Monday, 12 November 2018

इक्कीसवीं सदी का संविधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   इक्कीसवीं सदी का संविधान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      आखिर देश की सरकार को भी समझ आ ही गया है कि भगवान का ही भरोसा है। हम तो पहले से सोचते रहे हैं कि ये देश चल कैसे रहा है। जिस देश के नेता अधिकारी अपना कर्तव्य नहीं निभाते हर विभाग अपना काम छोड़ बाकी सब काम करता है पुलिस अस्पताल विद्यालय सभी अन्याय बढ़ाने अपराध करवाने रोगी को उपचार देने से पहले खुद अपनी कमाई की चिंता करने शिक्षा का कारोबार करने लगे हों उस देश का मालिक भगवान ही है। इसलिए सरकार ने नई नीतिगत योजना बनाई है मंदिर और मूर्तियां बनाने की। शिक्षा स्वास्थ्य न्याय और समानता से कहीं अधिक महत्व धर्म पूजा पाठ और मंदिर मूर्तियां का है। मंदिर में भगवान से ज्ञान शिक्षा स्वास्थ्य और इंसाफ जो मर्ज़ी मांग सकते हैं , सब को सभी कुछ भगवान ही दे सकता है। भगवान सब से धनवान है इस में किसी को संदेह नहीं है। सभी भगवान सब देवी देवता अकूत धन संम्पति हीरे जवाहारात सोना चांदी जमा करे हुए हैं। रब माना जाता है उनको भी देता है जो उसे नहीं मानते हैं शायद उन्हीं को ज़्यादा देता है। जो भगवान को मानते हैं वो मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाते हैं रोज़ सुबह शाम और घंटों राम नाम या गुरुबाणी या कुरान अथवा बाइबल पढ़ने पर खर्च करते हैं मगर जो इसकी चिंता नहीं करते वो जब मनोकामना पूरी हो जाती है तब चढ़ावा भेंट करते हैं। इनका भरोसा पहले काम फिर दाम की बात का है। नेता जी भी चुनाव जीतने के बाद करोड़ों का चढ़ावा सरकारी धन से चढ़ाते रहे हैं। समझदारी इसे कहते हैं हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चौखा हो , कमाल है। भगवान कैसे खुश नहीं होंगे इस से पहले ऐसा भक्त कोई सत्ताधारी नज़र आया ही नहीं होगा। देश का विकास भविष्य में संविधान के सिद्धांत के अनुसार नहीं साधु संतों और बाबाओं से निर्देश लेकर किया जाएगा। विभागों के नाम बदल कर देवी देवताओं के नाम से बुलाया जाएगा। वित मंत्रालय को देवी लक्ष्मी , ग्रह मंत्रालय को संकट मोचन , स्वास्थ्य मंत्रालय को धन्वन्तरी देव नाम की तरह करने से सब अपने आप ठीक हो जाएगा। और नहीं भी हुआ तो लोग सरकार की आलोचना नहीं करेंगे भगवान की मर्ज़ी मान खामोश रहेंगे। आज तक किसी ने भगवान को लेकर कोई बात कहने का साहस नहीं किया और जो करे उसको नास्तिक कहकर लताड़ा जाता है कि भगवान के लिए ऐसी बात कहते हो तभी तो बदहाल हो। अब जब चुनाव होंगे तब हर दल वाले वादे करेंगे आपके शहर में किस किस देवी देवता का कितना भव्य मंदिर बनाया जाएगा। कितनी मूर्तियां किस किस की धातु की पत्थर की या आधुनिक ढंग से रंग बिरंगी रौशनियों से बनाई जाएंगी। विज्ञान की साहित्य की अर्थशास्त्र की किसी भी विषय की पढ़ाई ज़रूरी नहीं होगी , बस भगवान को लेकर चर्चा खोज पर ध्यान देना होगा।

Saturday, 10 November 2018

तीसरा कौन है ( ज्योतिष की बात ) डॉ लोक सेतिया

       तीसरा कौन है ( ज्योतिष की बात ) डॉ लोक सेतिया 

     इसे मानो चाहे नहीं मानो की सूचि में रख सकते हैं। अभी उस नाम की चर्चा नहीं की जा सकती है। अभी सब इसी चिंतन में हैं कि अगला मोदी कौन अर्थात अगला शासक मोदी या राहुल। भाई ये कोई कुश्ती है दो पहलवानों की जो उन से एक की जीत और एक की हार होगी। धर्म कर्म मानने वाले लोग भूल गये कल क्या होगा कोई नहीं जनता पल भर का भरोसा नहीं और आप अगले चुनाव की अगले वर्ष की बात कर रहे हैं। लो आज इक ज्योतिष की जानकारी से अनजान आदमी घोषणा करता है अगला सत्ताधारी कोई तीसरा होगा। चाहो तो शर्त लगा सकते हो सट्टा गैरकानूनी है। है किसी टीवी वाले जाने माने अथवा हर फ़ोन कंपनी के संदेश वाले ज्योतिषी को मालूम उस तीसरे का नाम , चलो नाम नहीं तो इतना ही बता दो किस राशि का होगा , ये भी नहीं तो बताओ मेरी कुंभ राशि का होगा या मेष राशि का। मेरी इक राशि नाम से है दूसरी जन्म समय से। आपने गलत समझा मुझे राजनीति से कोई मतलब नहीं है और मैं अपनी बात नहीं कर रहा वैसे मेरी धर्म पत्नी को शायद लगता हो कि वो अच्छी नेता बन सकती है। मुझ में नेतागिरी के कीटाणु नहीं हैं। विषय पर आते हैं। विचार करो कि अगर अगले चुनाव में मोदी जी और राहुल जी घोषित कर दें कि उनकी ख्वाहिश नहीं है सत्ता पाने की और अब उनको सच में देश और समाज की सेवा करनी है बिना किसी पद की सत्ता की चाहत के तब क्या भूचाल आ जाएगा जो सवा सौ करोड़ लोगों के पास कोई नहीं होगा काबिल नेता प्रधानमंत्री बनने के लायक। नहीं उनका मोहभंग राजनीति से नहीं होगा और चुनाव भी लड़ेंगे मगर फिर भी होगा कुछ ऐसा जैसे दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर की मौज की कहावत है। मेरा मतलब किसी को बंदर कहने का नहीं है क्योंकि मानहानि की बात संभव है। समझा जाए तो हम बंदर से इंसान बने हैं और बंदर कहलाने में कोई अपमान की बात नहीं है वानरसेना से भगवान राम जंग जीत सकते हैं। 
       आपको आदत है पूछोगे ही कोई हिंट तो देना चाहिए। ठीक है वो पूरब से होगा न पश्चिम से उत्तर से नहीं होगा दक्षिण से भी नहीं , मगर उसका संबंध चारों दिशाओं से होगा। किसी भी एक दल से उसका नाता नहीं होगा और कोई भी दल उससे अछूता नहीं होगा। महिला पुरुष दोनों हो सकते हैं आयु की सीमा कोई नहीं होगी चाहे जितनी आयु हो बूढ़ा नहीं कहलाएगा न ही बचपना बाकी होगा। विवाहित कुंवारे से भी कोई मतलब नहीं है इतना समझ सकते है इसे लेकर दुविधा रहती है अक्सर। कुंडली बन चुकी है मगर अभी काफी उपाय करने को हैं थोड़ा इंतज़ार करें। इक अनुरोध इसे पढ़कर मेरे पास अपना भविष्य पूछने मत चले आना , मुझे किसी को ठगना झूठ बोलना या धोखे में रखकर फायदा उठाना नहीं आता न ही करना है। मगर मेरी बात शत प्रतिशत सही साबित होगी देखना अवश्य।

इतिहास का काला अध्याय ( मौजूदा हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

  इतिहास का काला अध्याय ( मौजूदा हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

 जो काम आज करने जा रहा हूं बेहद कठिन ही नहीं खुद अपनी रुसवाई की भी बात है फिर भी लिखने लगा हूं आजकल का वास्तविक इतिहास अपनी कलम से जिस पर कोई नाज़ तो नहीं किया जाना चाहिए। सोचा तो समझ आया कि हुआ क्या है जो हम सभी सदमें में हैं समझ नहीं पाये अभी तक हुआ क्या है। किसी व्यक्ति या दल से विरोध नहीं किसी विचारधारा से टकराव नहीं कोई चाहत नहीं शोहरत की नाम की न ही कोई गलतफहमी है इतिहास लेखन या साहित्य लेखन में मेरी अहमियत क्या कोई जानता तक भी नहीं। इक दर्द है इक टीस सी है सीने में चुभती हुई जो बेचैन किये है और हर दिन कुछ न कुछ घटता रहता है जो ज़ख्मों को कुरेदता रहता है। क्या ये तकलीफ़ मेरी है या पूरे देश की समाज की है और क्या ये एहसास मुझी को है या फिर बाक़ी लोगों को भी होता है। अगर होता है तो जो अनगिनत लिखने वाले हर दिन किताबें लिख लिख छपवा रहे हैं उन में किसी ने इस वक़्त की व्यथा को समझा है साहस किया है। लिखना क्या यही है जो अब पढ़ने को मिलता है और सभाओं में मंचों पर संस्थाओं के आयोजनों में सुनाया जा रहा है। केवल यही याद दिलवाना कि हम उनके वंशज हैं जो तोप के सामने कलम लेकर लड़ा करते थे। उन बहादुर लोगों के वंशज क्या ऐसे कायर हो सकते हैं। सच की बात का दावा करने वाले अख़बार टीवी चैनल से कविता कहानी लिखने वाले सब के सब क्या अपना फ़र्ज़ राह दिखलाने का कर रहे हैं या अपने सवर्थ सिद्ध करने वालों की भीड़ में शामिल होकर हुआं हुआं का शोर मचाने लगे हैं। पढ़ लिख कर समझदार कहलाने वाले लोग मुझे क्या सोच खुद को किनारे खड़े कर दूर से नज़ारा देख रहे हैं बर्बादी का और अपने समझदारी साबित करने को सोशल मीडिया पर व्यस्त हैं चौबीस घंटे। ऐसे में मैं इक नासमझ और पागल आपको आज के इतिहास का वो काला अध्याय पढ़कर सुना रहा हूं जिसपर कोई नाज़ नहीं करेगा चाहे बेशर्मी से नज़र बचाकर निकल जाने का कार्य करे या सुनकर अनसुना कर दे। 
               आपने सोचा क्या हुआ था जिस को देश की जनता ने चुना था उसने एक दिन बिना सोचे समझे घोषित कर दिया कि देश के हर नागरिक की तलाशी ली जाएगी। कभी किसी थानेदार ने शहर भर की तलाशी की बात की है किसी इतिहास में लिखा है। अपराधी को पकड़ने का ये तरीका क्या मंज़ूर किया जा सकता है। फ़िल्मी पार्टी में किसी का कीमती हार चोरी हो गया तो सभी बुलाये महमानों की तलाशी की बात की जाती देखी है कोई नहीं खुद को अपमानित महसूस करता। वास्तव में कोई किसी से ऐसा कहे तो जीवन भर उससे बात ही नहीं करना चाहोगे। मगर यहां ये घोषणा करने वाला तो घर का मालिक भी नहीं है चौकीदार है जनता का रखा हुआ। रखवाली करना छोड़ सब को चोर समझने लगा है। उसने कहा था तलाशी के बाद चोर नहीं पकड़ा गया तो सज़ा खुद उसे लोग दे सकते हैं चौराहे पर खड़ा कर मगर दो साल बाद तक चोरी का माल बरामद हुआ नहीं फिर भी उसको अपना अपराध स्वीकार नहीं है। उसकी गलती है कि नहीं क्या ये भी खुद वही तय करेगा। मामला इतना ही नहीं है उसकी गलतियों की कोई गिनती ही नहीं की जा सकती। अमेरिका में ट्रम्प के झूठ कितने हैं बता रहा है मीडिया मगर यहां हर झूठ को सच घोषित किया जा रहा है। 
           आज जब सत्ता संवैधानिक संस्थाओं को ध्वस्त करने लगी हुई है और जो उसकी नहीं मानता उसी को गुनहगार साबित कर सज़ा देने लगे हैं सीबीईआई आईबी अदालत के बाद आरबीआई की बारी है और आगे किस किस को बर्बाद करना है उनके इरादे नहीं मालूम। क्योंकि उनको अभी सत्ता चाहिए और किसी भी तरह से हर कीमत पर चाहिए। पहले उनसे कोई पूछेगा आपको चुना किस किस वादे पर गया था उनका क्या हुआ। अपने जो किया सब सामने है मगर चुनाव से पहले अपने ये तो नहीं कहा था कि आप सत्ता मिलते ही देश विदेश घूमने का कीर्तिमान स्थापित करना चाहते हैं और उस पर इतना धन देश का खर्च करेंगे जो पहले कभी किसी ने नहीं किया और उन सारी विदेशी यात्राओं से देश को मिलना कुछ नहीं केवल आपकी छवि चमकानी है। ये बहुत महंगी देशभक्ति है जो देश को देती कुछ नहीं लेना सभी कुछ चाहती है। अपने तो लोगों को बताया था कि अपने गरीबी देखी है और गरीबों की हालत सही करोगे मगर अपने तो रईसों की तरह शान से जीवन व्यतीत करने में राजाओं महाराजाओं को पीछे छोड़ दिया। अपने रहन सहन वेश भूषा और हर गली चौराहे पर अपनी तस्वीर के विज्ञापन से क्या देश की दशा बदल जायगी या आप की हंसती मुस्कुराती तस्वीर जनता को चिढ़ाती लगती है। काला धन मिला नहीं काले धन वाले जेल नहीं गये और आपके ख़ास लोग देश के बैंकों का धन लेकर रफू चक्क्र हो गए। अपने बार बार कहा था परिवारवाद को खत्म करना है मगर अपने संघवाद को बढ़ावा दिया और हर राज्य में सत्ता विस्तार कर संघ के लोगों को सत्ता पर थोपने का काम ही नहीं किया बल्कि ऐसे लोगों के सरकार चला पाने में असफल होने पर भी ख़ामोशी से साथ दिया और ऐसे नाकाबिल लोग मनमानी कर अपराध और दहशत को बढ़ाने का काम करते रहे। 
        नाम बदलना और पुराने लोगों को बदनाम कर खराब साबित करना क्या यही किसी चुनी हुई सरकार का ध्येय होना चाहिए। सत्ता की हवस में आपने उस पुरानी कहानी को दोहराया है जिस में और अधिक ज़मीन पाने की चाहत में कोई शाम ढलने तक अपनी मंज़िल तक नहीं पहुंच पाता है। हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स। अब आपको पता चलने लगा है जब साये लंबे होते जा रहे हैं मगर अपने जिस मंज़िल पर पहुंचना था वो कहीं दिखाई नहीं दे रही है। अच्छे दिन नहीं हैं। भ्र्ष्टाचार बढ़ा है। गरीबी बढ़ी है।  महंगाई और बढ़ती गई है। लोग असुक्षित हैं। महिलाओं को और भी चिंता बढ़ी है सुरक्षा को लेकर। रोज़गार खत्म हुए हैं।  कारोबार बर्बाद हुए हैं।  किसान ख़ुदकुशी करने को विवश हैं। सीमा पर सैनिक शहीद हो रहे हैं। पहले सत्ताधारी लोगों ने जो भी बनाया सामने है अपने क्या बनाया है नहीं मालूम। भूखे भजन न होय गोपाला। देश को मंदिर मस्जिद और धर्म के नाम पर नफरत और बांटने का काम नहीं करना था और किसी ऊंची मूर्ति से एकता होती है ऐसा शायद ही कोई समझता है। सार्थक क्या है जिसे सुनहरे हर्फों में लिखा जाये आज का इतिहास ऐसा हर्गिज़ नहीं जिस पर भावी पीढ़ियां गर्व करेंगी।
       इक पुरानी कहानी फिर से लिखनी पड़ी है। इक नगर का शासक बनाने की बात आई तो इक जादूगर आया कहीं से और उसने दावा किया जादू की छड़ी से सब कुछ कर दिखाने का। लोग भोले और नासमझ सपने बेचने वाले सौदागर की चिकनी चुपड़ी बातों में फंस गये। और उस के सर पर ताज रख दिया। वो हर दिन खेल तमाशे दिखलाता और हाथ की सफाई और आंखों के सामने झूठ का सुनहरा पर्दा डालकर शानदार दृश्य दिखलाता और कहता कि जल्दी ही इस ख्वाबों की दुनिया को वो हक़ीक़त में बदल देगा। मगर वास्तव में उसे जादू से धोखा देने को छोड़ कुछ भी नहीं आता था। उसको जितना समय दिया गया था धीरे धीरे व्यतीत होता गया और आखिर में उसने नगर वालों को बर्बाद ही कर दिया। संक्षेप में आज भी हम वास्तविकता और छल का अंतर नहीं समझते हैं और ठग आते रहते हैं। हम खुश हैं ठगस ऑफ़ हिंदुस्तान फिल्म के बड़े बड़े अभिनेता हमें जादूगर की तरह झूठी दुनिया में रखना चाहते हैं और हम ख़ुशी से उनको धनवान बनाने को तैयार हैं जबकि ठग तो हमारे पर नेता अधिकारी क्या साधु संत बनकर भी आते रहते हैं जो खुद अपनी इच्छाओं को पूरा करते हैं मगर हमें भगवान सब करेगा का सबक पढ़ाकर उल्लू बनाते हैं।

