मार्च 31, 2024

लागा इलेक्टोरल बॉण्ड का दाग़ ( हास -परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 लागा इलेक्टोरल बॉण्ड का दाग़ ( हास -परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    ( सबसे बड़ा अप्रैल फूल बनाया इतिहास में कीर्तिमान स्थापित किया है ) 

आखिर कुछ तो सबसे बड़ा कर दिखाया उन्होंने , उनके चाहने वालों को कब से यकीन था किसी दिन उनका नाम इतिहास में दर्ज होगा अवश्य । काले रंग से अंकित होगा इसकी कल्पना नहीं की थी , देश की सर्वोच्च अदालत ने असंवैधानिक घोषित किया तब भी जनाब को भरोसा था उनके दामन पर कोई कालिख़ टिक नहीं सकेगी । तमाम विपक्षी दलों के दाग़दार राजनेता उनकी दाग़ धोने की मशीन से धुलते ही चमकदार सफ़ेद घोषित होते रहे हैं । जनाब के लिबास कितने कीमती और चमकदार होते हैं अचानक देखा सभी पर कोई धब्बा दिखाई देने लगा है । जनाब की सजावट चमक को बरकरार रखने को फैशन डिज़ाइनर नियुक्त हैं बहुत बड़ी राशि वेतन की लेते हैं उनको तलब किया गया ये कैसे होने दिया । आखिर किसी ने शोध किया तो पाया कि ये सभी वस्त्र जिस रंग का धब्बा लगाए दिखाई दे रहे हैं इलेक्टोरल बॉण्ड से उतरा हुआ रंग है जो पक्का रंग है शायद किसी ने होली पर ये मज़ाक किया है । रंगरजिया कहलाते हैं जो कपड़ों को रंगने में माहिर होते हैं , महिलाओं की सब से बड़ी समस्या साड़ी कमीज़ सलवार के रंग से हूबहू मेल खाता दुपट्टा या अन्य वस्त्र को रंगवाना होता है । अच्छे कारीगर रंगते ही नहीं रंग को उतारते भी हैं कितना गहरा रंग चढ़ा हुआ हो वो उसे सफेद कर सकते हैं । जनाब के कपड़ों से इलेक्टोरल बॉण्ड का दाग़ उनसे भी साफ़ नहीं हुआ लाख कोशिश करने पर भी । आखिर सरकारी विभाग से अदालत तक सभी किसी काम के नहीं निकले जनाब की छवि को बनाए रखने के काम में । जांच आयोग ही राजनेताओं को निर्दोष साबित कर सकता है , अब फिर से सरकार बनी तो यही रामबाण उपाय किया जाएगा , तब तक पुराना गीत गुनगुनाना मज़बूरी है , लागा चुनरी पे दाग़ छुपाऊं कैसे । 
 

लागा चुनरी पे दाग़ छुपाऊं कैसे , जा के बाबुल से नज़रें मिलाऊं कैसे । 

एक नंबर दो नंबर चाहे दस नंबर , बॉण्ड असली नकली भुनाऊं कैसे । 

अदालत का अंगना है टेड़ा कितना , नचाया सबको खुद नृत्य दिखाऊं कैसे । 

दुनिया हैरान देख कर अजब घोटाला , जांच आयोग बना कलीन चिट पाऊं कैसे । 

 

जांच आयोग ( हास्य व्यंग्य कविता ) 

काम नहीं था
दाम नहीं था
वक़्त बुरा था आया
ऐसे में देर रात
मंत्री जी का संदेशा आया
घर पर था बुलाया ।

नेता जी ने अपने हाथ से उनको
मधुर मिष्ठान खिलाया
बधाई हो अध्यक्ष
जांच आयोग का तुम्हें बनाया ।

खाने पीने कोठी कार
की छोड़ो चिंता
समझो विदेश भ्रमण का
अब है अवसर आया ।

घोटालों का शोर मचा
विपक्ष ने बड़ा सताया
नैया पार लगानी तुमने
सब ने हमें डुबाया ।

जैसे कहें आंख मूंद
सब तुम करते जाना
रपट बना रखी हमने
बिलकुल न घबराना ।

बस दो बार
जांच का कार्यकाल बढ़ाया
दो साल में रपट देने का
जब वक़्त था आया ।

आयोग ने मंत्री जी को
पाक साफ़ बताया
उसने व्यवस्था को
घोटाले का दोषी पाया ।

लाल कलम से
फाइलें कर कर काली
खोदा पर्वत सारा
और चुहिया मरी निकाली ।        


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मार्च 30, 2024

लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ' ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ' ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया   

