जून 14, 2024

ये इश्क़ नहीं आसां ( बैसाखियों का मज़ा ) डॉ लोक सेतिया

     ये इश्क़ नहीं आसां ( बैसाखियों का मज़ा ) डॉ लोक सेतिया  

आज फिर इक फ़िल्मी दृश्य से शुरुआत करते हैं , राजपाल यादव अभिनय और कॉमेडी दोनों लाजवाब करते हैं । वाशरूम जाते हैं जो बैसाखियां हैं उनको भीतर इक तरफ रख कर नृत्य करते हैं और जिस महिला डॉक्टर से मिलने आते हैं उस नायिका का नाम ले कर कहते हैं उनकी खतिर जीवन भर ऐसे ही रहना मंज़ूर है । नायक सलमान खान देख कर हैरान हो जाते हैं , ऐसी बैसाखियां कितनी कीमती होती हैं आशिक़ ही ये राज़ समझते हैं । इधर सरकार बनी तो लोग कहने लगे दो बैसाखियां पुरानी देखी भाली हुई बेहद कमज़ोर हैं पता नहीं कब धड़ाम से सरकार गिर सकती है । बैसाखियों पर मैंने गहन शोध किया है बरसों बरस तक । टीवी चॅनेल अखबार जाने कब से सरकारी बैसाखियों के सहारे तेज़ बहुत तेज़ दौड़ रहे हैं उनको पता है ये भले भरोसे के काबिल नहीं सत्ताधारी नेता अधिकारी वर्ग लेकिन उनकी चाहत नाम शोहरत की ऐसी कमज़ोर नस है जिस पर हाथ रख कर पत्रकार मनचाहा वरदान हासिल कर लेते हैं । सरकार भी जानती है जो बिक जाए वो कभी खरीदार नहीं हो सकता ये दुनिया का दस्तूर है । सभी जानते हैं पिछले दस साल तक उनकी सरकार बहुमत से अधिक कुछ और चीज़ों पर कायम रही है , बस वो बैसाखियां पर्दे के पीछे से आसरा देती रही हैं जान कर भी अनजान बनते हैं लोग समझदार होकर समझते नहीं हैं । सरकार बैसाखियों को पकड़े हुए दिखाई देती है जबकि जकड़ रखी बैसाखियां समझती हैं हाथ छुड़ाना अपना अस्तित्व मिटाना है , इसी को राजनीति में घठबंधन धर्म कहते हैं । दुश्मन को चूड़ियां पहनानी हैं मगर हाथ खाली नहीं ये समस्या कोई नहीं समझता है चूड़ियों की खनक पायल की झनक सिर्फ आशिक़ समझता है झुमका बरेली वाला कानों में ऐसा डाला झुमके ने ले ली मेरी जान हाय मैं तेरे कुर्बान । 
 
 फिल्म में राजपाल यादव जी वाशरूम से निकलते हुए हाथ धोने लगते हैं , मगर धोते नहीं रुक जाते हैं , और बोलते हैं जाओ हाथ नहीं धोता इन गंदे हाथों से हाथ मिलाउंगा सभी से । ये मज़ा कोई आशिक़ ही लेता है या फिर राजनीति में सरकार का बहुमत पाने को कोई शासक , हाथ धोकर पीछे पड़ना बाद की बात होती है पहले हाथ मिलाते हैं गंदे हाथ साफ़ करना संभव नहीं कितनी बार हाथ धोये कोई । कोरोना कब का चला गया हाथ छुड़ा कर सभी से हम हाथ मलते रह गए । 
 
सत्ता में जन्म जन्म का साथ नहीं होता है , तमाम उम्र कहां कोई साथ देता है कदम दो कदम भी साथ निभाना बड़ी बात है । अभी तो चांदनी रात है मेरे हाथों में तेरा हाथ है डरने की क्या बात है जब पिया साथ है । सावन की बरसात है खूबसूरत समां है हमसफ़र साथ है , ऐसे में इक महिला मित्र की कविता याद आई है कुछ भी नहीं दिल से दिल की बात है , मन की बात और दिल की बात थोड़ा अंतर समझ नहीं आता दिल का क्या है दिल तो दीवाना है दिल तो पागल है दिल दिया दर्द लिया कितनी सारी दिल की बातें हैं । चलो सजना जहां तक घटा चले , लगा कर मुझे गले , मेरे हमसफ़र मेरे दोस्त फिल्म का गीत गाते गाते चलते ही जाना है । 

चलो चलें ( कविता ) रश्मी शर्मा

चलो चलें कही दूर
हम दोनों संग चलें
उड़ जायें कहीं  दूर
नीले  आसमान में
उन्मुक्त परिदों की
तरह उड़ान भरने ।
 
चलो न ऐसे जहाँ में
जहाँ बस प्रेम ही हो
खुशियां ही रहती हों
नित ही नव - पल्लव
बागों में खिलते हों
भ्रमर का गुंजन हो
तितलियों मनभावन
फूलों पर नृत्य करना हो ।
 
चलो चलें  न कहीं  दूर
ये सारा जहाँ हमारा हो ।
 
चलो चलें  खो जायें  हम
किसी को नज़र  न आयें
आसमां की गहराइयों में
हमसफर बन चले दोनों
सफ़र की इस तन्हाई में
मीत बन जायें इक दूजे के ,
हर कदम संग चलते जायें ।
 
चलो चलें  न कहीं  दूर
ये सारा जहाँ हमारा हो ।
 
चलो प्रेम भरे गीत गायें
साथ - साथ हँसते जायें
छू लें  इन चाँद सितारों को ,
 
फिर कोई नया नगमा
हम दोनों मिलकर गायें
चाँद से चाँदनी को हम
चुपके से यूँ ही चुरा लायें ।
 
चलो चलें न कही दूर
ये सारा जहाँ हमारा हो ।
 
रश्मि शर्मा "इंदु"   (  जयपुर राजस्थान )

( लेखिका से अनुमति ले कर आभार सहित शामिल किया है। )
 
 दिन में कितने क़दम चलना आपको बना सकता है सेहतमंद? - BBC News हिंदी

जून 13, 2024

बन बैठे मालिक हैं किरायेदार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      बन बैठे मालिक हैं किरायेदार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

