Monday, 17 June 2019

बिना शीर्षक की दास्तान ( कुछ कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया

  बिना शीर्षक की दास्तान ( कुछ कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया

   सोचा तो था आज कुछ नहीं लिखना बस सोचना समझना है। सुबह पहला गीत सुनाई दिया मन रे तू काहे न धीर धरे। थोड़ा चैन दिल को रूह को भी सुकून मिला बेचैनी को करार आया भी। चलते चलते सैर पर कुछ समझ आया तो भूल जाने का डर भी है इसलिए लिखना ज़रूरी हो गया। तक़रीर लिखते हैं लिख कर रखते हैं ताकि सनद रहे ये भाषा तो सरकारी दस्तावेज़ लिखने वालों की हुआ करती थी कोई करारनामा कोई अनुबंध कोई वसीयत पंजीकृत करवाते समय गवाही भी साथ ज़रूरी हुआ करती थी। मेरी बात की गवाही भला कौन देगा सभी तो मुखालिफ राय रखते हैं सहमत नहीं कोई भी अपने साथ मनवाना आता नहीं मानता मैं भी कब हूं अव्वल दर्जे का अड़ियल अपनी बात पर टिका रहता हूं लोग दुनियादारी समझते हैं जब जिस बात से बात बनती हो बात बदलते वक़्त नहीं लगाते। ऐसी अजनबी लोगों की दुनिया है जो कहने को मेरी है जबकि सच में मेरा कुछ भी नहीं है अपना कोई भी मुझे अपना लगता नहीं है। हर किसी के अपनेपन की इक कीमत है और सबको मेरी कीमत कुछ भी नहीं लगती है और खुद मैंने भी अपना दाम लगवाना स्वीकार नहीं किया कभी। जो चीज़ बेमोल मिलती है कोई कीमत नहीं देनी पड़ती उसको कोई तिजोरी में संभाल के क्यों रखेगा। 

  किसी बागबां ने अपने आंगन में पौधा लगाया था सोचकर कि बड़ा होकर फलदार और छाया देने वाला होगा। थोड़ा बढ़ने लगा तभी समझ गए कि ये कुछ और ही है उसको पहचान नहीं थी इस पौधे के पत्ते कड़वे हैं मगर दवा का काम करते हैं इस के फूल सुगंध देते हैं मगर डाली से तोड़ते ही मुरझा जाते हैं। अकेला पौधा बाकी सब ऊंचे पेड़ों से अलग अकेला अजनबी सा महसूस होता उनको भी लगता कि हमारे बीच ये क्या क्यों उग आया है। माली ने कितनी बार उखाड़ कर खत्म करना चाहा मगर पौधे की जड़ रह जाती फिर पनप आता। बागबां को हिसाब लगाना था कितना पानी कितना भोजन कितना खर्च हुआ है किसी तरह से लागत वसूल करनी थी। समझता था ये शायद खोटा सिक्का है मगर कभी लगता कि खोटा सिक्का भी शायद वक़्त पर काम आ ही जाए। बागबां की बदनसीबी जो जब पौधा खुशबू बांटने लगा थोड़ी छांव देने लायक हुआ तो बागबां अचानक दुनिया से रुख्सत हो गया। पौधे को किसी और माली के हवाले कर गया जाते जाते जैसे ही पता चला इसका फायदा उठा सकते हैं और इसकी डाली पत्ते जड़ फूल सभी दवा का काम करते हैं। 
माली ने जिस बाग़ में लगाया उस को लाकर उसके मालिक को रंगीन बाज़ार में बिकने वाले फूल चाहिएं थे अपनी दुकान पर सजाने को शोभा बढ़ाने को। इसकी सुगंध भाती थी और जब कभी दवा की ज़रूरत पड़ती काम भी आता था मगर आमदनी कुछ भी नहीं होती थी कोई सजावट भी नहीं की जा सकती थी। बस न रखने की चाहत न फेंकने का मन होता अधर में लटकते हुए फालतू सा रहने दिया पौधे को कुछ विचार कर कि शायद किसी दिन इसकी कोई कीमत मिल जाएगी। 

दुनिया के बाज़ार में रिश्तों की बोली लगाई जाती है। समझदारी की अपनी परिभाषा है जो किसी भी तरह अपना मकसद हासिल कर लेता है बेशक किसी को अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से बहलाकर या कोई लालच दिखलाकर। जब जिसकी ज़रूरत उसी की तरफ की बात करता है सफल रहता है अपना सामान बढ़ा चढ़ा कर महंगे दाम बेचकर मुनाफा कमाता है सब को अच्छा लगता है। मगर जब कोई सच की बात कहता है झूठ का कवर नहीं लगाता नंगा सच लेकर खड़ा होता है तब उसका सामान बिकता ही नहीं दुनिया के बाज़ार में। सच खरीदने की हैसियत ही नहीं होती तभी बिना बिका रह जाता है। सच्चा शराफत से रहने वाला आदमी किसी भी रिश्तेदार किसी भी संबंधी किसी भी दोस्त को देर तक अच्छा नहीं लगता है। बस अपने मतलब पाने तक उसको भला बताते हैं उल्लू बनाने को और काम निकलते ही दूध की मक्खी सा बाहर कर देते हैं। 

   जान लिया है नसीब अपना यही है जिस किसी से वफ़ा की उसी से अपमानित होकर लौटना पड़ा है। फिर भी कोई मन में मैल नहीं रख खुद अपने संग रहने की कोशिश करने लगा तो हर किसी को ये भी पसंद नहीं आई बात। हमारे बगैर भला ये कैसे रह सकता है , लोग जीने नहीं देते किसी को अपने आप के साथ खुश होकर भी। उनकी अपनी कीमत घटती है या कोई कीमत नहीं रह जाती है। नासमझ होने पर भी इतना तो समझ लेता है कि ये अपनी दुनिया नहीं है और जो अपने ही नहीं न बेगाने ही हैं अजनबी है साथ रहकर भी अनजान हैं उनसे गिला क्या शिकवा कैसा और उम्मीद किस बात की। आखिर में इक शेर अपनी ग़ज़ल से। 

                                       अपने होते तो कुछ गिला करते 

                                       गैर लोगों से बात क्या करते।

आयोग की बैठक से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया

     आयोग की बैठक से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया 

 योजना क्या है नीति कैसी है इस पर चर्चा करना व्यर्थ है। आपकी हर बात पत्थर की लकीर है आप ही न्याय आप ही सत्य आप ही देश आप ही संविधान। सरकार भी आप सरदार भी आप विधान आपका गुणगान आपका। बाकी सब नश्वर है बस स्थाई आप हैं मुहब्बत करना नहीं जानते हैं हरजाई आप हैं। दोहा आप गीत आपका कथा आपकी चौपाई आप हैं। बुरे हैं सब लोग सबकी भलाई आप हैं हम जनता छाछ भी नहीं हैं सब दूध मक्खन मलाई आप हैं। शांति के देवता हैं जंग और लड़ाई आप हैं। अब और क्या क्या हैं कैसे बताएं इस युग के हातिमताई आप हैं। बिना उस्तरे से हजामत करते हैं सभी की ऐसे नाई आप हैं। क्या और कोई चाहिए जब बधाई आप हैं। आयोग की बैठक की शुरुआत इन शब्दों से हुई। इसके बाद देश की समस्याओं पर चिंतन विचार विमर्श हुआ और सभी सर हिलाते सर झुकाते स्वीकार करते रहे। 

   गरीबी का नाम बुरा है गरीबी खराब नहीं है गरीबी नहीं होती तो अमीर अमीर नहीं कहलाते फिर भी गरीबी की बात करना लाज़मी है। गरीबी अभिशाप होगी गरीबों के लिए राजनीति करने वालों के लिए वरदान है। गरीबी को खरीदते हैं गरीबी को बेचते हैं गरीबी के नाम पर खैरात लाते हैं विश्व बैंक से आईएमएफ से कई देशों से और लेकर खैरात बांटते भी हैं। हम सरकार वास्तव में भिखारी हैं मगर बनकर दिखलाते हैं हम दाता हैं। गरीबी से मेरी पहचान है कितने साल से शासक बनकर रहता हूं मगर वोट मांगता हूं तो गरीब परिवार का होने की बात करता हूं। जितना भी रईस बन जाऊं भीतर की गरीबी मिटने वाली नहीं है मुझसे गरीब कोई नहीं है गरीबी मेरी ताकत है मेरी सत्ता का आधार है। गरीब लोगों को योग करना सिखाया जाएगा दुबले पतले होने का फायदा गिनवाया जाएगा। सरकारी खज़ाने से इक नया ताज बनवाया जाएगा अमीर शब्द जिस पर गुदवाया जाएगा हर भूखे नंगे को वही पहनाया जाएगा। इस तरह गरीबी का नाम तक मिटाया जाएगा। देश गरीब नहीं कहलाएगा इक अध्यादेश लाया जाएगा। 

       भूख को बिमारी को जड़ से मिटाना है देश को स्वस्थ बनाकर दिखाना है। चांद को पानी में सबको दिखाना है बच्चे की तरह जनता को बहलाना है। चांद तारों की बात करनी है भाग्य बदलने की बात करनी है कोई भी काम नौकरी नहीं करनी है ज्योतिषीय उपाय की बात करनी है।  ज्योतिष को भी बढ़ावा देना है भाग्य बदलने को सितारों की बदलने की राह देखनी होगी। भाग्य से जीत हार होती है फिर से अपनी सरकार होती है जनता से हर भूल बार बार होती है। ऊंचे ऊंचे बुत बनवाने हैं हम लोग कितने स्याने हैं पापी अपने घर लाने हैं चुनाव जितवा कर हर गुनहगार पापी के दाग़ धुलवाने हैं। 

                              नामुमकिन कुछ भी नहीं है अच्छे दिन लाना भी मुमकिन था मगर अच्छे दिन लाने की ज़रूरत क्या है। हमने गहराई से हिसाब लगाकर समझा बहुत सीधा गणित है। देश की गरीबी स्वास्थ्य और शिक्षा की बदहाली न्याय व्यवस्था को सही ढंग से लागू करने पर जितना धन हर साल चाहिए उतना नहीं उस से अधिक हम ख़ास वीवीआईपी कहलाने वाले लोग हर महीने अपने सुख सुविधा के साधन वेतन भत्ते और मुफ्त घर गाड़ी खाना पीना और अपने गुणगान पर खर्च कर देते हैं। देशभक्त होने का ढौंग करते हैं अन्यथा क्या देश और जनता की खातिर साल में एक महीना हम सरकारी पैसा सुविधा छोड़ दें तो देश की करोड़ों जनता की भलाई हो सकती है। मगर हम सभी मुझे भी शामिल कर आप सब क्या देश को एक महीना अपनी सेवा नहीं दे सकते हैं बल्कि हम तो और अधिक चाहते हैं मांगते हैं। 

Sunday, 16 June 2019

फूलों की ज़ुबां से कांटों की कहानी ( दास्तां ए दर्दे दिल ) डॉ लोक सेतिया

     फूलों की ज़ुबां से कांटों की कहानी ( दास्तां ए दर्दे दिल ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

   जाने लिखने वाले किस तरह से अपनी जीवनी लिखते हैं कोई स्याही नहीं मिलती जो इस को बयां कर सके। लिखनी पड़ती है आंसुओं से ही और लिखते लिखते धुंधली हो जाती है। कई बार लिखी है फिर मिटा दी थी दिल नहीं माना अपनों की शिकायत दुनिया से करना , मुझे हर दिन कटघरे में खड़ा करने वालों को सवालों की बौछार के सामने लेकर खुद तमाशा बन जाना तमाशाई भी। फिर आज भीतर की घुटन को बाहर निकालने को लिखने लगा हूं तो पहले साफ करना चाहता हूं दोषी भी मैं हूं अपना खुद का क़ातिल भी मैं खुद ही हूं खुद ज़हर खाता रहता हूं जीने को खतावार भी कोई और नहीं मैं ही हूं। सबने मुझे जीने को जो अमृत पिलाया मेरे लिए विष का काम करता रहा मगर जब भी किसी ने ज़हर दिया पीने के बाद भी मुझ पर असर नहीं हुआ कैसे होता जब इतना अभ्यस्त हो गया था ज़हर का कि ज़हर दवा बनकर सांस सांस में समाता गया। कुछ पुरानी लिखी ग़ज़ल कविता हैं जो लिख कर बात कह भी सकता हूं और कहने की ज़रूरत भी रहेगी नहीं बाकी। बीस साल पहले लिखी नज़्म से शुरुआत करता हूं। 

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग - लोक सेतिया "तनहा"

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ,
आईने से यूँ परेशान हैं लोग।

बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह ,
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग।

जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें ,
उन को ही देख के हैरान हैं लोग।

अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन ,
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग।

आदमीयत  को भुलाये बैठे ,
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग।

शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी ,
बन गए शहर की जो जान हैं लोग।

मुझको मरने भी नहीं देते हैं ,
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग।


कल रात चाहा था कुछ लिखना मगर लिखने के बाद मिटाना पड़ा। कड़वी यादों को भूल जाना पड़ा। मैंने इक घर बनाया था मुहब्बत की खातिर दोस्तों को जब भी बुलाना पड़ा नया ज़ख्म खाना पड़ा। अपने भी अजीब होते हैं कहने को शुभकानाएं दुआएं देते हैं असर करती है तो ज़ख्म पुराने हरे हो जाते हैं। इक नज़्म और भी ज़रूरी है बात को संक्षेप में कहना चाहता हूं।

आपके किस्से पुराने हैं बहुत - लोक सेतिया "तनहा"

आपके किस्से पुराने हैं बहुत ,
सुन रखे ऐसे फसाने हैं बहुत।

बेमुरव्वत तुम अकेले ही नहीं ,
आजकल के दोस्ताने हैं बहुत।

वक़्त को कोई बदल पाया नहीं ,
वक़्त ने बदले ज़माने हैं बहुत।

हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां ,
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत।

दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम ,
और भी अहसां उठाने हैं बहुत।

मिल न पाये ज़िंदगी के काफ़िये ,
शेर लिख लिख कर मिटाने हैं बहुत।

फिर नहीं शायद कभी मिल पायेंगे  ,
आज "तनहा" पल सुहाने हैं बहुत। 

कभी कभी सालों बाद राज़ खुलते हैं मेरे दिल में कितने लोगों के राज़ दबे हुए हैं। राज़ को राज़ रखना सब नहीं जानते हैं। किसी को कैसे बताता कि जिस नाते को लेकर आपको गिला शिकवा है वो नाता आपका कभी था ही नहीं। कोई पहले से उलझनों में है उसको इतना बड़ा हादिसा मार ही डालेगा ये भी मालूम नहीं कभी किसी को ये भी शिकायत हो सकती है बताया क्यों नहीं। जबकि बताने पर शायद उनको मेरी बात पर भरोसा ही नहीं आये और राज़ मुझे बताने वाला अपनी कही बात को ही बदल दे कि नहीं ऐसा नहीं ऐसा है। मुझे ही नासमझ घोषित करना खूब जानते हैं लोग। छोड़ो उसकी नहीं खुद अपनी कहानी लिखने लगा हूं मगर क्या किया जाये हर किसी की कहानी में कितने किरदार बाकी लोगों के जुड़े रहते हैं। कितना अच्छा होता मेरी कहानी से कई ऐसे किरदारों का वास्ता ही नहीं पड़ा होता। मगर जब मेरी ज़िंदगी की कहानी का हिस्सा बन गए हैं तो उनको कहानी से अलग रखना संभव ही नहीं है। कितनी बार खुद को लेकर समझा तो महसूस हुआ है कि मैं इक ऐसा पौधा हूं जो जाने कैसे इक रेगिस्तान में पनप गया उग आया बिना किसी के चाहत के। कितने लोग गुज़रते हुए रौंदते रहे पैरों तले कितने जानवर खा जाते रहे कोई बाढ़ नहीं थी बचाने को कोई खाद पानी नहीं मिला फिर भी जाने क्यों बार बार उग जाता रहा धरती से अपनी जड़ से हर बार। आप जब भी मेरी कहानी पढ़ना तो मेरी तुलना उस बाग़ के फलदार पेड़ से मत करना जिसको माली ने सींचा पाल पास कर ऊंचा बड़ा किया। मेरा बौनापन मेरा नसीब है हालात के कारण है। फिर इक ग़ज़ल सुनाता हूं।


