मई 27, 2013

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके
अभी तक हौसला बाकी , नहीं झुकते हैं सर उनके।

यही बस गुफ़्तगू करनी , अमीरों से गरीबों ने
उन्हें भी रौशनी मिलती , अंधेरों में हैं घर उनके।

उन्हें सूली पे चढ़ने का , तो कोई ग़म नहीं था पर
यही अफ़सोस था दिल में , अभी बाकी समर उनके।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को
रहे सबको पिलाते पर , रहे सूखे अधर उनके।

हुई जब शाम रुक जाते , सुबह होते ही चल देते
ज़रा कुछ देर बस ठहरे , नहीं रुकते सफ़र उनके।

दिये कुछ आंकड़े सरकार ने , क्या क्या किया हमने
बढ़ी गिनती गरीबों की , मिटा डाले सिफ़र उनके।

हमारे ज़ख्म सारे वक़्त ने ऐसे भरे "तनहा"
चलाये तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके।

मई 26, 2013

तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) - डॉ लोक सेतिया

 तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जुड़ा था सभी कुछ
मेरे ही नाम के साथ लेकिन
ज़माने में नहीं था
कुछ भी कहीं पर भी मेरा
बहुत रिश्ते-नाते थे
मेरे नाम से वाबस्ता
मगर उनमें कोई भी
नहीं था मेरा अपना।

रहने को इक घर
मिलता रहा उम्र भर मुझे
मैं रहता रहा वहां
मगर परायों की तरह
कहने को जानते थे
मुझे शहर के तमाम लोग
लेकिन नहीं किसी ने
पहचाना कभी मुझे।

जो दोस्त बनाये
हुए न कभी मेरे अपने
दुश्मन भी मुझसे
दुश्मनी निभा नहीं पाये
साथ हमसफ़र चल नहीं सके
 मंज़िल तलक
रहबर भी राह मुझको
दिखला नहीं सके।

इख़्तियार मेरा खुद पर भी कहां था
अपने खिलाफ़ खुद हमेशा खड़ा रहा
अकेला था नहीं था
साया तक भी मेरा साथ
बस अपने आप से ही
बेगाना बन गया मैं। 

मई 22, 2013

भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भुला नफरत सभी की , हम मुहब्बत याद रखते हैं
सितम जितने हुए भूले , इनायत याद रखते हैं।

तुन्हें भेजे हज़ारों खत मुहब्बत के कभी हमने
नहीं कुछ भेज पाये हम , वही खत याद रखते हैं।

हमेशा पास रखते हैं तेरी तस्वीर को लेकिन
ज़माने से छिपाने की हिदायत याद रखते हैं।

मुहब्बत में कभी कोई शरारत की नहीं हमने
सताया ख्वाब में आकर शिकायत याद रखते हैं।

बनेंगे एक दिन मोती हमारी आंख के आंसू
तेरा दामन इन्हें पौंछे ,ये हसरत याद रखते हैं।

किसी को बेवफ़ा कहना हमें अच्छा नहीं लगता
निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं।

तुम्हारी पास आने दूर जाने की अदा "तनहा"
वो सारी शोखियां सारी नज़ाकत याद रखते हैं। 

मई 04, 2013

बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहुत ढूंढा ज़माने में , नहीं तुम सा मिला कोई
तुम्हारे बिन नहीं सुनता , हमारी इल्तिजा कोई।

इबादत छोड़ मत देना ,परेशां हाल हो कर तुम
यही रखना भरोसा बस , कहीं होगा ख़ुदा कोई।

हुई वीरान जब महफ़िल , करोगे याद सब उस दिन
वही महफ़िल जमाता था ,कहां उठकर गया कोई।

किया करते सभी से बेवफ़ाई जो हमेशा हैं
शिकायत क्यों उन्हीं को है नहीं उनका हुआ कोई।

कभी कह हम नहीं पाये , कभी वो सुन नहीं पाये
शुरू कुछ बात जब करते , तभी बस आ गया कोई।

छिपा कर इस जहां से तुम  इन्हें पलकों पे रख लेना
तुम्हारे अश्क मोती हैं ,  नहीं ये जानता कोई।

खताएं भी हुई होंगी , कई हमसे यहां "तनहा"
सभी इंसान दुनिया में , नहीं है देवता कोई।