Friday, 9 November 2018

कारोबारी बाबाओं के भरोसे देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   कारोबारी बाबाओं के भरोसे देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  सवाल गंदुम जवाब अदरक हमारे बज़ुर्ग मिसाल दिया करते थे। ये होना ही था जाने क्यों किसी को पहले विचार नहीं आया। सीबीआई की समस्याओं को आर्ट ऑफ़ लिविंग वाले रविशंकर जी तीन दिवस के शिवर में हल करेंगे। शायद इसके बाद आरबीआई में आयोजन करवाना पड़ सकता है आईबी की बारी आ जाए तो भी हैरान मत होना। आपको क्यों याद होगा ये वही रविशंकर जी हैं जिन पर यमुना तट पर तमाम नियम कानून तोड़ने पर जुर्माना लगाया गया था जिस आयोजन में देश का चौकीदार भी शामिल हुआ था। तब से यमुना में कितना पानी बह गया और गंदगी भी बढ़ गई होगी स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद। विज्ञान के युग में हम अभी भी सदियों पुराने तौर तरीकों से देश को जाने किधर को धकेल रहे हैं। इक कहानी याद आ रही है मगर अभी ठीक से याद करने के बाद आगे विस्तार से लिखूंगा। उस में शासक राजा और अधिकारी इक मदहोशी का शिकार होकर बहुत अजीब बातें निर्णय और कार्य करते हैं मगर कोई होता है जो इस सब के बाद भी कोई अनहोनी नहीं होने देता है। अफ़सोस इस बात का है कि उस जैसा कोई किरदार अब संभव नहीं है और अगर हो भी तो हाशिये पर धकेला जा चुका होगा। सच्चाई ईमानदारी और देश के लिए निष्ठा ऐसे गुण हैं जो कोई माने चाहे नहीं माने विलुप्त हो चुके हैं या इनको अवगुण मान लिया गया है। 

     ( बाकी बात कल आगे लिखी जाएगी उस कहानी को याद करने के बाद )


मुझे दे दो अपने गहने ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मुझे दे दो अपने गहने  ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 सरकार और रिज़र्व बैंक का आपसी मामला है। सरकार समझा रही है जो धन तिजोरी में रखा हुआ है उसकी चाबी तुम मुझे सौंप दो मेरा धंधा मंदा चल रहा है। रिज़र्व बैंक नियम बताता है कि जो सुरक्षित रखना है उस पर आपकी नज़र नहीं होनी चाहिए उस से ज़्यादा जितना अपने मांगा दिया है मगर आपकी हालत और बिगड़ी है अब बचा हुआ देना अनुचित होगा। स्वायतता की बात सरकार को खलती है। कहानी को कहानी से समझ सकते हैं। पति पत्नी सात जन्मों का बंधन होता है और पत्नी मायके से लाई हो या विवाह में उपहार मिले हों ससुराल वालों से दोनों सोने के गहनों पर अधिकार उसी का होता है। हर महिला उसको जान से बढ़कर प्यार करती है और कोई भी मुसीबत आने पर यही उसका सहारा होता है। पति से झगड़ा हो या नाते रिश्ते निभाने हों पत्नी घर खर्च से थोड़ा बचा कर रखती है। दो साल पहले सरकार ने सभी महिलाओं की बचत को पल भर में बर्बाद कर दिया साथ में हर पत्नी को बदनाम भी किया अपने पति से झूठ बोलती हैं ऐसा साबित कर। क्या गुनाह किया था उन्होंने न ही रिज़र्व बैंक की गलती है जो नियमानुसार सुरक्षित धन सरकार को देने में घबरा रही है पत्नी की तरह और पति धौंस दिखा रहा है कानून बदलने की। 
         चार साल से मनमानी की है और देश के धन को फज़ूल के कार्यों पर उड़ाया है मगर अभी भी स्वीकार नहीं  करना चाहते कि नातजुर्बाकारी के कारण मूलधन ही बचा नहीं मुनाफा ख़ाक होता मगर बही खाते में कमाई दिखानी है। नाम गरीबों का बदनाम है जो बीवी को मार पीट कर उसकी कमाई से शराब पीकर ऐश किया करते हैं। नेताओं के देश का धन अपने घूमने फिरने देश विदेश में सरकारी साधनों से निजि कार्य दान धर्म अपने लिए शोहरत हासिल करने पर खर्च करने को अय्याशी से भी खराब अमानत में खयानत समझना होगा। कोई कारोबार के लिए गहने बेचना चाहता है कोई घर बनाने को कोई मज़बूरी में बेटी की शादी पर घर गहने सब बेचने पर विवश हो जाता है मगर सरकार को चुनाव से पहले अपने चेहरे को चमकदार बनाकर दिखाना है। अब अगर नहीं जीते चुनाव हर गये तो आने वाली सरकार सोचेगी क्या करना है। जी हां ऐसे लोग होते हैं जो अपने स्वार्थ को देखते हैं और अपने मतलब को भविष्य तक दांव पर लगा देते हैं। रिज़र्व बैंक या द्रोपती खुद को जुए में दांव पर लगने से इनकार नहीं कर सकती। सवाल आपके पद और संस्था का नहीं है सरकार के पति की तरह मालिक होने का है। पति कहता है मेरा है चाहे जैसे खर्च करूं बर्बाद होगा तो भी मेरा है तुम कौन होती हो रोकने वाली। कोई उसको याद दिलाए कि आप भी किराएदार हो मालिक नहीं और आपका भी अनुबंध खत्म होने को है।

Thursday, 8 November 2018

खज़ाना मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        खज़ाना मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     आज ही का दिन था जब खुदाई शुरू की थी कुबेर का खज़ाना दबा हुआ है काले बक्से में इसका शोर बहुत था। सबको कहा था उसने पचास दिन लगेंगे खुदाई में बस उसके बाद इतना बड़ा खज़ाना हाथ आएगा कि सब को सभी कुछ मिल जाएगा और बुरे दिन इक सपना बनकर रह जाएंगे , अच्छे दिन जब आएंगे। मौज उड़ाएंगे झूमेंगे गाएंगे जाम से जाम टकराएंगे। खाज़ना किस जगह है कोई नहीं जनता था शक था विदेश में अधिकांश धन गढ़ा हुआ है पर खुदाई देश से करनी थी और घर घर से करनी थी। किसी न किसी घर से कोई न कोई सुरंग जाती होगी स्विस बैंक तक और वापस उधर से देश के किस बैंक तक आती है पता लगाना ज़रूरी था। खुदाई हुई खज़ाना कितना मिला अभी तक हिसाब ही नहीं लगाया जा सका है मगर है ज़रूर खज़ाना। खुदाई करने वालों को पता है मगर खज़ाना मिलते ही खुदाई करने वालों की नीयत खराब हो जाती है। सब आपस में हिस्सा बांट लेते हैं और खज़ाना मिलने की बात खुदाई की जगह ही दफ़्न कर दी जाती है। लोग समझते हैं किसी की सनक थी कोई खज़ाना नहीं मिला बेकार खुदाई से बर्बादी की गई। मगर उनकी मर्ज़ी है सच्चाई बताएं या छुपाएं। खज़ाना उनका चौकीदार खुद सरकार है। आज भी रात आठ बजते सबकी धड़कन बढ़ जाएगी सोच कर। अली बाबा चालीस चोर बनानी थी मगर बना दी ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान और आज ही रिलीज़ कर दी है। सीने में ऐसी बात मैं दबा के चली आई , खुल जाए वही राज़ तो दुहाई है दुहाई। राज़ की बात पता चली है सरकार की तिजोरी खाली हो चुकी है और अब इरादा रिज़र्व बैंक में सेंध लगाने का है। 
     कुबेर जी ऊपर बैठे भगवान से विचार विमर्श कर रहे हैं। देवी लक्ष्मी जी इस बार भारत की धरती पर दीपावली की रात गईं तो साथ धन नहीं लेकर गईं इस डर से कि कहीं चौकीदार का आयकर विभाग हिसाब पूछने लगा तो बांटने से पहले ही ज़ब्त कर अपना खज़ाना भर लेगा। ऊपर से ज़हरीली हवा और शोर के साथ नकली रौशनी की चकाचौंध में भटकने का भी खतरा था। ऐसे में अमीरों के महलों की रौशनियों में गरीबों की अंधेरी बस्तियां अपनी तरफ देखने को विवश करती हैं। भगवान हैरान है उसके नाम पर इतनी बर्बादी धन की कैसे की जा रही है जब देश की आधी आबादी बदहाली में रहती है। अधर्म है आडंबरों पर देश का धन लुटाना या भगवान के नाम की आड़ में राजनीति की रोटियां सेंकना। देखो ऐ दीवानों तुम ये काम न करो , राम का नाम बदनाम न करो। ऐसे में नारद जी भी चिंता बढ़ा गये हैं ये जानकारी देकर कि किसी ने सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर करोड़ों को पैसे देकर गुणगान को रख रखा है और हर महीना नकद राशि लेकर भक्ति हो रही है। भगवान का अपना एक भी अकाउंट किसी साईट पर नहीं है। नकली भगवान भरे पड़े हैं जिनकी गिनती ही नहीं। 
                           टीवी चैनल वालों के भी अपने अपने भगवान हैं जो झूठे विज्ञापन करते हैं कमाई करने को मगर अख़बार टीवी वालों की आमदनी विज्ञापनों से ही होती है इसलिए उनके भगवान वही हैं। महात्मा जूदेव की बात भूली नहीं है उन्होंने सालों पहले घोषित किया था स्टिंग ऑपरेशन में कि पैसा खुदा तो नहीं मगर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं। खज़ाने की बात उनसे बेहतर भला कौन जनता होगा मगर अब सरकार उनके दल की है पर उनका कोई अता पता ही नहीं है। भगवान को अभी कोई ये नहीं बता सकता कि इधर भारत देश में लोग भगवान से कई गुणा अधिक नाम किसी नेता का लेते हैं। भगवान को भी लोग लालच की खातिर रटते हैं या डर से और उस नेता को भी इसी तरह लालच या डर से लोग नाम लेते हैं। खुश है वो भी दहशत ही सही डंका बजना चाहिए। खज़ाने का क्या हुआ इस पर सभी चुप हैं सरकार खुदाई को बेकार नहीं मानती और लोगों को अभी भी बुरे दिनों से कोई राहत मिली नहीं है। घोटालों की पुरानी बात है हुए मगर साबित नहीं हुए और चोर चोर का शोर आज भी जारी है मगर पकड़ा नहीं जाता कोई भी चोर। चोर दिन दहाड़े लूट लेते हैं साधु बनकर। राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट , ये लो फिर नारद जी चले आये हैं गाते हुए। नारद जी को कौन समझाए सभी अपनी खैर मनाते हैं।