शिकवा तकदीर का करें कैसे - लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा तकदीर का करें कैसे ,
हो खफा मौत तो मरें कैसे।

बागबां ही अगर उन्हें मसले ,
फूल फिर आरज़ू करें कैसे।

ज़ख्म दे कर हमें वो भूल गये ,
ज़ख्म दिल के ये अब भरें कैसे।

हमको खुद पर ही जब यकीन नहीं ,
फिर यकीं गैर का करें कैसे।

हो के मजबूर ज़ुल्म सहते हैं ,
बेजुबां ज़िक्र भी करें कैसे।
 
भूल जायें तुम्हें कहो क्यों कर ,
खुद से खुद को जुदा करें कैसे।

रहनुमा ही जो हमको भटकाए ,
सूए- मंजिल कदम धरें कैसे। 

अभी कहने को बहुत बचा है समझने को रहा कुछ भी नहीं लगता है। कोई नहीं समझेगा समझ कर भी समझना दुश्वार है। अब कुछ लिखने की ज़रूरत नहीं शायद कुछ कविताएं और इक ग़ज़ल बहुत है कहानी को खत्म करने को अन्यथा कहानी उपन्यास की तरह बोझिल बन जाएगी। कविताएं पहले सुनाता हूं।


  कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से।


नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मैंने देखे हैं
कितने ही
नाटक जीवन में
महान लेखकों की
कहानियों पर
महान कलाकारों के
अभिनय के।

मगर नहीं देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक
जो खेला जाएगा
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने घर के आँगन में।

देखना आप सब
उसे ध्यान से
मुझे जीने नहीं दिया जिन्होंने कभी
जो मारते  रहे हैं बार बार मुझे
और मांगते रहे मेरे लिये
मौत की हैं  दुआएं।

कर रहे होंगे बहुत विलाप
नज़र आ रहे होंगे बेहद दुखी
वास्तव में मन ही मन
होंगे प्रसन्न।

कमाल का अभिनय
आएगा  तुम्हें नज़र
बन जाएगा  मेरा घर
एक नाट्यशाला।

लोग वसीयत करते हैं जायदाद दौलत की पैसे की। मेरे पास कुछ भी नहीं ऐसा बचा हुआ जो है किसी के काम का नहीं है। फिर भी इक चाहत है कि मेरे बाद कोई रोना धोना कोई शोक का तमाशा नहीं हो , मुमकिन हो तो मुझे अपना समझने बताने कहने वाले मेरी यही आरज़ू पूरी कर दें कि इक जश्न मनाया जाये ख़ुशी मनाई जाये जीने से मिला ही क्या है दर्द आहें तन्हाई आंसू नफरत का ज़हर पल पल पीना पड़ा है। अच्छा हुआ ख़त्म हुई कहानी जीते जी नहीं मानी बात मरने के बाद इतना तो कर सकते हैं। ग़ज़ल ये भी ऊपर की रचनाएं भी आज कल की नहीं सालों पहले से लिखी हुई हैं। दुनिया बदलती रही मेरी ज़िंदगी ठहरी रही नहीं बदला कुछ भी कभी। ग़ज़ल दिल से कही है।

ग़ज़ल  ( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।   
 

किसी से भी कोई गिला नहीं शिकवा शिकायत नहीं है। गुनहगार की तरह रहा आपकी दुनिया में मैं। जुर्म भी स्वीकार किये हैं सज़ाएं भी मांगी हैं। कोई माफ़ी कोई रहम की भीख नहीं चाही है। कहते हैं मरने के बाद भूल जाते हैं जाने वाले की खताएं मुमकिन हो तो भुला देना मुझे सभी। अलविदा कहने की ये ज़िंदगी कई बार फुर्सत ही नहीं देती है।

 

 

 






Friday, 14 June 2019

दान सम्मान और अपमान ( कथा सागर ) डॉ लोक सेतिया

    दान सम्मान और अपमान ( कथा सागर ) डॉ लोक सेतिया 

   आप इस को गंभीरता से पढ़ना क्योंकि इस एक कथा में सभी धर्मों की किताबों का सारांश है। जैसे किसी मिठाई में खोया मेवा मीठा खट्टा नमकीन मसालेदार और सेहत को फायदा देने की तमाम वस्तुओं को इक साथ मिलाते हैं और चटनी जैम के साथ लेकर बाद में चाय कॉफी शर्बत आदि का आनंद लेते हैं। दान की परिभाषा यही है चुपके से देते हैं बदले में कुछ पाने की चाहत नहीं रखते हैं जो आजकल कोई नहीं देता इसलिए दान का फल मिलता नहीं है। अपने दान दिया ही नहीं व्यौपार किया नाम शोहरत कुछ और पाने को वो मिल गया बहुत है बाप दादा के नाम दान देना पाने वाले पर निर्भर है कैसा असर है दुआ का। सम्मान की बात और है आदर दिल से करते हैं तभी आपका सम्मान बढ़ता है। घर पर पति-पत्नी को जली कटी सुनाने के बाद बाहर लोगों के सामने आदर पूर्वक संबोधित करना फलदायी नहीं होता है इसके साइड इफेक्ट्स गंभीर मिलते हैं। अहंकारी लोग जो खुद को सब से समझदार और जानकर समझते हैं उनको सच्चा आदर कभी नहीं मिलता है जैसे शासक नेताओं को लोग दिखावे को आदर देते हुए भी मन में बुरा भला कहते रहते हैं। दान सम्मान की इतनी कथा बहुत है समझने को मगर अपमान की कथा का विस्तार भी आकार भी बहुत फैला हुआ है आज का सतसंग इसी पर चर्चा को है। 

     जब भी कोई किसी को अपमानित करता है तो अपमानित व्यक्ति के भीतर उसकी बही में दर्ज होता जाता है। अपमान सहने वाला लाख माफ़ करने की बात करता रहे अपमान की मिली पूंजी वापस लौटानी पड़ती है और जितना विलंब होता है अपमान का विष और बढ़ता रहता है और इतना ज़हरीजा हो जाता है कि अपने अपमान करने वाले को जान से मारकर भी खत्म नहीं होता है दुश्मन को भी मारकर हिसाब बराबर कर लेते हैं मगर दोस्त बनकर अपना होकर नीचा दिखाने वाले की मौत पर ख़ुशी मनाकर भी मलाल रहता है अभी हिसाब रह गया है कोई अगला जन्म हुआ तो पूरा बराबर करना है। भगवान ने किसी को भी किसी को अकारण अपमानित करने का हक नहीं दिया है खुद भगवान पापी को पाप की सज़ा देता है तब भी उसको अपमानित नहीं करते हैं बल्कि समझाते हैं अपने क्यों किया जब जानते थे ऊपर सब हिसाब चुकता करना है। अपमान ऐसा क़र्ज़ है जिसका असल कम ब्याज ज़्यादा होता है पल पल अपमानित व्यक्ति को जितनी टीस महसूस हुई होती है अपमान की दौलत दोगुनी चौगुनी होती जाती है और आखिर में इक ढेर जमा हो जाता है। ऐसी इक कथा है जो सब जानते हैं फिर से सुनाता हूं। 

     इक राजा अपने घोड़ों के अस्तबल में खड़ा होता है कि तभी इक भिक्षुक साधु मांगने चला आता है। राजा को शासक होने का गुरुर होता है अभिमान होता है राज्य का मालिक हूं और सत्ता के मद में चूर अहंकार में अच्छे बुरे का भेद नहीं समझता है। अपने अस्तबल से घोड़ों की लीद उठाकर भिक्षा के कटोरे में दाल देता है। कुछ देर बाद राजा उस साधु की कुटिया पर माफ़ी मांगने को जाता है तो देखता है कि बाहर बहुत ऊंचा ढेर लगा हुआ है लीद का। साधु से सवाल करता है इतनी लीद कैसे जमा है तो साधु जवाब देता है अपने दान में जो मुट्ठी भर लीद दी थी बढ़ते बढ़ते इतनी हो गई कुछ ही पल में। राजा पूछता है इसका होगा क्या तो साधु बताता है आपको खानी होगी ये लीद अभी और बढ़ते बढ़ते पहाड़ जैसी हो जाएगी। राजा कहता है क्या कोई उपाय है तो साधु कहता है अगर लोग आपको अपमानित करेंगे तो आपके हिस्से की लीद उन सभी में बंट जाएगी और ये ढेर कम होता जाएगा। जब आपका पूरा राज्य आपको अपमानित करेगा तभी ये सारा ढेर खत्म हो सकता है। 

          राजा ने उपाय करने का निर्णय किया और अगले दिन अपने रथ पर नशे में चूर शारबी बनकर  इक बाज़ारी वैश्या को संग लेकर मस्ती करते हुए गली गली गांव गांव नगर नगर घूमता है। सब राज्य वासी उसको देख गाली देते हैं उसको अपमानित करने का काम करते हैं और बहुत बदनामी होती है। मगर राजा का इक मंत्री चुप रहता है राजा कहता है तुम क्यों खामोश हो तब मंत्री बताता है मुझे पता है ये सब लोग आपके हिस्से की लीद खा रहे हैं मगर जितनी अपने दी थी उतनी बची हुई है जो मुझे नहीं खानी है। दोस्तो ये काल्पनिक कथा हो सकती है मगर ये झूठ नहीं है ये अपमान का विष इक क़र्ज़ है जो चुकाना पड़ता है। ध्यान रखना।

Thursday, 13 June 2019

कूड़ेदान की कमी है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         कूड़ेदान की कमी है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   कूड़ा है हर तरफ है हर गली सड़क चौराहे गांव कस्बे शहर महानगर भरे पड़े हैं। कूड़ा न नज़र आये तो लगता है अपना देश ही नहीं है कहीं और चले आये हैं। हमारा कमाल है जिस जगह हमने बहुत सजावट रौशनी की होती है कोई सभा समारोह आयोजित करते हैं उसी जगह परदे के पीछे मंच के नीचे लाल बिछी कालीन के नीचे दबा हुआ कूड़ा रहता है। शानदार होटल की रसोई का स्टोर रूम लगता है बदबू का ठिकाना है। कुछ साल पहले मेरे इक लेखक ऑस्ट्रेलिया गए अपनी बेटी पास तो उनको कूड़ा नज़र नहीं आया तो कहा कहीं ऐसी सफाई मेरे देश में होने लगी तो बीस फीसदी लोग भूखे मर जाएं। मगर उनकी जानकारी में कुछ कमी थी इस देश में कूड़ा चुनने वाले और कूड़े का कारोबार करने वाले गली का कूड़ा बीनने वाले ही नहीं हैं।  हम अधिकांश लोग कूड़े को फेंकते नहीं सहेजते हैं। चुनाव में हम जितना कूड़ा मुमकिन हो चुनते हैं राजधानी भेज देते हैं कई ऐसी जगह हैं जहां कूड़ेदान हैं जहां से सरकार चलाई जाती है। ऐसे लोगों में भीतर गंदगी की सड़ांध छुपी होती है बाहर सुंदर लिबास रहता है ठीक जूतों के डिब्बों की तरह मगर जूता पांव में डालते हैं तो मैले होते गंदगी लगते देर नहीं लगती है। पांव की जूती को सर पे बिठाना कहावत सच होती देखनी है तो संसद विधानसभा जाकर देखना जिनको दरवाज़े से बाहर होना चाहिए उनको कुर्सियों पर सजाया हुआ होता है। भरत जी अपने राम की खड़ाऊं सिंहासन पर रख कर शासन क्या चलाया लोग हर जगह जूतों को ऊंचा आसन देकर उसकी आरती करने लगे हैं। बात जूतों की नहीं कूड़े कूड़ेदान और उस से होने वाली कमाई आमदनी शोहरत की की जा रही थी। 

        कूड़ा कहां नहीं है कूड़े को जमा करना उसको सजाना उसको छिपाना उसके होने नहीं होने की चर्चा करना अपने आप में बड़ा धंधा है मुनाफा ही मुनाफा है। स्वछता अभियान के बोर्ड और इश्तिहार दो दिल बाद खुद कूड़े में शामिल हो जाते हैं विज्ञापन लगवाने से कूड़ा उस जगह से जाता नहीं है कहीं। मेरे शहर का सबसे अच्छा पार्क पपीहा पार्क जिस के सामने नगरपरिषद के इश्तिहार लगे रहते हैं उसी के गेट के सामने शहर का सबसे अधिक कूड़ा सुबह से रात तक रहता है। नगरपिशद के सभापति का वार्ड है मगर दीपक तले अंधेरा है। मामला सीधा नहीं है कूड़ा भी कमाई का साधन है कूड़ा डालने का अधिकार यूं ही नहीं मिलता है। अब इस शहर का हर कबाड़ी मालामाल है चलो इक व्यंग्य कविता सुनते हैं। 

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है ,
अब तो ऐसा हाल है ,
मर गए लोग भूख से ,
सड़ा गोदामों में माल है।

बारिश के बस आंकड़े ,
सूखा हर इक ताल है,
लोकतंत्र की बन रही ,
नित नई मिसाल है।

भाषणों से पेट भरते ,
उम्मीद की बुझी मशाल है,
मंत्री के जो मन भाए ,
वो बकरा हलाल है।

कालिख उनके चेहरे की ,
कहलाती गुलाल है,
जनता की धोती छोटी है ,
बड़ा सरकारी रुमाल है।

झूठ सिंहासन पर बैठा ,
सच खड़ा फटेहाल है,
जो न हल होगा कभी ,
गरीबी ऐसा सवाल है।

घोटालों का देश है ,
मत कहो कंगाल है,
सब जहां बेदर्द हैं ,
बस वही अस्पताल है।

कल जहां था पर्वत ,
आज इक पाताल है,
देश में हर कबाड़ी ,
हो चुका मालामाल है।

बबूल बो कर खाते आम ,
हो  रहा कमाल है,
शीशे के घर वाला ,
रहा पत्थर उछाल है।

चोर काम कर रहे ,
पुलिस की हड़ताल है,
हास्य व्यंग्य हो गया ,
दर्द से बेहाल है।

जीने का तो कभी ,
मरने का सवाल है।
ढूंढता जवाब अपने ,
खो गया सवाल है।

      बहुत देश अपने देश का कूड़ा हमारे देश को बेचते हैं और हम उनका कूड़ा चाव से खरीदते हैं ऊंचे दाम देकर। कूड़ा बड़े काम की चीज़ है कूड़ेदान से किसी को कब क्या मिल जाए कोई नहीं जानता है। ये देश नारी की पूजा करने की बात करता है मगर इसी देश में बच्ची को मारकर कूड़ेदान में फेंक देते हैं। कूड़ेदान से कभी कीमती सामान भी मिल जाता है क्योंकि चोर भागते हुए चोरी का माल कूड़ेदान में डाल जाते हैं वापस आकर उठाने को मगर जब नहीं आ सकते तो कूड़े उठाने वाले को लगता है आज अख़बार टीवी वाले की भविष्यवाणी सच साबित हो गई है। चोरी का माल थाने नहीं पहुंचता इसका दुःख चोर को कम थानेदार को अधिक होता है। सीधा आकर जमा करवाता तो थानेदार की भी तरक्की की राह खुलती ही। चल भाग जा कह कर थानेदार जिसकी चोरी हुई उसको खुश कर लेता बड़े अधिकारी भी खुश हो जाते और खुद भी खुश होता घर बैठे सब अपने आप होने से। कूड़ा चुनना हमारी मज़बूरी है या ज़रूरत इस पर शोध की ज़रूरत है। सब कूड़े जैसे हैं किसी को भी चुनेंगे हाल बदलने वाला नहीं है या फिर हम सोचते हैं बंदा कूड़े से खराब है मगर अपने काम का है कभी ज़रूरत पड़ेगी यही सोचकर चुनते रहते हैं मगर कूड़ा कभी काम नहीं आता है बल्कि कूड़े को छूने से अपने हाथ गंदे होते हैं। मुश्किल है कोई साबुन भी ऐसे कूड़े जैसे लोगों से मिले कीटाणु को खत्म नहीं कर सकते हैं। ये कीटाणु बढ़ते जा रहे हैं कूड़ा भी बढ़ता जा रहा है लेकिन अभी कूड़ेदान कम हैं और कब से कूड़ेदान में आरक्षण की मांग होती रही है। कूड़ा विदेश से मंगवा सकते हैं कूड़ेदान खुद बनाने पड़ते हैं। कहीं कोई कूड़े का पहाड़ लगा देख कर उसकी तस्वीर को सुंदर दृश्य की तरह सोशल मीडिया पर भेजता है। सच्ची बात यही है जितना कूड़ा फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप्प पर है दुनिया में कहीं नहीं है। हम कूड़ा परोसते हैं और उन्हीं हाथों से खाना पीना स्मार्ट फोन को पकड़े चलता रहता है। बाकी आप समझदार हैं अपने घर की सफाई के साथ ये भी साफ़ रखना सीख लेंगे शायद। अपने घर का या दिमाग का कूड़ा किसी और के घर के सामने नहीं डालना। अपने मन का मेल धोना ज़रूरी है क्योंकि कहता हैं " मन चंगा तो कठौती में गंगा "। अर्थ मुझे भी उतना ही समझ आता है जितना आपने समझा है। कूड़े का धंधा कहीं आपको कूड़ा नहीं बना दे और किसी दिन कोई कूड़ेदान आपकी शोभा बढ़ा रहा हो।