मैं किसी खेल किसी तमाशे की नहीं समाज की देश की वास्तविकता की बात कर रहा हूं । जब खिलाड़ी  किसी मैदान पर खेलते हैं तब जीत हार से अधिक महत्व खेल की भावना का होता है जिनको खेल में दिलचस्पी है उनको अच्छा खेल पसंद होता है भले उनका लगाव किसी एक टोली से होता है । लेकिन जब हम देश की समाज की राजनीति की विचारधारा को लेकर बात करते हैं चर्चा करते हैं सोचते हैं वार्तालाप करते हैं तब भले हम किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हों किसी राजनेता के प्रशंसक हों हमको सब से पहले उनके आचरण को ठीक से देखना चाहिए और सामाजिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था अपने देश के संविधान और सामाजिक सरोकारों को महत्व देना चाहिए । लेकिन अगर हम इन सब को विरुद्ध गलत और अनुचित आचरण देख कर भी बिना विचार किए किसी के पक्षधर बन कर समाज विरोधी आचरण करने वालों का बचाव करते हैं तो हम खुद अपना कर्तव्य अपनी निष्ठा अपनी देश समाज के प्रति ईमानदारी को छोड़ देश समाज के पतन का कारण बन जाते हैं । इसलिए अपने विवेक से काम लेकर कायरता को चाटुकारिता को छोड़ सही को सही कहना और अनुचित का मुखर होकर विरोध करना चाहिए अन्यथा हम भविष्य में अपने ही देश समाज के इतिहास में दोषी कहलाएंगे । कृपया दलीय विचारधारा से ऊपर उठ कर अपनी राय बनाना चाहिए अन्यथा हम शिक्षित होकर भी अज्ञानता की बात कर सकते हैं । कुछ लोग जिन को पसंद नहीं करते उनकी खामियां खोजते ही नहीं बल्कि जो कभी हुआ ही नहीं उस मनघड़ंत बात को बार बार दोहरा कर खुद भी समझने लगते हैं कि वही सत्य है । ऐसे कितने झूठे तथ्य घड़े जाते हैं प्रचारित किए जाते हैं किसी की छवि को धूमिल कर किसी अन्य की छवि को चमकदार साबित करने की कोशिश में । कभी उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफेद क्यों है का इश्तिहार दिखाई देता है आजकल दाग़ अच्छे हैं का विज्ञापन नज़र आना बदलाव की निशानी है कि दुनिया में बेदाग़ कोई नहीं है । 
 
विडंबना की बात है कि आजकल देश की राजनीति के अपराधियों से मुक्त करवाने की कोई चर्चा नहीं होती है बल्कि शासक दल विरोधी दल के जिन नेताओं को दाग़ी भ्रष्टाचारी कहता है अपने दल में शामिल कर उसी का गुणगान करने लगते हैं । जैसे कभी किसी अदालत ने पुलिस को कानूनन संघठित अपराधियों का गिरोह बताया था आज किसी राजनीतिक दल को ठीक वैसा समझा जा सकता है जब सबसे अधिक अपराधी उसी दल के सांसद विधायक हैं । हम ऐसे लोगों से देश की कानून और न्याय व्यवस्था को सही करने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं जिनको राजनीति में प्रवेश ही बाहुबली और किसी देश प्रदेश में उसकी दहशत को देख कर मिला हो । संविधान से कितना विचित्र मज़ाक किया जाता है जब ऐसे लोग जो नफरत और समाज को किसी न किसी तरह विभाजित करने का कार्य करते रहते हैं शपथ लेते हैं कि संविधान और न्याय तथा निष्पक्षता का पालन करेंगे । नौ सौ चूहे खा कर बिल्ली हज को चली कहावत चतिरार्थ होती है । 
 
शायद हम सदियों पुरानी बड़े बज़ुर्गों की शिक्षाओं को भुला बैठे हैं , जिसे देखो बुर्ज की तरह ऊंचाई की चाहत रखते हैं जबकि वास्तव में ईमारत की बुनियाद को खोखला करने का कार्य कर रहे हैं । नींव को कमज़ोर करने से खतरा होता है बहुमंज़िला भवन तक का धराशाही होने का जैसे आये दिन सामने दिखाई देता है किसी पुल के गिरने से जो हादिसे नहीं आपराधिक चूक से होता है । निर्माण सामिग्री से बनाने वाले से लेकर कितने विभागीय अधिकारी शामिल रहते हैं रिश्वत खा कर कोताही बरतने का गुनाह करने वाले । जब देश की संवैधानिक संस्थाएं तक अपने दायित्व निभाने में नाकाम रहती हैं तब दोष किसी और पर नहीं थोपा जाना चाहिए बल्कि उन सभी संस्थाओं का होना ही व्यर्थ है अगर उन संस्थाओं पर उच्च पदों पर बैठ कर भी उनकी सोच बेहद संक्रीण हो जाती है । नाकाबिल लोगों को सिर्फ सत्ताधारी दल की पसंद के कारण संवैधानिक पदों पर नियुक्त करना देश की जनता संविधान से गंभीर अक्षम्य अपराध है । ऐसे कृत्यों को आंखें मूंद कर होने देना इक भयानक भूल है जिसे लेकर कहा जाता है कि ' ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने , लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई '। ( मुज़फ़्फ़र रज़्मी )  
 
 लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई: मुजफ्फर 'रज़्मी'
 

                       

मार्च 28, 2024

गांव की महिलाओं का गीत-संगीत ( खूवसूरत विरासत ) डॉ लोक सेतिया

गांव की महिलाओं का गीत-संगीत ( खूवसूरत विरासत ) डॉ लोक सेतिया  

आपने क्या कभी देखा है कुछ परंपरिक परिधान वेश भूषा में सार्वजनिक जगह पर बैठी कुछ महिलाओं को अपने आप में मग्न गीत गुनगनाते हंसते खिलखिलाते हुए । मैं सैर पर पार्क में जाते हुए कितनी बार उनको देखता और सोचता था कि अपने गांव से शहर की भीड़ में भी कैसे उन्होंने अपनी विरासत को ज़िंदा रखा हुआ है । कुछ समय पहले उन्हीं से इक महिला से वार्तालाप का अवसर मिला इक इत्तेफ़ाक़ से , मैंने उनसे आग्रह किया बताएं ये क्यों इतना महत्वपूर्ण है । जो उन्होंने बताया शायद मेरी तरह अधिकांश लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते होंगे । गांव में उनके बचपन में यही उनकी माएं और मुंहबोली मौसियां किया करती थी जब भी उनको किसी अवसर पर संग संग सुःख दुःख बांटने का संयोग होता था । लेकिन खुद उस महिला को ये सब मालूम नहीं था तब तक जब तक उसका विवाह तय नहीं हुआ था ।
 
