Saturday, 14 January 2017

बिकाऊ माल अर्थात ब्रांड होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                 " कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं , बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। "
आज महत्व ब्रांड होने का है , ब्रांड होना ऊंचे दाम बिकना है। लोग अपने नेता को ब्रांड बता रहे हैं , उनकी शान बढ़ा रहे हैं। सच गांधी जी कोई ब्रांड नहीं थे , शुक्र है उनको लाख प्रयास कर के भी कोई बाज़ार में बिकता ब्रांड नहीं बना पाया। कभी वो लोग महान समझे जाते थे जिनकी कोई कीमत नहीं लगा सकता था , जो किसी भी दाम बिकने को तैयार नहीं होते थे। अब तो माना जाता है सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है बस मोल अपना अपना है। गरीब दो रोटी में बिक जाता है , मज़बूरी इक मां को दो हज़ार में बच्चा बेचने को विवश कर देती है , और गरीब की गरीबी और जनता की बदहाली की बातें कहकर कोई राजनीति करते हुए ब्रांड बन जाता है। कोई दूसरा ब्रांड योग और आयुर्वेद से लेकर हर शुद्ध वस्तु को बेच मालामाल हो जाता है , जबकि उसके पास आयुर्वेद की कोई शिक्षा ही नहीं है। वो अपने विज्ञापनों में कहता है " मेरा विश्वास है जो योग करेगा और दो घूंट रोज़ पियेगा वो रोगों के कुचक्र में ही नहीं फंसेगा। " आपको मालूम है इसका अर्थ , विश्वास है भगवान है , मगर विश्वास है ऐसा करने से रोग नहीं होंगे , में अंतर है। विज्ञान मात्र विश्वास पर नहीं चलता , आयुर्वेद भी इक चिकित्सया शास्त्र है कोई धर्मकथा नहीं। मुझे नहीं पता इस तरह किसी बात को बेचने को क्या कहा जाये , मगर इतना जनता हूं ऐसा कर किसी ने न आयुर्वेद न ही योग की भलाई की है। फिर भी अगर आप सवाल करें तो आपको बताना ज़रूरी है विज्ञान तथ्य और प्रमाण पर आधारित होता है। किसी भी दावे को परखा जाता है ये जांच कर के कि उसके उपयोग से कितनों को क्या लाभ हुआ। किसी की दुकान गली गली खुल गई इतना काफी है उसके व्योपार की सफलता के लिये , मगर कितने प्रतिशत रोग कम हुए या लोग तंदरुस्त हुए पहले से ये कौन बतायेगा।  स्वास्थ्य विभाग और डब्ल्यू एच ओ नहीं मानता देश में रोग या रोगी कम हुए।
      असली सवाल बाकी है , क्या बिकना और ब्रांड होना गर्व की बात है। उनके नाम से मुनाफा होता है उनके दल वालों को लगता है , फिर तो उनकी तस्वीर हर जगह लगवा दो , कुछ आधुनिक संत अपनी तस्वीर अपने अनुयायियों को कुछ हज़ार में अपने हाथ से आशिर्वाद के साथ देते हैं , चोखा धंधा है। कुछ अभिनेता भी अपनी फोटो किसी के साथ भी करवाते हैं पैसे लेकर , उनकी कमाई होती है इसी तरह। कभी लोग बाज़ारी होना अपमान समझते थे , आज बाज़ार बताता है आपका मोल कितना है। इक और दल के नेता का उपहास किया जाता है कि उसका खरीदार कोई नहीं , यहां कल क्या हो जाये क्या पता। कल वही सत्ता पर काबिज़ हो जाये तो लोग जनता क्या मीडिया तक उसका गुणगान करेंगे , उसके फोटो भी विज्ञापन में दिखाई देंगे नित नई योजना की घोषणा के साथ। अब समय आ गया ही शेयर बाज़ार में राजनीति के शेयर भी दर्ज हों और उनका भाव भी बढ़ता गिरता नज़र आता रहे। जब यही सब से बड़ा कारोबार है जिस में आकर सभी अरबपति बन जाते हैं तो इसको खुले बाज़ार की अर्थव्यवस्था में शामिल करना ज़रूरी है। कब तक आम आदमी दूर से तमाशा देखता रहेगा , सभी को सत्ता की भागीदारी की इजाज़त मिलनी चाहिए। जो चाहे जिस राजनितिक दल के शेयर खरीद सके और जब वो दल सत्ता में आये तब अपने शेयर मनचाहे भाव पर बेच सके। सरकार इसको गरीबी की योजना में शामिल कर सकती है। अजीत जोगी और जूदेव जैसे महात्मा पहले ही राजनीति में धन के महत्व पर प्रवचन दे चुके हैं। आज इंसान भी इक वस्तु बन चुका है और उसकी कीमत लगाई जाती है , विधायक और सांसद भी बिकते खरीदे जाते हैं ये भी अब राज़ की बात नहीं है। बड़े बड़े उद्योगपति हर दल को चंदा देने की तरह हर दल के शेयर खरीदा करेंगे और जिस दिन उनके पास इतना धन होगा की बहुमत संख्या के विधायक खरीद सकें सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। जो अभी तक परदे के पीछे होता आया चोरी से अब कानूनी तौर पर खुलेआम होगा। इधर इक दलाल बता रहा है कि राजनीति में ईमानदारी की कीमत माइनस में आ गई है और बेईमानी को मुंह मांगी कीमत मिलने लगी है। आप कुछ शेयर बेईमानी के खरीद कर और कुछ हेरा फेरी दल के भी साथ फ्री पाकर शुरुआत तो करो , इसमें सभी ब्रांड उपलब्ध हैं , लाल , भगवा , नीला  , हरा , अब तो काला भी शामिल हो चुका है , बहुरंगी तो है ही।
             ऊपर स्वर्ग लोक में बहस चल रही है , एक अंग्रेज़ की आत्मा भारतीय आत्मा से कह रही है , तुम क्या समझते थे हम देश को लूट रहे हैं , हमें बाहर निकाल दिया था। क्या शिक्षा दी थी तुमने चरित्र निर्माण की , आज हर बात को बेचा जा रहा खरीदा जा रहा , मूल्य आदर्श भी तोले जा रहे सत्ता के तराज़ू पर।  और  देख लिया झूठ का पलड़ा भारी है सब उधर झुके हुए हैं , सच की कद्र कुछ नहीं उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है। तुम सत्य अहिंसा की पुजारी थे , तुम्हारी समाधि पर फूल चढ़ाने वाले तुम्हारी सोच को कत्ल करते हैं। खुद विदेशी कम्पनियों को बुलाते हैं , स्वदेशी की बात कोई नहीं करता। गांव में देश बसता है तुम मानते थे , अब गांव भी गांव जैसे नहीं हैं , चरखा आज मिलता ही नहीं कहीं। आपको पता है लोग मन्नत मांगते हैं बहुत सालों से मांगते आये हैं और मन्नत पूरी होने पर चरखा लोहड़ी में जलाया करते थे , आज चरखा नहीं मिलता बस इक मॉडल छोटा सा बिकता है रस्म निभाने को। 2 अक्टूबर 3 0 जनवरी को रस्म निभाते हैं नेता। सत्तर साल हो गये हैं अभी तक देश के अंतिम आदमी के आंसू कोई पौंछता  क्या देखता तक नहीं है।

Friday, 13 January 2017

भीतर मिट्टी बाहर चूना , दिल्ली शहर नमूना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

ये अंदर की बात है , बाहर दिन का उजाला है भीतर अंधेरी रात है। इंसानियत का सूखा पड़ा है ये कैसी बरसात है। सत्ता के खेल में मोहरे हैं सब लोग , राजनेताओं की शह है कभी मात है। कमल उनका हाथ उनका उनका हाथी उनकी साईकिल उनकी हँसिया हथौड़ा और तारा है जनता को मिली सभी से पीठ पर उनकी लात है। कहने की नहीं है बस समझने की बात है। बाहर किसी को नहीं बतानी ये अंदर की बात है। ये हमारा समाज है जो अपने हर गुनाह को किसी गलीचे के नीचे दबा कर छुपा कर रखता है। कभी कोई खिड़की खुलती है और कोई तेज़ हवा या आंधी आती है जो सारे परदे हटा देती है बिछे कालीन उतार फैंकती है और सब नंगा दिखने लगता है। कमाल ये है तब भी हम तथाकथित सरकार प्रशासन और आला अधिकारी अपनी करतूतों पर शर्मसार नहीं होते इस बात पर कि हमारे भीतर कितना गंद भरा है , बल्कि हम सोचते हैं ये क्यों हुआ और फिर सच सामने नहीं आये इसका उपाय करते हैं। ये कहना कि जिसके साथ अन्याय हो उसको बाहर किसी को नहीं बताना चाहिए हमारे पास आकर रोना चाहिए। जब कि न पहले उनको किसी का दर्द समझ आया न आगे कभी दिखाई देना ही है। सरकार की सभी योजनाओं की हक़ीक़त यही है , दिल्ली शहर नमूना अंदर मिट्टी बाहर चूना। और ये कहावत आज की नहीं पुरानी है। महलों में युगों से अत्याचार ऐसे ही होते आये हैं , विरोध को दीवारों में ज़िंदा चुनवा दिया जाता है। आज भी शासक चाहते हैं अंदर की घुटन कोई बाहर नहीं आने दे , घुट घुट के मरना अनुशासन है। तानाशाही का मतलब यही होता है , अन्याय करने वाला ही इंसाफ भी करता है। फिर लोकतंत्र क्या है , सच बोलने की आज़ादी नहीं है तो सत्यमेव जयते को हटा दो जहां कहीं लिखा है।
             सवाल सर्फ सेना और सुरक्षाबलों का नहीं है। घर में बहु पर अत्याचार करने वाले भी यही चाहते हैं बहु खामोश ही रहे , परिवार की लाज के नाम पर गुलाम बनी रहे। इतना ही नहीं सभी संगठन यही चाहते हैं , उनकी असलियत किसी को पता नहीं चले। राजनीति तो है ही इसी का नाम , बाहर दिखाने को लोकतंत्र है , भीतर किसी की मनमानी या किसी की तानाशाही। कोई भी दल अपने आम कार्यकर्ता क्या विधायक सांसद तक को अपनी राय बताने की आज़ादी नहीं देता , व्हिप का चाबुक उनको भेड़ बकरी की तरह जिधर आदेश उधर चलने को मज़बूर करता है। और हम कहते हैं हम आज़ाद हैं , तो आज़ादी है क्या।  जनता की आज़ादी वहीं तक है जहां तक सरकार को कोई चुनौती नहीं दिखाई दे।
                   आपको तमाम योजनाओं की जानकारी दी जाती है , मेक इन इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया , रोज़ इक नया नाम। भीतर की बात अभी भी भीतर छुपी हुई है , गरीबी मिटानी तो है मगर कैसे , कुछ ऐसे कि गरीब मिट जायें मर जायें और उनका नामोनिशान तक नहीं रहे ताकि ये अभिशाप खत्म हो। न बचेगा कोई गरीब न बाकी रहेगी गरीबी। इस योजना पर काम जाने कब से चल रहा है , हालात बनाये जाते रहे हैं ताकि गरीब ज़िंदा ही नहीं रहे मर जायें सभी गरीब। ख़ुदकुशी का सामान खुद सरकार देती है सस्ते दाम पर , मौत सस्ती है ले लो , ज़िंदगी बहुत महंगी है उस पर अमीरों का नेताओं का अफसरों का धन्ना सेठों का हक है। सरकार की मज़बूरी है इस योजना को खुलेआम नहीं बता सकती। बस इतना ही करती है कि समस्या को हल ही नहीं करो , बनाये रखो उस सीमा तक जब लोग तंग आकर खुद ही मौत को चुन लें। किसी शायर का इक शेर है :--
                                   वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,
                                  तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवायें नहीं दीं।
सरकार ज़ालिम है पापी नहीं , आपका ईलाज नहीं करती मगर आपको ज़हर भी नहीं दे सकती।

Wednesday, 11 January 2017

( बेदाग़ लोग मत पढ़ें )***--- दाग़ मिटाने का शर्तिया उपाय ( हास्य कविता ) भाग तीन -- डॉ लोक सेतिया

परेशान क्यों होते हैं जनाब , बुरे नहीं होते सभी दाग़ ,
आप जैसे भी हैं सच्चे हैं , आप पर लगे दाग़ अच्छे हैं।
आप से पहले भी आये लोग , हमने सभी के मिटाये दाग़ ,
लोग कहते रहें उनको चोर , फैसला हमने किया कर गौर ,
झूठ अपराध का नहीं निशान , बस इसी से बढ़ गई थी शान ,
बरी जो हुआ वो नहीं गुनहगार , फिर से बन गई थी सरकार।
सुन जो आज इनकी भी बात , अदालत को नहीं भाया सबूत ,
आप मान लो नहीं ली घूस , हुई नहीं कभी ऐसी करतूत !
कल तलक यही कहते थे औरों को , घोटालों के हो गुनहगार ,
उन पर भी किसी अदालत ने अभी , दिया क्या कोई निर्णय सरकार।
चारा घोटाला , हवाला घोटाला या , चाहे कोई भी हुआ घोटाला ,
नहीं साबित हुआ आज तक किसी का अपराध सुनो रे लाला।
बस अदालत जब कहती नहीं हैं काफी सबूत जुर्म होने के ,
समझो दिन ख़ुशी के हैं अब नहीं आजकल दिन रोने के ,
बड़े बड़े वकील छोटी से बड़ी अदालत तक का लंबा सफर ,
डिटरजेंट बहुत मिल जाते हैं हर किसी के दाग़ धोने के।
जनता बेशक कभी किसी को आरोप मुक्त करती नहीं ,
सच ये है सज़ा किसी को भी मिलती अभी तक नहीं।
बातें बहुत मगर तुम्हें कहना नहीं कुछ सिवा शब्द तीन ,
अभी नहीं आया निर्णय , मुझे अदालत पर है पूरा यकीन।
सोचो अगर अभी तक जिन जिन घोटालों में नहीं हुआ फैसला ,
क्या यही समझ लिया जाये वो सब सच में नहीं हुआ।
जांच आयोग कितने खुद ही बिठाये नेताओं ने बार बार ,
खोदा पहाड़ कितना निकाली मरी चुहिया ही सरकार।

