मई 31, 2021

कुछ ठग इक बाज़ार सब ख़रीदार ( हाल-ए- बीमार ) डॉ लोक सेतिया

कुछ ठग इक बाज़ार सब ख़रीदार ( हाल-ए- बीमार ) डॉ लोक सेतिया 

 जल्दबाज़ी मत करना पढ़ना सोचना समझ आये तो समझना नहीं समझ सको तो उनसे कभी मत उलझना। ठग लोगों की बिरादरी है कोई चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं हैं उनका अपना धंधा है गंदा है मगर मुनाफा चंगा है। किसी को धरती पर सिक्का जमाना था किसी को समंदर पर कब्ज़ा जमाना था। हाय अपना भी कोई ज़माना था दुनिया हमारी उनका नहीं कहीं भी आशियाना था। मांगने से चाहे छीनकर मिला बना लिया सभी ठगों ने कोई ठिकाना था धेला पैसा बनते बनते बन गया इक आना दो आना चार आना था अठन्नी की हसरत बाक़ी थी रूपये की हैसियत को पाना था। हमने उनको नहीं ठीक पहचाना था देशभक्ति समाजसेवा सब झूठा बहाना था उन्हें तो दुनिया को उल्टा सबक पढ़ाना था लिखना नहीं सीखा था जो लिखा उसको मिटाना था उल्लू बनाकर सबको दिखाना था। हमने भी क़व्वाली को सच कर दिखलाना था जो दवा के नाम पे ज़हर से उस चारागर को ढूंढ लाना था। अपने क़ातिल को मसीहा कहकर दिल को बहलाना था मगर उनकी नज़र थी उनका निशाना था। 
 
  हर साल की तरह उनको जश्न मनाना था मगर अफ़सोस मौसम क़ातिलाना नहीं हर तरफ छाया वीराना था नशा था चढ़ा बिना पिये हर कोई दीवाना था साकी नहीं था न कोई पैमाना था बसंती को गब्बर सिंह को मनाना था । नाचना नहीं चाहिए झूमना भी अच्छा नहीं लेकिन उनको दिल अपना लगाना था झूठी तक़रीर की आरज़ू थी सच को दफ़नाना था। सारी दुनिया पर उनको परचम लहराना था हम लोग अच्छे बुरे हैं सभी उनका कौमी तराना था गुलाम सबको मानसिक तौर से बनाकर आप से अच्छा कोई नहीं शोर मच गया शोर देखो आया कैसा ठग वाला दौर खुद हंसना सभी को रुलाना था महरमछ के आंसू बहाकर अंदर से मुस्कुराना था। 
 
चूहों की दौड़ है बिल्ली मौसी का नहीं चलता ज़ोर है भौंकने वालों की नगरी में गधा बना सिरमौर है। डरने की क्या बात है जब गब्बर सिंह कहता मन की बात है तेरा मेरा साथ रहे जनता सदा उदास रहे चोरों की बरात चली सच की अर्थी साथ चली। टीवी पर ठग छाए हैं बड़े दूर की कौड़ी लाये हैं शीशे के महल बनाए हैं पत्थर जमकर चलवाएं हैं ये आधुनिक काल की बातें हैं बिन पानी की बरसातें हैं शीशे ये इतने पक्के हैं कोई इनको तोड़ नहीं सकता हवा का रुख उनके इशारे पर कोई आंधी को मोड़ नहीं सकता। टीवी पर बस दो चेहरे हैं शतरंज में ये दो मोहरे हैं बाकी सब बेजान खड़े खड़े मरते हैं बस ज़हर पीकर आह नहीं भरते हैं सुभानअल्लाह माशाल्लाह कहकर बादशाह सलामत रहे कहते रहते हैं। मसीहा है वही अत्याचारी है जाने कैसी बिमारी है जो दुनिया में सबसे झूठा है लाख सच पर वही भारी है। हम राजा-जानी हैं अभिनेता राजकुमार का अपना अंदाज़ था उसने अपनी शर्तों पर अभिनय कर खुद को सबसे अलग और बड़ा माना था क्या ज़माना था। उधर मीनाकुमारी का मंदिर और आखिरी सांस गिनती मां थी इधर शराब शराबी मयखाना था और क्या अजब तराना था। 
 

 

मई 28, 2021

ओटन लगे कपास ( शराफ़त की पढ़ाई नया नियम ) डॉ लोक सेतिया

 ओटन लगे कपास ( शराफ़त की पढ़ाई नया नियम ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे मंज़ूर है संयम और शराफ़त से आचरण का नियम लागू होना लेकिन सबसे पहले उन पर यही सख़्ती से लागू किया जाये , जिनको खुद पर कोई नियम कानून कोई रुकावट कोई सीमा रेखा कोई मर्यादा का पालन करना अपने शासकीय अधिकार का हनन लगता है। सिर्फ सोशल मीडिया पर झूठ नफरत असभ्य भाषा बिना आधार किसी को बुरा भला कहना बंद करवाना लाज़मी नहीं सभ्य समाज में बड़े छोटे सभी को नैतिकता और सच्चाई का पास रखना ज़रूरी है। संक्षेप में मगर बिल्कुल साफ और तथ्यात्मक ढंग से विषय की बात करते हैं। सरकार कोई नेता जब कोई बात कोई वादा कोई आरोप किसी पर भाषण में खुली सभा में या फिर संसद विधानसभा में किसी अदालत में अपना पक्ष रखते हुए बोलकर लिख कर या किसी तरह से सामने लाता है तब उसकी कही गई समझाई गई हर बात को ऐसे नियम कानून की कसौटी पर खरा साबित होना ही चाहिए और ऐसा नहीं होने पर उस पर कठोर करवाई की जानी चाहिए। देश जनता समाज को झूठ से बहलाना झांसे में रख कर सही को गलत और गलत को सच समझाने का काम देशभक्ति नहीं अपराध है संविधान की भावना का अनादर है जो सत्ता पर बैठकर कभी नहीं किया जा सकता है। चुनाव में वादा किया जो वास्तव में सच नहीं साबित हुआ तब ये गुनाह माफ़ी लायक कदापि नहीं हो सकता है। ऐसे अपराध की सज़ा पांच साल बाद चुनाव में हार ही काफी नहीं बल्कि उनको इक पल भी शासन का अधिकार नहीं होना चाहिए। अपनी बात से पलटते ही उनका तख़्ता पलट किया जाना चाहिए। 
 
सरकारी आंकड़े झूठे हों तो सरकार को रहने का अधिकार किसलिए और क्यों। कोई टीवी पर जनता को अपने किसी ढंग से निरोग होने का इश्तिहार देकर नाम पैसा शोहरत कमाता है लेकिन वास्तव में लोग उनकी कही बात मानने के बावजूद निरोग होते नहीं रोग बढ़ते जाते हैं तब सिर्फ वही इक शख्स नहीं उसके झूठ को जारी करने वाले सभी सहयोगी सहभागी टीवी अख़बार या उनके गोरखधंधे से फायदा उठाने वाले मुजरिम हैं लुटेरे हैं उन पर सज़ा और जुर्माना लगा कर जिनकी जेब से पैसा गया उनकी भरपाई की जानी चाहिए। सोशल मीडिया पर या टीवी अख़बार पर ज़हर को अमृत बनाना अपने कारोबार के बढ़ाने की खातिर उचित कैसे हो सकता है। सरकारी दफ़्तर में या पुलिस थाने या अदालत में डराने धमकाने रुतबा बढ़ाने को बिना कारण लोगों को अशिष्ट भाषा अनुचित अचार व्यवहार से अपनी मनमानी करना रिश्वत लेकर घर भरना क्या इसको किसी व्यक्ति अधिकारी शासक का विशेषाधिकार माना जाना चाहिए। किसी भी बहाने कोई भी मकसद बतलाकर आपराधिक आचरण को सही नहीं साबित कर सकते हैं। 
 
व्हाट्सएप्प फेसबुक ट्विटर सोशल मीडिया पर गंदगी नहीं होना काफी नहीं है गंदगी कहीं भी नहीं रहनी चाहिए और शराफत सोशल मीडिया की नकली दुनिया से पहले हमारी वास्तविक दुनिया में होना अधिक ज़रूरी और महत्वपूर्ण है। वो कहानी याद है ना पापी को सज़ा देनी है मगर पहला पत्थर वो मारे जिसने खुद कोई पाप नहीं किया हो। कमाल का विधान है जिनके अपकर्मों की कोई गिनती नहीं कर सकता वो हमसे हिसाब मांगेगे अच्छे बुरे कर्म हर बोली बात हर लिखी बात को परखेंगे कसौटी पर। इंसाफ़ का तराज़ू पकड़ने वाले से कोई सवाल नहीं पूछेगा कि आपका ये तराज़ू सभी को बराबर समझता भी है या नहीं। लेकिन उनके बाट बदल जाते हैं लेने के अलग देने के अलग अलग हैं। मगर जिनका आगाज़ ही झूठा हो उसका अंजाम सच कैसे होगा आपको सोचने की नहीं समझने की ज़रूरत है। यहां नियम कायदे कानून बनते हैं कागज़ पर ज़मीन पर दिखाई नहीं देता कोई भी कायदा कानून , बाल मज़दूरी महिला सुरक्षा , शिक्षा और रोटी से लेकर जीने का बुनियादी अधिकार पहले से है लेकिन बंद कानूनी किताब में वास्तव में कहां है। इंसान तो क्या पशु पक्षी जानवर तक के लिए नियम कायदे कनून हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि गधों तक के लिए कानून बनाया हुआ है हर गधे से दिन में आठ घंटे काम लेना उसको दिन में चार बार भोजन पानी के लिए अवकाश मिलना उसके पांव पर रस्सी बांधने से पहले मुलायम कपड़ा बांधना कानूनी नियम है इतना ही नहीं उसको उमस भरे मौसम में काम नहीं करवाने की भी शर्त राखी हुई है। 
 
कितने कानून बनाकर रख छोड़े हैं उनका पालन कोई नहीं करवाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात सभी ईमानदारी से कर्तव्य निभाने निष्पक्षता की न्याय की व्यवस्था की शपथ उठाकर कुर्सी पर बैठते हैं लेकिन अपनी शपथ कोई भी निभाता नहीं याद तक नहीं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। जिस देश की संसद में बड़े बड़े गंभीर अपराध के आरोपी बैठकर कानून बनाते हैं कानून को समझते नहीं उसकी खिल्ली उड़ाते हैं उस देश में बदलने को कोई कानून कारगर नहीं साबित हो सकता कभी भी। आधुनिक व्यवस्था पर कुछ दोहे लिखे हैं आखिर में आपके लिए हाज़िर हैं। 
 
 

           देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे          - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

मई 26, 2021

बदनाम बहुत हैं गुमनाम नहीं हैं ( लज्ज़त ए शोहरत ) डॉ लोक सेतिया

बदनाम बहुत हैं गुमनाम नहीं हैं ( लज्ज़त ए शोहरत ) डॉ लोक सेतिया 

    कोठों की बदनामी धंधा चमकाती है गब्बर सिंह का नाम मीलों तक दहशत महसूस करवाता था इस पर डाकू को नाज़ था अफ़सोस हुआ जब तीन साथियों ने नाम मिट्टी में मिला दिया। काली दाढ़ी वाले बाबा जी की खिल्ली जम कर उड़ाई जा रही है उनके चेहरे पर शिकन नहीं है उनका निशाना धंधे पर है धंधे में मुनाफा बढ़ता है तो खुद मज़ाक बन जाना खराब बात नहीं है। सफ़ेद दाढ़ी वाले से उन्होंने सीखा है खबरों में रहना ज़रूरी है भले विषय का क ख ग नहीं आता हो चर्चा में भाग लेना बड़े काम आता है। झूठ पकड़ा जाता है तब भी झूठ पर घंटा भर वाद विवाद चलता रहता है जिस में असली विषय किसी को याद ही नहीं रहता। अपमानित महसूस करना कारोबारी लोगों के लिए या राजनेताओं के लिए महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। जिस देश में सबसे बड़ी अदालत अपने को अपमानित करने वाले पर एक रुपया जुर्माना ठोकती है उस देश समाज में अपमानित सम्मानित होने पर चिंता करना फज़ूल है। 
 
   चलो झूठे काल्पनिक किस्से कहानियां पढ़ना छोड़ विचार करते हैं वास्तविकता क्या है। जिस इतिहास पर आपको गर्व है उसमें कितनी मिलावट कितनी बनावट है सोचने लगोगे तो पागल हो जाओगे। जिसको मसीहा लिखा हुआ है समझने लगे तो क़ातिल पाओगे अभी भी नहीं सच को सच कहोगे तो झूठ बोल कर झूठ सुनकर झूठे लोग कहलाओगे वक़्त के बाद जागोगे क्या होगा बस पछताओगे। कथा कहानी कभी सच नहीं होती है लिखने वाली कलम तक रोती है। आखिर में सब अच्छा होता है दर्शक अकल का कच्चा होता है लेकिन सबक यही सीखा है हमने बाद में जो होगा देखा जाएगा जीवन भर सबको लूटा खसूटा हैं हमने। स्वर्ग और नर्क जन्नत दोजख़ कितने जाकर कब देखा है जिनके हाथ कटे होते हैं उनकी भी भाग्य रेखा है। महल खड़े किये महनतकश लोगों ने खून पसीना उनका बहा था पैसा था भूखे नंगे गरीब लोगों का शिलालेख पर बादशाह का उल्लेख लिखा था। ज़ुल्मों की थी जो कहानी किसने लिखी कैसी थी मुहब्बत की दास्तां पुरानी और हमने समझा नहीं न जाना वहशत को चाहत जब माना। मेरी इल्तिजा सुनते हो प्यार करना सच्चा मगर ताजमहल न बनवाना हाथ पकड़ना साथ निभाना रिश्तों को मत जंजीर बनाना। शहंशाहों के ताज से अच्छा होता प्यार का छोटा सा आशियाना बसाना। 
 
   खुद को जो कहते हैं सेवक शासक बनकर सितम हैं करते उनके लाल कालीन के नीचे जाने कितने लोग कुचले पड़े हैं मगर ये बेरहम शान से चलते। गरीबों का हक छीन कर सब अरमान शासकों के पलते। धर्म की उपदेश की बातें दुनिया को समझाते हैं सबने देखा उनको खुद पाप की राह बढ़ते जाते हैं। छल कपट से बना इमारत उसको मंदिर मस्जिद कहते हैं क्या ऐसे घरों में ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु रहते हैं। हमने सच को नहीं है जाना झूठा पढ़ते हैं अफसाना तोते की तरह शब्द रटते हैं भावार्थ समझा न माना। देने वाला कोई नहीं है दाता बना सबसे बड़ा भिखारी नैतिकता क्या होती है और क्या होती है ईमानदारी ये सब भाषण की बातें हैं करते उल्टी बातें सारी जिसको बताते है दुनियादारी। शोहरत की चाहत जो हैं करते मुजरिम हैं गुनहगार हैं सारे कैसा युग आजकल है आया सबको डूबकर लोग ढूंढते हैं किनारे। बदनाम होकर भी खुश हैं झूठे लोग नाम मिला पहचान मिली है। मुझे कहा था मेरे बेटे ने सच है क्या आपने ये बात पढ़ी है। 
 