लाएंगे हम नई बहार , पतझड़ रही दो बार तीसरी बार होगा अलग संसार हम नहीं कहलाएंगे बस किरायेदार । अपना होगा कुल बाज़ार अब नहीं होता इंतिज़ार , हम दोनों बचपन के यार अमर रहेगा अपना प्यार । पर इक मुश्किल तू उस पार मैं इस पार बीच में दरिया है मझधार । कौन चोर है कौन बटमार करना नहीं इस पर सोच विचार हमको बनानी है सरकार धन दौलत खूब कमाया दिल मांगे सब अबकी बार खरीदनी है नई नवेली इक कार खाना पहनना हुआ बेकार । क़र्ज़ लेकर घी पीना है हमको मिलकर संग-संग जीना है मेरा हलवा पूरी तुम्हारा खट्टा मीठा अचार सब है पास मौज मनाएं सारी दुनिया को दिखलाएं उल्लू सभी को बनाकर सिर्फ हम कहलाएं समझदार । मैं तुझको महापंडित मानता तुम भी मुझको मानते आधुनिक युग का कोई अवतार कौन कहता है काठ की हांड़ी चढ़ती नहीं दूजी बार अपना है अजब इश्तिहार तीसरी बार हम होंगे उस पार । हमने देखा है इक सपना फूलों के नगर में घर अपना , चाहे हमने बबूल उगाये लेकिन आम सभी बाग़ से चुराये मिलकर अपनों से खाये खिलाये माली बनकर गुलशन रौंदा कलियों को मसला खलियान को रौंदा । कुछ कागज़ कहीं से बनवा लाये हैं जो लाया सबको उसको हम लाये हैं अब कोई अपने सिवा नहीं किसी का लोग कहते हैं बड़े लंबे शाम वाले साये हैं हम , पर सभी साथी हैं टूटी पतवार की तरह उनका सहारा लिया है जो हाथ छुड़ा लेते हैं जब चाहे किसी और का हाथ पकड़ , उनकी आदत से घबराये हैं हम । हम दोनों ने मिलकर दुनिया का दस्तूर बनाया है सिक्का खोटा हर बार चलाया है हमने साम दाम दंड भेद सब आज़माया है कौन समझता है क्या था जो भी हमने ढाया है । नगर वालों के घर बाज़ार बस्ती मंदिर मस्जिद ज़मीन सब छीन कर कितना अनुपम मनोरम दृश्य दिखाया है , इस नगरी ने हमको आईना दिखाया है सब खोया है जब उसको भुलाया है मर्यादा छोड़ जितना पाया समझ नहीं पाए क्या क्या गंवाया है । भूखों को हमने भीख मांगना आसान है सबक सिखलाया है जो पढ़ा था सबको पढ़ाया है । आपको कुछ भी समझ नहीं आया कोई बात नहीं इस इक शहर के हर शख़्स को सब समझ आया है , साये में धूप का मतलब यही होता है जिन दरख्तों के साये में धूप लगती हो उनसे रिश्ता निभाना कठिन है । उनसे किनारा कर लिया है जिन्होंने सभी को फुटपाथ पर ही आसरा है ये बतलाया है , भूखे भजन नहीं होता , आपने कितने दिन से कुछ भी नहीं खाया है । 
 

        चलो इक ग़ज़ल पढ़ते हैं दुष्यंत कुमार कहते हैं ।


वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है , माथे पे उस के चोट का गहरा निशान है । 

वो कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तुगू , मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है । 

सामान कुछ नहीं है फटे - हाल है मगर , झोले में उस के पास कोई संविधान है । 

उस सिर-फ़िरे को यूं नहीं बहला सकेंगे आप ,  वो आदमी नया है मगर सावधान है । 

फिसले जो उस जगह तो लुढ़कते चले गए , हमको पता नहीं था कि इतनी ढलान है । 

वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से , ऐसा लगा कि वो भी बहुत बे-ज़बान है ।

                                                                
                
                
        Dushyant kumar ghazal wo aadmi nahi hai mukammal bayan hai         
                                
                                                

जून 11, 2024

कोई नई सोच नहीं नया इरादा नहीं ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     कोई नई सोच नहीं नया इरादा नहीं ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

ज़रा सोचें कि दुनिया कितनी तबदील होती जाती है हम जैसे भी होते हैं , पुराने नहीं रहते , आधुनिक बनते हैं आधुनिकता को अपनाते हैं । इंसान ने कितने प्रयास कर जोख़िम उठा कर शोध कर दुनिया को कितना बदल दिया है । भगवान है कि नहीं इस को एक तरफ रख कर विचार विमर्श करते हैं तो समझ आता है भगवान भी हैरान होगा जिस की कल्पना तक नहीं की थी उस ने , आदमी ने उस का आविष्कार कर कीर्तिमान स्थापित कर क्या कमाल किया है । अब कुछ लोग खुश हैं जश्न मना रहे हैं कि किसी को तीसरी बार शासन करने का अवसर मिला है  , शायद किसी ने आंकलन करना ही नहीं चाहा कि पहले दो बार शासन कर उस ने कितना शानदार कार्य किया है या कैसा किया है । जीवन में अवसर सभी को नहीं मिलते हैं लेकिन कुछ ही लोग अवसर मिले तो कुछ अलग कुछ नया और अच्छा कर दिखाते हैं । सिर्फ दिखावे की अंधी दौड़ में तो हर कोई शामिल है सभी ने अपना मकसद बना रखा है धन दौलत पद प्रतिष्ठा साधन सुविधाओं को अन्य सभी को पीछे छोड़ना एवं उनसे बढ़कर हासिल करना । कोल्हू का बैल उसी दायरे में चलता रहता है क्योंकि उस से काम लेने को किसी ने उसकी आंखों पर पट्टी बांधने को खोपरे चढ़ाए जाते हैं जिस से उसे दिखाई नहीं देता कोई हांकने वाला है चाहे नहीं और उसे घूमना है उसी परिधि में इक रस्सी से बंधे जो इधर उधर जाने ही नहीं देती है । विरले लोग होते हैं जो पुरानी राहों पर नहीं चलते बल्कि अपनी कोई नई राह बनाते हैं जिस से बाद में लोग आते जाते हैं , महान लोग रास्तों से कांटे हटाते हैं फूल खिलाते हैं ज़माना कोई रेगिस्तान जैसा है कुछ लोग वहां नदी को लाते हैं नहीं आए तो कोई तालाब बनाते हैं । मतलबी लोग सिर्फ अपनी सोचते हैं मगर अच्छे लोग सभी की प्यास बुझाते हैं दिखावा नहीं करते अपना मानवधर्म निभाते हैं । 

अधिकांश कुछ कर दिखाने को जो भी पुराना उनको अच्छा नहीं लगता उसको ढाकर फिर से कोई ईमारत बनाते हैं हासिल कुछ हो नहीं हो अपने आंकड़े बढ़ाते हैं । शासक हमेशा से आते हैं चले जाते हैं बस कुछ होते हैं जो हमेशा याद आते हैं अधिकतर को लोग भूल जाते हैं कभी कभी समाधिस्थल पर औपचारिकता निभाने को फूल चढ़ाते हैं श्रद्धा जताते हैं । वास्तविक नायक सत्ता शोहरत की भूख नहीं रखते उनके आचरण से सभी उनको विशेष अलग अनोखा बताते हैं । आज़ादी के इतने साल बाद क्यों लोग बेघर हैं शोषित हैं बेबस हैं क्यों सभी को समानता की तलाश है ज़िंदगी सूनी है दिल निराश है , रात अंधेरी है सुबह उदास है । रहनुमाओं को फ़िक्र है सिर्फ खुद अपनी ही , कवि कहता है घोड़े को मिलती नहीं घास है गधा खा रहा च्ववनप्राश है । इधर कुछ लोग भवष्य में नहीं अतीत में जाना चाहते हैं , वर्तमान को स्वीकार नहीं करते है न ही मानते है कि कुछ भी कर के कोई बीते कल को वापस नहीं ला सकता है । जहां तक भविष्य की बात है कोई नहीं जानता क्या होगा लेकिन कोशिश करना कि आज से बेहतर बनाने की ज़रूरी है साथ ही सकारात्मक दृष्टिकोण का होना अनिवार्य है । संक्षेप में इक सार्थक बात है जो मुझे भी पचास साल पहले इक पत्रिका के कॉलम से समझ आई थी , सरिता पत्रिका के हर पाक्षिक अंक में विश्वनाथ जी लिखते थे जो बात दोहराता हूं । 
 
