सितंबर 14, 2021

भटक रही अजनबी राहों में ( हिंदी की बात ) डॉ लोक सेतिया

  भटक रही अजनबी राहों में ( हिंदी की बात ) डॉ लोक सेतिया 

सुबह सुबह शहर की सड़क किनारे फुटपाथ पर चलते चलते मुझे मिली तो मैंने पहचाना ही नहीं। शिकायत नहीं की तब भी कहने लगी कोई बात नहीं सूरत नहीं पहचानते तो क्या हुआ प्यार तो मुझी से करते हो। हिंदी दिवस मनाते हो सबको शुभकानाएं भेजते हो जानते हो मुझे कहां से कहां ले आये हैं मेरे अपने मगर भाषा का दर्द हिंदी लेखक नहीं समझेगा तो और कौन समझ सकता है। शहर शहर गली गली सभा आयोजित की जाएगी मुझे जाने क्या क्या संबोधन देकर पुकारेंगे मगर मुझे बुलाना भूल गए होंगे और अनचाही सी वहीं किसी आखिरी कतार में कोने में सिमटी बैठी मैं सोचती रहूंगीं हर बार की तरह क्या ये मेरी बात की जा रही है। हिंदी से हिंदी लिखने वालों को ही नहीं देश दुनिया भर को कितना मिला है भाषाओं को कला को व्यौपार को आपसी संबंधों से लेकर मानवता तक को समृद्ध किया है मगर क्या किसी ने मुझे थोड़ा भी एहसास दिया है अपनेपन का। सब उपयोग करते हैं जानते नहीं पहचानते नहीं मुझे अपना मानते नहीं। हिंदी भावनाओं में बहकर भी उदास निराश नहीं थी हंसती मुस्कुराती हुई सबको गले लगाती चलती जा रही थी। हिंदी को मिलकर लगा कोई अथाह समंदर अपनी गहराई में कितना कुछ समाये हुए है अपनी आगोश में आये हर किसी को झोली भर भर अनमोल रत्न देती रहती है। किसी मां की तरह बच्चों पर सर्वस्व लुटाती हुई ममता से लबालब भरी सबको अपने आंचल की छांव में बिठाकर वात्सल्य से अभिभूत करती लोरी गाती मधुर सपनों की नींद में परियों की कहानी सुनाकर सब दुःख दर्द मिटाती। 
 
हिंदी सबकी है कोई पराया नहीं हिंदी के लिए सबको समझना होगा हम हिंदी के कौन हैं और हमारा हिंदी से क्या नाता है। सोशल मीडिया फिल्मकार कथाकार विज्ञापन से लेकर टीवी सीरियल रियल्टी शो और नृत्य संगीत तक सभी बिना हिंदी क्या कुछ भी कर सकते हैं। हिंदी ने अपनाया है सभी को भले किसी ने उसको अपना समझा हो या बेगाना। भाषा सभी जोड़ती हैं आपस में मगर हिंदी की तरह घुल मिल जाना पानी और दूध की तरह ख़ासियत सब में नहीं होती है। ये ऐसी महिला है जो माता पिता भाई बहन सास ससुर ननद देवर क्या गली मुहल्ले तक से निभाती है खुद अपनी पहचान खोकर बेटी पत्नी बहु मां बन जाती है। कोई उसकी कीमत समझे या नहीं उसके बिना गुज़ारा किसी का नहीं होता है। चलो आज उन सभी से जाकर मिलो गले लगाकर बात कर जिनसे पाया है जाने कितना लेकिन देने की बात भूल गए हैं। हिंदी की तरह कई रिश्ते हैं जिन में चाहत की प्यास अधूरी रही है क्योंकि उन्होंने सभी को सब दिया बदले में चाहा कुछ भी नहीं। ये हिंदी दिवस इक भाषा का नहीं विश्व भर को प्यार अपनत्व देने का उत्स्व बन जाए तो कितना अच्छा होगा। 

                           हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।

सितंबर 11, 2021

रौशन सितारों के घने अंधेरे ( पीतल की चमक ) डॉ लोक सेतिया

 रौशन सितारों के घने अंधेरे ( पीतल की चमक ) डॉ लोक सेतिया

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। शुरआत कल रात के तथाकथित शानदार शुक्रवार केबीसी एपिसोड की बात से करते हैं। सामान्य लोग ख़ास समझे जाने वाले लोग यहां भी हैं चार दिन आपके एक दिन उनके अपने वर्ग के लिए। सामान्य वर्ग कोशिश करता है सालों साल किस्मत से पहुंचता है खेल का खिलाड़ी बन कर शहंशाह के सामने और तलवे चाटने तक कुछ भी करता है बड़ी शख़्सियत से मिलने को समझता है खुदाई मिल गई लेकिन उच्च वर्ग वाले शानदार ढंग से बुलाया जाता है सब अलग भव्य दिखाई देता है। ये माजरा क्या है दो महमान आये ख़ास मकसद से पैसा पाने केबीसी खेल से बड़े लोग बड़े इरादे। फरहा जी को इक छोटे बच्चे को करोड़ों रूपये की दवा बस कुछ दिन में दिलवानी है फाउंडेशन बन गया छह करोड़ जमा भी हो गए केबीसी से मिलने कुछ लाख हैं लेकिन रास्ता बन सकता है जाने कितने करोड़ जमा होने का। अमिताभ बच्चन जी समझाते हैं देश के एक करोड़ लोग दस दस रूपये देते हैं तो दस करोड़ हो जाएंगे। कोई नहीं समझता जिनको कुछ शब्द बोलने थोड़ा अभिनय कर दिखाने के सच्चे झूठे विज्ञापन के लाखों से करोड़ों तक मिल जाते हैं उनको दस बीस करोड़ जमा करने को कहीं जाने की क्या ज़रूरत है। वास्तव में माजरा टीवी शो और ख़ास लोगों की आपसी कारोबारी सहमति का है फायदा दोनों का है। 
 
दीपिका पादुकोण जी अपनी मानसिक परेशानी की बात करती हैं चकाचौंध रौशनी में रहने वाले अवसाद अकेलापन निराशा से पीड़ित हो सकते हैं क्योंकि जिस आधुनिक समाज में ऐसे लोग रहते हैं उस में मौज मस्ती झूमना नाचना ख़ुशी मनाना चाहते हैं तो तमाम लोग मिलते हैं तनाव की तनहाई की ख़ालीपन की बात समझने को किसी को फुर्सत नहीं होती है। नाम पैसा शोहरत आपको ऐसे दोस्त या अपने जो हर हाल में साथ निभाते हैं नहीं दिला सकता है बल्कि उनसे दूर करता है। क्योंकि जानी मानी शख़्सियत बनते हर कोई उनसे फ़ासला बना लेता है कि कहीं कोई उनसे किसी मतलब से मिल लाभ नहीं उठा ले ये धारणा बन जाती है। उनकी माता जी को अपनी बेटी का रोना देख कर समझ आया जैसे वो सहायता मांगती हुई लगी तब शायद यही सही लगा कि अपनी बेटी से ज़िंदगी की परेशानी सांझा करने को कहने से अधिक उसको सलाह दी किसी मनो-चिकित्सक से मिलने की। अब उनको कोई कैसे समझाए की आपकी फाउंडेशन किसी सामान्य नागरिक को क्या समझा सकती है। ख़ास बड़े धनवान लोग विशेषज्ञ मनो-चिकित्सक से बड़ी फीस देकर उपाय जान सकते हैं जिन करोड़ों लोगों से आपको कितने करोड़ की कमाई होती है उन्हें खुद अपनी ज़िंदगी की उलझनें सुलझानी पड़ती हैं क्योंकि गरीबी बदहाली के शिकार पीड़ित से हर कोई बचकर निकलता है। जबकि आप बड़े लोग वास्तविक शुभचिंतक से बचकर रहते हैं। 
 
सवाल समस्या की चर्चा करने का होता तो अनुचित नहीं था लेकिन जब सवाल दुःख दर्द परेशानी को भी इक इक खेल तमाशा बनाने का हो तो उसको मानसिक दिवालियापन समझ सकते हैं। शायर सुरेश भारती नादान की कलम से आभार सहित शब्द उधार लेकर समझते हैं , कहते हैं नादान जी :- 

           रौशनी से जो मकां भरा-भरा लगा , तुम कहो कुछ भी मुझे वो मकबरा लगा।

           जब मिला नादान तो रोता हुआ मिला , बज़्म में देखा उसे वो मसखरा लगा।

KBC 13: Deepika Padukone, Farah Khan performed 'Ek Chutki Sindoor' act with  Big B!

सितंबर 09, 2021

ओ नादान तू बन जा भगवान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ओ नादान तू बन जा भगवान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

दार्शनिकता की बात है समझना कठिन नहीं है थोड़ा सोचो ज़रा सा समझो वो जो कोई भी है किसी भी नाम से जाना जाता है विधाता ईश्वर ख़ुदा वाहेगुरु परमात्मा अल्लाह यीसु करता क्या है। तथाकथित ऊपरवाला किसी से पूछता नहीं किसी को बतलाता नहीं जब जैसा चाहता है अच्छा भला खराब करता चिंता नहीं करता दुनिया वालों को कैसा लगता है। मगर हर कोई उसकी दी परेशानी की बात उसी से जाकर कहता है रहम की भीख मांगता है। तुमने ऐसा क्यों किया कहने का साहस कभी कोई नहीं कर सकता। आदमी आदमी से रिश्ता निभाता रहता है तब तक जब तक आस रहती है कभी काम पड़ेगा तो साथ देगा मगर जब महसूस होता है अमुक व्यक्ति भविष्य में किसी काम में सहायक नहीं हो सकता उस से किनारा कर लेते हैं। आदमी की बात चेहरे के हाव-भाव बता देते हैं उसके पास बचा नहीं कुछ बांटने को पर भगवान को देख कर कोई नहीं समझ पाता कि उसके पास क्या है और उसके मन की मर्ज़ी क्या है। भगवान भले देता कुछ भी नहीं लेकिन उसको देख लगता है सामने खड़े व्यक्ति को आशिर्वाद दे रहा है। कभी उसके हाव भाव चेहरे के देख समझ नहीं सकते चाहता क्या है। अच्छा साहूकार इनकार नहीं करता बहाना बनाकर टालता है और जिस पर भरोसा होता है सूद सहित समय पर लौटाने का उसका अंगूठा लगवा बही पर नकद उधार दे देता है। भगवान सब जानता है आदमी मांगता है लेकर वापस करना याद नहीं रखता इसलिए जो इंसान अच्छा लगता है उस पर मेहरबान होता है ऊपरवाला। उसकी अपनी मौज है सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय , की मैं झूठ बोलिया की मैं कुफ़र तोलिया। 

सरकार भी भगवान की तरह होती है दिखाई नहीं देती बस सरकार है सब विश्वास करते हैं और सरकार भी सब कर सकती है लेकिन भगवान की तरह करती कुछ भी नहीं किसी के लिए जो भी करती है सिर्फ खुद की शान बढ़ाने को करती है। हर सरकार चाहती है लोग उसके सामने हाथ जोड़ भिखारी की तरह खड़े रहें और उसको जिनको देना है उन्हीं को देकर समझती है सबको सब मिल गया है। अमीरों को अमीर गरीबों को बेबस बनाना शासक होने सत्ता और सरकार का अहंकार होता है हम सरकार हैं हम जो करें हमारी मर्ज़ी जनता को सर झुककर स्वीकार करना चाहिए। राजा कभी भगवान नहीं होता है राजनेता कभी मसीहा नहीं होते हैं मगर चाटुकार लोग उनका गुणगान कर उनको भगवान होने का एहसास करवाते रहते हैं। मगर सत्ता जाते ही उनके होश ठिकाने लग जाते हैं शासक वास्तव में खुद सबसे भूखे नंगे भिखारी होते हैं ऐसे भिखारी जिनकी झोली कभी भरती नहीं है। जनता की सेवा देश समाज की भलाई की बातें भोले भाले लोगों को बहलाने का माध्यम हैं कथनी अलग करनी विपरीत होते हैं। 
 
ओ नादान आम आदमी तू भिखारी नहीं है भिखारी को राजा बनाकर पछताता है कभी नहीं देखा क्या तेरा बही खाता है। ठोकर खाकर भी समझ नहीं आता है क्यों भगवान की तरह सरकार पर भरोसा कर खाली दामन घर वापस लौट आता है। खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले , खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। 
 स्पर्धा परीक्षा मित्र मंडळ - ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले  ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है | Facebook

सितंबर 07, 2021

समंदरों की गाथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         समंदरों की गाथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

पहले पहले शुरुआत में ये सभी के सभी तपता हुआ रेगिस्तान हुआ करते थे पानी को तरसते और रेत का अंबार। उनकी आरज़ू तभी से विशाल समंदर बनने की रहती थी जैसे कोई बरसाती नाला मिला इन्होंने उसको अपने भीतर समा लिया। धीरे धीरे तालाब हुए और कोई करिश्मा कर जाने कितनी नदियों को अपनी तरफ आकर्षित उनको अपने में विलीन करते गए। धन दौलत नाम शोहरत बड़े होने की हैसियत पाकर खुद पर गर्व करने लगे और जिन से सब पाकर विशालता पाई उन्हीं का तिरस्कार करने लगे। समंदर कभी किसी से संबंध नहीं निभाते हैं उनसे दूर रहना अच्छा होता है उनके करीब जाते ही दरिया नदिया अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। समंदर किसी का उपकार नहीं मानते हैं उनको लगता है हमारी शरण में आना सबकी ज़रूरत है चाहत है विवशता है। आखिर समंदरों को छोड़कर उनसे बचकर कोई जाएगा कहां उनसे बचना आसान नहीं क्योंकि समंदर का मिजाज़ बदलता है तो उनकी लहरें सीमा की परवाह नहीं कर तूफ़ान लाकर तबाही ला सकती हैं। समंदर में खज़ाना है मोती हैं भंडार है सब जाते हैं कुछ पाने की चाह में डूब कर गहराई समझ आती है नसीब वाले बचते हैं मिला किसको कितना और क्या क्या खोकर कोई नहीं समझ पाता है। हर समंदर खुद प्यासा होता है उस से किसी की प्यास नहीं बुझ सकती कभी। समंदर अपने भीतर अनगिनत राज़ छुपाए रहते हैं उनकी थाह पाना मुमकिन ही नहीं है। समंदर का खारा पानी बदल बनकर बरसता है मगर बारिश का पानी तालाब नदिया से मिलकर आखिर बहता बहता फिर समंदर में वापस मिलकर मिठास खोकर खारापन अपना लेता है। 
 
