जून 27, 2026

POST : 2079 देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

      देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

कब तक धर्म और ईश्वर के नाम पर ठगों चोरों लुटेरों की तिजोरियां भरते रहोगे , सब कुछ सामने देख कर भी आंखों वाले अंधे बनकर अपनी मूर्खता को उचित ठहराते रहोगे । पहले अपने धर्म को समझने की आवश्यकता है समझने को पढ़कर चिंतन की ज़रूरत है । आपका धर्म आपको कभी नहीं कहता है कि आस्था के नाम पर सही गलत की पहचान ही मत करो बल्कि वास्तविक धर्म दीन दुखियों की गरीबों की भूखों की सहायता करना होता है ये संदेश देता है। धर्म और ईश्वर के नाम पर संचय करना कभी धर्म हो ही नहीं सकता है इसलिए आपको मानवधर्म समझ कर जितना संभव हो किसी ज़रूरतमंद की सहायता करनी चाहिए । भला ईश्वर को किसी से कुछ भी क्यों चाहिए होगा , भगवान के नाम पर जो अपना कारोबार व्यौपार करते हैं उनको अपने स्वार्थों से बढ़कर कुछ भी नहीं लगता है । आपको लोभ मोह माया का त्याग करने का उपदेश देने वाले खुद कितना अधिक खुद जमा किये हैं कोई दान पुण्य किसी की सहायता कदापि नहीं करते हैं बल्कि कुछ सामाजिक सेवा करने का दिखावा और आडंबर भी करते है तो खुद अपनी ख़ातिर । गरीबों पर रत्ती भर रहम नहीं करने वाली सरकार कुछ लोगों को कितनी ही कीमती ज़मीन कहने को एक रूपये में 90 साल को पटे पर देने का कार्य कर चोर चोर मौसेरे भाई का रिश्ता निभाती है ताकि वो लोग शासन की अनुचित और धर्म समाज विरोधी कार्यप्रणाली पर समर्थन देने का कार्य करें । ऐसे तमाम साधु सन्यासी क्या खुद धर्म और ईश्वर को समझते हैं । 
 
अगर आपको धर्म दान पुण्य करना है तो दिखावा करने और बदले में कुछ भी चाहत रखने की जगह ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करना सही होगा । भगवान कोई हिसाब किताब नहीं रखता है कि आपने कितना चढ़ावा धन दौलत अर्पित की है ताकि बदले में आपको कुछ उपहार वरदान दे या फिर आपके बुरे कर्मों को माफ़ कर दे । ऐसा समझते हैं तो आपको भगवान को लेकर कुछ भी समझ नहीं है , ऊपरवाला सब देखता है जानता है और सही समय पर निर्णय न्याय भी करता है । ये अलग बात है कि हम समझ नहीं पाते हमको जो भी अच्छा बुरा परिणाम हासिल हुआ वो अपने ही बीजे हुए कर्मों का फल मिलता है। सुःख दुःख का परेशानियों का कारण हम खुद ही होते है कोई भी हमको बचा नहीं सकता अपने अच्छे बुरे कार्यों के परिणाम से। जिनसे आपको ऐसी उम्मीद आशा अपेक्षा रहती है खुद उनको भी कर्मफल का परिणाम मिलता है , सामने है सभी आपको समझ नहीं आता तो आपकी समझ पर निर्भर है । क्या आपने ईमानदारी से मेहनत से कमाई की है तो आपकी नेक कमाई किसी गलत कार्य में ऐसे व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए जो दान का सही पात्र नहीं हो। किसी की चिकनी चुपड़ी बातों पर भरोसा कर ऐसे दान या सहायता नहीं देनी चाहिए जिसका गलत उपयोग किया जा सकता है और अगर ऐसा हुआ भी है तो आपको ऐसे लोगों संगठनों और संस्थानों का विरोध करना चाहिए जो धर्म ईश्वर और समाजसेवा की आड़ में अपनी तिजोरियां भरते हैं । 
 
  

    छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता ) 

