मई 25, 2024

आधुनिक धर्मकथा ( व्यंग्य-अध्याय प्रथम ) डॉ लोक सेतिया

   आधुनिक धर्मकथा ( व्यंग्य-अध्याय प्रथम ) डॉ लोक सेतिया 

प्रभु हमेशा की तरह विश्राम की मुद्रा में हैं , श्रीमती जी बैठी आनंद पूर्वक निहार रही थी । उधर धरती पर चुनाव का अंतिम चरण जारी था । अपने परमेश्वर पति से बोली भगवन अब तो बता दो भविष्य कौन क्या होने वाला है । आपने पिछली बार बताया था कि सब को अपने अपने कर्मों का फल मिलता है और क्योंकि उस देश और उस के अन्य राज्यों की जनता ने जो अपराध किए थे अपना फ़र्ज़ ईमानदारी से नहीं निभा कर उन सभी पापों का फल उनको ऐसी सरकार और नेता मिलने ही थे । हम भी देखते रहे आपको भी दिखाई देता रहा जनता को असहनीय पीड़ा अनगिनत परेशानियां झेलनी पड़ी हैं । आपको भी दया आती होगी त्राहि त्राहि की वाणी सुन सुन कर , थोड़ा तो रहम करो उनके गुनाह इतने भी बड़े नहीं थे हां स्वार्थी होकर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद कर जैसे भी हो अपने लिए मनचाहे ढंग से जीने को न्याय नैतिकता सामाजिक मर्यादाओं को भुला बैठे थे । लेकिन बदले में ऐसी सरकार मिली जिस ने उनको सुंदर सपनों की उम्मीद से अपने जाल में ऐसा फंसाया कि आह भरना भी उनका अपराध समझा जाने लगा है । क्षमा करें आपका इंसाफ़ सभी को बड़ा ही अजीब लगता है , जनता की नासमझी नादानी की सज़ा दी गई लेकिन जिनको आपने सत्ता दिलवाई मगर उन्होंने सभी पुरानी सरकारों से बढ़कर ज़ुल्म ढाने का कीर्तिमान स्थापित किया उनके किये गुनाहों की कोई भी सज़ा कैसे देंगे क्या ये भी आपने कभी सोचा है । अन्यथा मत लेना लेकिन उनके सभी अमानवीय कृत्य और अत्याचार क्या इसलिए क्षमा कर सकते हैं कि उन्होंने ये सब किया भी धर्म और इक ईश्वर के नाम पर ।  
 
तभी नारदमुनि जैसा कोई बिना किसी बुलावे अथवा पूर्व सुचना उपस्थित हुए , कहने लगे भगवान कभी किसी को अपनी योजना नहीं बताते हैं । आप को बताना और भी कठिन है क्योंकि महिला होने से आप कब किसी और महिला मित्र को राज़ बताएं भगवान क्या कोई भरोसा नहीं करता है । लेकिन असली परेशानी और है कि आपको हर पत्नी की तरह पति चाहे कितना ही अच्छा हो उनकी कमज़ोरी या मज़बूरी की जानकारी हो जाए तो जन्म जन्म तक उसे याद दिलवा कर किस सीमा तक घबराने को विवश कर देती हैं । आपको चुनाव के सही आंकड़े तो नहीं बता सकता लेकिन जो आंकड़े प्राप्त हुए हैं वो साबित करते हैं कि दुनिया भर के तमाम पति ये सितम सहने को विवश हैं । भगवान पर भरोसा करो उनको ऐसी दुविधा में मत डालो कि उनकी वाणी कंठ से निकलने ही नहीं पाए ।  मेरा आग्रह है करबद्ध निवेदन है कि इतने साल प्रतीक्षा की है तो थोड़ा और कुछ दिन नतीजों का इंतज़ार करते हैं । जनता जानती है उसने अपनी भूल को किस तरह सुधारना है , हां जिनकी सांस अटकी हुई है उन से किसी को कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिए । महिलाओं की दशा किसी भी दुनिया में बदलती नहीं है , हर दुनिया का कोई पुरुष भाग्य विधाता बन कर महिलाओं की शिकायत को अनसुना ही करता है समझ रहे हैं सभी ऊपर से नीचे तक ।

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मई 24, 2024

वार्तालाप करते हैं निष्कर्ष नहीं ढूंढते ( बहस जारी है ) डॉ लोक सेतिया

वार्तालाप करते हैं निष्कर्ष नहीं ढूंढते ( बहस जारी है ) डॉ लोक सेतिया 

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से शुरूआत करते हैं :-

भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ , 

आज कल दिल्ली में है ज़ेर-ए - बहस ये मुद्दआ ।

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह , 

ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रख कर छुआ । 

गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं , 

पेट भर कर गलियां दो आह भर कर बद्ददुआ । 

क्या वजह है प्यास ज़्यादा तेज़ लगती है यहां , 

लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुंवां । 

आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को ,   

आपके भी खून का रंग हो गया है सांवला । 

इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो , 

जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुंवा ।  

दोस्त , अपने मुल्क़ की क़िस्मत पे रंजीदा न हो , 

उनके हाथों में है पिंजरा , उनके पिंजरे में सुआ । 

इस शहर में वो कोई बरात हो या वारदात , 

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां । 

 

इस में कोई दो राय नहीं कि बातचीत से हर समस्या का समाधान खोजा जा सकता है । लेकिन तब जब चर्चा करने वाले संजीदा विषय पर हास परिहास नहीं करें साथ ही बात का जवाब बात से दिया जाए । लेकिन यहां तो  अजब कमाल के देशवासी हैं हम  , जब भी जहां कहीं भी अवसर मिलता है हम बहस करने लगते हैं मगर कभी किसी नतीजे तक नहीं पहुंचते हैं । कभी कभी तो बहस से लगता है बस अब सब समझ आने वाला है जो भी मसला है सुलझने वाला है । हर समस्या सुलझने वाली है हर प्रश्न का हल निकलने वाला है । कभी होता रहा होगा आपसी बातचीत से किसी भी विषय अथवा किसी विवाद को सुलझाना आपसी सहमति से । ये दौर अलग है इस देश में हर कोई सब कुछ जानता है समझाता है समझदार होने का दम भरता है  बस समझता कोई नहीं । कुछ अजीब सी ज़िद है जो हम मानते हैं बस वही सही है किसी दूसरे के मत से प्रभावित होना मतलब अपनी हार पराजय स्वीकार करना कोई तैयार नहीं । आजकल हमने उन्हीं को आदर्श बना लिया है जो शानदार भाषण देते हैं हम सब कुछ बदलने वाले हैं लेकिन अपना चेहरा नहीं बदलते जो आईना उनको असली सूरत दिखलाता है उस को चकनाचूर करते हैं । सार्वजनिक सभाओं में इकतरफ़ा संवाद होता है कोई जो मंच पर नहीं है सामने भीड़ में शामिल है उसे बोलने की अनुमति नहीं है सिर्फ मंच से बोलने वाले की कही बात का समर्थन करने तालियां बजाने का अधिकार है , क्या समझा नहीं समझा चर्चा बेकार है । राजनीति जनता के लिए दोधारी इक तलवार है घायल करती हर बार है अजब ये लोकतंत्र का संसार है जिसको समझ आ गया ठगना जनता को उसका बेड़ा पार है आपकी ख़ातिर टूटी नैया है इक मांझी की आस है जिस के पास पतवार है सामने आगे पीछे हर तरफ मझधार ही मझधार है । 
 
ये न सोचो इस में अपनी हार है कि जीत है ,  आपको पसंद है कोई पुराना गीत है , कौन पर सुनता सुनाता वो मधुर संगीत है आजकल हर तरफ इक शोर है भावनापूर्ण गीत लगता कितना बोर है । अपनी अपनी डफ़ली है और अपना अपना राग है , भाग भाग भाग इक यही गुणा भाग है बेनतीजा हर चर्चा हर संवाद है । शब्द क्या हैं अर्थ हीन इक सुलगती आग है । हर सुबह हर शाम इक नज़ारा दिखाई देता है , कुछ लोग मिलते हैं अजब उनकी महफ़िल का रिवाज़ है सभ्यता से अलग गाली और अश्लील भाषा कहते हैं दोस्ती है समझो तो खत्म शिष्टाचार है । अब कौन कैसे कहे क्यों होता भाषा पर अत्याचार है क्या यही शिक्षा है यही सभ्य संस्कार है हर बात का मतलब यही कुछ नहीं बात ही बेकार है । मिल बैठ कर हमने कोई सार्थक विषय समझा नहीं बस जिस तरफ की थी आंधी चलने लगे हम भी वहीं , हां यही नहीं यही कुछ है नहीं कुछ भी नहीं । कोई नहीं कुछ सोचता कोई नहीं कुछ बोलता क्या कर रहे घंटों तलक खाया पिया कुछ नहीं गलास तोडा बारह आना । कुछ नहीं समझा कुछ नहीं जाना किस बात की थी चर्चा बस था इक बहाना , आना जाना कितना अजब है ये आधुनिक अपना ज़माना । इस में वो बहस शामिल नहीं है जो टीवी चैनल वाले अपनी मर्ज़ी से जब चाहें किसी भी विषय पर जिनको चाहते हैं उनको चर्चा में शामिल कर अपना वर्चस्व अपना धंधा अपना टीआरपी आदि बढ़ाने को रोज़ करने का चलन बना आपका समय बर्बाद और आपकी सोच को प्रभावित कर जैसे चाहें बदलने का प्रयास करते हैं । सोशल मीडिया पर फेसबुक पर भी निर्रथक बहस जारी है जाने कब से लगी ये बिमारी है ।  
 

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मई 23, 2024

ज़ुल्मों का आपके हिसाब नहीं ( जान भी ले लो ) डॉ लोक सेतिया

  ज़ुल्मों का आपके हिसाब नहीं ( जान भी ले लो ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं जनाब कोई कटाक्ष नहीं , कोई शिकायत करने का इस देश की जनता को हक ही नहीं है , दुःख है तो इस बात का है कि इतना शाही ठाठ-बाठ भरा जीवन पाकर भी आपकी हसरतें लगता है अधूरी हैं ।  शायद कभी कोई हिसाब गिनेगा कि आपने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए खुद अपने सुख सुविधा शानो-शौकत मौज मस्ती और कितनी ही आरज़ूएं पूरी करने पर देश के खज़ाने को कितना कैसे बर्बाद किया । ऐसा महसूस होता है कि गिनती की जाए तो आप पर हर दिन नहीं है घंटे नहीं हर मिंट शायद करोड़ों रूपये खर्च किया गया होगा , जितने से जाने देश के कितने बदहाल लोगों की ज़िंदगी संवंर सकती थी । आपकी बातें आपके इश्तिहार देख कर मन घबराता है कि दावा किया जाता है आपने कितनी मेहनत की देश की भलाई करने में खुद को अर्पित कर दिया , इक शायर का शेर याद आता है वो करम उंगलियों पे गिनते हैं ज़ुल्म का जिन के कोई हिसाब नहीं । सच है आपका कोई जवाब नहीं पर सच है कि आप घना अंधकार हैं , कोई आफ़ताब नहीं , इस गरीब देश की पीठ आपके बोझ से झुककर दुहरा हो चुकी  है , आपको लगता है लोग सलाम कर रहे हैं । पचास साल पहले दुष्यंत कुमार की किताब की ग़ज़ल कभी इस हद तक हक़ीक़त ब्यान करेगी नहीं सोचा था पेश करता हूं पूरी ग़ज़ल आज का सच साबित हो गई है ।
 
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा , 
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा ।
 
यहां तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां , 
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा ।
 
ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते , 
वो सब के सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा ।
 
तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता है , 
कि इंसानों के जंगल में कोई हांका गया होगा । 
 
कई फ़ाक़े बिताकर मर गया , जो उस के बारे में , 
वो सब कहते हैं अब , ऐसा नहीं , ऐसा हुआ होगा ।  
 
यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं , 
ख़ुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा । 
 
चलो , अब यादगारों की अंधेरी कोठड़ी खोलें ,  
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा ।    
 
ये कमाल है कि आप बताते हैं कि आपका जन्म किसी मां की कोख़ से शायद नहीं हुआ लगता है ऊपरवाले ने मुझे किसी ख़ास मकसद से भेजा था इस देश में कुछ अलग विलक्षण करने को । पता नहीं भगवान जाने भगवान को ये बात सुनकर क्या लगा होगा । क्या मैंने इस मनुष्य को देश को इस तरह आर्थिक तौर पर लूटने बर्बाद करने को बनाकर धरती पर भेजा था , नहीं ये दोष उस पर मत डालो भले जितना भी उड़ा सकते हो उड़ा लो मौज मना लो । अपनी मां जो अब ज़िंदा नहीं उस पर थोड़ा तो तरस खा लो किस तरह पाला पोसा खिलाया पिलाया उस के दूध की लाज बचा लो । मईया मोरी मैं नहीं माखन खायो भजन सुना लो , तू कितनी भोली है गीत गा कर दिल बहला लो ।  आपने किसी को नहीं छोड़ा बदनाम करने में नफ़रत की आंधी चलाने में कोई कोर कसर बाक़ी नहीं छोड़ी , हर कसम संविधान की तोड़ी मरोड़ी कुछ इस तरह छोड़ी कि शर्म भी लगती है थोड़ी बड़ी थोड़ी । घर का मालिक जब खुद करता है माल की चोरी मैली चादर भी लगती है अभी है बिल्कुल कोरी की कोरी , कहते हैं लोग मत करो जोरा - जोरी रहने दो जो भी बची इज्ज़त थोड़ी ।