   इधर कब से कुछ लोग परिवारवाद की राजनीति से खानदानी कारोबार से मालामाल होने वालों को देश समाज का लुटेरा बता रहे थे अच्छे अच्छों की हस्ती मिटाकर धूल में मिलाने की कसम खा रहे थे। उनका कोई घरबार नहीं सबको समझा रहे थे अपना खाली झोला भरते भरते खुद सब देश समाज के लिए है मीठी मीठी बातों से उल्लू बना रहे थे। रात को दिन दिन को रात बनाकर जादूगिरी दिखला रहे थे। सोशल मीडिया टीवी अखबार सभी को कठपुतली बनाकर नचवा रहे थे सब उनके गुण गाकर अपना धंधा उनके गोरखधंधे से हाथ मिलाकर बढ़ा रहे थे। ऑफ दि रिकॉर्ड यार लोग समझा रहे थे हम खुद अपना नया इतिहास बना रहे थे। कोई आगे न पीछे बाद में सब भूल जाएंगे बस इसलिए उल्टी गंगा बहा कर कीर्तिमान बना रहे थे। कोई वारिस नहीं मगर विरासत बढ़कर शोहरत की बुलंदी पाकर इतरा रहे थे। बनाना नहीं कुछ भी जो भी पुराना बनाया हुआ है उसको ढा रहे हैं। हम जहां पांव रखते हैं उस धरती को बंजर बना कर कांटों की हस्ती दिखला रहे हैं। हम इंसान नहीं मशीन हैं बुलडोज़र की तरह बड़ी ऊंची इमारतों को ख़ाक में मिला रहे हैं। लोग टीवी पर देखते हैं हम मुस्कुरा रहे हैं जबकि हम खलनायक की तरह मन ही मन ठहाका लगा रहे हैं। जनता को क्या क्या सिखला रहे हैं बेचते हैं ज़मीर तक और आत्मा तक बिकवा रहे हैं। शोहरत जुर्म भी होती है जब अच्छे कार्य से नहीं खराब आचरण से भी पाने की ललक होती है हम सच करके दिखला रहे हैं। मतलबपरस्ती को देशभक्ति समाजसेवा घोषित करा रहे हैं।

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मई 25, 2021

दीवानापन है या कुछ और ( ब-कलम-ख़ुद ) डॉ लोक सेतिया

   दीवानापन है या कुछ और ( ब-कलम-ख़ुद ) डॉ लोक सेतिया

किसी ने नहीं पूछा और कौन किसलिए पूछेगा मैं क्या हूं कौन हूं। सच्ची बात तो यही है अब दुनिया को किसी को समझने की चाहत क्या ज़रूरत नहीं फुर्सत भी नहीं। बस हर कोई खुद को लेकर परेशान है हैरान है अपने से अनजान है। सोचा कोई नहीं समझने वाला तो दिल से दिल की बात करते हैं फिर इक बार खुद से मुलाकात करते हैं। लिखना ज़रूरी है कभी दुनिया की भीड़ में गुम हो गए तो जैसे बच्चों की जेब में नाम पता लिख कर रखा होता है जिस किसी को मिले घर स्कूल पहुंचा सकता है। अक्सर लोग पूछते हैं आपका नाम क्या पहचान क्या है किसी दिन मुझे बताएंगे आपका वजूद क्या है। मंज़िल-ए - मकसूद क्या है। मुझे चाह थी ज़रूरत थी घड़ी दो घड़ी कोई प्यार की बात करता मुझसे भी। मगर दुनिया तिजारत करती है मुहब्बत बिकती है नीलाम होकर बदले में खोटे झूठ वाले सिक्कों के दाम पर सच का मोल यहां दो कौड़ी भी नहीं और सच्चाई का तलबगार मिलता ही नहीं। सच की बात करने वाले हैं दुनिया में सच से बचते हैं घबराते हैं झूठ से मिलते हैं हाथ मिलाते हैं गले लगाकर साथ निभाते हैं। रिश्तों दोस्ती दुनियादारी के नातों में तमाम लोग तराज़ू लिए खड़े मिले। मुझसे मेरी आज़ादी लेकर अपने पिंजरे में बंद कर मुझे अपना बनाकर रखना चाहते थे और मुझे सोने वाले पिंजरे भी कभी नहीं भाये। कीमत सस्ती महंगी की बात नहीं मुझे तो अपनी अनमोल चाहत को बिना किसी मोल बिकना पसंद था कोई चाहत का तलबग़ार मिलता जो कभी। 
 
बड़ी देर बाद समझे हैं किसी से मुहब्बत की चाहत करते करते खुद से कभी मुहब्बत ही नहीं की। मेरे भीतर अथाह सागर है प्यार का जिसको दुनिया ने कभी देखा समझा नहीं खुद अपने आप को प्यार करना ज़रूरी है बाहर किसी से कभी मांगने से नहीं मिलता है प्यार ज़माने में। सुनते थे कोई कस्तूरी मृग होता है जो दौड़ता रहता है कस्तूरी की सुगंध के पीछे जबकि वास्तव में कस्तूरी खुद उसके भीतर छुपी रहती है। मुझे अपने भीतर झांकना होगा खुद को तलाशना समझना होगा और खुद से दिल लगाना होगा। बेशक मुझे हंसना मुस्कुराना गुनगुनाना होगा ज़िंदगी को ज़िंदगी की तरह जीना होगा मौत आएगी जब ख़ुशी से गले लगाना होगा मौत से भी नाता निभाना होगा। ज़िंदगी को अलविदा कहना ज़रूरी है मगर ज़िंदा हैं तो खुलकर जीना भी ज़रूरी है। ज़िंदगी इक फ़लसफ़ा है घुट घुट कर जीना ज़िंदगी नहीं जीने की मज़बूरी है। 
 







मई 24, 2021

किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

  किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया 

 मुकद्दर ने किसी को तख़्तो-ताज़ बख़्श दिया कितने बंदर कलंदर बन बैठे सिकंदर सभी हैरान हैं गधे बड़े पहलवान हैं। जो नहीं जानते कुछ भी अनजान हैं मगर अब ऊंची जिनकी दुकान है फीके बेशक उनके पकवान हैं वही लोग लगते देश की शान हैं। यही नसीब की बात है उनकी सुबह है आपकी रात है सूखा मचाती ये बरसात है फालतू की उनकी नई बकवास है सभी कह रहे वाह वाह क्या बात है। समझ आएगी साफ साफ बताते हैं ये सब जो उल्लू बनाते हैं खूब खाते कमाते हैं झूठ फरेब छल कपट की सीढ़ी चढ़ते जाते हैं आपको हर बात समझाते हैं उनके शीशे के घर हैं मगर फिर भी सभी पर पत्थर चलाते हैं। आपको फ़िल्मी डायलॉग की तरह बोलकर ऊंची आवाज़ में सबसे बड़ा झूठ यही सच समझना आपको कहते हैं और आप मान भी जाते हैं। आओ आपको दो ऐसे लोगों से मिलवाते हैं जिनको समझ कर भी लोग समझ नहीं पाते हैं। 
 
कोई राजनेता है कोई अभिनेता है उसने किसी का कोई भला नहीं किया है सब खुद लिया है कुछ भी नहीं दिया है सब मानते हैं ये सबसे ख़राब है मगर जादू उसका चल रहा है भिखारी सभी हैं इक वही नवाब है। जिसने किया सबका ख़ानाख़राब है वही मांगता सबसे हिसाब किताब है ये खोटा सिक्का चल रहा है देश में ठग ऑफ हिन्दुस्तान हैं दाता के भेस में। नहीं कुछ भी उसने कभी भी पढ़ा है अनपढ़ है नासमझ है और नकचढ़ा है बिठाया था आंखों पर लो सर पर खड़ा है कहता है दुनिया में सबसे बड़ा है। खोटा सिक्का चलता है बस समझो खरा है। इक और से मिलवाना हैं ये सच है झूठा अफ़साना है उसने सबको योग से भोग तक महारोग से राजयोग तक जो नहीं सीखा समझाना है खुद पढ़ा नहीं आपको पढ़वाना है उसका खाना खज़ाना है कहता है सब कुछ लुटवाना है मगर हाथ किसी के कुछ नहीं आना है उसका हर जगह ठिकाना है। सभी जानते हैं इन दोनों को ये झूठे हैं धोखेबाज़ हैं सब जानते हैं मगर फिर भी सब जाल में उन्हीं के फंसे हैं खुश हैं ये जैसे भी हैं हमारे लिए बढ़िया हैं सोचते हैं। संक्षेप में इक नज़्म पुरानी दोहरा रहे हैं ये देश को सपनों से बहला रहे हैं जो इनकी पोटली में रखा नहीं है दिखला रहे बेचते हैं करोड़ों कमाकर दिखला रहे हैं। राजा नंगा कहानी को बदलकर उल्टी गंगा बहा रहे हैं। अंधे रास्ता दिखा रहे हैं गूंगे मधुर गीत सुना रहे हैं सभी बहरे ताली बजा रहे हैं। 
 
किसी ने जन्नत का ख़्वाब बेचा किसी ने सब का बनाकर नकाब बेचा उसने अपना चेहरा दुनिया भर को आईना कहकर जनाब बेचा। समंदर है दावा किया था जनता को सूखा तलाब बेचा क्या क्या खरीदा क्या क्या बनाया सवाब मिलता है बतलाकर अज़ाब बेचा। जाने किस शायर की लिखी ये नज़्म है क्या सोचकर लिखी मगर इक बाबा इक राजनेता ने उसको सच कर दिखाया है। काठ की तलवार बनाकर जंग लड़ता है जीत का परचम फहराया है। नज़्म पेश है वीडियो से पहले लिख देता हूं आभार सहित जिसकी रचना है गुमनाम अनाम का धन्यवाद। रावी से तीन नहरें निकलीं दो सूखी और इक कभी बही ही नहीं। जो बहती नहीं उस में तीन लोग नहाने को आये दो डूब गए इक मिलता ही नहीं। जो मिलता नहीं उसको तीन गांय मिलीं दो बच्चे देने के काबिल नहीं एक गर्भवती होना नहीं जानती जो गर्भवती नहीं उसने तीन बछड़ों को जन्म दिया। दो अपाहिज एक उठ भी नहीं सकता। जो उठता तक नहीं उसका मूल्य तीन रूपये दो खोटे और एक जो चलता ही नहीं जैसे पुराने हज़ार पांच सौ वाले नोट रद्दी की तरह आजकल। उस चलन से बाहर नहीं चलते रूपये की कीमत आंकने तीन सुनियार पारखी आये जिन में दो अंधे हैं और एक को कुछ भी दिखाई नहीं देता है। उस को तीन मुक्के मारे गए जिन में दो चूक गए और एक लगा ही नहीं। अध्याय का अंत वीडियो अभी पेश है। 
 

 

मई 23, 2021

जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 नहीं टीवी चैनल वाले नहीं देख सकते अपने पालनहार के मुखमंडल पर उदासी का भाव। जनता का क्या है रोना उसका नसीब है आपकी पलकों पर नमी नहीं अच्छी लगती है। दिन भर यही सबसे ज़रूरी खबर चलती रही। मान गए प्यार हो तो ऐसा ही हो अपने महबूब का खिलता चेहरा कभी मुरझाया नज़र नहीं आये सच टीवी एंकर को लग रहा था खबर पढ़ना छोड़ वो भी रो दे काश कि सामने बैठे होते हज़ूर तो अपने टिशू पेपर से उनकी पलकों को पौंछती। आंचल दुपट्टा रहा नहीं क्या करें साड़ी का पल्लू ही होता लेकिन फैशन जीन टॉप का ठहरा। जो हमने दास्तां जनता की सुनाई आप क्यों रोये तबाही तो वाराणसी की जनता पे आई आप क्यों रोये। ये गीत बजाना चाहिए था मगर हो नहीं पाया मगर जहांपनाह की उदासी की वजह कुछ लोगों की जान जाना नहीं हो सकता है। मामला गंभीर है मन की बात शायद अभी कुछ समझनी समझानी रह गई है। इस में कोई शक नहीं कि वास्तविक कीमती अश्क़ वही होते हैं जिनको कोई पलकों से ढलने नहीं देता चुपचाप पी जाते हैं बेबसी के आंसू लोग आह भी नहीं भरते। लेकिन कीमत समझी जाती है उन अश्क़ों की जो बहते ही नहीं किसी दामन को भिगोते भी हैं। टुकड़े हैं मेरे दिल के ए यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू। उनका हाल देख कर लोग ज़ार ज़ार रोने लगे , हमारा दर्दो ग़म है ये इसे क्यों आप सहते हैं फ़ना हो जाएगी सारी खुदाई आप क्यों रोये। सैलाब की तरह बहाकर ले गए सभी को इतने लोग तो समंदर में आये ताउते तूफ़ान में तबाह नहीं हुए जितना उनकी भीगी पलकों में डूब कर फ़नाह हो गए हैं। 
 
 आंसुओं की दास्तां लिखते लिखते कथाकार की कलम उदास हो जाती है। आशिक़ के अश्क़ों पर कितने बेमिसाल शेर हैं शायरी में अश्क़ का रुतबा बड़ा ऊंचा है मुस्कुराहट की तो कोई कीमत नहीं आंसुओं से हुई है हमारी क़द्र , उम्र भर काश हम यूं ही रोते रहें आज क्योंकि हुई है हमें ये खबर। बादलों की तरह हम तो बरसे बिना लौट जाने लगे थे मगर रो पड़े। आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े। कभी लिखा था हमने भी बस ज़रा सा मुस्कुराए तो ये आंसू आ गए वर्ना तुमसे तो कहना ये अफ़साना न था। ये राजनीति है जनाब यहां एक एक आंसू का हिसाब रखते हैं गिन गिन कर बदला लेते हैं। कोई कलाकार पेंटिग बना सकता है बादशाह के इंसाफ के तराज़ू के पलड़े पर कितनी लाशें एक पलड़े पर मगर झुका हुआ पलड़ा होता है जिस पलड़े पर किसी का इक आंसू गिर गया है। महिलाओं को अच्छी तरह मालूम है ये हथियार कभी नाकाम नहीं होता है उनका रोना किसी को जीवन भर रुला सकता है जब कोई तरकीब नहीं काम आती है आज़मा सकता है। आंसुओं पर दो कविताएं इक नज़्म पेशा हैं।

दो आंसू ( कविता ) 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू।  
 

मां के आंसू ( कविता ) 

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं। 
 
 
 
 

मई 21, 2021

व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया

   व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया 

 सदियों पुराना लंबा सफर है संदेश भिजवाने का मिलने का खुला पोस्टकार्ड मिलता था कभी बंद लिफ़ाफ़े को देख कर हाल समझ जाते थे। कितने फ़िल्मी गाने प्यारे प्यारे सुनाई देते थे चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए। जो दुनिया से रुख़सत हो जाते उनकी याद आती थी तब यही कहते थे उधर से कोई डाकिया चिट्ठी लेकर आता किसी तरह। अब मत पूछो संदेश भेजते हैं अपने दिल के जज़्बात बयां करते हैं हालात बतलाते हैं तो सोशल मीडिया पर कोई समझता ही नहीं। भीड़ है मगर सभी अकेले हैं जानते हैं मगर सभी अजनबी लगते हैं कभी कभी कोई पढ़ता है तो सच पढ़कर नाराज़ हो जाता है क्योंकि अजीब मौसम है व्हाट्सएप्प मेसेंजर का हर कोई अपनी कहता है और जवाब भी चाहता है जो उसको भला लगता हो वही लिख कर भेजे कोई।  ख़त दोस्ती और मुहब्बत को कायम रखते थे मगर ये नामुराद सोशल मीडिया वाले संदेश आपसी दूरी को और भी बढ़ा देते हैं चार कदम दूर बैठा भी दिल से इतना दूर हो जाता है कि सात समंदर पार की दूरी से भी अधिक फ़ासला लगता है। मुझे याद आया कॉलेज में रहते थे तब परिसर में छोटा सा डॉकघर हुआ करता था क्लॉस से हॉस्टल जाते बीच में रुकते दोपहर का भोजन करने से पहले कोई ख़त मिले यही हसरत होती थी प्यार की दोस्ती की अपनेपन की भूख पेट की भूख को भुला देती थी। कमरा नंबर बताते थे और डाकिया चिट्ठी पकड़ा देता था हज़ार युवक पढ़ते थे किसी का नाम ज़रूरी नहीं हुआ करता था। शायद ही किसी दिन मुझे निराशा होती थी जब कोई डॉक मेरे नाम की नहीं मिलती थी सभी दोस्त हैरान होते थे मुझे रोज़ कैसे चिट्ठियां मिलती हैं ये किसी ने नहीं समझा कि मैं हर दिन कितने अपनों को खत लिख कर भेजता था। उस ज़माने में कितने लोगों से कितने साल पास नहीं होकर भी रिश्तों में नज़दीकी बनाये रखी थी। वास्तव में मेरी ख़त लिखने की आदत ने ही मुझे लेखन की राह पर ला दिया है।
 
