Saturday, 18 May 2019

संकुचित स्वार्थ और झूठ फरेब की राजनीती ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      संकुचित स्वार्थ और झूठ फरेब की राजनीती ( आलेख ) 

                                        डॉ लोक सेतिया

       आज जब देश में संसद का चुनाव आखिरी दौर तक पहुंचा चुका है तब ये हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है कि मोदी जी ने सत्ता मिलने के कुछ ही महीने बाद चुपके से ख़ामोशी से चुनाव आयोग का नियम ही बदलवा लिया था। आजकल के आधुनिक सोशल मीडिया और व्हाट्सअप्प की पढ़ाई से ज्ञान पाने वालों को जिनको कोई खेल की जीत हार या कोई दौड़ अथवा तिरंगा लहराना आई लव माय इंडिया कहना ही देशभक्ति लगती है और जिनको देश की गरीबी से लेकर वैचारिक शून्यता तक से कोई मतलब नहीं है उनको बीते इतिहास की बात पढ़ना क्या सुनने की फुर्सत नहीं न ही ज़रूरत लगती है। जब कोई दल गांधी जी के कातिल को देशभक्त बताने वाले आतंकवादी घटना के आरोपी को दल का उम्मीदवार बनाता है और देशभक्ति की अपनी परिभाषा बनाना चाहता है जिस में धर्मं के नाम पर हिंसा की जा सकती है और वोटों की गंदी राजनीति लोगों को विभाजित करने का काम कर देश को बांटती है तब खामोश रहना देश के लिए कर्तव्य को भुलाना है। आज आपको इतिहास की कुछ घटनाओं को याद करवाते हैं।

                   12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित कर रद्द करने के साथ उनको अगले छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया था। कारण था चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग करना जब खुद पद पर रहते वो किसी सरकारी कर्मचारी की ही तरह वेतन पाती थी। किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी और ये इक मील का पत्थर है न्यायपालिका की निष्पक्षता साबित करता हुआ साहसपूर्वक निर्णय था। जो व्यक्ति  काला धन भ्र्ष्टाचार और सत्ता का दुरूपयोग की बात करते हुए ईमानदारी का दावा करते हुए सत्ता पाता है वो अगर सत्ता मिलते ही चुनाव आयोग का नियम कानून ही इक नोट भेजकर चंद घंटों में बदलवा लेता है और नया नियम उसके चुनावी दौरों के खर्च को उसके दल का खर्च नहीं मानता और इसका बोझ जनता पर पड़ता है उसको कोई भी उचित नहीं कह सकता है। अर्थात पिछले चार साल तक मोदी जी अपने दल के चुनाव पर सभाओं पर बेतहाशा धन देश के खज़ाने से लुटवाते रहे हैं। चोरी रोकना नहीं इसको डाका डालने का अधिकार खुद ही हासिल करना समझना होगा। और ये खबर कोई आपको इतने समय तक नहीं देता  है। जब खबर देने वाले सत्ता का गुणगान करने और अपना घर भरने में लगे हों तब सच की चिंता कौन करता है। जबकि  ये नियम गलत है और भेदभावपूर्ण ही नहीं जनता के धन और सरकारी खज़ाने की लूट है जैसा लगता है तो ऐसे करने वाले को देश की भलाई करने वाला नहीं कहा जा सकता है। उस निर्णय के अनुसार पिछले जितने चुनाव हुए जिन में ये मनमानी की गई उनकी वैधता निष्पक्षता शक के दायरे में आती है। सत्ता पाने को कुछ भी करना देशभक्ति कदापि नहीं कहला सकता है।  काला धन की बात छूट गई है और चुनाव पर करोड़ों रूपये बर्बाद ही नहीं किये जा रहे बल्कि सत्ता धनबल का खेल बन गई है। सबसे मालामाल दल किस तरह से ईमानदारी की बात कर सकता है क्या उनके ऊपर धन की सोने चांदी की बरसात यूं ही होने लगी है।

     बात निकली तो पता चला है कि चुनाव आयोग भी बंटा हुआ है और सत्ताधारी नेताओं के अनुचित आचरण पर ऐतराज़ करने वाले की बात असहमति को दर्ज नहीं किया जाता है। किस बात की पर्दादारी है और जिस तरह मोदी जी ने वंशवाद परिवारवाद की आलोचना की उस से भी अधिक खतरनाक हर पद पर अपने पसंद के लोगों को नियुक्त करते जाना रहा है जो आज व्यक्तिवाद तक पहुंच गया है जो देश के संविधान और लोकतंत्र को निरर्थक बना सकता है। शायद ऐसे में आज इक जाने माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा जी का इक अख़बार में छपा लेख बहुत सामयिक है उसके कुछ अंश पढ़ कर समझते हैं पहले प्रधानमंत्री नेहरू और आज के प्रधानमंत्री मोदी में ज़मीन आसमान का अंतर है। आपको कौन अच्छा लगता है ये आपके विवेक पर है। अमर उजाला के लेख से अंश इस तरह हैं।

                                      नहरू का पहला चुनाव अभियान

जन उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने। कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा। लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं। 

    आज ये सुनकर कोई यकीन नहीं करेगा कि इस देश में ऐसे लोग थे जो अपने विपक्षी धुर विरोधी का भी आदर करते थे। और ऐसी घटनाएं बहुत हैं , आज खुद को महान साबित करने को आपके पर असंसदीय भाषा है बाकी सबको खराब बताने से अपशब्द कहने की क्या इनको अच्छे संस्कार और महानता की निशानी कहते हैं। ज़रा उस भाषण की बात को भी याद करते हैं। उन्होंने सभा में मौजूद लोगों को " भयावह सांप्रदायिक तत्वों " के प्रति आगाह करते हुए कहा कि वे देश में बर्बादी और मौत ला सकते हैं। उन्होंने आग्रह किया कि दिमाग की खिड़कियां खोलें और दुनिया के हर कोने से ताज़ी हवा आने दें। एक और भाषण में उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति सांप्रदायिक सोच वाला होता है वह छोटा व्यक्ति होता है जो कि कोई बड़ा काम नहीं कर सकता है ऐसे तुच्छ सिंद्धांतों पर आधारित देश भी छोटे हो जाते हैं। सांप्रदायिक संगठन बीमार भावनाएं फैला कर भारी नुकसान कर रहे हैं। नेहरू ने अपने भाषण में कहा कि मैं अन्य दलों का ज़िक्र करता हूं लेकिन सिर्फ सिद्धांतों के सवाल पर। मैं उन्हें व्यक्तित्व के दृष्टिकोण से नहीं देखता। वह वैसा ही कुछ कहना चाहते थे जैसा कि अब्राहम लिंकन ने एक बार नैतिक रूप से मज़बूत और साकारात्मक दृष्टिकोण वाला समाज बनाने की बात कही थी। लेखक अंत में लिखते हैं पाठक चाहें तो नेहरू के भाषणों के स्वर और विषयवस्तु की तुलना आधुनिक नेताओं के भाषण से कर सकते हैं। लेखक लिखते हैं कि मैं तो केवल अनुमान लगा सकता हूं कि आज से पचास साठ साल बाद कोई भी इतिहासकार यह दर्ज नहीं करेगा कि 2019 के चुनाव में किस किस नेता ने क्या कहा था।

           हैरानी हुई कुछ लोग चुनाव आयोग या अन्य संस्थाओं की गिरती साख और उनको अनुचित ढंग से इस्तेमाल करने के सवाल पर कहते हैं विपक्ष हार को देख कर ये कह रहा है। ये कमाल है अभी वोट मशीनों में बंद हैं और आपको नतीजा भी मालूम है क्योंकि ये पहले से समझते हैं बेशक कोई लाख झूठा साबित हो उसके दावे खोखले साबित हों तब भी देश को उन्हीं को चुनना होगा मज़बूरी है। ये किस मानसिकता के लोग हैं जिनको देश संविधान से बड़ा कोई नेता लगता है। जो लोग कोंग्रेस में नेहरू को प्रधानमंत्री बनाने की बात पर ऐतराज़ जताते हैं और पटेल या और कितने नाम लेते हैं उनको अपने दल में कोई दूसरा क्यों नज़र नहीं आता है और अब तो दल की नहीं इक व्यक्ति की सरकार की बात करते हैं। ये दोहरे मापदंड वाले लोग कभी अपने भीतर झांक कर नहीं देखते हैं। औरों पर पत्थर फेंकने वालों को अपने शीशे के घरों की चिंता करनी चाहिए। सबको नसीहत खुद मियां फ़ज़ीहत जैसी बात लगती है।

Thursday, 16 May 2019

मैं गरीब राजा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         मैं गरीब राजा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


      ऐ मेरे प्यारे देशवासिओ अपनी आंखों में भर लो पानी।  इक गरीब राजा की सुनो मुझसे कहानी। मैं बहुत गरीब था मेरा देश बहुत अमीर था सोने की चिड़िया क्या लंका थी सोने की। मैंने कई साल तक भीख मांगी गुज़ारा करने को पेट भरने को। पढ़ाई काम धंधा ये ज़रा टेड़ा सवाल है जो पढ़ा याद नहीं जो किया भूल गया। बस जैसे भाग्य खुलता है लॉटरी लगती है सब अमीर लोगों ने रईस लोगों से भूखे नंगे लोगों तक सभी ने मुझे इतनी भिक्षा डाली इतनी खैरात मिली कि मैं देश का सबसे अमीर बन गया।  सब लोग मुझे राजाजी कहकर बुलाते हैं मगर मैं खुद को अभी भी गरीब बतलाता हूं क्योंकि मुझे अभी भी लगता है मुझे और अधिक चाहिए , समझता खुद को शहंशाह महाराजा हूं पर दुनिया पर राज करने की चाहत है। अपने ठीक समझा है सिकंदर की तरह की हालत है मगर मुझे उसकी तरह दुनिया से खाली हाथ जाना नहीं है मुझे अमर होना है अमृत कलश की तलाश है मिलेगा किसी और को इक बूंद नहीं दूंगा जी भर का अकेले पीना है।

      गरीबी क्या होती है मैं ही जानता हूं , अमीरों को देखता था तो क्या मन करता था बता नहीं सकता। मन की बात कभी कही नहीं रेडिओ पर भी मन की बात के नाम पर बेमन की बात करता रहा हूं। मेरी गरीबी मिट गई मगर अपनी कमाई से नहीं हर किसी से चंदा लेकर अमीर बनकर भी अमीरी का एहसास नहीं आया। लगता है जाने कब सब मुझसे दी हुई खैरात वापस मांग लेंगे। भला कोई भिक्षुक मिली भिक्षा वापस देता है कोई मांगता ही नहीं मगर मैंने भीक ली ही छल कपट झूठ से है तभी लगता है कोई मुझसे मेरी तरह सब छीन सकता है। देश में मूर्खों की कमी नहीं है गरीब को इतना देते हैं मांगने पर कि अमीर बना देते हैं फिर उसी से उम्मीद करते हैं गरीबों की भलाई करेगा। अमीर बनकर अमीरों जैसा बन गया हूं पहले अमीरों को देख का जो सोचता था आजकल गरीबों को देखते ही विचार आता है इनका होना क्या ज़रूरी है। मगर है ज़रूरत इनकी क्योंकि झौंपड़ी सामने नज़र आती है तभी महल की ऊंचाई और शानो शौकत समझ आती है।

    कल इक साधु मिला था सपने में वास्तव में असली संत मुझसे मिलने क्यों आएगा। कहने लगा तुम पहले राजा हो जो बाहर से महंगी पोशाक और सज धज से रईसों से भी बढ़कर दिखाई देते हो जबकि भीतर बदन वही गरीब वाला है दिल गरीब से भी छोटा है गरीब भी आधी रोटी किसी को दे देता है तुम इतना खाकर भी भूखे के भूखे ही रहते हो। ये जाने क्या रोग है मेरी भूख जितना मिलता है खाता जाता हूं मगर दिल भरता नहीं और खाने को करता है। रात रात भर जागता रहता हूं देश भर से भिक्षा मिलती है बार बार भर पेट खाकर भी रहता भूखा का भूखा ही हूं। ये कुर्सी मिली हुई है जो अनपूर्णा की तरह सबको देती है इसको रात दिन जकड़े रहता हूं कोई मुझसे इसे छीन नहीं ले जाये डर सताता है। मुझे गरीब से राजा होना आया है फिर से राजा से गरीब होना नहीं आता मुझे। भले मैं दुनिया का सबसे गरीब हूं ऊपर वाले की नज़र में मगर मुझे राजाजी कहलाना पसंद है गरीब कहता रहता हूं मानता नहीं कोई कह नहीं सकता। मैं गरीब राजा हूं। 

Monday, 13 May 2019

परियों की खोज से भूतों पर शोध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    परियों की खोज से भूतों पर शोध ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      इसे मोदीनामा नाम देना चाहता हूं। जो कहना नहीं चाहिए कहना चाहता हूं। बस इसी देश रहना चाहता हूं कुछ सितम सभी दुनिया के सहना चाहता हूं। होटों पे ऐसी बात मैं दबा के चली आई खुल जाये वही बात तो दुहाई है दुहाई। कोई नहीं जान पाया उनका मकसद क्या है उनको नया कुछ कर दिखाना था। स्वर्ग की परियों को ज़मीं पर लाना था परियां किस जहां में रहती हैं पता ठिकाना ढूंढ़ना था। घर से चले थे हम तो ख़ुशी की तलाश में ग़म राह में खड़े थे वही साथ हो लिए। बस परियां तलाश करने चले और भूत मिल गए तो पहले उन पर ही शोध करने की बात सोच ली। मन का वहम है कि हक़ीक़त है साबित करना था। देश के भूत वही थे उनसे नया कुछ हासिल होना कठिन था इसलिए पचास देशों की सैर की और हर देश की सरकार से यही सहयोग मांगा अपने अपने भूत का इक सैंपल दे दो शोध करना चाहता हूं। शोध का विषय सबको भाया मेरा जादू दुनिया भर में छाया। 

      वो पढ़ने वाला भी पढ़ाने वाला भी स्कूल कॉलेज भी पढ़ाई भी खुद वही। भूत भी उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आते गए उसके नाम के भूत लोगों के सर चढ़ जाते रहे। भूत या किसी के सर चढ़ जाता है या किसी को डराता है। बस यही काम उसको भी आता है तभी दो हिस्सों में बांटने वाला शख्स बन जाता है। बात परियों की कथा की थी भूतों की कहानी बनती गई और शीर्षक मिला डरना मना है जीने की इजाज़त नहीं है और मरना भी मना है। ये साबित किया जा चुका है भूत सच है उसका भूत जनता को भयभीत भी करता है और बचने को उसी का नाम भी जपता है। जब तक भूत भागता नहीं परियां नहीं आने वाली हैं। 