अलख - ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा, मैं सजदे में नहीं था आपको  धोखा हुआ होगा । - दुष्यंत कुमार #LabourDay | Facebook

मई 22, 2024

लोकतंत्र पर कितने घने साये हैं ( दर-हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

  लोकतंत्र पर कितने घने साये हैं  ( दर-हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

दिल को बहलाने को ये ख़्याल अच्छा है वर्ना हम जानते हैं इस लोकतंत्र की हक़ीक़त क्या है । इतनी सारी इतनी ज़रूरी बातें हो सकती हैं चुनाव के समय कोई जनता की भलाई की सरकार बनाने को लेकिन किस को फुर्सत है समाज देश की कुछ अलग अच्छा बदलाव करने की जिसे देखो उन्हीं फज़ूल की बातों में उलझा हुआ है । जागरूक होना क्या जागरूकता फैलाना क्या खुद भी किसी जाल में जकड़े हुए हैं और चाहते हैं तमाम लोगों को भी किसी न किसी के पिंजरे में कोई टुकड़ा टंगा देख खुद ही लालच में आकर बंधक बना बेबस मज़बूर हो जाए । राजनैतिक दलों की रैलियां रोड शो आयोजित करने में जनता या लोकतंत्र का क्या भला हो सकता है , ऐसा किया जाता है अपनी धन दौलत और अन्य कितनी तरह की ताकत का दिखावा करने को । जनता की समस्याओं की परेशानियों की बात का कोई महत्व नहीं रहता है और राजनेताओं उनके दलों का वर्चस्व स्थापित किया जाता है ताकि आपको किसी न किसी के पीछे भीड़ बनकर खड़ा किया जा सके । टीवी पर अख़बार में जो भी राजनैतिक दल जैसा प्रचार करवाना चाहता हो अपना इश्तिहार पैसे दे कर चलवा सकता है और हर कोई एकतरफा संवाद ही नहीं जनता को भेड़ बकरियों की तरह अपनी तरफ लाने को हथकंडे अपना सकता है । और इतने अधिक शोर शराबे में हम सभी याद ही नहीं रखते कि इतने साल तक जितनी भी सरकार हमने बनवाई उनसे हमको क्या सच में अपने सभी संवैधानिक अधिकार मिले भी हैं या शायद उनको लेकर कोई चर्चा ही नहीं । फिर से दोहराना चाहता हूं कि सत्ता या विपक्ष कोई भी जनता को कभी कुछ नहीं देता न दे सकता है इसलिए ये घोषणा करना कि हमने जनता को कुछ दिया है या देना चाहते हैं बेहद अनुचित और लोकतांत्रिक विचारधारा के ख़िलाफ़ है ।

कुछ सालों से जनता को प्रभावित या भर्मित करने की कोशिशें सोशल मीडिया को मंच बनाकर ही नहीं बल्कि कितनी तरह से आपको उलझा कर की जा रही हैं । आपको आपकी बात से भटका कर और कितनी तरह की बिना मकसद की बातों में उलझाते हैं , किस दल किस नेता को कैसा समझते हैं जैसी चर्चा आपको सोच को खुद अपनी बात से अलग कर व्यर्थ की बहस वाद विवाद में फंसा देते हैं । लगता है किसी को देश की जनता की इक सही मायने में लोकतांत्रिक व्यवस्था की चिंता नहीं सभी का मकसद अपना मत थोपना है अर्थात आपकी सोचने समझने की आज़ादी को कुंद कर आपको अपने हाथ की कठपुतली बनाना चाहते हैं लोग । ध्यान पूर्वक देखना सोशल मीडिया से टीवी अख़बार तक चुनाव जैसी गंभीर बात को कॉमेडी की तरह पेश कर जैसा किया जा रहा है उस से कोई आदर्श व्यवस्था स्थापित नहीं की जा सकती है । और कैसे कैसे लोग नेता बने फिरते हैं जिनका कोई मकसद ही नहीं सिवा सांसद विधायक बन कर सत्ता सुःख हासिल करने के । क्या उनको आपका कोई ख़्याल भी है बिल्कुल नहीं उनको सिर्फ अपनी जीत चाहिए फिर जीतने को भले जो भी करना पड़े उनको उचित लगता है । 
 
हमने कभी सबक नहीं सीखा है कि हमारे साथ हमेशा से सरकार राजनेता प्रशासन कैसा बर्ताव करते रहे हैं , अपनी छोटी छोटी बातों के लिए कितनी परेशानी उनसे मिलती रहती है । ऐसा लगता है जनता को कुछ ख़ास वर्ग के लोगों ने अपना ग़ुलाम समझ लिया है । अपनी आज़ादी को किसी भी कीमत पर हम छोड़ नहीं सकते उसको आसानी से नहीं पाया है हमने अनगिनत शहीदों ने आज़ादी की कीमत अपनी जान देकर चुकाई है । हमको उनके आदर्शों सपनों को टूटने नहीं देना न किसी के पास गिरवी रखना है लेकिन कभी सोचा है जो आपको झूठे सपने दिखलाते हैं खुद उन्होंने अपनी आज़ादी किसी के पास गिरवी नहीं रखी बल्कि बेच दिया है अपना ईमान कुछ पैसों की ख़ातिर । अजीब विडंबना है कभी देश ग़ुलाम था फिर भी देशवासी कायर नहीं थे ज़ालिम से टकराते थे अपने देश को गुलामी की जंज़ीरों से मुक्त करवाने को कुछ भी करते थे मगर आज हम जानते हुए समझ कर भी सच बोलने का साहस नहीं करते हज़ार तरह के डर सताते हैं । ज़िंदा हो कर भी हम लोग ज़िंदा हैं नहीं चलती फिरती लाश बन गए हैं , कुछ लोग हमको साहस पूर्वक बात कहने पर समझाते नहीं डराते हैं छिपी हुई धमकियां देते हैं खामोश रहो अन्यथा उनकी ताकत तुम्हें मिटा देगी क्या ये लोकतंत्र है । अब तो कुछ लोग संविधान और लोकतंत्र की भावना का आदर नहीं करना जानते और समझते हैं की कोई राजनेता उन सब से बढ़कर महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि उस को जनता हटा भी नहीं सकती । अजीब खेद जनक बात है कि किसी व्यक्ति को समझना कि वही इक मात्र शासक होना चाहिए कोई विकल्प नहीं लोगों के पास । यकीनन इसको लोकतंत्र कदापि नहीं कह सकते और जो भी लोकतंत्र और संविधान को नहीं अपनाते उनको हाशिये पर होना चाहिए यही उपाय है । 
 
संक्षेप में कुछ कारण ढूंढते हैं , कुछ लोगों ने राजनीति में प्रवेश करने को किसी को सीढ़ी बनाया है खुद को किसी का चाटुकार बना कर आत्मसम्मान को खो कर उसकी वंदना करने लगते हैं । समाज से इक धनवान वर्ग अपनी सुख सुविधा और फायदा उठाने की खातिर राजनेताओं को प्रशासन को पैसा देते हैं जिस से आम जनता का जीवन दूभर होता है जब वो रिश्वत नहीं देना चाहते तब उनको परेशान किया जाता है । जनता की सेवा की बात चुनाव में भाषण तक होती है निर्वाचित होने के बाद किसी को परवाह नहीं होती है । पिछले 76 सालों में हमने कुछ करना सीखा है तो यही कि जिन्होंने कितना कुछ किया देश की खातिर उनकी कमियां ढूंढ कर उनको नायक से ख़लनायक साबित करने में माहिर हो गए हैं । बुद्धिजीवी हाशिये पर हैं और जिनको इतिहास और देश की वास्तविकता की कोई समझ नहीं वो सोशल मीडिया से अधकचरी जानकारी हासिल कर खुद को महान विद्वान समझने लगे हैं । कहने को सभी गांधी सुभाष भगत सिंह की बात करते हैं लेकिन कोई उनकी दिखाई राह पर चलता नहीं कभी भी । 14 अगस्त 2012 को ब्लॉग पर लिखी कविता जो शायद पहली बार मैंने अपने शहर में आयोजित कवि गोष्ठी में पढ़ी थी से अपनी बात को विराम देता हूं ।


जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्ने आज़ादी हर साल मनाते रहे
शहीदों की हर कसम हम भुलाते रहे ।

याद नहीं रहे भगत सिंह और गांधी 
फूल उनकी समाधी पे बस चढ़ाते रहे ।

दम घुटने लगा पर न समझे यही 
काट कर पेड़ क्यों शहर बसाते रहे ।

लिखा फाइलों में न दिखाई दिया
लोग भूखे हैं सब नेता झुठलाते रहे ।

दाग़दार हैं इधर भी और उधर भी
आइनों पर सभी दोष लगाते रहे ।

आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे हुआ
बाड़ बनकर रहे खेत भी खाते रहे ।

यह न सोचा कभी आज़ादी किसलिए
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ भुलाते रहे ।

मांगते सब रहे रोटी , रहने को घर
पांचतारा वो लोग होटल बनाते रहे ।

खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन
वो सुनाते रहे लोग भी गाते रहे ।
 

 

मई 20, 2024

तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

    भक्ति समर्पण की चरम सीमा होती है लेकिन चाटुकारिता की शुरुआत ही उस सीमा से आगे पहुंच कर होती है । चाटुकारिता की तपस्या में व्यक्ति अपना सर्वस्व छोड़ कर किसी की वंदना में अपने विवेक का त्याग कर अपने आराध्य देवता की कही हर बात को स्वीकार करता है झूठ सच का अंतर नहीं किया जाता बस जिसे स्वामी समझा तन मन धन सब कुछ उसके हवाले , उसकी मर्ज़ी है जीने दे चाहे मार डाले । देश आज़ाद हुआ लेकिन अधिकांश लोग गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलना ही नहीं चाहते वही समझते हैं किसी की कैद में रहना भी आनंददायक अनुभूति करवाता है । आपने मुझे ठोकर लगाई मुझे प्रतीत हुआ कि ये भी आपका मुझसे सच्चा प्रेम ही है , मगर मुझे एहसास होने लगा है कि ऐसा करते हुए आपके नर्म कोमल पांव को कोई दर्द तो नहीं हुआ होगा । भगवान के चरणों में भक्त का स्वर्ग होता है मुक्ति का मार्ग है चरणवंदना से जो भी मिलता है । कलयुग में कितने ही आधुनिक अवतार दिखाई देते हैं कौन कितना महान है कहना कठिन है इसलिए सब को एक समझ कर कल्पना से उनकी आधुनिक कथा लिखने का प्रयास करते हैं सबसे पहले भूल चूक की गलती की क्षमायाचना अगर कुछ कोर कसर रह जाती है तो नादानी नासमझी समझ छोड़ देना । 
 
पहला अध्याय : - 
 
भीड़ ही भीड़ है लगता है कोई समंदर है जिस में इंसान कीड़े मकोड़े जैसे लगते हैं । कोई आता है मंच पर ख़ामोशी छा जाती है सभा भी निःशब्द लगने लगती है ऐसे में इक जानी पहचानी आवाज़ फिर वही बात दोहराती है । बताओ क्या मैंने कहा सच है जवाब आता है हाथ उठा कर सच है बिल्कुल वही सत्य है बाक़ी कुछ भी सच नहीं है । भाषण सच है हक़ीक़त झूठ आपके नाम की लूट है लूट सके जो भी ले लूट । कितना शानदार लिबास है कितना महंगा है सूट बूट आपको है सब करने की छूट रूठे दुनिया आप नहीं जाना रूठ । शतरंज का खेल है राजा रानी घोड़ा हाथी सबकी चाल अलग अलग है प्यादों की कैसी औकात दिन को भी कहना है रात । हमने दिल आपको सौंप दिया है संभाल सको तो है उपकार नहीं जो संभला क्या हुआ जाना ही है सागर पार दिल आखिर शीशा होता है हो जाता है चकनाचूर आप हैं कितने करीब हमारे लेकिन हम हैं कितनी दूर । कौन आपसे जीत सकेगा कैसे हो सकती है आपकी हार कौन है जिस को यकीन नहीं जो भी कहते हैं इश्तिहार ।  हाथ छुड़ाए जाति हो , निर्बल जान के मोहे , हृदय से जब जाओगे , तो सबल जानूंगा तोहे ।  भक्ति में अंधा होना भी अभिशाप नहीं वरदान साबित होता है आंखें बंद हों चाहे खुली बस वही दिखाई देता है । 

                                  ( इति श्री प्रथम अध्याय )
 
 
 
 surdas | Spirtual Awareness

मई 19, 2024

कितने गब्बर सिंह आज भी - 2 ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

  कितने गब्बर सिंह आज भी - 2  ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया 