Monday, 9 January 2017

आपका आदेश है , हमारी आज़ादी नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    पिता कहते हैं मैं ऐसा चाहता हूं , बच्चों को मानना पड़ता है , अपनी मर्ज़ी नहीं चलती। मगर पिता की हर बात सही हो ये भी ज़रूरी नहीं , जब अनुचित बात माननी पड़ती है तभी एक हद के बाद विद्रोह होता ही है। पिता की समझदारी इसी में है कि उस हद तक मनमानी नहीं करे। सरकार चाहती है अब लोग अपना पैसा अपनी सहूलियत से नहीं खर्च करें , नकद खरीदारी नहीं कर कार्ड से या चेक से भुगतान करें। सरकार को काले धन को रोकना है मगर रोक काले धंधों पर नहीं लोगों पर लगाना चाहती है। नहीं समझे , कल थानेदार आपको आदेश दे घर में पैसा सोना या कीमती सामान नहीं रखो ताकि चोर चोरी नहीं कर सके। उसका सीधा मतलब यही है कि चोरों पर पुलिस का बस नहीं चलता इसलिए शरीफ लोगों पर ही हुक्म चलाते हैं , आपकी गलती है आप सभी रात को सो जाते हो। अगर कोई न कोई जागता होता तो खुद ही चोर को पकड़ लेते , भाई ये नया चौकीदार यही तो चाहता है "जागते रहो "। सोना मना है इस राज में , चैन से सोना तो गुनाह है। अब आप आज़ाद हैं मगर आपको आज़ादी उतनी ही मिलेगी जितनी सरकार चाहेगी। पैसा आपका है मगर आपको सप्ताह में कितना निकालना है ये आपकी मर्ज़ी क्या ज़रूरत पर भी निर्भर नहीं। आप आज़ाद हैं उसी तरह जैसे खूंटे से बंधा जानवर , उसकी रस्सी जितनी है उतनी दूर तक आजा सकता है। तो ये नया तरीका है जनता को खूंटे से बांध नेता लोग छुट्टे सांड की तरह घूमेंगे , उन पर कोई बंदिश नहीं। प्रशासन और सरकार जब जैसे सुविधा हो नियम बदल सकती है , आम नागरिक ही कुछ नहीं कर सकता अपनी सुविधा से। लोकतंत्र मैं और तानाशाही में अब कोई अंतर नहीं रहा , बस जो भी आदेश है आपकी भलाई में है। स्वीकार करना लाज़मी है।
                  कल ऐसा भी मुमकिन है सरकार का बयान आये वो चाहती है लोग शाम होते ही घर में बंद होकर खिड़की दरवाज़े बंद रखें अपनी सुरक्षा की खातिर। अर्थात वो जनता को सुरक्षा देने में नाकाम है। किसी भी अपराध को रोकने का ऐसा तरीका उचित नहीं है। आप अपनी नाकामी या कर्तव्य नहीं निभाने को इस तरह जनता पर अनुचित प्रतिबंध लगा सही नहीं साबित कर सकते। आपको भ्र्ष्टाचार रोकना है , अंकुश उन पर लगाना था जो घोटाले करते हैं , हर काम में रिश्वत खाते हैं , या जो अवैध धंधे करते हैं। आम नागरिक पर अनावश्यक रोक लगा आप अपनी हार मान रहे हैं कि बदमाशों को पकड़ना मुश्किल है तो शरिफ को ही समझाते हैं खुद बदमाश से बचकर रहो। यही आपका तरीका है पुलिस हवालदार वाला , जो सभ्य नागरिक को ही कहता है आप अपराधी के अपराध की बात किसी प्रशासन को मत बताओ। सच है , जिस देश में प्रधानमंत्री का दफ्तर ही ऐसा हो , जिसे कोई सत्येंद्र दुबे जैसा ईमानदार अफ्सर पत्र लिखे भ्र्ष्टाचार की सूचना देने को , और ये जानकारी भृष्ट लोगों तक पहुंच जाये और उसका कत्ल कर दिया जाये , उस देश में और क्या हो सकता है। चुप रहने में भलाई है , सच बोलना मौत को बुलावा देना है। मैंने भी खुद देखा है झेला है इसी शासन में। अंधेर नगरी चौपट राजा , सुना था अब देख भी लिया है।

Sunday, 8 January 2017

काठ की हांडी से लेकर हाथी के दांतों तक की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    अभी की बात है इक रियल्टी शो में कुछ लोगों को पहले चुना गया फिर जब उनमें से आधों को आगे शो में रखना था तब उन सभी को एक साथ बाहर कर दिया गया। जब लिया था तब उनको आम भाग लेने वालों से अधिक बेहतर बताया गया क्योंकि उन सभी में कोई न कोई शारीरिक कमी थी जिसके बावजूद उनकी पतिभा हारी नहीं उनका हौसला टूटा नहीं। कुछ बातें कैमरे पर की जाती हैं कुछ सच ऑफ दि रिकॉर्ड बताई जाती हैं , ऑफ दि रिकॉर्ड सच ये है कि उनको लिया ही इक मकसद से गया था। वो मकसद पूरा हो गया एक बार दर्शकों की वाहवाही लूट कर कि कितने संवेदनशील हैं जज करने वाले लोग। ये हर टीवी शो में कभी न कभी होता है , मगरमच्छ के आंसू बहा दिखलाते हैं। कौन बनेगा करोड़पति में भी यही दर्शाया जाता था कि वो कितने गरीबों की भलाई करते हैं। लोग तो करोड़पति नहीं बने आयोजक और प्रायोजक से संचालक तक अरबपति होते गये। नेता हमेशा से गरीबों की गरीबी दूर करने की बात करते आये हैं और खुद सत्ता पाकर मालामाल होते आये हैं। आज भी जो सत्ता में है उसकी सभाओं की भीड़ और शान मुफ्त की नहीं है , हर सभा करोड़ों रूपये खर्च कर आयोजित की जाती है। क्या उनके पास कोई पेड़ है जिस पर नोट बंदी के बावजूद भी नोट उगते ही हैं , जी हां उनको चंदा बेहिसाब मिलता है। मगर चंदा देने वाले गणित में कमज़ोर नहीं होते , सब हिसाब पहले गिना करते हैं।
                    तो अब ये चुनाव सत्ताधारी दल उस बात का ज़िक्र बिना किये लड़ना चाहते हैं , जिस बात से उनको जीत मिली थी , अच्छे दिन आने वाले हैं। अब बात होने लगी है गरीबों की गरीबी की , खुदा खैर करे , गरीब डरते हैं ये सुनकर। जब जब गरीबी की बात हुई गरीब और गरीब हुए हैं। बात दरअसल हाथी के दांतों की है , गरीबी की बात दिखाने वाले दांत हैं , खाने वाले हाथी के मुंह में छुपे रहते हैं। आज तक किसी दल के किसी नेता ने ऐसा कभी नहीं कहा कि उनकी सरकार बनी तो हर नागरिक को न्यूनतम इतनी आय देने को वो परिबद्ध होगी जिस से आम नागरिक की मूलभूत ज़रूरतें पूरी हो सकें। और जिसकी इतनी आय नहीं उसको हर महीने इतने पैसे सीधे मिलते रहेंगे ताकि लोग जीवनयापन कर सकें। संविधान में सभी को समानता का अधिकार है का इतना तो अर्थ है कि सब को दो वक़्त रोटी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा एक समान मिल सके अधिकार पूर्वक न कि सबसिडी की भीख जो केवल अपमानित करती है। मगर नेता जो खुद अपने लिये लाखों नहीं करोड़ों की सुविधायें चाहते हैं कि उनका हक है पाना , आम नागरिक को न्यूनतम भी देना ज़रूरी नहीं समझते। इनकी सारी सहानुभूति झूठी है मतलब की है , असल में ये सभी सफेद हाथी हैं जो चुप चाप देश का धन खुद अपने पर विलासिता पूर्वक रहन सहन पर उड़ाते हैं। इक बोझ हैं ये सभी , चाहे किसी भी दल के हैं।
             कभी धर्म की बात , कभी समान नागरिक सहिंता की बात , कभी किसी भी राज्य को विशेष दर्जा नहीं होने की बात , कौन करता था। सब छोड़ दिया तो इस बात को भी जीत कर निभायेंगे  कैसे यकीन करें , लगता है नेता इस बात का फायदा उठाते हैं कि हर बार कोई नई बात सुन लोग पुरानी को भूल जाते हैं। अर्थात ये किसी विचारधारा को नहीं मानते केवल अवसरवादी हैं। बार बार नया तमाशा दिखा जनता से खिलवाड़ करते हैं। कभी माना जाता था काठ की हांडी एक बार चढ़ती है। मगर यहां तो उनको हर बार काठ की हांडी चढ़ानी आती है। हर बार इक नई बात की नई हांडी बनाते हैं और चढ़ाते हैं। इस बार की हांडी पर रंग चढ़ाया हुआ है गरीबी दूर करने का। देखते हैं ये हांडी क्या पकाती है , इसी रंग की हांडी कभी पहले भी किसी ने सफलता पूर्वक चढ़ाई थी। गरीबी और गरीब दोनों आज तक पहले से भी बुरी हालत में हैं।

Tuesday, 3 January 2017

डरने की क्या बात है , जब पिया साथ है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    अरी पगली काहे को डरती हो , पिया चाहते हैं तुझे जब भरोसा है तो सज संवर लिया फिर धड़कन इतनी क्यों बढ़ी हुई है दिल काहे घबराता है। सखी समझाती है अब तो घड़ी है पिया आयेंगे बरात लेकर। मोदी जी और भाजपा जब आप जानते हैं आपने नोट बंदी जनता की भलाई के लिये की और देश से भ्र्ष्टाचार मिटाने को काला धन समाप्त करने को लिया ये कदम , इतना भी जानते जनता खुश है आपके साथ है फिर चुप किसलिए। जिन राज्यों में चुनाव हैं खुद कहें हमने पहली बार इतना सफल कार्य किया है। नये साल की पूर्व-संध्या को प्रधानमंत्री जी का संबोधन सुना सभी ने। कितने उपहार दिये उनहोंने हर नेता की तरह , किसे मिलते नहीं मिलते , कैसे मिलेंगे की फ़िक्र क्या। घोषणा करने से हमेशा सब होता रहा है , ये भी हो ही जायेगा , नहीं भी होगा तब भी आपको चुनाव जिता फायदा तो देगा ही। सभी नेताओं का ध्येय यही तो है , उसके बाद छाती ठोक कहना जनता ने सही समझा तभी जिताया है। बस चुनाव जीतो और जीत को प्रमाणपत्र बना लो अपनी हर बात का। बाकी दल यूं भी उलझे हुए हैं अपनी अपनी उलझनों में , आपका गणित खराब नहीं कर सकते। अब लोग आपकी सभाओं में भाषण ही सुन सकते हैं , सवाल तो नहीं कर सकते , तालियां बजा सकते हैं। कोई काले कपड़े तक पहन आपकी सभाओं में नहीं आ सकता आपकी सुरक्षा का ऐसा प्रबंध होता ही है , ताकि कोई काले झंडे नहीं दिखा सके विरोध प्रकट करने को। जब आपके लोकतंत्र में विरोध की आज़ादी ही नहीं तो किसकी मज़ाल है जो अपनी जान मुफ्त में गवाये। मर भी गये सौ लोग भीड़ में तो क्या हुआ , देश में आपके प्यारे सवासौ करोड़ बाकी तो हैं , हाज़िर हैं जनाब। आपका आदेश सर माथे।
               गर्भवती महिलाओं को पूरे छह हज़ार वो भी उस महिला के बैंक खाते में , सभी का खाता खुलवा दिया आपने। जिनका नहीं खुला वो जाने , मगर उन पैसों को निकाल सकती हैं ऐसी हालत में आज के हालात में गर्भवती महिलायें। बस पैसे हैं तो सब हो जाना है , हॉस्पिटल नहीं हैं दूर दूर तक , साफ पानी भी नहीं और आप इन पैसों से उनको जीवन देना चाहते हैं। प्रधानमंत्री हैं तो देश की दशा से वाकिफ ही होंगे क्या हाल है देश में स्वस्थ्य सेवाओं का , आपकी प्राथमिकता ही नहीं है। आप नेतओं के लिये स्वास्थ्य के लिए करोड़ों हैं और देश की जनता के लिये कितना कौन सोचता है , विश्व में हेल्थ पर सब से कम बजट देने वालों में हैं आपकी सरकार। आपकी सब से भली बात क्या थी भाषण में जानना चाहते हैं , सब को ईमानदार होने का पाठ पढ़ाने वाले कहते हैं राजनैतिक दलों से खुद अपने आप खुद को मुक्त करो जैसे पहले भी सभी दल ऐसा प्रयास करते रहे हैं। ये क्या था भद्दा मज़ाक गरीबों के साथ , अपने घर को छोड़ बाकी को साफ सफाई रखने को लताड़। पर आपका करिश्मा आपकी वाणी कितनी मधुर है , जनता मुग्ध है आप चिंता नहीं करें। जब पिया साथ तब डरने की क्या बात है , मुहावरा तो ठीक है , मगर पिया कौन हैं और डर किसको है यही समझना है !!
    ( बात अधूरी है , बाद में पूरी की जाएगी )