Wednesday, 7 November 2018

आवारा भीड़ का महान देश ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

   आवारा भीड़ का महान देश ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया 

            अदालत आपके घर तलवार लेकर नहीं आ सकती , अदालत देश समाज का संतुलन बनाए रखने को नियम लागू करने का निर्देश ही देती है। अपने देश की अदालत की बात की अवहेलना करना देश के साथ छल करना है। मगर हम लोग निसंकोच करते हैं मिलकर करते हैं , कोई किसी को रोकता टोकता नहीं है बढ़ावा देते हैं। मैं किसी कानून को नहीं मानता तुम भी मत मानो , सब मनमर्ज़ी करते हैं और इसे अराजकता नहीं आज़ादी कहते हैं। खुलेआम अदालतों के निर्देश की धज्जियां उड़ाते हैं तमाम लोग। सरकार प्रशासन खुद यही करता है जिसे वास्तव में बनाया ही संविधान का शासन और कानून का राज कायम रखने को है। मगर ऐसा करने के बाद भी खुद को देशभक्त कहते झिकझकते नहीं हैं न नेता न अधिकारी न ही जनता। जिस देश की हर डाल की हर शाख पर उल्लू बैठा हो उसका भला भगवान भी नहीं कर सकता। जहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा को बदल दिया जाना चाहिए। सोचिये हम क्या क्या करते हैं। भीड़ बनकर इक दहशत बन जाते हैं इंसान नहीं शैतान बन जाते हैं। कोई भी झंडा उठाकर किसी भी संगठन के नाम पर गुंडागर्दी करते हुए शान से अपराधी बन जाते हैं। भीड़ बनते ही रास्ता रोकना अत्यधिक शोर करना औरों का जीना दुश्वार करना तोड़ फोड़ करना इक आदत बन गई है और ऐसा करते हुए हम अपराधी होकर भी खुद को सभ्य नागरिक मानते हैं। 
                              हम सब धर्म की बात करते हैं भगवान को मानते हैं ऐसा दावा भी है मगर क्या हम सच में धार्मिक हैं। दिखाई देता तो नहीं है धर्म इंसानियत हमसे कोसों दूर है। जिन की हम पूजा करते हैं उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया था न ऐसा करने को कहा ही था। धर्म के नाम पर जो मर्ज़ी करना किस धर्म की किस किताब में समझाया गया है , कहीं नहीं लिखा हुआ ये सबक। ये पाठ पढ़ाने वाले नेता सरकारी लोग सामाजिक संस्थाओं की आड़ लिए अधर्मी लोग , नफरत की आग लगाने वाले स्वार्थी लोग किसी धर्म को नहीं जानते समझते। जिनको आदर्श मानते हैं उन्होंने जीवन काल में देश समाज के नियमों को कभी तोड़ा नहीं न ही अपनी सत्ता का दुरूपयोग किया। नेकी की राह पर चले हर कठिनाई को झेला मगर डगमगाए नहीं। हम उनकी तस्वीरों को पूजते हैं उनके आदर्शों को त्यागकर तो हम उनकी भक्ति नहीं उपहास करते हैं। जो लोग समझते हैं हम पैसे वाले हैं अपने पैसे से जो चाहे करें किसी को क्या वो अभिमानी और पापी लोग होते हैं। पैसा धन दौलत अथवा ताकत अनुचित करने को उचित नहीं करती है बल्कि ऐसा करने वाले उसके अधिकारी नहीं हैं इस बात का सबूत देते हैं। देश केवल धनवान लोगों का नहीं है सभी का है और सब एक समान हैं। मगर हम कोई और नियम तोड़ता है तो आलोचना करते हैं पर खुद तोड़ते सोचते तक नहीं हैं कि हम सभ्य नागरिक ही नहीं बन पाते तो देश भक्त कैसे बन सकते हैं। 
         कोई भी देश समाज वास्तविक रूप से ऊपर नहीं उठ सकता जब तक उस के लोग नियम पालन और नैतिकता की ईमानदारी की राह पर चलना ज़रूरी नहीं मानते। खेद है आज देश बदहाल है और हर दिन और भी रसातल को जाता जा रहा है मगर हम अपने अपने स्वार्थ में हठ पूर्वक अपने देश समाज को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। आज आपको इक बात याद दिलवानी ज़रूरी है कि 26 जनवरी 1950 जब देश का संविधान लागू हुआ तो उसके शुरूआती शब्द हैं वी दि पीपल ऑफ़ इंडिया , हम भारत के लोग , इस संविधान को अपना रहे हैं। हमने स्वीकार किया और हर देशवासी का कर्तव्य बन गया उसका पालन करना। मगर जिसे हमने तमाम धर्मों को दिखाने को अपनाया मगर समझा नहीं अपनाया नहीं केवल आडंबर करते हैं उस पर चलने का उसी तरह हम संविधान को अधिकार पाने तक याद रखते हैं फ़र्ज़ निभाने की बात को भूलकर। आदमी भी न रहे सब खुदा हो गये हैं , किसी को क्या खबर क्या थे क्या हो गये हैं। हक़ीक़क नहीं रहे फ़लसफ़ा हो गये हैं , हया की बात है बेहया हो गये हैं। झूठ की इब्तिदा नहीं इन्तिहा हो गये हैं , सच की बात है सब फ़ना हो गये है। जो कहीं भी नहीं हैं हर जगह हो गये हैं , बेगुनाही यही खुद गुनाह हो गये हैं। किस की बात है कैसे कहें सभी की बात है। शुरुआत किस से करें मुश्किल यही है। 

Monday, 5 November 2018

आप अपने में सिमटे सभी लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   आप अपने में सिमटे सभी लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     सभी जान पहचान वाले हैं अजनबी कोई नहीं फिर भी अनजान हैं इक दूजे से। जैसे कोई इक गली में रहे मगर घर के भीतर नहीं आता जाता बस बंद खिड़की से बाहर सुनाई देती आवाज़ या खुलते बंद होते दरवाज़े की चौखट पर खड़े होकर गुज़रने वालों से औपचारिक नमस्कार तक का संबंध रखे। मिलना होता भी है तो किसी आयोजन पर और बात होती है तो केवल बात करने को। कभी कोई ऐसा सवाल करता है जिसका अर्थ ही ख़ामोशी रखना अच्छा है या सवाल करने वाले की पसंद का ही जवाब। चुप रहता हूं जब से दुनिया की रिवायत को समझने लगा हूं। व्यर्थ है उनको समझाना कि साहित्य और समाज की बात लिखने का मकसद क्या है। लिखते नहीं आजकल कई पूछते हैं उनको मालूम ही नहीं मैं तो हर दिन लिखता हूं मगर जो उनको लगता है मैं लिखता नहीं कभी वो सब। समय बिताने को वही राजनीति की फालतू बातें अपनी अपनी समझ से समझते हुए। कोई कहता है आजकल तो बहुत पैसा लेते हैं कई कवि और सरकार से भी इनामात पाते हैं। सामाजिक सरोकार की बात कोई नहीं करता है लेखन को भी बाज़ारी चश्मे से देखते हैं जो उनको कैसे कहूं मैं क्या हूं कौन हूं क्या चाहता हूं क्या करता हूं। ऊब जाएंगे सुनकर वास्तविकता को समझना नहीं चाहेंगे। भीड़ में खोये लोग खुद ही को भुला बैठे लोग मिलते हैं मगर मुलाकात नहीं होती है। सामने होकर भी दीदार नहीं होता है शक्ल होती है किरदार नहीं होता है। इधर लोग बात भी मतलब की करते हैं मगर बातों का कोई मतलब नहीं होता है। शिक्षित होने से ज्ञान नहीं हासिल हो जाता है , जीवन का अनुभव किसी सिमित दायरे में रहकर हासिल होता नहीं है पर लोग कुवें को समझते हैं समंदर यही है जिसके मालिक हम हैं। अंतर क्या है पढ़ लिख कर भी विचारशील नहीं बनने और काला अक्षर भैंस बराबर वालों में। नफरत की आग की बात भी करते हैं तो ऐसे जैसे समाज की नहीं उपन्यास की बात हो। आंच अपने तलक पहुंचने तक सब दूर से खड़े तमाशा देखते हैं। कहने को आधुनिक साधनों ने कितना पास ला दिया है मगर भौतिक रूप से , दिल से दिमाग से सोच से पहले से अधिक बढ़ गई हैं दूरियां। समस्याएं अपनी हैं सुलझाएगा कोई और ऐसा समझते हैं। औरों को देखते हैं मगर कमियां तलाश करने को ही किसी की काबलियत को नहीं देखते और खुद अपने आप को आईने में कोई नहीं देखता है। सभी बाहर से शांत लगते हैं मगर हर कोई भीतर किसी तूफान को लिए फिरता हैं। रहते हैं जैसे अभिनय कर रहे हों जीने का जीते नहीं हैं। जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है मनोरंजन को बड़ा महत्वपूर्ण समझते हैं समय बिताने को झूठी खुशियां दिखावे की हंसी लिए रहते हैं मगर चेहरा बुझा बुझा लगता है। बीमार समाज स्वास्थ्य पर बहस करता है।

Sunday, 4 November 2018

मरना भी नहीं सीखा जीना भी नहीं आता ( मनन ) डॉ लोक सेतिया

 मरना भी नहीं सीखा जीना भी नहीं आता ( मनन ) डॉ लोक सेतिया 

   आज अपने ही कुछ शेर और कुछ विचार ज़िंदगी से मौत तक के सफर को समझने के लिए। बचपन था तो ज़िंदगी गले लगाती थी शायद हमसे ही भूल हुई जो उसकी अहमियत जानी ही नहीं। धीरे धीरे दूरियां बढ़ती गईं हमारी ज़िंदगी से दूर हम खुद हुए और इल्ज़ाम देते रहे ज़िंदगी को। आज स्मार्ट फ़ोन पर ज़िंदगी से विडिओ कॉल करते हैं।  सोशल मीडिया पर संदेश भेजते हैं मगर आमने सामने मिलती नहीं ज़िंदगी। इक मतला और इक शेर यूं है।
                  बस मुहब्बत से उसको शिकायत रही , इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही।
                  उड़ गई बस धुंआ बन के सिगरेट का , राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही।
ज़िंदगी को समझ सके नहीं हम भी और दुनिया ने भी समझाया नहीं इक सबक जो प्यार वाला ज़रूरी था। देर बहुत हो गई तब समझ आया कि जो प्यार करते थे सभी कुछ देकर हमें कहीं जाते रहे। 
और हम बेगानों को अपना बनाने में उम्र गंवाते रहे। इक मतला और इक शेर और ऐसे कहा है। 

                     उसको यूं हैरत से मत देखा करो , ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है। 
                 काफ़िले में चल रहे हैं साथ साथ , अपनी अपनी फिर भी तन्हा शाम है।
ये भी कैसी अजीब बात है मौत मांगते हैं सभी मरना चाहते नहीं लोग। मौत को पास जाकर देखते तो पता चलता कितनी प्यारी है। मौत से लोग डरते रहे और मौत का डर दिखाते रहे जबकि।