किसी भी राजनैतिक दल के तथाकथित हाई कमांड या बड़े नेता अध्यक्ष सचिव इत्यादि को ये बात भूल कर भी नहीं सोचनी चाहिए कि आम लोग या जनता उनसे डर कर हाथ जोड़ती है उनका स्वागत करती है । ऐसा हमारे देश समाज का स्वभाव है सभी से प्रेम पूर्वक मिलना आदत होती है लेकिन जब कोई अनुचित ढंग से आचरण करता है या अहंकार प्रकट करता है तो अधिकांश लोग समझा भी देते हैं कि हमको उनकी ये बात पसंद नहीं है । लेकिन ये समस्या हर राजनीतिक दल में दिखाई देती है कि वहां दल में शामिल लोग कार्यकर्ता से सांसद विधायक पार्षद सरपंच आदि सभी अपनी खुद की बात भी खुलकर कहने का साहस नहीं करते हैं बल्कि अधिकतर गलत का भी विरोध नहीं समर्थन करते हैं किसी को खुश करने और नाराज़ करने से बचने की खातिर । ये विचित्र विसंगति है जिनको लोकतंत्र और विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का पक्ष लेना चाहिए वही खुद अपने लिए इसका महत्व नहीं समझते । ऐसा हमेशा से नहीं था और वामपंथी विचारधारा को छोड़कर अन्य सभी विचारधारा वाले दलों में तर्क और विचार विमर्श होना सामान्य बात थी । जिनको देश की आज़ादी का इतिहास पता है या संविधान बनाने की बहस चर्चा की जानकारी है अथवा शुरूआती दौर में संसदीय करवाई को लेकर समझा है उन्हें मालूम है कि जितना भी बहुमत सत्ताधरी दल को बेशक मिला हो विपक्ष की आवाज़ को सुना और समझा जाता था । अपने दल में भी विचारों का मतभेद कोई अचरज की बात नहीं समझी जाती थी । ये सब बेहद महत्वपूर्ण है हमारे लोकतंत्र को मज़बूत करने और परिपक्व करने के लिए । 

इधर आजकल दिखाई देता है की दलीय अनुशासन कायम रखने के नाम पर अपने ही दल के सदस्यों को किसी बंधक की तरह रहने को विवश किया जाता है । लेकिन जो ऐसा अपमानजनक व्यवहार सहन करते हैं उनको न अपने दल से न ही बड़े नेताओं से कोई सरोकार होता है उनको सिर्फ अवसर मिलते ही दल से कोई फायदा उठाने की इच्छा रहती है । साफ शब्दों में ऐसे लोग जिस भी दल में शामिल होते हैं किसी विचारधारा को लेकर नहीं बल्कि किसी नेता का सहारा पाकर अपना ज़मीर उसके पांव में रख कर जनता में कोई पहचान बनाने को करते हैं । ये कभी जनता की बात नहीं करते न जनता की समस्याओं की चिंता करते हैं बल्कि उनको किसी आका की भीड़ बनकर रहना स्वीकार होता है कभी कोई खैरात अथवा अनुकंपा हासिल करने की उम्मीद में कभी शायद जीवन भर तो कभी सुविधानुसार दलबदल कर इधर उधर भटकने की कोशिश किया करते हैं । जनता को ऐसे तथाकथित नेताओं से बचना चाहिए क्योंकि जो किसी गब्बर सिंह जैसे व्यक्ति की जीहज़ूरी करते हैं आपको भी अपमानित कर सकते हैं । चिंता की बात है कि हमने सच बोलना साहस से अपना पक्ष रखना छोड़ दिया है और हम इक ऐसे मतलबी समाज बनने को अग्रसर हैं जिस में स्वार्थ की खातिर नैतिकता आदर्श और ईमानदारी का त्याग कर चाटुकारिता को उचित समझ सकते हैं । 
 





कितने गब्बर सिंह आज भी ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

      कितने गब्बर सिंह आज भी ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया   

गब्बर सिंह आज भी ज़िंदा है एक नहीं कितने ही नाम से देश राज्य से नगर नगर तक और आज भी उसके नाम का डंका बजता है । लोकतंत्र है गब्बर सिंह जंगल गांव छोड़ कर महानगर में आकर बस गया है और साथ ही उस ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर खुद को मसीहा घोषित करने को अपना इक आईटी सेल बना लिया है । गब्बर सिंह आधुनिक डाकू अर्थात शासक बन गया है जनता को झूठे सपने दिखला कर चुनाव जीत गया है । बसंती अभी भी नादान है जय वीरू भी गब्बर सिंह के संगी साथी बनकर धन दौलत नाम शोहरत कमाने लगे हैं । उनको छोटी मोटी चोरी करने की ज़रूरत नहीं है गब्बर सिंह से गठबंधन कर सुःख चैन से मौज मस्ती करते हैं । उधर बसंती को इक और गब्बर सिंह अच्छा लगा तो उस से दोस्ती बना ली है हर गब्बर सिंह की अलग अलग शर्त होती है और जितने भी गब्बर सिंह हैं उन सभी को अपना गुणगान बड़ा अच्छा लगता है । आधुनिक गब्बर सिंह लूटने के कितने ही तरीके अपनाते हैं और अंधा बांटे रेवड़ी का तौर अपनाते हैं चोर सिपाही मिल बैठ मौज मनाते हैं खूब पकवान खाते हैं कितने परिधान बनवाते हैं किसी शीशमहल की शोभा बढ़ाते हैं । शीशे के घर में रहने वाले इक बात भूल जाते हैं कि अपने घर शीशे के हों तो पत्थर औरों पर नहीं चलाते हैं । 
 
इक बसंती इक गब्बर सिंह के शीशमहल चली आई , गब्बर सिंह नहीं मिलना चाहता था बसंती नहीं समझी सत्ता होती है हरजाई । गब्बर सिंह के घर पर उसके भरोसे के संगी ने बसंती की जमकर कर दी है पिटाई वफ़ा का बदला होता ही बेवफ़ाई । चोर चोर मौसेरे भाई लेकिन उनको समझ नहीं आई बसंती का किरदार क्या है किसी से कभी भी नहीं जो घबराई बसंती ने अपनी आवाज़ उठाई गब्बर सिंह की थी जो तन्हाई आहट पाकर खेलने लगी छुपा-छुपाई । राम दुहाई राम दुहाई जाने किधर से चीख दी सुनाई , आपकी पाप की जितनी कमाई सारी निकली लाख छुपाई आखिर हाल हुआ है ऐसा आगे कुंवा तो पीछे खाई । चालाकी कई बार की थी खुद जुर्म किया सज़ा किसी और को दिलवाई धीरे धीरे अपने छोड़ गए , हुई जहां भर में रुसवाई । जिस भी थाली की रोटी खाई छेद उसी में कर झूठी कसम उठाई । इक दिन बोला था इक नाई जिस के हाथ हो उस्तरा उस से कभी नहीं उलझना भाई , गब्बर को ये बात नहीं समझ आई शायद शामत उसकी आई । 
 
हमने सुनी थी इक कहानी सच कहती थी वो नानी , होती है जो समझदार जनानी ( महिला ) कोई उस से करता है  जब छेड़खानी उसको मज़ा चखाती है वो अकेली चलती नहीं बदमाशी मनमानी । गब्बर सिंह नहीं समझा छोटी सी बात जय वीरू का भी हो चाहे साथ बसंती से मत टकराना समझा देगी आपकी औकात । महिला को कमज़ोर समझना होती है बड़ी ही भूल , देखना कभी किसी देवी को होता है हाथ त्रिशूल । नारी  होती है बड़ी महान उसका मत करना अपमान वर्ना आफत में पड़ जाएगी जान नारीशक्ति को पहचान । सुन लो सभी के सभी गब्बर सिंह क्षमा मांग कर कर लो पश्चाताप छोड़ झूठी आन बान शान नहीं तो मिट जाएगा नाम ओ निशान ।
 

 

मई 17, 2024

आईने की दास्तां ( दर्द भी दवा भी ) डॉ लोक सेतिया

      आईने की दास्तां ( दर्द भी दवा भी ) डॉ लोक सेतिया

    कैसे बताऊं और किस किस को बताऊं कि मैं कोई सामान नहीं इक इंसान हूं , ज़माने से नहीं मैं खुद अपने आप से परेशान हूं । थोड़ा आसान भाषा में बताऊं तो पानी की तरह तरल होता तो जो जिस जगह जैसा चाहता मैं उसकी पसंद से अपना आकार बना लेता , सभी मुझे अपने जिस भी बर्तन में भरते मैं उनकी ज़रूरत अनुसार आसानी से उनकी सुविधा से वैसा हो जाता । कोई पत्थर जैसा होता तो लोग मुझे तोड़ कर या तराश कर कुछ भी बना लेते अच्छा बुरा कुछ भी भगवान चाहे शैतान की शक़्ल देते कोई फर्क नहीं पड़ता । हवा होता तो भी शोर नहीं करता ख़ामोशी से सभी को कोई झौंका बन होने का आभास करवाता रहता कभी शीतल कभी तपिश कभी गीलापन और मैं धीरे धीरे सभी में समा जाता किसी को एहसास ही नहीं होता मेरे होने का नहीं होने का होते हुए भी । शायद ये कोई अजनबी दौर है जिस में लोग खुद अपनी सोच अपनी समझ अपने अनुभव से नहीं जाने कितनी और बातों से मुझ से ही नहीं हर किसी से अनावश्यक परेशान होते हैं । कहते हैं किसी ने बताया किसी से सुना लोग आपको बुरा समझते हैं नापसंद करते हैं खुद जानते ही नहीं उनको मैं अच्छा बुरा लगता हूं तो क्या कारण है । कैसा समाज है ये जिस में सभी दुनिया की गलतियां ही ढूंढते हैं अच्छाई उनको दिखाई देती ही नहीं क्योंकि अच्छाई से किसी को कोई मतलब ही नहीं हर किसी की बुराई की चर्चा करने से अपने आप को बेहतर साबित करना चाहते हैं जबकि ज़माने में कोई भी इंसान हमेशा एक जैसा होता नहीं है । एक ही समय एक ही बात से कोई खुश होता है कोई नाराज़ सभी की अपनी इक अलग राय होती है भला सभी को कुछ पसंद आये ये कैसे हो सकता है जब वही कभी मीठा कभी नमकीन पसंद करते हैं ।
 
लोग कभी लिबास बदलते हैं कभी चेहरे भी बदलते रहते हैं तो कभी कोई नकाब लगा लेते हैं , मुझ में अपना अक़्स देख कर ख़फा होते हैं कि उनकी सूरत कितनी खूबसूरत है लेकिन मुझ को देख कर जैसी चाहते हैं दिखाई नहीं देती । आईने को दोष देते हैं कभी पत्थर से चूर चूर कर देते हैं मेरा नसीब है कि टूट कर भी हर टुकड़ा असली तस्वीर ही दिखलाता है । आईनाख़ाना है ये शहर ये समाज जिस में जिधर नज़र जाती है हर देखने वाले को खुद ही खुद नज़र आता है । अजब दौर है हर किसी के हाथ में पत्थर ही पत्थर हैं और हर शख़्स आईने को तोड़ने को बेताब है फूल भी खुशबू से ख़फ़ा ख़फ़ा लगते हैं । हर ज़र्रा आफ़ताब है हर जुगनू माहताब है हर किसी को मिला अज़ाब है ज़ालिम को मिला अम्न का ख़िताब है सावन में बरसती आग है । 
 
 

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया 

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग
आईने से यूँ परेशान हैं लोग ।

बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग ।

जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें
उन को ही देख के हैरान हैं लोग ।

अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग ।

आदमीयत  को भुलाये बैठे
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग ।

शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी
बन गए शहर की जो जान हैं लोग ।

मुझको मरने भी नहीं देते हैं
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग ।  
 
 

 


मई 16, 2024

हंसने की चाह ने रुलाया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         हंसने की चाह ने रुलाया है  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

लोग हर मोड़ पे रुक रुक के संभलते क्यूं  हैं , इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूं हैं । राहत इंदौरी जी की ग़ज़ल है , सरकार भला डर डर कर चलती है सत्ता की रेलगाड़ी तो हवाओं से तेज़ भागती है । इतना क्या कोई डरावना सपना देखा आधी रात को जिस से जागने के बाद भी निकलना कठिन हो गया है । सौ तरह के डर होते हैं साधारण आदमी के , शासक को सत्ता खोने का अकेला डर रहता है । इतनी गारंटी की बात है जादुई आंकड़ा भी आपने निर्धारित किया हुआ है फिर घबराना किसलिए ।  घबराना बेकार  टकराना है उनसे  जो विरोधी सामने खड़े हैं , उनसे सामना करिये , बिना कारण किसी शायर की नज़्म से नींद उड़ना , किसी गीत से दिल की धड़कन बढ़ना , निशानी है कहीं रक्तचाप बढ़ गया हो तो डॉक्टर से दवा मिलती है । साठ साल की उम्र में अधिकांश खाते हैं । अब किसी कमेडियन से भी डरना क्या शोभा देता है बल्कि आपके संसदीय क्षेत्र की जनता को हंसने मुस्कुराने का अवसर मिलता उनको वंचित करना ठीक नहीं है । जनाब अपने भीतर के सभी डरों को भगाओ अगर नहीं कर पाओ तो डर को छुपाओ सामने मत लाओ अपनी छाती का नाप बताया था फिर से दोहराओ । 
 
