सितंबर 22, 2021

गठबंधन सरकार से विवाह संबंध तक ( हंसते - हंसाते ) डॉ लोक सेतिया

गठबंधन सरकार से विवाह संबंध तक ( हंसते - हंसाते ) डॉ लोक सेतिया 

समझ का फेर है अन्यथा विधाता के निर्णय में होती कभी नहीं इक पल की देर है माना साफ नज़र आता अंधेर ही अंधेर है सरकार क्या कमाल है सब कुछ बेहाल बदहाल है किस्मत की बात नहीं बिन बादल हुई बरसात नहीं अंधे के हाथ लगी बटेर है। वक़्त वक़्त की बात है दिन अंधेरे हैं जगमगाती रात है दिल्ली राजधानी है अजब करामात है सेवक महल में रहता मालिक को मिला फुटपाथ है। राजा है जिसकी नहीं रानी है उसकी रोज़ नई कोई कहानी है बिल्ली मौसी शेर की खो गई नानी है बस इतनी सी परेशानी है। शेर और बुढ़िया की सुनी कभी कहानी है बात समझने की है आपको समझानी है शेर से सभी डरते थे इंसान उसका शिकार कर लेता था उसने ईश्वर से इंसान की भाषा समझने का वरदान हासिल कर लिया और इंसान की बात सुनकर निडर होकर गांव बस्ती जाने लगा। इक झौंपड़ी से इक बुढ़िया की आवाज़ आती सुनाई देती है बड़बड़ाती है मेरा गधा धोबी वापस देने नहीं आया ज़मींदार के घर मिट्टी पहुंचानी है रात होने को है। मैं ज़मींदार से नहीं डरती मेरे सामने शेर भी आये तो नहीं डरती सुनकर शेर हैरान हो जाता है। बुढ़िया को शेर दिखाई देता है अंधेरे में समझती है मेरा गधा है। शेर दहाड़ता है तो बुढ़िया कहती है शेर समझने लगा खुद को मैं तुझको तेरी औकात बताती हूं और उसके कान पकड़ उस पर मिट्टी लदवाती है और ज़मींदार के घर गिरवाती है। शेर की पीठ टूट जाती है और भाग जाता है। इस नीति कथा की शिक्षा है की भीतर से डर कर आधी लड़ाई पहले ही हार जाते है , यही हालत सरकार जनता को लेकर है और पति पत्नी को लेकर भी। 
 
  कोई कहानी उपन्यास नहीं है ये बड़ी लंबी महाकथा है जिस के हर अध्याय का गंभीर और गहरा अर्थ है। आदमी का जीवन से ताकत का विवश कमज़ोर से निरंतर संघर्ष है। दुनिया की संरचना में कोई नहीं बड़ा छोटा था सब आज़ाद थे खुश थे आबाद थे ख़ुदग़र्ज़ी ने कयामत ढाई है भूलकर प्यार की पढ़ाई नफरत इतनी बढ़ाई है दुश्मन लगता प्यारा दोस्त से नहीं मिलने की कसम खाई है। सत्ता का खेल सांडों की लड़ाई है दलों की राजनीति में खेत खलियान की शामत आई है। सरकार बनाकर हर कोई पछताया है पाया नहीं धेला इक जो था जेब का रुपया गंवाया है। जंग है शतरंज है खेल मगर जारी है जनता की विनती है फरमान सरकारी है सत्ता दुनिया की सबसे बड़ी बिमारी है लाईलाज रोग है चारागर की लाचारी है। इश्क़ वाली भी मुश्किल बड़ी भारी है दवा देने से दर्द बढ़ने की लाचारी है। शादी करना मज़बूरी नहीं है खाना नहीं खाना लड्डू मर्ज़ी है पछताना ज़रूरी है ज़रूरी नहीं है। खुद क़ातिल को मसीहा बनाते हैं सरकार बनाकर नई मुसीबत बुलाते हैं शासक अपनी मनमानी चलाते हैं बाकी सब पर हुक्म चलाते हैं। कायदे कानून बनाए जाते हैं पर कसम खाई थी न्याय सत्यनिष्ठा की भूल जाते हैं। कायदा कानून कायम रखने को जो भी विभाग बनाते हैं उनकी बात मत पूछो ऐसे पेड़ हैं जो आग बरसाते हैं। शासक वर्ग मौज उड़ाते हैं और आम नागरिक शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं गरीबी भूख जैसी बुनियादी समस्याओं की बदहाली से तड़पते हुए जीते हैं मर जाते हैं। सभी नये शासक स्वर्ग के ख़्वाब दिखलाते हैं जन्नत ज़िंदा रहते क्या कभी  कोई पाते हैं। चोर लुटेरे अपराधी निर्दोष साबित होते हैं और बेगुनाही की सज़ा शरीफ लोग पाते हैं। न्याय-व्यवस्था समानता मौलिक अधिकार कहने भर को खोखले आदर्श हैं वास्तव में कहीं नज़र नहीं आते हैं। दुनिया भर के लोगों ने सरकार बनाई है परेशानी दूर क्या होती और बढ़ाई है। आजकल सबसे बड़ी समस्या खुद सरकार है अंधी बहरी लूली लंगड़ी बेबस लगती है मगर वास्तव में दोधारी तलवार है। भारत देश की सरकार जाने किस युग का अवतार है सच की बात नहीं होती झूठ की जय-जयकार है सिर्फ इक इश्तिहार है।
 
