अगस्त 29, 2012

POST : 99 मिला था कभी इक पैग़ाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

       मिला था कभी इक पैग़ाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) 

                      डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

मिला था कभी इक पैग़ाम दोस्ती का 
मगर अब डराता है नाम दोस्ती का ।

बुझाता रहा सबकी प्यास रोज़ साकी 
पिलाता हमें भी इक जाम दोस्ती का ।

नहीं दोस्त मिलते बाज़ार में कभी भी
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का ।

करेगा तिजारत की बात गर ज़माना
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का ।
 
जिएंगे - मरेंगे हम साथ दोस्तों के 
हमें सब को देना पैग़ाम दोस्ती का ।

दिलों में रहेंगे सब दोस्त याद बन कर 
बड़ा ख़ूबसूरत , अंजाम दोस्ती का । 

जहां भी रहें होंगे साथ दोस्त ' तनहा '
नहीं  नाम करना  बदनाम दोस्ती का ।
 

 
 
 


 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

एक जाम दोस्ती का👌👍