दिसंबर 29, 2022

क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

   क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

ये लिखने वाला भी नहीं जानता था छापने वाले को भी शायद इसकी उम्मीद नहीं थी किताब की बदनसीबी थी जो नहीं होना चाहिए था वही हो गया । क़िताब की ये व्यथा कोई समझेगा भी कैसे जब किसी को कागज़ की लिखावट छपाई काले रंग की स्याही की पढ़ने को लुभाती नहीं है । कहीं किसी कोने में पड़ी हुई है कितनी किताबों के बीच दबी हुई ख़ामोश हैं सब की सब अपना अपना अकेलापन अकेले सहती हुई । कोई किताब नहीं जानती उसके साथ पड़ी किताब के पन्नों पर क्या लिखा है । किताबों में क्या क्या नहीं है खुशियां हैं संवेदनाएं हैं शिक्षा है ज्ञान है जीवन की वास्तविकता से काल्पनिक परीकथाओं मनोरंजन तक सब है दुःख दर्द मानवीय सरोकार से प्यार मुहब्बत रिश्ते समाजिक संबंध की समझ शामिल है अथाह समंदर है । लेकिन जब कोई भीतर झांकता ही नहीं तो कंकर पत्थर हीरे मोती की परख कैसे होगी । कभी किताब को सर पर माथे पर लगाते थे आजकल किताब रद्दी वाले कबाड़ी के झोले में सिसकती दिखाई देती है । आपको हैरानी हो रही है तो बताना ज़रूरी है सुबह गली से गुज़रते कबाड़ी पर नज़र पड़ी तो बिल्कुल नई नवेली दुल्हन जैसी किताब दिखाई दी मुझे छत पर खड़े हुए । आवाज़ देकर रोका तो उसको लगा मुझे भी कोई पुराना सामान बेचना है , मैंने घर से बाहर गली में जाकर बात की और किताब की बात की तो उसने कहा आपको चाहिए तो दस रूपये कीमत है । अचरज से सवाल किया जिसने बेची दस रूपये में बेची है , नहीं साहब पांच रूपये में ख़रीदी है दस में बेचूंगा । खैर मैंने उसको मनचाहे दाम देकर किताब खरीद कर सर माथे लगाया और मां सरस्वती से क्षमा याचना की कहा जिस किसी ने भी ऐसा अपराध किया उसको माफ़ करना । 
 
कितने बड़े लेखक की पुस्तक है और कितनी बहुमूल्य कालजयी रचना बताकर इक और जुर्म नहीं करना चाहता फिर भी अनचाहे ही सालों पुरानी घटना याद आ गई है । लिखता था अखबार पत्रिकाओं में भी रचनाएं छपती थी और कई साथी सलाह देते रहते थे किताब छपवानी चाहिए । महानगर जाना हुआ तो इक प्रकाशक जो खुद बड़े नाम वाले लेखक भी थे उन से मुलाक़ात करने चला गया । उनको अपनी पांडुलिपि देकर निवेदन किया कि पढ़कर बताएं रचनाएं छपने के काबिल हैं भी या नहीं । जैसे कोई हंसता है उपहास करने जैसा जवाब मिला उन्होंने कहा हिंदी में किताब पढ़ता कौन है , ये तो आपको खुद पैसे खर्च कर दोस्तों को निःशुल्क बांटनी पड़ती है । उस के बाद कितने पन्नों की कैसी किताब कितनी प्रतियां कितने हज़ार में छपेंगी हिसाब समझाने लगे थे । ये सपने में भी नहीं सोचा था बस किसी तरह निकला बाहर भागा तेज़ी से सड़क तक आते आते सांस चढ़ी हुई थी ।
 