चुनाव कितना अलग होता जनाब भावुक होकर अश्कों की बारिश कर रहे हैं ऐसे में कोई जग को हंसाने वाला जनता को कहकहे लगवा रहा होता , शायद इसी विचित्र दृश्य का भय रहा होगा तभी सब तौर तरीके आज़मा उसको खेल के मैदान से ही बाहर कर दिया गया । शायरी कविता में दर्द बड़े काम आते हैं और ग़ज़ल तो लिखी ही अश्कों से जाती है । ग़ालिब कहते हैं रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं काईल  , जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है । आंसुओं की दास्तां लिखते लिखते कथाकार की कलम उदास हो जाती है । आशिक़ के अश्क़ों पर कितने बेमिसाल शेर हैं शायरी में अश्क़ का रुतबा बड़ा ऊंचा है मैंने भी कभी लिखा था  बस ज़रा सा मुस्कुराए तो ये आंसू आ गए वर्ना तुमसे तो कहना ये अफ़साना न था । ये राजनीति है जनाब यहां एक एक आंसू का हिसाब रखते हैं गिन गिन कर बदला लेते हैं । कोई कलाकार पेंटिग बना सकता है बादशाह के इंसाफ के तराज़ू के पलड़े पर कितनी लाशें एक पलड़े पर मगर झुका हुआ पलड़ा होता है जिस पलड़े पर किसी का इक आंसू गिर गया है । महिलाओं को अच्छी तरह मालूम है ये हथियार कभी नाकाम नहीं होता है उनका रोना किसी को जीवन भर रुला सकता है जब कोई तरकीब नहीं काम आती है आज़मा सकता है । बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें कौन समझ पाया है इक नज़्म मेरी से कोशिश करते हैं । याद रखना राजनेताओं की आंख के आंसू जब निकलते हैं तो ग़ज़ब ढाते हैं ।
 

          बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं ।  
 
 
 

डरते हैं सभी और कौन है जो हर पल किसी न किसी डर का शिकार नहीं होता , शायर राजेश रेड्डी जी की ग़ज़ल है :-

 
 
यहां हर शख़्स , हर पल , हादिसा होने से डरता है ,
खिलौना है जो मिट्टी का ,  फ़ना होने से डरता है ।

मेरे दिल के किसी कोने में , इक मासूम -सा बच्चा ,
बड़ों की देख कर दुनिया , बड़ा होने से डरता है ।

न बस में ज़िन्दगी इसके , न क़ाबू मौत पर इसका ,
मगर इन्सान , फिर भी कब , ख़ुदा होने से डरता है ।

अज़ब ये ज़िन्दगी की क़ैद है , दुनिया का हर इन्सां
रिहाई मांगता है , और रिहा होने से डरता है ।
 

 


मई 15, 2024

बहुत देर लग गई समझने में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बहुत देर लग गई समझने में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       (  चलते चलते ,        चलते चलते ,        चलते चलते ,    चलते चलते  .... )

जनता भोली है कहां समझती है सियासत की उल्टी सीधी चालों को , अभी भी कुछ लोगों को यकीन नहीं हो रहा जनाब भी ऐसे निकले । कभी सुनते थे इक कहावत बड़े बज़ुर्ग बताते थे कि औरत शादी के कुछ ही महीने बाद जान जाती है कौन कैसा उल्लू उसके पल्लू से बंधा है । बस साल भर होते होते हर पत्नी अपने पति को बदलने को कोई कोर कसर नहीं छोड़ती , लेकिन पुरुष जीवन भर कोशिश करते करते थक कर हार जाता है किसी भी नारी को समझना संभव ही नहीं है पुरष कभी पत्नी को बदलने को नहीं सोचता है जो मिल गया मुक़्क़दर समझ लिया । शासक भी किसी पहेली से कम नहीं होते हैं जनता हमेशा पहचानने में धोखा खाती रहती है । लेकिन पांच साल बाद भी कोई अपनी वास्तविक सूरत जनता से छिपाए रखने में सफल हो फिर से झांसे में रख सके आजकल ये आसान नहीं है । काठ की हांडी दो बार चढ़ाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है । बस अब पासा उलटा पड़ गया है लोग उनकी हर बात को हंसी में उड़ाने लगे हैं जनाब को दिन में तारे नज़र आने लगे हैं ।  किसी दार्शनिक ने गहन शोध किया इस को समझने को कि महिलाओं को पुरुष को समझने में आसानी होती किस कारण है । ये भी कोई राज़ की बात नहीं है मगर शायद किसी ने ध्यान ही नहीं दिया कि कौन सी पाठशाला है जिस में ये शिक्षा मिलती है । आखिर पता चला कि सभी महिलाएं जब भी कहीं मिल बैठती हैं घर गली शहर से देश दुनिया की जानकारी आदान प्रदान करती हैं वो भी नमक मसाला लगाकर । आप चाहे कुछ भी नाम दे लो वास्तव में उनकी बातचीत किसी कथा कहानी से भी बढ़कर ऐसा ज्ञान देती है जो भविष्य का निर्माण कर सकता है , इस विषय पर इतना ही अब असली बात सत्ता की सियासत को समझने की करते हैं । अर्थात जिन बातों को हमने कभी महत्व नहीं दिया उन से सीख कर किसी ने देश की जनता को रात को दिन दिन को रात समझने पर सहमत कर अपना खोटा सिक्का चलाया दो दो बार । 
 
 आपने सुना होगा दर दर से खैरात मांगना भिक्षुक को कितना अनुभवी बना देता है , कितने साल जिस ने यही पढ़ाई की हो उसकी समझदारी चतुराई और अपना जादू चलाने की कला कितनी विलक्षण हो सकती है । घर घर की महिलाओं से हलवा पूरी खाना बड़े बड़े साधु संत महात्मा भी कभी मार खा जाते हैं लेकिन जिस ने जीवन भर बिना कोई काम धंधा किए खाना ही नहीं बल्कि सिर्फ अपनी पसंद का ही खाना है ऐसा संकल्प लिया हो वो क्या नहीं कर सकता । बस लगातार शासक बने रहने को यही उनका गुरु मंत्र उनके आराध्य देव ने समझाया था । उनका मंत्र उनके ही नहीं उन सभी के भी बड़े काम आया था जिन्होंने उनको अपना देवता भगवान मसीहा समझ रात दिन उनका गुणगान सुनाया था और उन तक ये समाचार पहुंचाया था । जिनकी औकात नहीं थी उन्होंने भी परमपद पाया था । कोई माने चाहे नहीं माने उनकी पत्नी को बहुत पहले समझ आ गया होगा कि उसका साथ नहीं छोड़ जाना ही सही निर्णय है । आपको भी उनसे मोह त्याग देना चाहिए कब तक वो दर्द सहोगे जो दर्द नहीं था न दवा था बस इक ज़हर था मीठा पी लिया तो ऐसा हुआ कि ज़िंदा रह कर भी कभी जिये ही नहीं । कुछ नहीं करते हुए बहुत कुछ करने का भरम कायम रखना हर किसी को ये कला नहीं आती है । 
 
कयामत की घड़ी होती है जब सांस चुनावी नतीजों में अड़ी होती है , हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है , बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा - वर पैदा । अल्लामा इक़बाल का शेर है आपने पाक़ीज़ा फ़िल्म में शुरुआत ही में सुना तो होगा । पाक़ीज़ा की पाक़ीज़गी की तरह उनके चाहने वालों को उन जैसा कभी कोई नज़र आया नहीं और न कभी कोई आएगा उम्र भर , दिल आने की यही निशानी है । कहते हैं हम आपसे हैं ज़िंदगी आपकी है मौत भी दो तो भी आपकी मेहरबानी है । इक्कीसवी सदी के इश्क़ की बस यही इक कहानी है अगर उनके चेहरे पर शिकन आती है तो मर जाती उनके चाहने वालों की नानी है । उनको जा के समझाना खुद अपनी नादानी है , जनता भी हंस जैसी है जब कोहरा छटता है सब दिखाई देता है और कर देती दूध का दूध , पानी का पानी है । अंधकार की सीमा होती है लेकिन इक दिया जलता है तो रौशनी दूर दूर तलक अंधेरे को ख़त्म कर देती है । फिर सुबह होगी , नया ज़माना आएगा कोई आशा की किरण जगाएगा वक़्त बदलेगा नया दौर वापस लाएगा । आप भी पाक़ीज़ा फ़िल्म का गीत गाएं , यूं ही कोई मिल गया था सरे राह चलते चलते ।
 

 

मई 14, 2024

शर्म उनको मगर नहीं आती ( जनता मालिक है भिखारी नहीं ) डॉ लोक सेतिया

     शर्म उनको मगर नहीं आती ( जनता मालिक है भिखारी नहीं ) 

                               डॉ लोक सेतिया  

आज की बात की शुरुआत अपनी इक ग़ज़ल से करता हूं । खुद को खेवनहार कहने वाले देश की नैया को खुद डुबोकर कर भी अपने को मसीहा बताते हैं , शासक दल चाहे विपक्षी दल जब जनमत पाने की खातिर ऐसा जताते हैं जैसे ये कोई दानवीर हैं और देश की जनता उनके रहमो करम पर आश्रित है और वोट देने से उसको कितनी सारी खैरात मिलेगी या वो देते रहे हैं जबकि वास्तविकता बिल्कुल विपरीत है । कोई राजनेता कोई शासक जनता को कुछ भी नहीं देता है बल्कि सत्ता पाकर खुद ये सभी बोझ बन जाते हैं और वो बोझ इनकी सुख सुविधाओं और नाम शोहरत की हसरत इस देश की जनता की खून पसीने की कमाई से होता जो  दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है जिसकी कोई सीमा ही नहीं है । एक एक कर विस्तार से चर्चा करते हैं पहले जिस ग़ज़ल की बात की है उसे पढ़ते हैं । 

 

 हमको ले डूबे ज़माने वाले ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको ले डूबे ज़माने वाले
नाखुदा खुद को बताने वाले ।

देश सेवा का लगाये तमगा
फिरते हैं देश को खाने वाले ।

ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम
हम न सर अपना झुकाने वाले ।

उनको फुटपाथ पे तो सोने दो
ये हैं महलों को बनाने वाले ।

काश हालात से होते आगाह 
जश्न-ए-आज़ादी मनाने वाले । 
 
तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं
मेरी अर्थी को उठाने वाले ।

तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं
मुझको हर बार हराने वाले ।

मैं तो आइना हूं बच के रहना
अपनी सूरत को छुपाने वाले ।

चलिए थोड़ा ध्यान से समझते हैं ये सभी राजनेता हमको क्या ख़्वाब दिखला रहे हैं और क्या क्या एहसान जतला रहे हैं । आपको पेट भरने को दो वक़्त रोटी खिलाने की बात करते उनको शर्म से डूब मरना चाहिए जब बड़ी बड़ी भव्य इमारतें सड़कें आधुनिक साधन और बेहद शाही ढंग से जीने को उनको मनचाहे ढंग से मिलता है जनता की सेवा की आड़ में प्रतिनिधि बन कर । जनता देश की मालिक है देश का खज़ाना उसी का है जनप्रतिनिधि बनाया जाता है समान वितरण करने को बड़े छोटे अमीर गरीब का अंतर मिटाने को न कि अमीर को और अमीर और गरीब को और गरीब बनाने की नीतियों को लागू करने को । खुद अपने लिए इतना अधिक उपयोग करना जिस से जनता को कुछ भी मिलने को नहीं बचे इसे लूट नहीं देश के साथ छल और अमानत में ख़यानत कहते हैं । सेवक को वेतन सुविधा मालिक से हज़ार लाख गुणा भला कैसे मिल सकता है । आपको कुछ सौ या कुछ हज़ार जीवन यापन करने को देना कोई उपकार नहीं लोकतांत्रिक समाजिक न्याय और समानता का कर्तव्य निभाना होता है और वो भी जनता से ही कितनी तरह से मिले करों आदि से न कि किसी दल या नेता की तिजोरी से । यकीन नहीं आये तो सभी राजनेताओं की नकद धनराशि जायदाद बंगले गाड़ियां कितनी सम्पत्तियां बढ़ती सामने हैं छिपी हुई की बात को छोड़ कर भी । अजब धंधा है जिसे जनसेवा कहते हैं जिस में राजाओं सा जीवन आनंद पूर्वक बिताते हैं फिर भी तिजोरी खाली नहीं होती और भी ठसाठस भरती जाती है ।
 
जनता को कभी छोटा सा घर बनाने को जगह या निर्माण को सामान भी मिलता है तो उसका अधिकार भी आदर पूर्वक नहीं बल्कि ढिंढोरा पीटते हैं कितने गरीबों की क्या सहायता की । जनता चुनाव में माई बाप लगती है उस से भीख मांगते हैं वोट की वादा करते हैं देश की जनता की समस्याओं का समाधान करने का । कभी ईमानदारी से वादा निभाया गया होता तो आधुनिक सचिवालय संसद भवन से पहले देश के हर नागरिक को रहने को घर शिक्षा स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाते । बुनियादी ज़रूरतें जनता को नहीं मिलती तो उस आज़ादी का कोई महत्व नहीं रह जाता है जिस में शोषण अन्याय और बेबसी जनता का नसीब है । देश को गुलामी से मुक्त करवाने को आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों का ये सपना तो कभी नहीं था । साधु का भेस धारण कर लुटेरे होते थे कहानियों की बात क्या आज की कड़वी सच्चाई नहीं है । संविधान ने जनता को सभी अधिकार देने की बात कही है मगर सरकारों ने नागरिक को उनके हक नहीं बल्कि खैरात देने की बात कह कर लोकतंत्र का उपहास किया है । अभी बहुत कुछ बाक़ी है कहने समझने को लेकिन विराम देने से पहले इक अपनी ग़ज़ल और पेश करता हूं । टीवी चैनल पर विज्ञापन दे कर शोर मचा रहे हैं कि हमने कितना दिया कितना आपको मिलेगा ये कितना बड़ा धोखा है सेवक मालिक को खैरात बांटने की चर्चा कर क्या साबित करना चाहता है ।
 