Tuesday, 27 December 2016

एक अवैध प्रेम पर प्रहार ( कानूनी भ्रष्टाचार की बात ) { तरकश } डॉ लोक सेतिया

       भ्र्ष्टाचार हंस रहा है , प्रहसन चल रहा है , उसकी पहचान तक नहीं अभी उनको जिनको इसका अंत करना है। चलो घुमा फिरा कर नहीं सीधे बात करते हैं , संविधान को तो मानते ही होंगे सभी दल के सब नेता। मज़बूरी है उसको मानने से इनकार करें तो चुनाव ही नहीं लड़ सकते। तो उसी संविधान में तय किया हुआ है किसका क्या कर्तव्य है क्या अधिकार। विधायिका , संसद - विधानसभा , का काम है नियम कानून बनाना और निगरानी रखना उनका पालन किया जा रहा है। बजट बनाना आपका काम है अधिकार भी , मगर इक और अंग है सरकार का जिसको कार्यपालिका कहते हैं , बजट के अनुसार पैसे को खर्च करना विधायक या सांसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता संविधान में। तीसरा भाग सरकार का है न्यायपालिका जिसका कर्तव्य है न्याय करना , और न्याय सभी को मिले , हर विभाग को हर राज्य को , हर आम को हर ख़ास को। आपने देखा ही होगा जब भी किसी को लगता उसके साथ अन्याय हुआ वो अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है। इक रिवायत सी है कहने की मुझे न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। जब कि सब चाहते हैं न्याय उसी के पक्ष में हो , मगर न्याय भी मुफ्त नहीं मिलता है। बहुत ही महंगा है अपने देश में न्याय भी , जैसे स्वास्थ्य सेवा में मुंह मांगी फीस लेते हैं डॉक्टर उसी तरह वकील ही नहीं न्याय व्यवस्था में जुड़े सभी अंग। इस से उस अदालत तक पीड़ित भटकता है अपराधी को अपराधी साबित करने में। क्या क्या ज़िक्र करें छोड़ो विषय की बात करते हैं।
           सभी जानते हैं श्री नरसिंहराव जी ने सांसद निधि की शुरुआत की थी जब उनको अल्पमत की सरकार चलानी थी , अंधे की रेवड़ियां बंटनी शुरू क्या हुई सभी कतार में खड़े हो गये। हर नेता को रास्ता मिल गया खुद अपने हाथ से खाने का , फिर हर राज्य में विधायकों को भी कल्याण राशि मिलने लगी। उसी कल्याण राशि से सभी दलों के चुने विधायक-सांसद अपना अपना कल्याण करते आये हैं। ये तथाकथित कल्याण राशि अपनों को ही बांटी जाती है अग्रिम कमीशन लेकर , इस राज़ से कौन वाकिफ नहीं है। संसद को भी संविधान की भावना के विरुद्ध कानून बनाने का अधिकार नहीं , मगर ऐसा किया गया बार बार , संसद में विधानसभाओं में। जाने क्यों जनहित याचिका दायर करने वालों को ये ज़रूरी नहीं लगा कि अदालत जाते और सवाल उठाते क्या सांसद विधायक खुद देश जनता का धन खर्च कर सकते हैं। नहीं जा सके क्योंकि इन भृष्ट नेताओं ने पहले ही बीच का रास्ता निकाल लिया था , दिखाया जाता है कि राशि सरकारी विभाग खर्च करता है , मगर करता कैसे जैसे विधायक या सांसद आदेश देता है। चलो आपको उद्दाहरण से समझाते हैं , मेरे शहर में पिछले विधायक जी ने शहर की गलियों में टाइलें लगवाईं। जो सड़क ठीक थी उसे भी तोड़कर फिर बनाया गया , बनवाई भी हरियाणा शहरी विकास परारधिकरण ने। मगर टाइलें खुद विधायक जी की फैक्टरी से ऊंचे दाम खरीद कर। लो बिठा लो जांच कोई साबित नहीं कर सकता भ्र्ष्टाचार हुआ। मुझे लगता है ये शाकाहारी तरीका है किसी को कष्ट नहीं होता और उनको खाने को सब मिल भी जाता है। क्या काला धन और भ्र्ष्टाचार बंद करने वाली सरकार में साहस है इसको बंद करने का।
               अभी बात शुरू हुई है , देश में आज तक का सब से बड़ा घोटाला सामने आना बाकी है , क्या है वो। सरकारी विज्ञापन जिन पर रोज़ करोड़ों रूपये बर्बाद होते हैं इन नेताओं के सरकारों के झूठे प्रचार के। मीडिया वाले कभी इसकी चर्चा नहीं करते क्यों ? क्योंकि जिस जनता के पैसे की बर्बादी से आपको हिस्सा मिलता हो उसको बुरा कैसे बतायें। सच वही अच्छा जो मुनाफा देता है , घाटे वाला सच झूठ है। इक झूठ और भी , गांव को गोद लेने पर ज़ोर देते हैं। सब से पहले गोद लेते हुए लगता है गांव अनाथ है उसको माई बाप मिल गये। कल टीवी चैनेल कितने बड़े बड़े नाम वालों की गोद ली औलाद की बदहाली दिखा रहे थे। वास्तव में हमारे सभी नेता पाषाण हृदय और संवेदनारहित हैं जिनको अपने सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। जनता की भलाई का आडंबर करते हैं छल कपट और वोटों की खातिर। कोई अंत नहीं इनकी अधर्मकथा का।  बस दुष्यंत जी की ग़ज़ल के कुछ शेर कहता हूं।
                    अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
                    घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार।
                   इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं
                  आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
                 रोज़ अख़बारों में पढ़कर ये ख्याल आया हमें
                 इस तरफ आती तो हम भी देखते फसले बहार।

Friday, 23 December 2016

विष्णुलोक का टीवी चैनेल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             अगर आपने अभी तक नहीं लगवाया तो जल्द लगवा लें। जी नहीं ये आपके डी टी एच के सेटटॉप बॉक्स की बात नहीं है। ये विष्णुलोक का टीवी चैनल है जो अभी अभी शुरू किया गया है , बल्कि ये कहना चाहिये कि भगवान को करना पड़ा है। भगवान हाइटेक तो पहले ही हो चुके हैं , हर मंदिर हर पूजा स्थल पर सीसीटीवी कैमरे पहले ही लगवा चुके हैं , मगर नये हालात को देखते हुए इक कदम और आगे बढ़ाया है।
( सीसीटीवी कैमरे की बात विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो "शुभतारिका पत्रिका " के हरियाणा अंक में पढ़ें )
                नारद जी को आप पहचानते ही हैं , भगवान के विश्वस्त खबरी हैं और लोग चाहे उनको बदनाम करते हों इधर की उधर , उधर की इधर बात पहुंचाने का आरोप लगाकर , उनका काम ही मीडिया की तरह है। नारद जी आये हुए हैं भारतभूमि से विष्णुलोक टीवी का सीधा प्रसारण पहुंचाने को पूर्ण तथ्य सहित। इसको आप कोई धार्मिक चैनेल समझने की भूल नहीं करें। इस पर कोई धनलक्ष्मी यंत्र नहीं बेचा जायेगा न ही कोई भविष्यफल रोज़ का सप्ताह का वर्ष का राशियों के अनुसार बताया ही जायेगा। आपको कोई प्रवचन भी नहीं सुनाया जायेगा न ही किसी गुरु की दुकानदारी का हिस्सा विष्णुलोक का चैनेल बनेगा। फिर क्या करेगा ये नया चैनेल , आपने ठीक सवाल किया है। अभी तक बहुत चैनेल आपको बहुत कुछ दिखाने का काम करते आये हैं , ये चैनल भगवान बारे आपको नहीं आपके बारे भगवान को सही और सटीक जानकारी भेजने का काम करेगा। बिना कोई शुभ महूर्त निकले इसको शुरू किया गया है तो शुभः लाभ लिखने का प्रश्न ही नहीं उठता। कोई हवन नहीं कोई यज्ञ नहीं कोई लाल फीता नहीं काटा गया , सीधे काम शुरू। शास्त्रों में साफ़ लिखा है शुभ कार्य में विलंब नहीं करना चाहिए , पापकर्म करने से पहले विचार करना चाहिए , करें या नहीं करें।
                      टीवी कैमरा नज़र नहीं आता , नारद जी टीवी स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। अभिवादन नमस्कार सभी एक सौ पचीस करोड़ भारतवासियों का भी और छतीस करोड़ देवी देवताओं का भी , नारद जी बोलते हैं अपनी जानी पहचानी मुस्कुराहट के साथ। आज विष्णु जी टीवी चैनल से बेतार द्वारा , इंटरनेट कहते जिसको , जुड़ चुके हैं और मैं नारदमुनि उनको यहां का हाल चाल बताता हूं , दिखलाता हूं। कैमरा भीड़ ही भीड़ दिखाता है तो भगवन पूछते हैं ये कैसी भीड़ है , क्या यहां कोई मंदिर है जहां प्रसाद बंट रहा है। जी नहीं प्रभु ये देश की जनता है जो बैंकों के सामने खड़ी है कतार में अपने खुद के जमा किये पैसे निकलवाने की जद्दोजहद में अपनी जान जोखिम में डालती। प्रभु हैरान होकर पूछते भला ऐसा क्यों। नारद जी बताते हैं भगवन आपने खुद भी देखा अपने मंदिरों का हाल , लोग जाकर माथा टेकते और दानपेटी में पैसे डालते हैं। कोई नहीं पूछता ये कैसा धन है मेहनत से कमाया हुआ अथवा चोरी लूट से जमा किया हुआ। गंगा नदी में गंदा नाला भी मिलता है तब भी गंगा पवित्र ही रहती है , उसी तरह राजनीतिक दलों को मिला चंदा और आपके नाम से चढ़ाया सारा धन भी पावन ही नहीं बताया जाता , ऐसा भी घोषित किया जाता है कि जितना दो और अधिक बढ़कर मिलना है। लोग दल को चंदा और भगवान के दर पे चढ़ावा इसी उद्देश्य से देते हैं। इन दोनों को दिया धन वापस कोई नहीं मांग सकता , कोई भूखा कभी मज़बूर होकर दानपेटी से पैसे निकाल ले तो पापी अधर्मी कहलाता है। अब उस धन दौलत पर संचालकों का अधिकार है वो जैसे भी चाहते उपयोग करते हैं।
                         नारद जी बोले प्रभु अभी समाचार देख लो चुप चाप  , उसके बाद चर्चा को बहुत समय होगा। हमने कोई विज्ञापन तो दिखाने नहीं हैं। असली काम की बात करनी है और आपको असलियत दिखानी है। प्रभु हुआ ये कि इक दल को पूर्ण बहुमत से जनता ने जिताया ताकि देश की जनता को उस द्वारा दिखाये अच्छे दिन हासिल हो सकें। मगर क्या यही वो अच्छे दिन हैं कोई नहीं जानता , लोग तो बदहाल हैं। आप ही बताओ आम आदमी क्या करे , आपके पंडित जी के बताये उपाय करता रहे आपका नाम जपता रहे या कोई नौकरी काम धंधा करे अपना पेट पालने को। भूखे भजन न होय गोपाला। अब सरकार कहती है सहयोग करो मगर कब तक , तब तक क्या भूखे मरें , सरकार तब तक देती जनता को सभी खुद तो बात थी। देना नहीं जानती देश की सरकार भी आपकी ही तरह , माफ़ करना प्रभु यहां जितना बेईमानी का काला धन है सब से अधिक आप ही के नाम जमा है तमाम धर्मों के नाम पर या इन्हीं दलों के पास। खुद को छोड़ सभी की तलाशी ली जबकि चोरी की माला पहनी अपनी गले में हुई है। प्रभु जो आपने अभी सोचा , मुझे पता चला , धर्म की बात पूछते हो आप। देखो प्रधानमंत्री जी कैसे उपहास करते हैं विपक्ष का मज़ाक नहीं है ये जीत का अहंकार है जिस ने उनको मर्यादा तक को भुलवा दिया है। हार जीत होती रही है , जीत कर  विनम्र होना साहस का कार्य और अहंकारी होना कमज़ोरी होती है। मगर इस नेता को लगा कि किसी मंदिर में करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी दान में देकर उसने भगवान को खुश कर लिया है , जबकि वो लकड़ी भी जनता के धन की थी उसकी अपनी कमाई की नहीं।  आप जानते हैं जो नेता मेरे गरीब भाईयो की रट लगाता है उसको देश की आधी आबादी जो गरीब ही नहीं दलित और शोषित भी है से कोई सरोकार नहीं है। प्रभु को समझ नहीं आ रहा ये कैसी सरकार है जिसको इतना भी पता नहीं है कि किसान खेत में हल चलाये बीज बोये फसल की रखवाली करे या फिर बैंक की कतार में खड़ा रहे। नारद जी बता रहे हैं सरकार का विभाग मानता है वही फसल बिजवाता है और उसी के आंकड़ों से देश की जनता का पेट भरता है। सत्ता मिलते ही सभी नेता खुद को भगवान समझने लगते हैं और जनता को सोचते हैं जुमलों से बहला सकते हैं।
                        नारद जी ने अलग अलग क्षेत्रों की तमाम तस्वीरें प्रभु को दिखाकर बताया ये असली भारत की तस्वीर है। नंगे बदन बच्चे महिलाएं , भूख और बिमारी से हारे हुए निराश लोग जो जीते हैं मगर ज़िंदा लगते नहीं , उनको घर की छत तो क्या पीने को पानी भी साफ नहीं मिलता। शिक्षा की दशा इस कदर खराब है कि शिक्षा का अधिकार उपहास बनकर रह गया है। देश की आधी आबादी साठ करोड़ लोग किसी भी दल के किसी भी नेता के लिये मात्र वोट हैं जिनकी ज़रूरत पांच साल बाद पड़ती है। उन बदनसीब लोगों का दर्द उनको भला कैसे समझ आयेगा जो शहंशाहों की तरह रहते हैं। चलो आपको ये भी दिखला देते हैं। कैमरा लुटियन ज़ोन को दिखाता है जिस को देख आंखे चुंधिया जाती हैं। ये राष्ट्रपति भवन है जो शायद सौ एकड़ से अधिक जगह पर बना है गरीब देश के राष्ट्रपति का निवास। जब यहां सैंकड़ों कमरों में राजसी शानो-शौकत से रहने वाला कोई गरीबी की बात करता है तो समझ नहीं आता उस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की जाये , हंसा जाये कि रोया जाये। इस इक महल की देख रेख पर हर महीने करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं , अर्थात लाखों रूपये हर दिन। इसी देश की इक तिहाई आबादी की आय प्रतिदिन पचास रूपये भी नहीं है। इसका मतलब ये है कि एक आदमी के रहन सहन पर जितना धन खर्च होता है उसी से कितने लाख भूखे अपना पेट भर सकते हैं। दूसरे शब्दों में ये कुछ लोग खुद पर जितना धन जनता के पैसे का खर्च करते हैं वही अगर गरीब लोगों को दिया जाता तो आज देश में गरीबी का नामो-निशान नहीं होता। गरीबों का हितैषी होने का दावा करने वाले दरअसल उनकी गरीबी की वजह खुद हैं। इस लुटियन ज़ोन में ढाई ढाई एकड़ में इक इक बंगला बना है , जब किसी गरीब को घर देने की बात की जाती है तो पचास गज़ ज़मीन भी ज़्यादा लगती है। संविधान में सभी को समानता का अधिकार क्या इसी को कहते हैं।
                                 जो लोग अनपढ़ हैं अपने अधिकार की बात नहीं जानते उनको क्या कहें जब जो शिक्षित हैं सुविधा संपन्न हैं वो भी किसी दल किसी नेता की जय-जयकार किया करते हैं अपना स्वाभिमान भुला कर। गुलामी तमाम लोगों की मानसिकता बन गई है , हर किसी को भगवान बताने में कोई संकोच नहीं करता। कोई पूछे उनसे आप जिनको भगवान मानते हैं उन्होंने देश को दिया क्या है। हर दिन इनकी सभाओं को आयोजित करने पर ही कितना धन बर्बाद किया जाता है , कोई हिसाब नहीं बताता कैसे। सब से ज़रूरी बात , इस देश को माना जाता है धार्मिक लोग हैं , जबकि यहां अधर्म ही अधर्म दिखाई देता है। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाकर माथा टेकने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता , धार्मिक होते जो लोग वो अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं समाज को देश को लूट नहीं सकते। इस देश में न्याय की निष्पक्षता की कर्तव्य निभाने की आशा तक करना खुद को धोखे में रखना है। झूठ यहां का भगवान है और लूट यहां की नीति , धर्म की तो परिभाषा तक कोई नहीं जनता यहां। प्रभु ठीक से देख लो और समझ लो आप अगर भगवान हैं तो किन लोगों के भगवान हैं। इधर तो भगवान भी सभी लोग बदलते रहते हैं , सभी ने अपने अपने खुदा तराश लिये हैं जो उनको पाक साफ़ हैं का प्रमाणपत्र ही नहीं देते , मरने के स्वर्ग का आरक्षण भी देने की बात करते हैं।
               अभी का हाल इतना है , प्रभु को भी विश्राम करना होगा , शुभ -रात्रि।