विषय को थोड़ा बदलते हैं फ़ितरत को जो बदलते हैं अपने आप को छलते हैं सोचते हैं खूबसूरत दुनिया बसाएंगे फूल ही फूल खिलाकर हंसेंगे मुस्कुराएंगे गुलाब को नहीं पहचानते हैं शबनम को बारिश मानते हैं। गुलाब में कांटे छिपे रहते हैं चुभन होती है तो चिल्लाते हैं अश्क़ चुपके चुपके बहाते हैं। अकेलेपन से कभी घबराए थे कोई साथी ढूंढ कर लाये थे जश्न मनाए थे गीत गाये थे डोली बरात सब सजाये थे। चार दिन की चांदनी रात होती है अंधेरे मिलते हैं रौशनी की बात होती है। निभाना बड़ा मुश्किल लगता है दामन छुड़ाना भी नहीं चाहते हैं वो सुबह कभी तो आएगी वो सुबह कभी तो आएगी इंतज़ार उम्र भर करते हैं। लोग क्या कहेंगे इस से डरते हैं आहें चुपके चुपके भरते हैं वो भी क्या दिन थे जब आज़ाद परिंदे थे बंद पिंजरे में याद करते हैं। पति बनकर राजा बाबू गुलाम हुए पत्नी बन रानी बन राज करने के ख़त्म अरमान हुए दोनों को शिकायत दोनों को मुहब्बत भी है साथ और दूर की मुसीबत भी है। न जाने किसने विवाह संबंध की रस्म बनाई थी क्या उसका कोई ख़सम था क्या उसकी कोई लुगाई थी। गुड्डे गुड़ियों का खेल लगता था अच्छा शायद बड़े बूढ़ों ने की चतुराई थी बचपन से मन में चाहत जगाई थी यौवन आया मत मारी गई सामने कुंवां था पीछे गहरी खाई थी। किसी दार्शनिक ने कथा सुनाई थी जिस दिन हुई किसी की सगाई थी सब लोग चुटकला समझ हंस दिए कौन समझता पीर पराई थी। 
 
भगवान जोड़ियां बनाता है ये झूठ है जो सबको भाता है किसी पर लिखा कोई नाम नहीं सबका आगाज़ है अंजाम नहीं। कौन किसका भाग्य-विधाता है अपने मुकद्दर का हर कोई खाता है विवाह शादी करवाने वाला भी हमने देखा अकेला रह जाता है। जीवन साथी जब लोग चुनते हैं तब कभी नहीं सोचते क्या करते हैं हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती खुद क्या हैं क्या बताते हैं सच से किसलिए घबराते हैं। साथ रहना है खुश भी रहना है तो समझना समझाना ज़रूरी है क्या हर सुख दुःख में निभाना चाहते हैं ये बंधन इक विवशता मज़बूरी है स्वभाव प्यार आदर दोनों को दिल से होना ज़रूरी है। जन्म जन्म का रिश्ता कहते हैं शर्तों की क्यों बात होती है कितना दिखावा कितना तमाशा क्या भला मेल मुलाकात होती है। सबने कितने मापदंड बनाये हुए हैं पढ़ाई लिखाई शक़्ल सूरत धन दौलत ऐशो-आराम की चाहत ये सभी ख़्वाब की बातें हैं क्यों हक़ीक़त को सब समझते हैं। कोई भी इंसान मुकम्मल नहीं होता है आधा आधा बाक़ी रहता है सभी को मिलकर साथी को पूरा करना होता है। हम एक दूसरे को आज़माते हैं जो मिला उसको समझते नहीं नहीं मिला उसका अफ़सोस जताते हैं। 
 