                 मौत तो दरअसल एक सौगात थी , हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया। 
                           शिकवा तक़दीर का करें कैसे , हो खफ़ा मौत तो मरें कैसे।
नहीं सीख पाये जीना हम फिर भी जीते रहे जैसे कोई गुनाह करते रहे। कोई तलाश थी जो अधूरी रही। कुछ शेर कहना चाहता हूं। 

                  मिलने को दुनिया में क्या न मिला , मझधार में नाखुदा न मिला।
                  ढूंढा किताबों में हमने मगर , जीने मरने का फ़लसफ़ा न मिला।
                  मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी , दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी। 
                  मुस्कुराती सुबह आती है मगर , फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी। 
                  है कभी फूलों सी कांटों सी कभी , नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी। 

शायद तीस साल पहले अपनी वसीयत इक ग़ज़ल की शक्ल में लिखी थी जो मुझे मालूम है नहीं संभव हो सकता। भला दुनिया होने देगी ऐसा कोई किसी की मौत का जश्न मनाये इसे मंज़ूर करे। फिर भी हाज़िर है। 

( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।  

अलविदा ज़िंदगी 

और कब तलक मुझे 
रोके रहोगी प्यार से 
जाने भी दो अब तो 
शाम ढलने लगी है। 

न शिकवा न गिला है 
बहुत है जितना मिला है 
थक गया हूं चलते हुए 
खत्म अपना सिलसिला है।
 

Thursday, 1 November 2018

नीम हकीम खतरा ए जान बनाम सोशल मीडिया ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     नीम हकीम खतरा ए जान बनाम सोशल मीडिया ( आलेख )

                                    डॉ लोक सेतिया  

       मैं जो कहूंगा सच कहूंगा सच के इलावा कुछ नहीं कहूंगा। ये कहना ज़रूरी है आज जब खुद अपनी ही नासमझी नहीं मूर्खता की बात बतानी है। अपनी मूर्खता कोई किसी को बताता है भला , सब छुपाते हैं। हर गलती होने पर सबसे पहले यही सोचते हैं धन्यवाद भगवान का कोई देख नहीं रहा किसी को पता ही नहीं चलेगा कि मुझसे ये भूल हुई। बात सोशल मीडिया की है और शायद इससे अधिक मूर्खता क्या हो सकती है कि खुद एक डॉक्टर होने और बाकी दुनिया को समझाते रहने कि अपने ईलाज खुद नहीं करें न हर किसी की सलाह से विशेषकर टीवी अख़बार के विज्ञापन से कभी अपना उपचार करें। मैंने खुद इतनी बड़ी गलती की। एक बात सबसे पहले कहना मेरा कर्तव्य है कि बेशक हर समाज के भाग की तरह चिकिस्या व्यवसाय में भी कुछ कमियां आई हैं बदलते समय में फिर भी ये बात हम सभी को माननी चाहिए कि हर डॉक्टर चाहता है और पूरी कोशिश करता है अपने रोगी को ठीक करने को। कोई नहीं कह सकता कि कोई डॉक्टर अपने रोगी को ठीक करना नहीं चाहता। वास्तव में अधिकतर जैसा माना जाता है कि डॉक्टर अधिक पैसे लेते हैं या लेना चाहते हैं उस में भी तथ्य नहीं है और सामान्यता ऐसा नहीं होता है। बल्कि शायद हम ही अपनी जान की कीमत कम समझते हैं और पैसों की अधिक। आज शायद मेरे साथ आपको भी अपने उन सभी डॉक्टर लोगों का आभार व्यक्त करना चाहिए जिन्होंने कितनी बार आपको स्वस्थ किया निरोग किया रोग होने पर। 
          ये अच्छा है तब सोशल मीडिया नहीं था और मुझे पता था कि बेशक खुद डॉक्टर हूं मैं फिर भी अपने ईलाज अपने आप नहीं करना चाहिए और 1990 में मैं इक विशेषज्ञ से मिला और जांच करवाई जिस से मालूम हुआ कि मेरा कोलेस्ट्रॉल बहुत बढ़ा हुआ है और मुझे बहुत एतिहात बरतने की ज़रूरत है। 27 साल तक मैंने उनकी अथवा किसी और विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह ली और समस्या होने पर फिर से तंदुस्त हो गया। केवल हृदय की नहीं अन्य भी जीवन की स्वस्थ्य संबंधी समस्याओं में मुझे चिकित्स्कों की सलाह से स्वास्थ्य लाभ हुआ है। अक्सर हम दवा के साइड इफेक्ट्स की बात करते हैं जबकि उनसे डरने या घबराने की नहीं सचेत रहने की ज़रूरत होती है। सही डोज़ में डॉक्टर की सलाह से दवा लेना कभी अहितकर नहीं होता है। मगर साल पहले इक वीडियो से प्रभावित होकर मैंने बहुत बड़ी गलती की , जो दवा सालों से लेकर तंदुरस्त रहा उसको बंद कर दिया था क्योंकि उस वीडियो में जानकारी दी गई थी कि अधिक कोलेस्ट्रॉल होने से कोई समस्या नहीं होती है और ऐसा कुछ दवा बनाने वाली कंपनियों ने अपनी दवा बेचने को किया है। मैंने नासमझी में मूर्खता की और सोचा कि जब मेरा कोलेस्ट्रॉल बिल्कुल ठीक है तो दवा बंद कर देता हूं। मगर साल बाद ही मैं उसी मोड़ पर पहुंच गया जहां 1990 में 28 साल पहले था। अब जांच करवाई तो पता चला कि अपना ईलाज बिना अपने डॉक्टर की राय करने का नतीजा क्या होता है। धन्यवाद मेरे सभी डॉक्टर्स का मुझे हर बार उचित उपचार और सलाह देने के लिए। आज अपना ही लिखा पुराना लेख फिर याद आया है जो नीचे लिख रहा हूं।     
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  आप अपने डॉक्टर नहीं बनें ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       शायद सब कुछ उतना आसान होना मुमकिन नहीं जितना हम चाहते हैं। मेरे पास कई बार लोग आएं हैं इंटरनेट से किसी रोग बारे जानकारी हासिल कर अधकचरी जानकारी से कोई गलत नतीजा निकाल कर। मैंने हर बार उनको भी और कई बार कहीं भी या फोन पर ही अपने रोग का उपचार पूछने वालों की आगाह किया है कि अपनी जान की कीमत को समझें और इस तरह उपचार नहीं कराएं। पिछले साल मुझे जब लगा लोग आयुर्वेद के लेकर ठगी का शिकार हो रहे हैं तब मैंने सभी को निस्वार्थ सलाह लेने को अपना नंबर भी दिया और इक पेज पर आयुर्वेद की जानकारी और बहुत ऐसी समस्याओं का निदान भी बताना शुरू किया। मगर तब भी अधिकतर लोग चाहते थे उनको बिना किसी डॉक्टर से मिले घर बैठे दवाएं मिल सकें। अर्थात जो उचित नहीं मैं समझाना चाहता था लोग मुझ से भी वही चाहते थे। शायद कोई ऐसे में अपनी दुकानदारी कर कमाई भी कर सकता था , मगर मुझे लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर पैसे बनाना कभी मंज़ूर नहीं रहा। आजकल देखता हूं हर कोई हर समस्या का समाधान गूगल से खोजने लगे हैं। मगर रोग और चिकिस्या बेहद संवेदनशील विषय हैं। सवाल ये नहीं कि इस से डॉक्टर्स हॉस्पिटल या नर्सिंग होम को कोई नुकसान हो सकता है , सवाल ये है कि खुद जो इस तरह उपचार करेंगे उनका भला इस में है भी या नहीं। आप अगर कभी किसी भी दवा को लेकर सर्च करें तब आपको कठिन ढंग से इतना कुछ मिलेगा कि आप घबरा जाओगे और कोई भी अलोपथी की दवा नहीं लेना चाहोगे। मगर असल में कितने लोग इस सब को पढ़ कर समझ सकते हैं , मेरा विचार है अधिकतर बस रोग और दवा का नाम और किस मात्रा में खानी पढ़कर उसे अपने पर इस्तेमाल करते होंगे। जब कोई आस पास क्या राह चलता भी बताता है किसी रोग की दवा तब भी लोग बिना विचारे अपने पर आज़मा लेते हैं तब गूगल का नाम ही उनको प्रभावित करने को काफी है। कल ही मैंने इसी तरह इक नई दवा की जानकारी ढूंढी जो दिल्ली के इक बड़े संस्थान के डॉक्टर मेरे परिवार के इक सदस्य को लिख रहे थे , तब मैं हैरान हो गया ये पढ़कर कि तमाम रोगों पर काम करती है की बातों के आखिर में लिखा मिला अभी तक ये किसी ने विधिवत रूप से प्रमाणित किया नहीं है। ये शब्द आने तक मुझे लग रहा था जैसे ये कोई संजीवनी बूटी है राम बाण दवा है। लेकिन आखिरी शब्द मुझे डराते हैं क्योंकि वहीं उस दवा के तमाम ऐसे दुष प्रभाव भी थे कि इस से अमुक अमुक गंभीर रोग हो सकते हैं। इसलिए मुझे लगा लोगों को इस बारे सावधान किया जाना चाहिए। बेशक लोग विवश हैं क्योंकि देश में न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की खराब दशा है बल्कि जब मिलती भी है तो अनावश्यक रूप से महंगी और केवल पैसे बनाने के मकसद से न कि ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने को लोगों को रोगमुक्त स्वास्थ्य जीवन जीने के लिए। फिर भी ये तरीका कदापि सही नहीं है।

Tuesday, 30 October 2018

ऊपर वाले का नया नोटिस ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

      ऊपर वाले का नया नोटिस ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

      लिखा है तुझे पहले भी कितनी बार नोटिस भेजा है , रिमाइंडर भी अनेक भेजे हैं , तुम में एक बात अच्छी है कि पढ़ते ज़रूर हो और सोचते भी हो मेरे भेजे हर नोटिस पर , अन्यथा तो लोग पढ़ते ही नहीं समझना तो दूर की बात है। फिर से याद दिलवा रहा हूं जिस काम को तुझे दुनिया में भेजा था मैंने अब तो वो काम कर लो। अभी तक मनमानी करते रहे हो। अब आप बताओ मुझे क्या करना चाहिए। सरकारी नोटिस का नोटिस सभी लेते हैं क्योंकि उस में साफ चेतावनी लिखी होती है दंड की सज़ा की जुर्माना लगाने की। कोई पता भी नहीं जवाब किस तरह भेजा जाये कि मुझे अपने किसलिए दुनिया में भेजा था कभी बताया ही नहीं। अपना तरीका बदलो और जब भी जिसको धरती पर भेजो साथ में विस्तार से लिखित सूचना भी नत्थी करो कि इसका जन्म किस मकसद से हुआ है। मैंने तो हर दिन विचार किया है और हमेशा मुझे यही लगा है कि मेरा जन्म बेमकसद ही हुआ है और मुझे बेमकसद यही लिखने का काम करना है जिस से किसी को कोई ख़ुशी नहीं होती न कोई फर्क ही पड़ता है। कुछ भी और मुझे आता ही नहीं है। शायद भगवान की भक्ति या कोई अच्छे काम करने की बात कहना चाहते हो तो मुझसे होता नहीं है कि देश समाज में जो भी होता रहे उसको अनदेखा कर मैं किसी की भक्ति स्तुति गुणगान करता फिरूं। और लोग बहुत हैं मुझे रहने दो जैसा भी हूं।
    अक्सर सुनता रहता हूं ऊपर वाले का बुलावा आने की बात से डरते हैं सभी। मज़ाक की बात नहीं मैंने तो हमेशा चाहा है बुला ले जब मर्ज़ी क्या करना है बहुत जी लिये हैं। पर इतना तो है सोचता हूं मरने के बाद ही सही सामने आओगे नज़र तो बात तो करनी है। मेरा हिसाब लिखा हुआ है कभी अपना भी हिसाब सोचा क्या किया है दुनिया बनाकर उसकी देखभाल करना ही याद नहीं रखा। दुनिया बनाई थी कितनी अच्छी थी सुंदर थी फिर उसको क्यों बेकार नफरत झगड़े स्वार्थ दुश्मनी जैसे रोगों से खराब होने दिया। बस यही सोच कर खुश हो लेता हूं जैसे भी सही तकलीफ देकर नोटिस भेजकर ही सही ऊपर वाले को याद तो है कि इक इंसान है जिसे जन्म दिया है और वापस भी बुलाना है। मगर ये सरप्राइज की आदत का खेल किसलिए पहले से बताया होता एक्सपायरी की तारीख क्या है तो जो नोटिस भेजने से नहीं होता बिना किसी नोटिस मुमकिन है संभव हो जाता। कब आना है बताओ या अब बुला भी लो , कितनी लंबी आयु बस अब काफी है।

Monday, 29 October 2018

अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूंढो - जीने का सलीका - डॉ लोक सेतिया

        अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूंढो - 

                               जीने का सलीका - डॉ लोक सेतिया

      आज अपने अनुभव की बात , ज़िंदगी जीने का ढंग। जैसे सबको किसी की तलाश होती है कोई अपना जो समझे जो प्यार करे जो अपनाये जो दुनिया के ग़म दुःख दर्द भुला दे। हैं ऐसे लोग मगर आस पास मिलते नहीं हैं जिनको मिलते हैं बहुत खुशनसीब होते हैं। अधिकतर नाते रिश्ते शर्तों से बंधे होते हैं और शर्तों पर जीना तो बार बार मरना होता है। समझाते समझाते ज़िंदगी बीत जाती है। मुझे नहीं मिला कोई अपना जो समझता मगर मुझे फिर भी अगर किसी ने संबल बनकर ज़िंदा रखा है तो सबसे पहले संगीत ने और उसके बाद साहित्य लिखने पढ़ने ने। किताबों में आपकी हर समस्या का हल है हर सवाल का जवाब है कभी तलाश कर के देखना। सोचना जब भी आप वास्तव में अकेले होते हैं आपकी तनहाई का साथी हमेशा किताबें या संगीत हो सकते हैं। शीर्षक ही इक गीत से लिया हुआ है पूरा अंतरा यूं है। 

               ज़माने वालों किताबे ग़म में ख़ुशी का कोई फ़साना ढूंढो ,

                अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूंढो। 


  जीने की राह , फिल्म का नाम भी यही है। ऐसा भी नहीं कि आशावादी गीत ही आपको जीना सिखा सकते हैं , अक्सर दर्द भरे गीत भी इक सुकून थोड़ी राहत का अनुभव ही नहीं देते अपितु आपको समझ आता है कि शायद आपसे अधिक दुःख दर्द और लोग भी झेलते हैं सहते हैं। मैंने हमेशा उदासी निराशा अकेलेपन में पुराने गीत सुने हैं गुनगुनाए हैं और मुझे जैसे इक नई आशा इक उमंग मिलती रही है। मरने का सलीका आते ही जीने का शऊर आ जाता है। एक लाइन कितना कुछ कह जाती है। इक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफसाना , ऐ मेरे दिले नादां तू ग़म से न घबराना। हमने उन किताबों को पढ़ना छोड़ दिया है जो जीने का पाठ पढ़ाया करती थीं या फिर आज भी पढ़ा सकती हैं। किसी ने समझाया ही नहीं कि महीने में ही सही एक किताब साहित्य की खरीदी जाये और अच्छी तरह उसे पढ़ा जाए। शिक्षित होने का अर्थ पढ़ना लिखना छोड़ देना तो नहीं हो सकता , और जिनको पढ़ना उकताता है उन्होंने पढ़ा जितना भी समझा नहीं है। पढ़ने का मज़ा ही तभी आता है जब आप समझते हैं। यही संगीत की बात है जब तक शब्दों के भावार्थ आपको भीतर तक महसूस नहीं होते संगीत और शोर एक जैसे हैं। मुझे जिन फ़िल्मी गीतों से चैन मिलता है वो कुछ इस तरह हैं। 
           ओ माझी चल , रात भर का है महमां अंधेरा , किस तरह जीते हैं ये लोग , अपने लिए जिए तो क्या जिए , किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , कोई जब राह न पाए मेरे संग आये की पग पग दीप जलाये मेरी दोस्ती मेरा प्यार। मुझसे नाराज़ हो तो हो जाओ , आप अपने से तुम खफ़ा न रहो। न सर झुका के जिओ और न मुंह छिपा के जिओ। साहित्य कला संगीत वास्तव में रंग भरते हैं ज़िंदगी में बेरंग जीवन किसी अभागिन महिला की तरह होता है। इक बात को समझना ज़रूरी है कोई भी किसी का साथ हमेशा नहीं निभा सकता है , कभी न कभी किसी न किसी मोड़ से रास्ते बदलते रहते हैं। जब तक हम इस जीवन की वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते हैं हम दुःख दर्द को खुद जकड़े रहते हैं। जिस का साथ जितना रहा उसी को बहुत समझना ज़रूरी है कोई जब अनचाहे साथ निभाता है तो बनावटीपन होता है जीवन में वास्तविकता बचती नहीं। सब से पहले खुद अपने आपको तलाश करना और अपने संग रहना आना चाहिए। चल अकेला चल अकेला चल अकेला , तेरा मेला पीछे छूटा रही चल अकेला। सब से महत्वपूर्ण बात इक ग़ज़ल से समझी जा सकती है। 

जब किसी से कोई गिला रखना , सामने अपने आईना रखना। 

मिलना जुलना जहां ज़रूरी हो , मिलने जुलने का हौसला रखना। 

घर की तामीर चाहे जैसी हो , उस में रोने की इक जगह रखना। 

और भी ग़ज़लें हैं जो आपके काम आती हैं जब कोई आपके साथ नहीं होता है। 
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये , घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये।

Sunday, 28 October 2018

काली पहाड़ी के पीछे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       काली पहाड़ी के पीछे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है इधर उधर तथाकथित महानयक उपदेश देते हैं। जो भी चाहिए सब ऑनलाइन ऐप्प पर मिलता है। खलनायक ने आज़ादी को अपने कब्ज़े में कर लिया है और सोशल मीडिया पर खुलेआम घोषणा की है जिसको आज़ादी को आज़ाद करवाना है फिरौती देकर ले जाये। जगह वही जो हर हिंदी फिल्म में रही है काली पहाड़ी के पीछे। शोर मच गया है गब्बर सिंह ज़िंदा है और उसने बंधक बना लिया है हमारी आज़ादी को। हर चैनल अपने ढंग से बहस करवा रहा है , कोई अफवाह बता रहा है कोई वीडियो दिखा रहा है। सरकार अभी तथ्य पता लगा रही है उसकी कड़ी निगाह पल पल की घटना पर है। लोग फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर दहाड़ रहे हैं अपने अपने ज्ञान बघार रहे हैं। गूगल पर तलाश की जा रही है वो काली पहाड़ी , पहाड़ ही पहाड़ हैं हरियाली है रंग बिरंगे पत्थर हैं टूटी फूटी सड़कें हैं टेड़े मेड़े रास्ते हैं कुछ रेत वाले टीले भी हैं जो पहाड़ जैसे लगते हैं। काली पहाड़ी मिल नहीं रही है , चलो उसी महानयक से पता करते हैं उसने कई बार अपनी फ़िल्मी नायिकाओं को बचाया है। हंस कर सवाल उड़ाया है जवाब दिया है काली पहाड़ी काली ही है ऐसा कब किसी ने कहा आपको। आप जिस किसी पहाड़ी को काली पहाड़ी नाम देकर बुला सकते हैं। मेरी हर फिल्म में महानगर की सीमा पर जंगल और काली पहाड़ी होती थी आपने अपने गांव शहर में कोई जंगल कोई पहाड़ रहने दिया हो तो दिखाई देती काली पहाड़ी। फिर भी उनकी ऐप्प ने इक काली पहाड़ी ढूंढ ही ली। अब समस्या ये है कि उसका अगला भाग किधर है और पिछले कौन सा है। पूरी गोलाई में ऑनलाइन तलाश किया तो हर तरफ से इक जैसी दिखाई देती है। समस्या खड़ी हो गई है कि पहाड़ी के एक तरफ कोई देश है दूसरी तरफ कोई दूसरा देश है और दोनों देशों से हमारा संबंध बिगड़ा हुआ है। हम उन दोनों देशों को बता भी नहीं सकते कि हमने उस पार आकर अपनी आज़ादी को छुड़वाना है। सर्जिकल स्ट्राइक भी नहीं की जा सकती क्योंकि आज़ादी को खतरा है। 
                           अभी तक आपको ये काल्पनिक बात लग रही है तो चलो आपको आपकी वास्तविकता दिखाते हैं। घर की छत पर खड़े पकड़ो पकड़ो चिल्लाते हैं डरते हैं बाहर निकलना तो दूर छत से नीचे भी नहीं आते हैं। गुंडे बदमाश आतंकवादी जब चले जाते हैं आप तब सोशल मीडिया पर अपनी बनाई वीडियो वायरल कराते हैं और अपनी कायरता पर इतराते हैं। चोर चोर का शोर मचाते हैं मगर ऐसा कर चोरों का हौंसला बढ़ाते हैं। शेरदिल हैं सोशल मीडिया के पर शाम को घर में दुबक जाते हैं अंधेरे में अपने ही साये से डर जाते हैं घबरा कर भूत भूत चिल्लाते हैं। बात को और नहीं बढ़ाते हैं आईये आपको काली पहाड़ी की कथा की असलियत समझाते हैं। हम लोग समझते हैं हम अपनी सरकार बनाते हैं मगर दो दिन बाद खुद ही बतलाते हैं किस दल की किस नेता की सरकार है समझते समझाते हैं। उसके बाद हम सभी पछताते हैं मगर नेता लोग नाचते गाते जश्न मनाते हैं। जो कोई अधिकार की बात करता उसको आंखें दिखाते हैं। सत्ता पाकर सभी नेता एक जैसे हो जाते हैं , खलनायक बनकर आज़ादी को हमारी छीन कर अपना बंधक बनाते हैं। पांच साल किस तरह शासन चलाते हैं आज आपको सामने दिखाते हैं , क्या आपको हर दिन विज्ञापन नज़र आते हैं। मगर विज्ञापन की रोटी पानी भूख प्यास तो नहीं मिटाते हैं। धोखा देते हैं नेता हम धोखा खाते हैं। अब साफ सीधी बात पर आते हैं। सब पुरानी कहानियां दोहराते हैं , पहले वो करते थे अब ये कर दिखाते हैं।
          जो भी मुख्यमंत्री बनता है या प्रधानमंत्री बनाया जाता है , हर सप्ताह कभी इधर कभी उधर जाते हैं। मकसद देश या राज्य की वास्तविकता समझना या देखना नहीं होता है , अपनी महत्वाकांक्षा अपना वर्चस्व अपना विस्तार बस यही ध्येय बन जाता है। सच तो ये भी है इनको समाज की असलियत से नज़रें चुराना होता है सावन के अंधों को हर तरफ हरा भरा दिखाना होता है। आम जनता से बात होती नहीं है विरोध करने की अनुमति मिलती नहीं है। अधिकारी सब काम छोड़ इनके दल के आयोजन और सरकारी आयोजन का भेद भूल जाते हैं। सत्ताधारी नेताओं की आये दिन की सभाओं पर सरकारी साधन बर्बाद किये जाते हैं। कोई नियम कायदा नहीं लागू होता है। हर दिन अधिकारी कर्मचारी अनावश्यक सभाओं में लगे रहते हैं अपना कर्तव्य छोड़ कर। हम लोग उनकी तमाम गलत बातों पर खामोश रहते हैं सवाल नहीं करते क्या इसे जनता की सेवा कहते हैं। नेता जब जिस भी शहर जाते हैं कुछ लोग अधिकार मांगने नहीं खैरात लेने की तरह जाते हैं। अपना स्वार्थ पूरा होने पर खुश हो जाते हैं , बाकी हर तरफ कितना गलत है भूल जाते हैं। बड़ी बड़ी बातें करते हैं मगर इतना नहीं हिसाब लगाते हैं ये नेता आए दिन हमारा पैसा अपने मकसद को फज़ूल उड़ाते हैं।
         सत्ता पाकर आज़ादी पर डाका किसने डाला है देश का यही सबसे बड़ा घोटाला है। हर नेता को अपने दफ्तर में रहकर काम करना चाहिए। अपने बड़ी बड़ी कंपनियों के चलाने वालों को कभी इस तरह बेकार आते जाते देखा है , हर शहर उनका कारोबार है अधिकारी नियुक्त हैं सब काम की जानकारी लेते हैं। अगर इस तरह अपने अधिकारीयों कर्मचारियों को अपने आने जाने के आयोजन पर लगाएं और पैसा उड़ाएं तो कंगाल हो जाएं। मगर यहां नेता अधिकारी देश और जनता के धन को समझते हैं चोरी का माल है जितना खा जाओ सब हलाल है। इतना बड़ा देश इतने संसाधन होते भी घाटे में इसीलिए जाता है क्योंकि हर शासक लूटता है और लुटवाता है। लूट के माल का कोई भी नहीं रखा बही खाता है। अभी भी नहीं समझा जो अनाड़ी है , आपके सामने जो है यही काली पहाड़ी है।
         

Saturday, 27 October 2018

सीबीआई मार्का पटाखों की गूंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सीबीआई मार्का पटाखों की गूंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      आधी रात को गूंज दूर तक जाती है तभी सरकार ने आधी रात को सीबीआई मार्का पटाखों को आज़मा कर देखा। अदालती आदेश है दीपावली पर ऐसे पटाखे चलाए जाने चाहिएं जो कम प्रदूषण करें अब इन से कोई प्रदूषण हुआ ही नहीं और धमाका देश भर में अभी भी गूंज सुनाई दे रही है। आप बेकार चिंता मत करो कितनी संस्थाओं का क्या हाल है जब देश बदहाल है तो ये सभी देश से अलग भला कैसे रह सकते हैं। क्या ये सरकारी दीवाली थी या दिवालिया घोषित करना ये बहस करते रहेंगे जिनको आदत है चिंता करने की। चिंताराम की चिंता करने से कोई समस्या हल हुई कभी। सकारात्मकता तलाश करना आना चाहिए दशहरा से अनहोनी की चिंता होने लगी थी। आपको वास्तविकता अभी तक भी शायद समझ नहीं आई है। जिस इमारत को समझा गया था ऐसे पत्थर की बनी हुई है कि कभी दरार तक नहीं आएगी , ज़रा से तपिश में पिघल रही है मोम की तरह। सरकारी संस्थाओं की मज़बूती ऐसी ही होती है रावण के ऊंचे बुत को दो पल नहीं लगते ख़ाक होते समय। जिसका दावा था सबसे भरोसे की नींव पर बनाया गया है उसी में हर कोई भरोसा तोड़ता मिला। मेरे दोस्त जवाहर लाल ज़मीर जी का शेर है शायद दिल्ली की बात लगती है। 