चिट्ठियां बड़ी संभाल कर रखते थे बंद बक्से में अलमारी में और कुछ बिस्तर पर सिरहाने तकिये के नीचे आधी रात को जागते फिर से पढ़ते थे। ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू कोरे कागज़ पे लिख दे सलाम बाबू। क्या ज़माना था स्याही की खुशबू की महक समाई होती थी लिखावट में जो पढ़ने वाले के भीतर समा जाती थी। बाज़ार से किताबों की दुकान से लेटर पैड और पैन चुनकर लाया करते थे। रंग बिरंगे पैड पर कलाकारी की हुई होती थी भेजने वाले की पहचान नज़र आती थी। कलम-दवात की स्याही से जेल पैन तक पहुंचते पहुंचते शब्द लिखावट साफ और गहराई बढ़ती गई मगर दिल को छूने वाले एहसास जज़्बात जाने कहां खो गए हैं। बात रूह तक नहीं पहुंच पाती आंखों से दिल में उतरती नहीं दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेते हैं हम आजकल। शायद अब कभी कोई इतिहास की धरोहर बनकर किताब में दर्ज किसी जाने माने नायक की लिखी चिट्ठियों को लोग याद ही नहीं करते। अमृता प्रीतम की जीवनी रसीदी टिकट जैसा अनुभव मिलता नहीं इधर शोहरत वाले अपनी आत्मकथा लिखते लिखवाते हैं मगर ज़िंदगी की वास्तविकता से कोसों दूर बनावट की बातें। अब  राजनेता की रेडियो पर कही तथाकथित मन की बात में मन की कोई बात होती ही नहीं अनबन की बात लगती है। 
 
फोन क्या आया सब बदलता गया और बदलते बदलते इतना बदला जो लोग खुद ही बदल गए। कभी फोन पर सभी से आपसी हाल चाल की बातें हुआ करती थीं। धीरे धीरे फोन का महत्व कम होता गया और औपचारिकता की बातें होने लगी। अब बस कुछ करीबी लोगों को छोड़ किसी का फोन आता है तो इक चिंता होती है क्यों आया है फिर भी सब ठीक हो तो सोचने लगते हैं कोई मतलब कोई ज़रूरत कुछ काम होगा और पूछने से बचते हैं बल्कि सोचने लगते हैं कोई बहाना बनाकर पीछा छुड़ाने को लेकर। रिश्तों की मधुरता जाने कब ख़त्म हो गई जब लोग स्वार्थी और खुदगर्ज़ बनते बनते आदमी से बेजान पत्थर बन गए हैं। अभी बीस साल पहले अख़बार पत्रिका में पाठकों की बात बड़ी महत्वपूर्ण समझी जाती थी संपादक पाठक को भगवान की तरह आदर देते थे आलोचना करने पर भी आभार जताया जाता था। विज्ञापन और पैसा टीआरपी जब से पाठक से बड़े लगने लगे टीवी अख़बार पत्रिका को प्रशंसा के पत्र ईमेल ही अच्छे लगने लगे हैं। डॉक से मिले खत रचनाएं धूल चाटती पड़ी होती हैं कहीं। वास्तव में ईमेल कभी चिट्ठियों की जगह नहीं ले सकते हैं। कारोबारी  बात सामान बेचने खरीदने या सरकारी सामाजिक संगठनों संस्थाओं की सूचनाओं का आदान प्रदान जानकारी टीवी अख़बार के खबर आदि से लेकर अपने आर्थिक उद्देश्य की ज़रूरत भर बन गए हैं पल भर बाद कूड़ेदान में मिलते हैं। 
 
यूं तो खतो -किताबत पर बहुत लिखा लिखने वालों ने। नसीम अंसारी कहते हैं " मैं रौशनी पे ज़िंदगी का नाम लिख के आ गया , उसे मिटा मिटा के ये सियाह रात थक गई।" लेकिन मैंने जब से चिट्ठी की जगह सभी को संदेश भेजने शुरू किये व्हाट्सएप्प के मायाजाल में उलझकर बड़े हैरतअंगेज़ अनुभव हुए हैं लोग सच से घबराकर बिना पढ़े समझे मुझे समझाने लगते थे व्यर्थ समय बर्बाद करते हैं किसी को सच्चाई से कोई मतलब नहीं रहा। लेकिन हद की भी हद नहीं होती जब लोग पढ़कर जवाब देने की जगह सवाल उठाते हैं लिखने का हासिल क्या है पूछते हैं। ऐसे में दुष्यन्त कुमार का शेर याद आना ज़रूरी है। कहते हैं दुष्यन्त कुमार " हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है।"






मई 18, 2021

पागलपन से मानसिक दिवालियापन तक ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) डॉ लोक सेतिया

 पागलपन से मानसिक दिवालियापन तक ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

 हम जिसको आधुनिक समाज का भविष्य कहते हैं वास्तव में समझदारी क्या नासमझी से भी अधिक इक पागलपन है जो विकास के नाम पर मानसिक दिवालियेपन तक पहुंच गया है। और ये बात किसी एक जगह नहीं सभी जगह दिखाई देती हैं लेकिन हम देखना चाहते नहीं हैं। जिसको जो चाहिए उसको अपनी ज़रूरत से बढ़कर कुछ नहीं लगता और उसकी ख़्वाहिश से बाकी लोगों देश समाज का कितना नुकसान हो सकता है ये कोई नहीं सोचता है। जैसे अभी इंटरनेट के 5 जी की बात हो रही है और जिनको हर चीज़ जल्दी और सबसे आसान चाहिए उनका तर्क है जिनको टॉवर से निकलती तरंगों से खतरा लगता है उन्हीं को साबित करना होगा कि ऐसा कैसे होगा। अर्थात आपको ज़हर बेचने वाला पहले ज़हर पीने की शर्त रखता है बाद में अगर ज़हर पीकर आपको कुछ हुआ तब वो क्षमा मांग कर हिसाब चुका देगा। अभी तक विकास ने यही दिया है हमने कुदरत से खिलवाड़ कर धरती पानी हवा पेड़ पक्षी सभी का हाल खराब कर दिया है। बंद कमरों में बैठ ज़मीनी हक़ीक़त से अनजान लोग खुद को समझदार मानकर अतार्किक निर्णय करते रहते हैं जिनसे इंसान और दुनिया को क्या हासिल होगा किस कीमत पर ये सवाल कोई नहीं करता है। इक दौड़ में शामिल हैं सभी कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता है और शासक लोग हाथी घोड़ों पर आम आदमी को नीचे कुचल कर आगे बढ़ते थे आजकल आधुनिक हवाई जहाज़ और मानवता को विनाश की तरफ धकेलती जंग की नीति अपनाकर हथियार और विनाशकारी बंब बनाने से लेकर चांद मंगल पर जाने की बात करते हैं। 
 
    आज़ादी के बाद राजनेताओं ने सत्ता पाकर जनकल्याण गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य और यहां तक कि सही मायने में आज़ाद होने का अर्थ निडरता से समान अधिकार पाकर जीना की ज़रूरी बात को दरकिनार कर शासकों की महत्वांकाक्षा उनकी मनमानी उनके विशेषाधिकार पर ध्यान दिया है। जिनको कलाकार कलमकार साहित्यकार कथाकार और आधुनिक संदर्भ में टीवी अख़बार सोशल मीडिया को सही मार्गदर्शन करना था खुद भटक गए अपने अपने स्वार्थ में अंधे होकर। ये कैसी आज़ादी कैसा विकास कैसा लोकराज है जिस में मुट्ठी भर राजनेता अधिकारी शासकीय कर्मचारी और उद्योगपति कारोबारी फलते फूलते रहे और सत्तर फीसदी जनता भूखी नंगी बेबस है। लेकिन सरकार अधिकारी नेता राजनैतिक दल बदलने से व्यवस्था बदली नहीं बल्कि हालात खराब से भयावह होते गए हैं। सत्ता में जिनको पागल कर दिया है उनको अपना अपराध मानवता के ख़िलाफ़ आचरण अनुचित कभी नहीं लगता है। जनता और नागरिक से कानून पालन की उम्मीद करने वाले खुद अपनी मर्ज़ी से कायदे कानून को बदलते ही नहीं बल्कि देश के संविधान की भावना की धज्जियां उड़ाते हैं निरंकुश होकर जनहित विरोधी व्यवस्था स्थापित करते हैं। 
 
 सवाल उठता है कि क्या वास्तव में हम देशवासी आमजन खामोश रहने को विवश हैं या फिर हम सिर्फ अपने पुराने इतिहास की वीरों की गाथाओं पर गर्व करते हैं मगर खुद कायरता का जीता जागता उद्धाहरण बन गए हैं जो मतलब के बगैर समाज देश की खातिर सामने खड़ा होने को तत्पर नहीं है। तालियां बजाने लोग तमाशाई होते हैं खेल के खिलाड़ी नहीं और जिनको कुछ करना होता है वो लोग जीत हार की नहीं सही और गलत की चिंता करते हैं। सौ साल तक आज़ादी की जंग लड़ने वालों को अंजाम की चिंता कभी नहीं थी उनको जीना नहीं था गुलामी की कैद में और गुलामी की जंज़ीरों से भारतमाता को मुक्त करवाने को हंसते हंसते सूली पर चढ़ गए थे। क्या हम उनके बलिदान और उनकी अपेक्षाओं का निरादर नहीं करते जब हम चाटुकारिता और व्यक्ति दल के लिए अपनी निष्ठा रखते देश और समाज को पीछे छोड़ देते हैं। 
 

    आखिर इस दर्द की दवा क्या है - समस्या को समझने के बाद निदान की बात। 

एक एक कर सभी की बात करते हैं और ये जो भी करना था मगर नहीं किया और जो नहीं करना चाहिए था वो करते रहे उस को ठीक कैसे कर सकते हैं उन पर अंकुश कैसे लगा सकते हैं। पहले सरकार नेताओं शासन चलाने वाले अधिकारी वर्ग की बात करते हैं। राजनेता चुनाव लड़ते समय वादे करते हैं आपकी समस्याओं का समाधान करने के मगर जब चुने गए तब अपनी कही बातों पर खरे साबित नहीं होने पर उन पर कोई दंडात्मक करवाई कोई नहीं कर सकता जबकि संविधान की ईमानदारी की शपथ लेते हैं जनता देश की सेवा करने की निभाते नहीं क्या लोकतंत्र में ये सबसे बड़ा अपराध नहीं है। चुनाव आयोग न्यायपालिका पुलिस अन्य संस्थाएं उन पर नियुक्त लोग भी वास्तविक कर्तव्य को निभाना छोड़ केवल औपचारिकताएं निभाते हैं। जब जिस किसी को किसी भी काम पर रखना होता है तब कार्य नहीं करने पर मिला वेतन सुविधाएं छीन कर उन को जुर्माना लगाने गलत किया उसका खमियाज़ा कोई नहीं भरे इसलिए  उन पर हर्ज़ाना भरने का नियम होता है। जब तक नेताओं अधिकारियों पुलिस सुरक्षा दलों पर उनकी नाकामी लापरवाही पर सज़ा देने का कानून सख़्ती से लागू नहीं किया जाता ये लोग जनसेवा देशसेवा के नाम पर मनमानी करते गुलछर्रे उड़ाते रहेंगे। 
 
कोई आपको योग से निरोग बनाने का उपाय बताकर खूब मालामाल होता है मगर आपको क्या वास्तव में जो दावा था हासिल हुआ और अगर नहीं तो उसकी ठगी कब तक होने दी जा सकती है। ये साबित करना उनका कर्तव्य है कि उनकी बात झूठ नहीं है जबकि ये सभी चालाकी नहीं चतुराई से जालसाज़ी करते हैं आपको इश्तिहार में 90 से 99 फीसदी का झांसा देकर। फायदा किसी को नहीं होता क्योंकि उनका एक फीसदी आंकड़ा बचाव की खातिर है। कोई आपको कीटनाशक मिली शहद कोई सब्ज़ी कोई खाद्य पदार्थ बेचता है पैसे की खातिर आपकी जान स्वास्थ्य से खिलवाड़ करता है। सरकार कानून सभी जानते हुए आंखें बंद रखते हैं कारोबार का मतलब चार गुणा मूल्य पर बेचना नहीं होता है एक के साथ एक मुफ्त  भी जुर्म होना चाहिए आपको लागत पर उचित ही नहीं तर्कसंगत मुनाफा अपनी आजीविका चलाने को लेने की अनुमति होनी चाहिए अन्यथा आप सौदागर नहीं लुटेरे हैं। कितनी एजेंसी आपको बीमा पॉलिसी खरीदने को लुभाती हैं मगर जब किसी को भुगतान करना पड़ता है तब ये ईमानदारी से अनुबंध नहीं निभाते हैं। टीवी चैनल अख़बार फिल्म वाले अगर रास्ता दिखलाना छोड़ पैसा बनाने को मार्ग से भटकाने का काम करते हैं तो ये भी साधुवेश में ठगना ही है। कहने का अभिप्राय इतना है कि जिसको जो करना चाहिए उसका वो नहीं करना गुनाह है और हर गुनहगार को सज़ा मिलनी चाहिए बल्कि जिनको अपराध नहीं होने देने थे उनका जुर्म और कड़ी सज़ा का हकदार है।

मई 17, 2021

हम शैतान के पुजारी हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          हम शैतान के पुजारी हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  शोध करने पर जो नतीजा निकला वो कुछ ऐसा ही है। वो जिसने दुनिया बनाई आदमी को बनाया आदमी ने उसको मार डाला और मारने को इक शैतान बना कर उसे भगवान नाम दे दिया। पढ़ते रहे समझाया जाता रहा उसकी खोज सत्य की खोज में कितने जिज्ञासु जंगलों पहाड़ों पर भटकते रहे। मिला नहीं कभी किसी को वास्तव में जाने क्या सोचकर उन्होंने पा लिया पा लिया का शोर मचा कर सोचा लोगों की झूठी उम्मीद को टूटने नहीं देना चाहिए ताकि शायद कभी किसी को मिल जाए तो ऐसा नहीं हो लोग भूल ही गए हों कोई विधाता भी था या हो सकता है। सदियों से कितने ही शैतान दुनिया पर अपना शासन चलाते रहे हैं और सभी उनकी पूजा गुणगान इबादत ईश्वर अल्लाह क्या क्या नाम दे कर करते रहे हैं। जो जन्म देता है माता पिता की तरह वो प्यार करता हैं खुद सब देता है बदले में मांगता नहीं कुछ भी मगर संतान उसी से शिकायत करती है नाराज़ रहती है पर डरती नहीं कभी अपने जन्मदाता से भयभीत होने की ज़रूरत होती नहीं है। बच्चा बढ़ा होकर शिक्षक से डरता है क्योंकि उसके हाथ में दंडित करने और उत्तीर्ण या अनुतीर्ण करने का अधिकार रहता है। ऐसे ही शिक्षक पढ़ाते हैं उनको भगवान से पहले नमस्कार करना चाहिए और शिक्षा देने को दान बतलाकर बदले में गुरुदक्षिणा में जितना देते हैं उस से बढ़कर मांग लेते हैं। माता पिता और भगवान भला अपनी संतान अपने बच्चों से ऐसा करते कारोबार करते क्या। 
 
