Saturday, 26 May 2018

चाचा नेहरू की याद में - डॉ लोक सेतिया

        चाचा नेहरू की याद में - डॉ लोक सेतिया 

         आपने ये शब्द समझा है , दो ही लोग हुए हैं जिनको ये रुतबा हासिल हुआ है।  चाचा नेहरू और चच्चा ग़ालिब। यकीन करें इनसा दूसरा नहीं हो सकता। गांधी जी को लेकर कहा जाता है कि सदियों बाद लोग यकीन नहीं करेंगे कि हाड़-मांस का ऐसा कोई पुतला धरती पर होता था। मगर आज अभी 54 साल बाद कोई उसी कुर्सी पर बैठकर उनको नहीं अपने पद को अपमानित कर रहा है जिनका मुकाबला वो कभी नहीं कर सकता , उन देश के पहले वास्तविक प्रधान सेवक जवाहरलाल नेहरू की बुराई करते समय। उन जैसा नेता जो देश के भविष्य को लेकर बहुत बड़े सपने देखता है और समझता है कि देश से गरीबी भूख मिटानी है मगर उसके साथ आधुनिक विज्ञान और विकास भी करना है। खुद अपने मुंह से कहता है मुझे इतना अधिक प्यार देकर ऊंचा नहीं पहुंचाओ कि मैं तानाशाह बन जाऊं। किसी ने कभी आपको बताई ये बात आज तक। मैं तब 13 साल का बच्चा था और हमारे स्कूल में भीतर जाते ही नेहरू जी की कोट पर गुलाब लगाए हुई तस्वीर दिखाई देती थी। केवल कहने को नहीं हम बच्चे दिल से प्यार करते थे , कौन नहीं रोया था उनके निधन की खबर सुनकर। ये घटना मुझे कभी नहीं भूल सकती है , 1965 को 27 मई को स्कूल में नेहरू जी की याद में सभा हुई थी , केवल बच्चों को ही बोलना था और जो चाहे कर दिखाना था। आज रोज़ लिखता हूं बहुत कुछ , मगर कभी नहीं भूली वो बचपन की दिल की गहराई से निकली भावना की पहली लिखी कविता। मैंने अपनी पहली रचना नेहरू जी की याद में लिखी थी। 27 मई को याद करो चल बसे थे चाचा प्यारे , आंसू भरे सितारे। जो भी हो तुकबंदी भी हो मगर इक दिल से भावना से लगाव से लिखी थी। क्या आजकल किसी नेता के निधन पर किसी को ऐसा दर्द महसूस होता है। 
                                                पंचशील को भूल गये हैं जैसे बुरा सपना था , मगर नहीं आज भी सब कहते वही हैं जंग से किसी को कुछ हासिल नहीं होता है। पीठ में छुरा घोंपा था चीन ने और हम उस दोस्ती की आड़ में भरोसा तोड़ने वाले दुश्मन की बात को छोड़ इक सभ्य नेता को दोष देते हैं। आज देश जिस भी मुकाम पर है उद्योग को लेकर विज्ञान को लेकर बांध बनाने से लेकर राज्यों के अधिकार और लोकतंत्र को स्थापित करने तक उनका योगदान है। इस बात को आज़ादी के पचास साल पूरे होने पर संसद में अपने भाषण में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने सपष्ट किया था। आज के सत्ताधारी कुत्सित मानसिकता के चलते ये कभी नहीं बोल सकते हैं। किसी ने कभी विचार किया कभी नेहरू ने इंदिरा को सत्ता सौंपने की सोच भी रखी थी , जिनको नहीं मालूम उनको याद दिलवाना ज़रूरी है कि नेहरू जी के निधन के बाद श्री गुलज़ारी लाल नंदा जी को काकाजी प्रधानमंत्री बनाया गया क्योंकि वो सब से वरिष्ठ सांसद थे। मगर उन्होंने अपने पद और वरिष्ठ होने का दुरूपयोग नहीं किया , जबकि उन्हें तीन बार इस तरह का अल्पकालीन प्रधानमंत्री बनाया गया। ये था नेहरू का स्थापित लोकतंत्र , इतना ही नहीं उसके बाद संसद में कोंग्रेस के नेताओं की बैठक हुई जिस में नेहरू जी का स्थान किसे दिया जाये ये तय किया जाना था। हैरान हो जाओगे किसी को पहले कोई पता नहीं था क्या होगा। लाल बहादुर शास्त्री जी सभा में देर से आये और कोई खाली कुर्सी नहीं देख आखिर में सीढ़ियों पर धरती पर बैठ गए। जब उनके नाम का प्रस्ताव सामने आया और सब ने तालियां बजाईं तो ध्यान आया की वो हैं कहां , तब उनको अगली कतार में बिठाया गया। आज किसी दल में ये साहस है कि खुली सभा में विचार कर काबिल व्यक्ति को चुना जाये। चुनाव से पहले घोषित करना कि ये या वो प्रधानमंत्री हों संविधान की भावना की बात नहीं है। 
                                    इक कविता है किसी कवि की। बौने लोगों को लगता है , पहाड़ पर चढ़कर , उनका कद , ऊंचा हो जाता है , मगर वास्तव में , पहाड़ पर चढ़कर बौने , और भी बौने दिखाई देते हैं। इसलिए महान लोगों से अपनी तुलना नहीं करें। आखिर में किसी शायर की ग़ज़ल के कुछ शेर अर्ज़ करता हूं। 

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं , कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

रौशनी छीन के घर-घर के चिरागों की अगर , चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना , आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

आज मैं जो भी हूं हूं बदौलत उसकी , मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मैं जनता हूं उनको ये ग़ज़ल कभी समझ नहीं आएगी जो हर किसी को खुदा कहने लगते हैं और खुदा बदलते रहते है। अंतिम शेर की बात तो उनको अजीब ही लगेगी। मगर उनको बताना होगा इक महान नेता का कहना था , मैं तुम्हारी बात से असहमत हो सकता हूं , मगर मेरा कर्तव्य है आपकी अपनी बात कहने की आज़ादी की रक्षा करना। इक शेर जगजीत सिंह की गए ग़ज़ल से , हमने देखा है कुछ ऐसे खुदाओं को यहां , सामने जिस के वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं।

 

नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध ( मन की बात ) डॉ लोक सेतिया

       नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध ( मन की बात ) 

                                   डॉ लोक सेतिया 

    मैं तो इक मूर्ख हूं जो खुद मोह माया में रम गया है , बंधन से मुक्त होना चाहता हूं हो पाता नहीं। ये आज इक शब्द जो श्लोक मोहल्ला नौ सिख धर्म ग्रंथ की बाणी का बेहद महत्व रखता है जीवन में सही मार्गदर्शन के लिए जिसे काफी अर्से से नियमित सुनता हूं , उसी को साथ लेकर देश और समाज की बात करना चाहता हूं। मेरी विनती है कि मेरे ऐसे करने पर कोई भी मेरे मकसद को अन्यथा नहीं ले। वास्तव में धर्म की किताब चाहे गीता हो कुरान हो बाइबल हो सभी हम को सच की परख और सही जीवन राह पर चलने की ही बात समझते हैं। 
                 सीधी बात करने वाले सच्ची बात नहीं करते और अपना ज़मीर बेचने को राज़ी हैं। कोबरा पोस्ट ने जो आज बताया मुझे वही अख़बार वालों को पत्रिका वालों को लेकर लिखते बीस साल हो गए हैं। मीडिया हो सरकार के नेता हों चाहे अधिकारी सब की बात यही है जो शीर्षक है। 

करना हो सो ना कियो , पड़ेओ मोह के संग 

नानक समयो रम गयो , अब क्यों रोवत अंध। 

पहली बात करना क्या था , जो नहीं किया और जो नहीं करना था करते रहे। इसे शब्द में कहा है जो किसी को भय नहीं देता है और ना ही किसी से भयभीत होता ही है , नानक कहते हैं हे मन सुन ज्ञानी उसी को कहते हैं। दावा करते थे मुझे कोई मोह नहीं लोभ नहीं लालच नहीं , मगर किया क्या अपना गुणगान और झूठी शोहरत हासिल करने को अपनी लकीर बड़ी बनाना नहीं आया और जिनकी लकीर बड़ी लगी उनको छोटा करने लगे। मन की बात से इक भजन याद आया है।  तोरा मन दरपन कहलाये उसे भी सुन लेते हैं। 





मन की बात इसे कहते हैं , अपने मन को पा लिया भगवान को पा लिया। कोई बात मन से छुपी नहीं है , मन की बात का शोर नहीं होता ख़ामोशी से सुनते हैं। मन की बात सब से नहीं की जाती और खुलेआम तो कभी नहीं। जनता को वादा किया था जो वो अच्छे दिन यही हैं कभी मन से पूछना। धर्म की बात आचरण की बात होती है आडंबर की नहीं। रावण भी सुनते हैं बहुत की थी देवताओं की पूजा , कहते हैं सभी ग्रंथ कंठस्थ थे मगर आचरण में ज्ञानी नहीं था। सोने की लंका की तरह आलीशान भवन बनाने से महान नहीं हो जाते , जलकर राख हो जाती है ऐसी लंका भी। इस देश में हनुमान हर जगह विराजमान हैं , शायद भगवान कृष्ण जी अवतार लेना भूल गए वर्ना पाप की पापियों की अधर्म की कोई कमी तो नहीं बाकी आजकल। नाम की बात को छोड़ो नाम बदनाम लोगों का भी याद रहता है। इक अपना शेर कहना चाहता हूं। 

अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में , 

देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई। 

     अब इस से अधिक बात क्या होगी कोई बार बार कहता है , उनकी दुकान पर ताला नहीं होता तो हम विधायक रुपी सामान खरीद लेते या नहीं बिकना चाहते तो लूट कर चुरा कर भी अपनी सरकार बनवा लेते। लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है और जनता भले किसी को चुनती है सभी दल अपनी साहूलियत से व्याख्या कर लेते हैं। कोई विचारधारा नहीं कोई नैतिकता नहीं केवल सत्ता के लिए अवसरवादिता है। ये बहुत अजीब बात है आपने किसी भी राज्य में विधायकों को अपना नेता चुनने की आज़ादी नहीं दी , बस अपने ख़ास संगठन से जुड़े लोग मनोनीत करते गए , नतीजा कर्नाटक में राज्यपाल को देश संविधान नहीं अपने आका और संगठन की चिंता थी , सर्वोच्च अदालत कब कब ये करेगी। हरियाणा में पूरी सरकार इक अपराधी के संग खड़ी रही , उच्च न्यायालय और इक न्यायधीश के कारण पीड़ित महिलाओं को न्याय मिला। आप अपराधियों का बचाव ही नहीं करते सच को खरीदने का अधर्म ही नहीं करते , आप सच को डराने धमकाने परेशान करने में किसी गुंडे की तरह हर सीमा पार कर जाते हैं। नहीं ऐसा तो आपत्काल में भी नहीं देखा था। 
अब जब समयो रम गयो , अर्थात चुनाव सामने हैं तब , तरह तरह से बता रहे हमने क्या क्या किया है। जो किया जनता को सामने दिखाई देता होगा , अंधी नहीं है जनता। जो किया नहीं वो कैसे दिखाओगे। 

                ये सब करना था , किया है तो दिखाओ ?  

कालेधन वाले जेल नहीं गए , कालाधन मिला नहीं उसे सफेद करवा दिया। 
भ्र्ष्टाचार और महंगाई दोनों डायन अभी और विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। 
सेवक होने की बात कहकर खुद पर देश का धन बर्बाद करना , नौकर का चोरी करना है। 
एकतरफा संवाद स्वस्थ लोकतंत्र में उचित नहीं है। 
किसान , बेरोज़गार , किसी को कुछ नहीं मिला है। 
सीमा पर सैनिक शहीद हो रहे हैं और आम जनता आपके भ्र्ष्टाचारी पल के नीचे दबकर मर गए हैं। 
( ये आपके ही बोले शब्द हैं जब किसी और राज्य में किसी दूसरे दल की सरकार के रहते दुर्घटना घटी ) 
विकास कहीं नहीं , विनाश करने में कोई कमी है जिसे दोबारा सत्ता हासिल कर पूरा करना है। 
अंत में मीडिया के नाम लिखी तीस साल पुरानी ग़ज़ल पेश है ,  
 
इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।   
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।
सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।
देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।
कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।

 


 

