Tuesday, 14 July 2020

कभी खुद को भी देखो दर्पण में ( बदलते बाट ) डॉ लोक सेतिया

  कभी खुद को भी देखो दर्पण में ( बदलते बाट ) डॉ लोक सेतिया 

      उसने क्या किया किस किस ने क्या किया सब की बात कहते हैं खुद तुमने क्या किया नहीं सोचा कभी। ये बड़ी अजीब बात है संवेदना का मर जाना है जो कुछ लोग किसी को कोरोना होने को भी उपहास और मनोरंजन की बात समझते हैं। माना टीवी चैनल मीडिया पागल है पैसे टीआरपी और विज्ञापन की कमाई ने अंधा किया हुआ है उनको समाज दिखाई नहीं देता बस वही लोग नज़र आते हैं जो इनकी झोली भरते हैं। ये आधुनिक वैश्याएं हैं इनको सच का झंडाबरदार मत समझो ये करते हैं झूठ का गुणगान तो क्यों देखते हो इनको छोड़ दो पागल को समझाया नहीं जाता पागल सभी को पागल बताता है। लेकिन दर्द तकलीफ परेशानी किसी की भी हो इंसानियत का अर्थ है उस से संवेदना होना जिनको किसी नायक को कोरोना होना चुटकुले का विषय लगता है कभी भगवान न करे उनके किसी अपने करीबी को हो तो क्या होगा। नायक है या कोई भी आखिर इंसान तो पहले है और आपने अपनी इंसानियत को क्यों छोड़ दिया। हम हर किसी की सलामती की दुआ मांगते हैं तभी भले लोग हैं अन्यथा बेदर्द लोग हैं। 

   यही कुछ दिन पहले किसी अभिनेता के ख़ुदकुशी करने पर हुआ। ख़ुदकुशी करना दुःख दर्द चिंता की बात है मगर जीने के लिए साहस होना चाहिए वर्ना लोग कब किसी को चैन से जीने देते हैं। किसी पर आपने इल्ज़ाम धर दिया ख़ुदकुशी को विवश किया था कभी सोचा मुमकिन है खुद आपने जाने अनजाने कब किसी को इस सीमा तक आहत किया हो कि उसका जीना दूभर हो जाये। क्या कभी नहीं किया आपने , सच तो ये है आपने सभी ने अपने ही लोगों को परेशानी में अकेला छोड़ना ही नहीं उनको ताने मरना अपमानित करना जैसे गुनाह भी किये हैं। ये समाज बड़ा बेरहम बेदर्द है जो अपने दर्द को ही जानता है किसी और का दर्द दर्द नहीं लगता है , कभी कहा होगा फालतू नाटक करते हैं अब ये रोकर दिखा रहा है खुद रुलाया है नहीं सोचा कभी। 

सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प ने आपको अवसर दे दिया लिखने जो चाहे कहने का मगर आपने उसको सामाजिक सदभावना बढ़ाने दोस्ती करने आपस में विचार विमर्श करने के लिए सार्थक उपयोग नहीं किया। आपने अपनी भड़ास अपनी नफरत अपने भीतर छुपी किसी को नीचा दिखाकर खुश होने की गंदी सोच और मानसिकता की खातिर इस्तेमाल किया है। कितने लोगों ने लिखा वो अपराधी था उसको क़त्ल किया गया तो ठीक हुआ मगर अपराधी और सभ्य समाज एक जैसे नहीं हो सकते हैं अपराधी अपराधी हैं क्योंकि कानून को नहीं मानते लेकिन पुलिस और समाज अपराधी नहीं बन सकता उसको नियम कानून और न्यायपालिका और देश के संविधान को सर्वोच्च समझना चाहिए। किसी को भी अपराध करने का अधिकार नहीं हो सकता है। आज गुनहगार को बिना अदालत के निर्णय के सज़ा दी गई कल आपको कोई मुजरिम बताकर सज़ा दे तो क्या होगा क्या आपको न्याय अदालत और अपना पक्ष रखने का हक नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात अगर देश की पुलिस ही कानून का पालन नहीं करती और बदले की भावना से क़त्ल करती है तब कानून न्याय व्यवस्था है कहां। ये वही पुलिस है जो खुद अपराधी को पालती है उसको बढ़ावा देती है जब खुद पुलिस पर अपराधी भारी पड़ा तब होश आया पहले क्या किया था और पुलिस करती क्या है नेताओं के तलवे चाटती है देखते हैं उनको नेताओं के जूते साफ करते हुए। अपनी गरिमा खुद पुलिस ने ख़ाक में मिलाई है पुलिस सुरक्षा बल किसी नेता अधिकारी की नहीं देश की सुरक्षा की खातिर हैं उनकी आस्था संविधान और देश के कानून में होनी चाहिए किसी व्यक्ति या सरकार में नहीं। 

   आपको आपत्काल याद है मगर क्या लोकनायक जयप्रकाश नारायण की कही बात याद है। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में यही तो कहा था उन्होंने कि पुलिस या सुरक्षा बल को किसी नागरिक पर लाठी गोली चलानी नहीं चाहिए जब लोग शांति पूर्वक अपने अधिकार के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे हों। आपको जनता की सुरक्षा करनी है दमन नहीं करना है , दमनकारी सरकार या कोई भी विभाग देश के संविधान और कानून के खिलाफ है। आपको किधर खड़े होना है ये आपको विचार करना है। अपने को आईने के सामने खड़े कर फिर निर्णय करो सही गलत का।

Saturday, 11 July 2020

लाज का घूंघट खोल दो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      लाज का घूंघट खोल दो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   खुद को अपराध न्याय सुरक्षा सामाजिक सरोकार के जानकर सभी कुछ समझने वाले बतलाने वाले कुछ कह रहे हैं। पुलिस को सब मालूम रहता है कब कौन चोर चोरी करेगा कौन क्या अपराध करता है हर पुलिस वाला शरीफ आदमी को और बदमाश को देखते ही पहचान लेता है। पुलिस की मर्ज़ी ख़ुशी है जिसे चाहे अपराधी साबित करने को सबूत बना ले और जिसे बेगुनाह साबित करना हो उसके सबूत मिटा भी दे। मगर इस सब के बावजूद भी पुलिस का इंसाफ ही सच्चा इंसाफ है जो निर्णय कोई अदालत कितने साल लगाकर कितना पैसा खर्च करवा कर देती है किसी पुलिस वाले ने पहले ही कहा होता है कुछ हज़ार में मामला सुलटवा सकता है। बेशक पुलिस एनकउंटर में किसी को मारती है तो अपराधी गुनहगार की मौत के साथ न्याय और कानून की भी हत्या होती है मगर क़त्ल करने क़त्ल होने और क़ातिल कहलाने में बड़ा अंतर है। पुलिस जब क़त्ल करती है तब इंसाफ ताबड़तोड़ होता है सनी दयोल की तरह वाला न कोई सुनवाई न कोई सबूत न कोई गवाह। दामिनी फिल्म सुपरहिट रही थी आपने भी खूब तालियां बजाईं थी फिर अब क्या हुआ , होना यही चाहिए था ऐसे गुनहगार को सज़ाए मौत कह रहे सभी। पुलिस ने मामला सस्ते में निपटा दिया है। पुलिस वाले जानते हैं किस आतंकवादी को बचाना है उसको कश्मीर से दिल्ली चंडीगढ़ पहुंचा रहे थे तो क्या हुआ तब मामला और था। पुलिस को बाकायदा रिश्वत देकर आंतकवादी सहयोग ले रहा था पुलिस का पुलिस से तालमेल नहीं होने से बात खुल गई और आतंकवादी अपने मकसद में सफल नहीं हुआ तो क्या। ऐसा कभी कभी हो जाता है अन्यथा पुलिस का रिकॉर्ड है जिस से रिश्वत लेती है उसको बचा लेती है। 

    अदालती व्यवस्था किसी काम की नहीं है एक अदालत कोई निर्णय देती है ऊपर की अदालत बदल देती है और उस से बड़ी अदालत हैरान होती है कि पहले सही निर्णय था फिर खुद सरकारी वकील ऊपरी अदालत क्यों गया। सरकारी वकील अपराधी पर मुकदमा चलाता है उसे गुनहगार साबित करने को लेकिन चाहता है उसको बेगुनाह साबित करना। जितने मुजरिम छूटते हैं अपराध साबित नहीं होने के कारण सब वकील की मेहरबानी से मुमकिन है। मामला जितना ऊपर जाता है रिश्वत और अदालती कारवाई दोनों का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा जूता ज़्यादा पालिश खाता है। पुलिस सुधार की बात बहुत होती है मगर पुलिस को सुधारना कौन चाहता है जिन राजनेताओं को ऐसा करना चाहिए उनकी राजनीति का अंत हो जाएगा जिस दिन देश की पुलिस सही मायने में कानून का पालन करने करवाने लगेगी। आधे राजनेता सलाखों के पीछे होंगे ही उनकी ज़मानत नहीं हो सकेगी। जब देश की संसद में आधे सांसद और विधानसभाओं में आधे विधायक जुर्म की खूबसूरत दुनिया से आये हों तब सरकारी विभाग पुलिस या अन्य अधिकारी भला देश समाज के लिए ईमानदार हो कैसे सकते हैं। 

     सांसद विधायक बिकते हैं सरकार बनाने गिराने को तब जनमत कहां होता है। चुनाव पर करोड़ रूपये खर्च करने वाले या राज्य सभा की मेंबरशिप पाने को करोड़ों का हेर फेर होना क्या संविधान और कानून के अनुसार होता है। जब ये होना है होता है तो खुले आम बोली लगे क्या खराबी है जब नाचन लागी तो घूंघट काहे को। बंद करो अदालत सभी और पुलिस को न्याय की दुकान चलाने दो जैसे चल रही है खुले आम हो तो भारत महान बनने में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पुलिस थाने बिकते हैं तो न्याय भी उपलब्ध हो क्या खराबी है जिसको जहां से सस्ता मिले या अपनी मर्ज़ी का महंगे दाम भी ले ले। ईमान बिकते हैं भगवान बिकते हैं तो इंसाफ और न्याय भी बाज़ार में बिकने से परेशानी क्या है। आत्मनिर्भर होने का इक तरीका ये भी है क्यों किसी और के भरोसे रहे कोई।

गणिका डाकू और सिपहसलार ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   गणिका डाकू और सिपहसलार  ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    जाने कितने आशिक़ थे उस के जो उसकी अदाओं पर फ़िदा थे। उसका नाच देखते गाना सुनते और उस पर अपनी दौलत उड़ाते रहते। इक डाकू उस से दिल लगा बैठा और उसे कहा बाकी सब को अपने ठिकाने पर आने से रोक दो बस मेरे लिए नाचना गाना होगा। गणिका भला किसी एक की होकर कैसे रहती उसने नगर के सिपहसलार को संदेसा भिजवा कर अपने ठिकाने बुलवा लिया। जैसे सभी को अपनी सच्ची मुहब्बत का भरोसा दिलवाना जानती थी सिपहसलार को भी अपने प्यार के जाल में फंसा लिया। जब लगा वो पूरी तरह बस में है तो डाकू से बचाने की बात कह दी। सिपहसलार ने अपने कितने राज़ गणिका को बता दिए जिसे जानकर गणिका को लगने लगा कि शायद डाकू उसको माफ़ कर भी दे गलती मानने पर लेकिन ये जो नगर का सुरक्षा का काम करने को नियुक्त किया गया है शासक द्वारा डाकू से अधिक खतरनाक है।

  काफी समय तक गणिका दोनों से मुहब्बत का दिखावा करती रही निभाती रही अपने ठिकाने पर किसी को भी नहीं आने दिया और उन दो सिरफिरे आशिक़ों से उनके अपनी माशूक़ा को दिए ठिकानों पर मिलती रही। राजदरबार में गणिका की अच्छी जान पहचान बढ़ती गई और कई रईस नवाब उसको छुपकर अकेले में मिलते रहे। धीरे धीरे गणिका का रुतबा राजा के दरबार से उसके महल तक होता गया। इक गणिका और चाहने वाले तमाम लोग आपसी रंजिश हो गई और बढ़ते बढ़ते जान से मरने का खेल होने लगा। ऐसे में जो कभी नहीं होना संभव था हो गया जब खुद गणिका को कोई इतना भाया कि नगर छोड़ उसके साथ किसी और राजा के राज्य में चली गई। मगर जाने से पहले डाकू को भी और सिपहसलार को भी खत लिख कर दोनों को दूसरे पर अपहरण करने की धमकी देने की बात बता गई ताकि वो आपस में उलझे रहे और उसे कहीं तलाश नहीं करें।

   सिपहसलार ने अपने सिपाही डाकू को पकड़ मारने को भेज दिए मगर डाकू को पहले ही जानकारी मिल गई थी और डाकू  गिरोह ने सिपहसलार के सिपाही को मार डाला। ये खबर होते ही सिपहसलार ने जाकर डाकू का ठिकाना तहस नहस कर दिया जब उसको पकड़ नहीं सका। बस हर तरफ शोर मच गया सिपहसलार के सिपाही डाकू के शिकार हो गए हैं। आखिर उसने इक इक कर डाकू के सारे साथी मौत के घाट उतार डाले मगर सरगना को नहीं पकड़ सका। मगर फिर इक और गणिका ने डाकू को बचाने और सिपहसलार से समझौता करवाने का वादा किया और अपने पास डाकू को हिरासत में पकड़वा दिया। सौदेबाज़ी में कोई गड़बड़ नहीं हुई मगर उस से दूर जाने पर सिपहसलार ने अपनी माशूक़ा गणिका को लेकर पूछा तो बात बिगड़ गई और सिपहसलार के सिपाहियों ने उसके आदेश पर डाकू को कत्ल कर दिया। जिस गणिका के पास कितने ही राज़ थे उसका कभी कोई पता नहीं चला और राजा ने अपने सिपहसलार को मौत की सज़ा दे दी ये सोचकर कि उसने गणिका को कहीं अपने पास रख लिया है।
  
