Thursday, 20 July 2017

चैन की बंसी बजाने वाले लोग ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

   चैन की बंसी बजाने वाले लोग ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

 हम कौन हैं शायद सोचते ही नहीं , नीरो के वंशज हैं देश जल रहा है और हम जश्न मना रहे हैं। कोई सड़क पर तड़पता मर जाता है और लोग व्हाट्सएप्प पर सोशल मीडिया पर विडिओ अपलोड करने में लगे हैं। किसी को स्मार्ट फोन पर गेम खेलनी है किसी को संगीत सुनना है किसी को पिक्चर मैसेज भेजने हैं मानवता के उपदेश से धर्म की बातों वाले। कोई है जो चुटकुले बना रहा है , जैसे मनोरंजन ही जीवन का मकसद होता है। सत्तर साल जीना बेकार है जब वास्तव में सार्थक कोई काम नहीं किया। क्या इक पागलपन है अथवा कोई नशा है ये सब जिसमें हम भूल जाना चाहते हैं कि देश समाज ही नहीं मानवता और धर्म भी रसातल को जा रहा है। वाह रे टीवी वालो राम रायसीना हिल्स में घोषित करने लगे हैं। राम मंदिर में नहीं आलिशान भवन में रहेंगे अब देश के सब से बड़े पद पर बैठे। किसे कब खुदा किसे कब शैतान बताना मीडिया की मर्ज़ी है , मगर खुद को नहीं देखते क्या थे क्या हो गए हैं आदमी थे दुकान बन गए हैं।  चलो आपको गोविंद जी के गांव लिए चलते हैं टीवी उद्घोषक बताता है। सत्तर साल पहले इसी पेड़  के नीचे पढ़ते थे आज भी गांव उसी तरह बदहाल है मगर गांव का नाम सब को पता चल गया यही बड़ी बात है। दीवाली की तरह पटाखे बज रहे हैं दलित कहां से कहां पहुंच गया , क्या इसी तरह दलित कल्याण किया जायेगा। सत्ता बड़ी शातिर है लोग उसकी चाल नहीं समझते , बात दलित उद्धार की नहीं है वोट की है और कौन सत्ताधारी दल के लिए निष्ठा रखता है इस का महत्व है। उनको किसी को महल में संविधान की रक्षा को नहीं बिठाना , इक मोहर चाहिए अपने हर कागज़ पर लगाने को। ये क्या वास्तव में सही दिशा को जाना है। 
              चुने जाने के बाद गोविंद जी बचपन की बात दोहराते हैं कच्चा घर , मगर जब 150 एकड़ में बने भवन में सैकड़ों कमरों में महाराजा की तरह रहेंगे तब क्या विचार करेंगे इसका अर्थ क्या है। एक दिन का खर्च राष्ट्रपति भवन का लाखों रूपये है और इतनी जगह लाखों लोग रह सकते हैं। कोई नहीं जनता उस भवन में रोज़ इतना खाना गटर में डाला जाता है जिस से हज़ार लोग भूख मिटा सकते हैं। किसी का सत्ता मिलना बड़ी बात नहीं होता सत्ता पाकर जो किया उसका महत्व होता है। लेकिन अब ध्येय ही सत्ता विस्तार बन गया है , बाकी सब झूठे प्रचार और भाषण तक सिमित हैं। क्या देश का प्रधानमंत्री कोई तमाशा दिखाने वाला है जो बातों से मनोरंजन करता है और हम ताली बजाते हैं , तमाशबीन हैं। गरीबी भूख बदहाली हर तरफ है मगर हम देख कर भी अंधे बन चैन की बंसी बजाते है और समझते हैं हम राष्ट्रवादी हैं।

Tuesday, 18 July 2017

मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मैं साकी भी मैं सागर भी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

साकी ने प्यासे से नहीं पूछा मयकदे में ,
धर्म जाति या किस देश के वासी हो ,
सुराही ने पैमाने को भरते नहीं सोचा ,
मैं सोने की पीतल की जाम है कांच का।
किसी पीने वाले ने समझी नहीं प्यास ,
कितनी है साकी के मन की सुराही की ,
भीतर कितनी रही है अधूरी हमेशा ही ,
जाम भी नहीं बुझा सके अपनी प्यास। 
नदी से नहीं पूछा सागर ने नाम पता ,
मैली है या साफ़ है नहीं डाली नज़र ,
बाहें फैला कर सब नदियों को अपनाया ,
लेकिन सागर का खारापन कहां मिट पाया। 
मेरा नाम मुहब्बत है ईमान है इश्क़ ,
हर आशिक़ मेरे पास चाहत ही लाया ,
कब कौन किस मोड़ तक साथ रहा है ,
जब रात अंधेरी थी नहीं पास रहा साया। 
मैं फूल हूं खुशबू ही लुटाता मैं रहा हूं ,
हर हुस्न को हर दिन सजाता मई रहा हूं ,
मैं बारिश नहीं बस ओस की बूंद हूं मैं ,
सर्दियों को तुम धूप बुलाता मैं रहा हूं। 
परिंदा बैठा कभी मंदिर मस्जिद कभी ,
इंसानों को रास्ता भी दिखाया है मैंने ,
मुझको पिंजरे में कैद नहीं करना तुम ,
आज़ादी का परचम लहराना है मैंने।

अब पछताए क्या होत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      अब पछताए क्या होत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

अब कुछ नहीं हो सकता , काश बचपन में खाकी निक्कर पहन ली होती तो हम भी सत्ता की गली के निवासी होते। कोई विधायक बना कोई सांसद कोई बड़े आधिकारिक पद पर आसीन हुआ। कितने राज्य के मुख्यमंत्री बन गए और अब देश के राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति भी। बस इतना बहुत है। आप इसको परिवारवाद नहीं बताना बेशक उनका यही परिवार है। इसको सिफारिश भी नहीं समझना क्योंकि ये उनकी मर्ज़ी की बात है। कौन याद करता है संविधानिक मर्यादा की बात। जनता की गलती है इतना बहुमत देना जो दिल्ली की सत्ता हो या राजधानी की देश की सत्ता बिन बौराय नहीं रहता कोई। सोने में धतूरे से सौ गुनी मादकता होती है तो सत्ता की मादकता का खुमार उतरता तभी जब वापस असली ठिकाने लगाए जाते हैं। बहुत को देखा है आकाश से धरती नहीं पाताल तक नीचे आते। मगर कोई इनसे सवाल क्या करेगा जब , मीडिया वाले :-

                 बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते

                  सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते। 

किस्मत की बात है जो घर से भागे थे बचने को उनको फंसाया है उसी जाल में। चले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास। ये युग ही योगी के भोगी बन जाने का है। चोर उच्चके भी अब शाखा में जाने लगे हैं , अंधे भी सब को रास्ता दिखलाने लगे हैं। लो गूंगे मधुर स्वर में गाने लगे हैं। और हम आप नाहक शर्माने लगे हैं। चिड़िया खेत चुग गई हम पछताने लगे हैं।

Friday, 7 July 2017

मेरे लिए लिखना कितना ज़रूरी है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  मेरे लिए लिखना कितना ज़रूरी है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       जो दवा के नाम पे ज़हर दे , उसी चारागर की तलाश है।

कल मुझसे सवाल किया किसी ने मैं क्यों बर्बाद करता रहता अपना इतना वक़्त ये बेकार की बातें लिखने पर। मैंने कहा ये मेरा काम है मुझे ख़ुशी मिलती ऐसा कर के बल्कि मैं लाख चाहूं बिना लिखे नहीं जी सकता। टीवी पर खबर आ रही थी सोशल मीडिया के नशे की , लत पड़ गई है लोगों को व्हाट्सएप्प आदि की। मुझे भी उस में शामिल समझते लोग जो सच नहीं है। चालीस साल पहले इक काम शुरू किया था देश समाज की वास्तविकता को उजागर करने का काम करना। वही करता चला आ रहा हूं , माध्यम बदलते रहे हैं। कभी किसी विभाग को खत लिखता था , फिर अख़बार में पाठकों के कालम में चिट्ठियां रोज़ लिखने लगा। कई पाठक लिखते थे अपना नाम छपा पढ़ने को , मैं लिखता था हर दिन इक लड़ाई लड़ने को। रिश्वतखोरी हो या कारोबारी लूट अथवा भगवान के नाम पर ठगी सब लिखा और घर फूंक तमाशा देखा। न जाने कैसे अख़बारों में हिंदी की मैगज़ीनों में व्यंग्य कविता ग़ज़ल कहानी आलेख छपने लगे और सब मुझे लेखक समझने लगे। लोग तो ज़रा छपने पर किताब छपवा साहित्यकार होने का तमगा लगवा लेते हैं , मुझे कभी भी ये उतना महत्वपूर्ण नहीं लगा न ही मुझे समझ आया दो तीन सौ किताबें छपवा खुद ही बांटते रहना वो भी उन को जिनको शायद पढ़ना ज़रूरी ही नहीं लगता। आज सुबह जागते ही कल मुझसे किये सवाल का जवाब मुझे समझ आया और मैं सैर पर जाना छोड़ लिखने बैठ गया। सब को लगता है काम करने का मतलब है आप की कमाई किस से है , अब जब मुझे लिखने से मिलता नहीं कुछ भी आर्थिक लाभ तो इतना समय देना लिखने को अपना समय बर्बाद करना ही तो है। मुझे लगा कि लोग कितना समय भगवान की पूजा पाठ में खर्च करते हैं , कभी मंदिर जाते हैं कभी उपदेश सुनने को जाते हैं , हज़ारों रूपये खर्च कर हरिद्वार मथुरा काशी मक्का मदीना हरिमंदिर साहब दर्शन को जाते हैं। देवी देवताओं की शरण जाते हैं , अपने अपने गुरु की अर्चना करते हैं। क्यों करते हैं वो ये सब काम जब जानते हैं भगवान मिलते नहीं हैं किसी को। मुझे अभी भी याद है मेरी मां जो भजन गाती थी , तुझे भगवान बनाया है भक्तों ने। बस परस्तिश करने से इबादत करने से आरती करने से जो मिलता है सबको वही सुकून मिलता है मुझे लिखने से। और मैंने कभी नहीं समझना चाहा मेरा लेखन कितना अच्छा है या नहीं है , आप कभी सोचते हैं आपकी इबादत कैसी है। क्या जो लाखों करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाते उनकी आस्था बड़ी और जो चंद पैसे डालते दानपेटी में उनकी छोटी है। अब जो भी है और जैसी भी है मेरी इबादत ठीक है , मैं भगवान की पूजा करना उतना ज़रूरी नहीं मानता जितना सच लिखना क्योंकि मुझे हर धर्म में यही लिखा मिला है सत्य ही ईश्वर है। भगवान क्षमा करें मैंने उनकी तुलना लेखन से की है , पर क्या करूं मेरा सच यही है। मैं उन की तरह नहीं जो जिन नेताओं अधिकारीयों को रिश्वतखोर और कामचोर बताते उन्हीं के सामने हाथ जोड़े खड़े मिलते हैं। 