सरकार है बेकार है लाचार है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सरकार है  , बेकार है , लाचार है
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है ।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को
कहने को पर उनका खुला दरबार है ।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल
सब की दवा करता जो खुद बीमार है ।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है ।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है ।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है
इस बात से क्या आपको इनकार है ।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है ।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है ।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है ।  
 

 


जीत-हार ग़ज़ब इश्तिहार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          जीत-हार ग़ज़ब इश्तिहार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

पहली पहली बार नखरे हज़ार नैया डूबी भवसागर पार , उनको नहीं कुछ भी स्वीकार चाहे जीत हो चाहे हो हार बनवा लिए हैं दो इश्तिहार किसी की भी नहीं होती सरकार , ख़ाली है सारा संसार । तैयारी रखनी पड़ती है जाने कब बधाई देनी पड़ती है कब शोक जताना पड़ता है । आना जाना पड़ता है निभाना नहीं चाहते मगर रिश्ता निभाना पड़ता है । चूड़ियां मंगलसूत्र भला इनसे उनका क्या वास्ता जिधर नहीं जाना क्यों पूछना उस का रास्ता भगवान का वास्ता इक बार सच सच बताओ करण जोहर बना रहे इटेलियन पास्ता बस यही नहीं समझ आता उस में टमाटो सॉस डालते हैं कि नहीं । कॉफी विद करण के हैं जो मेहमान उनकी निराली है शान ऊंची दुकान फीके पकवान । फिर भी खूब है उनकी बढ़ाई अपने मुंह मिट्ठू मियां उन जैसा कहां कोई हरजाई खाई जमकर दूध मलाई ज़िंदगी दर दर ठोकर खा बिताई लेकिन किस्मत जब राजनीति में लाई तब जाकर कहानी समझ आई किस्मत मेहरबान गधा पहलवान कहावत झूठी नहीं मेरे भाई । टीवी पर उनका भाषण दिखलाना है या साक्षात्कार प्रसारित करना है प्रचार सचिव की दुविधा बड़ी है , जाँनिसार अख़्तर की ग़ज़ल याद आई है । 
 

इन्क़लाबों की घड़ी है ,  हर नहीं हां से बड़ी है । 

ज़िन्दगी हाथ पसारे ,  आज रस्ते पे खड़ी है । 

कभी ऐसा भी लगा है , ज़िन्दगी बंद घड़ी है । 

कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है ।  

 

      (   इन्क़लाबों  = परिवर्तन  ) 

                    (  जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल  ) 

आख़िर साहस कर पूछना पड़ा जनाब आपको किस बात का डर है , इधर उधर देखा कोई नहीं सुनने वाला तब करीब आकर कान में फ़ुसफ़ुसा कर बोले बस सीधे सवालात का डर है । कहीं कोई काली घटाएं नहीं मगर मुझे जाने क्यों बेमौसमी बरसात का डर है । कुछ भी नहीं बदलने वाला आने वाले हैं जो उन हालात का डर है ।  मुझे तपती दुपरही में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अटल जी की कविता पढ़ कर लगने लगा किसी चांदनी रात का डर है । दुश्मनों की हर चाल समझता हूं दोस्तों की दोस्ती से घबराता है मन जिनको भी अपना बनाते हैं लोग ज़ख़्म उन्हीं से पाते हैं लोग राजनीति का मिजाज़ अजब है वक़्त से पहले बदल जाते हैं लोग , मेरी वफ़ाओं को बार बार आज़माते हैं लोग और मुझी पर बेवफ़ाई की तोहमत लगाते हैं लोग । मेरा अधूरा इक अरमान है मुझ से बड़ा क्योंकर कोई विधान है जो है नाम वाला वही तो बदनाम है । आगाज़ था सुहाना क्यों दिखाई देता आखिर बुराई का होता खराब अंजाम है । हाथ में किसी और के मयक़दा है सुराही वही मेरा ही ख़ाली जाम है । आपने पी है क्या कहना पड़ा उनकी बहकी बहकी बातों से लगने लगा थोड़ा संकोच कर बोले तुमने चखी है कभी , नहीं तौबा तौबा मैंने कहा । हंस कर बोले घबराओ नहीं सभी कहते हैं ग़म में भी पीते हैं ख़ुशी में भी पीते हैं , अपनी किस्मत कैसी है हरदम रहते रीते के रीते हैं । सत्ता भी क्या चीज़ है कहते थे सुनते थे सोने में धतूरे से सौ गुणा नशा होता है लेकिन ये राज़ कोई नहीं जानता सत्ता का नशा उन सभी से बढ़कर होता है कितना चढ़ा कोई नहीं समझ पाता और जब उतरता है तब ख़ुमार को समझना और भी कठिन होता है । मेरे शहर में कोई है जो हर बार चुनाव घोषित होते ही सड़क पर कभी रोते रोते हंसता है कभी हंसते हंसते रोता है । ये रिश्ता बड़ा ज़ालिम होता है सब कुछ पाकर ही कोई खुद को खोता है यही कहलाता राजनैतिक समझौता है । अपनी तिजोरी का हर सिक्का ही खोटा है उसको नहीं पता ये भी सच होता है । अभी दुविधा है कुछ दिन का इंतिज़ार है चलो कुछ रंग बदलते हैं किसी शायरी की महफ़िल में चलते हैं । जाँनिसार अख़्तर की इक और ग़ज़ल पढ़ते हैं । 

                       (  जाँनिसार अख़्तर जी की ग़ज़ल  )

ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर ,  एक नदी में कितने भंवर । 

लाख़ तरह से नाम तेरा ,  बैठा लिक्खूँ कागज़ पर । 

रात के पीछे रात चले  ,  ख़्वाब हुआ हर ख़्वाबे सहर । 

कितना मुश्क़िल कितना कठिन , जीने से जीने का हुनर ।

         (    ख़्वाबे सहर =  सवेरा का सपना  )





मई 12, 2024

खिलाए फूल जिन्होंने पत्थर खा रहे ( अहसान फ़रामोश लोग ) डॉ लोक सेतिया

       खिलाए फूल जिन्होंने पत्थर खा रहे ( अहसान फ़रामोश लोग ) 

                             ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

ये बात लिखना कितना दर्दनाक अनुभव करवाता है अल्फ़ाज़ नहीं हैं बताने को , इधर इक चलन बन गया है उनकी अनुचित आलोचना करने का जिन्होंने अपना जीवन देश पर न्यौछावर कर दिया । अफ़सोस तो तब होता है जब ऐसी आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले खुद जानते समझते ही नहीं कि हमने क्या किया है । देश के लोकतंत्र पर कुछ लोग बोलते हैं कि इस देश के लोग इस काबिल ही नहीं और उनको लगता है कि जिन कुछ देशों में सिर्फ एक ही दल की सरकार होती है कोई विकल्प ही नहीं होता वो अच्छा है । शायद उनको ध्यान नहीं रहता कि तब उनको ये बोलने तक का भी अधिकार नहीं मिलता । सिर्फ बोलने की आज़ादी ही नहीं बल्कि बहुत कुछ बल्कि सभी कुछ जो हमको हासिल हुआ होता है और भविष्य में कितना कुछ और मिलेगा उनको कल्पना ही नहीं कि बिना लोकतांत्रिक व्यवस्था हम किसी अनचाही अनदेखी कैद में किसी घुटन भरे माहौल में कितनी बेबसी से जीते । सैंकड़ों साल जिस आज़ादी की खातिर अनगिनत लोगों ने अपनी ज़िंदगी ही नहीं अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उस की कीमत ही नहीं जानी हमने और बिना सोचे समझे इतना तक कहने लगे हैं कि देश की जनता को आज़ादी या लोकतंत्र मिलना ही नहीं चाहिए । हैरानी तब होती है जब कभी वही लोग जिस को मसीहा ही नहीं मानते थे बल्कि विश्वास करते थे कि उस को कभी कोई पराजित नहीं कर सकता है अब उसी की पराजय की कल्पना मात्र से उन लोगों का मानसिक संतुलन इतना बिगड़ गया है कि वो किसी भी हद तक घटिया और अतार्किक बात कह सकते हैं । लोकतंत्र की ताकत है जो आज भी किसी को सर बिठा भी सकती है और जब सही साबित नहीं हो सत्ता से बेदखल कर आसमान से नीचे धरती पर ला सकती है जो उनको मंज़ूर नहीं जिन्हें सब कुछ बिना कीमत चुकाए चाहिए ।
 
इक काल्पनिक कहानी है कुछ लोगों को इक शानदार बगीचा फ़लदार पेड़ रंग बिरंगे फूल और इक बेहद खूबसूरत दुनिया बिना किसी मेहनत विरासत में मिल जाती है । लेकिन उनको उन सभी की अहमियत पता नहीं होती और अपनी मनमानी और विनाशकारी प्रवृति से सब तहस नहस कर देते हैं । आपने कई कहानियां सुनी होंगी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी से लेकर बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे जैसी लेकिन यहां दो अलग अलग लोककथा नीतिकथा से शासक और मतलबी स्वार्थी लोगों का चरित्र समझ आ सकता है इतना ही नहीं बल्कि उन दोनों को मिलाकर आज की कड़वी वास्तविकता को पूरी तरह समझ सकते हैं ।  कितनी अजीब बात है कि जिन लोगों से आपेक्षा थी कि साधन सुविधा हासिल कर अपने स्वार्थों से इतर समाजिक समानता और मानवता को लेकर कोई सार्थक पहल या प्रयास करेंगे शिक्षित धनवान लोग उनको खुद के सिवा किसी की भी कोई चिंता नहीं । उनको अपनी ज़िंदगी में कोई खलल नहीं चाहिए भले आस पास तमाम लोग बर्बाद होते रहे अन्याय शोषण सहने को विवश हों । अभी तक देश का लोकतंत्र बेशक जीर्ण शीर्ण अवस्था में भी कायम है और साहस रखता है बदलाव की तो उन्हीं अशिक्षित उपेक्षित लोगों के जीवट की बदौलत ही है । वही लोग जिनको शायद आवश्यकता से बढ़कर किसी तरह मिल गया आज खुद को समझदार और उनको नासमझ मानते हैं जो पीछे रह गए हैं । जिस देश में सभी इक दूसरे का दुःख दर्द नहीं समझें और वंचित लोगों की अधिकारों की परवाह तक नहीं करते उस देश समाज का कल्याण हो भी कैसे । अपने लिए अधिकार मांगने वाले शोषित वर्ग को मानवाधिकार तक मिलने की बात पर चिंतन नहीं करते । समाज हम सभी से बनता है अफ़सोस हर कोई ख़ुदगर्ज़ होकर सिर्फ अपनी बात समझता है अगर हमको कोई परेशानी नहीं तो बेशक समाज रसातल की तरफ जाता रहे हमको क्या । जिन्होंने खुद कोई कर्तव्य निभाना ज़रूरी नहीं समझा उनको शिकायत बहुत हैं उनकी नींद में खलल नहीं पड़ना चाहिए । धार्मिक हैं घोषित है इतना काफी नहीं धर्म क्या है देश से प्यार क्या है नहीं जानते हैं । मौज मस्ती फज़ूल की बातें करना आसान है देश की वास्त्विक गंभीर समस्याओं पर चिंतन करना उनका समाधान खोजना हमारा भी कर्तव्य है सिर्फ सरकार प्रशासन पर सभी नहीं छोड़ सकते हैं । अधिकांश सरकारी विभाग अधिकारी कर्मचारी जनता के प्रति कोई कर्तव्य नहीं निभाते बस अपने लिए इक सुरक्षित जीवन चाहते हैं उसकी कीमत भले ज़मीर की बात को अनसुना कर लूट और भ्र्ष्टाचार का अंग बन जाना हो देश जनता की सेवा को भूलकर ।  दो वर्ग इक शासक बनकर गुलछर्रे उड़ाता है दूजा मतलबी और संवेदनारहित आचरण करता खुद पर केंद्रित है और उन दोनों के बीच में तीसरा वर्ग पिसता रहता है कदम कदम पर ज़ुल्म सहता हुआ ख़ामोशी से बेबस होकर । ज़िंदा है इक सपने की आस लिए कि किसी दिन देश में सभी को अपना अपना हिस्सा मेहनत का फल मिलेगा , ये बदल छटेंगे और कोई नई रौशनी इक नया दौर आएगा , हर बार चुनाव में वोट डालता है यही सोच कर । बार बार निराश हो कर भी उस ने हौंसला छोड़ा नहीं है , हमारे लोकतंत्र की बुनियाद उन्हीं से है । जो पहली कतार में खड़े हैं उनको सिर्फ अपने से आगे वालों से आगे जाना है पीछे वालों की उनको परवाह नहीं चाहे खुद उनके कारण ही वो पिछड़ गए हैं ।  समझने को दो कथाएं पढ़ना उचित होगा ।
 