         गणिका अभी भी नाच रही होगी किसी और को खुश करने को जो उसकी बाज़ारी मुहब्बत जो बिकती है सिक्कों की खातिर को असली समझ जान लेने जान देने का खेल खेलने को तैयार हैं।

Friday, 10 July 2020

अब नहीं ज़रूरत हमारी ( उस लोक की बात ) डॉ लोक सेतिया

  अब नहीं ज़रूरत हमारी ( उस लोक की बात ) डॉ लोक सेतिया

भगवान ने अपने सीसीटीवी पर देखा शनिदेव जी अभी तक अपने कक्ष से बाहर नहीं निकले तभी उनके व्हाट्सएप्प पर शनिदेव का संदेश मिला जिस में अपना न्याय करने का काम छोड़ने का निर्णय सूचित किया गया था। ये सामान्य घटना नहीं थी और भगवान भी न्याय के मामले में कोई हस्ताक्षेप नहीं करने की शपथ को दरकिनार नहीं कर सकते थे। न्याय का भार कोई और देवता नहीं वहन कर सकता है क्योंकि उनकी अपने अपने भक्तों से अनुराग की आदत जो है। भगवान जानते हैं शनिदेव को मनाना उनके अकेले की बस की बात नहीं है इसलिए सभी अन्य देवताओं की विशेष बैठक तुरंत बुलाना ज़रूरी हो गया। जब बाकी सभी आ गए तब भगवान ने शनिदेव से बात करने को वीडियो कॉल करना उचित समझा। जय शनिदेव महाराज जी क्या बात है आपने अपना न्याय का कार्य त्यागने का निर्णय ले लिया कोई परेशानी है तो बताएं। आप जानते हैं न्याय के बिना संसार का क्या हाल हो सकता है और निष्पक्ष न्याय सर्वोच्च अदालत की तरह केवल आप ही कर सकते हैं जो निर्णय देते समय पिता तक का भी लिहाज़ नहीं करता है। सभी देवता देवियां आये हैं आप भी आ जाएं या हम सभी आपके पास निवेदन करने आ सकते हैं आपसे अनुमति लेना ज़रूरी है। शनिदेव ने कहा किसी के भी आने की ज़रूरत नहीं है मगर फिर भी इंतज़ार करें मैं आपके आवास पर उपस्थित होता हूं। 

     शनिदेव ने आते ही सभी को अभिवादन करने के बाद खुद ही कहा आपको पूछने की ज़रूरत नहीं है आपको खबर भी है मगर फिर भी अपने आप ही खुद बताता हूं क्यों मैंने इक खबर का संज्ञान लेते हुए ये संदेश भेजा अपना फैसला बताने को। जब पुलिस वाले ही अपराधी को पकड़ अदालत में पेश करने की ज़रूरत नहीं समझते और खुद ही निर्णय करते हैं उसको जान से मारने की सज़ा दे देते हैं और सरकार अदालत देख समझ कर भी खामोश रहते हैं अदालत को अपनी तथाकथित मानहानि नहीं दिखाई देती तब मेरी क्या आप सभी देवी देवताओं की भी ज़रूरत है भी कि नहीं ये गंभीर चिंतन का विषय है। मुझे अगर न्याय नहीं करना करवाना तो मेरा कक्ष से बाहर जाना किस काम का। कोरोना काल है सबको अपनी सुरक्षा की चिंता है और घर में बंद रहना है विवशता होने पर मुंह बंद रखना है पट्टी बांध कर निकलना है। 

  तभी यमराज जी भी खड़े होकर अपनी बात कहने लगे , बोले ये सच है आजकल जो कोई भी मरता है कोरोना ने उसकी जान ली ऐसा समझते हैं कोई भगवान की धर्मराज की बात नहीं करता और यमराज है भी या नहीं कोई नहीं सोचता है। मेरा काम भी कोई और करता है ये होने लगा है तो मेरा भैंसा भी कहता है हमको छुट्टी मिल गई है बदनाम होने से बच गए हैं। बस ये शुरुआत थी एक एक कर सभी देवी देवता जो कब से खामोश थे अपने अपने विभाग के उपयोगी नहीं रहने के कारण अपनी अपनी दर्द भरी दास्तां खुलकर बताने लगे। महकाल जी चाह कर भी कुछ नहीं कह सके और बजरंग बली हनुमान जी भी संकट हरने में खुद को विवश पा रहे थे। देवी लक्ष्मी को बताना पड़ा उनके खज़ाने की दशा क्या है और कौन है जिसने कुबेर से बढ़कर खज़ाना बढ़ा लिया है लूट खसूट और चोरी हेराफेरी का युग है बात राम राज्य की होती है आचरण की मत पूछो कभी दानव भी ऐसा नहीं करते थे जो डायन होती थी वो भी चार घर छोड़ देती थी। 

ईश्वर भी विचार करने लगे और सोचने लगे क्या अब दुनिया मेरी मर्ज़ी से चल रही है लगता तो नहीं है। अब मेरे नाम पर धर्म स्थल बनाने का ही काम किया जाता है मैं वहां रह नहीं सकता ऐसा वातावरण है। जब किसी सरकार के बस में कोई भी विभाग नहीं रहे तब उसको होने बने रहने का क्या अधिकार है। भगवान दुःखी होकर कहने लगे मुझे बताओ मेरा कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है मैंने अपना पद छोड़ कर जा भी नहीं सकता किसे सौंपूंगा ये कर्तव्य और अधिकार। लगता है इस दुनिया का अंत करना ही उपाय है जब इंसान इंसान नहीं बन सकता भगवान समझने लगा है और शैतान बन गया है। ये शैतान का शासन है मगर हम क्या शैतान से हार मानकर उसको मनमानी करने देंगे। शनिदेव जी आपने हम सभी की आंखें खोल दी हैं लेकिन आपको अभी निराश होकर कोई निर्णय जल्दबाज़ी में नहीं लेना चाहिए। अभी आप इस विषय को छोड़ कर अपने कर्म करते रहें हम सभी की विनती है जल्द ही पूर्ण सभा में कठोर निर्णय इसको लेकर अवश्य लिया जाएगा। बस हर सीमा पर हो चुकी है अब मुझे भगवान देवी देवताओं को तमाशाई नहीं बनकर रहना है जो भी करना चाहिए करना ही पड़ेगा।

गुनाहगार का क़त्ल इंसाफ़ का जनाज़ा ( वारदात ) डॉ लोक सेतिया

 गुनाहगार का क़त्ल इंसाफ़ का जनाज़ा ( वारदात ) डॉ लोक सेतिया 

     जो दवा के नाम पे ज़हर दे , उसका क़ातिल ही उसका मुंसिफ़ है , कानून के रखवाले ही जब अपराधी बन जाते हैं जैसी कितनी बातें ज़हन में आती हैं। देश में कोई विधान है कानून का संविधान का शासन है जिस में अपराध अपराध ही है कोई गुनहगार करे या फिर पुलिस सुरक्षा के लोग। हम किसी अपराधी के मरने से कभी भी चिंतित नहीं होते हैं मगर गैरकानूनी ढंग से बदले की भावना या कोई और मनसूबा रख कर किसी का नियोजित ढंग से क़त्ल करना उसको एनकाउंटर बताना हमारी चिंता का विषय है होना भी चाहिए। क्या हमारा देश वास्तव में महान कहलाएगा अगर यहां सत्ता के अधिकार या पुलिस की वर्दी का उपयोग कोई मनमाने ढंग से नियम कानून को ताक पर रखकर करे। मगर सब जानते हैं जिनको कानून व्यवस्था लागू करनी है खुद उनकी आस्था कानून में नहीं है बल्कि सच ये है कि पुलिस आदतन अपराधी से गठजोड़ करती है और उसकी सहमति और जानकारी से अपराधी अपराध करते हैं। विकास दुबे की अपराध कहानी भी यही है और ये कोई कानपुर और उत्तर प्रदेश राज्य की बात नहीं हर शहर हर राज्य की यही सच्चाई है। मुझे याद है कुछ साल पहले हरियाणा मानव अधिकार आयोग के सदस्य और पदाधिकारी फतेहाबाद आये थे और इक बैंक्वेट हाल दि फाइव एकर्स के शानदार भवन में भाषण दिए गए थे जिस में हैरानी की बात थी अपने छोटे दफ्तर से दो भवन बनने को उपलब्धि बता रहे थे जबकि उनको नागरिक के मानव अधिकारों की दशा और उसके हनन की बात करनी चाहिए थी। मंच पर पुलिस और अन्य विभाग के अधिकारी बैठे थे और दोनों तरफ से इक दूसरे की तारीफ की जा रही थी। ऐसे में कोई उनको अधिकारी वर्ग की अन्याय की बात करने का साहस नहीं कर सकता था। मगर कुछ लोग पुलिस की मारपीट की शिकायत करने चले आये थे जिनको बाद में मिलने को कहा गया अर्थात जो आपका पहला फ़र्ज़ है उस को महत्व नहीं दिया गया।  

   पुलिस आम नागरिक से कभी भी सभ्य व्यवहार करने की आदी नहीं रही है। पैसा और जान पहचान उनके लिए कोई भी कर्तव्य निभाने के लिए इक शर्त है अन्यथा आपको भटकाना  और टाल मटोल करना उनको आता है। अधिकांश अपराधी पुलिस की जानकारी में जो चाहे करते हैं रिश्वत और मुफ्तखोरी पुलिस को अपने अधिकार लगते हैं। अपराधी और पुलिस का गठबंधन जब तक आपसी टकराव नहीं हो चलता रहता है जो विकास दुबे के मामले में भी हुआ सभी जानते हैं। अपराधी ने साज़िश की उसका जुर्म संगीन है मगर पुलिस को अपराधी की तरह नहीं देश के कानून के रक्षक की तरह आचरण करना चाहिए। पुलिस को भी कानून से न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ की अनुमति नहीं होती है। अगर हमारी पुलिस आपराधिक ढंग से कार्य करती है और सत्ताधारी नेता अपराध को बढ़ावा देते हैं और संसद विधानसभाओं में गंभीर अपराध के दोषी या आरोपी सदस्य बनकर माननीय कहलाते हैं तो ये समाज के लिए खतरनाक और डरावनी बात है। क्या ऐसे तमाम अपराधियों को इसी तरह सड़क का न्याय देना उचित होगा तब तो कोई भी पुलिस या अन्य सुरक्षा बल की वर्दी पहन अपने विरोधी या दुश्मन को कत्ल कर उसे कोई भी नाम दे देगा। हम कई देशों की आलोचना करते हैं कि वहां सेना और पुलिस जो मर्ज़ी करते हैं। हम देश पर गर्व तभी कर सकते हैं अगर देश में नागरिक सुरक्षित हैं कोई असमानता भेदभाव अन्याय किसी के साथ नहीं हो और सभी को निडर होकर जीने का हक हो , डर अपराधी से हो या पुलिस या नेता या धनवान अथवा अफ़्सर से गलत ही है।

 आपको सरकारी फॉर्म मिलते हैं सब दर्ज होता है बस आपको खाली जगह पर नाम और जानकारी भरनी होती है। उसी कहानी को नाम मुजरिम कौन समय और जगह बदली हुई मगर पहले से निर्धारित की हुई भोले मासूम पुलिस वाले लिखते हैं सुनाते हैं कोई भरोसा करे नहीं करे उनकी बला से। एन्कॉन्टर को आप कानून के नाम पर देश के सबसे बड़े गिरोह , जैसा किसी अदालत ने कहा था कि इस देश की पुलिस अपराधियों का संगठित गिरोह है। पुलिस वाले एन्कॉन्टर कभी अपनी मर्ज़ी से नहीं करते हैं उनको मज़बूर होकर ऐसा करना पड़ता है अन्यथा गुनहगार अदालत में जाने कितने पुलिस वालों और नेताओं के साथ उसका इस्तेमाल करते रहे लोगों को बेनकाब कर सकता है।  इतने बड़े बड़े शातिर अपराधी ऐसी मूर्खता करते हैं खुद हिरासत में पकड़े जाने के बाद बीच राह किसी पुलिस वाले से पिस्तौल छीन कर भागने की कोशिश कर अपनी मौत को बुलावा देते हैं जबकि उनको पता होता है अदालत उनको इक दिन बेगुनाह करार देकर बरी करेगी और हर दाग़ी नेता की तरह वो न्यायपालिका पर भरोसा था का ब्यान दोहराएंगे। 1975 से 2020 तक का सफर भी दुष्यंत कुमार की बात दोहराने से नहीं रोक सका है , " यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए। पुलिस अदालत इंसाफ सभी उस तरफ जा रहे हैं जहां किसी शायर की नज़र में " क्या बतलाएं हमने कैसे सांझ सवेरे देखे हैं , सूरज के आसन पर बैठे घने अंधेरे देखे हैं "। " उनके पत्ते ही अगर आग बरसाने लगे , कौन फिर बैठेगा बरगदों की छांव में "।  ये कोई हैरानी की बात नहीं है इसी की आशंका थी ये नहीं होता तो जाने क्या होता। पुलिस का काम खुद ही निर्णय करना नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर गुनाहगार से पहले इंसाफ़ का क़त्ल हो जाता है।


Thursday, 9 July 2020

ढूंढो ढूंढो ढूंढो चौकीदारों को ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ढूंढो ढूंढो ढूंढो चौकीदारों को ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