तीस साल बीत गए फिर किसी प्रकाशक से मिलने का हौंसला नहीं कर सका । जीवन में बहुत उल्टा सीधा कर लिया तब विचार आया चलो ये भी कर देखते हैं कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा ही सही । ये आदत रही है आगे बढ़े कदम रुकते नहीं और मंज़िल की चाह रखे बगैर सफर करता रहा हूं । जिस जहां की जिस मंज़िल की तलाश मुझे है शायद इक ख़्वाब ही है जिस को हक़ीक़त बनाना मेरी आरज़ू है । सब सोच समझ कर पूरी तैयारी से किताब छपवाने का हौसला किया और किताब छपवा कर समझा सब शानदार अनुभव है । लेकिन कहां मालूम था कि अभी दुश्वारियां ही दुश्वारियां सामने हैं । किताब छपना काफी नहीं पाठक तक किताब पहुंचाना उसको पढ़ने को उत्साहित करना टेढ़ी खीर है । लिखने वाला फिर उसी मोड़ पर खड़ा होता है कभी अखबार पत्रिका वाले खूब आमदनी करते हैं लेकिन लिखने वाले को कोई कीमत नहीं मिलती किसी बंधुआ मज़दूर की तरह या नाम को मानदेय राशि जिस से कोई जीवन यापन नहीं कर सकता है । नवोदित लेखक को आसानी से सोशल मीडिया पर किताबों के सौदागर मिलते हैं जो बिना परखे रचनाओं की किताब छापने का कारोबार कर खूब कमाई करते हैं । उस के बाद किताब की हालत पर कोई ध्यान नहीं देता , कोई खुद को लेखक समझने कहलाने पर संतोष कर लेता है कुछ हज़ार खर्च कर और कोई किताबें छापने का मुनाफ़े का व्यौपार कर मौज से रहता है । कितनी तरह की किताबें कहां अपनी बदहाली पर आंसू बहाती हैं किसी को अपनी दर्द भरी व्यथा कथा सुना नहीं सकती हैं । उस के आगे की दर्द भरी दास्तां कैसे लिखें किस को पढ़नी है क्योंकि लिखने वाला भी इक दौड़ में शामिल होने को अभिशप्त है इनामात सम्मान नाम शोहरत की भागम भाग में वास्तविक उद्देश्य समाज को आईना दिखाने का बदलाव का न्याय समानता का भेदभाव समाप्त करने वाले देश समाज दुनिया के निर्माण का पीछे छूट जाता है ।

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दिसंबर 16, 2022

किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है ) डॉ लोक सेतिया 

 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है )  डॉ लोक सेतिया 

                        जनाब साक़िब लखनवी अज़ीम शायर हैं कहते हैं

               ' ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था  ,  हमीं सो गये दास्तां कहते कहते '।

                       कोई पचास साल पहले कही थी मैंने पहली ग़ज़ल 

               ' किसे हम दास्तां अपनी सुनाएं  , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं ।

  उसी इक दोस्त इक मेहरबां की तलाश में क्या क्या नहीं लिखता रहा । बेनाम शख़्स अनजान नगर गांव  , बिना पता - जाने , ठिकाना बताए , भेजे ख़त लिख लिख कर कोई जवाब नहीं मिला , अधिकांश ग़ुम हो गए , कुछ वापस लौट आए मेरे पास खुद ही भेजे खुद ही पढ़े बार बार । ज़माना खुद को समझदार कहता है दावा करते हैं लिफ़ाफ़ा देख कर ख़त का  मज़मून भांप लेते हैं काश किसी ने खोला होता और समझने की कोशिश की होती कि मेरे लिखे ख़त नहीं भीतर इक कोरा कागज़ भेजा है । मेरी मन की किताब को किसी ने झांका तक नहीं बस बाहर से आवरण को देख कुछ और ही समझते रहे लोग । पुस्तक का बाहरी कवर देख लोग भटक भी जाते हैं तो कभी अंदर लिखा पढ़ कर हैरान हो जाते हैं कुछ ऐसा संभव था कोई मुझे भीतर तक गहराई से जानता समझता तो जैसा सोचा उस के विपरीत पाकर दंग रह जाता । हर कोई चेहरा देखता रहा लिबास की सिलवटें गिनता रहा , साफ मन की कद्र किसी ने नहीं जानी । कभी जब लिखनी होगी किसी किताब के पन्नों पर अपनी कहानी , प्यास को हम लिखेंगे तब पानी । यही आदत रही है हमने कभी साक़ी को अपनी प्यास दिखलाई ही नहीं ज़िंदगी भर खाली जाम लिए बैठे रहे दुनिया की महफ़िल के मयख़ाने में । दोस्ती की भाषा समझते ही नहीं लोग , सभी को निस्वार्थ दोस्ती क्या होती है नहीं पता मतलब की बात सभी जानते हैं । इस दौर की दुनिया की महफ़िल में सिर्फ मैं ही तनहा नहीं रहा सच तो ये है कि भीड़ में हर कोई अकेला नज़र आया मुझे । ये कहने को लिखी अपनी पुरानी इक ग़ज़ल पढ़ता हूं , शायद समझ सके कोई ।
 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया ।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा-सा नज़र आया ।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा-सा नज़र आया ।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया ।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ।   
 