Friday, 25 May 2018

इंसान हैं , इंसानियत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   इंसान हैं , इंसानियत नहीं है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     आज पार्क में सैर करते हुए सोच ही रहा था कुछ इसी तरह के विषय की बात , हमारी कथनी और करनी की बात तथा अधिकतर अपने अधिकारों पद सत्ता धन ताकत के अनुचित उपयोग की बात। पार्क से निकलने को ही था कि तीन चार लोगों की बातें सुनाई पड़ीं। इक व्यक्ति कह रहा था इन सफाई कर्मचारियों की मांगे नहीं मानी जानी चाहिएं थी। रुक गया और उनको भी रोका और सवाल किया क्या उनका शोषण नहीं किया जाता रहा अभी तक , दो वक़्त खाना मिल जाये इतना ही मांगते हैं। बोले ये अपना काम नहीं करते ठीक तरह से। मैंने कहा आपने अधिकारी करते हैं ठीक से काम , नगरपरिषद के सभापति से विधायक मंत्री मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री तक क्या सभी ठीक काम कर रहे हैं। करते तो सब कुछ सुधर सकता था। मगर हम उनके खिलाफ आवाज़ नहीं उठा सकते , जो मुफ़लिस हैं गरीब हैं उनके लिए जो चाहे बोलते हैं। कोई अधिकारी आपको बिना बात डांट देता है मगर आप खामोश सहते हैं , किसी सफाई कर्मचारी ने आपको सलाम नहीं किया तो आपका अपमान हो गया। उसने आपकी बात नहीं मानी तो आप नाराज़ हो गए , मगर जिनको खुद आपने चुना वो आपकी बात को नहीं सुनते तब भी हाथ जोड़े खड़े रहते हैं। सब से पहले हमें ये कायरता छोड़नी होगी , टकराना है तो अपने से बड़े के साथ टकराओ सही बात पर। यही अधिकतर लोगों का चरित्र है।  हम अपने साथ अन्याय होने पर रोते हैं आहें भरते है , किसी और पर अन्याय होता देख विचलित नहीं होते , और खुद किसी पर अन्याय करते भी संकोच नहीं करते हैं। मेरे जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं घटी हैं और उसी तरह सब को ऐसे कड़वे अनुभव होते हैं , जब उल्टा चोर कोतवाल को डांटता जैसी बात हो।
          किसी ने अपनी कार मेरे घर के गेट के सामने खड़ी कर रखी थी , उनसे कहा आप इसे थोड़ा परे खड़ा कर लो तो वो बोले मैं हुडा विभाग का हूं और मुझे पता है आपने जो रैंप बनाया हुआ है वो कितना अनुमति है। इसे क्या कहोगे , धौंस दिखाना , वो इंसान उसी समय जिस की दुकान पर खड़ा था उसने विभाग के प्लाट पर फुटपाथ पर कब्ज़ा कर रखा था जो उसको दिखाई नहीं दिया मगर मेरा रैंप जो सामन्य सभी की तरह से बना है उसको नियमानुसार नहीं लग रहा था , शायद उसके विभाग के नियम उसको ऐसा अमानवीय आचरण करने के अधिकार देते हों , देश का संविधान तो सब को बराबरी से न्याय की बात करता है।
       कुछ ऐसा ही इक और बार हुआ , कार में बैठ शराब पी रहे लोगों को मना किया कि ये क्लिनिक है जहां आपने दरवाज़े के सामने रोक कर कार खड़ी की हुई है और शराब पी रहे हैं। जनाब आये बाहर और बेशर्मी से बोले आप फोटो ले लो और शिकायत कर लो पुलिस को , मैं पुलिस में ही हूं। मैंने कहा तब तो और गलत बात है आपको जिस अनुचित काम को बाकी लोगों को रोकना हैं खुद वही कर रहे हैं , तभी तो देश की हालत ऐसी है। मैं बहुत ईमानदार पुलिस वालों को जनता हूं मगर ये कुछ लोग जो समझते हैं थानेदार हैं तो कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे लोगों को देश समाज और नियम कायदा कानून से कोई सरोकार नहीं होता है। जब तक हम सभी अपने आचरण को सही नहीं करते बाकी समाज की कमियां निकालते रहेंगे मगर हासिल कुछ नहीं होगा।
      कोई दुकानदार कारोबार करते उचित दाम की बात याद नहीं रखता , मगर किसी और के अधिक दाम मांगने पर लूटता है कहता है , जो सफाई वाले को 400 रूपये दिन के काम के मिलने को सोचता है इतना काम नहीं करता है वो , खुद हज़ारों की दिन की कमाई पर उचित अनुचित की बात नहीं करता। बाज़ार में कम होने पर ब्लैक करते उसको अपराधबोध नहीं होता है। हम सोचते हैं मंदिर जाने से पूजा अर्चना करने से दान करने से हम भगवान के भक्त हो गये , मगर नहीं। नानक जी कहते हैं ये तो सांप का कुंचल स्नान की तरह है। भाई इंसान है नाग नहीं बनिये , कुंचल नहीं बदलिए , सवभाव बदलिए। जपुजी साहिब में लिखा है , सोचे सोच ना होवई , जे सोचे लख वार , भुखियां भूख ना उत्तरी जे बन्ने पूरियां भार। अर्थात नहाने धोने से आप पावन नहीं हो जाते बेशक लाख बार स्नान करते रहो। और लालच की भूख मिटती नहीं चाहे कितना पास जमा किया हुआ हो।
                            मगर इस देश में जिस में मानवधर्म की बात सदियों से होती रही ये हो क्यों रहा है। क्योंकि हम ने धर्म की किताबों को , जीवन की सही राह दिखाने वाली नीतिकथाओं की बातों को भुला दिया है। ज्ञान हासिल नहीं किया और तोते की तरह राम राम रटते हैं। जब किसी और की गलतियां ढूंढते हैं तो खुद अपनी गलतियां और कमियां भी देख लिया करें। समाज हम सभी से है पहले खुद को बदलना होगा। ये बात शायद आजकल समझना कठिन है , मगर हमने बार बार पढ़ा है कि साधु का काम क्या है चोर को भी इंसान समझना। इक साधु ने देखा इक बिच्छु पानी में डूबता जा रहा , कहानी आपने सुनी होगी , हर बार साधु उसे हाथ बढ़ाकर बचाने को कोशिश करता और हर बार बिच्छू काट लेता। किसी ने कहा ये आप क्या कर रहे हो। साधु बोलै कि जब मर रहा है फिर भी बिच्छू अपना सवभाव नहीं छोड़ता तो मेरा सवभाव है डूबते को बचाना मैं कैसे अपना सवभाव त्याग दूं। कोई आपसे अन्याय करता है तो आप किसी और से उसका बदला नहीं लें किसी अपने से छोटे पर अन्याय कर के। इक बार हम पाप पुण्य और कर्मों के फल की बात को भी छोड़ देते हैं , मगर आप को अपनी आत्मा अपने विवेक का सामना तो करना ही होगा। चाहे सारी दुनिया आपकी बढ़ाई करती हो मगर आपका मन आपकी असलियत जनता है कि जो लोग समझते हैं आप वो नहीं है तो ऐसे झूठे गुणगान का क्या मतलब है। इंसान खुद अपनी नज़र में गिर जाये तो उस से अधिक नीचे नहीं गिर सकता कोई।

                बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय

               जो मन खोजा आपने तो मुझसे बुरा न कोय।


Thursday, 24 May 2018

ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

     ऐसी होगी मेरी शोकसभा कभी ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

      आप शोक जताने आये हैं या एहसान करने। चलो मेहरबानी की कुछ लोग तो मिल बैठे। मुझे मालूम है कितना कठिन है आपका मुझे अच्छा बतलाना। हमेशा जो बेहद खराब लगता रहा हो उसे अच्छा ही नहीं बेहद भला इंसान कहना सच साहस की बात है। आकर मेरी तस्वीर पर फूल चढ़ाना और हाथ जोड़ मन ही मन कुछ कहना , कमाल ही किया है। पता नहीं था वर्ना कब का मर जाता मैं। ये जो मंच पर भली भली बातें की जा रही हैं सब को पता ही हैं , हर शोकसभा में बार बार दोहराई जाती हैं। सुनाई देती हैं समझ नहीं आती कभी भी। अभी कहते हैं आत्मा नहीं मरती और अगर अच्छे कर्म किये हैं जीवन में तो भगवान से मेल हो जाता है , दुःख की कोई बात नहीं है , फिर इसे शोकसभा क्यों कहते हैं। जश्न होना चाहिए। मैं समझा नहीं सका मगर मैंने हमेशा समझा यही है। मौत से मुझे शायद ही डर लगा हो , ज़िंदगी ने डराया है मुझे हमेशा। 

           मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।

    रस्मे-दुनिया है निभा लेते हैं मगर ऐसे भी नहीं , आप तो भाषण देने लगे , इतनी मुहब्बत होती जिनको उनकी आवाज़ आंसुओं में डूब जाती है। संख्या की बात छोड़ो कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे कितने अधिक आये या थोड़े आये , मगर जितने भी आये हैं सब दावा करते हैं मुझे जानते हैं समझते हैं , ज़िंदा था तब तलक तो मुझे पहचान नहीं सके आप लोग। मुझे लगता था शायद मैं किसी और जहां का हूं गलती से आपकी दुनिया में भटक कर चला आया। उपकार तो किया है आपने घंटा भर मेरे लिए मेरे नाम पर खर्च किया है और बदले में मैं इतना भी नहीं कर सकूंगा कि बदला चुका सकूं , उस जहां से वापसी का रास्ता नहीं मालूम। दोस्त तो दोस्त वो भी आये हैं जो जलते थे मुझसे बिना बात दुश्मन समझ , मैं कब किसी का दुश्मन बना कभी। आया ही नहीं दुश्मनी करना , जो दुश्मनी करते रहे उन्हें ठीक से दुश्मनी निभानी भी नहीं आती। अगर आती होती तो वही लोग इक पार्टी रखते जश्न मनाते गाते झूमते ख़ुशी मनाते। कम से कम इसी तरह मेरी इक इच्छा ही पूरी हो जाती। वो पंजाबी गीत भी सच नहीं हुआ , जदों मेरी अर्थी उठा के चलणगे , मेरे यार सब हमहुमा के चलणगे। चलणगे मेरे नाल दुश्मन वी मेरे , ओ वखरी ए गल मुस्कुरा के चालनगे। आप तो यहां भी झूठ का दिखावा कर रहे हो। झूठी गमगीन सूरत बनाकर किसे बहला रहे हो अपने आप को। या ऐसा तो नहीं कि अभी तक ऐतबार ही हो रहा कि मैं मर गया और मेरी शोकसभा आयोजित की जा रही है , खुद आकर तसल्ली करने पर भी शक बाकी है। अपने भीतर से मुझे निकाल दो और भूल जाओ अदावत की बातों को। मरने के बाद दोस्ती दुश्मनी क्या सभी रिश्ते नाते खत्म हो जाते हैं। औपचारिकता निभाना भी ज़रूरी था जनता हूं। पढ़ते पढ़ते सोचोगे ये लेखक भी कमाल का है मरने के बाद भी इसकी रचना पढ़नी पड़ रही है। वाह इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। 

                                      कल की बात से आगे 

     मुझे लगता है कि किसी के भी दुनिया से जाने के बाद अगर उसके अपने और चाहने वाले उसकी याद में कुछ भी करना चाहते हैं तो वह बात करें जो उस मरने वाले को पसंद हो या थी। ऐसा भारत में बेहद कम होता है मगर पश्चमी देशों में होता है ऐसा पढ़ते रहते हैं। अभिनेता अनुपम खेर के पिता की इच्छा थी उनके बाद शोकसभा नहीं इक शानदार पार्टी आयोजित की जाये और ऐसा ही किया भी गया। उनकी अलग दुनिया में कोई सवाल नहीं करता क्यों किसी ने क्या किया। मगर अधिकतर हम लोगों की दुनिया में अपने तरीके से कुछ करने की छूट नहीं होती है। मेरे इक दोस्त के पिता इन सब बातों को नहीं मानते थे ये उनके बेटे जानते थे , इसलिए जब वो सब भाई हरिद्वार अस्थियां लेकर जा रहे थे तो पिता की बात का ध्यान रखकर अस्थियां राह में किसी नदी में प्रवाहित कर खुद कहीं और चले गए हरिद्वार की जगह। मगर उनको नहीं पता चला कि जब वो किसी राह की नदी में अस्थियां डाल रहे थे तब किसी ने उनको ऐसा करते देख लिया था और पहचान लिया था। वापस घर आने पर कोहराम मच गया और लोग बहुत साल तक उनकी आलोचना करते रहे। कुछ ऐसे ही राजकुमार जो हम कहकर मुखातिब हुआ करते थे अपने अंदाज़ में डायलॉग बोला करते थे , नहीं चाहते थे कि उनके मरने की खबर भी किसी को पता चले और उनकी इस इच्छा को पूरा करते हुए उनका अंतिम संस्कार दो चार दोस्तों और परिवार के लोगों ने किया था और फिल्म उद्योग के लोगों तक को नहीं पता चला उनकी मौत कब हुई। अभी साल दो साल पहले की बात है इक बेहद अच्छे व्यंग्यकार की मौत के बाद उनकी इच्छा का आदर करते हुए उनकी रचनाओं का पाठ किया गया था। ये बेहद भावनापूर्ण दृश्य था कि जब उनकी बेटी आंखों में आंसू लिए उनकी हास्य व्यंग्य की रचना पढ़कर सुना रही थी। ऐसा ही कुछ मेरे दोस्त पंजाबी के शायर कवि हरिभजन सिंह रेणु की शोकसभा में दिखाई दिया था सिरसा में ही। किसी भी वास्तविक रचनाकार को इससे बेहतर श्रद्धांजलि नहीं दी जा सकती है।
          मैंने कुछ रचनाएं लिखी हैं इसी विषय को लेकर। हास्य व्यंग्य कविता श्रद्धांजलि सभा , इक ग़ज़ल , जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये , इक कविता नाट्यशाला , मैं रहूंगा हमेशा , मेरी खबर। इक बात किसी कवि की कविता की मुझे बहुत पसंद आई थी और उसे मैंने अपनी कविता श्रद्धांजलि सभा के आखिर में लिखा भी है उसको दोहराना चाहता हूं।  दोस्तो मेरे लिए स्वर्ग की दुआ मत करना ,न ही मुझे मोक्ष या मुक्ति की चाह है।

