Wednesday, 25 March 2020

कथाओं का आधुनिक स्वरूप ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  कथाओं का आधुनिक स्वरूप ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

हर सुबह आठ बजते टीवी चैनल पर कोई भविष्य बांचने आता है। हर दिन दावा करता है हम आपके साथ हैं उपाय बताते हैं आपका कुछ भी बुरा नहीं होने देंगे। फिर राशिफल बताते है किस का दिन सप्ताह महीना साल कैसा होने वाला है। आखिर में किसी राशि का जैकपॉट खोलने का दावा करते हैं और तमाम लोग उनकी बात पर भरोसा करते हैं ये उनको चिट्ठियां मिलती रहती हैं। इसके बावजूद कोई भी नज़र नहीं आता जिसको कोई समस्या नहीं हो या उनकी सलाह से सब वास्तव में अच्छा हो गया हो। इक और हैं जो जाने क्या सोचकर जब भी कुछ कहना हो शाम को आठ बजे का समय चुनते हैं कोई राज़ छिपा हो सकता है। कई लोग घबराते हैं अबकी बार जाने क्या दूर की कौड़ी लाये हैं।

कड़ियां जोड़ना दर्शकों का काम है उनका काम ठीक समय पर हर बार नये विषय किरदार की बात निदेशक बन कर समझाना है। ये लगता है देश की सरकार और राज्यों की सरकारें सागर मंथन कर अमृत कलश की खोज करना चाहते हैं। पौराणिक कथा में पहाड़ की शिला को मथनी बनाकर देवताओं दानवों ने रस्साकशी की थी अब देश की जनता को मथनी बनाने को जकड़ा गया है और लोग खुश हैं कि उनकी सुरक्षा और भलाई को जो भी संभव है किया जा रहा है। कहने को सबको घर की लक्ष्मण रेखा में रहना है सीता माता की तरह बाहर निकलने की गलती की तो रावण जैसा कोई दैत्य गंभीर रोग का भेस धारण कर प्राण को हर ले जाएगा। जैसे कभी महिलाओं को घर की चौखट नहीं लंगने की बात समझाई जाती थी यहां तुम सुरक्षित हो। ये प्यार की रिश्तों की जंजीर पहन कर महिलाएं अपना शृंगार समझती थी। शायद सबको यकीन है इस बार बच गए तो अमर हो जाएंगे और वो सब पुरानी बातें झूठी साबित हो जाएंगी कि जब जैसे जिसकी मौत आनी है टाली नहीं जा सकती और यमराज आपको हज़ार तालों में बंद होने पर भी खोज ही लेगा।

अभी तक कोई डॉक्टर आदमी में आत्मा को तलाश नहीं कर सका है अन्यथा अगर कोई आधुनिक उपकरण ये दिखलाता कि किस किस की अंतरात्मा मर चुकी है और वो ज़िंदा होकर भी ज़िंदगी से अनजान हैं। अपनी अपनी लाश का बोझ उठाए मौत का इंतज़ार करते हैं। गीता में क्या लिखा हुआ है अब किसी को याद नहीं अर्जुन को उपदेश देते हैं कृष्ण हथियार उठाओ जिनको मारने से तुम डरते हो उनको काल के मुंह में जाना ही है तुम सिर्फ माध्यम बनते हो और शरीर मरता है आत्मा जन्म लेती है जैसी जाने कितनी बातें आखिर कायरता और मोह छोड़ युद्ध करने को तैयार कर लेती हैं। अच्छे वक्ता अपनी वाणी और चतुराई से हर किसी को मोहित कर सकते हैं तभी कौरव पांडव दोनों पक्ष कृष्ण को अपना मानते हैं। कृष्ण वो शासक है जो खुद पांडवों की तरफ है और अपनी सेना कौरवों को देते हैं , इक कवि की कविता में राधा सवाल करती है कान्हा तुम अपनी सेना जो आपकी जनता थी जिसकी सुरक्षा करना आपका फ़र्ज़ था उसको अर्जुन के तीरों से कैसे मरने देते रहे। शासक बनकर लोग कितने भी समझदार हों निष्ठुर बन जाते हैं।

सागर मंथन से अमृत ही निकलेगा या विष भी निकल सकता है। और अगर विष मिलेगा तो कौन है जो शिव बनकर हालाहल पी नीलकंठ बन सकता है। सत्ता का अमृत कलश सभी की चाहत है मगर अब कोई सच झूठ को परखने की चर्चा करता है तो सभी उसको जाने क्या क्या कहने लगते हैं। विदुर जैसा महात्मा इस कलयुग में कोई नहीं है। सच तो ये है कि आजकल जितने भी नायकत्व के किरदार वाले हैं सब नकली हैं असली रामायण गीता के किरदार कहीं नहीं हैं।

यमराज अपने बॉस भगवान के पास आये हैं सूचित किया है भारत सहित कई देश लॉकडाउन की घोषणा कर रहे हैं। भगवान नहीं समझे यमराज को इन बातों से क्या मतलब है। यमराज ने कहा क्यों नहीं आप मुझे भी भारत की सरकार की तरह तीन सप्ताह घर पर बैठने की अनुमति दे दें। मेरा भैंसा भी कभी तो आराम करने का हकदार है। भगवान ने कहा भला जन्म मृत्यु पर भी कोई बंदिश लगती है कभी। दुनिया में जीवन मृत्यु को कभी विराम नहीं मिल सकता है। आप तो जाते रहते हैं भारत की सरकार ने सबको घरों में रहने को आदेश दे तो दिया है मगर क्या हर नागरिक को घर मिला हुआ भी है। लोग बाहर नहीं निकलेंगे तो क्या इतने दिन कोई भी मरेगा नहीं ये नहीं जानते जन्म मरण उनकी मर्ज़ी से नहीं हो सकता है। मौत को जिसे जैसे अपनी आगोश में भरना है घर बैठे भी मुमकिन है ऊंचे महल की दीवारें भी किसी को मरने से बचा नहीं सकती हैं। आपको कोई टारगेट नहीं दिया जाता विधाता को केवल संतुलन कायम रखना होता है , जन्म लेते रहे और मौत नहीं होगी तो दुनिया की मुश्किल और बढ़ जाएगी। यमराज बोले अभी मैं इक सज्जन पुरुष को लाने गया था मुझे देख कर बोलने लगा कि जब तक लॉक डाउन है मुझे रहने दो अन्यथा मेरी अर्थी को उठाने कांधा देने कौन आएगा। किसी ईश्वरभक्त की ये दशा हो ये तो मुझे उचित नहीं लगा और मैंने उसे कुछ दिन की मोहलत अपने विशेषाधिकार उपयोग कर दे दी है।

भगवान ने अपने चक्षु बंद किये विचारमग्न होकर समस्या को समझा , फिर बोले ये बताओ अगर भारत में किसी वीवीआईपी का अंत आने वाला हो क्या तब भी ये सब नियम लागू रहेंगे। यमराज बोले भला ये भी कोई पूछने वाली बात है इस देश में खास लोगों की खातिर सब बदल जाता है। अभी देखा अमेरिका के सरकार आये तो मीलों लंबी दीवार बनाई गई गरीब बेघर बस्ती वालों को छुपाने को। ऐसे लाखों करोड़ बर्बाद करते हैं आडंबर और तमाशाओं पर उतने से कितने बेघर को घर भूखों को रोटी और रोगिओं को अस्पताल मिल सकते थे। सच तो ये है कि आज तक किसी रोग महामारी क्या दुर्घटना हादिसे से इतने लोग नहीं असमय मरे हैं जितने इन राजनेताओं और बड़े बड़े अतिविशिष्ट लोगों के सही आचरण नहीं करने और लापरवाही और मनमानी तथा अमानवीय कर्मों से मरते हैं जिनका दोष कभी कुदरत कभी भाग्य कभी विधाता को देने की बात की जाती है। भगवान ने चित्रगुप्त से जन्म मृत्यु का आंकड़ा पूछा तो उन्होंने बताया कि जैसा हमेशा से था उसी तरह सब सामान्य है अब मौत के कारण समय समय पर इंसानी फितरत को देख बदलते रहते हैं। समस्या विकट है जिनकी बारी है उनको मरना मंज़ूर नहीं मगर जिनको अभी जीना है वो खुद अपनी जान देने को व्याकुल हैं ऐसे में सरकार को कुछ नहीं सूझता क्या समस्या है और उपाय क्या है। सरकारों को जब जो करना होता है करती नहीं बाद में पछताती हैं मगर यमराज बोले हमको जो करना है किसी सरकारी आदेश से क्या रोक सकते हैं।

   कोई दार्शनिक चिंतित है कि जैसे पंछी जानवर पिंजरे में रहने के आदी हो जाते हैं तो उनको खुली हवा में आज़ाद होना घबराहट पैदा करता है। कहीं घर में बंद रहने की आदत बन गई तो हर शहर गांव गांव इक ख़ामोशी नहीं छाई रहने लग जाए। 

Tuesday, 24 March 2020

मौत से डर के जीना छोड़ दोगे ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

   मौत से डर के जीना छोड़ दोगे ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

शीर्षक से समझ सकते हैं " करो- ना " का उल्टा है ना करो। कुछ भी नहीं करना घर बैठ चिंतन करना है। इसी को कहते हैं जब किसी का वक़्त आता है तो हर तरफ उसकी धूम मची होती है। अब लग रहा है दिल के रोग कैंसर का रोग किडनी का डॉयबिटीज़ का जिगर का शरीर के हज़ारों रोगों का नाम निशान बाकी नहीं है। कोई किसी और रोग से मरने से नहीं घबराता बस इक रोग की दहशत है हर कोई उस से बचना चाहता है। गब्बर सिंह का रुतबा पचास कोस तक था लादेन का कुछ देशों तक मगर इन का भय उन देशों तक को है जिन्होंने दुनिया को अपनी ताकत से डराने और अपने आधीन करने के मनसूबे पाल रखे थे। हर सेर को सवा सेर मिलता है ये शाश्वत सत्य है। 

कहीं बैठा कोई किसी को अपनी वास्तविकता बता रहा है। आज मेरा समय है मगर मुझे भी खबर है मेरा भी अंत इक दिन होना है अहंकार करने वालों का अंजाम यही होता है। लोग गीता रामायण बाईबल कुरान गुरुग्रंथ साहिब को भूलकर जाने किस किस को सुबह शाम रटने लगे थे। भगवान से मंदिर मस्जिद बड़े लगने लगे थे और हर किसी ने कितने लोगों को इन सभी से बढ़कर समझ लिया था। किसी को कोई साधु किसी को कोई अभिनेता किसी को कोई खिलाड़ी किसी को कोई राजनेता किसी को कोई योगी किसी को कोई झूठ का कारोबारी किसी को दुनिया का सबसे अमीर उद्योगपति अपना आदर्श लगता था। अब इन सभी से किसी को कोई उम्मीद नहीं रही कि हमको बचा लेगा क्योंकि ये सभी तथाकथित ऊंचे रुतबे वाले खुद ही बहुत बौने साबित हो गए हैं। हम हैं ना अब इनसे कोई भी आपको ये दिलासा नहीं देने वाला। हर किसी को अपनी जान की पड़ी है भाई जान है तो जहान है। 

कल इक दोस्त ने चार शब्द लिखे थे अपनी फेसबुक पोस्ट पर। " प्यास लगी है , चलो कुंआं खोदें ''। बात नई नहीं है हमने यही ही नहीं किया बल्कि हम तो उल्टा करते रहे हैं। ये मेरा पानी ये मेरी नदी ये धरती मेरी है सब अपने खातिर मानवता को दरकिनार कर अब खामोश हैं सभी आपसी मतभेद भूलकर अपनी अपनी जान को लेकर चिंतित हैं। उधर जितने भी बाकी रोग हैं खिलखिला रहे हैं जैसे राजनेताओं को किसी अदालत ने बेगुनाह करार दे दिया हो। अब सारे इल्ज़ाम उसी एक के सर जाने हैं अभी तक जितने लोग उन रोगों से मरे उनकी मौत स्वाभाविक समझी जानी चाहिए क्योंकि इक इस रोग को छोड़ कोई और रोग कभी था ही नहीं तभी हर देश और सरकारी स्वास्थ्य विभाग से विश्व स्वास्थ्य संगठन तक इक इसी को लेकर चिंतित हैं। कितने झगड़े कितनी नफ़रतें जो नहीं कर सके इक बिमारी ने कर दिखाया है।

