जून 14, 2021

ज़माने को बदलना चाहते ( अनसुलझी उलझन ) डॉ लोक सेतिया

 ज़माने को बदलना चाहते ( अनसुलझी उलझन ) डॉ लोक सेतिया 

मुमकिन है कोई अपना गांव शहर देश बदल किसी और जगह रहने लगे। मगर नामुमकिन है इस दुनिया ज़माने को बदलना सुबह शाम रात दिन बदलने से धरती आकाश नहीं बदलते हैं आपके चाहने से हालात नहीं बदलते हैं रिश्ते बनते बिगड़ते हैं दिल के जज़्बात नहीं बदलते हैं। इतिहास बदल जाते हैं नाम बदल जाते हैं नानक कबीर और सुकरात नहीं बदलते हैं। आदमी को अच्छा कुछ भी नहीं लगता सब कुछ बदलना चाहता है अपने आप को छोड़कर समस्या बाकी लोग सब दुनिया नहीं है आपका सोचने समझने का तरीका है जो आपको सबको उस तरह बनाना है जैसा आपको पसंद है। क्या क्या बदलोगे माता पिता भाई बहन दोस्त रिश्तेदार पति पत्नी पड़ोसी जान पहचान वाले गली मुहल्ले वाले कोई भी आपको मंज़ूर नहीं जो भी जैसा है और जब नहीं बदलते लोग आपकी ज़रूरत और चाहत से तब आप दुःखी परेशान चिंतित हो जाते हैं क्योंकि सभी अपनी नज़र से सबको देखते परखते हैं औरों के नज़रिये को कभी नहीं समझते हैं। हमारी उलझन हमारी खुद की मानसिकता है सिमित सोच है और हम समझते हैं जो हम जानते हैं सोचते हैं बस इक वही सही है संपूर्ण है। मगर हम सभी आधे अधूरे हैं बाकी सभी मिलते हैं तभी हमारी दुनिया पूर्ण होती है। अपने अपने खोखलेपन से घबराते हैं और भीतर से कमज़ोर बाहर से शक्तिशाली बनकर इतराते हैं। जीवन भर हम खुद से ही लड़ते लड़ते जीतने की उम्मीद में हारते जाते हैं हासिल कुछ नहीं होता है खुद को खो कर बाद में पछताते हैं। हम जागते हुए भी गहरी नींद में हैं खुद सोते हुए दुनिया भर को जगाते हैं। सबको जैसा है कोई स्वीकार करो बिना बदले अपनों को दिल से प्यार करो खत्म हर बहस हर तकरार करो। जीवन भर मत यही मेरे यार करो। 
 


 

जून 12, 2021

पशुओं से प्यार इंसान से तकरार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  पशुओं से प्यार इंसान से तकरार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  न उनकी दोस्ती अच्छी न उनसे दुश्मनी अच्छी। जाने क्या सोचकर मनोविज्ञानिक उन पर शोध कर बैठे अब पछताते हैं क्या जुर्म बेलज्ज़त कर बैठे। चर्चा कर उनके आचार व्यवहार को समझ कर नतीजा निकला उनको खुद अपना इंसान होना अजीब लगता है। बाहर से इंसान लगते हैं अंदर जानवर नहीं शैतान और हैवान रहता है उनको खबर नहीं होती कब उनके भीतर कौन सा जानवर सामने निकलने को बेताब रहता है। कुत्ता बिल्ली चूहा सभी के गुण शामिल हैं लोमड़ी और गिरगिट उनके लिए उस्ताद हैं जबकि शेर होने की उनकी हसरत है गधों से उनका लगाव सबसे बढ़कर है तभी गधे को अपना पूर्वज समझने में उनको संकोच नहीं है। मांसाहारी हैं जानवर को उनकी पसंद का खाना खिलाते हैं खुद उनको ज़िंदा इंसान का लहू पीकर उसकी बोटी बोटी से हड्डियां तक चबाना बड़ा ही मज़ेदार लगता है। इंसान इंसानियत जैसे शब्द उनको ज़रा भी पसंद नहीं हैं खुद अपने आप को जब कभी आईने के सामने खड़ा कर देखते हैं उनको दर्पण में किसी आदमखोर जानवर की छवि नज़र आती है। पशुओं को पालना और अपने इशारों पर नचाना उनको खेल लगता है जिस खेल को खेलकर उनको अपार सुःख की अनुभूति होती है। उनको लगता है शहर गांव में बड़े बड़े मकानों में पशुओं को रहना चाहिए नर्म बिस्तर और गर्मी में ढंडी हवा और सर्दी में हीटर लगे कमरे उनके लिए होने ज़रूरी हैं इंसान को फुटपाथ भी नहीं मिलना चाहिए जंगल जाकर बसना चाहिए। 
 
उनको नहीं मालूम उनके अंदर का इंसान कब मरा पशुओं से प्यार होने से पहले या पशुओं से प्यार करते करते इंसान और इंसानियत को खुद क़त्ल किया उन्होंने। पर अब उनको इंसान देखना अच्छा नहीं लगता है जानवर उनको अपने लगते हैं इंसान किसी और दुनिया के वासी लगते हैं। हर जानवर पशु पक्षी को जैसा चाहे शिक्षित कर उनसे मनचाहा काम करवाना आता है इंसान को लाख कोशिश कर भी उस तरह का नहीं बना पाए जैसा उनको पसंद है। इंसान सवाल करते हैं तकरार करते हैं और उनको तकरार करने वाले बड़े खराब लगते हैं। ये उन्होंने पत्नियों से हुनर सीखा है अपने पतियों को अपना गुलाम बनाकर रखना और उन पर हुक्म चलाकर उनसे हर बात मनवाना मगर कभी न कभी ये पति नाम वाले भी इनकार कर देते हैं लेकिन पशु कभी ऐसा कर ज़िंदा नहीं रहते हैं उनको बीमार पागल घोषित कर मार कर उनका उपयोग कितनी तरह किया जाता है। इंसान की कीमत जीते जी भी कुछ भी नहीं होती और मौत के बाद उसको कोई नहीं चाहता है जबकि जानवर मौत के बाद भी हज़ार काम आते हैं। 
 
आधुनिक होना रईस धनवान और बहुत ख़ास होना सभी चाहते हैं और सब हासिल होने के बाद बस यही महत्वपूर्ण होता है इंसान और इंसानियत से रिश्ते छोड़ पशुओं जानवरों से संबंध बनाना। पुराने समय में कुत्ते घर के बाहर चौखट दरवाज़े पर बैठे होते थे और महमान पड़ोसी जानकर अजनबी लोग घर की बैठक में शोभा बढ़ाते अच्छे लगते थे। इधर मामला उल्टा हो गया है कुत्तों से गले लगते हैं गोदी में बिठाकर चूमते दुलारते हैं इंसान को दूर भगाते हैं धुधकारते हैं झूठी शान बघारते हैं। सुख सुविधा लोभ लालच ने आदमी को इंसान से खूंखार जानवर बना दिया है आजकल बड़े बड़े शहर महानगर में अमीरों की बस्ती में ऐसे लोग अपने जैसे भाई बंधु जानवर पशु पंछी को पालते हैं उनका भरोसा आदमी पर नहीं खुद से बढ़कर पालतू जानवर पर बचा है। यही उनको अपने लगते हैं। जिनको उनसे संबंध रखना हो उन्हें इंसान नहीं जानवर बनना पड़ता है आपको अपने जैसा बनाना उनका मकसद है।
 
 
 Can we live without love? - Quora
 

जून 11, 2021

मिट्टी जैसी ज़िंदगी ( ज़ुबां से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया

    मिट्टी जैसी ज़िंदगी ( ज़ुबां से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया 

ये आम होने का एहसास मेरा अकेले का नहीं बल्कि अधिकांश दुनिया भर के लोगों का है जिनकी कोई अलग पहचान नहीं होती है। शायद हम भी ख़ास हैं या ख़ास बन सकते थे मगर हमने कोशिश ही नहीं की आम से ख़ास बनने या होने की। हम मिट्टी के लोग मिट्टी से बनते हैं मिट्टी में मिल जाना है जान कर समझ कर खुद को हर किसी के पांव की धूल होने को स्वीकार कर लेते हैं कि यही नसीब है नियति है। सभी को आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जब जिसको जितनी ज़रूरत होती है। हम जैसे आम लोगों से सभी मिट्टी के खिलौने की तरह मन बहलाने को खेलते हैं और खेल खेल में तोड़ देते हैं मिट्टी का खिलौना टूटने का किसी को ज़रा भी अफ़सोस होता नहीं है। जिनको मिट्टी को आग में तपाकर पकाना आता है वो कुम्हार घड़े सुराही बनानकर मिट्टी को मनचाही कीमत में बेचते हैं भट्ठे वाले ईंट बनाकर खूब कमाते हैं मिट्टी का उपयोग सभी करते हैं मिट्टी से दामन सभी बचाते हैं। ज़िंदगी की चादर सभी मैली नज़र नहीं आने देना चाहते हैं कितने उपाय करते हैं अपने लिबास को साफ़ चमकदार और बेदाग़ बनाये रखने को। जिनके नाम की शोहरत के ढोल नगाड़े बजते हैं उनकी सारी ज़िंदगी अपनी चमक बरकरार रखने और छींटों से कीचड़ से सुरक्षित रहने में कट जाती है। कच्ची मिट्टी के घड़े से नदिया पार पिया से मिलने जाना हर किसी को मुहब्बत इबादत करना नहीं आता है। 
 
मिट्टी को छोड़ लोहा पीतल चांदी सोना सभी की कीमत होती है , सबसे महंगे दाम पत्थर बिकते हैं कभी रास्ते पर पांव की ठोकर खाने वाला पत्थर भी मूर्ति बनकर भगवान कहलाता है लोग सर झुकाते हैं आदमी भी मिट्टी का स्वभाव छोड़ जब कठोर पत्थर बन जाता है तभी हर कोई उसको पहचानता है उसका अस्तित्व समझता है। अन्यथा मिट्टी रेत बनकर उड़ती कभी कीचड़ बनकर पड़ी रहती है अनचाही चीज़ की तरह। घर में बहुत सामान ऐसा होता है जो हमेशा से रहता है उसकी ज़रूरत पड़ती है इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद कहां रख छोड़ा कोई नहीं ध्यान रखता। फिर ज़रूरत पड़ती है तो इधर उधर यहीं कहीं मिल जाती है वस्तु कोई उसको संभालता नहीं कोई चुरा कर क्या करेगा कोई ध्यान नहीं देता भले उसके बगैर कोई कितना महत्वपूर्ण कार्य होना संभव नहीं हो। जाने कितने लोग दुनिया में इसी तरह के हैं जिनको रोज़ सभी उपयोग करते हैं उनकी जब भी ज़रूरत पड़ती है मगर उनका महत्व कोई नहीं समझता क्योंकि वो सस्ते हैं बहुतायत में मिलते हैं। 
 
घर महल ऊंची अटालिकाएं बनाने वाले मिट्टी के बिछौने पर रहते सोते जागते मिट्टी होकर मिट जाते हैं। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना परिंदों की तरह अपना घौंसला अपनी नगरी बनाई बसाई छोड़ जाते है किसी और आने वाले की खातिर तिनकों को बिना अपने निशां छोड़े ही। मगर ख़ास बड़े लोग वास्तव में कोई नवनिर्माण करते नहीं है किसी पर मकान ज़मीन या इमारत पर अपना नाम लिखवा समझते हैं हम अमर हो जाएंगे जबकि उन्होंने खुद दिया कुछ भी नहीं छीना हासिल किया या अधिकार जमाया होता है। यही विडंबना है यहां हर कतरा खुद को दरिया समझता है और समंदर होना चाहता है जबकि समंदर या दरिया का अस्तित्व खुद कतरों से बना है। इक पागलपन की अंधी दौड़ है जिस में तमाम लोग अपनी वास्तविक पहचान सामान्य होने को छिपाकर ख़ास होने की बनावटी पहचान ढूंढते मिट्टी से पत्थर बन जाते हैं। पेड़ पौधे पशु पंछी जानवर सबकी पहचान बचाये रखने की बात करने वाले इंसान आदमी की वास्तविक पहचान को समाप्त होने से बचाना नहीं चाहता बल्कि उसको मिटाता जा रहा है। विकास कह रहे हैं विनाश को खुद बुलाते हैं। मुझे सभी ने बहुत समझाया मगर मुझे आम से ख़ास होना नहीं आया मुझे मिट्टी बनकर रहना पसंद है पत्थरों की नगरी में पत्थर दिल होना नहीं चाहा कभी। अब उड़ने की बेला है चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। 
 
शायद बड़ी देर बाद समझ आया है कि हम जैसे आम लोगों ने खुद ही अपने चारों तरफ इक जाल बुना हुआ है। समाज के सारे नियम कायदे हमारे लिए हैं ख़ास बड़े लोग अपनी मर्ज़ी ज़रूरत और साहूलियत को देख कर नियम अच्छे बुरे की परिभाषा बदल लेते हैं उनका किया सितम भी एहसान कहलाता है। अपने मतलब की खातिर खराब से खराब आचरण भी करते उनको रत्ती भर अफ़सोस नहीं होता है। झूठ चालाकी जालसाज़ी या छल कपट सब इस्तेमाल कर उनको सफलता पानी होती है। शासक अधिकारी धनवान या धर्मगुरु जैसे ओहदे को पाकर उनको मनमानी की छूट ही नहीं मिलती बल्कि उनका यशोगान किया जाता है करवाया जाता है करना पड़ता है निचली पायदान पर खड़े शोषित वर्ग को किसी तरह ज़िंदा रहने उनके अन्याय अत्याचार से बचने के लिए।
 

 
 

जून 05, 2021

साहित्य का बाज़ार बनाये लोग ( सिर्फ सच ) डॉ लोक सेतिया

   साहित्य का बाज़ार बनाये लोग ( सिर्फ सच ) डॉ लोक सेतिया 

कोई बीस साल पहले की बात है मैंने " लेखक का दर्द " शीर्षक से रचना लिखी थी और तमाम जगह भेजी थी। बस इक जगह छपी थी बाकी सभी ने रद्दी की टोकरी में फैंक दी थी छपना मेरा मकसद था भी नहीं आईना दिखलाने वालों को सच का आईना दिखाना था। ताकि सच ज़िंदा रहे जैसे स्लोगन की बड़ी बड़ी बातें करने वाले झूठ पर सच का लेबल लगाकर ऊंचे दाम बेच मालामाल होते हैं। इक अख़बार ने मेरी रचना को पुर्ज़े-पुर्ज़े कर फाड़कर वापस भेजा था तब मैंने उनको लिखा था जब किसी के यहां कोई मर जाता है तब उधर से फाड़कर चिट्ठी भेजी जाती है अपने सूचना भेजी आपके दफ्तर में लगता है ज़मीर नाम का कोई असमय मर गया है। संवेदना जताना ज़रूरी है उसके बाद मैंने ऐसे लोगों को लेकर बहुत लिखा है जो औरों को तस्वीर दिखलाते हैं अपने खुद को नहीं देखते हैं। इक ग़ज़ल इस पर बड़ी पुरानी बहुत बार छपी है पेश है। 
    
इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 
तमाम लोग साहित्य को मुनाफे का कारोबार समझ इसका बाज़ार लगाकर कारोबार करते हैं मगर समझते हैं हम साहित्य की सेवा उसको बढ़ावा दे रहे हैं जबकि अख़बार पत्रिका में छपने वाली रचनाओं के लेखक को कुछ भी नहीं देते हैं। बहुत लोग भेजने का वादा करते हैं भेजते नहीं हैं इन सभी ने समझा है लेखक बंधक की तरह है ख़ामोशी से अपना धर्म निभाना उसकी मज़बूरी है। इस पर कुछ लिखेगा तो छापेगा कौन मतलब पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा कोई नहीं लेता। इक बात को उन्होंने हथियार बना लिया है। कोई भी धंधा घाटे में कब तक चल सकता है शुरुआत में लिखने वालों से सहयोग की विनती करना अनुचित नहीं मगर पचास साल तक नियमित अख़बार पत्रिका निकालना उस से तमाम तरह से नाम शोहरत पद ईनाम पुरुस्कार पाने के बाद खुद को अगली कतार में बैठ महानता का चोला पहन कर भी लिखने वालों का शोषण करते रहना किसी गुनाह से कम नहीं है। 
 
   कोई नेता अपने अनुचित कार्य को गलत नहीं समझता मज़बूरी नाम देता है अधिकारी और काला बाज़ारी भी धंधे में करना पड़ता है दुहाई देते हैं मिलवट से लेकर अपना सामान बेचने को इश्तिहार में झूठ बताने वाले सभी पैसे की खातिर ईमान बेचते हैं। ठीक इसी तरह साहित्य से कमाई कर घर दफ्तर शानो शौकत और सुख सुविधा हासिल करने वाले लोगों के पास लेखक को महनत का उचित मोल देना फज़ूल लगता है। उनका स्टाफ़ वेतन पाता है कागज़ की कीमत चुकानी पड़ती है छपाई करने वाले को भी पैसा देना होता है बिजली अदि सभी खर्चे भरते हैं क्योंकि उनको भुगतान नहीं किया तो दुकान बंद हो जाएगी। मगर लिखने वाले विवश हैं हाथ जोड़ उपकार समझते हैं छापने पर उनको रोटी की ज़रूरत नहीं होती है , शायद पब्लिशर समझते हैं लिखने वालों को खाली पेट रख कर दर्द की अनुभूति करवा वे साहित्य पर एहसान करते हैं क्योंकि बदहाली में लिखने वाला अच्छा लिख सकता है। 
 
बिल्कुल सरकार की तरह जनता की हालत खराब से और खराब होती जाती है और खाना- ख़राब ने गुलिस्तां किया बर्बाद सामने है। उनकी हर चाहत देशसेवा है ज़रूरी है आम नागरिक का ज़िंदा रहना जुर्म नहीं मज़बूरी है खासो-आम की बढ़ती जाती दूरी है। सच कहना मुसीबत को घर बुलाना है मगर मेरे लिए सच को सच कहना ज़रूरी है लिखना मेरा कारोबार नहीं है ज़रूरत है चुप रहना नहीं सीखा मज़बूरी है। साहित्य की बात करने वालों को सच में मिलावट कर बाज़ार में बेच अपने स्वार्थ पूरे नहीं करने चाहिएं सच की खातिर ईमानदार अधिकारी अपनी जान जोखिम में डाल शासक को जानकारी देते हैं और देश का पीएमओ उसकी शिकायत की जानकारी बेईमान भ्र्ष्ट लोगों को भेजते हैं सत्येंदर दुबे क़त्ल कर दिए जाते हैं। आप सच बोलने की कीमत नहीं चुकाते घबराते हैं। टीवी चैनल अख़बार पत्रिका वालों से बस इक बात कहनी है। 
 

                 बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,

                 सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते।

जून 04, 2021

इम्युनिटी बढ़ाने से निराशा भगाने तक ( मानसिक दिवालियापन ) डॉ लोक सेतिया

    इम्युनिटी बढ़ाने से निराशा भगाने तक ( मानसिक दिवालियापन ) 

                                        डॉ लोक सेतिया  

इंतज़ार करें आपको ये सब पाने का तरीका भी बताना हैं वो भी बिना कोई सामान बेचे कोई पैसा कोई कीमत कोई लागत खर्च किये। पहले सोचना ज़रूरी है ये क्या हो रहा है हर कोई खुद को खुदा से बढ़कर सब करने समझने वाला बताता है। जाने कितनी दवाएं कितनी चीज़ें हमेशा कितने अन्य कार्यों में उपयोगी बताई जाती थीं बिकती खरीदी जाती थीं किसी ज़रूरत मकसद की खातिर। अचानक कोरोना के आने के बाद समझाया जाने लगा कि उनसे इम्युनिटी बढ़ती है और कोरोना से बचने को अपनी इम्युनिटी बढ़ाना सबसे ज़रूरी है। लगता है पैसे ने सभी को पागलपन की सीमा तक खुदगर्ज़ बना दिया है तभी इस तरह अपना सामान बेचने को निराधार दावे किये जाने लगे हैं। सभी आपको इक डर दिखलाकर बचाने को उपाय बता रहे हैं जबकि कोई नहीं जानता वास्तव में उस से कोई लाभ होगा या नहीं और सिर्फ किसी की तिजोरी भरनी है। जहां तमाम लोगों ने ईश्वर तक को बाज़ार में बेचा है भोले भाले लोगों को डर और लालच के जाल में उलझाकर वहां ये होना अचरज की बात नहीं है। क्या हम ठगों की नगरी नहीं ऐसे देश में रहते हैं जहां हर कोई दूसरे को ठगने के ढंग तलाश कर रहा है और ऐसे में खुद भी ठगी करते करते किसी ठग का शिकार बन जाता है। हमने घटिया फ़िल्मी पटकथा में देखा था नकली डॉक्टर मरते हुए रोगी को नाच गाना दिखलाकर तालियां बटोरते हैं। क्या गंभीर जानलेवा रोग का उपचार करते समय ऐसा करना और उसका वीडियो बनाकर वॉयरल करना सही मानसिकता है या फिर इक दिखावे का पागलपन है। 
 
लेकिन कमाल की बात है यहां देश के नेताओं अधिकारियों सभी विभाग वालों की कब से आदत सी बन गई है अपने वास्तविक कर्तव्य अपने कार्य को छोड़ तमाम अन्य कार्यों में संलगन होकर मौज मस्ती को अपना मनोरंजन का माध्यम बनाकर लोगों का ध्यान अपनी विफलताओं से हटाना। कोई अधिकारी जनसमस्याओं को छोड़कर सांस्कृतिक आयोजन या मुख्य अतिथि बन कर भाषण देता है कोई नेता किसी जाति समुदाय की सभाओं में शामिल होकर समाज की एकता से खिलवाड़ करता है। पुलिस विभाग अपराध पर अंकुश लगाने की बात छोड़कर नृत्य संगीत का कार्यक्रम आयोजित करता है। ऐसा तब उचित होता अगर उन्होंने जनता की समस्याओं का निदान कर दिया होता। खेद की बात है तमाम बड़े राजनेता शोहरत पाने की होड़ में कुछ सार्थक बदलाव करने की जगह यही करते नज़र आते हैं। उस से भी बड़ा अनुचित कार्य इन सभी कार्यों पर जनता का धन खर्च करना किसी गुनाह से कम नहीं है। 
 
अधिक विवरण की ज़रूरत नहीं है समझने को इतना बहुत है। मगर आपको इम्युनिटी बढ़ाने और निराशा को छोड़ आशावादी दृष्टिकोण अपनाने को बेहद साधारण आम तरीका बताना है। सबसे पहले आपको नफ़रत करना किसी से ईर्ष्या जलन रखना और तथाकथित आगे बढ़ने ऊपर पहुंचने की अंधी दौड़ को छोड़ सादगी से जीवन जीना सीखना होगा। खुद को बड़ा किसी को छोटा बनाने की कोशिश आपको सही मायने में नीचे ले जाती है। पहाड़ पर खड़े होकर खुद को ऊंचा समझना सही नहीं है ऐसे में आपका कद बौना होता है। पैसा दौलत पद नाम शोहरत अगर अच्छे कार्यों से मिलती है अपनी काबलियत से तभी वास्तविक है अन्यथा अनुचित ढंग छल कपट से अर्जित नाम काले धंधे रिश्वत की कमाई लूट की आमदनी आपसे आपका व्यक्तत्व छीन लेती है और आप इंसान नहीं मशीन की तरह बेजान बन जाते हैं जो खराब होते ही कबाड़ की तरह शहर घर से बाहर फैंकी जाती है। केवल अपने लिए सब कुछ की चाहत इंसान को हैवानियत की तरफ लेकर जाती है। आदमी वही है जो सभी की भलाई की सोच रखकर समाज की खातिर देश की खातिर योगदान देना जानता हो। झूठ से कभी आपका कल्याण नहीं हो सकता है झूठ आपको भीतर से खोखला कर देता है गेंहूं को घुन की तरह मिटा देता है। सच की ईमानदारी की कठिन डगर ही आपको साहस देती है और आपके अंदर की शक्ति आपको हर अन्याय अत्याचार से टकराने लड़ने की इच्छाशक्ति की तरह समस्याओं से निपटने का हौंसला देती है। ऐसा व्यक्ति घबराता नहीं हालात से लड़ता है जीत जाता है। मुमकिन है ऐसा भरोसा करने वाला हर रोग हर दशा में आशा का दामन पकड़ शान से जीता ही नहीं मरता भी उसी शान से है। मौत से डरकर जीना ज़िंदगी नहीं है।  हम किसी पर भी भरोसा नहीं करते खुद भी भरोसे के काबिल नहीं बन सकते हैं जिस ढंग से हमने जीना शुरू किया है डर और अविश्वास को बढ़ावा देकर। सरकार वयवस्था संस्थाओं पर क्या अब भगवान पर भी भरोसा नहीं करते हैं। अपने आत्मविश्वास से बढ़कर कोई इम्युनिटी कोई सुरक्षा होती नहीं है और आत्मविश्वास सच्चाई भलाई ईमानदारी की राह चलकर मिलता है। आडंबर झूठ छल कपट या दिखावे की महानता से कदापि नहीं।

जून 01, 2021

ज़िंदगी का अफ़साना ( जीने का फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

   ज़िंदगी का अफ़साना ( जीने का फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

ज़िंदगी इसी को कहते हैं कभी ख़ुशी कभी दर्द कभी जीत कभी हार कभी बहार कभी पतझड़ कभी भीड़ अपनों की दुनिया भर का साथ कभी एकाकीपन सूनापन वीरानगी का मज़र। धूप भी छांव भी आंधी तूफ़ान बारिश और इक डर बिजली गिरने का सब ख़ाक हो जाने का। ज़िंदगी सालों की बड़ी छोटी संख्या नहीं होती है ज़िंदगी नाम है अंधेरी तूफानी रात में मझधार में डगमगाती नैया को किसी खिवैया के बगैर हौंसलों से उस किनारे लगाने अपनी मंज़िल को तलाश करने का। मंज़िल कभी किसी को नहीं मिलती है आखिरी मंज़िल वही है बस जीने का मतलब है चलना चलते जाना रुकना नहीं थक कर ठहरना नहीं। ज़िंदगी खेल है जंग भी इम्तिहान भी कभी मुश्किल है कभी आसान भी। जब कभी आप घिर गये घने अंधेरों में और जिन पर आपको भरोसा था साथ देंगे हाथ पकड़ सहारा देंगें वही आपको निराश कर छोड़ गये मज़बूरी के बहाने बनाकर तब अकेले अपने दम पर कैसे आपने खुद को टूटने बिखरने नहीं दिया उसी को जीना कहते हैं। यही इम्तिहान है सभी मेले छूट जाने हर कारवां उजड़ जाने के बावजूद निराशा में आशाओं को मन में जगाये रखने और चलते रहने का। दोस्त अपने पराये रिश्ते सभी आपको मीठे कड़वे अनुभव देते हैं आपको सुःख दुःख दोनों को गले लगाना सीखना पड़ता है ज़िंदगी के सफर में धूप ज़्यादा छांव कम मिलती है पल पल बदलती है , एक समान रहना जीवन नहीं कहलाता है बहते पानी का दरिया है और बहाव के साथ नहीं लहरों से टकराकर धारा के विपरीत तैर कर अपनी मर्ज़ी की दिशा में बढ़ते जाना वास्तविक ढंग है अपनी शर्तों पर जीकर दिखाने का। 
 
मुश्किलों से घबराना हार मानकर बैठना ज़िंदगी नहीं होती है मुश्किलों उलझनों से लड़ते हुए आगे बढ़ते जाना जीना कहलाता है। कब आपका साथ किसी ने नहीं निभाया ये चिंता की बात नहीं है ऐसे में आपने कठिनाइयों का सामना किस साहस से किया ये महत्वपूर्ण है। ज़िंदगी लंगड़ी किसी और के सहारे बैसाखी से चलना नहीं है गिरकर भी खुद संभलना ज़िंदगी को सही अंजाम तक पहुंचाना है। दुनिया आपको क्या मानती है किस रूप में देखती है उसकी परवाह छोड़ खुद आपको कैसे रहना है अपना अस्तित्व बचाकर ये ज़रूरी है खुद अपनी पहचान हैं हम किसी और की बताई पहचान बनकर रह जाना खो जाना है। कभी कभी कोई आपका साथ निभाता है खराब हालात में बस वही अपना है बाकी सब दुनिया बेगानी है और अजनबी लोगों में खुद को बचाये रख कोई हमराही कोई हमदर्द कोई हमख़्याल मिलना नसीब की बात है। सबका नसीब शानदार नहीं होता है अपनी बदनसीबी बदहाली में भी संयम से काम लेकर कोशिश करते रहना पतझड़ में फूल खिलाना इसी को वास्तविक जीना कहते हैं। 
 
जब तक आप इसी बात को लेकर परेशान निराश होते रहेंगे कि सबने आपको क्या दिया क्या आपको उम्मीद थी तब तक आप जी रहे हैं लेकिन ज़िंदगी से भागकर उसका साक्षात्कार नहीं किया है। दुनिया से क्या मिला सोचना व्यर्थ की बात है आपने दुनिया को क्या दिया है ये सोचने की बात है खाली हाथ आना खाली हाथ जाना कोई मतलब नहीं हम रहे आकर चले गए। सार्थकता जीवन की इसी में हैं हम देश दुनिया को क्या योगदान देकर जाएंगे। हमने अपनी दुनिया को पहले से सुंदर खूबसूरत और बेहतर बनाया है या उसको और भी बर्बाद किया है ये तय करता है हमारा दुनिया में आना क्या था। हंसना रोना मौज मस्ती और अपने लिए सुख सुविधा आनंद और ऐशो-आराम से बसर करना ज़िंदगी नहीं सिर्फ जीने का अभिनय करना है ज़िंदगी है आस पास अंधेरे मिटाकर उजाले करने का काम। प्यार बांटना जीवन है मुहब्बत भाईचारा वास्तविक कल्याण की राह मानवता का धर्म है। झूठ अहंकार और हर किसी से टकराव की आदत ज़िंदगी को नर्क बनाना है  खुद जीते जी घुट घुट कर जीना खुदगर्ज़ी की सोच किसी को कुछ नहीं मिलता इन से। ज़िंदगी से नेमतें मिलीं हमने उनको समझा नहीं खुद शिकायत और जो नहीं हासिल उसकी चाहत करने में जितना भी पास उसको संवारा संजोया नहीं खो दिया सब कुछ। किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , हमको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। 
 

 

