अगस्त 27, 2012

POST : 93 हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

       हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हादिसों की अब तो आदत हो गई है
ग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है ।
 
दूर से ही लोग करते हैं इशारे 
शहर में मेरी तो शोहरत हो गई है ।

किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है ।

थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है ।

रात - दिन रोये तुम्हें हम याद करके  
भूलने की अब तो आदत हो गई है ।

अब ख़ुशी है और ग़म न हमको 
राम जाने जाने कैसी हालत हो गई है । 
 
सिर्फ कुर्सी चाहिए ' तनहा ' सभी को 
देश की कैसी सियासत हो गई है ।  
 

 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

क्या कहने सर