                     आयुर्वेद और स्वास्थ्य की बात             

            कल रात ही इक विडिओ देखा जो बहुत आचम्भित करने वाला है , कोलेस्ट्रॉल घटाने की दवा को लेकर। तथ्य ये है कि विश्व में कुल जितनी दवा बिकती और लोग खाते हैं उसका बड़ा हिस्सा चालीस प्रतिशत केवल भारत के लोग खा रहे हैं और उस दवा की ज़रूरत है भी कि नहीं बिना जाने ही डॉक्टर लिखते हैं दिल के रोग कम होने की उम्मीद में जबकि कोई पक्के तौर पर नहीं साबित कर सका ये कितना सच है। मुझे 1990  में आज से करीब 27 साल पहले दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के डॉ मल्होत्रा जी ने जांच करवा बताया था तब मेरी आयु चालीस साल थी कि आपका कोलेस्ट्रॉल बहुत बढ़ा हुआ है , ट्रिग्लिसराइड चार सौ आये थे। चाहते तो वो तभी लिख देते दवा मुझे खाने की , मगर उन्होंने कोई गोली तक नहीं लिखी थी। मेरा खान पान पूछा था दिनचर्या समझी थी और साफ बोला था इस तरह तो आप साल भर भी शायद स्वस्थ्य नहीं रह पाओगे। मुझे छह महीने तक उबली सब्ज़ियां खानी पड़ी और रोज़ सुबह तीस से चालीस मिंट की दौड़ कॉलेज के मैदान में लगाई थी और मैं ठीक हो गया था और उसके बीस साल तक बिना किसी दवाई खाये तंदरुस्त रहा हूं। अगर यही अपना कोलेस्ट्रॉल मैंने दवा खाकर घटाया होता तो मुमकिन ही नहीं बल्कि संभावना यही है कि मुझे उस दवा से और कई रोग मिलते और मैं शायद ज़िंदा होता ही नहीं अथवा होता तो तमाम रोगों को लेकर जी रहा होता। तब योग की कोई बात नहीं होती थी और आजकल लोग योग को ही स्वस्थ होने का आधार कार्ड मानते हैं सरकारी कार्ड की ही तरह। मगर मैंने केवल सैर की है कभी योग नहीं अपनाया और मुझे विचार आता है क्या किसी ने इस को लेकर रिसर्च की है कि योग करने वालों और नहीं करने वालों में कितना फर्क हुआ है। मुझे सामने दिखता तो नहीं योग के बढ़ते होने से रोगी कम हुए हों। आज तो हालत और खराब है डॉक्टर्स बिना ज़रूरत बहुत दवाएं लिखते हैं अपनी कमाई की खातिर या फिर निदान नहीं करने की आदत से एक की जगह चार दवाएं लिखना। मगर बीस साल पहले ही डब्ल्यू एच ओ विश्व स्वास्थ्य संघठन ने भारत सरकार को चेतावनी दी थी आगाह किया था कि आपके देश की आबादी को जितनी दवाएं उपयोग करनी चाहियें उस से पचीस गुना अधिक उपयोग की जा रही हैं जो खतरनाक हैं। मगर अपनी सरकारों की चिंता लोग नहीं दवा कंपनियां रहती हैं और जनता का स्वास्थ्य तमाम लोगों की कमाई का साधन है। पिछले सप्ताह डॉक्टर्स दिवस पर इक पिक्चर मैसेज मिला डॉक्टर को भगवान बताने वाला , मैंने उन डॉक्टर को जवाब लिखा मुझे बताओ तो सही वो भगवान है कहां। अब उसको जो भी लगा हो मेरा सच यही है। और कोई हैरान हो सकता है मेरी पहली व्यंग्य रचना इसी विषय पर थी। उत्पति डॉक्टर की। इक सवाल था भगवान ने ये प्रजाति बनाई क्यों होगी , आज तो ये और भी सार्थक है।

जनसम्पर्क की बात या इक धोखा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    जनसम्पर्क की बात या इक धोखा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

नाम बदल दिया तौर तरीके वही हैं। हरियाणा की सरकार ने इक नया तमाशा शुरू किया है , राहगिरी नाम से। आज सुबह देखा सामने अपने घर के। जनता से सम्पर्क क्या इसी तरह होगा , बड़े अधिकारी उसी शासकीय अंदाज़ से आये जब उनकी ही पसंद वाले शासन से जुड़े लोग उस जगह उनका अभिनंदन को तैयार बैठे नहीं खड़े थे। किसी भी तरह कोई नहीं समझ सकता कि समानता की कोई झलक भी है। कुछ ख़ास लोग कुछ बेहद ख़ास लोग और कुछ ख़ास से भी खास ऊंचे ओहदे वाले लोग। और उसी सत्ताधारी अंदाज़ से हर नियम कायदे की अनदेखी कर जब जो जैसे करते हुए। बीच सड़क मंच लगाकर , स्कूल के बच्चों को सर्वोच्च न्यायालय की बात को दरकिनार कर उपयोग करते हुए। सरकारी तंत्र से बुलाये हुए लोग कलाकार योग और जाने क्या क्या दिखाते लोग। गीत संगीत और शोर शराबा सब किसी भी सरकारी आयोजन की तरह कुछ पल की झूठी चमक दमक। कहीं भी आम निवासियों से वास्तविक मेल मिलाप की बात नहीं , किसी को अपनी समस्या बताने की अनुमति नहीं।  बस भाषण सुनना है इक फासला रख कर अधिकारी लोगों से , कोई खेल तमाशा ही नहीं , सब का वास्तविक उद्देश्य से दूर तक कोई मतलब लगा ही नहीं। हर दिन इसी तरह सरकारी धन किसी संस्था या विभाग द्वारा कुछ तथाकथित समाजसेवी लोगों की दुकान चलने को ही। सब से पहली बात ऐसा कदापि नहीं लगता कि आपके पास सरकार के लोग सेवक बनकर आये हैं। उसी खनक उसी ठसक के साथ जिस अंदाज़ से सचिवालय में मिलते हैं शासक बन शासित लोगों की तरह मानकर जनता को। जब तक नेता और अधिकारी अपनी मानसिकता नहीं बदलते और उनको ये नहीं समझ आता कि वो जो करते हैं उनका कर्तव्य है और अगर अपना कर्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाते तो ये देश और जनता के खिलाफ अपराध है। इन को उपहार अथवा भीख नहीं बांटनी है जनता को उसके हक देने हैं। जो चलन चलता आया है सत्ता की लाठी वाला उसका अंत होना ज़रूरी है। जिस दिन लोग हाथ जोड़ कर नहीं अपना अधिकार अधिकार की तरह लेना सीख जायेंगे उस दिन ही व्यवस्था बदलेगी। हम राज करने वालों से उम्मीद करें खुद झुकने की तो वो केवल सपने में मुमकिन है।



Thursday, 6 July 2017

नियम कायदा क़ानून अपने पर लागू नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

नियम कायदा क़ानून अपने पर लागू नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 



इसको राहगिरी नाम दिया गया है। राहगिरी इक राह बनाना होता है , हरियाणा में फतेहाबाद में पुलिस विभाग सरकारी हॉस्पिटल को जाती मुख्य सड़क को रोक अपने आयोजन का मंच बनाते हैं। उनको किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत कब है। अदालत आदेश देती है सरकार अपने आयोजनों में बच्चों की उपयोग नहीं करे मगर कौन मानता है। वास्तव में अपने प्रचार को राहगिरी नाम देना ही सही नहीं है। कई शहरों में ये शब्द प्रदूषण कम करने को राहगिरी नाम से नियमित किया जाता किसी एक दिन सप्ताह में कोई मार्ग वाहनों के लिए नहीं केवल साईकिल सवार और पैदल चलने वालों के लिए खुला रहता है। राहगिरी राह रोकना नहीं राह बनाना होता है। मगर क्या किया जाये नेता अधिकारी जनता की राहें रोकते ही अधिक हैं , बनाते खुद अपने लिए बहुत हैं। एन जी ओ की आड़ ने अपने लोगों को रेवड़ियां बांटने की परंपरा नई नहीं है। हर दिन बेकार के आयोजन करते हैं और राज्य या देश का धन फज़ूल बर्बाद किया जाता है , हासिल इन से कुछ भी नहीं होता है। कहने को जनसम्पर्क की बात मगर जनता को पास तक नहीं फटकने देते , शासक वर्ग अपनी पसंद के चुने लोगों के साथ कार्यकर्म करते हैं। किसी आम नागरिक की बात कोई बोल नहीं सकता सवाल करना तो दूर की बात है। सार्थकता की फ़िक्र किसे है निरर्थक किये जाते हैं आयोजन कभी इस नाम कभी उस नाम से। जो करना उसकी याद किसी को नहीं जिसका कोई मतलब नहीं बस कुछ पल का तमाशा वही किये जाते हैं। सरकारें तमाशा दिखाने को नहीं होती न ही देश की जनता तमाशबीन है , तमाशाई आप हैं जो किसी दिन खुद तमाशा बनते हैं तब होश उड़ जाते हैं।