भगवान से यही कहना है कि ,
मुक्ति दे देना तुम  ,
गरीब को भूख से  ,
दिला सको तो दिला दो  ,
मानव को घृणा से मुक्ति ,
और नारी को  ,
दे देना मुक्ति अत्याचार से  ,
मुझे जन्म देते रहना  ,
बार बार इनके निमित।
मित्रो ,
मेरे लिये  स्वर्ग की  ,
प्रार्थना मत करना  ,
न ही कभी मेरी  ,
मुक्ति की तुम दुआ करना ,
मेरी इस बात को  ,
तब भूल मत जाना  ,
मेरी श्रधांजली सभा में  ,
जब भी आना।

Tuesday, 22 May 2018

सरकार के चार वर्ष का हिसाब ( श्वेत पत्र ) डॉ लोक सेतिया

  सरकार के चार वर्ष का हिसाब ( श्वेत पत्र ) डॉ लोक सेतिया 

 जश्न की तैयारी हो रही है। कहा जा रहा है कि बताया जाएगा क्या क्या किया हमने चार वर्ष के शासन में। जनाब चार साल से यही तो करते आ रहे हैं। खुद अपनी महिमा का गुणगान तो भगवान भी कभी नहीं कर सके , अच्छा नहीं लगता। वैसे भगवान को भी तूती पसंद है मेरे इक दोस्त ऐसा कहा करते हैं। अर्थात ये माना जाता है कि ईश्वर अपनी स्तुति अपनी अर्चना अपनी महिमा का वर्णन सुन कर खुश होते हैं। मैं धर्मों की बहुत थोड़ी जानकारी रखता हूं और भगवान और धर्म को लेकर जब लिखता हूं तो सच लिखते डरता नहीं अपनी धर्मपत्नी जी की तरह। ऐसा इसलिए कि मुझे बचपन से गुरुग्रंथ साहिब से लगाव रहा है , और बाकी धर्म की किताबों को भी पढ़ा ज़रूर है मगर समझा नानक जी की बातों को अधिक अच्छी तरह से है। जिस धर्म की पहली बात ही सच ही ईश्वर है ऐसा बोलने वालों पर कृपा हो , जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल। उसे मानना है तो सच कहना ही होगा। भगतसिंह जी भी बेबाक कहते थे कि जिस भगवान के होते इतना अन्याय अत्याचार होता हो मैं उसकी पूजा नहीं करता। सब से बड़ी बात जो शायद सिख धर्म के अनुयाइयों को भी समझनी है वो ये कि गुरु जी की बानी है कि उस खुदा ईश्वर परमात्मा की आरती तो हर पल हो रही है , गगन में थाल ......  जिसे आरती बना लिया है। अर्थ क्या है कि आकाश में चांद सितारे सूरज दीप की तरह ज्योति जलाये हैं और धरती की सारी वनस्पति सुगंधित फूल आदि उसी को अर्पित हैं भला हम कैसे उसकी आरती कर सकते हैं। जो सबको सब कुछ देता है उसको किसी से क्या चाहिए और जो समझता भगवान को कुछ भी धन या सामान भेंट किया है उसे सोचना होगा , तेरा तुझको देवत क्या लागत है मोरा। फिर भी श्मशानभूमि तक नाम लिखवा लेते हैं तस्वीरें लगवा लेते हैं। इस सब का अर्थ भी समझाना होगा , तो सुनिए बंधु देश का सब कुछ किसका है , जनता का ही है तो फिर आपने सरकार बनाकर जनता को क्या दिया है। किस बात का इश्तिहार किस बात का ढिंढोरा किस बात का अहंकार है। वास्तविकता तो ये है कि जैसे भगवान आपको लाखों देता है और आप उसी में से सौ या हज़ार देकर दानी कहलाना चाहते हो , यही सरकार करती है। मगर इक बात और है ऊपर वाले का भी हिसाब किताब है और धार्मिक लोग कहते हैं कि ऊपर वाले की चक्की बहुत बारीक पीसती है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है , ये मुकेश जी का गया गीत उस भजनों से अच्छा और सच्चा है जो धार्मिक स्थलों पर फ़िल्मी धुनों पर गाये बजाए जाते हैं। भमिका लंबी हो जाये तो पाठक उकता जाता है इसलिए असली बात पर आते हैं। 
            तमाम लोग उपलब्धियों की बात लिख लिख जोड़ रहे हैं मगर जो जो वास्तव में किया किसी को भी ध्यान ही नहीं। इससे पहले कि विपक्षी श्वेत पत्र की मांग करें झूठ को सच बताने पर , मैंने बिना किसी से कोई मेहनताना मांगे उनका काम करना शुरू कर दिया है। मेहनताना मिलने की उम्मीद भी नहीं है , जो लोग कहने को स्वच्छ भारत अभियान की बात करते हैं मगर राज्य में सफाई करने वालों को बराबर वेतन नहीं देने की ज़िद पर अड़ जाते हैं वो किसी को क्या देंगे। मगर उन्होंने जो जो किया उसे इतिहास में दर्ज तो करना लाज़मी है। पहले उनकी बात जो काला सफेद करते हैं। बताया नहीं अभी तक कितने काले धन वालों को घोटाले करने वालों को जेल में डाला है। जो आपकी नाक के नीचे विदेश भाग गए उनकी बात सब को मालूम ही है। ये राज़ भी बताना चाहिए कि कितने अपराधी और दाग़ी नेता आपके दल में शामिल होकर गटरगंगा के स्नान से स्वच्छ भारत का हिस्सा बन गए , कितनी सरकारें आपने नैतिकता और संविधान की मर्यादा को ताक पर रखकर बनाई हैं। ये सब आप पिछली सरकारों पर डालकर बच नहीं सकते हैं। वो अच्छे दिन तो आपके नेता बेशर्मी से घोषित कर ही चुके हैं कि इक चुनावी जुमला था। जिस बात से आपको जनता ने बनाया अगर वही कोरी भाषण देकर जनता को ठगने की बात थी तो आप वास्तव में महान हैं। फिर भी आपने बताया है अठारह घंटे काम करते हैं तो हिसाब लगाना चाहिए इतनी अटूट मेहनत की किस काम को।
                  आप पीएमओ कितने दिन गए कितने घंटे ये राज़ आप ही जानते हैं। मगर आपने 150 देशों की सैर की है और ठसक के साथ जाते रहे हैं , जैसे बादशाह मिलते थे गले और हाथ में हाथ डालकर दोस्ती करते थे उसी तरह। किसी को नहीं पता देश को क्या हासिल हुआ और इस से जनता की कैसी भलाई हुई , मगर सब जानते है आपने हर बार विदेश जाने से पहले उस देश की बहुत बातों को और कई अपने देश के लोगों की भलाई के विपरीत शर्तों को स्वीकार किया केवल अपनी जयजयकार करवाने को। ये कैसी भूख है शोहरत हासिल करने की जिसकी कीमत देश की गरीब जनता को भविष्य में चुकानी होगी। क्या सज धज क्या शान से दिन में सुंदर परिधान बदलना , लगता ही नहीं किसी अविकसित देश का तथाकथित सेवक है। ये सब क्या है , रोड शो की बात मुझे समझ नहीं आई क्यों किये जाते हैं ये तमाशे। किसी विदेशी को साथ लेकर किसे प्रभावित करना है। धर्म की बात करना ज़रूरी है , धर्म कहता है अपना कर्तव्य निभाओ अपने किये वादे पूरे करो , राम की ही बात है , कोई वचन निभाया आपने। संविधान की रक्षा की शपथ तक याद नहीं शायद। धर्म में साफ है पूजा अर्चना दान आदि अपनी कमाई से करते हैं। आपने पद संभालते ही किसी देश में पूजा की और एक करोड़ रूपये मूल्य की चंदन की लकड़ी दान कर आये , जबकि आपने घोषित किया था आपके पास सीएम रहते जो धन जमा था महिलाओं को दे आये हैं। कितने मंदिरों में कितना धन आपकी पूजा अर्चना पर इस गरीब देश का बर्बाद किया गया , भगवान जानता है मगर भगवान उससे खुश नहीं हो सकता है।
         आपने सब से बड़ा अनुचित कार्य जो किया वो है , हर धर्म समझाता है अपने से पहले के उन लोगों जो ज़िंदा नहीं हैं उनकी बुराई कभी नहीं करते हैं। आपको उनकी अच्छाई कभी नज़र ही नहीं आई और बुराईयां जो शायद ही सच थीं। इक सवाल है , उनके समय आपका शासन होता या उनका तौर तरीका ढंग आपसा होता तो क्या भारत देश में लोकतंत्र बचा रहता। ये उन्हीं की बदौलत है जो देश में कोई भी दल कोई भी व्यक्ति ऊंचे पद तक पहुंच सकता है। जिस तरह से तब के प्रधानमंत्री ने विपक्ष के अटलबिहारी वाजपेयी जी की खुले दिल से तारीफ की थी , करने का हौसला है आप में से किसी एक में। आपको सब याद आये मगर जिन जयप्रकाशनारायण के आंदोलन से आपको राह मिली उनको भुला दिया। भुलाना ही था अन्यथा आपको कैसे पसंद आती उनकी कही खरी बात , जो उन्होंने 25 जून 1975 को अपने भाषण में कही थी। मुझे याद है , क्योंकि मैं उस सभा में मौजूद रहा हूं और गवाह हूं उनकी बात का। उन्होंने कहा था शांति पूर्वक विरोध करना देश की जनता का अधिकार है और सुरक्षा बल देश के प्रति उत्तरदायी हैं न कि किसी सत्ताधारी नेता या अधिकारी के प्रति और अगर कोई उन्हें दमनकारी आदेश देता है अपने विरोध करने वालों पर लाठी गोली चलाने के तो शांति पूर्वक प्रदर्शन करने वालों पर ऐसा अनुचित आदेश नहीं मानें। आज आपत्काल घोषित नहीं है मगर जिस तरह आपने सभी जगह पर अपनी पसंद के लोगों को मनोनीत करने का कार्य निरंतर किया है वो तानाशाही का संकेत है। आपने तमाम ऐसे कार्य किये हैं जिनकी नुकसान की भरपाई कोई नहीं कर सकता। इस श्वेत पत्र की हर बात आईने की तरह साफ है।

Monday, 21 May 2018

आपकी ख़ामोशी मेरी जान ले लेगी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   आपकी ख़ामोशी मेरी जान ले लेगी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       इक आशिक़ को महबूबा से इतनी शिकायत है कि चुप नहीं रहे हां बोले चाहे ना बोले। ख़ामोशी जान ले लेती है। बस कुछ वही हाल है। लोग बात ही नहीं करते। दोस्त हैं फोन करो तो मिलने से कतराते हैं , आपके दल की सरकार है तो क्या हुआ। कब से हम खुलकर चर्चा किया करते थे हर सरकार की कामकाज की। कोई तो ऐसे भी थे जो खुद नहीं साहस करते थे तो मुझी से कहते भाई इस पर कुछ तो लिखो। वो और बात है कि मैंने किसी के कहने पर कभी कुछ नहीं लिखा। अब कोई चाहता हो नहीं लिखूं तो वो भी नहीं कर सकता या मुझसे नहीं होता है। अखबार वाले सच नहीं लिखना चाहते , टीवी वाले बचते हैं सच बोलने से। उस पर भी कहते हैं हम आज़ाद हैं , कौन आज़ाद है। आपको टीवी वाले बुलाते हैं इस विषय पर कविता पढ़ना। सरकारी राग दरबारी राग से अब अखबारी राग तक बात पहुंच गई है। शासक की समझाई बात को दरबार में कहना सरकारी राग , शासक को खुश करने को किसी नेता के नाम का गुणगान दरबारी राग सुनते थे , अख़बार टीवी चैनल मीडिया क्या अब साहित्य अकादमी सत्ता की आलोचना से घबराती है और निर्देश देते हैं ऐसा कुछ भी नहीं लिखा बोला जाये जिस से शासक नाराज़ हो जाये। इसको ख़ुदकुशी करना कहते हैं जब कोई कहता है :-

   माना आवाज़ है मेरा नाम , मगर आप ही कहो लाशों का बोलने से क्या काम।

ये लाइन मेरी इक व्यंग्य कविता की है , आंखो देखा हाल। वास्तविक घटना की बात है। इक अख़बार की ही बात है। उसे फिर से पढ़ना होगा। क्या हम वापस वहीं पहुंच गए हैं। आपात्काल में भी ऐसा सन्नाटा नहीं था। साहित्य अकादमी से लेकर सरकारी अधिकारी तक विरोध के स्वर को खामोश करना चाहते हैं। बंद कमरों में चीखते हैं ताकि बाहर आवाज़ नहीं सुन ले कोई। आज़ादी के इतने सालों बाद आज़ाद हुए नहीं हम लोग , लगता है गुलामी आदत बन चुकी है। खुदा बदल लेते हैं इबादत करने को। मेरा इक शेर है :-

        तुम खुदा हो , तुम्हारी खुदाई है , हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।

        ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन , लोग फिर भी बगावत नहीं करते। 

   कोई बता रहा था राजधानी गया था , दो लाख का इनाम मिला है , सम्मानित किया गया है। इधर समझ नहीं आता सम्मान अपमान का भेद भी। ये बाज़ारी दस्तूर है बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। इक गीत से ली है ये लाइन भी। जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखें मुझ में , राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है। लेकिन ऐसा होता है कभी राख में दबी कोई चिंगारी हवा से आग बन जाती है और कोहराम मच जाता है। आप भी देखोगे इक दिन इस राख में दबी हुई चिंगारी को शोला बनते हुए।

Saturday, 19 May 2018

कभी सब कुछ कभी कुछ नहीं करते ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   कभी सब कुछ कभी कुछ नहीं करते ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    ये इक मिसाल है , कर्नाटक में विधानसभा में बहुमत की बात , सरकार बनाने - गिराने की बात। कहने को लोकतंत्र बचाने की बात मगर वास्तव में व्यवस्था के होने नहीं होने की बात। सब ठीक हो गया या अभी होना बाकी है मुझे इस की चर्चा नहीं करनी है। कोऊ नृप होय मोहे क्या हानि , हम जनता तो शासित होने को हैं शासक कौन है क्या फर्क पड़ता है। सत्ता की छुरी ने जनता रुपी आम को काटना है और उसे खाना है अपना पेट भरना है स्वाद चखना है। फाडियां बनाकर खाएं या चूस कर या चाहे शेक बनाकर सब उनकी इच्छा पर है। फिर इसकी चर्चा का मकसद क्या है , मकसद है हर दिन हम देखते हैं राजनेताओं अधिकारियों और देश की सारी व्यवस्था जिस में न्यायपालिका से मीडिया तक चैन की बांसुरी बजाते रहते हैं अचानक कितने एक्टिव हो जाते हैं कि हर पल कुछ हो रहा कुछ बदल रहा सभी को समझ भी आता है और दिखाई भी देता है। मगर ऐसा होता हमेशा इक ख़ास वर्ग की खातिर ही है। आम नागरिक की बड़ी छोटी छोटी समस्या पर सालों साल होता कुछ भी नहीं। आखिर क्यों ? क्या देश और राज्य में सरकार बनाना एक मात्र कार्य है या सरकार होने का कोई और अर्थ भी है कि जो जो सामन्य रूप से होना है किया जाता रहे और जो नहीं होना चाहिए उसे करने नहीं दिया जाये और न ही कोई वो कार्य करे जो उसे नियमानुसार ईमानदारी से नहीं करना चाहिए। इसी को फिर से देखें तो बहुत कुछ है जो नहीं किया जाना चाहिए था। जिनको मालूम था उनके पास संख्या बल नहीं है उनको सरकार बनाने का दावा करने के साथ राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद का मनमाने ढंग से दुरूपयोग नहीं करना चाहिए था और अगर सरकार बनाना चाहते भी थे तो उसके लिए विधायकों को खरीदना या लालच देना अथवा डराना धमकाना जैसे आपराधिक ढंग नहीं अपनाने चाहियें थे। सोचो अगर सर्वोच्च न्यायालय कठोर कदम नहीं उठाता और कुछ दिन की मोहलत उनको मिल जाती तो जो नहीं हुआ और नहीं होना चाहिए वही हुआ होता। ये नौबत आई ही इसलिए कि देश में हर कोई अपनी सुविधा और स्वार्थ की खातिर जब जो मर्ज़ी करता है , किसी को लाज नहीं आती , कोई शर्मसार नहीं होता अपने आचरण पर। जो पीछे से निर्देश देकर इस देश की व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने का काम कर रहे थे उन पर आंच नहीं आई और उनके गंदे मनसूबे सामने आकर भी ढके छुपे रह गए। दो दिन में दूसरा पक्ष सरकार बना लेगा और बहुत हद तक वो भी अवसरवादी गंदी राजनीति से किनारा नहीं करेगा ऐसा अक्सर होता है। सत्ता की पदों की बंदरबांट होगी और वास्तविक जनादेश की चर्चा को विराम दे दिया जाएगा। 

                          ये सब तब क्यों नहीं होता। 

       ये केवल भूमिका थी जिसे थोड़ा विस्तार से बताना पड़ा ताकि समझा जा सके। आम नागरिक की समस्याएं वास्तव में बहुत बड़ी नहीं होती हैं और अगर सरकार और सरकारी अधिकारी खुद ही जो उचित है उसे करते रहें और जो अनुचित हो उसे रोकते रहें तो हम सभी को शिकायत करनी ही नहीं पड़े। हम विवश होकर शिकायत करते हैं और अपने अधिकार मांगते हैं जो अधिकारी नेता देते नहीं हक की तरह और जब देना पड़े तो खैरात की तरह उपकार बतला कर देना चाहते हैं। वो ऐसा कर सकते हैं क्योंकि हमारे बीच में से कुछ लोग खुद अपने स्वार्थ के लिए ऐसे कार्य करते हैं जो उनको पता होता है कि करना अनुचित है। सब से पहले अगर देश के नगरिक ही सभ्य ढंग से नियम कानून का पालन करें तो अधिकतर मुश्किलें खड़ी ही नहीं हों। सड़क पर वाहन चलाते बहुत लोग औरों के लिए खतरा बने होते हैं , लाल बत्ती पर किसी को जिस तरफ टर्न लेना उस तरफ नहीं दूसरी तरफ वाहन खड़ा कर जब ह्री बत्ती हो तब गलत ढंग से अपनी सड़क को मुड़ते हैं और पुलिस वाला चुपचाप देखता रहता है रोकता नहीं समझाता नहीं। लोग अगर औरों को असुविधा नहीं होने की बात पर ध्यान दें तो ये कोई समस्या ही नहीं है।
                                इसी तरह गंदगी की बात है , हमारे अधिकतर शहर बेहद गंदे दिखाई देते हैं। स्वच्छता अभियान के नाम पर इश्तिहार ही दिखाई देते हैं। जिन को सफाई का ध्यान रखना है और शहर की गंदगी मिटानी है वो नगरपरिषद के प्रधान से सीईओ तक हद दर्जे के लापरवाह और गैर ज़िम्मेदार लोग हैं। किसी ने सरकारी प्लॉट्स को रोका हुआ है किसी ने सड़क को किसी ने पार्क को किसी ने फुट पाथ को। कोई नहीं विचार करता पार्किंग की जगह अपना धंधा करोगे तो लोग वाहन सड़क पर खड़ा करेंगे। ठीक है कुछ लोग विवश होकर रोटी कमाने को ऐसा करते हैं मगर बहुत हैं जो न केवल किराये की जगह ले सकते हैं बल्कि उनकी अपनी दुकानें हैं जो किराये पर उठा रखी हैं और खुद अनधिकृत कब्ज़ा आदतन करते हैं। जो गरीब मज़बूरी में किसी जगह धंधा करते हैं उनको भी अपनी गंदगी का प्रबंध खुद करना तो चाहिए। सड़क पर पार्क में फुट पाथ को गंदा करना मज़बूरी नहीं कहला सकता। आप के कारण गंदगी बदबू ही नहीं लोगों को रोग तक होने का अंदेशा है। आपके कारण कोई बीमार हो ये कैसे आपका अधिकार हो सकता है। जब कोई इसकी शिकायत करता है तो विभाग के लोग और अधिकारी अनुचित कार्य रोकने का उपाय नहीं करते उल्टा आम लोगों को आपस में भिड़वा देते हैं। किसी ने किसी की शिकायत निजि कारण नहीं की , जनहित और शहर में अपने आस पास सब की परेशानी और स्वस्थ्य को वातावरण को प्रदूषित होने को लेकर की है। आपको उचित काम नहीं करना क्योंकि आपके स्वार्थ जुड़े हैं अनुचित काम करने वालों से संबंध हैं , मतलब आप किस तरफ हैं गंदगी करने वालों का बचाव करते हैं मगर स्वच्छ भारत अभियान को असफल करते हैं।
           ये एक दो समस्याओं की बात है। मगर बहुत ऐसी समस्याएं हैं जो सरकार और सरकारी विभाग अपना कर्तव्य निभाएं तो पैदा ही नहीं हों। कर्नाटक की बात करने का मकसद यही था कि जिस तरह सब ख़ास लोगों की समस्या पर तेज़ी से कार्य करते हैं आम जनता की समस्याओं को लेकर होते तो कितना अच्छा होता।

Friday, 18 May 2018

जो दवा के नाम पे ज़हर दे ( उल्टा सीधा ) डॉ लोक सेतिया

  जो दवा के नाम पे ज़हर दे ( उल्टा सीधा ) डॉ लोक सेतिया 

    आपने कहानियां पढ़ी नहीं भी हों तब भी दादी-नानी से सही सुनी ज़रूर होंगी। परिकथा के साथ साथ विषकन्या की भी कहानी हुआ करती थी। जैसे आजकल लोग नेताओं की मीठी मीठी बातों में सुध बुध भुला देते हैं और इक तरह के सम्मोहन में फंस कर वही देखते सुनते बोलते ही नहीं सोचते समझते तक वही हैं जो ऐसे जादूगर चाहते हैं। जादू का खेल आजकल बाज़ार में चलन में कम बेशक हो जादू का खेल खेलने वाले खेल रहे हैं। सरकार कहती रहती है कभी कभी कि उसके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है गरीबी मिटाने को , मगर सत्ता मिलते खुद सत्ताधारी नेता कैसे मालामाल हो जाते हैं और कैसे उनका दल अचानक अमीर हो जाता है और हर राज्य हर शहर में उनके दफ्तर की ऊंची ऊंची आलीशान इमारतें खड़ी हो जाती हैं जो पचास साल में नहीं हुआ पांच साल में संभव हो जाता है तो कोई जादू की छड़ी होती ज़रूर है। मगर बात कुछ और है आज विषय है कि कैसे कोई ज़हर देता रहता है फिर भी लोग उसी को दुआ देते दिखाई देते हैं। ज़रूर उसके ज़हर में कुछ ख़ास है जो लोगों को मज़ा देता है। 
            राजा लोग दुश्मन को दोस्त बनाकर अपनी विषकन्या से कत्ल करवाते थे। देखने में बला की खूबसूरत मगर भीतर बदन पर विष ऐसा जो छूते ही मार डाले। आजकल महिलाओं के लिए पार्लर नाम की इक जगह है जो लैला को जूलियट बना देते हैं रंग बदल कर , फ़िल्मी किसी रंगभेद की बात नहीं है , उदाहरण का सीधा मकसद काले को सफेद कर दिखाना है। कुछ ऐसा ही होता है राजनीति में जिसको कोई चिमटे से नहीं छूना चाहता था उसे गले लगाते हैं जब दृश्य बदल जाता है। दागी अपराधी सब शरीफ हो जाते हैं सत्ता के साबुन से नहाने के बाद। जब कोई शासक बन जाता है तो उसकी तस्वीर हर जगह हर दीवार पर सरकारी दफ्तरों में इतनी प्यारी लगती है जैसे उसने चुनाव नहीं जीते सुंदरता की प्रतियोगिता में अवल आये हैं। 
     महलों में राजसी शान ठाठ मिलते ही बात भले गरीब परिवार में जन्म लेने की करते हैं ढंग और तौर तरीके महाराजा जैसे दिखने लगते हैं। इन्हें देख कर वो कहानी झूठी लगती है जिस में इक भिखारिन रानी बन कर भी भीख मांगने की आदत नहीं बदल पाती है। सत्ता पर आसीन होते ही जनता से वोट भी भीख की तरह नहीं मांगते हैं , गब्बरसिंह की तरह धमकाते हैं कि तुम्हारे पास बचने का एक ही उपाय है मेरी शरण में आना। रामगढ़ वाले भी ऐतबार करने लगते हैं यही उपाय अच्छा है , शायद इसी से अच्छे दिन का जुमला निकला होगा। शोले फिल्म इतिहास है और इतिहास दोहराया जा सकता है। अभिनय में दलीपकुमार से अमिताभ बच्चन तक नेताओं के सामने पानी भरते हैं। वास्तव में फ़िल्मी लोगों को नेताओं से सबक सीखना चाहिए। जब कभी भी फ़िल्मी महानयक और नायिका अपने दम पर राजनीति में आये हैं कमाल कर दिखाया है। सभी दल वाले उनको सभाओं में तभी बुलाया करते हैं। मगर बड़ा अंतर यही है कि फिल्म में अकेला नायक बीस गुंडों को मार गिराता है जबकि राजनीती में बड़बोले लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं मगर वास्तव में नतीजा शून्य होता है। ये शून्य भी अजीब है अकेला कोई हैसियत नहीं रखता लेकिन सौ के बाद हज़ार हज़ार के बाद दस हज़ार से अरबों की संख्या बना सकता है। ज्योतिष वाले शून्य के भाग्य को कभी नहीं बांच सके। शून्य कुछ नहीं है फिर भी सब कुछ है। आज की देश की राजनीति का ज़रूरी पाठ यही है।