बड़े हुए शिक्षा हासिल की नौकरी कारोबार करने लगे विवाह किया संतान का पालन पोषण किया कोई घर बनाया कुछ सुःख सुविधा के साधन जुटाए , ये सब अनपढ़ भी कर ही लेते हैं , पशु पक्षी जानवर भी कोई घोंसला कोई ठिकाना बना लेते हैं । आप शिक्षित हैं विवेकशील हैं तो आपको अपने देश और समाज को बेहतर बनाने को कुछ अवश्य करना चाहिए , ये आपका कर्तव्य है क्योंकि आपको जितना मिला है अधिक योगदान सामाजिक व्यवस्था का है अन्यथा कोई कितना काबिल हो कितने धनवान पिता माता की संतान हो सब नहीं संभव होता । अजीब विडंबना है माटी का क़र्ज़ या देश के प्रति प्यार की भावना दिखाई देती है शब्दों में ही आचरण में उस की कीमत चुकाना कोई नहीं चाहता है । बचपन की कहानियां नैतिक मूल्यों की और ऊंचे आदर्श सादगी भरा जीवन का सबक कोई आजकल पढ़ाता नहीं समझाता नहीं । शिक्षा से नौकरी कारोबार में पर्तिस्पर्धा का इक पागलपन है जो सिर्फ मृगतृष्णा ही है , आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए बस दो ग़ज़ ज़मीन इक अंग्रेजी कहानी है , हाउ मच लैंड ए मैन नीड । यही होने लगा है अधिक की चाहत में जीवन का अंत आ जाता है मंज़िल वही है ख़ाक में मिल जाना ।     

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जून 09, 2024

तीसरी कसम निभाना ( अफ़साना ए सियासत ) डॉ लोक सेतिया

  तीसरी कसम निभाना ( अफ़साना ए सियासत ) डॉ लोक सेतिया 

आपकी कसम , क्या क्या कसमें वादे लोग कहते हैं , झूठ नहीं कसम से , यहां अदालत में धार्मिक ग्रंथ पर हाथ रख कर सच बोलने की कसम खिलाई जाती है निभाई नहीं जाती अधिकांश मुकदमों में । लेकिन भारत इक लोकतंत्र है जिस में उच्चतम पद पर नियुक्ति करते समय संविधान और ईश्वर की शपथ उठवाई जाती है । कुछ कठिन कार्य नहीं पूरी निष्ठा संविधान के प्रति रखना और सभी के साथ न्याय की भावना रखना किसी से अनुराग अथवा पक्षपात नहीं करना । दो बार पहले उठाई है कसम मगर दिल पर हाथ रख कर बताना कभी याद भी आई वो शपथ , शायद ही कोई ऐतबार करेगा क्योंकि आपने हमेशा धर्म से लेकर विपक्षी दलों की ही नहीं पिछले सभी शासकों की अनुचित आलोचना करते समय किसी मर्यादा का कभी पालन नहीं किया है । देश के सभी लोगों की समानता की बात की भावना का पूर्णतय: आभाव रहा है । देशसेवा समाज की भलाई से पहले खुद को बड़ा महान और लोकप्रिय बनाने पर रात दिन एक करने को जनता का कल्याण नहीं कहते हैं । निंदक नियरे राखिए की बात आपको स्वीकार नहीं है जो आपकी बात से सहमत नहीं उसको क्या क्या नहीं घोषित किया गया बल्कि आपने अपना तथकथित आईटी सेल बनाकर विरोध करने को अपराध जैसा मानते हुए भाई को भाई से लड़वाने का कार्य किया है । आपको ये अवसर मिला है तो जो करना नहीं चाहिए था मगर आपने किया डंके की चोट पर और उस में सफल होकर अहंकार से सीना चौड़ा किया , अब उस सब का पश्चाताप और प्रयाश्चित करने पर विचार कर भूलसुधार किया जा सकता है । आपको तीसरी बार शपथ लेने पर शुभकामना देते हुए ये संदेश देश हित और समाज कल्याण की कामना से भेज रहा हूं । 
 
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जून 08, 2024

झुक गया आसमान ( 2024 चुनाव ) डॉ लोक सेतिया

       झुक गया आसमान ( 2024 चुनाव ) डॉ लोक सेतिया 

याद आया आपको अभिनेता राजेंद्र कुमार अभिनेत्री सायरा बानो की 1968 में इक फ़िल्म आई थी प्यार और कॉमेडी का संगम था । कहानी में ऊपरवाले से इक भयंकर भूल हो जाती है मौत का फ़रिश्ता उसी शक़्ल के किसी दूसरे व्यक्ति के प्राण हर लेता है रूह को ऊपर की दुनिया में ले जाता है । जब धर्मराज को माजरा समझ आता है तो यमराज को आदेश देता है इस भले व्यक्ति को फिर से ज़िंदा कर इक बदमाश की जान लेनी है । समस्या तब खड़ी होती है जब धरती पर वापस पहुंचने पर देखते हैं कि उसकी लाश को जलाया जा चुका है । धर्मराज उपाय बताते हैं कि इस शरीफ व्यक्ति की आत्मा को बदमाश व्यक्ति की रूह निकलते ही मृत शरीर में प्रवेश करवा समाधान किया जा सकता है । लेकिन नायक ज़िद पर अड़ जाता की बदमाश की जगह जीने से उसको सभी बुरा समझेंगे लेकिन शर्तों को मनवा कर तैयार हो जाता है । ये केवल बताने को लिखा है आधुनिक संदर्भ में इस आलेख से इसका कोई भी संबंध कदापि नहीं है , बात अब शुरू करते हैं । 
 
इस चुनाव को लेकर जानकर कितनी राय दे रहे हैं उनका विश्लेषण राजनैतिक सामाजिक अथवा अन्य आधार पर है । ये ज़रा अलग ढंग से जीत हार को एक तरफ कर कौन क्या चाहता था और किस को क्या हासिल हुआ ये देखना है । किसी को सिर्फ एक ही चाहत थी किसी और की बराबरी कर तीसरी बार लगातार सत्ता पर बने रहना और ऐसा करने के लिए विचार क्या अपने दल क्या गठबंधन क्या सबको पीछे रख कर सिर्फ और सिर्फ खुद अपने नाम पर जनादेश मांगा था अपने नाम को गारंटी घोषित किया था । लगता नहीं किसी ने गारंटी पर भरोसा किया दल को भी नहीं बहुमत मिला भी तो गठबंधन को शामिल करने के बाद । लगता है उनकी धड़कन और चिंता की रफ़्तार वही समझते हैं लेकिन खुद को सिर्फ एक मैं ही हूं की सोच निकलते पता ही नहीं चला बस किसी तरह दस्तार बच गई ये तसल्ली हुई । लेकिन तीसरी बार जनमत हासिल करने में क्या नहीं करना पड़ा और किस हद तक नीचे के स्तर तक आना पड़ा विचार करेंगे तो मुमकिन है समझ आए कि सौदा बड़ा ही महंगा पड़ा है , कभी हार कर भी शान बची रहती है कभी जीत कर भी लोकलाज और नैतिकता के तराज़ू पर हल्के साबित होते हैं । ये बताना भूलना नहीं कि जिनकी बराबरी करना चाहते हैं दस साल तक उनको बुरा साबित करने को बदनाम करने को कितना अशोभनीय आचरण नहीं किया । और उन्होंने कभी सत्ता से ऐसा मोह नहीं दिखाया था जैसा इन्होने किया जो भी जाए सत्ता मिल जाए । 
 
अब विपक्षी गठबंधन की बात करते हैं उनका घोषित मकसद था लोकतंत्र और संविधान को बचाना जिसे उन्होंने हारने के बावजूद भी हासिल कर लिया है । अब दस साल तक जिस तरह मनमाने ढंग से सत्ता और संविधानिक मर्यादा की परवाह नहीं कर मनमानी की आधुनिक जनादेश में संभव नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा करते ही जिन बैसाखियों का सहारा है उन से अवरोध मिलने का खतरा है । सही में अब सभी को साथ रखना मज़बूरी होगा और आप कोई बाजपेयी भी नहीं जो सत्ता को चिमटे से भी नहीं छूने का संकल्प लेते हैं और त्यागपत्र दे देते हैं । आसमान को झुकाया भी और इस तरह से कि आसमान धरती के सामने नतमस्तक होने को विवश है , शायद अभी कुछ और समझना बाक़ी है । सच्चाई है कि आसमान का कोई अस्तित्व ही नहीं होता है वो सिर्फ हमारी आंखें नज़र जहां तक देख सकती हैं उसका अंतिम छोर ही है । विपक्षी गठबंधन की सफलता है कि आसमान को झुकना पड़ा है और सत्ता को शर्तों से बांध दिया है गठबंधन के सहयोगी दलों में । त्रिशंकुः जैसी हालत बन गई है , इक कविता से अंत करता हूं । 
 