 

                          धरती का रस ( नीति कथा )

 

एक बार इक राजा शिकार पर निकला हुआ था और रास्ता भटक कर अपने सैनिकों से बिछड़ गया । उसको प्यास लगी थी , देखा खेत में इक झौपड़ी है इसलिये पानी की चाह में वहां चला गया । इक बुढ़िया थी वहां , मगर क्योंकि राजा साधारण वस्त्रों में था उसको नहीं पता था कि वो कोई राह चलता आम मुसाफिर नहीं शासक है उसके देश का । राजा ने कहा , मां प्यासा हूं क्या पानी पिला दोगी । बुढ़िया ने छांव में खटिया डाल राजा को बैठने को कहा और सोचा कि गर्मी है इसको पानी की जगह खेत के गन्नों का रस पिला देती हूं । बुढ़िया अपने खेत से इक गन्ना तोड़ कर ले आई और उस से पूरा गलास भर रस निकाल कर राजा को पिला दिया । राजा को बहुत ही अच्छा लगा और वो थोड़ी देर वहीं आराम करने लगा । राजा ने बुढ़िया से पूछा कि उसके पास कितने ऐसे खेत हैं और उसको कितनी आमदनी हो जाती है । बुढ़िया ने बताया उसके चार बेटे हैं और सब के लिये ऐसे चार खेत भी हैं । यहां का राजा बहुत अच्छा है केवल एक रुपया सालाना कर लेता है इसलिये उनका गुज़ारा बड़े आराम से हो जाता है । राजा मन ही मन सोचने लगा कि अगर वो कर बढ़ा दे तो उसका खज़ाना अधिक बढ़ सकता है । तभी राजा को दूर से अपने सैनिक आते नज़र आये तो राजा ने कहा मां मुझे इक गलास रस और पिला सकती हो । बुढ़िया खेत से एक गन्ना तोड़ कर लाई मगर रस थोड़ा निकला और इस बार चार गन्नों का रस निकाला तब जाकर गलास भर सका । ये देख कर राजा भी हैरान हो गया और उसने बुढ़िया से पूछा ये कैसे हो गया , पहली बार तो एक गन्ने के रस से गलास भर गया था । बुढ़िया बोली बेटा ये तो मुझे भी समझ नहीं आया कि थोड़ी देर में ऐसा कैसे हो गया है। ये तो तब होता है जब शासक लालच करने लगता है तब धरती का रस सूख जाता है । ऐसे में कुदरत नाराज़ हो जाती है और लोग भूखे प्यासे मरते हैं जबकि शासक लूट खसौट कर ऐश आराम करते हैं । राजा के सैनिक करीब आ गये थे और वो उनकी तरफ चल दिया था लेकिन ये वो समझ गया था कि धरती का रस क्यों सूख गया था । 
                                                                                                                                       

                       तू पी -तू पी ( लोक कथा )

 

ये राजस्थानी लोक कथा है । बचपन की दो सखियां रेगिस्तान से गुज़र रही होती हैं । रास्ते में उनको एक विचित्र दृश्य नज़र आता है । हिरणों का इक जोड़ा वहां मृत पड़ा होता है और पास में थोड़ा सा पानी भी होता है । इक सखी पूछती है दूसरी सखी से भला ऐसा क्योंकर हुआ होगा , ये दोनों प्यासे कैसे मरे हैं जब यहां पानी भी था पीने को । दूसरी सखी बताती है ये दोनों इक दूजे को प्रेम करते थे , प्यास दोनों को बहुत लगी थी लेकिन पानी कम था इतना जो इनमें से एक की प्यास ही बुझा सकता था । दोनों इक दूजे को कहते रहे तू पी - तू पी , मगर पिया नहीं किसी ने भी । दोनों चाहते थे कि जिसको प्रेम करते वो ज़िंदा रहे और खुद मर जायें , साथ साथ मर कर अपने सच्चे प्रेम की मिसाल कायम कर गये । सखी इसको ही प्यार कहते हैं ।

       बहुत साल बीत गये और वो दोनों सखियां बूढ़ी हो गई । फिर रेगिस्तान में उनको वही दृश्य दिखाई दिया और फिर एक सखी ने कहा दूसरी से कि देख सखी वही बात आज भी नज़र आ रही है । दूसरी सखी बोली अरी सखी तू किस युग की बात करती है ये वो बात नहीं है । हालत वही थी कि दोनों प्यासे थे मगर पानी थोड़ा था जो किसी एक को बचा सकता था । ये दोनों आपस में लड़ते रहे पानी खुद पीने के लिये । दूसरे को नहीं पीने देने के लिये लड़ते हुए मर गये , किसी ने भी दूसरे को पानी नहीं पीने दिया । ये आज के प्रेमियों के स्वार्थ की बात है सखी , अब वो प्यार कहां जो दूजे के लिये जान देते थे ।


इस व्यथा कथा का भावार्थ :-

शासक से लेकर स्वतंत्रता पूर्वक आनंदमय जीवन मिलने पर हमने उन सभी देश के महान नायकों और अथक मेहनत से देश को शानदार भविष्य देने को बड़ी दूरदर्शिता से इक संविधान देने और लोकतांत्रिक व्यवस्था की राह दिखाने वालों पर अनुचित दोषारोपण करने का आपराधिक आचरण किया है । यही होता है फलदार पेड़ को लोग पत्थर मारते हैं । 

Krishi Jagran Hindi - दुनिया विरोध करे तो तुम डरना मत क्योंकि जिस पेड़ पर  फल लगते हैं दुनिया उसे ही पत्थर मारती है. #goodnight #goodnightquotes  #hindiquotes #motivationalquotes ...



 

मई 09, 2024

लोकतंत्र हाज़िर हो ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

       लोकतंत्र हाज़िर हो ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

 
 इसको लोकतंत्र नहीं कहते हैं , किसी शासक को समझ आ गया हो कि उसने अपने देश अथवा राज्य अथवा जिस भी क्षेत्र से कोई निर्वाचित हुआ हो वहां की जनता का भरोसा उस पर नहीं रहा है फिर भी वो सत्ता या पद या सदस्यता पर बने रहना चाहता है । अल्पमत साबित होने का इंतज़ार करना सत्ता की भूख का प्रमाण है , और ऐसे में बहुमत जुटाने को साम दाम दंड भेद अपना कर विरोधी नेताओं को अपनी तरफ लाना नैतिकता को छोड़ किसी भी तरह कुर्सी पर बने रहना लोकलाज को भुलाना है । लोकलाज और शर्मो हया का त्याग करना आपको निम्न स्तर की राजनीति करने पर विवश कर लोकतंत्र की हत्या कर देने का अपराध करवाता है । बिना सोचे विचारे किसी भी नेता को अपने दल में शामिल करना भले उसकी कोई विचारधारा नहीं हो और वो आपराधिक छवि का बदनाम व्यक्ति हो ये प्रमाणित करता है कि आपको देश समाज की कोई चिंता नहीं और सत्ता की खातिर आप किसी भी हद तक समझौता कर सकते हैं ।  तलाश लोकतंत्र की और दर्शन दो लोकतंत्र शीर्षक से दो पोस्ट 2014 जनवरी में पब्लिश की गई हैं ये उस श्रेणी का नवीनतम अध्याय है । आप इसको इक जनहित याचिका समझ सकते हैं देश की जनता का भरोसा डगमगा रहा है उसे महसूस होने लगा है कि स्वर्ग और नर्क की तरह संविधान में वर्णित लोकतंत्र भी इक सुंदर कल्पना मात्र है अभी तक उसने खुद को जीवंत साबित नहीं किया है । अदालत वकील दलील सबूत सभी कुछ ख़ास लोगों की कैद में बंद हैं जनता उन तक कभी नहीं पहुंच पाती है । हर कोई वास्तविक लोकतंत्र को देखना महसूस करना चाहता है मगर कौन उस का पता ठिकाना बताए कहीं कोई उस की सुनवाई करने वाला नहीं है । 
 
ये अदालत भी ऊपरवाले की अदालत की तरह है जो सुनवाई कर सकती है समझ भी सकती है लेकिन कोई निर्णय नहीं कर सकती है क्योंकि उस के पास फैसला लागू करने की कोई व्यवस्था नहीं है और जिन्होंने देश के लोकतंत्र का हरण कर अपनी किसी तथकथित अशोक वाटिका में सीता की तरह बंधक बनाया हुआ है वो रावण से अधिक हठी और अहंकारी हैं । उन सभी को कोई अदालत दंडित नहीं कर पाई कभी भी वो सभी गुनहगार रंगे हाथ पकड़े जाने के बावजूद बेगुनाह साबित होते रहे हैं । अदालत की आंखों पर काले रंग की इक पट्टी बंधी है जिस में सब दिखाई देता है जैसा अदालत और न्याय व्यवस्था देखना चाहती है । अदालत के हाथ इक कोड़ा है अवमानना का दोष बता कर किसी को भी खामोश रखा जा सकता है । किसी सिरफिरे ने मुक़दमा दायर किया है उसको लोकतंत्र से खतरा है उसके जीने के अधिकार का सवाल है इसलिए विवश होकर अदालत ने आदेश जारी किया है लोकतंत्र जहां कहीं भी हो उसे अदालत में हाज़िर होना होगा । 
 
लोकतंत्र को धनवान लोगों राजनेताओं और गुंडों लुटेरों ने अपनी आलिशान अटालिकाओं में छुपा कर रखा हुआ था और उसको समझाया गया था तुम यहीं पर सुरक्षित हो । आजकल रईस अमीर लोग किसी पेड़ को घर के आंगन में गमले में बोनसाई बना रखते हैं जो सिर्फ उन्हीं के लिए फलदाई होता है , शायद देश का लोकतंत्र भी कुछ लोगों ने बौना बनाकर सत्ता की हवेली की सजावट की वस्तु बना दिया है । अदालती फरमान से सभी अधिकारी कर्मचारी उस को ढूंढने लगे हैं ये पता चलते ही राजनेताओं साहूकारों को डर सताने लगा है क्योंकि उन्होंने सिर्फ लोकतंत्र का अपहरण ही नहीं किया बल्कि उसको जीते जी मृत बनाने का भी अपराध किया है । सरकार देश की राज्यों की घबरा गई हैं उनका अस्तित्व खतरे में है जब लोकतंत्र ही नहीं बचा तो उनका होना संविधान के अनुसार नहीं माना जा सकता है । बचाव को सभी सरकारी वकील कितने ही नकली झूठे बनावटी लोकतंत्र अपनी गवाही देने को अदालत में लाये हैं , असली कोई भी नहीं लेकिन सभी अपने अपने नकली को असली बता अदालत को गुमराह कर रहे हैं । अदालत ने अंतरिम आदेश जारी किया है उन सभी को पुलिस और प्रशासन की हिरासत में रखने को तब तक जब तक असली वाला लोकतंत्र सामने आकर खुद को प्रमाणित नहीं करता है । 
 
वास्तविक लोकतंत्र अभी भी ज़िंदा है किसी गांव की झौपड़ी में किसी तरह उन सब से खुद को बचाए हुए है उसको अभी भी उम्मीद है कि शायद कभी कोई गांधी जैसा व्यक्ति अंग्रेज़ों की हुक़ूमत की तरह इन सभी ताकतवर और धनवान लोगों से उसको सुरक्षित करवाएगा । ये सत्ता और दौलत के पुजारी भीतर से डरपोक हैं अपनी कायरता को कितने मुखौटे पहनाते रहते हैं । कोई चैनल खबर दिखा रहा है कि उस ने असली लोकतंत्र का साक्षात्कार लिया है जिस में उस ने अपनी दर्द भरी दास्तां बताई है । लेकिन अचानक इक अफ़वाह सुनाई दी है कि सभी राजनीतिक दलों अधिकारीयों और बड़ी बड़ी संस्थाओं पर आसीन लोगों ने उस तथाकथित असली लोकतंत्र की सुपारी किसी क़ातिल को दे दी है । अचानक उस गांव की झौपड़ी को आग ने जलाकर राख कर दिया है लेकिन जांच करने पर कोई लाश नहीं बरामद हुई है । क्या लोकतंत्र को अपनी हत्या की आशंका पहले से थी जो वो भाग गया है जान बचाकर सरकार ने इक जांच आयोग गठित किया है जो कुछ महीने बाद अपनी रिपोर्ट देगा ये बताने को लोकतंत्र का सच क्या है । जितने नकली बनावटी लोकतंत्र अदालत में पेश हुए थे उनकी ज़मानत हो गई है लेकिन खबर है कि वो सभी देश से भाग गए हैं । 
 