Wednesday, 21 December 2016

पसीना गुलाब था ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                 अब इत्र भी लगाते हैं तो खुशबू नहीं आती
                                इक वक़्त था जब अपना पसीना गुलाब था।
शायर से माफ़ी चाहता हूं उनका नाम भूल गया और दूसरी बार माफ़ी मांगता हूं अगर शेर ठीक नहीं लिखा हो कोई शब्द इधर उधर हो गया हो। मैं खुद शायर हूं इसलिए इस बात का महत्व जानता हूं नहीं तो आजकल  लोग शब्द को ही इधर उधर नहीं करते , खुद भी इधर उधर हो जाते हैं और शायरी का ऐसा बुरा हाल करते हैं कि पूछो मत। लोग ऐसी बेहूदा शायरी पर तालियां बजाते हैं वाह वाह करते हैं। किसी का दर्द उपहास बन जाता है कॉमेडी शो में और कोई उसी से अपना धंधा चला धन कमाता है। इक क्लास है इलीट क्लास इंडिया वालों की जिन को देश की हर बात की समझ है और जिनका ध्येय है ज़िंदगी का मज़ा लूटना। ऐसे बड़े बड़े लोग नीरो से कम नहीं होते देश जलता रहे वो चैन की बंसी बजाते रहते हैं। मुझे क्या कौन कब कैसे किधर से किधर जाता किधर से भटकता हुआ कहां जा पहुंचा। अपने हंसाने वाले जुमलों से हर समस्या का हल बताने वाले अपनी मंज़िल ढूंढ लिया करते हैं। पंजाबी में कहावत भी है जिथे मिलण चोपड़ियां उथे लाईयां धरोकड़ियां। जहां से चुपड़ी मिले वहीं चले जाते हैं , मगर इक विरोधभास लगता है , आप जिधर से निकले थे अपनी ख़ुशी से वहां तो चुपड़ी भी मिलती थी मक्खन भी साथ मिलता था। आपको हज़म नहीं हुआ या आपकी भूख ही ज़्यादा है।
                 अभी तक आप जो समझे वो बात नहीं है , यहां किसी व्यक्ति विशेष की बात थी ही नहीं। वो तो शायरी की बात चली तो उनका ज़िक्र भी करना पड़ा जो शायरी नहीं जानते समझते फिर भी मशहूर हैं शायरी के कारण। अब बात सीधे उनकी करते हैं जिन पर रचना का शीर्षक है पसीना गुलाब था। आप फिर भटक जाते हैं सोचने लगे किसी हसीना की बात होगी , किसी हसीना को देखा है पसीना बहाते। पसीना मेहनतकश लोग मज़दूर गरीब बेघर लोग बहाते हैं धूप में , जिनका कभी शान से ज़िक्र किया जाता था। गुरु नानक को उसी की रोटी में दूध मिला था बाकी सभी अमीर लोगों की रोटी से खून की धारा बही थी। आज बातें होती हैं काले सफेद धन की हक की हलाल की मेहनत की कमाई की कोई नहीं करता। सोचा था इक गरीब बड़े ओहदे पर पहुंचा तो बात होगी गरीबी की रेखा की भूख की बेबसी की लाचारी की। कितने साल तक उन्हीं की बात की बदौलत सरकार बनती रही है , क्या अब इक चाय वाले को सब कुछ मिलने से सारे गरीब खुशहाल हो गये हैं। क्यों चाय वाले ने गरीबी की बात छोड़ अमीरी की चर्चा शुरू करवा दी , इस सवाल का जवाब भी है। हमें उतनी ख़ुशी अपने फायदे से नहीं होती जितनी दूसरे का नुकसान देखने से होती है। तभी सत्ता पाते जब आधा समय बीत गया और गरीबों को अच्छे दिन नहीं दिखा सके तो सोचा अमीरों को ही बुरे दिन दिखा देते हैं। अमीरों की खराब हालत देख गरीब खुश हो जायेंगे कि भगवान का शुक्र है हम पैसे वाले नहीं हैं। तभी फैसला करते ही भाषण देने लगे देखो करोड़पति लोगों को कतार में खड़ा करवा दिया मैंने। मगर करोड़पति घर बैठे उनका भाषण सुन हंसते रहे , वाह हमारी बिल्ली हमें ही मियाउं। चुनाव क्या मेहनत की कमाई से लड़ा था , चलो अगर ठान ही लिया था तो शुरुआत अपने घर से करते। सभी राजनीतिक दलों का धन काला धन नहीं है , आपकी सभाओं पर , अकेले इक नेता की नहीं सभी नेताओं की , कितना धन खर्च होता है सब पवित्र है। सब से अपवित्र कौन सा दल है जिस में सब से अधिक अपराधी सांसद हैं , अपने घर की सारी गंदगी कालीन के नीचे छुपा आप स्वच्छता अभियान चलाते हैं। देश के साठ प्रतिशत गांव में साफ पानी नहीं और आप शौचालय की बात ही नहीं करते ,  गरीबों को गुनहगार साबित कर अपमानित करते हैं। कहते हैं सभी दल एकमत हों तभी चंदे  की बात पर भी फैसला हो सकता है , सभी  गुनाहगार तौबा करें तभी हम भी छोड़ देंगे चंदा नकद लेना। लो जी कितने लोकतांत्रिक हैं प्रधानमंत्री जी बिना सभी दलों की सहमति कुछ नहीं करना चाहते। इसी को चोर चोर का भाईचारा कहते हैं।
                         हिसाब तो आपको देना था , आपने सत्ता मिलते ही हर महीने हिसाब देने की बात की थी। अपने जिस लोकतंत्र के मंदिर की चौखट पर माथा टेका था आज उसी में जाना आपको गवारा नहीं। कोई लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित प्रधानमंत्री भाषण देता है मुझे सदन में बात नहीं रखने देते इसलिये मैंने जनसभा में अपनी बात कहने का विकल्प चुना है। इतना बहुमत इतनी ताकत इतना चौड़ा सीना और ऐसी कायरता की बात , मुझे जान से मरवा सकते हैं , कहते हैं। आप को इतनी सुरक्षा में अपनी जान की चिंता तो हम आम नागरिक किस पर भरोसा करें। मगर आपको जनता को भटकाना था , गरीबी की भूख की , शिक्षा की बदहाली और स्वास्थ्य सेवाओं की रोगग्रस्त होने की समस्याओं की बातों से पीछा छुड़ाना था। इक टकराव अमीर गरीब का करवा उस पर अपनी राजनीति करनी थी। क्या सफल हुई आपकी योजना , नहीं। आपने इक नया इतिहास रचा है , इक प्रधानमंत्री का बार बार यू टर्न लेने का।  शुरुआत की इक घोषणा से की कि अब कभी काले धन वालों को दोबारा अवसर नहीं दिया जायेगा और बीस दिन , केवल बीस दिन बाद इक नई स्कीम पचास प्रतिशत की। आपकी दोनों बातें इक दूसरे से उल्ट फिर भी सच , आपको अभी भी उपाधि मिल रही खुद अपने दल से ठीक उसी तरह जैसे पूर्व प्रधानमंत्री को मिली ईमानदार हैं की उपाधि। आपको शायद समझ नहीं आ रहा क्या किया और हुआ क्या , चलो आपकी दुविधा मिटाते हैं।
                         बिल्ली शेर की नानी है , आपने भी सुना होगा। कहते हैं बिल्ली ने ही शेर को शिकार करना सिखाया था , जब सीख गया तो जानते हैं क्या हुआ। इक कहावत ये भी है :-
                     बिल्ली ने शेर पढ़ाया , शेर बिल्ली नूं खावण आया।
यही हुआ आपको जिन्होंने चुनाव जिताया आप उन्हीं को बर्बाद करने चले , स्विस बैंक पर बस नहीं चला तो देश में काला धन खोजने चले। बिल्ली को जब शेर खाने को झपटा था तो वो कूद कर पेड़ पर जा चढ़ी थी , शेर बोला मौसी आपने मुझे ये सबक तो सिखाया ही नहीं। बिल्ली बोली इसी लिये कि किसी दिन मुझे ही नहीं खा जाओ। काले धन वाले आपकी पकड़ से बच गये और पेड़ पर बैठ कह रहे तू डाल - डाल  मैं पात-पात। देखा फिर वही हुआ जिनकी बात की जानी थी , गरीबों की उनकी छूट गई और बड़े चोर छोटे चोर की बात पर अटक गये हम। उधर टीवी पर वही बहस जारी है , तू तू मैं मैं। क्या राजनीति है कैसी पत्रकारिता है। कभी खबर हुआ करती थी गरीबी और बदहाली की आजकल लाखों करोड़ों की बातें सुन लगता है सब जैसा भी है बढ़िया है , भूख गरीबी और देश की गंदगी , आवारा बचपन , भटकी जवानी की बात तो बंद हुई। मुबारिक हो , आप कौन सा डिओ लगाते हैं , किस ब्रांड के कपड़े डालते हैं। देश की असली समस्या आजकल यही है।

Sunday, 18 December 2016

आंसूओं से लिखी दर्द की दास्तां ( देश की दुर्दशा की बात ) डॉ लोक सेतिया

आज जो लिखना है उसको कोई कलम किसी स्याही से लिख नहीं सकती , और पढ़कर जिसकी पलकें भीग नहीं जायें उसको समझ भी नहीं आ सकती ये बात। इक घना अंधेरा छाया हुआ लगता है चरों तरफ पर उसी को बताया जा रहा है यही भौर की रौशनी है। कितने साल हो गये लिखते लिखते अब ज़िक्र भी करने से कुछ भी हासिल नहीं है। शायद ही कभी किसी ने कल्पना की होगी कि इस देश की पूरी व्यवस्था इस कदर रसातल तक नीचे गिर सकती है।
      " इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार। "
सच चालीस साल पहले ये कल्पना शायद दुष्यंत कुमार ही कर सकते थे। अपने समाज के दर्द को इस शिद्दत से कितनों ने महसूस किया है। आज देखो तो हर कोई बातें करता है राजनीति की समाज की धर्म की परंपरा की इतिहास की बदलाव की विचारधारा की आज़ादी की मानवता की साक्षरता की पर्यावरण की महिला अधिकारों की और देश की न्याय व्यवस्था की ही नहीं संविधान की भी। मगर वास्तविक जीवन में सभी की कथनी और करनी में अंतर ही नहीं विरोधाभास साफ दिखाई देता है। बातें सत्यमेव जयते की कर सच को खुले आम सरे-राह कत्ल किया जाता है प्रतिदिन पग पग पर। सत्य पराजित नहीं होता की बात आज सब से बड़ा झूठ है। सच ये है सच अपमानित होता है कलंकित किया जाता है और उसको इस तरह कत्ल किया जाता है कि कोई समझ नहीं पाता उसमें अभी जान बाकी है अथवा वो मर चुका है। सत्तर साल से हर सरकार और हर राज्य का शहर का गांव का प्रशासन सच को विवश करता रहा है कि सच ख़ुदकुशी कर ले। सच ज़िंदा है या मर चुका है कोई नहीं जानता , वो तो बिल्कुल भी नहीं जो सच ही का कारोबार करते हैं। उनकी दुकानों पर झूठ महंगे दाम बिकता है सच का लेबल लगाने के बाद।
                              अभी अभी की बात करें तो देश की सरकार नहीं इक नेता ने दावा किया है कि वो देश को अपराध भ्र्ष्टाचार और अभी तक चलती रही लूट से निजात दिलवा कर रहेगा। सभी चाहते हैं ऐसा हो , मगर कैसे हो कोई नहीं समझ पा रहा। इक बड़ा कदम लिया गया नोट बंदी का जो लगता है सफल नहीं हुआ या नहीं होने वाला , क्योंकि जब कोई ऐसा बदलाव करना चाहता है तो उसकी निष्ठा उस काम में पूर्ण होनी चाहिए। खेद है उसका आभाव साफ दिखाई दे रहा है , जिस दिन सवा सौ करोड़ जनता का प्रधानमंत्री ऐलान करता है कि बस बहुत हो चुका अब भविष्य में काला धन वालों को कोई अवसर नहीं दिया जायेगा , उसी से बीस ही दिन बाद इक और नई योजना घोषित की जाती है , पचास प्रतिशत जुर्माना भर काली कमाई को सफेद करने की। उसी दिन साफ हो गया था उनको मूल्यों से नैतिकता से लूट से मतलब नहीं है , उनको दो शिकार करने है एक तीर से। खुद के लिये गिरती या दिन पर दिन कम होती लोकप्रियता को ऊंचा करना और हर सत्ताधारी की तरह अधिक से अधिक पैसा ख़ज़ाने में लाना। कल आप नियम कानून ही बना दो चोर की चोरी माफ़ होगी अगर चोरी का आधा माल सरकार को दे दे। यही तो किया जा रहा है , जब तक लूट के दोषियों को सज़ा की जगह ऐसे ईनाम मिलता रहेगा लूट जारी रहेगी। अब लगता है उनको उचित अनुचित से कोई सरोकार नहीं है , गलत होने को रोकना उनका ध्येय नहीं गल्ती से फायदा उठाने की उनकी मंशा है या योजना का मकसद है। चालीस दिन बाद पता चल ही गया आपके प्रशासन का क्या हाल है बैंक तक शामिल हैं काले को सफेद करने में। किस किस को दोष दें , कोई भी दल तो बेदाग़ नहीं है , सभी के घर शीशे के हैं। संसद नहीं चलना ही गलत नहीं है , कोई प्रधानमंत्री जब कहता है मुझे संसद में बोलने नहीं दिया जाता तो मैंने जनसभा में बोलने का विकल्प चुन लिया है। तब इक खतरा दिखता है संसदीय लोकतंत्र को , शायद आप भूल गये अपने स्वार्थ में कि कोई शपथ ली थी आपने संविधान की रक्षा की। जब इक सदन का नेता पलायन करता है सदन से भागता है तो ये किसी एक व्यक्ति अथवा दल की बात नहीं रहती है। आप देश को इक अंधी सुरंग में धकेल रहे हैं जिस के पार का सिरा क्या है आपको भी नहीं मालूम। सब बाकी बातों को दरकिनार करते हैं और इक महत्वपूर्ण सवाल की बात करते हैं। देश का प्रधानमंत्री भरी सभा में अपनी जान को खतरा बताता है तो बात चिंता की है।
                       इस पहरे को छोड़ ऊपर की बात जारी करते हैं। आम आदमी की बात जब कोई प्रशासन कोई सरकार कोई संस्था नहीं सुने तब उसके पास क्या विकल्प है। नेताओं की तरह करोड़ों खर्च कर जनता को अपनी बात तो नहीं बता सकता न ही भाग सकता है कहीं इक जगह से दूसरी जगह। प्रधानमंत्री जी की हो या किसी मुख्यमंत्री जी की सभा , इक नया चलन देखा है , खबरों में सामने आया है कि प्रशासन निगाह रखता है कोई सभा में विरोध प्रकट ही नहीं कर सके। अर्थात जितने भी लोग हों सभी हाथ जोड़ने वाले हों , हाथ से तालियां बजाने वाले हों , सर उठाने वाला कोई भी नहीं हो। मेरे शहर में मुख्यमंत्री जी की सभा हुए तो जो काले रंग की जैकेट डाले थे उनसे उतरवा ली गई , काली जुराबें भी उतरवा ली गई , जो काले रंग के कपड़े पहने थे उनको प्रवेश नहीं करने दिया। क्या वो लोग काला धन वालों से अधिक खतरनाक थे , जिनको आज भी आप गले लगाना चाहते हैं अवसर पर अवसर देकर। और दावा किया जाता है लोकप्रिय होने का , जब आप लोकप्रिय हैं जनता खुश है तो काले रंग की या विरोध की चिंता क्यों। वास्तव में आज़ादी के बाद से कोई भी प्रशासन नहीं चाहता जनता का सीधा संवाद सत्ताधारी नेतओं से बड़े अधिकारियों से हो। क्योंकि इस से उनकी असलियत सामने आती है कि जो भी वो कागजों पर बताते हैं किया गया , हुआ होता ही नहीं। मगर हर नये सत्ताधारी की कमज़ोरी रही है कि उसने नौकरशाही पर कभी अंकुश नहीं लगाया ताकि जैसे पहले लोग उनका दुरूपयोग करते रहे हम भी करते रहें। रसोई का हर बर्तन साफ किया साग सब्ज़ी भी ताज़ी लाये दूध भी बासी नहीं फिर भी सब बना बनाया बिगड़ जाता है , कड़छी तो वही है उसको साफ करने का हौसला ही नहीं किया किसी ने। हम समझते हैं नेता शासन की बागडोर संभाले हैं जब कि सरकार को चलाते ही नहीं अपनी उंगलियों पे नचाते भी हैं अधिकारी बाबू से चपरासी तक। जब ऐसा हाल है तो सच बोलना अपराध ही है , देश के प्रधानमंत्री की जान को जब खतरा हो सकता है देश को काले धन के विरोध के कारण तो कोई आम नागरिक कैसे सुरक्षित हो सकता है किसी गैर कानूनी काम करने वालों के बारे सच बोल कर। शरीफ आम नगरिक को डरे सहमें जीना है और इसी को आज़ादी और लोकतंत्र मानना है। भारत माता कितनी बेबस है उसके आंसू कौन देखता है , कोई पौंछना भी चाहता है , किसे समझ आएगी उसकी दास्तां।