    कोई भूत भगाने वाला आया है उसने मंत्र समझाया है आपको उसका जाप करना है। ये नहीं सोचो पुण्य करना या पाप करना है बस किसी से करवाना नहीं अपने आप करना है। आप भी ठीक से याद करो दस दिन नियमित रात दिन इसी का जाप करो। शब्द जैसे लिखे हैं वही पढ़ने हैं ए ये का ध्यान रखना है। 

                जाएगा , जायेगा , जायेगा , जाएगा जाने वाला जाएगा। 

                                   108 बार माला जपनी है।


भगवान की उलझनें बहुत हैं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान की उलझनें बहुत हैं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी अपनी खुद की परेशानियों को दरकिनार कर ऊपर वाले की उलझनों पर कोई ध्यान देता तो पता चलता अपनी दुनिया से ज़्यादा परेशान खुद दुनिया बनाने वाला है। हम आप अपने घर कारोबार का हिसाब रखते हुए भी गलती कर जाते हैं मगर भगवान को तो गलती करने की भी अनुमति नहीं है सारी दुनिया का हिसाब किताब बराबर रखना ही रखना पड़ता है। हज़ार नहीं अनगिनत तरह के गणित लगाने होते हैं और कोई सीए नहीं कंप्यूटर नहीं कोई आधुनिक गूगल जैसी सुविधा नहीं ऐप्स का उपयोग नहीं। चलो इक छोटी सी लगने वाली बात को लेकर ही समझते हैं कितना कठिन नहीं लगभग असंभव कार्य है इंसाफ करना। 

                                          पहली उलझन


    पति-पत्नी गठबंधन करते हैं अगले सात जन्म का रिश्ता बनाने की सात कसम खाई जाती हैं। उसके बाद हर पत्नी करवाचौथ का उपवास रखती है अपना सुहाग बना रहे और सदसुहागिन बनकर जीना मरना चाहती है। आपको इस में कोई समस्या नहीं नज़र आई होगी जबकि बहुत कठिन है ऊपर वाले का इतनी सी बात को संभव कर दिखाना। अधिकतर पति आयु ही नहीं में भी बड़े होते हैं इक नियम जैसा बना हुआ है। अब पति की लंबी आयु से पत्नी के सदासुहागिन  के वरदान से पत्नी को पहले जाना होता है जहां छोड़ ऊपर वाले के पास , अगला जन्म उसी को पहले मिलता है और जितने साल पति बाद में अकाल चलाणा करता है अगली बार जन्म लेने में उतना अधिक वक़्त बाद में फिर से जन्म मिलता है। समस्या का समाधान तभी हो सकता है अगर अगली बार पति को महिला पत्नी को पुरुष बनाकर जन्म देने का कार्य किया जाये मगर मामला गड़बड़ है पति-पत्नी फिर वही होने का वादा कर चुके थे। ऐसे में अगले जन्म में पत्नी का जन्म पहले और पति का बाद में होना ज़रूरी है जिस से उलझन पैदा होती है। पत्नी बड़ी पति छोटा समाज को मंज़ूर नहीं होता है। इस बार उपवास रखते समय इस बात पर विचार करना। बारी बारी पत्नी का पति और पति का पत्नी बनाने का उपाय स्वीकार है या नहीं।

                                            दूसरी उलझन 

ऊपर वाला जिसको जैसा बनाता है और जिस काम करने का हुनर देता है कोई उस को पसंद करता नहीं। अब हालत ये है कि लोग अच्छे भले धंधे करते हैं मगर चाहते हैं काश चौकीदार जैसा रुतबा हासिल हो जाए। व्यवस्था बनाने को सरकार भी तय करती है किस काम का क्या बजट होगा किस को कितना वेतन मिलेगा क्या काम कितने समय तक करना होगा और नहीं किया तो कठोर करवाई की जा सकती है। सरकार से हर कोई डरता है मगर ऊपर वाले का भी कोई बजट है और सबको उसकी बात मानकर कार्य करना है बदले में नियमानुसार वेतनादि मिलेगा इस की परवाह कोई नहीं करता है। ऊपर वाला जब आमना सामना होगा तब देखा जाएगा यही सोच जिसकी जो मर्ज़ी करते हैं। ऊपर वाला बेबस है चुप चाप देखता है ये सब अपने सामने घटते हुए।

                                    तीसरी उलझन पागलपन

      शीर्षक पढ़कर अंदाज़ा मत लगाना बात दीवानगी की नहीं है पागलपन की है। पागल कौन है कैसे बताया जाये पागल सभी खुद हैं मगर पागल बनाते हैं औरों को। पागल होने की निशानी यही है कि वो सामने असली दुनिया को नहीं देखता और पागलपन में इक अपनी दुनिया बनाकर उसी को वास्तविकता समझता है। हम लोग वास्तविक समाज से बचकर स्मार्ट फोन की झूठी बनावटी दुनिया में जीते हैं और मनोरंजन को बड़ा मकसद समझते हैं। क्या इसको समझदारी कह सकते हैं या फिर इक पागलपन छाया हुआ है। सबसे पहले उनकी बात करते हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित ही नहीं करते बल्कि जिनको हम सब को असली समाज की तस्वीर दिखानी थी लेकिन वो वास्तविकता से बचते हुए इक काल्पनिक दुनिया को देखते और दिखलाते हैं। टीवी चैनल खबर मनोरंजन के नाम पर जिस दुनिया की बात करते हैं देश की तीन चौथाई आबादी से उसका कोई लेना देना नहीं है। फिल्म टीवी सीरियल जाने किस समाज की कैसी कहानियां और संगीत या शो दिखलाते हैं जो हमारी आस पास की दुनिया से मेल नहीं खाता है। सच नहीं है सब झूठ ही झूठ है मगर इस झूठ के सामान को बेचकर ये टीवी चैनल और फ़िल्मकार अभिनय करने वाले मालामाल हो रहे हैं। अर्थात उनको समाज को सच नहीं दिखाना मार्गदर्शन की तो बात ही क्या बस कमाई करनी है चाहे किसी भी तरह से हो। ऐसा लगता है कुछ लोग जो किसी तरह इक आरामदायक जीवन जी रहे हैं उनको बाकी समाज जो साधनविहीन है को लेकर कोई चिंता नहीं है। क्या अपने ही देश के लोगों के लिए ऐसी उदासीनता उचित है। समझा जाये तो हम पागल बन गये हैं और पागलपन पाकर खुश भी हैं।

                              उलझन की उलझन सबसे बड़ी उलझन 

  अभी तक मेरा भारत महान है ऐसा कहने पर क्यों महान है कोई सवाल नहीं पूछता था। अब महान होने का सबूत मिलने लगा है। प्यार के ढाई अक्षर कौन से हैं नहीं पता झूठ दो अक्षर से बड़ा बन गया है झूठ महान भी है उसकी शान भी है। लोग सत्य की खोज किया करते थे अब कोई झूठ पर शोध किया करता है। इक रेडियो कार्यकर्म हुआ करता था अंधेर नगरी चौपट राजा जिसका न्याय कमाल हुआ करता था। चोर की दाढ़ी में तिनका तलाश करते थे भैंस लाठी वाले की हो जाती थी। गूंगी गुड़िया सबसे अच्छा गाती थी कोयल कौवे से हार जाती थी। शासक का निर्णय आखिरी होता है न्याय अपने भाग्य पर रोता है। कल तक कौन उनसे सवाल करता था खुद वही हाल बेहाल करता था जो कहता सब दोहराते थे उसके संग संग रोते गाते थे। खुद उसने किसी को बुलाया है साक्षात्कार अजब दे दिखाया है। हमने सोचा था जवाब आएगा हैरान हैं सवाल ही बेमिसाल आया है। अपने आम चुराया है किस तरह आम को खाया है ,आपकी जेब खाली है डिजिटल कैमरा आज़माया है जब बना भी था आपके पास था टेक्नोलॉजी पर सितम ढाया है इंटरनेट से पहले नेट चलाया है। काला धन की बात क्या करनी है ब्लैक एंड वाइट को कलर बनाया है। हर किसी को मज़ा आया है ये कौन है जो झूठ का पिटारा लाया है हर झूठ उसका सच कहलाया है। देश क्यों महान था कोई बताने की बात नहीं समझ आती थी ये महानता को घसीट लाया है। क्या है जो नहीं कर दिखाया है उसने भगवान का खोटा सिक्का चलाया है। अपने चार युग सुने थे पांचवां युग लेके आया है ये झूठ का युग बहुत अच्छा है हर कोई इसके सामने अभी बच्चा है। चांद सूरज हवा पानी सब पर चलती उसकी मनमानी। चोर की भी है कोई नानी जो सुनाती है अपनी कहानी। तीर ऐसा कोई चलाता है जो रात को भी दिन बनाता है रास्ते उसके जो भी आता है उसी की दास्तां सुनता सुनाता है ख्वाब देखता नहीं दिखाता है हथेली पर सरसों उगाता है। देश भूखा रह जाता है वो भी बहुत थोड़ा खाता है खाता नहीं खाने पीने की हर बात को हवा में उड़ाता है। ज़िंदगी का साथ उड़ाता चला गया हर फ़िक्र को धुवें में ...........

पागल हुआ दीवाना हुआ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    पागल हुआ दीवाना हुआ ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

           मास्टरजी को पढ़ना पसंद नहीं था और पिता जी की ज़िद थी उनको विलायत न सही किसी और राज्य में उच्च शिक्षा दिलवानी है। अनपढ़ माता पिता को जो मर्ज़ी बताया जा सकता है फेल होने पर समझते कि हर क्लास में दो तीन साल लगाने से नींव मज़बूत होती है। ग्वालियर का नाम था दसवीं फेल बारहवीं पास कर सकते हैं पिता को मनाया और सीधे उच्च शिक्षा पाने चले गए। वापस आकर अपना स्कूल खोला और खूब कमाई की गांव की शान समझे जाते रहे भगवान उनको स्वर्ग से कम क्या दे सकता है। किसी ऐसे स्कूल से पढ़ाई पढ़कर अब कोई देश को पढ़ना लिखना सब सिखला रहा है ये कथा आधुनिक भगवान की है। हर दिन कोई न कोई ऐसी घटना बताता है जो असंभव ही नहीं होती बल्कि हास्यस्पद लगती है। विज्ञान से भगवान तक को चुनौती देती है। मनघड़ंत बात जिस आत्मविश्वास से कहते हैं सुनने वाला समझ कर भी कुछ समझ नहीं पाता है। पता लगाना कठिन है ये जनाब किस युग की बात कर रहे हैं क्या हर समय हर जगह रहे हैं असंभव को संभव करने का दावा है। जो संभव था नहीं किया ये नहीं बताते उनकी मर्ज़ी है। लोग अब शक करने लगे हैं उनको किसी मनोचिकिस्तक की राय लेने की सलाह देते हैं। 

    अचानक गढ़ा धन या कोई करोड़ों की लॉटरी लगने से मनसिक संतुलन बिगड़ जाता है। बड़ी बड़ी बातें करने लगता है खुद को ज्ञान का भंडार जाने क्या क्या कहने लगता है। लोग बुरा नहीं मानते हंसते हैं मन ही मन में पगला गया है। सबको खुश देख समझता है मेरा रुतबा ऊंचा हुआ है। कोई उसकी बात पर यकीन नहीं करता लेकिन बच्चों को अपनी शौर्य गाथा सुनकर ताली बजवाता है। बच्चों को झूठी मनघड़ंत कहानियों को सुन मज़ा आता है। किसी गांव में सभी अच्छे लोग रहते थे कोई भी सरपंच बनने के काबिल नहीं था तो पास के शहर से इक झूठा मक्कार मतलबी आया और सबको गांव को शहर बनाने का सपना दिखाया और सरपंच कहलाया। जब गांव का नाम बदल कर कबीर बस्ती को कबीर नगर किया तो सबको लगा उल्लू बनाया है। गांव में बिजली पानी सड़क कोई भी सुधार नहीं हुआ बस नाम अच्छा रख लिया। पागलखाने में पागल रोगी अपनी ख्वाबों की दुनिया बसा लेते हैं और खुश रहते हैं। कोई खुद को राजा समझता है कोई बारात लेकर महबूबा को लाने चलता है। फ़िल्मी कहानियों का असर कुछ लोगों पर बहुत देर तक रहता है। खिलौना जानकर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो। हमने देखी है उन आंखों की महकती खुशबू हाथ से छू के उसे रिश्तों का इल्ज़ाम न दो। ख़ामोशी फिल्म की नायिका नायक का उपचार करते करते खुद पागल हो जाती है। जिस कमरे से नायक की छुट्टी हुई उसी में नर्स नायिका रोगी बनकर दाखिल हो जाती है।

        इधर सुनने में आया है कि  जैसे कुछ पुरुष पत्नी से छुटकारा पाने का सपना देखते रहते हैं आजकल ऐसी भी महिलाएं हैं जो सोचती हैं काश उनका भी नसीब उस महिला जैसा होता जिसको छोड़ कर चले जाने वाला बहुत महान राजनेता कहलाता है। नारी नारी के दर्द को कभी नहीं समझती है उल्टा कई पुरुष पत्नी पीड़ित होने का नाटक करते हैं और किसी महिला की सहानुभूति हासिल कर लेते हैं। बात पति पत्नी और वो की है जिस का नायक बंदर की तरह गुलाटी मारना छोड़ता नहीं। पत्नी को छोड़ने वाले नेता को महिलाओं के अधिकारों का रक्षक समझना नामुमकिन का मुमकिन होना है। शायद जल्दी ही ऐसी महिलाएं अपने अपने पति को घर से जाने की अनुमति खुद दे सकती हैं इस शर्त पर कि उनको राजनीति में शामिल होना होगा।