               आप क्या हैं कोई दानव हैं राक्षस हैं या कोई अवतार देवी देवता क्या हैं। जवाब मिला देखो आपकी यही गलती है हर बात को किसी अंधविश्वास से मिलाने लगते हैं। अब भले कोई मुझे गाली दे या मेरी बढ़ाई करने की बात मूर्खता होगी। कोई अब भी मुझे अपना कारोबार बना सकता है मगर ऐसा कर मुझसे बच नहीं सकता है। मुझे किसी ईश्वर ने नहीं भेजा बनाया ये यहीं के दुनिया वालों की देन है। कितने नासमझ इंसान हैं विनाश के हथियार बनाने पर अपनी ताकत दिखलाने पर धन समय ऊर्जा संसाधन बर्बाद करते रहे और चांद से लेकर मंगल तक की बात की मगर वास्तविक मानवता का मंगल और उजाले की चिंता ही नहीं की अन्यथा कुदरत ने इतना सब दिया था जिस से दुनिया में सभी की सब ज़रूरत पूरी की जा सकती थी। अभी भी जाने कितने देश और लोग विचार कर रहे हैं कि हम बच गए तो मेरा उपयोग धंधा बढ़ाने में करना है। ये आपकी दुनिया खुद ही मौत की सौदागर है मौत को इतना बड़ा कारोबार बना दिया है। आदमी की ज़िंदगी की कीमत समझते कहां हैं , ये जिन्होंने देश दुनिया को इंसान के लिए सुरक्षित बनाने का काम करना था उन्हीं लोगों ने इंसानियत और कुदरत से खिलवाड़ किया है और नतीजा सामने है।

मैं इनको क्या सिखला सकता हूं जब गांधी नानक कबीर और तमाम महान आत्माओं को इन्होने दिखावे और आडंबर का माध्यम बना लिया है उनकी विचारधारा की धज्जियां उड़ाई हैं। गांधी जी की सादगी और नानक कबीर जैसे संतों की क्या गीता रामायण तक को समझने नहीं अपने अपने हित साधने स्वार्थ पूरे करने को दुरूपयोग किया जाता रहा है। पाप अधर्म का फल कड़वा ही होना था मगर लोग भूल गए हैं कि ऊपर वाले की लाठी आवाज़ नहीं करती। अपने बबूल बोये हैं तो कांटें भी मिलने हैं आम कैसे मिलते। अभी भी सही मार्ग पर चलकर अपने इंसानों की स्वास्थ्य शिक्षा और सभी की बुनियादी ज़रूरतों को ध्यान रखते हुए धन संसाधनों का सदुपयोग करें। अस्पताल स्कूल शिक्षा के मंदिर विद्यालय निर्मित करें सच्चा धर्म और ईश्वर की अर्चना दीन दुखियों के दर्द दूर करने को कहते हैं। समाज को अपनी मानसिकता को स्वस्थ बना लेंगे तो किसी भी अनहोनी से घबराने की ज़रूरत नहीं होगी। रोग पाप अन्याय से लड़ने को सत्य और ईमानदारी के मार्ग पर निस्वार्थ कर्म करने की ज़रूरत होती है। खाली बातों से कुछ भी हासिल नहीं होता है। जब तक ज़िंदगी है ज़िंदादिली से जीना सीखो मरना होगा तो मर ही जाना है। कुछ गीत कुछ बोल जीवन के आखिर में दोहराता हूं।

जीने का अगर अंदाज़ आए तो बड़ी हंसी है ये ज़िंदगी , मरने के लिए जीना है अगर तो कुछ भी नहीं है ये ज़िंदगी। अभी तो जीने का हौंसला कर लें जब आएगी मौत तो उसका भी स्वागत करेंगे। घबराने की कोई बात नहीं है इस दुनिया में कोई बचकर नहीं रहा। सब चले गए हमको भी जाना ही है। मौत से डर डर कर जीये तो जीये क्या ख़ाक। अब जीने सीख लें हम सभी मौत से सामना करने से पहले। मौत है इक लफ्ज़ ए बेमानी , जिसको मारा हयात ने मारा।  शायर कहता है गलत तो नहीं है। हमने जीना सीखा ही नहीं। सोचो कितने उपदेश देते रहे हर किसी को अनमोल वचन संदेश भेजते रहे। बस फिर से उनको याद करें और समझें तो बात आसान हो जाएगी।

अपने लिए जिए तो क्या जिए तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।
बुझते दिए जलाने के लिए तू जी ऐ दिल ज़माने के लिए।

अब छोड़ो ये लफड़ा कब कौन कैसे उठेगा। सफर फिल्म का डायलॉग है हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ है कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता। जीना सार्थक है अगर कुछ भी अच्छा कर जाओ। बीती जो बेकार थी जितनी बाक़ी है उसको कुछ अच्छा करने में लगाएं तो ज़िंदगी का मकसद होगा। सौ साल जीना ज़रूरी नहीं है जितना भी है उसको भरपूर जीना है तो अपने नहीं औरों के लिए जिओ।

Monday, 23 March 2020

अब तो जागो भारतवासियो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अब तो जागो भारतवासियो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 


ये आलोचना की बात नहीं है आत्मावलोकन की घड़ी है। जब अन्य देश भयानक स्वास्थ्य समस्या से मुकाबला करने को नये अस्पताल बनाने  और उपचार के ढंग और खोज जांच की बात करते हैं हमारे देश का सबसे बड़ा अस्पताल अपनी ओ पी डी बंद करने का निर्णय करता है। बड़े बड़े दावे खोखले साबित हुए हैं तमाम सरकारों के आम नागरिक को उचित स्वास्थ्य सेवाओं के उपलब्ध करवाने के। पिछले कई सालों से हर सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी बुनियादी साहूलियत को निजि नर्सिंग होम या बड़े बड़े अस्पतालों के भरोसे छोड़ दिया है जो कम से कम देश की आधी आबादी के लिए असंभव है बेतहाशा खर्च कर हासिल करना।

हमने भी पुरानी चली आ रही धार्मिक निशुल्क चिकित्सालय या स्कूल बनाने को छोड़ अन्य तरह से धार्मिक आयोजनों पर पैसा खर्च करने का काम किया है। बड़े बड़े उद्योगपति भी अब अस्पताल या स्कूल कॉलेज गरीब नागरिकों के लिए नहीं बनाते अगर बनाते हैं तो किसी कारोबार की तरह। सबसे आपत्तिजनक बात है देश की जनता का धन और संसाधन हर देश की सरकार और राज्यों की सरकारों ने व्यर्थ के आयोजनों और अपनी महत्वांक्षाओं की पूर्ति और आडंबर अपनी शोहरत गुणगान करने पर बर्बाद कर मानवता के विरुद्ध इक अपराध किया है। जैसे हर दिन इक इक राजनेता और आलाधिकारी से तमाम पदों पर बैठे लोगों ने अपने सुख सुविधा और ऐशो आराम पर लाखों करोड़ों बर्बाद करने को अपना अधिकार समझ लिया है इस गरीबी भूख से पीड़ित देश में देशसेवा के नाम पर लूट ही है।

इनके देश विदेश के अनावश्यक सैर सपाटे और सांसदों विधायकों को मिलने वाली लाखों की राशि देख लगता है जैसे सरकार और अधिकारी वर्ग सफेद हाथी की तरह हैं। टीवी मीडिया जो कहने को बड़ी बड़ी बातें करते हैं वास्तव में देश में चलते आये सबसे बड़े घोटाले के भागीदार हैं। सरकारी विज्ञापन के नाम पर हर दिन करोड़ों रूपये ऐसे विज्ञापनों पर सरकार के तमाम विभाग खर्च नहीं फज़ूल उड़ाने का काम करते हैं।
काश ये सारा धन स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने पर खर्च किया जाता तो आज हम इस कदर बेबस नहीं होते। आज हम सभी को घर पर रहने को कहने वाले खुद किसी राज्य में अपनी सरकार बनाने को जमा होने वाले हैं। ऐसे में उनसे संवेदशीलता की उम्मीद क्या की जाए।

हम सभी को मिलकर भविष्य में अन्य धार्मिक कर्मकांड या आयोजन की जगह सार्वजनिक स्वस्थ्य सेवाओं और शिक्षा की तरफ ध्यान देना चाहिए। किसी धार्मिक स्थल पर चढ़ावे की जगह अपना वही धन अच्छे उदेश्य की खातिर देने का चलन फिर से शुरू करना चाहिए।

Sunday, 22 March 2020

हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) डॉ लोक सेतिया

   हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

 सच से भागना संभव नहीं है भले आपको सच सुनना अच्छा नहीं लगता है। जब कोई मुसीबत सामने खड़ी हुई तब समझ नहीं आया सामना कैसे करें। अब लोग या तो उपदेश देते हैं ये करना ज़रूरी है या फिर अपनी मूर्खता का सबूत देते हुए चुटकले बनाते हैं। गंभीर समस्या पर गंभीरता से चिंतन नहीं करते हम लोग। चलो जो हुआ अब कोई सबक तो समझ सकते हैं क्योंकि हर घटना आपको सबक सिखाती है। सरकार ने कहा लोग घर से बाहर नहीं जाएं अपना बचाव सबका बचाव करना है , चलो माना ये करने से कुछ तो बचाव शायद मुमकिन हो मगर कितना और कब तक कोई नहीं जानता। आधुनिक उपचार निदान के समय हम ये कहां खड़े हैं। मगर सवाल करना लगता है आलोचना है जबकि कमियां निकालना और वास्तविकता से नज़र मिलाने की बात करना दो अलग बातें हैं। 

विचार करो क्या सबक मिल रहा है। सच ये है कि चांद पर जाने एटम बंब बनाने सबसे ऊंची मूर्ति बनाने की बातें करने वाली सरकार ने देश की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी की है उपचार क्या जांच की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। जब समस्या खड़ी तब उपाय सूझता नहीं तब शोर मचाने जैसे काम किये जाते हैं। अभी खबर दिन भर सुनते रहे किसी फ़िल्मी गायिका की लापारवाही के आचरण की और हर कोई उसको दोष देता रहा मगर क्या हम सब भी अपना फ़र्ज़ निभाते हैं जब भी कोई बात हो अपने बारे सच जाकर बताते हैं और अपने कारोबार को छोड़कर सबकी भलाई की बात करते हैं। वास्तव में अधिकतर लोग यही किया करते हैं सच बताने से घबराते हैं। कितने लोग जब पता चला जांच करवाने की जगह शहर छोड़ भाग गए। 

इक और बात समझना ज़रूरी है। भगवान को लेकर कोई गलतफ़हमी मत रखना सब कुछ उसकी इच्छा से नहीं होता है हमने अपनी दुनिया को कितना बर्बाद किया है और जो जो भी अनुचित करते हैं उसका दोष किसी और पर नहीं दिया जा सकता है। अपने मतलब स्वार्थ को अंधे होकर हम कितना खिलवाड़ कुदरत से करते हैं। अब जब मंदिर मस्जिद धार्मिक स्थल वाले उनको बंद कर रहे हैं तब भी आपको समझ नहीं आया कि इन जगह वास्तव में कोई भगवान आपको क्या खुद को भी नहीं बचाने वाला। विश्वास के नाम पर आपकी भावनाओं का दोहन किया जाता है , कितना अंबार धन आदि जमा करना धर्म उचित ठहराता है , कदापि नहीं। यही जन कल्याण पर खर्च करते तो सच्चा धर्म हो सकता था। 

टीवी चैनल वाले खुद अपने पर कोई नियम नहीं मानते हैं। विज्ञापन के जाल में आपको फंसाते हैं अपनी पीठ थपथपाते हैं जबकि अपना कर्तव्य नहीं बिभाते निष्पक्षता से और टीआरपी और कमाई की खातिर अंधे हुए हुए हैं। राजनेताओं को अपने आप पर रोज़ लाखों करोड़ ऐशो आराम पर खर्च करते लज्जा नहीं आती है। हर दिन बेशर्मी से कोई कहता है देश जनता की सेवा नहीं कर सकता बिना संसद या कोई पद मिले इसलिए इस दल से उस दल में जा रहा हूं , क्या ऐसे स्वार्थी मतलबी लोग किसी की भलाई कर सकते हैं। और राजनीति के इस हम्माम में सभी नंगे हैं। टीवी चैनल वाले आज भी उसी से करोना पर चर्चा कर रहे हैं जिसका अनुभव केवल सब कुछ बेचकर मुनाफा कमाकर भी महानता का दावा करना है। उसकी शिक्षा जानकारी से नहीं इन को मतलब है उसके विज्ञापन से मिलने वाली राशि से। मामला चोर चोर मौसेरे भाई वाला है। हद है कि ये भी उसको अवसर लगता है अपने धंधे को लेकर। 

