रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"
रंक भी राजा भी तेरे शहर मेंमैं कहूं यह बात तो किस बहर में ।
नाव तूफां से जो टकराती रही
वो किनारे जा के डूबी लहर में ।
ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है
रोक रोने पर भी है अब कहर में ।
मर के भी देते हैं सब उसको दुआ
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में ।
सब कहीं सच ही पराजित हो रहा
बच सका ज़िंदा कहां इस दहर में ।
जगमगाने लग गईं रातें यहां
कोहरा छाने लगा पर सहर में ।
बिक गया ' तनहा ' यहां सब का इमां
लोग जाते हैं बदल हर पहर में ।
2 टिप्पणियां:
Wahh बहुत खूब
Wahh sir👌👍
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