कोई भी भगवान कहीं नहीं है अगर होता तो ये सब जो सामने होता दिखाई देता है चुपचाप देखता रहता कहीं ऊपर आसमान पर बैठा कदापि नहीं। अन्याय अत्याचार करने वालों ने नादान भोले अच्छे लोगों को अपने अधीन बनाने को उपरवाले की झूठी कथाएं मूर्तियां आकार देकर अपना उल्लू साधने की बात की है। अधिकांश से सब छीनकर अपना आधिपत्य जमा उसको भगवान विधाता भाग्य की मर्ज़ी बताया है। शैतान खुद को शैतान नहीं महान कहलवाना चाहता है ये खुद धर्म वाले पढ़कर सुनाते हैं हम असलियत को नहीं समझते और सर झुकाते हैं। जिसको लोग मसीहा समझते हैं चलो आज उसकी गाथा सुनाते हैं बीते ज़माने की नहीं जो आज है जिसे कल अपने देखा था पर पहचाना नहीं उस से मिलवाते हैं। हां वही जो महल दुमहले बनवाते हैं मौज मस्ती करते हैं झूमते हैं गुनगुनाते हैं सभी को भूखा रखते हैं खुद खीर हलवा पूरी खाकर भगवान होने का दम भरते हैं क्या देखने पर शैतान के बाप नज़र नहीं आते हैं। दुनिया भर पर शासन करने वाले आदमी को इंसान बनकर जीने नहीं देते बेबस लोगों पर ज़ोर आज़माते हैं ताकतवर के सामने वो भी सर झुकाते हैं। ये वो दुनिया है जहां इंसान नहीं रह सकते शैतान बनकर रह जाते हैं। शैतान की दुनिया का मंज़र अभी आपको दिखलाना है भगवान नहीं है इस बात को समझाना है। 
 
टीवी चैनल वाला मज़बूर होकर देश की वास्तविकता दिखा रहा है लोग कैसे बदहाली में बेमौत मर रहे हैं शासक चैन की बंसी बजा रहा है। हर शासक आपको झूठे आंकड़े दिखाकर बहला नहीं रहा भटका रहा है सबको असली चेहरा नज़र आ रहा है। जो लोगों को बचाने की बात कह रहा है उसको सब पता है सब जानकर अनजान बन दिखा रहा है। देश भर में अस्पतालों की बदहाली सामने खड़ी है अस्पताल स्कूल छोड़ शासक अपनी दुनिया सजा रहा है। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे गली गली हैं बस ज़िंदगी बचाने को स्वास्थ्य सेवा को सालों से शासक भुलाकर मौज मना रहा है। शैतान को बड़ा मज़ा आ रहा है खड़ा हुआ है जगह मुस्कुरा रहा है। सत्ता वालों को सरकार नेताओं अधिकारी वर्ग को पैसे नाम शोहरत के भूखे धनपशु लोगों को समझ नहीं आ रहा है कौन स्वर्ग सी दुनिया को अपनी खुदगर्ज़ी लालच हवस की खातिर नर्क से बदतर बना रहा है। पहचान लो जो भी आपको हर जगह नज़र आ रहा है सबसे बड़ा शैतान है खुद को मसीहा कहलवा रहा है भगवान के नाम पर क्या क्या कर रहा है इंसानियत को ख़त्म कर खुद पर इतरा रहा है।



 

 

 

 

 

 

 

 

मई 15, 2021

कुछ बज़ुर्गों की कही कुछ अपनी आपबीती ( इधर उधर की खरी खोटी ) डॉ लोक सेतिया

कुछ बज़ुर्गों की कही कुछ अपनी आपबीती ( इधर उधर की खरी खोटी ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

    कुछ भी नई बात नहीं है कितनी बार दोहराई गई बातें हैं। सबने अपने अपने ढंग से बताई समझी मैं उन्हीं बातों को अपने अलग अंदाज़ में पेश करने की कोशिश करूंगा। दादाजी कहते थे समझदार पत्नी कभी पति से डांट नहीं खाती है। कहानी बनाकर बातें समझाया करते थे इक आदमी को सदा उस अवसर की तलाश रहती थी जब पत्नी कोई भूल करे और वो उसको डांट लगाएं मगर ऐसा नहीं मिलता था मौका कभी। इक दिन सुबह सुबह तालाब से मछली पकड़ घर लाये और पत्नी को देकर बोले रात को ये ही खानी है मुझे और चले गए घर से देर शाम तक लौटे नहीं जानबूझ कर। रात होने लगी थी घर आकर बोले भूख लगी है खाना बन गया क्या पत्नी ने झट से मछली की भाजी और रोटी बनाकर सामने परोस दी। पति कहने लगे ये तो तरी वाली है मुझे सूखी भुनी हुई खानी थी पत्नी बोली अभी लाती हूं और लेकर सामने रख दी। पति ने कहा इतनी बड़ी मछली सारी बनानी थी कुछ बचाकर कच्ची रखनी थी पत्नी ने बताया थोड़ी रखी है बचाकर। समझदार पत्नी को डांटना नहीं पड़ता खुद सोच लेती है घर परिवार की ज़रूरत कब कैसे पूरी करनी है। क्या ये बात आपको पुरुषवादी सोच भर लगती है नहीं जनाब ये आप पर भी लागू होती है कुछ अपने आज के लिए कुछ किसी की सहायता के लिए कुछ कल  की भविष्य की चिंता कर बचाकर रखना चाहिए। सुई छोटी सी होती है सिलने का भी काम करती है जोड़कर रखती है और उसी से कोई उधेड़ने का भी काम ले सकता है। इक कहावत थी कि पुरुष कस्सी लेकर घर को ढाने का काम भी मुश्किल से कर सकता है और महिला चाहे तो सुई से सब बना बिगाड़ सकती है। 

चलो इक और नासमझी की बात समझने की कोशिश करते हैं। कोई पति पत्नी हमेशा एक दूसरे से खुश नहीं रहते हैं। कुछ साल बाद लगने लगता है शादी कर मुसीबत मोल ले ली अकेले अच्छे थे मगर बिना साथ चैन से नहीं रह पाते हैं। क्या सोचा था ये क्या निकले हैं लगता है काश जैसा चाहते साथी मिलता मगर जैसा सब चाहते हैं कोई हो नहीं सकता क्योंकि खुद भी कब तक किसी और की इच्छानुसार बन सकते हैं। जब जीवन साथी का चुनाव करना था तब लड़का लड़की या उनके परिवार वाले अन्य सभी बातों को देखते हैं किसकी पसंद ख़्वाहिश क्या क्या है कोई पूरी कर सकता है या नहीं संभव इसकी बात की ही नहीं जाती। पत्नी उम्मीद लेकर आती है ससुराल में उसी का शासन होगा और पति और परिवार वाले बहु से कर्तव्य निभाने जैसी अपेक्षाएं रखते हैं। पूरी तरह खरा साबित कोई कभी नहीं हो सकता है पति के पास अलादीन का चिराग नहीं होता और पत्नी के पास दस हाथ नहीं होते हर समय सभी उम्मीदों पर खरा कोई नहीं हो सकता है। घर में तालमेल बिठाने को ज़रूरी है पत्नी चाहे कितनी जली कटी सुनाये आपको उसकी तारीफ कर खुश रखना ज़रूरी है पत्नी भी समझती है ये जैसा भी है निभाना मज़बूरी है। करीब रहना मुसीबत और सही नहीं जाती दूरी है। तभी कहते हैं शादी इक समझौता है निभाना पड़ता है जो है उसी से घर बसना मुस्कुराना पड़ता है। ये किस्सा इक मिसाल है असली बात और है बड़ी ज़रूरी है। 

इक दार्शनिक कहते हैं राजा जैसा भी हो उसको अच्छा बताना पड़ता है लेकिन जब आपको बनाना हो किसी को राजा तो परखना आज़माना पड़ता है मीठी मीठी बातों से बचकर सच को समझना होता है नहीं तो बाद में पछताना पड़ता है। पति पत्नी का तालमेल नहीं ठीक तो घर परिवार की हालत खराब होती है मगर गलत व्यक्ति को शासन की बागडोर थमाई तो देश समाज का बंटाधार होना लाज़मी है। हर शासक को तमाम लोग अच्छा बताते हैं उसका गुणगान करते हैं अपनी खैर मनाते हैं झूठ को सच समझते हैं रोज़ ठोकर खाते हैं इतिहास कहता है इतिहास खुद को दोहराता है हर कोई अपने आप को मसीहा बतलाता है वास्तव में उल्लू बनाकर मौज मनाता है। बस अब मामला समझ आएगा कोई राजनीति का सबक समझेगा कोई रिश्तों की वास्तविकता समझायेगा। जिस तरह घर में नई नवेली दुल्हन जब आती है चार दिन में सबको समझती है फिर सबको नासमझ जानकर समझाती है नाज़ नखरे दिखाती है उसके बाद अपनी असलियत पर जब आती है। घर में सब गलत था ठीक करने का अधिकार जताती है आपको लगता है मौसमी बारिश है गीली मिट्टी की महक भाती है मगर कच्ची ज़मीन पर फिसलन कब किसके पांव डगमगाती है। 
 
सरचढ़ी बहु की तरह लोग चुनकर जिसको लाए थे उसके इरादे नहीं समझ पाए थे। आकर उसने सभी पर अपना जादू चलाया था मुझसे पहले नहीं कोई भी सच्चा अच्छा समझदार नहीं यहां आया था। सब बेकार था जो भी सभी ने मिलकर बनाया था उनको जीने का सलीका समझ नहीं आया था। उसको फूटी आंख नहीं कुछ भी भाया था मायके से नहीं मिला था कुछ भी सब यहां पाया था बस अपनी किस्मत पर राजनेता इतराया धुंवां बनकर छाया था। पुरखों ने विरासत जितनी छोड़ी थी बहुत थी मगर उसकी ज़रूरत के लिए थोड़ी थी। सब जमापूंजी उसके हाथ आई थी खज़ाने की चाबी मिल गई खूब लुटवाई थी रेवड़ियां सभी अपनों को बंटवाई थी खत्म करनी उसको घर की पाई पाई थी उसने किस्मत अपनी आज़माई थी पहाड़ था इधर उधर गहरी खाई थी। सब के सब बड़े हैरान थे परेशान थे अपनी भूल पर पशेमान थे। खत्म सभी के हो चुके अरमान थे कितने नासमझ थे कैसे नादान थे। अपने घर में बनकर रह गए अनचाहे महमान थे। उसने खोटा सिक्का जमकर चलाया था मुझे बदल नहीं सकते मुझे अपना शुभचिंतक समझना होगा ज़ुल्म को भी इनायत कहना होगा। आपकी भलाई है ज़हर भी दवाई है पीकर दुआ देना है दर्द ज़रूरी है दर्द सहकर आह नहीं भरना जीहज़ूर कहना है। 
 
पुरुष और महिला दोनों का स्वभाव अलग होता है पुरुष महिला को चिकनी चुपड़ी बातें कहकर प्यार से उपहार से खुश रखकर उसको रानी बोलकर खुद राजा बन शासक होने की आरज़ू करते हैं। महिला अपनी दिलकश अदाओं से पुरुष को अपना गुलाम बनाना जानती हैं। ये राज़ राज़ रहता है कि किसने किसको प्यार से अपना बनाया किसने चालाकी से भरोसा पाकर उंगलियों पर नचाया। मगर सत्ता का खेल कोई कुंवारा नहीं कभी जान पाया। जो शादी कर अपनी पत्नी को अकेली बेसहारा बीच मझधार छोड़ आया ऐसे व्यक्ति को हमने क्या समझा क्या बनाकर क्या पाया। इक उलझे हुए ने उलझन को इतना उलझाया कि उसकी गुत्थी कोई नहीं सुलझा पाया। जिसने बर्बाद करने को छोड़ नहीं कुछ भी कर दिखलाया उसका मंज़र पस-मंज़र जैसा नज़र आया।
 
   कितना बना हुआ सब मिटा डाला है अंधेरा कह रहा है वही उजाला है बाहर से सुंदर है बोलता है मीठी बातें दिल का मगर हद से बढ़कर काला है। कोई नशा सभी पर चढ़ाया है सेवक बनकर घर में आया था फ़र्ज़ इक दिन नहीं निभाया था ऐसा किरदार सामने आया है देख कर हर कोई घबराया है। किसी ने लिखा हुआ सब मिटाया है कालिख़ को स्वर्णाक्षर कहता है जिस शाख पर बैठा उसी को काट रहा है अधुनीक नव निर्माण की बात करता है। मत पूछो कैसी उसकी आदत है जाने किस तरह की उसकी हसरत है। सच से उसको नहीं उल्फत है झूठ फितरत है उसकी मुहब्बत है सियासत उसकी बड़ी कयामत है हर किसी की यहां शामत है। उसको सारे लोग खराब लगते हैं बस अच्छे खुद जनाब लगते हैं वो निराशा की फसल बोते हैं नफरत को बढ़ाकर हंसते हैं वही बाक़ी सब रोते हैं। अच्छे दिन झूठे सपने होते हैं झूठ सच कभी नहीं होते हैं।

मई 13, 2021

बुलंदी से नीचे गिरने का भय ( डरावना ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया

   बुलंदी से नीचे गिरने का भय ( डरावना ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया 

      बात इज्ज़त के सवाल की होती है तब ऑनर किलिंग के नाम पर घर परिवार वाले अपनी बेटी तक को क़त्ल कर देते हैं। बस उनकी शोहरत की बुलंदी बरकरार रहे लोग मरते हैं मर जाएं उनको बदनाम नहीं कर जाएं। इतना ऊंचा लंबे लंबे कद का होना कितना कठिन होता है मगर ज़रूरी है सबको ध्यान दिलवाने को अपनी तरफ आकर्षित करने को संतुलन बनाकर खड़े होना नहीं चल कर दिखाना पड़ता है। तमाशा दिखाने को बंदर भालू सांप नेवला का खेल गली गली हुआ करता था मगर सिगरेट का कारोबार का निराला ढंग हुआ करता था टांगों से बड़े बड़े ऊंचे बांस बांधकर उन पर चलना क्या नज़ारा होता था। लोग भूल गए थे मगर किसी ने सोशल मीडिया का उपयोग कर कुछ ऐसा मायाजाल बिछाया खुद को बड़ा साबित करने को जितने बड़े बड़े कद्दावर लोग थे सबको छोटा बनाने का काम किया। मगर छोटी करने को रेखा मिटाना ज़रूरी नहीं होता है सामने उस से बड़ी रेखा बनानी पड़ती है। इधर उधर से देश विदेश से तीन हज़ार करोड़ खर्च कर 182 मीटर अथवा 597 फ़ीट ऊंची मूर्ति बनवाना मुश्किल नहीं था खुद अपनी शोहरत की बुलंदी आसमान से ऊपर पहुंचाना मुमकिन किया सिर्फ किसी एक ने। अब चिंता होनी स्वाभाविक है जब उनकी कही तमाम बातें खरी साबित नहीं होती हैं। पचास दिन मांगे कालाधन लाने को लोग मर गए हाथ धेला नहीं लगा उल्टा पापी गंगा नहाकर काले से सफ़ेद हो गए। ऐसा होता रहा और कितनी बार किस किस ऐलान का अंजाम वही निकलता रहा मगर जैसे उनको हर विषय की जानकारी दुनिया भर से बढ़कर और पहले होती है समझते समझाते हैं 24 मार्च 2020 को आधी रात से 21 दिन का लॉकडाउन घोषित किया भरोसा दिलाकर कि उसके बाद कोरोना पर जीत तय है। 
 