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सितंबर 21, 2021

दुनिया की सबसे बड़ी दौलत ( बेटी का प्यार-विश्वास ) डॉ लोक सेतिया

 दुनिया की सबसे बड़ी दौलत ( बेटी का प्यार-विश्वास ) डॉ लोक सेतिया 

11 साल पहले मुझे बेटी ने जाने क्या सोचकर प्यार आदर विश्वास का एहसास दिलवाता ये अनमोल प्रमाणपत्र दिया था दुनिया का सबसे अच्छा पिता होने का। शायद अन्य कोई ईनाम पुरुस्कार धन दौलत मैंने अर्जित नहीं की जीवन भर में। ऐसा नहीं कि मैंने अपने बच्चों बेटी बेटे को सब कुछ दिया हो बल्कि ज़िंदगी में हमेशा संघर्ष करते हुए सभी अपनों को जितना देना चाहता था नहीं दे पाया जिसका एहसास मुझे रहता है। शायद इक बेटी ही इस तरह भावना को समझ सकती है और खुले मन से इज़हार कर सकती है अन्य कोई नाता इतना उदार नहीं हो सकता जो नहीं मिला जो सब उसको भूलकर जितना भरपूर कोशिश कर दिया किसी ने उसका मोल समझना। अनुपम खेर की इक फ़िल्म आई थी जिस में इक बेटी अपने पिता को निराश जीवन से निकालने को उस पर भरोसा करती है और जब तमाम लोग उसका इम्तिहान लेते हैं और असफल साबित करने की भरसक कोशिश करते हैं लेकिन अनुपम खेर कहते हैं उनको आज सिर्फ बेटी पूजा की नज़र में खुद को सही साबित करना है और किसी की परवाह नहीं कौन क्या समझता है। याद नहीं बचपन से आज तलक कोई ऐसा ईनाम पुरुस्कार प्रमाणपत्र मिला हो कोई चाहत ही नहीं रही खुद को ख़ास समझने की। आम हूं और आम होने पर रत्ती भर भी हीनभावना मन में रही है ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने देखा है हर कोई खुद को ऊंचा साबित करने की कोशिश में अपने को बौना साबित कर कर रहा है। मेरा ऐसा कोई मकसद कभी नहीं रहा है कुछ चाहत रही है तो यही कि कोई मुझे जैसा मैं हूं वैसा स्वीकार करे और अपना समझे। आपस में असहमति विचार का मतभेद होते रहने पर भी अपने संबंध पर अटूट विश्वास रखना वास्तविक मज़बूती होती है नाते रिश्ते की। बेटी के दिए इस उपहार से बढ़कर कोई दौलत दुनिया की हो नहीं सकती है और मेरा वादा है बेटी के भरोसे को हमेशा बनाये रखना। शायद खुद मैं दुनिया का सबसे अच्छा पिता बन नहीं सकता मगर मेरी बेटी दुनिया की सबसे प्यारी बेटी है हमेशा रहेगी। 
 

 

सितंबर 14, 2021

भटक रही अजनबी राहों में ( हिंदी की बात ) डॉ लोक सेतिया

  भटक रही अजनबी राहों में ( हिंदी की बात ) डॉ लोक सेतिया 

सुबह सुबह शहर की सड़क किनारे फुटपाथ पर चलते चलते मुझे मिली तो मैंने पहचाना ही नहीं। शिकायत नहीं की तब भी कहने लगी कोई बात नहीं सूरत नहीं पहचानते तो क्या हुआ प्यार तो मुझी से करते हो। हिंदी दिवस मनाते हो सबको शुभकानाएं भेजते हो जानते हो मुझे कहां से कहां ले आये हैं मेरे अपने मगर भाषा का दर्द हिंदी लेखक नहीं समझेगा तो और कौन समझ सकता है। शहर शहर गली गली सभा आयोजित की जाएगी मुझे जाने क्या क्या संबोधन देकर पुकारेंगे मगर मुझे बुलाना भूल गए होंगे और अनचाही सी वहीं किसी आखिरी कतार में कोने में सिमटी बैठी मैं सोचती रहूंगीं हर बार की तरह क्या ये मेरी बात की जा रही है। हिंदी से हिंदी लिखने वालों को ही नहीं देश दुनिया भर को कितना मिला है भाषाओं को कला को व्यौपार को आपसी संबंधों से लेकर मानवता तक को समृद्ध किया है मगर क्या किसी ने मुझे थोड़ा भी एहसास दिया है अपनेपन का। सब उपयोग करते हैं जानते नहीं पहचानते नहीं मुझे अपना मानते नहीं। हिंदी भावनाओं में बहकर भी उदास निराश नहीं थी हंसती मुस्कुराती हुई सबको गले लगाती चलती जा रही थी। हिंदी को मिलकर लगा कोई अथाह समंदर अपनी गहराई में कितना कुछ समाये हुए है अपनी आगोश में आये हर किसी को झोली भर भर अनमोल रत्न देती रहती है। किसी मां की तरह बच्चों पर सर्वस्व लुटाती हुई ममता से लबालब भरी सबको अपने आंचल की छांव में बिठाकर वात्सल्य से अभिभूत करती लोरी गाती मधुर सपनों की नींद में परियों की कहानी सुनाकर सब दुःख दर्द मिटाती। 
 