                 कुछ दिन महीने या साल भर पहले कितने लोग चौकीदार होने को गौरव की बात समझते थे। मैं भी चौकीदार बतलाने वालों से फेसबुक भरी रहती थी। अचानक याद आया तो ढूंढने पर कोई नहीं मिला कल मुझे जाने उन सभी को हुआ क्या। छुट्टी न कोई हड़ताल कोई तो करो पड़ताल कहां सब चले गए क्या कोई वेतन का झगड़ा था या कोई चोर पुलिस का लफड़ा क्या हुआ कुछ तो राज़ है छुपा हुआ। कुकरमुत्ते की तरह उनकी फसल फैलती जाती थी ख़त्म कैसे हुई लहलहाती फसल। ये घर बिना चौकीदार सजता नहीं हम क्या करें कोई होना चाहिए रात भर जागते रहो की आवाज़ लगाने को। भगवान न करे कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हुई जैसे कोई ऐसी नशीली हवा चली जो सभी चौकीदार गहरी नींद में सो गए। मालूम नहीं उनका कौन सा विभाग है जिस से जाकर सूचना के अधिकार का उपयोग कर जानकारी हासिल की जा सकती है। सबसे पहले जिसने खुद को देश का चौकीदार बताया था उसी को अपने भाई बंधुओं की खोज खबर लेनी चाहिए।  इक दिन किसी कॉमेडी शो में कोई खिलाड़ी से हास्य जगत में आने के बाद राजनीति में चले जाने वाले बंदे ने सरदार जी ने बताया था उनको इक नेता ने समझाया था कि जिन तिजोरियों के खज़ाने लुट जाते हैं उन पर कोई ताले नहीं लगाता है। ये वही कहानी तो नहीं कि जब देश का खज़ाना लुट चुका तब चौकीदार को हटा दिया गया कहकर कि रखवाली किस की करोगे जब रखवाली करने को कुछ बचा ही नहीं तब वेतन कहां से मिलेगा। शायद ये स्थाई नौकरी नहीं थी ठेके पर निर्धारित समय को नियुक्ति हुई थी और समय गुज़रते ही अनुबंध खत्म। 

       ऐसे में मामला बेरोज़गार होने का बनता है इतने लोग चौकीदार के पद पर नियुक्त थे उनकी क्या दशा होगी कोई तो उनकी चिंता करे। चोर और पुलिस का खेल चौकीदार के बगैर कैसे चलेगा। फेसबुक पर इक ऐसे दोस्त की पुरानी डी पी दिखाई दी तो उसको संदेश भेजा क्या हुआ आपकी सारी बिरादरी ठीक तो है। जवाब आया आपको संसदीय भाषा में बात करनी चाहिए अन्यथा मुझे आपको मानहानि का नोटिस भेजना पड़ेगा। मैंने हैरान होकर पूछा क्या असभ्य शब्द मैंने उपयोग किया है तो कहने लगे सब जानते हैं अब ये चौकीदार शब्द गंदी गाली बन चुका है इसका उच्चारण नहीं किया जाना चाहिए। मुझे बिटिया ने समझाया हुआ है पापा जी वकील से कभी बहस नहीं करना जीत कर भी घाटे में रहोगे। मैंने पूछा वो कैसे तो बेटी जो वकालत करती है बोली पहले मेरी फीस दो फिर सलाह मिलेगी। बात समझ आ ही गई। लेकिन जाने क्यों मुझे चौकीदारों को ढूंढना ज़रूरी लगता है मेरा निवेदन है जिस किसी को खबर है कौन कौन चौकीदार था या खुद ही जो चौकीदार कहलाने को शान समझते थे वो भी पूरी जानकारी मुझे उपलब्ध करवाने की अनुकंपा करें क्योंकि असंगठित बेरोज़गार लोगों को उनका अधिकार दिलवाने का मेरा मकसद है। किसी का बकाया वेतन या फिर हटाने पर मिलने वाला मुआवज़ा बकाया होगा ज़रूर भला उनका शोषण कैसे किया जा सकता है। 

    आपको अपना नाम दर्ज करवाना चाहिए ये आपको भविष्य में पूर्ण सुरक्षा दे सकता है। पंजीकरण बेहद आसान है आपको अपनी फेसबुक पर लिखना होगा " मैं भी चौकीदार नहीं हूं " जैसे पहले होने का ऐलान किया था बस उसी तरह से ही। भले आपने अपना दल बदल लिया हो दिल बदल गया हो या भीतर से ही आपकी आत्मा ने आपको समझाया हो तब भी आपने जितने कार्यकाल तक सेवा दी है चौकीदार बनकर आप को उतना ही वेतन मिलना चाहिए सभी सुविधाओं के साथ जितना पहला खुद को चौकीदार बताने वाला लेता रहा है और अभी भी ले ही रहा है। जब उसने खुद को चौकीदार कहना छोड़ने के बाद भी उस लाभ के पद के फायदे उठाना नहीं छोड़ा तब आपको क्या ज़रूरत है अपने हक को छोड़ने की ये कोई सौ दो सौ रूपये की रसोई गैस की सब्सिडी नहीं है लाखों नहीं करोड़ों की बात है। आपको दिल्ली जाना चाहिए सब मांगे अपनी मनवाने को जैसे महमूद मेहरबान फिल्म में अपने गधे को सभी गधों का लीडर बनाकर जाने का संदेश दे रहे हैं। 

 



Monday, 6 July 2020

विकास लापता सुरक्षा घायल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    विकास लापता सुरक्षा घायल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      जहां कहीं भी हो देश की व्यवस्था को तुम्हारी तलाश है। खोजने वाले को ईनाम दस गुणा बढ़ा देने का वादा किया है विकास बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता है उनको जिनसे विकास का मधुर संबंध कितने साल से रहा है। उनको बेमौत मार दिया दिल तोड़ दिया उनकी वफाओं का ये कैसा सिला दिया है। जिसकी उम्मीद नहीं होती वही दिल के टुकड़े टुकड़े करता है तो मुश्किल होती है कैसे बताएं किस किस को कैसे समझाएं कि हमारी किसी से कैसी मुहब्बत रही है। बदनाम खुद भी होना पड़ता है अपने आशिक़ की बेवफ़ाई की दास्तां सुनाने में बंद दरवाज़े की राज़ की बात होने लगी है ज़माने में। दिल का क्या हाल हुआ दिल लगाने में किसी को अपना बनाने किसी के भाग जाने में , लोग डूब गए हैं गंगा नहाने में। गंगा मैली हुई और भी पाप धोने धुलवाने में बस इतना ही फर्क है पास आने दूर जाने में। 

   इधर मामला संगीन है बहुत लोग देशभक्ति और धर्म की अपनी परिभाषा मानते हैं मनवाते हैं। उनका कुतर्क है सत्ता से सवाल मत करो सत्ता और उनके तथाकथित भगवान को झूठ बोलने का अधिकार है इतना ही नहीं उसका झूठ भी बड़े काम का है उस के झूठ को दुनिया सच मानती है और अब देश को उनका झूठ ही बचा सकता है जितवा सकता है। ये वही लोग हैं जो नोटेबंदी में परेशान थे कैसे अपने ही पैसे को अपना बताकर अपना धंधा या कोई भी काम करें मगर ऐसे लोगों को सत्यमेव जयते या सत्य ही ईश्वर है जैसे शब्द दीवार पर लिखने को होते हैं वास्तव में आचरण करने को नहीं। देशभक्ति धर्म ईमानदारी उनके लिए बड़ी बड़ी अच्छी लगने वाली ऐसी बातें हैं जिनका पालन वो कभी नहीं करते हैं कोई उनको आईना नहीं दिखला सकता है। ये समझदार लोग उनको नासमझ बतलाते हैं जो देश की मौजूदा हालत पर सत्ता और सरकार से सवाल करते हैं उनका विचार है कि सवाल विपक्ष से किये जाने चाहिएं और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य से शिक्षा की खराब दशा का इल्ज़ाम पहले की सरकारों के सर जाना चाहिए। 

  विकास विकास की रट लगाते विनाश को घर बुलाते रहे , अपराधी दाग़ी नेताओं को सत्ता पाने को अपना हमजोली बनाते रहे उनको निर्दोष साबित करने से लेकर मुकदमे वापस लेने तक सब बेशर्मी से करते रहे। जिस व्यक्ति पर खुद कितने आपराधिक मुकदमें दर्ज थे उसी को राज्य का मुखिया बनाते रहे जो सत्ता मिलते ही हज़ारों को मुकदमे वापस लेने की राहत देने का फ़रमान सुनाते रहे। अपराधी दनदनाते रहे और लोग उनके गीत गाते रहे झूमते नाचते गुनगुनाते रहे ज़ख़्म खाते रहे मुस्कुराते रहे। विकास उनको धोखा देकर उनको उन्हीं की बिछी बिसात पर पटखनी देकर उनकी आंखों में धूल झौंककर गायब हो गया है तब समझ आया घर का भेदी लंका ढाये और बोये पेड़ बबूल के आम कहां से खाय। इक विकास ने कितनों को नंगा कर दिया है ये सत्ता का हम्माम है जिस में सभी नंगे हैं। विकास की बात ख़त्म नहीं होने वाली है अभी चलती रहेगी और विकास को सरकार सुरक्षा बल ढूंढते रहेंगे जैसे देश की जनता अच्छे दिनों को ढूंढती फिरती है। आखिर में इक ग़ज़ल से विषय को अल्पविराम देते हैं विराम देना मुमकिन नहीं है। 

 

             बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) 

                             डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है। 

Friday, 3 July 2020

बाज़ीगर जादूगर सौदागर छलिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 बाज़ीगर जादूगर सौदागर छलिया  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

एक भी अनेक भी जैसे कोई ठगने वालों की टोली हो। आपको ये सभी काल्पनिक किरदार फिल्मों में दिखाई देते रहे हैं अब सामने हैं मगर आपको पहचान नहीं हो रही है। आपको नटवरलाल अच्छे लगते हैं ये सभी नटवरलाल की संतानें हैं। चालीस चोरों की टोली है अलीबाबा कोई नहीं अब ये भी इनका कमाल है कि जितने भी नायक थे हुए हैं या बन सकते हैं उनको इन्होने जोकर बना दिया अपनी जादूगरी दिखला कर। और जिसको जोकर नहीं बनाया जा सकता था उसको खलनायक साबित कर दिया और ये सभी जो वास्तव में खलनायक ही हैं नायक महानायक बन कर आसमान पर छा गए हैं आंधी की तरह। धूल ने सूरज को ढक दिया है और अटल जी की कविता भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा फिर सच हो गई है। अब आंधी का दावा है दिए की सुरक्षा करने का। आपने शायद कभी देखा हो कलाकार लोग पुरानी फिल्मों को कभी विदेशी फिल्मों को बदल कर अपनी नई फिल्म बना लेते थे और कभी तो कितनी पुरानी फ़िल्मी तस्वीरों को जोड़कर गडमड कर कुछ और ही बना पेश करते रहते हैं। संगीत में ये बहुत है अच्छे दिल को छूने वाले दर्द और प्यार की भावना वाले नग्में आधुनिक धुन पर मिलाकर इक शोर किसी डिस्को में झूमने को बनाने का चलन बेहद सफल हो रहा है। रोने की बात पर ठहाके लगते हैं बस यही देश समाज में होने लगा है। इतनी कहानियां एक साथ जुड़ गई हैं कि असली नकली की पहचान नहीं हो सकती है। जो बाबा खुद नकली साबित हो चुका है फिर से उसी का बाज़ार खुल गया है खोटा सिक्का चलने लगा है। 

    देशभक्ति का सौदागर देश को ही बेचने की बात करने लगा है ये उसी का कमाल है सबकी झोली खाली है इक वही मालामाल है सोने जैसा रंग है तेरा चांदी जैसे बाल इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल। गोरी शब्द की जगह आपके मन में जो नाम आया है अभी सच है , क्योंकि मन की बात है। मन से कुछ भी छिपता नहीं है मगर मन चंचल है झूठे ख़्वाब बड़े बड़े सपने दिखलाता है और आपको सपने सच होने की उम्मीद होने लगती है। उसका शतरंज का खेल अजब ग़ज़ब है उसकी उलटी चाल भी सीधी समझी जाती है और सामने कोई खिलाड़ी नहीं होता है विरोधी उसको पसंद नहीं है खुला मैदान उसका अधिकार है जिधर जो खेल चाहे खेल सकता है। मैदान कोई भी हो खेल उसी का है खिलाड़ी अकेला वही है उसकी टीम में बाकी सभी अनाड़ी हैं और ऐसे अनाड़ी खुद अपने गोलपोस्ट में गेंद डाल देते हैं मगर ये हारी बाज़ी को अपनी जीत घोषित कर देता है अपने हाथ से गेंद को उठाकर सामने के गोलपोस्ट में डाल सकता जिस में कोई गोलकीपर होता ही नहीं है। उसकी मर्ज़ी से नियम बदल जाते हैं खेल बदल जाता है और खेल का मैदान तमाशा दिखलाने का स्थान बन जाता है। नमस्कार , भाइयो और बहनों , मित्रो मेरे प्यारे देशवासियो कितने आयोजन उस के निर्देशन अभिनय की मिसाल हैं। और इक मीडिया है जो ताली बजा बजा कर क्या खूब है तमाशा लाजवाब है घोषणा करने को तैयार रहता है।