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मई 08, 2024

इक आवारा बादल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         इक आवारा बादल ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कहीं किसी इक जगह कब ठहरता है कोई बादल आवारा , मैंने चांदनी रात को चांद से कह दिया था । मेरा कोई ऐतबार नहीं मेरा कभी इंतिज़ार मत करना । हवाओं का रुख समझ जिधर की हवा चली उधर उधर भटकता रहा किसी दरवेश की तरह सोचा समझा कुछ नहीं बस मनमौजी की तरह सभी को छोड़ अपनी ही धुन में अनजानी राहों पर सफर करता रहा । कोई ठौर ठिकाना नहीं किसी से दोस्ती याराना नहीं नाता कोई नया पुराना नहीं दुनिया क्या है खुद क्या पहचाना नहीं । ज़िंदगी का मज़ा लूटता रहा धीरे धीरे मेरा माज़ी पीछे छूटता रहा । कभी सोचा नहीं था मुकद्दर का सिकंदर होना चाहता हूं वो ख़्वाब हक़ीक़त बन जाएगा । किस्मत ने ज़ीरो से हीरो बना दिया तो समझने लगा मुझ जैसा दुनिया ज़माने में कोई नहीं बस फिर क्या था किसी भी देश के शासक ने जो नहीं किया मैंने सब किया और डंके की चोट किया । मेरा झूठ दुनिया को इतना अच्छा लगा कि मुझे ज़माने के झूठों का सरदार घोषित किया गया और मुझे अपने झूठ और सभी के सच से बड़े और शानदार लगने लगे ।  सच मैंने कभी बोला ही नहीं लेकिन सभी को मेरे झूठ पर इतना यकीन था कि खुद मैं भी बताता कि ये सच नहीं तब भी लोग नहीं मानते क्योंकि उन्होंने मुझे नायक नहीं मसीहा समझा और मैं भी अपने आप को भगवान मानने लग गया ।  

शोहरत की बुलंदी का तमाशा ख़त्म हुआ तो खुद को ऊंचे पर्वत के शिखर से नीचे धरती पर पाया । सब कुछ ख़त्म हुआ तो लगा कि क्या हुआ जितना ऐशो आराम आन बान बिना कुछ किए हासिल हुआ बहुत था किसी किसी को ज़माने में मिलता है कथाओं कहानियों में जो मुझे वास्तव में झोली में मिल गया इत्तेफ़ाक़ से । बस समस्या इक ही है कि वापस पीछे लौटना संभव नहीं और आगे कोई मंज़िल नहीं पाने को , कुछ साथी बन गए हैं जो मतलब के यार हैं । उनको जितना बांटा है कोई हिसाब नहीं शायद मैंने जो बरस खैरात मांग मांग कर जीवन बिताया वो कुछ भी नहीं लेकिन खैरात कभी कोई वापस लौटाता है न कोई मांगता ही है । ज़िंदगी भर मैंने किसी से प्यार वफ़ा निभाई नहीं तो कोई मुझसे निभाएगा ऐसा सोचना ही व्यर्थ है । मैंने पिछले दस साल कुछ भी नहीं किया कर बहुत कुछ सकता था लेकिन जिस को बगैर कुछ काम किए बिना किसी समझ काबलियत को देखे दुनिया घोषित कर दे कि वो सब से बढ़कर है हर काम में , वो कुछ सीख भी नहीं सकता । कोई विकल्प नहीं था नौटंकी करने के सिवा कि मैं सब से बढ़कर सबसे अच्छा सबसे सच्चा हूं । मेरे अभिनय को सभी ने मेरा असली किरदार समझा है इसलिए अब मुझे कुछ नहीं करने की आदत बदलनी होगी और फ़िल्म टीवी पर अपना सिक्का जमाना होगा । इश्तिहार का युग है और विज्ञापन में काम करने वाले कितने मालामाल हुए हैं । कैमरा तो मेरी ज़रूरत ही नहीं कमज़ोरी भी है मुझे पल पल दुनिया को दिखाई देना पसंद है बस विज्ञापन जगत मेरा इंतिज़ार बेसब्री से कर रहा है । मैं इक ब्रांड कहलाता हूं और मेरा भाव सब से अधिक होना ही है ।  ये किसी ज्योतिषी की भविष्यवाणी नहीं है इक काल्पनिक कथा है कृपया इस को कुछ और नहीं समझना किसी से कोई ताल्लुक कदापि नहीं है इक कविता आखिर में ।

 

विज्ञापन जगत का नया मॉडल ( हास्य कविता )

    डॉ लोक सेतिया 

विज्ञापन जगत की जागी है नई आस 

कितने पुराने मॉडल हो रहे हैं उदास

सभी को घबराहट होने लगी शायद

अकेला ही खा जाएगा सब की घास । 

आहट है उसके आने की जिसकी बड़ी

शोहरत दुनिया भर को मज़ा चखाने की

सबको चिंता अपनी अपनी सताती बहुत

आती है कला उसको सब कुछ पाने की । 

खिलाड़ी अभिनेता सभी पीछे रह जाएंगे 

सभी विज्ञापन बस उसको मिल जाएंगे 

उसका झूठ भी मीठा लगता है लोगों को 

उसका दिया हुआ ज़हर सभी खा जाएंगे ।

दिन ऐसा आने वाला कोई जाने वाला है 

ख़्वाब बेच कर दुनिया जीती कितनी है 

हुनर अपना छुपा हुआ आज़माने वाला है 

सब को ही खोना पड़ेगा वो पाने वाला है ।  

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ख़ुद ही हमने फ़रेब खाए हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        ख़ुद ही हमने फ़रेब खाए हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

                      ( विश्व गधा दिवस पर विशेष रचना )

गधों की औकात को कम नहीं आंकना कभी भी , गधों की बात दुनिया से अलग है । कौन किस को कैसे गधा बनाता है कब कौन किस गधे को बाप बनाता है इस रहस्य को कभी कोई नहीं समझ सका है । गधेपन का गुण होना हमेशा काम आता है गधा जब भी आलाप लगाता है ढेंचू ढेंचू का स्वर दूर तलक वादियों में पहुंच जाता है । सभी का बजता इक दिन बैंड बाजा है गधा सच समझो तो हमारे युग का राजा है जब से गधे ने शोहरत पाई है जिस तरफ देखते हैं बहार ही बहार आई है । आदमी गधे से बढ़कर नहीं है किस बात की जगहंसाई है गधा कौन है बड़ा भाई है गधे की लात जिस ने खाई है हक़ीक़त बस उसी को समझ आई है । सभी मूर्ख मिल कर कहकहे लगाते हैं गधे देख कर मुस्कुराते हैं क्या इस तरह दुनिया को ख़ुशी दिखलाते हैं , हंसने वालों के भी अश्क़ छलक जाते हैं । सरकार भी गधों की चिंता में दुबली होती है गधों की भीड़ जमा कर मगरमच्छ के आंसू रोती है , सरकारी गधों के बहुमत का ख़्याल रखती है । जवाब मांगते हैं लोग तो जवाब के बदले सवाल रखती है । किसी को पकवान मिलते हैं किसी का नसीब है आधी रोटी भी नसीब नहीं मिल भी जाए तो पानी की तरह अधपकी दाल मिलती है । ये दुनिया गधों का मेला है जानते हैं सभी बोझ जितना है उठाना है आदमी सोचता रहता है उसका अपना ही कुछ झमेला है । 
 
लोकतंत्र गधों की बारात होती है जिस में दूल्हा खामोश रहता है बड़ी अजब सुहागरात होती है । लोग चुन चुन कर उन्हीं को लाते हैं जिन से कितने फ़रेब खाते हैं । राजनीति का यही तमाशा है सबकी आशा झूठी है सच होती है जनता की हताशा है । गधों का नसीब होता है जो भी होता अजीब होता है जब गधा घोड़ी पर चढ़ कर निकलता है दिल मचलता है कुछ फिसलता है । हर गधे की कोई कहानी है उसकी नानी सभी की नानी है शाहंशाह कोई और होता है दुल्हन है जिसकी राजा जानी है । गधों का कोई घर नहीं होता और न कहीं कोई घाट मिलता है ये अजब फूल है जो मौसम के बगैर किसी रेगिस्तान में खिलता है । ऊंठ से उसका कोई नाता नहीं है कौन खिलाए पिलाए समझ आता नहीं । राजधानी में सभी बराबर हैं ऊंठ घोड़ा गधा खच्चर मिल लगाते रहते हैं चक्कर पे चक्कर अपना हिस्सा सभी की चाहत है पेट भरता नहीं क्या मुसीबत है । लो फिर से चुनाव आये हैं हथकंडे सभी आज़माए हैं मिल कर बदलने चले हैं मिजाज़ अपना इक नया इंक़लाब लाये हैं ।  
 
सबने अपना अपना प्रधान चुना है गधों का भी अपना लीडर है गधों की सियासत शानदार है उस से भी लाजवाब उनकी विरासत है । गधों की अपनी सरकार बने दिल की सभी की यही हसरत है , गधों का वोट-बैंक बनाना है धोबी पछाड़ का अर्थ समझाना है । गधों की एकता ज़रूरी है थोड़ी सी इक मगर मज़बूरी है उनका कोई इक ठिकाना नहीं होता कोई अपना बेगाना नहीं होता उनकी चतुराई का कोई भी पैमाना नहीं होता ।  गधों का गधापन उसकी विशेषता होती है इंसानियत देख कर हैरान है आदमी गधे से बढ़कर गधापन कर सकता है सभी का अजब अरमान है लोग गधों की परस्तिश करते हैं गधे को प्रणाम करते हैं कोई दुलत्ती मार सकता है इसी से डरते हैं । राजनीति  में कितने गधे हैं आंकड़ों का हिसाब कोई नहीं हर किसी का बाप है गधा मगर खुद गधे का किसी भी बाप कोई नहीं ।
 

 

मई 07, 2024

बोझ बन जाए जब कोई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बोझ बन जाए जब कोई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

फ़िल्म सफ़र की कहानी है जो हंसी मज़ाक़ की बात हक़ीक़त में इक अनहोनी घटना या दिल दहलाने वाला हादिसा बन गई है । नायक नायिका की लिखावट की नकल हूबहू कर इक ख़त उसकी मेज़ पर रखी किताब में छुपा देता है । बड़ा भाई पढ़ कर हैरान परेशान हो जाता है लिखा होता है कि मैं घर वालों के लिए इक बोझ बन गई हूं आदि आदि । नायिका पता लगा कर बताती है कि चित्रकार नायक ने कितनी मेहनत की है अपनी लेखनी को मेरी लिखावट बनाने में । हंसी मज़ाक की बात तब गंभीर बन जाती है जब नायिका उस खत को अपने विवाह होने के बाद भी अपनी अलमारी में संभाल कर रखे रहती है । इक दिन नायिका का पति उस को पढ़ कर समझता है कि उसकी पत्नी छुटकारा चाहती है और पागल प्रेमी ज़हर खा कर अपनी जान दे देता है । हालांकि फिल्मों में हर समस्या का कोई समाधान भी कहीं कोई सुझा दिया करता है जैसे साहिर लुधियानवी जी चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों गीत से अपने अपने रास्ते जाने का विकल्प ढूंढते हैं । 
 
देश की राजनीति सही मायने में किसी अनचाहे बोझ से कम नहीं है जिसे ढोते रहना जनता की नियति है ।  लेकिन उस से बढ़कर राजनैतिक दलों में कुछ लोग असहनीय और अनचाहा बोझ बन जाते हैं जिनको छोड़ना संभव नहीं होता क्योंकि उनके पास इक ऐसी चाबी रहती है जिस से कोई खज़ाना खुलता है खुल जा सिम सिम कहते ही । लेकिन परिवारवाद और जातिवाद धर्म के नाम पर राजनीति का विरोध करने वाले जब किसी को मसीहा समझने लगते हैं और व्यक्ति पूजा करने लगते हैं तब विकट हालात बन जाते हैं । कोई इकलौता व्यक्ति इतना भारी होने लगता है कि उसका बोझ उठाते उठाते सभी का कचूमर निकलने लगता है । ऐसे में निगलते बनता है न ही उगलते बनता है और तमाम लोग इक पहाड़ के नीचे दब कर घुट घुट कर मरने को अभिशप्त हो जाते हैं । ज़िंदगी जब मौत से बदतर होने लगती है तब पछतावा करने से कोई राहत नहीं मिलती है । हमने कब मांगा था कोई स्वर्ग जैसा खूबसूरत सपनों का संसार , आपने ही सुनहरे ख़्वाब दिखलाए थे जनता को , मगर मिला इक ऐसा जहां जिस में हर कोई हमेशा घबराया सहमा रहता है कि जाने कब आपकी तिरछी नज़र उसको जला कर ख़ाक कर दे ।  राजनीति में कब कौन नटवरलाल किस रूप में छलेगा कभी कोई भी नहीं समझ पाया है , इक ग़ज़ल पेश है आखिर में ।
 

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ( ग़ज़ल ) 

              डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता
हो जीना मौत से बदतर , न इतनी बेबसी देता ।

मुहब्बत दे नहीं सकते अगर , नफरत नहीं करना
यही मांगा सभी से था , नहीं कोई यही देता ।

नहीं कोई भी मज़हब था , मगर करता इबादत था
बनाकर कश्तियां बच्चों को हर दिन कागज़ी देता ।

कहीं दिन तक अंधेरे और रातें तक कहीं रौशन
शिकायत बस यही करनी , सभी को रौशनी देता ।

हसीनों पर नहीं मरते , मुहब्बत वतन से करते
लुटा जां देश पर आते , वो ऐसी आशिकी देता ।

हमें इक बूंद मिल जाती , हमारी प्यास बुझ जाती
थी शीशे में बची जितनी , पिला हमको वही देता ।

कभी कांटा चुभे ऐसा , छलकने अश्क लग जाएं
चले आना यहां "तनहा" है फूलों सी नमी देता ।  
 