Wednesday, 12 June 2019

खुद से कहनी है सुननी खुद है ( ज़िंदगी की दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

 खुद से कहनी है सुननी खुद है ( ज़िंदगी की दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

    अब इंतज़ार को ज़िंदगी समय कब तलक देगी और कितनी उम्र राह तकनी है कि कोई मिलेगा मुझे मेरी दास्तां सुनेगा अपनी सुनाएगा। अनकही छोड़ जाएंगे अपनी कहानी तो रूह को मर कर भी चैन नहीं मिलेगा। आज यही सोचकर खुद से खुद की कहानी कहने लगे हैं। था तो इक मेला साथ मेरे फिर भी साथी कोई नहीं था कोई मुझसे आगे चलता रहा कोई रास्ता बदल साथ छोड़ गया कोई किसी मोड़ से बिछुड़ गया। चल रहा हूं सामने कुछ दूर धुंधली सी तस्वीर दिखाई देती है शायद उन्हीं लोगों की है जो कारवां में साथ चले थे पर आगे निकल गए मुझे पीछे छोड़ कर , वापस मुड़ कर देखता हूं तो इक धूल का गुबार है जो बाकी रह गया है। याद आती है बात कितने लोग कहते थे अकेले अकेले क्यों हैं हम भी साथ साथ हैं मगर साथ पल दो पल का रहा फिर किसको थी फुर्सत साथी बनकर साथ निभाने की। हर कोई चाहता था अपनी किसी मंज़िल को पहुंचना समय रहते शाम ढलने से पहले। आप तो बहुत धीमी रफ़्तार से धीरे धीरे चलते हो बात भी करते हो तो कहने से पहले सोचने लगते हो तभी कह नहीं पाते अपने दिल की बात। अपने आप से बातें करना लोग इसको पागलपन समझते हैं , कोई नहीं सुनेगा सभी को अपनी अपनी कहनी है ऐसे में लिखनी खुद ही पढ़नी दिल बहल जाता है।

                लोग राज़ की बात भी बता देते हैं किसी न किसी को अपनी तो ज़िंदगी खुली किताब जैसी है फिर भी किसी को बता नहीं सके भला किसको फुर्सत है कौन सुनेगा समझेगा। हर कोई अपनी लघुकथा को विस्तार देकर कहानी मुकम्मल करना चाहता है। मेरी कहानी तो दो हर्फों की है मगर आवाज़ मिले तो उपन्यास से भी लंबी होती जाती है। जाने क्या बात है हर कोई मुझे मिलता रहा है खरीदार बनकर मैं तो बिकने को तैयार ही नहीं था मगर जब जिस ने चाहा मुझे अपनाना मैंने बदले में कीमत यही चाही थोड़ा सा प्यार अपनापन और भरोसा मिल जाए तो बेदाम बिकने को राज़ी था। किसी के पास प्यार की मुहब्बत की अपनेपन की दौलत नहीं थी शायद सभी को ज़रूरत थी पाने की देने को कोई नहीं तैयार हुआ। टुकड़े टुकड़े मिला सभी कुछ जी भर कर कभी प्यास बुझी नहीं दिल की।

        दुनिया भर से दोस्ती की तो समझ आया फिर इक ज़ख्म सीने पे खाने को मिला है। जी पहली ग़ज़ल थी हम अपनी दास्तां किस को सुनाएं दूसरी थी नया दोस्त कोई बनाने चले हो। दर्द आंसू पिरोकर बनती है ग़ज़ल और तीसरी ग़ज़ल कही , हमको तो कभी अपने काबिल नहीं समझा। जाने काबलियत का क्या अर्थ है कोई पैमाना कभी नहीं पता चला आपकी सफलता कुछ है किसी और की चाहत कुछ और बन जाने की है। कई बार खुद को झूठे सपनों से बहलाया है ख्वाब की दुनिया बनाई है उस में रह कर सुकून पाया है , हंसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है कोई हमदर्द नहीं दर्द मेरा साया है , ऐसे गीतों ने मुझे समझाया है। फिर कोई भूला हुआ नग्मा याद आया है। मेरा दिल है प्यार का आशियां यहां जी तो लूंगा करार से मेरे आगे नामे चमन न लो मैं डरा हुआ हूं बहार से। मेरी ज़िंदगी है अजीब सी मुझे ग़म मिला न ख़ुशी मिली , कभी हंस दिया कभी रो दिया मैं लिपट के दामने यार से। बीडी तेरे बगैर मेरी कहानी अधूरी रह जाती है तुम मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं भी हो और हिस्सा हो भी कुछ ऐसे शामिल हुए जैसे रूह में समा गया कोई चुपके से। टॉवर हॉउस की ग़ज़ल बड़ा चैन देती है आज भी। ए मेरे दिले नादां तू ग़म से न घबराना इक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफसाना। सोचता हूं क्या तेरा अफसाना किसी को समझ आया कभी। मैंने तो ये चाहा ही नहीं कि दुनिया मेरी कहानी समझे भी फ़साना बनकर नहीं रहना चाहता मैं सबकी तरह से।

      मुझमें मुहब्बत प्यार के सिवा कुछ भी नहीं है मगर इस दुनिया में इसकी कोई कदर नहीं कीमत नहीं मोल नहीं है। बस सबकी तरह खुद से प्यार करना नहीं आया बहुत कोशिश की दिल चाहता है उसी तलाश की बात पर रहना कभी न कभी कोई न कोई मिलेगा जिसकी मुझे तलाश है तुम तो किसी और जहां में शायद अपने हंस परदेसी को मिल गए होंगे। ये किसी और दुनिया की बात है भला इस दुनिया वाले समझेंगे कभी अपनी बात को। और क्या कहूं बहुत कुछ लिख रखा है कहानी ग़ज़ल व्यंग्य कविता जाने कितना कुछ मगर अभी भी नहीं मिला तो वही जिसको अपनी ये विरासत सौंप कर दुनिया से अलविदा होना चाहता हूं। अपनी इक ग़ज़ल से बात को विराम देता हूं बात खत्म कभी नहीं होने वाली जानता हूं।

 

ग़ज़ल  ( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,

बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,

जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,

कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,

मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,

ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,

इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।    

 

Tuesday, 11 June 2019

सिलसिला हादिसा हो गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   सिलसिला हादिसा हो गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

विषय कई सारे हैं मगर सभी मझधार हैं और हम समझते किनारे हैं। शुरुआत इक बहुत पुरानी अपनी ग़ज़ल से करता हूं। इसी बहाने इधर उधर की इंट रोड़ा ले आता हूं इक इमारत बनानी है बिना नींव की मगर। जी हां लोग यही करामात करते हैं। ग़ज़ल पेश है।

  सिलसिला हादिसा हो गया - लोक सेतिया "तनहा"

सिलसिला हादिसा हो गया ,
झूठ सच से बड़ा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से ,
कद में कितना बड़ा हो गया।

कश्तियां डूबने लग गई ,
नाखुदाओ ये क्या हो गया।

सच था पूछा ,बताया उसे ,
किसलिये फिर खफ़ा हो गया।

साथ रहने की खा कर कसम ,
यार फिर से जुदा हो गया।

राज़ खुलने लगे जब कई ,
ज़ख्म फिर इक नया हो गया।

हाल अपना   , बतायें किसे ,
जो हुआ , बस हुआ , हो गया।

देख हैरान "तनहा" हुआ ,
एक पत्थर खुदा हो गया।

    कल पूछा था या सवाल किया था मुझे झूठ बोलने को कोचिंग देना शुरू करना है जिस किसी को सीखना हो बता सकता है। दो लोग तुरंत तैयार भी हो गए मगर इक लेखक दोस्त ने संदेश भेजा जनाब आपके बस का ये धंधा नहीं है कहां आप सच की बात कहने वाले और कहां झूठ में परांगत होने को बेताब लोग। उनको जवाब देना पड़ा अध्यापक रख कर लोग स्कूल चलाते हैं खुद जो नहीं पढ़ा सबको पढ़ाते हैं। चलो विषय पर वापस आते हैं आपको दिलकश कहानियां सुनाते हैं दिल बहलाते हैं।

      दिल बहलाना हर कारोबार में पहली शर्त है और ज़रूरी है। कुछ साल तक जिसको मानते थे कि ये तो जनकल्याण को सिखाते हैं भला इस से आमदनी की बात भी कैसे सोच सकते हैं। मगर योग को व्यायाम करने को करोड़ों का मुनाफे वाला धंधा बना दिया सब हैरान हैं। हींग लगे न फटकरी और रंग भी चौखा ये कहावत सच होती देख ली सबने। योग सिखला रहे थे आज अभी पार्क में दो लोग , इक महिला इक पुरुष बाकायदा लाऊडस्पीकर से समझा रहे थे चलते चलते हमने भी सुन लिया। जानना चाहोगे क्या कह रही थी महिला। आंखें बंद ध्यान अपने भीतर बाहरी शोर को नहीं सुनना है और ऊपर वाले से प्रार्थना करनी है मुझे निरोग रखना। भजन गाने लगी तालियां बजने लगी और योग को आस्था विश्वास के साथ मनोरंजन का मसाला डालकर दिल को बहलाने का सामान कर दिया। हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन , दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है। धर्म की सभा में जाओ तो नाचना झूमना गाना दिल लगाना सब की छूट है। रविवार को सतसंग के बहाने मिला करते हैं आशिक़ भी , घर वाले नहीं पूछते बेटी किस किस के साथ जाती है। सबको समझ आया जब खुद बाबाजी के किस्से आम हुए , हीर रांझा मुफ्त में बदनाम हुए। शिक्षा धर्म स्वास्थ्य सेवा से लेकर समाज सेवा की संस्था खोलने तक सब में खूब कमाई के अवसर हैं। आपको कोई नौकरी रोज़गार तलाश करने की ज़रूरत नहीं है बस ये हुनर सीखना होगा।

     इक जान पहचान का खड़ा मिला मुझे पार्क में बस बिना वजह ही पूछ बैठा सब उस दल को छोड़ भाग रहे हैं आपका क्या स्टेटस है वहीं है या कहीं और जा पहुंचे हैं। हम कहीं नहीं है बस थक गए हैं मगर चेहरे पर ताज़गी साफ छलक रही थी तो समझ आया अभी मझधार में हैं कोई किनारा नज़र आएगा तो बात बनेगी। बिना पूछे बताने लगे जैसे हमारे गांव का इक बदमाश हुआ करता था जो अपने खेत में काम करवाता था मगर कोई मज़दूरी नहीं देता था रोटी खाओ और दिन रात महनत करो। इक दिल उसको कस्सी से घाव लगा जो बढ़ते बढ़ते नासूर बन गया और उनको अपाहिज बनकर जीना पड़ा। खेती उनके बेटे ने संभाली तो पिता लात घूंसे मरता था मज़दूरी मांगने पर बेटा चार कदम आगे निकला लाठी डंडे से पिटाई करने लगा। आज उनको आध्यात्मिक ज्ञान मिला था ये बता रहे थे अंजाम क्या हुआ इक दिन बिजली की गिरी तार को फोन पर बात करते करते छू लिया और जान चली गई। अपने दल के नेताओं को लेकर बताया यही किया करते हैं और जैसा उनका कहना है इक दिन दल के बड़े नेता को बद्दुआ मिलती है ऐसा कहा भी था। जाने कैसे हौंसला किया होगा और फिर भी सही सलामत उन्हीं के दल के निष्ठावान कार्यकर्ता बनकर रहे।

    बात मुंह से निकली तो पराई हो जाती है , कह कर संभले और बोले हम तो उनके दादा जी के नाम के चाहने वाले हैं तभी उनके साथ रहे मगर बाप दादा को बदनाम किया है उन्होंने नाम मिट्टी में मिला दिया है। यूं ही दिल में इक ख्याल आया तो उनसे कह दिया , ये आप लोग जो दल बदलते हैं उसका तरीका क्या है। कहने लगे अभी तक उन्होंने दल बदला नहीं है मगर बहुत लोग हैं जो कभी किसी कभी किसी दल में शामिल होते रहते हैं। अपने शहर से ही कोई भी नेता ऐसा नहीं जिसने दल बदला नहीं हो। किसी किसी को दूसरे से ये भी शिकायत रहती है कि जिस दल में जाता हूं आप भी चले आते हैं वहां ही। जाने दल बदलने का कुछ अलग मज़ा होता होगा मैंने विचार किया। क्या मुझे भी दल बदल करने का लुत्फ़ मिल सकता है सवाल किया उनसे। लगा उनको हंसी ठट्ठा कर रहा हूं मगर मेरे चेहरे पर भाव मासूमियत वाले उनको नज़र आये। भोले हैं आप भी जब किसी दल के सदस्य तक नहीं नेता होने की बात नहीं फिर दलबदल कहां से मुमकिन है। मैंने कहा आजकल सुनते हैं सब मुमकिन है। भाई हमें राजनीति से कोई मतलब नहीं है अपने मतलब की बात नहीं है , नॉट माय कप ऑफ़ टी। सोचा लोग घर बदलते हैं सामान साथ ले जाते हैं गांव बदलते हैं नौकरी बदलते हैं तो कितना जंजाल साथ लिए फिरते हैं , जो दल बदलते हैं उस दल से दूसरे दल साथ लेकर जाते क्या हैं। उन्होंने राज़ खोल दिया कहने को यही कहते हैं हमारे साथ वोट हैं जनता है मगर वास्तव में होता नहीं कुछ भी पल्ले में ऐसे ही पल्लू में गांठ लगाई होती है कोई पोटली नहीं होती है। सुदामा की तरह चावल भी नहीं साथ बंधे होते उनके पास। सोचो अगर कुछ वोट जनता का साथ होता तो भटकते फिरते इधर उधर असल में खोखली ढोल की पोल की शोर मचाने जैसी बात है। दलबदल का सिलसिला चलता रहता है और ऐसा भी होता है कि घूम फिर वापस गधी  बोहड़ के पास अर्थात लौट के बुद्धू घर को आये। 
 