   साक़िब लखनवी जी इक शेर में कहते हैं ,  कोई नक़्श और कोई दीवार समझा , ज़माना हुआ मुझ को  चुप रहते रहते । शायद यही होता है ख़ामोश रहने से मगर बोलने से कब कौन क्या समझता है कहना और भी मुश्किल है । तभी बहादुर शाह ज़फ़र जी कहते हैं बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी , जैसे अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी । मैंने कुछ और लिखा मगर ज़माने ने कुछ और पढ़ा समझा जो जिस का नज़रिया था उस ने अपने ढंग से अर्थ निकाल लिया । जब कई साल बाद मुझे अपने लेखन को  पुस्तक के आकार में छपवाना शुरू किया तब जान पहचान वाले लोगों दोस्तों को शायद लगा जैसा सभी किताब छपवाते हैं नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार आदि की कतार में खड़े होने को वही चाहत रही होगी । कुछ दिन बाद कुछ लोग पूछने लगे कि कैसा रहा पाठक वर्ग की प्रतिक्रिया , मुझे यकीन है ये सवाल करने वालों ने खुद मेरी किसी किताब को ठीक से पढ़ा नहीं होगा अन्यथा वो मुझ से रचनाओं भावनाओं की बात करते न कि इस तरह औपचारिक दुनियादारी की बातें । उनको रूचि थी कितनी किताबें बिकी कितनी आमदनी घाटा हुआ क्या खोया क्या पाया , मुझे इनकी चिंता कभी नहीं थी । कभी कभी होता है लेखक की बात पाठक को अपने अनुसार कुछ अलग लगती है जो स्वाभाविक है मगर कभी कोई शब्दों भावनाओं को ही नहीं समझता तब उलझन होती है । मुझे जिस की चाहत थी आखिर वो दिन वो पल-क्षण आ ही गए हैं । हर दिन कहीं से कोई फोन पर कॉल कर बात करता है क्या डॉ लोक सेतिया जी बात कर रहे हैं , हां कहने पर बताते हैं आपकी किताब मिली किसी तरह से पढ़ कर मन किया बातचीत करने को जानने समझने को । यही वास्तविक मूल्य है किताब का चाहे किसी भी लेखक की हो ।
 
   कई बार ये बात कही है पहले भी , मैंने हर वर्ष डायरी शुरू करते एक ही हिसाब याद किया है वो ये कि पिछले साल कितने दोस्त बने कितने खो गए कितने अजनबी साथ चले कितने हमराही बिछुड़ गए । जैसे अधिकांश दुनिया वाले धन दौलत सोना चांदी हीरे जवाहरात के बढ़ते घटते खज़ाने का बही खाता लगाते हैं । मेरे पास इक पलड़े में दोस्ती रिश्ते नाते रहे हैं और तराज़ू की दूजी तरफ पलड़े में सच लिखने का मेरा जूनून और दोनों को बराबर रखने का असंभव सा काम जैसे दोधारी तलवार पर चलना मेरी विवशता रही है । सदा यही भरोसा किया है कोई भी मुझे पढ़ेगा समझेगा तो दोस्त बन कर हमेशा साथ रहेगा । किताबों ने मुझे कितने ऐसे लोगों से परिचित करवाया है यही दोस्ती मेरी सच्ची पूंजी हैं । कभी पढ़ा था किसी लेखक को समझना है तो उस के लेखन को पढ़ना ज़रूरी है अन्यथा नहीं जान सकते । मुझे आप या अन्य लोग जो समझते हैं बिना पढ़े ही सही नहीं हो सकता है , जानता हूं किसी को फुर्सत कहां मुझे जाने समझे फिर भी कभी जिन को दोस्ती प्यार मुहब्बत की ज़रूरत है पढ़ कर मेरी तरह दोस्त तलाश कर सकते हैं । मुझसे करोगे दोस्ती या कोई और मुझ से बेहतर ढूंढना चाहोगे ये आपकी मर्ज़ी है । 
 