पर्वत की ऊंचाई और समंदर की गहराई दोनों अलग अलग हैं। शासक सत्ताधारी बड़े नाम वाले ख़ास लोग दिखाई पहाड़ जैसे देते हैं मगर वास्तव में किरदार उनका छोटा होता है उनको नीचे वाले इंसान इंसान नहीं लगते हैं। अक्सर इंसान की लाश उनके पांव नीचे की ज़मीन बनी होती है। समंदर की ख़ामोशी तूफ़ान आने का संकेत हो सकती है तो उनकी लहरों का शोर अंदेशा लगता है अनहोनी घटना का भय पैदा करती हुई। शोर की खामोशी से मुलाक़ात और रौशनी का अंधेरों से रिश्ता कुछ उसी तरह का संबंध है जैसा महल का झौंपड़ी से अमीर का गरीब से सरकार का जनता से। एक का होना दूसरे का अस्तित्व बनाता है बिना झौंपड़ी महल की शान नहीं रहती है गरीब हैं तभी अमीरों की अमीरी कायम है जनता का आम होना सरकार को सरकार होने का एहसास दिलाता है। अन्यथा सरकार दाता नहीं भिखारी है और आम लोग नेताओं अधिकारियों का अनचाहा बोझ ढोने को विवश हैं। घोड़ा कभी घास से दोस्ती नहीं कर सकता है राजनेता घोड़े हाथी शेर की तरह हैं उनका अधिकार जंगल पर जिस तरह ताक़तवर का कमज़ोर पर ताकत आज़माने से समझा जाता है देश की राजनीति में सत्ता का संविधान से छीनते हैं राजनेता शासक वर्ग। हमने कानून अदालत संस्थाएं बनाई हुई हैं लेकिन उनकी अहमियत कठपुतलियों जैसी बन जाती है। जनता की चीख पुकार उन तलक नहीं पहुंचती क्योंकि सरकार ने उनको ऐसे भवनों में बंद किया होता हैं जहां बहरी आवाज़ सुनाई दे नहीं सकती और चकाचौंध रौशनी में बैठकर निर्णय करने वाले निगहबान करने वाले अंधेरे से परिचित नहीं होते हैं। 
 
हम सभी कैफ़ी आज़मी की नज़्म में बतलाये गए अंधे कुंवे में कैद लोग हैं जो कुंवे के अंदर से आवाज़ देते रहते हैं , हमें आज़ादी चाहिए , हमें रौशनी चाहिए। लेकिन जैसे ही कोई बाहर निकालता है तो हम बाहर की खुली हवा से घबरा जाते हैं रौशनी से आंखें चुंधिया जाती हैं और आज़ादी से डरने लगते हैं। और फिर खुद ही उसी अंधे कुंवे में छलांग लगा देते हैं। और दोबारा शोर मचाने लगते हैं हमें आज़ादी चाहिए , हमें रौशनी चाहिए। हमने अपनी दुनिया को उसी कुंवे तक सिमित किया हुआ है और कुंवे के मेंढक खुद को समझते हैं यही दुनिया है।

सितंबर 05, 2021

बेअसर आंसू-आहें अनसुनी फ़रियाद ( पढ़ना-लिखना ) डॉ लोक सेतिया

बेअसर आंसू-आहें अनसुनी फ़रियाद ( पढ़ना-लिखना ) डॉ लोक सेतिया 

कितनी बार वही सवाल मन में आता है बात तमाम चिंतन करने वालों की लिखने समझने वालों की है। जितने भी विचारक हुए सभी ने समाज की बातों को जाना समझा और अलग अलग तरह से कोशिश की अपने समय के समाज को बदलने की। पांच सौ हज़ार साल पहले लोग शिक्षित नहीं थे सोचने समझने की सीमा थी तब जानकारी हासिल करना कठिन था जीवन की समस्याओं को समझने की ज़रूरत ही नहीं महसूस होती थी। विधाता भाग्य और बने बनाये सामाजिक तौर तरीके मूल्यों मान्यताओं को अपनाना नियति लगती थी। मगर महान समाज सुधारक साधु-संतों सभी ने समाज को बदलने उचित राह चलने और नीति कथाओं बोध कथाओं से सही और गलत का फर्क समझाने की कोशिश की जिस से आसानी से जीवन की वास्तविकता को लोग समझ सकें और जानकार विवेक से सच्चाई अच्छाई के मार्ग पर चलना सीखें। और लगता है तब शायद अनपढ़ सीधे सादे लोग समझने लगते थे और ज़िंदगी समाज को बदलने की चाहत रखते हुए समय के साथ बदलाव करते रहे। आसान नहीं था सदियों की मान्यताओं परंपराओं को छोड़कर नई सोच को अपनाना मगर दो सौ साल पहले बड़े बड़े विचारक अपनी कलम से नई परिभाषा लिखने लगे थे। अन्याय से टकराने और सच और मानव कल्याण समानता आज़ादी की बुनयादी बातों को महत्व देने लगे थे। साहित्य सृजन का मकसद कोई नाम धन दौलत पाना कदापि नहीं था उन सभी की रचनाओं में दुनिया के तमाम लोगों के दुःख दर्द परेशानियों की बात होती थी। कुछ भी जो गलत होता है क्यों होता है और उसको कैसे बंद किया जाये और जो होना चाहिए उसकी शुरुआत की जानी चाहिए सिर्फ यही चाहते थे कोशिश किया करते थे। 
 
आजकल लोग कहने को पढ़ लिखकर जानकार बन गए हैं भले किताबी ज्ञान वास्तविक ज़िंदगी में किसी काम नहीं आता हो फिर भी सोचने समझने से लेकर तर्क वितर्क करने लगे हैं। सोशल मीडिया से जानकारी सच्ची झूठी हासिल कर खुद को समझदार और जानकार मानते हैं लेकिन हैरानी और विडंबना की बात ये है कि जो पढ़ते हैं सबको समझाते हैं लाजवाब ढंग से शानदार संदेश भेज कर किसी और की क्या बात कहें जब खुद उन्हीं पर उन बातों का रत्ती भर असर होता नहीं है। आजकल की ही घटनाओं की बात को ध्यानपूर्वक समझने सोचने से पता चलता है। टीवी पर किसी कलाकार की मौत की घटना से हर कोई विचलित दिखाई देता है अनुमान लगाता है क्या हुआ क्योंकर हुआ कैसे हुआ और क्या होता तो अच्छा होता। टीवी पर किसी शो में भावुक हो जाते हैं दर्शक और आयोजक क्षण भर को। पलकें भीगती हैं टिशू पेपर से पौंछते हैं और पल बाद अगले दृश्य में नये सीरियल में ठहाके लगाते हैं। संवेदनाएं औपचारिकता बनकर रह गई हैं। समझ नहीं आता जो नज़दीक नहीं जिन से नाता मनोरंजन और समय गुज़ारने या पसंद करने का है उनकी घटनाओं से परेशान विचलित होने वाले वही हम लोग खुद अपने देश समाज गांव शहर घर परिवार दोस्तों संग संग रहने वालों को लेकर विरक्त और संवेदनारहित बन जाते हैं। अपने पास किसी को बदहाल देख जानना ही नहीं चाहते कोई किसी परेशानी में है तो कैसे हम सहायक बन सकते हैं। ऐसे समय हम जिसकी समस्या हो उसी को दोषी समझने लगते हैं पर्दे पर अनजान अजनबी से सहानुभूति और करीब रहने वालों से उदासीनता दो अलग अलग किरदार हम निभाते हैं अफ़सोस असली दोनों ही नहीं होते हैं। हमारा किरदार बदल जाता है जब हम खुद परेशानी चिंता और समस्या में घिर जाते हैं तब जिनसे उम्मीद रखते हैं दिलासा देने और सुःख दुःख बांटने की उनको फुर्सत नहीं होती है व्यर्थ के दुनियादारी के अनावश्यक कार्यों से। मगर मिलने आते हैं रस्म निभाने को भीड़ का इक हिस्सा बनकर और तब संवेदनाएं बनावटी दिखावे की लगती हैं। फरहत अब्बास शाह कहते हैं बदल गए मेरे मौसम तो यार अब आये , ग़मों ने चाट लिया ग़मगुसार अब आये। ये वक़्त इस तरह रोने का तो नहीं लेकिन , मैं क्या करूं कि मेरे सोगवार अब आये। 
 
यही होता है ज़िंदगी भर जिनकी खबर तक नहीं लेते कभी याद नहीं आती कभी बात करना मिलना ज़रूरी समझा नहीं फोन पर कॉल नहीं करते बस व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते रहते हैं दुनिया से चले जाने पर शोकसभा में जाकर फूल चढ़ाते हैं। अंत में इक लघुकथा मेरी लिखी बहुत साल पुरानी है। 
 
 

               फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

     बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता।

    महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी ,

         " दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें "।

    तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।

अगस्त 31, 2021

किन बातों को अपनाना या छोड़ना ( विरासत ) डॉ लोक सेतिया

  किन बातों को अपनाना या छोड़ना ( विरासत ) डॉ लोक सेतिया 

लगता है जैसे तमाम लोग मानते हैं कि हमारी सभी पुरानी ऐतहासिक धार्मिक किताबों की कहानियां और पुरातन धारणाएं महान हैं और उनको फिर से अपनाया जाना चाहिए। सोशल मीडिया पर बाढ़ आई हुई है सच्ची झूठी मनघडंत बातों की और उपदेश देते हैं हमको वापस उस ज़माने को लाना है। मगर अगर हम ध्यानपूर्वक सोचें तो उन्हीं कथाओं कहानियों में बेहद अनुचित अतार्किक और देश समाज की भलाई के खिलाफ आचरण किया जाता रहा है। वास्तविकता सभी जानते हैं बीता ज़माना पुरानी बातें तौर तरीके लौटते नहीं कभी। यकीनन हम बीते हुए कल की तारीख को वापस नहीं ला सकते तो हज़ारों वर्ष सदियों पुरानी चीज़ों को फिर दोहराना संभव नहीं है। जीवन में भी अतीत को दोहराया नहीं जा सकता है हां वर्तमान को बेहतर बनाने को अतीत और पुराने ज़माने से सीख लेकर नया किया जा सकता है। शायद कोई ऐसे युग में जीना नहीं चाहेगा जिस में आधुनिक समय में उपलब्ध साधन सुविधा नहीं हो पाषाण युग मानवता और सामाजिक संरचना का कोई निशान नहीं था जब। क्या हम अपने घर में परिवार में बाप दादा की सभी पुरानी चीज़ों को हमेशा को संभाल रख सकते हैं शायद अधिकांश चीज़ों का कोई महत्व नहीं रहता है उनको रखना घर को कचरे का ढेर बनाना हो सकता है। हम हर वर्ष घर की सफाई करते हैं और अनुपयोगी वस्तुओं को निकाल देते है नया लाकर घर को सजाते हैं। माता पिता की याद उनकी दी गई शिक्षा को मन में रखना अच्छा है मगर क्या हम अपनी आने वाली संतान को उसी तरह से पालन पोषण करना उचित समझते हैं जैसा उस समय किया जाता रहा था। कहावत है ठहरा पानी खराब हो जाता है बहता पानी होना अच्छा है समय के साथ नदी में पानी बहता रहता है तालाब का पानी भी बदलना होता है। बदलना कुदरत का नियम है सभ्यता भी बदलते समय के साथ परिवर्तित होती रहती है पुरानी सभ्यता के अवशेष तलाशना माना आदमी की आदत होती है लेकिन उसको फिर से स्थापित किया नहीं जाता है। 
 
कभी ध्यान से समझना क्या जो सब पुरानी कथाओं कहानियों में पढ़ते सुनते रहे हैं सब लाजवाब था , नहीं उस में भी अन्याय अत्याचार भेदभाव और बिना तर्क बड़े ताकतवर लोग अपनी मर्ज़ी से नियम बनाते लादते थे। महिलाओं गरीबों अपने अधीन व्यक्ति से बेहद अनुचित अमानवीय आचरण किया जाता था। राम रावण से कौरव पांडव युद्ध तक कितनी आपत्तिजनक बातें हुई जिनको वापस लाना ठीक नहीं होगा। वास्तव में इतिहास और धर्म की कथा कहानियां लिखने वालों ने अपनी खुद की आस्था और विश्वास को स्थापित करने सही और गलत को दरकिनार करते हुए किसी को नायक किसी को ख़लनायक साबित करने के लिए मनमर्ज़ी से मापदंड बनाकर अपना मकसद हासिल किया है। वास्तविक ज्ञान आपको अपने विवेक से काम लेकर मिलता है और जब कोई खुद को उस समय में रखकर विचार करेगा तब समझ आएगा जो उस युग में कोई किसी से करता रहा हमारे साथ होता तो क्या होता। सिर्फ इसलिए कि किसी किताब में लिख दिया गया है इस पर शंका नहीं कर सकते उचित नहीं लगता बल्कि ऐसा लिखने वाला खुद को बचाने की कोशिश करने को हमको अंधविश्वास और अज्ञानता में डालना चाहता है। अन्यथा सांच को आंच नहीं और सत्य को कसौटी पर खरा साबित होना ही चाहिए। हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती और अनमोल हीरे जवाहरात की पहचान उनकी खरेपन की जांच से की जाती है। विवेकशीलता का अर्थ है हमको किसी बात को पढ़कर सुनकर विचार कर समझना चाहिए उसकी वास्तविकता और उपयोगी होने को लेकर अन्यथा हम शिक्षित हो सकते हैं जानकार नहीं।

