अप्रैल 07, 2015

POST : 479 राह पर साथ दोनों चले किसलिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   राह पर साथ दोनों चले किसलिए  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
राह पर साथ दोनों चले किसलिए 
फिर भी बढ़ते रहे फ़ासिले किसलिए  ।

आप तन्हा रहे , हम भी तन्हा रहे 
फिर बनाते रहे काफिले किसलिए  ।

मिल गए अजनबी , राह वीरान पर 
फूल उनके दिलों के खिले किसलिए  ।

रह के ख़ामोश सारा सफ़र तय किया 
क्या हुआ था हमें  लब सिले किसलिए  ।

सोचते ही रहे , उम्र भर बस यही 
दिल नहीं जब मिले हम मिले किसलिए  ।

एक झौंका हवा का न आया यहां 
घर के पर्दे थे सारे हिले किसलिए  ।

लोग अंधे यहां , रौशनी क्या करें 
दीप ' तनहा ' तुम्हारे जले किसलिए  ।