       
     प्यार कहते हैं अंधा होता है मगर कोई भी अंधा किसी से प्यार नहीं कर सकता है। ये फ़लसफ़े की बात है समझने की कोशिश मत करो अगर नहीं समझ आई तो। कोई किसी बदसूरत लड़की पर फ़िदा हो अगर तो हर कोई समझेगा पागल हुआ है कोई दूसरी नहीं दिखाई दी। ज़हर कड़वा लगता है कोई नहीं पीता है मगर जब कोई मीठा ज़हर पिलाता है तो सब पी लेते हैं। उसकी बातें उसकी शैली सबको पागल करती है। ये इश्क़ रोग ही नामुराद है दिल बेवफ़ा पर ही आता है। हमको उनसे हो गया है प्यार क्या करें। पागलपन संभव असंभव की बात नहीं समझता है होनी को अनहोनी अनहोनी को होनी जब जमा हो तीनों मजनू रांझा महिवाल इक जगह। कागज़ के फूल फिल्म बनी थी आजकल शहर कागज़ी बन चुके हैं ज़रा से हवा चलती है बिखरने का डर लगता है। दिल्ली देखने को पत्थरीली है मगर वास्तव में सब कागज़ी है कोई जाकर किसी फूल को छूता है तो सभी कागज़ बिखर जाते हैं।

               याद आते हो कभी मिलते थे कितनी बातें करते थे अजनबी शहर जाकर तुम तो खामोश हो गए। कोई हमज़ुबां नहीं मिलता यहां भी। ये सच है इक  दोस्त था  कॉलेज का शिक्षक रहा है जाने क्यों यादास्त खो गई है अब कोई चिंता नहीं सताती होगी।  कल कोई मिलने गया था उनसे तो उनको अभी भी पिछले चुनाव की बात याद थी और पूछने लगे अच्छे दिन आने वाले हैं क्या अभी भी लोग इंतज़ार करते हैं।  उनकी सुई वहीं रुकी हुई है। इस बीच गंगा स्वच्छ हुई काला धन मिला गरीबी मिटी सब को छोड़ लोग इक पुराना खेल खेलने लगे हैं। पागल हो जाना भी राहत की बात हो सकती है।   
      

Saturday, 11 May 2019

चाय पर शोध ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         चाय पर शोध ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  आज रविवार का दिन है उठने की कोई जल्दी नहीं थी मगर पत्नी जी ने जगा दिया। उठो भी चाय बन गई है। कितना खूबसूरत सपना था देख रहा जगाकर तोड़ दिया। चाय पीना पसंद है लत लगी हुई है चाय ने क्या क्या नहीं करवाया है। कॉलेज में इक दोस्त को चाय की इतनी चाहत थी कि रात भर पढ़ने को नहीं चाय पीने को जागता रहता था। सिनेमा हॉल के बाहर चाय वाले की चाय की बात कुछ और थी ऐसे ही मेरे शहर में इक स्वादिष्ट चाय बनाकर पिलाने वाला इतना सफल हुआ कि शहर में भगत जी की मिठाई से अच्छी कोई मिठाई नहीं लगती है। चाय की कहानी सदियों पुरानी है विदेशी राज का चाय से रिश्ता रहा होगा हम क्या समझते मगर पिछले चुनाव में चाय पर चर्चा ने जो कर दिखाया कोई कल्पना नहीं कर सकता था। जो कहता था मुझे चौकीदार बना लो उसको खज़ाने का मालिक ही बना दिया अब मालिक की मर्ज़ी है कोई चोरी थोड़ा कहलाती है अपना समझ खूब खज़ाना उड़ाया है। चाय तुमने कितना सितम ढाया है। मुझे इक गीत याद आया है शायद मेरी शादी का ख्याल दिल में आया है इसी लिए मम्मी ने मेरी तुम्हें चाय पे बुलाया है। कुछ लोग नेताओं को चाय पर बुलाते हैं नेता जी पूरी बारात लेकर आते हैं चाय पीने पर लाखों खर्च हुए लेकिन नेताजी जीत जाने पर कीमत चुकाते हैं अपने चाहने वाले को कुछ न कुछ बनवाते हैं। 

       चाय बदनाम हो गई है शराब से बढ़कर , चाय गर्म अच्छी लगती है ठंडी चाय पीना इक सज़ा है लोग पांच साल से प्याली लिए खड़े हैं उसने चाय डाली ही नहीं। साक़िया जम के पिला से इक बार मेरी प्यास बुझा दे। औरों को पिलाते रहते हैं और खुद प्यासे रह जाते हैं ये पीने वाले क्या जाने पैमानों पे क्या गुज़री है। दीवानों से ये मत पूछो दीवानों पे क्या गुज़री है , हां उनके दिलों से ये पूछो अरमानों पे क्या गुज़री है। मैंने भी इक शेर कहा है। प्यास बुझती नहीं कभी उनकी , दर्द समझो कभी तो प्यालों का। आप पूरी ग़ज़ल ही सुन सकते हैं काम की बात है। 

हल तलाशें सभी सवालों का - लोक सेतिया "तनहा"

हल तलाशें सभी सवालों का ,
है यही रास्ता उजालों का।

तख़्त वाले ज़रा संभल जायें ,
काफिला चल पड़ा मशालों का।

फूल भेजे हैं खुद रकीबों को ,
दे दिया है जवाब चालों का।

प्यास बुझती नहीं कभी उनकी ,
दर्द समझो कभी तो प्यालों का।

ख्वाब हम देखते रहे शब भर ,
मखमली से किसी के बालों का।

बेच डालें न देश को इक दिन ,
कुछ भरोसा नहीं दलालों का।

राज़ दिल के सभी खुले "तनहा" ,
कुछ नहीं काम दिल पे तालों का।

         चाय थी इक प्याली थी जिसने दफ्तर के बाबू को खुश कर अपना काम निकलवाया था। ये राज़ किसी ने मुझे बताया था चपरासी अधिकारी से घर से ही सही करवा लाया था। सही करना हस्ताक्षर करने को कहते हैं। चाय की कीमत भले चार आने से दस रूपये हुई हो चाय फिर भी चाय रही है कोई अहंकार नहीं पालती है। तबले बजाने वाला वाह ताज कहता था चाय की मस्ती थी सबसे कहता था। चाय की दुनिया निराली है ये जो आपके सामने चाय की प्याली है आधी भरी हुई है सरकार कहती है जनता समझती है आधी खाली है। चाय पर पहरा लगा रखा है हंगामा मचा रखा है चाय की रखवाली है कोई मक्खी चाय में गिरने नहीं देनी आपको हरदम बजानी ताली है। आपको ताली बजानी है चाय किसी और को पिलानी है ये चाय बड़ी मस्तानी है। चाय वाला सुनाता नित नई कहानी है। अपने गलास भर के चाय पी नहीं किसान लोटे की बात करते हैं चाय नहीं उसकी तस्वीर भेज दी बड़े धोखे की बात करते हैं।

    चाय का रंग कितना सच्चा है चाय अपनी बेटी है कॉफी पड़ोसी का बच्चा है। मामला ये उलझा हुआ बहुत है इक जैसे हैं अंतर बहुत है कीमत महंगी है उसकी अपनी सस्ती है। ये चाय भी गरीब की बस्ती है। चाय पीते भी हैं पिलाते भी हैं चाय को लाजवाब बताते भी हैं। चाय पर तोहमत लगाई जाती है गैस बनाती है तेज़ाब बनाती है चाय इस आरोप से घबराती है आपको बिस्कुट भी साथ खिलाती है। खाओ और सबको खिलाओ यही बात सबसे अच्छी है जो अकेला खाना चाहता है मतलबी है बात पक्की है। चाय पीकर भी नींद आने लगी है बात यही सबको डराने लगी है। चाय में जाने क्या क्या कंपनी मिलाने लगी है चाय पियोगे कम बीमार पड़ोगे स्लोगन सुनाने लगी है। बचपन की बात याद आई है मुफ्त गली गली चाय पिलाई है आज देखो क्या कमाई है। चाय और पकोड़े दो साथी हैं मिल जाएं तो बात बनती है लोग कहते हैं कोई चाय वाला है उसकी पुलिस वाले से बड़ी छनती है। चाय पर शोध अभी जारी है न जाने किसकी अबके बारी है कोई पुलिस वाला कहता है उनकी चाय कड़क होती है चीनी कम होती है कड़वी लगती है। इक फौजी भी चाय पीता है उसका बड़ा सा धातु का मग उसकी पहचान है सीमा पर खुला आसमान उसका मकान है। चाय का विस्तार बहुत है आदमी लाचार बहुत है पीकर भी कोई कहता है बेकार बहुत है। और पीनी है जवाब देना है , जी नहीं जी नहीं बस इतनी नसीब में थी मेरी सरकार बहुत है। चाय तेरा भी किरदार बहुत है इस पार ही नहीं उस पार बहुत है। किया इस चाय ने लाचार बहुत है बिन पिये लगता जीना बेकार बहुत है। और मत बोलो अब बहुत हुआ जितना कहा है यार बहुत है। चाय का खुला दरबार बहुत है अपना उसका संसार बहुत है।



दूर के ढोल सुहावने लगते ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   दूर के ढोल सुहावने लगते ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       पांच साल तक हम भी सुनते रहे विदेशों में उनकी धूम मची हुई है। भारत से बाहर रहने वाले भारतीय सुना है अभी भी कायल हैं नेता जी ने कमाल किया है। बस उनका कमाल देशवासियों को ही नज़र नहीं आता। काश हम भी विदेशी चश्मा खरीद लेते और जो नहीं हुआ उसको देख सकते। हुस्न कहते हैं देखने वाले की नज़र में होता है। विदेश में किसी शानदार होटल में शराब और डिनर का लुत्फ़ लेते  वाह वाह करना उनको भी आता है जो इधर से आये शायर की शायरी सुनते हैं कभी कभी। पैसे का खेल कमाल का खेल है। सोचा इस बार बाहर रहने वाले देश वापस आकर रहना शुरू करने वाले हैं और चुनाव पर मतदान करने ज़रूर आएंगे देशभक्ति आखिर देशभक्ति है। मगर पता चला वहीं से सोशल मीडिया पर मतदान की रस्म निभा रहे हैं चुनाव आयोग को उनकी भी गिनती जोड़नी चाहिए। इस देश में उनकी सांस घुटती है सुरक्षा का कोई भरोसा नहीं भले उनको सरकारी सुरक्षा मिली हुई है और खुद भी अपने बाऊंसर रखे हुए हैं।

         नेता हैं क्योंकि पिताजी भी नेता थे। अभी अभी उनका संदेश वीडियो से मिला है। शुरआत करते हैं मेरे बच्चे विदेश में रहते हैं मैंने उनसे पूछा कौन देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए। सबने एक साथ जवाब दिया उनको और किसको , नाम नहीं लिया मैंने क्योंकि बात किसी नेता का समर्थन या विरोध की नहीं है। नेता जी हमारे राज्य के ही नहीं यहीं के ही हैं और जिस दल का समर्थन करते हैं अपने बच्चों को वोट डालने को ज़रूर बुलवा सकते हैं कोई धन दौलत की कमी नहीं है। मगर पिता जी को जो कहा या नहीं कहा वही जानते हैं लेकिन भारत में रहने वाले दोस्तों को समझाते हैं क्या रखा है उस देश में। कौन जाना चाहता है वापस वतन को क्या है उस जगह। कहते हैं उनको राजनीति करनी है मगर सांसद विधायक बनने से अधिक महत्व कारोबारी विस्तार पर ध्यान देना ज़रूरी है। जौहरी हैं हीरों का कारोबार करते हैं और असली नकली की परख भी करना जानते हैं। बच्चों को समझ आ गया है अब भरोसा नहीं किसी का भी और जिनको समर्थन दे रहे हैं मतलब और डर के साथ बहुत कुछ लेकर उनका क्या पता कल नहीं जीत पाये तो किसी और के पास जाना भी आसान नहीं होगा। इक बहुत पुरानी बात राजनीति की याद आई है। पिता राजनेता थे और बच्चे को भी राजनीति में लाना चाहते थे। बच्चे को ऊपर छत पर खड़ा किया और खुद नीचे आकर कहा बच्चे छलांग लगा दो , बच्चा कहने लगा मुझे चोट लग सकती है। पिता जी बोले घबराओ मत मैं खड़ा हूं तुम गिरोगे तो मैं पकड़ लूंगा गिरने नहीं दूंगा। बच्चे ने विश्वास किया और कूद गया मगर नेता पिता ने पकड़ा ही नहीं। जब बच्चा रोने लगा तो नेताजी ने ने समझाया यही राजनीति का पहला सबक है , कभी किसी पर ऐतबार मत करना अपने बाप पर भी नहीं।

          बात हास्यास्पद है जो विदेश जाकर रहते हैं वो बताएंगे कौन अच्छा है। मगर ऐसे अकेले वही नहीं है बहुत सारे लोग जो महानगर में उच्च वर्गीय जीवन जीते हैं उनको नहीं मालूम गांव छोटे शहर और किसान मज़दूर गरीबी की रेखा से नीचे बदतर जीवन जीने वाले कैसे रहते हैं। महानगर की चकाचौंध रौशनी में दिखाई नहीं देता कोई गंदी बस्ती या फुटपाथ पर भी रहने को मज़बूर है। आपको आरो मिनरल वाटर मिलता है खरीद सकते हैं उनको पीने को साफ पानी भी नसीब नहीं है। विदेश में बैठ कर आई लव माय इंडिया कहना देशभक्ति नहीं है। और वो लोग जो देश में रहते हैं मगर चाहते हैं अमेरिका इंग्लैंड यूरोप जाकर रहना उनसे देश को बेहतर बनाने को बातें सुन सकते हैं कोई कोशिश नहीं करने की उम्मीद रख सकते हैं।

       बाहर विदेश रहकर देश को समझ नहीं सकते आप। अगर किसी नेता को विदेशी शोहरत पसंद है तो उसके बारे कुछ भी कहना फज़ूल है। देश में रहते हैं चाहे विदेश में पहला सवाल यही है आप खुद देश को अच्छा बनाने में क्या योगदान देते हैं। केवल अपने लिए घर बनाना परिवार का पालन पोषण करना हर कोई करता है अशिक्षित गरीब भी , आप अगर पढ़े लिखे हैं और साधन संपन्न हैं तो देश और समाज को आपको कुछ योगदान किसी भी तरह से बिना कोई स्वार्थ देना चाहिए। अगर वास्तव में ऐसा होता तो शायद नहीं यकीनन देश की हालत जैसी आज है कभी नहीं होती। बहुत सुधार हो सकता था। सबसे कमाल की बात ये है हर कोई जिस नेता को लेकर मानता है उसकी किसी बात का कोई भरोसा नहीं उसी को फिर से बनाने को मज़बूरी समझते हैं। जबकि लोकतंत्र का अर्थ ही है भरोसा होना अगर किसी पर लोग भरोसा ही नहीं करते तो उसका किसी पद पर होना ही अनुचित है। शायद इसी को कमाल करना कहते हैं जिसका भरोसा नहीं उसी पर विश्वास कर छत से छलांग लगाने का इरादा है। शोर दूर से अच्छा लगता है पास आने पर कुछ भी सुनाई नहीं देता , इतनी दूर से सच दिखाई नहीं देता।