मई 31, 2021

कुछ ठग इक बाज़ार सब ख़रीदार ( हाल-ए- बीमार ) डॉ लोक सेतिया

कुछ ठग इक बाज़ार सब ख़रीदार ( हाल-ए- बीमार ) डॉ लोक सेतिया 

 जल्दबाज़ी मत करना पढ़ना सोचना समझ आये तो समझना नहीं समझ सको तो उनसे कभी मत उलझना। ठग लोगों की बिरादरी है कोई चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं हैं उनका अपना धंधा है गंदा है मगर मुनाफा चंगा है। किसी को धरती पर सिक्का जमाना था किसी को समंदर पर कब्ज़ा जमाना था। हाय अपना भी कोई ज़माना था दुनिया हमारी उनका नहीं कहीं भी आशियाना था। मांगने से चाहे छीनकर मिला बना लिया सभी ठगों ने कोई ठिकाना था धेला पैसा बनते बनते बन गया इक आना दो आना चार आना था अठन्नी की हसरत बाक़ी थी रूपये की हैसियत को पाना था। हमने उनको नहीं ठीक पहचाना था देशभक्ति समाजसेवा सब झूठा बहाना था उन्हें तो दुनिया को उल्टा सबक पढ़ाना था लिखना नहीं सीखा था जो लिखा उसको मिटाना था उल्लू बनाकर सबको दिखाना था। हमने भी क़व्वाली को सच कर दिखलाना था जो दवा के नाम पे ज़हर से उस चारागर को ढूंढ लाना था। अपने क़ातिल को मसीहा कहकर दिल को बहलाना था मगर उनकी नज़र थी उनका निशाना था। 
 
  हर साल की तरह उनको जश्न मनाना था मगर अफ़सोस मौसम क़ातिलाना नहीं हर तरफ छाया वीराना था नशा था चढ़ा बिना पिये हर कोई दीवाना था साकी नहीं था न कोई पैमाना था बसंती को गब्बर सिंह को मनाना था । नाचना नहीं चाहिए झूमना भी अच्छा नहीं लेकिन उनको दिल अपना लगाना था झूठी तक़रीर की आरज़ू थी सच को दफ़नाना था। सारी दुनिया पर उनको परचम लहराना था हम लोग अच्छे बुरे हैं सभी उनका कौमी तराना था गुलाम सबको मानसिक तौर से बनाकर आप से अच्छा कोई नहीं शोर मच गया शोर देखो आया कैसा ठग वाला दौर खुद हंसना सभी को रुलाना था महरमछ के आंसू बहाकर अंदर से मुस्कुराना था। 
 
चूहों की दौड़ है बिल्ली मौसी का नहीं चलता ज़ोर है भौंकने वालों की नगरी में गधा बना सिरमौर है। डरने की क्या बात है जब गब्बर सिंह कहता मन की बात है तेरा मेरा साथ रहे जनता सदा उदास रहे चोरों की बरात चली सच की अर्थी साथ चली। टीवी पर ठग छाए हैं बड़े दूर की कौड़ी लाये हैं शीशे के महल बनाए हैं पत्थर जमकर चलवाएं हैं ये आधुनिक काल की बातें हैं बिन पानी की बरसातें हैं शीशे ये इतने पक्के हैं कोई इनको तोड़ नहीं सकता हवा का रुख उनके इशारे पर कोई आंधी को मोड़ नहीं सकता। टीवी पर बस दो चेहरे हैं शतरंज में ये दो मोहरे हैं बाकी सब बेजान खड़े खड़े मरते हैं बस ज़हर पीकर आह नहीं भरते हैं सुभानअल्लाह माशाल्लाह कहकर बादशाह सलामत रहे कहते रहते हैं। मसीहा है वही अत्याचारी है जाने कैसी बिमारी है जो दुनिया में सबसे झूठा है लाख सच पर वही भारी है। हम राजा-जानी हैं अभिनेता राजकुमार का अपना अंदाज़ था उसने अपनी शर्तों पर अभिनय कर खुद को सबसे अलग और बड़ा माना था क्या ज़माना था। उधर मीनाकुमारी का मंदिर और आखिरी सांस गिनती मां थी इधर शराब शराबी मयखाना था और क्या अजब तराना था। 
 

 

मई 28, 2021

ओटन लगे कपास ( शराफ़त की पढ़ाई नया नियम ) डॉ लोक सेतिया

 ओटन लगे कपास ( शराफ़त की पढ़ाई नया नियम ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे मंज़ूर है संयम और शराफ़त से आचरण का नियम लागू होना लेकिन सबसे पहले उन पर यही सख़्ती से लागू किया जाये , जिनको खुद पर कोई नियम कानून कोई रुकावट कोई सीमा रेखा कोई मर्यादा का पालन करना अपने शासकीय अधिकार का हनन लगता है। सिर्फ सोशल मीडिया पर झूठ नफरत असभ्य भाषा बिना आधार किसी को बुरा भला कहना बंद करवाना लाज़मी नहीं सभ्य समाज में बड़े छोटे सभी को नैतिकता और सच्चाई का पास रखना ज़रूरी है। संक्षेप में मगर बिल्कुल साफ और तथ्यात्मक ढंग से विषय की बात करते हैं। सरकार कोई नेता जब कोई बात कोई वादा कोई आरोप किसी पर भाषण में खुली सभा में या फिर संसद विधानसभा में किसी अदालत में अपना पक्ष रखते हुए बोलकर लिख कर या किसी तरह से सामने लाता है तब उसकी कही गई समझाई गई हर बात को ऐसे नियम कानून की कसौटी पर खरा साबित होना ही चाहिए और ऐसा नहीं होने पर उस पर कठोर करवाई की जानी चाहिए। देश जनता समाज को झूठ से बहलाना झांसे में रख कर सही को गलत और गलत को सच समझाने का काम देशभक्ति नहीं अपराध है संविधान की भावना का अनादर है जो सत्ता पर बैठकर कभी नहीं किया जा सकता है। चुनाव में वादा किया जो वास्तव में सच नहीं साबित हुआ तब ये गुनाह माफ़ी लायक कदापि नहीं हो सकता है। ऐसे अपराध की सज़ा पांच साल बाद चुनाव में हार ही काफी नहीं बल्कि उनको इक पल भी शासन का अधिकार नहीं होना चाहिए। अपनी बात से पलटते ही उनका तख़्ता पलट किया जाना चाहिए। 
 
सरकारी आंकड़े झूठे हों तो सरकार को रहने का अधिकार किसलिए और क्यों। कोई टीवी पर जनता को अपने किसी ढंग से निरोग होने का इश्तिहार देकर नाम पैसा शोहरत कमाता है लेकिन वास्तव में लोग उनकी कही बात मानने के बावजूद निरोग होते नहीं रोग बढ़ते जाते हैं तब सिर्फ वही इक शख्स नहीं उसके झूठ को जारी करने वाले सभी सहयोगी सहभागी टीवी अख़बार या उनके गोरखधंधे से फायदा उठाने वाले मुजरिम हैं लुटेरे हैं उन पर सज़ा और जुर्माना लगा कर जिनकी जेब से पैसा गया उनकी भरपाई की जानी चाहिए। सोशल मीडिया पर या टीवी अख़बार पर ज़हर को अमृत बनाना अपने कारोबार के बढ़ाने की खातिर उचित कैसे हो सकता है। सरकारी दफ़्तर में या पुलिस थाने या अदालत में डराने धमकाने रुतबा बढ़ाने को बिना कारण लोगों को अशिष्ट भाषा अनुचित अचार व्यवहार से अपनी मनमानी करना रिश्वत लेकर घर भरना क्या इसको किसी व्यक्ति अधिकारी शासक का विशेषाधिकार माना जाना चाहिए। किसी भी बहाने कोई भी मकसद बतलाकर आपराधिक आचरण को सही नहीं साबित कर सकते हैं। 
 
व्हाट्सएप्प फेसबुक ट्विटर सोशल मीडिया पर गंदगी नहीं होना काफी नहीं है गंदगी कहीं भी नहीं रहनी चाहिए और शराफत सोशल मीडिया की नकली दुनिया से पहले हमारी वास्तविक दुनिया में होना अधिक ज़रूरी और महत्वपूर्ण है। वो कहानी याद है ना पापी को सज़ा देनी है मगर पहला पत्थर वो मारे जिसने खुद कोई पाप नहीं किया हो। कमाल का विधान है जिनके अपकर्मों की कोई गिनती नहीं कर सकता वो हमसे हिसाब मांगेगे अच्छे बुरे कर्म हर बोली बात हर लिखी बात को परखेंगे कसौटी पर। इंसाफ़ का तराज़ू पकड़ने वाले से कोई सवाल नहीं पूछेगा कि आपका ये तराज़ू सभी को बराबर समझता भी है या नहीं। लेकिन उनके बाट बदल जाते हैं लेने के अलग देने के अलग अलग हैं। मगर जिनका आगाज़ ही झूठा हो उसका अंजाम सच कैसे होगा आपको सोचने की नहीं समझने की ज़रूरत है। यहां नियम कायदे कानून बनते हैं कागज़ पर ज़मीन पर दिखाई नहीं देता कोई भी कायदा कानून , बाल मज़दूरी महिला सुरक्षा , शिक्षा और रोटी से लेकर जीने का बुनियादी अधिकार पहले से है लेकिन बंद कानूनी किताब में वास्तव में कहां है। इंसान तो क्या पशु पक्षी जानवर तक के लिए नियम कायदे कनून हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि गधों तक के लिए कानून बनाया हुआ है हर गधे से दिन में आठ घंटे काम लेना उसको दिन में चार बार भोजन पानी के लिए अवकाश मिलना उसके पांव पर रस्सी बांधने से पहले मुलायम कपड़ा बांधना कानूनी नियम है इतना ही नहीं उसको उमस भरे मौसम में काम नहीं करवाने की भी शर्त राखी हुई है। 
 
कितने कानून बनाकर रख छोड़े हैं उनका पालन कोई नहीं करवाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात सभी ईमानदारी से कर्तव्य निभाने निष्पक्षता की न्याय की व्यवस्था की शपथ उठाकर कुर्सी पर बैठते हैं लेकिन अपनी शपथ कोई भी निभाता नहीं याद तक नहीं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। जिस देश की संसद में बड़े बड़े गंभीर अपराध के आरोपी बैठकर कानून बनाते हैं कानून को समझते नहीं उसकी खिल्ली उड़ाते हैं उस देश में बदलने को कोई कानून कारगर नहीं साबित हो सकता कभी भी। आधुनिक व्यवस्था पर कुछ दोहे लिखे हैं आखिर में आपके लिए हाज़िर हैं। 
 
 

           देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे          - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

मई 26, 2021

बदनाम बहुत हैं गुमनाम नहीं हैं ( लज्ज़त ए शोहरत ) डॉ लोक सेतिया

बदनाम बहुत हैं गुमनाम नहीं हैं ( लज्ज़त ए शोहरत ) डॉ लोक सेतिया 

    कोठों की बदनामी धंधा चमकाती है गब्बर सिंह का नाम मीलों तक दहशत महसूस करवाता था इस पर डाकू को नाज़ था अफ़सोस हुआ जब तीन साथियों ने नाम मिट्टी में मिला दिया। काली दाढ़ी वाले बाबा जी की खिल्ली जम कर उड़ाई जा रही है उनके चेहरे पर शिकन नहीं है उनका निशाना धंधे पर है धंधे में मुनाफा बढ़ता है तो खुद मज़ाक बन जाना खराब बात नहीं है। सफ़ेद दाढ़ी वाले से उन्होंने सीखा है खबरों में रहना ज़रूरी है भले विषय का क ख ग नहीं आता हो चर्चा में भाग लेना बड़े काम आता है। झूठ पकड़ा जाता है तब भी झूठ पर घंटा भर वाद विवाद चलता रहता है जिस में असली विषय किसी को याद ही नहीं रहता। अपमानित महसूस करना कारोबारी लोगों के लिए या राजनेताओं के लिए महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। जिस देश में सबसे बड़ी अदालत अपने को अपमानित करने वाले पर एक रुपया जुर्माना ठोकती है उस देश समाज में अपमानित सम्मानित होने पर चिंता करना फज़ूल है। 
 
   चलो झूठे काल्पनिक किस्से कहानियां पढ़ना छोड़ विचार करते हैं वास्तविकता क्या है। जिस इतिहास पर आपको गर्व है उसमें कितनी मिलावट कितनी बनावट है सोचने लगोगे तो पागल हो जाओगे। जिसको मसीहा लिखा हुआ है समझने लगे तो क़ातिल पाओगे अभी भी नहीं सच को सच कहोगे तो झूठ बोल कर झूठ सुनकर झूठे लोग कहलाओगे वक़्त के बाद जागोगे क्या होगा बस पछताओगे। कथा कहानी कभी सच नहीं होती है लिखने वाली कलम तक रोती है। आखिर में सब अच्छा होता है दर्शक अकल का कच्चा होता है लेकिन सबक यही सीखा है हमने बाद में जो होगा देखा जाएगा जीवन भर सबको लूटा खसूटा हैं हमने। स्वर्ग और नर्क जन्नत दोजख़ कितने जाकर कब देखा है जिनके हाथ कटे होते हैं उनकी भी भाग्य रेखा है। महल खड़े किये महनतकश लोगों ने खून पसीना उनका बहा था पैसा था भूखे नंगे गरीब लोगों का शिलालेख पर बादशाह का उल्लेख लिखा था। ज़ुल्मों की थी जो कहानी किसने लिखी कैसी थी मुहब्बत की दास्तां पुरानी और हमने समझा नहीं न जाना वहशत को चाहत जब माना। मेरी इल्तिजा सुनते हो प्यार करना सच्चा मगर ताजमहल न बनवाना हाथ पकड़ना साथ निभाना रिश्तों को मत जंजीर बनाना। शहंशाहों के ताज से अच्छा होता प्यार का छोटा सा आशियाना बसाना। 
 
   खुद को जो कहते हैं सेवक शासक बनकर सितम हैं करते उनके लाल कालीन के नीचे जाने कितने लोग कुचले पड़े हैं मगर ये बेरहम शान से चलते। गरीबों का हक छीन कर सब अरमान शासकों के पलते। धर्म की उपदेश की बातें दुनिया को समझाते हैं सबने देखा उनको खुद पाप की राह बढ़ते जाते हैं। छल कपट से बना इमारत उसको मंदिर मस्जिद कहते हैं क्या ऐसे घरों में ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु रहते हैं। हमने सच को नहीं है जाना झूठा पढ़ते हैं अफसाना तोते की तरह शब्द रटते हैं भावार्थ समझा न माना। देने वाला कोई नहीं है दाता बना सबसे बड़ा भिखारी नैतिकता क्या होती है और क्या होती है ईमानदारी ये सब भाषण की बातें हैं करते उल्टी बातें सारी जिसको बताते है दुनियादारी। शोहरत की चाहत जो हैं करते मुजरिम हैं गुनहगार हैं सारे कैसा युग आजकल है आया सबको डूबकर लोग ढूंढते हैं किनारे। बदनाम होकर भी खुश हैं झूठे लोग नाम मिला पहचान मिली है। मुझे कहा था मेरे बेटे ने सच है क्या आपने ये बात पढ़ी है। 
 