तब की बात है ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

           तब की बात है ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

         कब की बात है अब की नहीं तब की बात है। जब हम नहीं थे जब तुम नहीं थे ग़ज़ब की बात है। पिछले पांच साल से इतिहास की तलाशी लेने खंगालने और उसको बदल कर परिभाषित करने का चलन देख कर लगता है भविष्य को करने की नहीं वर्तमान को संवरने की नहीं बीते कल कहानी सुनने सुनाने पर ध्यान अटका हुआ है। मुझे याद है इक अख़बार के संपादक हर दिन अपने संपादकीय लेख में घुमा फिरा कर बात उसी वक़्त पर ले आते थे , जब मैं वज़ीर था। मालूम नहीं किस सरकार में उनकी वज़ारत कितने समय तक रही लेकिन शायद उनको किसी हसीन ख्वाब की तरह उसी में जीना आनंद देता था। बहुत लोग अपने पूर्वजों की कहानियां उनकी सफलता के किस्से उनकी शोहरत की  बातें सभी को सुनाते बताया करते हैं जब उनका आज का वर्तमान खुद उनको कमतर लगता है। सरकार या कोई दल राजनीति में अपने मकसद के लिए विपक्षी दल की सालों पुरानी बातों को दोहरा कर फायदा उठाने का काम करें तो अलग बात है लेकिन हम सभी किसलिए आज की बात इस दल की सरकार की काम की बात को छोड़ उनकी बातें करें जो कितने सालों पहले दुनिया से ही चले गए हैं। चलो ज़रा अलग ढंग से चर्चा करते हैं।

     सोचो क्या इस तरह से सोचने से जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। कोई इसी बात पर विलाप करता रहे कि काश बाहरवीं में उस साल फेल नहीं होता तो तब कोई और ही बन गया होता। उस शहर को छोड़ता नहीं तो आज जाने कहां पहुंच गया होता। नौकरी नहीं करता तो कारोबार कर खूब कमाई कर सकता था अथवा नौकरी मिल जाती तो आज सेवानिवृत होकर चैन से पेंशन लेकर मज़े से रहता। ये सब सोच कर अपनी गलतियों या गलत साबित हुए फैसलों की विवेचना कर सबक नहीं लेते बस उसका विलाप करते हैं किसी और को अपने वर्तमान का दोषी ठहराते हैं। जो हैं होकर खुश नहीं जो नहीं बने सोचते हैं काश होते इसको मानसिक असहजता कहते हैं कि जब जो करना था नहीं किया और जो किया बाद में सोचना ये करना नहीं था। मगर जो पिछले समय के इतिहास और घटनाओं से अच्छी तरह वाकिफ़ नहीं बस सुनी सुनाई बातों से कुछ भी मान लेते हैं और यकीन से घोषणा करते हैं तब अमुक नेता को अमुक पद मिलना चाहिए था। कोई उनसे सवाल करे आज जिसको आप समझते हैं केवल उसी को किसी पद पर होना चाहिए मुमकिन है पचास साल बाद आपकी ही तरह कुछ लोग इसकी चर्चा करें कि किसी और को पद मिलता तो देश का अच्छा होता। मगर क्या कोई पिछले घटे हुए घटनाकर्म को बदल सकता है। ये आज के लोग आप हम या जिनको अधिकार है उनका निर्णय है जिस को चाहा पद पर बिठाया है।

    कुछ साल पहले महिलाएं यही सोचती थी कि काश वो औरत नहीं पुरुष होती तो अपने पति भाई या पिता से बेहतर कर सकती थी। ये आसान रास्ता था मगर आजकल महिलाएं लड़कियां जो चाहती हैं हौंसले से कर गुज़रती हैं बाद में पछताती नहीं हैं। घर से कोई पढ़ लिख जाता है तो कोई पढ़ाई लिखाई को बेकार समझता है कुछ और कारोबार करता है और पढ़ लिख कर भविष्य बनाने वाले से अधिक आमदनी करने लगता है। कभी जिसको लगता था मेरा पति अनपढ़ है अमीर बन जाने पर शिक्षित की पत्नी को तंज करती है देखो मेरे वो आपके वाले से बढ़कर हैं। पैसा पास होना इक मापदंड बन गया है जबकि बज़ुर्ग समझाते थे ज्ञान का धन कोई चुरा नहीं सकता है धन दौलत कभी कम कभी अधिक हो सकते हैं कारोबार आमदनी भी कभी आकाश से पाताल को पहुंच सकती हैं मगर शिक्षा आपके पास हमेशा सुरक्षित रहती है। जाने क्यों लोग अपने रिश्तों को इस तरह मापते तोलते हैं बड़ा ओहदा छोटा पद या धन दौलत की कमी अधिकता की बात से। हीनभावना का शिकार हो जाते है या अहंकार करने लगते हैं , कोई आपसे किस तरह से निभाता है कितना अच्छा है या खराब है इसको नहीं देखते बस रईस से करीब होकर खुश होते हैं जो वास्तविक ख़ुशी नहीं होती है।

    कहते हैं कि जो खानदानी रईस होते हैं उनका सलीका उनका ढंग शिष्टाचार वाला होता है। उनको अपनी अमीरी का दिखावा करना नहीं पसंद होता और न ही अमीरी जाने से उनका तौर तरीका बदलता है। जो किसी को अपनी अमीरी का दिखावा करने को कहते हैं भाई हम तो इस हाल में कभी नहीं रह सकते जाने कैसे लोग बिना बड़ी कार और सुख सुविधा रह लेते हैं। कहने को बेशक किसी को शुभचिंतक बनकर कहते हैं मगर क्या ऐसे लोग किसी अपने की पैसे की कमी देख कर हाथ बढ़ाते हैं , नहीं हर्गिज़ नहीं बल्कि तब अगर लगे किसी की विवशता में सहायता देनी पड़ेगी तो करीब ही नहीं आते हैं। साफ बात ये है कि आपको ज़रूरत है बताने पर जो आपको उधार नहीं देते जब लगता है आपके पास बहुत है तो खुद कहते हैं जब मर्ज़ी बताना आपके लिए सब हाज़िर है। अच्छा बुरा वक़्त जीवन में आता है आपको सबक सिखाता है। कब की बात है जब की बात है तब की बात है को छोड़ जान लेना चाहिए वक़्त वक़्त की बात है।

Monday, 10 June 2019

कितनी लाशों पे अभी तक ( आखिर कब तलक ) डॉ लोक सेतिया

  कितनी लाशों पे अभी तक ( आखिर कब तलक ) डॉ लोक सेतिया 

    जाँनिसार अख्तर जी के शेर से बात शुरू करते हैं। " इन्कलाबों की घड़ी है , हर नहीं हां से बड़ी है। कितनी लाशों पे अभी तक , एक चादर सी पड़ी है। " सिर्फ इक कठुआ की घटना नहीं सिर्फ इक नन्हीं ढ़ाई साल की बच्ची से वहशीपन की बात नहीं चिंता की नहीं विचलित करने की बात है हर दिन कोई न कोई कहीं न कहीं घटना घटने पर समाज दंग रह जाता है जानकर कि पुलिस सरकारी अस्पताल से लेकर व्यवस्था का हर भाग इस कदर संवेदनहीनता का शिकार हो गया है कि चंद रुपयों की खातिर अपना ईमान बेचकर गुनहगार को पकड़ने की बात छोड़ उसको बचाने ही नहीं लगता बल्कि गुनहगार के साथ खुद गुनाह में शामिल भी हो जाता है। ये सब देख कर पल भर को हम सन्न रह जाते हैं लेकिन अगले ही पल किसी और घटना की बात करने लगते हैं। ये अधिक चिंता की बात है जो हमने हालात को स्वीकार कर लिया है हमारी सोच में शामिल है कि जो है उसको बदलना संभव ही नहीं है। हम अगर कभी अन्याय का विरोध करने को कदम बढ़ाते भी हैं तो बहुत थोड़ी राह चलकर तक जाते हैं अपनी लड़ाई को बीच में छोड़ हार मान लेते हैं आखिरी अंजाम तक ले जाने का हौंसला नहीं रखते। मगर ज़ुल्म के अन्याय के खिलाफ जंग कभी इतनी आसान नहीं हो सकती है। काली पट्टी लगाना या मशाल लेकर जुलूस निकालना मोमबत्तियां जलाना शायद अब असरकारी रहा नहीं है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से शेर हैं। 

       आज सड़कों पे चले आओ तो दिल बहलेगा , चंद ग़ज़लों से तन्हाई नहीं जाने वाली। देख दहलीज से काई नहीं जाने वाली , ये खतरनाक सच्चाई नहीं जाने वाली। चीख निकली तो है होंठों से मगर मद्धम है , बंद कमरों को सुनाई नहीं जाने वाली। एक तालाब से भर जाती है हर बारिश में , मैं समझता हूं ये खाई नहीं जाने वाली। कितना अच्छा है कि सांसों की हवा लगती है , आग अब उनसे बुझाई नहीं जाने वाली। तू परेशान बहुत है तू परेशान न हो , इन खुदाओं की खुदाई नहीं जाने वाली। 

 ज़ालिम की ताकत बन जाती है ज़ुल्म सहने वालों की सहनशीलता ख़ामोशी डर कायरता। घुट घुट कर जीने से कहीं अच्छा है मकसद की लड़ाई लड़ते लड़ते शहीद हो जाना। कोई मसीहा धरती पर कभी नहीं आएगा हमको बचाने को। अपनी जंग है खुद को लड़नी पड़ती है , ये जो भी लोग आपको सपने बेचते हैं उन से उम्मीद रखना फज़ूल है उनको राजनीति की धर्म की या किसी कारोबार की दुकान चलानी है खुद अपने लिए किसी और के लिए नहीं। स्वर्ग जाने का ख्वाब देखना छोड़ इसी अपनी दुनिया को नर्क जैसी भयानक को बदलकर स्वर्ग जन्नत जैसी बनाने को कोशिश करेंगे तो सब मुमकिन है। नामुमकिन है बिना किसी जतन किये कुछ भी हासिल करना। कोई और दुनिया है नहीं है ये जब सामने होगा देख लेंगे अभी जो दुनिया है जिस में रहते हैं रहना होगा अंतिम सांस तक उसको सांस लेने के काबिल तो बनाया जाए। संक्षेप में दुष्यंत कुमार की सबसे सार्थक ग़ज़ल सुनते हैं समझते हैं। 

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए , 

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। 

आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी ,

शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। 

हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गांव में ,

हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। 

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। 

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही ,

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।

 


 

Sunday, 9 June 2019

बेमतलब की बात ( पढ़ना मना है ) डॉ लोक सेतिया

       बेमतलब की बात ( पढ़ना मना है ) डॉ लोक सेतिया 

   पहले ही सचेत कर दिया था फिर भी नहीं माने आप तो कोई बात नहीं मगर ये बात किसी से कहना नहीं। बीवी भी सरकार की तरह होती है उसकी मर्ज़ी आपकी मर्ज़ी है। खुद खिलाए तो चुपचाप खाना ज़रूरी है आपको मांगना नहीं चाहिए बिना इजाज़त कुछ भी खाओगे तो कब क्या नतीजा होगा कोई नहीं जानता है। इनका साथ भी ज़रूरी है इनसे थोड़ा बचकर भी रहना अच्छा है। इनका मिजाज़ बदलते बरसते बादल बिजली गरजने की तरह डराते चौंकाते हैं। शीतल पवन कब गर्म तपती लू बन जाए कोई नहीं जान पाता है। घर भी आपका है देश भी अपना ही है मगर नियम कानून आपके नहीं उनके लागू हैं और जब उनकी ज़रूरत बदल भी सकते हैं। 

    
      सरकार भी आप ने ही बनाई है बीवी को भी खुद आप लाए थे गुनहगार खुद आप ही हैं। अच्छी सरकार और अच्छी बीवी हक़ीक़त में किसी ने देखी है सवाल का जवाब जानते सभी हैं। हर कोई समझता है किसी बाहरी देश की सरकार अच्छी है। ऐसा उन्होंने जाकर नहीं देखा , सुनी सुनाई बात है अफ़वाह की तरह से उस देश के लोग अपनी उसी  सरकार से परेशान हैं शायद आपसे अधिक भी । कुछ कुछ ऐसा बीवी को लेकर लगता है अपनी बीवी से अच्छी है पड़ोसन जो पति का कितना ख्याल रखती है और यही पड़ोसन का पति भी समझता है। घर की नहीं पड़ोसन की बनी कढ़ी खाकर तारीफ करते हैं स्वाद बदलना इतना भी बुरा नहीं होता है। समस्या तब बढ़ जाती है जब उसी पड़ोसन की नई साड़ी देख कर बीवी आपसे फरमाईश करती है उस से महंगी दिलवाने को साथ ये भी बताती है कि पड़ोसी भाई साहब अपनी पत्नी को कितने उपहार देते हैं। आपको समझ आता है हम सस्ते में छूट जाते हैं अर्थात जिसको समझते थे अच्छी है वो आपकी आर्थिक क्षमता से बाहर की बात है।

   पिछली बार पहली सरकार से तंग आकर नई सरकार बनाई थी ये सपना देखा था उस से बेहतर साबित होगी मगर हुआ उल्टा और भी खराब अनुभव मिला। इस बार लगा अब जैसी भी है यही ठीक है नहीं बदलते कहीं इस से भी बदतर मिली तो जीना हराम है मरना भी दुश्वार हो सकता है। बीवी को लेकर भी जैसी भी है यही अच्छी है अधिकांश लोग मानने को मज़बूर हो ही जाते हैं। कहते हैं मुसीबत कभी बताकर नहीं आती है मुसीबत से घबराना नहीं चाहिए उनका सामना करना सीखना चाहिए। इसको आजकल अक्लमंदी कहा जाता है गंगा जाओ गंगा राम जमुना जाकर जमुनादास होने की कला सीख लो फिर आपको देश समाज कुछ नहीं बना सकता है। काबिल होना नहीं काबिल समझा जाना बड़ी बात है , आपको पता है अच्छा बनने का मतलब क्या है कैसे बनते हैं मगर आपको समझना है विचार करना है अच्छा सच्चा बनकर रहना कितना कठिन है और ऐसा होने का दिखावा करना कितना सहज है। भरोसा शब्द अपनी ज़िंदगी से बाहर कर दो हमेशा को ही बस फिर कोई दर्द कोई दुःख परेशानी नहीं होगी। भरोसे का ज़माना ही नहीं रहा भरोसा करोगे तो धोखा खाओगे। भरोसा कोई आप पर नहीं करता है बस आपको समझने नहीं देते लोग कि आपको बताते हैं अच्छा मानते नहीं हैं सोचते हैं ये इतना भी भला मानुष नहीं हो सकता। बिना मतलब हमारी भलाई करता है तो ज़रूर कोई मकसद छुपा हुआ होगा। शक करने की आदत आपको हादसों से बचाकर रखती है यहां सब लोग हादसा होने की छाया में रहते हैं।

     धर्म की राह पे चलने का चलन नहीं अब दुनिया में , वचन निभाने को कोई जान नहीं देता कसम खाते हैं तोड़ने को ही निभाने को नहीं। झूठ से नफरत कोई नहीं करता है जब मालूम है सब झूठ है तो झूठ से बचकर जाओगे कहां और कोई दुनिया जाने है कि नहीं मगर ये सही है ये दुनिया झूठ है इक सपना है जाने कब नींद खुली और दिखाई कुछ भी नहीं देगा। जो भी अच्छा नहीं उसको लेकर चिंता मत करो और अच्छा बनकर नहीं रहो खराब बनकर जो चाहे करो बस अच्छे होने का मुखौटा लगाए रखो ताकि सबको आप अच्छे समझदार और शरीफ लगते रहो। ये दोगलापन नहीं है अभिनय है ज़िंदगी की वास्तविकता को झेलने से मिलता क्या है अभिनय करने वाले करोड़पति बन करोड़पति का खेल रचाते हैं। अब लोग खलनायकी के दीवाने हैं ऐसी ऐसी बातों को देखकर तालियां बजाते हैं क़त्ल करने वाले को मसीहा घोषित कर कत्ल का सामान खरीद लाते हैं। नायक होना कोई नहीं चाहता खलनायक बनने को हौसला बढ़ाते हैं। सब जानते है ये बात कितनी सच है कितनी दिखावा फिर भी सारे जहां से अच्छा गीत गाते हैं और देश की ऐसी तैसी करने के बाद भी देशभक्त कहलाते हैं। देश को हर दिन रसातल में धकेलते जाते हैं। खाते हैं पीते हैं मौज मनाते हैं आपको जाने कितनी कहानियां सुनाते हैं हक़ीक़त से सभी नज़रें चुराते हैं। सरकार हो समाज हो कारोबार हो राजनीति हो शिक्षा स्वास्थ्य या कोई भी अन्य वर्ग हो जो होता नहीं वही आपको दिखलाते हैं उल्लू बनते हैं उल्लू बनाते हैं। बेमतलब की बात से सबको उलझाते हैं , आप इस पर चिंतन करो भाई हम तो अपनी गली जाते हैं। नहीं नहीं जाना है अभी बस कुछ देर को फिर लौट कर वापस आते हैं।