हिंदी सबकी है कोई पराया नहीं हिंदी के लिए सबको समझना होगा हम हिंदी के कौन हैं और हमारा हिंदी से क्या नाता है। सोशल मीडिया फिल्मकार कथाकार विज्ञापन से लेकर टीवी सीरियल रियल्टी शो और नृत्य संगीत तक सभी बिना हिंदी क्या कुछ भी कर सकते हैं। हिंदी ने अपनाया है सभी को भले किसी ने उसको अपना समझा हो या बेगाना। भाषा सभी जोड़ती हैं आपस में मगर हिंदी की तरह घुल मिल जाना पानी और दूध की तरह ख़ासियत सब में नहीं होती है। ये ऐसी महिला है जो माता पिता भाई बहन सास ससुर ननद देवर क्या गली मुहल्ले तक से निभाती है खुद अपनी पहचान खोकर बेटी पत्नी बहु मां बन जाती है। कोई उसकी कीमत समझे या नहीं उसके बिना गुज़ारा किसी का नहीं होता है। चलो आज उन सभी से जाकर मिलो गले लगाकर बात कर जिनसे पाया है जाने कितना लेकिन देने की बात भूल गए हैं। हिंदी की तरह कई रिश्ते हैं जिन में चाहत की प्यास अधूरी रही है क्योंकि उन्होंने सभी को सब दिया बदले में चाहा कुछ भी नहीं। ये हिंदी दिवस इक भाषा का नहीं विश्व भर को प्यार अपनत्व देने का उत्स्व बन जाए तो कितना अच्छा होगा। 

                           हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।

सितंबर 11, 2021

रौशन सितारों के घने अंधेरे ( पीतल की चमक ) डॉ लोक सेतिया

 रौशन सितारों के घने अंधेरे ( पीतल की चमक ) डॉ लोक सेतिया

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। शुरआत कल रात के तथाकथित शानदार शुक्रवार केबीसी एपिसोड की बात से करते हैं। सामान्य लोग ख़ास समझे जाने वाले लोग यहां भी हैं चार दिन आपके एक दिन उनके अपने वर्ग के लिए। सामान्य वर्ग कोशिश करता है सालों साल किस्मत से पहुंचता है खेल का खिलाड़ी बन कर शहंशाह के सामने और तलवे चाटने तक कुछ भी करता है बड़ी शख़्सियत से मिलने को समझता है खुदाई मिल गई लेकिन उच्च वर्ग वाले शानदार ढंग से बुलाया जाता है सब अलग भव्य दिखाई देता है। ये माजरा क्या है दो महमान आये ख़ास मकसद से पैसा पाने केबीसी खेल से बड़े लोग बड़े इरादे। फरहा जी को इक छोटे बच्चे को करोड़ों रूपये की दवा बस कुछ दिन में दिलवानी है फाउंडेशन बन गया छह करोड़ जमा भी हो गए केबीसी से मिलने कुछ लाख हैं लेकिन रास्ता बन सकता है जाने कितने करोड़ जमा होने का। अमिताभ बच्चन जी समझाते हैं देश के एक करोड़ लोग दस दस रूपये देते हैं तो दस करोड़ हो जाएंगे। कोई नहीं समझता जिनको कुछ शब्द बोलने थोड़ा अभिनय कर दिखाने के सच्चे झूठे विज्ञापन के लाखों से करोड़ों तक मिल जाते हैं उनको दस बीस करोड़ जमा करने को कहीं जाने की क्या ज़रूरत है। वास्तव में माजरा टीवी शो और ख़ास लोगों की आपसी कारोबारी सहमति का है फायदा दोनों का है। 
 