      डॉ लोक सेतिया 

चोर सबको कहता लुटेरा अजब तौर है  ,
देश की सियासत का यही नया दौर है । 
 
अब अंधेरे उजालों को समझाने लगे हैं 
बंद आंखों से देख समझो हो गई भौर है ।
 
सबको ये तमाशा लाज़मी देखना होगा 
हम्माम में सभी नंगे है ये तो हर ठौर है ।
 
इक पहेली है सच क्या और झूठ क्या 
लबों पर है कुछ दिल की बात और है ।  
 
हमने इरादा किया बनाएंगे राह इक नई 
फुर्सत मिले सोचते हैं काबिल ए गौर है ।  
 
शहंशाह को भूख है जो मिटती ही नहीं है
छीन लो गरीबों से हाथ अगर इक कौर है ।  

उनका दस्तूर है सब परस्तिश उनकी करें 
उनकी मर्ज़ी जो चाहें वही ख़ुद सिरमौर है । 
 
खुद मसीहा है हर गुनाह उसका मुआफ़ है 
जो है उसका मुख़ालिफ़ शख़्स वो चोर है । 

 

 देते है भगवान को धोखा . . . . . . By: @codepur_ka_superhero  @kuch.ankahi.baate #poetry #love #poems #poem #quotes #writersofinstagram  #poet #writing #words #writer #poetrycommunity #follow #poetsofinstagram  #quote #wordporn #like #art #

जून 21, 2026

POST : 2078 वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया

   वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया  

शायर दुष्यंत कुमार की याद आई है , कहते हैं ' वे कर रहे हैं इश्क़ पर संजीदा गुफ़्तगू , मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है '।  आखिर में पूरी ग़ज़ल पढ़ना , अभी ध्यान जिस तरफ है उस की बात करते हैं। सुबह सुबह सैर पर जाते दूर कहीं से योग दिवस पर भाषण की आवाज़ सुनाई दे रही थी पार्क के एंट्रेंस पर भी कोई योग से किसी सीमेंट कंपनी से जोड़ कर अपना कारोबार करता दिखाई दिया और पार्क में महिलाओं की टोली का फोटो अपने बैनर के साथ लेकर वापस अपने ठिकाने चला गया। पार्क में घूमते घूमते कोई पिता दिवस पर ख़ास छूट खून की जांच इत्यादि में दस हज़ार के टेस्ट दो हज़ार में का उपहार घोषित कर रहा था। आस पास कितने ही लोग विशेष अवसर पर आयोजित आयोजन को कैमरे में कैद कर रहे थे। योग दिवस की धूम मची हुई है कौन इस में शामिल नहीं होगा मगर मेरा दुष्यंत कुमार की तरह कहीं और ध्यान है। सब कुछ तो याद नहीं कुछ कुछ ध्यान में अभी तक भी है , कॉलेज के दिनों स्वामी विवेकानंद जी की ज्ञान योग कर्म योग ध्यान योग की कुछ किताबें पढ़ने को मिली थी। उन में बताया गया था योग का अभिप्राय संयम संयमित आचार विचार व्यवहार से खुद अपने पर भाषा से सामाजिक व्यवहार तक कितना कुछ शामिल है। योग केवल इक शारीरिक व्यायाम की बात नहीं है और आसान तो कदापि नहीं हैं कठोर साधना और मन मस्तिष्क पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। आप गीता को योग से जोड़ते हैं जबकि गीता का योग बिल्कुल अलग बात है , हमने शब्दों को सुना पढ़ा और जैसा चाहा उपयोग करना शुरू कर दिया है। आधुनिक संदर्भ में योग को स्वास्थ्य से जोड़ने पर ध्यान है जिस में सरकार के साथ तमाम लोग शामिल हैं मगर क्या इस पर सही ढंग से शोध और विमर्श किया जाता है। 
 