Saturday, 8 June 2019

ये कहां आ गए हम ( काल्पनिक कथा ) डॉ लोक सेतिया

     ये कहां आ गए हम ( काल्पनिक कथा ) डॉ लोक सेतिया 



   ये तो अदालत है मगर खामोश सी है कोई बहस नहीं सुनवाई नहीं। अपनी किताब देखी और आदेश जारी कर दिया। सच में इंसाफ होता है सब साफ होता है। ऊपर वाले की अदालत अनोखी है वकील नहीं दलील की ज़रूरत ही नहीं। फैसला भी आखिरी है कोई चुनौती भी नहीं दी जा सकती है। स्वर्ग नर्क या कुछ और जन्म निर्णय सुना रहे हैं। अपनी भी बारी आनी थी थोड़ा सा इंतज़ार करना कठिन नहीं था बल्कि देख कर दिल को सुकून सा मिल रहा था। मुझे ही नहीं शायद किसी को भी कोई चिंता कोई घबराहट कोई डर नहीं महसूस हो रहा था। मेरा हिसाब पढ़कर बताया जा रहा जो मुझ को ही सुनाई दे रहा था मुझसे पहले किस को क्या कहा गया मुझे नहीं सुनाई दे रहा था। पढ़ने वाले ने बताया ये भी उसी तरह का बंदा है जिसको ऊपर वाले से कोई लगाव भक्ति भाव का नहीं था किसी दोस्त से नाते रिश्ते से मोह का धागा इतना अटूट नहीं था कि उन की खातिर सब करने को तैयार हो। देश और समाज को लेकर परेशानी में रहता और फिर भी आनंद का अनुभव करता था जनहित जनकल्याण की बात करते हुए। दोस्ती निभाने को उचित अनुचित की परवाह नहीं करना दुनिया वाला सबक सीखा नहीं कभी समझना नहीं चाहा , किसी को दुश्मन नहीं समझा मगर लोग इसको अपना दुश्मन मानते रहे। ज़ुल्म सहता रहा कोई बदला किसी से नहीं लिया दुश्मनी करने वालों से भी नफरत नहीं करना आता था। पागल लोग होते हैं जो घर अपना फूंक कर खुद ही बाहर खड़े तमाशा देखते हैं। कबीर की तरह हक सच की बात निडरता से निस्वार्थ कहते हैं। निर्णय सुना दिया वहीं ले जाओ उन लोगों के पास छोड़ आओ जो इस तरह के हुए हैं और मुझे दरबान कर्मचारी साथ लेकर चल पड़े थे।

     पहुंचा उस जगह तो गांधी जी सुभाष भगत सिंह नानक कबीर सभी महान लोग नज़र आये मगर किसी को मेरे आने से कोई ख़ुशी हुई न कोई ग़म का अनुभव ही। अभिवादन किया परिचय दिया तो सब ने पूछा अपने भारत देश का क्या हाल है। पहली ही मुलाकात में उनको सब हाल कैसे समझाता बस कहा कि आप सबने कितना किया वतन को स्वर्ग जैसा बनाने को मगर अभी भी बहुत करने को बाकी है मगर जाने क्यों आजकल के नायक कहलाने वालों को उसकी चिंता ही नहीं है। दिन पर दिन दशा लगता है सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही है। भारत शीर्षक से नई फिल्म की चर्चा है मैंने नहीं देखी मुमकिन है उस में वास्तविकता की कोई बात की गई हो अन्यथा तो हर तरफ झूठ का बोलबाला है। और तो और अभी पर्यावरण दिवस पर हमने पेड़ भी लगाए तो झूठ के ही असली पेड़ को उसकी छांव में बैठे सभी अपने अपने स्वार्थ की कुल्हाड़ी से काटने को लगे है। चोर चोर मौसेरे भाई की कहावत सब तरफ सच होती लगती है। मुझे कहा शायद आपको मुंह से बोलकर बताने में संकोच हो रहा मगर सुना है कोई लिखने वाले लेखक हो तो थोड़ा समय लेकर विस्तार से भारत फिल्म की नहीं देश की कहानी लिख कर दे देना हम पढ़ कर समझ सकेंगे और इक सबूत भी रहेगा। हम जानते हैं आप कड़वा सच लिखने में संकोच नहीं करने वाले।

       कहानी फ़िल्मी या नाटकीय नहीं है वास्तविक है देश की समाज की। पहले किस की बात करें किसकी नहीं करें जब सब की दशा साल दर साल बिगड़ती जा रही है। कहां वो ऊंचे आदर्श सादा जीवन उच्च विचार और कहां आधुनिकता की अंधी दौड़ जिस में शानदार आडंबर का जीवन बाहर से दिखाई देता है और विचार कुछ भी नहीं बस खोखली बातें हर कोई करता है। यहां हर कोई समझता है बताता है क्या क्या करना देश समाज के लिए अनुचित है मगर अपने आचरण में ऐसे ही खलनायक जैसे लोगों को पसंद भी करते हैं और उस जैसा बनना भी चाहते हैं। राजनीति की आलोचना बुराई करते हैं मगर अवसर मिलते ही खुद अच्छी राजनीति करने का साहस नहीं करते हैं और सत्ता मिलते ही उसी कीचड़ में स्नान करने को गंगा स्नान मानते हैं। सरकार का अर्थ ही कुर्सी मिलते ही खुद को दोषमुक्त और भला पुरुष मनवाना हो गया है। जो शिक्षक से ज्ञान का दान करते थे शिक्षा का व्यौपार कोचिंग क्लासेज या आधुनिक स्कूल धनवान लोगों के बच्चो के लिए खोलकर कारोबार करते करते लूट का धंधा करने लगे , जो अधिकारी देश की सेवा को नियुक्त हुए कर्तव्य की भावना छोड़ मनमानी करने  और अहंकार तथा लालच से राह से भटक गए हैं। कारोबार करने वालों ने ईमानदारी से उचित कमाई करना छोड़ अनुचित ढंग से पैसा कमाने को ईमान को बेचने लगे हैं हर चीज़ में मिलावट धोखा हेराफेरी की आदत ने इंसान और इंसानियत को भुला दिया है। डॉक्टर सबको स्वस्थ्य देने का मकसद भूलकर केवल पैसे की हवस की खातिर भगवान कहलाने की जगह अपने धर्म को भुलाकर धन दौलत सुख सुविधा की अंधी दौड़ में भागते हुए बदनाम हो रहे हैं। जैसे हर शाख पर उल्लू बैठा है बर्बादी को बढ़ाता हुआ सा। मगर असली कहानी सरकार की है जिसने सब कुछ ठीक करना था मगर किया सब कुछ गलत पर और भी गलत है। देश की समस्याओं का समाधान करने की जगह समस्याओं को बढ़ाने बुलाने का काम करती रही हैं और आज की सबसे विकट समस्या ही सरकार खुद ही है।

      सरकार की सत्ता की कहानी शुरू हुई तो थी जनकल्याण की भावना से मगर आज पहुंच गई है हद दर्जे की मतलब की स्वार्थ की पाप कथा तक। 71 साल पहले देश को आज़ादी दिलवाने को कितने शहीदों ने कुर्बानियां दी थी और इक संविधान रुपी नक्शा बनाकर देश को ऐसा गुलशन बनाने का रास्ता बताया था जिस में सभी नागरिक समान हों खुशहाल हों अम्न चैन से मिलकर साथ रह सकें और हर किसी को उसके हिस्से की रौशनी उसके हिस्से की ज़मीन भी आकाश भी खुली हवा में सांस लेने और सुरक्षित जीने के बुनियादी अधिकार भी हासिल हों। जैसे कोई बड़ा सा घर हो सभी को रहने को छत और सुख सुविधा मिले। ये नहीं है कि भारत देश में संसाधनों की कोई कमी है इतना है कि हर किसी की ज़रूरत पूरी की जा सकती है , जैसा गांधी जी और कई महान चिंतक बताते रहे हैं , लेकिन किसी की भी हवस लालच को पूरा करने को दुनिया का सब कुछ भी काफी नहीं है। सरकार बनाने का अर्थ था निर्माण की बात करना मगर यहां कुछ ही सालों बाद देश की आज़ादी की कीमत को भुलाकर हर कोई मतलबी और लोभी लालची बनता गया। देश सेवा समाज की भलाई को दरकिनार करते गए लोग। इक इमारत जो बहुत कम समय में बनाई जा सकती थी अभी भी उसको बनाना तो क्या उसकी बुनियाद को ही तोड़ने का काम करने लगे हैं। हर कोई सत्ता मिलते ही जो निर्माण हुआ उस से आगे और बनाने पर ध्यान देने की बजाय मैंने बनाया है इसका ख्याल रखते हुए पिछले बने को बदल अपने नाम का पत्थर लगवाना अपनी शोहरत बढ़ाने की देश के खज़ाने को उपयोग कर अपनी तस्वीर लगवाना जैसे फज़ूल के काम करने लगता है।

         इक सबक समझाया गया है कुछ महान जन-नायकों द्वारा कि आपको क्या करना है चाहते हैं अपने अंदर रखना चाहिए , क्या कर रहे हैं बताने की ज़रूरत नहीं सामने नज़र आना ही है , क्या नहीं करना चाहिए ये जानना ज़रूरी है और अपनी आलोचना अपना विरोध होने देना चाहिए और अपने आचरण को बदलना सुधारना बेहतर बनाना चाहिए कोई अहंकार नहीं करना चाहिए कि आपके पास सत्ता का अधिकार है तो आपकी हर बात उचित है। देश की तस्वीर और निर्माण की इमारत को ऊंचा ही नहीं बनाना चाहिए बल्कि पारदर्शी भी बनाया जाना चाहिए। सत्ता की हवेली की ऊंची दीवारें और बंद खिड़की दरवाज़े बाहर की आवाज़ को नहीं सुनाई देना जैसे काम कभी नहीं होने चाहिएं। मगर खुद को खुदा कहलाने का पागलपन तमाम राजनेताओं पर ऐसा सवार हुआ कि अपनी ऊंचाई के सामने बाकी सभी उनको बौने लगने लगे। ये किसी कवि की कविता से समझ सकते हैं जो लोग सत्ता के शिखर पर चढ़कर सोचते हैं उनका कद बढ़ गया है नहीं जानते कि शिखर से गिरने पर नमो निशान नहीं रहता है। सत्ता की ऊंचाई आपकी नहीं है पहाड़ की है और जो पहाड़ पर खड़ा होता है उसको नीचे वाले चींटी की तरह लगते हैं मगर नीचे से वो भी और भी बौना लगता है। आपको अपना कद बढ़ाना है तो लालबहादुर शास्त्री जैसे लोगों से सबक सीख सकते हैं बहुत थोड़े समय सत्ता पर रहे मगर आज भी जय जवान जय किसान और बेहद सादगी से रहने के बाद भी देश के गर्व और स्वाभिमान को ऊंचा रखने का कीर्तिमान स्थापित किया था। अब हालत ऐसी है लोग हर बार किसी पर भरोसा करने के बाद पछताते हैं कि हमने क्या समझा और ये कैसा निकला है।

     सरकार का अर्थ सत्ता पाकर अपने खुद की खातिर सब पाना नहीं है। चार साल तक सत्ता के मद में मनमानी करना फिर उसके बाद जनता को खुश करने को खिलौनों से बहलाना दोबारा सत्ता हासिल करने को देश की जनता संविधान और उन महान विचारकों भगत सिंह गांधी सुभाष के साथ छल करना है। राजनीति की विडंबना यही है जो विपक्ष में खराब लगता है सरकार खुद की बनाने पर अच्छा लगता है। दूसरे शब्दों में जिस बुराई को खत्म करना था जिस व्यवस्था को बदलना था उसी को अपनाने लगते हैं। कल कोई अपना गुणगान करवाता था आज आप भी वही करवाते हैं। देश से पहले कोई दल कोई संगठन कोई संस्था कोई परिवार कोई रिश्ता नहीं हो सकता है मगर जिसको देखते हैं देश की बात कहने को कहता है मकसद अपने ख़ास लोगों को बढ़ावा देना होता है। कोई विचारधारा नहीं है कल किसी दल का नेता था जिसकी सोच तानाशाही है आज किसी और दल में शामिल हो गया जिसकी सोच धार्मिक भेदभाव वाली है , कहीं कोई अच्छी विचारधारा की बात नहीं केवल सत्ता की गंदी दलगत राजनीति ही सभी को उचित लगती है। अंधे की रेवड़ियां बांटने का काम होता रहा है जिस से पांच दस फीसदी लोग रईस और अमीर बनते गए और देश की अधिकांश दौलत संपत्ति को हथिया लिया है बाकी के हिस्से कुछ भी नहीं बचने देना चाहते हैं। अगर यही देश भक्ति समाज सेवा और जनकल्याण कहलाता है तो कितनी गलत व्याख्या और उल्टा शब्दार्थ है। भला बनने की जगह बुराई को ही भलाई कहने लगे हैं। शुरू में इक नई फिल्म भारत की बात की थी उसकी किसी से कहानी सुनी है। सतर साल से कोई अटका हुआ है और बस पिछली घटनाओं इतिहास को याद करने में समय बर्बाद कर रहा है। विभाजन के बाद भटकता रहा है कभी कुछ कभी कुछ काम करता हुआ फिल्म की कहानी को चूं चूं का मुरब्बा बना दिया है मगर  क्या संदेश है कोई नहीं समझ पाया कोई स्वाद नहीं बेस्वाद है मगर मकसद बनाने वाले का कमाई करना है जो अवश्य हासिल किया जा सकता है और यही समानता भारत फिल्म की भारत देश की वास्तविकता से मेल खाती है। जनता को हासिल कुछ नहीं होता और राजनीति की हर दुकान हर शोरूम मुनाफा कमाता है उनके दोनों हाथ में लड्डू हैं , पांचों उंगलियां घी में सर कढ़ाई में हैं और बहती हुई सत्ता की गंगा में नाहाकर समझते हैं उनके पाप धुल गए हैं। अपराधी सांसद मंत्री बनकर समझते हैं जितने गंभीर अपराध किये करते रहे और अभी भी करने हैं उनको इजाज़त मिल गई है जनता ने चुना है तो गुनाह गुनाह नहीं अधिकार बन गए हैं। भारत की यही सच्ची कहानी है जो जनता की व्यथा कथा है और राजनीति की महाभारत की ऐसी किताब है जिस में धर्म की तरफ कोई भी नहीं है।

Tuesday, 4 June 2019

संविधान क्या पूर्णतया लागू है और सफल भी ( विवेचना ) डॉ लोक सेतिया

     संविधान क्या पूर्णतया लागू है और सफल भी ( विवेचना ) 

                                        डॉ लोक सेतिया 

 चर्चा की जाती है और कुछ लोग संविधान के जानकर होने का दावा करने वाले घोषणा करते हैं कोई निर्णय या अन्य कोई बात किस सीमा तक उचित है संविधान के अनुसार। मुझे बहुत सिमित जानकारी है संविधान को लेकर अधिकांश भारतीय जनता की तरह। मालूम हुआ कि संविधान सभा ने इसका बड़ा अंश 1935 के बने अंग्रेजी शासन के कानून को रखते हुए शामिल किया है और थोड़ा कुछ चौथाई भाग और देशों के संविधान से लिया गया है और बेहद कम दसवां भाग ही खुद नया विचार कर बना कर शामिल किया गया है। हम मानते हैं ये दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है और इस में बदलाव भी होते रहे हैं। मगर शायद ही किसी ने फिर से सोचने की कोशिश की है कि अपने उद्देश्य में किस सीमा तक सफल रहा है। ईमानदारी पूर्वक चिंतन किया जाये तो लगेगा ये बनाने वालों की उम्मीदों आपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। राजनैतिक दलों ने इसके पालन की अनदेखी ही नहीं की बल्कि अपनी मर्ज़ी से परिभाषित करना चाहा है। कुछ मुख्य बातों को लेकर चिंतन करते हैं। 