  इक मदारी है उसका बंदर है और जमूरे ही जमूरे है , कभी एक जमूरा हुआ करता था मदारी का खेल उसी पर आधारित होता था। जमूरे बता कितने लाख करोड़ और जवाब होता देश की जनता से अधिक वोट मिले आपको छह सौ करोड़ मत से विजयी हुए आप। उनका झूठ पकड़ा जाता साबित नहीं होता कभी भी। अदालत गवाह कानून सब उसकी कठपुतलियां हैं उसकी कही बात गीता रामायण से बढ़कर है। उसकी टोली के लोग दवा के नाम पर ज़हर देते हैं लोग स्वस्थ्य होने की जगह स्वर्ग सिधार रहे हैं मगर फिर भी सब को यकीन है यही मोक्ष दिलवा सकता है अच्छे दिन नहीं अब सीधे स्वर्ग भेजने का उपाय है। देश की अर्थव्यवस्था को इतना ऊंचा खड़ा कर दिया है कि नीचे अस्सी करोड़ लोग दो जून रोटी की खैरात पाने की हालत में पहुंच गए हैं। दाता इक वही है भिखारी सारा देश है ये बेमिसाल शासन का ही कमाल है।

    आपने बापू के तीन बंदरों की बात सुनी होगी इक देखता नहीं इक बोलता नहीं इक सुनता नहीं है। मगर इक लिखने वाले ने लिखा था कि वास्तव में बापू के पास चार बंदर थे जब बापू तीन बंदरों की कथा सुना चुके तब वो चौथा बंदर कहीं बाहर गया हुआ था भाषण देने को। उसने कहा बापू मुझे भूल गए अपनी कहानी में मेरा नाम नहीं बताया काम नहीं बताया मेरी पहचान क्या होगी। बापू ने कहा भविष्य में हर तरफ तुम ही टीम नज़र आओगे लोग इन तीन बंदरों को भूल जाएंगे तुम जो बस बोलना जानते हैं भाषण देने में निपुण हैं वही शासन करेंगे। मैंने जानकर तुम्हारी गैरहाज़िरी में तीन बंदरों से सबकी पहचान करवाई है ताकि तुम्हारी किसी को पहचान नहीं हो पाए क्योंकि जब लोग तुम्हें जान पहचान लेंगे तुम्हारा खेल खत्म हो जाएगा। बापू के तीन बंदर शोकेस में बंद हैं चौथा खुला है उछलता कूदता है मनमानी करता है बाग़ पर उसका अधिकार है खाता भी है और जितना खा सकता है उस से कई गुणा अधिक उजाड़ता है बर्बाद करता है।

Monday, 29 June 2020

दुश्मन से दोस्ती दोस्तों से दुश्मनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  दुश्मन से दोस्ती दोस्तों से दुश्मनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   ये आपकी मर्ज़ी है इसको सियासत से जोड़ सकते हैं या मुहब्बत से और कोई चाहे तो तिजारत से भी। सबसे पहले इक पुराना सबक इक कहावत को भूलना नहीं चाहिए , मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन अच्छा होता है। सरकार बड़ी अजीब चीज़ है दिखाई नहीं देती जब ढूंढते हैं मगर जब उसको ज़रूरत होती है सामने खड़ी होती है चीन की ऊंची दीवार की तरह। सरकार देश नहीं होती है मगर सरकार समझती है वही देश है जबकि सरकार बदलती रहती है देश वही रहता है। सबसे पहले हमको सरकार की नहीं देश की चिंता होनी चाहिए क्योंकि सरकारें कभी देश की चिंता नहीं करती हैं उनकी चिंता सत्ता और सरकार होने रहने की रहती है। सत्ता पक्ष विपक्ष चोर चोर मौसेरे भाई हैं इनकी लड़ाई इनकी जंग काठ की तलवारों से चुनावी मैदान में गंदी ज़ुबान से जनता को दिखलाने को होती हैं अन्यथा उनको आपस में कोई दुश्मनी कभी नहीं होती है। उनकी ब्यानबाज़ी जनता को बहलाने उल्लू बनाने के काम आती है और इनका पाला बदलना दिल से दिल मिलना शुद्ध तिजारत होती है सांसद विधायक बिकते हैं खरीदे जाते हैं। फर्रूखाबादी खेल है चलता रहता है चलता रहेगा जब तक वैश्या अपना जिस्म बाज़ार में बेचेगी नेता अपनी आत्मा जो ज़िंदा नहीं मर चुकी होती है उस अपनी लाश का सौदा करते रहेंगे। मुहब्बत और जंग में फिर भी शायद कोई सीमा होती है लेकिन ये जो अनीति है राजनीति या विदेश नीति किसी भी देश की सरकार की किसी और देश की सरकार से दोस्ती और दुश्मनी की रणनीति उस में कोई सीमा नहीं होती कोई नियम नहीं कोई मर्यादा नहीं और उसूल तो होते ही नहीं है ये अवसर की राजनीति होती है जो दो तरह की होती है इक सामने इक पर्दे के पीछे। 

    अब दोस्त की दुश्नमी की बात की कथा कहानी सुनाते हैं। ये वही है जिसने कई साल पहले हम भाई भाई हैं कहते हुए भाई की पीठ में खंज़र घौंप दिया था। हमने खंज़र घौंपने वाले को क्षमा कर दिया उसको गले लगाया उसके साथ झूले झूले और जिसकी पीठ में खंज़र घौंपा गया था अभी तक भी उसको दोषी ठहराते रहे हैं। हमने खुद को समझदार माना और विश्वास किया अपनी समझ पर कि वही जिसने पहले कभी किसी से वफ़ा नहीं की हमसे वफ़ाएं निभाएगी। गाइड फ़िल्म का गीत गुनगुना रहे हैं आजकल चाहा क्या क्या मिला बेवफ़ा तेरे प्यार में। दिल है कि मानता नहीं अभी भी साहब को उसको बेवफ़ा कहना मंज़ूर नहीं है कहते हैं न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं मगर क्या करें अपनी रहें जुदा हैं। साहब उसको दोष नहीं देते कहते हैं नहीं उसने अपनी सीमा नहीं लांघी हमने भी उसको बुरा भला नहीं कहा फिर झगड़ा काहे का है। कितनी जान कुर्बान करेंगे ऐसी आशिक़ी में सांढों की लड़ाई में फसल बर्बाद धूल उड़ाई और खड़े हैं सीना ताने। नवाब लोग मुर्गे लड़वाते थे मज़े लिया करते थे आजकल शासक खेल तमाशे करते हैं कभी किसी को ताजमहल किसी को धार्मिक आरती किसी को शानदार बाग़ की सैर जाने क्या क्या उस तरफ इस तरफ करते रहते हैं। खेल खेल में बच्चों की तरह लड़ना झगड़ना रूठना मनाना चलता है ये सीमा पर तकरार ये रार ये वार पर वार सब उनका मनोरंजन ही है आपको ताली बजानी है उनको सरकार चलानी है वार्ता से बात बनानी है। 

  ये आतंकवाद ये कभी सीमा पर संधि कभी संधि का उलंघन उनके अपने शतरंज के मोहरे हैं चाल है शह मात नहीं होने देते बाज़ी कभी इक तरफ नहीं होने देते। आपको इनको छोड़ अमिताभ बच्चन जी की तरह करोड़पति का खेल खिलवाना चाहिए जो खेलते हैं शायद कभी थोड़ा जीते सकते हैं खिलवाने वाले जीत कर करोड़ नहीं बिशुमार दौलत बनाते रहते हैं। आपको ऐप पर खेल में नाम दर्ज करवाना है यहां उनकी ऐप्पस पर पाबंदी की बात याद आई है। ये इक पर्दा है घूंघट कर लिया उस को देखना नहीं उसको अपना चेहरा नहीं दिखाना है उसको तड़पाना है। यही हमारी जीत है वो आकर गलती मानेगा तो घूंघट उठा देंगे फिर से उनसे मुहब्बत का तिजारत वाला लेन देन का रिश्ता चलने लगेगा। आपको नहीं समझ आता उनका झगड़ा किस बात का है उनकी दोस्ती कैसी है दुश्मनी क्यों है। उन सभी को सभी देश की सरकारों को , देश नहीं क्योंकि देश सरकार नहीं हैं ये पहले बताया है , जिन समस्याओं से लड़ना है कोरोना को हराना है गरीबी भूख और शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं बुनियादी ज़रूरतों जनता की को उपलब्ध करवाना है मगर करते नहीं हैं उन से आपका ध्यान हटवाना है। राजनीति बड़ी बेरहम होती है जब कोई राजा मरता था उसके साथ ही कोई उसके तख़्त पर ताजपोशी करवाता था , यहां मातम और जश्न समोरह इक साथ होते रहे हैं। नेता बदलते हैं तो पिछले सत्ताधारी से कोई सीख नहीं लेते क्योंकि जीतने वाला समझता है अपनी समझ चालाकी और चालों से उसने पिछले को हराया है तो उस से अकलमंद हूं जबकि हारने वाले का अनुभव वास्तव में काम का होता है। मुझे राहत इंदौरी जी की ये ग़ज़ल बेहद पसंद है शुरू से ही। 

                       दोस्ती जब किसी से की जाये , दुश्मनों की भी राय ली जाये।

 

 




Sunday, 28 June 2020

मुश्किल कहना मन की बात ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  मुश्किल कहना मन की बात ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    होते होते होते प्यार हो गया मगर महबूबा को जाने क्या सूझी जो आशिक़ ने जब भी कोशिश की दिल की बात कहने की अभी नहीं फिर कभी यहां नहीं कहीं और ऐसे नहीं कुछ और ढंग से सोशल मीडिया पर भी नहीं और अकेले अकेले भी नहीं। आखिर इक दिन पूछ लिया इरादा क्या है किसी और से तो नहीं लगा लिया दिल बता दो तू नहीं और सही। इस बात पर माशूक़ा को अपने मन की चाहत बतानी पड़ी कहा मुझसे मन की बात कहनी है तो रेडियो पर निर्धारित समय पर कहना अन्यथा ख़ामोश रहो। मालदार बाप की औलाद को लगा ये कोई बड़ी बात है वादा कर बैठा। जब रेडियो के दफ़्तर जाकर बात की तो मालूम हुआ क्या क्या करना होगा और जैसे कोई हर महीने मन की बात करता है उसका खर्चा आठ करोड़ हर एपिसोड का आता है। मुहब्बत करना बाद में उसका इज़हार करना ही इतना महंगा होगा बेचारे आशिक़ को सपने में भी अंदाज़ा नहीं था। किसी ने बताया छोड़ो सरकारी रेडियो को ऍफ़ ऍम रेडियो से गुज़ारा कर सकते हैं मगर पता चला उनका दायरा उतना बड़ा नहीं है जो आशिक़ के शहर से महबूबा के शहर तक सुनाई से सके। राजनीति ने मन की बात को भी इतना मुश्किल बना दिया है कि आम इंसान अपने मन की बात मन में ही रखने को मज़बूर है। कोई पहचान वाला मिला जिसने समझाया आप कवि होते या ग़ज़ल कविता कहते होते तो कोई अवसर मिल भी सकता था , कविता पढ़ते अपनी महबूबा को सुनवा कर बात बन जाएगी। कविता का शीर्षक रखते  मन की बात। आशिक़ ने गूगल पर ढूंढा और मन की बात कविता मिल ही गई। लिखने वाले को तलाश किया फेसबुक पर मिले तो अपनी समस्या बताकर उनकी कविता अपने नाम से सुनाने की इजाज़त मिल ही गई हाथ जोड़कर। उसके बाद रेडियो पर सौ पापड़ बेले तब जाकर सिफ़ारिश और उपहार देकर कविता पढ़ने का अवसर मिल गया। मगर जैसा होता है जवानी में सभी किसी की कविता ग़ज़ल चुराकर अपनी माशूक़ा को तुम्हारे लिए खुद लिखी है कहकर सुनाते हैं। मुहब्बत और जंग में सब जायज़ समझा जाता है। रेडियो पर किसी अनजाने कवि की कविता को अपनी बताकर पढ़ कर कह दिया मेरे मन की बात जिसे भी पसंद आई हो मुझे कल इंडिया गेट पर मिल कर जवाब दे सकती है। 


मन की बात ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

देख कर किसी को
बढ़ गई दिल की धड़कन
समा गया कोई
मन की गहराईओं में
किसी की मधुर कल्पनाओं में
खोए  रहे रात दिन
जागते रहे किसी की यादों में
रात - रात भर करते रहे
सपनों में उनसे मुलाकातें।

चाहा कि बना लें उन्हें
साथी उम्र भर के लिए
हर बार रह गया मगर
फासला कुछ क़दमों का
हमारे बीच।

उनकी नज़रें
करती रहीं इंतज़ार 
खामोश सवाल के जवाब का
पर हम साहस न कर सके
प्यार का इज़हार करने का कभी।

समझ नहीं सके वो भी
हमारी नज़रों की भाषा को
और लबों पे ला न पाए
दिल की बात कभी हम।

 ये ऊपर लिखी कविता सुनकर सोचता रहा आशिक़ कल क्या होगा। धड़कन बढ़ गई नींद नहीं आई। 

  कविता पढ़ने पर चेक भी मिला साथ में लेकर जब इंडिया गेट पहुंचे आशिक़ तो जो नहीं होना था हो गया। महबूबा से पहले कई और यही समझकर कि उनके लिए लिखी सुनाई गई है मिलने चली आईं और बात बनने की जगह बिगड़ गई जब वो जिसका इंतज़ार था आई तो अपने आशिक़ को गोपियों से घिरा पाया। मामला उलझ गया है अब कसम खाने और असलियत बताने पर भी भरोसा नहीं हुआ। तब बताया कि ये कविता जिनकी है उनसे मिलकर अपने प्यार की खातिर अनुमति ली है चाहो तो उनसे पता कर सकती हो। लिखने वाले का नंबर लिया सच जानकर आखिर मान भी गई। मन की बात किसी और की लिखी हुई चाहे खुद लिखी हो कहना बहुत मुश्किल है। बहुत कठिन है डगर पनघट की।