मेरी भी कहानी है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

       मेरी भी कहानी है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

 कहानी तो सबकी होती ही है और सबकी कहानी बाकी लोगों से थोड़ी अलग भी और कुछ कुछ मिलती जुलती सी भी हुआ करती है। कई बार कोई अपनी बात बताता है तो लगता है यही कभी मेरे साथ भी बीत चुका है। साहित्य जिस भी विधा में लिखा हुआ हो जब पाठक को कविता ग़ज़ल कहानी खुद के साथ जुड़ी हुई लगती है तभी लोगों को पसंद आती है और याद रहती है हमेशा। हम कोई उपन्यास पढ़ते हैं फिल्म देखते हैं या कोई रचना पढ़ते हैं और उसके किरदार को खुद से जुड़ा महसूस करते हैं तब भीतर दिल से अपने जीवन के अतीत में खो जाते हैं। मुझे कई बार कुछ गीत सुनकर लगता है जैसे मेरी वास्तविकता है या किसी फ़िल्मी किरदार में अपनी छवि देखते हैं। अपने सोचा है कोई गीत आप बार बार सुनना चाहते हैं फिल्म बार बार देखना चाहते है कहानी के डॉयलॉग आपको कभी नहीं भूलते हैं ऐसा केवल पसंद होने से नहीं होता है कोई नाता कहीं जोड़ता है। हम जो किसी को समझा नहीं सकते बताना कठिन होता है या बताना चाहते नहीं उस को ऐसे देख कर पढ़कर लगता है कोई राज़दार मिल गया है। कला आपको अच्छा इंसान भी बनाती है और हर हालात में जीना भी सिखलाती है। मानवीय संवेदना होना ही जीना है और संवेदन शून्य लोग भावना को नहीं समझने वाले पत्थर जैसे होते हैं। पत्थर से आपको कोई संवेदना नहीं मिलती है इसलिए इंसान की इंसानियत उसको पत्थर नहीं होने देती। 

              बच्चों को मां दादी नानी कहानियां सुनाया करती थी रात को परियों की सितारों की चांदनी की फूलों की नगरी की। स्कूल की शिक्षा से कम सोचने की समझने की शक्ति को विकसित नहीं करती थी। आपको सपने देखना ही नहीं सपने बुनना भी आता है तो सपने सच करने की ऊर्जा भी होती है। कभी जब भी जीवन में निराशा छाने लगती है तब अपने पुराने ख्वाबों में खो जाना आपको साहस देता है। डायरी लिखना अच्छी आदत हुआ करती थी जो शायद खो गई है सोशल मीडिया आपको वो एहसास नहीं दे सकता है। आप अपने आप से संवाद करना छोड़ कर खुद से अजनबी हो जाते हैं। ऐसा भी होता है कोई कभी आपको आपके साथ मिलवाता है कोई व्यक्ति दोस्त या कोई घटना या कोई कहानी फ़साना कुछ भी हो सकता है। आप इतनी बड़ी दुनिया में हज़ारों लोगों से पहचान कर सकते हैं मगर फिर भी अकेलापन लगता है तो आपको अपने आप से मुलाकात करनी ज़रूरी है। ये अचरज की बात है हम तमाम लोगों के बारे सब कुछ जानते हैं और जो नहीं जानते मालूम करने को उत्सुक रहते हैं पर खुद को लेकर नहीं सोचते कि हम क्या हैं कैसे हैं क्यों हैं। सोचो औरों की ही तरह मेरी भी इक अपनी कहानी है। आपकी कहानी जो भी हो बहुत अच्छी है और सच्ची है जिस में कोई काल्पनिक बात नहीं है।

Thursday, 9 May 2019

कथा शैतान की ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

        कथा शैतान की ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

पूर्वकथन - ये कथा उस वक़्त की है जब दुनिया बनाई जा रही थी। आदमी पशु पक्षी जानवर के बाद जब शैतान बनाने की बारी आई तब लेखक भी खड़ा था। मगर दुनिया बनाने वाले का आदेश था कि ये कथा सुनानी नहीं है मुंह बंद रखना है आज लिख रहा हूं क्योंकि कोई सुनता नहीं समझेगा भी नहीं विश्वास भी नहीं करेगा यही निर्देश मिला था जब ऐसा समय आएगा तभी लिखना बेशक कोई ऐतबार करे नहीं करे पढ़े नहीं पढ़े। कथा शुरू करते हैं। 

          इंसान जानवर पशु पक्षी कीड़े मकौड़े जाने कितना कुछ बनाते गए कोई कुछ नहीं बोला। सबको अपनी पहचान उचित लगी थी। मगर जब शैतान बनाने लगे तो उस को पसंद नहीं आया अपना रंग रूप और सबसे अलग नज़र आना। हाथ जोड़ बोला हे दुनिया बनाने वाले इस तरह सब देखते समझ लेंगे मैं बुरा नहीं बेहद बुरा हूं कोई पास रहने नहीं देगा मेरा जीना दूभर हो जाएगा। दयालु हैं उनको दया आई और पूछा फिर किस तरह से शक्ल सूरत बनाई जा सकती है। उसने कहा आप मुझमें शैतान की सब बातें शामिल कर दो मगर मुझे रहना इंसानों के साथ ही है जानवर पशु पक्षी से अलग मुझे उन्हीं जैसा इंसान बना दो। सबको बता दो शैतान क्या है शैतानियत किसे कहते हैं लोग समझदार हैं सबको दिमाग मिला है समझ लेंगे। शैतान की बातों में ऊपर वाला भी आ गया था हम आप क्या हैं। ऊपर वाले ने हर दसवां इंसान शैतान बनाया जो दस नंबरी कहलाया। दस नंबर का जूता हर किसी को फिट नहीं आया जिसने भी पहना घबराया बचकर भाग आया। 

      शैतान की पहचान आसान नहीं थी उसकी कोई भाषा कोई ज़ुबान नहीं थी रंग बदलने में महारत हासिल थी। शैतान हर घर हर गांव रहता है खुद को अच्छा औरों को शैतान कहता है शिक्षक समझता है ये कुछ कच्चा है हर बच्चा लगता शैतान का बच्चा है। शैतान की खुद अपनी पढ़ाई है शैतान कोई नहीं है इंसान का भाई है , उसका सब कुछ है उसकी चतुराई है। दुनिया भर की सरकार शैतान की बनाई है हर जगह किसी शैतान की शैतान से लड़ाई है। शैतान खुद नहीं जंग कभी लड़ता है उसके इशारे पर इंसान लड़ा करता है। जिस तरफ देखो हुकूमत शैतान की है ख़ामोशी छाई है आहट तूफ़ान की है। सब जानते हैं पुरानी कहानी है बिल्ली है जो वही शेर की नानी है। शैतान की भी इक नानी है राजनीति की बुढ़िया कितनी पुरानी है , मरती नहीं मरने नहीं देती है ये इक जिस्मफरोश है जवां थी रहेगी रहती है। अभी सोलह बरस की खुद को कहती है। 

          हर दिल शैतान का बना बसेरा है बेकार का लफड़ा है क्या तेरा है क्या मेरा है। ये दुनिया समझ लो इक रैन बसेरा है चल उड़ जा रे पंछी ये देश बेगाना है। कलयुग क्या है शैतान का आशियाना है इंसान का नहीं कोई भी ठिकाना है , ये उसी की बस्ती है किस्सा पुराना है। शैतान कहता है बदलने वाला है ये बात कुछ नहीं बस इक बहाना है। शैतान ने कोई तीर अपना चलाना है। शैतान है पैसा शैतान है ताकत भी शैतान का महल है दौलतखाना है। शैतान सबको लगता मगर अपना है शैतान बन जाने का हर किसी का सपना है। क्या तुमने भी हाथ उससे मिलाया है शराफत खोई है कुछ भी नहीं पाया है। शैतान की महिमा का गुणगान जिस किसी ने गाया है मत पूछो किस तरह ऊपर फिर पहुंचाया है। बात खत्म करने से पहले इक गुज़ारिश है। मेरी इक पुरानी ग़ज़ल को सुन कर विचार करना। 

                             ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया 

फिर कोई कारवां बनायें हम ,
या कोई बज़्म ही सजायें हम।

छेड़ने को नई सी धुन कोई ,
साज़ पर उंगलियां चलायें हम।

आमदो रफ्त होगी लोगों की ,
आओ इक रास्ता बनायें हम।

ये जो पत्थर बरस गये  इतने ,
क्यों न मिल कर इन्हें हटायें हम।

है अगर मोतिओं की हमको तलाश ,
गहरे सागर में डूब जायें  हम।

दर बदर करके दिल से शैतां को ,
इस मकां में खुदा बसायें  हम।

हुस्न में कम नहीं हैं कांटे भी ,
कैक्टस सहन में सजायें  हम।

हम जहाँ से चले वहीँ पहुंचे ,
अपनी मंजिल यहीं बनायें हम। 

  दुनिया बनाने वाले ने तरह तरह की कथाएं कहानियां बनाई हैं। कथा शैतान की भी बिना उसके चाहने से नहीं लिखी जा सकती थी। उसकी इच्छा बिना पत्ता भी नहीं हिलता है। शैतान को अपनी दुनिया से भगाना है इंसान को फिर से इंसान बनाना है। उपाय कठिन नहीं बताता हूं ये कथा ध्यान से सुना करो हर दिन सुनाता हूं। कथा बाकी है पर अभी जाता हूं उस शैतान ने इसी तरफ अभी आना है मुझे जाने दो अब मुझे जाना है।

 



Wednesday, 8 May 2019

फ़िदा हैं दर्शक खलनायक पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     फ़िदा हैं दर्शक खलनायक पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 


             बंदूक तलवार किसी के हाथ होती है लोग सुरक्षित महसूस करते हैं। क्योंकि जिस के पास हथियार है औरों को भरोसा दिलवाता है सुरक्षित हैं आप मैं आपकी सुरक्षा करता हूं। हथियार जिस के पास है आपको डर दिखलाता है दहशत पैदा करता है और खुश है लोग उसके सामने झुकते हैं सत्ता से धन की ताकत से या जिस्मानी ताकत की गुंडई से घबराकर।  कोई औज़ार से निर्माण करता है कोई औज़ार से विधवंस करता है। जिसने बनाया उसको बहुत कुछ सोचना पड़ा समय लगा और कठिनाईयां पेश आईं मगर जिसने अवसर मिलते ही बनाने की नहीं मिटाने की बात की उसको कुछ भी नहीं समझना पड़ा कुछ भी नहीं सोचा बस हाथ में सत्ता पैसा अधिकार आया तो मनमानी करने लगे। विचार हमने करना है किसको पसंद करते हैं नफरत को या मुहब्बत को। इतिहास गवाह है नफरत करने वाले धन दौलत सत्ता का अंबार जमा करने के बाद भी नायक नहीं खलनायक ही बन पाए हैं। मुहब्बत और प्यार करने वाले ज़िंदा नहीं रहे तब भी दिलों में बसे रहते हैं नायक कहलाये हैं। 
             जब लोग खलनायक को नायक समझने की भूल करते हैं तो रावण कंस हिरण्यकश्यप जैसे लोग होते हैं जो आखिर में अधर्म और झूठ की पर्याय बन जाते हैं।  ये कैसा निज़ाम है जिस में जब भी बात होती है निराशाजनक हालात की बात होती है। आशा जगाना नहीं आता बस हर किसी को बदनाम करना आदत है और सबको अंधा साबित कर खुद काना होने को अच्छा होना बतलाता है और सब पर हुक्म चलाता है। देश की रोटी पानी रोज़गार शिक्षा स्वस्थ्य की हालत नहीं बदलता केवल बड़ी बड़ी चांद सितारों की कहानियां सुना कर बहलाता है। इतिहास को झूठा खुद को सच्चा बताता है और जितने भी महान नायक हुए सबको खलनायक बताता है। अच्छाई से उसका इतना नाता है उसके दल में शामिल होकर पापी भी धर्मात्मा कहलाता है। इक नई रीत चलाई है परदे पीछे दुश्मन है सामने भाई भाई है। 


रंक भी राजा भी तेरे शहर में ,
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में।

नाव तूफां से जो टकराती रही ,
वो किनारे जा के डूबी लहर में।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है ,
रोक रोने पर भी है अब कहर में।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ ,
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में।

क्या भरोसा आप पर "तनहा" करें ,
आप जाते हो बदल इक  पहर में। 

  अगर आप शराफ़त पसंद हैं तो किसी मुगालते में मत रहिये। कल रात टीवी पर रियलिटी शो में ये भी सामने आया कि आधुनिक नारी को विवाह करने को वही पुरुष बेहतर लगते हैं जो आवारा किस्म के होते हैं। शराफत अली को शराफत ने मारा , किसी को किसी की मुहब्बत ने मारा , किसी को किसी की अदावत ने मारा। शरीफ लड़के किसी लड़की से मुहब्बत का इज़हार करते डरते हैं कि कहीं लड़की बुरा नहीं मान जाये अब अगर शादी करने को भी शरीफ उनकी पसंद नहीं हैं तो बेचारे शरीफ लोग किधर जाएंगे। लेकिन इसको हम कोई देश की समस्या नहीं मान सकते हैं। समस्या है जब लोग देश की राजनीति से लेकर तमाम अपने समाज के विशेष कहलाने वाले वर्ग को लेकर यही सोच रखने लगते हैं। खलनायक इस युग के नायक बन गये हैं और नायक हास्य कलाकार भी नहीं क्योंकि खलनायक अपना किरदार निभाते हैं तो लोग उनकी हर बात पर हंसते हैं तालियां बजाते हैं। बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है यूं भी हालात से समझौता किया जाता है। क्या कमाल है नेताजी खलनायकी भी करते हैं और लोग उनकी भाषा बदज़ुबानी झूठ पर झूठ को देख कर भी अनदेखा करते हैं। खलनायक की गाली भी ताली बजवाती है। अजब आशिक़ी है जो दवा के नाम पे ज़हर से उसी चारागर ( डॉक्टर ) की तलाश है। ज़हर इतना मीठा लगता है कभी सोचा नहीं था।