निरोगी काया ही नहीं स्वास्थ्य में मानसिक ही नहीं सामाजिक आचरण में भी कुछ नियमों कुछ मूल्यों को अपनाना होता है। सत्य और नैतिक आदर्शों को अपने जीवन में सबसे पहले महत्व देकर सभी जीव जंतुओं पेड़ पक्षी प्रकृति से तालमेल बिठाना होता है। ईमानदारी से देखा जाये तो आधुनिक समाज भौतिक स्वरूप में भले बेहतर लगता हो मगर आध्यात्मिक और नैतिक रूप से भीतर से खोखला और गंभीर बीमार लगता है। हमने लगता है आडंबर करने को कितने ही दिन मनाने की परंपरा बनाई है लेकिन किसी भी को लेकर वास्तविक चिंतन मनन करने को हमारे पर वक़्त ही नहीं है बस कुछ पल को औपचरिकता निभाते हैं। सोशल मीडिया की तस्वीरों की बातें वास्तविक सामाजिक जीवन में दिखाई नहीं देती हैं। कहीं हम किसी भेड़चाल या ऐसी मानसिकता के शिकार तो नहीं हो गए हैं जिस में रेगिस्तान में चमकती रेत को पानी समझ दौड़ते दौड़ते प्यासे मरने की राह पर चल पड़े हैं। 
 
हमने अपने देश और समाज के वास्तविक रोग को जाना नहीं समझा नहीं और नीम हकीमों की तरह हर रोग का ईलाज योग को समझने लगे।  गीता का ज्ञान योगी बनने को कहता है कर्तव्य पथ पर निरपेक्ष भाव से कर्म करने को कौन अपना कौन नहीं की बात को छोड़ सत्य और धर्म को सामने रखना है।  आज का आधुनिक योग अपने स्वार्थ अपनी कामनाओं अपनी वासनाओं पर काबू पाने की बात नहीं समझाता है। आप योग मुद्रा में भी सोचते देखते समझते चाहते कुछ और ही हैं आपका अंतर्मन भटकता है आप हो कर भी नहीं हैं। रोज़मर्रा के कार्य में आपको सत्य असत्य सही अनुचित से अधिक चिंता अपने लाभ हानि की रहती है योग से कुछ भी बदलाव नहीं हुआ जीवन में । कोल्हू के बैल की तरह हम उसी इक परिधि में घूमते रहते हैं इक रस्सी से बंधे हुए। योगी कहलाते हैं चाहते हैं भोगी बनकर सभी कुछ हासिल कर आनंदित होना , ये विरोधाभासी चलन इक साथ कैसे हो। श्री आर पी शर्मा महृषि जी किसी शायर की तज़मीन इस तरह करते हैं। 
 

जिसको देखो वही हिर्सो - हवा का रोगी 

है सदाचार के बहरूप में कोई भोगी 

उसकी साज़िश की शिकार आज भी सीता होगी ,

' ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी 

आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह। 

( राम प्रसाद शर्मा महृषि )  

 
 

ग़ज़ल : दुष्यंत कुमार  

 
वो आदमी नहीं है मुक़म्मल बयान है 
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है। 
 
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू 
मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है। 
 
सामन कुछ नहीं है फ़टेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।  
 
उस सिरफ़िरे को यूं नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है ।  
 
फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए 
हमको पता नहीं था कि इतनी ढलान है । 
 
देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं 
पांवों तले ज़मीन है या आसमान है । 
 
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से 
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है । 
 
 

 
 
 
 
  


 
 
 

जून 20, 2026

POST : 2077 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

बिकते जहां पे नेता , बाज़ार मिल गया है
भटके हुओं को आखिर घर- बार मिल गया है ।   
 
अपना नसीब इक दिन शायद बदल ही जाए 
हलवा उन्हें  , हमें बस आचार मिल गया है । 
 
जितने गुनाह उनके सब माफ़ हो गए हैं 
देखो यहां खुला इक दरबार मिल गया है । 
 
सोना जहां पड़ा था , दौलत जहां पड़ी थी 
सब लुट गया है ख़ाली भंडार मिल गया है । 
 
जंगल में अब भी बाक़ी कुछ पेड़ तो खड़े हैं 
कुछ लोग कह रहे हैं विस्तार मिल गया है । 
 