मेरी अपनी मुहब्बत की कहानी - डॉ लोक सेतिया

       मेरी अपनी मुहब्बत की कहानी - डॉ लोक सेतिया 

   मुहब्बत की नहीं जाती हो जाती है , मुझे भी उस से इश्क़ हो गया। कब क्यों कैसे हुआ कभी किसी को पता चला है। आप जो समझ रहे हैं वैसा नहीं है , मेरा विवाह प्रेम विवाह नहीं है। साफ बात है कि जिस मुहब्बत की बात कर रहा हूं वो मेरी बीवी नहीं है। ये भी झूठ नहीं है कि मुझे उस से आज भी मुहब्बत है और हमेशा रहेगी भी। आपने इश्क़ नहीं किया अगर आप सोचते हैं कि इश्क़ करना छोड़ दूं , भला इश्क़ कभी मर्ज़ी से किया जाता है या छोड़ा जाता है। बस हो जाता है तो हो ही जाता है और उसके बाद चैन नहीं आता बिना मुहब्बत के। जान के साथ जाता है और बाद में भी निशानी छोड़ जाता है। जानता हूं मिलना चाहते हो मेरी महबूबा से , थोड़ा इंतज़ार तो करो अभी। नाम जान कर क्या करोगे , खूबसूरत बहुत है। बला का हुस्न है बयां करना आसान नहीं है। ग़ज़ल जैसी नाज़ुक कविता जैसी दिलकश और कहानी जैसी भी जो शुरू कहां से हुई और खत्म कब कहां कोई बता नहीं पाता। कोई कहानी कभी खत्म नहीं हुआ करती , केवल विराम दे देते हैं। और उसके बाद , याद आया उपन्यास का नाम यही तो था , और उसके बाद। बहुत साल संभाल कर रखा था पर न जाने कहां खो गया , दत्त भारती मेरी पसंद के उपन्यासकार थे। कितना रुलाया उनकी लिखी कहानी ने मुझे , बार बार पढ़ता था। जिल्द फट गई थी उपन्यास की किताब की , बिना जिल्द की किताब कब तक रहती बचकर। बिक गई हो शायद रद्दी में अनजाने में , नहीं नहीं मैं भला बेच सकता हूं किताबों को रद्दी में , कभी नहीं। चाहता हूं दिलोजान से। 
                                  अब लगता है कुछ कुछ समझ गये हो तो छुपाना क्या , बता ही देता हूं मैंने बस इसी से मुहब्बत की है , अपनी कलम से लेखनी से और लिखना ही मेरी इबादत है जूनून है। ये बुरी आदत है इक पागलपन है नशा है जो छोड़े नहीं छूटता किसी भी लेखक से। जो लिखना छोड़ देते हैं वो ज़िंदा नहीं रहते बाद में , कोई लिखने वाला लिखना छोड़ देता है तो वो सच्चा आशिक़ नहीं है उसका इश्क़ इश्क़ था ही नहीं। झूठी मुहब्बत की कहानी सुनाते हैं वो लोग। मुहब्बत में सब से बड़ी मुश्किल यही तो है आशिक खुद नहीं जनता मुहब्बत क्यों हुई , महबूबा को क्या जवाब दे , दिल को है तुझ से प्यार क्यों ये न बता सकूंगा मैं। ये मेरा दिवानापन है या मुहब्बत का सुरूर , तू न पहचाने तो है ये तेरी नज़रों का कसूर। इन प्यार के कुछ गीतों ही ने कितने आशिक पैदा किये होंगे। जगमोहन जी का गया ये गीत बहुत लोकप्रिय रहा है , इक बार की बात है वो इक कार्यकर्म में शामिल होने आये किसी शहर तो किसी ने मंच पर जाने से पहले कहा जगमोहन जी आपने मुझे बर्बाद कर दिया , वापस उतरने लगे कार्यकर्म के अंत में तो फिर वही बोल सुनाई दिये। रहा नहीं गया उनसे , बुलाया उसे पास और पूछा भाई मैं नहीं जनता आपको , भला क्या किया मैंने जो आप इल्ज़ाम धर रहे हो अपनी बर्बादी का मुझपर। वो बोला आपका ये जीत रेडिओ पर बजता रहता था , और सामने की खिड़की में इक हसीन लड़की बैठी रहती थी , गीत सुनते नज़रें मिलती और मुहब्बत हो गई थी। अब बीवी है मेरी हमने शादी कर ली थी , अब पछताता हूं तभी आपको सच कहा आप ही ने मुझे बर्बाद किया है। हंस दिए जगमोहन जी भी उसके साथ साथ। मुहब्बत बर्बाद तो करती ही है , इश्क़ करने वालों को , आशिकी का यही मज़ा है। इक आशिक़ गाता है वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और के सर जाये तो अच्छा। ये क्या बात हुई मुजरिम कोई और झूठा इल्ज़ाम किसी पर। इक पंजाबी ग़ज़ल है , उसका इक शेर है , तुम कहते हो मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है , नहीं हेराफेरी नहीं। मैनूं इश्क़ दा लगेया रोग मेरे बचणे दी नहींयों उम्मीद। 
                                 मुहब्बत कर किसी को कुछ भी मिला नहीं कभी , वो कहते हैं ना , इश्क़ ने ग़ालिब निक्क्मा कर दिया , वरना हम भी आदमी थे काम के। मेरी ज़िंदगी भी मेरे लिखने के जूनून ने कम बर्बाद नहीं की। लोग पागल समझते हैं और बच कर दूर रहते हैं इस डर से कि कहीं उनको भी ये नामुराद रोग नहीं लग जाये। आसान नहीं है इश्क़ करना और होना , ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। मुहब्बत सबकी महफ़िल में शमां बनकर नहीं जलती , हसीनों की नज़र सब पर छुरी बनकर नहीं चलती , जो हैं तकदीर वाले बस वही कुर्बान होते हैं। हर किसी को नहीं मिलता यहां प्यार ज़िंदगी में ,खुशनसीब है जिसको मिली ये बहार ज़िंदगी में। इक शायर की बहुत पुरानी ग़ज़ल है। 
रंग जब आसपास होते हैं , रूह तक कैनवास होते हैं। 
खून दे दे के भरना पड़ता है , दर्द खाली गलास होते हैं। 
सैंकड़ों में बस एक दो शायर , गहरी नदियों की प्यास होते हैं। 
हमने यूं ही मिजाज़ पूछे थे , आप नाहक उदास होते हैं। 
कल यूं ही बैठे बैठे इक चुटकुला बना लिखा अपनी फेसबुक वाल पर। मास्टरजी समझाते हैं इश्क़ कभी मत करना। ठीक है विद्यार्थी मान जाता है। मास्टरजी आशिर्वाद देते हैं लंबी आयु जीने का। विद्यार्थी कहता है मास्टरजी इश्क़ नहीं करना तो जी कर करेंगे क्या। 
इक दोस्त ने कमेंट किया खतरनाक चुटकुला है। भाई खतरनाक क्या नहीं है। इस देश में खतरा ही खतरा है। और सच बोलने से अधिक खतरा किसी बात में नहीं है। खतरों में बीता है अपना हर दिन नहीं हर पल भी। तभी तो अपने लिखने को और बेबाक सच बोलने को अपनी मुहब्बत कहता हूं , नहीं छोड़ सकता चाहे जो भी अंजाम हो। जगजीत सिंह की गाई इक ग़ज़ल हाज़िर है। 

सच्ची बात कही थी मैंने , लोगों ने सूली पे चढ़ाया ,

मुझको ज़हर का जाम पिलाया , फिर भी उनको चैन न आया। 

वक़्त जहां भी ले के गया है , ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है ,

सच का ये इनाम मिला है , सच्ची बात कही थी मैंने। 

सबसे बेहतर कभी न बनना , जग के रहबर कभी न बनना ,

पीर पैयंबर कभी न बनना , सच्ची बात कही थी मैंने। 

चुप रहकर भी वक़्त गुज़ारो , सच कहने पे जां मत वारो ,

कुछ तो सीखो मुझसे यारो , सच्ची बात कही थी मैंने। 

अभी मुहब्बत की कहानी बहुत बाकी है , आखिरी सांस तक जारी रहेगी। अपनी इक ग़ज़ल के शेर से विराम लेता हूं। 
         सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे , अब ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे।
                                                  लोक सेतिया "तनहा"

Thursday, 17 May 2018

खुदा से शिकायत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        खुदा से शिकायत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हमेशा सोचा था , 

रहा नहीं गया , कह दिया। 

खुदा तूने किस बात का बदला लिया ,

सारी उम्र मुझे दर्द ही दर्द दिया। 

बोला हंसकर मुझसे खुदा ,

तुझको मैंने प्यार किया यही किया। 

तुझे दर्द मिले ज़ुल्म किये सभी ने ,

हर दिन अपमान का विष भी पिया। 

पल भर नहीं भूला मुझको कभी ,

बस इक मेरा हमेशा नाम लिया। 

समझा दुःख सहकर सभी के दुःख ,

किसी से कभी नहीं बदला भी लिया। 

मैंने कहा बता मेरे खुदा सब का दर्द मैंने सहा ,

अपना समझ औरों का दर्द सदा है लिखा। 

कोई तो होता मेरा भी साथी दुनिया में ,

हर घड़ी सबसे अकेला ही मैं लड़ा। 

तुमको सच बोलने की ताकत दी थी मैंने ,

खुदा बोला तभी कभी नहीं तू किसी से डरा। 

लेकिन फिर भी मिला मुझे सच का सिला ,

रोया मैं झूठ रहा हंसता हुआ खड़ा। 

खुदा हंसा हंसकर इतना ही कहा ,

सच बोलकर निडर तू है हमेशा रहा। 

झूठ बाहर से हंसता हुआ लगता था ,

अंदर से रहता था सच से डरा डरा। 

सुख मिला हो या दुःख हो मिला किसी को ,

बड़ी बात है कौन किस तरह है जिया। 

दुनिया को मिला सब कुछ लेकिन ,

उनको नहीं जो तुझको मिला है खुदा।


Wednesday, 16 May 2018

थोड़ी ख़ुशी थोड़ा ग़म ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        थोड़ी ख़ुशी थोड़ा ग़म ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    कल ही की बात है सुबह लड्डू खा खिला रहे थे , दोपहर तक ख़ुशी अधूरी लगने लगी जब जीत भी थोड़ी कम रह गई और बहुमत नहीं मिला। जीत का सेहरा जिनके सर बंधना था उन्हीं के संसदीय क्षेत्र में इक हादिसा भी इसी दिन हो गया।  ग़म भी थोड़ा मिला तो ख़ुशी मनानी मुश्किल हो गई। बहुमत का जुगाड़ कर सत्ता मिलते ही चुनावी दुःख दर्द भूल जाएगा मगर जो लोग बेमौत मारे गए उनकी याद किसे रहेगी। दो पांच लाख मिल गए सरकार की मेहरबानी कम नहीं है। उधर कुछ गिद्ध लाशों पर अपनी असलियत दिखला रहे थे मुर्दाघर से लाश मिलने को रिश्वत की मांग कर रहे थे। भला भ्र्ष्टाचार कैसे हो सकता है उनके अपने क्षेत्र में अपने दल के शासन में। जांच होगी और हमेशा की तरह पुल गिरने से लेकर लाश की कीमत मांगने तक होगा कुछ भी नहीं। आज तक सरकारी विभागों के गलत काम करने या उचित काम नहीं करने की कोई सज़ा किसी को मिली है। बदलता कुछ भी नहीं है। सरकार बदलने से सरकारी लोग नहीं बदलते न ही उनके तौर तरीके बदलते हैं। छोड़ो शेरो शायरी , है लाश वही सिर्फ कफ़न बदला है। ये कफ़न भी सफ़ेद नहीं किसी रंग से रंगा है। 

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर , दामन इंसाफ़ का या खून से यूं रंगा है। उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ , " लोक " राजा को वो कहता है निपट नंगा है।