          किसी फ़िल्मी नायक की असली ज़िंदगी और फ़िल्मी किरदार की बात विपरीत होना और बात है। फिल्म की कहानी डयलॉग कोई लिखता है अभिनेता अभिनय करता है , अभिनय को सच समझने की भूल हो जाती है भोली जनता उसकी बेबसी पर आंसू बहाती है। वास्तविक जीवन में उसका किरदार उल्टा है सती सावित्री बनी थी कुल्टा है। घर किसी का बर्बाद कर खुद घर बसाया है शादीशुदा उसके मन भाया है , लो उसने भी दूजा ब्याह रचाया है पहली को नहीं छोड़ा इक और को लाया है। ये कोई इश्क़ की कहानी नहीं है किस किस से रिश्ता बनाया उसका कोई सानी नहीं है। हम जानते हैं अनजान बन जाते हैं ऐसे लोगों को सांसद भी बनाते हैं। बबूल बोने वाले क्या आम खाते हैं। धन दौलत के जितने पुजारी हैं हमने उनको भगवान समझा है। ऊपर को बहती है ये ऐसी गंगा है।

           सब के घर आरओ लगाने की बात करते हैं बिना नल पानी की बात करते हैं। बताओ कोई बड़ा बदलाव शिक्षा स्वास्थ्य गरीबी लोगों की ज़िंदगी में लाया है। हरदम वही राग बेसुरा सुनाया है किसी ने पहले कुछ भी नहीं बनाया है वही है जो सबको जो नहीं किया दिखाया है। ये कैसा मसीहा बनकर कोई आया है अपनी बातों से हमको उल्लू बनाया है वादा किया कोई सच कर दिखाया है। खलनायक सबको बहाने लगे हैं खुद अपने कातिल को घर बुलाने लगे हैं। लोग गाते गाते रोने लगे हैं रुलाने वाले मुस्कराने लगे हैं। खज़ाना किसी को चुराने न देगा अब किसी को भी खाने न देगा कहा था मगर आधा सच बताया था , ये नहीं कहा था खुद मज़े उड़ाएगा अपने आप पर सब कुछ उड़ाएगा , जिस में बाकी सब को कुछ नहीं मिलेगा वही नाचेगा झूमेगा गाएगा , गरीबी की बात करता रहेगा रईसी की ज़िंदगी जिएगा नया दौर लाएगा हर कोई इक दिन पछताएगा। तेरे वादे पे ऐतबार किया ये गुनाह हमने बार बार किया। कोई फ़िल्मी गाना सुना रहा है। मुझे मार कर बेशर्म खा गया , मगर आप तो ज़िंदा हैं। ये जीना भी कोई जीना है लल्लू। डबल रोल देखे हैं कितने फ़िल्मी कहानियों में ये किरदार पहला है जिसके रंग जितने हैं सब नकली हैं पहली बारिश में ये रंग उतर जाते हैं। सत्ता के शिखर की यही कहानी है उस पर चढ़ते ही आदमी की अच्छाई सच्चाई और शराफत किसी पुराने लिबास की तरह उतार कर फेंक दी जाती है और भीतर की हर ख्वाहिश बाहर निकल आती है। रहम राजनीति किसी पर नहीं खाती है। कोई नशा सा है छा गया है परदे पर खलनायक समझा गया है कलयुग को सतयुग नाम देना पड़ेगा , राम नाम छोड़ जपना मेरा नाम लेना पड़ेगा। आपकी यही मज़बूरी है ये नियम नया है सब पर लागू है विकल्पहीनता है ज़रूरी है।

       अपने देखा है भूल गए हैं खलनायक जिस जिस युग हुए हैं कहनी खत्म होती तभी है आखिरी भाग में आग ही आग जंग ही जंग दौड़ भाग और सब विनाश दिखाई देता है। मुहब्बत की कहानी का ये अंजाम क्यों है शराफत हुई इतनी बदनाम क्यों है। किसी को भी सच की नहीं होती पहचान क्यों है , इस मुल्क में हर कोई परेशान क्यों है। आगाज़ अच्छा था जो भी था ये अंजाम क्यों है।

Tuesday, 7 May 2019

आधुनिक काल की अनीति कथाएं ( मंथन ) डॉ लोक सेतिया

   आधुनिक काल की अनीति कथाएं ( मंथन ) डॉ लोक सेतिया 

                   (  पहली लोक कथा - तू पी तू पी - आधुनिक संस्करण  )

राजस्थानी लोक कथा है कभी इक हिरणों का जोड़ा मर जाता है खुद पानी नहीं पीता ताकि दूसरे की प्यास बुझ सके। बचपन की सखियां बूढ़ी होकर देखती हैं उसी तरह का दृश्य मगर हुआ ये होता है कि हिरणों का जोड़ा मर तो गया है मगर लड़ते हुए ताकि पानी खुद पीकर ज़िंदा रहे। आधुनिक काल में कभी संबंध बनाये थे और साथ सब करते रहे मगर सालों बाद लगने लगा कि तब मेरे साथ छेड़छाड़ की गई थी और मीटू की कितनी कहानियां सुनाई देने लगी हैं। आजकल प्यार मुहब्बत दिल की भावना से नहीं बहुत कुछ और देख कर किया जाता है होता नहीं है। सुंदरता धन दौलत नौकरी ऐशो आराम को देख कर आशिक़ी नहीं कारोबार किया जाता है। 

               ( दूसरी नीति कथा - धरती का रस - आधुनिक संस्करण )

  पुरानी कथा में राजा रास्ता भटक जाता है सैनिकों से बिछुड़ जाता है। गर्मी धूप लू में प्यासा इक खेत में बनी झौंपड़ी में बुढ़िया पास जाकर पानी पिलाने को कहता है। बुढ़िया को दया आती है और पानी की जगह गन्ने का रस निकाल कर पिला देती है। राजा को पता चलता है किसान की मां खुशहाल है उस पर थोड़ा कर और लगाया जाये तो खज़ाना भर सकता है। कुछ देर बाद फिर से राजा गन्ने का रस पीना चाहता है मगर तब एक गन्ने की जगह चार गन्ने से गिलास भरता है तो राजा अचरज में पढ़कर सवाल करता है इतनी देर में ऐसा क्या हुआ है। बुढ़िया बतलाती है ये तो होता है जब शासक को लालच आता है तो धरती का रस सूखने लगता है। अधिनिक काल का शासक वही करता है अपने आप पर धन बर्बाद करने को जनता पर करों का बोझ बढ़ाता जाता है। लोग बेबस भूखे हैं उसको कोई बदहाली नज़र नहीं आती है। विनाश को विकास कहते हैं और जीना दुश्वार हो गया है। 

           ( तीसरी नीति कथा - इंसाफ का तराज़ू - आधुनिक संस्करण )

 दो लोग साथ साथ एक समय होते हैं। एक के मन में दूसरे के लिए रंजिश रहती है उसको नीचा दिखाना चाहता है। ऐसे में उस पर किसी अपराध का झूठा आरोप लगाया जाता है , वो जानता है कि उसने कोई अपराध किया ही नहीं उसके साथ था जब की घटना है। मगर बदले की भावना से सबके साथ आरोप लगाने में शामिल हो जाता है। मुंसिफ की अदालत में गवाही देता है उसको अपराधी साबित करने की। न्यायधीश को लगता है कि जो अपराध हुआ अकेले कोई नहीं कर सकता और कोई साथी शामिल ज़रूर होगा। कोतवाल को जांच करने को निर्देश देते हैं कि ख़ुफ़िया तौर पर निष्पक्ष जांच कर पता लगाओ तब कोई इसके साथ था। और कोतवाल जानकारी हासिल करता तो उन दोनों के एक साथ होने का पता चलता है। न्याय करने वाला न्याय करता है कि जब ये उस समय उस जगह था ही नहीं तो अपराध कर ही नहीं सकता बेगुनाह है। मगर जो बदले की भावना से रंजिश की खातिर आरोप लगाता है और जानता था कि उसने गुनाह किया ही नहीं उसको झूठी गवाही और निर्दोष को सज़ा दिलवाने की कोशिश करने पर सज़ा मिलती है। 
     आधुनिक काल में यही राजनीती में बार बार होता है किसी पर आरोप लगाने का सबूत होने की बात करते हैं मगर सत्ता मिलने पर निकलता कुछ भी नहीं और झूठे आरोप लगाने वाले को कोई सज़ा नहीं मिलती है। इंसाफ का तराज़ू कभी देखना अदालत में हिलता नहीं है भले किसी पलड़े में कितना झूठ और दूसरे में कितना सच रख दिया जाये। गवाही सबूत और मुंसिफ सब की आंखों पर स्वार्थ की पट्टी बंधी हुई है। आये दिन इंसाफ का कत्ल किया जाता है बेगुनाह को सूली चढ़ाते हैं और गुनहगार छूट जाते हैं। न्यायधीश जानते हैं अन्याय को न्याय का नाम दिया जा रहा है। 

निष्कर्ष :-

हमारी पुरानी लोक कथाओं और नीति कथाओं में जीवन की समस्याओं का समाधान भी है और मार्गदर्शन भी। लेकिन हमने समझना तो क्या पढ़ना भी छोड़ दिया है और किसी कोल्हू के बैल की तरह उसी दायरे में घूमते रहते हैं। इक अंधे कुंआ के कैदी की तरह भीतर शोर करते हैं आज़ादी चाहिए रौशनी चाहिए। कैफ़ी आज़मी की नज़्म की तरह। बाहर निकलते ही फिर कुंआं में छलांग लगा देते हैं।

Monday, 6 May 2019

लिक्खा मिटाना और फिर लिखाना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  लिक्खा मिटाना और फिर लिखाना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    बात अपने से शुरू करते हैं क्योंकि खैरात घर से शुरू करनी होती है। हर भिखारी कटोरे में पहला सिक्का खुद अपना डालता है तब अगले घर खनखनाहट होती है। सब लिखने वाले लिखते हैं तो मुझे भी लिखना होगा कि लिखने को जाने कितनों ने लिखा मगर जैसा मैंने सोचा पहले किसी ने उस तरह नहीं सोच कर लिखा। जब जाने माने मशहूर लोग पुरानी किताबों से चुराकर कुछ अपना बनाकर लिखते हैं तो यही करते हैं। आज मैंने कबीर रहीम से लेकर ग़ालिब मीर ज़फर तक की लिखी बातें अपने ढंग से लिखनी हैं और कोई मेरा कुछ नहीं बिगड़ सकता है। 

         वो खत के पुर्ज़े उड़ा रहा था हवाओं का रुख बता रहा था। कुछ और भी हो गया नुमाया मैं अपना लिखा मिटा रहा था। सब उड़ाया हुआ है। कल कोई इतिहास समझा रहा था सबकी खिल्ली उड़ा रहा था। जाने रो रहा था या गा रहा था खुद ही ताली बजा रहा था। बुरा जो देखन मैं चला को इस तरह पढ़ रहा था पढ़वा रहा था। भला जो खोजन मैं चला भला हुआ नहीं कोय , तुम सब मुझको देख लो मुझसे भला ना कोय। रहिमन हीरा कब कहे इस तरह सुना रहा है। बड़े बढ़ाई खुद करें बोलें बड़बोले बोल , मैं हीरा इतिहास का देखो मुझको तोल। अपना इक शेर भी याद आया है लिखने में बुरा क्या है। अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में , देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई। गोविंदा फिल्म वाला धर्म वाला नहीं दावा करने की ज़रूरत नहीं थी फिल्म ही थी , क्योंकि मैं झूठ नहीं बोलता और पहला मुकदमा झूठ को सच साबित कर जीत लेता है इतिहास वहीं से लिखा जाना चाहिए। आत्मविश्वास की बात है कि किसी और के बंगले को अपना बनाकर इक अमीर वकील जिसकी शोहरत है की लड़की से शादी करने का इरादा बनाता है और नायक है तो सब मुमकिन है। आजकल यही कहते हैं सब मुमकिन है। गाली देना भी बड़े होने की निशानी है अब लगता है और अपने से पहले जो हुए थे सबको बुरा बताकर खुद को अच्छा साबित करना चाहता है। जो नहीं हैं उनकी बुराई नहीं करते की संस्कृति और परंपरा को लात मार कर सबकी कमीज़ पर छींटे डाल बताता है मेरी कमीज़ उसकी कमीज़ से सफ़ेद है ये डिटरजेंट का सवाल नहीं है इतिहास का पन्ना है लिखना है भारत रत्न नहीं जो उसको उचित लगता है वही लिखो , गाली देने वाले को नहीं उसके खानदान को खराब बताना है। अपने खानदान की बात शोले फिल्म की तरह जैसे पता चलती है बता देंगे। मगर मौसी जी कोई बुराई नहीं है मेरे दोस्त में। 

       हर लड़की उस दौर में गुज़रती है जब खुद से खूबसूरत कोई नहीं लगती है। जनाब भी उसी दशा में हैं मैं मैं मैं बस मैं मैं मैं। सबसे सुंदर सबसे अच्छा सबसे महंगा मैं हूं , ये तो सच है महंगा तो बहुत साबित हुआ है ये सभी को। कभी कभी कोई सामान इतना महंगा होता है कि लगता है कीमत जितनी है उतने काम का नहीं है। फिर भी महंगी चीज़ों की सजावट अमीरी का दिखावा करने को ज़रूरी है। मुझे कोई तीस लाख सालाना कमाने वाला समझा रहा था कि अमीर को और अमीर बनाना गरीब की भलाई है , अमीर दो चार सिक्के उछलेगा तो गरीब दौड़कर उठा सकता है। समानता की बात फज़ूल की सोच है पुरानी है। नल का नहीं नदिया का नहीं मिनरल वाटर और आरओ का पानी है। कोई ग़ज़ल सुनाओ लोग ऊबने लगे हैं। 

लिखी फिर किसी ने कहानी वही है ,
मुहब्बत की हर इक निशानी वही है।

सियासत में देखा अजब ये तमाशा ,
नया राज है और रानी वही है।

हमारे जहां में नहीं कुछ भी बदला ,
वही चोर , चोरों की नानी वही है।

जुदा हम न होंगे जुदा तुम न होना ,
हमारे दिलों ने भी ठानी वही है।

कहां छोड़ आये हो तुम ज़िंदगी को ,
बुला लो उसे ज़िंदगानी वही है।

खुदा से ही मांगो अगर मांगना है ,
भरे सब की झोली जो दानी वही है।

घटा जम के बरसी , मगर प्यास बाकी ,
बुझाता नहीं प्यास , पानी वही है।

हां हम भी अपनी कहानी लिखेंगे और जहां प्यास लिखना हो पानी लिखेंगे। आपने जितने सितम ढाये हैं उनको आपकी मेहरबानी लिखेंगे। चलो इक ग़ज़ल और भी अपनी सुनाता हूं। 