अगस्त 27, 2021

बिना रानी कहानी नहीं ( किस्सा राजा का ) { व्यंग्य } डॉ लोक सेतिया

बिना रानी कहानी नहीं  ( किस्सा राजा का ) { व्यंग्य } डॉ लोक सेतिया 

कोई महबूबा होती है तभी मुहब्बत की निशानी ताजमहल बनता है अमर होने को निशानी रह जाती है। राजा आखिर राजा होता है शासक बनकर मन की बात करने से चैन नहीं मिलता हसरत बाक़ी है इसिहास में उसकी अलग कहानी शामिल होनी चाहिए। सज धज शानो शौकत खूब मौज मस्ती जी भर कर मनमानी सारी दुनिया को घूमकर देखा फिर भी कैसा खालीपन ज़िंदगी में रह गया जाता नहीं सब आधा आधा लगता है। बात कहते हैं तो आधा सच आधा झूठ मिलकर झूठ का पुलिंदा बन जाता है। दरबारी लेखक महिमा गुणगान लिखना करना जानते हैं शासक की मर्ज़ी की आत्मकथा लिख देते हैं जिस में नज़र थोड़ा आता है ढकना अधिक पड़ता है। बीस साल शासन करने के बाद उनकी चाहत यही है कोई उनकी भी ऐसी कहानी लिखे जो ज़माना सदियों तक भूल नहीं पाये। कितने अच्छे साहित्यकारों से चर्चा की और सभी ने समस्या एक ही बताई जब तक शामिल रानी नहीं बन सकती आपकी कहानी नहीं। अविवाहित शासक भी हुए हैं मगर उनकी भी इक मुहब्बत अवश्य होती थी उनका जूनून उनका मकसद कुछ करने का आज़ादी हासिल करना समाज को अच्छा बनाने जैसे मकसद बड़े होते थे। सिर्फ कुर्सी से प्यार बेजान चीज़ों से लगाव अपनी विवाहिता पत्नी घर परिवार को छोड़ना बगैर कोई महान मकसद लिए लिखने को कहानी का विषय हो नहीं सकता है। सवाल आएगा राजा की पत्नी रानी बनकर नहीं जोगन बनकर भी नहीं रही खुश भी नहीं उदास भी नहीं अलग नहीं होकर भी पास भी नहीं ऐसा क्यों हुआ। कोई आरोप नहीं जुर्म नहीं सज़ा जीवन भर पाती रही इस वास्तविकता को छोड़ना मुमकिन नहीं है। माना सत्ता होने से सब मुमकिन हो जाता है मगर चांद पर दाग़ स्वीकार किया जाता है सूरज कहलाने को चेहरे पर धब्बा नहीं। 
 
राजा की आरज़ू है इक शानदार ऊंचा विशाल गगन को छूता भवन बनाया जाये जिस में सिर्फ इक उसी की खूबसूरत तस्वीरें सजाई गईं हों। चाहे कितने तरह के लिबास में लाखों तस्वीर किसी व्यक्ति की किसी चित्रशाला में लगाई जाएं दर्शक को अधिक समय तक लुभा नहीं सकती हैं। हर किसी के साथ कोई संगी साथी होना ज़रूरी है। आपने खुद को सबसे ऊपर सबसे बड़ा दिखलाने की खातिर अकेला और तन्हा कर लिया है लाखों की भीड़ में भी आप खुद को अजनबी महसूस करते हैं। कोई नाटक कोई फिल्म अकेले किरदार से बन नहीं सकती है कोशिश करते रहे हैं लोग खुद ही नायक निर्देशक पटकथा लेखक बन फिल्म बनाने की अंजाम दर्शक भी सिर्फ वही बनकर रह गए। आपकी ज़िंदगी में प्यार मुहब्बत की कोई दास्तां नहीं है केवल खुद को खुदा समझने का झूठा अहंकार रहा है। जो बाकी लोगों की अहमियत को स्वीकार नहीं करते हैं खुद उनकी कोई अहमियत रहती नहीं है। आपकी ज़िंदगी इक किस्सा बनकर रह गया है जिसको किसी किताब में दर्ज नहीं किया जा सकता है किस्सों में सच्चाई काम कपोल कल्पना अधिक होती है। कहीं खुद आप ज़िंदगी को किस्सा समझने की भूल कर पछता तो नहीं रहे। रानी का वजूद नहीं समझने वाले राजा की कोई कहानी बनती नहीं है।

अगस्त 25, 2021

ख़ुशी की तलाश में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

           ख़ुशी की तलाश में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया    

पढ़ने से पहले समझ लो ख़ुशी पाने की बात यहां नहीं हो रही है। खुश रहना जिनको जीवन का मकसद लगता है ख़ुदगर्ज़ लोग होते हैं भौतिक वस्तुओं से आनंद की अनुभूति होती है। खुश रहने के तौर तरीके अंदाज़ समझाने वाले संदेश भेजने वाले बहुत मिलते हैं ख़ुशी क्या होती है शायद उनको खुद मालूम नहीं नाचना गाना मौज मस्ती करना घूमना फिरना अच्छा लगता है ख़ुशी देता है ऐसा नहीं है। ख़ुशी कोई बाज़ार में बिकता सामान नहीं होता है अपने भीतर से उपजा एहसास होता है। अगर हमारे आस पास समाज में असमानता अन्याय भूख गरीबी जैसी समस्याएं हैं मगर हम जश्न मनाते हैं सुःख सुविधा साधन पाकर तब हमारी ख़ुशी मानवता की भावना को समझे बिना झूठी खोखली और दिखावे की अस्थाई पल दो पल की है बस ज़रा सा झौंका आकर उसको कभी भी दुःख दर्द परेशानी में बदल सकता है। ख़ुशी ऐसा एहसास है जो हासिल करने से नहीं बांटने देने से मिलता है सभी के दुःख दर्द परेशानियां समझना उनका एहसास करना अपना समझ उनको मिटाने की कोशिश करना सच्ची मानसिक ख़ुशी देता है। बिना कोई स्वार्थ सबकी सहायता करना कोई नाम शोहरत उपकार करने की चाह नहीं रखते हुए मानवीय संवेदना की खातिर हर किसी की भलाई की कामना रखना ख़ुशी पाने का वास्तविक ढंग है। ख़ुशी इक मासूम बच्ची की तरह है जिसको जन्म देने में महीनों इंतज़ार करने के बाद अपने भीतर पलना पड़ता है और असहनीय पीड़ा झेल कर जन्म देना होता है। हर ख़ुशी छोटी से बड़ी होती जाती है देखभाल करने से संभालने से प्यार से हर समस्या से बचा कर रखने से। मगर हमने ख़ुशी को समझा नहीं जाना नहीं पहचाना नहीं एवं धन दौलत नाम शोहरत भौतिक चीज़ों को पाने को खुश रहने का तरीका मान लिया है। अनुचित ढंग से छल कपट से धोखा देकर विवश कर जालसाज़ी द्वारा हासिल ख़ुशी वास्तविकता उजागर होते ही परेशानी दुःख दर्द की वजह बन जाती है। चोर डाकू लुटेरे पकड़े जाने पर मुजरिम ठहराए जाते हैं गुनाह की सज़ा मिलती है मगर जिनको बिना महनत अनुचित कार्य से धन दौलत नाम शोहरत मिल भी जाती है उनकी खुद की अंतरात्मा ख़ुशी अनुभव नहीं होने देती और अधिकांश लोग खुश होने का आडंबर दिखावा करते हैं ख़ुशी को अनुभव नहीं कर सकते हैं। 
 
रईस लोग बड़े धनवान लोग शासक बनकर ऐशो आराम पाने वाले पल पल जो मिला है उसको खोने का डर उनको चिंतित किये रहता है खुश नहीं रहने देता तभी जिनको बहुत अधिक हासिल है उनकी और ज़्यादा पाने की चाहत की हवस मिटती नहीं और वास्तव में वो सबसे गरीब होते हैं। हमने देवता और दानव की कथाएं कहानियां पढ़ी सुनी हैं , आदमी जब अपने पास जितना है किसी और को देता है ज़रूरतमंद को तब वो इंसान देवता बन जाता है। मगर दानव होते हैं जो किसी से उसका सब छीन लेते हैं अपनी इच्छा कामना की खातिर। देवता देते हैं राक्षस लेते हैं यही अंतर है अच्छे बुरे होने का , खेद की बात है आधुनिक समाज के मापदंड और नैतिक मूल्य आदर्श बदलते बदलते गलत को सही समझने लगे हैं। तेज़ चलने आगे बढ़ने की दौड़ में हमने पतन को उन्नति का नाम दे दिया है। जितना नीचे गिरते हैं लगता है ऊंचाई पर हैं और सबको पीछे छोड़ने में खुद अपनी ज़मीन से कट जाते हैं। 
 
आपको धर्म समाज की शिक्षा ने कितने कर्तव्य कितने क़र्ज़ गिनाये होंगे माता पिता से लेकर तमाम लोगों के लिए आभारी होने और उनका उपकार चुकाने की बातें। लेकिन कभी सोचा है जिस धरती पर रहते हैं जिस समाज से हमको कितना कुछ मिलता है उसका कोई क़र्ज़ हमपर बाकी रहता है चुकाने को। अपना घर परिवार संतान के इलावा देश समाज से जीवन भर कितना बिना मांगे बगैर शर्त मिलता रहा उनको कुछ वापस देना याद रहा ही नहीं। जिनके पास बहुत है उनको देना चाहिए उनको जिनके पास कुछ भी नहीं क्योंकि विधाता ने धरती हवा पानी प्रकृति सभी के लिए बराबर बनाई है जिन्होंने अपने हिस्से से बढ़कर हासिल किया है औरों का अधिकार छीन रहे हैं। सिर्फ कहने को सबका भला विश्व का कल्याण हो व्यर्थ की बात है जब हम सिर्फ अपनी ख़ुशी अपनी ज़रूरत को समझते हैं मतलबी बनकर अन्य लोगों के लिए असंवेदनशील हो जाते हैं। इस युग का आदमी अनगिनत लाशों के ढेर पर खड़ा उल्लास और अट्हास का प्रदर्शन कर हैवानियत का कार्य कर रहा है। मुट्ठी भर लोगों की हंसी के नीचे तमाम लोगों की आहें चीखें दबी हुई हैं। ख़ुशी चाहते हैं तो ऐसा समाज बनाना होगा जिस में सभी एक समान हों छोटा बड़ा ऊंचा नीचा ख़ास आम जैसा भेदभाव नहीं हो।

अगस्त 21, 2021

शानदार अंत की अभिलाषा ( अजीब दस्तान ) डॉ लोक सेतिया

   शानदार अंत की अभिलाषा ( अजीब दस्तान ) डॉ लोक सेतिया 

यही टीवी सीरियल के पर्दे पर नज़र आया अंतिम एपिसोड में सब चंगा हो गया है। हर बात का खुलासा हो गया सभी राज़ खुल गए पूरी तस्वीर साफ़ हो गई शुरुआत से अनगिनत बार सिर्फ गलत और अनुचित आचरण करने वाला खलनायक पल भर में बदल गया माफ़ी मांगने लगा अपने किये पर पशेमान होता दिखाई दिया। अर्थात अनहोनी घट रही थी राक्षस अपना स्वभाव बदल देवता बन गया। कहानी लिखने वाले के पास कुछ भी बचा नहीं अंत करना ही विकल्प हो गया। कल उसी समय कोई और नया धारावाहिक शुरू होगा शुरआत लाजवाब होगी बाद में बोझिल दास्तान आखिर में अंत वही सब उलझन सुलझती हुई।
 
 वास्तविक जीवन में भी ठीक यही होता है। कोई कितना अकेला होकर जिया दुनिया से विदा होने के बाद शोक मनाने वाले बहुत चले आते हैं काश लोग जानते तो कब से मरने की ख़्वाहिश करते। बात क्या है कि मशहूर लोगों के घर , मौत का सोग होता है त्यौहार सा। गुड़िया गुड्डे को बेचा खरीदा गया , घर सजाया गया रात बाज़ार सा। डॉ बशीर बद्र जी की ग़ज़ल कितनी सच्ची है इतनी अच्छी बातें इतना अपनापन कहां नज़र आता है मतलबी दुनिया में अफ़सोस की घड़ी बिछुड़ने की कम मुलाक़ात की ज़्यादा लगती है। इक अजीब बात ज़रूर होती है शोकसभा में जिसकी तस्वीर पर पुष्प चढ़ाते हैं सभी उसकी बात शायद कोई करता है हर कोई हज़ार बातें करता है। न जाने क्यों लोग आकांक्षा करते हैं उनकी शोकसभा शानदार होनी चाहिए जबकि खुद देख नहीं सकते उनकी चर्चा कोई नहीं करता। रिश्ते नातों की कितनी बातें होती हैं उनके बहाने से लोग अर्से बाद मिलते हैं अपनी अपनी बात करते हैं। ख़ुशी भी दुःख दर्द भी असली नहीं लगते हैं अब सब खोखला खाली खाली लगता है भीड़ में आदमी की शख़्सियत खो जाती है।   
 
 धार्मिक सभाओं में उपदेशक वक्ता दोहराते हैं उन्हीं बातों को असंख्य बार , कहते हैं आप नाम नहीं जपते धार्मिक स्थल जाते नहीं भगवान की उपासना करते नहीं। जाने इतनी भीड़ मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे तमाम धार्मिक शहरों में किस तरह दिखाई देती है। लोग एक नहीं सभी धार्मिक जगहों पर दर्शन ईबादत पूजा अर्चना को जाते हैं किनको शिकायत है लोग नहीं धार्मिक आस्था पर चलते हैं। ईश्वर उनको कैसे बताते हैं मेरी भक्ति का उपदेश अभी थोड़ा है शायद इतना अधिक होने लगा है कि उसकी कीमत घट गई है। आदमी पल पल चिंता में रहता है कोई बात गलत नहीं हो जाए लेकिन हज़ार नज़रें उस पर गढ़ी हुई होती हैं जो हर क्षण उसकी कमियां तलाश करती रहती हैं। कोई खुद अपनी गलती नहीं देखता है। अधिकांश लोग अपनी भूल गलती क्या अपराध तक को अनुचित नहीं समझते हैं। औरों पर तलवार ताने हुए हैं खुद को आईने में नहीं देखते हैं। 
 
  विडंबना की बात है कि धार्मिक जगहों पर रिश्वत देकर पहले दर्शन करने से लेकर चढ़ावे और दानराशि की चर्चा होती है आस्था विश्वास और भक्ति भावना को कोई नहीं जानता समझता। भवसागर से पार लगाने की बात कहने वाले मोह माया में डूबे हैं खुद दीपक तले घना अंधकार है। लिखने से पहले मिटाना पड़ता है जो मनघडंत अतार्किक लिखा हुआ है। सोच की मानसिकता की स्लेट अथवा पट्टी को साफ करना होगा लिखावट ऐसे शब्दों में हो जिसको पढ़ा और समझा जा सके। बिना अर्थ समझे रटना किसी काम का नहीं होता है। सही मार्ग की तलाश करनी ज़रूरी है कब तक कोल्हू के बैल बनकर उसी दायरे में घूमते रहेंगे आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी बांधे , जहां हैं वहीं रहेंगे।