   राजनेता तो मगरमच्छ के आंसू बहाना जानते हैं मगर सरकारी अमला तो बाढ़ हो सूखा हो या कोई आपदा हो , कभी उनसे फायदा उठाने में पीछे नहीं रहते। ये कुछ अलग तरह के पत्थर से बने लोग होते हैं जिनमें मानवीय संवेदना नाम की भावना नहीं होती , पाप पुण्य का अपराधबोध नहीं होता। वेतन भले लाखों रूपये मिलते हों और सुविधाएं करोड़ों की मुफ्त में फिर भी ऊपर की कमाई का मोह जाता ही नहीं है। अब रिश्वत अपराधी ही देंगे सहयोग पाने के लिए या आम नागरिक को अकारण परेशान करने से मिल सकती है , अपना कर्तव्य निभाने से केवल वेतन मिलता है। इक विशेष बात होती है बड़े बड़े अफसरों की कोई उनसे विभाग में हो रहे अनुचित कार्यों की बात करे तो ऐसे भाव दिखलाते हैं जैसे उनको कुछ अता पता ही नहीं। इतने भोले लगते है कि उन पर न्यौछावर होने को दिल करता है। हुस्न वाले कातिल होते है तो ये भोलेपन की आड़ में क्या नहीं कर जाते। 
                      कौन कहता है गिद्ध कम हो रहे हैं , सरकारी दफ्तरों की कुर्सियों पर कितने गिद्ध विराजमान हैं। ये किसी इंसान की मौत का इंतज़ार नहीं करते , जीते जी इंसानों के जिस्म की बोटी बोटी नोच खाते हैं। ये सभी पल भर में चेहरा बदल लेते हैं। हादिसे में मरे लोगों को सांत्वना देते दुःखी लगते हैं और उस जगह से बाहर निकलते ही किसी बात की ख़ुशी में जाम छलकाने लगते हैं। दोनों मिलने से सत्ता का नशा और बढ़ जाता है तभी नेता जी थोड़ी अधिक जीत मिलते ही किसी दल को नीचे दिखलाने वाले बयान देने लगते हैं। थोड़ी लाज शर्म बचाकर रखनी चाहिए और अपने अतीत को कभी नहीं भुलाना चाहिए। शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस शाख पे बैठे हो वो टूट भी सकती है।
                        इन राजनेताओं की परेशानी बढ़ गईं हैं जबसे इनकी बातें विडिओ में रिकॉर्ड होने लगी हैं , बार बार उपहास होता है देश के सब से बड़े पद का जब कोई बात नेता जी सत्ता में आने के बाद बोलते हैं और मीडिया वाले उस की उल्ट कही बात भी याद करते हैं जब किसी और की सत्ता थी और आपने कही थी। मगर टीवी चैनल वाले कभी इसको तूल नहीं देते क्यिंकि उनको सत्ता साथ मिलकर विज्ञापनों की मलाई खानी है। इस को मनोरंजन की तरह खबरों के बाद कार्टून बना दिखला हवा में उड़ा देते हैं। ये हंसी ठठा भी नेताओं को अपना गुणगान जैसा लगे ये भी देखा जाता है। कभी अख़बार में इक कार्टून बहुत बेचैन कर दिया करता था। अब इस पुल गिरने पर भी नेता जी का पुराना बयान सुनाया गया जिस में वो तब की सरकार पर आरोप लगते हैं कि ये एक्ट ऑफ गॉड नहीं है भ्र्ष्टाचार है। ये सच है ऐसे हादिसे भगवान नहीं करवाता , कुछ लोगों की लापरवाही और अपराध के कारण होते हैं। मगर इन नेता जी की समस्या दूसरी है हर अवसर पर कोई न कोई विशेष पूजा करते रहते हैं मंदिर मंदिर जाकर और सब को मानना होगा उनसे बड़ा भगवान का भक्त कोई नहीं है। बेशक पहली बार सुन रहे हैं उनके खुद के भक्त लोग हैं जो उनके नाम पर लड़ भिड़ सकते हैं और हंगामा कर देते हैं जब कोई सत्ता धारी नेता की सरकार की आलोचना करे।
           आपने कभी किसी धर्म को समझा है , किसी भी धार्मिक किताब को पढ़ते तो मालूम होता कि पूजा पाठ अर्चना खुद अपने साधन और धन अदि से की जा सकती है। ये जनाब तो सत्ता मिलते किसी मंदिर में पूजा करते करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी दान में दे आये थे सरकारी कोष से। इसको आप भ्र्ष्टाचार भले नहीं कहोगे भगवान से डर कर मगर पद का दुरूपयोग और धर्मानुसार पाप ही होगा। ये अजीब धार्मिकता है जो जानवरों के नाम पर इंसानों की हत्या करवाती है। दैरो हरम में रहने वालो , मयखारों में फूट न डालो। आप पुण्यात्मा हम सब मुजरिम आपके हिसाब से मगर संविधान सब को बराबर मानता है। मंदिर और भगवान के नाम पर दंगे करवाना देश भक्ति नहीं है। व्यक्तिवाद परिवारवाद से खतरनाक है और किसी एक संगठन के लोगों को ही मनोनीत कर बड़े बड़े पदों पर बिठाने का अर्थ भी संविधान और लोकतंत्र के लिए खतरा है। देश को किसी मसीहा की ज़रूरत शासन करने को नहीं है , मसीहा होते हैं जो लोग वो सत्ता और शासन की हवस के भूखे नहीं हुआ करते। जिनको मसीहा लगता है कोई वो भी उनके सत्ता से बाहर होते कोई और मसीहा तलाश करते मिलेंगें।

Tuesday, 15 May 2018

खबर का सफर ( आईने के सामने ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

   खबर का सफर ( आईने के सामने ) आलेख - डॉ लोक सेतिया 

   अब कोई कल्पना भी नहीं कर सकता जो कभी ठोस वास्तविकता रही है। मीडिया टीवी चैनल अख़बार सभी राजनेताओं के भाषणों की बात सुनकर इतिहास इतिहास की रट लगाते रहते हैं मगर शायद ही कभी खबर के इतिहास की बात याद की हो किसी ने। इतिहास तो क्या अपना चेहरा तक भूल गये लगते हैं। आज किसी को याद नहीं होगा कि गांधी जी भी कभी अख़बार निकाला करते थे और देश की आज़ादी के आंदोलन में अख़बारों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बाबू बालमुकंद गुप्त जी का नाम भी शायद बहुत कम लोगों को पता होगा जो भारत में पत्रकारिता के पुरोधा माने जाते हैं और आज भी उनके नाम से इक पत्रिका नारनौल से बाबूजी का भारतमित्र नाम से निकलती है जिसके संपादक मेरे मित्र श्री रघुविंद्र यादव जी हैं। बाबू बालमुकंद गुप्त जी हरियाणा की भुमि की ही संतान थे , उनका जन्म हरियाणा के गुडियानी गांव में हुआ था। 
       आज़ादी से पहले ही नहीं उसके बाद 1975 तक भी अख़बार कोई व्यापार नहीं इक अंदोलन हुआ करता था। तब अख़बार जागरूकता फ़ैलाने और सच को उजागर करने का काम किया करते थे और बहुत जोखिम उठाकर घोटालों की खोज करते थे। खबर की वास्तविक परिभाषा ही यही है :-

खबर वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं दे रहा और पत्रकार का काम है उसका पता लगा कर आम जनता तक सूचना पहुंचाना। 

       ये सोचकर अजीब लगता है कि आजकल खबर उसे कहा जाने लगा है जो सरकार नेता अथवा बाकी लोग शोर मचा मचा कर बता रहे हैं। वो खबर कैसे है , खबर वालों को खुद अपनी खबर नहीं है। इक और शब्द पीत पत्रकारिता हुआ करता था जिसका अर्थ समझा जाता था कि जब कोई खबर किसी के कहने पर या अपने फायदे की खातिर बनाई जाए तो वो पीत पत्रकारिता होती है। उस नज़र से आज की पत्रकारिता पूरी की पूरी पीलिया रोग से पीड़ित है। खबर वास्तव में कोई देखने की वस्तु नहीं होनी चाहिए टीवी पर जो दिखाई जाती और जैसे दिखलाते हैं उस में खबर कहां खो गई या कत्ल कर दी गई कोई नहीं जान पाता है। टीवी सिनेमा की तरह इक मनोरंजन का माध्यम है और खबर को मनोरंजन बनाना किसी अपराध की तरह ही है। टीवी चैनल वालों को दोष नहीं देना चाहता , अख़बार वालों से गिला है। प्रसार संख्या और विज्ञापनों के मोहजाल ने उनको अपनी राह से ही भटका दिया है। सब से अधिक बुरा हुआ है टीवी और अख़बार दोनों के सरकारी विज्ञापनों के मोहजाल में फंस पर सच झूठ की पहचान भुला बैठे हैं। 

                                          बैसाखियों के सहारे

सब बोलते हैं हम तेज़ दौड़ रहे हैं मगर बिना सरकारी बैसाखियों के दो कदम नहीं चलते सभी। काश ये सब नहीं हुआ होता और अख़बार अपने आप को कारोबार नहीं जनहित का अंदोलन मानते तो शायद केवल अपना ही नहीं राजनीति से लेकर धर्म और समाज तक की गिरावट को रोका जा सकता था। बहुत बहस करते हैं हर समाचार को लेकर , कभी खुद खबर की दुर्दशा पर भी चिंतन किया जाता। 
                                                     ( अभी आगे जारी बाद में )

Monday, 14 May 2018

ख़ुदकुशी नहीं की मैंने , मुझे कत्ल किया गया - डॉ लोक सेतिया

  ख़ुदकुशी नहीं की मैंने , मुझे कत्ल किया गया - डॉ लोक सेतिया 

   आपने सही पढ़ा है जनाब , आप ही हैं मेरे कातिल। नाम भी लिखा हुआ है इक खत में पूरी कहानी लिखी है आज ही। मगर आपको चिंता की कोई बात नहीं है। सच लिखा था उस आईएएस अफ़्सर सत्येंदर दुबे ने 15 साल हो जाएंगे 27 नवंबर को। आप जैसे लोग ही थे पी एम ओ ऑफिस भी और भरष्टचारी लोग भी। ईमानदारी गुनाह है। इक कहानी याद आई है। इक राजा का राजकुमार गुरु के पास शिक्षा पाने गया हुआ था , शिक्षा पूरी होने के समय खुद राजा गया गुरु के आश्रम में राजकुमार को ले जाने को। पूछा गुरु जी शिक्षा पूरी हो गई है तो राजकुमार को ले जा सकते हैं। गुरु जी ने कहा आप गुरुकुल के बाहर इंतज़ार करें अभी शिक्षा पूरी कर भेजता हूं। 
                               राजकुमार को गुरु जी ने बुलाया और कहा आपके पिता आपको राजमहल ले जाने आये हैं और अब आप जा सकते हैं। राजकुमार झुका गुरु जी को प्रणाम किया और तभी गुरु जी ने अपने पास रखी छड़ी लेकर राजकुमार की पीठ पर मार दी। राजकुमार दर्द से भीतर तक कंपकपा गया। मगर गुरु जी को कुछ कह नहीं सकता था यही सीखा था नियम था। राजकुमार को सज़ा मिली कोई नहीं जनता था , उसने पिता राजा को भी नहीं बताया। किस बात की सज़ा मिली सोचता रहा। 
                          सालों बाद जब राजकुमार राजा बन गया तब उसने गुरु जी को सादर आमंत्रित किया दरबार में असीस देने को। जब गुरु जी आये तो परनाम करने के बाद कहा गुरु जी इक सवाल आपसे पूछना है अगर अनुमति दें तो। गुरु जी बोले ज़रूर पूछो। राजा बन चुका राजकुमार बोला आपने आखिरी दिन मुझे पीठ पर छड़ी से मारा था , मैं नहीं जनता मेरा क्या कसूर रहा होगा। गुरु जी बोले राजन वो कोई सज़ा नहीं थी न ही तुमने कोई अपराध ही किया था। वो आखिरी सबक था , मुझे पता था आपने आगे चलकर इक दिन पिता की जगह राजा बनना है। आपने सभी को अपराधों की सज़ा भी देनी होगी , मगर निर्णय करते समय आपको याद रहेगा कि किसी बेगुनाह को सज़ा मिल जाए तो वो कभी नहीं भूलता है। इसलिए आपको कभी किसी को भी गलती से ऐसे दंड नहीं देना है। न्याय करने वाले को इसका आभास होना ज़रूरी है कि किसी को अकारण दंडित नहीं किया जाये।   
                         मुझे कुछ भी नहीं कहना आपसे , इतना ही चाहता हूं आप गुनहगारों को छोड़ आम नागरिक को सज़ाएं देने का काम नहीं करें। कानून के अनुसार जुर्म करने से किसी को अपने अधिकारों से दंडित करना अधिक बड़ा पाप है। पाप की सज़ा ऊपर वाला देता है मगर उसकी लाठी बेआवाज़ होती है। देश की सरकार राज्य की सरकार को समझना होगा अन्याय करने वालों की कहानियां भूलती नहीं।

Saturday, 12 May 2018

सत्येंद्र दुबे की आत्मा की पुकार ( देश और राज्य की सरकार से फरियाद ) डॉ लोक सेतिया

                  सत्येंद्र दुबे की आत्मा की पुकार 

            ( देश और राज्य की सरकार से फरियाद ) 

                           डॉ लोक सेतिया

    आज के युग में हैं कितने लोग जो निडर होकर सच बोलते हैं ताकि देश और समाज से भ्र्ष्टाचार को खत्म किया जा सके। स्वर्गवासी सत्येंद्र दुबे की आत्मा चीख चीख कर कहना चाहती है देश और समाज की खातिर सच बोलने वालों की जान को सस्ती नहीं समझो। आज भी सरकारी विभाग के लोग उन आपराधिक लोगों का साथ देने को सच बोलने वालों को अनुचित रूप से परेशानी देकर देश और अपने कर्तव्य के साथ गलत कर रहे हैं। आपके पास पाने को धन दौलत सुख सुविधा बहुत कुछ है मगर खोने को ईमान थोड़ा तो बचा कर रखना। इस देश को आज़ाद करवाने वालों को इस बात का कभी पता नहीं था कि आज़ादी का अर्थ सत्ता और अधिकारों का उपयोग ऐसे भी किया जाएगा। जिस बाग़ को बाढ़ ही खाने लगे , रक्षक ही भक्षक बन कर लूट और अपराध करने वालों के साथ खड़े हों उस देश का भविष्य कितना भयानक हो सकता है , सोचोगे तो रूह कांप उठेगी। संभल जाओ। जो गलती अटल बिहारी वाजपेयी के समय पीएमओ ने की उसे हर दफ्तर में फिर से दोहराया जा रहा है।