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में ,
आज कैसे कह दिया सब कुछ यहां आगाज़ में।

आप कहना चाहते कुछ और थे महफ़िल में ,पर ,
बात शायद और कुछ आई नज़र आवाज़ में।

कह रहे थे आसमां के पार सारे जाएंगे ,
रह गई फिर क्यों कमी दुनिया तेरी परवाज़ में।

दे रहे अपनी कसम रखना छुपा कर बात को ,
क्यों नहीं रखते यकीं कुछ लोग अब हमराज़ में।

लोग कोई धुन नई सुनने को आये थे यहां ,
आपने लेकिन निकाली धुन वही फिर साज़ में।

देखते हम भी रहे हैं सब अदाएं आपकी ,
पर लुटा पाये नहीं अपना सभी कुछ नाज़ में।

तुम बता दो बात "तनहा" आज दिल की खोलकर ,
मत छिपाओ बात ऐसे ज़िंदगी की राज़ में।  

बात निकलेगी तो किस तरफ जाएगी नहीं मालूम। इस देश में हर मुजरिम को भरोसा है अदालत पर। सब बरी हो जाते हैं ख़ुशी मनाते हैं। कत्ल हुआ था कातिल कोई नहीं , ये कमाल का इंसाफ है। बेगुनाही की सज़ा मिलती है गुनहगार होना कोई खराबी नहीं है। आरोप लगते रहते हैं और क्लीन चिट बंटती रहती हैं आपको भी मिल जाएगी जब ज़रूरत होगी। बात को विराम देते हैं इस बहुत पुरानी ग़ज़ल के साथ। 

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,

जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,

हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,

जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,

दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,

और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,

उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,

"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है।

 




Sunday, 5 May 2019

दुश्मन-दुश्मन , भाई-भाई ( कथा सत्ता की ) डॉ लोक सेतिया

    दुश्मन-दुश्मन , भाई-भाई ( कथा सत्ता की ) डॉ लोक सेतिया 

     भूख से मर गई जनताबाई अपनी जान बेकार गंवाई। राजनीति किसको समझ है आई सब करते हैं चतुराई। छाछ भी हिस्से में नहीं आई नेता खाते दूध मलाई। कैसी पढ़ ली सबने पढ़ाई सत्ता बचा ली खैर मनाई। तुमने थी सरकार बनाई खुद फिर तुम हर बार पछताई। रोटी पानी की बात भुलाई करनी किसको किसकी भलाई। आई नई मुसीबत आई हमने अपनी जान बचाई , उधर कुंआं है और इधर खाई किस ओर जाओ समझ न आई। बारिश महलों को है भाई बाढ़ बनी बस्ती डुबाई किस को कोई दे दुहाई। 

    हमने भी इक घर बनाया हर कोई है अपना पराया। समझा न कोई सबने समझाया जाने कैसी है ये माया। घर से निकला घर नहीं आया बाहर जाकर फिर पछताया। घर की दाल रोटी भी अच्छी थी मुर्गी खाई मज़ा नहीं आया। ये बाजार किसने सजाया खाना था अमृत ज़हर खिलाया। घर है दरवाज़ा है खिड़की है घर का कोई वजूद नहीं है साथ होकर बहुत फासले हैं गले लगने का दस्तूर नहीं है। आंगन कोई नहीं बचा है सबका अपना अपना रस्ता है कोई आता है जाता है शोर सुनते हैं दिल घबराता है। ख़ामोशी छाई है घर में आहट सुन घबराहट है मन में। 

      सब मिलते हैं पर अजनबी हैं सारे दिन को नज़र आते हैं सितारे। नींद आती नहीं डर के मारे कोई किसको कैसे पुकारे। झूठी कसमें झूठी रस्में झूठे रिश्ते झूठे नाते सच देख कर सब डर जाते। गांव शहर महानगर बनाये पर इंसानियत को छोड़ आये। जीते चाहे कोई हारे नारे हैं रहेंगे बस नारे उनको वारे न्यारे होंगे जो हर रात कुंवारे होंगे। उनकी सेज सजेगी फूलों से जनता सोएगी शूलों पे। दलदल है सत्ता की ऐसी भैंसा बन जाता है भैंसी। कभी नहीं इस तालाब में जाना अच्छा नहीं कीचड़ में नहाना साफ नहीं होना गंदा हो जाना कोई ऐसी राह मत दिखाना। 
   
       जाने किसने रीत चलाई , भगवान की देते हैं दुहाई। जिसको मिलती दूध मलाई भोग लगाते सुबह शाम पूजा करते आरती गाई। सुंदर महल में रहता है सजधज कर मंच पर रहता है उसको कौन बताये भाई भूखी जनता की जो दशा बनाई। सत्ता को सब हरियाली दिखती है सारी दुनिया सुंदर दिखती है , उनकी अपनी राजधानी की नगरी है किसको तेरी बस्ती दिखती है। बच्चो को मां है बहलाती चूल्हे पर पानी है पकाती। किसान खड़ा राशन की कतारों में उसकी शान बढ़ी नारों में। धुआं बनके फ़िज़ा  में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको। खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए , सवाल ये  है किताबों ने क्या दिया मुझको। सफ़ेद संग की चादर लपेट कर मुझ पर , फ़सीले शहर में किसने सजा दिया मुझको। मैं एक ज़र्रा बुलंदी को छूने निकला था , हवा ने थम के ज़मीं पर गिरा दिया मुझको। ये लता जी की और जगजीत सिंह की गई ग़ज़ल है जो अपनी कहानी है। हवा थम गई है घुटन है दम घुटने लगा है जो उम्मीद थी बुझ गई है। ज़रूर सुनना। 

 

Friday, 3 May 2019

बादल हवा घुटन बारिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      बादल हवा घुटन बारिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    कोई बता रहा था किसी की हवा चल रही है। हमने तो आंधी भी चलती देखी है किसी की कभी। ये भी देखा कि जिनकी आंधी चलती थी वही तेज़ हवा चली तो तिनके की तरह उड़ गए। अंधेरों ने सूरज से दोस्ती क्या की रौशनी धूप दोनों उनकी कैद में बंद हो गए हैं। मौसम पल पल बदलता रहता है बादल आकाश पर छाते हैं बिना बरसे गुज़र जाते हैं। बारिश का कोई इंतज़ार करता है तो किसी को विरह की मारी गाती है कजरे बदरवा रे , मर्ज़ी तेरी है क्या ज़लिमा। ऐसे ना बरस ज़ुल्मी कह ना दूं किसी को मैं बालमा। क्या ज़माना था महबूबा को कितनी फुर्सत रहती थी पिया मिलन के मधुर गीत गुनगुनाती थी घने बादल देखते ही। आजकल पिया परदेस में सजनी किसी और देस में दोनों फेसबुक व्हाट्सएप्प पर मिल लेते हैं कभी सोशल मीडिया का युग बीत गया तो जीना कठिन हो जाएगा। क्षमा चाहता हूं बात मौसम से राजनीति पर होकर इश्क़ मुहब्बत की तरफ चली आई है।

              जाने उसकी कैसी हवा चल रही है जो दम घुटने लगा है हर किसी का। लोग कहते हैं हवा बंद है कोई शायर कहता है सब हवाएं ले गया मेरे समंदर की कोई , और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया। जिसे बादबानी शब्द नहीं मालूम उसको बताना चाहता हूं अपने देखी होगी किसी फिल्म या कोई पेंटिंग में इक कश्ती जिस पर ऊंचे ऊंचे परदे लगाए होते हैं और वो हवा के रुख के हिसाब से चलती है। कोई राजनेता देश की जनता को कुछ ऐसी सौगात देता है हवा अपने पास बंद कर ली है और बादबानी कश्ती की तरह कोई खैरात सभी को देता है। सब कुछ मिलता है उसकी ऐप्स पर इसी तरह से मगर ठीक असली की जगह लकड़ी या मिट्टी के खिलौने की तरह से। जिनकी परवाह है उनको एएसी की ठंडी हवा नसीब है बाकी लोग घुटन महसूस करते हैं। दिलासा देते हैं ये बारिश से पहले की थोड़ी दिक्क्त है मगर पांच साल से अच्छे दिन की बारिश होने का नाम ही नहीं ले रही। लोग आह भरते हैं तो शक होता है विरोध करते हैं। हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता। शायर समझते हैं तभी कहते हैं। आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। हमको मालूम है तगाफुल न करोगे लेकिन , ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक। खबर वाले अब बेखबर को खबर कहते हैं उनको खुद अपनी खबर नहीं है कि क्या थे कब क्या से क्या हो गये हैं। शर्म शर्म कहते कहते बेहया हो गये हैं।

      मौसम कोई वक़्त था बेईमान भी होता था आने वाला कोई तूफान भी होता था। मौसम आशिकाना हुआ करता था क्या ज़माना हुआ करता था। बारिश होती थी बच्चे भीगने का लुत्फ़ उठाते थे हम भी पागल बनकर पानी में चलते जाते थे झूमते थे गाते थे कोई सर्दी ज़ुकाम का डर नहीं था बदन टूटता था अगली सुबह नहीं घबराते थे। बारिश में चाय पीते थे पकोड़े समोसे खाते थे पांच रूपये खर्च करने कितनी कितनी दूर जाते थे। खुशनसीब थे जो बारिश के पानी में कागज़ की कश्ती बनाकर चलाते थे। जगजीत सिंह क्या खूब ग़ज़ल गाते थे बचपन याद दिलाते थे। अब कुछ भी सुहाना नहीं है कोई मुहब्बत का तराना नहीं है पूरा क्या अधूरा सा भी फ़साना नहीं है , मिलने जुलने का कोई बहाना नहीं है किसी का घर किसी के आना जाना नहीं है।

     गर्म हवा तपती लू चलती है बदन नहीं लगता रूह जलती है। इक प्यास है हर किसी की ज़िंदगी उदास है। बाकी रही नहीं कल की भी आस है , जाने कैसी आज़ादी आई है जनता झेल रही बनवास है। आम आदमी की कीमत कुछ भी नहीं है आम को चूसता है वही जो सबसे ख़ास है। कांटों के केक्टस महलों में खिलते हैं , आम जो बोते हैं उस को बबूल के कांटे बस मिलते हैं। बाड़ बनकर खेत खा रहे हैं सुनते हैं अपने नगर आ रहे हैं। उनकी खातिर झौंपडियां हटवा रहे हैं पेड़ बाग़ बगीचे कटवा रहे हैं गमलों के फूलों से मंच सजा रहे हैं। अब ये मत पूछो क्या करते हैं क्या दिखला रहे हैं। तुम्हें ताली बजाने को सभी नेता बुलाते हैं , भले कैसा लगे तुमको तमाशा खूब था कहना। बारिश क्या ऐसी भी होती है अश्कों की बरसात हर किसी की पलकों को भिगोती है , गरीब की जोरू है इस देश की जनता , उनके कहने पे हंसती है अपनी किस्मत पे रोती है।

                                         मेरी इक ग़ज़ल भी पेश है।

ज़माना झूठ कहता है , ज़माने का है क्या कहना ,
तुम्हें खुद तय ये करना है , किसे क्यों कर खुदा कहना।

जहां सूरज न उगता हो , जहां चंदा न उगता हो ,
वहां करता उजाला जो , उसे जलता दिया कहना।

नहीं कोई भी हक देंगे , तुम्हें खैरात बस देंगे ,
वो देने भीख आयें जब , हमें सब मिल गया कहना।

तुम्हें ताली बजाने को , सभी नेता बुलाते हैं ,
भले कैसा लगे तुमको , तमाशा खूब था कहना।

नहीं जीना तुम्हारे बिन , कहा उसने हमें इक दिन ,
उसे चाहा नहीं लेकिन , मुहब्बत है पड़ा कहना।

हमें इल्ज़ाम हर मंज़ूर होगा , आपका लेकिन ,
मेरी मज़बूरियां समझो अगर , मत बेवफ़ा कहना।

हमेशा बस यही मांगा , तुम्हें खुशियां मिलें "तनहा" ,
हुई पूरी तुम्हारे साथ मांगी ,  हर दुआ कहना। 

  


Thursday, 2 May 2019

बड़े बनकर नीचे गिरते लोग ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

    बड़े बनकर नीचे गिरते लोग ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया 

    चाहे किसी भी तरह से किस्मत से खुशनसीबी से या  किसी भी ढंग से आप बड़े बड़े पद पर पहुंच गए हैं। मगर आपने देश की संविधान की तिरंगे की लाज रखनी है अपने कर्तव्य को निडरता निष्पक्षता ईमानदारी से निभाना है। मगर जब बड़े बड़े अधिकारी सत्ताधारी नेताओं के तलवे चाटते हैं तो खुद को ही नहीं अपने पद की गरिमा के साथ साथ देश की प्रतिष्ठा को भी बहुत नीचे गिराते हैं। सत्ताधारी दल के नौकर  नहीं हैं आप देश जनता के अधिकारों के रक्षक नियुक्त किये गए हैं। आपने अपने गौरव नहीं देश के साथ वफ़ादारी निभाने को भुलाकर खुद को अपनी और सबकी नज़र में गिरा कर साबित कर दिया है कि आप अपने पद के काबिल नहीं हैं।  शायद तीस चालीस साल पहले बी के चम जी का इक लेख पढ़ा था जो वास्तव में इक मिसाल था कि कभी ऐसे भी लोग हुआ करते थे। तीन घटनाओं की आंखों देखी बात बताई थी। पहले भी उनका विवरण दिया हुआ है आज फिर से दोहराता हूं।

कोई है जो अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभाता है ( पहली घटना )

शिमला मॉलरोड का रास्ता गाड़ियों के लिए बंद किया हुआ था और इक बैरियर बनाया गया था इक सिपाही तैनात किया गया था। कार पर इक विभाग के बड़े अधिकारी थे जो बाकयदा वर्दी में थे और सड़क से गुज़रना चाहते थे सिपाही ने बताया जनाब इधर से जाने की अनुमति नहीं है। कार चालक ने बाहर निकल का अधिकारी कौन है बताया था मगर सिपाही तब भी रास्ता खोलने को माना नहीं था। खुद को ऐसी हालत में पा कर अधिकारी खुद कार से निकल कर आये थे और सिपाही को बताया था जानते हो मैं उस विभाग का बड़ा अधिकारी हूं और कभी मुमकिन है तुम मेरे आधीन कर्मचारी बनकर नियुक्त किये जा सकते हो। सोचा है तब क्या होगा ,  सिपाही ने सैलूट किया और कहा माफ़ करना आपको इधर से नहीं जाने दे सकता यही मेरी ड्यूटी है। और कभी अगर मेरी नियुक्ति आपके विभाग में हुई तो होगा ये कि आपको पता होगा कि आपके आधीन कोई एक व्यक्ति है जो अपना कर्तव्य निडरता से और ईमानदारी से निभाता है। अधिकारी ने उस सिपाही को सैल्यूट किया था और अपनी गलती की माफ़ी मांग वापस लौट गया था। 