साल से अधिक समय बीत गया और अब देश की सांस अटकी रहती है मगर जनाब की हसरतें थमने का नाम नहीं ले रहीं उनको सेंट्रल विस्टा प्रोजक्ट जल्द पूरा करना है बीस हज़ार करोड़ लागत से शासक वर्ग के लिए शानदार भवन का निर्माण हरी भरी ज़मीन पर पत्थर और मशीनी निर्माण से पर्यावरण की सुरक्षा की परवाह को दरकिनार करते हुए। अपने नाम को इतिहास में दर्ज करवाने की चाहत ने ये सोचने समझने नहीं दिया कि आज ज़रूरत किस की पहले है। जब राज्य राज्य शहर शहर गांव गांव लोग स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और सरकारों की उदासीनता व संवेदनहीनता से बेमौत मर रहे हैं उस समय ये अनुचित अनावश्यक कार्य सत्ता की बीमार सोच को बताता है। लेकिन हद इस बात की है सत्ताधारी दल के लोग ही नहीं संवैधानिक संस्थाएं और देश की न्याय व्यवस्था तक मौन होकर ये देख खुद शामिल हैं इंसानियत को शर्मसार करने वाले ऐसे अमानवीय आचरण पर। सत्ताधारी नेताओं और सरकारी अधिकारी कर्मचारी वर्ग की चिंता नागरिक की ज़िंदगी से अधिक शासक की खराब होती छवि की है। जब कोई व्यक्ति देश समाज से बड़ा नज़र आने लगता है अथवा समझाया जाने लगता है तब पता चलता है कि विवेकशून्यता की बात है।  

बचपन में पढ़ी थी की कहानी जिस में किसी को उपहार में अपने को ढकने पहनने को मिलता है खास परिधान जो शायद जादू से या कुदरती कारण से कोई खोल आवरण फैलता जाता है सभी दिशा में लंबा चौड़ा और ऊंचा भी नीचे पाताल तक चला जाता है ऊपर आसमान छूने लगता है। लेकिन जितना बाहरी तौर पर विस्तार होता है भीतर से सिकुड़ते सिकुड़ते बिल्कुल छोटा होता जाता है। सरकार शासक अधिकारी धनवान लोग वास्तव में उसी रोग के मरीज़ होते हैं उनके महल निवास दफ़्तर जितने बड़े आधुनिक और खूबसूरत बनते जाते हैं उनकी सोच उनकी कर्तव्य पालन की आदत उतनी सिमटती जाती है। देश में सरकारी इमारतों की शोभा बढ़ती गई है मगर जो उन में रहते हैं बैठते हैं उनकी शोभा खत्म होते होते इस हद तक पहुंच गई है कि वो किसान की फसल की बीच कोई डरावा बन गए हैं। किसान लकड़ी भूसा हांडी कपड़े से बनाकर आदमी जैसे आकृति दे कर दूर से आदमी दिखाई देता है पक्षियों आवारा पशुओं से बचाने को खेत को। लेकिन फसल को कीड़े और बिजली या आंधी तूफ़ान ओले से बचाने के लिए ये कारगर नहीं होता है। अब तो ये सभी बाढ़ बनकर खेत खलियान को चौपट करने लगे हैं।  
 
झूठी इज्ज़त की खातिर मरने वालों की संख्या के आंकड़े छिपाने कम करने तक नहीं बल्कि जो अस्पताल वास्तव में कम बिस्तर वाले हैं उनको सिर्फ सरकारी साइट्स पर कई गुणा बढ़ाकर लोगों को गलत जानकारी दे कर भटकाया और उलझाया जाता है। सत्ता और शासकीय अधिकारों का मोह इतना खतरनाक कभी नहीं होता था। अवश्य उनको मखमली बिस्तर पर सोते हुए भी डरावना ख़्वाब जगाता होगा बुलंदी से नीचे गिरते खुद को देखना पसीने पसीने हो जाना। वास्तविक देशभक्त या जनसेवक नहीं ये सभी डरावा बिजूका बन गए हैं।
   
 

मई 12, 2021

रही हसरत अभी बाकी ( उल्टा-पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया

      रही हसरत अभी बाकी ( उल्टा-पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया 

   इतना बड़ा महल जैसा घर फिर भी लगता नहीं है दिल मेरा सोचते रहते हैं। रातों को नींद खुल जाती है अकेले बिस्तर पर करवटें बदलते हैं। न जाने क्यों इस हवेली में उनको पिछले शासकों के साये नज़र आते हैं डराते हुए क्या क्या सवालात करते दिखाई देते हैं। दर्पण के सामने खड़े अपने आप को निहारते हैं और खुद ही अपने से कहते हैं मुझ सा कोई हुआ न कभी होगा। हवाओं की सरसराहट सुनाई देती है तो लगता है कोई दबे पांव आकर किसी खिड़की के पीछे छिपकर झांकता है। ज़िंदगी को समझते समझते मौत का मंज़र दिखाई देता है जब से इतने बड़े महलनुमा घर में आकर रहने लगे हैं घर से भागने को दुनिया भर आवारा की तरह घूमते रहे हैं। अचानक हाथ आई दौलत खज़ाना मिल गया बिना कोई महनत किये उसको संभालना नहीं सीखा बर्बाद करने का भी कोई ख़ास मज़ा आया नहीं। कहने को चाहने वाले तमाम हैं मगर जानते हैं सब सत्ता के संगी साथी हैं सुःख के साथी हैं दुःख दर्द बांटने वाला हमराही हमसफ़र कोई भी नहीं है। जाने ये इक किताब यहां कौन छोड़ गया है दुष्यन्त कुमार की " साये में धूप " उठाकर पढ़ते हैं तो सच्चाई सामने दिखाई देती है। मेज़ की दराज से मिली पुरानी इक डायरी लेकर देखते हैं जिस पर कुछ शेर लिखे हुए हैं सोचते हैं कभी फुर्सत में समझने की कोशिश करेंगे। आधी रात को ये काम करना अच्छा लगता भी है और बेचैनी को बढ़ाता भी है। लिखा हुआ है जो बार बार पढ़ते हैं मिटाने को मन करता है मगर कोशिश करते हैं तो शब्द और उभरने लगते हैं जैसे लगान फिल्म के बच्चे को भयभीत करते थे। पढ़ते हैं अभी अभी लिखा क्या है किसी ने बात अटल है सत्य है शाश्वत है । इसी घर में कोई कविहृदय शासक रहता था उसकी निशानी मिटाना मुमकिन नहीं है उन जैसा बनना संभव नहीं पर उनकी विरासत को सहेजना ज़रूरी है।
 
    ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती , ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती। देखिए उस तरफ उजाला है , जिस तरफ रौशनी नहीं जाती। मुझको ईसा बना दिया तुमने , अब शिकायत भी की नहीं जाती। पन्ना पलटते हैं आगे लिखा हुआ पढ़ते हैं। वो निगाहें सलीब हैं , हम बहुत बदनसीब हैं। हम कहीं के नहीं रहे , घाट औ घर करीब हैं। हालाते जिस्म सूरते जां और भी खराब , चारों तरफ ख़राब यहां और भी ख़राब। नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे , होंठों में आ रही है ज़ुबां और भी खराब। मूरत संवारने से बिगड़ती चली गई , पहले से हो गया जहाँ और भी ख़राब। सोचा था उनके देश में महंगी है ज़िंदगी , पर ज़िंदगी का भाव वहां और भी ख़राब। अगले पन्ने को पढ़ते ही खुद अपने आप को किसी कटघरे में खड़ा पाते हैं बस दो शेर पढ़ते ही किताब डायरी को वापस तिजौरी में सुरक्षित रख देते हैं ये शेर असली शेर से ख़तरनाक लगते हैं पढ़ते हैं। तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं , कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं। तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह , तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं। 
 
  दिल में हसरत अभी बाकी है लेकिन किसी को खुद कह भी नहीं सकते मुझे भगवान की तरह पूजने को मेरा भी इक मंदिर नगर नगर गली गली गांव गांव होना चाहिए। लोग भरोसा करें मुझसे जो फरियाद करेंगे सच्चे भक्त बनकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण अवश्य होंगी। ऊपर वाले ने दुनिया बनाई थी तो किसी को घर सामान कुछ भी नहीं दिया था नीचे धरती ऊपर गगन रहने को सारा जहां। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे खुद ऊपर से आशीर्वाद देते दिखाई देते हैं। इतना ही करना होता है खुदा ईश्वर बनकर कठिनाई क्या है मेरे दर से जाओगे तो जाओगे कहां। भगवान ने किसी को सब कुछ नहीं दिया जिनको जितना मिला उनको थोड़ा लगता है फिर भी भगवान खुदा ईश्वर अल्लाह होने पर कोई शंका नहीं कर सकता मुझसे भी लोग हाथ जोड़कर मांगते रहते नहीं मिलता तो भी कोई बस नहीं तकदीर को दोष देने से हासिल क्या होता।
 
     दावा किया करते थे अठारह घंटे काम दिन रात की दौड़ धूप दुनिया की सैर मौज मस्ती खेल तमाशे दोस्ती दुश्मनी का उनका तरीका अलग है। अब आना जाना सब बंद तो कुछ नहीं करने वाले बहुत कुछ करते हैं दिमाग़ी खलल कहते हैं , ख़ाली दिमाग़ को कब क्या सूझे कोई नहीं जानता इसलिए उन्होंने तय कर लिया जो भी घर महल हवेलियां पहले पिछले शासकों ने तामीर करवाईं उनको हटाकर सब नया आधुनिक बनवाना है जिस पर सिर्फ इक नाम खुदवाना है अपना नाम अपनी तस्वीर सबसे ऊंची सबसे शानदार जैसे उनके खूबसूरत लिबास हैं। लोग बाहरी  चमक दमक देखते हैं चकाचौंध रौशनी से चुंधिया जाती हैं आंखें।
 
लोग क्या सोचते हैं ये शंहशाह नहीं सोचते हैं बादशाह आवाम की नहीं अपनी शोहरत की फ़िक्र करते हैं गरीबों के लहू से उनकी मुर्दा लाशों पर बुनियाद के पत्थर रखकर ताजमहल से चीन की दीवार तक बनाई जाती है महबूबा की लाश ताजमहल में दफनाई जाती है उसको ज़िंदगी भर क्या मिला बात छुपाई जाती है। फिर इक शहंशाह ने देश के गरीबों की गरीबी का मज़ाक उड़ाया है। कोरोना से बचने का तरीका समझ आया है सबसे अलग सुरक्षित शासन चलाने वालों का संसार बसाने का संकल्प उठाया है कोई ज़ोर ज़ोर से हंसता हुआ नज़र आया है आदमी जिसकी आवाज़ से घबराया है। दो गज़ ज़मीन ने जाने कितनों को भगाया है ये कोई साया है किसी के हाथ कभी नहीं आया है।
 
 
 SC refuses to stay Central Vista project, says no urgency as COVID-19  pandemic is on

मई 11, 2021

तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला , तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला। ग़ुलाम अली की आवारगी ग़ज़ल आपने सुनी होगी इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ आवारगी। ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी। मगर आवारगी शीर्षक से इक और ग़ज़ल है जो सुनकर मौजूदा हालात की सच्ची बात लगती है। परस्तिश की आदत बड़ी खराब होती है किसी भी बुत को खुदा समझने लगते हैं आशिक़ जिस पर फ़िदा होते हैं उसके हुस्न की दीवानगी में उसी पर मरते ही नहीं क़ातिल को दुआ भी देते हैं। जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल पढ़ते हैं पहले फिर बात को आगे बढ़ाते हैं। 
 

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए 

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए। 

दिल का वो हाल हुआ है ग़में दौरां के तले 

जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए। 

हमने इंसानों के दुःख-दर्द का हल ढूंढ लिया 

क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाए। 

हम को गुज़री हुई सदियां तो न पहचानेंगी 

आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए। 

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 

चंद लफ़्ज़ों  में कोई आग छुपा दी जाए। 

कम नहीं नशे में जाड़ों की गुलाबी रातें 

और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए। 

 

आवारगी कहते हैं कहीं टिक कर नहीं रहने की आदत को वक़्त भी कहीं ठहरता नहीं है बदलता रहता है। नानी की कहानी की तरह किसी भटकने वाले को हमने महल तख्तो-ताज देकर भिखारी से शहंशाह बना डाला और उसने खूब जमकर अपनी हसरतों को पूरा करने में खज़ाना लुटा डाला। लोग उसकी दिलकश अदाओं पर ऐसे लट्टू हुए कि उसके सितम भी करम इनायात लगने लगे। बस यही देखा तो जाँनिसार जी की ग़ज़ल याद आई। हम खुद देखते सुनते हुए नादान बने रहते हैं मगर कोई विदेशी हमको समझाता है तब पता चलता है हम क्या हैं। हमारे टीवी अख़बार हमें वास्तविकता से परिचित करवाने के बदले उलझाने का काम करते हैं ऐसे में विश्व प्रसिद्ध जॉर्नल लांसेट लिखता है भारत में दस लाख लोग मर सकते हैं कुछ महीनों में जिसका दोष मौजूदा मोदी सरकार ही है। किसी शायर ने कहा था " वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता , तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं "। मोदी सरकार ने ही नहीं देश में सभी राज्यों की सरकारों ने भी यही किया है कोरोना ही नहीं तमाम अन्य समस्याओं पर जो कदम उठाने ज़रूरी थे नहीं उठाकर शोर मचाने दलगत राजनीती करने और सत्ता को अपनी बपौती बनाने में लगे रहे। नेता जीतते रहे जनता हारती रही मरती रही और कोई मुजरिम नहीं ठहराया गया कभी भी। 

लोग सिर्फ कोरोना से बिना ईलाज नहीं मरे हैं लोग सरकार की बिना सोची विचारी गलत नीतियों को लागू करने से भी बेमौत मरते रहे हैं। चुनाव और सत्ता का घिनौना खेल इंसान को इस कदर वहशी बना देता है कि शासक गरीबी भूख बदहाली को मिटाने नहीं ढकने लगता है। दुनिया को देशवासियों को झूठी तस्वीर दिखाई देती है जबकि सत्ताधारी अपने ऐशो-आराम सुख सुविधा नहीं रईसाना शौक पर खज़ाना लुटाते हैं। संवैधानिक संस्थाओं सर्वोच्च न्यायलय आरबीआई सीबीआई सभी कठपुतली बनकर रह गए हैं सीएजी तक गूंगी अंधी बहरी बन गई है। शोर किसी और बात का सुनाई देता है जबकि ख़ामोशी में चीखें दबी पड़ी हैं। हम लोग अभी भी न्याय समानता के अधिकार की बात छोड़कर बहकावे में आकर उनकी जयजयकार करते हैं जो देश की बुनियादी समस्याओं को हल करना  नहीं चाहते और धर्म जाति मंदिर मस्जिद में उलझाकर जनता को पागलपन की तरफ धकेलते रहते हैं। और हमने इसको अपनी नियति मान लिया है जो शासकों की नाकामी और लापरवाही  बल्कि जानकर कुछ नहीं करने की आपराधिक कार्यशैली से होता है हो रहा है। 
 
इधर लोग ऐसी ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाते हैं जो अच्छे अच्छे पढ़े लिखे लोगों की अकल पर खुदगर्ज़ी का पर्दा पड़ जाने से झूठ को सच समझने लगते हैं। गुडलक ऐसी फिल्म है कोई किसी को तीन महीने गुडलक की ऑफर बेचता है मुफ्त में और शर्त ये कि अगर काम आया तो आपको हमेशा को गुडलुक पास रखने को अनुबंध करना होगा कीमत चुकानी होगी। तीन महीने बाद कीमत बताई जाती है आपको किसी का क़त्ल करना होगा अन्यथा आपका मिला गुडलुक चला जाएगा। बस किसी ने गुडलुक को बेचा अच्छे दिन नाम देकर किसी ने योग आयुर्वेद का लेबल लगाकर किसी ने करोड़पति बनने का सपना कहकर। और उसके बाद लोग उनकी बेची चीज़ खरीद बदले में मौत के कुंवे का तमाशा देख तालियां बजा रहे हैं। पहले ज्योतिष वाले झांसा देकर किस्मत बदलने को केवल पैसा लूटते थे अन्धविश्वास बढ़कर अपना सिक्का चलाते मालामाल होते थे। अब तीन लोग नहीं उनकी टोली वाले यही मौत से ज़िंदगी खरीदने का कारोबार अपनी अपनी तरह कर कमाल नहीं धमाल कर रहे हैं। 