जाना था कहां जा रहे हैं किधर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    जाना था कहां जा रहे हैं किधर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                        मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया की बात चलते चलते वहां पहुंच गई है जहां भारत को स्वदेशी की अवधारणा को ही तिलांजलि देनी पड़ी है। तीन साल हो गए गंगा की सफाई करते इस सरकार को भी और पिछली सरकारों की तरह ही गंगा पापियों के पाप धोते धोते और मैली हो गई है। आज राजकपूर जी होते तो उनकी फिल्म का भी रीमेक आ जाता और बाकी नायकों की तरह समाज की बात को अपनी कमाई का जरिया बना सकते थे वो भी। अब हमारी गंगा कोई विदेशी आकर बताएगा कैसे साफ़ होगी , पानी भी उसी से साफ़ करवा लिया जाएगा और देश की सुरक्षा को ड्रोन भी उसी से मिलेंगे। इन सब को छोड़ उस छोटे से देश से ईमानदारी और साहस के साथ निडर होकर किस तरह रहना भी सीख लेते तो बाकी सब खुद ब खुद हो जाता। इधर टीवी और अख़बार वाले खबरों के नाम पर मनोरंजक सामान बेच रहे या झूठे इश्तिहार से कमाई कर के सच के पैरोकार कहला रहे अपने मुंह मियां मिट्ठू बनकर। इनकी खबर में राजनेता अभिनेता खिलाड़ी और शेयर बाज़ारी या अन्य कारोबारी ही नज़र आते हैं। बाकी तीन चौथाई जनता की कोई खबर नहीं है , बस उनकी ख़ुदकुशी खबर है पांच सेकंड की इक दिन। अब महिलाओं से अनाचार की खबर जैसे केवल दोहराई जाती जगह का नाम बदल कर। देश बदल रहा है मोबाइल की कॉलर ट्यून भर बनकर रह गया है , दिखावे की देशभक्ति की तरह।
                                    इधर सत्ताधारी दल को लगता है देश में सरकार संविधान में बताये लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव से नहीं फेसबुक व्हाट्सएप्प पर बहस और शोर से बनेगी। कोई अगले चुनाव में फिर अपने दल को जिताने की कोई और आगे बढ़कर बीस साल किसी नेता की सरकार बनाने की आस लगाए है। सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं। कल क्या होगा किसे मालूम , अभी तलक देश की जनता बहुत अचंभित करती आई है ऐसे आसमानी लोग धरती पर पटकती रही है। ये जो पब्लिक है ये सब जानती है , भीतर क्या है बाहर क्या है ये सब कुछ पहचानती है। आपको इस नए दौर की सुशासन की कुछ वास्तविक घटनाएं बताना ज़रूरी है। शहर की स्वच्छता और आवारा पशु रहित करने का इनाम मिलता है अधिकारी को , मगर जिस जगह राज्य अधिकारी बड़े बड़े भाषण देते वहीं गंदगी उनको दिखती नहीं। किस को छल रहे हो जनता को या खुद अपने आप को। पिछली सरकारें खुला दरबार लगाती थीं आपने नई खिड़की खोल दी अपने नाम से सी एम विंडो मगर हुआ क्या वही ढाक के तीन पात। एक शिकायत वह भी खुद सरकारी प्लॉट्स पर कब्ज़े की नियम कानून को ताक पर रखने और रिश्वतखोरी की , एक महीने में हल किये जाने की बात कहने वाले पहले लिख देते कोई करवाई ज़रूरी नहीं , फिर दोबारा खुल जाती और एक साल छह महीने तक इधर से उधर भेजी जाती जबकि सी एम विंडो को पहले मालूम किस विभाग की बात है। कोई बड़ा अधिकारी साल तक कुछ नहीं करता मगर अचानक सी एम का दौरा होने पर फिर कागज़ी करवाई कर निपटान कर दी जाती है। अभी इतना काफी नहीं है सात महीने बाद बताया जाता है जांच करने पर शिकायत फिर खोल दी गई है। किसी सरकार को खुद अपना उपहास इस तरह करते कभी नहीं देखा था जो इनका देख लिया। 
                   शायद बहुत लोगों को इतना भी मालूम नहीं कि किसी दल की सरकार होना उनके हर नेता को अधिकार नहीं देता सरकारी काम काज में दखल देने को वो भी अपना रोब जमाने को। दल के नेता को खुद की परेशानी होने पर कोई कानूनी अधिकार किसी विभाग पर छापा डालने का है या नहीं , मगर टीवी अख़बार खबर देते हैं नौ बजे दल के नेता ने छापा मारा और कुछ अधिकारी नहीं उपस्थित थे। उनको इतना भी मालूम नहीं बेशक तब वो घर पर रहे हों मगर उनको विभाग के काम पर बाहर भी होना ज़रूरी होता है। और ऐसे में उन पर धौंस जमाना कि हमारा फोन नहीं लिया कितना उचित है जबकि यही सब आम जनता से अधिकारी हर दिन करते रहते हैं। और इस के बाद क्या हुआ वो भी जान लें , विभाग के अधिकारी सत्ताधारी दल के आवास पर छापा डालते हैं और बिजली की चोरी होती पाते हैं तो नेता जी मार पीट और गुंडागर्दी करते हैं ताकि अपने दल की सरकार की सुशासन की परिभाषा समझाई जा सके। जब विभाग के कर्मचारी चेतावनी देते हैं तब उन नेता जी पर मुकदमा दर्ज किया जाता है। मगर दल के लोग अभी भी कहते हैं कि नेता जी की अनुपस्थिति में बिजली काटनी गलत है। अब नेता जी की माता जी जाकर बेटे की गलती की माफ़ी मांगती हैं अधिकारी से मारपीट करने पर। और शायद सदा की तरह मामला पंचायती ढंग से निपटा दिया जाये। नियम कायदा अपराध हर बात आम सहमति से समझौता करवा खत्म। इसको कानून का नहीं कोई और शासन कहते हैं। दिल्ली को जाने कैसा रोग लगा है एक दिल्ली का शासक खुद को दूध का धुला मानता है और जब मर्ज़ी अपने ढंग से जनमत को अपने पक्ष में साबित कर अपने कर्मों को उचित ठहराता है तो दूसरा खुद को समझता है कि बस वही देश की नैया पार लगा सकता है और घोषित करता रहता है उसी का शासन चलने वाला है। ऐसे में क्या बीस साल को चुनाव आयोग को छुट्टी दे दी जाये और टीवी बहस और सोशल मीडिया पर तय हो जाये जनता का अभिमत क्या है। अभी भी आपको लगता है देश और समाज सही दिशा के जा रहे हैं।
       

Tuesday, 4 July 2017

इश्क़ करना सीख लिया ( उल्टा पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया

   इश्क़ करना सीख लिया ( उल्टा पुल्टा ) डॉ लोक सेतिया 

शायरी भरी पड़ी है इश्क़ की बातों से , बहुत नाम हैं दुनियावी इश्क़ वाले भी रूहानी इश्क़ वाले भी। मीरा को न जाने कितनों ने क्या समझा होगा , राधा नसीब वाली है जो उसके मंदिर बने हैं। किसी ने नहीं सोचा होगा कि अगर राधा नहीं होती राधा तो कृष्ण कनहिया भी नहीं होते। किसी शायर की ग़ज़ल है बंदे को खुदा करता है इश्क़। इश्क़ करने वाले खुदा नहीं होते वो किसी से करते हैं इश्क़ और उसको खुदा बना देते हैं। हर कोई इश्क़ करना चाहता है आज भी मगर जनता नहीं इश्क़ होता क्या है। आज का ये सबक उन्हीं सब की खातिर पढ़ाया जा रहा है जिनको इश्क़ का फ़तूर है। लोग कितने अजीब हैं इश्क़ भी करते हैं और छुपाते भी हैं , आजकल के राजनेता ही देख लो सत्ता देवी के आशिक़ हैं सब के सब। जब भी जिसको मिलती है उसकी सुध बुध खो जाती है , सामने है देख लो ध्यान से। आप भी खुद बनना चाहते वही और जो मजनू बना हुआ उस को पत्थर भी मारते हैं। यही सब से उलटी बात है , अपना अपना इश्क़ इबादत लगता है और कोई और हो आशिक़ तो अदावत करते हैं। आप यही सोच रहे ये कैसा लिखने वाला है इधर उधर की बात करता है सीधी बात करता नहीं खुद अपने इश्क़ की। शीर्षक दे कर भूल ही गया। भटक गया है विषय से , नहीं। घूम फिर का आना उसी पर है , हर कोई यही करता है बात किसी की हो अपने पर ले आते हैं। चलो कौन है जिस से मुझे इश्क़ है अभी बता देता हूं , चालीस साल से उसी की आशिक़ी की है। अपना घर फूंक तमाशा देखता रहता हूं। मेरा इश्क़ मेरा जुनून यही तो है इक पागलपन है लिखते रहना देश समाज की बात , आईना दिखलाना सब को। मैं क्या कर सकता हूं अगर आईने में हर किसी को अपनी असली सूरत दिखाई देती है जो सब को अपनी लगती नहीं , लोग अपने मुखौटे को अपना चेहरा समझते हैं। आईने से मेकअप छुपाए नहीं छुपता , और लोग आईना ही तोड़ देते हैं। हर दिन कितनी बार टूटा हूं फिर भी ज़िंदा हूं खुद मैं भी हैरान हूं। इक शेर है मेरी एक ग़ज़ल का जो सब को पसंद आता तो है समझ आया कि नहीं मुझे नहीं मालूम। 

                  तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,

                     मेरी अर्थी को उठाने वाले।

किसी को अपनी शायरी से इश्क़ होता है , किसी को कविता कहानी से , कोई संगीत से इश्क़ करता है , कोई अभिनय से। आशिकी वही है महबूब अपने अपने हैं , मेरी आशिक़ी बस कलम चलाना है , अपनी कलम से इश्क़ है भले कलम जो भी लिखे , ग़ज़ल कविता कहानी व्यंग्य या फिर आज की तरह बेसिर पैर की बात। अभी भी आपको लगता असली बात नहीं बताई , कोई तो आई होगी जीवन में जिस से हुआ होगा मुझे भी इश्क़। लोग मानते हैं कि शायरी करता है तो कोई तो ज़रूर होगी जिस का दर्द छलकता है ग़ज़ल के अशआरों में। है कोई सपनों की रानी जिस से हुई है मुहब्बत , ढूंढता फिरता हूं कभी कहीं तो मिलेगी जो मुझ जैसे सरफिरे से इश्क़ करने को राज़ी होगी। जिस को न सोने के गहने चाहिए होंगे न चांदी की पायल , न कोई कीमती उपहार न कोई फूल गुलाबी। मेरा दामन तो भरा हुआ है कांटों ही से। मेरे गले लगेगी तो खुद अपने जिस्म को घायल ही कर लेगी , इसलिए जब कोई लगती भी है ऐसी जो मुझसे इश्क़ कर सकती है तब मैं उस से फासला रखता हूं। ये ज़रूरी भी है क्योंकि जो दूर से लुभाते हैं उनको पास से देखते हैं तो लगता है सपना बिखर गया है। ऐसा बहुत बार हुआ है कोई कहीं दूर से मुझे अख़बार या मैगज़ीन में पढ़कर मिलने आया और मिलते ही लगा उसे मैं कोई और ही लगा। जो अक्स बनाकर मिलने आते हैं किसी ख़ास व्यक्ति वाला जिस से मिलने की चाहत थी वह आम सा लगता है तो मुमकिन हैं पछताते हैं। क्योंकि मिल कर जाने के बाद वो खत फिर नहीं मिलते मुझे। तभी चाहता हूं अपने चाहने वालों से आमने सामने नहीं मुलाकात हो। क्योंकि मुझे आता नहीं है वही दिखाना बनकर जो आपका चाहने वाला चाहता है। जिस दिन अपनी असलियत को छुपाने लग गया वो मेरा आखिरी दिन होगा , मर जाना और क्या होता है। अमर भी नहीं होने की चाहत , किसी शायर की तरह जो कहता है। " बाद ए फ़नाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र , जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या "।  ये भी लोगों की अजीब चाहत है मर कर भी मरना नहीं चाहते , सोचते हैं कोई निशानी छोड़ जाएं ताकि लोग भूल नहीं जाएं। जीने की उतनी फ़िक्र नहीं जितनी मर जाने की चिंता। भाई हमने तो पच्चीस साल पहले लिख दी थी अपनी वसीयत , तैयार हैं मौत आये तो सही। मैंने इक शेर भी कहा है कुछ इस तरह। " मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया "।
            अश्क़ की दास्तां अधूरी है , किसी आशिक़ की कहानी अंजाम तक कभी पहुंची है। बाकी बहुत बातें हैं अभी याद तो करने दो 66 साल में कौन कौन आया जीवन में। अभी तो मेरी इक ग़ज़ल जो मेरी वसीयत भी है उसका लुत्फ़ उठायें और मुझे चाहे भूल जाना मेरी वसीयत को याद रखना। 