   इधर कब से कुछ लोग परिवारवाद की राजनीति से खानदानी कारोबार से मालामाल होने वालों को देश समाज का लुटेरा बता रहे थे अच्छे अच्छों की हस्ती मिटाकर धूल में मिलाने की कसम खा रहे थे। उनका कोई घरबार नहीं सबको समझा रहे थे अपना खाली झोला भरते भरते खुद सब देश समाज के लिए है मीठी मीठी बातों से उल्लू बना रहे थे। रात को दिन दिन को रात बनाकर जादूगिरी दिखला रहे थे। सोशल मीडिया टीवी अखबार सभी को कठपुतली बनाकर नचवा रहे थे सब उनके गुण गाकर अपना धंधा उनके गोरखधंधे से हाथ मिलाकर बढ़ा रहे थे। ऑफ दि रिकॉर्ड यार लोग समझा रहे थे हम खुद अपना नया इतिहास बना रहे थे। कोई आगे न पीछे बाद में सब भूल जाएंगे बस इसलिए उल्टी गंगा बहा कर कीर्तिमान बना रहे थे। कोई वारिस नहीं मगर विरासत बढ़कर शोहरत की बुलंदी पाकर इतरा रहे थे। बनाना नहीं कुछ भी जो भी पुराना बनाया हुआ है उसको ढा रहे हैं। हम जहां पांव रखते हैं उस धरती को बंजर बना कर कांटों की हस्ती दिखला रहे हैं। हम इंसान नहीं मशीन हैं बुलडोज़र की तरह बड़ी ऊंची इमारतों को ख़ाक में मिला रहे हैं। लोग टीवी पर देखते हैं हम मुस्कुरा रहे हैं जबकि हम खलनायक की तरह मन ही मन ठहाका लगा रहे हैं। जनता को क्या क्या सिखला रहे हैं बेचते हैं ज़मीर तक और आत्मा तक बिकवा रहे हैं। शोहरत जुर्म भी होती है जब अच्छे कार्य से नहीं खराब आचरण से भी पाने की ललक होती है हम सच करके दिखला रहे हैं। मतलबपरस्ती को देशभक्ति समाजसेवा घोषित करा रहे हैं।

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मई 25, 2021

दीवानापन है या कुछ और ( ब-कलम-ख़ुद ) डॉ लोक सेतिया

   दीवानापन है या कुछ और ( ब-कलम-ख़ुद ) डॉ लोक सेतिया

किसी ने नहीं पूछा और कौन किसलिए पूछेगा मैं क्या हूं कौन हूं। सच्ची बात तो यही है अब दुनिया को किसी को समझने की चाहत क्या ज़रूरत नहीं फुर्सत भी नहीं। बस हर कोई खुद को लेकर परेशान है हैरान है अपने से अनजान है। सोचा कोई नहीं समझने वाला तो दिल से दिल की बात करते हैं फिर इक बार खुद से मुलाकात करते हैं। लिखना ज़रूरी है कभी दुनिया की भीड़ में गुम हो गए तो जैसे बच्चों की जेब में नाम पता लिख कर रखा होता है जिस किसी को मिले घर स्कूल पहुंचा सकता है। अक्सर लोग पूछते हैं आपका नाम क्या पहचान क्या है किसी दिन मुझे बताएंगे आपका वजूद क्या है। मंज़िल-ए - मकसूद क्या है। मुझे चाह थी ज़रूरत थी घड़ी दो घड़ी कोई प्यार की बात करता मुझसे भी। मगर दुनिया तिजारत करती है मुहब्बत बिकती है नीलाम होकर बदले में खोटे झूठ वाले सिक्कों के दाम पर सच का मोल यहां दो कौड़ी भी नहीं और सच्चाई का तलबगार मिलता ही नहीं। सच की बात करने वाले हैं दुनिया में सच से बचते हैं घबराते हैं झूठ से मिलते हैं हाथ मिलाते हैं गले लगाकर साथ निभाते हैं। रिश्तों दोस्ती दुनियादारी के नातों में तमाम लोग तराज़ू लिए खड़े मिले। मुझसे मेरी आज़ादी लेकर अपने पिंजरे में बंद कर मुझे अपना बनाकर रखना चाहते थे और मुझे सोने वाले पिंजरे भी कभी नहीं भाये। कीमत सस्ती महंगी की बात नहीं मुझे तो अपनी अनमोल चाहत को बिना किसी मोल बिकना पसंद था कोई चाहत का तलबग़ार मिलता जो कभी। 
 
बड़ी देर बाद समझे हैं किसी से मुहब्बत की चाहत करते करते खुद से कभी मुहब्बत ही नहीं की। मेरे भीतर अथाह सागर है प्यार का जिसको दुनिया ने कभी देखा समझा नहीं खुद अपने आप को प्यार करना ज़रूरी है बाहर किसी से कभी मांगने से नहीं मिलता है प्यार ज़माने में। सुनते थे कोई कस्तूरी मृग होता है जो दौड़ता रहता है कस्तूरी की सुगंध के पीछे जबकि वास्तव में कस्तूरी खुद उसके भीतर छुपी रहती है। मुझे अपने भीतर झांकना होगा खुद को तलाशना समझना होगा और खुद से दिल लगाना होगा। बेशक मुझे हंसना मुस्कुराना गुनगुनाना होगा ज़िंदगी को ज़िंदगी की तरह जीना होगा मौत आएगी जब ख़ुशी से गले लगाना होगा मौत से भी नाता निभाना होगा। ज़िंदगी को अलविदा कहना ज़रूरी है मगर ज़िंदा हैं तो खुलकर जीना भी ज़रूरी है। ज़िंदगी इक फ़लसफ़ा है घुट घुट कर जीना ज़िंदगी नहीं जीने की मज़बूरी है। 
 







मई 24, 2021

किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

  किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया 

 मुकद्दर ने किसी को तख़्तो-ताज़ बख़्श दिया कितने बंदर कलंदर बन बैठे सिकंदर सभी हैरान हैं गधे बड़े पहलवान हैं। जो नहीं जानते कुछ भी अनजान हैं मगर अब ऊंची जिनकी दुकान है फीके बेशक उनके पकवान हैं वही लोग लगते देश की शान हैं। यही नसीब की बात है उनकी सुबह है आपकी रात है सूखा मचाती ये बरसात है फालतू की उनकी नई बकवास है सभी कह रहे वाह वाह क्या बात है। समझ आएगी साफ साफ बताते हैं ये सब जो उल्लू बनाते हैं खूब खाते कमाते हैं झूठ फरेब छल कपट की सीढ़ी चढ़ते जाते हैं आपको हर बात समझाते हैं उनके शीशे के घर हैं मगर फिर भी सभी पर पत्थर चलाते हैं। आपको फ़िल्मी डायलॉग की तरह बोलकर ऊंची आवाज़ में सबसे बड़ा झूठ यही सच समझना आपको कहते हैं और आप मान भी जाते हैं। आओ आपको दो ऐसे लोगों से मिलवाते हैं जिनको समझ कर भी लोग समझ नहीं पाते हैं। 
 
कोई राजनेता है कोई अभिनेता है उसने किसी का कोई भला नहीं किया है सब खुद लिया है कुछ भी नहीं दिया है सब मानते हैं ये सबसे ख़राब है मगर जादू उसका चल रहा है भिखारी सभी हैं इक वही नवाब है। जिसने किया सबका ख़ानाख़राब है वही मांगता सबसे हिसाब किताब है ये खोटा सिक्का चल रहा है देश में ठग ऑफ हिन्दुस्तान हैं दाता के भेस में। नहीं कुछ भी उसने कभी भी पढ़ा है अनपढ़ है नासमझ है और नकचढ़ा है बिठाया था आंखों पर लो सर पर खड़ा है कहता है दुनिया में सबसे बड़ा है। खोटा सिक्का चलता है बस समझो खरा है। इक और से मिलवाना हैं ये सच है झूठा अफ़साना है उसने सबको योग से भोग तक महारोग से राजयोग तक जो नहीं सीखा समझाना है खुद पढ़ा नहीं आपको पढ़वाना है उसका खाना खज़ाना है कहता है सब कुछ लुटवाना है मगर हाथ किसी के कुछ नहीं आना है उसका हर जगह ठिकाना है। सभी जानते हैं इन दोनों को ये झूठे हैं धोखेबाज़ हैं सब जानते हैं मगर फिर भी सब जाल में उन्हीं के फंसे हैं खुश हैं ये जैसे भी हैं हमारे लिए बढ़िया हैं सोचते हैं। संक्षेप में इक नज़्म पुरानी दोहरा रहे हैं ये देश को सपनों से बहला रहे हैं जो इनकी पोटली में रखा नहीं है दिखला रहे बेचते हैं करोड़ों कमाकर दिखला रहे हैं। राजा नंगा कहानी को बदलकर उल्टी गंगा बहा रहे हैं। अंधे रास्ता दिखा रहे हैं गूंगे मधुर गीत सुना रहे हैं सभी बहरे ताली बजा रहे हैं। 
 
किसी ने जन्नत का ख़्वाब बेचा किसी ने सब का बनाकर नकाब बेचा उसने अपना चेहरा दुनिया भर को आईना कहकर जनाब बेचा। समंदर है दावा किया था जनता को सूखा तलाब बेचा क्या क्या खरीदा क्या क्या बनाया सवाब मिलता है बतलाकर अज़ाब बेचा। जाने किस शायर की लिखी ये नज़्म है क्या सोचकर लिखी मगर इक बाबा इक राजनेता ने उसको सच कर दिखाया है। काठ की तलवार बनाकर जंग लड़ता है जीत का परचम फहराया है। नज़्म पेश है वीडियो से पहले लिख देता हूं आभार सहित जिसकी रचना है गुमनाम अनाम का धन्यवाद। रावी से तीन नहरें निकलीं दो सूखी और इक कभी बही ही नहीं। जो बहती नहीं उस में तीन लोग नहाने को आये दो डूब गए इक मिलता ही नहीं। जो मिलता नहीं उसको तीन गांय मिलीं दो बच्चे देने के काबिल नहीं एक गर्भवती होना नहीं जानती जो गर्भवती नहीं उसने तीन बछड़ों को जन्म दिया। दो अपाहिज एक उठ भी नहीं सकता। जो उठता तक नहीं उसका मूल्य तीन रूपये दो खोटे और एक जो चलता ही नहीं जैसे पुराने हज़ार पांच सौ वाले नोट रद्दी की तरह आजकल। उस चलन से बाहर नहीं चलते रूपये की कीमत आंकने तीन सुनियार पारखी आये जिन में दो अंधे हैं और एक को कुछ भी दिखाई नहीं देता है। उस को तीन मुक्के मारे गए जिन में दो चूक गए और एक लगा ही नहीं। अध्याय का अंत वीडियो अभी पेश है। 
 

 

मई 23, 2021

जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 नहीं टीवी चैनल वाले नहीं देख सकते अपने पालनहार के मुखमंडल पर उदासी का भाव। जनता का क्या है रोना उसका नसीब है आपकी पलकों पर नमी नहीं अच्छी लगती है। दिन भर यही सबसे ज़रूरी खबर चलती रही। मान गए प्यार हो तो ऐसा ही हो अपने महबूब का खिलता चेहरा कभी मुरझाया नज़र नहीं आये सच टीवी एंकर को लग रहा था खबर पढ़ना छोड़ वो भी रो दे काश कि सामने बैठे होते हज़ूर तो अपने टिशू पेपर से उनकी पलकों को पौंछती। आंचल दुपट्टा रहा नहीं क्या करें साड़ी का पल्लू ही होता लेकिन फैशन जीन टॉप का ठहरा। जो हमने दास्तां जनता की सुनाई आप क्यों रोये तबाही तो वाराणसी की जनता पे आई आप क्यों रोये। ये गीत बजाना चाहिए था मगर हो नहीं पाया मगर जहांपनाह की उदासी की वजह कुछ लोगों की जान जाना नहीं हो सकता है। मामला गंभीर है मन की बात शायद अभी कुछ समझनी समझानी रह गई है। इस में कोई शक नहीं कि वास्तविक कीमती अश्क़ वही होते हैं जिनको कोई पलकों से ढलने नहीं देता चुपचाप पी जाते हैं बेबसी के आंसू लोग आह भी नहीं भरते। लेकिन कीमत समझी जाती है उन अश्क़ों की जो बहते ही नहीं किसी दामन को भिगोते भी हैं। टुकड़े हैं मेरे दिल के ए यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू। उनका हाल देख कर लोग ज़ार ज़ार रोने लगे , हमारा दर्दो ग़म है ये इसे क्यों आप सहते हैं फ़ना हो जाएगी सारी खुदाई आप क्यों रोये। सैलाब की तरह बहाकर ले गए सभी को इतने लोग तो समंदर में आये ताउते तूफ़ान में तबाह नहीं हुए जितना उनकी भीगी पलकों में डूब कर फ़नाह हो गए हैं। 
 
 आंसुओं की दास्तां लिखते लिखते कथाकार की कलम उदास हो जाती है। आशिक़ के अश्क़ों पर कितने बेमिसाल शेर हैं शायरी में अश्क़ का रुतबा बड़ा ऊंचा है मुस्कुराहट की तो कोई कीमत नहीं आंसुओं से हुई है हमारी क़द्र , उम्र भर काश हम यूं ही रोते रहें आज क्योंकि हुई है हमें ये खबर। बादलों की तरह हम तो बरसे बिना लौट जाने लगे थे मगर रो पड़े। आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े। कभी लिखा था हमने भी बस ज़रा सा मुस्कुराए तो ये आंसू आ गए वर्ना तुमसे तो कहना ये अफ़साना न था। ये राजनीति है जनाब यहां एक एक आंसू का हिसाब रखते हैं गिन गिन कर बदला लेते हैं। कोई कलाकार पेंटिग बना सकता है बादशाह के इंसाफ के तराज़ू के पलड़े पर कितनी लाशें एक पलड़े पर मगर झुका हुआ पलड़ा होता है जिस पलड़े पर किसी का इक आंसू गिर गया है। महिलाओं को अच्छी तरह मालूम है ये हथियार कभी नाकाम नहीं होता है उनका रोना किसी को जीवन भर रुला सकता है जब कोई तरकीब नहीं काम आती है आज़मा सकता है। आंसुओं पर दो कविताएं इक नज़्म पेशा हैं।

दो आंसू ( कविता ) 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू।  
 

मां के आंसू ( कविता ) 

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं। 
 
 
 
 

मई 21, 2021

व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया

   व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया 

 सदियों पुराना लंबा सफर है संदेश भिजवाने का मिलने का खुला पोस्टकार्ड मिलता था कभी बंद लिफ़ाफ़े को देख कर हाल समझ जाते थे। कितने फ़िल्मी गाने प्यारे प्यारे सुनाई देते थे चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए। जो दुनिया से रुख़सत हो जाते उनकी याद आती थी तब यही कहते थे उधर से कोई डाकिया चिट्ठी लेकर आता किसी तरह। अब मत पूछो संदेश भेजते हैं अपने दिल के जज़्बात बयां करते हैं हालात बतलाते हैं तो सोशल मीडिया पर कोई समझता ही नहीं। भीड़ है मगर सभी अकेले हैं जानते हैं मगर सभी अजनबी लगते हैं कभी कभी कोई पढ़ता है तो सच पढ़कर नाराज़ हो जाता है क्योंकि अजीब मौसम है व्हाट्सएप्प मेसेंजर का हर कोई अपनी कहता है और जवाब भी चाहता है जो उसको भला लगता हो वही लिख कर भेजे कोई।  ख़त दोस्ती और मुहब्बत को कायम रखते थे मगर ये नामुराद सोशल मीडिया वाले संदेश आपसी दूरी को और भी बढ़ा देते हैं चार कदम दूर बैठा भी दिल से इतना दूर हो जाता है कि सात समंदर पार की दूरी से भी अधिक फ़ासला लगता है। मुझे याद आया कॉलेज में रहते थे तब परिसर में छोटा सा डॉकघर हुआ करता था क्लॉस से हॉस्टल जाते बीच में रुकते दोपहर का भोजन करने से पहले कोई ख़त मिले यही हसरत होती थी प्यार की दोस्ती की अपनेपन की भूख पेट की भूख को भुला देती थी। कमरा नंबर बताते थे और डाकिया चिट्ठी पकड़ा देता था हज़ार युवक पढ़ते थे किसी का नाम ज़रूरी नहीं हुआ करता था। शायद ही किसी दिन मुझे निराशा होती थी जब कोई डॉक मेरे नाम की नहीं मिलती थी सभी दोस्त हैरान होते थे मुझे रोज़ कैसे चिट्ठियां मिलती हैं ये किसी ने नहीं समझा कि मैं हर दिन कितने अपनों को खत लिख कर भेजता था। उस ज़माने में कितने लोगों से कितने साल पास नहीं होकर भी रिश्तों में नज़दीकी बनाये रखी थी। वास्तव में मेरी ख़त लिखने की आदत ने ही मुझे लेखन की राह पर ला दिया है।
 