 

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

छल कपट झूठ धोखा
सब किया तुमने क्योंकि
नहीं जीत सकते थे कभी भी
तुम मुझसे
इमानदारी से जंग लड़कर ।

इस तरह
तुमने जंग लड़ने से पहले ही
स्वीकार कर ली थी
अपनी पराजय ।

मैं नहीं कर सका तुम्हारी तरह
छल कपट कभी किसी से
मुझे मंज़ूर था हारना भी
सही मायने में
इमानदारी और उसूल से
लड़ कर सच्चाई की जंग ।

हार कर भी नहीं हारा मैं
क्योंकि जनता हूं
मुश्किल नहीं होता
तुम्हारी तरह जीतना
आसान नहीं होता हार कर भी
हारना नहीं अपना ईमान ।




Jhuk Gaya Aasman (1968) | MemsaabStory

सर ऊंचा आबरू लुटवा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          सर ऊंचा आबरू लुटवा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

देश की हालत को देखते हैं नेटफ़्लिक्स पर हीरामंडी को देखते हैं लगता है इक जैसे हैं चमक दमक से लेकर बिकने तक सत्ता की खातिर कुछ भी करने को बदन से आत्मा तक का सौदा खुलेआम होता है । दुश्मनी से दोस्ती तक भरोसा नहीं कब कौन किस किरदार में दिखाई देने लगे । शान से जिस्मफ़रोशी के बाज़ार में राजे रजवाड़े जागीरदार जाते हैं किसी की आबरू लूटने में अपनी उतरवा आते हैं । जिसकी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देती वो चमाटा ख़ुशी ख़ुशी खाते हैं । ठीक ऐसे में किसी कमज़ोर महिला ने किसी ताकतवर महिला को थप्पड़ लगाया है इक पुराना सबक याद आया है , यही ज़ुबान तख़्त पे बिठाती है यही किसी को इक दिन सूली पर चढ़ाती है । मालूम नहीं किसलिए पुरानी कहावतें अपने आप याद आने लगी हैं जिनको कब का भुलाए बैठे थे । आशिक़ लाख कोशिश करता है दिल टूटने पर महबूबा को भुलाने की मगर शाम ढलते ही उसकी याद सताने लगती है ऐसा ही इक गीत पता नहीं कैसे इक दोस्त ने हंसी मज़ाक़ में मेरी पहचान बना दी । मुझे भी कुछ दोस्त किसी गीत को सुनकर या कोई फ़िल्म पुरानी देखकर बहुत याद आते हैं , वापस सही विषय पर लौट आते हैं । मुल्तानी कहावत है ढठी हाई खोते तूं ते लड़ी हाई कुंभार नाल । हिंदी में अनुवाद है कि गधे पर बैठ कर सफ़र कर रही थी अचानक गधे ने गिरा दिया तो पत्नी अपने पति कुंभार से झगड़ने लगी ।थप्पड़ भी किसी ने खाया है लेकिन दोषी कोई और था जो उसका मालिक जैसा है गुस्सा उस पर निकालना था निकला किसी पर । करे कोई भरे कोई वाली बात है बस किसी इक से नारज़गी ने कितने बेकसूर लोगों को गुस्सा झेलना पड़ा है चुनावी नतीजों का ये सार समझा कोई भी नहीं बल्कि जिस की ऊट - पटांग बातों से जनता को ऐतराज़ था उसे अभी भी अपनी गलती का एहसास नहीं वो आज भी कुछ दिन चुप रहकर फिर अपने पुराने किरादर में आने लगा है । इंसान की फ़ितरत बदलती नहीं अक़्सर गिरगिट की तरह रंग बदलना जाता नहीं है मज़बूर है झूठ का पुजारी है सच उसको भाता नहीं है । इक कहावत है ऊंचाई से गिर कर दोबारा ऊपर जा सकता है नज़रों से गिर गया जो फिर दिल उसको अपनाता नहीं है ।  
 
कथा कहानियों कहावतों कल्पनाओं से निकलते है खुली हवा में ज़माने से मिलते हैं । आपने मुझे मारा ठीक है लेकिन इतना बताओ गुस्से में पिटाई की या कोई मज़ाक़ था । जवाब मिला गुस्सा हैं तुम पर सुनकर कहने लगे फिर ठीक है क्योंकि मुझे मज़ाक पसंद नहीं , लेकिन आपकी तो आदत है सभी का उपहास करते हैं तो कहने लगे बादशाह लोग मज़ाक़ ही करते हैं उनको कुछ और करना नहीं आता जब तब ये उनका विशेष अधिकार है । राजा नंगा है कहना हमेशा गुनाह रहा है किसी को मुझे आप नंगे हो चुके हैं कभी नहीं कहना चाहिए । जैसे मैंने पिछले शासक का उपहास किया था कि कोई रेन कोट पहन कर नहाते थे जो कोई दाग़ नहीं लगा उन पर अन्यथा सत्ता के हम्माम में नंगा कौन नहीं हमने सभी दाग़दार लोगों को अपने साबुन से चमकदार सफ़ेद ही नहीं बना दिया बल्कि काला धन सफेद धन का भेदभाव मिटा दिया । जिस ने हाथ नहीं मिलाया उसका हाथ ही कटवा दिया , नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली कहावत सुनते थे हमने उस का आंकड़ा लाखों करोड़ तक क्या उस से भी आगे पहुंचा दिया । कोठेवाली की रोज़ सुहागरात होती है सत्ता की कुछ ऐसी बात होती है खुद को नहीं अपना सर्वस्व बेच कर भी हम शर्मिंदा नहीं हैं अपने धंधे को हमने कभी बुरा नहीं समझा बदनाम होना कोई आसान बात नहीं है । शरीफ़ लोगों को दुनिया भुला देती है जैसे हमको लगा था महात्मा गांधी को कोई नहीं जानता लेकिन हिटलर को दुनिया चाहे भी तो भुला नहीं पाएगी । कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी । ये बिजली राख कर जाएगी तेरे प्यार की दुनिया , ना फिर तू जी सकेगा और ना तुझको मौत आएगी । जिनको बात करने का सलीका नहीं आता है महफ़िल में रौनक है उनकी और जिनकी सूरत ऐसी जैसे कैक्टस का चेहरा , दिखाई देते हैं आईनाख़ाने में ।
 
नीरज श्रीवस्तवा आभाकाम

                        