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये , 

बाअदब अपनों परायों को बुलाया जाये। 

इस ख़ुशी में ,कि मुझे मर के मिली ,ग़म से निजात ,

जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये। 

मुझ में ऐसा न था कुछ , कोई मुझे याद करे ,

मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये। 

दर्दो-ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह , तनहाई ,

ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये। 

जो भी चाहे वही ले ले ये विरासत मेरी ,

इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।         


Monday, 3 July 2017

हास्य कवि की चाहत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

          हास्य कवि की चाहत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

मैं अपनी ये रचना फेसबुक और व्हाट्सएप्प के नाम करता हूं। जब तक मैं इन दोनों को नहीं समझा था बेचैन रहता था। सोचता था लोग दोस्त बनते हैं बस नाम को ही , इक संख्या हैं हम सभी , भारत सरकार के किसी विभाग के झूठे आंकड़ों की तरह। सैकड़ों नहीं हज़ारों दोस्त फिर भी बातें दोस्ती की कम दुश्मनी की अधिक लगती , या कभी लगता इक लेन देन है। बाजार में आप जेब खाली कर पसंद का कुछ खरीदते हो , फेसबुक पर जेब भी भरी रहती और जो आपको पसंद वो भी मिल जाता। आपको लाइक्स के बदले लाइक्स ही करनी है और कमैंट्स में वाह क्या खूब लिखना है , बस थोड़ा झूठ बोलकर किसी को ख़ुशी देना इस में गलत क्या है। आप किसी को गलती से भी सलाह मत देना कि आपकी कविता में कोई कमी है , हर कविता नाम की लड़की नाराज़ हो जाएगी , खुशबू रानी को भी बुरा लगेगा , और ग़ज़ल तो रूठ ही जाएगी। मुझे ये सब इक साथी हास्य कवि से समझ आया है। उसकी बात आखिर में , पहले अपनी भड़ास निकालनी है। काफी चिंतन करने के बाद मैंने इक फेसबुक और बना डाली व्यंग्य साहित्य नाम से ये सोचकर कि अब इस पर कौन क्या है बिना सोचे दोस्त बना लेना और फिर ये चिंता नहीं करनी उसकी पोस्ट पर क्या लिखा है या मेरी पोस्ट कोई पढ़ता भी है कि नहीं। सब ज्ञानी लोग ज्ञान बांट रहे हैं अपना ज्ञान खुद पास नहीं रखते औरों को देते हैं अव्यवहारिक ज्ञान। मुझे अपनी मूर्खता को ज्ञान नहीं समझना ये हमेशा से सोचा हुआ है , मुझे समझदारी और अक्लमंदी से फासला रखना पसंद है। समझदार लोग जो करते हैं सब जानते हैं , औरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना। आप ये मत पूछना उल्टा और सीधा उल्लू होता क्या है , मैं उल्लू नहीं न किसी को बनाता ही हूं। अब वापस असली बात पर उस हास्य कवि की कविता से बात करते हैं।

    देख कर सब कवि हैरान थे , सब से बढ़कर छा गया था , इक प्रेम की कविता सुनाकर , जो कवि उसको मिली थी सभी , महिला श्रोताओं की तालियां , जैसे सभा में बैठी उसकी सालियां।  मगर बताया था बाद में राज़ , फैला दी थी उसने सभा में बात , जिसको चाहता है उसी पर लिखी , आज आया है खुद उसे सुनाने को , और जाने किस किस को लगा था , ज़रूर मुझी से हुई है मुहब्बत , सब , समझ रही थी है वही उसकी चाहत। इक कवि भाई ने अकेले में पूछा , दिखला दो मिलवा दो भाई हमें भी , देखी अभी तक कोई कविता सी नहीं , हंसकर बोला कोई हो तो मिलवाऊं , ख्वाब की मेहबूबा को हकीकत बनाऊं , मुझे तो सब की सब लगती हैं आफत , मेरी रचना ही है केवल मेरी मुहब्बत।

         बस मुझे इक गुरुमंत्र मिल गया था , मुझे दूसरों की नकल करना पसंद नहीं है इसलिए मैंने अपना वास्तविक तरीका अपनाया। मैंने भी अपना इक फेसबुक और इक व्हाट्सएप्प का ग्रुप बनाया जिसका एडमिन खुद को बनाया , अपनी मर्ज़ी से धूप की अपनी मर्ज़ी से छाया। मगर अपनी सच बोलने की बुरी आदत फिर भी नहीं छोड़ पाया। मैंने संबंध बनाने का अलग अपना नुस्खा अपनाया , खुले में लिखकर नहीं किसी को गलत को गलत बताया।  उस लिखने वाले को या लिखने वाली को इनबॉक्स समझाया , इस तरह बहुत को अपना चाहने वाला बनाया। लोग ग्रुप में महिला दोस्तों की बेकार कविताओं को पसंद कर रहे थे , इधर हम दो कदम और आगे बढ़ रहे थे। उनकी रचनाओं को सही करने का काम कर रहे थे , वो समझती थी हम उन पर मर रहे थे। सर जी सर जी सुनकर मज़ा आ रहा था , कोई अनपढ़ गुरु बन गया था , दसवीं फेल टीचर नहीं बन पाया अब योग सिखला रहा था। मैं देख कर चुपके चुपके मुस्कुरा रहा था। मुझे इक पुराने दोस्त की बात जो कभी नहीं समझ आई थी समझ आई थी , जब उस से अपनी कुट्टी है बिना बात हुई लड़ाई थी। आज होने लगी बात तो वो भी बताता हूं , इक सच्ची बात पर आज तलक पछताता हूं। दोस्त अखबारी छपास का मारा है उसको लगता अपना छपा नाम सब से न्यारा प्यारा था। इक दिन उसने अख़बार में समाचार लिख भेजा , किसी को नहीं खबर थी किस किस को किस ने देखा। जो लोग उस दिन शहर में नहीं थे खबर में उस कवि गोष्ठी में उपस्थित थे। मैंने किया फोन और बोला मेरे भाई , जो नहीं आया उसकी भी बधाई , इतना सितम नहीं करो मेरे यार। बुरा मान गया था , वो समझाता था भगवान को भी तूती पसंद है , हम तो आदमी हैं तारीफ के भूखे हैं। बस मुझे इसीलिए भगवान को मनाना आया नहीं , झूठी बातों का भोग मैंने लगाया नहीं। अब काम की बातें लिखना छोड़ बेकार की अनाप शनाप लिखता हूं और अपनी लिखी पोस्ट को जब भी खुद पढ़ता हूं खुद ही लाइक भी और कमेंट भी करता हूं। बस मुझे सोशल मीडिया की समझ आई है , खुद अपनी पीठ सब से थपथपाई है। टीवी हो अख़बार हो या फिर अपनी सरकार हो , सब खुद अपनी आरती गए रहे हैं , कोई  नहीं सुने फिर भी दोहरा रहे हैं। जो कहते थे न खाएंगे न खाने ही देंगे आजकल मौज मना रहे हैं।

Sunday, 2 July 2017

आज़ादी अपनी नहीं सभी की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       आज़ादी अपनी नहीं सभी की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