 

Thursday, 25 June 2020

एक बाबा मांगते सभी देश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     एक बाबा मांगते सभी देश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

उनको उम्मीद थी भरोसा था यकीन था कोरोना की दवा की खोज की खबर का असर होगा ज़रूर। अमेरिका से फोन आया तो धमकी मिलने की तैयारी थी दिल ही दिल में सोचा था इनकार नहीं किया जा सकता फिर भी नाज़ नख़रे दिखाए जा सकते हैं पहले रूठना फिर मान जाना दोस्ती मुहब्बत का मज़ा लिया जाता है। मगर ये क्या उधर से कोरोना की दवा की नहीं मांग की गई मांगा गया कि ये बाबा मुझे दे दो ठाकुर। गब्बर सिंह की तरह से उनको जो चाहिए छीन सकते हैं। समझ नहीं आया पूछा आपको कोरोना की दवा चाहिए तो भिजवाते हैं हमने तो अपने देश में रोक लगा दी है बेचारे गरीब की दवा बिक जाये अच्छा है। अपने क्या हमें उल्लू समझ रखा है हमने किसी दवा की नहीं उस बाबा की मांग की है। बाबा बड़े काम की चीज़ है दवा नहीं कुछ और काम लिए जा सकते हैं आप भिजवा दो। बात बीच में रह गई उधर से चाईना भी यही मांग रहा था उसको भी कोरोना की दवा की नहीं बाबा की ज़रूरत थी। ऐसा क्या महत्वपूर्ण मकसद हो सकता है नहीं समझ पा रहे हैं सरकार जनाब। दोनों को दिलासा दे दिया बाबा से बात कर आपको सूचित करते हैं। 

दिल दिमाग़ में खलबली मची है क्या करना चाहते हैं बाबा को लेकर। तीसरे देश के शासक ने राज़ खोल दिया आखिर ये बताकर कि बाबा उनकी अर्थव्यवस्था से लेकर चुनावी खेल तक जनता को झांसे में रखने से लेकर देशभक्ति और ऊंचे आदर्शों महान बनने तक सभी कुछ का उपाय हैं। करोड़ों लोगों को बिना वास्तविक कुछ भी लाभ हासिल किये ऐसा भरोसा दिलवाना तो राजनेताओं के भी बस की बात नहीं है। सरकार जनाब भी उनका इस्तेमाल यही सब पाने को करते रहे हैं तो अब ये राज़ खुल गया है चर्चा आम हो गया है। बाबा को बताया तो बाबा अपना दाम और बढ़वाकर अमेरिका जाने को उतावले हो जाएंगे उनको पता है खुद उन्हें अमेरिका जाना देश की सबसे बड़े पद की कुर्सी हासिल करने से भी अधिक महत्वपूर्ण लगा था। हम भी किसी से कम नहीं हैं जापान चीन अमेरिका से मेड इन इंडिया लगी मोहर वाली चीज़ खरीदते हैं। झट विचार आया हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चौखा की तरह समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। 

कॉलोन बनाने वाले को खुद अपने जैसे और नकली हूबहू आदमी बनाने को कहा हुआ था उसको बुलवाया गया और बाबा की नकल के कॉलोन बनवाने की योजना की बात की। बाबा को किसी बहाने उनकी लैब में भिजवाया गया ताकि उनकी नकल बनाने की तरकीब निकाली जा सके। मगर वैज्ञानिक हैरान हो गए ये देख कर कि जिनकी कॉपी बनानी है वो खुद असली है ही नहीं नकली हैं और नकली की नकल बनाना कॉलोन बनाने में संभव नहीं है। सरकार जनाब को जाकर बताया पहले तलाश करो कास्तविक असली बाबा हैं कहां ये तो उनकी नकल है। नकली की पहचान भारत में नहीं होती है और नकली पर असली का लेबल लगाकर बेचते हैं लेकिन अमेरिका चाईना जापान परखना जानते हैं उनको नकली बाबा भेजा तो मामला बिगड़ सकता है। असली नकली में उलझ गए हैं हम लोग और नकली को असली साबित करने वाले सामान ही नहीं बाबा भी नकली बनाने तक लग गए हैं।

ज़िंदगी से खिलवाड़ कब तक ( मौत के सौदागर ) डॉ लोक सेतिया

 ज़िंदगी से खिलवाड़ कब तक ( मौत के सौदागर ) डॉ लोक सेतिया 

    शायद अभी भी देश की सरकार राज्यों की सरकारों को समस्या की जड़ तक पहुंचने की ज़रूरत नहीं समझ आएगी। ये शायद किसी भी देश में संभव नहीं होगा कि स्वास्थ्य को लेकर नियम कानून जैसे कड़े होने चाहिएं हैं ही नहीं और जो बने हुए हैं उनको भी सख्ती से लागू किया ही नहीं जाता है। राजनीति और धर्म के बाद सबसे अधिक लूट की छूट शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में ही है। हैरानी हुई किसी ने मेरी इक पोस्ट पर ये तक कहा कि क्योंकि कोई आयुर्वेद की बात कहता है उसका विरोध नहीं करना चाहिए। लोगों की जान से खिलवाड़ कोई भी करे अपराध है वो चाहे किसी भी पैथी के नाम पर किया जाये। वास्तव में यही समय है कि उसको ही नहीं जिसने कोरोना की दवा बनाने के नाम पर उचित अनुचित की परवाह नहीं कर अपने फायदे के लिए ऐसा अनुचित कार्य करने की कोशिश की हर तरह के हथकंडे अपना कर इक घिनौना खेल खेलना चाहा लोगों की ज़िंदगी के साथ बल्कि और भी सभी को भी कोई खिलवाड़ लोगों की ज़िंदगी से करने या मनमाने ढंग से कमाई करने से रोकने का उपाय किया जाये। वास्तव में गली गली मौत के सौदागर बिना किसी डर के जनता को जाने कितने झूठे दावों से ठग रहे हैं। आपको सुबह पार्क में सैर करते कोई पतले मोटे होने की कोई गोरा होने की कोई आपको गंभीर रोगों की उपचार की बात कहकर जाने क्या क्या नहीं बेचते हैं। सरकारी विभाग की जानकारी में तमाम देसी एलोपैथिक या घरेलू नुस्खे बताकर नीम हकीम खूब कमाई करते हैं। एलोपैथिक दवा भी बिना डॉक्टर की सलाह से बिकती हैं या डॉक्टर भी अनावश्यक लिखते हैं अपनी कमाई की खातिर। महंगे टेस्ट भी कमीशन की खातिर और डॉक्टर बड़े अस्पताल को मरीज़ भेजते हैं किसी बिचौलिये दलाल की तरह हिस्सा लेकर। ये जितने बाबा आयुर्वेदिक दवा बेच रहे हैं शायद नहीं कर पाते अगर नियम कानून वास्तव में कड़ाई से लागू किये जाते और ये अनुमति ही नहीं मिलती कि कोई भी किसी एक जगह रोगी को देख कर निदान करने के बाद ही उपचार कर सकता न कि कोई बाबा या डॉक्टर कितनी जगह अपने नाम से दवा बेचने का काम करता। ये अंधेर नगरी चौपट राजा कब तक इसको बंद करना ज़रूरी है क्योंकि इनसे लोग स्वस्थ्य होने की जगह और रोगों के शिकार हो रहे हैं। किसी ने कमेंट किया एलोपैथिक दवा नुकसान देती हैं मैंने उनको बताया कोई भी दवा आपको नुकसान देती है अगर बिना डॉक्टर की राय और हिदायत लेते हैं। ये कोई देसी अंग्रेजी का झगड़ा नहीं है उचित ढंग से सही सलाह से कोई भी दवा चिकित्सक सोच समझ कर देते हैं रोगी की भलाई के लिए। रोग होने पर दवा ज़रूरी है मगर अपनी मर्ज़ी से या दवा बेचने वाले की बात से नहीं। सच कहा जाये तो हमारी स्वस्थ्य सेवा खुद बेहद बीमार है गंभीर चिंताजनक हालत है मगर किसी नेता अधिकारी को परवाह ही नहीं उनको समझ ही नहीं है कि कब कोई दवा दवा होती है और कब वही दवा ज़हर भी हो सकती है। 

    दवा कभी इश्तिहार छपवा कर नहीं दी या बताई जा सकती है और कानून है कि कोई भी किसी रोग का उपचार करने की गारंटी की बात नहीं कह सकता है। मगर ये क्या सरकार और स्वास्थ्य शिक्षा विभाग की आपराधिक गलती नहीं है कि उसने ये कभी समझना ही नहीं चाहा की शिक्षा और स्वास्थ्य हर नागरिक को उचित ढंग से मिलना चाहिए और कोई इनको लेकर धोखाधड़ी लूट नहीं कर सके। मैंने देखा है कितने ऐसे अस्पताल खुले हुए हैं जिन में डॉक्टर का नाम तक नहीं होता है लोग नहीं जानते कौन है जो उनका ईलाज कर रहा है। और ऐसे लोग पर्चे बंटवाते हैं कितने असाध्य रोगों का ईलाज करने के दावे कर

ते हुए। दवा कंपनियां दवा को सामान की बेचती हैं किसी भी ढंग से , इतना सब जो भी जैसे चाहे करते हैं कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। कितने तथकथित साधु बाबा उपदेश देने के साथ अपनी द

वा बेचते हैं सभा में हर किसी को कोई भी ईलाज बताकर। सड़क किनारे कोई भी आपको ठग सकता है मगर बात इतनी ही नहीं है यहां तो बड़े बड़े अस्पताल डॉक्टर क्या करना है क्या करते हैं कोई परखने जांचने वाला नहीं है।

  ये भगवान हैं कहते हैं और इनको यकीन है भगवान की तरह ये जो भी कर सकते हैं कोई सवाल नहीं कर सकता है। संक्षेप में कुछ बातें समझते हैं। नर्सिंग होम क्लीनिक में क्या क्या हो कितनी जगह कितने नर्स स्टाफ हो और उनकी शिक्षा अनुभव क्या हो कोई नहीं सोचता समझता ईलाज नहीं खिलवाड़ किया जाता है डॉक्टर नहीं है तब उनकी जगह कोई भी रोगी की जांच और उपचार करता है। बड़े अस्पातल नर्सिंग होम

में कितने बिस्तर का अस्पताल है कितनी जगह हो कितने स्टाफ होना चाहिए और चौबीस घंटे खुले होने का अर्थ कितने डॉक्टर होने चाहिएं देखने लगे तो हालत चिंताजनक है। संभव ही नहीं है सही उपचार जब तक आपका बुनियादी ढांचा ही सही नहीं हो। जैसे हर कारोबार में नियम हैं कितने दाम ले सकते हैं कोई नहीं पूछता अस्पताल डॉक्टर के लिए कोई सीमा तय है कितने पैसे ले सकते हैं। केमिस्ट लैब से हिस्सा तो जैसे उनको ज़रूरी लगता है। मुझे हैरानी हुई किसी धर्मार्थ अस्पताल में डॉक्टर को  वेतन के साथ दवा लैब से कमीशन का खाता अलग बनाया हुआ था अर्थात धर्मार्थ की बात करने वाले भी लूट में शामिल थे।

ये सबसे अराजकता की बात है कि देश में राज्यों में अस्पताल नर्सिग होम को लेकर कोई मापदंड नहीं है कि ये किस स्तर का है और उसके चार्जेस कितने हों। कितने डॉक्टर पीआरओ रखते हैं जो उनके लिए रोगी लाने का उपाय करता है मगर किसी भी नर्सिंग होम डॉक्टर के पास अपने पास दाखिल रोगियों से पूछने वाला कोई मैनेजमेंट का स्टाफ नहीं होता जो उनसे जानकारी ले कि आपको उचित उपचार दवा सुविधा मिल रही है। मनमाने पैसे लेकर भी बदले में उचित सुविधा नहीं उपलब्ध करवाना ये आम बात है आपको जो भी जैसा है चुप चाप झेलना है क्योंकि तब आपको अपनी समस्या का समाधान ज़रूरी लगता है। इंसान रोग होने पर भीड़ में जानवर से खराब हालत में रहने को मज़बूर हैं। नहीं इनको अस्पताल नर्सिंग होम नहीं कोई और नाम देना चाहिए। मगर सरकार अंधी नहीं है उसके पास आम नागरिक की सुरक्षा के लिए अपने ही नियम कानून कड़ाई से पालन करवाने का कर्तव्य है जिसे कोई ध्यान नहीं देता है।

आपको टीवी पर विज्ञापन दिखाई देते हैं बीमा करवाने के मगर बीमा कंपनी कभी समय पर अपना फ़र्ज़ निभाती नहीं है। जब आपको ज़रूरत है बेइमान लोग आपको ही गलत ठहराने की कोशिश करते हैं और कभी भी आसानी से आपको बीमे का लाभ नहीं देते हैं कई बार तो कोई भी बहाना बनाकर आपको परेशान करते हैं और सालों साल आपको अदालत से राहत की लड़ाई लड़नी पड़ती है। सच कहा जाये तो स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली इतनी खतरनाक है कि लगता है जैसे इस देश में इंसान की जान की कोई कीमत ही नहीं है। और किसी भी धंधे में ऐसा मुमकिन नहीं है कि मनमाने मूल्य या दाम या कीमत लेकर भी आपको घटिया किस्म की सेवाएं कोई दे सकता हो। बहुत कुछ नहीं यहां सभी कुछ बदइंतज़ामी है और सरकार राज्य के विभाग अपना काम करना नहीं चाहते हैं। नेताओं को सत्ता की राजनीती और पैसे बनाने की लत लगी है और जो भी उनको रिश्वत चंदा देता है जो मर्ज़ी करने की छूट ले सकता है। कई साल पहले इक स्वस्थ्य मंत्री ने इसको लेकर कानून बनवाने की कोशिश की थी मगर उस कानून को संसद की कमेटी को भेजकर उनको ही स्वस्थ्य मंत्री पद से हटवा दिया गया था क्योंकि तमाम देश के डॉक्टर्स का संगठन ने पैसा इकट्ठा कर ऊपर पहुंचा दिया था। मीडिया को इसकी खबर की ज़रूरत नहीं थी उनको खबर नहीं विज्ञापन की कमाई ज़रूरी लगती है।