जून 06, 2024

क्यूं नाचे सपेरा ( विद्रूप ) डॉ लोक सेतिया

            क्यूं नाचे सपेरा ( विद्रूप ) डॉ लोक सेतिया 

सरकार हज़ूर की हालत खराब होगी कौन सपने में भी सोचता था कभी लेकिन इस कदर खराब होगी ये तो अभी भी भरोसा नहीं होता है ।  कहते हैं कि शेर कितना भी भूखा हो कभी घास नहीं खाया करता है यहां तो हाथ पसारे उनसे आसरा मांगना पड़ रहा है जिनको समझते थे भला ये भी कोई औकात रखते हैं । आपके पास जितनी भी गिनती हो किसी काम की नहीं मगर उनकी छोटी छोटी संख्या आपकी झोली को भर सकती है । सभी को शंका थी वो जिनको हज़ूर सरकार ने कभी अपने बराबर नहीं समझा आज अवसर मिला है तो हिसाब किताब बराबर करने से चूकेंगे नहीं । लेकिन कमाल है वो फिर भी बेरहम कहलाना नहीं चाहते बस इक भरम रखने को सहारा देने को राज़ी हुए हैं मगर सभी की कई कई शर्तें हैं । हैरान हुए वो ही नहीं आपके अपने भी सुनकर कबूल है कबूल है की आवाज़ बगैर जाने कि किन शर्तों की बात है । जानते हैं कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है लेकिन इक फ़िल्मी डायलॉग है कठपुतली करे भी तो क्या धागे किसी और के हाथ में हैं नाचना तो पड़ेगा ही । जिसको लोग गब्बर सिंह मानते थे बसंती बनकर नाचेगा तो ज़रूर लेकिन कब तक क्योंकि जब तक उनके इशारों पर नाचोगे सरकार चलेगी सांस चलेगी हज़ूर के आशिक़ की जब भी पांव रुके खेल खत्म । कोई रोकने वाला भी नहीं बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना क्योंकि ज़माना बदल चुका है जान अपनी सब को बचानी है । ये असली घटना भी कोई काल्पनिक कहानी है , प्यास बुझाने को सिर्फ चुल्लू भर पानी है ।  आरज़ू थी जिनको सभी खुदा समझते वो तो खुद परस्तार निकले भी तो किस किस के जो अपना खुदा कितनी बार बदलते रहते हैं । चाहने वाले निराश हैं हैरान परेशान हैं कि उन्होंने जिस की ईबादत की उम्र भर अब पता चला वो तो रास्ते का कोई पत्थर था जिसे भगवान बना लिया नादानी से । नाख़ुदा को खुदा कहा है तो फिर डूब जाओ खुदा खुदा न करो , मेरे दुःख की कोई दवा न करो । 
 
आप को भी याद होगा गाइड फिल्म बनी थी जिस में नायक जाली हस्ताक्षर कर बैंक से पैसे निकालने के अपराध में सज़ा की अवधि समाप्त होने पर यूं भी चलता जाता है बिना किसी मंज़िल का पता जाने । संक्षेप में कहानी यह है कि सभी को रास्ता दिखाने वाला गाइड अपनी राह भूल जाता है । नायिका एक विवाहिता है जो अपने पति के बंधनों में जकड़ी हुई है और नायक से लगाव से वो सारे बंधन तोड़ कर नाचने लगती है जो उसकी तमन्ना थी पूरी हो जाती है । एक गांव जहां पानी की कमी है सूखा पड़ा हुआ है वह वहीं रात बिताने को खुले आकाश में सो रहा होता है और कोई साधु अपनी चादर उस पर डाल कर चला जाता है ताकि उसे ठंड नहीं लगे खुले में सोते हुए । गांव वाले उसे मसीहा समझने लगते है और कुछ ऐसा घटित होता रहता है कि वहां के पंडित ज्ञानी सभी उस की चतुराई की बातें के सामने हार मान लेते हैं । लेकिन समस्या वहां की जनता के अंधविश्वास की है और लोग सोचते हैं कि वो बरसात करवा सकता है और इत्तेफाक से एक दिन बारिश हो जाती है । गांव के लोग ही नहीं दूर दराज तक के लोग उसे कोई महान महात्मा समझने लगते है और उस की पूजा करने लगते हैं । अपनी प्रेमिका और अपनी मां को छोड़ कर दुनिया की अपनी ज़िंदगी की वास्तविकता से भागने वाला एक मसीहा कहलाने लगता है ये देख वो महिलाएं बिना किसी को वास्तविकता से अवगत कराए लौट जाती हैं । फिल्म का गीत मुसाफ़िर तू जाएगा कहां में एक पंक्ति है जो क़माल की बात कहती है ‌‌। क्यों नाचे सपेरा । 

कहानी का सार इतना सा है कि जब जो लोग ख़ूबसूरत सपनों में मग्न होकर खुश रहते हैं तब उनको कभी सच्चाई दिखाई भी देती है तो वो जागना नहीं चाहते नींद नहीं भी आए तब भी जागते हुए भी ख्वाबों की दुनिया से बाहर निकल नहीं पाते हैं । शायर का ख़्वाब हो , चौदवीं का चांद हो या आफ़ताब हो , जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो । 

 
जब शकील बदायूंनी ने लिखा- चौदहवीं का चांद... कहीं दीप जले कहीं दिल -  Shakeel badayuni birth anniversary best hindi song gazal afsana likh rahi  hoon - News18 हिंदी

जून 04, 2024

बना सकते हैं पर मना नहीं सकते ( आस्था ) डॉ लोक सेतिया

    बना सकते हैं पर मना नहीं सकते ( आस्था ) डॉ लोक सेतिया 

हम सीधे साधे इंसान हैं बिना वजह सवालों से नहीं उलझते हैं , कौन कैसा भगवान किस जगह रहता मिलता भी है या ढूंढना कठिन है ऐसी बातों को छोड़ भरोसा दुनिया का कर लेते हैं तो भगवान पर भी ऐतबार कर लेते हैं । लेकिन ज़िंदगी भर उस को मनाते रहते हैं जो किस बात पर क्यों खफ़ा है नहीं जानते बस उसे अपना बनाना है हम लोग हैं मानते । रोज़ जाते हैं कुछ लोग सुबह शाम जाते हैं कुछ कभी कभी जाकर किसी जगह सर झुकाते हैं अधिकांश लोग घर में ही छोटा सा पूजाघर बनाते हैं उस को भोग लगाते हैं दीपक जलाते हैं । भगवान ऐसा लगता नहीं कि मनाने से मान भी जाते हैं लोग शिकयत करते हैं दुःख दर्द उसको सुनाते हैं जो मुमकिन है बहरा हो आंसू बहाते हैं लौट आते हैं । कहते हैं ज्ञानी लोग अजब उसकी माया है गरीबों को तपती धूप मिलती अमीरों को शीतल ढंडी छाया है । सब कुछ मिलता है वहीं से उन्हीं को जिन्होंने कोई मंदिर कोई मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा बनवाया है आम लोगों को सुकून भी नहीं मिलता सब ने जगह जगह आज़माया है । चाहे किसी ने कितना चढ़ावा चढ़ाया है थोड़ा प्रसाद पाकर भी शुक्र मनाया है पर कभी हाथ कुछ भी नहीं आया है ये सच है अंधेरे में भी छोड़ जाता साथ अपना ही साया है । भगवान जाने कहते हैं आप कुछ भी नहीं जानते उसको सब पता है ऐसा कहा करते हैं । आप भगवान से नहीं डरते हैं नहीं मालूम ये नियम किस ने बनाया है भय बिनु होई ना प्रीति , क्या वास्तव में निर्जीव विनय नहीं सुनता । पत्थर का भगवान तभी कभी किसी की व्यथा सुनता ही नहीं लेकिन हर कोई उनकी तरह धमकी भी नहीं दे सकता कि शराफ़त से बात नहीं समझते तो दंडित होने को तैयार रहो । खुद भगवान समंदर को सुखा सकते हैं बिना विचारे की जो जीव हैं सागर में उनका विनाश हो जाएगा , लेकिन हम भूले से इक प्रश्न भी करते हैं तो मूर्ख कहलाते हैं । आज हमने भी खुद दामन उनका छोड़ दिया है जिस ने हमको मझधार में बेबस अकेला छोड़ दिया है । उसके होने का यकीन रखते हैं बस नहीं इंसाफ़ करता कहते हैं , किसी को बेपनाह देता है नहीं गुनाहों की उनको सज़ा देता है और जो लोग भूखे प्यासे हैं उनका दुःख दर्द नहीं मिटाता है । ज़ालिम ज़ुल्म ढाते रहते हैं ये नज़ारा क्या ईश्वर को मज़ा देता है । कोई शायर है जो ऊपरवाले से बस यही कहता है । 
 