       इक फूल को छुआ तो सब कागज़ बिखर गए , तुम कह रहे थे मेरा बहारों का शहर है।

यहां तो फूल तक पत्थर के होते हैं राजधानी में दिखावे को लगते हैं असली जैसे मगर खुशबू नहीं होती न ही कोमलता का एहसास होता है। दूर से दर्शन करो यही अच्छा है हाथ लगाओ तो घायल भी हो सकते हैं। अब हर राज्य अपने अपने विभाग को निर्देश जारी करने वाला है कि आप भी ऐसे धमाके करके दीवाली मनाओ। सीबीआई के पटाखे ही नहीं मिठाईयां भी मंगवाओ। त्यौहार है सब मिलकर मनाओ नाचो गाओ। अभी तो अपने सैंपल देखे हैं अभी तो फिल्म बाकी है ये केवल ट्रेलर था। अगले महीने रिलीज़ होगी सारी फिल्म और सुपर डुपर हिट होनी तय है। ठगज़ ऑफ हिंदुस्तान के बाद इसकी बारी है आमिर खान की चिंता बढ़ गई होगी। अभी तक मामला चोर पुलिस वाला था जो वास्तव में चोर चोरी और चौकीदार था मगर किसी को खबर नहीं थी। बात निकलती है तो कितनी दूर तलक जाएगी ये शायद खुद बोलने वालों को खबर नहीं होती। काहे को लफड़ा किया अंदर बैठ चुपचाप सुलटा लेते तो ऐसी छीछालेदारी तो नहीं होती। नाम कमाने में सालों लगते हैं नाम मिटाने को इक लम्हा भी नहीं। आज जो लिखी है लघुकथा लगती है , कल यही कहानी बनेगी और बाद में इसी का उपन्यास बनाया जाएगा। अभी थोड़ा रुकना चाहिए तमाशा शुरू हुआ है खत्म नहीं होने वाला जल्दी से। मध्यांतर।

Friday, 26 October 2018

साधु और शैतान की नई कथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    साधु और शैतान की नई कथा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      बात शुरु तो नन्हा फरिश्ता से करना चाहता था जिस में तीन खूंखार डाकू इक नहीं सी बच्ची के कारण इंसान बन जाते हैं। मगर ऐसा मुमकिन नहीं है क्योंकि संवेदना बची नहीं है समाज में। बात साधु और शैतान से शुरू करनी पड़ रही है जबकि वास्तव में इधर साधु भी साधु बनकर शैतान को भी सोचने पर विवश कर रहे हैं कि इनमें कोई विवेक कोई अंतरात्मा नाम का कुछ नहीं है। अन्यथा ऐसा कैसे संभव है कि ये सब अंधे हो कर अपनी ख़ुशी अपने स्वार्थ के लिए धन दौलत सत्ता धर्म नियम कानून हर चीज़ का गलत इस्तेमाल करें। और ये सब घोर पाप अपराध करने के बावजूद धार्मिकता का चोला पहने हुए हों। जिस देश की पुरानी परंपरा और गुरुकुल की शिक्षा की बात करते हैं जब भारत विश्वगुरु कहलाता था और लोग ज्ञान पाने को आते थे उस समय की शिक्षा और उन सभी वेदों ग्रंथों उपनिषदों नीतिशास्त्र की किताबों की बातों को पढ़ना तो क्या उन पर चिंतन करना भी छोड़ दिया है। आज उन्हीं किताबों की कथाओं का सार निचोड़ इस अध्याय में आधुनिक संदर्भ में बताया जाएगा। 
                              पाप क्या है पापी कौन है अपराध किसे कहते हैं हर शब्द की व्याख्या है। लोग भूख से मरते हैं मगर सत्ता पर बैठे व्यक्ति को कोई एहसास नहीं होता है और वो खुद अपने पर बेतहाशा धन सुःख साधनों पर अपने नाम के गुणगान और शोहरत हासिल करने पर खर्च करता है तो ऐसा करना गुनाह है। जो शासक जनता को वादे करता है उनकी भलाई करने के मगर उस पर खरा उतरता नहीं है बल्कि उन वादों को भूलकर विपरीत आचरण करता है केवल अपने चाटुकार लोगों को पदों पर बिठाता है और अपने ख़ास लोगों को अनुचित ढंग से फायदा पहुंचाने को हर नियम कायदा ताक पर रख देता है वो अधर्मी शासक है। जो धनवान अपने धन को केवल और अधिक बढ़ाने का काम करते हैं हर किसी से लूट लेना चाहते हैं और जिनकी पैसे की हवस खत्म होती ही नहीं है उनकी गरीबी सबसे अधिक है और ऐसी कमाई कभी खुद उन्हीं के विनाश का कारण बनती है। जिस के पास अपनी ज़रूरत से अधिक धन होता है उसको उसका उपयोग लोगों की सहायता और समाज कल्याण में करना चाहिए वास्तव में दीन दुखियों की सहायता कर के न कि आडंबर कर दिखावे को दान आदि देकर। रहीम के दोहे के अनुसार " देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन "। दान या सहायता दाता बनकर नहीं ये विचार कर करनी चाहिए कि ईश्वर ने दिया है मुझे तो माध्यम बनाया है कोई आदमी दाता नहीं हो सकता है। 
               अपराधी कौन हैं इसकी भी व्याख्या की गई है। आपको ओहदा मिला अधिकार मिले मगर आप देश या समाज के लिए पूरी लगन और ईमानदारी से कर्तव्य पालन नहीं करते हैं तो आप अधिकारी या डॉक्टर शिक्षक उद्योगपति बनकर भी अज्ञानी और अत्याचारी हैं जो काबिल होकर भी नाकाबिल हैं क्योंकि जो करना फ़र्ज़ है उसे नहीं करते और जो कभी नहीं करना वही करते हैं। अगर ऐसा करने के बाद आप खुद को आस्तिक मानते हैं तो इससे बड़ा छल कपट और कुछ नहीं हो सकता है। डॉक्टर का पहला काम उपचार करना है उसके बाद उचित कमाई की बात। शिक्षक जब ज्ञान का कारोबार करता है तो गुरु कहलाने का हक नहीं रह जाता है उसको भटका हुआ अज्ञानी समझना चाहिए। अधिकारी बनकर देश और समाज को अच्छा शासन नहीं देकर अधिकारों का दुरूपयोग करने वाला चोर डाकू और अन्यायी बनकर भगवान की अनुकंपा का निरादर करता है। 
               धर्म कोई इमारत का नाम नहीं है , मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे बनाना धर्म है ऐसा किसी किताब में लिखा नहीं है। हर धर्म संचय नहीं करने और जो पास है उसे गरीबों की दुःखियों की बेबस लोगों की सहायता में खर्च करना चाहिए यही समझाता है। पत्थरों में नहीं भगवान इंसानों में देखना चाहिए और धर्म के नाम पर धन दौलत सोना चांदी हीरे जवाहरात का अंबार जमा करना तो अधर्म हो सकता है धर्म नहीं। अब विचार करना होगा कौन कौन है जो साधु होने का दम भरता है मगर काम शैतान से भी बढ़कर गंदे करता है। शायद हर किसी ने समझ लिया है उनकी वास्तविकता कोई नहीं जानता और भगवान भी उनकी दिखावे की भक्ति और पूजा पाठ से खुश होकर उनके पाप अपराध क्षमा कर देगा। मगर ऐसा नहीं है ऊपर वाला कोई रिश्वतखोर या अपनी स्तुति से खुद होने वाला हम लोगों जैसा आदमी नहीं है और उसको कोई कुछ भी नहीं दे सकता है न ही उसको किसी से कुछ भी चाहिए। उसका हिसाब सच्चाई और झूठ को तोलना और अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब करना है। देर है अंधेर नहीं है और शायद अब अधिक देर तक ईश्वर भी ये होने नहीं दे सकता है।  
  

Wednesday, 24 October 2018

तोता मैना की कहानी नया अध्याय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  तोता मैना की कहानी नया अध्याय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          जब से देश में घोटाले होने लगे तभी से सरकार ने इक तोता पाल रखा था। कथावाचक तोता जो लिखा हुआ मिलता उसे बांचता था। कभी किसी ने दक्षिणा पर सवाल नहीं उठाया मामला जितना बड़ा दक्षिणा  उतनी अधिक। कथावाचकों  का झगड़ा कोई अनहोनी बात नहीं है कथावाचक आरोप लगाते रहते है सरकार बीच बचाव करती और किसी को खबर नहीं होती। नये नेताजी को उस तोते पर भरोसा था जो बीस साल से उनकी पसंद की कथा पढ़ता रहा था। मुश्किल सामने आई कि तोता अनुभव में कम था और उस से अधिक अनुभवी कथावाचक तोते पहले से विभाग में थे। मगर बीच का रास्ता तलाश किया और अपने तोते को दूसरे नंबर पर बराबरी के अधिकार देकर नियुक्त किया और पहले पर भी अपनी पसंद का थोड़ा अनुभवी तोता रख लिया। जो काबिल और अनुभवी थे उनको रखना मुश्किल था क्योंकि उनको पुरानी कथा कंठस्त थी मगर सत्ता को अपनी लिखवाई किताब की कथा बंचवानी थी। सरकार ने उन दोनों को अपनी पसंद की कथा समझा दी थी और उनको पढ़नी भी आ गई थी। ऐसे में कोई नया घोटाला सामने आने को था जो नज़र आता भी छुप जाता भी। ऐसे कठिन समय में दो कथावाचक खुद को देशभक्त और दूसरे को देशभक्त नहीं चोर है का आरोप लगाने लगे। चोरी हुई सब जानते हैं मगर चोरी का माल बरामद नहीं हो सकता था। ज़रूरत थी उस पुरानी वाली देशभक्ति की किताब की मगर उसको पहले ही नष्ट किया जा चुका था ऊपरी आदेश से। फिर भी किताब तलाश करने की बात ज़रूरी थी और तलाशी शुरू भी कथावाचक से शुरू की गई।       
    वादों की किताब अभी सुरक्षित रखी हुई है अलमारी में। चुनाव जीतने के बाद संभाल कर रखी दी थी। और इरादों की किताब पर अमल शुरू कर दिया था जो अभी जारी है। इरादे बहुत हैं कुछ सामने हैं कुछ छुपे हुए हैं। इरादों की किताब बहुत विस्तार में लिखी है। लिखने वाले लिख कर शर्मिंदा भी बहुत थे मगर फिर भी दंगों की किताब को जलाया नहीं देश जलाने के बाद भी। विश्वास था सत्ता उसी से मिलेगी तभी उसकी नियमित पूजा करते रहे हैं उनके बाद उनके शागिर्द भी। बड़े मियां ने सिखाया छोटे मियां को वही भाया। अभी नफरत को और बढ़ाना है जो सबक भूल गये उनको याद करवाना है। जाना चाहिए जाना चाहते नहीं दोबारा आज़माना है वही किस्सा पुराना है। चोरों की किताब दो भाग में लिखवाई हुई है सभी विभागों को अलग अलग ढंग से समझाई हुई है। आपको भी भिजवाई हुई है भूली क्यों सीबीआई है। पहला भाग है चोरी करने के ढंग हज़ार पढ़ते हैं बड़े अधिकारी और उसके सब यार। चोरों के उसूलों की है जो आधी बाकी किताब हुआ उसी को लेकर है नया फसाद। उसूल तोड़ने वाले पर लिखवाई एफआईआर मचा हुआ है हाहाकार। खो गई उसूलों की किताब है जिसमें हर सवाल का दिया जवाब है। इतिहास की भी किताब रखी है दूध में गिरी कोई मक्खी है। किताबों की बात कभी नहीं बदलती है यही बात उनको मगर खलती है। देशभक्ति को बेचना बात अच्छी है झूठ की हर इक बात सच्ची है। सच्चाई कड़वी है नीम जैसी है , बात झूठी अफ़ीम जैसी है। झूठ मक्खन भी है मलाई भी और खिलाता है वो मिठाई भी। हो गई गुम है देशभक्ति की किताब जिसमें शामिल था सभी का सांझा हिसाब। जाने किस ने चुरा लिया उसको , हम सभी ने भी भुला दिया जिसको। गब्बर सिंह तक हैरान है अभी तलक उस पर नहीं बसंती भी लगा सकी गलत कोई इल्ज़ाम है। नाचना गाना कब किसने कहा हराम है जब भी मौज मस्ती हो वही सुहानी शाम है। डाकू तक देशभक्ति की किताब को अच्छा बताते थे , उसी के सामने सर झुकाकर बदल जाते थे। जिस किसी ने किताब चुराई है लौटा दे दुहाई है।
         कोतवाल को रपट लिखनी है किस भाषा में लिखी हुई किताब है जिस किसी ने पढ़ी हो सामने आये। सुनी है मगर देखी नहीं देखी थी मगर पढ़ पाये नहीं सब यही जवाब देते हैं। सीबीआई को सुरक्षा करनी थी देशभक्ति की किताब अनमोल थी। जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं सरकार कहती है जिनको किताब की सुरक्षा करनी थी उन्हीं को जांच का अधिकार नहीं हो सकता है। सीवीसी को पता होगा किताब को किसे तलाश करना है। नेता लोग ब्यानबाज़ी से बाज़ नहीं आते हैं कोई कहता है जब आज़ादी के बाद उस किताब की पढ़ाई ही बंद कर दी गई और केवल कई तरह की बातों को ही देशभक्ति मान लिया गया तो किताब को दीमक चाट गई होगी। आजकल देशभक्ति तिरंगा फहराना कोई दौड़ आयोजित करना किसी खेल की हार जीत पर ख़ुशी या दुःख होने से दिखाई देती है या दो दिन खास तौर पर छुट्टी मनाते गीत गाने से नज़र आती है। पुराने ढंग की देशभक्ति जिसमें जान नयौछावर करने का जज़्बा होता था इधर चलन से बाहर है। राजनेता देश को लूटने को देशभक्ति नाम देते हैं। कहीं किसी विदेशी हाथ की बात तो नहीं है पता चले कि देशभक्ति की किताब कोई और देश अपने अजायबघर में रखे हुए हो और जिसे देखनी हो वो किताब उसे दाम चुकाना पड़ता हो। दाम चुकाने वाली देशभक्ति आज कौन चाहता है , हर किसी को देशभक्त बनना है सांसद विधायक या कोई तमगा पाकर।
             सत्ता का कहना है आपको देश में अगर रहना है झूठ को सच ज़रूरी कहना है। देशभक्ति उन्हीं की सच्ची है आज़ादी से पहले की देशभक्ति तो कोई बच्ची है। किताब फिर से लिखवानी होगी जिस में बस उनकी सिर्फ कहानी होगी। न कोई दादा होगा न कोई नाना नानी होगी , आपको ताली ही बजानी होगी , नेता जी को सुनानी है उन्हीं की ज़ुबानी होगी। आग पहले लगानी होगी फिर आग से आग बुझानी होगी। जहां राजा होगा वहीं राजधानी होगी , रानी नई होगी न ही पुरानी होगी। लोग शक कर रहे हैं जिस पर उसका कहना है किताब मिट गई हमारी राजनीति में पिसकर। सत्ताधारी खामोश है किताब की सुरक्षा उसी का ज़िम्मा था। उसको पहले सत्ताधारी ने सौंपी थी आने वाले को अपने बाद सौंपनी थी। सवाल हैं जवाब नहीं हैं , उनका सब ज़ुबानी जमा खर्च है कोई बही खाता नहीं है। जानकर कहने लगे हैं ये तो पुरानी कथा का नया अध्याय है। जो पहले कोई करता वही चल रहा है। बेकार लोग तोते की साख की चिंता करते हैं जब तोता है वो भी सरकारी सत्ता का पिंजरे में बंद तोता तो साख बचती कहां है। जो पढ़ाया वही दोहराता है फिर भी सभी को क्यों भाता है। आधी रात को दो तोतों को पिंजरे से बाहर कर दिया और इक तोता वहां रख दिया गया , पिंजरा खाली नहीं रहना चाहिए। जिन को किताब खोजने पर लगाया गया था उनको भी आज़ाद कर भेज दिया अलग अलग जगहों पर। हर तोता रखवाली करने वाला था अब हर तोते पर पहरा लगाया गया है। किताब मिल गई तो चौकीदार की नौकरी पर बन आएगी। एक डाल पर तोता बोले एक डाल पर मैना , दूर दूर बैठे हैं लेकिन प्यार तो फिर भी है ना , बोलो है ना। कोयल भी गीत सुना रही है मेरी ग़ज़ल गुनगुना रही है।

     बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते , सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते।


     सभी यहाँ बराबर हैं सभी से प्यार करना तुम , सबक लिखा हुआ जिसमें किताब क्यों नहीं देते।


     नहीं भुला सके हम खाव्ब जो कभी सजाये थे , हमें वही सुहाने फिर से ख्वाब क्यों नहीं देते।


     यही तो मांगते सब हैं हमें भी कुछ उजाला दो , नहीं कहा किसी ने आफताब क्यों नहीं देते।


Monday, 22 October 2018

वैधानिक चेतावनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        वैधानिक चेतावनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   म्यूच्यूअल फंड्स का विज्ञापन सभी दस्तावेज़ों को ध्यान से पढ़ने को सचेत करता है। हर शराब की बोतल पर है सिगरेट की डिब्बी पर भी सावधानी की बात लिखना ज़रूरी है। बीमा कंपनी वालों की बात ओह माय गॉड फिल्म तक बना डाली मगर बदला नहीं चलन कोई भी। चेतावनी देने से किसी का धंधा मंदा नहीं हुआ है। चर्चा हो रही है मुहब्बत इश्क़ प्यार के बाज़ार की , कुछ दिनों से गुलाब कम बिक रहे हैं आई लव यू वाले महंगे कार्ड की बात क्या सस्ते भी कोई खरीदार नहीं मिलता है। आशिक़ लोग कभी डरपोक नहीं होते थे , जब प्यार किया तो डरना क्या। मगर इधर डर महबूबा के बाप का नहीं है न उसके भाइयों का ही , महबूबा ही कभी बाद में मीटू कर सकती है डर सताता है। मजनू को पहले कोई चेतावनी देता पत्थर मारने की नौबत भी होगी तो शायद वो भी सौ बार सोचता। हीर रांझा रोमियो जूलियट की कहानी कुछ और होती अगर उनको अंजाम का पता होता पहले से। मगर प्यार के बाज़ार का कारोबार करने वाले आशिक महबूबा दोनों की चिंता समझते हैं। तभी हर मुहब्बत का इज़हार करने वाले उत्पाद पर बाद में मीटू की बात लिखनी ज़रूरी समझी जा रही है। कोई भी कारोबार करने वाला ये जोखिम नहीं उठाना चाहता कि उनके उत्पाद किसी भी तरह से किसी को इश्क़ विश्क का सबक पढ़ाने को ज़िम्मेदार रहे हैं। किसी को प्यार का इज़हार करना है या नहीं उनके उपहार बेचने का उससे कोई मतलब नहीं है। भविष्य में किसी होने वाली घटना से कारोबार करने वाली कंपनी का कोई नाता नहीं होगा। बहुत ही बारीक शब्दों में चेतावनी लिखी रहती है जिस पर किसी का ध्यान नहीं जाता , पहले अपनी महबूबा से पूछ लें कि किसी मतलब या ज़रूरत से तो नाता नहीं बना रही और कभी बाद में मीटू में शामिल होकर खुद को भोली मासूम बेचारी कहकर आशिक़ को बदनाम तो नहीं करोगी। हैरानी की बात नहीं है आजकल प्यार भी सोच समझ कर हिसाब किताब लगाकर होता है। पढ़े लिखे लोग हैं नासमझी वाला इश्क़ नहीं करते कभी। रही बात आज जो कहा बाद में उस पर कायम रहने की तो उसका उपाय कोई नहीं है मुकरने वाले लिख कर भी मुकर सकते हैं। मामला अदालत में पहुंच गया है मुमकिन है अदालत कोई नया ढंग प्यार करने का भी समझा दे या कोई कानून बनवा सकती है आशिकों का पंजीकरण ज़रूरी हो जाये।
        एक्सपायरी की तारीख दवाओं की तरह रिश्तों की भी होती है , तमाम उम्र कहां कोई साथ देता है , मैं जनता हूं मगर थोड़ी दूर साथ चलो। बीच राह में साथ छोड़ना ही नहीं कहते कभी रास्ते भी बदलते रहते हैं जिस को जिधर जाना हो जाने दो आप जिधर जाना चाहते हो चले जाओ। मगर जितना साथ निभाया उस का आभार समझना चाहिए , किसी को बेवफ़ा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता , निभाई थी कभी उसने भी उल्फत याद रखते हैं। दिलबर की रुसवाई नहीं होने देनी चाहिए वर्ना आपकी अपनी वफ़ा भी झूठी साबित हो जाएगी। चलो किसी ने मीटू का आरोप लगाया तो चिंता की क्या बात है आपको साथ लेकर डूबने की ही बात है। हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी साथ लेकर डूबेंगे नाकाम आशिक़ी का अंजाम है। पर मानहानि का दावा करना उचित नहीं है , आशिक़ों को भला कब से मान सम्मान की फ़िक्र होने लगी। आशिक़ी करनी है तो दिल से करो और दिल धक धक धड़कता है मुहब्बत में डर से नहीं , डर दिमाग़ की उपज है। इक उपाय किया जा सकता है , जिन जिन जगहों पर आशिक़ मिलते हैं सब जानते ही हैं उन सभी जगहों पर बड़े बड़े बोर्ड विज्ञापन की तरह लिखवा कर टंगवाये जाने लाज़मी हैं जिन पर चेतावनी लिखी हुई हो। सड़कों पर खतरनाक मोड़ की बात की तरह वाले। फिर जब कोई अदालत पुलिस थाने जाएगा तो पहला सवाल यही किया जाएगा , आप की दो आंखें हैं अंधे तो नहीं हैं फिर चेतावनी को पढ़कर अनदेखा क्यों किया। दिल दिया दर्द लिया तो दिल एक मंदिर है अब दिल है कि मानता नहीं फिर दिल का क्या कसूर। दिल ने फिर याद किया है अब दिल दे के देखो। दिल हाय दिल जब दिल की बात है तो दिल के डॉक्टर से सलाह लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। आशिक़ी करने से पहले दिल की जांच करवाई होती तो दिल टूटता नहीं। मुश्किल और है कि डॉक्टर दिल का ईलाज भले करते हैं उनके पास दिल होता नहीं है। बड़े बेदिल होते हैं दिल के डॉक्टर तभी दिल को चीरते हैं दिल पर छुरी चलाते हाथ नहीं कांपते उनके। मेरा दिल आपके पास है संभाल कर रखना कहने वाले बिना दिल जीते कैसे हैं। या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो। बात दिल की थी दिल में रखते जुबां पर लेकर क्यों कयामत ढाने की बात करते हैं। सरकार को कोई भी ढंग नहीं मिला तो मुहब्बत करने पर रोक लगाई जा सकती है। प्यार करना समाज को अपराध लगता है अगर कानून भी इसे गुनाह मान लेगा तो कैसे प्यार करोगे। लोग गुज़र बसर कर भी लेंगे मगर लिखने वाले कहानी कविता ग़ज़ल कहने वाले और उनपर फिल्म टीवी सीरियल बनाने वाले सभी बर्बाद हो जाएंगे। ज़रा सी बात पर जाने कितने तूफ़ान खड़े हो सकते हैं।
 

Sunday, 21 October 2018

शोध अच्छे दिनों पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        शोध अच्छे दिनों पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     दादा जी याद किया करते थे वो भी क्या दिन थे दो रूपये में घर की महीने भर की ज़रूरत का सामान मिल जाता था। अच्छे दिन की सही परिभाषा यही है। हर दौर में सुनते हैं ऐसे खराब दिन आएंगे ख्वाब में भी नहीं सोचा था। गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा। तभी समझ जाना था जब कोई अच्छे दिन लाने की बात कर रहा था।  गया वक़्त कभी वापस लौट कर नहीं आता है हां आशिक़ ज़रूर कहते हैं मेहरबान होकर बुला लो मुझे जब चाहो , मैं गया वक़्त नहीं हूं जो आ भी न सकूं। गुज़रे वक़्त की ताबीर नहीं ला सकते तो तस्वीर दिखला रहे हैं , ज़ालिम क्या ज़ुल्म किया करते थे समझाने को ज़ुल्म ढा रहे हैं। देखो आपको भी वही पुराने दिन अच्छे थे समझ आ रहे हैं। बुरा वक़्त ठहरता है जाने का नाम ही नहीं लेता अच्छा वक़्त कब चला गया पता ही नहीं चलता है। जो लोग पछता रहे हैं दिल को अब इस तरह बहला रहे हैं चलो अच्छे दिन नहीं आये तो क्या बुरे दिन बस अभी जा रहे हैं। राज़ की बात है जो आज हम बतला रहे हैं आपको अच्छे दिनों से मिला रहे हैं। सामने देखो , उस तरफ मेरी तरफ नहीं दूसरी तरफ दो हमशक्ल साथ साथ आ रहे हैं। 
       अच्छे दिन बुरे दिन दोनों जुड़वां भाई हैं राम और शाम सीता और गीता की तरह। आते जाते रहते हैं उसी घर में बारी बारी से। जब जो जिस घर में रहता है तब उस घर में उसी के जैसे दिन रहते हैं। महलों वाले गरीबों से कहते हैं हम से मत पूछो कितने बेचैन रहते हैं अच्छे दिन हैं मगर बड़े ज़ालिम हैं हर घड़ी लगता है महलों को अभी ढहते हैं। अच्छे दिन का सुख रहता नहीं अधिक दिन जब तक रहता है और अच्छे दिनों की चाहत खुश होने नहीं देती है , बुरे दिन साथ निभाते हैं जाते नहीं आसानी से। इस दुनिया में खलनायक ही अच्छे दिन वापस ला सकता है शरीफ नायक तो बेचारा सितम सहता है। नायक किसी काम का नहीं खलनायक बड़े काम आता है। शराफत से अच्छे दिन नहीं ला सकते आदमी को थोड़ा खराब होना चाहिए , मौका मिलते ही बराबर हिसाब होना चाहिए। बर्बाद करने वाले को भी बर्बाद होना चाहिए। 
       अच्छे दिन पूछते हैं भाई बुरे दिन तुम रहते कहां हो , बुरे दिन कहते हैं तेरी तलाश में रहता हूं। हर कोई यही गलती करता है उनकी तलाश में रहता है जो आने नहीं हैं बीत चुके हैं। अच्छे दिन एक सपना है बुरे दिन वास्तविकता है। लोग सपनों के पीछे भागते हैं , राजनीति केवल रेगिस्तान की दूर दूर तक फैली गर्म रेत जैसी है जिसमें जनता प्यासे मृग की तरह लोग चमकती रेत को पानी समझ भागते रहे हैं प्यासे मरने को। शोध जारी है कल जाने किसकी बारी है।