 




 

दिसंबर 12, 2022

भूल गए कलम की बात लिखना ( जुर्म-बेलज़्ज़त ) डॉ लोक सेतिया 

 भूल गए कलम की बात लिखना  ( जुर्म-बेलज़्ज़त ) डॉ लोक सेतिया  

  ये कैसे हुआ कलम उदास है किसी लिखने वाले को लेखनी की याद तक नहीं आई । मुझे उसकी हालत पर रोना आ गया । हाथ में लेकर चाहा आजकल के दौर को लेकर कुछ लिखना तो लगा जैसे स्याही सूख गई है मेरी कलम की । कलम को मेरी विवशता समझ आई तो कहने लगी तुमने हमेशा अपने अश्कों से अपने लहू से समाज की दुःख दर्द की बात कही है । लिखते लिखते जीवन बिताया है और तब कहीं जाकर खुद अपने और किताबों को लेकर लिखा है अन्यथा अपना सुख दुःख ख़ुशी ग़म छोड़ समाज की खातिर आंसू बहाए हैं तुमने । आज जब मुझे थामा है उठाया है कलम को समाज की वास्तविक दशा लिखने को तब मेरी बेबसी पर परेशान हो रहे हो । मैं इस दौर की सच्ची बात लिख नहीं सकती क्योंकि समाजिक मर्यादाओं आदर्शों नैतिक मूल्यों का पतन इस सीमा तक हो चुका है कि लिखने को स्याही आंसू नहीं खून भरना पड़ेगा और लिखने वाले तुझ में खून बचा ही कितना है और किसी का लहू तुम नहीं भर सकते मुझ में , भले आदमी का लहू पानी से सस्ता बाज़ार में मिलता है । साहित्य शिक्षा से लेकर देश समाज की वास्तविकता की बात करने खुद को सच का झंडाबरदार समझने वाले तक कलम से नाता तोड़ चुके हैं कागज़ कलम स्याही की दवात बीते ज़माने की बात हो गये हैं । कलम क्या होती है तलवार को पराजित कर सकती है इस को समझना उनके बस की बात नहीं जो बिक कर लिखते हैं अपना ज़मीर मार कर चाटुकारिता करते हैं और जिसकी अनुकंपा से धन दौलत सुख सुविधा साधन पाते हैं उन्हीं की भाषा में राग दरबारी गाकर शासकों का गुणगान करते हैं उनको मसीहा बतलाते हैं । 
 
  कलम की व्यथा-कथा कोई लिखे भी तो कैसे जब कलम खुद प्यासी है और कोई भी स्याही किसी भी लिखने वाले क़लमकार के पास बची नहीं है । जिस कलम से मुहब्बत की दास्तानें लिखी प्यार वाले गीत लिखे ग़ज़ल कविता में एहसास भरे उस कलम से आधुनिक युग की खोखली झूठी मनघडंत कहनियां कोई किस तरह लिख सकता है हाथ कांपते हैं रूह बेचैन होती है ये हालात देख कर जब हर तरफ हिंसा नफरत और समाज को बांटने की कोशिश करने को बढ़ावा दिया जा रहा है । अनैतिकता आदर्श बन गई है और देशसेवा लूट का कारोबार और घना अंधकार खुद को सूरज घोषित कर रहा है । तस्वीरों ने अपनी झूठी चमक दमक से शब्दों को धुंधला कर दिया है कलम ने जो लिखा पढ़ा नहीं जा सकता है समय की धूल ने कागज़ किताब को ढक दिया है और आईना वास्तविक शक़्ल को नहीं दिखलाता है जो बहुत भयानक बदसूरत है आधुनिक समाज की और नकली रौशनी सबको परेशान कर रही है । आंखें हैं फिर भी अंधे बने हैं लोग मुंह में ज़ुबान है फिर भी गूंगे बन गए हैं सभी , सब सामने है मगर दिखाई कुछ भी नहीं देता । सभी लिखने वालों ने अपनी कलम को या तो कहीं रख छोड़ा है बेकार बेजान समझ कर या उस से रिश्ता तोड़ लिया है और लैपटॉप कंप्यूटर कीपैड पर उंगलियां चलती हैं लिखती हैं शब्द जिन में संवेदना का अभाव होता है । 
 