             संविधन में लोकतंत्र की बात है किसी दलीय व्यवस्था वाले लोकतंत्र की नहीं है। जनता अपने सांसद विधायक निर्वाचित करती है जिनको अपने बीच से किसी को नेता चुनना होता है और बहुमत जिस के साथ उसको सरकार का प्रमुख बना देते हैं। मगर ये पहली ही बात बिना संविधान को बदले ही छोड़ दी गई और सांसद विधायक अपनी आज़ादी से नेता नहीं चुनते पहले से कोई आलाकमान बड़ा नेता घोषित किया जाता है। ये संसदीय प्रणाली नहीं अमेरिका की राष्ट्रपति प्रणाली जैसा है मगर पूरी तरह से उस की नकल भी नहीं है। सबसे अजीब बात है राजनेताओं ने कई नियम अपनी सुविधा और साहूलियत को ध्यान में रख कर बना लिए बदल लिए है। विधायक निधि सांसद निधि इसी तरह की बात है क्योंकि संविधान विधायिका को कानून बनाने और बजट बनाकर उसको लागू करवाने को अधिकार देता है , व्यय खर्च का दायित्व कार्यपालिका पर सौंपता है न्याय व्यवस्था का न्यायपालिका को दिया गया है। 

      दल बदल कानून को इस तरह तलवार की तरह उपयोग किया जाता है सदन के सदस्य बंधक हैं व्हिप को मानना पड़ता है वोट अपनी सोच अनुसार नहीं दल की मर्ज़ी से देना होता है। बिना लोकलाज और शर्म के अपने लिए तमाम साधन  सुख सुविधा छीन लेने का कार्य किया गया है बगैर देश की गरीबी की दशा की परवाह किये हुए। मगर चाहे ये सभी मिलकर आपसी बंदरबांट को जो भी मनमानी करते रहें हम लोग जो वास्तव में देश के मालिक कहलाते हैं कुछ भी नहीं कर सकते हैं। कम से कम पढ़े लिखे तथाकथित बुद्धीजीवी कहलाने वालों को इसकी चर्चा अवश्य करनी चाहिए कि क्या वास्तव में हमारा संविधान सफल है। या फिर कोई भूल कोई गलती कोई जल्दबाज़ी हुई थी और अपने देश का संविधान यहां की व्यवस्था अपने अनुसार चलाने को किसी की कॉपी पेस्ट नहीं खुद अपना मौलिक बनाना उचित था। जिस तरह हमने गीता को केवल कसम उठाने को किताब बना दिया है समझने की ज़रूरत नहीं समझते हैं उसी तरह संविधान कुछ लोगों को देश और जनकल्याण की नहीं अपने स्वार्थ और सत्ता पाने का माध्यम भर बन गया है।

कभी मस्ती में यारो हम भी होंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 कभी मस्ती में यारो हम भी होंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

 
कभी मस्ती में यारो हम भी होंगे
हुए सब दूर रंजो- ग़म भी होंगे।

सुलगती रेत का दरिया यहां है 
यहीं बारिश के सब मौसम भी होंगे। 

बहुत लंबा जहां फैला हुआ है 
मुसाफिर लोग कुछ पैहम भी होंगे। 

किसी तरहा मना लेंगे उन्हें हम 
अगर रूठे हुए हमदम भी होंगे। 

नहीं आंसू बहेंगे अब कभी भी 
हमारे दर्द जितने कम भी होंगे। 

न भरने ज़ख्म देंगे लोग अब पर 
मिला जो चारागर मरहम भी होंगे। 

नज़र आते नहीं  "तनहा " कहीं अब 
कभी इक रोज़ हर आलम भी होंगे।

Monday, 3 June 2019

बर्बाद होने के रास्ते ( फज़ूल की चर्चा ) डॉ लोक सेतिया

      बर्बाद होने के रास्ते ( फज़ूल की चर्चा ) डॉ लोक सेतिया 

    बर्बाद शब्द पर मत जाना यहां अर्थ कुछ अलग सा है। इबादत इक ऐसा काम है जिस में खुदा भगवान वाहेगुरु अल्लाह मिलते नहीं कभी मगर उनको पाने में अपने आप को खोना फनाह करना बर्बाद होना सबसे बढ़कर ख़ुशी देता है। ये परिभाषा समझाना ज़रूरी था कि बर्बादी कोई खराब चीज़ नहीं होती है बर्बाद होना अच्छी बात है बर्बाद होकर जो मिलता है आबाद रहकर कहां हासिल होता है। आज बर्बाद होने के रास्तों की बात करनी है। 

       राजनीति और आशिक़ी बर्बाद करती है तो कहीं का नहीं छोड़ती। सत्ता की चाहत महबूब की चाहत चैन नींद सब छीन लेती है। कोई कोई खुशनसीब होता है जिनको मंज़िल मिलती है राजनीति में और आशिक़ी में , वर्ना तमाम लोग सालों तक राहों पर भटकते रहते हैं। बड़ी महंगी कीमत चुकानी पड़ती है राजनीति में दीन ईमान नैतिकता आदर्शवादी मूल्य जैसी बातों को किसी कूड़ेदान में फैंक कर आने की इजाज़त मिलती है। अगर आपको दोस्तों में दुश्मन मिलते हैं और आपको परखना नहीं आता तो राजनीति की तरफ भूल कर भी मत जाना उधर दोस्ती दुश्मनी एक साथ की जाती है। ऊपर बंधी रस्सी पर संतुलन बनाकर चलना होता है थोड़ा संतुलन बिगड़ा और आपकी हालत घायल दर्द से बेहाल मरीज़ जैसी हो सकती है। रही बात इश्क़ की तो इश्क़ वालों का मुकदर है यही आप अपनी आग में में जल जाइए। प्यार धोका है तो धोका ही सही , चाहता है दिल कि धोका खाईए। हमको अपना इम्तिहां मंज़ूर है और भी तड़पाइए तरसाइए। दिल है हाज़िर लीजिए ले जाइए और क्या क्या चाहिए फरमाइए।

   इन दोनों के इलावा भी बर्बादी की राहें बहुत हैं। ज़िंदगी का रास्ता कभी सीधा किसी मंज़िल की तरफ नहीं जाता है। बीच में कोई दोराहा आता है और आपको चुनना होता है किस तरफ मुड़ना है इक  राह आसान इक कठिन होती है। आसान राह चुनते हैं तो आबाद तो रहते हैं ख़ुशी नहीं मिलती है मुश्किल राह चलते हैं तो कोई साथी नहीं होता अकेले अकेले चलना पड़ता है। कहीं कोई चौराहा आता है आपको किस दिशा को जाना है सवाल खड़ा होता है और जो राह लिखा हुआ रहता है उस तरफ जाती है वास्तव में जाती नहीं कभी भी। ये सबसे बड़ा धोखा है राह चलती नहीं कभी जाना मुसाफिर को होता है कहते है ये रास्ता उस देश को जाता है। मंज़िल की तलाश अपना रास्ता खोजने के बाद शुरू होती है मगर अधिकतर समय हम राह से भटकते हुए इधर उधर जाते रहते हैं। कितना सामान जोड़ते रहते हैं जिस की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ती है और जिसकी ज़रूरत बहुत होती है उसी को बहुत पीछे छोड़ आये होते हैं। सब लुटवा कर होश आता है चाहिए क्या था और हम क्या ढूंढते रहे जमा करते रहे।

        छोटे छोटे घर हुआ करते थे गांव में इक आंगन होता था इक पेड़ की छांव जिस पर पक्षियों की आवाज़ का संगीत सुनाई देता था। पनघट पर पानी पिलाती थी गांव की गोरियां हंसी की आवाज़ भी सुनते थे। कोई इकतारा बजाता गुज़रता था तो लगता था जाने कैसा स्वर है दर्द भी सुकून भी एक साथ महसूस किया करते थे। उस घर को छोड़ शहर में मकान बनाकर रहने लगे तो बंद कमरे की घुटन से बाहर निकलने को कोई दरवाज़ा खिड़की खुली नहीं दिखाई देती है। भीड़ है चहल पहल है जाने पहचाने लोग हैं मगर सब में इक अजीब सा अजनबीपन परायापन लगता है अपनत्व की कमी खलती है। वापस गांव जाने की राह बंद कर आये है और महानगर जाने से खो जाने का डर भी है और उसकी चमक दमक रंगीनियां लुभाती हैं आकर्षित करती हैं बुलाती हैं। ऊपर जाने का हासिल यही है नीचे देखते हैं सर चकराता है और लगता है फिसलन है गिर सकते हैं कदम कदम संभल कर रखना है। मिट्टी की सुगंध को छोड़कर पत्थरों से दिल लगाने को बर्बादी कहें या कुछ और भला सा नाम दिल को समझाने को। इक ग़ज़ल याद आई है।

यही सोचकर आज घबरा गये हम - लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम ,
चले थे कहाँ से कहाँ आ गये हम।

तुम्हें क्या बतायें फ़साना हमारा ,
किसे छोड़ आये किसे पा गये हम।

जिया ज़िंदगी को बड़ी सादगी से ,
दिया जब किसी ने ज़हर खा गये हम।

खुदा जब मिलेगा कहेंगे उसे क्या ,
यही सोचकर आज शरमा गये हम।

रहे भागते ज़िंदगी के ग़मों  से ,
मगर लौट कर रोज़ घर आ गये हम।

मुहब्बत रही दूर हमसे हमेशा ,
न पूछो ये हमसे किसे भा गये हम।

उसी आस्मां ने हमें आज छोड़ा ,
घटा बन जहाँ थे कभी छा गये हम।

रहेगी रुलाती यही बात "तनहा" ,
ख़ुशी का तराना कहाँ गा गये हम।   

शपथ खाना सपने बेचने के बाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   शपथ खाना सपने बेचने के बाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                  सपने बेचने का घोटाला ( पहला अध्याय )

   बात टीवी अख़बार के विज्ञापन की है। सरकारी विज्ञापन कहते हैं सब बढ़िया है हर तरफ स्वच्छ भारत है बच्चे स्कूल जाते हैं गरीब के घर खाना पकता है सब कुछ खूबसूरत है। चाय की दुकान पर बर्तन धोने वाले बच्चे को कोई महिला स्कूल पहुंचा देती है , तस्वीर इतनी जल्दी बदलती है बच्चा निकर बनियान की जगह स्कूल की यूनिफार्म पहने चाय के गलास नहीं किताबों का बस्ता लिए हुए खेलता नज़र आता है। मेरा देश बदल रहा है सुनाई देता रहता है जाने किधर से कोई गा रहा है। ढूंढा तो महिला बच्चा दोनों साथ साथ मिल गए , हमने कहा बहन जी बहुत महान हैं कितना अच्छा काम करती हैं। हंस दी वो महिला और वो बच्चा भी हमारी नासमझी और मूर्खता पर। कहने लगे जनाब इस युग में इतने भोले कैसे रह गए आप , इतना नहीं समझते ये हाथी के दांत हैं दिखाने को सरकारी विज्ञापन। हम तो दोनों कलाकार हैं अभिनय करते हैं और हर सरकार के विज्ञापन पैसे लेकर करते हैं जिस किरदार की ज़रूरत होती है निभाते हैं। अगली बार सरकार बदले या रहे विज्ञापन नये होंगे ये कारतूस बार बार नहीं चलते हैं। याद करो गरीबी हटाओ के इश्तिहार शाइनिंग इंडिया भारत निर्माण लंबा इतिहास है सपने बेचने वाले कमाल करते हैं कहीं की कहानी कहीं से जोड़ धमाल करते हैं। राजनीति लूट का व्यवसाय है विज्ञापन जनता को लुभाने का हथियार है महंगा पड़ता है सस्ता मिलता है जो भी बेकार है।  विज्ञापन कभी सच नहीं होते सपने हैं बिकते हैं ऊंचे दाम पर। सपनों को यकीन करो हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करो , कोई भूखा नहीं कोई बाल मज़दूर नहीं कोई बंधुवा मज़दूरी नहीं करता। और तो और जितने भी सांसद विधायक हैं किसी नेता के बंधक की तरह नहीं हैं जो सच है कहने पर कोई रोक नहीं कोई दल से निष्काषित नहीं होता अपने विचार आलाकमान से अलग रखने पर। कोई बड़ा नहीं छोटा नहीं किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं मिले हुए। किसी जाति पाति का धर्म का झगड़ा नहीं है सदभाव है एकता है। नेता अफ़्सर ईमानदार हैं रात दिन कर्तव्य निभाते हैं न कोई रिश्वत न किसी की सिफारिश की ज़रूरत है। जन गण सुरक्षित हैं पुलिस सभी को आदर से सहयोग देती है कोई डंडे का राज नहीं है सभ्यचार का सबक सीख लिया है कोई दादागिरी नहीं चलाते हैं। अब इस से अच्छा क्या हो सकता है और ये मुमकिन है बस आपको अपनी आंखें बंद रखनी हैं सपने को सच समझना है यकीन करना है जो सरकार बताती वही सच है जो हम आप देखते हैं सच है मगर उसको सच नहीं समझना डरावना ख्वाब है भूल जाना होगा। सपनों में जीने का आनंद लेना सीखो बहुत काम की बात है। याद आया कोई जाग कर सपनों को सच करने का भरोसा देता था उसने बाकायदा किताब लिख डाली थी 2020 का भारत कैसा होगा। न वो महान आदमी रहा न किसी को उस सपने को हक़ीक़त में बदलना ज़रूरी लगा। अगले साल उस सपने के टूट कर बिखरने की बात कोई याद भी नहीं करेगा , मेरा सुंदर सपना टूट गया।

    देश में कितने घोटाले हुए हैं सबकी रकम मिलाई जाये तो कम होगी इस रकम से जो सरकारी विज्ञापनों के नाम पर अपने ख़ास लोगों को खैरात की तरह बांटते हैं अपनी महिमा अपना गुणगान करवाने को। इस तराज़ू के पलड़े में कितने बिक गए कितने बिकने को तैयार हैं। सच का आईना दिखाने वाले सभी दर्पण दौलत की चकाचौंध में झूठ को सच साबित कर मालामाल हो रहे हैं। सभी वास्तविकता की बात कहते हैं खुद अपनी को चुप रहकर छुपाते हैं। इक पुरानी कहानी दोहराते हैं , राजा नंगा है की कथा बताते हैं। ठग आए दरबार को बताया शानदार कपड़ा बनाया है सच बोलने वाले ही देख सकते हैं झूठे लोग देख नहीं सकते हैं। जो कपड़ा उनके पास नहीं था हर किसी को दिखाई दिया सबने शानदार कहा और राजा को पोशाक बनवाने को सिलाई करने को दर्ज़ी भी बुलाये गए , उन्होंने भी ऐसे कपड़े की पोषक बनाई जिसका कोई वजूद नहीं था। हर कोई खुद को सच्चा साबित करना चाहता था नज़र नहीं आया भी दिखाई दे रहा कह रहे थे। राजा नई पोशाक पहन कर रथ पर सवार होकर निकला नगरवासी जय जयकार करने लगे थे। तभी रास्ते में इक बच्चा घर की छत पर से बोला राजा तो नंगा है। राजा नंगा है कहना तब भी गुनाह था आज भी अपराध है। सभी जानते हैं मगर खामोश हैं।

                     शपथ आइसक्रीम की ( अध्याय दूसरा )