अगस्त 08, 2021

हां मैं शून्य हूं ( शुरुआत से आखिर तक ) डॉ लोक सेतिया

    हां मैं शून्य हूं ( शुरुआत से आखिर तक ) डॉ लोक सेतिया 

यही सच है सबने मुझे ज़ीरो समझा है हीरो बनना भी नहीं चाहता क्योंकि हीरो नायक कहलाने को बेताब लोग भी होते भीतर से खोखले हैं। ज़ीरो की कीमत कोई नहीं समझता मगर शून्य की अहमियत समझना बेहद ज़रूरी है आपकी संख्या में जोड़ने घटाने से अंतर नहीं पड़ता फिर भी बड़े काम का होता है एक के बाद लगाने से दस बना देता है तो करोड़ से गुना करने पर करोड़ को ज़ीरो भी बनाता है। जब तलक अपने मुझे जाना समझा पहचाना नहीं आपके जीवन का गणित उत्तीर्ण नहीं हो सकता है। विश्व का आदि और अंत शून्य ही है संसार की हर शय का यही अफसाना है शून्य से आना शून्य में विलीन हो जाना है। मुझे आपको अपनी कहानी नहीं सुनानी आपको आपकी कथा से मिलवाना है। 
 
बात उनकी करते हैं जिनकी संख्या असंख्य समझी जाती है बड़े लोग धनवान शासक अधिकारी राजनेता उपदेशक उद्योगपति शिक्षक विद्वान महान कहलाने वाले। सौ साल जीने के बाद आखिर शुरुआत के भार के मिट्टी बनकर रह जाते हैं। सिकंदर खाली हाथ आये थे खाली हाथ जा रहे कह जाते हैं। छोटा सा आकार लेकर आये थे विस्तार पाकर आकाश तक पहुंचे मगर मिट्टी से मिट्टी तक का सफर ज़िंदगी है। शायद इस से बड़ा मज़ाक कोई नहीं हो सकता कि हर कोई जीते जी मरता है सोचता है मौत के बाद ज़िंदा रहना है। जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या , पागलपन है मरने के बाद ख़त्म कहानी की चर्चा करते हैं ज़िंदगी की सच्ची कहानियों को नहीं समझते हैं। आपने जीवन भर जो भी किया अपने मकसद की खातिर किया कभी कुछ भी बिना स्वार्थ किया ही नहीं कभी अपने पराये की बात कभी कोई विवशता का बहाना बनाकर मानवता के कर्तव्य को अनदेखा किया। आपको बदले में कुछ चाहिए कोई सुख कोई सुविधा कोई मोल अन्यथा क्यों किसी को कोई सहयोग देना , मानव होना मानवता की राह चलना पड़ता है। आदमी इंसान नहीं बना कभी हैवान कभी शैतान बन जाता है। सिर्फ खुद की खातिर जीना ज़िंदगी का मकसद नहीं हो सकता है जीना सार्थक होता है जब आदमी आदमी के काम आये अन्यथा हमारा होना नहीं होना एक समान है। 
 
मुझे शून्य होना अच्छा लगता है किसी को बदले में कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ती है। सभी को उपलब्ध होता हूं हमेशा जब ज़रूरत हो उपयोग कर सकते हैं। आपकी संख्या बढ़ जाएगी मुझे अपने पीछे खड़ा कर और इक बार नहीं बार बार कर सकते हैं। शून्य को बेकार मत समझो उसको अपना लो , हां शून्य हूं मैं। तकरार छोड़ो मुझसे प्यार कर लो। बस एक बार मेरा भी ऐतबार कर लो।


जानिए संख्या शून्य /"0" का रहस्य! - Who Discovered Zero And It's  Significance – Vigyanam

जुलाई 24, 2021

चाय की कहानी उसकी ज़ुबानी ( अजीब दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

 चाय की कहानी उसकी ज़ुबानी ( अजीब दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

चाय की चुसक्कियां लेते लेते लिख रहा हूं सामने भरी प्याली में गर्म गर्म चाय है इस हाथ टाइपिंग उस हाथ कप लिए। ये ज़रूरी था चाय की शर्त थी बस हम दोनों सबसे अलग इक साथ होंगे तभी अकेले में खुलकर बातें होंगी। चाय जैसी कोई नहीं है हुई नहीं होगी भी नहीं कभी भी। चाय इंसान इंसान में भेदभाव नहीं करती है जाने किसने झूठ कहा है चाय की प्याली और होंटों के बीच का फ़ासला इतना है कि कभी कभी सालों लग जाते हैं और प्याली के लबों तक पहुंचने में कितने जोख़िम हैं। चाय चाह का नाम है जहां चाह वहां राह होती है चाय से बिगड़ी बात बन जाती है सर्दी की धूप में चाय पीना लुत्फ़ और बढ़ा देता है तो गर्मी में गर्म चाय ठंडक पहुंचाती है। पत्नी महबूबा दिलरुबा इक प्याली चाय से मान जाती है सुबह की चाय ताज़गी लाती है शाम की चाय आशिक़ाना बनाती है। चाय की चाहत कम नहीं होती कभी ज़िंदगी भर साथ निभाती है बिछुड़ों को मिलाती है सब के मन को भाती है। खुद अपनी ज़ुबानी कहानी चाय सुना रही है कोई केतली रसोई में गुनगुना रही है खुशबू बाहर तलक जा रही है पड़ोसी को जैसे बुला रही है। 
 
मैं नहीं बदली दुनिया बदलती रही है प्याली कभी गलास कभी मग कभी लोटा भर कर कटोरी में डालकर पीना हज़ार ढंग बदले हैं पीने पिलाने वालों ने मेरा मिजाज़ नहीं बदला अंदाज़ नहीं बदला। मेरा साथ छोड़ा प्लेट प्याली का जोड़ा बिछुड़ा प्याली का अकार बदलता रहा मग का भरोसा नहीं कभी कितना बड़ा कितने संगी साथी कभी अकेला अलग अलग हुआ मगर मुझसे जुदा होकर नहीं रहा खुश कभी भी। कॉफी से मेरा कोई झगड़ा नहीं है कड़वाहट मिठास का रिश्ता होता नहीं है मुझे पीने वाले कभी बेवफ़ा नहीं होते हैं ये बात बतानी है कोई लफड़ा नहीं है। बिस्कुट से नाता मेरा सदियों पुराना है नमकीन से भी मुझको रिश्ता निभाना है बारिश में मौसम हो जाता सुहाना है कड़ाही संग टबलर मिल जश्न मनाना है गर्म पकोड़े चाय का रहता ज़माना है। चाय पीने को घर पर बुलाया है शायद मम्मी को बेटी की शादी का ख्याल आया है। चाय ने कितने संबंध बनाये हैं कारोबार कितने लोगों ने चाय साथ साथ पीकर बढ़ाए हैं। कौन है जिसने मुझे नहीं आज़माया है जब कोई नहीं देता साथ चाय ने निभाया है। 
 
पीने को बोतल शराब की भी कितनी हैं शर्बत कितने हैं और सबको लुभाती ढंडी रंग बिरंगी अनगिनत नाम की बाज़ारी जिस्मफ़रोश हैं बर्बाद करती हैं। लस्सी दूध को छोड़ सभी आदमी का सत्यानाश करती हैं। चाय पर कोई ऐसा इल्ज़ाम नहीं है दुनिया में कोई मेरा हमनाम नहीं है। चाय मुहब्बत का पैगाम देती है दोस्तों को बिठाती है साथ चाहे जिस जगह हो भूले नहीं ऐसा ईनाम देती है। घर की होटल की चायखाने की ढाबे की किसी चलते फिरते चायवाले की महंगी नहीं सस्ती नहीं बस गर्माहट देती है ठंडे रिश्तों को पल भर में नया करती है। प्याली खुद नहीं पीती बुझाती है चाह सबकी चाय की मस्ती है शहर गली बस्ती है। चाय के दुनिया में दीवाने बहुत हैं इक इक प्याली को याद अफ़साने बहुत हैं। चाय गर है साथ याराने बहुत हैं कहने को कई महंगे नज़राने बहुत हैं पर चाय की प्याली तूफ़ान खड़े करती है घर घर में रहती है सब चुपके से कहती है पीकर गाओ दिलकश तराने बहुत हैं। चाय की प्याली भी जिनको मिलती नहीं वही समझते हैं कितनी बड़ी कीमत है उसकी। ये मेरी चाय की प्याली नहीं है कहकर ढंडी आह भरते हैं अक्सर लोग।

You're my cup of tea drink sticker - TenStickers

जुलाई 22, 2021

धुंवा बनाके फ़िज़ा में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको।

   भगवान बेचते सब पैसे के पुजारी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

झूठ बोलते हैं अदालत में शपथ खाकर सच बोलने की संविधान की शपथ उठाकर धज्जियां उड़ाते हैं। हम सच नहीं कहते झूठ से पर्दा हटाते हैं जो देखते हैं उसकी असलियत समझते समझाते हैं। इधर उधर से ढूंढकर मुद्दे लाते हैं सिक्का नहीं उछालते नहीं किस्मत आज़माते हैं राज़ की बात भरी महफ़िल में कहते हैं बेआबरू होकर निकाले जाते हैं। खेल पैसे का है पैसा भगवान है कथा कहानी हक़ीक़त फ़लसफ़ा है। शुरुआत करते हैं टीवी पर इक नया विज्ञापन चल रहा है गांव के लोग बात कर रहे हैं स्कूल की ईमारत की हालत खराब है कुछ करना होगा सरकार ने हाथ खड़े कर दिये हैं। जब तलवार मुकाबिल हो अखबार निकालो आजकल कोई नहीं कहता क्योंकि अखबार टीवी चैनल खुद बंदर के हाथ उस्तरा बन गए हैं बंदर बांटता है बिल्लियां रोटी खाने की आस लिए बंदर का गुणगान करती हैं। कुछ मुहावरे की नकल की तरह उपाय ढूंढते हैं और निर्णय किया जाता है मुनादी करवाई जाती है केबीसी को फोन लगाओ गांव के समझदार सब उल्लू बन जाओ। लगता है सरकार ने अमिताभ बच्चन को ज़िम्मा सौंपा है हमसे नहीं होता आप केबीसी से विकास की गंगा लाओ जनता को समझाओ खाली दिमाग शैतान का घर होता है सबके दिमाग में कचरा भर कर उलझन को सुलझाओ नहीं सुलझती और उलझाओ। बस 15 सवाल हैं ज़िंदगी मौत का सवाल नहीं है कोरोना को छोड़ो धमाल नहीं मिसाल नहीं है। आपके सामने ऑप्शन होते हैं किधर जाना है सही दिशा कौन सी है दिमाग़ कहता है जिधर सभी जाते हैं उसी डगर चलना ठीक है दिल है कि मानता नहीं और आत्मा भटकती है कोई अलग रास्ता बनाने को चिंतन करती है लेकिन रटी रटाई बात याद आती है सत्य की खोज की ज़रूरत नहीं है आगे बढ़ना है तो जो जवाब पैसा दिलवाता है उसी को लॉक करना होगा। कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में सही जवाब का शोर मचाकर बच्चा यादव मंच को हिलाकर रख देता है। अमिताभ बच्चन और टीवी शो वाले खुद अपनी असलियत नहीं जानते दुनिया भर की जानकारी समझदारी की बातें करते हैं। दुनिया से जाना है खाली हाथ सबको मगर क्या कमाल है कुत्तों को खिलाते हैं जानवर से प्यार करते हैं इंसान को इंसान नहीं समझते आदमी आदमी को भूनकर खाने लगे हैं। दुष्यन्त याद आने लगे हैं घर मिल रहा जहां तहखानों से तहखाने लगे हैं। महल वालों के अंदाज़ नज़र आने लगे हैं घर वही है रहने वाले लोग वही हैं दरवाज़े अलग अलग होने लगे हैं करीब होकर दूर जाने लगे हैं बात करने से बचते हैं मिलने जुलने से कतराने लगे हैं। अपने भीतर शिकवे शिकायत बैर नफरत छुपा नकाब चेहरे पर लगाकर मुस्कुराने लगे हैं। 
 
सत्तावाले सोने चांदी के कलम भिजवाने लगे हैं जो बात लिखवानी है लिखवाने लगे हैं। सच की बात करने वाले झूठ के कदमों में सर झुकाने लगे हैं। टीवी सीरियल फिल्म गाने समाज को गलत दिशा दिखाने लगे हैं ज़मीर बेचने वाले धन दौलत कमाने लगे हैं। लोग खोटे सिक्कों को बार बार आज़माने लगे हैं। संसद विधानसभा में देश समाज की समस्याओं की चर्चा छोड़कर माननीय कहलाने वाले आपस में टकराने लगे हैं चाय की प्याली में तूफ़ान उठाकर अपनी ताकत को आज़माने लगे हैं। शून्यकाल में सवाल खड़े हैं जवाब खाली कुर्सियां हैं कौन सुनता है चीख पुकार आम लोग रोते बच्चे भूखे सो जाने लगे हैं। खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए , सवाल ये किताबों ने क्या दिया मुझको। धुंवा बनाके फ़िज़ा में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको। नज़ीर बाकरी जी की ग़ज़ल जगजीत सिंह की आवाज़ में हर लफ्ज़ हक़ीक़त है आज भी।
 

 


जुलाई 20, 2021

कुछ करना था कुछ कर बैठे ( सच के दर्पण में ) डॉ लोक सेतिया

  कुछ करना था कुछ कर बैठे ( सच के दर्पण में ) डॉ लोक सेतिया 

ढूंढने से जो नहीं मिला जीवन भर अचानक सामने खड़ा दिखाई दिया कहीं ये कोई ख़्वाब तो नहीं। नहीं ये सपना नहीं हक़ीक़त सामने नज़र आई मुझे बिल्कुल शीशे की तरह साफ जिसको तलाश किया इधर उधर मिला भी तो खुद अपने पास और इतना पास कि कोई फ़ासला नहीं था दोनों में ज़रा भी। मैंने चाहा उस से पूछना बहुत कुछ कितने सवाल मन में उठते रहे ज़िंदगी भर मगर कुछ भी कहने से पहले उसने सब कुछ बता दिया जैसे किसी परीक्षा में हर सवाल का जवाब लिखा हुआ हो। आधुनिक समय में होता है आपको सही और गलत का निशान लगाना होता है झट से पहले से दिए कॉलम में। पर यहां सोचने की ज़रूरत नहीं थी सही का निशान लगा हुआ था जैसे ऐसा गलत है साफ बताया हुआ था। आपको समझने में आसानी हो इसलिए आपको तमाम उलझनों समस्याओं परेशानियों चिंताओं का कारण भी समाधान भी बता देता हूं बस आपको हां या नहीं सच या झूठ जो उचित लगता है बोलना है खुद से खुद ही बात करनी है। आत्मचिंतन उसी तरह है जैसे हम आप अपनी मन की बात सोशल मीडिया पर लिखते हैं सोचते हैं लोग नासमझ हैं उनको समझाना ज़रूरी है खुद कभी नहीं समझा क्या समझना क्या समझाना है। ध्यान से पढ़ना खुली किताब को बिना समझे पन्ने नहीं पलटते जाना जैसे साल बढ़ते गए संख्या बढ़ी हम वहीँ रहे जहां थे। 
 