भारत देश खुद को खुद ही महान बतलाता है यहां लोग पैसा कमाने की खातिर अधिक की चाह में देश को छोड़ विदेश जाकर बसते हैं मगर वहां से देश को प्यार करने की बात सोशल मीडिया पर करते हैं। मुसीबत में देश के काम नहीं आते मगर जब विदेश में खुद मुसीबत में पड़ते हैं तब देश वापस आने की गुहार लगाते हैं। देशभक्त अपने देश में थोड़े से गुज़ारा चलाते हैं अपना देश आखिर अपना है बज़ुर्ग समझाते हैं। जाने किस ने समझाया है कि  जब देशवासी आपदाग्रस्त हैं जनाब सरकार अपने लिए बीस हज़ार करोड़ खर्च कर नया आवास बनवा कर कीर्तिमान स्थापित कर सकता है अपनी आकांक्षा पूरी करने को।



मई 10, 2021

क्यों उदास रहते हैं हम ( दास्तान -ए-ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   क्यों उदास रहते हैं हम ( दास्तान -ए-ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

आपको अजीब लगेगा शायद नापसंद भी हो मुझे उदास रहना बुरा नहीं लगता दर्द भर गीत गुनगुनाना मेरी आदत है। कॉलेज में हॉस्टल में उल्टे सीधे नाम देते थे और सूचना पटल पर सबके नाम की सूचि लगा दी जाती थी। बताना नहीं चाहता मुझे जो नाम मिला था मगर मतलब यही था ये सुबह होते ही शाम ए ग़म की ग़ज़ल गाता है। अठारह साल की उम्र में ये होता नहीं मगर हम दो दोस्त कुछ ऐसे थे दूजा अब दुनिया में नहीं है मगर उसका भी पसंद का गीत था ऐ मेरे दिल ए नादां तू ग़म से न घबराना। कुछ साल पहले इक दोस्त फेसबुक पर मिला पूछा याद आया कौन हूं तो उसने मैसेज में वही गीत लिख भेज दिया जिसको लेकर वो मुझे चिढ़ाता था कि ये सुबह हुई और गाता है हुई शाम उनका ख़्याल आ गया। जो कॉलेज में सुनकर खराब लगती थी कितने साल बाद पढ़कर ख़ुशी हुई थी। बात फिर आज भी वही है मुझे उदासी वाले गीत फ़िल्में कहानियां क्यों अच्छी लगती हैं और किसलिए मैं ये लिखता हूं इक लेखक दोस्त शिकायत करते थे निराशा की दुःख दर्द की परेशानी की ही रचनाएं क्यों लिखता हूं। अधिकांश लोग हैरान होते हैं कि इसको सब मिला है मौज से रहता है कभी बदहाल नहीं दिखाई दिया फिर ये ऐसा लिखता क्योंकर है। 
 
लोग दर्द से घबराते हैं मुझे दर्द अच्छे लगते हैं खुशियां कभी कभी पास आती हैं छोड़ जाती हैं ग़म कभी साथ नहीं छोड़ते दिल में बसते हैं। समस्या ये है हम लोग चाहते हैं सब हमेशा इक जैसा रहना चाहिए मगर जीवन सभी रंगों से मिलकर बनता है। गीत ग़ज़ल लिखने वालों ने ख़ुशी के गाने लिखे और ग़म वाले भी मिलन के गीत लिखे जुदाई के भी। क्योंकि ये सब दुनिया का सच है दिन बदलता है सुबह दोपहर शाम ढलती है रात होती है। हर रात को सुबह का इंतज़ार रहता है गुलाब है गुलाब में छिपे कांटें भी हैं। नाज़ुक फूल और पत्थर के साथ शीशा भी अपनी अपनी सभी की पहचान है जो जैसा है उसको उसी तरह स्वीकार करना ज़रूरी है मगर हम चाहते हैं सब जैसा हम पसंद करते हैं वैसा होना चाहिए। सभी इंसान इक जैसे नहीं हो सकते तब किसी की कोई पहचान नहीं बचेगी। मौसम बदलते हैं ये कुदरत का करिश्मा नहीं उपहार है पतझड़ के बाद बहार आना और खूबसूरत लगता है जब आप ख़ुशी के अवसर पर खुशियों के गीत गाते हैं तब सिर्फ ख़ुशी बढ़ती ही नहीं जो ख़ुशी से महरूम हैं उनको भी ख़ुशी का एहसास होता है। दुःख की घड़ी में आशा के गीत नहीं गाये जाते दर्द वाले गीत दर्द को सहने समझने की ताकत देते हैं। निराशा के समय आशावादी गीत सुनकर उम्मीद जागती है तो दुःख की घड़ी में दर्द की बात बेचैनी से आराम देती है। 
 
सभी लोग काले नहीं हो सकते न ही गोरा होना ज़रूरी है जो जैसा है वैसा अच्छा है मानना होगा। पेड़ पौधे पशु पंछी जंगली जानवर कुदरत की बनाई सभी चीज़ों का अपना अपना मकसद है ज़रूरी है संतुलन बनाये रखने को। सब फल फूल इक जैसे सभी खाद्य पदार्थ इक स्वाद के होते हो क्या मज़ा आता मीठा नमकीन कड़वा भी शीतल गर्म सभी अपनी जगह हैं। जिनको दर्द की बात सुनकर घबराहट होती है ज़िंदगी भर डर के साये में जीते हैं मुश्किलें आने पर घबरा जाते हैं उनसे लड़ना नहीं चाहते। गीतकार कथाकार सभी की बात कहते हैं सबका सुख दुःख समझते हैं तभी हर अच्छी खराब हालत पर लिखते हैं। पढ़कर सुनकर सभी को लगता है कि जो मैंने दर्द झेला है सिर्फ मुझे नहीं दुनिया में बहुत को मिला है इक तसल्ली मिलती है ये सब भी बदलेगा निराशा की बात कहानी ग़ज़ल में भी उम्मीद छुपी रहती है। क्या सभी तालाब इक जैसे होते सभी नदियां इक जैसी सभी झरने समंदर सबका पानी ठहरा हुआ या बहता हुआ इक जैसा होता तो क्या लगता। ज़िंदगी भी सुख दुःख दर्द राहत परेशानी और उम्मीद से मिलकर बनती है बदलाव नियम है संसार की हर वस्तु की तरह ज़िंदगी पल पल बदलती रहती है। ज़िंदगी को जी भर जियो जब जैसी है अपनाकर। 
 
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर कर भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। ज़िंदगी ज़िंदादिली है मगर मौत से दुःख दर्द से भागना बुझदिली है। दो रंग जीवन के और दो रस्ते सुनते हैं ये लाजवाब गीत समझाता है। 
 
 





 

मई 09, 2021

मैंने जान लिया है राज़ क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   मैंने जान लिया है राज़ क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  जो लोग फेसबुक पर नहीं हैं उनके अपने उनको भूल जाते हैं अन्यथा उनका भी जन्म दिन वर्षगांठ विवाह की उत्सव जैसा दिखाई देता ये समझ आया तो ढूंढ ढूंढ दोस्त बनाने लगे जिनको हमारी याद नहीं आती मुद्दत हुई। बाकी कुछ नहीं रहेगा बस इक इसी का नाम हमेशा रहेगा। भगवान की नहीं बात फेसबुक की है। दस साल से भटकता रहा नहीं जान पाया ये क्या सिलसिला है कैसा माजरा है। कब कहां क्या हुआ इक इसी को पता है जो नहीं जानता ये उसी की खता है। दोस्त रिश्ते नाते सभी निभ रहे हैं जहां पर हम रह गए थे ज़मीं पर सब जा पहुंचे आस्मां पर। फेसबुक बगैर हम अजनबी हो गए थे आदमी सब थे जितने खुद नबी ( पैगंबर ) हो गए थे। होश आया तो जाना बस यही है इक यही है इसके बिना दोस्ती कुछ नहीं है ज़िंदगी कुछ नहीं सब होकर भी आदमी कुछ नहीं है। सबका घर है यहां पर हर खबर है यहां पर लोग मिलते यहीं हैं और जाएं भी कहां पर। कीमत समझ आती है हर चीज़ की मगर वक़्त आने पर लोग मिलते थे कभी मंदिर में मिलते हैं अब शराबखाने पर। चौपाल लगती नहीं पीपल तले गांव में बात पहुंचती है पुलिस थाने तक हमको मालूम है तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। लोग चले गए दुनिया से रुखसत होकर खबर पहुंची नहीं शाम की सहर से शाम शाम से सहर होने तक। हाल पूछते हैं ठीक होने के बाद हंसते हैं मिलकर रोने के बाद। दुनिया बड़ी है पर सिमट कर स्मार्ट फोन में रह गई है ग़ज़ल कविता कहानी कहीं नहीं मिलती चुटकले की लंबी आयु हो व्हाट्सएप्प वाली देवी कह गई है। 
 
सोशल मीडिया से कोई खुदा बन गया है झूठ सच बन गया फ़लसफ़ा बन गया है। ढूंढते रहे हम पहचान अपनी मिली नहीं और कोई इसी को बनाकर सहारा खुदा बन गया है। तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला। शायर का नाम भी याद नहीं आता फेसबुक पर जो नहीं उसको तलाश करना आसान नहीं है। इक़बाल साजिद फरमाते हैं , रुखे रौशन का रौशन एक पहलू भी नहीं निकला ,  जिसे मैं चांद समझा था वो जुगनू भी नहीं निकला। इस सपनों की दुनिया का सच यही है जुगनू भी नहीं चांद बन बैठे हैं सूरज के सिंघासन पर घने अंधेरों का डेरा है क्या तेरा है क्या मेरा है ये जोगी वाला फेरा है। कुछ तो निशानी छोड़ जा अपनी कहानी छोड़ जा गीत सुनते थे मगर कैसे हर कोई ताजमहल बनवा नहीं सकता लेकिन कमाल किया है फेसबुक बनाने वाले ने 4 फ़रवरी 2004 को मार्क ज़ुकेरबर्ग ने सभी को अवसर देकर अपना नाम रौशन करने का साधन उपलब्ध करवाकर। लोगों को मौत से बढ़कर चिंता रहती है बाद में उनको लोग याद करेंगे कि भूल जाएंगे। फेसबुक आपकी रहेगी हमेशा अगर आप चाहेंगे।
 
सोशल मीडिया पर एक्टिव होना आपके होने का असली सबूत है ख़ास बात ये भी है कि आपकी मर्ज़ी है चाहो तो दुनिया से जाने के बाद भी फेसबुक पर आप ज़िंदा रह सकते हैं। इस नकली दुनिया ने सभी को भटकाया भी है बहलाया भी और जो किसी किताब ने नहीं पढ़ाया वो समझाया भी। ग़ालिब ने कहा था मस्जिद के जेरे साया घर बना लिया है , ये बंदा ए कमीना हमसाया ए खुदा है। फेसबुक पर आप बड़े नाम वाले नायक खिलाड़ी नेता धर्मगुरु से दुनिया की तमाम जानी मानी हस्तियों के दोस्त बन सकते हैं। धरती पर इतने मंदिर मस्जिद नहीं हैं जितने देवता ईश्वर खुदा मसीहा पीर पय्यमबर इस जगह साक्षात हैं कमेंट में लिखते ही मनोकामना पूर्ण होने का भरोसा दिलाते हैं लोग आपको जिनसे खुद कभी नहीं मिलते मिलवाते हैं। इक यही दुनिया हैं जहां इक साथ जश्न भी मातम भी मनाते हैं बधाई भी मिलती है अफ़सोस भी जताते हैं किसी के घर जाते नहीं न किसी को घर बुलाते हैं फिर भी रिश्ते हर किसी से निभाते नज़र आते हैं। गुलदस्ता मिलता है ख़ास दिन और श्रद्धासुमन भी चढ़ाते हैं लोग इस दुनिया को वास्तविक समझते हैं ख्वाब बुनते हैं दिल को बहलाते हैं लाइक कमेंट की दुनिया का लुत्फ़ उठाकर जिन खोजा तिन पाईया राज़ समझाते हैं।  हमने देखा है समझा है जाना है अब कोई शिकायत नहीं है कोई नहीं बहाना है जिनसे पहचान हैं उनको अपना दोस्त बनाना है फेसबुक वाला याराना ही याराना है। दिल में नहीं सबको दोस्त कितने हैं लिस्ट में नंबर बनाना है। मासूम सी मुहब्बत का बस इतना सा फ़साना है , कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है। अब कुछ पीछे वापस मुड़कर देखते हैं कितना कुछ बदला है इस सोशल मीडिया के चलन से। 
 
यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते की तरह इक कहानी मिली लेखक से गुनगुनाती हुई ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। शादी विवाह समाज घर सभी को भूलकर दो आशिक़ अपनी दुनिया में खो गए। अचानक साल भर बाद प्यार से पेट नहीं भरता समझ आया तो चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। माशूका घर वापस चली गई सुबह की भूली भटकी शाम को लौट आई सबको बताया नौकरी करने गई थी अब शादी करने घर चली आई है। उधर आशिक़ भी अपनी पत्नी को छोड़ महबूबा संग रंगरलियां मना लौट आये थे सब ठीक हो गया चार दिन की चांदनी के बाद। फेसबुक पर स्टेटस मौसम से जल्दी बदल जाता है रिलेशनशिप से विवाहित होने का ऐलान हो गया। लेखक को पहली दास्तां को छोड़कर नई कहानी लिखने को कहा और पुरानी लिखी मिटाने को अनुरोध किया गया। शायद विधि का विधान है कि जल्दी ही पति का निधन हो गया और स्टेटस सिंगल का सामने दिखाई दिया। 
 
चार महीने पहले पति की मौत की खबर की पोस्ट पर संवेदना देने वाले आज फेसबुक पर शादी की वर्षगांठ की मेमरी देख बिना सोचे भूलकर पति की मौत की खबर शुभकामनाएं देने लगे हैं। इधर
 अपने पति से जान से बढ़कर प्यार करने वाली पत्नी जो उसको जाने कितने अच्छे संबोधन देकर बुलाती थी चार महीने बाद मौज मस्ती की झूमती गाती नाचती तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट करती है तो समझना कठिन है कहानी सच्ची थी या काल्पनिक थी।
 

  

मई 08, 2021

चेहरा नहीं मुखौटा है पहचान ( अनजान लोग ) डॉ लोक सेतिया

   चेहरा नहीं मुखौटा है पहचान ( अनजान लोग ) डॉ लोक सेतिया 

सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखते हैं व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते हैं लगता है आदमी नहीं देवता हैं। सबकी भलाई की कामना सभी के लिए प्यार भरा दिल और झूठ छल कपट से दूर इंसान और इंसानियत को महत्व देने वाले हैं। धन दौलत शोहरत अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज देश और भलाई की राह चलने की भावना उनके लिए महत्वपूर्ण है। धर्म की बात तो यहां हर कोई इस सीमा तक करता दिखाई देता है जैसे संसार में रहकर मोह माया लोभ अहंकार को त्याग संत महात्मा बन कर दुनिया के कल्याण को जीवन समर्पित किया हुआ है। लेकिन सभी की अनुचित बातों पर चिंता और विरोध जतलाने वाले खुद अपने वास्तविक जीवन में कारोबार नौकरी और दोस्ती रिश्तेदारी में पहले दर्जे के खुदगर्ज़ और मतलबी बन जाते हैं। इतना ही काफी नहीं बल्कि अपने अनुचित और आपत्तिजनक आचरण को उचित ठहराने को बेझिझक कहते हैं सभी ऐसे हैं हम उनसे अलग नहीं हैं यहां जीने रहने को सब करना पड़ता है ज़रूरी है। अर्थात अपने गलत कार्य को जानते हुए भी कि गलत कर रहे हैं सही ठहराने का काम करते हैं। शायद उनको खुद अपनी पहचान तक नहीं है वर्ना कोई अपने आप से नज़र मिलाकर ऐसा कैसे कर सकता है। 
 