  शपथ को लेकर साफ कुछ भी नहीं है। अदालत से लेकर समाज और प्यार मुहब्बत में इसको उपयोग किया जाता है। कसम खाना शपथ लेना उठाना या खाना ज़रूरी होता है अधिकारी डॉक्टर शिक्षक शपथ लिया करते हैं और सरकारी दफ्तर में हर साल रिश्वत नहीं लेने की शपथ खिलाई जाती है। नेताओं को शपथ लेना बेहद आनंददायक अनुभव लगता है बार बार खाने को मन ललचाता है। शपथ लेने का समारोह भव्य ढंग से आयोजित करना था इसलिए अधिकारी कोई कमी नहीं छोड़ना चाहते थे। सभी विभाग शामिल थे बंदोबस्त करने के लिए। सबको खाने को खूब मिलेगा इसकी उम्मीद भी थी और हर कोई अपनी पसंद का भी ख्याल रख रहा था। बजट की कोई सीमा नहीं थी और शपथ हज़ारों की भीड़ जमा कर ली जानी थी। अधिकारी समझना चाहते थे कि शपथ लिखित ली जाए क्या काफी नहीं है हर किसी को बोलना भी ज़रूरी है। शपथ लेने वाला खुश होता है नाम घोषित होने पर मगर शपथ दिलवाने वाले को कितनी बार वही दोहराना पड़ता है। कई बार गलती करने वाले को सुधारना भी होता है। इक बार खाई शपथ कितने दिन तक मान्य समझी जा सकती है क्या हर दिन शपथ को याद रखना होगा या इक बार लिखित को शीशे में जड़वा कर तमगा बनाकर रखना काफी है। शपथ के विपरीत आचरण करने पर क्या कोई दंड मिल सकता है। कुछ साल पहले हर सरकारी दफ्तर में तख्तियां टंगवाई गई थी यहां रिश्वत देना मना है , लोग समझे नहीं फिर किस जगह मना नहीं है। 

     बड़े सचिव स्तर के अधिकारी ने सवाल किया क्या व्यर्थ की चर्चा में उलझे हैं आप भी। इन बातों को छोड़ विचार करो कि शपथ किस रूप में खाई जाएगी खिलाई जानी है। क्या शुरू में खानी है तो फ्रूट चाट अथवा सालाद को शपथ नाम देकर इस्तेमाल किया जा सकता है और अगर आखिर में अंत में खानी होगी तो आइसक्रीम के रूप में स्वादिष्ट शपथ खिलाना उचित है। जिसको जो स्वाद अच्छा लगता है सब वैरायटी की उपलब्ध हो सकेगी। किसी को वेनिला किसी को स्टाबरी टूटी फ्रूटी या बुटरस्कोच पसंद अपनी अपनी। गर्मी के मौसम में शपथ ठंडी और स्वादिष्ट होनी चाहिए। शपथ आखिर में खाई जाए उचित है क्योंकि जिस तरह आइसक्रीम कुछ ही देर में पिघल जाती है शपथ भी लेने के चंद मिंट बाद भूल जाती है या भुला दी जाती है। शक़्कर के रोगी भी चुपके से खा लेते हैं मगर फिर भी उनको शुगरफ्री उपलब्ध करवा दी जाएगी। शपथ खाने का सब बंदोबस्त ठीक था और लाजवाब रहा सब का मुंह मीठा करने का अवसर मिला जितने भी महमान बुलाये गए थे। दो चार मन मसोस कर रह गए उनकी बारी आने तक आइसक्रीम खत्म हो चुकी थी।  

Sunday, 2 June 2019

मोदी जी इतना बता दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      मोदी जी इतना बता दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   सीधा सा सवाल है कोई टेड़ी मेड़ी बात नहीं है। हम भी चाहते हैं देशभक्त देश सेवक बनकर दिखाना। बस इतना नहीं जानते बिना राजनीति की ताकत हासिल किये कैसे करें क्या करें। आप इतना सच सच बताओ कि किसी दिन अगर कभी आपके पास शासन की बागडोर नहीं हो कोई राजनीति की ताकत नहीं हो कोई शान शौकत नहीं हो राजा जैसा शाही रहन सहन और रुतबा नहीं हो बस इक सामन्य नागरिक बन जाओ तो क्या करोगे आप वास्तव में।  ये मत कहना झोला उठाकर चल दूंगा उसको पलायन करना कहते हैं। देश के सभी लोग अपने देश से प्यार करते हैं बिना कोई स्वार्थ भी देश से दिल से मुहब्बत करते हैं। देश का हर नागरिक जो भी काम करता हो किसान मज़दूर अपना कोई धंधा नौकरी या फिर काम की तलाश में रोज़गार ढूंढते लोग भी किसी न किसी तरह देश के भविष्य में योगदान देते हैं। कोई महान कार्य करने का तमगा लगाकर नहीं फिरते हैं। क्यों आप लोग राजनेता और बड़े बड़े सरकारी पदों पर आसीन लोग ही चाहते हैं देश और जनता की सेवा करनी है तो सत्ता और अधिकार ज़रूरी हैं। देशभक्त होने का दिखावा नहीं बनकर दिखाना अच्छा है और उसके लिए सत्ता मिली हो तब भी देश की वास्तविकता और बदहाली की चिंता होने पर खुद के लिए सभी कुछ विलासिता पूर्ण की जगह उतना ही हासिल किया जाना चाहिए जो ज़रूरी हो। जो सच्चे जनता के हितचिंतक होते हैं सादगी से रहना चाहते हैं शानदार रईस की तरह रहकर आम लोगों की गरीबी भूख की बात नहीं समझी जा सकती है। ये संविधान का उपहास है सत्ताधारी अपनी मर्ज़ी से नियम बनाकर देश के धन को खज़ाने को खुद पर खर्च करें बेशक ये कानूनी होगा मगर है लूट ही। कोई सीमा निर्धारित की जानी चाहिए देश के हर आम नागरिक की आमदनी और शासन संभालने वाले नेताओं अधिकारियों को मिलने वाली राशि वेतन सुविधा साहूलियात में कितने गुणा अंतर रखा जाये।

           ये कोई सरकार कभी किसी को नहीं बताती है कि देश के आम नागरिक की औसत आमदनी कितनी है और नौकरशाहों को सत्ताधारी लोगों को मिलने वाला वेतन का औसत कितना है। विकसित देशों में ये अंतर दो से पांच गुणा अधिक होता है तो हमारे विकासशील देश में जहां तीस फीसदी जनता गरीब है ये अंतर और कम होना चाहिए क्योंकि शासक को तभी समझ आएगा कितना आवश्यक है रोज़मर्रा जीने की ज़रूरत को। लेकिन आप लोग कभी नहीं बताओगे कि जब आम जनता को दिन की आमदनी सौ पचास होना भी लगता है दो वक़्त रोटी खाने को बहुत है तब आपका एक समय का खाना हज़ारों से लाखों तक होता है और आम नागरिक की आमदनी और नेताओं को मिलने वाली राशि अधिकारी कर्मचारी को मिलने वाले वेतन में अंतर ज़मीन आसमान से बढ़कर है। कई लाख गुणा किसी एक सत्ताधारी का एक दिन का खर्च और किसी के निवास का रखरखाव का बेतहाशा ख़र्च लोकतंत्र तो नहीं है। ये व्यवस्था न्यायकारी नहीं समझी जा सकती है।

     इस बार सबसे बड़ी चिंता का विषय है संसद में बढ़ती अपराधियों की गिनती। जिस संसद में 43 -44 फीसदी लोग आपराधिक मामलों के अभ्युक्त हों और जब देश में पैसे वाले और सत्ता वाले न्याय को खरीद कर छीन कर हासिल करते हों जिसकी पुलिस हर दिन अत्याचारी ढंग से आचरण करती मिलती हो उस में संसद बन जाने के बाद किसी का अपराध साबित किया जाना कितना संभव हो सकता है। सर्वोच्च न्यायलय चुनाव आयोग की कितनी कोशिशों से 2004 में संसद में अपराधी सांसद 12 फीसदी हुआ करते थे 2009 में बढ़ते हुए 24  होने 2014 में 32 फीसदी तक और इस बार 2019 में 44 फीसदी हो गई है। सत्ताधारी दल के आधे से अधिक सांसद करीब 55 फीसदी इसी कतार में आते हैं। ऐसे ही जारी रहा तो अगली संसद में बहुमत आपरधिक इतिहास वालों का हो सकता है मगर हम कहते हैं देश महान बन रहा है विश्वगुरु होने को है गर्व करने की बात है। शायद हमने वास्तविक ज़िंदगी को फ़िल्मी कहानी या किसी नाटक जैसा समझने की भूल की है। फिल्मकारों को पिछले चालीस साल से खलनायकी को समाज में मान्यता दिलाने और गुंडई को स्वीकार करवाने का दोषी ठहराया जा सकता है। उनको सफलता और कमाई से मतलब है समाज को रसातल में धकेलने से भी संकोच नहीं है। देश की फ़िल्मी अभिनय वाले नायक नहीं देश को उचित दिशा दिखाने और मार्गदर्शन देने वाले जन नायकों की ज़रूरत थी न कि ऐसे बाहुबली अपराध के आरोपी लोगों को चुनने की। ये भटकना राह भूलना नहीं है विपरीत दिशा को चलते जाना है।

     जो लोग अगर जेल में बंद नहीं तो समाज से बाहर किनारे पर होने चाहिएं जब उनको माननीय कहना शुरू किया तो अंजाम अच्छा नहीं हो सकता है। भूख गरीबी बेरोज़गारी की समस्या से गंभीर है ये कि ऐसे लोग सत्ता की बागडोर संभालेंगे जिनको नैतिकता और शराफत जैसे शब्दों से कोई नाता ही नहीं हो। जो महिला आरक्षण को चिंतित हैं 33 फीसदी होने पर क्या पहाड़ टूटेगा उनको आधी संख्या अपराधियों की कोई गंभीर सवाल नहीं लगती है। हौंसले की ज़रूरत है ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने को कानून बनाना देशहित और देशभक्ति का निर्णय होगा। दोषी हैं जब तक दोषमुक्त नहीं होते क्या देश सेवा करना चाहते हैं जनता की सेवा ही करनी है तो विधायक सांसद बने बगैर भी की जा सकती है। सत्ता का पद कुर्सी पाना ज़रूरी नहीं है वास्तविक देश और जनता की भलाई या जनकल्याण का काम करने को।

Saturday, 1 June 2019

दर्द का हद से बढ़ जाना है दवा बन जाना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 दर्द का हद से बढ़ जाना है दवा बन जाना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

                    उनके आने से जो आ जाती है चेहरे पे रौनक , वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है। दुनिया यही समझ रही होगी किसी ने कोई चमत्कार किया है जो जनता ने फिर से बेशुमार प्यार दिया है। असली राज़ की बात हमसे पूछो कोई हमने कयामत का भी इंतेज़ार किया है। मांगने से जो मौत मिल जाती कौन जीता इस ज़माने में। कितने साल तक राह देखते रहे इसकी कि सबको सब कुछ बराबर मिलेगा , बहार आएगी फूल खिलेंगे। ख्वाब था चकनाचूर हुआ तो अब समझे कि अच्छे दिन जाने क्या क्या सब कहने को थे भला भूख गरीबी का कोई ईलाज होता है। जो बात उपदेशक उपदेश देकर नहीं समझा पाये कि जिस हाल में ऊपर वाला रखे खुश रहना सीखे सीखना चाहिए समझना चाहिए कि जो खराब है उस से खराब भी हो सकता था। खैर मनाओ नहीं हुआ हाल बदहाल , बस इक नेता ने समझा दिया जैसे हो बहुत अच्छी किस्मत पाई है जो मेरा शासन नसीब हुआ है। फिर से इक बार सिर्फ मेरी सरकार।  इक नशा कोई जादू छाया जो दर्द देने वाला भी मसीहा कहलाया। सबने राग दरबारी मधुर सुर में गाया अपनी मौत का भी खुद जश्न है मनाया। कफ़स इस कदर है परिन्दों के मन को भाया सय्याद का जाल बिछा जानकर मन  ललचाया दाना भी नहीं डाला जाने क्या खाया। 

            अब इस से खराब क्या होगा सबने सोचा ईलाज क्या होगा। कुए कातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें , क्या खबर कूचा ए दिलबर से प्यारा ही न हो। जाँनिसार अख्तर जी की ग़ज़ल का शेर है। ज़िंदगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही न हो , कुछ न कुछ हमने तेरा क़र्ज़ उतारा ही न हो। दिल को छू जाती है रात की आवाज़ कभी , चौंक उठता हूं कहीं तूने पुकारा ही न हो। कभी पलकों पे चमकती है जो अश्क़ों की लकीर , सोचता हूं तेरे आंचल का किनारा ही न हो। ग़ज़ल का आखिरी शेर लाजवाब है फिर से सुनने की गुज़ारिश होगी। शर्म आती है कि उस शहर में हैं हम कि जहां , न मिले भीख तो लाखों का गुज़ारा ही न हो। 

     दर्द इस तरह अश्क बनकर ढलते हैं , लोग ग़म छुपाने को मुस्कुराते नहीं अब ज़ोर से हंसते हैं। बुरा वक़्त टल गया है ये इस का सबूत है। लोग खुद ही चले आते हैं कत्ल होने को , कुछ नहीं मिला दर्द ही मिला मगर उसका दिया सब कबूल है। मुझे ग़म भी उनका अजीज़ है , कि उन्हीं की दी हुई चीज़ है। यही ग़म है अब मेरी आरज़ू , इसे कैसे दिल से जुदा करें। है इसी में प्यार की आबरू वो जफ़ा करें हम वफ़ा करें , जो वफ़ा भी काम न आ सके तो वही कहें कि हम क्या करें। ये राजनीति कैसे आशिक़ी बन गई है सितमगर से प्यार करने लगे हैं लोग। बड़ा नामुराद है सखी दिल का ये रोग दिल धड़कता है कोई क्या जाने घबराहट है दहशत की या किसी बेदिल की चाहत है। हालत कभी इस हद तक खराब हो जाती है जब दर्दो ग़म का एहसास नहीं होता है। कोई ज़हर पिलाता है तो चैन मिलता है ये बात ग़ज़ल से शुरू हुई थी कव्वाली तलक चली आई है। न तो कारवां की तलाश है न तो हमसफ़र की तलाश है , मेरे शौके खाना खराब को तेरी रहगुज़र की तलाश है। मेरे नामुराद जूनून  का अब  है ईलाज कोई तो मौत है , जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है। कुछ यही हुआ है कव्वाली का मज़ा ले कर समझना फिर कभी। 



Friday, 31 May 2019

जीवन का पिंजरा और चौराहा ( लीक से हटकर ) डॉ लोक सेतिया

  जीवन का पिंजरा और चौराहा ( लीक से हटकर ) डॉ लोक सेतिया 


     आज कोई कहानी नहीं कविता नहीं ग़ज़ल नहीं कोई निरर्थक बहस नहीं कोई राजनीति की धर्म की बात नहीं और दुनिया की नहीं अपनी ज़िंदगी को सच्ची बात खुलकर। मैंने बहुत थोड़ा पढ़ा है मगर जितना भी पढ़ता रहता हूं उस को लेकर चिंतन करना समझना आदत है। किताबों से बेहद लगाव है और किताबों से संगीत से फिल्मों से पुरानी युग की से भी मुझे काफी सबक समझने सीखने को मिले हैं। कल इक अख़बार में बोध कथा और इक किताब में इक ग़ज़ल पढ़कर ये फ़लसफ़े की बात लिखना ज़रूरी हो गया है।

       सोचता हूं तो एक साथ दोनों बातें सच लगती हैं। जैसे कोल्हू का बैल अपनी परिधि में घूमता रहता है आंखों पर दो खोपे बंधे रहते हैं और बैल समझता है चलता जा रहा है जबकि रहता वहीं का वहीं है अपनी भी दशा उसी जैसी है। जीवन की राह में कितने चौराहे मिलते रहते हैं चलते चलते , इक राह लगती है आसान होगी छोटी होगी , इक और लगती है बनी हुई पगडंडी है पहले भी तमाम लोग उसी से गुज़रते रहे हैं कोई अनजानी नहीं होगी , इक उबड़ खाबड़ लगती है जिस पर कांटे भरी झाड़ियां हैं रेगिस्तान है पत्थरीली राह है कोई छांव नहीं कठिन लगती है और इक और सीधी चली जाती है। हम समझते नहीं हमारी मंज़िल क्या है और कौन सी राह उस को जाती है , हम अपनी मर्ज़ी की राह चलते रहते हैं और कभी मंज़िल नहीं मिलती है। शायद आज से ही सही दिशाहीनता को छोड़ अपनी मंज़िल की तरफ चलने का निर्णय लेना होगा।