Friday, 16 December 2016

सावधान ! गोरे या गोरियां मत पढ़ना ( काला शाह काला - हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

चलो शुरू करते हैं बात , सबसे पहले यही बताना चाहता हूं कि मामला काले धन का हर्गिज़ नहीं है , बात काले रंग की ही है। इक पंजाबी लोकगीत है , काला शाह काला , नी मेरा काला ऐ सरदार , गोरियां नू दफा करो।
गायिका कहती है मेरा सरदार ( मेरा पति ) काला है बहुत ही काले रंग वाला है , मुझे यही पसंद है , जिनका गोरा रंग है उनको परे करो मुझे नहीं पसंद गोरा रंग। स्कूल में इक सहपाठी जो बहुत ही गोरे रंग का था , आज भी है बेहद गोरा और सुंदर , उसका नाम माता पिता ने काला रख दिया था घर का प्यार का नाम। कहते हैं इस से नज़र नहीं लगती , बच्चों को काले रंग का टीका भी तभी लगाया जाता है। गोरी महिलाएं काजल यही समझ लगती हैं कि कजरारी काली काली आंखें उनके गोरे रंग को और निखार देती हैं। काला रंग कुछ लोगों को बेहद पसंद होता है , मेरी श्रीमती जी के भाई को भी पसंद है और विवाह के समय उसने इक साड़ी काले रंग की भी खरीद ली थी। मगर मेरी ताई जी को पता चला तो उन्होंने साफ बोल दिया था काले रंग का कोई कपड़ा नहीं देना हमारी बहु को। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा था उस बात से , मगर ताई जी को पता नहीं था कि मैंने अपनी बहन जी के साथ इक बेहद कीमती कपड़ा मैक्सी बनवाने को लिया था जिस का रंग भी काला था मगर उस पर कई रंग के गोल गोल रंग बिरंगे डॉट्स थे जो सभी को अच्छे लगे थे।
                   काले रंग में जाने क्या बात है जो नेता लोग इस से डरते हैं। मुख्यमंत्री जी की जनसभा थी और अगले दिन खबरों में इक महत्वपूर्ण खबर इस को लेकर थी कि सुरक्षा कर्मियों ने उनको भीतर ही जाने दिया जो काले रंग के कपड़े पहने थे। जिनको जैकेट काली थी या जुराबें काली वो उतरवा कर रख ली थी। क्या काला रंग सुरक्षा के लिये खतरा है , जी नहीं उस से भी अधिक बड़ी बात है। प्रशासन नहीं चाहता था कोई मुख्यमंत्री जी को विरोध दिखाने को काले कपड़े का उपयोग करे। मुझे तो ये मालूम नहीं काली पट्टी या काले झंडे दिखाने की विरोध की परंपरा किस ने कब और क्यों शुरू की , मगर मुझे इस शांतिप्रिय विरोध में कोई खतरे की बात नहीं लगती है। एक तरफ आप जनता को भाषण देते हैं सरकार के किसी अंग से घूस की शिकायत हो तो निसंकोच बताने की बात और दूसरी तरफ कोई आपकी नापसंद की बात कहने वाला सभा ने दाखिल तक नहीं हो पाये ऐसी व्यवस्था करते हैं। जब दावा है लोग बेहद खुश हैं आपसे तो फिर डर किस बात का।  कोई बता रहा था मुख्यमंत्री जी भगवान हैं बिना मांगपत्र समझते हैं क्या देना है। भाई वाह आपने तो चाटुकारिता को और ऊंचे आकाश पर पहुंचा दिया , ईनाम का हक तो बनता है।
                                   चलो काले रंग और कालिख के डर की बात को किनारे कर पहले यही चरचा करते हैं , कौन दाता है कौन भिक्षुक। क्या जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि जनता का धन जनता पर ही खर्च करता है तो दानवीर है दाता है भगवान है। ज़रा गहराई से समझते हैं इतिहास में मिसाल मिलती हैं कुछ तो। इक दोहा इक कवि का सवाल करता है और इक दूसरा दोहा उस सवाल का जवाब देता है। पहला दोहा गंगभाट नाम के कवि का जो रहीम जी जो इक नवाब थे और हर आने वाले ज़रूरतमंद की मदद किया करते थे से उन्होंने पूछा था :
                                                  सीखियो कहां नवाब जू ऐसी देनी दैन
                                                  ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें त्यों त्यों नीचो नैन।
अर्थात नवाब जी ऐसा क्यों है आपने ये तरीका कहां से सीखा है कि जब जब आप किसी को कुछ सहायता देने को हाथ ऊपर करते हैं आपकी आंखें झुकी हुई रहती हैं। रहीम जी ने जवाब दिया था अपने दोहे में :
                                              देनहार कोउ और है देत रहत दिन रैन
                                              लोग भरम मो पे करें या ते नीचे नैन।
अर्थात देने वाला तो कोई और है ईश्वर है जिसने मुझे समर्थ बनाया इक माध्यम की तरह , दाता तो वही है पर लोग समझते कि मैं दे रहा तभी मेरे नयन झुके रहते हैं। आज तक किसी नेता ने देश या जनता को दिया कुछ भी नहीं सत्ता मिलते ही शाही अंदाज़ से रहते हैं और गरीबी का उपहास करते हैं।
                     अब वापस विषय की बात , क्या लोकतंत्र इसी का नाम है। आप किसी को काले रिब्बन या काली पट्टी लगाने पर परिबंध लगा सकते हैं , ऐसा तो आपात्काल में भी नहीं देखा था। आप एक तरफ इतने साल बाद उनको सुविधा देने की बात करते हैं जो इमरजेंसी में जेल में बन्द रहे दूसरी तरफ विरोध करने की आज़ादी बिना घोषणा किये छीन रहे हैं। किधर जा रहे हैं जनाब। मुझे इक पुरानी बात याद आई इक नेता जी की , उनको जब काले झंडे दिखाने की बात हुई तो बोले थे मेरी मां का घाघरा इतने गज़ काले कपड़े से बना होता था , मुझे ये छोटा सा काले रंग का कपड़ा क्या रोक सकता है। जी नहीं मैं न इनकी न उनकी बात का पक्ष लेना चाहता हूं , मुझे खेद होता है इस देश के प्रशासन के रंग ढंग देख कर  , जो हर सत्ताधारी को ऐसे ही ठगता है असलियत से दूर रख कर। अगर लोग किसी मंत्री की सभा में विरोध करेंगे तो किस बात का , यही कि आपका प्रशासन सही काम करता नहीं है। अर्थात जो काले कपड़े वालों को भीतर नहीं जाने दे रहे थे उनको किसी बात का डर था , तभी उन्होंने ऐसा अनुचित काम किया लोगों की पोशाक पहनने की आज़ादी का हनन , संविधान क्या कहता है उनको पता है।
                      क्या काला रंग अशुभ है , क्या तभी नेता श्वेत वस्त्र पहनते हैं कालिख के काम करते समय भी ,
हां इक बात है काले रंग पे लगा धब्बा अधिक चमकता भी है और उसको मिटाना भी कठिन होता है। बाकी किसी रंग वाले कपड़े पर दाग़ लगे तो उसको काले रंग में रंगने से वो नहीं रहता। ये ज्ञान मुझे इक पुरानी फिल्म से मिला था जिस में नायक इक काल गर्ल से प्रेम करता है और चिंतित होता है क्या करुं। तभी उसकी इक कमीज़ पर लगा काला दाग़ नहीं मिटने पर धोबी सलाह देता है साहब इसको इसी रंग में रंगवा लो। अभी शनि देव जी की चर्चा है कि वो खराब नहीं हैं न्यायकारी हैं भाग्यफ़लदाता हैं। अब शनिदेव से या काले रंग से डरने की ज़रूरत नहीं हैं। शनि की पूजा किया करें काला धन या काला कपड़ा आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता। ऐसा मुझे अज्ञानी पंडित जी का अभिमत है।

Monday, 5 December 2016

क्या चरित्र निर्माण ऐसे किया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश पारित किया है सिनेमाघर में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगीत को सुनाने और दिखाने को और सभी दर्शकों को खड़े होकर आदर पूर्वक सुनने का। भला इस को कोई अनुचित बता सकता है या इसकी आलोचना कर सकता है , मगर ये जान कर अचरज होता है कि हालत ऐसी आ गई है। अब लोगों को देशभक्त भी कानून द्वारा बनाया जाना पड़ेगा , देश से प्यार की भावना भीतर से नहीं जाग सकती जो बाहर से करने को बाध्य किया जायेगा। शायद हमें बहुत गहराई से समझना होगा कि समस्या क्या है और उसकी जड़ कहां है। कानून बनाकर अभी तक जनता को बराबरी के सभी अधिकार तक नहीं मुहैया करवा पाये हम , शिक्षा और स्वास्थ्य की बात क्या जब बाल मज़दूरी और दहेज का दानव तक विकराल रूप धारण कर चुके हैं। मात्र मुख्य न्यायधीश का ये कहना कि न्यायधीशों के पद खाली हैं काफी नहीं है , न्यायपालिका को भी चिंतन करना होगा उसमें खामियां क्या हैं और क्यों हैं। अवमानना की तलवार से कोई समस्या खत्म नहीं होगी , भले लोग देख कर खामोश रहें डर से। काश सभी अपने अपने विशेषाधिकार की लड़ाई से इतर जनता की भलाई की चिंता करते। सत्यमेव जयते , लिखने मात्र से सत्य अपराजित नहीं होता जैसा माना जाता है कि सत्य कभी पराजित नहीं होता है। बहुत बार उसको कत्ल कर दिया जाता है ज़िंदा जलाया जाता है बेगुनाहों को और कातिल छूट जाते हैं कानूनी दांव पेच से। फिर भी आज इस विषय पर विचार विमर्श करने की ज़रूरत तो है।
          क्या आपको मालूम है किसी बैंक में कोई नियम है हर सुबह प्रार्थना करने का , जी बैंक ऑफ़ बड़ोदा में ऐसा ही है। मुमकिन है बाकी बैंकों में भी ऐसा हो , इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो ना , हम चलें नेक रस्ते पे हम से भूल कर भी कोई भूल हो ना। आशा की जा सकती है उस का थोड़ा असर तो रहता ही होगा दिन भर कर्मचारियों में। मगर सवाल ये है सिनेमा देखने वालों को ही देशभक्त बनाना बहुत है , यूं  भी आजकल फिल्म देखना काफी महंगा मनोरंजन है और शायद बेहद कम प्रतिशत जनता सिनेमा हाल जाती है। शायद चरित्र निर्माण की आवश्यकता सारे देश में है , तो क्यों नहीं शुरुआत वहीं से की जाये जहां सब से ज़्यादा ज़रूरत है। संसद और विधानसभाओं में कोई प्रार्थना ईमानदारी का सबक सिखाने वाली अगर हर दिन हर अधिवेशन में गाई जाये तो बेईमानी करने वालों को थोड़ी शर्म शायद आ ही जाये। वरना कौन उनको ये पाठ पढ़ा सकता है जो सभी को सबक पढ़ाना नहीं सिखाना अपना अधिकार समझते हैं। बस जनता ने निर्वाचित किया तो जो चाहे करने की छूट मिल गई उनको , इसे लोकतंत्र कदापि नहीं कह सकते।
          मुमकिन है आपको ध्यान नहीं भी हो सभी सरकारी दफ्तरों में साल में इक दिन ईमानदारी की भ्र्ष्टाचार नहीं करने की रिश्वत नहीं मांगने की बाकायदा शपथ दिलाई जाती है वो भी धूम धाम से समारोह आयोजित करके। नतीजा बताने की ज़रूरत ही नहीं है। जिस देश में सभी खुद को धार्मिक समझते हैं और नियमित मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं , बुरे कर्म छोड़ सद्कर्म करने का उपदेश सुन के आते हैं उस देश में पाप नफरत हिंसा बैर भाव और घिनोने अपराध कैसे हैं। आखिर उन उपदेशों का असर हो भी कैसे जब उपदेशक और धर्म का पाठ पढ़ाने वाले ही लोभ मोह अहंकार ही नहीं अधिक से अधिक चढ़ावा चढ़ने को ही धर्म मान रहे हों , ज़रूरत से अधिक मत जमा करो का उपदेश देकर खुद करोड़ों अरबों जमा करें और उसको इक कारोबार ही बना लें। बचपन में सभी प्रतिदिन प्रार्थना सभा में कोई न कोई प्रार्थना बोलते और सुनते आये हैं , किताबों में भी अच्छाई और भलाई की बातें ही पढ़ाई जाती हैं। इंसानियत का पाठ पढ़ा तो हर किसी ने मगर याद कितनों को रहा है। बड़े होते होते किताबी शिक्षा भुला ज़िंदगी से मिली शिक्षा मन मसितष्क में बैठ जाती है। बच्चे वही समझते और सीखते हैं जो बड़े आचरण करते नज़र आते हैं। चोर से कोई ईमानदारी का सबक नहीं सुनना चाहता।
                            चरचा से क्या होगा , सवाल है कि राष्ट्र में चरित्र निर्माण कौन करे और कैसे। अध्यापक और माता पिता पहला पाठ उनको बातों से नहीं अपने आचरण से पढ़ाना होगा। लेखक कथाकार कवि शायर भी विवेक को जागृत करने का दायित्व निभा सकते हैं अपने स्वार्थ को दरकिनार कर निष्पक्ष सच्चाई की बातें लिखकर। बड़े स्तर पर सिनेमा अपना वास्तविक फ़र्ज़ निभा सकता है ऐसे कहानियों पर फ़िल्में बनाकर जो दर्शक को केवल मनोरंजन ही नहीं दें अपितु शिक्षित भी करें। किसी समाजिक सरोकार पर जागरुकता पैदा करें , मात्र धन कमाना ही सफलता का पैमाना नहीं हो। खेद की बात है नग्नता और अंधविश्वास को बढ़ावा देने जैसे काम सिनेमा ने किये हैं , टीवी सीरियल भी जैसे बुराई को बढ़ावा देने की दौड़ में लगे हुए हैं। कहने को समाचार चैनेल या अख़बार हैं मगर विज्ञापनों ने सभी कोई अंधा कर दिया है। पत्रकारिता का पतन धर्म और राजनीति की तरह हर सीमा लांघ चुका है।  देश की चिंता किसे है , सभी को अपने अपने हित साधने हैं , मगर किस कीमत पर। नैतिकता कोई बाज़ार से खरीद कर नहीं ली या दी जा सकती औरों को , उसको पालन करने को बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है जो अनुचित नहीं भी कहलाये या गैर कानूनी नहीं भी हो पर अनैतिक हो। देश में चरित्र निर्माण करना शायद नहीं यकीनन बेहद ज़रूरी है।