शादी से पहले मां उसे साथ ले जाती थी और सभी मौसियां कोई नानी भी जो वास्तव में रिश्ते की नहीं मगर उस से बढ़कर अपनत्व रखने वाली महिलाएं हुआ करती थी । तब बिना किसी के समझाए इक बात उनको समझ आ गई थी कि उन सभी महिलाओं को घर परिवार गांव खेत खलियान में अथक मेहनत करने के बाद भी पीड़ा ही मिलती थी आदर नहीं कोई महत्व नहीं । घर में सार्वजनिक ढंग से विरोध तो क्या रोना तक और भी ताने सुनने का कारण बन जाता था । लेकिन चौपाल में गांव की अपनी उम्र की महिलाओं संग किसी तीज त्यौहार पर गीत संगीत से नाचना अपनी परेशानियों को भुला देता था । बस जाने कब से ये परंपरा बनी हुई है सब चिंताओं में भी कुछ पल संगी सहेलियों साथ आनंद से बिताने की । शादी से पहले हर मौसी उस लड़की को कोई ऐसा गीत गाने को साथ कहती याद करवाती और बतलाती उसे किस ने ये सिखाया था । शायद ये उनकी ऐसी सौगात थी जो हमेशा साथ रहती है उम्र के हर छोड़ तक । 
 
उन्होंने बताया उन सभी गीतों में मायके और ननिहाल की मधुर यादों की बात कही जाती है जबकि ऐसा सभी को वास्तव में मिलता हो ज़रूरी नहीं था । लेकिन बचपन में भी लड़कियों को अन्य कड़वे अनुभव के बीच वही इक सुखद एहसास लगते थे । शादी के बाद जिस भी गांव शहर जाकर रहती हैं ऐसी अपनी उम्र की महिलाएं मिल ही जाती हैं जो इंतज़ार करती हैं उन कुछ दिनों का जब वो साथ मिल बैठ कर सारी परेशानियां चिंताएं भुलाकर कुछ पल हंस लेती हैं । ये कुछ दिन का आनंद उनको जीने की ऊर्जा देता है ।  



मार्च 27, 2024

छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

    छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

चोर सबको कहता लुटेरा अजब तौर है  ,
देश की सियासत का यही नया दौर है । 
 
अब अंधेरे उजालों को समझाने लगे हैं 
बंद आंखों से देख समझो हो गई भौर है ।
 
सबको ये तमाशा लाज़मी देखना होगा 
हम्माम में सभी नंगे है ये तो हर ठौर है ।
 
इक पहेली है सच क्या और झूठ क्या 
लबों पर है कुछ दिल की बात और है ।  
 
हमने इरादा किया बनाएंगे राह इक नई 
फुर्सत मिले सोचते हैं काबिल ए गौर है ।  
 
शहंशाह को भूख है जो मिटती ही नहीं है
छीन लो गरीबों से हाथ अगर इक कौर है ।  

उनका दस्तूर है सब परस्तिश उनकी करें 
उनकी मर्ज़ी जो चाहें वही ख़ुद सिरमौर है । 
 
खुद मसीहा है हर गुनाह उसका मुआफ़ है 
जो है उसका मुख़ालिफ़ शख़्स वो चोर है । 


इस तरह यीशु मसीह की भविष्यवाणी "मैं चोर के समान आता हूँ" पूरी होती है
 
 

मार्च 25, 2024

आत्मा - अलग , ज़िंदा लाश लोग ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  आत्मा - अलग , ज़िंदा लाश लोग  ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

ये कोई झूठी मनघडंत कथा कदापि नहीं है इस विषय पर शोध विचार विमर्श सभी कुछ करने के बाद इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि वास्तव में हर आदमी औरत की आत्मा का अस्तित्व होता है और कोशिश करने पर खोज सकते हैं कि किस की आत्मा का निवास किस जगह है । आजकल कोई सोशल मीडिया पर नियमित रूप से निरंतर सक्रिय व्यक्ति जब कुछ दिन तक दिखाई नहीं देता तब उसके परिचित अपने और बेगाने तक महसूस करते हैं कोई अनहोनी घटना हो गई हो संभव है । खुद सुबह से देर रात तक स्मार्ट फ़ोन की तिलस्मी दुनिया में खोए रहने वाले फोन या इंटरनेट की कमी को सहन नहीं कर सकते और उनको जीवन व्यर्थ प्रतीत होता है बगैर सोशल मीडिया के । जिस्म और रूह का रिश्ता हमेशा ऐसा उलझा हुआ रहा है आदमी का जिस्म धर्म उपदेश सुनता दिखाई देता है जबकि मन किसी और दुनिया में विचरण करता रहता है । प्राण आत्मा की उपस्थिति है अन्यथा देह सिर्फ़ मिट्टी है किसी पत्थर की तरह जिस में कोई संवेदना नहीं होती है । धनवान सेठ की आत्मा तिजोरी में बंद रहती है तो राजनेताओं की आत्मा जो भले मर चुकी होती है तब भी सत्ता की कुर्सी के पाये से जकड़ी रहती है कुर्सीविहीन राजनेता बिना जल मछली की तरह छटपटाते हैं । शासक की आत्मा किसी एक जगह टिकती नहीं बस भटकती रहती है कहते हैं कोई अभिशाप मिला हुआ है तख़्त ओ ताज़ को चाहे कितने नर्म मुलायम कपड़े से सामान से निर्मित हों शासक को कांटों की चुभन का आभास देते हैं । 
 