  पिजरे की बात इक बोध कथा से फिर याद आई। संक्षेप में सुनाता हूं। इक आदमी पहाड़ों पर सैर करने को गया। उसने देखा चरों तरफ ऊंचे ऊंचे पहाड़ हरे-भरे पेड़ और ठंडी ठंडा हवाएं खूबसूरत वादियां हसीन मंज़र का आनंद ले रहा था। अचानक उसको कोई आवाज़ पहाड़ों से टकराती हुई उसके कानों को सुनाई दी। जैसे कोई पुकार रहा हो आज़ादी आज़ादी। वह आदमी हैरान होकर ढूंढने लगा कहां से ये चीख आ रही है। काफी तलाश करने के बाद उसे इक तोता मिला जो इक पिंजरे में बंद था जो चिल्ला रहा था आज़ादी आज़ादी। उस आदमी ने पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। पर तोता डरकर अंदर की तरफ भाग गया। आदमी बहुत देर तक तोते को पुचकारता रहा पर तोता पिंजरे से बाहर नहीं निकला और अंदर से ही राग अलापता रहा , आज़ादी आज़ादी। काफी कोशिश के बाद आदमी ने हाथ डालकर तोते को आराम से पकड़ कर बाहर निकाला और खुले गगन में छोड़ दिया। अगली सुबह फिर से उस आदमी को वही आवाज़ सुनाई दी मगर जब जाकर देखा तो हैरान हुआ दरवाज़ा खुला है फिर भी तोता अंदर बैठा चिल्ला रहा है आज़ादी आज़ादी। हम लोग भी जीवन में सभी जगह उसी तरह से किसी पिंजरे में रहने के अभ्यस्त हो चुके हैं। पिंजरा छोड़ेंगे तभी पता चलेगा कि दुनिया कितनी हसीन है।

       कुछ शेर बलबीर राठी जी की ग़ज़ल से चौराहे को लेकर सुनने से पहले ज़रूरी बात खरी भी कड़वी भी। सभी लोग अपने को जानकर समझते हैं अच्छी अच्छी बातें कहते हैं समझाते हैं। सोशल मीडिया पर और क्या होता है संदेश पढ़कर लगता है कितने आदर्शवादी लोग हैं भलाई की बातें धर्म की उपदेश जैसी सुंदर सुंदर तस्वीरें भी मगर कितने हैं जो उन को पहले खुद आचरण में अपनाते भी हैं। लिखने वाले साहित्य की दुनिया की खबर की आईने दिखाने की बात करने वाले टीवी अख़बार वाले भली भली महानता की बातें कहते हैं खूब ज़ोर शोर से लेकिन खुद इनकी बात मत पूछना नसीहत करते हैं अमल में लाते नहीं है। जिसे देखो खुद को जानकर समझदार ही नहीं शरीफ ईमानदार होने का दिखावा करते हैं मगर जब ज़रूरत हो कोई सीमा नहीं कोई बंधन नहीं उचित अनुचित का कोई मापदंड नहीं। चेहरा कोई है मुखौटा बदलते रहते हैं सुविधानुसार। अब कुछ शेर पेश हैं।

मेरे पीछे सूनी राहें और मेरे आगे चौराहा , 

मैं ही मंज़िल का दीवाना मुझको ही रोके चौराहा। 

ऐसे मुसाफिर भी थे जिनकी अक्सर यूं भी उम्रें गुज़रीं , 

जिस भी सिम्त सफर को निकले उनको मिला आगे चौराहा। 

चौराहों पर आकर सारी राहें गड्ड मड्ड हो जाती हैं ,

जो अपना रस्ता पहचाने उसका क्या कर लेगा चौराहा। 

जिन दीवानों के कदमों में मंज़िल अपनी राह बिछा दे ,

राठी ऐसे दीवानों को खुद रस्ता दे दे चौराहा।

हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया ( हास-परिहास ) 

                        डॉ लोक सेतिया ( किसी की डायरी से )

    इस बार भी बुलावा नहीं आया कितना शानदार उत्सव था। सखियां ज़रूर छेड़ेंगी मान जाती खुद ही चली जाती भला कोई रोक सकता था। जब मानते हैं अभी भी तुम उनकी पत्नी हो तो अधिकार था जाती साथ की कुर्सी पर विराजमान होती। टीवी चैनल वाले भी उनकी माता जी मतलब आपकी सासु मां को घर बैठ टीवी पर देखते दिखाना छोड़ तुम्हीं पर कैमरा फोकस करते हम भी देखते कितना अच्छा लगता। कोई बहाना समझ ही नहीं आ रहा इस बार पिछली बार कहा था बुलाने का इंतज़ार करती रही बुलावा मिला ही नहीं। जाने कैसे लोग पता लगा लेते हैं जो जानकारी मिली कि जिस भी नेता को पद पर आसीन होने की शपथ लेनी हो उसके परिवार को बुलावा भेजना ज़रूरी है और इस के लिए उनके कहने की ज़रूरत नहीं समझी जाती है। खैर इस बार ये उम्मीद नहीं थी जाऊं चाहे नहीं भी जाऊं बुलाना तो होगा ही। उस दिन जानकर घर से बाहर नहीं निकली न किसी से संपर्क किया किसी तरह भी। सब समझे होंगें चली गई होगी इस बार बुलावा आने की राह तकने की भी ज़रूरत नहीं होगी। 

     हम लोग रिश्तों को लाख आपसी मन मुटाव होने पर भी निभाते हैं ख़ुशी के वक़्त बुला लेते हैं दुःख की घड़ी चले जाते हैं खबर मिलते ही। पति पत्नी में तो रूठना मनाना घर के भीतर होता है बाहर समाज को पता नहीं चलने देते कोई झगड़ा भी है। ऐसे मिलते हैं आदर्श जोड़ी की तरह इक दूजे की ख़ुशी को मिलकर मनाते हैं। जाओ जी बड़े वो हो , अरी तुम भी अजीब हो घर की मालकिन सबको बुलाती है तुम को भला बुलाने की ज़रूरत थी कोई। खत नहीं फोन नहीं व्हाट्सएप्प संदेश भेज कर लोग जिसको नहीं पसंद उनको भी आने को निमंत्रण भिजवा देते हैं खुद नहीं जाना तो डाक से कुरियर से ही। अधिकतर चले जाते हैं उत्सव का अवसर है गीले शिकवे भुलाकर फिर से मरासिम कायम रखने को सिलसिला चल पड़ता है। 

    अगली सुबह सखियां चली आईं बधाई देने को। मिठाई मंगवाना भूल गई ओह याद किसी की न सताये राम जी। झूठ बोलना पड़ा मिठाई की दुकान से लड्डू मिले ही नहीं पहले से बुक करवा लिए थे उन्हीं के दल वालों ने। घर पर ही हलवा बनाकर खिलाना पड़ा। गई क्यों नहीं सवाल आना था जाने क्यों जवाब सूझ भी गया सखी इस बार डाक विभाग की गलती है उन्होंने इतना खूबसूरत निमंत्रण पत्र भिजवाया है मगर पहुंचा उत्सव खत्म होने के बाद तो कैसे जाती। सखियां नहीं समझी सच है या बहाना है। ये राजनेता लोग विपक्षी नेता को या अपने ही दल के विरोधी को जानकर देर से बुलावा भेजते है सभा में आने का पर घर के लोगों वो भी पत्नी को इस तरह नहीं बहलाया जा सकता है। चलो इसी बात पर इक ग़ज़ल आर पी महरिष जी की सुनते हैं। 

आईने में देखना अच्छा लगा , अपना अपना चौखटा अच्छा लगा। 

आत्मश्लाघा में खुद अपनी पीठ को , थपथपाना ठोंकना अच्छा लगा। 

आज विश्वामित्र के बहरूप को , मेनका ने फिर छला अच्छा लगा। 

आधुनिक बनने की अंधी दौड़ में , उनको चस्का जाम का अच्छा लगा। 

एक खलनायक की कटु मुस्कान पर , हो गए दर्शक फ़िदा अच्छा लगा। 

बाद उत्सव के निमत्रण पत्र वो , खूबसूरत सा मिला अच्छा लगा। 

हम तो रुकने ही को थे महरिष मगर , उसने रोका रास्ता अच्छा लगा।       


Thursday, 30 May 2019

खोजना होगा भगवान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     खोजना होगा भगवान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      हमने खोजा था भगवान बहुत पहले इस की चर्चा की गई थी जब पेटेंट की बात चली थी। मालूम नहीं तब सरकार ने किया या नहीं शायद नीम हल्दी तुलसी की चिंता थी भगवान का पेटंट करवाने से आर्थिक नफ़ा नुकसान नहीं सोचा हो तो छोड़ दिया हो। भगवान भी क्या करते जब कोई उनकी अहमियत को नहीं समझता हो। पर अब लगता है किसी न किसी को दोबारा ऋषि मुनि बनकर तलाश करना होगा क्योंकि अफवाह सुनी है भगवान इस देश को कभी का छोड़ कहीं विदेश जा बसे हैं। देश की सुरक्षा का सवाल है इसलिए अभी ये राज़ छुपाया जा रहा है मगर उड़ती उड़ती खबर बाहरी देश से इधर पहुंची है कि उधर किसी सच्चे फ़कीर ने पा लिया है ऊपर वाले को। अपने देश में करोड़ों देवी देवता कभी वास किया करते थे और सबकी मनोकामना पूरी हुआ करती थी अब किसी को यकीन नहीं होता किस जगह किस से मनौती मांगी जाये जो मिल भी जाये। इधर उधर कितनी जगह भटकते फिरते हैं लोग। कहीं ऐसा तो नहीं देश की आबोहवा ठीक नहीं होने की विवशता के कारण भगवान घूमने फिरने आबोहवा बदलने विदेश चले गए हों और फिर किसी देश में मन रम गया हो और वापस लौटना ही भूल गए वहीं का निवासी बन कर रहने लगे हों। माना भगवान के पास धन दौलत की कोई थोड़ नहीं है अंबार लगे हैं उसके कितनी कितनी जगह। पर पासपोर्ट बनवाने हवाई टिकेट उपलब्ध कराने में कोई न कोई सरकारी अधिकारी या नेता ज़रूर शामिल हुआ होगा। बिना सबूत आरोप नहीं लगाना चाहिए लेकिन ये भी कोई बड़ा घोटाला हो भी सकता है। कोई अपने साथ भगवान को देवी देवताओं को लेकर जाता रहा हो और अपना मतलब पाने के बाद उसी देश छोड़ कर चुपचाप लौटता रहा हो। कई लोग कबूतरबाज़ी का खेल खेलने का कारनामा अंजाम लाने को बदनाम हुए हैं।  

          कई साल पहले मैंने कहा था कि अगर कोई ईश्वर होने का पेटेंट करवा ले तो क्या होगा।  हमको पहले से ये अपने नाम करवा लेना चाहिए। मगर हम भारत वासी खुद को भगवान हरगिज़ नहीं कह सकते।  भले है बहुत जो भगवान कहलाते हैं , मीडिया ने बना दिया अपने मकसद से , कुछ ताकत शोहरत मिलते ही खुदा बन जाते हैं इंसान नहीं रहते। मगर भगवान हैं ये नहीं कहते क्योंकि भगवान से उनको भी डर लगता है। मगर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि ये पेटेंट अपने नाम करवा लिया जाये कि भगवान को हमने ही खोजा था। ये झूठ भी नहीं है , हम साबित कर सकते हैं। हमारे साधू संत , सन्यासी , ऋषि मुनि , देवी देवता तक वर्षों बन बन भटकते रहे , तपस्या करते रहे पर्मात्मा को पाने को। इस अपने देश में करोड़ों देव वास किया करते थे , तो बहुमत भी अपना ही साबित किया जा सकता है। अब वो सब किधर गये ये सवाल मत पूछना , कलयुग में राक्षस ही मिलते हैं उनके रूप में। लेकिन जब हमने खोजा था भगवान को तो इसका पेटेंट अपने नाम होना ही चाहिये। अब आप सोचोगे कि ऐसा करने से क्या हासिल होगा। तो समझ लो जब भगवान पर अपना पेटेंट होगा तब उसकी बनाई हर चीज़ पर अपना अधिाकर खुद ही हो जायेगा। तब उनको पता चलेगा जिन्होंने हमसे गैट समझौते पर हस्ताक्षर लिये थे। हवा पानी चांद सूरज , रौशनी अंधेरा सब की यहां तक कि बरसात की रायल्टी देनी होगी , इंद्र से लेकर सभी देवता अपने ही हैं। तब पता चलेगा उनको भी कि पेटेंट करवाना क्या होता है।

          पूजा अर्चना पहले सुख शांति पाने को करते थे फिर भगवान से खाने को रोटी मिलती रहे घर की छत कायम रहे और परिवार फलता फूलता रहे यही बहुत समझा जाता था। धर्म की राजनीति करने वालों ने सत्ता पाने को अनुष्ठान करवाना शुरू किया तो बात खुलने लगी। सभी ने अपनी अपनी तरह धार्मिक कार्य करवाया और नामी गिरामी लोगों की सेवाएं लेकर विधि विधान से किया मगर मनोकामना कितने की पूरी हुई ये आंकड़े पता करने पर बवाल खड़ा हो जाता खुले आम घोषणा नहीं की जा सकती थी कि एक दो लोग ही सौ में से सफल हुए हैं जिन्होंने चुनाव की टिकट लेने से पर्चा भरने तक धार्मिक अनुष्ठान किये। मगर जो 44 फीसदी गुनहगार जीते भला भगवान की मर्ज़ी से तो नहीं हुआ होगा संभव। विजयी होने को धर्म कर्म को छोड़ जाने क्या क्या नहीं किया करवाया गया बताना उचित नहीं है। सांप गुज़र गया हम लाठी भांजते खड़े हैं अब। अब पछताए क्या होय जब चिड़िया चुग गई खेत। इक दार्शनिक बता रहे हैं लोग भगवान की पूजा अर्चना भी मतलब से करते हैं जो किसी काम का नहीं है आडंबर है औरों को दिखावा करने को। वास्तविक पूजा इबादत किसी को बताकर नहीं की जाती कोई शोर शराबा नहीं किया जाता। जो किसी धार्मिक स्थल जाकर कोई भेंट चढ़ावा देने के बाद उसकी चर्चा करवाते हैं उनका मकसद धार्मिक नहीं स्वार्थी कारण से आडंबर होता है। 

         मगर हमारी चिंता राजनेताओं के झूठे दिखावे की बातों को लेकर नहीं है। समस्या गंभीर है अपने देश में रोज़ सुबह शाम करोड़ों लोग मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाते हैं भगवान को मनाने को। हर को विश्वास करता है वो है उन जगहों पर , मगर अगर उन जगहों पर उसका निवास है ही नहीं तो बात चिंता करने की है। खोजना होगा भगवान। अब फिर से कोई करेगा जनकल्याण को ये तपस्या उसको ढूंढने की। कोई इस बात को किसी भी तरह कहे मगर इस में कोई शक नहीं है कि हमारा देश भगवान भरोसे ही चल रहा है चलता रहा है अन्यथा इस देश का सत्यानाश करने वालों ने कोई कोर कसर कोई कमी छोड़ी तो नहीं है। बाकी सब को फिर देख लेंगे क्या अच्छा बुरा क्या हुआ नहीं हुआ। मगर भगवान मिलना बेहद ज़रूरी है और वो भी असली वाला कोई नकली किसी का घोषित किया हुआ नहीं। दुनिया से क्या लेना देना जैसे भी चलती रहे अपना देश भगवान के बगैर कैसे चलेगा इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है।