आपने कितने जाने माने अभिनेताओं को खिलाडियों को ऐसे विज्ञापन देते देखा है जिन का उन्होंने कभी खुद उपयोग शायद ही किया हो। आपको कीमत देनी है और आपका झूठ सच साबित हो जाता है। आखिर में इक शेर दुष्यंत कुमार का पेश है।

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं 

आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार। 

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार 

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।


Wednesday, 24 June 2020

जाने कहां खो गए ऐसे लोग ( सफर मुसाफ़िर ) डॉ लोक सेतिया

  जाने कहां खो गए ऐसे लोग ( सफर मुसाफ़िर ) डॉ लोक सेतिया 

   नहीं आज उनका किसी का भी कोई जन्म दिन नहीं है न ही उनकी निजि ज़िंदगी की बात है। मगर ये दिन उनकी याद के बिना पूरा नहीं हो सकता है। आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के बहाने ऐसे कई लोग याद आये हैं। 25 जून 1975 को आपत्काल घोषित हुआ उस से अधिक महत्व इस बात है कि आज़ादी के पहली बार किसी ने अपने देश की अपनी ही चुनी हुई सरकारों के ख़िलाफ़ शांतिपूर्वक अंदोलन करने की राह दिखलाई थी और दूर से तमाशा देख कर नहीं खुद इक ज्वाला में कूदकर उस आग को जलाया था जो आज भी हमारे सीनों में जलती है दुष्यंत कुमार के शब्दों में। मुझे अफ़सोस होता है जब लोग गांधी नेहरू भगत सिंह लक्ष्मी बाई जैसे कितने महान लोगों की बात करते हैं मगर जेपी कौन थे उन जैसे कितने लोग जो हमेशा अपने आदर्शों विचारों की कठिन डगर पर बिना किसी स्वार्थ चलते रहे जीत हार की चिंता नहीं की न ही कौन साथ चलता है कौन छोड़ जाता है इसकी परवाह की उनको कुछ भी पता नहीं होता है। हां उनको अमिताभ बच्चन की ज़िंदगी का सब मालूम होता है ये विडंबना है कि 11 अक्टूबर को लोग असली जन नायक की नहीं फ़िल्मी तथाकथित सदी के घोषित महानायक की बात करते हैं। ऐसे लोग बातें भली भली करते हैं मकसद पैसा शोहरत हासिल करना होता है। नकली नायक नकली बाबा नकली नेता देशसेवक होने का दावा भी झूठा वास्तविक चाहत लालच लोभी सत्ता धन और कारोबार या ऐसी राजनीति जिस का कोई नैतिक आदर्श से मतलब नहीं यही लोग हर तरफ दिखाई देते हैं और महान कहलाते हैं। जाने कहां खो गए ऐसे लोग जो अपना घर जलाकर रौशनी करते थे। जाँनिसार अख्तर के शब्दों में।

                      जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं 

                      देखना ये है कि अब आग किधर लगती है। 

                       सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है 

                       हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है। 

Rekhta  रेख़्ता में मुझे तलाश करने पर जाँनिसार अख़्तर के ये अल्फ़ाज़ नहीं मिले। आपको जावेद अख़्तर को लेकर मालूम है उनके वालिद क्योंकि शोहरत और सफ़लता की बुलंदी पर नहीं थे लोग नहीं जानते हैं। 
कुछ ऐसा ही मजाज़ लखनवी जी को लेकर है। असरार उल हक़ मजाज़ , महिलाओं के लिए उनसे अच्छा पैग़ाम किसी ने दिया हो मुझे नहीं दिखाई दिया मीर ग़ालिब से आज तक। दो शेर उनकी नज़्म से भी पढ़ते हैं। 

                             तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन 

                       तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था। 

                           तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत 

                           तू अपने सर से ये बदल हटा लेती तो अच्छा था। 

आपको तो उन सत्येंद्र दुबे का भी नाम याद नहीं जो सच की खातिर क़त्ल कर दिया गए। ये 2003 की बात है 27 नवंबर को 30 साल की आयु में अपने जन्म दिन को ही। कारण उन्होंने इक पत्र लिखा था अटल बिहारी वाजपेयी जो को पीएमओ से गोपनीय खत पहुंचा भ्रष्टाचार करने वालों तक जिन्होंने उनको क़त्ल कर अपना रास्ता साफ कर दिया। राष्ट्रीय राजमार्ग योजना की बात है जिन बड़े खुली सड़कों पर आज भी आप शान से चलते हैं कभी सोचा किसी ईमानदार आईएएस अधिकारी का खून बहा होगा उन्हीं पर। 

   कोई यकीन करेगा ऐसे लोग जो उसूलों की राह पर बिना डरे बिना विचलित हुए चलते रहे जबकि उनको खुद कोई पद कोई तमगा कोई भी सत्ता का अधिकार नहीं चाहिए था। जयप्रकाश नारायण जी को कितने बड़े बड़े पद प्रस्ताव सामने रखे गए मगर उनको कोई पद नहीं चाहिए था। उनको देश की गरीबों की शोषण की सत्ता के अनुचित आचरण के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करनी थी। जो सोये हुए हैं उनको जगाना था मगर क्या हम जागे हैं या फिर किसी नशे की गहरी नींद में बेसुध हैं। आज भी बहुत लोग दावा करते हैं जेपी की संपूर्ण क्रांति की सोच को कायम रखने की मगर अधिकांश का मकसद और होता है जैसे उनके आंदोलन में जो लोग शामिल थे उनकी वास्तविकता सामने आई तो बेहद निराशा हुई उनको सभी को। कितने नाम हैं मत पूछो आपको विश्वास नहीं होगा कि क्या ये वही लोग हैं जो एमर्जेन्सी में डरते छिपते थे आज शासक बनकर तानशाही ढंग से आचरण करते हैं। बड़े नज़दीक से देखा जाना समझा है उनको मैंने अब शायद उनको मेरी पहचान भी याद नहीं होगी कभी मेरे पास खुद चल कर आये थे सहायता ली थी छिपने को और कई तरह से।

आज जयप्रकाश नारायण सत्येंद्र दुबे और ऐसे सच्चे देश समाज के शुभचिंतक कहीं नहीं नज़र आते हैं जबकि आज उनकी ज़रूरत पहले से अधिक है। इक बात इक नेता ने कही थी , आसान है किसी भी नेता या महान व्यक्ति की छवि को धूमल करना मगर क्या आप ऐसा एक भी व्यक्ति बना सकते हैं सोचना ज़रूर।

Tuesday, 23 June 2020

मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  मौत के सर यही इल्ज़ाम है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

मौत के सर यही इल्ज़ाम है 
खूबसूरत भी  है बदनाम है। 

इक कहानी हक़ीक़त बन रही 
आज भेजा  मुझे पैग़ाम है। 

मयकदा मय नहीं साक़ी नहीं 
और टूटा हुआ  हर जाम है। 

राह देखी सुबह से शाम तक 
इक यही अब हमारा काम है। 

कल बुलाया मुझे कहने लगे 
देखना है   तमाशा आम है। 

ख़त कई साल पहले था लिखा 
पर पता है  न कोई नाम है। 

अब तो आवाज़ "तनहा" की सुनो 
ढल रही ज़िंदगी की शाम है।

जनाब सच सच बोलो नहीं कुछ भी छिपाना है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      जनाब सच सच बोलो नहीं कुछ भी छिपाना है ( तरकश ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

    सियासत की आदत होती है बताते कम हैं छिपाते ज़्यादा हैं। मगर ये क्या सभी ऐसा करने लगे हैं। टीवी चैनल अख़बार मीडिया बताते नहीं समझाने की कोशिश करते हैं कि उनका झूठ झूठ होकर भी झूठ नहीं है उनका बाज़ार ही झूठ का है जिस में सच का कोई काम ही नहीं है। लेकिन अदालत को क्या हुआ है आप को देश के कानून की इंसाफ की बात कहनी है आपने इक दिन भगवान को अपनी ढाल बना लिया और घोषणा कर दी हमने अनुमति दे दी तो भगवान भी माफ़ नहीं करेगा। भगवान से गवाही की बात कहां थी बताओ किस भगवान ने आपको कैसे बताया कि उनकी माफ़ी कब किसे मिलेगी किसे नहीं मिलेगी। भगवान अब आपको माफ़ी दे देगा जब आपने अपनी कही बात बदल कर अनुमति दे दी है। भगवान नहीं हुआ आपके झूठे गवाह हो गए जो हर मुकदमे में घटना के चश्मदीन गवाह होते हैं। भगवान और आस्था का मज़ाक बना दिया है आपको कोई धर्म की मंदिर मस्जिद की राजनीति करनी है आपको देश की कानून व्यवस्था संविधान की रक्षा करनी है मगर आप तो लगता है सत्ता की भाषा पढ़ने सीखने बोलने लगे हैं। देश में बहुत कुछ था भगवान भरोसे अब न्याय व्यवस्था भी भगवान के भरोसे होगी क्या। पता नहीं ऊपर वाला कब इंसाफ करेगा लोग तो थक गए हैं विनती करते करते न्याय नहीं मिलता झूठी तसल्ली भी कोई नहीं देता बस खुद ही दिल को बहलाते हैं वो है सब देख रहा है। देखती तो सरकार भी है अदालत पुलिस भी मगर जो करना है करती नहीं अब भगवान को जाने कब चिंता होगी दुनिया को सही करने को भलाई का साथ और बुराई का अंत करने को अपना पलड़ा इंसाफ के तराज़ू का सही रखने की। कोई धर्म के नाम पर डंडी नहीं मार सके ऐसा कब होगा। 

       दादा जी को मरे हुए भी पचास साल हो गए हैं। उन्होंने जीवन भर ईमानदारी और मेहनत से बहुत कुछ खड़ा किया था। उस ज़माने में रिश्तों की अहमियत होती थी और दादा जी की आदत थी भलाई करने की जो भी सहायता मांगता देते थे मगर जब उनकी तबीयत बिगड़ी कुछ रिश्तेदार समझे उनका बचना मुश्किल है और वो जो भी उनके हाथ लगा ले कर चंपत हो गए। मगर दादा जी बच गए मगर उनकी आदत थी माफ़ करने की खुद ही अपने बेटों को आदेश दिया उनसे कोई झगड़ा नहीं करना। कहावत सुनाते थे दो पैसे की हंडिया गई कुत्ते की जात  पहचानी गई। ऐसे कुत्तों को घर गली में दोबारा नहीं घुसने देने की नसीहत दे गए थे। कुत्तों से सावधान रहने का सबक समझा गए थे ये भी कि कुत्तों की वफ़ादारी बदल जाती है जब चोर उसको खाने को हड्डी डालते हैं। इधर सत्तधारी नेताओं ने मीडिया को पालना शुरू कर दिया है जो सत्ता के सामने दुम हिलाते तलवे चाटते हैं और विरोधी पर भौंकते हैं। ये विदेशी नसल के कुत्ते लगते हैं और देसी भाषा में भौंकते हैं। जाने कितने लोग देश का धन क़र्ज़ लेकर भाग गए विदेश और हम देखते रहे कुछ नहीं कर सके। पहली बार कोई अमीर उद्योगपति कंगाल होने की बात स्वीकार कर पड़ोसी देश के बैंक को पैसा लौटने से इनकार कर रहा है तब लोग उसको भरत रत्न देने की बात करते हैं उनके लिए ये भी गैरव की बात है कि जिस दुश्मन से देश की सरकार कितनी योजनाओं में साथ रखती है उसे कमाने देती है और ठगी जाती है दोस्ती भाईचारे के जाल में मगर कुछ समझ नहीं पाती  क्या करे आगे कुंवां पीछे खाई वाली दशा है , कोई सरकार का खास अमीर उसको चपत लगाने का काम कर गया है। अब क़र्ज़ नहीं चुकाने वालों को भी महान समझने लगे हैं लोग हद है कुछ बचा है समाज की सोच के नीचे गिरने में।  