ध्यान से देखें तो पिछले सालों में धर्म राजनीती और खबर वालों टीवी अख़बार वालों का नैतिक पतन सबसे बढ़कर हुआ है। राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर अधिकारी और अन्य संस्थानों में नियुक्त लोग देश से धोखा करते हुए शर्मसार नहीं हैं। ये सब अपना कर्तव्य नहीं समझते निभाने की तो बात क्या करें मगर आपको आम नागरिक को आदेश उपदेश देते हैं और फिर भी उनकी नहीं मानो तो कानून की लाठी न्याय नहीं अत्याचार करने को तैयार है व्याकुल है। 

कल ये भी बीत जाएगा और सब सामान्य हो जाएगा मगर क्या हम इन से कोई सबक भविष्य को बेहतर बनाने को लेते हैं या नहीं ये हम पर निर्भर है।

पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया

  पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया 

पहले कुछ गीत याद करते हैं। पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। पंछी से छुड़ा कर उसका घर तुम अपने घर में ले आये , ये प्यार का पिंजरा मन भाया हम जी भर के मुस्काए , जब प्यार हुए इस पिंजरे से तुम कहने लगे आज़ाद रहो। हम कैसे भुलाएं प्यार तेरा तुम अपनी ज़ुबां से ये तो कहो। तोड़ के पिंजरा इक दिन पंछी तो उड़ जाना है। कोई गिनती नहीं है और ये भी सच है हम सभी खुद अपने बनाए पिंजरे में बंद हैं निकलते ही नहीं अपनी कैद से। मेरी इक कविता है। 

कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से।


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आज हमने किसी के कहने पर खुद को घर में कैद रखना चुना है। सुरक्षा की खातिर। सच तो ये भी है कि शायद भगवान भी चाहता होगा इंसान की बनाई ऊंची ऊंची इमारतों की कैद से मुक्त होना। ये जाने कैसे आस्तिक उसको मानने वाले हैं जिन्होंने उसे भी अपने तालों में कैदी बना रखा है। कितना बड़ा मज़ाक है जिसके लिए भरोसा है सबको दुनिया को बनाया है मिटाता है उसको आपके सहारे की ज़रूरत है घर बनवाने को रहने को। भगवान को दाता नहीं बेबस भिखारी बना दिया है। कब किसी भी धर्म के ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु यीशु मसीह ने कहा मुझे आलीशान महल चाहिए चढ़ावे में पैसा हीरे मोती जवाहरात चाहिए , शानदार पोशाक चाहिए।

अभी भी आपको धर्म भगवान के नाम पर कुछ करना है तो समझो वास्तविक सच्चा धर्म क्या चाहेगा। किसी भूखे को खाना किसी गरीब को आसरा किसी बेघर को घर रोगियों के लिए अस्पताल बच्चों के लिए स्कूल कॉलेज और उनको वास्तविक जीवन का ज्ञान देना। अंधविश्वास और भेदभाव का अंत करने का संकल्प। अब ये भी समझ लेना चाहिए कि क्या करना अधर्म है। अपना काम ईमानदारी से नहीं करना अधर्म है। शिक्षा स्वास्थ्य जनसेवा राजनीति निजी कारोबार को बेतहाशा धन कमाने का साधन बनाना भी अधर्म है। व्यौपार और लूट में यही अंतर है सही कारोबार उतना मुनाफा लेना जिस से आपका गुज़र बसर हो सके को कहते हैं मगर अपने लिए तमाम साधन और सुख सुविधाओं को हासिल करने को व्यवसाय में मनमाने ढंग से और उचित अनुचित की परवाह नहीं करते हुए धन कमाना अधर्म है। धर्म सबको सब कुछ मिलने का मार्ग है जब लोग अपने पास बहुत अधिक जमा करते हैं तब धर्म की बात कहना आडंबर भी है और छल कपट अधर्म भी।

इक तरफ मानते हैं जीना झूठ है मरना शाश्वत सत्य है दूसरी तरफ जीने को इतना सामान जमा करते हैं जैसे सब सुख साथ लेकर जाना है। विचार करें तो लगता है हम भगवान को धोखा देते हैं ये समझते हैं कि चाहे कुछ भी करते हैं पूजा अर्चना ईबादत और स्तुति चढ़ावे से उसको बहला लेंगे। ये समझदारी है या अज्ञानता है शायद इस से अच्छा होता हम ईश्वर को नहीं मानते नास्तिक ही होते मगर इंसान और इंसानियत को समझते। वास्तविकता में हम जिस पिंजरे में बंद हैं और खुद ही कैदी बने हैं वो पिंजरा है हमारे स्वार्थों और खुदगर्ज़ी के जाल का बुना हुआ पिंजरा। उसे तोडना है और फैंकना है किसी गहरी खाई में इस कथा के अनुसार।

साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )

 पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे आज़ाद करो। ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला। मगर पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया। अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़ सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है। उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना। अब साधु ने उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई में फेंक दिया। इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को। लेकिन आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही दिशा नहीं समझाने वाले। अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है। घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है।

Wednesday, 4 March 2020

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे पिता से पति से बराबरी करने की ज़रूरत नहीं है। जैसे कोई नदी अपने दो तटबंधों के बीच बहती है और अपने आस पास की दुनिया को बनाती संवारती रहती है। तटबंध उसको रोकते नहीं आगे बढ़ने से बांधे रखते हैं पानी को किनारे तोड़ कर बाढ़ होने नहीं देते। आधुनिक महिला को अपना बदन ढकना उचित नहीं लगता है क्योंकि उसको नहीं मालूम उसकी नग्नता जिनको पसंद है उनकी नज़र में महिला कोई इंसान नहीं इक सामान है नुमाईश का औरों के दिल बहलाने को सजना और अपने खुद के लिए संवरना दो अलग बातें हैं। महिला कम नहीं किसी से नासमझ भी नहीं है फिर भी जो किसी को चाहता है उस पुरुष भाई पिता पति या कोई दोस्त भी सखी भी हो सकती है अगर देश समाज की कड़वी वास्तविकता को जानकर किसी को उसी की सुरक्षा की खातिर संभलने को कहता है तो ये समझना किसी को क्या अधिकार है आदेश उपदेश देने का तो विचार करना होगा अपना अहम बड़ा है कि सुरक्षा और आदर की खातिर सलाह पर ध्यान देना। 

जैसे महिलाओं की भावनाओं को महिला समझती है जिस तरह पुरुष शायद नहीं ठीक उसी तरह पुरुष भी अपने पुरुषवादी समाज को हमसे बेहतर जानते समझते हैं। ये हम स्वीकार करें चाहे नहीं करें नारी कोमल मन और भावनाओं से कुदरत की रची रचना है जबकि पुरुष सवभाव से कठोर और मन से काम वासना के अधीन भीतर से किसी शिकारी की तरह है और अधिकांश पुरुष अपनी घर की महिलाओं को छोड़ बाकी को बस इक औरत ही समझते हैं और हर कोई खूबसूरत महिला को हासिल करना चाहता है। महिलाओं को अपने सजने संवरने और पुरुष से महंगे उपहार की चाहत रखने ने खुद उसी को छोटा बनाया है क्योंकि हर उपहार देने वाला खुद को बड़ा और अधिकारी होने का भाव रखता है। महिला कमज़ोर नहीं होती है उसकी इच्छाएं ही उसको कमज़ोर बनाती हैं। जब महिला उम्मीद रखती है पिता भाई पुरुष उसको आगे बढ़ने को सहायक हों तब उसे स्वीकार करना होगा खुद अपने लिए समाज से समानता हासिल करना कठिन है असंभव नहीं। और वास्तव में उन्हीं महिलाओं ने अपने समाज को दिशा दिखाई है जो बिना कोई समझौता किये अपने मकसद पाने की राह पर चलती रही हैं। जो बंधन सामाजिक ताने बाने को मधुरता बनाये रखने को हैं उनको निभाना कोई खराब बात नहीं है। 

बेशक समाज की कुत्सित सोच को बदलना चाहिए मगर नारी को ये अपनी अस्मिता खोकर नहीं कायम रखते हुए करना है। अपने बेटे-बेटी को उचित समझ और शिक्षा देकर खुद अपनी न सही अपनी आगे की आने वाली पीढ़ियों को इक अच्छा और सुरक्षित समाज देने में योगदान दे सकती हैं। सिर्फ अपने लिए अधिकार और समानता हासिल करना कोई महान उद्देश्य नहीं हो सकता है। आप शिक्षित हैं स्वालंबी हैं तो उन महिलाओं को आगे बढ़ाने को साथ दे सकती हैं जिनको अपनी शक्ति और स्वाभिमान को समझना अभी बाकी है। मगर जब महिला दिवस मनाने वाली महिलाएं अपने घर या पार्टी में कामकाजी महिलाओं को अपने से कम समझती हैं और उनको भी महिला दिवस में शामिल नहीं करती उनकी बातें भाषण व्यर्थ हैं केवल आडंबर हैं। क्या इस 8 मार्च को अपनी महिला कर्मचारी को छुट्टी देकर महिला दिवस की शुरुआत कर सकती हैं।

Tuesday, 3 March 2020

जाने वाले हो सके तो लौट कर आना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  जाने वाले हो सके तो लौट कर आना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

जनाब आली हज़ूर आपको कोई रोक नहीं सकता है। अपने ठान लिया जो भी कर के रहते हैं। सबको समझ आ गया है। आपको आपकी पत्नी नहीं रोक सकी थी और किसी का शासन आप पर क्या चलेगा। जाना है ख़ुशी से जाओ और भी ग़म हैं ज़माने में सोशल मीडिया ट्विटर फेसबुक इंस्टाग्राम व्हाट्सएप्प के सिवा। आपको जितना फायदा मिलना था मिल गया अब लगता है शायद नुकसान होता दिखाई दिया होगा। फिर भी बड़ी चहल पहल रौनक थी जाने कितने लोग तो आपने ही रख छोड़े थे गुणगान को उनको ये कमी खलनी लाज़मी है जब आप नहीं रहोगे सोशल मीडिया पर देखने को तब उनको कुछ भी पोस्ट करना किसी काम का नहीं लगेगा। अब अपने अपने दल या पद छोड़ने की बात कही होती तो चाटुकार लोगों को अवसर मिलता आपके समर्थन में भीड़ लेकर नारे लगाकर अपने नंबर बढ़ाने को। आपके दल के शासन वाले राज्यों से लोग आते आपको मनाने मगर जिनका ऐसा ख्वाब है कभी नहीं सच होने वाला। भला कुर्सी से कोई नेता कभी तंग आता है वास्तव में तो आपका ही करिश्मा है जो बड़े पद पर रहते इतना सोशल मीडिया पर रह सकते हैं। 

साफ बात तो ये है कि मुझे भी और तमाम लोगों को ये व्यर्थ की ऊर्जा और वक़्त की बर्बादी के इलावा कुछ भी नहीं है। मगर ये ऐसा नामुराद रोग है जिसका कोई उपचार नहीं आशिक़ी की तरह दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। आपको इस से छुटकारा मिले तो लोग दोबारा कहेंगे आप हैं तो सब मुमकिन है। फिर भी मुझ जैसे जो आपके अथवा किसी के भी समर्थक या चाहने वाले नहीं हैं चाहेंगे आपके दर्शन सोशल मीडिया पर होते रहें तो खूब चर्चा को विषय उपलब्ध होते रहें। सत्ता का विरोध करने वाले लोगों को ऐसे आपका छोड़ कर जाना जैसे कुछ खालीपन दे जाएगा। ये मत समझना वास्तव में ऐसा करने से किसी को कोई फर्क पड़ेगा कुछ भी नहीं अंतर होता कोई रहता है या छोड़ जाता है बेचैनी उसी को होती है जो छोड़ता है मगर चैन नहीं आता जिस की आदत थी उसके बगैर।


Sunday, 1 March 2020

इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया

 इस युग के शिक्षक फेसबुक व्हाट्सएप्प ( होली है ) डॉ लोक सेतिया 

कथा का सार इतना है बिना देखे मिले अपनापन और दोस्ती संदेश से अचानक संबंध तोड़ने दरवाज़ा बंद करने अर्थात व्हाट्सएप्प फेसबुक मैसेंजर पर ब्लॉक करने तक का सफर। इन सब में छिपी हुई है अहंकार की भावना जो विचार विर्मश और आपस में शिष्ट वार्तालाप को जंग के अखाड़े में बदल देती है। अब कुछ घटनाओं की अनुभव की बात बिना किसी को दोष देते हुए कहना चाहता हूं। 