आपको भी शायद बहुत मज़ा आता होगा , यू ट्यूब पर फेसबुक पर सोशल मीडिया में अजीब अजीब हरकतें करते बच्चे जानवर पशु पक्षी न जाने क्या क्या। कभी सोचा इस की कीमत क्या है , इक महिला अपनी एक साल की बच्ची को कीर्तन करना सीखा रही है। बच्ची को करना होता जैसा मां आदेश देती , उसको भूख लगी है या चॉकलेट का लालच दिया जाता है। इक और साहब ऐसा अपने तोते से कराते हैं , उसको खाने को तभी मिलेगा जब तोता मालिक की कही बात दोहराएगा। किसी की बेबसी मज़बूरी का फायदा उठाना या किसी को लालच देकर अपनी बात मनवाना बताता है कि आप आज़ादी पसंद नहीं हैं। जानवर से प्यार का ढोंग करते हैं और अपनी अंदर की शासक होने की ललक को पूरा करते हैं। बहुत हैरानी की बात है हम सत्तर साल से दावा करते हैं कि आज़ाद हो चुके मगर आज़ादी के अर्थ तक को नहीं समझते। पिता सोचता है बेटा जैसे मैं कहता उसी तरह जिए क्योंकि मैंने उसको जन्म ही नहीं दिया पाला पोसा ही नहीं बल्कि उसको काम करने को पैसे मुझ से लेने हैं तो मेरी शर्त माननी ही चाहिए। कोई पति सोचता पत्नी को घर चलाने को कमाई देता हूं तो उसको मेरी हर बात माननी ही होगी। पत्नी भी अपने ढंग से सोचती है कि जब मुझ से विवाह किया है तो पति को हर कदम मेरी पसंद से चलना होगा। जब जिस का बस चलता तब वही दूसरे को अपने अधीन रखना चाहता है। आप हम बेशक कितने आधुनिक और पढ़ लिख कर सभ्य हो जाने की बात समझते हों , शायद ही कभी सोचते हैं वास्तविक आज़ादी किसे कहते हैं। आप अपनी आज़ादी चाहते हैं मगर दूसरों की आज़ादी की कदर नहीं करते हैं। अमीर गरीब की आज़ादी को खरीदता भी है तो सोचता है उचित कर रहा हूं। 
       आज फेसबुक पर इक पेज देखा बीस साल और मोदी। तमाम लोगों ने पसंद किया हुआ बिना समझे कि आप क्या कर रहे हैं। आप केवल किसी व्यक्ति की चाटुकारिता ही नहीं कर रहे अपितु देश के संविधान और डेमोक्रेसी को भी ताक पर रखने की बात कर रहे हैं। और ऐसा कर भी क्या देख कर रहे हैं , आपको मालूम भी है देश की अधिकतर आबादी की हालत कितनी बुरी है मगर इस आपके तथाकथित महान आदमी की किसी योजना में आम गरीब को कोई अधिकार शिक्षा का स्वास्थ्य का जीवन की बुनियादी सुविधाओं का कोई ज़िक्र तक नहीं है। हर पुरानी सरकार की तरह उनको खैरात के टुकड़ों पर रहना है की योजना है। आप के सामने आएगा इस तरह देश की हालत नहीं सुधरने वाली। अभी विदेश जाने से पहले बहुत दवाओं को उस सूचि से बाहर किया गया जिस में दवा कंपनी बिना सरकारी अनुमति मोल नहीं बढ़ा सकती। यही सरकार जब अपनी पीठ थपथपानी हो तब आपको बताती है हमने निर्धारित किये हैं दवाओं के दाम। मगर जब दवा कंपनी वालों से मिलना होता तो उनकी बात पहले ही पूरी कर दी जाती है। अगर तब भी आपको इस में कोई घोटाला नहीं समझ आता तो आप बापू के बंदर हैं जो आंख मुंह कान बंद रखे हुए हैं। 
               आज तक किसी ने सवाल नहीं किया मगर अब करना कोई , सूचना के अधिकार का उपयोग कर पता लगाना आपका प्रधानमंत्री हर दिन कितना धन खुद पर खर्च करता जनता ही का। क्या पिछली सरकारों से बहुत अधिक और तब हिसाब लगाना करोड़ों रूपये से राजसी शान से रहकर आम जनता की भलाई को वास्तविक मिला क्या है। अगर आपको नहीं पता अभी तक तो इक बार फिर दोहराता हूं , इस देश का सब से बड़ा घोटाला और कुछ नहीं सरकारी विज्ञापन हैं जिन पर जितना धन सत्तर साल में अपने महिमामंडन पर बर्बाद किया गया उसी से देश को खुशहाल बनाया जा सकता था। जनता के धन की लूट में कौन कौन शामिल है कभी विचार किया। आपको टीवी चैनल वाले बताएंगे बड़ी तेज़ दौड़ रहे हैं , लेकिन उनसे कोई कहे आप को सरकारी विज्ञापन या और तमाम ऐसे लोगों के झूठे विज्ञापन जिन से जनता को गुमराह किया जाता धोखा दिया जाता है की असलियत कभी क्यों नहीं खोलते। बैसाखियों पर चलने वाले अपाहिज लोग हैं , और ये भी कहां ईमानदार हैं। खबर किसे कहते हैं , पत्रकारिता क्या होती है , नहीं जानते। खुद को सब से ऊपर मानते हैं। इक शब्द लोग भूल गए हैं पीत पत्रकारिता। आज का मीडिया टीवी अख़बार सब पीलिया रोग से पीड़ित हैं। सच बोलते नहीं हैं झूठ को सच साबित कर बेचते हैं। और विचारों को अभिव्यक्त करने की आज़ादी इनको केवल अपने लिए ज़रूरी लगती है , बाकी कोई बोले तो हंगामा खड़ा हो जाता है।

Saturday, 1 July 2017

कलमकार की चाहत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       कलमकार की चाहत (  कविता ) डॉ लोक सेतिया  

आपको किसी कवि से शायर से ,
किसी कथाकार से ग़ज़लकार से ,
हो गई है अगर मुहब्बत सच्ची ,
दर्द उसके अपने समझना ख़ुशी। 
शायद नहीं देगा वो महंगा उपहार ,
बस इक फूल देकर करेगा इज़हार ,
पर महक रहेगी उस फूल की सदा ,
आपको दिल की जगह लेगा बसा। 
उसकी कहानी शुरू तुमसे होगी ,
ग़ज़ल तुम्हीं पर कविता तुम होगी ,
हर लफ्ज़ में तुम्हारा नाम होगा ,
आशिक़ तेरा है क्यों बदनाम होगा। 
ज़माना कभी नहीं जान पाएगा राज़ ,
लिखी उसने ज़माने की बता के बात ,
नहीं आपको मौत भी खत्म कर सकती ,
हर रचना में ज़िंदा रहेगी दोनों हस्ती। 
कभी मगर नहीं इक बात करना आप ,
उसकी रचनाओं को सौतन न समझना ,
बड़ी खूबसूरत जगह है प्यार वाली ,
रहती वहीं आप ख़ुशी खशी ही रहना।


Friday, 30 June 2017

आधी रात की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         आधी रात की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      आधी रात की बात अलग होती है। आधी रात में आधा चंद्र्मा भी हो और महबूबा कहती हो रह न जाये तेरी मेरी बात आधी तब इश्क़ का लुत्फ़ होता है। आधी रात को अंधेरे में कभी कहते थे फ़रिश्ते आते हैं ज़मीं पर। आजकल आधी रात को लूट बलात्कार होते हैं , चोरी दिन दिहाड़े भी होती हैं और डाका आजकल जंगली डाकू नहीं डालते , कारोबारी धर्म वाले सच्चाई की दुकान वालों से लेकर भगवा धारी और सरकार तक डालते हैं। पहले डाकू अमीरों को लूटते थे आजकल सब गरीबों को लूटते हैं , कोई नहीं सोचता उसकी कमाई ईमानदारी की दूध सी है या फिर नानक उनकी रोटी को निचोड़ दिखाएं तो खून की नदी बहती होगी। खैर आज बात और है आधी रात को देश की सरकार इक शो आयोजित करने जा रही है जी एस टी को लागू करने पर। और उस में ख़ास बड़े बड़े लोगों को विशेष तौर पर बुलाया गया है। आम जनता की किसी भी समारोह में ज़रूरत होती नहीं मगर आपने ये सब लागू करना उसी पर है। अब अमिताभ बच्चन जैसे लोगों को जिनको कुछ मिंट का विज्ञापन करने पर करोड़ रूपये मिलते हों क्या फर्क पड़ता है महंगी सस्ती होने पर किसी वस्तु के। अभी विदेश यात्रा पर मोदी मोदी का शोर सुन कर लगता था जैसे वहां रहने वालों को पता चल गया हो कि तीन साल पहले जिन अच्छे दिनों की बात की थी वो लाये जा चुके हैं। हज़ारों रूपये टिकट के देकर मनचाहा भाषण सुनने वालों को क्या पता देश में अभी भी तीन चौथाई जनता को दो समय रोटी और पीने का साफ पानी नहीं मिलता। अभी तलक आम जनता को हासिल कुछ नहीं हुआ है , सरकार रोज़ नई नई बातें करती है मगर उस से हुआ क्या किसी को मतलब ही नहीं। 
                 ऐसा दिखाया जा रहा है मानों वास्तविक आज़ादी अब मिलने वाली है। जब कि खुद सरकार नहीं जानती कल इसका फल क्या निकलेगा। नोटबंदी से हासिल क्या हुआ कोई नहीं जनता। मगर असली बुनियादी सवाल ही और है। क्या हम आज़ादी के चाहने वाले हैं अथवा अभी भी हमारी मानसिकता वही गुलामी वाली ही है। हर किसी की जयजयकार करते हैं , उगते सूरज को सलामी देते हैं। नहीं सोचते उस ने देश समाज को दिया है कुछ या लिया है। इन पर हर पल लाखों करोड़ों खर्च करती है वो जनता जिस की खुद की आमदनी मासिक हज़ार रूपये भी कठिनता से होती है। अब अगर तब भी राजनेता शाही शान से रहते हैं और अपने पर बेतहाशा धन बर्बाद करने के बावजूद खुद को देश का सेवक घोषित करते हैं तो इसको क्रूर मज़ाक कहना होगा। आडंबर के समारोह अपनी शान दिखलाने को हर दिन आयोजित करने मानवता के खिलाफ अपराध जैसा ही है। आपने पल बनाया सड़क बनाई या भवन बनाया या आपको सत्ता मिले साल दो साल तीन साल हुए उस को जश्न या कोई और आडंबर करने की उपयोगिता क्या है। जब आपने भी वही करना है जो पहली सरकारें करती आईं तब बदलाव कैसे होगा। असंवेदनशीलता की पराकष्ठा है सरकारी धन को अपने महिमामंडन पर अथवा झूठे विज्ञापनों पर खर्च करना। अगर हम आज़ादी का अर्थ समझते है तो किसी को भी खुदा या मसीहा नहीं बनाएं ये खतरनाक है। आपने चुना है उनको जिस काम के लिए वो करना उनका कर्तव्य है उपकार नहीं है। कुछ लोग वास्तविकता दिखलाने को आलोचना मानते हैं जब कि हर सत्ताधारी अंधा होता है , उसको वही दिखाई देता है जो वो चाहता , तभी जब जिस जगह जाना होता मंत्री को बड़े अधिकारी को तब दो दिन पहले सब सही दिखलाने का प्रबंध किया जाता कार्यपालिका द्वारा। कभी किसी ने सोचा ये कितना अनुचित है , जो काम जनता की ज़रूरत को नहीं नेता अधिकारी को खुश करने को किये जाते उनको वास्तव में पहले ही होना चाहिए था। हम सब देख समझ कर भी सोचते क्यों नहीं ये क्या है। 
                               14-15 अगस्त की आधी रात को मिली आज़ादी अभी भी देश के बहुमत को कोई उजाला देने में सफल नहीं हुई है। ऐसे में फिर वही आधी रात की इतिहासिक भूल दोहराने जैसा काम सरकार करने वाली है जिस में वही लोग शामिल होंगे जो पहले से चमकीली रौशनी में सितारों की तरह रहते हैं। अंत में अपनी इक ग़ज़ल याद आती है। पेश करता हूं :-

चंद धाराओं के इशारों पर ,

डूबी हैं कश्तियां किनारों पर। 

अपनी मंज़िल पे हम पहुंच जाते ,

जो न करते यकीं सहारों पर। 

वो अंधेरों ही में रहे हरदम ,

जिनको उम्मीद थी सितारों पर। 

खा के ठोकर वो गिर गए हैं लोग ,

जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर। 

डोलियां राह में लूटीं अक्सर ,

क्या भरोसा करें कहारों पर। 

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,

फूल रख आये हम मज़ारों पर। 

डॉ लोक सेतिया " तनहा "

 


Tuesday, 27 June 2017

मैं बदल गया ( डॉ लोक सेतिया )

                     मैं बदल गया  ( डॉ लोक सेतिया  )  