Friday, 11 May 2018

अदालत धर्मराज की ( तरकश ) भाग -2 , डॉ लोक सेतिया

     अदालत धर्मराज की ( तरकश ) भाग -2 , डॉ लोक सेतिया 

       ये रचना पहले लिखी रचना से आगे की कहानी है , आप इसे उसी तरह समझ सकते हैं जैसे इधर हिट फिल्म के आगे उसी नाम से दो तीन चार अगेन अदि जोड़कर नई फिल्म बना लेते हैं। अभिनेता वही रहते हैं कहानी बदल जाती है। ऊपर वाले की अदालत में मुजरिम बदलते रहते हैं मगर न्यायधीश और हिसाब किताब धर्मराज और चित्रगुप्त जी ही किया करते हैं , गवाह की ज़रूरत नहीं न जिरह की , ऊपर वाला सब जनता है। इंसाफ किया ही नहीं जाता वास्तव में इंसाफ ही होता है। जैसा कि पिछली कथा में सुन चुके हैं जो जो भी भगवावेसधारी साधु संत मरने के बाद अदालत आते हैं उनको जुर्मों की हज़ार गुना सज़ा मिलती है क्योंकि औरों को उपदेश देने वालों का खुद काम क्रोध लोभ मोह अहंकार में फंसना माफ़ी के काबिल नहीं है। 
                          तीन तरह के लोग कतार में लगे हैं , आम लोग जो बाकी अपराध बेशक नहीं भी किये मगर सरकारी दस्तावेज़ में अपराधी बताये गए। उनसे सवाल किया गया आपने सरकार को पूरा कर क्यों नहीं चुकाया , आमदनी को सही नहीं बताया , सामान बिना बिल खरीदा और किसी तरह ज़मीन जायदाद खरीदी तो उस पर सरकारी फीस कम कीमत की अदा की। जवाब था कि सरकार ने नियम ही ऐसे बनाये हुए थे कि ईमानदारी से जी ही नहीं सकते फिर भी सरकारी विभाग की तय की कीमत पर ही सब को पंजीकरण करवाना पड़ता था। इतनी अनुचित शर्तें और नियम बनती है सरकार कि संभव ही नहीं होता कोई काम बिना सिफारिश या घूस दिए करवाना। इसके बावजूद आम जनता को बिना अपराध किये शर्मसार होने की आदत होती है इसलिए उन्होंने सर झुका अपने लिए सज़ा मांग ली। भगवान की अदालत का नियम है माफ़ी से बड़ी कोई सज़ा नहीं होती , जो मन आत्मा से माफ़ी मांगता उसे सज़ा नहीं मिलती। ये भी विचार किया गया कि अगर आम लोग नियमानुसार कर भरते तब भी नेता और अधिकारी उसको देश पर नहीं खुद पर खर्च करते। आम लोगों को उनके बाकी सभी अपराधों की सज़ा मिली मगर सरकारी कर और नियम पालन नहीं करने की गलती को माफ़ कर दिया गया। 
                             अधिकारी और उद्योगपति बड़े कारोबारी लोगों को उनके अपने निजि जीवन में किये अपराधों की सज़ा के साथ सरकारी काम में रिश्वत लेने और ईमानदार लोगों को अनावश्यक परेशान करने को सज़ा दी गई कि आपको पिछले जन्म में अच्छे कर्मों से सब कुछ मिला था मगर आपने ऐसे अमानवीय कार्य किये कि अगले कई जन्म तक आपको जानवर बनकर उन्हीं इंसानों से सज़ा पानी होगी जिन्हें आपने तड़पाया हमेशा ही। आपने अपने स्वार्थ से गलत किया चाहे किसी बड़े अधिकारी के आदेश पर जुर्म आपका ही है , कोई आपको कुवें में कूदने को कहता है तो सोचना आपको है कि कूदना है या नहीं। आगे किसी भी जन्म में आपको उच्च शिक्षा उच्च पद नहीं मिलेगा बेशक आपकी जाति धर्म कोई भी हो। आप जनसेवक थे और वही आपकी जाति थी धर्म था। 
                               नेताओं की बात सामने आई तो सब हैरान हो गये। पता चला वो कहावत वास्तव में सच है कि राजनीति और वैश्यावृति इक जैसे पेशे हैं। आपने देश को लूटा झूठ छल कपट सब किया और जिस जनता ने सत्ता दी उसी पर ज़ुल्म किये। आपको अपने सभी बाकी अपराधों की सज़ा तो सौ गुना मिलेगी ही साथ में अगले जन्मों तक आपके साथ आपके साथी रहे सभी लोगों को अपना जिस्म बेचने वाली वैश्या बनकर बिताने होंगे। भगवान की अदालत का इन्साफ कभी गलत नहीं होता है , जिन लोगों ने अनुचित ढंग से कमाई की थी उनको कई लाईलाज रोग और ज़िंदगी की तमाम परेशानियां उसी का नतीजा थी मगर मूर्ख लोग समझते है कि पैसे से हमने रोग का ईलाज और समस्याओं का समाधान कर लिया। कुदरत के नियम को समझते तो ईमानदारी से सुखी जीवन जीते सब।

Thursday, 10 May 2018

आम नागरिक होना अपराध है , सरकारी अधिकारी होना न्यायधीश होना है - डॉ लोक सेतिया

     मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है , क्या मेरे हक में फैसला देगा।

     आम नागरिक होना अपराध है , सरकारी अधिकारी होना न्यायधीश होना है - डॉ लोक सेतिया 

कल ही मुझे ये डाक से मिला है। इस नोटिस में नाम भी सही नहीं है , कब आबंटित किया किस को किस ने नहीं लिखा गया , जिसे छपे हुए फॉर्म में रिहायशी बताया गया है वो वास्तव में संख्या से ही पता चल जाता है एस सी एफ 30 अर्थात शॉप कम फ्लैट नंबर तीस। इक कमर्सिअल प्लाट है जिसे किसी और विभाग ने इस विभाग के बनने और इस के एक्ट से पहले ही बेचा था पचास साल पहले बोली पर। जहां तक मुझे लगता है इस विभाग को तब उस विभाग के नियम और किसे बेचा क्या प्लान था विभाग का कुछ भी नहीं पता। मैंने जब ये प्लाट खरीदा और उस पर निर्माण किया तब ये मॉडल टाउन का एरिया हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण जो नाम अभी है और पहले हरियाणा अर्बन डेवलप्मेंट ऑथोरिटी था , उसके आधीन नहीं था , बाद में पहले विभाग के बिना बिके प्लॉट्स इस विभाग को मिले और इसने बेचे। वकील नहीं हूं मैं मगर इतना समझता हूं कि जो संम्पति किसी और विभाग ने इस विभाग के बनने से सालों पहले बेचे उस पर तब के विभाग के नियम लागू होंगे इस के नहीं जो तब बना ही नहीं था न ये एक्ट ही था तब। मगर ऐसा नहीं कि विभाग को ये सब नहीं मालूम , क्योंकि जब से हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण को ये स्थान्तरित किया गया अनबिके प्लॉट्स तब से तीस साल में मेरे भवन के बने पहले से ही को कभी कोई नोटिस नहीं दिया गया इसी विभाग द्वारा। वास्तविक बात आगे बताता हूं। 

                     जनहित की शिकायत करना 

मैं पहले भी चालीस साल से जनता के लिए समस्याओं को लेकर सरकार को सभी विभागों को जनहित की बात लिखने का कार्य करता रहा हूं। मैंने 27 नवंबर 2015 को इक शिकायत CMOFF/N/2015/114055
सी एम विंडो पर दर्ज करवाई थी। जो मेरे किसी निजि कारण नहीं बल्कि विभाग ही के प्लॉट्स पर अवैध कब्ज़ों और गंदगी और फुटपाथ पर कब्ज़ों आदि की थी। मगर दो साल तक सभी अधिकारी एक दूसरे को करवाई को भेज कुछ भी करने से बचते रहे। आखिर उसको मुख्यमंत्री कार्यालय ये लिखकर निपटान कर देता है कि ये इक सुझाव है शिकायत नहीं। मगर उसके बाद जो लोग यहां रिहायशी भवन में दुकानें खोले हुए हैं उनको विभाग के लोग बता गए कि आपकी शिकायत मैंने की है जबकि तब उस शिकायत को निपटा चुके थे अपनी साइट पर। ये कैसी अनुचित बात है कि विभाग अपने प्लॉट्स पर कब्ज़े हटवाने की जगह मुझे मुसीबत में डालना चाहता है। मैंने तब इक खुला पत्र लिखा था कि आपको नहीं हटवाना अवैध कब्ज़ों को तो मत हटाओ मेरा नाम बताकर मेरे लिए खतरा नहीं पैदा करो। हैरानी हुई जब विभाग के उच्च अधिकारी का पत्र मिला जिसमें अपने विभाग के सम्पदा अधिकारी को कोई करवाई सी एम विंडो की शिकायत पर अभी तक नहीं करने के साथ , "कोई शिकायत नहीं " मेरे पत्र को भी शिकायत में शामिल किया गया। मार्च में ये पत्र मिला मुझे।
साफ लगता है मुझे जो नोटिस मिला है उसका मकसद बदले की भावना से मुझे प्रताड़ित करना है। इक 67 साल का वरिष्ठ नागरिक जो तीस साल से अपने मकान में रहता है और जिस के पास और कोई साधन नहीं है उसे अनावश्यक रूप से ऐसे दाव पेच में उलझना उसको मानसिक रूप से किस हद तक परेशान कर सकता है , ये अच्छा वेतन पाने वाले अधिकारी और राजनेता नहीं समझ सकते। इस आयु में जो किसी तरह गुज़र बसर करता है वो कैसे इनसे सच की लड़ाई लड़ सकता है जिनको आम नागरिक को अपने पद और अधिकारों का गलत उपयोग कर परेशान करते मानवता तक याद नहीं होती। शायद ऐसे में कोई ख़ुदकुशी तक कर सकता है जब उसके पास कानूनी लड़ाई लड़ने को साधन नहीं हों न ही कोई अनुचित कार्य किया हो। ये कमर्सिअल प्लाट है और सभी एक नंबर से तीस नंबर तक में कमर्सिअल ही काम हैं , डाकघर आयकर विभाग तक इसी में शामिल हैं। तीस साल पहले बने भवन से आज पूछना कब कैसे बना वह भी किसी एक को चुनकर , लगता है जैसे सरकारी विभाग किसी मनमाने ढंग से बदले की भावना से काम करता है। 
        मगर खुद इस विभाग ने किस किस जगह को प्लान को अनदेखा कर जिसे चाहा अलॉट किया ये कोई नहीं सवाल करता। खुद विभाग ने दुकानों के प्लॉट्स को धर्मशाला के नाम , पार्क की जगह को किसी संस्था को और कमनूयीटी सेंटर की जगह को किसी विभाग को बेच दिया। खुद विभाग अपने प्लान को मनमानी से बदलता है मगर आम नागरिक से उन नियमों की बात करता है जो प्लाट बेचते समय थे ही नहीं। शायद सरकारी विभाग को अपना असली मकसद लोगों को घर उपलब्ध करवाना याद नहीं , बस किसी तरह नियमों की लाठी से डराना और मुमकिन हो तो जुर्माना लगाना ही अपना काम लगता है। अपने कर्तव्य की बात कोई अधिकारी नहीं समझता , अधिकारों का सही और गलत इस्तेमाल करना जानते हैं। ये कुछ भी हो जनसेवा तो कभी नहीं कहला सकता। 

                          इतने साल तक देश की हालत बद से बदतर होती गई है क्योंकि देश की आम जनता की औसत आमदनी से तीस गुना अधिक वेतन पाकर भी अधिकारी न्यायपूर्ण कर्तव्य नहीं निभाते और नागरिकों के साथ शासकों की तरह व्यवहार करते हैं। जनता को उचित अधिकार सुविधा देने की अहमियत नहीं मगर उस से नियम कानून पालन कड़ाई से करवाना याद रहता है। यही अधिकारी नेताओं और अवैध कब्ज़े करने वालों पर सालों साल कोई करवाई नहीं करने को गलत नहीं मानते। अपराध बढ़ रहे हैं क्योंकि सत्ताधारी नेता अपराधियों से सहयोग करते हैं जब उन्हें ज़मीन हथियानी हो भुमि का उपयोग बदलवाना हो। ये कैसा शासन है जो सभ्य नागरिक के लिए अन्यायकारी हद तक सख्त और अनुचित काम करने वालों अपराधी लोगों अवैध कब्ज़े करने वालों से मुलायम और लचीला है। आम नागरिक की हालत ऐसी है कि :-