सभी सरकारी प्रशासन वालों की आत्मा अपने बदन से निकल कर शासक की चरणों की धूल से घुलमिल जाती है अपना वजूद मिटाकर तभी मनवांछित फल प्राप्त होते हैं । आत्मा परमात्मा से मिले चाहे नहीं मिले बड़े लोगों की अंतरात्मा को सुकून सामान्य प्राणियों से अपनी प्रशंसा सुनकर ही मिलता है । जनता आम आदमी भूखे नंगे गरीब बदहाल लोग अमीरों शासकों धनवान उद्योगपतियों सत्ताधारी और विपक्षी राजनेताओं की सबसे बड़ी आवश्यकता होते हैं अन्यथा खास वर्ग के सभी खुद को सबसे बड़ा ऊंचा और महत्वपूर्ण होने का अहंकार लिए फिरते हैं । अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को कभी नहीं सुनने वाले लोग ही नाम शोहरत रुतबा हासिल कर पाते हैं यही साधारण से विशिष्ट होने की शर्त है । शायर राजेश रेड्डी जी कहते हैं , 
' न बस में ज़िंदगी उस  के , न काबू मौत पर उस  का , मगर  इंसान  फिर भी कब खुदा होने से डरता है '।
 
विषय था आत्मा का अस्तित्व तलाश करने की तो खोजने पर शोध करने पर पाया गया कि जैसे कहानियों में किसी की जान किसी तोते में बसती थी कुछ उसी तरह हम सभी की आत्माएं निवास करती हैं जिस किसी भी से हमारा प्रेम लगाव मोह सबसे अधिक होता है । लिखने वालों की आत्मा अपनी किताबों रचनाओं में उलझी रहती है , प्रकाशक की किताबों की बिक्री की आमदनी से जकड़ी लिखने वाले की रॉयल्टी की उलझन से निकलने को बेताब रहती है । अख़बार टीवी चैनल वालों की आत्माएं विज्ञापनों और टीआरपी की अंधी दौड़ में कहने को सबसे तेज़ दौड़ते लगता हैं जबकि वास्तव में कोल्हू के बैल की तरह उसी इक दायरे में घूमते रहते हैं । कोल्हू के बैल की तरह से ही उनकी आंखों पर बंधी स्वार्थ और विवेकहीनता की पट्टी उनको खबर नहीं होने देती कि सबको ख़बर देते देते खुद से बेखबर क्या करना था करने क्या लगे हैं । आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास की हालत हो गई और समाज में सबसे बढ़कर पतन इन्हीं का हुआ है होता जा रहा है ।
 
आखिर में उनकी बात जिनको समाज की व्यवस्था की लोकतंत्र की मर्यादा की न्याय की समानता की हमेशा रखवाली करनी थी उनहोंने अपनी आत्मा अपना ज़मीर सोने चांदी के चंद सिक्कों के बदले कहीं बंधक रख दिया है । अब कठपुतली क्या कर सकती है जिस के हाथ धागे हैं उसी के इशारे पर नाचने को विवश हैं । कोठे पर नाचने वाली जिस्म का सौदा किया करती थी ये सभी ज़मीर तक का सौदा करते हैं और चुपके चुपके नहीं सरे आम खुले बाजार में बेशर्मी से किया करते हैं । जिस्मफ़रोशी की तरह इस कारोबार में धन दौलत सभी मिलता है लेकिन बदनाम नहीं कहलाते बुरे हैं लेकिन नाम शोहरत वाले समझे जाते हैं । ये बातों से झगड़ा दंगा फ़साद सब करवाते हैं सुबह शाम बहस करवाते हैं तकरीर सुनवाते हैं ये काठ की तलवारों से जंग लड़ते हैं हार को जीत साबित कर शूरवीर बन जाते हैं । कहीं जाना नहीं ब्रेक के बाद आते हैं कितनी बार दर्शक पर सितम ढाते हैं ।
 
देश की आबादी की संख्या एक सौ चालीस करोड़ है लेकिन उन सभी को ज़िंदा नहीं समझा जा सकता है बहुत लोग चलते फिरते सांस लेते खाते हैं पीते हैं लेकिन सिर्फ जिस्मानी तौर पर । उनकी रूहें उनकी आत्माएं उन से अलग कहीं मुर्दा जैसी पड़ी रहती हैं । शिक्षा विज्ञान आधुनिक संसाधन बढ़ने से सभी की बौद्धिक प्रगति नहीं होती है । सोचना समझना अपने विवेक का उपयोग कर उचित अनुचित अच्छा बुरा सही गलत का आंकलन करना छोड़ सब को देख कर भीड़ का हिस्सा बन कर कितने ही लोग ज़िंदगी भर किसी लाश की तरह जीवन बिताते हैं उनका दुनिया में आना दुनिया से चले जाना वास्तव में कुछ भी अंतर नहीं लाता है । शायद अधिकांश लोग सोचते ही नहीं कि ज़िंदगी को सार्थक ढंग से जीने का ढंग क्या होना चाहिए । आपको आत्माओं का इक घर दिखलाते हैं । 
 
 May be an image of grass and tree

मार्च 14, 2024

सब शरीक़े जुर्म हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया { चुनावी बॉन्ड की चुप्पी की आवाज़ की गूंज }