व्हाट्सएप्प ग्रुप में पहचान हुई संदेश आदान प्रदान के बाद व्हाट्सएप्प कॉल पर कहने लगे मिलना चाहिए। अगले दिन संदेश भेजा अगर समय है तो पास पार्क में मिलते हैं मगर जवाब नहीं मिला पता नहीं संदेश को बिना पढ़े ही डिलीट किया हो खैर। इक वीडियो भेजा जिस में साफ नहीं था कौन हैं और कब की बात है संदेश भेजा आपको पता है तो जानकारी देने का कार्य करें अच्छा होगा। कोई जवाब नहीं दिया ये भी नहीं बताया पता है या नहीं है। कल इक वीडियो आया तो लिखा जब तक सब जानकारी नहीं होती यकीन नहीं होता आपके भेजे वीडियो को फॉरवर्ड नहीं कर सकूंगा। नोटेड। संदेश इक शब्द का और ब्लॉक्ड। अब कौन उनको किस तरह समझाए कि जीवन भर लिखने से पहले सच को समझना पहचाना है अब कोई बात शेयर करने से पहले विचार करना होता है कि हज़ारों चाहने वाले पढ़ने वालों को भरोसा है ये ध्यान रखना महत्वपूर्ण होता है। हम लोग सोशल मीडिया पर रिश्ते बनाते हैं और उनको आपसी विश्वास के धागे से नहीं पिरोते हैं बड़ी कच्ची डोरी है ये आधुनिक इंटनेट और सॉफ्टवेयर ऐप्प्स वाली छूट जाती है बिखर जाती है। हम जानते हैं समझते नहीं पहचानना तो दूर की बात है। 

इक और सज्जन हैं सब जानते हैं समझाते हैं सबक सिखलाते हैं। बस अपनी बात से असहमत नहीं होने देते अन्यथा अंदाज़ बदल जाता है। कई संदेश कई वीडियो भेजते रहे अपने किसी गुरु के संबोधन वाले। मगर जब कोई गुरु अपने अनुयाइयों को अपने धर्म की अच्छी बातें समझाने उन पर अमल करने की सही दिशा दिखलाने की बात छोड़ इस पर उपदेश देने लगता है कि किसी और धर्म की क्या क्या बुराई है क्या खराब बात है कैसी शिक्षा देते हैं तब सोचना पड़ता है क्या आपके पास खुद अपने धर्म की अच्छाई बताने को कुछ नहीं जो उनकी बुराई बताकर अपने को अच्छा साबित करना पड़ रहा है। ऐसे बहुत लोग हैं जो व्यर्थ की सोशल मीडिया की बहस में आपसी नाते रिश्ते बर्बाद करने लगते हैं। 

मुझे हैरानी नहीं खेद हुआ जब देखा अपने करीबी किसी के बच्चे बड़े छोटे से वार्तालाप करने की मर्यादा की सीमा लांघ जाते हैं केवल किसी नेता के समर्थन या राजनीति की विचारधारा के मतभेद के कारण। उनका जन्म नहीं हुआ था जब से मैंने तमाम सरकारों नेताओं की आलोचना की है जनहित की खातिर मगर अपने देश की ऐतहासिक घटनाओं से अनजान ये चार किताबें पढ़ खुद को सब समझने जानने वाला कहते हैं। उनको बस वही मालूम है जो जोड़ तोड़ कर कुछ मतलबी लोगों ने अपने स्वार्थ की खातिर समझाया है। अब जब ऐसे लोगों की नफरतों का अंजाम सामने है तब भी क्या हम उनकी चालों को बांटने की राजनीति को समझ नहीं सकते। अब तो इन सब का अंत होना ही चाहिए।

Saturday, 29 February 2020

सामाजिक सरोकार एवं कलाजगत का संगम ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   सामाजिक सरोकार एवं कलाजगत का संगम ( आलेख ) 

   ( रौनक एंड जस्सी नाटक और पापुलेशन फाउंडेशन संस्था की बात )   डॉ लोक सेतिया 

कल शाम इन दोनों का संगम देखने का अवसर मिला दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में। जेआरडी टाटा से सामाजिक संस्था की शुरआत पचास साल पहले की गई थी जिस में रत्न टाटा आज की सभा के विशेष वक्ता और शामिल महमान थे। अभी दिल्ली के दंगों में मरने वाले लोगों और घायलों पीड़ितों की खातिर थोड़ा मौन रखकर दुआ मांगी गई देश की शांति की कामना के साथ। रत्न टाटा जी का उद्बोधन जैसा उम्मीद थी देश की शिक्षा गरीबी रोज़गार स्वास्थ्य की समस्याओं को लेकर था और उनके परिवारिक उद्योगपति टाटा संस्थान की देश जन सेवाओं की बात थी। इस सभा में कोई दो हज़ार लोग अधिकांश दिल्ली और देश के जाने माने ख़ास वर्ग से बुलाये गए थे। दो लोग डॉ रानी बांग और डॉ अभय बांग खास थे जिनको उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। डॉ रानी बांग जी ने अपनी बात की शुरुआत ही दिल्ली दंगे पीड़ित लोगों के दर्द से की ये भी बताया कि जिस ग्रामीण महारष्ट्र के भाग से उन्होंने अपनी जनता के स्वास्थ्य और महिलाओं को सक्षम बनाने के कार्य से की थी वो ऐसी ही दशा से बदहाल था। यहां इक विसंगती पर्दे के पीछे छिपी भी वास्तव में सामने थी की आज़ादी के सतर साल बाद सरकार और समाजिक संगठनों संस्थाओं के तमाम दावों के बाद भी दूर दराज गांव जंगल जैसी हालत खुद देश की राजधानी दिल्ली में है। मगर शायद इस को सोचने समझने की कोशिश तो क्या ज़रूरत भी ये तमाम लोग नहीं समझते हैं कि हमने इतने साल में क्या हासिल किया क्या खोया है क्योंकि हम असलियत से नज़रें मिलाते हुए घबराते हैं कि जब दुनिया इतना आगे बढ़ चुकी है हम तथाकथित उच्च वर्ग अभिजात वर्ग उद्योगपति धनवान और शानदार ढंग से जीवन बिताने वाले आत्ममुग्ध हैं और अपने स्वार्थ अपनी शोहरत अपनी विलासिता को पाकर गर्व की बात करते हैं। गांधी जैसे लोग हमारे लिए वास्तविक ज़िंदगी में आचरण में कोई जगह नहीं रखते केवल देशभक्ति और आदर्शवादी भाषण देने को किसी मुखौटे की तरह हैं। बेशक डॉ रानी बांग और डॉ अभय बांग दोनों ने जीवन भर कड़ी लगन से सराहनीय कार्य किया है। मगर जब हम उनको आदर देते हुए तालियां बजाते हैं तो क्या हमने सोचा है अभी तक अपने लिए ही बहुत किया क्या अब भी वास्तविक कार्य उनकी राह पर चलकर करने की कोई भावना है। और नहीं है तो हम आडंबर करते हैं औरों से चाहते हैं अच्छे कार्य करें खुद विलासिता ऐशो आराम की चाहत को छोड़ नहीं सकते हैं। कहने का अर्थ ये है कि हम दोगले मापदंड अपनाने वाले लोगों का समाज हैं। रानी बांग के बाद डॉ अभय  बांग जी ने अपनी बात कहते हुए आज के समय की चर्चा आपत्काल लगाने के समय की घटना से की और बताया कि तब इंदिरा गांधी बेहद ताकतवर थी और सत्ता के मद में मनमानी करते हुए संविधान को नागरिक अधिकारों को कुचलती थी तब उनके वकील रहे नानी पालकीवाला ने उनके लिए वकील होने से अपना इस्तीफ़ा देते हुए उनको खत लिखा था। क्या आज कोई वकील इस समय वही सब करने वाले सत्ताधारी नेता से कह सकता है। 

    मैं सोचता हूं इस सभा के इस पहले इक घंटे के आयोजन को लेकर उस सभा में उपस्थित दो हज़ार लोगों में से बाद में क्या सोच भी रहे होंगे या फिर याद भी करेंगे या अधिकांश को बाद के दो घंटे के शानदार संगीत नाटिका का अवलोकन करने का मनोरंजन का आनंद का अनुभव ही महत्वपूर्ण लगता होगा। अब बाद के कला संगीत नाटक के शानदार आयोजन की चर्चा आगे करते हैं।

                  रौनक एंड जस्सी संगीत नृत्य नाटक ( बुक माय शो )

कहने को इश्क़ मुहब्बत प्यार ही लैला मजनू हीर रांझा रोमियो जूलियट जैसी कहानी पंजाब की ज़मीन से ताल्लुक रखती हुई। मगर जिस तरह से पंजाबी के उन गीतों को पिरोया गया है जो अब पंजाब ही नहीं भारत भर बल्कि विदेशी चाहने वालों की भी ज़ुबान से रूह तलक रचे बसे हुए हैं। शुरुआत की दमा दम मस्त कलंदर से और बेहद मधुर स्वर में नृत्य के साथ तालमेल बनाते कहानी की बुनावट को रचते हुए लोकगीतों का आनंद बढ़ाते हैं और दर्शकों को जोड़ने में सफल रहते हैं। नायक नायिका नायक के दोस्तों और नायक के सहायक मामाजी और नायिका की सहायिका दाई मां सभी का अभिनय किरदार को जीवंत बना देता है। दिल्ली से पहले मुंबई में धूम मचा चुका है। बेहद शानदार भव्य और दर्शनीय है ये संगीत नाटक हमेशा यादगार बनने के लिए उपयुक्त होगा।

      


Monday, 24 February 2020

अतिथि फिर मत आना ( आदर्शों मानवीय मूल्यों से भटके हम लोग ) डॉ लोक सेतिया

 अतिथि फिर मत आना ( आदर्शों मानवीय मूल्यों से भटके हम लोग )

                                   डॉ लोक सेतिया 

धूम मची है सरकारी महमान की राजसी आवभगत करने की। हर कोई महमान तो भगवान होता है कहता दिखाई देता है। कल मैंने कुछ ऐसे दोस्तों से कहा आपसे मिलने आपके निवास आना है हर कोई बहाने बनाता मिला आज तो बाहर जाना है कोई ज़रूरी काम है सब की विवशता थी। घर आये बिना बुलाये महमान को कब जाओगे नज़र पूछती है। ये सत्ताधारी नेता और सरकारी अधिकारी देश के खज़ाने को जम कर लुटाते हैं अपने संबंध बनाने को। सामाजिक संस्थाओं के समाजसेवी कहलाने वाले लोग भी चंदा देने से लेकर नेताओं अफसरों को सभाओं में बुलाकर उपहार देने तक सब संस्था के खाते से करते हैं। किसी पद पर आसीन होते ही उस का धन संसाधन निजी स्वार्थ की खातिर खूब उड़ाते हैं। माले-मुफ्त , दिले -बेरहम। 

शासक राजा रहे हों या अब जनता के निर्वाचित कहने को जनता के सेवक सभी पाषाण हृदय होते हैं जिनको किसी पर भी दया नहीं आती है। देश का खज़ाना बर्बाद करते उनको कोई संकोच नहीं होता कोई अपराधबोध नहीं होता कि जिनकी खातिर ये धन है उनकी दशा अभी भी कितनी बदहाल है। और ये बात केवल इक विदेशी महमान पर सौ करोड़ खर्च करने की नहीं है हर दिन कितने आयोजन समारोह मानते हुए वास्तव में आप अपनी अमानवीयता का ही सबूत देते हैं। आपकी बनाई करोड़ों की मूर्ति या फिर किसी राजा का बनाया ताजमहल दोनों की कहानी इक जैसी है। अपने आखिरी समय में वही शासक अपने बनवाये ताजमहल को कैद में बंद झरोखों से देखता था तब शायद सोचा हो कितने गरीबों की भलाई हो सकती थी अपनी झूठी मुहब्बत की इक निशानी बनाने की आरज़ू ने कितना बड़ा गुनाह करवा दिया। 

अपने घोटालों की कितनी कहानियां सुनी हैं मगर घोटाले और भी हैं जैसे जिनकी लाशें नहीं मिलीं उनके कत्ल करने वाले भी मसीहा बने बैठे रहे। जितना धन सरकारों ने आडंबरों पर आये दिन बर्बाद किया और अपनी शोहरत के झूठे सच्चे इश्तिहार छपवाने पर खर्च किया किसी अपराध से कम नहीं था। करोड़ों लोग भूख से मर जाते है याद है भात भात करती इक बच्ची मर गई थी वो इक उदारहण था अकेली वही नहीं मरी। सरकारों को इस लिए माफ़ नहीं किया जा सकता कि उनके गुनाह साबित नहीं किये जा सके। किसी शायर का इक शेर है जो समझाता है :-

                वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,

                  यो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं।

इस देश की बदनसीबी है शासकों ने कभी समय पर जनता की समस्याओं का समाधान नहीं किया है। बल्कि शायद उनकी राजनीती ही समस्याओं को बढ़ाये रखने की रही है। मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ़ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। धर्म और ईश्वर की बात करना मत अगर उनसे डरते तो शासक अपने वास्तविक धर्म से कभी नहीं भटकते।