चिट्ठियां बड़ी संभाल कर रखते थे बंद बक्से में अलमारी में और कुछ बिस्तर पर सिरहाने तकिये के नीचे आधी रात को जागते फिर से पढ़ते थे। ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू कोरे कागज़ पे लिख दे सलाम बाबू। क्या ज़माना था स्याही की खुशबू की महक समाई होती थी लिखावट में जो पढ़ने वाले के भीतर समा जाती थी। बाज़ार से किताबों की दुकान से लेटर पैड और पैन चुनकर लाया करते थे। रंग बिरंगे पैड पर कलाकारी की हुई होती थी भेजने वाले की पहचान नज़र आती थी। कलम-दवात की स्याही से जेल पैन तक पहुंचते पहुंचते शब्द लिखावट साफ और गहराई बढ़ती गई मगर दिल को छूने वाले एहसास जज़्बात जाने कहां खो गए हैं। बात रूह तक नहीं पहुंच पाती आंखों से दिल में उतरती नहीं दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेते हैं हम आजकल। शायद अब कभी कोई इतिहास की धरोहर बनकर किताब में दर्ज किसी जाने माने नायक की लिखी चिट्ठियों को लोग याद ही नहीं करते। अमृता प्रीतम की जीवनी रसीदी टिकट जैसा अनुभव मिलता नहीं इधर शोहरत वाले अपनी आत्मकथा लिखते लिखवाते हैं मगर ज़िंदगी की वास्तविकता से कोसों दूर बनावट की बातें। अब  राजनेता की रेडियो पर कही तथाकथित मन की बात में मन की कोई बात होती ही नहीं अनबन की बात लगती है। 
 
फोन क्या आया सब बदलता गया और बदलते बदलते इतना बदला जो लोग खुद ही बदल गए। कभी फोन पर सभी से आपसी हाल चाल की बातें हुआ करती थीं। धीरे धीरे फोन का महत्व कम होता गया और औपचारिकता की बातें होने लगी। अब बस कुछ करीबी लोगों को छोड़ किसी का फोन आता है तो इक चिंता होती है क्यों आया है फिर भी सब ठीक हो तो सोचने लगते हैं कोई मतलब कोई ज़रूरत कुछ काम होगा और पूछने से बचते हैं बल्कि सोचने लगते हैं कोई बहाना बनाकर पीछा छुड़ाने को लेकर। रिश्तों की मधुरता जाने कब ख़त्म हो गई जब लोग स्वार्थी और खुदगर्ज़ बनते बनते आदमी से बेजान पत्थर बन गए हैं। अभी बीस साल पहले अख़बार पत्रिका में पाठकों की बात बड़ी महत्वपूर्ण समझी जाती थी संपादक पाठक को भगवान की तरह आदर देते थे आलोचना करने पर भी आभार जताया जाता था। विज्ञापन और पैसा टीआरपी जब से पाठक से बड़े लगने लगे टीवी अख़बार पत्रिका को प्रशंसा के पत्र ईमेल ही अच्छे लगने लगे हैं। डॉक से मिले खत रचनाएं धूल चाटती पड़ी होती हैं कहीं। वास्तव में ईमेल कभी चिट्ठियों की जगह नहीं ले सकते हैं। कारोबारी  बात सामान बेचने खरीदने या सरकारी सामाजिक संगठनों संस्थाओं की सूचनाओं का आदान प्रदान जानकारी टीवी अख़बार के खबर आदि से लेकर अपने आर्थिक उद्देश्य की ज़रूरत भर बन गए हैं पल भर बाद कूड़ेदान में मिलते हैं। 
 
यूं तो खतो -किताबत पर बहुत लिखा लिखने वालों ने। नसीम अंसारी कहते हैं " मैं रौशनी पे ज़िंदगी का नाम लिख के आ गया , उसे मिटा मिटा के ये सियाह रात थक गई।" लेकिन मैंने जब से चिट्ठी की जगह सभी को संदेश भेजने शुरू किये व्हाट्सएप्प के मायाजाल में उलझकर बड़े हैरतअंगेज़ अनुभव हुए हैं लोग सच से घबराकर बिना पढ़े समझे मुझे समझाने लगते थे व्यर्थ समय बर्बाद करते हैं किसी को सच्चाई से कोई मतलब नहीं रहा। लेकिन हद की भी हद नहीं होती जब लोग पढ़कर जवाब देने की जगह सवाल उठाते हैं लिखने का हासिल क्या है पूछते हैं। ऐसे में दुष्यन्त कुमार का शेर याद आना ज़रूरी है। कहते हैं दुष्यन्त कुमार " हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है।"






मई 18, 2021

पागलपन से मानसिक दिवालियापन तक ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) डॉ लोक सेतिया

 पागलपन से मानसिक दिवालियापन तक ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

 हम जिसको आधुनिक समाज का भविष्य कहते हैं वास्तव में समझदारी क्या नासमझी से भी अधिक इक पागलपन है जो विकास के नाम पर मानसिक दिवालियेपन तक पहुंच गया है। और ये बात किसी एक जगह नहीं सभी जगह दिखाई देती हैं लेकिन हम देखना चाहते नहीं हैं। जिसको जो चाहिए उसको अपनी ज़रूरत से बढ़कर कुछ नहीं लगता और उसकी ख़्वाहिश से बाकी लोगों देश समाज का कितना नुकसान हो सकता है ये कोई नहीं सोचता है। जैसे अभी इंटरनेट के 5 जी की बात हो रही है और जिनको हर चीज़ जल्दी और सबसे आसान चाहिए उनका तर्क है जिनको टॉवर से निकलती तरंगों से खतरा लगता है उन्हीं को साबित करना होगा कि ऐसा कैसे होगा। अर्थात आपको ज़हर बेचने वाला पहले ज़हर पीने की शर्त रखता है बाद में अगर ज़हर पीकर आपको कुछ हुआ तब वो क्षमा मांग कर हिसाब चुका देगा। अभी तक विकास ने यही दिया है हमने कुदरत से खिलवाड़ कर धरती पानी हवा पेड़ पक्षी सभी का हाल खराब कर दिया है। बंद कमरों में बैठ ज़मीनी हक़ीक़त से अनजान लोग खुद को समझदार मानकर अतार्किक निर्णय करते रहते हैं जिनसे इंसान और दुनिया को क्या हासिल होगा किस कीमत पर ये सवाल कोई नहीं करता है। इक दौड़ में शामिल हैं सभी कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता है और शासक लोग हाथी घोड़ों पर आम आदमी को नीचे कुचल कर आगे बढ़ते थे आजकल आधुनिक हवाई जहाज़ और मानवता को विनाश की तरफ धकेलती जंग की नीति अपनाकर हथियार और विनाशकारी बंब बनाने से लेकर चांद मंगल पर जाने की बात करते हैं। 
 
    आज़ादी के बाद राजनेताओं ने सत्ता पाकर जनकल्याण गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य और यहां तक कि सही मायने में आज़ाद होने का अर्थ निडरता से समान अधिकार पाकर जीना की ज़रूरी बात को दरकिनार कर शासकों की महत्वांकाक्षा उनकी मनमानी उनके विशेषाधिकार पर ध्यान दिया है। जिनको कलाकार कलमकार साहित्यकार कथाकार और आधुनिक संदर्भ में टीवी अख़बार सोशल मीडिया को सही मार्गदर्शन करना था खुद भटक गए अपने अपने स्वार्थ में अंधे होकर। ये कैसी आज़ादी कैसा विकास कैसा लोकराज है जिस में मुट्ठी भर राजनेता अधिकारी शासकीय कर्मचारी और उद्योगपति कारोबारी फलते फूलते रहे और सत्तर फीसदी जनता भूखी नंगी बेबस है। लेकिन सरकार अधिकारी नेता राजनैतिक दल बदलने से व्यवस्था बदली नहीं बल्कि हालात खराब से भयावह होते गए हैं। सत्ता में जिनको पागल कर दिया है उनको अपना अपराध मानवता के ख़िलाफ़ आचरण अनुचित कभी नहीं लगता है। जनता और नागरिक से कानून पालन की उम्मीद करने वाले खुद अपनी मर्ज़ी से कायदे कानून को बदलते ही नहीं बल्कि देश के संविधान की भावना की धज्जियां उड़ाते हैं निरंकुश होकर जनहित विरोधी व्यवस्था स्थापित करते हैं। 
 
 सवाल उठता है कि क्या वास्तव में हम देशवासी आमजन खामोश रहने को विवश हैं या फिर हम सिर्फ अपने पुराने इतिहास की वीरों की गाथाओं पर गर्व करते हैं मगर खुद कायरता का जीता जागता उद्धाहरण बन गए हैं जो मतलब के बगैर समाज देश की खातिर सामने खड़ा होने को तत्पर नहीं है। तालियां बजाने लोग तमाशाई होते हैं खेल के खिलाड़ी नहीं और जिनको कुछ करना होता है वो लोग जीत हार की नहीं सही और गलत की चिंता करते हैं। सौ साल तक आज़ादी की जंग लड़ने वालों को अंजाम की चिंता कभी नहीं थी उनको जीना नहीं था गुलामी की कैद में और गुलामी की जंज़ीरों से भारतमाता को मुक्त करवाने को हंसते हंसते सूली पर चढ़ गए थे। क्या हम उनके बलिदान और उनकी अपेक्षाओं का निरादर नहीं करते जब हम चाटुकारिता और व्यक्ति दल के लिए अपनी निष्ठा रखते देश और समाज को पीछे छोड़ देते हैं। 
 

    आखिर इस दर्द की दवा क्या है - समस्या को समझने के बाद निदान की बात। 

एक एक कर सभी की बात करते हैं और ये जो भी करना था मगर नहीं किया और जो नहीं करना चाहिए था वो करते रहे उस को ठीक कैसे कर सकते हैं उन पर अंकुश कैसे लगा सकते हैं। पहले सरकार नेताओं शासन चलाने वाले अधिकारी वर्ग की बात करते हैं। राजनेता चुनाव लड़ते समय वादे करते हैं आपकी समस्याओं का समाधान करने के मगर जब चुने गए तब अपनी कही बातों पर खरे साबित नहीं होने पर उन पर कोई दंडात्मक करवाई कोई नहीं कर सकता जबकि संविधान की ईमानदारी की शपथ लेते हैं जनता देश की सेवा करने की निभाते नहीं क्या लोकतंत्र में ये सबसे बड़ा अपराध नहीं है। चुनाव आयोग न्यायपालिका पुलिस अन्य संस्थाएं उन पर नियुक्त लोग भी वास्तविक कर्तव्य को निभाना छोड़ केवल औपचारिकताएं निभाते हैं। जब जिस किसी को किसी भी काम पर रखना होता है तब कार्य नहीं करने पर मिला वेतन सुविधाएं छीन कर उन को जुर्माना लगाने गलत किया उसका खमियाज़ा कोई नहीं भरे इसलिए  उन पर हर्ज़ाना भरने का नियम होता है। जब तक नेताओं अधिकारियों पुलिस सुरक्षा दलों पर उनकी नाकामी लापरवाही पर सज़ा देने का कानून सख़्ती से लागू नहीं किया जाता ये लोग जनसेवा देशसेवा के नाम पर मनमानी करते गुलछर्रे उड़ाते रहेंगे। 
 
कोई आपको योग से निरोग बनाने का उपाय बताकर खूब मालामाल होता है मगर आपको क्या वास्तव में जो दावा था हासिल हुआ और अगर नहीं तो उसकी ठगी कब तक होने दी जा सकती है। ये साबित करना उनका कर्तव्य है कि उनकी बात झूठ नहीं है जबकि ये सभी चालाकी नहीं चतुराई से जालसाज़ी करते हैं आपको इश्तिहार में 90 से 99 फीसदी का झांसा देकर। फायदा किसी को नहीं होता क्योंकि उनका एक फीसदी आंकड़ा बचाव की खातिर है। कोई आपको कीटनाशक मिली शहद कोई सब्ज़ी कोई खाद्य पदार्थ बेचता है पैसे की खातिर आपकी जान स्वास्थ्य से खिलवाड़ करता है। सरकार कानून सभी जानते हुए आंखें बंद रखते हैं कारोबार का मतलब चार गुणा मूल्य पर बेचना नहीं होता है एक के साथ एक मुफ्त  भी जुर्म होना चाहिए आपको लागत पर उचित ही नहीं तर्कसंगत मुनाफा अपनी आजीविका चलाने को लेने की अनुमति होनी चाहिए अन्यथा आप सौदागर नहीं लुटेरे हैं। कितनी एजेंसी आपको बीमा पॉलिसी खरीदने को लुभाती हैं मगर जब किसी को भुगतान करना पड़ता है तब ये ईमानदारी से अनुबंध नहीं निभाते हैं। टीवी चैनल अख़बार फिल्म वाले अगर रास्ता दिखलाना छोड़ पैसा बनाने को मार्ग से भटकाने का काम करते हैं तो ये भी साधुवेश में ठगना ही है। कहने का अभिप्राय इतना है कि जिसको जो करना चाहिए उसका वो नहीं करना गुनाह है और हर गुनहगार को सज़ा मिलनी चाहिए बल्कि जिनको अपराध नहीं होने देने थे उनका जुर्म और कड़ी सज़ा का हकदार है।

मई 17, 2021

हम शैतान के पुजारी हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          हम शैतान के पुजारी हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  शोध करने पर जो नतीजा निकला वो कुछ ऐसा ही है। वो जिसने दुनिया बनाई आदमी को बनाया आदमी ने उसको मार डाला और मारने को इक शैतान बना कर उसे भगवान नाम दे दिया। पढ़ते रहे समझाया जाता रहा उसकी खोज सत्य की खोज में कितने जिज्ञासु जंगलों पहाड़ों पर भटकते रहे। मिला नहीं कभी किसी को वास्तव में जाने क्या सोचकर उन्होंने पा लिया पा लिया का शोर मचा कर सोचा लोगों की झूठी उम्मीद को टूटने नहीं देना चाहिए ताकि शायद कभी किसी को मिल जाए तो ऐसा नहीं हो लोग भूल ही गए हों कोई विधाता भी था या हो सकता है। सदियों से कितने ही शैतान दुनिया पर अपना शासन चलाते रहे हैं और सभी उनकी पूजा गुणगान इबादत ईश्वर अल्लाह क्या क्या नाम दे कर करते रहे हैं। जो जन्म देता है माता पिता की तरह वो प्यार करता हैं खुद सब देता है बदले में मांगता नहीं कुछ भी मगर संतान उसी से शिकायत करती है नाराज़ रहती है पर डरती नहीं कभी अपने जन्मदाता से भयभीत होने की ज़रूरत होती नहीं है। बच्चा बढ़ा होकर शिक्षक से डरता है क्योंकि उसके हाथ में दंडित करने और उत्तीर्ण या अनुतीर्ण करने का अधिकार रहता है। ऐसे ही शिक्षक पढ़ाते हैं उनको भगवान से पहले नमस्कार करना चाहिए और शिक्षा देने को दान बतलाकर बदले में गुरुदक्षिणा में जितना देते हैं उस से बढ़कर मांग लेते हैं। माता पिता और भगवान भला अपनी संतान अपने बच्चों से ऐसा करते कारोबार करते क्या। 
 
कोई भी भगवान कहीं नहीं है अगर होता तो ये सब जो सामने होता दिखाई देता है चुपचाप देखता रहता कहीं ऊपर आसमान पर बैठा कदापि नहीं। अन्याय अत्याचार करने वालों ने नादान भोले अच्छे लोगों को अपने अधीन बनाने को उपरवाले की झूठी कथाएं मूर्तियां आकार देकर अपना उल्लू साधने की बात की है। अधिकांश से सब छीनकर अपना आधिपत्य जमा उसको भगवान विधाता भाग्य की मर्ज़ी बताया है। शैतान खुद को शैतान नहीं महान कहलवाना चाहता है ये खुद धर्म वाले पढ़कर सुनाते हैं हम असलियत को नहीं समझते और सर झुकाते हैं। जिसको लोग मसीहा समझते हैं चलो आज उसकी गाथा सुनाते हैं बीते ज़माने की नहीं जो आज है जिसे कल अपने देखा था पर पहचाना नहीं उस से मिलवाते हैं। हां वही जो महल दुमहले बनवाते हैं मौज मस्ती करते हैं झूमते हैं गुनगुनाते हैं सभी को भूखा रखते हैं खुद खीर हलवा पूरी खाकर भगवान होने का दम भरते हैं क्या देखने पर शैतान के बाप नज़र नहीं आते हैं। दुनिया भर पर शासन करने वाले आदमी को इंसान बनकर जीने नहीं देते बेबस लोगों पर ज़ोर आज़माते हैं ताकतवर के सामने वो भी सर झुकाते हैं। ये वो दुनिया है जहां इंसान नहीं रह सकते शैतान बनकर रह जाते हैं। शैतान की दुनिया का मंज़र अभी आपको दिखलाना है भगवान नहीं है इस बात को समझाना है। 
 
टीवी चैनल वाला मज़बूर होकर देश की वास्तविकता दिखा रहा है लोग कैसे बदहाली में बेमौत मर रहे हैं शासक चैन की बंसी बजा रहा है। हर शासक आपको झूठे आंकड़े दिखाकर बहला नहीं रहा भटका रहा है सबको असली चेहरा नज़र आ रहा है। जो लोगों को बचाने की बात कह रहा है उसको सब पता है सब जानकर अनजान बन दिखा रहा है। देश भर में अस्पतालों की बदहाली सामने खड़ी है अस्पताल स्कूल छोड़ शासक अपनी दुनिया सजा रहा है। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे गली गली हैं बस ज़िंदगी बचाने को स्वास्थ्य सेवा को सालों से शासक भुलाकर मौज मना रहा है। शैतान को बड़ा मज़ा आ रहा है खड़ा हुआ है जगह मुस्कुरा रहा है। सत्ता वालों को सरकार नेताओं अधिकारी वर्ग को पैसे नाम शोहरत के भूखे धनपशु लोगों को समझ नहीं आ रहा है कौन स्वर्ग सी दुनिया को अपनी खुदगर्ज़ी लालच हवस की खातिर नर्क से बदतर बना रहा है। पहचान लो जो भी आपको हर जगह नज़र आ रहा है सबसे बड़ा शैतान है खुद को मसीहा कहलवा रहा है भगवान के नाम पर क्या क्या कर रहा है इंसानियत को ख़त्म कर खुद पर इतरा रहा है।



 

 

 

 

 

 

 

 

मई 15, 2021

कुछ बज़ुर्गों की कही कुछ अपनी आपबीती ( इधर उधर की खरी खोटी ) डॉ लोक सेतिया

कुछ बज़ुर्गों की कही कुछ अपनी आपबीती ( इधर उधर की खरी खोटी ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

    कुछ भी नई बात नहीं है कितनी बार दोहराई गई बातें हैं। सबने अपने अपने ढंग से बताई समझी मैं उन्हीं बातों को अपने अलग अंदाज़ में पेश करने की कोशिश करूंगा। दादाजी कहते थे समझदार पत्नी कभी पति से डांट नहीं खाती है। कहानी बनाकर बातें समझाया करते थे इक आदमी को सदा उस अवसर की तलाश रहती थी जब पत्नी कोई भूल करे और वो उसको डांट लगाएं मगर ऐसा नहीं मिलता था मौका कभी। इक दिन सुबह सुबह तालाब से मछली पकड़ घर लाये और पत्नी को देकर बोले रात को ये ही खानी है मुझे और चले गए घर से देर शाम तक लौटे नहीं जानबूझ कर। रात होने लगी थी घर आकर बोले भूख लगी है खाना बन गया क्या पत्नी ने झट से मछली की भाजी और रोटी बनाकर सामने परोस दी। पति कहने लगे ये तो तरी वाली है मुझे सूखी भुनी हुई खानी थी पत्नी बोली अभी लाती हूं और लेकर सामने रख दी। पति ने कहा इतनी बड़ी मछली सारी बनानी थी कुछ बचाकर कच्ची रखनी थी पत्नी ने बताया थोड़ी रखी है बचाकर। समझदार पत्नी को डांटना नहीं पड़ता खुद सोच लेती है घर परिवार की ज़रूरत कब कैसे पूरी करनी है। क्या ये बात आपको पुरुषवादी सोच भर लगती है नहीं जनाब ये आप पर भी लागू होती है कुछ अपने आज के लिए कुछ किसी की सहायता के लिए कुछ कल  की भविष्य की चिंता कर बचाकर रखना चाहिए। सुई छोटी सी होती है सिलने का भी काम करती है जोड़कर रखती है और उसी से कोई उधेड़ने का भी काम ले सकता है। इक कहावत थी कि पुरुष कस्सी लेकर घर को ढाने का काम भी मुश्किल से कर सकता है और महिला चाहे तो सुई से सब बना बिगाड़ सकती है। 

चलो इक और नासमझी की बात समझने की कोशिश करते हैं। कोई पति पत्नी हमेशा एक दूसरे से खुश नहीं रहते हैं। कुछ साल बाद लगने लगता है शादी कर मुसीबत मोल ले ली अकेले अच्छे थे मगर बिना साथ चैन से नहीं रह पाते हैं। क्या सोचा था ये क्या निकले हैं लगता है काश जैसा चाहते साथी मिलता मगर जैसा सब चाहते हैं कोई हो नहीं सकता क्योंकि खुद भी कब तक किसी और की इच्छानुसार बन सकते हैं। जब जीवन साथी का चुनाव करना था तब लड़का लड़की या उनके परिवार वाले अन्य सभी बातों को देखते हैं किसकी पसंद ख़्वाहिश क्या क्या है कोई पूरी कर सकता है या नहीं संभव इसकी बात की ही नहीं जाती। पत्नी उम्मीद लेकर आती है ससुराल में उसी का शासन होगा और पति और परिवार वाले बहु से कर्तव्य निभाने जैसी अपेक्षाएं रखते हैं। पूरी तरह खरा साबित कोई कभी नहीं हो सकता है पति के पास अलादीन का चिराग नहीं होता और पत्नी के पास दस हाथ नहीं होते हर समय सभी उम्मीदों पर खरा कोई नहीं हो सकता है। घर में तालमेल बिठाने को ज़रूरी है पत्नी चाहे कितनी जली कटी सुनाये आपको उसकी तारीफ कर खुश रखना ज़रूरी है पत्नी भी समझती है ये जैसा भी है निभाना मज़बूरी है। करीब रहना मुसीबत और सही नहीं जाती दूरी है। तभी कहते हैं शादी इक समझौता है निभाना पड़ता है जो है उसी से घर बसना मुस्कुराना पड़ता है। ये किस्सा इक मिसाल है असली बात और है बड़ी ज़रूरी है। 

इक दार्शनिक कहते हैं राजा जैसा भी हो उसको अच्छा बताना पड़ता है लेकिन जब आपको बनाना हो किसी को राजा तो परखना आज़माना पड़ता है मीठी मीठी बातों से बचकर सच को समझना होता है नहीं तो बाद में पछताना पड़ता है। पति पत्नी का तालमेल नहीं ठीक तो घर परिवार की हालत खराब होती है मगर गलत व्यक्ति को शासन की बागडोर थमाई तो देश समाज का बंटाधार होना लाज़मी है। हर शासक को तमाम लोग अच्छा बताते हैं उसका गुणगान करते हैं अपनी खैर मनाते हैं झूठ को सच समझते हैं रोज़ ठोकर खाते हैं इतिहास कहता है इतिहास खुद को दोहराता है हर कोई अपने आप को मसीहा बतलाता है वास्तव में उल्लू बनाकर मौज मनाता है। बस अब मामला समझ आएगा कोई राजनीति का सबक समझेगा कोई रिश्तों की वास्तविकता समझायेगा। जिस तरह घर में नई नवेली दुल्हन जब आती है चार दिन में सबको समझती है फिर सबको नासमझ जानकर समझाती है नाज़ नखरे दिखाती है उसके बाद अपनी असलियत पर जब आती है। घर में सब गलत था ठीक करने का अधिकार जताती है आपको लगता है मौसमी बारिश है गीली मिट्टी की महक भाती है मगर कच्ची ज़मीन पर फिसलन कब किसके पांव डगमगाती है। 
 
सरचढ़ी बहु की तरह लोग चुनकर जिसको लाए थे उसके इरादे नहीं समझ पाए थे। आकर उसने सभी पर अपना जादू चलाया था मुझसे पहले नहीं कोई भी सच्चा अच्छा समझदार नहीं यहां आया था। सब बेकार था जो भी सभी ने मिलकर बनाया था उनको जीने का सलीका समझ नहीं आया था। उसको फूटी आंख नहीं कुछ भी भाया था मायके से नहीं मिला था कुछ भी सब यहां पाया था बस अपनी किस्मत पर राजनेता इतराया धुंवां बनकर छाया था। पुरखों ने विरासत जितनी छोड़ी थी बहुत थी मगर उसकी ज़रूरत के लिए थोड़ी थी। सब जमापूंजी उसके हाथ आई थी खज़ाने की चाबी मिल गई खूब लुटवाई थी रेवड़ियां सभी अपनों को बंटवाई थी खत्म करनी उसको घर की पाई पाई थी उसने किस्मत अपनी आज़माई थी पहाड़ था इधर उधर गहरी खाई थी। सब के सब बड़े हैरान थे परेशान थे अपनी भूल पर पशेमान थे। खत्म सभी के हो चुके अरमान थे कितने नासमझ थे कैसे नादान थे। अपने घर में बनकर रह गए अनचाहे महमान थे। उसने खोटा सिक्का जमकर चलाया था मुझे बदल नहीं सकते मुझे अपना शुभचिंतक समझना होगा ज़ुल्म को भी इनायत कहना होगा। आपकी भलाई है ज़हर भी दवाई है पीकर दुआ देना है दर्द ज़रूरी है दर्द सहकर आह नहीं भरना जीहज़ूर कहना है। 
 
पुरुष और महिला दोनों का स्वभाव अलग होता है पुरुष महिला को चिकनी चुपड़ी बातें कहकर प्यार से उपहार से खुश रखकर उसको रानी बोलकर खुद राजा बन शासक होने की आरज़ू करते हैं। महिला अपनी दिलकश अदाओं से पुरुष को अपना गुलाम बनाना जानती हैं। ये राज़ राज़ रहता है कि किसने किसको प्यार से अपना बनाया किसने चालाकी से भरोसा पाकर उंगलियों पर नचाया। मगर सत्ता का खेल कोई कुंवारा नहीं कभी जान पाया। जो शादी कर अपनी पत्नी को अकेली बेसहारा बीच मझधार छोड़ आया ऐसे व्यक्ति को हमने क्या समझा क्या बनाकर क्या पाया। इक उलझे हुए ने उलझन को इतना उलझाया कि उसकी गुत्थी कोई नहीं सुलझा पाया। जिसने बर्बाद करने को छोड़ नहीं कुछ भी कर दिखलाया उसका मंज़र पस-मंज़र जैसा नज़र आया।
 
   कितना बना हुआ सब मिटा डाला है अंधेरा कह रहा है वही उजाला है बाहर से सुंदर है बोलता है मीठी बातें दिल का मगर हद से बढ़कर काला है। कोई नशा सभी पर चढ़ाया है सेवक बनकर घर में आया था फ़र्ज़ इक दिन नहीं निभाया था ऐसा किरदार सामने आया है देख कर हर कोई घबराया है। किसी ने लिखा हुआ सब मिटाया है कालिख़ को स्वर्णाक्षर कहता है जिस शाख पर बैठा उसी को काट रहा है अधुनीक नव निर्माण की बात करता है। मत पूछो कैसी उसकी आदत है जाने किस तरह की उसकी हसरत है। सच से उसको नहीं उल्फत है झूठ फितरत है उसकी मुहब्बत है सियासत उसकी बड़ी कयामत है हर किसी की यहां शामत है। उसको सारे लोग खराब लगते हैं बस अच्छे खुद जनाब लगते हैं वो निराशा की फसल बोते हैं नफरत को बढ़ाकर हंसते हैं वही बाक़ी सब रोते हैं। अच्छे दिन झूठे सपने होते हैं झूठ सच कभी नहीं होते हैं।

मई 13, 2021

बुलंदी से नीचे गिरने का भय ( डरावना ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया

   बुलंदी से नीचे गिरने का भय ( डरावना ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया 

      बात इज्ज़त के सवाल की होती है तब ऑनर किलिंग के नाम पर घर परिवार वाले अपनी बेटी तक को क़त्ल कर देते हैं। बस उनकी शोहरत की बुलंदी बरकरार रहे लोग मरते हैं मर जाएं उनको बदनाम नहीं कर जाएं। इतना ऊंचा लंबे लंबे कद का होना कितना कठिन होता है मगर ज़रूरी है सबको ध्यान दिलवाने को अपनी तरफ आकर्षित करने को संतुलन बनाकर खड़े होना नहीं चल कर दिखाना पड़ता है। तमाशा दिखाने को बंदर भालू सांप नेवला का खेल गली गली हुआ करता था मगर सिगरेट का कारोबार का निराला ढंग हुआ करता था टांगों से बड़े बड़े ऊंचे बांस बांधकर उन पर चलना क्या नज़ारा होता था। लोग भूल गए थे मगर किसी ने सोशल मीडिया का उपयोग कर कुछ ऐसा मायाजाल बिछाया खुद को बड़ा साबित करने को जितने बड़े बड़े कद्दावर लोग थे सबको छोटा बनाने का काम किया। मगर छोटी करने को रेखा मिटाना ज़रूरी नहीं होता है सामने उस से बड़ी रेखा बनानी पड़ती है। इधर उधर से देश विदेश से तीन हज़ार करोड़ खर्च कर 182 मीटर अथवा 597 फ़ीट ऊंची मूर्ति बनवाना मुश्किल नहीं था खुद अपनी शोहरत की बुलंदी आसमान से ऊपर पहुंचाना मुमकिन किया सिर्फ किसी एक ने। अब चिंता होनी स्वाभाविक है जब उनकी कही तमाम बातें खरी साबित नहीं होती हैं। पचास दिन मांगे कालाधन लाने को लोग मर गए हाथ धेला नहीं लगा उल्टा पापी गंगा नहाकर काले से सफ़ेद हो गए। ऐसा होता रहा और कितनी बार किस किस ऐलान का अंजाम वही निकलता रहा मगर जैसे उनको हर विषय की जानकारी दुनिया भर से बढ़कर और पहले होती है समझते समझाते हैं 24 मार्च 2020 को आधी रात से 21 दिन का लॉकडाउन घोषित किया भरोसा दिलाकर कि उसके बाद कोरोना पर जीत तय है। 
 