        सब शरीक़े जुर्म हैं  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

पाक़ीज़ा खुले आम इल्ज़ाम लगाती है , किसी को नहीं बख़्शती सिपहिया से रंगरजवा तक सभी दुपट्टा बेचने वाले से बजजवा तक । असली विषय पर आएं उस से पहले इस को जान लेना आवश्यक है कि इक मान्यता है कि राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के सब से प्राचीन धंधे हैं और इन दोनों में काफी समानताएं हैं । अमर प्रेम का नायक कहता है कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना , हमको जो ताने देते हैं हम खोए हैं इन रंगरलियों में , हमने उनको छुप छुप के आते देखा इन गलियों में । बदनाम बस्ती में शरीफ़ लोग रात को अंधेरे में छुपते छुपाते जाते थे , रईस खानदानी लोग घर पर महलों में बुलवा नचवाते थे । खिलौना फिल्म में तो नाचने वाली पागलपन की दवा बन गई थी । ख़ामोशी से उमराव जान तक कितनी फ़िल्में अपने देखी हैं । वैश्या जिस्म बेचती है कुछ लोग अपना ईमान बेचते हैं और कुछ उनका ईमान ख़रीद कर बदले में मनचाहा वरदान देते हैं । लोकतंत्र में कुछ लोग हैं जो न रोटी बनाते हैं न रोटी खाते हैं वो रोटी से खेलते हैं , किसी कवि ने पूछा ये तीसरा व्यक्ति कौन है , देश की संसद इस पर मौन है । चुनावी बॉन्ड शायद वही चुप्पी है जिस की आवाज़ की गूंज अभी भी साफ सुनाई नहीं देगी भले चुनाव आयोग की वेबसाइट पर नाम लिख भी दिए जाएं ।
 
 
चुनावी बॉण्ड किसी खरीदार और भुनाने वाले की गोपनीय राज़ की बात घोषित की गई थी बैंक का काम था किसी बिचौलिए की भूमिका निभाना । बैंक राज़ी हो गए अपनी आंख बंद कर खरीदार और जिसको मिला और जिस ने भुनाया उसकी पहचान किसी को खबर नहीं होने देने पर । अंधेर नगरी चौपट राजा की निशानी नहीं है सिर्फ बल्कि जिस को देश के संविधान कानून और लोकतंत्र की सुरक्षा का फ़र्ज़ निभाना था उसको ये दिखाई नहीं दिया तब तक जब तक किसी ने उसकी चौखट पर दस्तक नहीं दी ।  
 
2017 में 2017 - 2018 के बजट में प्रावधान किया गया और 2 जनवरी 2018 को वित्त मंत्रालय ने घोषणा जारी की , 15 फरवरी 2024 को सर्वोच्च न्यायालय ने इस को असवैंधानिक बताया और इसे देश की जनता के सूचना के अधिकार का उलंघन बताया । गंभीर सवाल ये है कि सत्ताधारी अथवा सभी राजनैतिक दल जब चाहे मनमानी करते रहें लेकिन जिन संस्थाओं को न्याय और जनता के अधिकारों एवं लोकतान्त्रिक प्रणाली की सुरक्षा करनी है जिनको संविधान ने बनाया ही इस मकसद से है उनको खुद ये सब देखना नहीं चाहिए बल्कि कोई गैर सरकारी संस्था असोसिएशन ऑफ डेमोक्रैटिक राईट को अदालत जाकर मुकदमा दायर करना चाहिए ऐसी अंधेर नगरी बन गया है देश । अब भी सिर्फ नाम बताने से क्या सब ठीक हो गया मान लिया जाएगा । अनुचित असंवैधानिक ढंग से हुए लेन देन पर कोई करवाई नहीं तो आम नागरिक पर ही हमेशा तलवार लटकती रहना किसलिए जो अपनी आमदनी का हिसाब नहीं बता सकता तो अपराधी घोषित किया जाता है । ई डी क्या सिर्फ सत्ता विरोधी को पकड़ने को बदले की भावना से कार्य करती है किसी सत्ताधरी किसी सरकार समर्थक कारोबारी की तरफ देखती तक नहीं है । 
 
भारतीय स्टेट बैंक पहले महीनों लगने का बहाना बनाता है बाद में इक दिन में आंकड़े दे सकता है जब अदालत कड़ा रुख अपनाती है यही अपने आप में किसी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है । अब तो दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल सच साबित होती लग रही है । 
 

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार ,

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहाऱ । 

आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं ,

रहगुज़र घेरे हुए मुरदे  खड़े हैं बेशुमार । 

रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख़्याल आया हमें ,

इस तरफ आती तो हम भी देखते फस्ले - बहार । 

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं ,

बोलना भी है ,मना सच बोलना तो दरकिनार । 

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं ,

आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार । 

हालते इनसान पर बरहम न हों अहले-वतन , 

वो कहीं से ज़िंदगी भी मांग लाएँगे उधार । 

रौनक़े जन्नत ज़रा भी मुझको रास आई नहीं ,

मैं जहन्नुम में बहुत खुश था मेरे परवरदिगार । 

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ,

हर हथेली ख़ून से तर और ज़्यादा बेक़रार ।  

( साये में धूप से आभार सहित ) अब वास्तव में दरख़्तों के साये में धूप लगती है । 





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मार्च 06, 2024

आदमी से जानवर बनते जा रहे हैं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

        फेसबुक व्हाट्सएप्प का तराज़ू ( बद अच्छा बदनाम बुरा ) 