Thursday, 1 December 2016

जनता बोलो ये होना चाहिए या नहीं , मोदी जी पूछते हैं बार बार ( सवाल ) डॉ लोक सेतिया

         गरीब जनता को ही त्याग करने को कहा जाता है  हर बार , कभी किसी राजनेता से किसी ने नहीं कहा त्याग करने को। जनता को समझा रहे हैं इस में तुम्हारी भलाई है , अभी थोड़े से काम चला लो कुछ दिन फिर सब अच्छा हो जायेगा। भाषण में बार बार पूछते हैं सरकार काला धन बंद होना चाहिए या नहीं , फिर उस सवाल को दोहराते हैं , आप तैयार हैं थोड़ा कष्ट झेलने को। जनता को कितना चाहये भला सत्ता तय करती है , दो हज़ार बहुत है ए टी एम से रोज़ निकलवाने को , सप्ताह में चौबीस हज़ार क्या काम हैं। मान लिया जो भी आपने हुक्म दिया पर किसी को कभी तो लगता ऐसा ही परिबंध जनता के सेवक कहलाने वालों पर भी लगाया जाये जिनको हर महीने तमाम तरह से वेतन भत्ते और सुविधाओं के रूप में लाखों नहीं करोड़ों बिना मांगे मिलते हैं। प्रधानमंत्री जी आप बताओ क्या उन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए या नहीं , अगर जनता को आदेश देते हैं कि कुल मुद्रा के 1 6 प्रतिशत से काम चला लो तो खुद अपने भी खर्चे इतने न सही एक चौथाई कर काम चला लेने की बात करते। मगर किसी सांसद किसी विधायक किसी मंत्री पर कोई रोक नहीं लगी , आपको ढाई ढाई एकड़ के बंगले चाहिएं , तमाम सुरक्षकर्मी भी जनता के धन से और अपनी मर्ज़ी से निजि स्टाफ भी देश के ख़ज़ाने से। मोदी जी किसी भाषण में ये सवाल भी पूछते तो जनता बार बार दोहराती जी सरकार लोकतंत्र के नाम पर सभी लुटेरों की लूट अब तो बंद हो। कभी तो ये फैसला हो कि देश की आम जनता की आमदनी और मंत्रियों जनप्रितनिधयों पर खर्चे में कोई अनुपात रखा जाये। क्यों नहीं आप सभी पर इक शर्त लगाई जाये कि आपको सभी साधन सुविधाएं तभी मिलेंगी अगर जनता को जितना ज़रूरी उतना मिल सके ऐसा प्रबंध आप कर सकें। अगर आप में काबलियत ही नहीं देश की जनता की हालत को सही करने की तो कब तक मुफ्त में आपका बोझ सहती रहे जनता। आज आपको बताता हूं आपने किया क्या है।
                इक पुरानी कहानी नये ढंग से लिखनी पड़ेगी मुझे। सूरज ने वादा किया था मछलियों से उनको मगरमच्छ से सुरक्षित रखने का , बताया गया कि उसको बस में  करने का उपाय है 8 0 प्रतिशत पानी को सुखाने का।  थोड़ी सी परेशानी होगी कुछ दिन प्यास सतायेगी फिर सब ठीक हो जायेगा , सूरज का शासन था उसको सब करने का अधिकार मिल गया था।  अपनी ताकत की गर्मी से उसने तमाम पानी सुखा दिया और जिस जिस तालाब या नदी नाले के पास पानी था उसको जल्द ही वापस सरकार के समंदर में डालने का हुक्म सुना दिया जिस का पालन नहीं करना अपराध था। धीरे धीरे मछलियां मरती गई लेकिन मगरमच्छ को कुछ नहीं हुआ। आखिर सूरज को लगा मगरमच्छ को भी जीने का अधिकार है , और निर्णय किया गया आधा पानी मगरमच्छ को मिले और आधा सरकार के समंदर में भेंट कर अपने सारे अपकर्मों से मुक्त हो जाये। मछलियां अभी भी मर रही हैं पर मगरमच्छ सरकार की बात मानते हैं या नहीं कोई नहीं जानता।
           सीमा पर भी जैसा दावा किया गया था दुश्मन को समझ आ गई है वैसी बात दिखाई नहीं दे रही। यही तो सत्तर साल से होता आया है हर सरकारी दावा खोखला साबित होता रहा है। हर बार इक नई योजना पुरानी की जगह उसी की तरह और नाम से।  आज तक हर सरकार ने देश की जनता की तकलीफ को बढ़ाया ही है कम नहीं किया है। मोदी जी शायद अगले चुनाव में यही सवाल खुद से करेंगे जो किया नहीं पांच साल तक वो करना चाहिए था कि नहीं।  पर जवाब नहीं मिल सकेगा लगता है , मिल सकेगा फिर कोई नया नारा।

Monday, 28 November 2016

काला धन मिल गया , गरीबों के पास ( सत्ता का उपहास ) डॉ लोक सेतिया

         हा-हा-हा  , खुल कर हंसो सभी , उनका चुटकुला मज़ेदार है।    
आखिर पता चल ही गया काला धन उन्हीं के पास है जिनके जनधन खाते सरकार ने खुलवाये थे। थानेदार यही हमेशा से करते आये हैं चोरी की रपट लिखने से पहले ही घर के नौकर चाकर को पकड़ लाते और बहुत बार उनसे चोरी की मनवा भी लेते हैं। इस में इक राज़ छुपा रह जाता है कि चोर पुलिस का भाईचारा बना रहता है। कितनी बार जिस की चोरी हुई पुलिस उसी को चोर साबित कर देती है , आपने देखा था किसी को घर में घुसते जैसे सवाल इतना उलझाते हैं कि लोग हाथ जोड़ कहते हैं माफ़ करें कोई चोरी नहीं हुई। सामान गया भाड़ में जान सलामत है इतना क्या कम है। यकीन करें चोरी की शिकायत करना घर पर आफत को बुलाना है। अब सरकार को मालूम हो गया है काला धन बड़े बड़े महल में रहने वालों अमीरों के पास नहीं है , काला धन जनधन खाते वालों के पास जमा है। उनको बता रहे हैं सच सच बता दो अगर बचना है। बस मान लो काली कमाई है और आधा-आधा बांट लो सरकार से। तो बात यहां तक पहुंच ही गई। कमाल है मोदी जी।
               मगर आप सोचते होंगे ये जितने नोट सरकार के ख़ज़ाने में वापस जमा होंगे उनका करेंगे क्या। क्या ये कागज़ के टुकड़े रद्दी वाला खरीदेगा।  जी नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा , प्रधानमंत्री जी उनको किसी ऐतिहासिक प्रमाणपत्र की तरह सहेज कर रखेंगे और सभी को दिखाया करेंगे अपना महान कारनामा। आदेश दिया गया है उन तमाम पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को सरकारी दीवारों में जितनी दरारें दिखती हैं उनको छुपाने को भीतर से चिपका दिया जाये सत्ता की गोंद के साथ। इस तरह किसी को भी कुछ दिखाई नहीं देगा , अंदर क्या है बाहर क्या है। भाई ये जो पब्लिक है नहीं कुछ भी जानती है। आखिर में दुष्यंत कुमार जी की ग़ज़ल के शेर।
                                      अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
                                      घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।
                                     इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं
                                     आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
                                     आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं
                                      राहगुज़र रोके हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार।
                                    दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर
                                     हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।

बेवफ़ा तेरे प्यार में ( हस-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         वो हर किसी को बेहद सुंदर लगती है , सब उसको अपना बनाना चाहते हैं। मेरी हो जाये सभी चाहते हैं , सत्ता रूपी सुंदरी के मोहजाल से भला कोई बच सकता है। राजनीति का महल उसी की खातिर तो बना है , हर राजनेता उसका वरण करना चाहता है। वो सदा ही नवयौवना बनी रहती है , सदा सुहागिन का वरदान भी उसे मिला हुआ है। कभी विधवा नहीं हो सकती और बार बार विवाह रचाने के बाद भी रहती कुंवारी ही है। उस को देख सभी ठंडी आहें भरते हैं , हासिल करने को उतावले रहते हैं। सब सोचते हैं कि हम ही उस के योग्य वर हैं। जानते हैं सभी कि सत्ता रूपी सुंदरी कभी किसी एक की बन कर नहीं रहती फिर भी अनजान बन जाते हैं। सभी मानते हैं कि हमीं उसके सच्चे आशिक़ हैं दिलोजान से प्यार करते हैं। और यकीन करते हैं कि उस के दिल में हमारी ही छवि बसी हुई है , ये किसी को भी मालूम नहीं कि इस सुंदरी के सीने में दिल नाम की चीज़ होती ही नहीं। ये इक पत्थर की मूरत है जो लगती वास्तविक है , जबकि है इक छलावा। बस मैं भी उस की चाह में राजनीति की दलदल में खिंचा चला आया था। यहां आने के बाद वापसी को कोई राह बचती ही नहीं , निकलना चाहो भी तो और फंसते चले जाते हैं। किसी जानलेवा रोग की तरह है जो मरने तक जाता नहीं है।
      मैं आपको अपनी प्रेम कहानी सुनाना चाहता हूं ताकि आप मुझे गलत न समझें। आज सब सच सच बताना है इसलिये कोई कसम नहीं खाऊंगा , उम्र भर शपथ लेकर उसको भुलाता रहा और कसम खाकर झूठ बोलने वालों में शामिल रहा हूं। हम नेताओं का कुर्सी की खातिर ऐसी कसमें खाना इक रिवायत ही है , इसका कोई महत्व असल में नहीं होता। आज सच बोलकर अपने दिल का बोझ हल्का करना है , झूठ बोल बोल खुद अपनी ही नज़र में पहले ही बहुत गिर चुका हूं। जो अधिक शिक्षित लोग होते हैं वो अपनी जीवनी लिख पुस्तक छपवा लेते हैं , मैं अधिक पढ़ा लिखा नहीं इसलिये कहानी सुना रहा हूं। शायद मेरी कहानी किसी को अच्छा सबक सिखा सके हालांकि खुद मैंने औरों के लाख समझाने पर भी कोई सबक कभी नहीं सीखा है। गुरु जी ने पहला पाठ यही तो पढ़ाया था कि हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती , फिर भी चमक देख आगे बढ़ता गया दलगत राजनीति में। दूसरा सबक भी वही था कि सुंदरता रंग रूप एक जाल है धोखा है इस से बच कर रहना , जो इस जाल में फंसता वो कहीं का नहीं रहता है। उन शब्दों का अर्थ समझ किसी हसीना के इश्क़ में तो नहीं फंसा , मगर उनके शब्दों का भावार्थ नहीं समझ पाया और इस बेवफ़ा की चाहत में उलझ गया और उसी से मेरा जो भी हाल बदहाल हुआ आपके सामने है।
                             कल तलक मैं मंत्री था , आज आरोपी हूं भ्र्ष्टाचार का और घोटालों का। आप कल तक मेरी जय-जयकार करने वाले आज मुझे गलियां दे रहे हो। जब तक कुर्सी पर था सभी जान पहचान वालों को हर प्रकार से सहयोग देता रहा , आज मेरी बुराई करने वालों में वो भी शामिल हैं जिनकी खातिर मैं बुरा बना। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं ये कहावत सभी पर लागू होती है सिर्फ नेताओं पर ही नहीं। वो क्या था , परिवारवाद कहें , जातिवाद कहें , धनबल या फिर बाहुबल या कोई दूसरा नाम दे लें गंदी राजनीति का , जिस ने मुझे चुनाव जिताया और मैं सत्ता पर आसीन हो गया। मंत्री पद की शपथ लेते कसम खाई थी निष्पक्ष रहने , सब से न्याय करने और देश के संविधान की रक्षा की। मगर जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई शासक बनने की , मैं उस सत्ता रूपी सुंदरी के जाल में फंस चुका था। जो सोचता था कि मैं जो मर्ज़ी करने को स्वतंत्र हूंगा वो इक भ्र्म साबित हुआ , मुझे वही करना पड़ता था जो सत्ता सुंदरी चाहती थी। कहने को मैं शासक था मगर असल में इक गुलाम था उस व्यवस्था का जिस ने मुझे कुर्सी दी थी। अपनी सोच अपनी नैतिकता अपने आदर्श सब का त्याग करना पड़ा था कुर्सी पर बने रहने को। अपनों के अनुचित काम करने को विवश और आम जनता के उचित काम भी करना कठिन था , प्रशासन और लालफीताशाही के कारण। बस सत्ता सुंदरी का आलिंगन मुझे जकड़े हुए था।
                   हम सभी राजनेता उसी सत्ता सुंदरी के पागल प्रेमी हैं , उसकी खातिर इस दलदल में घुस चुके हैं। आशिक प्रेमिका को पाने को किसी भी हद तक जा सकते हैं जानते हैं आप भी। अपने पुराने युग की , हीर-रांझा , लैला-मजनू , रोमियो-जूलियट की प्रेम कथायें सुनी होंगी , इस युग की सब से महान कहानी यही है जो केवल मेरी अकेले की नहीं हर नेता की है। अफसोस इसका है कि हमारी प्रेमिका की वफ़ा सत्ता बदलते बदल जाती है , उसकी वफ़ा पुराने को छोड़ नये के प्रति हो जाती  है। बेवफा की याद सताती है पल पल क्या करें बताओ। क्या से क्या हो गया , बेवफ़ा तेरे प्यार में।