साल से अधिक समय बीत गया और अब देश की सांस अटकी रहती है मगर जनाब की हसरतें थमने का नाम नहीं ले रहीं उनको सेंट्रल विस्टा प्रोजक्ट जल्द पूरा करना है बीस हज़ार करोड़ लागत से शासक वर्ग के लिए शानदार भवन का निर्माण हरी भरी ज़मीन पर पत्थर और मशीनी निर्माण से पर्यावरण की सुरक्षा की परवाह को दरकिनार करते हुए। अपने नाम को इतिहास में दर्ज करवाने की चाहत ने ये सोचने समझने नहीं दिया कि आज ज़रूरत किस की पहले है। जब राज्य राज्य शहर शहर गांव गांव लोग स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली और सरकारों की उदासीनता व संवेदनहीनता से बेमौत मर रहे हैं उस समय ये अनुचित अनावश्यक कार्य सत्ता की बीमार सोच को बताता है। लेकिन हद इस बात की है सत्ताधारी दल के लोग ही नहीं संवैधानिक संस्थाएं और देश की न्याय व्यवस्था तक मौन होकर ये देख खुद शामिल हैं इंसानियत को शर्मसार करने वाले ऐसे अमानवीय आचरण पर। सत्ताधारी नेताओं और सरकारी अधिकारी कर्मचारी वर्ग की चिंता नागरिक की ज़िंदगी से अधिक शासक की खराब होती छवि की है। जब कोई व्यक्ति देश समाज से बड़ा नज़र आने लगता है अथवा समझाया जाने लगता है तब पता चलता है कि विवेकशून्यता की बात है।  

बचपन में पढ़ी थी की कहानी जिस में किसी को उपहार में अपने को ढकने पहनने को मिलता है खास परिधान जो शायद जादू से या कुदरती कारण से कोई खोल आवरण फैलता जाता है सभी दिशा में लंबा चौड़ा और ऊंचा भी नीचे पाताल तक चला जाता है ऊपर आसमान छूने लगता है। लेकिन जितना बाहरी तौर पर विस्तार होता है भीतर से सिकुड़ते सिकुड़ते बिल्कुल छोटा होता जाता है। सरकार शासक अधिकारी धनवान लोग वास्तव में उसी रोग के मरीज़ होते हैं उनके महल निवास दफ़्तर जितने बड़े आधुनिक और खूबसूरत बनते जाते हैं उनकी सोच उनकी कर्तव्य पालन की आदत उतनी सिमटती जाती है। देश में सरकारी इमारतों की शोभा बढ़ती गई है मगर जो उन में रहते हैं बैठते हैं उनकी शोभा खत्म होते होते इस हद तक पहुंच गई है कि वो किसान की फसल की बीच कोई डरावा बन गए हैं। किसान लकड़ी भूसा हांडी कपड़े से बनाकर आदमी जैसे आकृति दे कर दूर से आदमी दिखाई देता है पक्षियों आवारा पशुओं से बचाने को खेत को। लेकिन फसल को कीड़े और बिजली या आंधी तूफ़ान ओले से बचाने के लिए ये कारगर नहीं होता है। अब तो ये सभी बाढ़ बनकर खेत खलियान को चौपट करने लगे हैं।  
 
झूठी इज्ज़त की खातिर मरने वालों की संख्या के आंकड़े छिपाने कम करने तक नहीं बल्कि जो अस्पताल वास्तव में कम बिस्तर वाले हैं उनको सिर्फ सरकारी साइट्स पर कई गुणा बढ़ाकर लोगों को गलत जानकारी दे कर भटकाया और उलझाया जाता है। सत्ता और शासकीय अधिकारों का मोह इतना खतरनाक कभी नहीं होता था। अवश्य उनको मखमली बिस्तर पर सोते हुए भी डरावना ख़्वाब जगाता होगा बुलंदी से नीचे गिरते खुद को देखना पसीने पसीने हो जाना। वास्तविक देशभक्त या जनसेवक नहीं ये सभी डरावा बिजूका बन गए हैं।
   
 

मई 12, 2021

रही हसरत अभी बाकी ( उल्टा-पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया

      रही हसरत अभी बाकी ( उल्टा-पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया 

   इतना बड़ा महल जैसा घर फिर भी लगता नहीं है दिल मेरा सोचते रहते हैं। रातों को नींद खुल जाती है अकेले बिस्तर पर करवटें बदलते हैं। न जाने क्यों इस हवेली में उनको पिछले शासकों के साये नज़र आते हैं डराते हुए क्या क्या सवालात करते दिखाई देते हैं। दर्पण के सामने खड़े अपने आप को निहारते हैं और खुद ही अपने से कहते हैं मुझ सा कोई हुआ न कभी होगा। हवाओं की सरसराहट सुनाई देती है तो लगता है कोई दबे पांव आकर किसी खिड़की के पीछे छिपकर झांकता है। ज़िंदगी को समझते समझते मौत का मंज़र दिखाई देता है जब से इतने बड़े महलनुमा घर में आकर रहने लगे हैं घर से भागने को दुनिया भर आवारा की तरह घूमते रहे हैं। अचानक हाथ आई दौलत खज़ाना मिल गया बिना कोई महनत किये उसको संभालना नहीं सीखा बर्बाद करने का भी कोई ख़ास मज़ा आया नहीं। कहने को चाहने वाले तमाम हैं मगर जानते हैं सब सत्ता के संगी साथी हैं सुःख के साथी हैं दुःख दर्द बांटने वाला हमराही हमसफ़र कोई भी नहीं है। जाने ये इक किताब यहां कौन छोड़ गया है दुष्यन्त कुमार की " साये में धूप " उठाकर पढ़ते हैं तो सच्चाई सामने दिखाई देती है। मेज़ की दराज से मिली पुरानी इक डायरी लेकर देखते हैं जिस पर कुछ शेर लिखे हुए हैं सोचते हैं कभी फुर्सत में समझने की कोशिश करेंगे। आधी रात को ये काम करना अच्छा लगता भी है और बेचैनी को बढ़ाता भी है। लिखा हुआ है जो बार बार पढ़ते हैं मिटाने को मन करता है मगर कोशिश करते हैं तो शब्द और उभरने लगते हैं जैसे लगान फिल्म के बच्चे को भयभीत करते थे। पढ़ते हैं अभी अभी लिखा क्या है किसी ने बात अटल है सत्य है शाश्वत है । इसी घर में कोई कविहृदय शासक रहता था उसकी निशानी मिटाना मुमकिन नहीं है उन जैसा बनना संभव नहीं पर उनकी विरासत को सहेजना ज़रूरी है।
 
    ये ज़ुबाँ हमसे सी नहीं जाती , ज़िंदगी है कि जी नहीं जाती। देखिए उस तरफ उजाला है , जिस तरफ रौशनी नहीं जाती। मुझको ईसा बना दिया तुमने , अब शिकायत भी की नहीं जाती। पन्ना पलटते हैं आगे लिखा हुआ पढ़ते हैं। वो निगाहें सलीब हैं , हम बहुत बदनसीब हैं। हम कहीं के नहीं रहे , घाट औ घर करीब हैं। हालाते जिस्म सूरते जां और भी खराब , चारों तरफ ख़राब यहां और भी ख़राब। नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे , होंठों में आ रही है ज़ुबां और भी खराब। मूरत संवारने से बिगड़ती चली गई , पहले से हो गया जहाँ और भी ख़राब। सोचा था उनके देश में महंगी है ज़िंदगी , पर ज़िंदगी का भाव वहां और भी ख़राब। अगले पन्ने को पढ़ते ही खुद अपने आप को किसी कटघरे में खड़ा पाते हैं बस दो शेर पढ़ते ही किताब डायरी को वापस तिजौरी में सुरक्षित रख देते हैं ये शेर असली शेर से ख़तरनाक लगते हैं पढ़ते हैं। तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं , कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं। तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह , तू इक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं। 
 
  दिल में हसरत अभी बाकी है लेकिन किसी को खुद कह भी नहीं सकते मुझे भगवान की तरह पूजने को मेरा भी इक मंदिर नगर नगर गली गली गांव गांव होना चाहिए। लोग भरोसा करें मुझसे जो फरियाद करेंगे सच्चे भक्त बनकर उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण अवश्य होंगी। ऊपर वाले ने दुनिया बनाई थी तो किसी को घर सामान कुछ भी नहीं दिया था नीचे धरती ऊपर गगन रहने को सारा जहां। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे खुद ऊपर से आशीर्वाद देते दिखाई देते हैं। इतना ही करना होता है खुदा ईश्वर बनकर कठिनाई क्या है मेरे दर से जाओगे तो जाओगे कहां। भगवान ने किसी को सब कुछ नहीं दिया जिनको जितना मिला उनको थोड़ा लगता है फिर भी भगवान खुदा ईश्वर अल्लाह होने पर कोई शंका नहीं कर सकता मुझसे भी लोग हाथ जोड़कर मांगते रहते नहीं मिलता तो भी कोई बस नहीं तकदीर को दोष देने से हासिल क्या होता।
 
     दावा किया करते थे अठारह घंटे काम दिन रात की दौड़ धूप दुनिया की सैर मौज मस्ती खेल तमाशे दोस्ती दुश्मनी का उनका तरीका अलग है। अब आना जाना सब बंद तो कुछ नहीं करने वाले बहुत कुछ करते हैं दिमाग़ी खलल कहते हैं , ख़ाली दिमाग़ को कब क्या सूझे कोई नहीं जानता इसलिए उन्होंने तय कर लिया जो भी घर महल हवेलियां पहले पिछले शासकों ने तामीर करवाईं उनको हटाकर सब नया आधुनिक बनवाना है जिस पर सिर्फ इक नाम खुदवाना है अपना नाम अपनी तस्वीर सबसे ऊंची सबसे शानदार जैसे उनके खूबसूरत लिबास हैं। लोग बाहरी  चमक दमक देखते हैं चकाचौंध रौशनी से चुंधिया जाती हैं आंखें।
 
लोग क्या सोचते हैं ये शंहशाह नहीं सोचते हैं बादशाह आवाम की नहीं अपनी शोहरत की फ़िक्र करते हैं गरीबों के लहू से उनकी मुर्दा लाशों पर बुनियाद के पत्थर रखकर ताजमहल से चीन की दीवार तक बनाई जाती है महबूबा की लाश ताजमहल में दफनाई जाती है उसको ज़िंदगी भर क्या मिला बात छुपाई जाती है। फिर इक शहंशाह ने देश के गरीबों की गरीबी का मज़ाक उड़ाया है। कोरोना से बचने का तरीका समझ आया है सबसे अलग सुरक्षित शासन चलाने वालों का संसार बसाने का संकल्प उठाया है कोई ज़ोर ज़ोर से हंसता हुआ नज़र आया है आदमी जिसकी आवाज़ से घबराया है। दो गज़ ज़मीन ने जाने कितनों को भगाया है ये कोई साया है किसी के हाथ कभी नहीं आया है।
 
 
 SC refuses to stay Central Vista project, says no urgency as COVID-19  pandemic is on

मई 11, 2021

तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला , तेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला। ग़ुलाम अली की आवारगी ग़ज़ल आपने सुनी होगी इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ आवारगी। ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया आवारगी। मगर आवारगी शीर्षक से इक और ग़ज़ल है जो सुनकर मौजूदा हालात की सच्ची बात लगती है। परस्तिश की आदत बड़ी खराब होती है किसी भी बुत को खुदा समझने लगते हैं आशिक़ जिस पर फ़िदा होते हैं उसके हुस्न की दीवानगी में उसी पर मरते ही नहीं क़ातिल को दुआ भी देते हैं। जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल पढ़ते हैं पहले फिर बात को आगे बढ़ाते हैं। 
 

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए 

है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए। 

दिल का वो हाल हुआ है ग़में दौरां के तले 

जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए। 

हमने इंसानों के दुःख-दर्द का हल ढूंढ लिया 

क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाए। 

हम को गुज़री हुई सदियां तो न पहचानेंगी 

आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए। 

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 

चंद लफ़्ज़ों  में कोई आग छुपा दी जाए। 

कम नहीं नशे में जाड़ों की गुलाबी रातें 

और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए। 

 

आवारगी कहते हैं कहीं टिक कर नहीं रहने की आदत को वक़्त भी कहीं ठहरता नहीं है बदलता रहता है। नानी की कहानी की तरह किसी भटकने वाले को हमने महल तख्तो-ताज देकर भिखारी से शहंशाह बना डाला और उसने खूब जमकर अपनी हसरतों को पूरा करने में खज़ाना लुटा डाला। लोग उसकी दिलकश अदाओं पर ऐसे लट्टू हुए कि उसके सितम भी करम इनायात लगने लगे। बस यही देखा तो जाँनिसार जी की ग़ज़ल याद आई। हम खुद देखते सुनते हुए नादान बने रहते हैं मगर कोई विदेशी हमको समझाता है तब पता चलता है हम क्या हैं। हमारे टीवी अख़बार हमें वास्तविकता से परिचित करवाने के बदले उलझाने का काम करते हैं ऐसे में विश्व प्रसिद्ध जॉर्नल लांसेट लिखता है भारत में दस लाख लोग मर सकते हैं कुछ महीनों में जिसका दोष मौजूदा मोदी सरकार ही है। किसी शायर ने कहा था " वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता , तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं "। मोदी सरकार ने ही नहीं देश में सभी राज्यों की सरकारों ने भी यही किया है कोरोना ही नहीं तमाम अन्य समस्याओं पर जो कदम उठाने ज़रूरी थे नहीं उठाकर शोर मचाने दलगत राजनीती करने और सत्ता को अपनी बपौती बनाने में लगे रहे। नेता जीतते रहे जनता हारती रही मरती रही और कोई मुजरिम नहीं ठहराया गया कभी भी। 

लोग सिर्फ कोरोना से बिना ईलाज नहीं मरे हैं लोग सरकार की बिना सोची विचारी गलत नीतियों को लागू करने से भी बेमौत मरते रहे हैं। चुनाव और सत्ता का घिनौना खेल इंसान को इस कदर वहशी बना देता है कि शासक गरीबी भूख बदहाली को मिटाने नहीं ढकने लगता है। दुनिया को देशवासियों को झूठी तस्वीर दिखाई देती है जबकि सत्ताधारी अपने ऐशो-आराम सुख सुविधा नहीं रईसाना शौक पर खज़ाना लुटाते हैं। संवैधानिक संस्थाओं सर्वोच्च न्यायलय आरबीआई सीबीआई सभी कठपुतली बनकर रह गए हैं सीएजी तक गूंगी अंधी बहरी बन गई है। शोर किसी और बात का सुनाई देता है जबकि ख़ामोशी में चीखें दबी पड़ी हैं। हम लोग अभी भी न्याय समानता के अधिकार की बात छोड़कर बहकावे में आकर उनकी जयजयकार करते हैं जो देश की बुनियादी समस्याओं को हल करना  नहीं चाहते और धर्म जाति मंदिर मस्जिद में उलझाकर जनता को पागलपन की तरफ धकेलते रहते हैं। और हमने इसको अपनी नियति मान लिया है जो शासकों की नाकामी और लापरवाही  बल्कि जानकर कुछ नहीं करने की आपराधिक कार्यशैली से होता है हो रहा है। 
 