सभी ने समझाया , फिर भी समझ नहीं आया ,
ठोकरों से कभी भी , मैं नहीं आज तक घबराया। 
इक घाटे का काम है , सच को सच ही कहना ,
फिर क्यों मैं सोचता , खोया है क्या क्या पाया। 
गुज़ारी है उम्र मैंने , बस झूठ से लड़ते लड़ते ,
ये बात और है कि मैं , ये जंग हारता ही आया।
पर इस निज़ाम के हैं , दस्तूर सभी निराले बने ,
गहरी काली घटा बन , सूरज भी है कहलाया। 
अब रौशनी नाम है , अंधकार का नया बदला ,
सब को डराता है अब , खुद ही खुद का साया। 
सब कुछ वही है लेकिन , बदले हैं नाम सबके ,
बदहाली शब्द जो था , है खुशहाली कहलाया। 
बस शोर हर तरफ है , मेरा देश बदल रहा है ,
बंधी आंखों पर पट्टी , इक कोल्हू चल रहा है। 
अब बोलना मना है , सच बोलना गुनाह है ,
दम मेरा घुट रहा है , क्या मैं बदल गया हूं। 
ये कौन आया जिसने , जलता दिया बुझा दिया ,
इक रौशनी को  आकर , बस धुआं बना दिया। 
किसी की हर अदा पर , दुनिया है सारी फ़िदा ,
नहीं आदमी जी सकता , यहां आया जब खुदा।  

आप अपने डॉक्टर नहीं बनें ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        आप अपने डॉक्टर नहीं बनें ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       शायद सब कुछ उतना आसान होना मुमकिन नहीं जितना हम चाहते हैं। मेरे पास कई बार लोग आएं हैं इंटरनेट से किसी रोग बारे जानकारी हासिल कर अधकचरी जानकारी से कोई गलत नतीजा निकाल कर। मैंने हर बार उनको भी और कई बार कहीं भी या फोन पर ही अपने रोग का उपचार पूछने वालों की आगाह किया है कि अपनी जान की कीमत को समझें और इस तरह उपचार नहीं कराएं। पिछले साल मुझे जब लगा लोग आयुर्वेद के लेकर ठगी का शिकार हो रहे हैं तब मैंने सभी को निस्वार्थ सलाह लेने को अपना नंबर भी दिया और इक पेज पर आयुर्वेद की जानकारी और बहुत ऐसी समस्याओं का निदान भी बताना शुरू किया। मगर तब भी अधिकतर लोग चाहते थे उनको बिना किसी डॉक्टर से मिले घर बैठे दवाएं मिल सकें। अर्थात जो उचित नहीं मैं समझाना चाहता था लोग मुझ से भी वही चाहते थे। शायद कोई ऐसे में अपनी दुकानदारी कर कमाई भी कर सकता था , मगर मुझे लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर पैसे बनाना कभी मंज़ूर नहीं रहा। आजकल देखता हूं हर कोई हर समस्या का समाधान गूगल से खोजने लगे हैं। मगर रोग और चिकिस्या बेहद संवेदनशील विषय हैं। सवाल ये नहीं कि इस से डॉक्टर्स हॉस्पिटल या नर्सिंग होम को कोई नुकसान हो सकता है , सवाल ये है कि खुद जो इस तरह उपचार करेंगे उनका भला इस में है भी या नहीं। आप अगर कभी किसी भी दवा को लेकर सर्च करें तब आपको कठिन ढंग से इतना कुछ मिलेगा कि आप घबरा जाओगे और कोई भी अलोपथी की दवा नहीं लेना चाहोगे। मगर असल में कितने लोग इस सब को पढ़ कर समझ सकते हैं , मेरा विचार है अधिकतर बस रोग और दवा का नाम और किस मात्रा में खानी पढ़कर उसे अपने पर इस्तेमाल करते होंगे। जब कोई आस पास क्या राह चलता भी बताता है किसी रोग की दवा तब भी लोग बिना विचारे अपने पर आज़मा लेते हैं तब गूगल का नाम ही उनको प्रभावित करने को काफी है। कल ही मैंने इसी तरह इक नई दवा की जानकारी ढूंढी जो दिल्ली के इक बड़े संस्थान के डॉक्टर मेरे परिवार के इक सदस्य को लिख रहे थे , तब मैं हैरान हो गया ये पढ़कर कि तमाम रोगों पर काम करती है की बातों के आखिर में लिखा मिला अभी तक ये किसी ने विधिवत रूप से प्रमाणित किया नहीं है। ये शब्द आने तक मुझे लग रहा था जैसे ये कोई संजीवनी बूटी है राम बाण दवा है। लेकिन आखिरी शब्द मुझे डराते हैं क्योंकि वहीं उस दवा के तमाम ऐसे दुष प्रभाव भी थे कि इस से अमुक अमुक गंभीर रोग हो सकते हैं। इसलिए मुझे लगा लोगों को इस बारे सावधान किया जाना चाहिए। बेशक लोग विवश हैं क्योंकि देश में न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की खराब दशा है बल्कि जब मिलती भी है तो अनावश्यक रूप से महंगी और केवल पैसे बनाने के मकसद से न कि ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने को लोगों को रोगमुक्त स्वास्थ्य जीवन जीने के लिए। फिर भी ये तरीका कदापि सही नहीं है।

Saturday, 24 June 2017

आलेख डा. लोक सेतिया

                     मुझ में ज़िंदा हैं जे पी जी

                                 डॉ लोक सेतिया

कोई किसी की मूर्ति कोई किसी की तस्वीर कोई किसी की कोई निशानी दीवार पर सजा कर रखता है। कोई किसी के नाम पर कुछ बनवाता है , कोई किसी की याद में ताज बनवाता है। मैं शायद पहली बार गया था उनको सुनने को 42 साल पहले रामलीला मैदान दिल्ली में और बस उसी दिन मैंने इक मकसद बना लिया था , मेरा जन्म उसी जगह उसी दिन हुआ था। आज वो जननायक जयप्रकाश नारायण किसी को याद तक नहीं है मगर मैंने उसे अपने दिल में ज़िंदा रखा हुआ है। आज उन्हीं के नाम पर मैंने इक फेसबुक बनाई है जो किसी को नकली लग सकती है , मगर मुझे नहीं। क्योंकि मुझ में मेरा अपना कुछ शायद नहीं ज़िंदा मगर जे पी अभी भी मुझ में जीवित हैं। अधिकतर लोगों को सोशल मीडिया मनोरंजन करने से अपने स्वार्थ सिद्ध करने तक की जगह लगता है , मुझे वहीं अपने विचार सांझा करने हैं। ये जानते हुए भी कि अब किसी को फुर्सत ही नहीं और की बात सुनने की। फेसबुक व्हाट्सएप्प पर सब अपना अपना ज्ञान बांट रहे हैं , मैं ज्ञानीपुरुष नहीं कोई। केवल चिंतन करता हूं हर दिन और देखता रहता देश की समाज की हालत को।  पता नहीं क्यों उस को देख कर मुझे अचरज होता है कैसे लोग आस पास ये सब देख कर अपने मनोरंजन और कई तरह के काम करते हैं अपनी ख़ुशी की खातिर। आप ऐसे समाज में रहते हैं जहां हर तरफ हाहाकार चीख पुकार सुनाई दिखाई देता है लेकिन आप आँखे बंद कर कान पर हथेली रख होंठ सी लेते हैं। मुझ से नहीं हुआ ऐसा कभी भी , मैंने हर दिन इक लड़ाई लड़ी है नफरत स्वार्थ और कायरता की नीतियोँ के साथ। आपको ये मेरा पागपन लगता है तो मुझे अपना पागलपन पसंद है , पागल होना किसी सार्थक मकसद के लिए बुरा नहीं है। मुझे भी निराशा हुई है जब देखा जो कभी सत्ता की मनमानी और तानाशाही के विरुद्ध जे पी जी की जंग में साथी बने वही खुद और भी भृष्ट और अलोकतांत्रिक बन गए। उन लिए संपूर्ण क्रांति कोई मकसद नहीं केवल इक सीढ़ी थी सत्ता हासिल करने की। कितनी विडंबना है इक नेता जिस ने कभी कोई बड़ा पद नहीं स्वीकार किया उसके अनुयायी कहलाने वाले सब कुछ किसी भी तरह हासिल करने को तत्पर हैं। सत्ता ही उनका सब कुछ है। मैं अकेला चलता रहा और चलना भी आखिरी सांस तक उस काम को पूरा करने को। आप भी मेरे साथ चलना चाहोगे , बिना कोई स्वार्थ लिए मन में , देश और समाज की खातिर।

Thursday, 22 June 2017

Pressident Candidate And Caste Politicts ( Aalekh ) Dr. Lok Setia

                विकास की नहीं , जाति धर्म की राजनीति

                                           डॉ लोक सेतिया

  जब आप इधर आ गए , देश के सब से बड़े पद को भी दलित राजनीति का ज़रिया बनाकर , अपनी ही बातों को भुलाकर कि सब ने अपने अपने घर भर लिए इसी राह पर चलकर अब इसकी नहीं विकास की , वो भी सब के विकास की बात होनी चाहिए तब जो इधर खड़े थे वो भी क्या करते। और इस तरह आपने तीन सौ साठ डिग्री का रास्ता कब तय कर लिया कोई नहीं समझ पाया। दोनों पक्ष ने दलित अपना अपना चुना और उम्मीदवार बना दिया। वास्तव में इन में दलित कोई भी नहीं माना जा सकता , एक राज्यपाल जैसे पद और एक लोकसभा अध्यक्ष जैसे पद पर रह चुके हैं। दलित लोग अलग होते हैं और दलित राजनीति करने वाले अलग। दलित लेखन दलित चिंतन भी कुछ ऐसे ही होते हैं। समझ नहीं आता देश की राजनीति किस कदर दिशाहीन कैसे होती गई है कि देश का राष्ट्र्पति भी उसी दलगत राजनीति के तराज़ू पर तोला जा सकता है। अब जो कल एक दलित का समर्थन करते कह रहे थे जो उनके उम्मीदवार होने का समर्थन नहीं करेगा वो दलित विरोधी समझा जायेगा। लो अब दोनों ही दलित हैं और आप चाहे किसी का भी साथ देते हैं आप दलित विरोधी ही बन जाओगे। क्योंकि आपने दूसरी तरफ के दलित का विरोध तो किया ही है , कितनी अजीब स्थिति है अब दलित का समर्थन करेंगे मगर होंगे दलित विरोधी ही। यही वास्तविकता है , ये सभी दल दलित शोषित ही नहीं गरीब मज़दूर किसान सभी के विरोधी ही हैं , इनकी सत्ता की राजनीती की केवल एक सीढ़ी भर। देशहित की संविधान की वास्तव में अनुपालना की राजनीति क्या कोई कभी नहीं करेगा। काश कोई होता जो ऐसी ओछी राजनीति का माध्यम बनने से इनकार करता। साहस करता इस गलत विचारधारा का विरोध करने का और कहता नहीं मुझे केवल किसी जाति में जन्म लेने के कारण नहीं पाना कोई पद।  मुझे आप अगर दलित वर्ग से नहीं होने पर भी इस पद के काबिल समझते तब ही इसे मंज़ूर करता या करती। देश के सब से बड़े पद पर आसीन होने वाले को इतना बड़ा तो होना ही चाहिए कि वो असूल की खातिर सब कुछ त्याग कर सके। मगर जब आप जानते हैं कि आपको इतने बड़े देश के सर्वोच्च पद पर दो कारण से उम्मीदवार बना रहे हैं , आपकी किसी के लिए निष्ठा और उनके लिए दलित होने से वोट पाने का इक माध्यम होने से। सवाल इस से अधिक महत्व का है , क्या उस पद की गरिमा प्रतिष्ठा बढ़ती है या कम होती है।