दर्द से मेरा दामन भर दे  या अल्लाह , 

फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह । 

मैंने तुझसे चांद सितारे कब मांगे , 

रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह । 

सूरज सी इक चीज़ तो हम सब देख चुके , 

सचमुच की अब कोई सहर दे या अल्लाह ।

या धरती के ज़ख्मों पर मरहम रख दे , 

या मेरा दिल पत्थर कर दे या अल्लाह । 

                    ( क़तील शिफ़ाई की ग़ज़ल है । )

  Dard Se Mera Daaman Bharde Ya Allah | Lata Mangeshkar Ghazals | Romantic  Ghazals | Jagjit Singh

जून 03, 2024

अर्थी उठेगी या बरात निकलेगी ( लोकतंत्र का भविष्य ) डॉ लोक सेतिया

 अर्थी उठेगी या बरात निकलेगी  ( लोकतंत्र का भविष्य ) डॉ लोक सेतिया  

लगा हुआ है दरबार , क्या है जीत क्या है हार मिथ्या है सारा संसार  , जनता ने क्या किया कमाल सबकी नैया बीच मझधार इक लोकतंत्र का कायम आधार ।  कुर्सी वही रहती है हर दिन होता उसी का सोलह श्रृंगार , छोड़ दिया सब दुनिया का झूठा प्यार उनको जाना ही है उस पार । कौन सुने ऐसे समाचार जिन को सुन खाना पीना हो जाए , बेकार राजनीति है कौन संग है खुद से अपनी जंग है ,  बस कहने की होती ही क्या कोई आर या पार , कोई शिकारी बन गया कोई हुआ शिकार । जनाब ने अचानक किसी को फोन लगाया बोला वो कहिए सरकार याद किया आपने हर बार , लेकिन अभी तो नहीं मिला कोई किनारा आप हैं बीच मझधार , होगा जिया भी बेकरार । नहीं कोई चिंता की बात कट जाएगी ये भी इक रात बजेगा बैंड बाजा नाचेगी बरात , हमने बिछाई है बिसात हमसे कौन जीत सकेगा उनके घर है भीतरघात । मुझे किसी ने बताया है आपसे लोग ही नहीं अपने भी बड़े नाराज़ हैं , परेशान हैं बहुत शिकायत भी करते हैं हां मगर अभी भी गुस्सा हद से बढ़ा नहीं है । कुछ जो बंधे हैं मेरी परस्तिश में किधर जाएंगे मैं डूबूंगा साथ वो खुद मर जाएंगे । वफ़ा करने वाले रूठ कर जाते हैं शाम ढलनेलगे वापस घर आते हैं । सबको ही ज़िंदगी ने मारा है हम दुश्मन हैं अपने जहां हमारा है इक इसी बात का बाकी सहारा है । हम मुसाफिर हैं अपना यही किनारा है , कौन भला हार कर जीता है जो भी जीता है आखिर कभी दिल हारा है ।

 सत्ता का है चढ़ा सुरूर क्या बहक रहे हैं मेरे हज़ूर खाना चाहें मोतीचूर लेकिन दिल्ली है अभी दूर धीरे धीरे जाएगा सत्ता का खुमार । ये नज़ारा ऊपरवाला देख रहा था जब से सीसीटीवी लगवाया दुनिया का आंखों देखा हाल ठीक समझने लगे हैं । ग़ज़ब हैं वो जो अपने आप को भगवान समझने लगे हैं । जीवनसंगिनी चुप थी ध्यानमग्न नहीं पशेमान थी कई साल पहले इक भिखारी पर हुई मेहरबान थी पति से मांग लिया अजब वरदान था उस भिखारी को राजा बना दो उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते रहना , ऐसा संभव नहीं मुझे मत कहना । भला पत्नी की मांग कौन पूरी नहीं करना चाहता कोई विकल्प ही नहीं था वरदान देना पड़ा था । 
उसको भी कुछ समझ नहीं आ रहा है ये क्या सच अपने कर्मों पर पछता रहा है या दिखावे को आंसू किसी मगरमच्छ के बहा रहा है ।  

शासक बनकर लगा जैसे ऊपरवाले ने छप्पर फाड़ कर इतना दिया कि झोली में समाना मुश्किल हो गया , भगवान से जो जब मांगता मिलता तो समझता कि मुझ से अधिक काबिल और बड़ा आदमी कौन है । बस थोड़ा अहंकार का असर था जो समझने लगा उस ने जो भी किया भगवान ने भेजा था वो सब करने को । ऊपरवाला अपनी पत्नी को दिखला रहा था कोई अपने कर्मों का उत्तरदाई उसे बना रहा था । इतना बड़ा  इल्ज़ाम भला कैसे मंज़ूर होता लेकिन अपने ही दिए वचन से है वो भी मज़बूर होता । दुनिया वादा करती है कसमें खाती है भूल जाती है पर काश उसकी दुनिया का नहीं इक दस्तूर होता प्राण जाये पर वचन ना जाये । लेकिन हर बात की सीमा होती है शेर को बिल्ली ने सबक पढ़ाया इक दिन उसी को खाने आया , बिल्ली झट से पेड़ पर चढ़ गई शेर को बात लगी बिगड़ गई , बोला मौसी ये सबक नहीं सिखाया तब बिल्ली ने ठेंगा दिखलाया । सोचा उसने क्या था पाया पल भर में सब कुछ गंवाया । आखिर हाथी पहाड़ नीचे आया , कुछ घबराया कुछ इतराया अपना बोझ नहीं जाता खुद उठाया लेकिन खूब जमकर खाया जितना मनचाहा उड़ाया । अच्छा बुरा समझ नहीं आया कर दिया जैसा मनभाया । क्या बिल्ली ने रास्ता है काटा या फिर दिल को समझाना है कभी कभी धंधे में हो जाता है घाटा , कंगाली में गीला हुआ आटा रसोईघर छाया सन्नाटा ।  बैंड बाजा बारात रौशनी सजावट सब शानदार था । दुल्हा कुछ उदास लग रहा था परिवार के सदस्य और मित्र मंडली चिंतित थी कि कहीं दूल्हे के मन में कोई बात अभी तक अनकही तो नहीं रह गई । जब कारण पता चला कि दुल्हन के घरवालों ने बताया कि दुल्हन का कुछ पता नहीं है जाने कहां चली गई है । हज़ार तरह के डर लगने लगे हैं । खुशी का माहौल चिंता के आलम में तबदील हो गया है और ज़रा सी आहट सुनाई देती है तो धड़कने तेज़ हो जाती हैं । लड्डू खिलाए जाते हैं मगर अब लगता है कि लड्डुओं में मिठास नहीं है । इक मुल्तानी की कहावत है नहांदी - धोंदी रह गई ते मुंह से मक्खी बह गई ।