इधर लोग ऐसी ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाते हैं जो अच्छे अच्छे पढ़े लिखे लोगों की अकल पर खुदगर्ज़ी का पर्दा पड़ जाने से झूठ को सच समझने लगते हैं। गुडलक ऐसी फिल्म है कोई किसी को तीन महीने गुडलक की ऑफर बेचता है मुफ्त में और शर्त ये कि अगर काम आया तो आपको हमेशा को गुडलुक पास रखने को अनुबंध करना होगा कीमत चुकानी होगी। तीन महीने बाद कीमत बताई जाती है आपको किसी का क़त्ल करना होगा अन्यथा आपका मिला गुडलुक चला जाएगा। बस किसी ने गुडलुक को बेचा अच्छे दिन नाम देकर किसी ने योग आयुर्वेद का लेबल लगाकर किसी ने करोड़पति बनने का सपना कहकर। और उसके बाद लोग उनकी बेची चीज़ खरीद बदले में मौत के कुंवे का तमाशा देख तालियां बजा रहे हैं। पहले ज्योतिष वाले झांसा देकर किस्मत बदलने को केवल पैसा लूटते थे अन्धविश्वास बढ़कर अपना सिक्का चलाते मालामाल होते थे। अब तीन लोग नहीं उनकी टोली वाले यही मौत से ज़िंदगी खरीदने का कारोबार अपनी अपनी तरह कर कमाल नहीं धमाल कर रहे हैं। 

भारत देश खुद को खुद ही महान बतलाता है यहां लोग पैसा कमाने की खातिर अधिक की चाह में देश को छोड़ विदेश जाकर बसते हैं मगर वहां से देश को प्यार करने की बात सोशल मीडिया पर करते हैं। मुसीबत में देश के काम नहीं आते मगर जब विदेश में खुद मुसीबत में पड़ते हैं तब देश वापस आने की गुहार लगाते हैं। देशभक्त अपने देश में थोड़े से गुज़ारा चलाते हैं अपना देश आखिर अपना है बज़ुर्ग समझाते हैं। जाने किस ने समझाया है कि  जब देशवासी आपदाग्रस्त हैं जनाब सरकार अपने लिए बीस हज़ार करोड़ खर्च कर नया आवास बनवा कर कीर्तिमान स्थापित कर सकता है अपनी आकांक्षा पूरी करने को।



मई 10, 2021

क्यों उदास रहते हैं हम ( दास्तान -ए-ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   क्यों उदास रहते हैं हम ( दास्तान -ए-ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

आपको अजीब लगेगा शायद नापसंद भी हो मुझे उदास रहना बुरा नहीं लगता दर्द भर गीत गुनगुनाना मेरी आदत है। कॉलेज में हॉस्टल में उल्टे सीधे नाम देते थे और सूचना पटल पर सबके नाम की सूचि लगा दी जाती थी। बताना नहीं चाहता मुझे जो नाम मिला था मगर मतलब यही था ये सुबह होते ही शाम ए ग़म की ग़ज़ल गाता है। अठारह साल की उम्र में ये होता नहीं मगर हम दो दोस्त कुछ ऐसे थे दूजा अब दुनिया में नहीं है मगर उसका भी पसंद का गीत था ऐ मेरे दिल ए नादां तू ग़म से न घबराना। कुछ साल पहले इक दोस्त फेसबुक पर मिला पूछा याद आया कौन हूं तो उसने मैसेज में वही गीत लिख भेज दिया जिसको लेकर वो मुझे चिढ़ाता था कि ये सुबह हुई और गाता है हुई शाम उनका ख़्याल आ गया। जो कॉलेज में सुनकर खराब लगती थी कितने साल बाद पढ़कर ख़ुशी हुई थी। बात फिर आज भी वही है मुझे उदासी वाले गीत फ़िल्में कहानियां क्यों अच्छी लगती हैं और किसलिए मैं ये लिखता हूं इक लेखक दोस्त शिकायत करते थे निराशा की दुःख दर्द की परेशानी की ही रचनाएं क्यों लिखता हूं। अधिकांश लोग हैरान होते हैं कि इसको सब मिला है मौज से रहता है कभी बदहाल नहीं दिखाई दिया फिर ये ऐसा लिखता क्योंकर है। 
 
लोग दर्द से घबराते हैं मुझे दर्द अच्छे लगते हैं खुशियां कभी कभी पास आती हैं छोड़ जाती हैं ग़म कभी साथ नहीं छोड़ते दिल में बसते हैं। समस्या ये है हम लोग चाहते हैं सब हमेशा इक जैसा रहना चाहिए मगर जीवन सभी रंगों से मिलकर बनता है। गीत ग़ज़ल लिखने वालों ने ख़ुशी के गाने लिखे और ग़म वाले भी मिलन के गीत लिखे जुदाई के भी। क्योंकि ये सब दुनिया का सच है दिन बदलता है सुबह दोपहर शाम ढलती है रात होती है। हर रात को सुबह का इंतज़ार रहता है गुलाब है गुलाब में छिपे कांटें भी हैं। नाज़ुक फूल और पत्थर के साथ शीशा भी अपनी अपनी सभी की पहचान है जो जैसा है उसको उसी तरह स्वीकार करना ज़रूरी है मगर हम चाहते हैं सब जैसा हम पसंद करते हैं वैसा होना चाहिए। सभी इंसान इक जैसे नहीं हो सकते तब किसी की कोई पहचान नहीं बचेगी। मौसम बदलते हैं ये कुदरत का करिश्मा नहीं उपहार है पतझड़ के बाद बहार आना और खूबसूरत लगता है जब आप ख़ुशी के अवसर पर खुशियों के गीत गाते हैं तब सिर्फ ख़ुशी बढ़ती ही नहीं जो ख़ुशी से महरूम हैं उनको भी ख़ुशी का एहसास होता है। दुःख की घड़ी में आशा के गीत नहीं गाये जाते दर्द वाले गीत दर्द को सहने समझने की ताकत देते हैं। निराशा के समय आशावादी गीत सुनकर उम्मीद जागती है तो दुःख की घड़ी में दर्द की बात बेचैनी से आराम देती है। 
 
सभी लोग काले नहीं हो सकते न ही गोरा होना ज़रूरी है जो जैसा है वैसा अच्छा है मानना होगा। पेड़ पौधे पशु पंछी जंगली जानवर कुदरत की बनाई सभी चीज़ों का अपना अपना मकसद है ज़रूरी है संतुलन बनाये रखने को। सब फल फूल इक जैसे सभी खाद्य पदार्थ इक स्वाद के होते हो क्या मज़ा आता मीठा नमकीन कड़वा भी शीतल गर्म सभी अपनी जगह हैं। जिनको दर्द की बात सुनकर घबराहट होती है ज़िंदगी भर डर के साये में जीते हैं मुश्किलें आने पर घबरा जाते हैं उनसे लड़ना नहीं चाहते। गीतकार कथाकार सभी की बात कहते हैं सबका सुख दुःख समझते हैं तभी हर अच्छी खराब हालत पर लिखते हैं। पढ़कर सुनकर सभी को लगता है कि जो मैंने दर्द झेला है सिर्फ मुझे नहीं दुनिया में बहुत को मिला है इक तसल्ली मिलती है ये सब भी बदलेगा निराशा की बात कहानी ग़ज़ल में भी उम्मीद छुपी रहती है। क्या सभी तालाब इक जैसे होते सभी नदियां इक जैसी सभी झरने समंदर सबका पानी ठहरा हुआ या बहता हुआ इक जैसा होता तो क्या लगता। ज़िंदगी भी सुख दुःख दर्द राहत परेशानी और उम्मीद से मिलकर बनती है बदलाव नियम है संसार की हर वस्तु की तरह ज़िंदगी पल पल बदलती रहती है। ज़िंदगी को जी भर जियो जब जैसी है अपनाकर। 
 
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे , मर कर भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे। ज़िंदगी ज़िंदादिली है मगर मौत से दुःख दर्द से भागना बुझदिली है। दो रंग जीवन के और दो रस्ते सुनते हैं ये लाजवाब गीत समझाता है। 
 
 





 

मई 09, 2021

मैंने जान लिया है राज़ क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   मैंने जान लिया है राज़ क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  जो लोग फेसबुक पर नहीं हैं उनके अपने उनको भूल जाते हैं अन्यथा उनका भी जन्म दिन वर्षगांठ विवाह की उत्सव जैसा दिखाई देता ये समझ आया तो ढूंढ ढूंढ दोस्त बनाने लगे जिनको हमारी याद नहीं आती मुद्दत हुई। बाकी कुछ नहीं रहेगा बस इक इसी का नाम हमेशा रहेगा। भगवान की नहीं बात फेसबुक की है। दस साल से भटकता रहा नहीं जान पाया ये क्या सिलसिला है कैसा माजरा है। कब कहां क्या हुआ इक इसी को पता है जो नहीं जानता ये उसी की खता है। दोस्त रिश्ते नाते सभी निभ रहे हैं जहां पर हम रह गए थे ज़मीं पर सब जा पहुंचे आस्मां पर। फेसबुक बगैर हम अजनबी हो गए थे आदमी सब थे जितने खुद नबी ( पैगंबर ) हो गए थे। होश आया तो जाना बस यही है इक यही है इसके बिना दोस्ती कुछ नहीं है ज़िंदगी कुछ नहीं सब होकर भी आदमी कुछ नहीं है। सबका घर है यहां पर हर खबर है यहां पर लोग मिलते यहीं हैं और जाएं भी कहां पर। कीमत समझ आती है हर चीज़ की मगर वक़्त आने पर लोग मिलते थे कभी मंदिर में मिलते हैं अब शराबखाने पर। चौपाल लगती नहीं पीपल तले गांव में बात पहुंचती है पुलिस थाने तक हमको मालूम है तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। लोग चले गए दुनिया से रुखसत होकर खबर पहुंची नहीं शाम की सहर से शाम शाम से सहर होने तक। हाल पूछते हैं ठीक होने के बाद हंसते हैं मिलकर रोने के बाद। दुनिया बड़ी है पर सिमट कर स्मार्ट फोन में रह गई है ग़ज़ल कविता कहानी कहीं नहीं मिलती चुटकले की लंबी आयु हो व्हाट्सएप्प वाली देवी कह गई है। 
 
सोशल मीडिया से कोई खुदा बन गया है झूठ सच बन गया फ़लसफ़ा बन गया है। ढूंढते रहे हम पहचान अपनी मिली नहीं और कोई इसी को बनाकर सहारा खुदा बन गया है। तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला। शायर का नाम भी याद नहीं आता फेसबुक पर जो नहीं उसको तलाश करना आसान नहीं है। इक़बाल साजिद फरमाते हैं , रुखे रौशन का रौशन एक पहलू भी नहीं निकला ,  जिसे मैं चांद समझा था वो जुगनू भी नहीं निकला। इस सपनों की दुनिया का सच यही है जुगनू भी नहीं चांद बन बैठे हैं सूरज के सिंघासन पर घने अंधेरों का डेरा है क्या तेरा है क्या मेरा है ये जोगी वाला फेरा है। कुछ तो निशानी छोड़ जा अपनी कहानी छोड़ जा गीत सुनते थे मगर कैसे हर कोई ताजमहल बनवा नहीं सकता लेकिन कमाल किया है फेसबुक बनाने वाले ने 4 फ़रवरी 2004 को मार्क ज़ुकेरबर्ग ने सभी को अवसर देकर अपना नाम रौशन करने का साधन उपलब्ध करवाकर। लोगों को मौत से बढ़कर चिंता रहती है बाद में उनको लोग याद करेंगे कि भूल जाएंगे। फेसबुक आपकी रहेगी हमेशा अगर आप चाहेंगे।
 
सोशल मीडिया पर एक्टिव होना आपके होने का असली सबूत है ख़ास बात ये भी है कि आपकी मर्ज़ी है चाहो तो दुनिया से जाने के बाद भी फेसबुक पर आप ज़िंदा रह सकते हैं। इस नकली दुनिया ने सभी को भटकाया भी है बहलाया भी और जो किसी किताब ने नहीं पढ़ाया वो समझाया भी। ग़ालिब ने कहा था मस्जिद के जेरे साया घर बना लिया है , ये बंदा ए कमीना हमसाया ए खुदा है। फेसबुक पर आप बड़े नाम वाले नायक खिलाड़ी नेता धर्मगुरु से दुनिया की तमाम जानी मानी हस्तियों के दोस्त बन सकते हैं। धरती पर इतने मंदिर मस्जिद नहीं हैं जितने देवता ईश्वर खुदा मसीहा पीर पय्यमबर इस जगह साक्षात हैं कमेंट में लिखते ही मनोकामना पूर्ण होने का भरोसा दिलाते हैं लोग आपको जिनसे खुद कभी नहीं मिलते मिलवाते हैं। इक यही दुनिया हैं जहां इक साथ जश्न भी मातम भी मनाते हैं बधाई भी मिलती है अफ़सोस भी जताते हैं किसी के घर जाते नहीं न किसी को घर बुलाते हैं फिर भी रिश्ते हर किसी से निभाते नज़र आते हैं। गुलदस्ता मिलता है ख़ास दिन और श्रद्धासुमन भी चढ़ाते हैं लोग इस दुनिया को वास्तविक समझते हैं ख्वाब बुनते हैं दिल को बहलाते हैं लाइक कमेंट की दुनिया का लुत्फ़ उठाकर जिन खोजा तिन पाईया राज़ समझाते हैं।  हमने देखा है समझा है जाना है अब कोई शिकायत नहीं है कोई नहीं बहाना है जिनसे पहचान हैं उनको अपना दोस्त बनाना है फेसबुक वाला याराना ही याराना है। दिल में नहीं सबको दोस्त कितने हैं लिस्ट में नंबर बनाना है। मासूम सी मुहब्बत का बस इतना सा फ़साना है , कागज़ की हवेली है बारिश का ज़माना है। अब कुछ पीछे वापस मुड़कर देखते हैं कितना कुछ बदला है इस सोशल मीडिया के चलन से। 
 
यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते की तरह इक कहानी मिली लेखक से गुनगुनाती हुई ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन। शादी विवाह समाज घर सभी को भूलकर दो आशिक़ अपनी दुनिया में खो गए। अचानक साल भर बाद प्यार से पेट नहीं भरता समझ आया तो चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। माशूका घर वापस चली गई सुबह की भूली भटकी शाम को लौट आई सबको बताया नौकरी करने गई थी अब शादी करने घर चली आई है। उधर आशिक़ भी अपनी पत्नी को छोड़ महबूबा संग रंगरलियां मना लौट आये थे सब ठीक हो गया चार दिन की चांदनी के बाद। फेसबुक पर स्टेटस मौसम से जल्दी बदल जाता है रिलेशनशिप से विवाहित होने का ऐलान हो गया। लेखक को पहली दास्तां को छोड़कर नई कहानी लिखने को कहा और पुरानी लिखी मिटाने को अनुरोध किया गया। शायद विधि का विधान है कि जल्दी ही पति का निधन हो गया और स्टेटस सिंगल का सामने दिखाई दिया। 
 
चार महीने पहले पति की मौत की खबर की पोस्ट पर संवेदना देने वाले आज फेसबुक पर शादी की वर्षगांठ की मेमरी देख बिना सोचे भूलकर पति की मौत की खबर शुभकामनाएं देने लगे हैं। इधर
 अपने पति से जान से बढ़कर प्यार करने वाली पत्नी जो उसको जाने कितने अच्छे संबोधन देकर बुलाती थी चार महीने बाद मौज मस्ती की झूमती गाती नाचती तस्वीरें फेसबुक पर पोस्ट करती है तो समझना कठिन है कहानी सच्ची थी या काल्पनिक थी।