देखो यहां नया इक भगवान आ गया है 
लो आपको ये सारा संसार मिल गया है । 
 
सच बोलना मना है ' तनहा ' न कुछ भी कहना 
बस झूठ लिख रहा है अख़बार मिल गया है ।  
 

 

जून 18, 2026

POST : 2076 मंदिर में चोरी , भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मंदिर में चोरी , भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

नारायण-नारायण , नारद जी अपने ही अंदाज़ में बोले , भगवन ये खबर सुनी है मंदिर से करोड़ों रुपया और सोना गायब है । कौन चोरी कर गया कोई रपट तक किसी थाने में नहीं लिखवाई गई । भगवान बोले आपको क्या परेशानी है भला मुझे मंदिर की दौलत से रूपये पैसे से क्या लेना देना है। जो जिसका कर्म है उसे वही करना है चोर चोरी नहीं करेगा तो क्या करेगा , आपको चिंता करनी चाहिए भारत देश की जनता की जिनका सभी कुछ राजनेता अधिकारी उद्योगपति धनवान लोग छीन कर झपट कर चालाकी से नहीं जालसाज़ी से देशसेवा की बात कहकर खुद अपने पर खर्च कर रहे हैं। आपको उनको डकैती की चिंता क्यों नहीं हुई और मंदिर से आपका मेरा क्या वास्ता है , मंदिर जिनका है उनको सब पता है चोर चोर मौसेरे भाई की बात है। सबका साथ सबका विकास है समझ आई उनकी बात है जूतों में बंट रही खैरात है सत्ता की शह है हुई जनता की मात है राजधानी की हक़ीक़त समझो चोरों की निकली नाचती झूमती बरात है।  नारद जी कहने लगे भगवान इतनी गंभीर बात पर आप ठिठोली कर रहे हैं , भगवान बोले नारद जी आपको गलतफ़हमी हुई है मंदिर मेरी जायदाद नहीं है मैं कभी किसी मंदिर में नहीं रहता मैं तो लोगों के दिलों में बसता हूं।  जिस दिन वहां से निकाला मुझे जिस जिस ने मेरा उनसे कोई नाता नहीं रहा है , मुझसे कभी पूछा आपने क्या क्या मैंने सहा है। दुनिया में मेरा अब कुछ भी नहीं रहा है भगवान की बनाई दुनिया को बर्बाद करने वाले शोर मचाते हैं हमने क्या क्या बनवाया है , सब झूठ की माया है शिकारी ने अपना जाल बिछाया है , मैंने सब धर्मराज पर छोड़ दिया है जैसा कोई करता है उसको फल मिलता है , कीचड़ में कमल खिलता है। 
 
नारद जी को अब चैन आया है अपना भजन उनको याद आया है , मूर्ख बंदे क्या तुमने कमाया है भगवान की मर्ज़ी से बिना मेहनत धन पाया है चोरी करता है सीनाज़ोरी करता है क्या सितम तुमने ढाया है।  बोल कितना खाया है कितना गंवाया है ऊपरवाले को भुलाकर अपना अनमोल जीवन व्यर्थ गंवाया है। नारद जी आधुनिक कथा सुनाते हैं लोग बिना बात घबराते हैं भगवान का नाम रटते रटते मरा मरा बोलने लगते हैं खोटा है जो उसको खरा कहने लगते हैं। इस दुनिया में सभी चोर हैं लेकिन कुछ चोर हरामखोर हैं जो अपने ही घर में चोरी करते हैं खुद ही देश का खज़ाना लुटवाते हैं। ये जो अमेरिका वाले हैं कितना ज़ुल्म कमाते हैं सभी को डराते धमकाते हैं और कितने कायर उनके सामने अपना सर झुकाते हैं। आप उनको महान बताते हैं जो नीचता करने से नहीं बाज़ आते हैं उनका अंजाम सभी को दिखाई देता है अब अमेरिका को होश आया है जब ऊंठ पहाड़ तले आया है। ये दुनिया बन गई चोरों का खुला बाज़ार है हर लुटेरा आजकल बन गया साहूकार है , सरकार कुछ भी है झूठ का इश्तिहार है जिसको डुबोया कहती है किया उद्धार है सभी को जाना भवसागर पार है। 
 