                                    डॉ लोक सेतिया  

पहले रग रग से मेरी खून निचोड़ा उसने  , 

अब ये कहता है कि रंगत ही मेरी पीली है । 

मुज़फ़्फ़र वारसी । 

अपने गिरेबान में नहीं झांकते वर्ना चुल्लू भर पानी में डूब मरते , क्या हाल बना दिया है फेसबुक की बात मत पूछो गंदगी परोसते हैं लाज शर्म को छोड़ कर । अब जब मुझे व्हाट्सएप्प ने स्पैम घोषित किया तो समझ नहीं आया कि माजरा क्या है । कोई बेहूदगी की बात नहीं कोई अभद्रता की भाषा नहीं संदेश भेजता रहा सिर्फ सामाजिक सरोकार और झूठ और सच का अंतर समझने को । अपने इतने लोगों को संदेश भेजा क्या ये गुनाह है लोग अंधकार मिटाने को कितने चिराग़ जलाते हैं और ये जो सोशल मीडिया पर अंधेर मचा रहे हैं मनमाने ढंग से निर्णय कर सकते हैं । उनका अपराध नहीं है उनको समझ ही नहीं किस बात का अर्थ क्या है महत्व कितना है । लेकिन इन आधुनिक युग के धनपशुओं को पैसे की भाषा के बिना कुछ भी नहीं आता है । देश समाज विश्व का भला बुरा ये उनकी सोचने की बात ही नहीं उनको अपना धंधा बढ़ाना है किसी भी तरह से आमदनी चाहिए भले जिन्होंने उन पर भरोसा किया उनकी जानकारी बेच कर या विज्ञापन से ठगी का माध्यम बन कर । 
 
आपको क्या लगता है अगर ये सब नहीं होंगे तो हमारा जीवन दुश्वार बन जाएगा या फिर उल्टा ही है इन आधुनिक संचार माध्यमों का अनुचित और अत्यधिक उपयोग करने से हमने सोचना समझना छोड़ दिया है और ऐसे लोगों के भरोसे सब छोड़ दिया है जिनको सही गलत उचित अनुचित का भेद नहीं मालूम बल्कि तमाम नैतिकता के मूल्यों को तार तार कर रहे हैं । हमने भूल की है इन पर इतना आश्रित हो गए हैं कि बगैर सोशल मीडिया खुद को बेबस समझने लगते हैं जबकि वास्तविकता इस के विपरीत है । काश हम इनको छोड़ कर कुछ सोचते समझते कुछ सार्थक विमर्श करते समय की बर्बादी नहीं करते । सच तो ये है कि इनसे हमको कुछ भी अच्छा नहीं मिला बल्कि हमारी सोचने परखने की क्षमता कुंद हो गई है । हम भूल गए हैं कि हमारे पूर्वज इन सब के बिना कितने महान विद्वान और विवेकशील हुआ करते थे और बगैर किसी शोर तमाशे के देश समाज को बेहतर बनाते रहे और बदलाव करते रहे । जबकि आजकल हम कहने को दौड़ रहे हैं लेकिन वास्तव में हम कोल्हू के बैल की तरह उसी सिमित दायरे में घूमते रहते हैं , सोशल मीडिया का ज्ञान किसी छल से कम नहीं मगर हमने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है और दोस्तों फॉलोवर्स की झूठी संख्या से खुद को लोकप्रिय समझते हैं जबकि उन सभी का अभिप्राय कुछ और होता है । 
 
कभी विचार किया है कि इन सभी ने आदमी को आदमी की तरह नहीं किसी बेजान मशीन की जीने को विवश कर दिया है । मानवीय संवेदना रहित समाज बनता जा रहा है जिस में भावनाओं का रत्ती भर भी महत्व नहीं समझा जाता है । विज्ञान विकास जब मानवता की भलाई करे तभी उचित है लेकिन जब बंदूक तोप हथियार और बंब विध्वंसक साज़ो सामान बनाते हैं तो हैवानियत को बढ़ावा मिलता है । भारत देश की संस्कृति और सभ्यता या पुरातन परंपरा जिस का हम शोर मचाते हैं ऐसा करने को कभी स्वीकार नहीं कर सकता है । इक बात सभी जानते हैं कि किसी भी चीज़ का नशा अच्छा नहीं होता है और ये सोशल मीडिया की झूठी चमक दमक तो समाज को भटका रहे हैं । इनकी आवश्यकता कम है उपयोगिकता की सीमा तक ठीक है अन्यथा समय ऊर्जा ही नहीं सामाजिक संसाधनों की भी बर्बादी है । आजकल ये किसी बंदर के हाथ में उस्तरा होने जैसी चिंताजनक हालत है । कभी ध्यान से देखना आपको इंसान कम बंदर अधिक दिखाई देंगे यहां पर , बंदरों की आदत सभी जानते हैं , टोपी वाले की कहानी याद है जो भी किसी को करते देखता है नकल करने लगता है ।  आदमी पहले बंदर था कि नहीं कहना कठिन है लेकिन सोशल मीडिया ने इंसान को बंदर बनने पर विवश ज़रूर कर दिया है । कभी बंदर की तरह कभी कुत्ते की तरह कभी लोमड़ी कभी गिरगिट कभी मगरमच्छ की तरह दिखाई देते हैं । कई लोग तो किरदार बदलते क्षण भर भी नहीं लगने देते हैं । आदमी का आदमी बनकर रहना आसान नहीं इस युग में ।
 
   
 
 बरेली: लाखों जिंदगी पर भारी है कुत्ते-बंदरों का खौफ... हल्के में मत लीजिए -  Amrit Vichar

मार्च 04, 2024

इश्तिहाऱ बन गए हैं जनाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      इश्तिहाऱ बन गए हैं जनाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