Tuesday, 20 June 2017

Yog Par Patibandh Ho ( Tarkash ) Dr. Lok Setia

             योग पर प्रतिबंध लगाओ ( तरकश )

                                डॉ लोक सेतिया

हर कोई परेशान है , सरकारी अधिकारी रिश्वत भी चैन से नहीं ले सकते ताकि सरकार की बदनामी नहीं हो। इस सरकार की चिंता ही यही है कि किसी को ये नहीं पता चले कि आम आदमी को आज भी घूस देनी पड़ती है हर काम कराने को। अब तो इतना तक भी है कि गरीब होने की सूचना अपने घर की दीवार पर लिखवानी होगी ताकि सरकारी आंकड़े बढ़ सकें। सरकार की शान है कि वो आपको सहायता देती है आपसे ही लिए कर द्वारा जमा किये धन से। आप अपने अधिकार लेते हैं भीख की तरह , सरकार अपना फ़र्ज़ भी निभाती है उपकार एहसान की तरह ताकि बाद में उसी की बात कहकर वोट मांग सके। गरीबों की परेशानी तो उनका मुक़द्द्र है , अमीरों को परेशानी हो तो सरकार मुश्किल में पड़ जाती है। 
         आज योग दिवस है , विश्व स्वास्थ्य संघठन के नए आंकड़े आये हैं जो साबित करते हैं कि योग की शुरुआत करने से भारत में रोगी कम होते जा रहे हैं। आपको यकीन नहीं होगा मगर मैं खुद डॉक्टर हूं और मुझे हमेशा यही लगता रहा है मेरे पास मरीज़ बहुत कम आते हैं। ये दूसरी बात है कि मैंने इसका कभी प्रबंध नहीं किया कि मेरा धंधा चमके। कोई कमीशन नहीं दी किसी गांव वाले डॉक्टर को कि वो मरीज़ भेजता , उल्टा कोई आया ऐसा बात करने तो भगा दिया डांट कर , केमिस्ट और लैब से हिस्सा लिया नहीं , उनकी खातिर जांच को भेजा नहीं रोगियों को , ऐसे में मेरा धंधा मंदा रहना ही था। और मैंने कभी भगवान से भी ऐसी दुआ नहीं मांगी कि लोग स्वास्थ्य नहीं हों ताकि मेरी कमाई हो। सब की भलाई चाहोगे तो अपनी भलाई कैसे होगी। घोड़े और घास की बात है , खरबूजे और छुरी की बात की तरह। चलो कोई बात नहीं बिना दौलत भी मैं खुश हूं चैन से रहता भले आयकर का दफ्तर मेरे से दो प्लाट छोड़ पास ही है। दो तीन बार आये थे कभी हिसाब देखने मगर निराश हुए , एक बार तीस रूपये भरने पड़े उनकी लाज रखने को वो भी सी ए ने कहा मान भी लो इतना बनता है। 
                       अभी डॉक्टर्स का संगठन सरकार के नए बनते कानून को नहीं बनने की आस लगाए था , कि ये डब्लू एच ओ के आंकड़े भी डराने लगे। उनको यकीन है पिछले सालों में उनकी आमदनी घटी है तो उसका कारण बाबा जी का योग बेच कर मालामाल होना है। सालों साल खटते रहकर भी उनकी संम्पति कुछ सौ करोड़ की हुई और बाबा जी इतनी जल्दी हज़ारों करोड़ के मालिक बन गए। अब समझ आया समझदारी क्या होती है पढ़ लिख कर लोग चाकरी करते हैं और अनपढ़ नेता या उद्योगपति बनकर पढ़े लिखों को चाकरी को रखते हैं। पहले समझ आता तो अपने बच्चों को लाखों की कैपिटेशन फीस भर मेडिकल कॉलेज भेजने की जगह भगवा वस्त्रधारी बाबा बनाते। आप बेकार झूठी खबरें पढ़ते रहते हो सरकारी और निजि हॉस्पिटल की कि वहां डॉक्टर कम हैं रोगी अधिक हैं , डब्लू एच ओ की रपट बताती है कि रोगी हैं ही नहीं।  भारत को कब का केवल पोलियो रोग मुक्त नहीं सब रोगों से निजात मिल गई है योग द्वारा। कलाम जी किताब लिख गए थे दो हज़ार बीस का भारत कैसा होगा , वो भी सच होने ही वाला है। इधर कोई दो हज़ार उन्नीस तक किसी समस्या का अंत करने और दो दो हज़ार बाईस तक भारत को इण्डिया बनाने की घोषणा कर रहा है। बड़े लोगों की कही बात सच साबित नहीं भी हो तब भी कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हम जैसे लिखने वालों की किताब कोई बिना पैसे लिए नहीं छापता और अटल बिहारी जी की किताब को विश्वविद्यालय का कुलपति सब कॉलेजेस को खरीदने की सलाह देता है , कीमत भी केवल हज़ार रूपये थी। कलाम जी की किताब की भी रॉयल्टी किसी को मिलती रहेगी उनके पचास साल बाद तक , ऐसा नियम जो है।
                         मगर आज सब से बड़ी समस्या खड़ी हो गई है , रोग नहीं रहे तो केवल हॉस्पिटल और डॉक्टर्स ही नहीं कितने लोग इसी से जुड़े हैं सब के भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। दवा बेचने वाले ही नहीं बनाने वाले भी बर्बाद हो जायेंगे। इतनी महंगी महंगी मशीनें किस काम आएंगी जब एम आर आई , सी टी स्कैन , अल्ट्रासाउंड की ज़रूरत नहीं होगी। करोड़ों की कमाई खत्म होगी सो होगी , खुद बाबा जी की भी दवाएं बिकनी बंद हो जाएंगी। आपको दवाएं बेचनी हैं तो रोगी चाहियें , स्वस्थ लोग क्यों दवा  लिया करेंगे। एक तो पहले ही स्वच्छता अभियान और खुले में शौच बंद होने से लोग बीमार नहीं होते और सब डॉक्टर भूखे मर रहे हैं ऊपर से योग से सब को निरोग किया तो क्या हाल होगा। आम नागरिक की चिंता छोड़ भी दो तब भी नेताओं को हमेशा हॉस्पिटल में दाखिल होने की ज़रूरत रहती है जेल से बचने को। जब डॉक्टर नहीं , हॉस्पिटल नहीं तब आप में आधे से अधिक जेल में होंगे। और जब लोग स्वस्थ होंगे तब उनमें आत्मविश्वास भी भरपूर होगा और वो आप नेताओं को हर  इक गलत बात पर मज़ा चखाया करेंगे। योग करने के खतरे , ऐसी इक किताब भी बाज़ार में आने वाली है जिस सेल योग सिखाने वाली सब किताबों से बढ़कर  होगी।
योग विद्या हो सकती है , मगर जब किसी दवा के दुष्परिणाम देख उन पर परिबंध लगा सकते हैं तो योग को भी प्रतिबंधित किया जा सकता है।

Monday, 19 June 2017

Rashtrpti Chunav Se Emergency Tak ( Alekh ) Dr. Lok Setia

               राजनीति की भटकी दिशा ( आलेख )

                                 डॉ लोक सेतिया

दूर की कौड़ी लाएं हैं देश का पहला सेवक होने का दावा करने वाले। इक दलित को देश के सब से बड़े पद पर बिठाकर एक तीर से दो नहीं कई निशाने साध रहे हैं। बिहार चुनाव पहला निशाना है और दलितों के नाम पर राजनीति करने वालों की बोलती बंद करना दूसरी। साथ में तमाम वर्ग भी किसी न किसी रूप में आते भी हैं। सब से विशेष बात ये भी होगी जो कभी सांसद का चुनाव नहीं जीत पाया , अर्थात एक संसदीय क्षेत्र की जनता ने नहीं चुना उसको पूरे देश के सांसद और विधायक चुनेंगे। अन्यथा नहीं लें तो यहां इक और बात भी स्पष्ट करना ज़रूरी है कि किसी का किसी कार्य में निपुण होना ये साबित नहीं करता कि वह वास्तव में देश की सही समझ रखता भी है। अक्सर किताबी ज्ञान वालों से मिला कुछ भी नहीं। मनमोहन सिंह जैसा अर्थशास्त्री भी वित्तमंत्री बन अपनी नीतियां लागू करने के बाद भी गरीबी को मिटा नहीं पाया अपितु और और बदहाल हो गए लोग। और कलाम जी को पूरा आदर देने के बावजूद कहना चाहता उनकी कल्पना का 2020 का भारत कभी बन नहीं सकता तीन साल बाद तक। किताबी ज्ञान की समस्या यही है , वास्तव में तो कभी आपको ये विचार भी करना ही होगा कि जिस देश में लोग भूखे और बदहाल हों उस देश को शांतिप्रिय कहलाने के साथ परमाणु हथियार बनाने पर इतना धन बर्बाद करना चाहिए था या नहीं। आप वही परमाणु हथियार होना अपने और पड़ोसी देश के पास इक बड़ी चुनौती बन गया है। 
         लेकिन मुख्य सवाल और है , किसी दलित को इक आलीशान महल में पहुंचाना सरल है राजनीति में , मगर कठिन है किसी का ये समझना कि क्या डेढ़ सौ एकड़ के राष्ट्रपति भवन में किसी को रहना चाहिए या उतनी जगह लाखों लोगों को रहने को मिलनी उचित होगी। कभी किसी नेता ने नहीं किया साहस इक सही कदम उठाने का कि जनता के सेवक होने की बात करने वालों पर देश का कितना धन बर्बाद क्यों हो। क्या ये अपराध नहीं है। बदलाव लाने की बातें सभी करते हैं लाता कोई भी नहीं। दिल्ली की सरकार से भारत की सरकार तक बदलाव की बातें करने वाले लोग खुद ही बदल गए , और वही पुरानी नीति अपनाने लगे। जो अच्छा वो नहीं जो ज़रूरी वो भी नहीं जो लोगों को खुश कर सके बहला सके आपकी लोकप्रियता बढ़ा सके वो करते हैं। कितना बड़ा धोखा है , योग्यता की बात बचती कहां है। ख़ास बात ये भी है कि आप कहते कुछ हैं करते कुछ और हैं। आम सहमति की बात दिखावा और करनी मनमानी है।  इस से अधिक डरने की बात किसी का एक मात्र निर्णय करने का अधिकार होना है।  किसी दूसरे दल क्या अपने दल में भी किसी को आप की बात से अलग कुछ कहने की इजाज़त नहीं है। चलो कुछ दिन नहीं पांच दिन बाद वही दिन आने वाला है जिस दिन आपत्काल की घोषणा की गई थी। 25 जून 1975 को। 