     आपको ये बताना ज़रूरी था क्योंकि कुछ लोग जो आज सत्ता में हैं पचास साल पहले के शासक को हर बात का दोष देकर समझते हैं बड़ी अच्छी बात करते हैं। जिस बुनियाद पर खड़े हैं ये उनकी ही खड़ी की हुई है मुमकिन है जिनका गुणगान करते हैं ये लोग उन्होंने इस बुनियाद को उखाड़ने और देश की ऊंची ईमारत को बर्बाद करने को तमाम कोशिशें की हों। और जिनको ऐसे लोग महान मानते हैं उनकी किसी बात का कोई भरोसा ही नहीं है उनके ब्यान बदलते भी हैं तो भी नहीं सोचते कि इनका सच क्या है। सच बताते नहीं छिपाते हैं और झूठ को सच से बड़ा साबित करते हैं तब भी ये लोग देश नहीं दल और नेता की हद से बढ़कर चाटुकारिता करते हुए अपनी देशभक्ति को ही शर्मसार करते हैं। उनको देश की बर्बादी की चिंता नहीं है कोई बर्बादी की चर्चा करता है ये उनको अच्छा नहीं लगता है। सावन के अंधे हैं उनको हर तरफ हरियाली दिखाई देती है। इतिहास से सबक लेते तो गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले से प्यार की पींग में झूला झूलने की गलती नहीं करते जो किसी का वफ़ादार नहीं उस की वफ़ा की उम्मीद वही करते हैं जिनको वफ़ा का अर्थ नहीं मालूम होता है। आजकल बड़े बड़े पद पर लोग शपथ संविधान की खाकर भी वफ़ादारी किसी नेता या दल या कोई संस्था किसी संगठन के लिए रखते हैं। पुलिस अधिकारी आतंकवादी लोगों को पैसे लेकर उधर से इधर पहुंचाने का काम करते पकड़ा जाता है मगर पुलिस तीन महीने बाद भी अदालत में केस दर्ज नहीं करवाती और उसको ज़मानत मिल जाती है।

    जनाब बताते हैं कोरोना से दुनिया के लोग योग से फायदा उठा रहे हैं। कोई आधार नहीं किसी ने कोई दावा साबित नहीं किया बस यारी है निभानी है योग से किसी को फायदा हुआ है तो उसी को जिसने योग को बेचा है बाज़ार लगाकर मालामाल हो गया है। योग करना नहीं आपको योग को बेचना सीखना होगा या फिर देशभक्ति को भी दलगत राजनीति का जुमला जिस का शोर करना है देश की खातिर करना कुछ भी नहीं। सच से नज़र छिपाते हैं झूठ को गले लगाते हैं अच्छे दिन की बात नहीं करते रोज़ तमाशे दिखलाते हैं। भगवान इनको माफ़ करना ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैं कहना चाहते हैं मगर सवाल फिर देश की अदालत का सामने है क्योंकि वही तय करती है भगवान माफ़ नहीं करेगा और बाद में भगवान को भूल जाती है आदेश जारी कर देती है। भगवान कोई पुनर्विचार याचिका दायर नहीं कर सकते उनका अधिवक्ता कोई नहीं है।  

Saturday, 20 June 2020

बौछार सावन की लोग कागज़ के ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

 बौछार सावन की लोग कागज़ के ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया 

निकले थे ज़िंदगी की तलाश में आ पहुंचे हैं मौत के करीब। धन दौलत महल चौबारे रौशनियां और शोर कहकहों का अब लगता है ये सभी कागज़ के फूल जैसे हैं बारिश की इक बौछार इनका वजूद मिटा सकती है। खुश रहने को दिल को क्या क्या झूठा तसल्ली देते रहे क्या क्या नहीं है पास क्या क्या नहीं मिलता है दुनिया के बाज़ार में खरीदार हो बिकता है इंसान भी ईमान भी। तराशा है अपने हाथ से अपना भगवान भी और खुद ही अपने भीतर छुपाए हुए हैं कोई शैतान भी। बदन समझ बैठे जिसको लिबास है जैसे किसी मिट्टी की दीवार पर सीमेंट का पलस्तर किया हुआ देखने को मज़बूत मगर खोखलापन बेताब बाहर निकलने को। अपने को तंदुरस्त रखने को क्या क्या नहीं किया चिंता मिटी नहीं बीमा भी करवा कर भी , क्या ग़ज़ब की सलाह देते हैं महंगा नहीं है अब तो करवा लो आप मर गए तो क्या होगा आपके अपनों का। आज की छोड़ अनदेखे कल की व्यर्थ की चिंता जैसे इंसान हो नहीं हो पैसा होना चाहिए आपके परिवार को बच्चों को आपकी नहीं पैसों की ज़रूरत होगी ज़िंदा हैं तो जैसे भी जितना भी जमा करते रहो और मर जाना मगर छोड़ जाना खूब जीने का सामान किस किस के लिए। कोई नहीं समझाता अपने बच्चों को परिवार को ये भी सिखाना चाहिए कि हालात बदलते रहते हैं हौसला रखना चाहिए और ज़िंदगी की मुश्किलों से घबराना नहीं उनसे टकराना चाहिए। 

नतीजा अभी भी नहीं समझे हैं। पैसा है आधुनिक साज़ो-सामान है घर कार सुख सुविधा और सेहत बनाने को सैर खाना पीना योग और क्या क्या टॉनिक और जिम जाना मौज मस्ती ठहाके लगाना इसको सभी कुछ मान लिया है। आत्मा मन क्या है कुछ भी नहीं बेकार की चीज़ें हैं उनको कूड़ेदान में फेंक दिया जाने कब अब याद भी नहीं है। लिबास को महत्व दिया वास्तविक इंसान को मन विचार को जाना नहीं समझा नहीं देखा नहीं। आपको सारी ताकत शोहरत किसी तिनके की तरह हवा चलते ही बिखर जाती है नज़र नहीं आता अपना निशां तक दूर दूर तक। चमकीले रंग बिरंगे पैकिंग में गत्ते के डिब्बे जैसी हालत है हमारी दिखाई देते हैं सुंदर बाहर से अंदर कितना मैल भरा हुआ है खोलते हैं कोई उपहार तो बेकार कितना फैंकते हैं कूड़े में। अपने भीतर से भी वास्तविक वस्तु मन आत्मा को रख बाकी गंदगी को निकालते और फैंकते किसी कूड़ेदान में। अस्पताल दवाओं का भंडार और डॉक्टर जीवन रक्षक उपकरण सभी हैं मगर मौत कब कैसे आती है कुछ भी काम नहीं आता और मौत के नाम से घबराते हैं भयभीत हैं क्योंकि अंदर से खोखले हैं अन्यथा समझते कि ज़िंदा रहना क्या है ध्यान देते मौत से डर कर बार बार नहीं मरते। अपने लिए जीना ज़िंदगी नहीं होता है ज़िंदगी वही है जो औरों की खातिर जी जाये किसी के काम आये किसी को ख़ुशी देने किसी का दर्द बांटने का नाम है वास्तविक जीना सार्थक ढंग से। झूठ का तिलक लगाकर लोभ अहंकार को हथियार बनाकर खुद अपने आप पर मोहित होना यही सबसे बड़ा रोग है जो हमने पाला हुआ है। अपने मन की आत्मा की खिड़कियों को बंद रखते हैं जैसे बारिश की बौछार से अपने कमरे की सजावट को बचाने को घुटन में रहना विवशता है।

Sunday, 14 June 2020

ख़ुदकुशी पर गंभीर चिंतन ( विचार-विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

   ख़ुदकुशी पर गंभीर चिंतन ( विचार-विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

क्या आप भी कहोगे कायर लोग ख़ुदकुशी करते हैं क्या आप हौंसला रखते हैं जान देना मेरी जान आसान नहीं है। दो घटनाओं की बात करते हैं दोनों वास्तविक हैं। किसी देश में इक मनोचिकिस्तक ने ये इश्तिहार छपवा रखा था कि जिस किसी को भी ख़ुदकुशी करनी हो इक बार पहले आकर मुझसे अवश्य मिले। और उसके पास रोज़ कितने लोग निराश होकर आते और वो उनमें अपनी बातों से आशा का संचार कर उनको ख़ुदकुशी करने से रोकने को सफल हो जाता था। मगर इक दिन कोई आया जिसकी दर्द भरी बात सुनकर खुद मनोचिक्त्सक ही हार मान उसको कह बैठा क्षमा करें मुझे नहीं समझ आ रहा कैसे और क्यों आपको जीने को समझाऊं। अर्थात उसको ख़ुदकुशी से रोकने का कोई उपाय नहीं था उसके पास। जब उनसे मिलकर बाहर निकला तो उस डॉक्टर की स्वागत कक्ष की सहायिका ने पूछा आप क्या सोच रहे हैं। उस ने जवाब दिया अब तो मुझे ख़ुदकुशी करनी ही है जब उन्होंने ही मुझे जीने का कोई मकसद नहीं बतलाया जो सभी को मरने से रोकते हैं। उस महिला ने कहा क्या आप ख़ुदकुशी करने जाने से पहले मेरे साथ एक कप कॉफी पीने चल सकते हैं। और उसके बाद उस डॉक्टर की सहयोगी ने उस से दोस्ती कर ली और कहा कितनी अजीब बात है मुझे ज़िंदगी में पहली बार कोई अच्छा सच्चा दोस्त मिला है मगर आज ही उसको ख़ुदकुशी भी करनी है। और शायद जीवन भर मुझे ऐसा दोस्त मिलेगा भी नहीं। तब उसने कहा कि मुझे जब आप जैसी दोस्त मिल गई है तो आपके लिए मुझे ज़िंदा रहना ही होगा ख़ुदकुशी करने का कारण ही यही था कोई मुझे समझने वाला दोस्त नहीं मिला था। आपकी जानकारी के लिए उस डॉक्टर ने अपने उस काम को उसी महिला के नाम समर्पित कर दिया था। संजीवनी नाम से भारत में उसकी शाखा है दिल्ली में जिस का सहयोगी मैं भी रहा हूं कुछ समय तक दिल्ली में रहते हुए।     

  अब जो सच्ची घटना आपको बताने जा रहा हूं सोचते ही बदन में कंपकपी होने लगती है। बहुत साल पहले अख़बार में खबर पढ़ी इक पति-पत्नी ने साथ साथ ख़ुदकुशी कर ली। चौंकाने की बात थी दोनों डॉक्टर थे और ख़ुदकुशी करने का कारण आर्थिक दुर्दशा इतनी खराब थी कि उनके घर में अनाज का इक दाना नहीं था कोई सामान बचा नहीं था बेचने को। अस्पताल और रहने को घर दोनों किराये के थे और जीवन यापन को आमदनी नहीं थी। जाने क्या सोचकर मैंने उस शहर में अपने इक साथी डॉक्टर को फोन किया और पूछा था क्या आपको पता है ऐसा क्यों हुआ। उन्होंने बताया कि डॉक्टर इक अमीर बाप का इकलौता बेटा था मगर उसने पिता की मर्ज़ी के खिलाफ डॉक्टर लड़की से शादी कर ली जिसे प्यार करता था। और पिता ने उसको कुछ भी देने से साफ इनकार कर दिया था। ख़ुदकुशी से पहले अपने घर गया था बताया था उसे अपनी नहीं अपनी पत्नी की जान की खातिर आपसे मदद चाहिए अपनी जगह छोटी सी बनाने को ताकि किराये से निजात मिल जाये तो थोड़ी आमदनी में भी दोनों ज़िंदा रह लेंगें वर्ना ख़ुदकुशी की नौबत आ गई है। मगर पिता से निराश होकर उसने अपनी पत्नी के साथ जीने मरने की कसम निभाई थी। जी नहीं सकते तो मर तो सकते हैं। मुझे उस घटना पर लिखी अपनी ग़ज़ल बहुत पसंद है शायद आपको भी अच्छी लगे। 

                                     ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई।

तेज़ झोंकों में रेत के घर सा
ग़म का मारा बिखर गया कोई।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन
मौत के द्वार पर गया कोई।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर
फिर से खुद ही संवर गया कोई।

ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई।

और गहराई शाम ए तन्हाई
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक"
जीते जी कब से मर गया कोई।  


Friday, 12 June 2020

ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

   ज़िंदगी से मिलो मर जाने से पहले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

दोस्त मुझे अपना बनाने से पहले  
मुझे जान लेना भूल जाने से पहले 

ये जीने का अंदाज़ सीखो मुझसे 
मर जाना नहीं मौत आने से पहले। 

कभी आ भी आओ साथ मिलकर 
कदम दो कदम चलें हम दोनों भी 

गले से लगा लो बताओ सुनो भी 
हाल ए दिल छोड़ जाने से पहले। 

दुनिया अजब है हैं दस्तूर निराले 
हैं लिबास सफेद और दिल काले 

चलों अश्कों की बारिश में भीगें 
मिल के दोनों मुस्कुराने से पहले। 

शिकवे गिले यारो मुझ से कर लो 
जितने भी अरमान बाकी कहो तुम 

छुपाके दिल में शिकायत न रखना 
मेरी अर्थी को फिर उठाने से पहले। 

कुछ मीठी कुछ कड़वी कुछ बातें 
हंसती रुलाती कई यादें करना याद 

मेरे मजार पर शमां जलाकर मुझपे 
फूलों की इक चादर चढ़ाने से पहले। 

यही वक़्त है दो चार घड़ी हमारा 
सुनाओ कहानी तुम अपनी ज़ुबानी 

कोई और किस्सा नई बात कोई 
कहो उनके भूल जाने से पहले।

मुहब्बत ईबादत प्यार दोस्ती है 
इसी को कहते हैं जी रहे हैं हम 

मिलके जियो जीने के लिए अब तो 
मिलो ज़िंदगी से मर जाने से पहले।
 




काश कोरोना के आंकड़े की तरह कुछ आंकड़े और भी सामने होते ( बात देश की समाज की ) डॉ लोक सेतिया