Sunday, 27 November 2016

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         नारद जी क्या कह रहे प्रभु को बिल्कुल समझ नहीं आया। कौन हैं जो भूखे हैं गरीब हैं। प्रभु को तो नहीं दिखाई दिये ऐसे लोग। रोज़ जो भी आते हैं उनके मन्दिरों मस्जिदों गिरिजाघरों गुरुद्वारों में सभी कितना अच्छा स्वादिष्ट प्रसाद लाते हैं और इतना अधिक धन उनको देते हैं चढ़ावे में कि अंबार लगे हुए हैं। रोज़ कितनी धूम धाम से कोई न कोई त्यौहार मनाते हैं। स्वर्गलोक से भी देखो तो धरती कैसी सुंदर अप्सरा जैसी चमकती हुई लगती है। वहां की रौशनी देख सभी देवी-देवताओं की आंखें चुंधिया जाती हैं। शासन करने वालों की कितनी जय-जयकार होती रहती है रोज़ हर तरफ। उनकी निराली शान देख कर तो प्रभु भी आह भरते हैं कि काश मेरे पास भी इतना सब कुछ होता। जिस देश के शासक का ऐसा ठाठ हो उसकी जनता भला भूखी कैसे रह सकती है। लोकतंत्र स्थापित यही सोच कर तो किया था कि जनता खुशहाल हो सके। नारद जी बोले मैं आपको कैसी समझाऊं जो सब जान समझ भी नासमझ बने हुए हो। आप अपनी महिमा का गुणगान सुनते सुनते इतना खो गये कि आपको बाकी कोई दिखाई नहीं देता। किसी शायर ने सही कहा है
                      " खुदा मुझ को ऐसी खुदाई न दे , कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे। "
यही हाल धरती पर आपके भारत देश का है। आपने तेतीस करोड़ देवी देवता बना डाले , उन्होंने कुछ हज़ार सांसद विधायक मंत्री और ऊंचे ऊंचे ओहदे बना लिये जिनको वी आई पी नाम दे दिया। बस उनको सभी कुछ चाहिए अपने लिये और सभी भाड़ में जायें। आप सोच रहे हो जनता के पास हर अधिकार है वही बनाती है नेताओं को शासक फिर उसको अनदेखा कोई किस तरह कर सकता है। आप ही बताओ आप भगवान बन गये पर बनाया किस ने , यही लोग हैं जिन्होंने आपको अपना भाग्य विधाता समझा और सब छोड़ दिया आप पर। युगों से ये आप ही के भरोसे जी रही है मगर आपने उनकी सुध ली नहीं कभी। अपनी आरती पूजा और स्तुतिगान में इतने मुग्ध हो गये कि ये भी याद नहीं रखा कि इतनी बड़ी दुनिया बना दी तो उसकी हालत भी अच्छी रखनी है। संतान को पैदा किया पर लालन पालन को अपना कर्तव्य नहीं समझा , काश जब लोग भूख से बिलखते और उनको रातों में नींद नहीं आती खाली पेट तब आपको उस हालत का एहसास होता।
                              भगवान है का विश्वास बेचारे लोगों को छलता रहा है , सभी सोचते हैं कभी तो भगवान उनकी सुनेगा और अच्छे दिन आयेंगे। उसे क्या पता भगवान अपनी इक अलग दुनिया में बड़े सुख चैन से रहता है दुनिया को उसके हाल पर छोड़कर। धरती पर शासक भी आपकी तरह हैं जब जनता से उसका सब कुछ छीनना चाहें पल भर में छीन लेते इक आदेश से ही , मगर जब जनता को थोड़ा भी देना हो तब विवशता की बात करते हैं। अच्छे दिन का वादा तो करते हैं मगर वादा पूरा कब तलक होगा कभी नहीं बताते। सत्ता मिलते वो वादा भूल जाते हैं और जनता को बहलाने को कोई नई चाल चलने लगते हैं। जनता को वही दिखाई देता है जिस का शोर होता है।
                                         भगवान भी पछता रहे हैं दुनिया बनाकर , अकेले भगवान कुछ भी नहीं कर सकते , आज तक किसी भी देवी देवता ने उनको असलियत बताना ज़रूरी ही समझा। इन देवी देवताओं को ही तो नियुक्त किया था संसार की भलाई करने को , सभी खुदगर्ज़ बन गये अपना अपना स्वर्ग धरती पर बनाने में लग गये। अब उनको सुधारा भी नहीं जा सकता न ही खुद उनको अधिकार भी है उनको हटाने का , यही भूल हुई थी बनाते समय उनको ठीक कार्य नहीं करने पर हटाने का प्रावधान रखना था। नारद जी बोले भगवान तब भी कुछ नहीं होता , लोकतंत्र में पांच साल बाद जनता को सरकार बदलने का अधिकार है फिर भी जनता के लिये कभी बदलता कुछ भी नहीं।  केवल सत्ताधारी लोग बदल जाते हैं। पर नहीं अब भगवान और तमाशाई नहीं बने रहेंगे , बुलवा भेजा है सभी देवी-देवताओं को। देखते हैं क्या निर्णय करते हैं सभी मिल कर। नारद जी चल पड़े हैं सभी को बुलाने। नारायण नारायण।

आपकी सुन ली हमने , अब तो हमारी भी सुनो सरकार जी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

           आप जो भी सत्ता में हो , आपके पास हर साधन है , सुविधा है , तरीका भी है अपनी बात हम लोगों को बताने का समझाने का ही नहीं मनवाने का भी आदेश देकर। आपने कहा हमने सर झुका स्वीकार कर लिया कि आप हमारी और देश की भलाई चाहते हैं। आप टीवी से प्रसारण करें या सभा बुला भाषण दें , अपनी हर बात रख सकते हैं। कभी तो हो ऐसा भी कोई ढंग कि वोट डालने के सिवा भी हम किसी तरह अपनी बात कह सकें और आपसे अपने सवाल पूछ सकें। क्या ये ज़रूरी नहीं जनतंत्र में। आज बहुत साधारण से सवाल मुझे पूछने हैं देश की जनता की ओर से।
                           पहला ज़रूरी सवाल :-
  आपने बहुत कुछ समझाया लोग समझ गये कि आप गरीबों की गरीबी मिटा देंगे , पर कब , कोई समय सीमा तो तय कर दो कि इस अवधि तक जनता को और झेलना है परेशानियों को हंसते या रोते। बस इतना बता दो कब कोई भूखा नहीं होगा , किसी को स्वास्थ्य सेवा की या शिक्षा की कोई कमी नहीं होगी गरीबी के कारण। बस इंसान की तरह जी सकें हम भी इतना ही चाहते हैं , और कितना इंतज़ार करना है।
                   दूसरा ज़रूरी सवाल  :-
आप सभी जनप्रतिनिधि कब तक इसी तरह खुद अपने पर जनता का सरकारी पैसा खर्च करते रहोगे , जैसे आप जनता और देश के सेवक नहीं मालिक हैं , राजा हैं। लोकतंत्र के नाम पर जारी ये लूट क्या कभी खत्म होगी। क्या जनता के लिये जैसे मापदंड बनाये हैं कि इतना है तो गरीब नहीं उसी तरह नेता मंत्री के लिये भी कोई सीमा अधिकतम की होगी। और उस में और आम जनता में अंतर ज़मीन और आसमान जैसा नहीं होगा। कभी हिसाब लगाना और जनता को भी बताना कि इतने सालों में कितने लाखों करोड़ सिर्फ सरकारी मंत्री और अमले पर ही खर्च होते रहे हैं , जिन से देश से गरीबी कभी की मिट सकती थी। लोग भूखे हैं क्योंकि आप नेता अफ्सर ज़रूरत से बहुत बहुत अधिक खुद पर बर्बाद करते हैं। सत्ता के अधिकारों का दुरूपयोग आपराधिक सीमा तक कर रहे करते आये हैं।
             तीसरा ज़रूरी सवाल :-
ये आज तक का सब से बड़ा घोटाला है। जितना धन इस में बेकार बर्बाद किया जाता रहा और लगातार किया जा रहा है हर सरकार द्वारा चाहे केंद्र की हो या राज्यों की , उतना शायद बाकी सभी घोटालों में भी नहीं लूटा गया होगा। वो घोटाला है अनावश्यक सरकारी प्रचार के विज्ञापन का। कुछ मुट्ठी भर लोगों अख़बार टीवी वालों को छोड़ और किसी को इन से कुछ नहीं मिलता है।
                            जवाब कौन देगा
क्या पत्रकार जनहित की बात करने वाले कभी ये सवाल पूछेंगे जब भी सत्ताधारी नेता या प्रशासनिक अधिकारी से साक्षात्कार हो उनसे।  कभी तो अपना स्वार्थ छोड़ सच का पक्ष लें मीडिया वाले।

Saturday, 26 November 2016

उधर थे जो कल , आज इधर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           हंगामा हो गया उस इक बात से , हर जगह वही मुद्दा छाया हुआ है। अख़बार टीवी समाचार फेसबुक ट्विट्टर व्हाट्सऐप संदेश से गली पार्क में आपसी चर्चा उसी विषय की है। ऐसे में इस पर बहस आमंत्रित करने का विचार बना तमाम बुद्धिजीवी वर्ग को पत्र लिख कर पूछा कि आप किधर हैं , पक्ष में बोलना चाहते हैं अथवा विरोध में बात रखना चाहते हैं। जो भी चाहें करें मगर आयोजकों को कार्यक्रम से एक घंटा पहले सूचना अवश्य दें ताकि बहस को सार्थक बनाया जा सके इक संतुलन दोनों पक्ष में बना कर। लेखक चिंतक विचारक आलोचक और पत्रकार सभी को शामिल किया गया बहस में भाग लेने को। सभी को मांगने पर जो जो प्रश्न पूछे जाने हैं उनका विवरण उपलब्ध करवा दिया गया। लोकतंत्र की सफलता विफलता से लेकर अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी तक हर बात शामिल थी सवालों में। नैतिक मूल्यों से देश की बिगड़ी हालत तक , नागरिक अधिकारों से सभी में समानता लाने की बात तक सब कुछ बहस में शामिल होगा। अधिकतर ने शुरू में ही विरोध में भाग लेने का मत प्रकट किया मगर उनको कहा गया अभी जल्दी नहीं है दो दिन बाद कार्यक्रम का आयोजन है तब तक मुमकिन है घटनाएं और रूप में सामने आयें और आपकी सोच बदल जाये इसलिये आप तय दिन बहस शुरू होने से एक घंटा पहले बताना जो चाहते हों। आप समर्थन करें या विरोध उसका मतलब आपकी निजि राय ही नहीं है अपितु समझना है कि उचित या अनुचित क्या है।
                बहस आयोजित करने का जम कर प्रचार किया गया , तमाम जाने माने लोगों को बुलावा भेजा गया , इक अपने रसूख वाले टीवी चैनल को भी शामिल किया गया ताकि बहस के अंश खबरों में दिखाये जा सकें। लोग भी अधिक आयेंगे ये पता चलने पर कि श्रोता  बन कर ही सही टीवी पर चेहरा दिख तो सकता है। पहले भी अलग अलग विषयों पर चर्चा आयोजित करते रहे हैं और सभी सरकारों की अनुकंपा पाते रहे हैं , इस सरकार से पाने में सफल होंगे उनको भरोसा है। दो दिन भी उनके पास है और नई जानकारी नये तथ्य जुटाने के लिये। उधर हर तरफ शोर बढ़ता जा रहा था और उनको ख़ुशी हो रही थी मामला गर्म है अभी ठंडा नहीं हुआ। जो भी उनको तो हर हाल में बहस करवानी ही थी।
                           दो घंटे पूर्व सभी वक्ता आ गये थे और आयोजक ने फिर याद दिलाया था कि ठीक एक घंटा बाद आपको लिखित में अपना निर्णय उनको बताना है कि आप उधर हैं या इधर , मतलब पक्ष में बात रखना चाहते हैं या विपक्ष में। क्योंकि उनको इक चिंता थी कि बहस एकतरफा नहीं हो जाये अगर सभी समर्थन में ही बोलना चाहें इसलिये उनहोंने ये सूचना दे दी थी कि विरोध में बोलने वालों को काफी अधिक राशि का मानदेय मिलेगा प्रयोजकों की तरफ से जबकि पक्ष में बोलने वालों को दूसरे प्रयोजक उतनी राशि का मानदेय नहीं दे सकते। इस को भेद भाव नहीं हमारी विवशता समझना , विरोध करने के प्रयोजक धनवान हैं , पक्ष में बोलने वालों के थोड़ा कम अमीर हैं हालात के मारे हैं। कोई इस पर आपत्ति नहीं जता सकता , मगर चाहें तो अपना मत बदल सकते हैं और बता सकते हैं अब आप किधर खड़े होना चाहते हैं।
                             सभी ने बंद लिफाफे में लिख कर दे दिया था किस तरफ हैं। जब सभी लिफाफे खोले गये तो पता चला सबने अपना इरादा बदल लिया है। सभी विरोध में बोलना चाहते हैं। मत बदलने का कारण भी सभी ने बताया था , निडर होकर सच का साथ देने का कर्तव्य निभाना। जो अभी तलक उधर थे अब इधर हैं , बहस का अंजाम जो भी हो , ये बात ज़ाहिर हो गई थी कि पैसे के महत्व पर सब एकमत हैं।

