राह पर साथ दोनों चले किसलिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
राह पर साथ दोनों चले किसलिए
फिर भी बढ़ते रहे फ़ासिले किसलिए ।
आप तन्हा रहे , हम भी तन्हा रहे
फिर बनाते रहे काफिले किसलिए ।
मिल गए अजनबी , राह वीरान पर
फूल उनके दिलों के खिले किसलिए ।
रह के ख़ामोश सारा सफ़र तय किया
क्या हुआ था हमें लब सिले किसलिए ।
सोचते ही रहे , उम्र भर बस यही
दिल नहीं जब मिले हम मिले किसलिए ।
एक झौंका हवा का न आया यहां
घर के पर्दे थे सारे हिले किसलिए ।
लोग अंधे यहां , रौशनी क्या करें
दीप ' तनहा ' तुम्हारे जले किसलिए ।
फिर भी बढ़ते रहे फ़ासिले किसलिए ।
आप तन्हा रहे , हम भी तन्हा रहे
फिर बनाते रहे काफिले किसलिए ।
मिल गए अजनबी , राह वीरान पर
फूल उनके दिलों के खिले किसलिए ।
रह के ख़ामोश सारा सफ़र तय किया
क्या हुआ था हमें लब सिले किसलिए ।
सोचते ही रहे , उम्र भर बस यही
दिल नहीं जब मिले हम मिले किसलिए ।
एक झौंका हवा का न आया यहां
घर के पर्दे थे सारे हिले किसलिए ।
लोग अंधे यहां , रौशनी क्या करें
दीप ' तनहा ' तुम्हारे जले किसलिए ।