गीता कुरआन बाईबल गुरुबाणी पढ़ने सुनने से मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाने से उपदेश सतसंग सुनकर कोई उदघोष लगाने से कोई फायदा नहीं अगर उनसे हम में कोई अंतर नहीं आता है अच्छाई बुराई को समझने को। शायद दुनिया को धार्मिक होने का दिखावा कर सकते हैं लेकिन अपने आप को कैसे झांसा दे सकते हैं ज़मीर से बचकर भाग नहीं सकते हैं। शायद इस से बढ़कर कोई हमारे विवेक को जगा नहीं सकता था कि इतनी बड़ी आपदा विश्व भर के सामने खड़ी है जब सभी को आपस में सुख दुःख बांटने और अपने स्वार्थों को दरकिनार कर विश्व कल्याण की सोच को अपनाना ज़रूरी लगता। मगर विडंबना की बात है कि ऐसे समय में भी तमाम लोग इंसानियत को भुलाकर खुदगर्ज़ी में डूबे ऐसे ऐसे कार्य करते हैं कि इंसानियत शर्मसार हो गई है। ज़िंदगी को बचाने की जगह मौत का कारोबार करने लगे हैं जो आपदा पीड़ित लोगों की विवशता को अधिक पैसा कमाने का अवसर समझ दवाओं जीवनरक्षक उपकरणों यहां तक कि एम्बुलेंस जो कोई कमाई का  ज़रिया नहीं मरीज़ को बचाने को सहायता देने को होने चाहिएं मनमाने दाम लेकर अपने व्यवसाय को बदनाम कर रहे हैं।
 
सिर्फ कुछ लोग नहीं बाकी सभी भी अपने अपने कारोबार नौकरी में हर किसी की मज़बूरी का लाभ उठाकर घर भरने को लगे हैं। ये समय था जब सभी को अपनी खुदगर्ज़ी छोड़ वास्तविक इंसानियत का धर्म निभाने की घड़ी में इक कठिनाई का सामना करना था मिलकर आपस में। लेकिन इसी वक़्त हमने अपने संयम अपने धैर्य को खो दिया है। आधुनिक समाज कितना विकसित लगता है मगर भीतर से इस कदर खोखला है ऐसी कल्पना नहीं की होगी कभी किसी ने।

मई 07, 2021

इस हक़ीक़त को फ़साना समझना ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

    मैं इक चोर मेरी नहीं रानी , तू मेरा राजा जनता तेरी रानी 

                  ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

                             इस हक़ीक़त को फ़साना समझना। 

वैधानिक चेतावनी की तरह शुरुआत में छोटे छोटे शब्दों में लिख देते हैं ये इक काल्पनिक कहानी है किसी व्यक्ति से इसका कोई ताल्लुक इत्तेफ़ाक़ हो सकता है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना कदापि नहीं है। बाद में सामने अभिनय करने वाले दिखाई देते हैं तब आपको समझने में ज़रा देर नहीं लगती ये किस जाने माने व्यक्ति की छवि है। मिलिए इन सभी से आपको मिलवाते हैं पहचान का ध्यान रखना आपका काम है। 

निर्माता निर्देशक :- 

असली खेल उन्हीं का है बाकी सभी खिलाड़ी उनके ख़ास अपने हैं जिनको हर डायलॉग की शुरुआत उनके नाम से करनी होती है। जब उनका शासन है तो सब लाजवाब बेमिसाल है वो रात को दिन बना सकते हैं दिन को तारे दिखला सकते हैं। सच को झूठ झूठ को सच बना सकते हैं देश क्या विदेश तक कठपुतलियां बनाकर अपनी उंगलियों पर नचा सकते हैं। अच्छे दिन की बात कहकर ऐसी हालत पर देश को पहुंचा सकते है कि लोग कुछ नहीं कर सकते न रोकर आंसू बहा सकते हैं न हंसकर गा सकते हैं मन की बात सुनते हैं खुद दिल की दास्तां नहीं सुना सकते हैं। चिड़िया चुग गई खेत कुछ नहीं हो सकता पछता सकते हैं। खुद आफ़त को घर बुलाया नहीं पीछा छुड़ा सकते हैं। लोग ज़िंदा रहें या मर जाएं जनाबेआली रंगरलियां मना सकते हैं। उनके इशारे पर सब होता है मनमर्ज़ी चलाकर दिखला सकते हैं आपको सपने दिखाकर आपका सब चुराकर चौकीदार से बढ़ते बढ़ते साहूकार बनकर आपको अपना कर्ज़दार बना सकते हैं। गब्बर सिंह की तरह सिक्का उछालकर हर बारकिस्मत आज़मा सकते हैं दोनों तरफ उनकी जीत का राज़ आखिर समझा सकते हैं। 
 

नायक अभिनेता :- 

आपको शराफ़त छोड़ कर डॉन बनकर रहने की हिंसा की गुंडागर्दी की उल्टी राह पर चला सकते हैं। भूखे गरीब का किरदार निभाते हुए करोड़ों कमा कर दिखला सकते हैं। सब जो भी कोई पैसे देकर बेचने को कहे बिकवा सकते हैं। असली नकली का खेल क्या है उलझा कर जो खुद खाना नहीं चाहते दुनिया को खिला सकते हैं। आपको चिंतामुक्त करने का तेल बताकर चिंता अपनी मिटा सकते हैं। आपको करोड़पति बनने का राज़ नहीं बताते करोड़पति बनाने के नाम पर खुद माल कमाकर दिखला सकते हैं। अपनी फ़िल्मी कहानी के किरदार नहीं हैं ये कहलाते हैं महानायक पर नायक कहलाने के हकदार नहीं हैं। पैसे का इनसे बढ़कर कोई बीमार नहीं है झूठ वाला कोई और ऐसा फनकार नहीं है। 
 

महमान कलाकार नाचने गाने वाले और प्रयोजक :-

 कोई बाबा है कोई बड़ा धनवान कोई बिचौलिया कोई धर्म का खिलाड़ी ये सब लगते हैं अनाड़ी वास्तव में हैं बदले रूप में गिरधारी भगवाधारी अनाचारी जिनको चाहिए दुनिया सारी की सारी। कोरोना नहीं है इनसे बड़ी माहमारी जिनकी है उपरवाले से मतलब की यारी। योग से रोग को कैसा भगाया है हर किसी ने उनकी बात को आज़माया है खोया है मगर नहीं हाथ कुछ भी आया है। कोई नहीं समझा खोया है हमने उसने पाया है जो कहता है झूठी मोह माया है। हर चीज़ पर लेबल अपने नाम का लगाया है टीवी पर सभी चैनल पर उसका पड़ा साया है। असली नकली में उलझकर खूब माल बनाया है काला सफेद होकर चमकता है डिटर्जेंट बनाया है।  देशभक्ति और धर्म को मिलाकर चूर्ण बनाया है जिनको खिलाया उनके मन भाया है अच्छे अच्छों को पागल बनाकर खुद को सभी का बाप बताया है। 

पटकथा डॉयलॉग नृत्य निर्देशक :- 

लखुकथा जैसी कहानी है बिल्ली शेर की नानी है। इक बेटा है और इक नई नई बहुरानी है। दोनों को जिस जिस ने सर पर बिठाया है पलकों पर बिठाना ठीक था अपने सर पर चढ़ाया है उसी ने सर पर नाचकर सितम ढाया है। किसी को इतना मत चाहो कि खुदा समझने लगे शायर कहता है सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा , इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा। राजनेता हों या कारोबारी होते हैं भिखारी बनकर शिकारी दिखलाते हैं मक्कारी। मसीहा दुनिया में कोई नहीं है ये सच है बुरे सब हैं मगर ऐसे खराब लोगों से बढ़कर बुरा कोई नहीं है। कोरोना से बचते फिरते हो इनसे कैसे जान बचाओगे हर जगह यही नज़र आएंगे घबराओगे मर जाओगे।  इनकी बनाई हर कहानी झूठ की दास्तान है ये कहते हैं कुछ करते हैं कुछ और नहीं समझते इनके तरीके हैं क्या और क्या हैं तौर बन बैठे हैं सिरमौर अजब है ये दौर। गरीबी भूख शिक्षा रोज़गार सब समस्याओं से बढ़कर समस्या खड़ी है सांस लेने को हवा नहीं है मौत बिना मांगे मिलती है।
 

 



मई 06, 2021

कह दो नहीं मंज़ूर मूर्ख बनना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     कह दो नहीं मंज़ूर मूर्ख बनना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

      सच बताना कोई बेसिर-पैर की बातें करता हो क्या आप ख़ामोशी से सुनकर जी हां कह सकते हैं और अगर करते हैं तो बेकार की झूठी बातें करने वाला सोचता होगा पहले दर्जे के नासमझ लोग हैं इतना भी नहीं सोचते ये सब मुमकिन ही नहीं है। चलो उन सभी से मुलाकात करते हैं जो हर दिन हमको उल्लू बनाते हैं। आपका समय नहीं कटता घर बैठे हैं टीवी पर मनोरंजन के नाम पर सीरियल कॉमेडी शो देखते हैं। आपको खीज नहीं होती इतनी अतार्किक कहानियां परोसते हैं टीवी सीरियल वाले। सब को समझ आता है ये खलनायक है घर में रहकर तमाम हथकंडे अपनाता है किसी को बंधक किसी को अपने जाल में फंसवाता है और नायक और समझदार सामने घटती घटनाओं से अनजान रहते हैं। और हर टीवी सीरियल की कहानी में वही बार बार दोहराया जाता है। वास्तव में इन  कथाकार कलाकार सृजन कार्य करने वालों के पास कोई नवीन सार्थक विषय समाज को दिखलाने जागरूक करने को नहीं है सभी इक कुंवे के मेंढक खुद को दुनिया का मालिक समझते हैं। उनको रहने दो उनकी छोटी सी कुंवे की दुनिया है आप क्यों खुद को कुंवे के मेंढक बनने दे रहे हैं। छोड़ दो इस दुनिया को बाहर निकलो और देखो समझो अपनी आंखों से वास्तविक दुनिया का सच जो बिल्कुल अलग है। टीवी वालों की खबरें खबरें कम किसी को बदनाम किसी का गुणगान अधिक है और खबर किसे कहते ये खुद उसकी परिभाषा भूल गए है। " खबर वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं देता पत्रकार का फ़र्ज़ है उसे तलाश करना और उजागर करना। " लेकिन ये कोई छिपी बात नहीं तलाश करते ये जो कोई खुद बताता है उसी को दोहराते हैं बस शोर मचाते हैं। चोर चोर चिल्लाते हैं चोरों से दोस्ती निभाते हैं। हम क्यों इनके बहकावे में आते हैं। 
 
 चलो राजनीति का नंगा नाच दिखलाते हैं चुनाव लड़ने को खुलेआम जनता को भड़काते हैं अपने अपने विरोधी को अपराधी गुंडा कहते हैं मगर चुनाव बाद आपको रहने नहीं देंगें की धमकियां देकर खुद क्या हैं बतलाते हैं। नेता भरी सभाओं में गाली धमकी और डराते धमकाते हैं चुनाव आयोग संविधान के रखवाले खड़े दुम हिलाते हैं न्यायव्यवस्था वाले आंखों पर पट्टी कान पर हाथ धरे मुंह बंद रखकर बापूजी के बंदर बन जाते हैं। लेकिन ऐसी असभ्य और नफरत की आग लगाने वाले नेताओं की सभाओं में हम किसलिए जाते हैं इतना ही नहीं जिन घटिया बातों पर जूते फेंकने होते हैं हम तालियां बजाते हैं। यही जिनको हम अपना सेवक चुनते हैं हम पर शासक बनकर हुक्म भी चलाते हैं और हर बार हम पांच साल तक हाथ मलते हैं पछताते हैं। हमने कैसे कैसे शहंशाहों के ताज उछाले हैं कितने तख़्त गिराए हैं भूल क्यों जाते हैं। हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म याद नहीं करते बल्कि जो ये नहीं चाहते उनकी चालों में फंसते जाते हैं। आवाम की आवाज़ को धर्म से जोड़कर ये नेता हमको उल्टा सबक पढ़ाते हैं। लोकराज में तानाशाह बनकर इतराते हैं देश को बेचते जाते हैं बंटाधार करते हैं समाज का और उसको विकास कहकर सभी को मूर्ख बनाते जाते हैं। 
 
    चलिए उनकी तरफ भी नज़र दौड़ाते हैं जो आपको धर्म की भगवान की अल्लाह की जीसस की गुरुनानक की कथा बताते हैं। अपनी सहूलीयत से कथा कहानी बनाते हैं आपको चमत्कार और अंधविश्वास की अंधी गली में लिए जाते हैं बाहर निकलने रौशनी पाने का कोई मार्ग नहीं रहने देते कूप-मंडूक बनाकर आपको भूखा रखते हैं खुद हलवा पूरी खाते हैं। ईश्वर से नहीं मिलवाते आपको धर्म के नाम पर गुमराह करते रोज़ मौज मनाते हैं। मानवता और दीन दुःखी लोगों की पीड़ा को नहीं समझते असली धर्म भूलकर आडंबर करते जाल बिछाते हैं। हम उपदेश सुनते हैं समझते नहीं हैं जो लोभ मोह से बचने को कहते हैं खुद धर्म के नाम पर कितना बढ़ाते जाते हैं इंसानियत की खातिर कभी नहीं मंदिर मस्जिद वाले खुद धर्म निभाने सामने आते हैं। भूखे नंगे लोगों को भजन सुनाते हैं भूखे भजन ना होय गोपाला साधु समझाते हैं।  मतलब इसका इक कहावत से समझते हैं कोई अपने गधे पर बैठ कर सफर कर रहा था मगर अपने सर पर गठड़ी का बोझ उठाये हुए था किसी ने पूछा ये गठड़ी अपने सर से उतारकर गधे पर अपने आगे रख दो किसलिए सर पर रखे हुए हो। वो बोला मुझे खुद अपना बोझ उठाना है गधा मेरा बोझ उठाये है काफी है नासमझ को कौन समझाए सारा बोझ फिर भी गधा चुपचाप ढो रहा है। हम सभी भी अपने गधों का बोझ खुद अपने सरों पर ढोने का काम कर रहे हैं। बल्कि सच तो ये है जिनको हमारा बोझ उठाना था वही गधे हम पर बोझ बन गये हैं। 
 

 

मई 05, 2021

कांच के टुकड़ों पे चलना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        कांच के टुकड़ों पे चलना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 कहां से बात शुरू करूं यही मुश्किल है , राजेश रेड्डी जी का शेर याद आता है " न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊं। ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊं , बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊं। नसीहत कर रही है अक्ल कब से , कि मैं दीवानगी से दूर हो जाऊं।" 
   सच लिखना तलवार की धार पर चलना है और सच शासक ताकवर धनवान सत्ताधारी लोगों को हमेशा दुश्मन लगता है। सच लिखने की पहली शर्त है अपने बेगाने की नहीं खुद अपनी भी वास्तविकता को साहस से उजागर करना। जो लेखक टीवी मीडिया वाले सबकी सूरत दिखाते हैं खुद अपनी महिमा अपने मुंह से सुनाते हैं सच से हमेशा नज़रें चुराते हैं। आज आपको कहानी नहीं सच बताते हैं सच लिखने की कीमत हर दिन चुकाते हैं। आंख से आंख मिलाकर झूठ को झूठ बताना मतलब होता है किसी पत्थर की दीवार से सर टकराना मगर हम ने इक बार नहीं सौ बार किया है। सच को जान से बढ़कर है चाहा ये गुनाह बार बार किया है अपने क़ातिल से भी हमने सिर्फ प्यार किया है गुनाह यही मैंने मेरे यार किया है। आज कितनी घटनाएं भूली हुई यादों की तरह फ्लैशबैक की तरह नज़रों के सामने चल रही हैं। ये जुर्म बेलज्ज़त है अर्थात ऐसा अपराध जिस में कोई लुत्फ़ कोई आनंद कोई मज़ा नहीं है सज़ा ही सज़ा है क़ज़ा ही क़ज़ा है। 
 