 

मई 06, 2024

मन के हारे हार है मन के जीते जीत ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

   मन के हारे हार है मन के जीते जीत ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

वक़्त है अभी भी कोई श्रीकृष्ण जैसा सारथी तलाश कर लो , मन की बात कोई किसी को नहीं समझाता ख़ुद अपने अंतर्मन को टटोल कर देख लो । हार क्या है जीत क्या है सत्ता की झूठी प्रीत की रीत यही है जीवन का संगीत यही है राम नाम जपना मनमीत वही है । प्यार में और जंग में सब जायज़ नहीं होता है हेरा फेरी तो हर्गिज़ नहीं । देखो क्या लाया था कुछ भी नहीं और अब कितना कुछ तिजोरी में भरा है चाहो तो जैसे मौज मस्ती से शासन किया ज़िंदगी भर वही शान ठाठ बाठ से रहने को कोई कमी नहीं है । कुछ लोग तो ऐसे भी हुए हैं जो सत्ता नहीं रही तो बगल में इक चारपाई उठा कुरुक्षेत्र जा कर बस गए । जिसने ज़िंदगी भर झोली फैलाई हो उस को चिंता क्या इस देश में कोई दरवाज़े से ख़ाली नहीं जाए ऐसा नियम अभी भी है । मैं समझ गया क्या सोच रहे हो , नहीं मैं जले पर नमक नहीं छिड़कना चाहता बल्कि पहले से भविष्य की योजना बनाने की राय देना चाहता हूं । बस इक मुश्किल है कोई तो ऐसा अपना बना लिया होता जिस के कांधे पर अपना सर रख का जी भर रोने से जी हल्का हो जाता । ऐतबार करोगे किसी ने बुरी तरह से पराजय मिलने पर उसी के कांधे पर सर रख कर अपना दर्द सांझा किया था जिस के कारण पराजित हुए थे । तभी कहते हैं कि दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाईश रहे जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों । अचानक नींद खुली ख़्वाब से जागे तो बेचैनी हुई कि सोते समय किसी और भगवान से विनती की थी ये भगवान कैसे बिन बुलाए सपने में चले आये । 
 
ये अकेलापन भी कभी कभी इक कमी महसूस करवाता है , जिनकी धर्मपत्नी संग रहती है आधी रात को जगाकर कुछ नहीं तो शतरंज की बाज़ी खेल लेते हैं या कोई इधर उधर की बात से दिल बहलाते हैं । हां पत्नी कोई छोटी मुसीबत तो नहीं होती फिर भी बड़ी बड़ी परेशानी का कोई हल ज़रूर बताती है बड़े सियाने लोग कहते थे । समझदार महिला कभी घर परिवार को बिखरने नहीं देती , कहने को सारा जहां हमारा कह लो लेकिन घर बिना घरवाली बनता नहीं है । उम्र बढ़ती है तब हमसफ़र साथी की ज़रूरत और भी अधिक पड़ती है लोग रूठों को मना लिया करते हैं । नहीं अब लौट कर घर वापस जाने को रास्ता ही नहीं छोड़ा है खुद ही कितने कांटें कितने अवरोध दुनिया को रोकने को खड़े किए अब कठिन है कोई साफ़ सीधा रास्ता मिलना । पहली बार धर्म उपदेशक की बात सच लगने लगी है कि किसी दिन सभी धन दौलत पास होगा लेकिन सुकून नहीं मिलेगा । ज़माने भर को नौटंकी से उलझा सकते हैं ख़ुद अपने आप को तमाशा बनते नहीं देखा जा सकता है । ऊपर जाना उतना कठिन नहीं था जितना ऊंचाई से नीचे आते हुए फ़िसलन का डर होता है । भूल गया था बचपन की कहानी जिस में भले वक़्त में ख़राब दिन आने की बात ध्यान रखते हुए हर कदम देख कर रखते हैं । कभी फूलों का कोई गुलशन खिलाया होता तो हर तरफ धूल की आंधी कहीं रेगिस्तान कहीं कंटीली तारें देख इतना अफ़सोस नहीं होता । सबको जीतने का नुस्खा बताते रहे कभी उनसे भी कोई सबक सीखने की कोशिश करते जो हार कर भी हार नहीं मानते थे । अनुभव की बात बड़ी महत्वपूर्ण होती है ये कितनी किताबों में बताई जाती रही है । भगवान राम भी अपने दुश्मन को पराजित कर जब अंतिम सांस ले रहा होता है तब भाई को कोई सबक सीखने को कहते हैं , तभी ये भी रहस्य समझ आता है कि जिस से कुछ समझना सीखना होता है उसके पैरों की तरफ बैठते हैं सिरहाने नहीं । 

कुछ नहीं सूझा किस को कैसे बताएं लगता है सत्ता खोने का भय क्यों तड़पाता है जिसे पाने की चाहत में धूनी रमाई देर से समझे कि उस ने नहीं कभी किसी से वफ़ा निभाई । मझधार में नैया डोलने लगी है मिलन से पहले कैसी जुदाई सच कहते हैं जाके पैर न फ़टी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई । माई री मैं कासे कहूं पीर अपने जिया की माई री , कुछ और कभी मन को भाया ही नहीं बस इतना सा ख़्वाब था सब से बड़ा कहलाना ।  सब कुछ खुद पाना कुछ ऐसे चोरी चोरी चुपके चुपके सबका दिल चुराना मगर लाख कोशिश करने पर भी नहीं किसी के भी हाथ आना । गुज़रा हुआ ज़माना दोबारा नहीं आएगा कोई जोगी गली गली वही गीत गाता नज़र आएगा , खोएगा सो पाएगा । खोना क्या है पाना क्या है दुनिया इक झूठा है अफ़साना क्या , पाना था तो कुछ कठिन नहीं था जब खोने की घड़ी करीब आई तो दिल कहता है ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं हम क्या करें । अपना समझ बैठे जिसे चार दिन का बसेरा था किराये का घर था भूल हुई लगता बस मेरा था ।
 

 

मई 04, 2024

वोट चाहिए तो मुझे पढ़ना पड़ेगा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    वोट चाहिए तो मुझे पढ़ना पड़ेगा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

चुनाव में खड़े थे नेता जी जगह जगह सार्वजनिक स्थान पर इधर उधर हाथ जोड़े विनती कर रहे थे , इक घर का दरवाज़ा ख़ुला देखा तो भीतर चले आए । अपना परिचय दिया साथ में इक घोषणापत्र जिस में अगर विजयी हुए तो कितना कुछ करने का इरादा है लिखा हुआ था , सवाल किया जनाब आप क्या करते हैं तो जवाब मिला कि इक लेखक हैं । नेता जी आदत अनुसार कह गए कोई कार्य हो तो कभी भी आकर मिल सकते हैं । लेखक ने उनका घोषणापत्र देखा अच्छा शानदार आकर्षक लगा तो कहने लगे कि कभी कभी किसी किताब का आवरण और शीर्षक लुभावना लगता है लेकिन जब पढ़ते हैं तो निराशा होती है पहले भी इक प्रत्याशी अपना घोषणापत्र दे गए हैं दोनों को पढ़ कर समझ कर निर्णय किया जाएगा कौन बेहतर है । नेता जी ने कहा क्या अमुक व्यक्ति की बात कर रहे हैं , हां उनकी ही बात है सुनते ही बोले उनका कोई भरोसा नहीं अव्वल दर्जे के झूठे हैं । लेखक बोले अगर आप सच्चे हैं तो बात ही क्या मेरा वोट सच बोलने वाले को ही मिलेगा । चाय पिलाई और जाने लगे नेता जी तो उनको अपनी किताब थमाते हुए बोले कि बिल्कुल जैसा अपने घोषणापत्र बनवाया है मैंने भी अपनी रचनाओं में कैसा आदर्श नेता चाहिए इस पर विस्तार से चर्चा की है । आपको मेरा वोट पाना है तो किताब को पढ़ना होगा और समझ कर मुझे बताना भी होगा कि आपकी क्या राय है । थोड़ा संकोच के साथ नेता जी ने कहा समय मिलते ही अवश्य पढ़ कर आपको फ़ोन पर बताऊंगा । ठीक है तब मुझे भी आपका घोषणापत्र पढ़ने की फुर्सत मिलेगी तब समझ कर निर्धारित किया जाएगा । कुछ उलझन में फंस गए नेता जी सोच कर कहने लगे आपकी बात उचित है मैं आज ही रात सोने से पहले किताब की शुरुआत करता हूं और पढ़ कर चर्चा करता हूं ।
 
लेखक ने कहा महोदय पहले आगाह कर रहा हूं बिना पढ़े झूठ मत बोलना अन्यथा मुझे झूठ की खूब भली पहचान है । आपको बता देता हूं हम साहित्य प्रेमी इंसान की फ़ितरत को जानने में माहिर होते हैं , हमारे अनुभव हमेशा सबक सिखाते रहते हैं । अख़बार पत्रिका वालों से पुस्तक प्रकाशक तक सभी हमको मधुर बोल से बहलाते हैं लेकिन जब मेहनत का मोल चुकाना होता है तब नज़रें चुराते हैं । मानदेय या अन्य भुगतान की बात क्या जब लेखकीय प्रति तक भेजने की औपचारिकता नहीं निभाते हैं । आपको कभी अपना बही खाता दिखाऊंगा कितनी सैंकड़ों रचनाओं का कोई पारिश्रमिक कभी मिला ही नहीं बस झूठे आश्वासन देते हैं । आप से बात करते मालूम हो जाएगा कि किस रचना को आपने पढ़ा है या सिर्फ शीर्षक देख कर गलत बात बता रहे हैं ।  लेखक की बात से नेता जी समझ गए कि बुद्धिजीवी लोग कैसे होते हैं , अब कैसे बताते कि पढ़ना कभी उनको अच्छा लगता ही नहीं था और ये किताब पढ़ना उनको चुनाव लड़ने से भी कठिन लग रहा था । बस किसी तरह से बहाना बनाकर निकल लिए थे । 
 
नेता जी ने अपने दफ़्तर जा कर अपने बड़े नेताओं को इस घटना को विस्तार से बताया , इक वरिष्ठ राजनेता ने कुछ विचार किया और उस लेखक को लाने को इक सहायक को भेजा । आपसे हमारे बड़े नेता मिलना चाहते हैं आग्रह किया है कृपया चलिए , उनको खुद आना चाहिए कोई काम है तो अन्यथा मैं जब कभी मन करेगा आऊंगा मगर कोई निर्धारित नहीं कर सकता ये मेरा स्वभाव है , लेखक का सीधा जवाब था । उस सहायक ने बड़े नेता जी को ये बात फोन पर बताई तो उन्होंने फोन पर ही लेखक से वार्तालाप करने का विकल्प चुना । लेखक से बात कर उन्होंने कहा आपने कीमत बताई है किताब पढ़ कर राय देने पर वोट डालने की लेकिन मुझे लगता है कि आपको इतना मिलना काफ़ी नहीं है । आपको मालूम है कुछ साल पहले जो राज्य की साहित्य अकादमी के निदेशक बनाये गए थे उन्होंने हमारे लिए बहुत ही शानदार भाषण और संदेश लिख लिख कर हमारी शानदार छवि बनाई थी । आजकल उनका कद ऊंचा हो गया है और वो हमारे आलाकमान के चहेते हैं । लेखक ने बताया मुझे सब पता है लेकिन शायद आपको नहीं पता कि मैंने कभी भी किसी की स्तुति करना मंज़ूर नहीं किया चाटुकारिता करना सीखा नहीं खरी खरी बात कहता हूं डंके की चोट पर निडर होकर निष्पक्ष रहकर ।  धन दौलत नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार की चाहत ही नहीं है कुछ चाहिए तो इक ऐसा समाज जिस में कोई बड़ा छोटा ख़ास आम नहीं हो सभी बराबर हों इंसान बनकर इंसानियत का धर्म निभाएं । सिर्फ इतनी ही कीमत है मेरे लेखन की जो शायद किसी भी राजनेता के पास नहीं है ।  
 

आज़ाद भारत की तस्वीर ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

 
इंसां हों सब ही बराबर जहां , हम सब बनाएंगे इक ऐसा जहां  
फूल प्यार के खिले हों चहुंओर , रहेगा नहीं नफरत का धुंवा ।
कहीं किसी पे न हो अत्याचार , राजनीति बने नहीं व्यौपार 
शिक्षा स्वास्थ्य सभी अधिकार , जनसेवा का बंद हो बाज़ार । 
 
हर इक बेटी हो शाहज़ादी , जीने की सभी को मिले आज़ादी 
ख़त्म दहेज प्रथा ख़त्म बाल मज़दूरी ,  बहुत हो चुकी बर्बादी । 
प्रशासन का नहीं हो ऐसा बुरा हाल , बीमार हैं जैसे अस्पताल 
अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग नहीं हो इक सुर ताल ।    

लूट रहे बन कर देशसेवक सभी के सभी जनता की यही परेशानी
कौन बताए उनको क्या है आज़ादी का महत्व , शहीदों की कहानी ।
भूल गए हैं शायद हम सभी देश और समाज कल्याण का मकसद 
फिर से कोई सबक पढ़ाए स्वार्थ छोड़ो फिर मांगता है देश कुर्बानी ।  
 
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