खबर है कि यू पी पुलिस का कहना है कि एक करोड़ के सोने के गहने बारिश के पानी में गल गए , और बंदर उनको उठा ले गए। अदालत ने आरोपी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनको बरी किया था और पुलिस को ज़ब्त किए ज़ेवर ससुराल वालों को सौंपने का आदेश दिया था । 2007 में लखीमपुर के मोहल्ला कपूरथला निवासी मुद्रित अग्रवाल की पत्नी रानी अग्रवाल ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। अदालत को पुलिस ने बताया कि ज़ेवर भीगने से खराब हो गए थे भीगी पोटली को मालखाने की छत पर सुखाने को रखा था जिसे बंदर उठा कर ले गए । भारतीय पुलिस ही ऐसे तर्क दे सकती है कि किसी की लाश से उतारे गहने बरामद कर सुरक्षित रखने और लौटाने के बजाय खुद हड़पने का शर्मनाक कार्य कर ऐसी बात अदालत में बताती है।  यही पुलिस जांच करेगी मंदिर से पैसा और सोना चुराने या डाका डालने वालों को पकड़ने का काम करेगी तब कुछ ऐसा ही तर्क घड़ा जाएगा । चोरी का इल्ज़ाम बंदरों के सर मढ़ा जाएगा , अलीबाबा चालीस चोर का अगला अध्याय जल्द ही लिखा जाएगा । इक सवाल हमेशा बाकी खड़ा रह जाएगा ।  
 
 

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है
अब तो ऐसा हाल है
मर गए लोग भूख से
सड़ा गोदामों में माल है ।

बारिश के बस आंकड़े
सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही
नित नई मिसाल है ।

भाषणों से पेट भरते
उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए
वो बकरा हलाल है ।

कालिख उनके चेहरे की
कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है
बड़ा सरकारी रुमाल है ।

झूठ सिंहासन पर बैठा
सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
गरीबी ऐसा सवाल है ।

घोटालों का देश है
मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं
बस वही अस्पताल है ।

कल जहां था पर्वत
आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी
हो चुका मालामाल है ।

बबूल बो कर खाते आम
हो  रहा कमाल है
शीशे के घर वाला
रहा पत्थर उछाल है ।

चोर काम कर रहे
पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया
दर्द से बेहाल है ।

जीने का तो कभी
मरने का सवाल है । 

ढूंढता जवाब अपने
खो गया सवाल है । 
 
 
 भारत के इस मंदिर में जमा है सबसे ज्यादा सोना, कीमत इतनी की छोटी पड़ जाएगी  कई देशों की इकोनॉमी | DNA HINDI
 

जून 13, 2026

POST : 2075 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

खोटा सिक्का बाज़ार में चल गया है , चमक दमक कर साबित खरा हो गया है , कैसा ग़ज़ब इधर हो गया है झूठ सच से बड़ा हो गया है। इक व्यंग्यकार ने बहुत पहले लिखा था कि सच और झूठ इक नदी में नहाने गए थे , शायद बनारस की बात थी , सच नहा रहा था झूठ ने उसका लिबास चुराया और पहन कर चल दिया , जब सच बाहर निकला नदी से नहाकर तो वहां झूठ का लिबास पड़ा हुआ था भला सच झूठ का लिबास कैसे पहनता , इसलिए वो नंगा ही खड़ा रह गया अभी तलक भी सच नंगा है तभी कहलाता है । समय के साथ कथाएं कहानियां अपना स्वरूप बदलती रहती हैं आधुनिक युग में झूठ की क्या बात है , राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है , ये सुबह सुबह की बात है । नकली झूठे लोकतंत्र को सभी ने एकमत से असली घोषित कर दिया है सभी संस्थाओं संगठनों ने झूठ का दामन थाम लिया है उसको अपना आका मान लिया है । चुनाव आयोग से सर्वोच्च न्यायालय ने अपना आचरण तौर तरीका बदल लिया है झूठ की शरण में ख़ुद को समर्पित कर अपनी हस्ती को मिटा दिया है , खुद को बेच कर सभी ने सब कुछ पा लिया है , सच किसी काम का नहीं सभी ने आज़मा लिया है बीच मझधार नाख़ुदा को ही अपना ख़ुदा मान लिया है । झूठ बिना इस दुनिया में जीना मुश्किल है इस सच्चाई को जान लिया है , कौन है जो डुबो कर सभी को अपनों की नैया पार लगाता है उसको पहचान लिया है । कोई सभी से पूछता है क्या आपने उसको देखा है जिस के हम मामा हैं जो हमको यहां लेकर आया था खुद को मेरा बतलाया था मुझे मामा कहकर बुलाया था । भरोसा किया था उसको अपना झोला पकड़वाया था उसने हमको मामा नहीं उल्लू बनाया था कोई ठग था बातों से उलझाया था , अंजाम सभी कुछ लुटवाया था । 
 