   क्या कुछ भी वास्तव में उस तरह का है जैसा होना चाहिए दुनिया में सब कुछ जैसा है कोई नहीं मानता कि बढ़िया है। लेकिन हम जिस चीज़ को अच्छा नहीं समझते बदलते रहते हैं अपने खुद की खातिर घर वाहन साज़ो-सामान खराब छोड़ बेहतर चुनते हैं हासिल करते रहते हैं। लेकिन जिस दुनिया में रहना है उसको अच्छा और सुंदर बनाने की जगह और भी खराब करते रहते हैं। किसी और ने नहीं हमने बर्बाद किया है इस कभी बड़ी खूबसूरत रही दुनिया को और कैसा बनाया है जैसा बनाना कदापि नहीं था। सरकार राजनेता अधिकारी न्यायपालिका पुलिस सुरक्षा शिक्षा स्वास्थ्य सेवा यहां तक कि धर्म भगवान समाजसेवा तक सभी जैसा होने चाहिएं उस के उल्ट हैं। धन दौलत शोहरत सुख सुविधा के पीछे भागते रहते हैं इक रेगिस्तान में मृगतृष्णा की तरह चमकती रेत को पानी समझ और मर जाते हैं प्यास से। प्यास बुझ सकती थी अथाह सागर था पास हमने जिसको देखा नहीं मुहब्बत इंसानियत और दोस्ती अपनेपन को छोड़ खुदगर्ज़ी को मकसद बना लिया है। 
 
कोई रिश्ता कोई संबंध सच्चा और निस्वार्थ नहीं बनाया है हमने सब को खराब किया है जो नहीं भाया उसको भी संवारा नहीं मिटाना चाहा है। बनाना नहीं सीखा बने बनाये को ख़त्म करना यही किया है। विधाता जो चाहता है हमने उसके विपरीत किया है मनमानी की है और विधि से मिला जो हम नहीं चाहते थे। जिस दिन अपनी मर्ज़ी छोड़ विधाता की मर्ज़ी को समझ सही आचरण करने लगे बदले में जिसकी हमको चाहत है विधाता वही देगा। बस हम उस से होड़ लगा बैठे हैं जिस के सामने अपना कोई बस नहीं चलता और बेबस हैं। हम खुद को नहीं बदलते विधाता को उसकी दुनिया को बदलना चाहते हैं। मगर किया क्या है दुनिया बनाने वाले की हर चीज़ को हमने चाहा है अपनी मर्ज़ी की बनाने को बदलने में जैसा था उस से खराब किया है। शायद ध्यानपूर्वक देखना होगा क्या ये सब जैसा होना चाहिए उसके उल्ट नहीं है जैसे सफ़ेद और काला रंग। लेकिन हमने कालिख़ को दाग़ को छुपाने को सब कुछ काले रंग में रंग दिया है। इतना ही नहीं हम काले रंग झूठ आडंबर और सभी गलत बातों को स्वीकार कर अपना लिया है। राह ही गलत चलते रहे हैं तो जिस मंज़िल की चाह थी मिलती कैसे और हम अपनी खूबसूरत मंज़िल से इतना दूर होते गए हैं कि हमारी राहें  भी खो गई हैं। 
 
सामने सच खड़ा हुआ है सच ही ईश्वर है और सच के दर्पण में सब कुछ दिखाई दिया है। कुछ करना था कुछ कर बैठे। ज़िंदगी का घड़ा भरता नहीं है जितना पानी डालते हैं रिसता जाता है जीवन को बहते दरिया की तरह बनाते तो प्यास बुझाते सबकी कुछ फूल खिलाते इक गुलशन था ये दुनिया इसको बर्बाद नहीं करते बचाते सजाते और सब पाने से अच्छा था कुछ दे कर जाते। 
 
 Money Quotes in Hindi: मैं पैसा हूँ - Afroj.In

जुलाई 15, 2021

कल्याणकारी मोदीमंत्र ( नवीनतम अध्याय ) डॉ लोक सेतिया

   कल्याणकारी मोदीमंत्र ( नवीनतम अध्याय ) डॉ लोक सेतिया 

आखिर मैंने उनको मना ही लिया उनके शिखर तक पहुंचने के निराले ढंग अजब तौर तरीके और अचूक निशाने पर लगने वाले रहस्यमयी बाणों का भेद खोलने को जनहित विश्वकल्याण की दुहाई देकर। आपको यहां तलक पहुंचने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान किस का रहा है पहले ये सवाल करना लाज़मी था। क्या जनता का संपर्क संगठन का भरोसा या दल का समर्थन इसके लिए पहली सीढ़ी साबित हुआ। ताली बजाते हुए हंस कर कहने लगे इतना भी नहीं जानते हर कामयाब व्यक्ति के पीछे किसी महिला का हाथ होना लाज़मी है। मेरी धर्मपत्नी अगर चाहती तो मुझे अपने बंधन से मुक्त नहीं होने देती और मैं दाल रोटी कपड़ा मकान घर का सामान जमा करने में भटकता रहता। लेकिन उस महान आदर्शवादी नारी ने मुझे किसी झंझट में नहीं डाला मुझ पर गुज़ारा मांगने तक को मुकदमा नहीं किया। सोचो अगर अलग अलग रहने से विवाह बंधन से छुटकारा पाने को पंचायत का अथवा अदालत का दरवाज़ा खटखटाती तो मैं जितने साल खैरात मांग कर गुज़र बसर करता रहा इन चक्करों में फंसकर ज़िंदगी बिताने को मज़बूर हो सकता था। आज भी मेरे शासक बनने के बाद उस औरत ने कभी अपना अधिकार नहीं चाहा है जो कानून संविधान भी उसको इनकार नहीं कर सकता है। बात पते की लगी तो मैंने कहा किसी महीने मन की बात करते रेडियो पर उनका धन्यवाद या आभार ही जता देना उचित था किया नहीं किसलिए। उन्होंने कहा ये पति - पत्नी का आपसी मामला है इसको राजनीतिक चर्चा से अलग रखना चाहिए। 
 
ठीक है जैसा आपकी मर्ज़ी मगर आपके कितने मंत्र आये-दिन सुनते हैं कुछ ख़ास ऐसे सभी की भलाई के लिए बताओ। उन्होंने कहा मुझे जानवरों से बड़ा लगाव है प्यार है उनसे सीखने को बहुत मिलता है। बिल्ली और कुत्ता दो जीव हैं जिनको लोग पालते हैं मगर उनका सवभाव अलग अलग है सोच बिल्कुल उल्टी है। कुत्ते को कोई खिलाता पिलाता है रहने को जगह देता है उसको आराम से सोने को बिस्तर कपड़े देता है तब कुत्ता समझता है ये मेरा भगवान है मुझे सब देता है। इसलिए अपने पालने वाले के पांव चूमता है दुम हिलाकर उपकार मानने का इज़हार करता है। लेकिन यही सब बिल्ली को मिलता है तो उसको लगता है मैं भगवान हूं तभी ये मुझे खुश करने को रात दिन कोशिश करता है। बिल्ली जो मिलता है उसको अधिकार समझती है और कुत्ता उसी को उपकार समझता है। सियासत में ये दोनों महत्वपूर्ण सबक सिखलाते हैं। कुत्ते को हड्डी खिलाते हैं बिल्ली से दूध को बचाते हैं छिपाते हैं मुश्किल खड़ी तब होती है जब चूहे बिल्ली कुत्ते शेर दोस्ती निभाते हैं। ऐसा होता है जब चुनाव करीब आते हैं। लोमड़ी को सरे गुर आते हैं गिरगिट भी रंग बदलने में पीछे रह जाते हैं हम राजनेता मगरमच्छ हैं चबाते नहीं निगल जाते हैं लोग हमको बार बार आज़माते हैं। धोखा खाते हैं पछताते हैं सब सम्मोहित करने वाले मंत्र बस मुझी को आते हैं। असली बात आपको समझाते हैं बात कहते हैं बात से मुकर जाते हैं अच्छे दिन लाने की बात थी जानते हैं कैसे कैसे हालात दिखलाते हैं। किया जो जो छुपाते हैं जो कर नहीं सकते उसके सपने दिखलाते हैं बिना कुछ भी करे कर दिया का शोर मचाते हैं जब लोग समझने लगते हैं उनको भारतमाता की जय देशभक्ति जैसे नारों से उलझाते हैं हारी बाज़ी को जीतने वाले बाज़ीगर कहलाते हैं।

जुलाई 09, 2021

दर्शक ताली बजाओ मदारी बंदर नचाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

इक बस वही खिलाड़ी सब अनाड़ी ( सत्ता की बाज़ी ) डॉ लोक सेतिया 

ये उनकी राजनीति है उनके लिए खेल बदलते हैं मैदान बदल जाते हैं मगर मर्ज़ी उनकी रहती है। धर्मराज जुए में सब को दांव पर लगाते हैं हर बाज़ी हार जाते हैं फिर भी सच्चे अच्छे कहलाते हैं। उनके हाथ देश की बागडोर है सारी की सारी दुनिया चोर है उनकी बात और है दिल पर भला चलता किस का ज़ोर है। मन की बात करते हैं झूठ कहते हैं सब उनका झूठ सबसे बड़ा सच कहलाता है रोज़ बात से मुकरते हैं। आपको कुछ समझ नहीं आ रहा है कोई आपको देशभक्ति का सबक पढ़ा रहा है अपनी धुन में कोई दरवेश भजन सुनाता चला जा रहा है मधुर स्वर सुन कितना मज़ा आ रहा है। खुले आकाश से राजदरबार तक किसी मॉल से मल्टीप्लेक्स और थियेटर तक उसका तमाशा है आपकी हर निराशा उसकी बन जाती आशा है आदमी नहीं है इक बताशा है मिलने की आशा है। उसके हाथ हज़ार हैं सारी दुनिया में उसके यार हैं किस लिए लोग बेज़ार हैं। बर्बादी के जितने भी आसार हैं उनकी सत्ता के सभी अचूक हथियार हैं। अपनी अपनी कहानी है बिल्ली शेर की नानी है जनता की नादानी है जिसने बदहाल किया उसकी भी समझी मेहरबानी है। चलो इस किताब को खोलते हैं खामोश अल्फ़ाज़ कभी बहुत कुछ बोलते हैं राज़ की बात खोलते हैं उनको सच के तराज़ू में तोलते हैं। जिनकी शोहरत के चर्चे हैं आमदनी से बढ़कर जिनके खर्चे हैं उन का क्या क्या हिसाब है लिखा बही खाता में सौ खून माफ़ है। हर अध्याय मुक़्क़मल है समझना चाहो तो कोई नहीं मुश्किल है। 
 
पहला अध्याय। मैं आज़ाद हूं। अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्म है पर्दे से असलियत में कर दिखाया है किसी संपादक ने झूठा किरदार बनाकर अपनी कल्पना से सभी पाठकवर्ग को उल्लू बनाया है। रोज़ जिस नाम से कॉलम पढ़वाया है कोई नहीं बस इक साया है अचानक कोई भूखा बेबस नज़र आया है जिसने सड़क से फेंका झूठा सेब चुपके से उठाया है। उसकी मज़बूरी का फायदा उठाया है खूब खिलाया है और पैसे देकर झूठ बोलने का अनुबंध करवाया है। मैं आज़ाद हूं , सबसे दावा कर अमिताभ बच्चन से मिलवाया है। किरदार अभी तक सदी के महानायक निभाते हैं हर फिल्म में झूठा किरदार शिद्दत से निभाते हैं मालामाल होते जाते हैं। आपको करोड़पति बनने की राह दिखाते हैं खेल खेल में पैसा बनाते हैं समझदारी उसको बतलाते हैं। आजकल कितने लोग आपको जुआ खेलने को ललचाते हैं टीवी पर खेलो और जीतो विज्ञापन में उल्टी पट्टी पढ़ाते हैं ये गुमराह करने वाले नायक समझे जाते हैं। 
 
सबसे बड़ा खिलाडी। अध्याय दो। खोटा सिक्का उसने चलाया है कुछ भी नहीं आता फिर भी सब में हाथ आज़माया है। कभी शतरंज की बिसात बिछाई है जनता मोहरे हैं बादशाह की मौज मस्ती है सत्ता की खुमारी छाई है। हर कोई दुश्मन है हर कोई भाई है बस उसकी मुहब्बत और जंग की लड़ाई है जिस में सब जायज़ है कौन सच्चा आशिक़ कौन हरजाई है। चाल उसकी है मात खाई है मगर क्या लाजवाब की चतुराई है उसने बिसात पलटी है हारी बाज़ी जिताई है। अब कोई खेल नया खेलेगा ताश की बाज़ी में हार जाएगा पुलिस बनकर वापस ले लेगा। उसने ताश के पत्तों का महल बनाया है बस हवा का झौंका कहीं से आया है बिखर गए सभी पत्ते हैं। अभी नहीं समझे बड़े कच्चे हैं उनके सामने बूढ़े भी बच्चे हैं। सरकार कोहलू के बैल जैसी है चलती रहती है अपने दायरे में नहीं किसी मंज़िल पर पहुंचती है उसकी आंखों पर बंधी खुदगर्ज़ी की पट्टी है। खराब है मगर अपनी महबूबा है ज़ुल्म ढाये फिर भी प्यार आता है उनको करना हर वार आता है उनकी सूरत पे प्यार आता है। शोहरत की बुलंदी की बात मत पूछो हर घड़ी इश्तिहार आता है। उनको नींद नहीं आती है खबर उनको सच्ची नहीं भाती है उनकी शोहरत घटती जाती है जान जाती है रूह थरथराती है। 
 
        (  अभी जारी है किताब का अगला अध्याय अगली पोस्ट पर। )
 

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जुलाई 07, 2021

तस्वीर तेरी दिल में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       तस्वीर तेरी दिल में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आशिक़ आशिक़ होते हैं महबूबा की तस्वीर दिल में छुपा कर रखते थे कभी ज़माना था। किसी शायर ने कहा था कुछ हसीनों के खतूत कुछ तस्वीरें बुताँ बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला। अब उनको क्या मालूम था कितनी हैं अब तलक और कितनी अभी और बनानी हैं। बड़े दिलवाले लोग मुहब्बत बांटने में किफ़ायत नहीं किया करते हैं। आधुनिक युग है आशिक़ी का रोग छोटी उम्र में लग जाता है शायद कोई बचना चाहता है कोई नहीं बच पाता है। सोशल मीडिया ने झूठी मुहब्बत की कितनी कहानियां बनाई बिगाड़ी हैं फेसबुक पर बाज़ार सजा हुआ है सच्ची मुहब्बत की झूठी तस्वीरों का। किसी सिरफिरे ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर बंदे ने फेसबुक पर इक पेज बना डाला है सब पेज लाइक करने वालों को जिस किसी से मुहब्बत हुई उसकी बात तस्वीर के साथ शेयर करने को कहा है। खुद को बदनसीब बताया है क्योंकि उनकी ज़िंदगी में जो भी मिलती रहीं उनकी तस्वीर पास नहीं है लिखते हैं तस्वीर तेरी दिल में बसाई है। कोई वक़्त था लड़के अपने ख़ाली बटुए में तस्वीर रखते थे बस तस्वीर से बात करते थे उसको कहने से डरते थे। वहीं से कुछ टुकड़े आशिक़ों के दिल के बिखरे पड़े हैं लाया हूं आपको दिखाने को क्या ज़रूरी है हर मुहब्बत की अमर कहानी कोई लिखे जाने कितने बेनाम अनजान बदनाम आशिक़ सच्चे नहीं झूठे ही सही दुनिया में हुए हैं। इधर शायरी लिखने वालों ने खूबसूरत तस्वीर साथ लगाई है मिलती बधाई है। आपने अपनी कहानी क्या किसी को बताई है तौबा तौबा ये प्यार की रुसवाई है , देखा कोई पढ़ कर लज्जाई शर्माई है। 
 
     बचपन की मुहब्बत को दिल से न भुला देना , पोस्ट पर तस्वीर गुलाब के फूल की नहीं किसी भंवरे की लगाई है। समझ नहीं आई बात इतनी साफ समझाई है भंवरा बड़ा नादान रे , बगियन का महमान रे , फिर भी जाने ना जाने ना जाने ना कलियन की मुस्कान रे। किसी लड़की की फेसबुक वाले लड़के ने किसी की तस्वीर फेसबुक से लेकर उसकी तस्वीरों का गुलदस्ता बनाकर क्या कमाल किया है। बस जिसकी तस्वीर है उसी को नहीं पता कौन है उसने कि इसने ब्लॉक किया है। सोनम बेवफ़ा नहीं है किस्सा भूला नहीं है हर कोई उसकी गवाही देता था , सोनम ने अपनी बात लिखी है बस यही बताया है नाम पर मत जाना असली नहीं है बाकी सब सच है। सबसे लाजवाब बात इक महिला ने लिखी है जिस से सच्चा प्यार हुआ कभी इकरार नहीं इज़हार नहीं किया उसके लिए ज़िंदगी भर घर-बार नहीं किया उसके नहीं रहने पर उसकी नाम की माला जपती है खुद को मीरा कहती है राधा कहती है। जिस देश में गंगा बहती है कितनी फ़िल्मी कहानियां कितनी नायक नायिकाओं के किस्से लिखे हुए हैं। साहिर की बात से लेकर रेखा हेमा की कितनी कहानियां पढ़ कर लगता है मुहब्बत का तमाशा किसी मेले की नौटंकी में दिखाया जा रहा है। 
 
  सबसे बड़ी सच्ची मुहब्बत रूहानी होती है किसी ने ख़ुदा से ऊपरवाले से इश्क़ की कहानी लिखी है। पढ़कर किसी ने वीडियो बना डाला है कोई बादशाह किसी को खुले आसमान के नीचे मिट्टी से खेलते देख सोचता है इस के पास घर नहीं पहनने को कपड़े नहीं खाने को कुछ नहीं है। उस से कहता है मेरे साथ मेरे महल में चलकर रहो आपको सब मिलेगा जो भी मांगोगे। क्या मेरी चार शर्त मानोगे मुझे साथ ले जाना चाहते हो तो बताओ। बादशाह ने कहा कोई मुश्किल नहीं मेरे लिए बोलो क्या क्या शर्त है। उसने कहा मुझे सब खाने को देना मगर खुद आपको कुछ भी नहीं खाना पहली शर्त है , बादशाह ने कहा ये छोड़ और क्या है शर्त बताओ। उसने कहा मुझे शानदार लिबास पहनने को देना खुद नहीं पहनना , तीसरी शर्त मुझे चैन से सोने देना खुद कभी नहीं सोना होगा , और चौथी शर्त है मुझे छोड़कर कभी इक पल भी कहीं नहीं जाना। बादशाह बोले आप ही बताओ कोई भी ऐसा कैसे कर सकता है। मुझे अपने राज का सब कुछ कामकाज करना है कैसे कर सकता हूं।  उसने बताया मेरा ईश्वर ये सब करता है मुझे खिलाता है खुद कुछ नहीं खाता है। मुझे पहनने को कपड़े देता है खुद नहीं पहनता , मैं सोता रहता वो कभी नहीं सोता है , कभी भी मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाता। फिर भी उसका कामकाज उसका दुनिया का सब काम नियमित होता रहता है दिन रात हवा पानी मौसम कुदरत सभी रुकते नहीं हैं। सोचना आपको किसी तस्वीर की ज़रूरत नहीं होगी कोई ईमारत कोई मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरजाघर ज़रूरी नहीं उस से मुहब्बत सबसे सच्ची मुहब्बत है। माला फेरना गिनती करते रहना जैसे कर्म की अहमियत नहीं है। 
 
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जुलाई 04, 2021

ज़िंदा हैं मर कर भी लोग ( ग़ज़ब की बात ) डॉ लोक सेतिया

  ज़िंदा हैं मर कर भी लोग ( ग़ज़ब की बात ) डॉ लोक सेतिया 

बड़े बड़े दार्शनिक बड़े बड़े संत महात्मा आदर्शवादी समाज सुधारक समझाते रहे मर के भी अमर अजर होने को अच्छे अच्छे कर्म करने चाहिएं अच्छाई सच्चाई की राह चलना चाहिए मगर हम ज़िंदा होकर भी मरे जैसे बेज़मीर लोग बन कर सालों की गिनती बढ़ाते रहे। वास्तव में जीना ऐसा था बल्कि है जीते हैं जैसे कोई चलती फिरती लाश हैं। वास्तविक जीवन कठिन लगता है तभी हमने इक झूठा सपने जैसा जीवन जीना सीख लिया है व्हाट्सएप्प  फेसबुक पर ज़िंदा हैं कुछ लोग दुनिया से अलविदा होने के बाद भी और हमने देखा कुछ दिन बंद किया सोशल मीडिया पर खाता तो लोग समझने लगे जाने ज़िंदा भी हैं कि नहीं। यही ग़ज़ब की बात है आपकी ज़िंदगी की खबर से महत्वपूर्ण लगती है मौत की खबर। दोस्त तो दोस्त दुश्मन भी चाहते हैं तारीफ़ करना फूल चढ़ाना भूलकर दिल की रंजिशें। कभी कभी समझते हैं चार दिन की ज़िंदगी हज़ार झगड़े झमेले किसलिए काश हंसते बोलते मिलते प्यार मुहब्बत की दास्तां बनते। स्वर्ग जैसी लगती है ये काल्पनिक सोशल मीडिया की नकली दुनिया जिस में सभी कुछ है और सबके लिए है शुभकामनाएं भगवान की भक्ति से लेकर आपको मार्गदर्शन देने वाली बातें कथाएं कहानियां। लगता है किसी को किसी से कोई बैर नफरत जलन नहीं है हर कोई सबकी भलाई अच्छाई की चाहत रखता है। 
 
  वास्तविक ज़िंदगी में आपने क्या किया क्यों किया उसका हिसाब कहीं कोई नहीं लिखता है लेकिन अपने सोशल मीडिया पर खूब अपना सिक्का जमाया है सबको वही सच लगता है। समस्या विकट है हम लाख कोशिश कर असली ज़िंदगी में उस तरह बन नहीं सकते हैं। जानते हैं ये सब बेकार किताबी बातें हैं और किताबों को पढ़ना नहीं उनको अलमारी में सजाकर रखते हैं कोई दिन होता है जिस दिन उनको झाड़ पौंछ कर माथा टेकते हैं। जब हमने मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे को भी घंटा बजाने माथा टेकने मोमबत्ती जलाने आरती अरदास पूजा ईबादत करने की जगह समझ लिया है चिंतन मनन करने की जगह कोई नहीं सिर्फ रटी रटाई बात वही औपचारिकता निभाते हैं हर दिन ऐसे में सोशल मीडिया की बातों का असर ख़ाक होगा। शायद हमने स्वर्ग तलाश कर लिया है अनजाने में जन्नत का सुख अनुभव करते हैं परियां हैं बहार है कितनी रौशनी है। लेकिन हम किसी गहरी नींद में सोये हुए दिलकश ख़्वाब देखते रहते हैं नींद खुलने से डरते हैं कहीं हक़ीक़त सामने आकर खड़ी नहीं हो जाए। चिट्ठी नहीं आती मगर संदेश आते हैं स्वर्ग की दुनिया है स्मार्ट फोन की हमारी दुनिया जिस में सांसों की नहीं इंटरनेट डॉटा की ज़रूरत पड़ती है। क्षण भर में जान मुश्किल में पड़ जाती है। सोशल मीडिया की ज़िंदगी में हमसे असली जीने का मज़ा छीन लिया है बात इतनी नहीं हमने अपनी झूठी पहचान बनाने में असली पहचान खो दी है। दुनिया क्या हम खुद से भी अजनबी हैं अपने चेहरे को देखते हैं तो लगता है आईने में कोई और अक्स है हमारी कितनी खूबसूरत डीपी है।
 

 


जुलाई 03, 2021

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ( ज़फ़र से जारी है सफ़र ) डॉ लोक सेतिया

 बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ( ज़फ़र से जारी सफ़र ) 

                                       डॉ लोक सेतिया

जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी। बादशाह होकर भी उनकी मुश्किल वही थी और सदियों बाद हमारी भी हालत उन से बढ़कर कठिन है। दुष्यंत कुमार को भी बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार। ये कोई सरकारी फ़रमान की ही बात नहीं है घोषित आपात्काल की बात भी नहीं हालात समाज के ऐसे बन गए हैं कि शोर मचाने की छूट है हर कोई बंद कमरे में बैठा सोशल मीडिया पर भड़ास निकाल सकता है घर की चौखट लांघते ही सोच विचार कर मुंह खोलना होता है। बात किसी अपने से करनी हो या जान पहचान वाले से अथवा अनजान अजनबी से कहने से पहले समझना ज़रूरी है किसको क्या सुनना है बस जिसको जो अच्छा लगता है आपको उस से वही कहना हैं नहीं तो चुप रहना सब सहना है। इस दौर में ख़ामोशी सबसे बड़ा गहना है ज़ालिम को मसीहा क़ातिल को ख़ुदा कहना है उनकी दुनिया में जीना मौत से दुश्वार है। हर कोई लाचार है बंदा गुनहगार है सरकार खुद बेज़ार है इश्तिहार ही इश्तिहार है। राजाओं की सभाओं से धर्म की चर्चाओं में कभी वाद-विवाद होते थे चर्चा में अपने विचार से बात मनवाई जाती थी सच कहना जुर्म नहीं था कोई आफ़त नहीं ढाई जाती थी तीर तलवार मैदान-ए -जंग में चलाई जाती थी। महफ़िल में इक शमां जलाई जाती थी अपनी कही सबकी सुनी समझी और समझाई जाती थी।  
 
मन की बात का ढिंढोरा नहीं पीटा जाता है मन की बात दुनिया से नहीं होती है शोर करना उलझन की बात होती है। राजा बोला रात है रानी बोली रात है , मंत्री बोला रात है सन्तरी बोला रात है , ये सुबह-सुबह की बात है। इधर काली अंधियारी रात को दिन का उजाला कहना है  बस्ती में रहना है तो झूठ को सच कहना है। दोस्तों से फ़ासिले हो गए हैं ख़त्म सब सिलसिले हो गए हैं , आवाज़ गुम हो गई है लब हिले कुछ सिले हो गए हैं। खुद से मुलाक़ात नहीं होती ज़माने के शिकवे गिले हो गए हैं। किसी से दोस्त से पत्नी से भाई बहन खास रिश्ते से उसकी नापसंद बात करना आपसी संबंध को बिगाड़ना है। मीठा खाना सब चाहते हैं मधुमेय की चिंता छोड़ कर झूठी तारीफ भाती है सच सुनते नातों में कड़वाहट भर जाती है यूं अदब से हंसकर मिलते हैं मन में नफरत का ज़हर छुपाए रखते हैं। मुझे आप जैसे लोग पसंद हैं कहते हैं हम आपके दिल में रहते हैं मौका मिलते ही ऊंचे महल ढहते हैं कहने वाले कहते हैं दुनिया के दस्तूर निराले हैं भीतर अंधेरे बाहर उजाले हैं। आज सवाल करते हैं कड़वा सच किसलिए बोलते हैं क्यों सच के तराज़ू पर सभी को तोलते हैं। इक दिन खोलेंगे लबों को भरी सभा में कहेंगे कहां चले गए वो जो वक़्त पर बोलते हैं।
 

 
 
 
 
 
 

जुलाई 02, 2021

बड़ा नामुराद सोशल मीडिया रोग ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

 बड़ा नामुराद सोशल मीडिया रोग ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

ये ऐसा मीठा मीठा दर्द है जो हर किसी को अच्छा लगता है पहले , उसके बाद धीरे धीरे मज़ा आने लगता है आखिर लगता है ये मुसीबत बन गया है मगर तब तक नशा बन चुका होता है छोड़ना चाहते हैं छोड़ नहीं पाते हैं। कोई इस से बचा नहीं इंसान से बेजान सरकार तक उलझे हैं फेसबुक व्हाटऍप्स के मायाजाल में। सब से दुनिया भगवान रिश्तों से मोहभंग हो सकता है मुआ यही इक है जिस बिन जीना मुहाल लगता है फरिश्तों की दुनिया है बाकी सब जी का जंजाल लगता है। इंटरनेट नहीं हो डाटा खत्म हो मत पूछो जीने मरने का सवाल लगता है। मैंने ज़िंदगी के दस साल खुद को गंवाया है अब जाकर समझ आया है खोया ही हैं समय बर्बाद किया है नहीं कुछ भी पाया है। एक बार नहीं सौ बार आज़माया है। जिधर देखते हैं बढ़ता जाता ये शाम का साया है हर किसी ने सोच समझ का दीपक खुद ही बुझाया है ये घना अंधियारा हर किसी को बहुत भाया है। सबने औरों को सब कुछ समझाया है कभी किसी को समझ नहीं आया है दवा जानकर मीठा ज़हर खाया है। आपको अपनी कहानी बताते हैं इस दुनिया की तस्वीर बनाते हैं भगवान से बाज़ार तक यहीं मिलते हैं ये कुछ नहीं सिर्फ इक फैला हुआ रेगिस्तान है जिस में कभी गुलशन नहीं खिलते हैं। आज मंच पर आते हैं हर पर्दा उठाते हैं सच और झूठ दोनों को आमने सामने बिठाते हैं फिर दर्द की दास्तां सुनते हैं मगर उदास नहीं होते हैं ख़ुशी जताते हैं हंसते गाते मुस्कुराते हैं ये दिखावे की दुनिया है डीपी खूबसूरत चुनकर लगाते हैं। 
 
आपको हर शख़्स ऑनलाइन दिखाई देता है पढ़ता है जाने कैसी उल्टी सीधी पढ़ाई राज़ कोई नहीं जानता दोस्त दुश्मन भाई भाई दिखाई देता है। मिलते नहीं बात करते नहीं गली से जिनकी गुज़रते नहीं उनको सुबह शाम शुभकामना संदेश भेजते हैं। मुझे बड़े अच्छे सच्चे लगते हैं कुछ लोग हिम्मत वाले जो मुझे पसंद नहीं करते ब्लॉक कर देते हैं अपने दिल की हसरत का पता देते हैं मेरे बारे जो अफ़वाह उड़ा देते हैं ये अल्फ़ाज़ बड़े शायर से उधार लिए हैं ज़रूरी है साफ बता देते हैं। सोशल मीडिया पर सरकार चलती है कितनी बेकार हो तब भी शानदार चलती है झौंपड़ी महल दिखाई देती है अंधों की नगरी काना राजा है जम्हूरियत लंगड़ी लूली है बैसाखियों की महिमा हर बार चलती है। कुदरत की नहीं है किसी और की माया है कुछ भी मिला नहीं किसी को सभी ने खुद को गंवाया है जिस दिन से पड़ा ये मनहूस साया है इक पागलपन सभी पर छाया है समझ कोई नहीं असलियत को पाया है। 
 
   पढ़ता सुनता कोई भी नहीं है समझता सच्चाई कोई भी नहीं है गरीब की जोरू सबकी भाभी है बहन कोई नहीं भरजाई किस की कौन है नहीं मालूम किस घर मातम किस घर बजती शहनाई सोचता हरजाई कोई भी नहीं। माता पिता का निधन सोशल मीडिया पर बता रहे हैं जैसे मौत का जश्न मना रहे हैं लाइक देखते हैं कमेंट पढ़ कर जवाब देते हैं कुछ इस तरह दुनियादारी निभाते हैं सारा हिसाब देते हैं। भगवान परेशान हैं क्या हाल किया है भक्तों ने बिना सोचे समझे कोई टकसाल किया है अंधभक्तों ने। इंसान कितने ख़ुदा बन गए है ईमान बेचकर दौलत बनाई है मत पूछो किसी कैसी कमाई है उस तरफ कुंवा इस तरफ गहरी खाई है सबने अपनी रफ़्तार बढ़ाई है। इंसानियत बच नहीं पाई है लाश उसकी हर किसी ने सजाई है। फेसबुक व्हट्सएप्प दोस्ती बढ़ाएंगे दावा झूठा है नफरत बढ़ाई है इक दीवार रिश्तों में खड़ी की है कोई उसका चाहने वाला कोई इसका चाहने वाला दो चोरों ने राजनीति में क्या आग लगाई है। आपसी कोई मतभेद नहीं है दिखाई देता बस छेद नहीं है राजनेता मिल बैठेंगे अवसर मिलते ही हम लड़ते रहेंगे मिलने का कोई अनुछेद नहीं है। लगता हैं हम गुलाम हैं आज़ाद नहीं हैं ख्यालात नहीं कोई जज़्बात नहीं हैं जिनको मसीहा बना लिया सभी ने वास्तव में उनकी कोई औकात नहीं है नेताओं की कोई धर्म जात नहीं है ये बदल हैं जिनकी होती बरसात नहीं है। 
 

                           समीक्षा की बात : - 

काश जितना समय इस सोशल मीडिया पर बर्बाद किया कोई सार्थक कार्य किया होता तो बहुत अच्छा हो सकता था। मैंने इस से पीछा छुड़ाने का संकल्प लिया है आपको क्या लगता है क्या सही क्या ग़लत आपकी मर्ज़ी है।

 
 
 
 
WhatsApp privacy backlash: Facebook angers users by harvesting their data |  Facebook | The Guardian

जून 28, 2021

खोखले आदर्श झूठी संवेदनाएं ( आधुनिक समाज ) डॉ लोक सेतिया

  खोखले आदर्श झूठी संवेदनाएं ( आधुनिक समाज ) डॉ लोक सेतिया

आंसू बहाना रो देना वास्तव में कायरता नहीं होता है मगर तब जब हमारी भावनाएं सच्ची हों जो पल भर को नहीं हमेशा स्वभाव में नज़र आएं। बार बार देखते हैं टीवी शो में किसी की दुःख भरी घटना सबकी पलकें भिगो देती है तथाकथित नाम वाले लोग मंच पर टिशू पेपर से अपने आंसू पौंछते हैं लगता है सारे जहां का दर्द हमारे सीने में है। मगर ऐसा वास्तविक जीवन में होता नहीं है हम वही दर्शक बेहद निष्ठुर बन जाते है अपने करीब कुछ भी घटता देखते हुए। और टीवी पर किसी को झट से लाख रूपये का चैक देने वाले किसी गरीब को मांगने पर भीख भी नहीं देते है। जनाब आर पी महृषि जी कहते हैं " ये हादिसा भी हुआ इक फाकाकश के साथ , लताड़ उसको मिली भीख मांगने के लिए। अजीब बात है असली भिखारी नहीं मिलते नकली भिखारी हर तरफ दिखाई देते हैं कौन किस किस बात का चंदा मांगता है और चंदे से क्या शान से रहता है कोई हिसाब नहीं है। भिखारी हैं जो नौकरी काम करने का वेतन सुविधाएं पाने के बाद रिश्वत और बेईमानी करते हैं देश समाज अपने कर्तव्य के साथ। लेकिन धर्म का चोला पहन मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाकर भगवान तक को अपने पाप का भागीदार बनाते हैं अमर अकबर ऍंथोनी के अमिताभ बच्चन की तरह लूट चोरी का आधा दान पेटी में डालकर खुद को मसीहा समझते हैं। 
 
दावे करते हैं सत्ताधारी राजनेता जनता का कल्याण और गरीबी मिटाने को लेकर जबकि आज़ादी के 74 साल होने को हैं और आधी आबादी भूखी है अधिकांश को बुनियादी सुविधाएं नहीं हासिल हैं। कारण ये नहीं कि देश के पास संसाधन नहीं हैं बल्कि वास्तविक कारण ये है कि कुछ लोगों को अधिक पाने की हसरतें खत्म ही नहीं होती है शासक वर्ग रईस लोग धनवान कारोबारी उद्योगपति फिल्म टीवी वाले टीवी चैनल अख़बार से समाज सेवा और धर्म की दुकान चलाने वाले महल बनाने और देश विदेश जाकर अपना डंका पीटने पर पैसा बर्बाद करते हैं। इक पागलपन है नाम शोहरत और किसी तरह इतिहास में ख़ास होने को दर्ज होने को। सरकार आलीशान भवन सभागार और ऊंची मूर्तियां जाने क्या क्या आडंबर करती है फिर भी सड़क पर सोशल मीडिया पर इश्तिहार छपवाने पर बेतहाशा धन खर्च किया जाता है खुद के गुणगान पर। असल में अच्छे कार्य करते तो इनकी ज़रूरत नहीं पड़ती वास्तव में शोहरत पाने को इन बातों की कोशिश करना खुद किसी अपराध से कम नहीं है। 
 
लोग समझते हैं अमुक नेताओं ने अधिकारी कलाकार खिलाडी धनवान लोगों ने देश समाज को दिया है जबकि सच इस के विपरीत है उन्होंने जनता से पाया है और केवल दिखाने को नाम भर को वापस जनता को देकर उपकार एहसान करने की बात कहकर अपराध किया है। आपको बड़ी बड़ी कथाओं कहानियों से सबक सिखलाने वालों ने खुद कोई सबक सच्चाई ईमानदारी का सीखा नहीं है अन्यथा अपने लिए नहीं देश के नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने को काम करते। जिन को लाखों करोड़ के शाही विमान और शानदार घर दफ्तर की चाहत है उनको गरीब जनता की भूख रोटी शिक्षा स्वास्थ्य की चिंता करनी चाहिए थी। ये सब राजा बने बैठे हैं कोई राजा नहीं हैं सेवक हैं खुद कहते थे चौकीदार हैं फिर मालिक बन बैठे किस तरह। चलो आपको फिर इक बार असली और नकली धर्म दान की पहचान करवाते हैं। रहीम का नाम सुना तो होगा , कवि के साथ साथ खानदानी नवाब थे जिनको ज़रूरत होती उनकी सहायता किया करते थे। उनकी सभा में इक कवि गंगभाट देखा करते कि रहीम सहायता देते समय अपनी आंखों को झुकाए रहते थे। उनको समझ नहीं आता था नवाब जी ऐसा क्या सोचकर करते हैं। इक दिन उन्होंने दोहा पढ़कर ये बात रहीम से पूछ ली। 

सिखियो कहां नवाब-जू , ऐसी देनी दैन 

ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें , त्यों त्यों नीचे नैन। 

रहीम ने उनके सवाल का जवाब अपना दोहा पढ़कर दिया। 

देनहार कोऊ और है , देत रहत दिन रैन 

लोग भरम मो पै करें , या ते नीचे नैन।

 

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जून 24, 2021

ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड चर्चा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड चर्चा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आपने मंच पर नाटक में जैसा देखा होगा बस ठीक उसी तरह कहीं आसमान या जाने कोई और लोक है वहां सभी धर्म वाले भगवान मिलकर चर्चा कर रहे हैं। एक ही अभिनेता अपना किरदार बदल कभी कुछ कभी कुछ बन जाता है दर्शक समझते हैं कब नायक किस किरदार को निभा रहा है। दुनिया के मंच पर हम सभी भी ज़िंदगी और जीने का अभिनय ही करते हैं शायद खुद अपने किरदार को कभी नहीं समझते कोशिश करते रहते हैं हर किसी को समझने की। समझदारी कहते हैं अपने पागलपन को। समझ नहीं आया तो चलो दर्शक की तरह मंच पर जारी चर्चा विचार विमर्श को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इक धर्म का रूप धारण कर भगवान कह रहा है मैं एक हूं मेरे रंग मेरे चेहरे मेरे तौर तरीके अनेक हैं आज मुझे अपने हर अवतार को धारण कर चर्चा में सभी तरह के ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड बन कर सभी को लेकर बातचीत करनी है। पलक झपकते ही रूप बदल जाता है दूसरे धर्म वाला भगवान बन कहता है माफ़ करना बीच में टोकना पड़ा है पहले इस युग कलयुग की बात करनी है क्या कलयुग में कोई भगवान होता है कौन अवतार लेता है किस रूप में समझना कठिन है कितने भगवान बन बैठे हैं लेकिन किसी भी भगवान के मानने वालों को मिलता कुछ भी नहीं कोई भी तथाकथित भगवान भक्तों की झोली भरता नहीं है सबकी झोली खाली है भरी हुई झोली वाले अपने भगवान के दर पर आते हैं मगर जाते हैं लौट कर खाली झोली हाथ जोड़े निराश हमेशा। 
 
अचानक तीसरे धर्म वाले भगवान दिखाई देते हैं कहते हैं कलयुग में मसीहा पय्यम्बर नहीं जन्म लेता कभी भी। शैतान को भगवान ने ये वरदान दिया हुआ है कि लोग दुनिया कलयुग में उसको ही अपना विधाता भाग्यविधाता समझ उसका गुणगान करेंगे। भगवान बेबस होकर ये तमाशा देखते रहते हैं लोग सब जानकर देख कर समझ कर भी शैतान की अनुचित अनैतिक बातों को भी सही मानकर उसकी जयजयकार करते हैं। जिस जिस को मसीहा भगवान पय्यम्बर समझते हैं वही उनको ठगता है लूटता है धोखा देता है तब भी उसी की वंदना करते हैं। रोज़ टीवी चैनल वाले इस समय की माहमारी का कारण वायरस के नये नये अवतार की बात करते हैं भला कीटाणु विषाणु के भी कभी अवतार होते हैं मगर देखो हर कोई भगवान से बढ़कर कोरोना के नाम की माला जपता है। जिसकी माला जपते हैं उस से ही बचना भी चाहते हैं। फ़िल्मी लगता है ख़लनायक को खुश करने को उसकी महिमा का गुणगान करते हैं। 
 
किसी अभिनेता को सदी का महानायक नाम दिया है किसी को धन दौलत का अंबार लगाने पर उसकी बढ़ाई करते हैं टीवी अख़बार वाले खुद को सबसे महान सच्चा बताकर उल्लू बनाते हैं। ये सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं मिलकर बांटकर खाते मौज मनाते हैं झूठ का दरबार लगाकर सच के पैरोकार कहलाते हैं। मापदंड इनके सुविधा से बदल जाते हैं जिसको गुंडा बदमाश कहते हैं उसी की हाज़िरी लगाते हैं उसके पांव दबाते हैं। भोगी लोभी योग सिखाते हैं खूब धन कमाते हैं जनता को रोगमुक्त होने के उपाय समझते मगर खुद दवा की दुकान चलाते हैं। समझ नहीं आता क्या किसको समझाते हैं खुद को सच्चा और बाकी सभी को झूठा बताते हैं इस तरह खोटा सिक्का अपना दुनिया भर में चलाते हैं। ऐसे लोग भिखारी से जाने कैसे शासक बन जाते हैं देश को विकास और भले वक़्त की बातों से बहलाते हैं मगर वास्तव में सत्यानाश विनाश और बर्बादी लेकर आते हैं। कलयुग में हंस दाना दुनका चुगता है कौवे मोती खाते हैं। जनता की झौपड़ी भी नहीं रहती और सरकार जनाब आलिशान घर महल दफ्तर बनवाते हैं। मंच पर कोई नहीं है नेपथ्य से आवाज़ आने लगी है भगवान को गहरी नींद आ गई है उसको नहीं जगाते लोरी गाकर सुलाते हैं। आखिर में इक फ़िल्मी भजन से कथा का अंत कर विराम देते हैं और घर पर रहो सुरक्षित रहो दो गज़ की दूरी मास्क है ज़रूरी का संदेश सुनते हैं खामोश होकर नाटक के दर्शक अपने स्मार्ट फोन पर समय बिताते हैं। 
 