Aapko Apne Desh Se Pyar Hai ( Aalekh ) Dr. Lok Setia

                  वास्तविक भावना भी जगाओ 

                देश से प्यार को खेल की जीत हार से नहीं आंको

                              आलेख :- डॉ लोक सेतिया 

  मुझे भी इसकी उम्मीद नहीं थी , भारत की ऐसी हार वास्तव में स्तंभित करती है। मगर खेल की जीत का जश्न या हार का मातम मनाना कितना उचित है वह भी उसको दुश्मनी से जोड़कर किसी देश की। आपको दुश्मनी निभानी भी नहीं आती न ही दोस्ती करना। कभी उसी देश से कोई आता है और आप पलकें बिछाते हो , कभी खुद उसी देश जाते हो खुश होकर। कोई उसी देश से व्यापार करता है , कोई कलाकार रिश्ते निभाता है। और आपको देशभक्ति का दिखावा भी करना होता है तो टीवी चैनल वालों के सामने अपने पुराने खराब टीवी लेकर तोड़ कर। कितनी बार देखा यही होता है , आप जाओ इन के घरों में एलईडी एलसीडी टीवी बड़ी स्क्रीन वाले ही मिलेंगे। जिन के पास वही पुराना टीवी है वो चाहें भी तो उसको भी तोड़ नहीं सकते , क्योंकि उनकी हालत ही नहीं होती आजकल का नया टीवी खरीदने की। हमारी आदत ही अजीब है हम किसी को कभी खुदा बना देते हैं सफल होता देख कर फिर उसी को असफल देखते उसको रौंदते हैं पांवों तले। 
            रोज़ खुद भी कितने काम करते हैं जिनको देश हित नहीं समझा जाना चाहिए , जब जो मर्ज़ी अपनी सुविधा की खातिर। आपके दल की सरकार है तो आपको आंखे बंद कर अपने नेताओं अधिकारीयों का अनुचित आचरण अनदेखा कर उसकी जयजयकार करनी है। इसे देशभक्ति कहते हैं , अभी भी वही जुमले बोलते हैं सत्तर साल में केवल विनाश हुआ है। उन सत्तर साल में आपकी बनी सरकार के तीन साल भी खुद शामिल करते हैं , इतना ही नहीं बाकी की खुद अपने दल की ही या अन्य दलों की पहली सभी सरकारों को ख़िताब दे देते हैं लूट करने में लगे होने का। वही लूट अभी भी जारी है , आपने भी कहां तौर तरीका बदला है। क्या झूठा प्रचार ज़रूरी है या जनता की बदहाली को मिटाना जो आपने भी विज्ञापनों की बाढ़ ला दी है। गरीबी की बात करते खुद रहना अमीरों की तरह , इसको कोई अच्छा बताता है तो फिर बुराई क्या है। 
       देश का प्रशासन पुलिस कार्यपलिका न्यायपालिका सब को अमीरों की चिंता सताती है। आप जो कहने को भीड़ में शामिल होकर सब करते हैं खुद हर अनुचित बात सामने होते भी देखना नहीं चाहते। आपके देश को समाज को ये सब भीतर से खोखला कर रहा है मगर आप चैन की नींद सोते हैं। आपको सच नहीं बोलना क्योंकि नेता अधिकारी या फिर वो लोग जो आपराधिक प्रवृति के हैं नियम कानून को नहीं मानते उनसे डरते हैं कि कहीं आपको कोई नुक्सान नहीं दे सके। देशभक्ति तब खुद के स्वार्थ से छोटी लगती है। आप को अच्छा लगता है देशभक्त समझे जाना ये ठीक बात है लेकिन आपकी देशभक्ति किसी खास अवसर पर नहीं हर दिन दिखाई दे तभी सच्ची है। चलो इक बार दोबारा याद करते हैं देशभक्ति का असली अर्थ देश पर खुद को न्यौछावर करना है और हर उसका विरोध करना जो देश के लिए अपना कर्तव्य निभाता नहीं चाहे उस में आपके दल क्या घर का कोई सदस्य ही नहीं खुद आप भी हों तब अपने आप का भी विरोध करें ताकि देशभक्ति केवल दिखावा बनकर नहीं रह जाये।

Sunday, 18 June 2017

Kaun Banega Crodpati Se Kaun Jeetega Khel Tak ( Tarkash ) Dr. Lok Setia

                   फिर आया है मसीहा ( तरकश )

                           डॉ लोक सेतिया

  उनको सदी का महानायक नाम दिया गया है , टीवी पर आकर कहते हैं मैं फिर आ रहा आपको करोड़पति बनाने। आज पहला सवाल है भाग लेने को उसका जवाब दें। आप को लगेगा भाई करोड़ रूपये की बात है सवाल कठिन होगा ही। और सवाल पूछते हैं बाहुबली फिल्म को लेकर , अगले दिन तक सही जवाब देना है। अगली दोपहर को बाहुबली फिल्म उसी टीवी चैनल के फ़िल्मी चैनल पर देख आप सही जवाब दे सकते हैं।
लगता है आपको कितनी आसानी से राह मिल रही है। स्वच्छ भारत भी उन्हीं की मेहरबानी है गांव गांव खेत खेत जाकर सुबह शौच को जाने वालों को लताड़ते हैं समझाते हैं भारत सरकार शौचालय बनाने को पैसा देती है। उनको कौन सवाल कर सकता है कितने गांवों में पानी ही नहीं पीने को मीलों दूर जाना पड़ता है और आप शौचलय की बात करते हैं। इन फ़िल्मी लोगों को सब फ़िल्मी नज़र आता है , इनकी ताकत भी फ़िल्मी , इनकी गरीबी भी फ़िल्मी , और इनका नायकत्व भी फ़िल्मी। नकली किरदार हैं ये सब। सब से अजीब बात है कि आप क्या दिखला रहे हैं , आपको सवाल भी यही पूछने हैं फ़िल्मी काल्पनिक दुनिया के। समाज को क्या अंधकार में रखना चाहते हैं और झूठे सपनों में खो जाओ यही आपका उद्देश्य है। लोग भूखे नंगे हैं बदहाल हैं मगर आपको उनको खाली पेट मनोरंजन के नशे में अपनी हालत को भूल जाने का उपाय करना है। बचपन में परीकथाओं में खोना अच्छा लगता था लोगों को , मुझे शायद तब भी मां ने उस तरह की झूठी कहानियां या लोरियां नहीं कुछ सच्ची कथाएं सुनाईं।
                आप को सब को टीवी वालों तक को बाहुबली को किसने मारा और भारत पाक मैच में जीत हार देश की सब से बड़ी समस्या लगती हैं। जब आपके सामने खड़ा होता है कोई नेता जो रिश्वत खाता हर काम करने को या अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता अथवा कोई अफ़्सर जो जनता की सेवा नहीं नागरिक पर सत्ता का चाबुक चलाता हो। तब देश के प्रति अपराध करने वालों के सामने आप हाथ जोड़ खड़े होते हैं या अपने किसी मकसद को हासिल करने को उनको मुख्य अथिति बनाकर सम्मानित करते हैं। मगर आपकी देशभक्ति नहीं जगती और आप कुछ नहीं बोलते कायर बन जाते हैं। आपका जोश खेल को टीवी पर देखते जगता है बंद कमरे में या किसी मैदान में जाकर तरह तरह से दिखावा कर के। आप कोई भी काम करते हों , राजनीति , नौकरी या अपना कारोबार , आपको कभी नहीं लगता अपने काम में देश और समाज के लिए आप कितने सही हैं ईमानदार हैं। कम से कम देश का बीस तीस प्रतिशत हिस्सा जो सुविधा संपन्न है शायद नहीं जनता सत्तर प्रतिशत जनता की दशा क्या है। उन से सरोकार रखना देशभक्ति नहीं हो सकता। अगर हम सब को अपने ही देश के लोगों से प्यार नहीं है तो फिर किस से है। देश आप सब से है , हम सभी देश हैं मिलकर।
       बेहद हैरानी की बात है ये टीवी शो समाज को न केवल दिशाहीन करते हैं बल्कि साथ साथ उसको छलते भी हैं कुछ देते नहीं लूटते ही हैं। धन दौलत के अंबार हैं इन के पास फिर भी इनकी पैसे की हवस खत्म नहीं होती और कुछ भी करते कभी नहीं सोचते कि उस में देश या देशवासियों की भलाई है या उनके लिए बिछाया जाल है। आप हम इनकी मछलियां हैं , इनको ज़रूरत है हमारी , अपनी आमदनी और और बढ़ाने को। आपको ये कोई मसीहा लगते हैं। एक बार फिर याद दिलाता हर धर्म ग्रंथ कहता है वो सब से दरिद्र है जिस के पास सब कुछ है फिर भी और अधिक पाने की हवस है। हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स , कहानी भी किसे याद है। यूं भी बड़े लोगों को मरने के बाद भी कई कई एकड़ ज़मीन चाहिए समाधि स्थल बनाने को उस देश में जिस में लोगों को ज़िंदा रहते घर नहीं नसीब होता।  अर्थशास्त्र का नियम समझाता है अधिकतर के पास कुछ इसी लिए नहीं है क्योंकि कुछ थोड़े से लोगों पास ज़रूरत से कहीं अधिक है। इस पर जो खुद और चाहते उनका कहना कि आपको अमीर बनाना चाहता हूं , झूठ है धोखा है और कपट है। मगर जानते हुए भी ऐसा करने वाले को जो महान समझते हैं सवाल उनकी सोच का है।