आधा-आधा , फिफ्टी-फिफ्टी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        सिक्के के दो पहलू होते हैं , हर बात के दो पक्ष होते हैं। लोकतंत्र का खेल तमाशा भी सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से चलता है। कुछ कुछ याद आता है बचपन में खेलते थे चोर-सिपाही आधा-आधा। काला धन भी पूरा ही काला नहीं होता , उसको भी सफेद किया जा सकता है। अभी जब नोट बंद हुए हज़ार और पांच सौ वाले तो खबर पता चली दस बीस प्रतिशत कम देकर नोट बदल देने की। तब सरकार ने चेतावनी भी दी कि ऐसा करते पकड़े गये तो दंड मिलेगा। कानून की यही बात बहुत अच्छी है पकड़े जाओ तभी अपराधी नहीं पकड़ में आओ तो सभ्य नागरिक। पकड़े भी गये तब भी खुद को निर्दोष साबित करने को एक नहीं अनगिनत अवसर मिलते हैं। रंगे हाथ पकड़े गये और जुर्म कबूल भी कर लिया तब भी अदालत में कसम खाकर मुकरने की इजाज़त है। आर्थिक अपराध यूं भी चोरी नहीं कहलाते , समझौता कर लो या जुर्माना भर दो मामला निपट जाता है।  जब प्रधानमंत्री जी ने अचानक नोट बंदी की बात की और भाषण दिये हर दिन ये कहते हुए कि जो लोग सालों से लूट रहे थे अब उनकी खैर नहीं , उनको घोषित करने का अवसर पहले ही दिया जा चुका है। अब फिर बात होने लगी है काला धन घोषित करो और पचास प्रतिशत जुर्माना भर बाकी पचास प्रतिशत सफेद करा लो। क्या बात है चोर-सिपाही आधा-आधा। अब समझ लो ये काला धन कभी खत्म नहीं होगा , जब मर्ज़ी रंग बदलता रहेगा। आज काला है जो वही कल सफेद ही नहीं अल्ट्रा-वाइट होगा। लो जी भ्र्ष्टाचार जी आपका डर खत्म चिंता खलास। कबीरा तू क्यों भयो उदास।
                                                    बस सारी बातें चंद दिनों की थीं , महीना भी नहीं बीता और देश वापस वहीं जहां था। मगर सरकार यू-टर्न नहीं लेगी इस को लिख कर रखा हो तो मिटा देना। असल में सत्ता इक गोलचक्र में घूमती है उसको वापस आने को यू-टर्न लेने की ज़रूरत नहीं होती। आपने दिल्ली में इंडिया गेट देखा होगा , इक बड़ा घेरा है चौगिर्दा लोग घूम कर आनंद लेते नज़ारा देखते। अब वहां से रास्ता हर तरफ जाता है , पत्थर की हवेली से तिनकों के नशेमन तक , इस मोड़ से जाते है कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज़ कदम राहें। सही याद आया आपको ये आंधी फिल्म का गीत है। राजनीति आज भी वही है जनता को भावनाओं से बहला शासन पाना। खिलाड़ी बदलते रहे खेल नहीं बदला , किसी ने तब खेल दिखाया कोई आज दिखा रहा है।
                 लो जी अभी तो पार्टी शुरू हुई है , सब खुश इधर वाले भी उधर वाले भी। जनता तू भरोसा रख काला धन आया है तो अच्छे दिन भी लाया ही होगा। देखना तेरी गरीबी कैसे मिटती है , दुख भरे दिन बीते रे भईया अब सुख आयो रे। डरता काहे को है जो भी धन किसी ने डाला तेरे खाते में आधा तेरा आधा सरकार का। सीधा सा हिसाब है कोई बनिया का बही खाता नहीं जो गिनती में चूक हो जाये। जन धन खाते इसी सोच से खुलवाये थे समझे आप , बेचारे जिन्होंने अपने खाते में औरों को काला धन नहीं डालने दिया फिर गरीब के गरीब ही रहे बदकिस्मत लोग। अभी भी दिन बाकी हैं अगर साहस हो कुछ करने का , क्योंकि गलत काम बिना साहस नहीं किया जा सकता। डरपोक कभी अमीर बन ही नहीं सकते। सुबह देश के सब से बड़े न्यायधीश कह रहे थे अदालतों में न्यायधीश के पद रिक्त हैं न्याय का क्या हो। जब भृष्ट लोगों का काला धन काली कमाई का आधा लेकर ठीक करना हो तब क्या ज़रूरत न्यायपालिका की भी। देखो हिस्सा मिला और इंसाफ हुआ उनका , ये कोई मुगलेआज़म फिल्म का फ़िल्मी तराज़ू नहीं जो झुकता दिखाई देगा। कहते थे विदेश तक में नाम रौशन होगा देश ईमान की राह चल पड़ा है , क्या नाम दिया था जंग है अपराध आतंकवाद नशे का कारोबार और रिश्वत तथा लूट के खिलाफ। कसमें वादे बातें नारे सब खोखले साबित होंगे क्या पूछना उन से शायद बता सकें , छल फरेब धोखा कोई शब्द बचा ही नहीं कहने को लगता है। चलो थोड़ा हंस लिया कुछ दिन अब थोड़ा रो लो दोबारा अपनी हालत पर। हंसना-रोना फिफ्टी-फिफ्टी , आधा-आधा फिफ्टी-फिफ्टी।

Friday, 25 November 2016

ज्योतिष वास्तुशास्त्र और देश की हालत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

               मैं भूल गया था , फिर से याद दिला दिया आपने , ऐसा अक्सर होता ही है हम सभी के साथ। ओह याद आया , काश पहले याद आ जाता तो समस्या ही नहीं होती। हर समस्या का समाधान है हमारे ज्योतिष शास्त्र और इधर लोकप्रिय हुए वास्तुशास्त्र के पास। कारण चाहे जो भी हो अख़बार टीवी वाले भी इस से सहमत हैं , तभी हर दिन इनको प्रचारित करते हैं। इन्हीं की अनुकंपा से मालामाल भी हैं। नया राज्य बना और नये मुख्यमंत्री को पता चला कि हैदराबाद का पुराना मुख्यमंत्री निवास वास्तु दोष से ग्रस्त है। खुद अपना घर होता तो उनसे सलाह लेकर कोई दरवाज़ा कोई खिड़की बदलवा उसको ठीक कर लेते। कोई पौधा किसी दिशा में लगाते या रसोई घर की जगह बदल जाती। खुद अपनी सुरक्षा का भी उपाय है , घर को किसी खास रंग में पेंट करवा महंगे फर्नीचर से सजा कर मुख्यद्वार के दोनों तरफ धातू की बनी ऊंची ऊंची योद्धा की मूर्ति रख लेते। वास्तु वाले इनको सुरक्षा कवच बताते हैं , हम भी ऐसा करने को बुरा नहीं बताते। जब बाकी नेताओं अधिकारियों को अरबों रुपये खर्च कर पाल सकते हैं सफेद हाथी बनाकर जो किसी काम नहीं आते तो ये भी स्वीकार कर लेते। मगर ये तो ज़रूरी नहीं था कल खबर सुनी कि ऐसा किया गया वास्तु दोष के कारण।
                                      इक नया मुख्यमंत्री आवास बनाया गया आठ महीने के काल में इक रिकॉर्ड की तरह 3 8 करोड़ की राशि खर्च कर के। इसको लोकतंत्र कहते हैं , राजा का हुक्म हुआ और ताजमहल बना दिया गया जनता के धन से सभी ने वाह ताज कहा चाय की चुस्की लेकर। देखो उनकी जान को खतरा है , उनका स्नान घर तक बुलेट प्रूफ है शयनकक्ष ही नहीं। ऐसे मौत से डरे लोग भाषण देंगे जनता को साहस से काम लो निडर बनो और भगवान पर भरोसा रखो। इनको तमाम पूजा पाठ हवन यज्ञ करने करवाने के बाद भी भगवान पर इतना यकीन नहीं कि इनको बेमौत नहीं मरने देगा। इनकी जान कीमती है जनता की सेवा करनी है इसी तरह बहुत साल तक , बस चले तो आखिरी सांस भी सत्ता की गद्दी पर बैठे लेना चाहेंगे। हैरानी की बात है अपने देश के नेताओं की धर्म में बड़ी आस्था रहती है खुद की खातिर , मगर जब ईमानदारी से राजधर्म का पालन करने की बात हो तब उनको कुछ याद ही नहीं रहता।
                                          याद आया अटल जी ने कभी उनको राजधर्म निभाने का संदेश दिया था। सत्ता मिलते सीस झुकाया जिस मंदिर की चौखट पर आजकल उसी में प्रवेश करने से बचते हैं। जब आपने कुछ गलत किया ही नहीं तो छप्पन इंच की छाती ठोक देते जवाब विपक्ष को। मगर इक सच मनोविज्ञानिक बताते हैं कि जो सुरक्षा कर्मी रखते हैं उनको डर सब से अधिक लगता है। लगता है अभी उनको समझ नहीं आ रहा कि अपने उचित निर्णय को उचित साबित कैसे करें , उनको सवाल पूछने वाले ही गलत लगते हैं। इसलिये नाराज़ प्रेमिका की तरह कहना चाहते हैं जाओ मैं नहीं बोलती। वे मैं नहीं बोलणा , क्या गीत है , तेरे सामणे बैठ के रोणा दिल दा दुखड़ा नहीं खोलणा। जाओ कोई उनके आवास पर उनके आंसू पौंछ कर मना लाओ , बस बहुत हुआ रूठना अब मान भी जाओ ।  ओह बात कुछ और हो रही थी कहां बीच में काला धन आ गया , करें क्या आजकल यही हो रहा है। सवाल आया था कि क्या नोट बंद करने से सब ठीक हो जायेगा और जो अभी तलक काले कारनामे करते रहे उनके पाप इस से धुल जायेंगे। क्या ये गंगा स्नान है सभी नेताओं के इतने साल तक दो नंबर के धन से चुनाव लड़ने के बाद उसका प्रायश्चित है। इक कथा है मां पार्वती ने शिवजी से यही पूछा था , और शिव जी ने जवाब दिया कि जो केवल तन गीला करते हैं उनको मोक्ष नहीं मिलता पर जो मन को पवित्र करते स्नान कर बस उन्हीं के पाप समाप्त हो जाते हैं। मगर कौन मात्र तन से नहाया कौन मन का मैल भी धोता कैसे पता चले पूछा पार्वती जी ने। शिवजी इक कोड़ी का रूप बना और पार्वती को सजी धजी सुंदर औरत बनाकर उसी डगर पे बैठ गये जिस से लोग गंगा स्नान कर वापस लौट रहे थे। लोग पास आते तो पार्वती जी बताती कि ये मेरे पति हैं और मैं इनको कंधे पर लादकर लाई हूं गंगा स्नान को , थक गई इसलिये विश्राम कर रही हूं। लोग बुरी नज़र से देखते और सुंदर नारी देख प्रलोभन दे अपना बनाना चाहते , पार्वती चुप चाप शर्मसार हो जाती ये हालत देख। संध्या को इक पुरुष आये और उनकी बात सुन उसकी आंखों से आंसू की धारा बह निकली , उसने कहा चलो मैं आपकी सहायता करता हूं। उसने शिवजी को अपने कंधे पर उठाकर तट पर पहुंचा दिया और जो सत्तू था उसके पास वो भी खिला दिया। शिवजी पार्वती का प्रयोजन पूरा हो गया था और वो चले गये अपने लोक। देखते हैं इस कलयुगी उपाय से क्या काला राक्षस खत्म होता है अथवा नहीं।
                             विषय पर आते हैं , ज्योतिष शास्त्र की बात की जाये। शुभारंभ बहुत ज़रूरी होता है , और जन्म समय और तिथि ही नहीं जगह भी मिलकर किसी का भविष्य तय कर देते हैं। ये सभी ज्योतिष विशेषज्ञ बताते हैं। हिंदुस्तान जब आज़ाद हुआ और इंडिया नामकरण किया गया तभी भविष्य निर्धारित हो गया था। तब ग्रह सिथ्ति बन गई थी , आज़ादी मिली चौदह - पंद्रह की आधी रात को , तभी आज़ादी का पक्ष सदा अंधेरा ही रहा , उजाला ढूंढने वाले निराश हुए और काले कारनामे और धंधे वालों को पूरी आज़ादी रही। पी एम कहना प्रधानमंत्री नाम रखना भी ऐसा ही था , पी एम शाम का समय होता है और प्रधानमंत्री जीवन की शाम में ही बने लोग। इक युवा बने तो उनकी आयु भी कम ही रही। अभी कल पूर्व प्रधानमंत्री बता रहे थे नोट बंदी से कितने प्रतिशत क्या कमी होगी , वही पी एम कहते थे मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं जो बता सकूं महंगाई कब कम होगी। महंगाई डायन और गरीबी पापिन दोनों की कुंडली बनवा देखी जाये कब उनको राहू केतु की दशा खत्म करेगी। चलो आखिर में आज की नई इक कथा लिखते हैं ताकि सनद रहे और ज़रूरत पर काम आये , अरे ये तो वकीलों की भाषा है। पर इधर कथा पुराने ढंग की समझता कौन है इसलिये यही उचित है।
                उस माता के दो पुत्र हैं , नेता और अधिकारी , और एक बेटी है जनता अनचाही औलाद जैसी। बड़े बेटे को सत्ता सभी अधिकार खुद देती है , छोटा जानता है नहीं मिलें तो कैसे छीन सकते हैं। देश की एक तियाही जनता की तरह बेटी को लेकर मां सोचती है अच्छा होता ये अभागी जन्म ही नहीं लेती। यही मापदंड है समाज का बेटा अपकर्म लूट मर करता रहे तब भी बुरा नहीं , बेटी की ज़रा सी बात भी बदनामी का सबब बन जाती है। गरीबी इक कलंक है जनता की दशा इक अभिशाप। कसूर किसी का नहीं विधाता ने इनका भाग्य ऐसा ही लिखा है। कितने उपाय किये सभी ने , आरक्षण देने से महिला आयोग बनाने , और मनरेगा से पहले भी कितने सूत्री कार्यक्रम चलाकर। कोई पता करे किसी वास्तु शास्त्र वाले या अंक शास्त्री अथवा ज्योतिष पंडित से , कोई उपाय ऐसा ही सही , और सब आज़मा लिया सबने।