Friday, 21 February 2020

भगवान किस के कितने भगवान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान किस के कितने भगवान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

 सबसे पहले ईश्वर को लेकर सबसे बढ़कर अज्ञानता उन्हीं लोगों में है जिनका दावा कि हम धर्म और ईश्वर की बात करते हैं। मंदिर मस्जिद गिरजा गुरुद्वारा अथवा ऐसे तमाम स्थान धर्म की दुकानदारी करते हैं अगर ईश्वर को समझते तो इंसान इंसानियत की बात करते अपने अपने भगवान देवी देवता नहीं बनाते फिरते। जिनको इतना भी नहीं मालूम कि भगवान एक ही हो सकता है जो सभी का है इनका उनका नहीं और उसका जन्म अंत नहीं हो सकता। जिनको लेकर जाने कितनी कथा कहानियां घड़ी गई हैं उन के बारे में अच्छी भी और कुछ ऐसी जो अच्छी नहीं समझी जानी चाहिए हर तरह की बातें होती हैं जबकि ईश्वर में ऐसा हो कहना ही अनुचित होगा। दुनिया एक ही है और दुनिया के सभी इंसान उसी ने पैदा किये हैं मगर जो भी इंसान इंसान में अंतर करते भेदभाव करते हैं उनको ईश्वर को लेकर रत्ती भर भी जानकारी नहीं है। 

ईश्वर को लेकर तमाम संतों महात्माओं साधु ज्ञानी लोग एकमत रहे हैं कि " सत्य ही ईश्वर है "। जिनको सच की राह चलना नहीं आता उनको भगवान भी नहीं समझा सकता है। वास्तव में तथाकथित धर्म वालों खुदा ईश्वर अल्लाह यीसु मसीह किसी को भी लेकर समझने की चाहत नहीं है उनको अपने अपने हित साधने हैं। हमने धार्मिक किताबों में सच्चाई फरेब झूठ पाप पुण्य देवता दानव मसीहा शैतान जैसे कितने किरदार पढ़े समझे हैं। सवाल उनका काल्पनिक या वास्तविक होने का नहीं बल्कि उनको समझने का है। इस दुनिया में हम देखते हैं तरह तरह के लोग कभी विचार किया जाए तो यहीं वो सब किरदार जीते जागते दिखाई देते हैं।

राक्षस अथवा शैतान अपनी ज़रूरत हवस की खातिर औरों से छीनते हैं और मसीहा देवता वो हैं जो अपने पास जितना है दूसरों की भलाई सहायता को देते हैं। ईश्वर में दुनिया में इतना सब उपलब्ध किया है जो सभी की ज़रूरत को काफी है लेकिन किसी की हवस को पूरा करने को काफी नहीं है। विचार करना होगा भगवान ने हवा पानी और कुदरती तमाम संसाधनों को किसी के लिए कम या अधिक नहीं दिया उसने हम सबको इक जैसा बनाया सब को समान हवा धूप रौशनी पानी हाथ पांव दिमाग़ बराबर दिए हैं। यकीनन उसने धरती किसी के नाम नहीं लिखी है न किसी को अलॉट की है कि आपको जो चाहे करने का अधिकार है। मगर क्योंकि चालाक और जालसाज़ लोगों ने औरों को समान नहीं देने और खुद अधिक पर कब्ज़ा जमाने को कई ढंग अपना कर ऊपर वाले की मर्ज़ी को बिना समझे खुद जितना अधिक हो सका हथिया लिया है इसलिए बाकी को उनके हिस्से का मिलता नहीं है। अपने देखा है जिनको उद्योगपति राजनेता धर्म उपदेशक बन कर बातें भली भली करते हैं मगर असल में सबको दान धर्म करने संचय नहीं करने की बात करते हुए खुद सब अपने अधिकार में लेते हैं जमा करते हैं , जैसे कोई लुटेरा डाकू साधु बनकर छलता है लूटता है। नाम राम का रख कर कर्म रावण जैसे करते हैं। कारोबारी लोग जब मनमाने ढंग से अनुचित मुनाफ़ा कमाते हैं मगर जब कभी उनको अपनी वस्तु मनमाने मूल्य पर बिकती नहीं तब उनको लगता है बदहाल हैं। अभी ऐसे कुछ लोगों की बात सामने आई जिनको व्यौपार धंधे में घाटे की नौबत हुई मगर जब उन्होंने पास कुछ भी नहीं था और समय का अनुचित उपयोग करते हुए अकूत दौलत कमाई थी उनको नहीं विचार आया था कि ऐसा उन्होंने जाने कितनों की जेब पर डाका डालकर हासिल किया है।

  जनता की सेवा के नाम पर देश के खज़ाने को अपने आप पर राजसी ढंग से खर्च करने वाले चाहते हैं उनको मसीहा माना जाए जबकि उनका आचरण शैतान जैसा है जो अपनी भूख अपनी हवस की खातिर गरीब नागरिक के हक पर डाका डाल रहे हैं। बाहर से पहनावे से मीठी मीठी बातों से मसीहा होने का अभिनय करते हैं मगर हैं लोभी लालची सत्ता के भूखे लोग। धर्म के नाम पर करोड़ों के चढ़ावे को वास्तविक धर्म दीन दुःखी लोगों की सहायता करने की बात भूलकर अंबार लगाए हुए हैं सोने चांदी और दौलत अपनी तिजोरियों में भरकर। शायद तभी इस को कलयुग कहना उचित है जहां अच्छाई पर बुराई की विजय सत्य पर झूठ और आडंबर की जीत होती है। आपको अगर लगता है कोई मसीहा कोई भगवान जन्म लेकर इन सबको खत्म करेगा तो ये इन अत्याचारी लुटेरे लोगों को समझाई बात है क्योंकि वास्तव में ईश्वर ने अपनी व्यवस्था इस तरह बनाई है कि आपको अच्छा खराब करते खुद सामने आकर नहीं रोकते हैं। जब भी हम कुछ भी गलत करते हैं तब हमारा विवेक या आत्मा हमें अवश्य समझाती है ये हम पर है कि अपने ज़मीर की बात को सुनते हैं समझते हैं या फिर अपने ज़मीर को मार देते है अथवा बेच देते हैं। अख़बार टीवी चैनल मीडिया जब पीत पत्रकारिता करता है खबर पैसे की खातिर लिखता दिखाता है तब खुद को सच का पैरोकार बताने वाला झूठ को सच साबित कर असली तस्वीर नहीं कुछ और पेश करता है। ये आईना सच नहीं दिखलाता इसको देखने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है।  मुझे आजकल कहीं भी ढूंढने से कोई देवता जैसा किरदार नज़र नहीं आता है किस को आदर्श बनाने की बात की जाए। लगता है ईश्वर अपनी बनाई दुनिया की ऐसी दुर्दशा देख सोचता अवश्य होगा मैंने कुछ और बनाया था ये वो संसार वो दुनिया तो रही नहीं है। अंत में भगवान को लेकर दशा इस कदर अजीब है कि उसके होने पर सवाल उठने लगे हैं।

  फ़िलहाल   कुछ साल पहले लिखी मेरी ये ग़ज़ल पढ़ कर कोशिश करते हैं समझने की।


 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु )

Tuesday, 18 February 2020

जनता के शासन में राजाओं महाराजाओं जैसे तौर तरीके ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  जनता के शासन में राजाओं महाराजाओं जैसे तौर तरीके ( आलेख ) 

                                       डॉ लोक सेतिया 

 भारत और अमेरिका विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाते हैं। जब भारत में चुनाव होने वाले थे तब कुछ भारतीय अमेरिका में हौडी मोदी नाम से आयोजन करते हैं जिस में अमेरिका के शासक मोदी जी के समर्थक की तरह सहयोग करते हैं।  जबकि दो देशों के संबंध दो लोगों के बीच की दोस्ती से बहुत ऊपर देशों की जनता के साथ साथ और सहयोग से बनते हैं। अब बदले में या फिर उस क़र्ज़ को चुकाने को भारत देश की सरकार नमस्कार ट्रम्प नाम से गुजरती में केम छो आयोजित करने जा रहे हैं अमेरिका में चुनाव से ठीक पहले इक शुरुआत की तरह से। कोई सौ करोड़ खर्च कर लाख लोगों की भीड़ जमा कर भव्य आयोजन किया जाना है। शायद इस से बढ़कर उपहास नहीं हो सकता कि ऐसे आयोजन में देश की वास्तविकता गरीबी अथवा झुगी झोपड़ी को छिपाने को इक सात फ़ीट ऊंची दीवार बनाई गई है ये बेशर्मी की हद है। सौ करोड़ में ऐसे गरीबों के घर भी बन सकते थे मगर जब सत्ता की राजनीति की विचारधारा ही जनता के शासन में अपने आप को राजा समझने जैसी बन गई है तब राजनेताओं से आम नागरिक के लिए संवेनशीलता की बात बेमायने हो जाती है। 

   मगर असली सवाल ये है कि लोकतंत्र में जनता के शासन में कोई भी शासक राजा की तरह आचरण कैसे कर सकता है और क्या तमाम संवैधानिक संस्थान अपनी आंखें और कान बंद कर खामोश तमाशाई बने हुए हैं। लगता है किसी बड़े अमीर देश का महाराजा इस गरीब देश में अपनी शान बढ़ाने को आने वाला है। क्या अमेरिका नहीं जनता कि इस समय भारत की सरकार देश की अर्थव्यवस्था को अपने स्वार्थ में उपयोग कर कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचा बर्बाद करने के बाद देश की जनता को दमन पूर्वक दबाने का कार्य कर रही है और पुलिस न्यायपालिका सत्ता के हाथ की कठपुतली बनकर न्याय कानून को अपनी मनमानी से इस्तेमाल कर रहे हैं। अमेरिका की निति लोकतंत्र को लेकर कितनी उचित या अनुचित है ये उस देश के नागरिक भली तरह से समझते हैं। लेकिन भारत देश में कोई अच्छे दिन के सुनहरे सपने दिखला कर सेवक और चौकीदार होने की बात करने वाला नेता जब देश की गरीबों की कमाई अपने शानो शौकत आडंबर और झूठे गुणगान पर खर्च करता है तो कथनी करनी का विरोधाभास साफ हो जाता है। 

भविष्य के भारत की राजनीति को साफ स्वच्छ करने की बात छोड़ धर्म के नाम पर आपस में नफरत की दीवार खड़ी कर बांटने का कार्य सत्ता हासिल करने को देश भक्ति नहीं हो सकती है। और देश के कई राज्यों की जनता ने इस को समझा है और ऐसे विचार वाले लोगों को हाशिये पर पहुंचाया है। अभी दिल्ली में उनका ये ढंग पूरी तरह असफल हुआ है। जाने ये कैसी मानसिकता है जो देश के संसद में बैठे लोग बड़े बड़े पद पाने के बाद अपने देश के नागरिकों को हो गाली अपशब्द बोलकर जो मर्ज़ी कहते हैं मगर न्याय कानून चुपचाप खड़ा रहता है। मगर जब संसद में करीब आधे लोग आपराधिक छवि के हों तो उनसे गीता रामायण पाठ की उम्मीद नहीं की जा सकती है। जब हम लोग ख़लनायक के कारनामों पर तालियां बजाते हैं तब केवक किसी फिल्म की कमाई और सफलता की बात होती है मगर जब आपराधिक छवि के लोगों को संसद चुनते हैं तब कांटे बोने का काम करते है और बबूल बोकर आम नहीं खा सकते हैं। 

इस देश को इक गुलशन फूलों का चमन बनाना था मगर अब इसको कांटों भरा रेगिस्तान बनाने की राह जाने लगे हैं। वक़्त फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहां कोई सत्तानशीन खुद को देश समझने लगा है मगर देश केवल ज़मीन का टुकड़ा नहीं देश की जनता उसके नागरिक आवाम होते हैं। ये बात रेखांकित करने की ज़रूरत है कि जनता के निर्वाचित लोग देश के सेवक बनकर कर्तव्य निभाने को होते हैं शासक बनकर राजाओं की तरह मनमानी दमन और ऐशो आराम शानो शौकत दिखाने की कदापि नहीं।