  काश कोरोना के आंकड़े की तरह कुछ आंकड़े और भी सामने होते 

                            ( बात देश की समाज की ) डॉ लोक सेतिया 

     ये कमाल है हर दिन पल पल हर कोई देश की सरकार राज्य की सरकार कितने अधिकारी कितने विभाग कितने जानकर टीवी चैनल वाले यहां तलक हर कोई बताता है आज कितने लोग पॉजिटिव हैं कितने किस हालत में हैं। कितने ठीक हुए कितने नहीं हुए। ये डरावने घबराने के आशा- निराशा के सभी आंकड़े पल पल मिलते हैं। शायद देश समाज इंसानियत की दशा सुधर का बहुत बदल कर अच्छी हो जाती अगर हम सभी को और खुद सरकार को वास्तविक आंकड़े देश की जनता के सही मालूम होते और सभी को बताने में कोई संकोच नहीं करते , पता चलता भारत महान कितना महान है और क्या है महानता। बस ये आंकड़े भी ठीक इसी तरह देखते और सब को बताये जाते। कभी ये सब आंकड़े सामने आते तो पता चलता कि दुनिया भर में कोरोना ने उतने लोगों की जान नहीं ली है जितनी देश की सरकारों की लापरवाही और समय पर फ़र्ज़ नहीं निभाने अपना वास्तविक कर्तव्य नहीं निभाने से मरते रहे हैं और आज भी मरने को विवश हैं। 

   आज देश में कितने लोग भूख से मर गए। कितने हैं जिनको कोई अधिकार नहीं मिला जिनको जीवन की बुनियादी ज़रूरत को भी ठोकर के सिवा कुछ नहीं मिला। कितने बिना उपचार छोटी सी बिमारी से मर गए उनको ईलाज नहीं मिला गरीब होने से। कोई डॉक्टर उनको कर्तव्य समझ दवा नहीं देना चाहता सबको तगड़ी फीस और ऐशो आराम चाहिएं और सरकार को अपने लिए लूट का अधिकार गरीब देश की जनता को कुछ भी नहीं देकर खुद शानो शौकत से रहने को ताम झाम और खज़ाने की बर्बादी। कितने बच्चे शिक्षा से वंचित रहे कितने युवक पढ़ लिख कर काबिल होने के बावजूद भी बेरोज़गार हैं क्योंकि रिश्वत और पहुंच नहीं है। कितने नेताओं अधिकारियों  ने कितनी लूट जनता से खज़ाने से किस दिन की और कैसे राजनीति का कारोबार करते हुए अरबपति खरबपति बन गए। कितने सरकारी अफसर कर्मचारी अच्छा वेतन और तमाम तरह की सुविधाएं मिलने के बाद भी ईमानदारी से अपने देश समाज के लिए कर्तव्य नहीं निभाते हैं। उनकी मीटिंग्स का मतलब क्या है और उनका आम नागरिक से मिलना क्या फोन पर बात करना भी कितना कठिन है जबकि उनका दावा होता है जब जो चाहे मिलकर शिकायत कर सकता है। सबसे ज़रूरी जनता की भेजी कितनी शिकायत कैसे दफ्तर की फाइल में दबकर खत्म हो जाती हैं और कितनी ऑनलाइन ऐप्प्स पर की शिकायत बिना निदान ठीक हुई घोषित की जाती हैं।

    आप बताते हैं इतने सौ लोग इतने अमीर हैं उनकी अमीरी की दौलत कितने गरीबों से निवाला छीन कर शोषण कर हासिल हुई बताते। बताते किस किस नेता पर अधिकारी पर गरीब देश ने कितना खर्च किया हर दिन उनकी सुविधाओं पर मौज मस्ती पर। ठीक कहा आज़ादी के बाद विदेशी लोगों से बढ़कर आपने लूटा है बेरहम और बेशर्म होकर। बताया जाता आज कौन रोज़ करोड़ रूपये अपने पर खर्च करता हैं इंसानियत को भूलकर जब करोड़ों लोग बदहाल हैं। नहीं इसको भगवान और भाग्य की बात मत कहना ये आपके स्वार्थ में हद से बढ़कर अंधे होने की बात है। कोरोना की तरह देश की हर बात का सच सामने आता तो ये लोग चुल्लू भर पानी में डूब मरते जो किसी शायर की शायरी को रटते हैं समझते नहीं कि जो हुआ वही आप कर रहे हैं और कैसी गंगा निकालने की उम्मीद की जा सकती है। देश की जनता के अधिकारों के क़ातिल इंसाफ की बात करते हैं फैसला अपने को पाक साफ निर्दोष बताने का करते हैं। सही आंकड़े सामने होते इंसाफ के संविधान की भावना के क़त्ल के और तमाम वीवीआईपी लोग मुजरिम बनकर कटघरे में खड़े होकर जवाब देते कितना सभी के हिस्से का उन्हों ने छीनकर जमा किया हुआ है।

      मगर सबसे बड़ा अपराध जिन लोगों का है कोई उनकी बात ही नहीं करता है। टीवी चैनल वाले अख़बार वाले जिनको ये सब सामने लाना था उन्होंने अपना ज़मीर बेच दिया पैसे विज्ञापन और ख़ास होने को कितने अधिकार हासिल कर लूट में सांझेदार बनकर। सरकार कारोबार सबके झूठ को सच साबित करने के साथ उनका ढंग और तरीका खुद को सबसे ऊपर समझने का किसी लठैत से कम नहीं है। कोई उनसे पूछता कितनी कमाई आपको उन इश्तिहारों से हुई जिनका कोई मकसद ही नहीं केवल टीवी अख़बार को खुश कर खामोश रहने की खातिर उनको सरकारी विज्ञापन की बैसाखी चाहिए अन्यथा इक कदम नहीं चल सकते हैं। जिनके विज्ञापन खिलाड़ी और अभिनेता करते हैं क्या पता किया उनका सच क्या है। कब कहां किसी ने उनके दावे को जांचा परखा है कि उनका विज्ञापन कितना सच्चा झूठा है। आज तक का सबसे बड़ा घोटाला यही सरकारी विज्ञापन हैं कोई सच बताएगा कितने साल में कितना धन उनकी झोली में गया है जो बेशक देश के सभी घोटालों की राशि से अधिक होगा। जिन पैसों का उपयोग अस्पताल स्कूलों के बनाने को किया जाना था उनकी बंदरबांट होती रही इन सभी नेताओं अफसरों कर्मचारी वर्ग कारोबारी उद्योगपति लोगों में मीडिया वालों में।

  बड़ी घोषणाएं होती हैं मगर हैरानी हुई आज जानकर कि देश का पहला अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान देश के पास पैसे नहीं थे तब भी चार साल में विदेश से सहायता लेकर बनकर खड़ा हो गया था। उसके बाद किसी भी दल की कहीं की भी सरकार ने उस तरह का संसथान ए आई आई एम एस बनाने का ऐलान किया मगर अभी एक भी पूरा बनकर सामने नहीं आया हज़ारों करोड़ मिलने के बाद भी आधा अधूरा है हर जगह। तीस हज़ार करोड़ की मूर्ति बन जाती है सैंकड़ों करोड़ का पार्टी का भव्य भवन आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित खड़ा हो जाता है मगर अस्पताल नहीं बनते समय पर। कोरोना के आने पर पहला सवाल यही था देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दशा बेहद खराब है। खराब क्यों है क्योंकि आपको जो बनाना है उसके लिए पूरी कोशिश की जाती है नागरिक को बुनियादी सुविधा महत्वपूर्ण नहीं है। कितना धन सभी दलों ने चुनाव पर खर्च किया कभी ये भी आंकड़े सामने आते तो पता चलता कोई भी सांसद विधायक निर्धारित राशि में चुनाव नहीं लड़ा अर्थात अवैध है उनका सांसद विधायक बनना ही। लेकिन सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं और जो उनको चंदा देते हैं वो साले जीजा जैसे हैं इक हाथ लेते हैं दूजे हाथ देते हैं और मीडिया किसी बिचौलिया की तरह हैं। ये लोग कोरोना जैसे नहीं उनसे अधिक जानलेवा हैं मगर उनके कारण कितने बेमौत मरे कोई बताता नहीं है। ऊपर वाला भी लगता नहीं इनका हिसाब करेगा क्योंकि अगर ऐसा होता तो इन की हालत अच्छी नहीं हो सकती थी।

Monday, 8 June 2020

वार्तालाप भगवान का ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    वार्तालाप भगवान का ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

उठो अब तो जागो आपको काम पर जाना है बहुत दिन घर पर आराम कर लिया मुझे भी कितना परेशान किया चलो कोई बात नहीं। बाहर आपके कर्मचारी संदेश लेकर आये हैं सरकार ने भगवान को भी अपने काम पर लौटने की छूट दे दी है मगर कुछ नियम हैं पालन करना है। ये किट मंगवाई है आपको खुद अपनी भी सुरक्षा करनी है तो इसको पहन लेना। तभी वही आवज़ सुनाई दी जो कभी कभी भगवान को भी सवाल पूछ कर खामोश कर देती है। भगवान जी जाने से पहले दुनिया का बदला हाल रंग ढंग समझते जाओ। मैंने इक स्मार्ट फोन मंगवाया है पास रखना बड़े काम की चीज़ है सब कुछ है उस छोटे से उपकरण में खबर से देश दुनिया की जानकारी और सहायता को कितनी ऐप्प भी हैं। खबर पढ़ना कोई महिला कितने स्कूलों में इक साथ पढ़ाती रही वेतन पाती रही साल भर एक करोड़ से अधिक अब मुसीबत में है शिकयत दर्ज है और मुकदमा चलेगा। आयकर वाले भी तैयार हैं पूछताछ करने को अवसर मिलते ही समझना चाहते हैं और ऐसी कितनी महिलाएं हैं कितने पुरुष भी होंगे जो एक साथ कई जगह काम करते हैं। भगवान हैरान होकर बोले भला मुझे इस से क्या लेना देना जो जैसा करता है उसको उसका नतीजा मिलता है। आप भी कितने भोले हैं आज आपको जाना है तो पहले सोच कर बताओ किस जगह जाओगे। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे ये किसी धार्मिक स्थल या कोई गुरूजी का डेरा उपदेश और संदेश समझाने वाला। कानून सब पर इक बराबर लागू है आपको जैसे कोरोना को लेकर बने नियम समझने हैं उसी तरह बाकी कानून भी जानना ज़रूरी है। भारत देश में जो इक बार कानून के शिकंजे में फंस गया खुद आप भी उसको नहीं बचा सकते और मत भूलना कि वकील क्या होते हैं भगवान हो चाहे शैतान उनके आगे किसी की नहीं चलती है। पानी भरते हैं बड़े बड़े उनके सामने। 

  भगवान भूल जाओ कि आप भगवान हैं और हर समय हर जगह होते हैं हो सकते हैं आप हैं तो सब मुमकिन है ये डायलॉग भी किसी और के नाम हो गया आपको खबर नहीं हुई। बस वही हर जगह हर देश हर शहर इक साथ हो सकता है वर्चुअल रैली कर के। आपके पास ये सुविधा उपलब्ध नहीं है। आप कितनी जगह हैं और उन सभी धार्मिक स्थलों से आपकी आमदनी और जमापूंजी कितनी है आपको हिसाब बताना होगा और साबित करना होगा कैसे इतनी जगह इक साथ रहकर कल्याण राशि का उपयोग किया। कितना धन सोना चांदी हीरे जवाहारात आपने कितनी तिजोरियों में रखे हैं किसलिए। आपने आने वाले भक्तों से लिया कितना और उनको मिला क्या है आपसे। आपको धरती की आधुनिक कथा मालूम नहीं है कोई है लोग जिसके भक्त होने की चर्चा करते हैं उस के भक्त आपके भक्तों से बढ़कर आस्था रखते हैं। आपने कभी इश्तिहार छपवाया क्या क्या किया दुनिया को क्या क्या दिया है आप हैं भी या नहीं हैं इक कल्पना हैं ये भी लोग विचार करते हैं। मगर उसके बारे कुछ भी किया दिखाई नहीं देता तब भी लोग मानते हैं उसने बहुत किया है और उसके होने का सबूत गली गली टीवी अख़बार सोशल मीडिया हर जगह उसकी चर्चा उसका नाम फोटो और इश्तिहार हैं। आपने सभी की मन की बात मनोकामना समझी जानी है कभी खुद अपनी मन की बात नहीं शेयर की भक्तों से। उसने मन की बात करते करते अब चिट्ठी लिखनी भी शुरू कर दी है। भगवान आपके अमृत और भोग लगे मिष्ठान का असर नहीं रहता लेकिन उसने चाय पर चर्चा करवाई थी छह साल बाद भी उसकी चाय का असर किसी नशे की तरह बाकी है।

 आपके पास जो भी धन आया उसके बारे में आपसे पूछताछ हो सकती है कहीं किसी आतंकी संगठन या किसी नशे के कारोबारी ने आपको खुश करने को चढ़ावा तो नहीं चढ़ाया है। भगवान को भगवान याद आने लगे ये भूलकर कि भगवान तो खुद वही हैं। बस खामोश अचानक भगवान जी की पत्नी ने ज़ोर से बुलंद आवाज़ में कहा। ख़ामोशी छा गई अब पत्नी के सामने भगवान भी क्या मज़ाल कुछ बोलते और ये आवाज़ भी जिस की उसको पता है चुप रहना ही ठीक है। पत्नी जी बोली पति परमेश्वर जी आपको कहीं भी नहीं जाना है घर पर रहो ये बेकार के झंझट लफड़े झगड़े जिनके हैं उन्हीं को मुबारिक। और अच्छे पति की तरह भगवान अपने आसन पर विराजमान हो गए हैं। मंदिर मस्जिद खुलें या बंद रहें उनको कहीं भी नहीं जाना है , ये वास्तविकता भगवान भी और दुनिया भी समझ गई है कि उनके होने नहीं होने से कोई फर्क किसी को नहीं पड़ता हैं क्योंकि भगवान कोई सरकार नहीं हैं जो नियम कानून का पालन नहीं करने पर किसी को सख़्त सज़ा की धमकी दे सकती है।