   पीछे जाने से पहले अभी किसी की कही बात से शुरू करते हैं दोस्त ने कहा आपकी इज्ज़त करते हैं। सही कहते हैं सभी जब तक सच उनके बारे में नहीं किसी और को लेकर हो अच्छा लगता है बहुत बार हुआ है। मैंने कभी किसी से अनुचित को उचित कहने को नहीं कहा ये मुझसे होगा भी नहीं फिर जाने क्यों शासक लोग अफ़्सर नेता यही कहते रहे हैं कि आपकी बड़ी इज्ज़त करते हैं अपने लिहाज़ नहीं किया लिखते हुए हमारे बारे में। सच कभी किसी को मीठा लगता नहीं है सच सुनना ही नहीं चाहते लोग सच का आदर करना जानते तो झूठ पर इतराते नहीं। गुरुनानक जी जेल में भी शासक को सामने कहते हैं बड़ा ज़ालिम है तू सच की डगर चलने वाले जान हथेली पर रख कर चलते हैं। इज्ज़त तभी इज्ज़त है जब लोग आपकी सच्चाई को जानकर आदर करें अन्यथा दिखावे की इज्ज़त धोखा होता है जैसे लोग नेताओं अधिकारी वर्ग और दौलतमंद की करते हैं मतलब की खातिर। अपनी इक ग़ज़ल पेश करता हूं।
 
वो पहन कर कफ़न निकलते हैं
शख्स जो सच की राह चलते हैं।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं।

जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं।

टालते हैं हसीं में  वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं।
 
नाम नहीं लेना चाहता मगर इक पुलिस के बड़े अधिकारी से जान पहचान हुई तीस साल पुरानी बात है अक्सर सुबह ही अख़बार में मेरी रचना पढ़कर वाह डॉक्टर साहब लाजवाब कलम है आपकी ये शब्द सुनाई देते थे। इक दिन अख़बार की मैगज़ीन के पहले पन्ने पर छपी रचना पढ़कर उनको खराब लगा पुलिस को लेकर उनको मेरे शब्द नापसंद आये थे जबकि वही शब्द अधिकारी नेता डॉक्टर सभी के लिए मीडियम बनाकर उपयोग किया गया था कटाक्ष में लेकिन उनको उम्मीद नहीं थी कि उनकी पहचान दोस्ती का ध्यान नहीं रखेगा ये व्यंग्यकार जिसकी तारीफ करते हैं जनाब। नहीं ये कीमत दोस्ती की महंगी है चुकाना खुद से बेईमानी होगा। ऐसे इक उपयुक्त महोदय तबादला होने पर साहित्य की हमारी संस्था को चेक देने लगे अपने को सम्मानित करवाने को तो नहीं स्वीकार की कभी राशि किसी नेता अधिकारी या धनवान से मुख्य अतिथि बनाकर। जैसा सभी करते हैं मैंने नहीं किया और बदले में किसी से गलत काम में सहयोग करने को नहीं कहा। ये अजीब खेदजनक बात है कि लोग आपकी उचित बात का समर्थन उचित होने के कारण करते हैं मगर उसको भी उपकार मानते हैं। 
 
   कितनी अख़बार मैगज़ीन वाले संपादक उनकी वास्तविकता को लेकर लिखने पर नाराज़ होते रहे हैं। आपको छपवानी है रचनाएं तो उनको सलाम करना होगा और देखता हूं लोग फेसबुक पर धन्यवाद करने की बात लिखते हैं रचना स्वीकृत करने के लिए सम्मानित करने के लिए। होना ये चाहिए की संपादक लिखने वाले को अच्छी रचना भेजने को धन्यवाद देने की बात कहे क्योंकि अभी तक उचित मेहनताना तो अख़बार मगज़ीन वाले देते नहीं , नहीं देने को बहाने बहुत हैं। उनको भी उनकी वास्तविकता बताना नराज़ करना है जबकि ये बाकी सभी खर्चे छपाई कागज़ दफ्तर और कर्मचारी का वेतन देते हैं सिर्फ लेखक को ही गुज़ारे लायक पैसा देना उनको शोषण नहीं लगता है। साहित्य के साथ इस से अधिक अनुचित कुछ हो नहीं सकता है। मैंने साहित्य अकादमी के निदेशक की अनुचित बात मंज़ूर नहीं की उनकी कार्यशैली का हिस्सा बनने से मना कर दिया कवि सम्मलेन आयोजित करने में अकादमी के धन का बंदरबांट करना। सरकारी सम्मानों को लेकर मैंने लिखी कविता साहित्य अकादमी को भेजी जो उसी अंक में छपी जिस में इक और दोस्त को ईनाम मिलने की खबर छपी थी आमने-सामने पेज पर। ये  मुझे नहीं पता था कि ऐसा भी हो सकता है और कई दोस्तों ने फोन किया मुझे भी उस दोस्त को भी तमाशा देखने को लेकिन अच्छा है दोस्त पहले से जानता था मेरी कविता और सोच क्या है। मैं जो मानता हूं उसे लिखते हुए संकोच नहीं करता न घबराता हूं कि कोई बुरा मानेगा। लिखना मैंने ईबादत की तरह किया है काम समाज जनहित को अपने लाभ नुकसान या पैसे शोहरत से नहीं आंका कभी भी। सच लिखने बोलने से दोस्त दोस्त नहीं रहते तो मंज़ूर है सच की ये कीमत चुकानी पड़ती है। लिखना हिंदी में अभी भी घर फूंक तमाशा देखने जैसा है छापने वाले मालामाल और लिखने वाला बदहाल ये अजब कमाल है। वक़्त की उल्टी सीधी चाल है कुछ लोगों की अपनी सुर ताल है। आखिर में जगजीत सिंह जी की गाई ग़ज़ल सब कहती है लिखने को बहुत बाकी है। 
 

 



मई 03, 2021

जनता का आह भरना जुर्म शासकों की लापरवाही उनकी मर्ज़ी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   जनता का आह भरना जुर्म शासकों की लापरवाही उनकी मर्ज़ी 

            ( आलेख - कड़वी सच्चाई तथ्य सहित ) डॉ लोक सेतिया 

    ये संवेनहीनता की हद है सरकार नेता पुलिस सभी जनता को दोषी समझते हैं उनके आदेशों और निर्देशों का पालन नहीं करते कोरोना को हराने बढ़ने से रोकने और बचाव के तरीकों पर गौर नहीं करते हैं। ये समय आरोप लगाने का नहीं है मगर जब सत्ताधारी अपनी नाकामी और वास्तविक कर्तव्य नहीं निभाने की वास्तविकता को स्वीकार करने की जगह जो मर रहे हैं उनकी गलतियां बताने लगे तो जले पर नमक छिड़कने का काम लगता है। सोलह महीने में कोरोना को लेकर देश और राज्यों का स्वास्थ्य विभाग कितना कुछ कर सकता था ये सवाल भी छोटा है आपको असली कारण समझने को और पीछे जाकर देखना समझना होगा। सोलह साल पहले जो शुरआत की जा सकती थी सरकारें नेता बदलते रहे बदलाव करना किसी को ज़रूरी नहीं लगा। शिक्षा और स्वास्थ्य को बजट नाम को निर्धारित किया जाता रहा आबादी को देखते हुए इक नागरिक पर एक दो से बढ़कर अधिकांश पांच रूपये जो इमारत कर्मचारी वेतन के बाद वास्तव में दवा अदि के लिए कुछ भी नहीं बचता। मगर विकास के नाम पर बुत बनाने से आडंबर करने पर बेतहाशा धन बर्बाद किया जाता है हर दिन। मानव जीवन की सुरक्षा से बढ़कर चांद और मंगल पर जाने को अधिक ज़रूरी समझते रहे।
 
मनमोहन सिंह की सरकार में डॉ अंबुमनी रामदासा स्वस्थ्य मंत्री बने थे मई 2004 में तब उन्होंने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा को सुधारने को सख्त नियम कानून बनाने को बिल संसद में पेश किया था। अस्पताल क्लिनिक सरकारी या निजी सभी को मापदंड अनुसार न केवल पंजीकरण करने बल्कि उपचार को लेकर शुल्क की सीमा तक निर्धारित करने तथा ईलाज और अस्पताल में दाखिल करने को मरीज़ की हालत को सामने रखना न कि पैसे या सिफारिश को महत्व देने का नियम की बात थी और निर्धारित कानून और नियम का अनुपालन नहीं करने पर अस्पताल पर कठोर करवाई की बात भी शामिल थी। लेकिन उस कानून को संसद की कमेटी को भेजकर ठंडे बस्ते में डालकर भुला दिया गया राजनितिक कारणों से और जो डॉक्टर देश की स्वास्थ्य सेवाओं को सही करना चाहता था उसको पद से हटवा दिया गया। नागरिक स्वास्थ्य से अधिक महत्व आर्थिक कारणों को दिया गया क्योंकि देश में अधिकांश नर्सिग होम अस्पताल निजी क्या सरकारी खरे साबित नहीं होते थे। मतलब ये कि उनको मनमानी करने और मरीज़ों की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं समझने की की गई और भविष्य में जो जैसा चल रहा था जारी रहने दिया गया। हमारे देश के शासक नेताओं अफसरों को नागरिक की स्वास्थ्य सेवा पाने की उम्मीद को कभी समझना ज़रूरी नहीं माना क्योंकि उनको जब ज़रूरत हो बड़े अस्पताल और विदेश जाकर ईलाज की सुविधा हासिल होती है।
 
पिछले कुछ सालों से जनता की समस्याओं को खिलौना समझने की बात की जाती रही है। आपको हर बात के लिए ऐप्प्स बना कर समझाया गया चुटकी बजाते समाधान मिलेगा। मगर वास्तव में तमाम ऐप्प्स नाकारा और बेकार साबित हुई क्योंकि अफसरशाही बाबूशाही और सरकारी कर्मचारी दर्ज शिकायत को जब मर्ज़ी हटा देते बिना समाधान किये अपने आंकड़े सही करने को। झूठ और फरेब का मायाजाल रचा गया वास्तविक हल नहीं किया गया। अधिकारी नेता मनमर्ज़ी से अपनी सुविधा के नियम बनाते बदलते रहे। पुलिस नेता अपराध को बढ़ाते रहे और कानून व्यवस्था का बंटाधार करते रहे। अपराधी को पकड़ना सज़ा देना छोड़ अपराध करवाना उनका कारोबार बन गया। जनता पर लाठी भांजने वाले खुद मुजरिमों के साथी बनकर आगे बढ़ते बढ़ते वहां तक पहुंच गए कि संसद विधानसभा में बहुमत बाहुबली और गंभीर अपराध करने के आरोपी का होने लगा। वोटों की खातिर बलात्कार के आरोपी को बचाते उसके गैरकानूनी काम को वैध करते रहे। 
 
अब तो चुनाव जीतना ध्येय बन गया और सत्ता पाना और शासक बनकर जनविरोधी विचारधारा जनमत विरोधी कार्य और कानून बनाना आदत बनता गया। देश समाज के कल्याण को छोड़ अपनी विचारधारा थोपने को हथकंडे अपनाकर संविधान तक की अनदेखी की जाती रही। विरोध की आवाज़ को दबाने कुचलने से टीवी अख़बार मीडिया को खरीदने का तानाशाही ढंग अपनाया जाता रहा। भूल गए देश की करोड़ों की आबादी को रोटी शिक्षा स्वास्थ्य चाहिए मंदिर मस्जिद धर्म के नाम पर बांटना अनुचित है। कितनी बड़ी अर्थव्यवस्था की बात कहां रह गई जब सपनों की कांच की बुनियाद पर खड़ी ऊंची इमारत विकास की चरमरा कर ढह गई। कोरोना की आपदा कड़वा सच कह गई। झूठ की नगरी में सच का कत्ल होता रहा शासक मुस्कुराता रहा आमजन रोता रहा। क्या होना चाहिए था और क्या होता रहा। हालत ये है कि ऑक्सीजन नहीं मिलने से अस्पताल में बिस्तर नहीं मिलने से लोग बेमौत मर रहे हैं। आह भरते हैं तो सरकार जनाब को लगता है गुनाह कर रहे हैं। लाशों पर राजनीती की बात सच होती लगती है सावन के अंधों को मगर हरियाली नज़र आती है। 
 
आखिर में भयानक तस्वीर आपको दिखाते हैं कभी गूगल पर सर्च करना तो किसी अख़बार में आपको डॉ अंबुमणी रामदासा का संसद में पेश किया स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने वाले बिल का मसौदा मिल जाएगा। पढ़कर दंग रह जाओगे कि इतने साल पहले किसी ने इतनी गहनता से विमर्श कर स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की कोशिश की थी जो नाकाम नहीं कर दी गई होती तो आज जो बेबसी और दर्द खुद डॉक्टर्स और नगरिक महसूस कर रहे हैं कदापि नहीं होती। जिन को हम चुनते हैं देशभक्ति की समाज सेवा की बातें सुनकर वो सांसद विधायक बनते केवल अपने खुद के लिए सब हासिल करने वाले कानून पल भर में पारित कर लेते हैं जबकि जनता की भलाई की खातिर कोई पहल करता भी है तो उसको सही अंजाम तक नहीं पहुंचने देते हैं। बीस तीस साल पहले बनाये अच्छे कानून राज्य सरकारें लागू नहीं करती मगर अपने ख़ास लोगों की ज़रूरत को उनकी गलत मांग को भी अध्यादेश लेकर तुरंत पूरा किया जाता है। हम खुद को देशभक्त कहते हैं मगर देश समाज विरोधी आचरण करने वाले लोगों के सामने सर झुकाये खड़े रहते हैं। स्वार्थी खुदगर्ज़ सत्ता का अनुचित उपयोग करने वालों की बातें सुनकर तालियां बजाते हैं। अपने देश को बर्बाद करता देख हमारा खून खौलता नहीं हैं जैसे हमारी धमनियों में खून नहीं पानी बहता है। अनुचित को अनदेखा करना विरोध नहीं करना कायरता है फिर कैसे हम अपने गैरवशाली इतिहास की बात करते हुए सीना चौड़ा करते हैं। जिन्होंने देश को आज़ाद करवाया गुलामी की जंज़ीरें तोड़कर उनके सामने हम शर्मसार नहीं होते जब उनकी महिमा का गुणगान करते हैं और उनके सपनों को तार तार करने वालों को मसीहा कहते हैं। 
 
आपको लग सकता है कि कुछ ऐसे कानून बन जाने से क्या वास्तव में बदलाव हो सकता है , तो आपको बताना चाहता हूं कि स्वस्थ्य शिक्षा को मुनाफे का कारोबार नहीं बनाने दिया जाता और स्कूल अस्पताल को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं सभी को उपलब्ध करवाने का लक्ष्य दिया जाता और ऐसा नहीं करने वालों को ये पेशा करने की अनुमति नहीं मिलती तब क्या हो सकता था। तब फार्म हॉउस बड़ी बड़ी गाड़ियां खरीदने और रहने को ऊंचे भवन बनाने की जगह चिकिस्तक अपने अस्पताल में नर्सिंग होम या सरकारी नागरिक अस्पताल में अपनी सुविधाओं से पहले रोगी का उपचार और निदान करने को ज़रूरी साधन उपलब्ध करवाने पर ध्यान देते। भगवान के बाद जिनको महान समझा जाता है उनको खुद कुछ पाने की चाहत नहीं त्याग की भावना महत्वपूर्ण लगती।