क्या से क्या हो गया , बेवफ़ा तेरे प्यार में । सत्ता की कुर्सी भी गाइड फ़िल्म की नर्तकी जैसी है जनाब उसकी ख़ातिर कुछ भी बन सकते हैं । रोज़ लिबास की तरह किरदार बदलते हैं दिल की बात छोड़ो सरकार हैं जब चाहे दिलदार बदलते हैं । घर बार परिवार की बात क्या उनकी अलग बात है खूबसूरत सपने दिखला कर सोचते हैं दुनिया बदलना छोड़ अख़बार टीवी पर पुराना इश्तिहाऱ बदलते हैं । गुलामों की मंडी के हैं इक वही सिकंदर कोई ताज बनाते हैं सरताज़ बदलते हैं लोकतान्त्रिक तौर तरीके बदल डाले हैं इस बार इरादा है ऐतबार नहीं करते ऐतबार बदलते हैं कुछ दोस्त नहीं ज़रूरत जिनकी दामन छुड़ा मतलब की दोस्ती करते हैं दुश्मन से यार बनाते सब यार बदलते हैं । हम लोग तमाशा पसंद स्वभाव वाले हैं हर किसी का तमाशा देख खुश होते हैं लेकिन जब इक दिन खुद ही तमाशा बन जाते हैं तो हैरान परेशान होते हैं । ऐसा जादूगर कभी नहीं देखा पहली बार जितने भी तमाशाई हैं खुद अपने आप को जमूरा कहलाना गर्व की बात समझते हैं । कल उनके आका तालियां बजवाने को अजीब पागल जैसे करतब दिखलाएं तो सभी अपने आप को पागल मैं भी साबित करने लग सकते हैं । सोशल मीडिया पर खुद को जो भी घोषित करने का अर्थ वो कार्य करना नहीं होता है , विज्ञापन या इश्तिहाऱ की विशेषता यही है उनको खरा साबित नहीं करना पड़ता सिर्फ दावा करना होता है । अपने आप को सर्वश्रेष्ठ घोषित करना वास्तव में कोई महान कार्य नहीं होता बल्कि कहावत है कि बड़े बढ़ाई ना करें बड़े ना बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल । 
 
बड़बोला होना कोई गुण नहीं समझा जाता है , इक कवि की कविता है जिस में कवि कहता है कि बौने किरदार वाले लोग पर्वत की चोटी पर चढ़ कर समझते हैं कि उनका रुतबा उनका क़द बढ़ गया है जबकि वास्तव में वो और भी बौने दिखाई देते हैं । बड़ी बड़ी बातों से कोई महान नहीं बनता है महान नायक वही कहलाते हैं जो बड़ी सोच और ऊंचे आदर्श की कसौटी पर खरे उतरते हैं सादा जीवन और आचरण से इक कीर्तिमान स्थापित करते हैं । विज्ञापन की दुनिया चमकीली लुभावनी शानदार आकर्षित करती प्रतीत होती है जबकि ये झूठ बनावट धोखा और कपट से बुना इक जाल होता है । जनाब का नया इश्तिहाऱ भी परिंदों को पकड़ने और उनके परों को काट कर अपने स्वार्थ के पिंजरे में कैद करने की चाल है । ज़माना बदल गया है लोग अब समझने भी लगे हैं राजनीति की चालों को और नेता बचने लगे हैं जवाब नहीं दे सकते जीना उन सभी सवालों से । जनाब से सवालात करना मना है मगर कभी कोई सवाल दागता है तो सरकार जवाब नहीं देते सवाल के बदले इश्तिहाऱ की तरह ब्यान देते हैं । मैं इश्तिहाऱ हूं आप सभी मेरा इश्तिहाऱ   हैं , भरी सभा से कहलवाते हैं सभी कहो आप सब मेरे इश्तिहाऱ हैं , और चाटुकार इश्तिहाऱ   बन कर गौरव का अनुभव करते है ।  आख़िर में अपनी ग़ज़ल संग्रह की किताब ' फ़लसफ़ा ए ज़िंदगी ' से इक ग़ज़ल पेश है ।

अब लगे बोलने पामाल लोग 
देख हैरान सब वाचाल लोग ।
 
कौन कैसे करे इस पर यकीन 
पा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग ।

ज़ुल्म सहते रहे अब तक गरीब 
पांव उनके थे हम फुटबाल लोग ।

मुश्किलों में फंसी सरकार अब है
जब समझने लगे हर चाल लोग ।

कब अधिकार मिलते मांगने से
छीन लेंगे मगर बदहाल लोग ।

मछलियां तो नहीं इंसान हम हैं  
रोज़ फिर हैं बिछाते जाल लोग । 

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग । 
 
पामाल =  दबे कुचले  
वाचाल = बड़बोले





               