 आंगन में हलवाई थे बिठाए लड्डू के थाल पड़े सजाए लेकिन कौन खाए कैसे खाए जीया तरसे मनवा डराए ।
 चाहे कोई शीतल पेय पीये चाहे पीना चाहे गर्म-गर्म , सब हाज़िर है दाम चुकाओ छोड़ कर लाज शर्म । उन को तो है करना अपना कर्म फिर किस बात का भरम , जो भी हो किसी का नहीं कोई इख़्तियार है । आज नहीं किसी की जीत है आज नहीं किसी की हार है । लोकतंत्र का त्यौहार है जनता ही भगवान है सब जनता की मर्ज़ी है बाक़ी की खुदगर्ज़ी है । बुलावा आएगा ज़रूर उनको ये ऐतबार है कोई नया नाता नहीं वो अपना पुराना यार है । धंधा इसी को कहते हैं ख़ुशी और ग़म जो भी मिले सब सहते हैं इस को वही बस समझते हैं जो महानगर में रहते हैं । बरात निकले चाहे अर्थी जो भी हो बड़ी ऊंची शान से हो फूलों की बारिश से लेकर सजावट तक का इंतज़ाम सब पूरे अरमान से हो । आप क्या समझे अजब ग़ज़ब उनका व्यौपार है जिस को जो भी चाहिए समझो पूरा बाज़ार है । ताज़ भी मिल जाते हैं शोक गीत गाने वाले मातम जाकर मनाते हैं । ख़ुशी और ग़म दोनों अवसर के अश्क़ उनके पास हैं जिनका सपना टूटा उस दिल की तसल्ली की ख़ातिर बुझे दीप  जल जाते हैं । 
 
कयामत की घड़ी आने वाली है अभी ये राज़ है अर्थी सजनी है कि बरात चलने वाली है , आदमी की आरज़ू कब निकलने वाली है सब कुछ जमा किया है मगर थोड़ा लगता है थोड़ा और मांगते हैं । सिकंदर जब गया दुनिया से दोनों हाथ खाली थे मगर इस बात से अनजान सभी ताली बजाने वाले थे । दोनों आमने सामने हैं भीड़ उधर भी है इधर भी है , कयामत की है सबकी नज़र भी । बेखबर हैं वो जिनको रहती है दुनिया की खबर भी ।  कोई विश्लेषण का अर्थ समझा रहा था , अजब हाल है टेढ़ी तिरछी चाल है गर्दन उठा खड़ा हो किस की मज़ाल है कोई जीत कर भी उदास है मंज़िल दूर है बची आस है कोई खुश है हार भी उसकी जीत का नया आधार है । कुछ रिश्ते नाते दोस्त आएंगे रूठों को मनाएंगे जश्न मिलकर मनाएंगे , शपथ ग्रहण होना है शुभ अशुभ का रोना है आदमी खिलौना है । धरती पर रहना ज़रूरी है आसमान नहीं होना है नींद उड़ने लगी जागना नहीं आसां मुंह ढक कर सोना है । खाधी तां रज के नहीं तां सुमणा मुंह कज के , मुल्तानी कहावत है ।
 
 शायर बशीर बद्र जी की ग़ज़ल से कुछ शेर याद आए हैं । 
 

अब है टूटा - सा दिल , खुद से बेज़ार - सा 

इस हवेली में लगता था दरबार - सा । 

बात क्या है कि मशहूर लोगों के घर 

मौत का सोग भी होता है , तेहवार - सा । 

              डॉ बशीर बद्र 

 हर वक्त गुजर जाता है चाहे खुशी हो या गम का नशा उतर ही जाता है चाहे माशुका  या रम का - विभूति | Quote by vibhuti mishra | Writco

पर्दे के पीछे क्या है ( एग्ज़िट पोल सर्वेक्षण ) डॉ लोक सेतिया

   पर्दे के पीछे क्या है  ( एग्ज़िट पोल सर्वेक्षण  ) डॉ लोक सेतिया  

घूंघट की प्रथा भले आपको जैसी लगती हो सिर्फ इक बंधन नहीं थी और ऐसा महिलाओं की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ अथवा उनकी आज़ादी का हनन करना नहीं था । आपको अच्छा लगता है फ़िल्मी डायलॉग दो चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानो रमेश बाबू । सोचना ज़रूरी नहीं समझा कि कभी कभी कुछ चीज़ों का महत्व ही किसी बंधन की मर्यादा में होता है । बिल्कुल इसी तरह से वोट की गोपनीयता चुनाव की पवित्रता और देश में लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है । सबको उत्सुकता हो सकती है होने वाली संतान लड़का है या कि लड़की है लेकिन जब लगा समय से पहले ये जानकारी बेहद हानिकारक है तो इस पर प्रतिबंध लगाना पड़ा हालांकि अभी भी जिनको मनमानी करनी है वो नहीं मानते और कुछ लोग पैसे की खातिर कानून क्या किसी भी तरह से खिलवाड़ करने में संकोच नहीं करते हैं । खेल प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले जांच की जाती है कि किसी ने कोई ऐसी दवा तो नहीं ली हुई जिस से उसे अनुचित तरीके से अपनी ताकत बढ़ाकर छल कपट कर आगे बढ़ने को बाकि सभी को टंगड़ी मारने का अवसर मिले जो सामने दिखाई भी नहीं दे । लोकतंत्र की मर्यादा का चीरहरण चुनाव घोषित होते ही लोग करने लगते हैं । टीवी अख़बार वालों के लिए किसी का पक्ष बेशर्मी से लेकर चर्चा से जिसे चाहा उसे अच्छा बुरा या फिर नीचा दिखाने को घटिया उपहास करते रहना जैसी बातों को पत्रकारिता बिल्कुल नहीं कह सकते हैं । ऐसे ही विज्ञापन तो ऐसा है जैसे कुछ लोग हर आपदा को अवसर समझते हैं ये तो उनका पैसा कमाने का मौका है बेशक ऐसा करने से मतदाता को प्रभावित करना और सभी को निष्पक्ष सोच से विवेक से निर्णय करने को भर्मित किया जाना समाज को किसी अंधी खाई में धकेलना ही हो । आपको क्या अधिकार है खुद अपना ईमान बेच कर जनता के भोलेपन का फायदा उठाते हुए किसी की चुनावी लहर हो नहीं हो निर्मित करने की कोशिश करना ।
 
वोटों की गिनती से पहले किसी का कोई आंकलन करना ही लोकतंत्र की भावना को दरकिनार करना है , जब हर किसी का वोट गोपनीय है तब आपको किसी से भी किसी भी तरीके से जानकारी लेना सही नहीं कहला सकता है । लेकिन इन लोगों ने सिर्फ धन दौलत कमाने को अपने तथाकथित ऊंचे बड़े रुतबे  का झूठा लिबास पहन कर जो भी चाहे मनमानी करने की छूट खुद ही हासिल कर ली बल्कि छीन ली है । जैसा इनका दावा रहता है ये संविधान में कोई सतंभ नहीं हैं न ही इनको कोई विशेष अधिकार मिले हैं , खुद को ख़ास समझने को ये समाज सरकार से संगठन संस्थाओं को किसी न किसी तरह डराते रहते हैं । हमको जो महत्व नहीं देता उसकी छवि खराब करने की बात बोले बिना समझाई जाती है । आपने कभी पीत पत्रकारिता की बात सुनी है तो आजकल का ये मीडिया गंभीर रूप से पीलिया रोग से ग्रस्त है । ऐसे में उनकी नज़र जो चाहती है देखती भी है और सभी को दिखलाना भी चाहती है । 
 
कभी कभी कुछ बातें हमें लगता है जैसी भी हैं क्या फर्क पड़ता है उचित अनुचित होने से ऐसा होता ही है , बस यही भूल भविष्य को बर्बाद कर सकती है । समाज में परिवार में अनुचित को मौन स्वीकृति देना भी उचित को हानि पहुंचाता है जो इक सामान्य बात लगती है । चुनाव आयोग को जब भी चाहा कोई नियम बदलना ख़तरनाक़ साबित हो सकता है जो किया जाता रहा है कभी किसी सरकार की बात मान कर तो कभी खुद अपने आप को संविधान से ऊपर समझने की कोशिश कर । हर कदम पर संभल संभल कर चलना ज़रूरी है क्योंकि इस चुनौती में राह फिसलन भरी है और ज़रा संतुलन बिगड़ा तो गंभीर परिणाम कोई हादिसा होना मुमकिन है । आज़ादी का अर्थ किसी को कुछ भी करने की अनुमति नहीं हो सकती बल्कि हर किसी को अपनी निर्धारित सीमा में रहकर अपना कार्य करना चाहिए ईमानदारी से और निडर होकर निष्पक्षता से । बात शुरू की थी घूंघट की लाज से जो कोई अनावश्यक पुरातन प्रथा की सोच नहीं थी उस से बहुत आगे की समझ थी भले जब सामाजिक बदलाव आया तब खुद महिला को पर्दा हटाना पड़ा तब भी ये उनका खुद का निजि पसंद का विषय है हां कोई अपना मत उन पर थोप सके ये नहीं स्वीकार किया जा सकता है । 
 