दीपिका पादुकोण जी अपनी मानसिक परेशानी की बात करती हैं चकाचौंध रौशनी में रहने वाले अवसाद अकेलापन निराशा से पीड़ित हो सकते हैं क्योंकि जिस आधुनिक समाज में ऐसे लोग रहते हैं उस में मौज मस्ती झूमना नाचना ख़ुशी मनाना चाहते हैं तो तमाम लोग मिलते हैं तनाव की तनहाई की ख़ालीपन की बात समझने को किसी को फुर्सत नहीं होती है। नाम पैसा शोहरत आपको ऐसे दोस्त या अपने जो हर हाल में साथ निभाते हैं नहीं दिला सकता है बल्कि उनसे दूर करता है। क्योंकि जानी मानी शख़्सियत बनते हर कोई उनसे फ़ासला बना लेता है कि कहीं कोई उनसे किसी मतलब से मिल लाभ नहीं उठा ले ये धारणा बन जाती है। उनकी माता जी को अपनी बेटी का रोना देख कर समझ आया जैसे वो सहायता मांगती हुई लगी तब शायद यही सही लगा कि अपनी बेटी से ज़िंदगी की परेशानी सांझा करने को कहने से अधिक उसको सलाह दी किसी मनो-चिकित्सक से मिलने की। अब उनको कोई कैसे समझाए की आपकी फाउंडेशन किसी सामान्य नागरिक को क्या समझा सकती है। ख़ास बड़े धनवान लोग विशेषज्ञ मनो-चिकित्सक से बड़ी फीस देकर उपाय जान सकते हैं जिन करोड़ों लोगों से आपको कितने करोड़ की कमाई होती है उन्हें खुद अपनी ज़िंदगी की उलझनें सुलझानी पड़ती हैं क्योंकि गरीबी बदहाली के शिकार पीड़ित से हर कोई बचकर निकलता है। जबकि आप बड़े लोग वास्तविक शुभचिंतक से बचकर रहते हैं। 
 
सवाल समस्या की चर्चा करने का होता तो अनुचित नहीं था लेकिन जब सवाल दुःख दर्द परेशानी को भी इक इक खेल तमाशा बनाने का हो तो उसको मानसिक दिवालियापन समझ सकते हैं। शायर सुरेश भारती नादान की कलम से आभार सहित शब्द उधार लेकर समझते हैं , कहते हैं नादान जी :- 

           रौशनी से जो मकां भरा-भरा लगा , तुम कहो कुछ भी मुझे वो मकबरा लगा।

           जब मिला नादान तो रोता हुआ मिला , बज़्म में देखा उसे वो मसखरा लगा।

KBC 13: Deepika Padukone, Farah Khan performed 'Ek Chutki Sindoor' act with  Big B!

सितंबर 09, 2021

ओ नादान तू बन जा भगवान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ओ नादान तू बन जा भगवान ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

दार्शनिकता की बात है समझना कठिन नहीं है थोड़ा सोचो ज़रा सा समझो वो जो कोई भी है किसी भी नाम से जाना जाता है विधाता ईश्वर ख़ुदा वाहेगुरु परमात्मा अल्लाह यीसु करता क्या है। तथाकथित ऊपरवाला किसी से पूछता नहीं किसी को बतलाता नहीं जब जैसा चाहता है अच्छा भला खराब करता चिंता नहीं करता दुनिया वालों को कैसा लगता है। मगर हर कोई उसकी दी परेशानी की बात उसी से जाकर कहता है रहम की भीख मांगता है। तुमने ऐसा क्यों किया कहने का साहस कभी कोई नहीं कर सकता। आदमी आदमी से रिश्ता निभाता रहता है तब तक जब तक आस रहती है कभी काम पड़ेगा तो साथ देगा मगर जब महसूस होता है अमुक व्यक्ति भविष्य में किसी काम में सहायक नहीं हो सकता उस से किनारा कर लेते हैं। आदमी की बात चेहरे के हाव-भाव बता देते हैं उसके पास बचा नहीं कुछ बांटने को पर भगवान को देख कर कोई नहीं समझ पाता कि उसके पास क्या है और उसके मन की मर्ज़ी क्या है। भगवान भले देता कुछ भी नहीं लेकिन उसको देख लगता है सामने खड़े व्यक्ति को आशिर्वाद दे रहा है। कभी उसके हाव भाव चेहरे के देख समझ नहीं सकते चाहता क्या है। अच्छा साहूकार इनकार नहीं करता बहाना बनाकर टालता है और जिस पर भरोसा होता है सूद सहित समय पर लौटाने का उसका अंगूठा लगवा बही पर नकद उधार दे देता है। भगवान सब जानता है आदमी मांगता है लेकर वापस करना याद नहीं रखता इसलिए जो इंसान अच्छा लगता है उस पर मेहरबान होता है ऊपरवाला। उसकी अपनी मौज है सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय , की मैं झूठ बोलिया की मैं कुफ़र तोलिया। 