मार्च 02, 2024

किताबें पढ़ने का महत्व ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

           किताबें पढ़ने का महत्व ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

हम भटक गए हैं इधर उधर से सुनकर अथवा सोशल मीडिया से लेकर टीवी सीरियल यहां तक कि हर किसी के भाषण उपदेश से प्रभावित होकर अपनी सोच को किसी सकरी गली में धकेल रहे हैं । अधिकांश लोगों ने किताबें पढ़ना छोड़ दिया है खरीदना तो शायद ही ज़रूरी लगता है । किताबें सबसे विश्वसनीय दोस्त तो होती ही हैं और इनकी विशेषता ये भी है कि आप जब चाहें इनसे जीवन की सभी समस्याओं परेशानियों का हल ढूंढ सकते हैं । क्या आपको लगता है कि किताब पढ़ना सिर्फ परीक्षा में उत्तीर्ण होने अथवा अपने कार्य में उपयोग करने को ही उपयोगी है तो आपकी जानकारी सही नहीं है । अपने मतलब की ज़रूरी किताबों के साथ आपको अपने देश समाज की विविध जानकारी को हासिल करने ही नहीं समझने को भी पढ़ना बेहद आवश्यक है । शिक्षक से पंडित मौलवी पादरी से उपदेशक तक सभी किताबों ग्रंथों का अर्थ अपनी सुविधा से घड़ते हैं और समझाते हैं तभी ये लोग आपको धार्मिक ग्रंथ से अन्य वास्तव में जीवन उपयोगी पुस्तकों को हर किसी को खुद पढ़ने और समझने को नहीं कहते हैं । हमारी समझ धर्म संविधान और नैतिक आदर्श से अपने सामाजिक मूल्यों तक सिमित दायरे में सिमटी हुई है । किताबें हमारी सोच और बुद्धि का भोजन होती हैं और उनको पढ़ना आपको किसी खुले आसमान में विचरण करवाता है । देखते हैं आजकल लोग पढ़ने की आदत को तिलांजलि दे चुके हैं दूसरे शब्दों में अपनी सोचने की क्षमता पर रोक लगा दी है , बोलते अधिक हैं पढ़ते नहीं और सुनते हैं सिर्फ अर्थहीन बहस गप शप इधर उधर की ऐसी बातें जिन से कुछ सार्थक नहीं मिलता है । कहने को हम आज़ाद हैं मगर वास्तविकता में हमारी मानसिकता आज भी गुलामी की है और हम किसी न किसी को अपना भगवान बना कर उसका गुणगान करते हैं । क्या आपको लगता है ईश्वर का गुणगान उसकी स्तुति करने से ईश्वर मिलते हैं तो अपने ईश्वर की परिकल्पना को जाना नहीं समझा नहीं । भगवान को हमने दाता से भिखारी ही नहीं बना दिया बल्कि उसे बेबस समझ लिया है जिसे इंसान से कुछ चाहिए , सोचना सब बनाने वाले को आदमी से क्या चाहिए पैसा भोजन या कोई घर रहने को । आदमी भगवान से बड़ा समझने लगा है या ऐसा तो नहीं कि हमने मान लिया है कि कोई ईश्वर विधाता नहीं सिर्फ आडंबर करते हैं आस्तिकता का । और कुछ लोग खुद को नास्तिक कहते हैं और ज़िद पर अड़े रहते हैं संवाद भी नहीं करते बस अपनी मनवाना चाहते हैं । 
 
अच्छा साहित्य आपको अच्छा इंसान बनाता है अगर आप पढ़ते हैं ध्यान पूर्वक और पढ़ने के बाद उस पर चिंतन भी करते हैं ।  कैफ़ी आज़मी की इक कविता है , आदत ,  मैं इक अंधे कुंवे में कैद था और शोर मचा रहा था मुझे आज़ादी चाहिए मुझे रौशनी चाहिए , जब मुझे बाहर निकाला गया तो मैंने घबरा कर फिर वापस उसी अंधे कुंवे में छलांग लगा दी , और फिर वही आवाज़ लगाने लगा मुझे आज़ादी चाहिए मुझे रौशनी चाहिए । आजकल सभी की हालत ऐसी लगती है । कैसी खेदजनक हालत है हर कोई जिन बातों पर घंटों तक बोलना जानता है खुद उनका अर्थ तक नहीं समझता ये अज्ञानता की पराकाष्ठा है , कोई भी कितना भी जानकर हो दुनिया की जानकारी के अथाह समंदर के इक कतरे जैसा है । कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन में आपका पाठन कभी थमता नहीं है आपको निरंतर अध्यन करना होता है अन्यथा आप पिछड़ जाते हैं । ये जितना भी हमारा पुरातन साहित्य और इतिहास है वही हमारी असली विरासत है जिस को केवल कहीं रखना सुरक्षित बंद अलमारी में उचित नहीं है बल्कि उसे हमेशा वक़्त के साथ जोड़ते रहना उपयोगी बनाता है । किताबों की विशेषता है कि उनमें लिखा बदलता नहीं है और वो आपसे कोई शिकायत भी नहीं करती चाहे कितने अंतराल तक अपने उनको देखा पढ़ा नहीं । जब भी चाहो उठाओ और उनसे सीख सकते हैं , युग चाहे कोई भी हो पुस्तकों का महत्व कभी कम नहीं होता है ।   
 
जीवन साल दिन और आयु से नहीं निर्धारित किया जा सकता , आपने क्या सार्थक जिया ये आपकी सोच और बुद्धिमता पर निर्भर करता है । बहुत लोग हुए हैं जिन्होंने छोटी सी ज़िंदगी में खुद अपने ही लिए नहीं परन्तु समाज की खातिर बहुत कुछ किया है । कुछ लिखने वाले जितना भी लेखन कार्य किया उस से ऐसे शिखर पर पहुंच गए जहां अन्य सैंकड़ों किताबें लिख कर भी नहीं पहुंच पाए । उच्च कोटि का साहित्य वही होता है जो अपने समय की सही तस्वीर पूरी ईमानदारी से दिखलाता है । साहित्य का मकसद मनोरंजन नहीं बल्कि मार्गदर्शन करना और सत्य की राह चलना बताना होता है । आधुनिक सिनेमा टीवी सीरियल से लेकर सोशल मीडिया तक अपने ही मार्ग से भटके हुए हैं और हर कोई उपदेशक बना फिरता है जिस राह पर कभी पांव नहीं रखा उस पर चलने की नसीहत सभी को देता है । ख़ुदपरस्ती का आलम है हर ज़र्रा अपने को आफ़ताब समझता है ।  
 
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