                         हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम ,

                         वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता। 

        भगवान ही इनको सद्बुद्धि दे सकता है , ये शायद भगवान से भी डरते नहीं हैं।

Wednesday, 9 May 2018

पंद्रह मिंट सच बोलने का चेलेंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 पंद्रह मिंट सच बोलने का चेलेंज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ये क्या किया आपने बिना कागज़ पढ़े पंद्रह मिंट बोलने का चैलेंज देकर। कुछ तो सोचा करो , सामने वाला भी आपको ऐसे ही कुछ चैलेंज दे अगर लिख कर अपने सभी अधिकारियों से और सभी सरकारी सूचनाओं को उपयोग कर यहां तक कि अपनी सभी ऐप्स के और सभी विभागों से आंकड़े लेकर भी आपको कुछ मिंट केवल सच बोलने का चैलेंज दे तो क्या होगा। कर सकते हो साहस सच सच बताने का अपनी सरकार के चार साल के कामों के बारे में। अपने सहयोगी और विशेष सलाहकार की बात से हैरान हुए नेता जी। बोलना चाहते थे मगर सच बोलने की शर्त सुनते पसीना आ गया। उनकी दुविधा समझ सलाहकार कहने लगे आपको चिंता नहीं करनी मैंने सब जानकारी लिख रखी है , मगर पढ़कर नहीं सुना सकता क्योंकि मुझे डर है सुनकर आप अपने आपसे नहीं मिलना चाहोगे। लो ज़रा पढ़कर देखे आपने चार साल में क्या क्या किया है। अब नेता जी से चुप नहीं रहा गया , बोले सब मालूम है जो जो जानकारी आपने हासिल की है , मगर उसे छोड़ मुझे कुछ तो इस तरह का मेरा किया हुआ बताओ जो अभी तक किसी भी पहले इस पद पर रहे नेता ने नहीं किया हो , इतिहास में लिख सकते हैं ये केवल मैंने ही किया। अभयदान लेकर उनकी इस इच्छा को पूरा किया आखिर सलाहकार महोदय ने। जो कहा शब्द बा शब्द बता रहा हूं।
       आज तक किसी भी देश क्या विश्व के पी एम ने इतने झूठ नहीं बोले और न ही कोई आपके इस विश्व कीर्तिमान को तोड़ सकता है। खुद अपने आप पर जितना धन आपने बर्बाद किया है जनता का आज तक किसी भी प्रधानमंत्री ने किया नहीं है। सत्ता दुरूपयोग कर अपने ख़ास लोगों को लाभ के ऊंचे ऊंचे पदों पर बिठवाने का अपराध आपसे बढ़कर किया नहीं किसी ने भी। परिवारवाद का विरोध करने वाले से ऐसा करना तो और भी अधिक अनुचित है। आपने कितनी योजनाएं घोषित की मगर किसी को भी सफलता से लागू किया नहीं कभी भी। नाकाम योजनाओं में भी आपका नाम सब से ऊपर है। सब से गलत बात आपने कभी देशहित और जनहित को अपने और अपने दलहित से अधिक महत्व नहीं दिया बल्कि खुद को सब से महान साबित करने में लगे रहे। आपकी हालत तो उस एक दोहे के अनुसार है , आये थे हरि भजन को , ओटन लगे कपास। इस देश की जनता को आदत है माफ़ करने की , कर सकती है। मगर कोई और ऊपर वाला है जो सब देख रहा है , तुम उस से डरना जिसके नाम पर क्या क्या नहीं किया। बोलने लगा तो चार साल लग सकते हैं मगर संक्षेप में कुछ मिंट ही बोलना था। समझ गए हो।

घर की डयोढ़ी के बाबाजी - यादें पुरानी - डॉ लोक सेतिया

     घर की डयोढ़ी के बाबाजी - यादें पुरानी - डॉ लोक सेतिया 

    इक ख़्वाब देखा , कोई घर की पहली मंज़िल से ऊंची ऊंची आवाज़ में कहता सुनाई दिया , कभी नहीं समझेंगे कि जो भी आया है उसको आने दो ऊपर , हम खुद अपने आप अच्छे बुरे की पहचान कर सकते हैं। कोई छोटे बच्चे नहीं हैं। कोई सवाल करे कि किसे विश्वास नहीं है , उनको आप पर नहीं है या फिर आपको अपने बड़े बूढ़ों पर भरोसा नहीं है कि वो आपकी भलाई की ही बात नहीं करते बल्कि अनुभवी भी हैं आपसे अधिक। आपकी निगरानी नहीं करते हैं निगेहबानी करते हैं आपकी सुरक्षा की चिंता आपको हो न हो उनको अपना कर्तव्य लगता है आपको हर कठिनाई से बचाना। आधुनिकता ने सब को खुद तक सिमित कर कितना अकेला और असहाय कर दिया है शायद हमने विचार ही नहीं किया कि अपनी आज़ादी की कितनी कीमत चुकाई है सब ने और आज हर कोई अकेला हो चला है। चलो मेरे साथ आज आपको समझाता हूं सामने दिखलाता हूं उन सब बातों का महत्व और मकसद। 
                बाबाजी हर समय घर के दरवाज़े पर जो कभी बंद नहीं रहता था किसी डर से वहीं बैठे रहते थे। हुक्का सामने रखा होता था जिसकी गुड़गुड़ाहट सुनाई देती थी। हर आगुन्तक का स्वागत करते थे बाबाजी , मुझे अभी भी याद है हम बच्चों तक को बाबाजी नाम के साथ जी जोड़कर बुलाते थे। जब कोई किसी को लोकजी बुलाएगा तो सामने वाले के मुंह से जीबाबाजी ही निकलता था। ये अब समझ आया कि जी कहने से बड़े लोग छोटे नहीं हो जाते उनको जी भी दुगना होकर मिलता है और वो दिल से आदर के साथ बुलाया जाता है। मैंने पहले भी लिखा है दादाजी मेरे आदर्श थे और हैं , उनका अपना एक प्रभाव था जो सब को उनके बड़े होने का लिहाज़ करने को खुद ही विवश कर देता था। ऊंची आवाज़ में बात कभी नहीं करते थे बाबाजी , मगर हर कोई घर में धीमे स्वर में बात करता था। किसी पर कोई बंधन नहीं रखते थे मगर जब भी कोई आता जाता तो पूछते थे कहां जा रहे हो , किधर से आये हो। जिसे आजकल दखल देना समझते हैं वो वास्तव में परवाह करना होता था। 
                              घर में कोई जानवर नहीं घुस सकता था , बाबाजी की खूंडी तैयार रहती थी। कोई आता तो जानकर कि भूखा है उसे बिठाते और भीतर से बुलाते किसी को और उसे भरपेट खाना खिलाते थे। बहुत बार अनजान अजनबी लोग भी आते तो उनकी भी सहायता करते , शरण मिलती और कुछ ज़रूरत होती तो वो भी पूरी करते थे। एक दो बार तब भी लोग इस बात का गलत फायदा उठा गए मगर उनकी सजगता से कोई नुकसान नहीं हुआ। बाबाजी कहते थे सैंकड़ों में एक चोर हो सकता है मगर इसका मतलब ये नहीं कि किसी पर भरोसा ही नहीं किया जाये। धोखा खाना गलत नहीं होता धोखा देना गलत बात है। कोई बेटों से मिलने आता तो उसे आंगन में चारपाई पर बिठाते पानी पिलवाते और भीतर से बेटे को बुलाते मिलने को। चाहे कोई बेटियों की सहेली हो या फिर बच्चों के संगी साथी उनसे मिलने के बाद घर में जा सकते थे या घर के ऊपर की मंज़िल या फिर छत पर। सब कुछ सामन्य था किसी को कोई समस्या ही नहीं थी। मगर इस तरह से बहुत सारी समस्याएं घर के भीतर प्रवेश ही नहीं कर सकती थी। सही मायने में बड़े बूढ़े किसी सायादार पेड़ की तरह छाया देते थे और सायबान की तरह धूप गर्मी सर्दी लू से बचाते थे परिवार को। 
            मनमानी करने की छूट नहीं थी किसी को भी बड़े को न ही छोटे को। आज हर कोई खुद को अपनी मर्ज़ी का मालिक समझता है मगर अपनी हर उलझन अपनी समस्या से अकेले लड़ता है। ऐसे में चाहकर भी किसी अपने से राय अथवा सहयोग नहीं मांग सकता क्योंकि ऐसा करते उसे अपने छोटेपन का एहसास होता है। संयुक्त परिवार से अपने खुद अलग परिवार जिस में कभी माता पिता की जगह नहीं तो कभी बच्चों तक की नहीं समझते , ये उसी तरह है जिसे भीड़ भरे महानगर में सब अजनबी अकेले हैं। हर कोई हर किसी से दूर भागता है इक अनजाने डर के कारण।

Monday, 7 May 2018

अपनी मर्ज़ी के मापदंड नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     अपनी मर्ज़ी के मापदंड नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     देश में राज्य में दो कानून नहीं हो सकते। सरकार का कोई धर्म नहीं होता , केवल संविधान ही उसका राजधर्म है और उसी का अनुपालन करना होता है। जो सरकार किसी एक तथाकथित बाबा के सैकड़ों एकड़ के अनुचित और अवैध निर्माण को नियम बदल कर वैध करार कर देती है और सत्ता पाने को किसी अपराधी का बचाव करती रहती है जब तक अदालत उसे सज़ा देकर जेल में नहीं भेज देती , उसे कोई नैतिक अधिकार नहीं किसी और को सही गलत बताने का। वास्तव में किसी भी दल की सरकार को किसी भी धर्म के नाम पर वोट मांगने का असंवैधानिक कार्य नहीं करना चाहिए। आपकी निष्ठा जिस किसी धर्म में हो वो आपका निजि मामला है , आपकी पूजा अर्चना अपनी खुद की कमाई और साधनों से की जानी चाहिए। सरकारी साधनों का उपयोग कर के नहीं। जब आप किसी धर्म की आड़ में सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करने की बात करें तब आपको याद रखना चाहिए कि आप भी किसी भी धर्म जाति को वोटबैंक की खातिर कौड़ियों के दाम पर ज़मीन नहीं देंगे। जब सत्ताधारी खुद हर किसी को अपने स्वार्थ की खातिर अनुचित लाभ देते हैं तब भूल जाते हैं यही पहले वाले सत्ताधारी करते रहे और आपने गलत बताया था। सर्वोच्च न्यायालय तक कितनी बार चेतावनी दे चुका है लेकिन कोई भी सरकार अपनी ही ज़मीन पर अवैध रूप से धार्मिक स्थल बनाने को रोकती नहीं है। उल्टा आम तौर पर ये काम किया ही सत्ताधारी नेताओं की मूक सहमति से ही है। राजनीति के हम्माम में इस बारे सभी एक समान हैं। सच कहा जाए तो राजनेताओं का किसी धर्म से कोई मतलब नहीं होता है। धर्म की परिभाषा जानते होते तो खुद अपने आचरण को स्वच्छ करते सभी नेता।

Saturday, 28 April 2018

बोलिये मत केवल सुनिये ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

      बोलिये मत केवल सुनिये ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

      बात इक पुरानी फिल्म की है , इक महिला कमरे में आती है , ध्यान से देखती है। वही खुशबू वही सिगरेट का ब्रांड वही शराब की बोतल भी उसकी पसंद की ब्रांड की। सिगरेट सुलगाती है और कश लेकर सोचती है वही पुराना खरीदार है। महिला काल गर्ल का काम करती है। दरवाज़ा खुलता है तो महिला जिस की बात समझ रही थी उसकी जगह और ही शख्स भीतर आता है। वास्तव में यह शख्स उस महिला का आशिक है और महिला उसके दोस्त की बात समझ रही थी। उस दोस्त ने ही महिला को बुलवाया था अपने दोस्त की उदासी मिटाने की खातिर बिना जाने कि उसकी उदासी की वजह क्या है। नायक के पांव तले से ज़मीन खिसक जाती है ये असलियत जानकर कि दिन भर मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाने वाली महिला रात को जिस्म बेचती है। मुझे ये कहानी क्यों याद आई असली बात पर आता हूं। 
       फिर वही जगह वही लोग वही तमाशा। पुलिस वाले फिर पार्क में लाऊड स्पीकर लगा कर नाच गाना करवा रहे हैं। खाई के पान बनारस वाला , नाच गाना देखो सुनिये। इसे जनता से संवाद कहते हैं। आपको बोलना नहीं है केवल सुनना है देख कर झूमना है और ताली बजानी है। सब वही है लोग कुछ पुराने कुछ नए हो सकते हैं मकसद नहीं बदला। पार्क के बाहर खड़े पुलिस वालों ने बुलाया आप रोज़ सैर करते हो आज हमारे साथ भी सैर करो , उनसे बात की और कई घटनाओं की चर्चा की और सवाल किया मुझे समझा दो ये क्या है जनता से मेलजोल कदापि नहीं है। तमाशा है आखिर पुलिस वाले को भी कहना पड़ा। तमाशा मदारी दिखलाता है और जादूगर आपको सामने दिखलाता है। असलियत और होती है। सरकार और अधिकारियों को खुद भी वास्तविकता को समझना होगा , झूठे सपने बेचना किसी विभाग का काम नहीं है। शायद बिना विचारे अपने उच्च अधिकारी की हर बात पर अमल करना इक सीमा तक ज़रूरी है। कभी तो चिंतन करें आपका काम क्या है और कर्तव्य क्या है , क्या इन बातों से उसका कोई मतलब है। आंखे बंद रखना गंधारी की तरह कोई सच्ची निष्ठा नहीं , आपकी निष्ठा देश समाज के लिए होनी चाहिए व्यक्ति के लिए नहीं। 43 साल बीत गए लोकनायक जयप्रकाशनारायण की बात फिर भी वही है। सुरक्षाकर्मी जनता और देश की सुरक्षा को हैं या सत्ताधारी नेताओं की उचित अनुचित हर बात हर आदेश के पालन करने को। यक्ष प्रश्न यही है।