Thursday, 6 February 2020

मैं मेनका हूं पहचानो मुझे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     मैं मेनका हूं पहचानो  मुझे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    मेरा मुकाबला किसी से नहीं है कोई भी मेरी तरह इतनी जगह इतने भेस इतने रंग इतने चेहरे एक साथ नहीं रख सकता है। सबको ज्ञान देने वाले भी मेरी आगोश में आकर अपनी सुध-बुध अपना विवेक अपनी सोच समझ खोकर मदहोश हो जाते हैं। मेरा अस्तित्व कण कण में बसता है। राजनीति में सत्ता मेरा ही रूप है और घर बार दुनिया के रिश्ते मोह माया छोड़ने वाले साधु सन्यासी संत महात्मा तक मुझे देखते ही सब को छोड़ मेरे बन जाते हैं। सत्ता किसी की नहीं हुई न कभी हो सकती है ये जानते हुए भी सभी आखिरी सांस तक मेरे आगोश में रहना चाहते हैं। मुझ बिन जीना नहीं चाहते मेरे लिए मरने को मारने को तैयार हैं मगर मैं भला किसी के साथ मरती हूं कभी नहीं। पुराने युग में राजा पिता की मौत युवराज पिता के लिए राजा बन गद्दी पाकर मुकट धारण करने का जश्न का अवसर हुआ करता था। सत्ता कभी विधवा नहीं होती है सदा सुहागन दुनिया में मेरे सिवा कौन है अर्थी उठती नहीं शासक की और डोली पहले सजने लगती है। आजकल बदला रूप है शपथ उठाने की रिवायत निभाई जाती है और संविधान की शपथ खाई जाती है। पल भर बाद कसम भुलाई जाती है और मुझसे निभाई जाती है। माना भारत देश गांधी और जेपी जैसे महान लोगों का देश है जो कभी सत्ता पर आसीन हुए नहीं मगर जो लोग भी सन्यास लेकर भी सत्ता की गद्दी पर आये उनका ईमान पल भर में डगमगा जाता रहा है। भारत के इतिहास में ऐसा उद्दाहरण एक ही है हरियाणा के गुलज़ारी लाल नंदा जी का जो तीन तीन बार कार्यवाहक पीएम बन कर भी सत्ता से मोहित हो नहीं सके। जब उनको आखिर में सरकारी आवास खाली करवाया गया तो उनके पास इक चारपाई एक बिछाने को दरी और पहने हुए धोती कमीज़ के ईलावा थैले में दो जोड़ी कपड़े थे जिस सामान को खुद ही बिना किसी सरकारी वाहन के उठा कर चले आये थे अपने नगर कुरुक्षेत्र समाज की वास्तविक सेवा करने। दिल्ली या किसी और महानगर जाकर बसने का विचार भी नहीं आया था। अब बड़े से लेकर छोटे पद पर बैठे सभी मेरे दीवाने हैं मसताने हैं मुझ शमां के सब परवाने हैं जल जाने हैं।
             सरकारी अधिकारी कर्मचारी सरकारी अमले के लिए भी मैं अधिकार सुविधा का रूप बनकर उनकी तपस्या भंग करती हूं। मेरे हम्माम में सभी नंगे हैं और लाज शर्म की बात क्या शिक्षा और प्रशिक्षण की सभी बातें त्याग देते हैं। हमने ईमानदारी से नौकरी करनी है की भावना किस दिन किस जगह छूट जाती है कोई सोचता भी नहीं है। डॉक्टर शिक्षक भी बनते उपचार करने की कसम उठाकर हैं मगर मेरा लक्ष्मी रूप देखते ही मुझे पाने को सब करने को तैयार हो जाते हैं। धंधा कारोबार उद्योग करने वाले लोभ लालच का मेरा दुपट्टा पकड़ कर आगे बढ़ने लगते हैं तो खरीदार क्या अपने बेगाने किसी को नहीं छोड़ते हैं। मुझसे लगन लगती है तो भाई भाई का दुश्मन बन जाता है। दुनिया में मेरे प्यार के सामने बाकी सभी की मुहब्बत टिकती नहीं है। तुम मुझे कोई दोष नहीं दे सकते हो , विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के समय विधाता ने मुझे वरदान दिया था कि मैं कोई भी रूप धारण कर किसी को अपने पर आसक्त करने को आज़ाद हूं और दोषी मेनका नहीं मेनका के संसर्ग में फंसने वाला माना जाएगा।
          बाकी छोटे मोटे लोगों की बात क्या आज का सबसे ताकतवर समझा जाता मीडिया टीवी अख़बार वाले सब मेरे ही जाल में फंसे हुए हैं। टीआरपी मैं ही हूं और विज्ञापन भी मेरा ही स्वरूप है। सब अपना ज़मीर बेचते हैं भाव कम अधिक मांगते हैं कोई भी अनमोल नहीं जिसको कोई खरीदार खरीद नहीं सकता हो। अपने दाम लगवाना बढ़वाना ऊंचे भाव बिकना हर अभिनेता नायिका खिलाड़ी तक चाहते हैं। मेनका ही मेनका सब कहीं मौजूद रहती हूं मैं।
                                         ( पहला अध्याय समाप्त )

Wednesday, 5 February 2020

कौन करता भला उसूल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 कौन करता भला उसूल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कौन करता भला उसूल की बात , 
सब यहां  कर रहे फ़ज़ूल की बात। 

पतझड़ों ने बहार से कही आज , 
एक मसले हुए  से फूल की बात। 

उनकी खातिर बिछा हुआ है कालीन , 
उनको मालूम क्या है धूल की बात। 

कह रहे हम बहार की हैं सरकार , 
हर ज़ुबां बोलती है शूल की बात। 

ख़वाब टूटे हुए की देख ताबीर , 
याद उनको कहां है तूल की बात।

Sunday, 2 February 2020

एक नई कहानी चाहत की ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया

    एक नई कहानी चाहत की ( लघु कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 हर बार की तरह सत्ता पर बैठे शासक ने सपनों का नया जाल बनाया है। जनता को लुभाने को शानदार भविष्य की तस्वीर बना कर समझाया है कि जो पहले नहीं हुआ मुझसे और किसी से भी मुमकिन नहीं था इस बार अवश्य संभव होगा। शर्त इतनी सी है जैसा मुझे करना पसंद है उसका बिना सोचे समझे समर्थन करना होगा। जो मेरी बात नहीं मानेगा उसको बेवफ़ा समझा जाएगा। इस तरह से सरकार ने अपने बजट में जनता की वफ़ा और अपनी ज़फ़ा का खुला सौदा सरेआम रख दिया है। जनता को इक सदियों पुरानी मुहब्बत की कहानी याद आई है जिसको सत्ताधारी को सुनाना चाहती है मगर डर लग रहा है अंजाम को सोचकर। फिर भी साहस कर सुना रही है। शासक जी अपने पहले भी वादा किया था सेवक बनकर रहोगे मगर कभी भी ऐसा लगा नहीं। हमेशा मालिक बनकर देश का ख़ज़ाना अपने खुद पे लुटाते रहे और जब खज़ाना ख़ाली हुआ तब घर मकान सामान बेचकर सपनों की दुनिया बसाने के ख्वाब दिखला रहे हो। आपको दो आशिक़ों की बात बताते हैं। 

इक औरत के दो चाहने वाले थे और हर दिन उसको खुश करने को बहुत कुछ करते रहते थे। आखिर दोनों को इक इम्तिहान से गुज़रना पड़ा और क्या कर सकते हैं विवाह के बाद बताना था। इक आशिक़ ने बहुत खूबसूरत घर बनवा कर दिखलाया दूजे ने दौलत का अंबार लगा कर दिखलाया। उस औरत ने दोनों को इनकार कर दिया ये कहते हुए कि तुम मुझे प्यार नहीं करते पाना चाहते हो और मेरी कीमत सिक्कों में लगा मुझे खरीदना चाहते हो। मुझे उसकी तलाश है जो मुझे वास्तव में खुश रखना चाहता हो आज़ाद होकर अपनी मर्ज़ी से जीने देना चाहता हो। किसी की कविता है जिस में बेटी अपने बाबुल से अपना विवाह किसी लौहार से करने को कहती है जो उसकी जंज़ीरों को काट सके। और वो औरत अभी भी उसी की तलाश में है जो अपनी शर्तें नहीं थोपना चाहे और नारी को सम्मान से जीने देना चाहता हो अधिकार की तरह न कि किसी का उपकार समझ कर। आपने भी सत्ता पर आसीन होकर देश की जनता को अपनी शर्तों में बांधना चाहा है मगर इस युग की जनता और आधुनिक महिला सोने चांदी के गहनों और महल की चाह नहीं रखती है उसको अपने हक और समानता सुरक्षा और आदर का महत्व पता है। अब मीठी मीठी बातों से बहलती नहीं है और घबराती भी नहीं इस बात से कि किसी के बगैर कैसे रह सकेंगे। अपनी ताकत को पहचानती है जानती है अपने अधिकार भीख में नहीं मिलते हासिल करने होते हैं।

Friday, 24 January 2020

फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       राम और रावण दो किरदार हैं समय समय पर इंसान किरदार बदलता रहता है। उन के भीतर हमेशा से इक ऐसा इंसान छुपा हुआ था जो महिला को अपनी बनाकर छोड़ना अपना अधिकार समझता है। उसने कभी अच्छे होने का किरदार निभाना नहीं चाहा मगर कोई नहीं जानता वो देखने को असली चेहरा रखता है वास्तव में किसी और का मुखौटा है जैसे कठपुतली नाचती है ऊपर किसी के हाथ में पकड़े धागे के इशारे पर उसे भले होने का किरदार अनचाहे निभाना पड़ा है। अभिनेता की तरह निर्देशक की हर बात को स्वीकार करना उसकी नियति है। आखिर अब उसने जो चाहा करने की अनुमति मिल गई है और उसको नाच नचवाने वाले ने उसे नायक नहीं खलनायक बनाने की बात मान कर उसे खुली छूट दे दी है अपना किरदार खुद लिखने और दिल में छुपे सभी अरमान जी भर पूरे करने को डायलॉग क्या कथा तक अपनी इच्छा से लिखवाने की। कब से उसकी हसरत थी सीता रुपी जनता का हरण करने की और इस के लिए अब और इंतज़ार भी उसको नहीं करना तभी उसने शुरुआत ही उसी अध्याय से करने का निर्णय कर लिया है। जनता बेचारी हमेशा से कैद रही है सुरक्षा के नाम पर सत्ता की बनाई परिधि के भीतर। और हर युग में रावण को खुली छूट मिली होती है छलने को भेस बदलने से लेकर अहंकार पूर्वक नारी को हरने की राम से बदला लेने की खातिर। पुरुषों की कायरता ढकी रहती है हर हाल में रावण बनकर सीता हरण करने पर भी और राम होकर सीता से अग्नि परीक्षा लेने पर भी। अपनी पत्नी को असुक्षित अकेली छोड़ने की बात कोई नहीं पूछता महिला उद्धार की कथा सुन ताली बजाते हैं सभी। 

        कलयुग के समय भी कोई देश की जनता को छलने साधु बनकर मधुर भाषा और सुनहरे सपने दिखा सत्ता की वरमाला डलवा कर असली रंग ढंग में सामने आने लगा है। सेवक बनने की बात भूल सत्ता की लाठी चलाने लगा है। आधुनिक रावण अयोध्या को लंका बनाना चाहता है अपने हाथ से आग लगाकर दुनिया को नई रौशनी दिखाना चाहता है। अपनी नाभि में अमृत कलश समझता है जिस समर्थन को वास्तव में वही उसकी सत्ता की संजीवनी को सबसे बड़ा खतरा हैं ये विभीषण भी नहीं समझा पाएगा। अब विभीषण रावण के दर की चौखट नहीं लांघ पाएगा। आधुनिक युग की रामायण कोई बाल्मीकि नहीं लिखेगा कोई तुलसी नहीं लिख सकेगा। रावण का शासन है उसकी मर्ज़ी उसकी पसंद उसकी अनुमति लेकर भाड़े पर रखे सोशल मीडिया टीवी अख़बार मिलकर लाइव सीधा मंच से सब होता जो नहीं होना चाहिए उसे भी हो रहा दिखलाने को बेताब हैं। सीता से सवाल किया जाएगा उसने रावण को पहले क्यों नहीं पहचाना उसकी गलती है जो कलयुग में मर्यादा पुरषोत्तम की चाहत भी की । सीता को विरोध किस की अनुमति नहीं मिल सकती और सत्ता के अधिकारी की हर आज्ञा का पालन करना उसका फ़र्ज़ है।

    मगर कुछ ऐसा हो गया है जिसकी कल्पना आधुनिक रावण ने नहीं की थी। देश की जनता रुपी सीता उठ खड़ी हुई है कायरता का त्याग कर साहस के साथ। सीता ने अपनी नारी शक्ति और हर महिला की वास्तविक ताकत को पहचान लिया है और रावण को चेतावनी दे रही है कि बिना अनुमति उसको अपहरण करने की बात तो दूर उसको छूना भी चाहा तो सती अपनी शक्ति से उसको भस्म कर देगी। अपनी सुरक्षा किसी लक्ष्मण की बनाई रेखा के भरोसे नहीं खुद अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान के दम पर लड़कर करने को तैयार है। किरदार बदले हुए खलनायक को कहीं भीतर डर लगने लगा है पुरुष होकर अपनी छाती का नाप बताने वाले को औरत से मात खाने हारने के अपमान झेलने का। इतने साल तक उसने महिला जगत से छल किया उसको लुभावने नारे और समानता के अधिकार देने की बात कहकर बहलाता रहा है सत्ता पाने को उनकी सुरक्षा शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर देने की करते हुए जबकि दिल से उसने नारी को कभी आदर देने की क्या महत्व समझने का भी काम किया नहीं। मगर फिर इक बार अहंकारी का अहंकार ज़िद पर अड़ा है औरत से टकराने की एतिहासिक गलती दोहरा रहा है। उसको खबर नहीं सीता हरण के बाद की कथा क्या होगी और उस से पिछली जो कहानी नहीं दिखाई गई अभी और अगले अध्याय में फ़्लैशबैक में समझाने का विचार है उस का क्या होगा। मंदोदरी और सीता दोनों साथ मिलकर उसकी दशा वो कर सकती हैं कि अयोध्या और लंका दोनों जगह उसको अपने किरदार निभाने में कठिनाई होगी क्योंकि राम बनना अब संभव नहीं और रावण होने की कीमत जान से प्यारी सत्ता हाथ से निकलना हो सकता है।  



                                

Tuesday, 21 January 2020

मिलिए इनसे जन्म सफल हो जाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 मिलिए इनसे जन्म सफल हो जाएगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     ( इस कथा को सुनने-पढ़ने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती और मुक्ति मिलती है )

ये वही लोग हैं जिन्होंने कभी अपने माता पिता की बात नहीं मानी शिक्षा हासिल की किसी तरह उपाधि पाने को जानकारी पाना समझना मकसद नहीं था। नौकरी व्यवसाय कारोबार में सफल होने को अच्छे बुरे की चिंता कभी की नहीं। अपने फायदा करने को चोरी हेराफेरी छल कपट सब किया बिना कोई अपराधबोध मन में लाये हुए। गीता कुरान बाईबल रामायण सब की बात सुनी समझी किसी की भी नहीं। नानक बुद्ध तुलसी कबीर सभी संतो के नाम रट लिए उनकी वाणी को नहीं जाना समझा। खुद को आईने में नहीं देखा और अपनी बढ़ाई खुद औरों से करते रहे दुनिया को बुरा कहते समझते बतलाते रहे। जीवन भर अपने स्वार्थ पूरे करने को मनचाहे कर्म करते रहे और अपने और अपने बच्चों को जैसे भी संभव हुआ दुनिया का सुख देने का काम करते रहे। आदर्श सच्चाई नैतिकता शब्दों को लेकर कभी भूले से भी विचार नहीं किया। देश समाज में जितना भी पतन होता रहे इसकी चिंता कभी नहीं की। पैसे कमाना साधन जमा करना मौज मस्ती करना यही बस मकसद बन गया और खूब हंसे नाचे झूमे आनंद लिया। पाप अपराध के साथ कभी लड़ना नहीं चाहा और उनसे बचने की जगह साथ निभाते रहे। धर्म को समझा नहीं जाना नहीं धर्म की रह चले नहीं बस धर्म धर्म का शोर करते रहे आडंबर करते रहे जीवन भर धार्मिक होने का। कभी कोई धर्मगुरु मिल गया तो शिष्य बन गए मगर कभी नहीं देखा कि जो खुद लोभी लालची है और और जमा करता है अकूत धन सम्पति जमा करता रहता है कोई रास्ता अच्छा बुरा छोड़ता नहीं दुनियादारी का उसके उपदेश कितने सार्थक हो सकते हैं। सबको त्याग की बात कहता खुद मोह माया में फंसा उलझा हुआ है। ये लोग जीवन भर मनमानी करते रहे हैं मगर देश समाज को कभी कुछ भी योगदान नहीं दिया बल्कि जो भी जैसे गलत खराब हुआ उस में ख़ामोशी से सहयोगी बने रहे हैं। 

   जो कोई भी समाज की सच्चाई की बात करता झूठ को झूठ कहने का साहस करता वो इन लोगों को नासमझ पागल लगता था। ये हमेशा ऐसे लोगों से दोस्ती करने से बचते रहे। देश के इतिहास और समाज की पुरानी मर्यादाओं की इनकी समझ सतही रही और महान लोगों की गहरी बातों को समझना ज़रूरी नहीं लगा इनको। जिन गांधी भगतसिंह सुभाष जैसे नेताओं ने मिलकर देश की खातिर सब कुछ न्यौछावर किया उनको भी ऐसे लोगों ने अपनी मर्ज़ी और साहूलियत से बांटने की कोशिश की। महान नेताओं की महानता उनकी सादगी उनका त्याग ऐसे लोगों को पसंद नहीं आया और जिस किसी ने आडंबर बड़े बड़े झूठे दावे भाषण ही देने का कार्य किया इनको वही अपना आदर्श लगा जो बात कुछ नहीं चाहत की करता हो मगर चाहता हो सब उसी को हासिल हो और उसके लिए सही गलत की भी परवाह नहीं करता हो। बस इनको ऐसा इक नेता मिल गया जिसने पहले सभी नेताओं को खराब और खुद को मसीहा घोषित करने को हर तरीका अपनाया आज़माया। पहली बार किसी ने ऐसा वातावरण देश में बना दिया कि देशभक्त होने का अर्थ उस नेता की महिमा का गुणगान करना हो गया। जो भी देशवासी उसकी विचारधारा से सहमत नहीं उसको देश भक्त नहीं होने का आरोप झेलना पड़ गया। 

ये वही ऊपर बताये लोग हैं जिन्होंने देश समाज की रत्ती भर परवाह नहीं की थी मगर अब इक नेता की जय जयकार कर खुद को सच्चे देशभक्त बताने लगे और जो हमेशा देश की समाज की बात करते रहे उनकी देशभक्ति पर सवाल करने लगे हैं। इनके दिमागों में भाषा में आचरण में नफरत भरी पड़ी है अपने ही देश के भाई बहनों दोस्तों से लड़ने लो तैयार हैं इक नेता की आलोचना करने पर। देश का संविधान देश का कानून और वास्तविक धार्मिक सदभावना मानवता की बात इनके लिए व्यर्थ है। देश के लिए सबसे अधिक खतरा इसी आवारा भीड़ का है जैसा व्यंग्यकार परसाई जी को डर था होता लग रहा है। जाने इस कहानी को राजा नंगा है कहानी से क्या नाता हो सकता है शायद ये उस का अगला अध्याय है। अब राजा की पोशाक हर पल शानदार बेहद कीमती है चमकती हुई भी है मगर देश की अर्थव्यवस्था की बदहाली को छिपाने ढकने में फिर भी नमाम है। नाम खुमारी नानका चढ़ी रहे दिन रात गुरुनानक ने भगवान को लेकर कहा था ये इक आदमी को भगवान बना बैठे उसी की नाम की माला जपने लगे हैं। इन्होने अपना जीवन सफल कर लिया है और ये भी पक्की बात है जिस दिन सत्ता नहीं रही इन लोगों ने कोई दूसरा और भगवान बना लेना है क्योंकि अब इनको कोई न कोई चाहिए ईबादत करने को। चाटुकारिता की सीमा गुज़र गई गुलामी में मज़ा आने लगा है।

Saturday, 18 January 2020

विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया

  विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया 

             बस इसी इक बात से समझ लो सच क्या है , आप भगवान का गुणगान अल्लाह की इबादत वाहेगुरु या जीसस की महानता को भले किसी भी कथा कहानी आरती अदि से कहते हैं कोई आपसे सवाल नहीं करेगा कि जो अपने कहा लिखा दावा किया मुमकिन है भी या केवल कपोल कल्पना है विश्वास दिलाने को। मगर जैसे ही आप किसी बात को लेकर सवाल खड़े करते हैं कि ये सही नहीं हो सकता है या फिर जो भी कथा कहानी में बताया उचित नहीं कहला सकता आप कटघरे में खड़े कर दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों ने भगवान अल्लाह जीसस वाहेगुरु को जानने समझने की बात नहीं की केवल आंखें बंद कर अंधविश्वास किया है। अन्यथा ऊपर वाले को जो सबसे शक्तिशाली है ऐसे लोगों के सहारे की बचाव को ज़रूरत नहीं हो सकती है। 

     कुछ ऐसा ही इस समय किसी नेता या दल की सरकार के समर्थक कर रहे हैं। उनकी किसी बात की भी आलोचना को सहन नहीं करते और विरोध करने वाले को कटघरे में खड़े करने लगते हैं। उनको देश की गरीबी भूख बेरोज़गारी और अर्थव्यवस्था की बदहाली से सामाजिक सदभाव की चिंता नहीं है चिंता है किसी नेता की खुद को सबसे महान कहलाने की चाह की। हज़ार झूठ ऐसे लोगों को सच लगते हैं और देश के संविधान की भावना या जनता के जनमत की उपेक्षा को अनदेखा करना उनको आपत्तिजनक नहीं लगता है। आप इनकी तुलना उस व्यक्ति से कर सकते हैं जो उसी शाख को काट रहा होता है जिस पर बैठा हुआ है।  मगर ये उच्च शिक्षा हासिल कर विलासितापूर्ण जीवन जीते लोग सोशल मीडिया और एकतरफा शोर से इकतरफ़ा जानकारी लिए गांधी नहरू को दोष देते हैं। उनको लगता है जो लोग आजकल सत्ता पर हैं वही देशभक्त हैं और उनसे पहले सभी देश को लूटते रहे। उनको विश्वास ही नहीं है कि जिस नेहरू को लेकर अपशब्द उपयोग करते हैं उन्होंने अपनी जवानी के 3259 दिन नौ बार विदेशी शासकों के ख़िलाफ़ आंदोलन करते हुए जेल में बिताये हैं इतना ही नहीं ये भी नहीं मानते कि उनके पिता एक धनवान वकील थे जो अपने बेटे को विलायत में पढ़ाई करवा रहे थे जिनको ये तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे सड़क छाप कोई गरीब का बेटा समझते हैं। खुद ये लोग देश समाज की खातिर कुछ करने की बात पर जवाब देते हैं इस के लिए तमाम अन्य लोग हैं। मगर जिनको ये देशभक्त मानते हैं उनके संगठन के लोग आज़ादी से पहले विदेशी शासकों के लिए सूचना देने का काम किया करते थे। इतिहास में दर्ज है उनके माफ़ीनामे भी और ये भी कि उनका आज़ादी की लड़ाई में कोई भी योगदान नहीं था।

   इक बात और है जो ये आज के शासक नेहरू और पटेल को लेकर कहते हैं उनको शायद पता नहीं है कि उन्हीं पटेल जी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था और उस संगठन को लेकर क्या कहा था। सबसे अजीब बात ये है कि इनको ये भी नहीं मालूम कि नेहरू जी अटल जी के बारे क्या राय रखते थे और लोहिया से लेकर तमाम विपक्षी दल के लोग क्या कहते थे। कैसे नेहरू विपक्षी नेताओं का आदर ही नहीं देते थे बल्कि उनको संसद में देखने को कोशिश करने की खातिर अपने विरुद्ध चुनाव हारने के बाद अपने दल के किसी सांसद से जगह खाली करवाते थे। नेहरू जी के निधन पर अटल जी का संसद में भाषण इन को समझ नहीं आएगा क्योंकि इनको मानवीय संवेदनाओं से मतलब नहीं है। क्या आपको पता है अटल बिहारी बाजपेयी ने खुद स्वीकार किया था कि युवा अवस्था में उन्होंने अंग्रेजी हकूमत को सूचना दी थी उन देशभक्त आज़ादी के आंदोलन करने वालों के बारे में। क्योंकि तब उनको ये समझ नहीं थी कि सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना अपराध नहीं देशभक्ति था।

                                 नहरू का पहला चुनाव अभियान

       जब उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने। कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा। लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं। आज कोई कल्पना कर सकता है आज के सत्ताधारी नेता से ऐसी सलाह जनता को देने की बात संभव है।

       कितने लोग जेपी के आंदोलन के बारे जानते हैं शायद ये आधुनिक सोशल मीडिया से शिक्षित लोग तो नहीं। लोकतंत्र में विरोध करना नागरिक का अधिकार है ये बात अभी कल ही दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत की इक न्यायधीश ने कही है पुलिस के तौर तरीके पर कटाक्ष करते हुए। जीपी ने भी 25 जून 1975 को भाषण में यही बात कही थी जिस सभा में उस दिन मैं भी शामिल था सुनने वालों में। अपनी क्लिनिक बंद कर रामलीला मैदान आया हुआ था। उन्होंने कहा था पुलिस जनता की सुरक्षा को है और सुरक्षबलों को संविधान की भावना का आदर करना है और शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन करने पर कोई लाठीचार्ज या गोली चलाने का आदेश नहीं मानना चाहिए। जो बात उस समय इंदिरा सरकार के वक़्त कही थी जो लोग उस आंदोलन में शामिल थे और बाद में सत्ता पर रहे आपात्काल के बाद अब खुद उनकी तरह नहीं उनसे भी अधिक निरंकुश लग रहे हैं।  

  लोग आज गुमराह हैं किसी के नफरत के प्रचार से सोशल मीडिया की बातों से। समय के साथ बहुत चीज़ें बदल जाती हैं सालों बाद आपको भविष्य की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए न कि इतिहास की बीती बातों को लेकर बहस में उलझना चाहिए। कश्मीर को लेकर तब क्या क्यों किया ये चर्चा करना उसी तरह बेकार है जैसे अयोध्या में संविधान कानून को दरकिनार कर राम मंदिर बनवाने के नाम पर ढांचा गिराना ताकि अपनी राजनीति को सत्ता पाने की सीढ़ी बनाया जा सके। अभी आपको समझ नहीं आया उन लोगों को धर्म नहीं अपनी राजनीति से मकसद है। क्या आज सत्ताधारी नेताओं को देश की जनता से अपने कार्यों की बात करनी चाहिए या फिर वास्तविक समस्याओं को भूलकर अन्य विषयों में उलझाने का काम करना चाहिए। अच्छे दिन नहीं हैं गरीबी भूख और बेरोज़गारी की हालत और बिगड़ी है देश में आपसी भाईचारा और सदभावना को खतरा लगने लगा है। 1964 और 2014 के बीच पचास साल बहुत पानी गंगा जमुना में बहा है मगर कुछ लोगों को पचास साल पहले देश के सत्ताधारी नेता को दोष देने से फुर्सत नहीं है जबकि उनको विचार करना चाहिए कि इस नेता ने पांच साल से अधिक समय में देश को क्या दिया है , क्या नेहरू जी के शासन के 17 साल का तीसरा भाग क्या दसवां हिस्सा भी देश को आगे बढ़ाया है। जी नहीं मोदी जी की तुलना नेहरू जी से कभी नहीं की जा सकती क्योंकि अपने निधन के पचास साल बाद भी नहरू जी जो हैं शायद कोई और नहीं रह सकेगा।

                       

Thursday, 16 January 2020

जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये गुनाह तो मुझसे भी हुआ है शायद , उन्होंने संदेश भेजा कभी इन सभी का कोई वीडियो बड़े सरकार की तारीफ़ का भी देखा सुना है। कितनी ज़िंदगी बिता दी मैंने भी हर सरकार की आलोचना करते हुए , ये हसरत ही रही कोई तो सरकार नेता हो जिनकी जी भर तारीफ़ करने को मन करे। अख़बार वाले संपादक टीवी वाले एंकर अपने मतलब को साधने को कलाकारी दिखलाते हैं हर नेता को खुश करने को ऐसे सलीके से बात कहते हैं जिस से लगता है जनता की नागरिक की तरफ हैं होते सरकार की ओर हैं। उनकी सलाह और भी दोस्तों चाहने वालों की राय का आदर करते हुए आज ये जुर्म बेलज़्ज़त भी करने चला हूं। शायद जिन लोगों ने मुझे व्हाट्सएप्प फेसबुक पर ब्लॉक किया हुआ है उनके भगवान की आलोचना के अपराध के कारण उनको खबर मिल जाए और मुझे अनब्लॉक करने की अनुकंपा करें। 

          पहला अध्याय ( नेता जी पर आलेख लिखना है ) 50 अंक का अनिवार्य सवाल। 

  नेताजी अच्छे दिन लाने वाले थे देश को खूबसूरत सपने दिखलाने वाले थे। चाय की चौपाल पे चर्चा करवाने वाले थे। सेवक बनकर गरीबों के दुःख दर्द मिटाने वाले थे। घायल थी जनता मरहम लगाने वाले थे मगर नहीं था मालूम कैसे दिन दिखलाने वाले थे दर्द को दवा बताने वाले थे घायल को ज़ख्म पर नमक छिड़कने वाले थे उसको तड़पा कर अट्टहास लगाने वाले थे। इक नया इतिहास रचाने वाले थे शहंशाह की तरह हर घड़ी पोशाक लिबास बदलने का कीर्तिमान स्थापित करने वाले थे।  देश को नई दिशा दिखलाने वाले थे हर घड़ी झूमने गाने वाले थे। रोज़ कोई नया मजमा लगाने वाले थे देश की जमापूंजी ऐशो-आराम पे उड़ाने वाले थे। कुछ नहीं नया बनाने वाले थे जो भी स्थापित था एक एक कर गिराने-मिटाने वाले थे। हम सबको चार्वाक ऋषि की बात का अर्थ समझाने वाले थे क़र्ज़ लेकर घी पीओ की मिसाल बनाने वाले थे। अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने वाले थे , रिज़र्व बैंक से भी उलझने टकराने वाले थे। रिज़र्व बैंक का सुरक्षित धन हथियाने वाले थे अपने लिए उस को उड़ाने वाले थे। अंधे कुएं में गाड़ी चलाने का जादू दिखलाने वाले थे आग से आग बुझाने वाले थे जितना भी पानी था खुद पी जाने वाले थे। होश सबके उड़ाने वाले थे हर किसी को सज़ा देने को अपराधी बतलाने वाले थे अपनी अदालत लगाने वाले थे वकील गवाह न्यायधीश सब खुद बनकर फैसला सुनाने वाले थे। लोग ये ग़ज़ल दोहराने वाले थे , मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। आदमी आदमी को क्या देगा।

         दूसरा अध्याय ( उनकी अदालत का निर्णय ) 50 अंक का सवाल अनावश्यक है।

ऊंचे सिंहासन पर बैठे न्यायधीश बन जनता को कटघरे में खड़ा कर आरोप लगा अपनी बेगुनाही साबित करने को कह रहे हैं। लोग कह रहे हैं ये सच है हमें अपने किये का फल मिल रहा है ऐसे व्यक्ति की झूठी बातों पर भरोसा किया और उसकी सरकार बनवा दी। अब वही हम पर इल्ज़ाम लगाता है और अपने गुनाहों का दोष हम पर लगाता है। जितने अपराधी हैं राजनीति में उनको गले लगाता है अपने दल में शामिल करता है और जिनको देश विरोधी कहता था सहयोगी बनाता है। जनता को उल्लू बनाता है। चार सौ करोड़ विदेशी दौरों पर खर्च कर इतराता है खुद को विश्व का महान राजनेता बतलाता है इतने पैसे से देश की भलाई करता तो बहुत किया जा सकता था मगर उसकी जेब से क्या जाता है। दोस्तों संग जश्न हर दिन मनाता है। अपनी संस्था के लोग बड़े बड़े पदों पर बिठाता है अपनी मनमानी करने को उचित अनुचित का भेद मिटाता है। इक पुरानी कहावत सच दोहराता है , अगर संतान काबिल है तो जमा करने की ज़रूरत क्या है खुद अपने आप कमाई कर लेगी और नाकाबिल है तो जमा किया हुआ बर्बाद कर उड़ा देगी। यही कर दिखाता है ,रिज़र्व बैंक जब ये समझाता है ये सुरक्षित धन बुरे समय काम आता है। मुझ जैसा शासक हो बुरा समय खुद ही बुलाता है मेरा आदेश है मुझे चाहिए किसी का क्या जाता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस फैसला सुनाता है। भैंस के सामने बांसुरी बजाता है। 

                  तीसरा अध्याय ( अंतिम उत्तीर्ण होने को ) खरैती पास कॉपी-पेस्ट 

इक स्कूल के शिक्षक को नेता जी की बचपन की कापी रद्दी से मिल गई है। अगर मैं शासक बन गया। शीर्षक पर लेख लिखवाया गया था। तब उस बच्चे ने जो लिखा था लिखावट जैसी भी रही लेख पढ़कर अध्यापक ने नंबर शून्य दिए थे। शासक बन गया तो करना कुछ भी किसलिए है बस अपना गुणगान करवाना है उस पर खज़ाना खर्च करवाना है। अपनी सभी इच्छाएं पूरी करनी है जो मेरी बात नहीं मानेगा उसकी ऐसी की तैसी करनी है जिस टीचर ने मुझे गलती करने की सज़ा दी या भले घर के किसी बड़े ने शरारत करने पर डांट लगाई सभी को खूब मज़ा चखाना है। इक इक का हिसाब चुकाना है। बदमाश कहते हैं बदमाश क्या गुंडा बनकर सबक सिखाना है। 

वैधानिक चेतावनी :- ये इक काल्पनिक कथा की रचना है और इसका किसी की ज़िंदगी से कोई वास्ता नहीं है। किसी घटना से समानता हो ऐसा केवल इत्तेफ़ाक़ से हो सकता है।


Sunday, 12 January 2020

मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं ( मेरा परिचय ) डॉ लोक सेतिया

  मुझे चलना पसंद है ठहरना नहीं ( मेरा परिचय ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी कभी खुद से अपने बारे चर्चा करता हूं। आत्मचिंतन कह सकते हैं। मुझमें रत्ती भर भी नफरत नहीं है किसी के लिए भी , उनके लिए भी प्यार हमदर्दी है जिनकी आलोचना करना पड़ती है सच कहने को। कोई व्यक्तिगत भावना दोस्ती की न विरोध की मन में रहती है। कुछ अधिक नहीं पढ़ा है मैंने जीवन को जाना समझा है और उसी से सीखा है। किताबों से जितना मिला समझने की कोशिश की है विवेचना की है। बहुत थोड़ा पढ़ा है शायद लिखा उस से बढ़कर है विवेकशीलता का दामन कभी छोड़ा नहीं है और खुद को कभी मुकम्मल नहीं समझा है। क्यों है नहीं जानता पर इक प्यार का इंसानियत का भाईचारे का संवेदना का कोई सागर मेरे भीतर भरा हुआ है। बचपन में जिन दो लोगों से समझा जीवन का अर्थ मुमकिन है उन्हीं से मिला ये प्यार का अमृत कलश। मां और दादाजी से पाया है थोड़ा बहुत उन में भरा हुआ था कितना प्यार अपनापन और सदभावना का अथाह समंदर। दुनिया ने मुझे हर रोज़ ज़हर दिया पीने को और पीकर भी मुझ पर विष का कोई असर हुआ नहीं मेरे भीतर के अमृत से ज़हर भी अमृत होता गया। और जिनको मैंने प्यार का मधुर अमृत कलश भर कर दिया उनके भीतर जाने पर उनके अंदर के विष से वो भी अपना असर खो बैठा। 

मेरी कोई मंज़िल नहीं है कुछ हासिल नहीं करना है मुझे लगता है मेरे जीवन का मकसद यही है बिना किसी से दोस्ती दुश्मनी समाज और देश की वास्तविकता को सामने रखना। समाज का आईना बनकर जीना। भौतिक वस्तुओं की चाहत नहीं रही अधिक बस जीवन यापन को ज़रूरी पास हो इतना बहुत है। सुःख दुःख ज़िंदगी के हिस्सा हैं कितने रंग हैं बेरंग ज़िंदगी की चाह करना या सब गुलाबी फूल खुशबू और सदाबहार मौसम किसी को मिले भी तो उसकी कीमत नहीं समझ आएगी। हंसना रोना खोना पाना ये कुदरत का सिलसिला है चलता रहता है। लोग मिलते हैं बिछुड़ते हैं राह बदलती हैं कारवां बनते बिगड़ते हैं हमको आगे बढ़ना होता है कोई भी पल जाता है फिर लौटकर वापस नहीं आता है ये स्वीकार करना होता है। जो कल बीता उनको लेकर चिंता करने से क्या होगा और भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है नहीं मालूम फिर जो पल आज है अभी है उसी को अपनाना है जीना है सार्थक जीवन बनाने को। कितने वर्ष की ज़िंदगी का कोई हासिल नहीं है जितनी मिली उसको कितना जीया ये ज़रूरी है। 

लोगों से अच्छे खराब होने का प्रमाणपत्र नहीं चाहता हूं खुद अपनी नज़र में अपने को आंखे मिलाकर देख पाऊं तो बड़ी बात है। मगर यही कठिन है। मैली चादर है चुनरी में दाग़ है और अपना मन जानता है क्या हूं क्या होने का दम भरता हूं। वास्तविक उलझन भगवान से जाकर सामना करने की नहीं हैं अपने आप से मन से अंतरात्मा से नज़र मिलाने की बात महत्वपूर्ण है। और अब यही कर रहा हूं।