हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
हादिसों की अब तो आदत हो गई हैग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है ।
दूर से ही लोग करते हैं इशारे
शहर में मेरी तो शोहरत हो गई है ।
किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है ।
थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है ।
रात - दिन रोये तुम्हें हम याद करके
भूलने की अब तो आदत हो गई है ।
अब ख़ुशी है और ग़म न हमको
राम जाने जाने कैसी हालत हो गई है ।
किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है ।
थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है ।
रात - दिन रोये तुम्हें हम याद करके
भूलने की अब तो आदत हो गई है ।
अब ख़ुशी है और ग़म न हमको
राम जाने जाने कैसी हालत हो गई है ।
सिर्फ कुर्सी चाहिए ' तनहा ' सभी को
देश की कैसी सियासत हो गई है ।

1 टिप्पणी:
क्या कहने सर
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