आख़िर में समाज की टीवी फ़िल्म की और साहित्य की शालीनता की कड़वी बात जिस में महिला ही नहीं पुरुष को भी निर्वस्त्र दिखाना देखना इक चलन बन गया है । महिलाओं का अधिकार है जैसा चाहें वो पहन सकती हैं आपकी नज़र उनके कपड़ों पार जिस्म को क्यों देखना चाहती है खुद पर अंकुश लगाएं । मगर इक पहलू और है जो महिलाएं विज्ञापन में टीवी सीरियल में फ़िल्म में खुद को नंगा प्रस्तुत करती हैं वो सिर्फ अपना नहीं सारी नारी जगत की छवि को नुक्सान पहुंचती हैं । चिंता का विषय यही है की हम सभी ने अपनी अपनी सीमाओं का उलंघन करने की आदत बना ली है जो हमको ऐसे समाज बनाने की तरफ ले जा रही है जिधर से वापसी लौटना कभी हो नहीं सकता । सभी विषयों को जोड़ कर कम शब्दों में बात कहना क्या होता है किसी ग़ज़ल कहने वाले से समझना , दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल पढ़ते हैं समझना भी होगा । ग़ज़ल पेश है ।
 

लफ़्ज़ एहसास - से छाने लगे , ये तो हद है 

लफ़्ज़ माने भी छुपाने लगे , ये तो हद है । 

आप दीवार गिराने के लिए आए थे 

आप दीवार उठाने लगे ये तो हद है । 

ख़ामोशी शोर से सुनते थे कि घबराती है 

ख़ामोशी शोर मचाने लगे ये तो हद है । 

आदमी होंठ चबाए तो समझ आता है 

आदमी छाल चबाने लगे ये तो हद है । 

जिस्म पहरावों में छिप जाते थे , पहरावों में 

जिस्म नंगे नज़र आने लगे ये तो हद है । 

लोग तहज़ीबों तमद्दुन के सलीके सीखें 

लोग रोते हुए भी गाने लगे , ये तो हद है ।

         ( दुष्यंत कुमार - साये में धूप से )    

 How accurate are the exit poll numbers How accurate were their figures in  the previous elections | Exit Poll 2024: एग्जिट पोल के नंबर कितने सही,  जानिए पिछले तीन चुनावों में कितने

 

जून 01, 2024

ज़िंदा लाश की व्यथा ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदा लाश की व्यथा  ( व्यंग्य - कविता )  डॉ लोक सेतिया 

सब को बेजान लगता था शायद उस में जान बाक़ी नहीं है 
जीवंत लोकतंत्र का कोई भी लक्षण दिखाई नहीं दे रहा था
बस इक विभाग इसको कभी स्वीकार नहीं कर सकता था 
क्योंकि उस का होना नहीं होना निर्भर करता है इसी पर । 
 
चुनाव आयोग को देश राज्य राजनीति के अजब खेल को 
आयोजित करना पड़ता है सब खेलने वाले खिलाड़ियों की
चाहत सत्ता पाने सरकार बनाने की पूरी करने की कोशिश 
जनता इस खेल में भी सभी खेलों की तरह दर्शक होती है । 
 
जिसको लोकतंत्र नाम दिया है दो सिरों से बंधा हुआ शख़्स 
कुछ उधर से कुछ इधर से ज़ोर ज़बरदस्ती से खींचते उसको 
उनका खुला मैदान है बीच में तंग गली है जो उसको मिली है 
दोनों तरफ ऊंची दीवारों पर सलाखें ही सलाखें गड़ी हुई है ।  

ख़ुदगर्ज़ लोग उसको बेजान चीज़ समझ  लूट मार मचाते हैं 
आम लोग कभी किसी कभी किसी हाथ का हथियार बनकर 
आप इक आग में खुद अपनी ही मर्ज़ी से घर अपना जलाते हैं 
जाने किस स्वर्ग की ख़्वाहिश में ज़िंदा जल गले मौत लगाते हैं । 

ख़ुदकुशी की होगी क़त्ल हो नहीं सकता क़ातिलों का ढंग है 
एक मुर्दा जिस्म आख़िर कंधों पर जाता है जिस तरफ जाना
खुद बाद मरने कोई बोझ अपना ही ढो नहीं सकता कभी भी 
जश्न का अवसर है जीत जिस की भी लोकतंत्र रो नहीं सकता । 
 
पहले भी कई बार ऐसा होता रहा है कोई न कोई सिरफिरा 
किसी अदालत किसी थाने किसी सार्वजनिक सभा में जा 
विनती करता है दुहाई देता है कहीं ज़ख़्मी हालत में पड़ा है 
दर्द से कराहता कोई अपने को वो लोकतंत्र ये बताता हुआ । 
 
हर बार उसकी व्यथा को कोई नहीं समझता रहा पहले से
लेकिन इस बार किसी ने सोचा चलो कुछ नहीं तो इक बार 
इसको संविधान नाम वाले अस्पताल में दिखाते हैं ले जाके 
भली भांति जांच परख कर उसको स्वस्थ है या मृत बताएं । 
 
घायल था लहूलुहान था फिर भी उसको ईलाज से पहले 
अपनी पहचान बतानी थी और क्या ये कैसे किसने किया
कोई गवाह कोई साक्ष्य सबूत पेश कर सकते हो पूछा गया 
जनाब किस किस का नाम बताऊं कैसे खुद को मैं बचाऊं । 
 
राजनेताओं ने मुझे अपनी विवाहित पत्नी नहीं रखैल जान
समझा उपयोग किया मसला कुचला विवश कर कैद किया 
अखबार टीवी चैनल से सोशल मीडिया वालों तक सभी ने 
मुझे बचाने का वचन देकर मेरे साथ जो नहीं किया वो कम ।  

जनता बेचारी हर बार जाती हारी कोई समझा नहीं बिमारी
क्या बताए किसे जाकर क्या है जनता की नहीं है कोई भूल 
आम लोगों की खातिर हैं कांटे ही पग पग पर बिछे हुए हैं पर 
राजनेताओं अधिकारियों को मिलते हैं सभी गुलशन के फूल ।    

कोई योगी कोई संत महात्मा कोई रहम दिल दर्शन शास्त्री 
समझ गया ये कोई लावारिस है जिस को घर से बेघर किया 
मिलकर कुछ धनवान और चालाक लोगों ने स्वार्थी बनकर 
सभी दलों के नेताओं अधिकारियों न्याय करने वालों ने बस 
लोकतंत्र की विरासत को पाने को चुपचाप दफना दिया था । 
 
आपको किसी लाश की कब्र को देखा है कभी कहीं पर तो 
खामोश आहें और भीगापन अश्कों से गीली माटी का वहां 
आहट  सुनाता है अपने वर्तमान अतीत से भविष्य तक की 
आगाज़ सभी जानते हैं अंजाम अपना खुद नहीं जानता कोई । 
     
 भारत में लोकतंत्र की गिरावट का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा