अक्टूबर 10, 2026

POST : 2127 अपनी मौत का सामान ले चले ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         अपनी मौत का सामान ले चले  ( तरकश )   डॉ लोक सेतिया

कभी कभी ख़ामोशी जो कहती है शब्दों से नहीं ब्यान किया जा सकता लेकिन आजकल शोर शराबा बहुत है ऐसे में जिसको ख़ामोशी की आवश्यकता होती है ढूंढते हैं कोई जगह कहीं मिल जाये ।  ऐसा क्यों है जिस दौर से हम पचास साल पहले गुज़र चुके हैं लगने लगा है वही दौर वापस लौट कर पहले से बढ़कर दुश्वारियां सामने खड़ी कर रहा है ।  तब कोई शख़्स था जो दिखाई देता था साहस और यकीन के साथ उस कोहरे को हटाकर खुले आसमान को दिखाएगा । लेकिन आज तो घना अंधकार छाया हुआ है मगर कोई उजाला करने वाला दूर दूर तलक दिखाई नहीं देता । कहने को कितने लोग जतलाते हैं कि वो सब कुछ जिसको ध्वस्त किया जा चुका ही नहीं निरंतर ध्वस्त करने का प्रयास जारी है उस सब को फिर से दोबारा पहले जैसा बना देंगे , लेकिन तब किसी की बात उसके मकसद पर शंका का सवाल ही नहीं था जबकि आज चाह कर भी फिर किसी पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता ।  ऐसा इस कारण है कि उस एक शख़्स जैसा कभी कोई दूसरा नज़र कभी नहीं आया जिस को ख़ुद अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए था सिर्फ देश जनता की चिंता थी । अब तो बार बार यही हुआ है कि जिसे समझते कुछ था पर अवसर मिलते ही वही आदमी कुछ और ही निकला और जितनी आशाएं जगाई थी उस से कहीं अधिक कई गुणा निराशाओं का कारण साबित हुआ ।  तभी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहना है और कहना भी किस को है इधर कोई किसी की बात सुनता ही नहीं है । सभी बोलना जानते हैं वह भी बिना सोच विचार किए ही ।  
 
दिल में कितने अरमां थे जब किसी को ढूंढ कर लाए थे भिखारी से बादशाह बना बैठे , ये आशिक़ी भी ख़ुद ही अपनी जान की दुश्मन होती है । जितना भरोसा करते हैं उतना ही अधिक धोखा खाते हैं हम बदनसीब दिल में बसा कर प्यार अरमान ले चले हम आज अपनी मौत का सामान ले चले ।  ऐसे कितने फ़िल्मी गीत गाकर दिल को बहलाते हैं कि हमारे साथ जो हुआ जाने पहले किस किस के साथ होता ही रहता है ।  अब किसी की बातों पर यकीन नहीं करना बस सभी देवता लगते हैं साबित आदमी तक नहीं होते बाद में ।  जावेद अख़्तर जी फ़रमाते हैं ,   नर्म अल्फ़ाज़ , भली बातें , मुहज़्ज़ब लहज़े , पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं ।  ऐसे में किसी शायर की इक ग़ज़ल याद आई है उसी को पढ़ते हैं सोचते समझते हैं ।   
 

तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला 

मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला । 

मैं रफ़्ता रफ़्ता हुआ क़त्ल जिस के हाथों से 

वो बदनसीब  वो क़ातिल मैं आप ही निकला । 

     ( शायर का नाम मालूम  नहीं है )  


 

 
            

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