इधर देश में लगता है कोई भी संजीदा बात किसी गंभीर विषय पर नहीं करता है राजनीति मज़ाक बन गई है चुटकुलेबाज़ी का चलन है । इक पुराना चुटकुला फिर से याद आया है सुनाता हूं , कुछ बच्चे मैदान में खेल रहे थे तभी उनके अध्यापक उधर से गुज़रे , अध्यापक ने पूछा बच्चो क्या खेल खेल रहे हो । बच्चों ने बताया मास्टरजी हमको इक कुत्ते का पिल्ला मिला है और हमने ये शर्त रखी है कि जो भी सबसे बड़ा झूठ बोलेगा ये पिल्ला उसी का हो जाएगा । कैसे झूठ बोलते हैं अध्यापक ने मिसाल देने को कहा तो बताया जैसे देश की राजनीति में सभी झूठी बातें करते हैं और चुनाव जीत कर मौज मस्ती करते हैं । मास्टरजी ने हैरान हो कर कहा क्या ज़माना आ गया है जब हम छोटे बच्चे थे तो हमको झूठ शब्द का मतलब तक मालूम नहीं था । इतनी बात सुनते ही सभी बच्चों ने मिलकर कहा मास्टरजी ले जाएं ये कुत्ते का पिल्ला आपका हुआ आप शर्त में सबसे अव्वल रहे हैं । यकीनन इस से बड़ा कोई झूठ बोल ही नहीं सकता था कि उसको झूठ क्या होता है मालूम तक नहीं । लगता है कोई है जिस ने झूठ की शिक्षा की पढ़ाई में डिग्री हासिल की हुई है तभी जिधर देखते हैं उसका झूठ का ही परचम फहरा रहा है । झूठ सच को छोटा बताकर अपना कद बढ़ा रहा है ऐसे में किसी कवि का लिखा याद आ रहा है , कवि कहता है बौने कद वालों को पहाड़ पर चढ़ने का बड़ा शौक होता है । पहाड़ की ऊंचाई पर खड़े हो कर उनको लगता है उनकी ऊंचाई बढ़ गई है जबकि वास्तव में पहाड़ पर खड़े होकर वो और भी बौने दिखाई देते हैं । आजकल सभी एक से बढ़कर ऊंचे शिखर पर खड़े हैं ऐसे शिखर जिनकी कोई बुनियाद ही नहीं है बस कुछ और कहना व्यर्थ है । झूठ के चाहने वालों को सच कड़वा लगता है उनको मीठा ज़हर पसंद है भले उस से अंजाम जैसा भी हो सामने दिखाई दे तब भी अनदेखा करते हैं चाटुकारिता इक गुण समझा जाने लगा है । मीडिया झूठ को ख़ुदा बताने ही नहीं बनाने को अपने ज़मीर को नीचे गिराने लगा है , सभी को झूठ लुभाने लगा है , ऊंठ पहाड़ को छोटा बताने लगा है।  आखिर में इक पुरानी ग़ज़ल पेश है।  
 
 

 ग़ज़ल  : डॉ लोक सेतिया 

 
पूछते सब ये क्या हो गया
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न ' तनहा ' उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया। 
 
 
 Pasand: सच और झूठ का महत्व