जमुना मौसी का बुलावा ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

     जमुना मौसी का बुलावा ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

     गंगा मैया के बेटे मोदी पिछली बार मुझे देर से पता चला कि बेटे आजकल बुलावे पर आते हैं मां के पास। तुम गंगा के बेटे हो तो जानते तो होंगे जमुना मौसी को मुझे , इस बार कोई और बुला ले उस से पहले मैं बुला रही हूं। और कहीं दूर भी नहीं जाना उसी दिल्ली में ही मुझे मिल लेना , अब तो दिल्ली घर जैसी लगती भी होगी। ग़ालिब की दिल्ली ज़फर की दिल्ली , कौन जाता है दिल्ली की गलियां छोड़कर। जो लोग दिल्ली की लाख कमियां गिनवाते हैं वो भी दिल्ली से सब कुछ लेते हैं दिल्ली की बदनसीबी है दिल्ली से लेकर खाते हैं फिर भी गरियाते भी हैं। मेरा दिल भी दिल्ली की तरह विशाल है किसी से कोई भेदभाव नहीं करती। गंगा जमुना संस्कृति की बात सुनी ज़रूर होगी हम हिंदी उर्दू भाषा और सभी धर्मों के मेल की बात को सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं। चिंता मत करना मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए और मैं नहीं सवाल भी पूछूंगी कि गंगा कितनी स्वच्छ हुई अब तक। मन की बात दिल की बात दोनों एक ही हैं और दिल की बात देश का दिल कहलाने वाली दिल्ली से नहीं होगी तो किसी और से हो भी नहीं सकती है। मेरा महत्व इसी से समझ लेना कि सभी महान लोगों की समाधियां मेरे किनारे पर ही तो हैं। सबकी आत्माओं का मुझसे गहरा नाता है। तुम दिल्ली की जनता के मानस को गलत मत समझना उसे कोई नहीं जान पाया है , चिंता मत करना कि दिल्ली से तुम्हारे दल को बुरी पराजय मिली थी। साहस होना चाहिए दिल्ली का दिल जीतना मुश्किल नहीं है , मगर अहंकार से दिल्ली किसी को नहीं मिली इतिहास गवाह है। नफरत की जगह दिल्ली वालों को भाती नहीं है और दिल्ली का अनुभव है कि जो उसे छोटा समझता है उसे सबक भी सिखाती है। तभी जिसे सभी संसदीय क्षेत्र में जितवाती है विधानसभा में हरवा भी सकती है। गंगा स्नान से पाप धुलते हैं तो जमुना की डुबकी लगाने वाले पाप करने से ही तौबा किया करते हैं। मौसी बुलाए तो हिसाब नहीं लगाते कि जाना फायदे की बात होगी या नुकसान की , मौसी मां से बढ़कर प्यार करती है अगर दिल से बात करता है कोई। 
     कोई मांग नहीं है न मेरा कोई झगड़ा है किसी से भी। हरियाणा हो या दिल्ली हो मैं रोकने से रूकती नहीं , जो भी बाहें फैलता है चली आती अविरल बहती हर रुकावट को पार कर। कुछ लोग हैं जो मौसी के रिश्ते को समझते नहीं हैं अन्यथा हर मौसी अपने बच्चों की तरह सभी बहनों के बच्चों को प्यार करती है। मौसी सा रिश्ते निभाना चाचा ताऊ भाई जीजा साला मामा मामी कोई नहीं जानता है। जिनको मां भी कभी प्यार नहीं करती किसी भी कारण उनको भी मौसी सीने से लगाती है। लिखने वालों ने मौसी के किरदार को ठीक से समझा और पहचाना नहीं है वर्ना मौसी की बात पर शोले की बसंती की मौसी याद नहीं आती। यहां ये बताना ज़रूरी नहीं है मगर ध्यान दोगे तो याद आ जाये शायद जब कोई मां जान लेती है कि बच नहीं सकूंगी तब बच्चों का ख्याल रखने को जिसे कहती है वो मौसी ही हो सकती है। हो सकता है तुम्हारे मन में ये बात आये कि मैं खुद तुम्हें क्यों बुलावा भेज रही हूं , मेरा कोई स्वार्थ तो नहीं है। इशारे से समझ जाना मां को जब अपने बच्चे को बचाना होता है तो अपनी छोटी बहन से कहती है तुम उसे अपने घर बुला लेना मेरे पास आएगा तो डरती हूं कोई सज़ा नहीं मिल जाये। और मौसी कभी नहीं पूछती किस बात की सज़ा क्या शरारत की है उसने। भरोसा कर सकते हो सगी मौसी हूं सौतेली मां नहीं हूं। मुझे चुनाव तक तुम्हारा इंतज़ार रहेगा। अपना ख्याल रखना मैसी की ताकीद है।

Saturday, 20 October 2018

शुरू भी हमसे खत्म हमीं पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        शुरू भी हमसे खत्म हमीं पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

          चार साल बाद फुर्सत मिली अपनी कुर्सी पर बैठे तो पीठ पीछे लिखे नामों को ध्यान से पढ़ने लगे। सचिव को बुलाया और सवाल दाग दिया मेरा नाम सबसे आखिर में इतना नीचे क्यों लिखवाया गया है। सचिव ने बताया कि हर दफ्तर में ऐसा ही चलन है शुरुआत पहले नंबर से की जाती है आप का नंबर आखिर में ही है पहले 13 और नेता पद पर रहे बारी बारी और एक बीच में कार्यवाहक भी बनाये गये थे। नेता जी को अपना नाम ऊपर चाहिए था इसलिए कहने लगे कि अगर इस को बदलकर उलटी तरह लिखा जाये तो क्या परेशानी है। सचिव ने बताया ये संभव नहीं है कि हर बार संख्या घटती हुई लिखी जाये ऐसे में शुरुआत किस संख्या से करेंगे क्योंकि ये सिलसिला आगे बढ़ता रहेगा। आपके बाद जो बनेगा उसका नाम आपके नीचे लिखा जायेगा। नेता जी को ये अच्छा नहीं लगा , उनको लगता है उनके बाद भी उन्हीं को ही बनना ही है। उनको तो जो नाम पहले लिखे उनको नीचे करना है और सबसे ऊपर अपना लिखवाना है। हमारा नाम वारणसी बाबू , बने हैं हम बनेंगे भी हम हमारा नाम वाराणसी बाबू। नेता जी सुबह शाम दिल ही दिल में यही सोचते रहे तो ये होना ही था कि दिल की बात ज़ुबान पर आ गई। दिन रात यही सोचते रहते और यही सपना देखते कि काश उनका नंबर सबसे ऊपर हो जाये।
             ऐसे में ख्वाब में मनचाही मुराद मांगने की बात सुनते ही कहा कि बस यही बात खलती है कि मुझे 14 वें 15 वें स्थान पर नहीं पहले स्थान पर होना चाहिए था। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि इस पद की कुर्सी और मैं एक दूसरे के लिए ही बने हैं। जब भी कुर्सी पर बैठता हूं मुझे लगता है जो जो भी पहले इस पर बैठे काबिल नहीं थे। जिस तरह हर कुंवारा चाहता है उसकी दुल्हन को किसी ने भी पहले छुआ नहीं हो , मुझे भी लगता है कि जब तक मैं नहीं बनाया गया था इस कुर्सी को दूसरे किसी को बैठने देना नहीं था। मेरा इंतज़ार करती रहती। सपना टूट गया वरदान मिलते मिलते रह गया। अपनी उलझन उसको बताई जो इस समस्या का समाधान कर सकता है। बताया कि अगर इस पद का नाम ही वारणसी बाबू हो जाये तो जो भी चुना जाएगा उसी को देश का चौकीदार नहीं वाराणसी बाबू ही कहकर पुकारा जाएगा। नेता जी की चिंता अपनी जगह है उनकी अपनी जगह। ज़िद पर अड़े हैं कि पद का नाम वाराणसी बाबू हो और उसके साथ संख्या एक से लेकर बढ़ती जाये। वाराणसी  शब्द  ही उनका नाम है। संविधान में बदलाव कर हमेशा को पद पर बैठे व्यक्ति को उसी तरह संबोधित किया जाना चाहिए जैसे एलिजाबेथ एक दो तीन हुआ करता था। मगर उलझन है कि नेता जी संविधान में संशोधन भी आज़ादी के बाद से करना चाहते हैं ताकि इतिहास में शुरुआत से ही उन्हीं का नाम लिखा जाये बदल कर। मगर संविधान लागू किया ही बाद में गया था 26 जनवरी 1950 को। अब उससे पहले की तारीख में संशोधन कैसे हो सकता है लेकिन उनका कहना है जब मेरे पास तीन चौथाई बहुमत है तो सब मुमकिन है। आज़ादी की तारीख तक बदल सकते हैं नेता जी का दावा है। नेता जी को पुराना इतिहास पसंद नहीं है बदलना चाहते हैं। सड़कों शहरों के नाम बदलने से बात बनती नहीं लोग तब भी पुराने नाम को याद करते हैं। नेता जी को लगता है इतिहास को दोबारा लिखवाया जाये और ऐसा घोषित किया जाये कि आज़ादी मिली ही उसी दिन जिस दिन उनको कुर्सी मिली थी। और देश की सत्ता जिस का हाथ हो उसको वाराणसी बाबू कहा जाये अभी खुद वाराणसी बाबू हैं तो लिखा जाना चाहिए वाराणसी बाबू एक उसके बाद जब तक उनकी सत्ता है संख्या पहली ही रहेगी जब कभी कोई और बनेगा तो उसको भी वास्तविक नाम से नहीं वाराणसी बाबू दो उसके बाद तीन चार लिखते रहेंगे ताकि अनंतकाल तक उन्हीं का ही नाम रहे। सोशल मीडिया पर बहस जारी है , उनके बाद भी उनकी ही बारी है। सत्ता की ज़िद हमेशा जीतती है कब भला हारी है। नाम लिखना नहीं मिटाना है दिल में बेकरारी है। नाम की भूखी दुनिया सारी है बड़ी मुश्किल से मिलती बारी है। क्या करना है मर्ज़ी हमारी है। निभानी थोड़ी सी मगर दुनियादारी है।
         मगर नेता जी असली बात भूल गये हैं , ख्वाब में जो उनसे बातें कर रहा था वो वाराणसी का गंगा का तट था। उसने बताया था आप को सत्ता मिली ही वाराणसी से जीत के कारण है। जिस दिन वाराणसी ने आपको ठुकरा दिया आप पुराने राज्य से जीत कर भी देश की राजधानी में सत्ता नहीं हासिल कर सकते हैं। वारणसी बाबू नाम दिया था उसी तट ने वो याद रहा मगर असली बात भूल गये। क्या वाराणसी अपनी राय बदलेगी या शायद खुद जनाब ही वाराणसी छोड़ कोई और किनारा तलाश करने लगेंगे। गंगा फिर से उनको बुलाएगी ऐसी संभावना लगती नहीं है। जब नाम ही नहीं रहा वाराणसी बाबू कोई दूसरा बन गया तो क्या होगा। ख्वाब की बात अक्सर आधी अधूरी याद रहती है। ख्वाब तो ख्वाब है उनके सपने भी कमाल के हैं खुद ही अपना नाम याद करते हैं इस डर से कि कहीं भूल ही जाऊं मैं कौन हूं कहां से आया हूं। सिवा अपने कुछ नहीं याद।