सरकार भी भगवान की तरह होती है दिखाई नहीं देती बस सरकार है सब विश्वास करते हैं और सरकार भी सब कर सकती है लेकिन भगवान की तरह करती कुछ भी नहीं किसी के लिए जो भी करती है सिर्फ खुद की शान बढ़ाने को करती है। हर सरकार चाहती है लोग उसके सामने हाथ जोड़ भिखारी की तरह खड़े रहें और उसको जिनको देना है उन्हीं को देकर समझती है सबको सब मिल गया है। अमीरों को अमीर गरीबों को बेबस बनाना शासक होने सत्ता और सरकार का अहंकार होता है हम सरकार हैं हम जो करें हमारी मर्ज़ी जनता को सर झुककर स्वीकार करना चाहिए। राजा कभी भगवान नहीं होता है राजनेता कभी मसीहा नहीं होते हैं मगर चाटुकार लोग उनका गुणगान कर उनको भगवान होने का एहसास करवाते रहते हैं। मगर सत्ता जाते ही उनके होश ठिकाने लग जाते हैं शासक वास्तव में खुद सबसे भूखे नंगे भिखारी होते हैं ऐसे भिखारी जिनकी झोली कभी भरती नहीं है। जनता की सेवा देश समाज की भलाई की बातें भोले भाले लोगों को बहलाने का माध्यम हैं कथनी अलग करनी विपरीत होते हैं। 
 
ओ नादान आम आदमी तू भिखारी नहीं है भिखारी को राजा बनाकर पछताता है कभी नहीं देखा क्या तेरा बही खाता है। ठोकर खाकर भी समझ नहीं आता है क्यों भगवान की तरह सरकार पर भरोसा कर खाली दामन घर वापस लौट आता है। खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले , खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। 
 स्पर्धा परीक्षा मित्र मंडळ - ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले  ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है | Facebook

सितंबर 07, 2021

समंदरों की गाथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         समंदरों की गाथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

पहले पहले शुरुआत में ये सभी के सभी तपता हुआ रेगिस्तान हुआ करते थे पानी को तरसते और रेत का अंबार। उनकी आरज़ू तभी से विशाल समंदर बनने की रहती थी जैसे कोई बरसाती नाला मिला इन्होंने उसको अपने भीतर समा लिया। धीरे धीरे तालाब हुए और कोई करिश्मा कर जाने कितनी नदियों को अपनी तरफ आकर्षित उनको अपने में विलीन करते गए। धन दौलत नाम शोहरत बड़े होने की हैसियत पाकर खुद पर गर्व करने लगे और जिन से सब पाकर विशालता पाई उन्हीं का तिरस्कार करने लगे। समंदर कभी किसी से संबंध नहीं निभाते हैं उनसे दूर रहना अच्छा होता है उनके करीब जाते ही दरिया नदिया अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। समंदर किसी का उपकार नहीं मानते हैं उनको लगता है हमारी शरण में आना सबकी ज़रूरत है चाहत है विवशता है। आखिर समंदरों को छोड़कर उनसे बचकर कोई जाएगा कहां उनसे बचना आसान नहीं क्योंकि समंदर का मिजाज़ बदलता है तो उनकी लहरें सीमा की परवाह नहीं कर तूफ़ान लाकर तबाही ला सकती हैं। समंदर में खज़ाना है मोती हैं भंडार है सब जाते हैं कुछ पाने की चाह में डूब कर गहराई समझ आती है नसीब वाले बचते हैं मिला किसको कितना और क्या क्या खोकर कोई नहीं समझ पाता है। हर समंदर खुद प्यासा होता है उस से किसी की प्यास नहीं बुझ सकती कभी। समंदर अपने भीतर अनगिनत राज़ छुपाए रहते हैं उनकी थाह पाना मुमकिन ही नहीं है। समंदर का खारा पानी बदल बनकर बरसता है मगर बारिश का पानी तालाब नदिया से मिलकर आखिर बहता बहता फिर समंदर में वापस मिलकर मिठास खोकर खारापन अपना लेता है। 
 
पर्वत की ऊंचाई और समंदर की गहराई दोनों अलग अलग हैं। शासक सत्ताधारी बड़े नाम वाले ख़ास लोग दिखाई पहाड़ जैसे देते हैं मगर वास्तव में किरदार उनका छोटा होता है उनको नीचे वाले इंसान इंसान नहीं लगते हैं। अक्सर इंसान की लाश उनके पांव नीचे की ज़मीन बनी होती है। समंदर की ख़ामोशी तूफ़ान आने का संकेत हो सकती है तो उनकी लहरों का शोर अंदेशा लगता है अनहोनी घटना का भय पैदा करती हुई। शोर की खामोशी से मुलाक़ात और रौशनी का अंधेरों से रिश्ता कुछ उसी तरह का संबंध है जैसा महल का झौंपड़ी से अमीर का गरीब से सरकार का जनता से। एक का होना दूसरे का अस्तित्व बनाता है बिना झौंपड़ी महल की शान नहीं रहती है गरीब हैं तभी अमीरों की अमीरी कायम है जनता का आम होना सरकार को सरकार होने का एहसास दिलाता है। अन्यथा सरकार दाता नहीं भिखारी है और आम लोग नेताओं अधिकारियों का अनचाहा बोझ ढोने को विवश हैं। घोड़ा कभी घास से दोस्ती नहीं कर सकता है राजनेता घोड़े हाथी शेर की तरह हैं उनका अधिकार जंगल पर जिस तरह ताक़तवर का कमज़ोर पर ताकत आज़माने से समझा जाता है देश की राजनीति में सत्ता का संविधान से छीनते हैं राजनेता शासक वर्ग। हमने कानून अदालत संस्थाएं बनाई हुई हैं लेकिन उनकी अहमियत कठपुतलियों जैसी बन जाती है। जनता की चीख पुकार उन तलक नहीं पहुंचती क्योंकि सरकार ने उनको ऐसे भवनों में बंद किया होता हैं जहां बहरी आवाज़ सुनाई दे नहीं सकती और चकाचौंध रौशनी में बैठकर निर्णय करने वाले निगहबान करने वाले अंधेरे से परिचित नहीं होते हैं। 
 
हम सभी कैफ़ी आज़मी की नज़्म में बतलाये गए अंधे कुंवे में कैद लोग हैं जो कुंवे के अंदर से आवाज़ देते रहते हैं , हमें आज़ादी चाहिए , हमें रौशनी चाहिए। लेकिन जैसे ही कोई बाहर निकालता है तो हम बाहर की खुली हवा से घबरा जाते हैं रौशनी से आंखें चुंधिया जाती हैं और आज़ादी से डरने लगते हैं। और फिर खुद ही उसी अंधे कुंवे में छलांग लगा देते हैं। और दोबारा शोर मचाने लगते हैं हमें आज़ादी चाहिए , हमें रौशनी चाहिए। हमने अपनी दुनिया को उसी कुंवे तक सिमित किया हुआ है और कुंवे के मेंढक खुद को समझते हैं यही दुनिया है।

सितंबर 05, 2021

बेअसर आंसू-आहें अनसुनी फ़रियाद ( पढ़ना-लिखना ) डॉ लोक सेतिया

बेअसर आंसू-आहें अनसुनी फ़रियाद ( पढ़ना-लिखना ) डॉ लोक सेतिया 

कितनी बार वही सवाल मन में आता है बात तमाम चिंतन करने वालों की लिखने समझने वालों की है। जितने भी विचारक हुए सभी ने समाज की बातों को जाना समझा और अलग अलग तरह से कोशिश की अपने समय के समाज को बदलने की। पांच सौ हज़ार साल पहले लोग शिक्षित नहीं थे सोचने समझने की सीमा थी तब जानकारी हासिल करना कठिन था जीवन की समस्याओं को समझने की ज़रूरत ही नहीं महसूस होती थी। विधाता भाग्य और बने बनाये सामाजिक तौर तरीके मूल्यों मान्यताओं को अपनाना नियति लगती थी। मगर महान समाज सुधारक साधु-संतों सभी ने समाज को बदलने उचित राह चलने और नीति कथाओं बोध कथाओं से सही और गलत का फर्क समझाने की कोशिश की जिस से आसानी से जीवन की वास्तविकता को लोग समझ सकें और जानकार विवेक से सच्चाई अच्छाई के मार्ग पर चलना सीखें। और लगता है तब शायद अनपढ़ सीधे सादे लोग समझने लगते थे और ज़िंदगी समाज को बदलने की चाहत रखते हुए समय के साथ बदलाव करते रहे। आसान नहीं था सदियों की मान्यताओं परंपराओं को छोड़कर नई सोच को अपनाना मगर दो सौ साल पहले बड़े बड़े विचारक अपनी कलम से नई परिभाषा लिखने लगे थे। अन्याय से टकराने और सच और मानव कल्याण समानता आज़ादी की बुनयादी बातों को महत्व देने लगे थे। साहित्य सृजन का मकसद कोई नाम धन दौलत पाना कदापि नहीं था उन सभी की रचनाओं में दुनिया के तमाम लोगों के दुःख दर्द परेशानियों की बात होती थी। कुछ भी जो गलत होता है क्यों होता है और उसको कैसे बंद किया जाये और जो होना चाहिए उसकी शुरुआत की जानी चाहिए सिर्फ यही चाहते थे कोशिश किया करते थे। 
 
आजकल लोग कहने को पढ़ लिखकर जानकार बन गए हैं भले किताबी ज्ञान वास्तविक ज़िंदगी में किसी काम नहीं आता हो फिर भी सोचने समझने से लेकर तर्क वितर्क करने लगे हैं। सोशल मीडिया से जानकारी सच्ची झूठी हासिल कर खुद को समझदार और जानकार मानते हैं लेकिन हैरानी और विडंबना की बात ये है कि जो पढ़ते हैं सबको समझाते हैं लाजवाब ढंग से शानदार संदेश भेज कर किसी और की क्या बात कहें जब खुद उन्हीं पर उन बातों का रत्ती भर असर होता नहीं है। आजकल की ही घटनाओं की बात को ध्यानपूर्वक समझने सोचने से पता चलता है। टीवी पर किसी कलाकार की मौत की घटना से हर कोई विचलित दिखाई देता है अनुमान लगाता है क्या हुआ क्योंकर हुआ कैसे हुआ और क्या होता तो अच्छा होता। टीवी पर किसी शो में भावुक हो जाते हैं दर्शक और आयोजक क्षण भर को। पलकें भीगती हैं टिशू पेपर से पौंछते हैं और पल बाद अगले दृश्य में नये सीरियल में ठहाके लगाते हैं। संवेदनाएं औपचारिकता बनकर रह गई हैं। समझ नहीं आता जो नज़दीक नहीं जिन से नाता मनोरंजन और समय गुज़ारने या पसंद करने का है उनकी घटनाओं से परेशान विचलित होने वाले वही हम लोग खुद अपने देश समाज गांव शहर घर परिवार दोस्तों संग संग रहने वालों को लेकर विरक्त और संवेदनारहित बन जाते हैं। अपने पास किसी को बदहाल देख जानना ही नहीं चाहते कोई किसी परेशानी में है तो कैसे हम सहायक बन सकते हैं। ऐसे समय हम जिसकी समस्या हो उसी को दोषी समझने लगते हैं पर्दे पर अनजान अजनबी से सहानुभूति और करीब रहने वालों से उदासीनता दो अलग अलग किरदार हम निभाते हैं अफ़सोस असली दोनों ही नहीं होते हैं। हमारा किरदार बदल जाता है जब हम खुद परेशानी चिंता और समस्या में घिर जाते हैं तब जिनसे उम्मीद रखते हैं दिलासा देने और सुःख दुःख बांटने की उनको फुर्सत नहीं होती है व्यर्थ के दुनियादारी के अनावश्यक कार्यों से। मगर मिलने आते हैं रस्म निभाने को भीड़ का इक हिस्सा बनकर और तब संवेदनाएं बनावटी दिखावे की लगती हैं। फरहत अब्बास शाह कहते हैं बदल गए मेरे मौसम तो यार अब आये , ग़मों ने चाट लिया ग़मगुसार अब आये। ये वक़्त इस तरह रोने का तो नहीं लेकिन , मैं क्या करूं कि मेरे सोगवार अब आये। 
 
यही होता है ज़िंदगी भर जिनकी खबर तक नहीं लेते कभी याद नहीं आती कभी बात करना मिलना ज़रूरी समझा नहीं फोन पर कॉल नहीं करते बस व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते रहते हैं दुनिया से चले जाने पर शोकसभा में जाकर फूल चढ़ाते हैं। अंत में इक लघुकथा मेरी लिखी बहुत साल पुरानी है। 
 
 

               फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

     बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता।

    महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी ,

         " दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें "।

    तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।