नवंबर 01, 2026

POST : 2134 नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी बढ़ती गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

      नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी बढ़ती गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी बढ़ती गई 
हर तरफ जलते दिए पर तीरगी बढ़ती गई । 
 
प्यास के मारे तरसते रह गए  बरसात में 
अब कि बारिश में हमारी तिश्नगी बढ़ती गई ।  
 
थी ज़माने की नसीहत प्यार करना जुर्म है 
रोकती दुनिया रही पर आशिक़ी बढ़ती गई । 
 
दिल्लगी क्या चीज़ है कैसे बताएं हम भला 
रोकना चाहा मगर दिल की लगी बढ़ती गई । 
 
याद उनके प्यार की दिल में बसाये हम रहे  
भूलना चाहा कभी  तो बेकसी बढ़ती गई ।  
 
कब कहीं देखा ख़ुदा ता उम्र जो कहते रहे 
जब मुसीबत आ पड़ी जो बंदगी बढ़ती गई । 
 
ख़त्म ' तनहा ' हो गई हैं हुस्न की वो शोखियां 
पर हमारे इश्क़ की वो  सादगी बढ़ती गई ।