उनसे कह दो उनको साक्षात्कार देने से वंचित किया गया है ( दूसरी घटना )

अपने अधिकारी दोस्त से मिलने उस शहर गया तो पता चला वो दफ्तर में साक्षात्कार ले रहे हैं। कोई रिश्वत या सिफारिश नहीं स्वीकार करते जानता था। दफ्तर पहुंच उनके सामने बैठा ही था कि किसी मंत्री जी का फोन आया और जी मंत्री जी नमस्कार से बात शुरू हुई। बात सुनी और बोले आप उसका नाम नंबर क्या है विवरण बताओ और लिखते गये किस की सिफारिश की जा रही है। उधर से शायद सवाल किया गया उस को क्या बता सकता हूं उसकी नौकरी पक्की है। अधिकारी ने कहा था आप उनको बता सकते हैं नियम है कि कोई सिफारिश या रिश्वत या अनुचित दबाव डालना किसी को साक्षात्कार से बाहर करने का आधार है अत: उनको साक्षात्कार की अनुमति नहीं है। कोई भी नेता अधिकारी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता अगर निष्पक्ष है और ईमानदार है। 

आजकल की घटनाओं की बात ( तीसरी घटना अभी याद नहीं आ रही )

कोई अधिकारी नेता के पांव छूता है सभा में कोई जूते साफ करता है कोई हाज़िरी लगाने चला जाता है। अब चुनाव हैं और अधिकारी कर्मचारी चुनाव आयोग का हिस्सा बन देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम रखने को कार्य करने की ज़िम्मेदारी है। मगर उच्च अधिकारी किसी नाते किसी रिश्ते किसी संबंध को देख कर निष्पक्षता और देश भक्ति को दरकिनार कर उनको अनुचित फायदा देने का अपराध करते हुए नहीं सोचते कि ऐसा देश संविधान के साथ छल कपट करना है। कितनी शिकायत आयोग को मिलती हैं और तब तक बेशर्म लोग देश के कानून को ताक पर रखकर मनमानी करते हैं। हद तब होती है जब सत्ताधारी दल के नेताओं के असंवैधनिक आदेश को पालन करते हुए विपक्षी दल के साथ भेद भाव किया जाता है। किसी विपक्षी दल के पोस्टर आधी रात को अधिकारी फड़वाने का काम करते हैं तो अपराध नहीं देश के साथ धोखा करते हैं। लोग ऊंचाई पर पहुंच कर सजग रहते थे कोई उनकी ईमानदारी पर शक नहीं कर सके मगर आजकल बड़े बड़े अधिकारी सत्ता के दलाल की तरह लाज शर्म छोड़ खुद को अपने पद की गरिमा को नीचे गिराने का काम कर रहे हैं।

Wednesday, 1 May 2019

हंगामा हो गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          हंगामा हो गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     ये होना संभव तो नहीं था मगर हो गया। शोर मचा हुआ है वो है तो सब मुमकिन है। लेखक को सत्ताधारी दल ने बिना आवेदन टिकट दे दिया और शहर वालों ने पर्चा भरने को विवश भी कर दिया। ज़रूर किसी दोस्त की साज़िश है समझ गए वो भी मगर जब ओखली में सर डाला है तो मूसलों से क्या डरना। पत्नी से विचार मिलने का कोई सवाल ही नहीं था फिर भी घर आते ही पत्नी ने बिना मांगे पानी भी नहीं देने वाली पत्नी ने जब खुद ही कहा कसम खाती हूं आपकी मेरा वोट आपका ही है। घबरा गया बेचारा पति वोट मिले नहीं मिले कोई बात नहीं जान है तो जहान है कहीं पत्नी का मन बदल गया वोट डालते समय तो झूठी कसम का असर सच हो जान जोखिम में डालना होगा। पति बोले भाई हम तो आज़ाद ख्याल रखते हैं आपको वोट जिसे देना है दे सकती हो कसम खाने की ज़रूरत नहीं है। पत्नी हंसकर बोली आपको क्या लगा आपको वोट देना चाहती हूं मुझे तो उसको वोट देना है जो उस दल के नेता हैं जिसने आपको खड़ा किया है। बात बढ़ाने से कोई फायदा नहीं था लेखक को जीतने हारने की नहीं ज़मानत बचाने की चिंता थी। 

         हंगामा हो गया हमारा भेजा सोशल मीडिया का संदेश किसी ने ग्रुप में भेज दिया जिस की सदस्य मेरी पत्नी जी भी हैं। ऊपर से एडमिन का सभी सदस्यों से निवेदन उस संदेश को जितना संभव हो फ़ॉरवड करने का आग में घी का काम कर गया। हम कभी सरकार विरोधी संदेश पत्नी क्या उसकी जान पहचान वालों को भी नहीं भेजते हैं। उनको हम पर शक ही नहीं है पूरा यकीन है हम सरकार के विरोधी हैं क्योंकि वो सरकार हैं और सत्ताधारी दल की समर्थक हैं। उनके अपने कारण हैं उनको लगता है जो नेताजी अपनी पत्नी को विवाह करने के बाद छोड़ देते हैं मगर पत्नी होने का अधिकार वापस नहीं लेते महिला जगत के हितेषी हैं। मतलब समझने समझाने की कोशिश मत करना। संदेश ही कुछ ऐसा था , सत्ताधारी दल के पांच साल से नहीं बीस तीस साल से समर्थक रहे लोग ठीक चुनाव के समय विपक्षी दल के नेता का साथ देने की बात कर रहे हैं। हमने हैरानी जताई और पूछा तो बात समझ आई है चर्चा है किसी ने अफवाह उड़ाई है झूठ सच का सगा बड़ा भाई है। हमको बताया गया पहले जितने दल थे मिलकर मलाई खाते थे खाते थे खिलाते थे , इस बार ऐसी सरकार है बात करना बेकार है। जो भी ऊपर बैठे हैं सब हज़्म करते जाते हैं चुपके से छुपके सब खा जाते हैं डकार भी नहीं लेते हैं। 

   खबर पक्की थी घटना सच्ची थी कोई राज़ की बात नहीं थी। घर के भेदी लंका ढाते हैं ये नेता भला कहीं टिकते हैं जिधर चुपड़ी मिलती भाग कर जाते हैं। जब अपने दल के लोग वोट नहीं देंगे और साथ चलते टंगड़ी लगाने का काम करेंगे तो मामला संगीन हो जाता है। पैसा सभी का बाप है कुर्सी माता है कुर्सी का क्या भरोसा है बदलती रहती है इसकी थी उसकी बनेगी किसकी रहती है। ये गंगा है जो ऊपर से नीचे कभी उल्टी भी बहती है। पत्नी को पढ़ते ही जोश आया है हमको आवाज़ देकर बुलाया है और सवाल उठाया है किस किस को ये संदेश भिजवाया है। बताओ ये क्या माजरा है किसलिए सबको फ़ॉरवड करने को कहा है , कोई और नहीं मिला है मूर्ख  बनाने को। बात इतनी सी है सबसे पूछा गया है आपको कौन से रंग का गुलाब भाता है या गुलाब की जगह गेंदे का आपसे नाता है। गेंदे के फूल गुलाब से कम अच्छे नहीं हैं मुरझाते नहीं इतनी जल्दी। बात गुलाब की है गेंदे की है कमल का कोई लेना देना नहीं है फिर कमल का फूल क्यों मुरझाने लगा है। कीचड़ से कमल उकताने लगा है। 

    मेरे घर में राजनीति का कोई काम नहीं है कोई और इस शहर में मेरा हमनाम नहीं है। और तो कोई इतना भी बदनाम नहीं किसी के कत्ल का झूठा लगता इल्ज़ाम नहीं। हम उधर के हैं न इधर के हैं हम तो उन्हीं के हैं और अपने क्या उनके ही घर के हैं। उनके दल के लोग क्यों दल से छल करते हैं हम क्या करें बात करते हैं तो डरते हैं लोग कहते हैं और मुकरते हैं। हंगामा करना मेरा मकसद नहीं है दुष्यंत कुमार की कसम मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। आग दिल में नहीं रसोई घर के चुल्हे में जलनी चाहिए रोटी कोई दल वाला नहीं भेजता है न किसी सरकारी ऐप से डाउनलोड की जा सकती है। गलती कोई नहीं मगर माफ़ी मांगनी ज़रूरी है हाय कैसी मज़बूरी है। पास होने की बात नहीं है दिल्ली की बढ़ती दूरी है।



Tuesday, 30 April 2019

नाम रौशन भी नाम बदनाम भी है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  नाम रौशन भी नाम बदनाम भी है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

नाम से क्या होता है सच है कि झूठी बात है। आदमी ये आम है अनाम है कोई और है नाम जिसका बेहद ख़ास है।  बस उसी का नाम है इक उसी की आस है। देखो ओ दिवानों तुम ये काम न करो , राम का नाम बदनाम न करो। नाम में क्या रखा है जिसने कहा उसका नाम जुड़ गया इसी बात से ये भी नाटककार की पहचान है। कल मुझसे भूल हुई किसी का नाम लब पर आ गया हंगामा हो गया आपको दुश्मनी क्या है बात बात पर उसी का नाम लेते हो। जनाब इसको मुहब्बत कहते हैं इश्क़ है हरदम उसी का नाम दिल में रहता है। नीरज जी का गीत है कि ग़ज़ल है , इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में , तुमको सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में। लोग बाप दादा के नाम की कमाई खाते हैं छाछ नहीं पीते हैं मलाई खाते हैं। 

   नाम को लेकर लोग बड़े संवेदनशील होते हैं , शहर भर में नाम है क्या हुआ जो बदनाम है। चोरी मेरा काम है। एक अधिकारी को बुलाने गये थे उनके सचिव ने फोन पर समझाया था नये अधिकारी आये हैं जो चले गये अब वो नहीं आने वाले इनको बुलाना ज़रूरी है अगर नहीं बुलाओगे तो पछताओगे। सब सभा के सदस्य घबरा गये और बुलाने दफ्तर चले गये , कार्ड पर नाम की स्पेलिंग गलत लिखी हुई थी उनका नाम ही कुछ ऐसा था कोई समझ नहीं पाता था। फ़तेह फतेहाबाद और फते की उलझन थी सुलझानी मुश्किल थी खैर हमने माफ़ी मांगी मगर हमारी सॉरी की शायद स्पेलिंग उनको फिर गलत लगी माफ़ नहीं कर सके जब तक रहे शहर में जतलाते रहे। अधिकारी हैं रौब जमाते रहे हम बुलाते रहे वो रस्म निभाते रहे , आते जाते रहे बीच में उठ कर चले जाते रहे। ज़रा सी बात का बतंगड़ बनता है इस को समझ लिया। हिंदी में ऐसी गड़बड़ नहीं होती है। 

पत्नी का नाम बदलने का चलन रहा है नाम बदलने से राशि के गुण मिलाया करते थे। बचपन में घर पर कॉलेज में दोस्त कई नाम से बुलाया करते थे। कभी पूरा कभी पहला अक्षर बीच का अक्षर अंत में किस वर्ग से हैं लिखने का चलन था। बीच वाला नाम मुझे भाता नहीं था इक दिन चुपचाप हटा दिया और लोक सेतिया छोटा सा नाम नेम प्लेट पर मोहर पर लगवा दिया। बीच में कोई क्यों रहे शुरू और आखिर इतना बहुत है। लोक अकेला ही काफी है खुद को जाने क्या समझता है ऐसा लगता है ज़रा पहचान बनी तो अकड़ता है। बना है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता ,वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है। हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं खो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है। रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल , जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है। ग़ालिब से क्या मुकबला , बदल कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब तमाशा ए अहले करम देखते हैं। 

   नाम की बात आज लिखनी पड़ी किसी नाम वाले की बड़ी चर्चा है। इक उसी के नाम पर लोग इधर हैं या उधर हैं क्योंकि उसका गणित है जो उसके साथ नहीं उसके खिलाफ है। मुझे किसी से इतना लगाव नहीं हुआ कि उसकी महिमा गाता फिरूं न कोई इतना खराब लगा कि बस मुखालफत के नाम पर मुखालफत करता रहूं। सच को सच झूठ को झूठ कहना किसी का दोस्त होना नहीं न किसी का दुश्मन होना है। अब उसका नाम रौशन भी बहुत है और बदनाम भी उस से बढ़कर है , इक फासला रखना चाहता हूं बड़े लोगों से दूरी रखने की बात भी इक शायर समझा गये हैं। बड़े लोगों से मिलने में ज़रा सा फासला रखना , जहां दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता। हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है , जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा। सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा , इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा। बात आज की है बात पुरानी याद आई फिर से , किसी नेता ने कहा था मुझको इतना मत सर चढ़ाओ कि मैं तानाशाह बन जाऊं। उनको तानाशाह होना खराब लगता था इनको होने की ख्वाहिश है। नाम रौशन होना और बदनाम होना ज़मीन आसमान का अंतर है , कोई चाहता है उसको दिल से प्यार करें लोग और कोई चाहता है उसके नाम का डर लोगों के दिल में रहे दहशत बनकर कर। यहां से पचास पचास कोस तक दूर जब कोई बच्चा रोता है तो मां कहती है चुप हो जा नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा। गब्बर इस बैक।

Monday, 29 April 2019

गुलामों की मंडी का सौदागर है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   गुलामों की मंडी का सौदागर है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 कहानी वही पुरानी है इक सरकार बनानी है। इक वही खरीदार है उसी का पूरा बाज़ार है। गुलामों की होती बोली है सबको उतनी खैरात मिलती जितनी जिसकी झोली है। कहती मीनाकुमारी है हर गुलबदन तुम्हारी है खुद को मुर्दा समझती है इक श्मशान जा बैठी है इस्मत किस ने लूटी है किस्मत अपनी फूटी है। बच्चन की याद आई है सौदागर की चर्चा छाई है। शादी नहीं व्यौपार किया गुड़ का चोखा कारोबार किया। उसका गुड़ सबसे मीठा था झट पट सारा बिक जाता था। शादी की दौलत कमाई छोड़ दिया इक अबला का दिल तोड़ दिया। आज़ादी से पहले यही होता था इक पिजंरा था इक तोता था इक नाम रटता रहता था हरी मिर्ची खा खुश रहता था। फिर से मंडी लगाई है बाज़ार पुराने में दुकान लगाई है उसकी गुलामी अच्छी है झूठी बात भी सच्ची है। भरी सभा में बताता है बिकने वालों से मेरा नाता है जो भी बिकता जाता है वही खरीदार कहलाता है। दाग़ी अपराधी उसके पास आते हैं गंगा उसी की है नहाते हैं फिर ईमानदार और शरीफ कहलाते हैं। 