 

जून 14, 2021

ज़माने को बदलना चाहते ( अनसुलझी उलझन ) डॉ लोक सेतिया

 ज़माने को बदलना चाहते ( अनसुलझी उलझन ) डॉ लोक सेतिया 

मुमकिन है कोई अपना गांव शहर देश बदल किसी और जगह रहने लगे। मगर नामुमकिन है इस दुनिया ज़माने को बदलना सुबह शाम रात दिन बदलने से धरती आकाश नहीं बदलते हैं आपके चाहने से हालात नहीं बदलते हैं रिश्ते बनते बिगड़ते हैं दिल के जज़्बात नहीं बदलते हैं। इतिहास बदल जाते हैं नाम बदल जाते हैं नानक कबीर और सुकरात नहीं बदलते हैं। आदमी को अच्छा कुछ भी नहीं लगता सब कुछ बदलना चाहता है अपने आप को छोड़कर समस्या बाकी लोग सब दुनिया नहीं है आपका सोचने समझने का तरीका है जो आपको सबको उस तरह बनाना है जैसा आपको पसंद है। क्या क्या बदलोगे माता पिता भाई बहन दोस्त रिश्तेदार पति पत्नी पड़ोसी जान पहचान वाले गली मुहल्ले वाले कोई भी आपको मंज़ूर नहीं जो भी जैसा है और जब नहीं बदलते लोग आपकी ज़रूरत और चाहत से तब आप दुःखी परेशान चिंतित हो जाते हैं क्योंकि सभी अपनी नज़र से सबको देखते परखते हैं औरों के नज़रिये को कभी नहीं समझते हैं। हमारी उलझन हमारी खुद की मानसिकता है सिमित सोच है और हम समझते हैं जो हम जानते हैं सोचते हैं बस इक वही सही है संपूर्ण है। मगर हम सभी आधे अधूरे हैं बाकी सभी मिलते हैं तभी हमारी दुनिया पूर्ण होती है। अपने अपने खोखलेपन से घबराते हैं और भीतर से कमज़ोर बाहर से शक्तिशाली बनकर इतराते हैं। जीवन भर हम खुद से ही लड़ते लड़ते जीतने की उम्मीद में हारते जाते हैं हासिल कुछ नहीं होता है खुद को खो कर बाद में पछताते हैं। हम जागते हुए भी गहरी नींद में हैं खुद सोते हुए दुनिया भर को जगाते हैं। सबको जैसा है कोई स्वीकार करो बिना बदले अपनों को दिल से प्यार करो खत्म हर बहस हर तकरार करो। जीवन भर मत यही मेरे यार करो। 
 


 

जून 12, 2021

पशुओं से प्यार इंसान से तकरार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  पशुओं से प्यार इंसान से तकरार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  न उनकी दोस्ती अच्छी न उनसे दुश्मनी अच्छी। जाने क्या सोचकर मनोविज्ञानिक उन पर शोध कर बैठे अब पछताते हैं क्या जुर्म बेलज्ज़त कर बैठे। चर्चा कर उनके आचार व्यवहार को समझ कर नतीजा निकला उनको खुद अपना इंसान होना अजीब लगता है। बाहर से इंसान लगते हैं अंदर जानवर नहीं शैतान और हैवान रहता है उनको खबर नहीं होती कब उनके भीतर कौन सा जानवर सामने निकलने को बेताब रहता है। कुत्ता बिल्ली चूहा सभी के गुण शामिल हैं लोमड़ी और गिरगिट उनके लिए उस्ताद हैं जबकि शेर होने की उनकी हसरत है गधों से उनका लगाव सबसे बढ़कर है तभी गधे को अपना पूर्वज समझने में उनको संकोच नहीं है। मांसाहारी हैं जानवर को उनकी पसंद का खाना खिलाते हैं खुद उनको ज़िंदा इंसान का लहू पीकर उसकी बोटी बोटी से हड्डियां तक चबाना बड़ा ही मज़ेदार लगता है। इंसान इंसानियत जैसे शब्द उनको ज़रा भी पसंद नहीं हैं खुद अपने आप को जब कभी आईने के सामने खड़ा कर देखते हैं उनको दर्पण में किसी आदमखोर जानवर की छवि नज़र आती है। पशुओं को पालना और अपने इशारों पर नचाना उनको खेल लगता है जिस खेल को खेलकर उनको अपार सुःख की अनुभूति होती है। उनको लगता है शहर गांव में बड़े बड़े मकानों में पशुओं को रहना चाहिए नर्म बिस्तर और गर्मी में ढंडी हवा और सर्दी में हीटर लगे कमरे उनके लिए होने ज़रूरी हैं इंसान को फुटपाथ भी नहीं मिलना चाहिए जंगल जाकर बसना चाहिए। 
 
उनको नहीं मालूम उनके अंदर का इंसान कब मरा पशुओं से प्यार होने से पहले या पशुओं से प्यार करते करते इंसान और इंसानियत को खुद क़त्ल किया उन्होंने। पर अब उनको इंसान देखना अच्छा नहीं लगता है जानवर उनको अपने लगते हैं इंसान किसी और दुनिया के वासी लगते हैं। हर जानवर पशु पक्षी को जैसा चाहे शिक्षित कर उनसे मनचाहा काम करवाना आता है इंसान को लाख कोशिश कर भी उस तरह का नहीं बना पाए जैसा उनको पसंद है। इंसान सवाल करते हैं तकरार करते हैं और उनको तकरार करने वाले बड़े खराब लगते हैं। ये उन्होंने पत्नियों से हुनर सीखा है अपने पतियों को अपना गुलाम बनाकर रखना और उन पर हुक्म चलाकर उनसे हर बात मनवाना मगर कभी न कभी ये पति नाम वाले भी इनकार कर देते हैं लेकिन पशु कभी ऐसा कर ज़िंदा नहीं रहते हैं उनको बीमार पागल घोषित कर मार कर उनका उपयोग कितनी तरह किया जाता है। इंसान की कीमत जीते जी भी कुछ भी नहीं होती और मौत के बाद उसको कोई नहीं चाहता है जबकि जानवर मौत के बाद भी हज़ार काम आते हैं। 
 
आधुनिक होना रईस धनवान और बहुत ख़ास होना सभी चाहते हैं और सब हासिल होने के बाद बस यही महत्वपूर्ण होता है इंसान और इंसानियत से रिश्ते छोड़ पशुओं जानवरों से संबंध बनाना। पुराने समय में कुत्ते घर के बाहर चौखट दरवाज़े पर बैठे होते थे और महमान पड़ोसी जानकर अजनबी लोग घर की बैठक में शोभा बढ़ाते अच्छे लगते थे। इधर मामला उल्टा हो गया है कुत्तों से गले लगते हैं गोदी में बिठाकर चूमते दुलारते हैं इंसान को दूर भगाते हैं धुधकारते हैं झूठी शान बघारते हैं। सुख सुविधा लोभ लालच ने आदमी को इंसान से खूंखार जानवर बना दिया है आजकल बड़े बड़े शहर महानगर में अमीरों की बस्ती में ऐसे लोग अपने जैसे भाई बंधु जानवर पशु पंछी को पालते हैं उनका भरोसा आदमी पर नहीं खुद से बढ़कर पालतू जानवर पर बचा है। यही उनको अपने लगते हैं। जिनको उनसे संबंध रखना हो उन्हें इंसान नहीं जानवर बनना पड़ता है आपको अपने जैसा बनाना उनका मकसद है।
 
 
 Can we live without love? - Quora
 

जून 11, 2021

मिट्टी जैसी ज़िंदगी ( ज़ुबां से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया

    मिट्टी जैसी ज़िंदगी ( ज़ुबां से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया 

ये आम होने का एहसास मेरा अकेले का नहीं बल्कि अधिकांश दुनिया भर के लोगों का है जिनकी कोई अलग पहचान नहीं होती है। शायद हम भी ख़ास हैं या ख़ास बन सकते थे मगर हमने कोशिश ही नहीं की आम से ख़ास बनने या होने की। हम मिट्टी के लोग मिट्टी से बनते हैं मिट्टी में मिल जाना है जान कर समझ कर खुद को हर किसी के पांव की धूल होने को स्वीकार कर लेते हैं कि यही नसीब है नियति है। सभी को आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जब जिसको जितनी ज़रूरत होती है। हम जैसे आम लोगों से सभी मिट्टी के खिलौने की तरह मन बहलाने को खेलते हैं और खेल खेल में तोड़ देते हैं मिट्टी का खिलौना टूटने का किसी को ज़रा भी अफ़सोस होता नहीं है। जिनको मिट्टी को आग में तपाकर पकाना आता है वो कुम्हार घड़े सुराही बनानकर मिट्टी को मनचाही कीमत में बेचते हैं भट्ठे वाले ईंट बनाकर खूब कमाते हैं मिट्टी का उपयोग सभी करते हैं मिट्टी से दामन सभी बचाते हैं। ज़िंदगी की चादर सभी मैली नज़र नहीं आने देना चाहते हैं कितने उपाय करते हैं अपने लिबास को साफ़ चमकदार और बेदाग़ बनाये रखने को। जिनके नाम की शोहरत के ढोल नगाड़े बजते हैं उनकी सारी ज़िंदगी अपनी चमक बरकरार रखने और छींटों से कीचड़ से सुरक्षित रहने में कट जाती है। कच्ची मिट्टी के घड़े से नदिया पार पिया से मिलने जाना हर किसी को मुहब्बत इबादत करना नहीं आता है। 
 
मिट्टी को छोड़ लोहा पीतल चांदी सोना सभी की कीमत होती है , सबसे महंगे दाम पत्थर बिकते हैं कभी रास्ते पर पांव की ठोकर खाने वाला पत्थर भी मूर्ति बनकर भगवान कहलाता है लोग सर झुकाते हैं आदमी भी मिट्टी का स्वभाव छोड़ जब कठोर पत्थर बन जाता है तभी हर कोई उसको पहचानता है उसका अस्तित्व समझता है। अन्यथा मिट्टी रेत बनकर उड़ती कभी कीचड़ बनकर पड़ी रहती है अनचाही चीज़ की तरह। घर में बहुत सामान ऐसा होता है जो हमेशा से रहता है उसकी ज़रूरत पड़ती है इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद कहां रख छोड़ा कोई नहीं ध्यान रखता। फिर ज़रूरत पड़ती है तो इधर उधर यहीं कहीं मिल जाती है वस्तु कोई उसको संभालता नहीं कोई चुरा कर क्या करेगा कोई ध्यान नहीं देता भले उसके बगैर कोई कितना महत्वपूर्ण कार्य होना संभव नहीं हो। जाने कितने लोग दुनिया में इसी तरह के हैं जिनको रोज़ सभी उपयोग करते हैं उनकी जब भी ज़रूरत पड़ती है मगर उनका महत्व कोई नहीं समझता क्योंकि वो सस्ते हैं बहुतायत में मिलते हैं। 
 
घर महल ऊंची अटालिकाएं बनाने वाले मिट्टी के बिछौने पर रहते सोते जागते मिट्टी होकर मिट जाते हैं। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना परिंदों की तरह अपना घौंसला अपनी नगरी बनाई बसाई छोड़ जाते है किसी और आने वाले की खातिर तिनकों को बिना अपने निशां छोड़े ही। मगर ख़ास बड़े लोग वास्तव में कोई नवनिर्माण करते नहीं है किसी पर मकान ज़मीन या इमारत पर अपना नाम लिखवा समझते हैं हम अमर हो जाएंगे जबकि उन्होंने खुद दिया कुछ भी नहीं छीना हासिल किया या अधिकार जमाया होता है। यही विडंबना है यहां हर कतरा खुद को दरिया समझता है और समंदर होना चाहता है जबकि समंदर या दरिया का अस्तित्व खुद कतरों से बना है। इक पागलपन की अंधी दौड़ है जिस में तमाम लोग अपनी वास्तविक पहचान सामान्य होने को छिपाकर ख़ास होने की बनावटी पहचान ढूंढते मिट्टी से पत्थर बन जाते हैं। पेड़ पौधे पशु पंछी जानवर सबकी पहचान बचाये रखने की बात करने वाले इंसान आदमी की वास्तविक पहचान को समाप्त होने से बचाना नहीं चाहता बल्कि उसको मिटाता जा रहा है। विकास कह रहे हैं विनाश को खुद बुलाते हैं। मुझे सभी ने बहुत समझाया मगर मुझे आम से ख़ास होना नहीं आया मुझे मिट्टी बनकर रहना पसंद है पत्थरों की नगरी में पत्थर दिल होना नहीं चाहा कभी। अब उड़ने की बेला है चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। 
 
शायद बड़ी देर बाद समझ आया है कि हम जैसे आम लोगों ने खुद ही अपने चारों तरफ इक जाल बुना हुआ है। समाज के सारे नियम कायदे हमारे लिए हैं ख़ास बड़े लोग अपनी मर्ज़ी ज़रूरत और साहूलियत को देख कर नियम अच्छे बुरे की परिभाषा बदल लेते हैं उनका किया सितम भी एहसान कहलाता है। अपने मतलब की खातिर खराब से खराब आचरण भी करते उनको रत्ती भर अफ़सोस नहीं होता है। झूठ चालाकी जालसाज़ी या छल कपट सब इस्तेमाल कर उनको सफलता पानी होती है। शासक अधिकारी धनवान या धर्मगुरु जैसे ओहदे को पाकर उनको मनमानी की छूट ही नहीं मिलती बल्कि उनका यशोगान किया जाता है करवाया जाता है करना पड़ता है निचली पायदान पर खड़े शोषित वर्ग को किसी तरह ज़िंदा रहने उनके अन्याय अत्याचार से बचने के लिए।