  ऐसे में पुरानी बंद पेटी से कितने ख़त कितने रंगों की स्याही से अलग अलग लिखावट के अनगिनत स्वरूपों वाले निकाल देख रहा हूं । इक इक शब्द एहसास से भरा हुआ महसूस होता है किसी डायरी में कोई सूखा फूल अभी भी याद ताज़ा कर रहा है और कोई किताब के पन्नों के बीच रेशमी राखी जैसा धागा आधी पढ़ी किताब की याद दिलाता है । कैसे कैसे कागज़ कितनी तरह की छवियां कितने रंग की खुशबूदार स्याही देख कर लगता है उन फूलों भरे गुलशन को छोड़ हम लोग इक तपते झुलसते रेगिस्तान में चले आये हैं , भागते फिरते हैं किसी हिरण की तरह चमकती रेत को पानी समझ मृगतृष्णा का शिकार हुए हम सभी । कितना कुछ याद रहता है जो भुलाये नहीं भूलता पुराना बेहद खूबसूरत हुआ करता था । काश कोई फिर से लौटा सकता वो गुज़रा ज़माना । कलम का कागज़ से स्याही वाला रिश्ता बहुत अच्छा था बड़ा सुहाना ।  







दिसंबर 11, 2022

बनाकर खुद इस को परेशान ( इंसान भगवान ) डॉ लोक सेतिया 

   बनाकर खुद इस को परेशान ( इंसान भगवान ) डॉ लोक सेतिया 

     आदमी को भी चैन नहीं आया भगवान की दुनिया से अलग अपनी इक अजीब करिश्माई जहां की तामीर कर ली । नाम कितने हैं सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प टीवी स्मार्ट फोन काल्पनिक कितने ही किरदार कठपुतली जैसे बनाए अपनी उंगलियों पर नचाने को खेल से लेकर जंग तक मुहब्बत से लेकर नफरत तक दोस्ती दुश्मनी दोनों आधुनिक दुनिया में कभी कुछ कभी कुछ रंग बदलने वाले । फेसबुक की झूठी दुनिया असली लगने लगी और वास्तविक धरती आसमान हवा पानी पेड़ पशु पंछियों की दुनिया किसी काम की नहीं लगने लगी है । कौन जाने जैसे खुद बनाए इस मायाजाल से आदमी परेशान हुआ लगता है चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा पा रहा , अनावश्यक ही समय व्यर्थ बर्बाद कर रहा है आदत बन गई है नशा बन गया है कुछ भी हासिल नहीं होता फिर भी आशिक़ी की तरह दिल लगता नहीं सोशल मीडिया के बगैर जीना बेकार लगता है , ऊपरवाला भी पशेमान रहता हो जब दुनिया उसके मनचाहे ढंग से नहीं चलती और इधर उधर जिधर किधर भटकती रहती है । इक लोक कथा में दैत्य बना कर कोई सृजनकार खुद उसी का शिकार हो जाता है और जिसको खुद तराशा हाथों से अपने , वही पूछता है बनाने वाले से निशानी होने की उसकी । भगवान से इंसान उसी तरह सवालात करता है और भगवान से जवाब देते नहीं बनता है । 
 
  फेसबुक बनाते समय लगता था यही जगह है ख़ुशी सुकून खूबसूरत रिश्ते दोस्ती प्यार सब मनचाही मुरादें मिल जाती हैं , धीरे धीरे सब कागज़ी फूल हाथ लगाते बिखरते गए । दिन भर तरसते ही रहे कोई बात तो करे  , मुझको कहां खबर भी इशारों का शहर है ये अल्फ़ाज़ मेरे इक स्वर्गवासी दोस्त की ग़ज़ल से लिये हैं । नकली जलते बुझते सितारों की रौशनी से कुदरती नज़ारे छुप गए हैं । सुनहरे ख़्वाबों की दुनिया इतनी भाई है कि हर कोई जागते हुए भी सपने देख कर मस्ती में झूमता रहता है । बंद कमरे में खुद कैद होकर समझते हैं दुनिया भर को कैद कर लिया है । अपने ख़्यालात दिल के जज़्बात ख़ुशी दर्द नर्म मुलायम से सख़्त शब्द तलवार जैसे अल्फ़ाज़ सभी भरी महफ़िल बयां करते हैं बेशक किसी को किसी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । बधाई शोक संदेश बुलाना सब औपचरिकता निभाते हैं सिर्फ कहने भर को संदेश भेज कर जवाब दे कर । मिलना जुलना ज़रूरी नहीं लगता है कई बार महीनों सालों वार्तालाप करते रहने के बाद पूछना पड़ता है आप कौन हैं रहते कहां करते क्या हैं । सैंकड़ों हज़ारों की भीड़ में रिश्ते इक तस्वीर बन कर रह गए हैं जो प्रोफाइल पिक्चर बदलते समय नहीं लगता है । 
 
   भगवान की बनाई दुनिया भी जैसी बनाई थी वैसी रही नहीं और इंसानों की इंसानियत ख़त्म होती गई और शैतान की हैवानियत बढ़ती गई , जिस से सभ्यता शराफ़त ईमानदारी का नामो निशान मिट गया और धोखा छल कपट हिंसा अन्याय का आलम स्थपित हो गया है । सोशल मीडिया भी संबंध बनाने के बजाय आपसी मतभेद और अनावश्यक विवाद बढ़ाने का मंच बन गए हैं गंदी राजनीती और संकीर्ण विचारधारा ने फेसबुक व्हाट्सएप्प को हथियार बना कर दोस्तों रिश्तेदारों को विरोधी बना दिया है । इतना ज़हर भर दिया है लोगों के दिल-दिमाग़ में कि लोग बिना ख़ंजर इक दूजे को ज़ख़्मी करने लगे हैं । विडंबना है हर हाथ फूल लिए है और हर सर पर घाव भी दिखाई देता है । टीवी सीरियल से फिल्म तक अख़बार टीवी की बहस से विज्ञापन तक झूठ धोखा डर और भयानक घंटनाओं कहानियों ने माहौल को इस कदर खराब कर दिया है कि हर किसी को अजनबी क्या अपने करीबी लोग तक भरोसे करने के काबिल नहीं लगते हैं । दलदल में धंसे हुए हैं निकलने की कोशिश में और धंसते जाना नियति है । उपाय शायद यही है कि कभी इंटरनेट किसी कारण ख़त्म हो जाए ये सब बेकार होकर अपनी मौत मर जाएं , विनाश करने वालों का आखिर अंत इसी तरह से होता है जब कोई उनका अंजाम आखिर अंत होना है ये बात सच कर दिखला दे । अचानक लिखते लिखते वाई फाई इंटरनेट हमेशा को जाना अर्थात इस पोस्ट का खुद ही डिलीट किए बिना अनपब्लिश रहना । 
 
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दिसंबर 03, 2022

लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

  लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

लेखक बहुत दिन से चिंतित था कुछ भी नया विषय लिखने को ध्यान में नहीं आ रहा था । बिस्तर पर करवट बदलते बदलते सामने रखी अलमारी पर निगाह जाकर ठहर गई कुछ हलचल सी भीतर महसूस हुई । लगा कोई किताब कह रही है मुझे इस बंद अलमारी से बाहर निकलना है । चाबियों का गुच्छा लिया मगर कोई भी चाबी ताला खोलने में सफल नहीं हुई तो सोचा कल सुबह उठ कर चाबीवाले को घर बुलाना होगा । आंख लग गई और सपने में किताब अपनी चुप्पी तोड़कर खुद बोलने लगी । लेखक पुस्तक संवाद होता रहा और लिखने वाले की नया विषय की तलाश पूर्ण हो गई और लिखी गई आत्मकथा किताब की । 
 