    बंधक बनाना अपराध नहीं है उसकी कैद हवालात नहीं है। उसके पिंजरे के जितने पंछी हैं सबको दाना मिलता है बाकी सब जो भूखे हैं नासमझ हैं बस रूठे हैं। उसको मनाना आता है सरकार चलाना आता है। उस पर लागू संविधान नहीं उसके सिवा कोई भी महान नहीं। शोरूम है कोई दुकान नहीं। अब तो ऐसा हाल है वो खुश है जो दलाल है। उसकी टेड़ी चाल है सत्ता का धमाल है फिर वही सुर ताल है उल्लू डाल डाल है पांच साल पांच साल है जाने कैसा कमाल है सरकारी जाल है। खेल उसी का वही खिलाड़ी है उसी बल्ला उसकी बॉल है। चलता उल्टी चाल है उसकी नई मिसाल है। जनता की धोती फ़टी हुई है महंगा सरकारी रुमाल है। सरकार को खतरा नहीं जनता बस बदहाल है। नैतिकता के भाव गिर गये हैं अनैतिकता की कीमत में उछाल है। उनके मन भाये जो भी वो बकरा हलाल है। झूठ बैठा सिंहासन पर सच खड़ा फटेहाल है। सोना सस्ता महंगा पीतल राजनीति की टकसाल है। पल पल रंग बदलता ये अखबारी आईना बेमिसाल है अक्स बनाता अक्स बिगाड़ता टीवी चैनल मालामाल है। नसीहत देता है नाम फजीहत लाल है। जो हल नहीं करना उनको कभी भी गरीबी ऐसा सवाल है। भूखे पेट किसान मरते हैं गोदामों में सड़ता माल है। चुनावी दौड़ धूप है अभी फिर तो बेढंगी चाल है। सूअर की आंख में किसी लोमड़ी का बाल है , जांच कर रहा खुद कोतवाल है। विलंब नहीं है थोड़ा अंतराल है। आप निकालते बाल की भी खाल है जब घोटालों का देश है कैसे फिर कंगाल है।

   करोड़पति बनाता कोई मुंगेरीलाल है। पानी बोतल बंद है जूतों में बंटती दाल है। सत्ता के गलियारे में अपनी करताल है उनका सब हराम है अपने लिए हलाल है। फूल तोड़ता खुद माली अधखिले देख रही हर डाल है। पनघट की डगर हुई वाचाल है। खलियानों को रौंदती जाती राजनीति की घुड़ताल है। सुनते थे जो बिहार में देख लो वही बंगाल है। दफ्तर दिल्ली घर भोपाल है कल जो पर्वत था अब बना पाताल है। इक फ़साना बन गया खुद हक़ीकतलाल है। हर नज़र बन गई अनसुलझा सवाल है। बड़ा गुरु से हुआ गुरुघंटाल है घर आया था मेहमान बनकर मालिक को दिया बाहर निकाल है। गुंडों बदमाशों के लिए जेल भी ससुराल है। अय्याशी के लिए होटल सा हाल है। जीने की नहीं बात अब मरने का सवाल है। लोकतंत्र तू बता तेरा क्या हुआ हाल है। हर दम तेरी चिंता है इक तेरा ख्याल है। हास्य व्यंग्य भी हुआ दर्द से बेहाल है। इक हास्य व्यंग्य की कविता से बात का अंत करते हैं।

        अब तो ऐसा हाल है ( हास्य-वयंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

                                          
जूतों में बंटती दाल है ,
अब तो ऐसा हाल है ,
मर गए लोग भूख से ,
सड़ा गोदामों में माल है।

बारिश के बस आंकड़े ,
सूखा हर इक ताल है,
लोकतंत्र की बन रही ,
नित नई मिसाल है।

भाषणों से पेट भरते ,
उम्मीद की बुझी मशाल है,
मंत्री के जो मन भाए ,
वो बकरा हलाल है।

कालिख उनके चेहरे की ,
कहलाती गुलाल है,
जनता की धोती छोटी है ,
बड़ा सरकारी रुमाल है।

झूठ सिंहासन पर बैठा ,
सच खड़ा फटेहाल है,
जो न हल होगा कभी ,
गरीबी ऐसा सवाल है।

घोटालों का देश है ,
मत कहो कंगाल है,
सब जहां बेदर्द हैं ,
बस वही अस्पताल है।

कल जहां था पर्वत ,
आज इक पाताल है,
देश में हर कबाड़ी ,
हो चुका मालामाल है।

बबूल बो कर खाते आम ,
हो  रहा कमाल है,
शीशे के घर वाला ,
रहा पत्थर उछाल है।

चोर काम कर रहे ,
पुलिस की हड़ताल है,
हास्य व्यंग्य हो गया ,
दर्द से बेहाल है।

जीने का तो कभी ,
मरने का सवाल है।
ढूंढता जवाब अपने ,
खो गया सवाल है।




हिसाब क्यों नहीं देते ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

       हिसाब क्यों नहीं देते ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया 

   आपकी बात मान ली सब चोर हैं। आपने तो सबका हिसाब मांगा और जो करना था किया होगा।  आपकी बारी है अपने अपने पास दो करोड़ की नकद और अन्य सभी तरह की कुल पूंजी बताई चुनाव आयोग को। आपका वेतन इतने साल तक विधायक सांसद और प्रधानमंत्री पद पर रहते मिला होगा जो शायद इतना ही होगा आपके राजनीतिक सफर में। कोई हिसाब की भूल चूक मुमकिन नहीं आपके पास आधुनिक ऐप्स और सुविधा है ही और लेखाकार भी कोई रखा होगा। सब ठीक है मान लेते हैं। बस ये कुछ खर्च हैं जो आपके निजि खर्च हो सकते हैं देश के प्रधानमंत्री के नहीं उनका बता देना ईमानदारी से सच सच बेहद ज़रूरी है। 

    आपने क्या शानदार लिबास पहने हैं बेहद कीमती होंगे ही इतना तो बताया जा सकता है क्या जितना उन पर खर्च हुआ आपकी आमदनी से अधिक तो नहीं है। ऐसे सज धज करने वाली कई महिलाओं के पति दिवालिया होते देखे हैं हमने। कोई खज़ाना मिला हो तो बता देना किस जगह से खुदाई की थी।  ये आप ही कर सकते थे कि गरीबी का रोना रोते रहे और खुद शहंशाहों से बढ़कर रईसाना ज़िंदगी का मज़ा लूटते रहे। गांधी लालबाहदुर जाने क्या सोचते होंगे ऊपर बैठे। काश अपनी ये राजसी विलासिता को बढ़ावा देने की जगह गरीबों का दर्द समझा होता और सभी सरकारी ओहदों पर बैठे लोगों को जनता के करों से मिले धन का दुरूपयोग बंद करते। जिस देश में आधी आबादी भूखी सोती है राजनेताओं का बंगलों में शाही ढंग से रहना जनसेवा नहीं अपराध की तरह है। हिसाब लगाओ आपसे पहले किसी ने खुद पर इतना धन बर्बाद किया था। अपने भीतर झांकते नहीं लोग औरों की बुराईयां देखते हैं। शायद आप पर जितना पैसा व्यर्थ बर्बाद हुआ उस से हर दिन हज़ारों लोगों का पेट भर सकता था। कथनी और करनी का इतना अंतर कभी नहीं देखा इतिहास में बल्कि विरोधाभास साफ नज़र आता है।

  धर्म के जानकर हैं और धार्मिक दान पुण्य कोई व्यक्ति करता है पूजा अर्चना हवन यज्ञ आदमी पंडितजी द्वारा संकल्प लेता है अपने नाम पिता के नाम कुल आदि से जिसका संबंध देश के संविधान से नहीं किया जा सकता है। पुण्य आपके नाम दान आपके नाम खर्च आपके नाम ही होना चाहिए। पांच साल में जितने ऐसे कार्य किये हैं आपके व्यक्तिगत खर्च हैं अपनी आमदनी से किये जाने चाहिएं ही थे हुए भी होंगे। बता दें कि कितना खर्च दान धर्म के मद में किया है। आपकी श्र्द्धा किसी भी धर्म में हो सकती है मगर देश का संविधान धर्म निरपेक्षता का पक्षधर है। देश का खज़ाना अपनी धार्मिक आस्था को निभाने पर व्यय करना धर्म भी उचित नहीं समझेगा। सत्ता का दुरूपयोग किसी भी तरह नहीं किया जाना चाहिए। 

नहीं अपनी विदेश की यात्राओं और सरकार के इश्तिहारों से आपके गुणगान की बात नहीं करते क्योंकि उसको जनहित देश सेवा कहना आसान है। आपके घर दफ्तर रहन सहन पर हर दिन लाखों का व्यय भी परंपरा है अपने दो चार गुणा बढ़ाया ही तो है। आप के एक एक मिंट की कीमत जनता ने चुकाई है बदले में अच्छे दिन के नाम पर जो मिला सच होता तो आज अच्छे दिन आपको भी याद रहते भाषण देते समय। लेकिन किसी भी राजनेता को अपने व्यक्तिगत धर्म आदि के आयोजन खुद अपनी आमदनी से करने ही चाहिएं। 

                            सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते।


Sunday, 28 April 2019

खुश रहना ज़रूरी है क्या ( जीवन सफर ) डॉ लोक सेतिया

    खुश रहना ज़रूरी है क्या ( जीवन सफर ) डॉ लोक सेतिया 

    68 साल जिया जी लिया हर साल नव वर्ष पर जन्म दिन पर समय समय पर चिंतन करता रहा।  कितनी बार कुछ नियम तय किये भविष्य में क्या करना क्या नहीं करना। डायरी पर लिखे रहे अमल लाना संभव नहीं था। खुश रहना सीखा नहीं आता भी नहीं फिर भी कभी कभी सोचता रहा हर हाल में खुश रहना है। खुश रहना अच्छी बात हो सकती है मगर आज समझना चाहता हूं खुश रहना कोई ज़रूरी तो नहीं है। कल मुझे पता है सभी लोग जन्म दिन पर यही शुभकामनाएं देना चाहेंगे खुश रहना। खुश रहना शायद मेरे बस की बात नहीं है मुझे खुश कैसे रहते ये भी समझ नहीं आया। नाचना झूमना गाना मनोरंजन करना मिलना जुलना
सैर सपाटे करना मनपसंद खाना खाना ये सब मुझे लगता नहीं मन के भीतर कोई वास्तविक ख़ुशी महसूस होने देते हैं। औरों को खुश दिखाई देते हैं अपने मन में उदासी रहती है। उदास रहना खामोश रहना कितना सुकून मिलता है भीड़ से अलग बस खुद अपने आप से बातें करना। तनहाई से घबराता था कभी अब समझ आया तनहाई कितनी अच्छी थी अब तनहाई मिलती नहीं लाख कोशिश करने पर भी। कुछ बातें अच्छी लगती हैं लिखना जो मन चाहे बिना इसकी परवाह किये कोई पढ़ता है तो क्या नहीं पढ़ता तो क्यों और पढ़ कर जाने क्या सोचेगा कोई छपने को लिखना नहीं लिखने को लिखना है अपने आप से मिलना खुद को समझना।

खुश रहना खराब बात तो नहीं मगर खुश रहने को ख़ुशी साथ होनी चाहिए। जब दुनिया भर की परेशानियां खुद से ज़्यादा समाज की आस पास की देश की दुर्दशा की पल पल दिखाई देती हैं तो लगता है ख़ुशी कोई गुनाह है। देश जल रहा हो हम कोई नीरो हैं जो चैन की बंसी बजाएं। खुश हैं शायद कुछ लोग धन दौलत सत्ता शोहरत ताकत सफलता पाकर। मैंने कभी ये सब चाहा ही नहीं जो चाहा मिलना क्या कहीं नज़र नहीं आया है भी वास्तव में कि बस इक कल्पना है। इक घर जिसके दरवाज़ा खुला रहे कोई आना चाहता है चला आये जिस घर में अपने बेगाने की कोई बात नहीं हो। इक गांव या शहर जिस में अपनापन हो प्यार हो लगाव हो किसी को किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं हो। बंधन हो प्यार का मुहब्बत का कोई रिश्तों की दिवार नहीं हो जिस की ऊंचाई आंगन में धूप की रौशनी की किरणों को आने से रोकती हो। सब अच्छे हैं कोई भी खराब नहीं है मगर सब को बाकी लोग भी अच्छे लगते हों जैसे भी हैं ठीक हैं। माना बहुत कुछ है जो आस पास देश समाज में अखरता है चिंतित करता है परेशान करता है मगर क्या मिलकर बदलना संभव नहीं है। मैं भी आप भी अपने अपने हिस्से की बात करूं बाकी लोग भी अपना अपना कर्तव्य निभाने का काम करें।

सबसे बड़ा झगड़ा अहंकार का है किस बात की अकड़ है कोई नहीं जानता बस मुझसे भला कोई भी नहीं। समझदार जानकर काबिल मुझसे बेहतर नहीं कोई भी। लाईलाज रोग लगा लिया है जो खुश होने देता है न किसी को ख़ुशी देने देता है। जाने कैसे लोग हैं जो जलती हुई रेत के रेगिस्तान को पानी का दरिया समझते हैं और मृगतृष्णा में दौड़ते दौड़ते प्यासे मरने की राह पे हैं। हमें तो रेंगने की भी इजाज़त नहीं मिलती वर्ना किसी शायर की कही बात है जिधर जाते कुछ फूल खिलाते जाते। ज़िंदगी को सालों से नापना व्यर्थ है जीवन की सार्थकता को पैमाना बनाकर समझना होगा क्या हासिल है। ये सोच कर पता चलता है जाना बहुत दूर है समय का पता नहीं और अभी सफर की शुरुआत करनी है। ठहरी हुई है ज़िंदगी उसी जगह पर कब से। संकल्प की बात दोहरानी है कल जन्म दिन से इक नई शुरुआत जीने की करना चाहता हूं जो सार्थक हो। इतनी सी आरज़ू बाकी है।