किताबें असंख्य विषयों पर लिखी जाती हैं साहित्य सांस्कृतिक ऐतहासिक धार्मिक देश काल विश्व भर की नित नई जानकारी खोज शोध से लेकर शिक्षा जगत स्कूल कॉलेज से विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई को लेकर । लेकिन साधारण ढंग से किताबों को दो मुख्य भागों में बांट कर रख सकते हैं । पहली वो जो पाठक को किसी और काल्पनिक दुनिया में लेकर जाती हैं जहां चमक दमक जगमगाहट और असंभव को संभव होते दिखाई देते हैं चमत्कार से सब होता है लेकिन उन कथा कहानियों को लेकर शंका सवाल सोचने समझने की किसी को अनुमति नहीं है । लिखा है आपको बगैर सोचे विश्वास करना होगा अन्यथा आपको नादान नासमझ आदि कहकर नकारा जा सकता है । ऐसी तमाम किताबें आपको मानसिक तौर पर आज़ाद होकर चिंतन की अनुमति नहीं देती हैं । दूसरी वो जो पाठक को वास्तविक जीवन से परिचित करवाती हैं और जिन से सबक लेकर सीख कर पाठक ज़िंदगी में उनका उपयोग कर समस्याओं को समझने और समाधान खोजने का कार्य कर सकते हैं । 
 
इधर किताबें लिखने की दौड़ लगी हुई है लेकिन मकसद समाज को बदलना नहीं बल्कि नाम शोहरत और अन्य भौतिक वस्तुओं की चाहत हो गया है । लिखने वाला खुद लिख कर भूल जाता है और पाठक को देश समाज को कोई मार्गदर्शन अथवा सकारात्मक योगदान को लेकर उदासीन है । प्रकाशक किताब की गुणवत्ता परखे बिना छापते हैं सामान्य कारोबार की तरह धन दौलत कमाने की खातिर । बड़े बड़े शहरों में किताबों का बाज़ार लगाया जाता है जहां किताबों को तोलकर खरीदा बेचा जाता है किसी भाजी तरकारी या धातु या सामान की तरह से । किताब में लिखा कितना मूलयवान है महत्वपूर्ण है अथवा व्यर्थ की गतिविधि ही है कुछ फर्क नहीं पड़ता है सब एक भाव है टके सेर भाजी टके सेर खाजा जैसी बात है । किताबों की ऐसी दुर्दशा हमारे समाज की कड़वी वास्तविकता को दिखलाता है जहां इंसान से लेकर सामाजिक आदर्श और मूल्य तक कहीं फेंक दिए गए हैं । खोखली बातें करते हैं अनुसरण करना अनावश्यक लगता है । आधुनिक शिक्षा ने आदमी को बेजान मशीन जैसा बना दिया है जैसे कोई रॉबट या कम्प्यूटर जैसा प्रोग्राम किया गया है करता है । चिंतनशील विचारवान विवेकशील नहीं बनने देती आधुनिक शिक्षा । 
 
शिक्षा विज्ञान विकास और विनाश को नहीं परखते हैं , साधन बनाने की खातिर समाज को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां बर्बादी और मानवीयता के अंत को सामने देख हैरान हैं । अब कोई सोचता तक नहीं कि हम कब कहां भटक गए और देश समाज दुनिया को बेहतर बनाने की जगह खतरनाक गहरी खाई में ले आये हैं जबकि समझते रहे कि शिखर पर चढ़ रहे हैं । जवीन उपयोगी किताबों को बंद अलमारियों में सजाकर रखना पढ़ना छोड़ कर यही करते रहने का परिणाम है । इक ताला जो हमारे दिमाग़ को लगा है खुलता नहीं है और बंद अलमारी में रखी किताबों की तरह दीमक की तरह खोखला कर रहा है । जिनके ज़हनों में अंधेरा है बहुत , दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत । मेरी इक पुरानी ग़ज़ल का मतला याद आता है ।