Tuesday, 22 August 2017

हर कोई परेशान क्यों है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        हर कोई परेशान क्यों है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

          लोग परेशान हैं , सब की अपनी अपनी चिंता है। एक महान संत कहलाने वाले पर मुकदमा चल रहा है और फैसला घोषित होना है। उस के अनुयायी कुर्बानी देने को तैयार हैं , अपने गुरु को जेल नहीं जाने देंगे। पुलिस और सरकार भी मुस्तैद है भीड़ से निपटने को सुरक्षा बल मंगवा लिए गए हैं। मैं सोच रहा हूं क्या ये सब जानते हैं अदालत उसको अपराधी बताएगी और सज़ा देगी। अभी तक सब बड़े बड़े लोग यही कहते आये हैं उनको अदालत पर भरोसा है और न्याय की उम्मीद है। और देखता आया सभी को ज़मानत मिल गई , बेगुनाही साबित हो गई और क्लीन चिट लेकर फिर और भी बड़े बन गए। अब अगर अदालत का फैसला वो नहीं हो जो सब मानते हैं और आशा करते हैं , तब क्या होगा। क्या उसको दोषी साबित नहीं होने के फैसले की कोई उम्मीद नहीं जिनको वो इस पर निराश हो जाएंगे। 
        कल तीन तलाक पर अदालत का फैसला आया कि ये असंवैधानिक है। जो अपनी विवाहिता पत्नी को छोड़ आया था बस इतना कहकर कि तेरा मेरा रिश्ता खत्म वो महिलाओं के हक की बात करता है। शायद मुस्लिम महिलाओं की चिंता से वोट मिलने की उम्मीद अधिक है। वो बेचारी तो गाय है बिना खूंटे से बंधी हुई। हरियाणा सब से आगे है। हरियाणा के विज़न डॉक्यूमेंट 2030 में महिलाओं की वर्तमान दशा उजागर हुई है। खुद पुलिस विभाग के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 73 फीसदी आपराधिक घटनाएं महिलाओं के खिलाफ प्रति लाख जनसंख्या पर हो रही हैं। जो देश की औसत से बीस प्रतिशत ज़्यादा हैं। हर तीसरी महिला पति द्वारा ज़ुल्म की शिकार है। बच्चों के खिलाफ भी हरियाणा में प्रति लाख जनसंख्या पर 27. 4 फीसदी अपराध होते हैं जबकि देश में 20. 1 फीसदी। हिंसा की घटनाओं में देश की औसत 26. 6 है और हरियाणा की 37 है। 
          सरकार के अरबों खर्च कर टीवी वालों को मालामाल कर दिया , एड्स रोगी से भेदभाव नहीं करने और एड्स से बचाव पर जागरूकता के। चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित पी जी आई में इक नवजात शिशु को पीलिया होने पर खून चढ़ाया गया जो एड्स के कीटाणु युक्त था। यमुनानगर में उस नवजात को खुद माता पिता छूना नहीं चाहते बाकी लोग क्या करेंगे क्या बताएं। सामने होते अपराध को नहीं देखने वाली पुलिस सरकार और विभाग गली गली गांव गांव जाकर भाषण दे रहे हैं कि आप घबराना नहीं हम किसी को दंगा नहीं करने देंगे। ये वही सरकार है जो पिछले दंगा करने वालों के खिलाफ दायर मुकदमें वापस लेना चाहती थी मगर अदालत नहीं मानी। सब हाथी के दांत वाले लोग हैं , खाने को अलग दिखाने को अलग। मिडिया वालों को हर दिन इक विषय चाहिए बहस कराने को दिन भर और कुछ गिने चुने लोग हर बात पर चर्चा को तैयार हैं। देश दुनिया की बाकी कोई खबर ही नहीं है। इक दिन बाढ़ इक दिन रेल दुर्घटना इक दिन अदालती फैसला अगले दिन की भी पहले से तयारी की हुई है। अपराधी घोषित होने पर भी हैं बहस वाले और अपराध साबित नहीं होने पर भी। चलो आप भी सोशल मीडिया पर समय बर्बाद करो , बाकी सब ठीक ठाक है।

Monday, 21 August 2017

बेगुनाही जुर्म है ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

       बेगुनाही जुर्म है ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

        राजनीति क्या है , अपराधियों का पहला घर है। नेता बन गए तो आपके गुनाह गुनाह नहीं रहते। हर मुकदमा राजनीतिक दुश्मनी से विपक्षी लोगों ने झूठा दायर किया है। साबित ही नहीं होता अपराध। हत्या हुई लूट हुई घोटाले हुए , मगर किसने किये कोई सबूत ही नहीं। हमारे देश की पुलिस और सभी जांच एजेंसी इस काम में माहिर हैं कि सबूत इस तरह मिटाते हैं कि खुद भी नहीं याद रहते। न्यायपालिका भी आंखों पर पट्टी बांधे है निष्पक्षता की नहीं देख कर नहीं देखने की। नेता सत्ता में है तो अपराध करने वाले अपने खास लोगों को बचाने में कभी शर्माते नहीं हैं। इक नेता को रंगे हाथ पकड़ा गया तो लोग कहने लगे अगर अपने दल के शासन में जेल जाना पड़ा तो क्या फायदा सत्ताधारी दल में होने का। सत्ता का मकसद ही लूट का अधिकार है। सत्ताधारी दल के अध्यक्ष की संविधान या कानून में क्या हैसियत है , आम नागरिक से अधिक कुछ नहीं। मगर देख लो हर पदाधिकारी खुद को देश समाज शहर गांव का शासक ही नहीं मालिक समझता है। लाल बत्ती लगाना ज़रूरी नहीं है , गाड़ी पर सत्ताधारी दल के पद का नाम होना आपको सब करने की आज़ादी देता है। मीडिया वालों का लिखा एक शब्द उनको वी आई पी बनवा देता है। सरकार तक को आम जनता की कोई चिंता नहीं मगर मीडिया पर मेहरबान हो जाती है। जो जनता की बात करने वाले थे वो सत्ता की चौखट पर खड़े मिलते हैं। अधिकारी नेता जो भी बोलते हैं बयान खबर बन जाते हैं। 
       सरकारी विभाग खुद नियम कायदे कानून तोड़ने वालों को बचाते हैं। अधिकतर अनुचित काम उनकी पहले से जानकारी या अनुमति से होते हैं। शायद देश का चरित्र ही यही बन गया है।  हर कोई मानता है कि गलत काम करना उसकी ज़रूरत मज़बूरी या अधिकार ही है। आदतन हम अपराधी हैं , अनुचित करते हमें लज्जा नहीं आती बल्कि गर्व करते हैं अपने कारनामों पर। कोई अभिनेता गंभीर आपराधिक मुकदमें में जेल से बाहर आता है तो फिल्म इंडस्ट्री उसको खलनायक नहीं नायक समझती है और जनता उसकी गांधीगिरी की कायल हो जाती है। कोई महानायक हर कानून को तोड़ता है किसी राज्य की सरकार के सहयोग से झूठा प्रमाणपत्र किसान होने का हासिल करने को और तब भी उसका बाल भी बांका नहीं होता। तमाम उद्योगपति सरकार के सहयोग से सेज बनाने को किसानों की ज़मीन लेते हैं मगर करते उसका दुरूपयोग हैं तब भी उनको लोग मीडिया महान देश भक्त और समाज सेवक साबित करते हैं। उनके एन जी ओ लूटे माल से डाकुओं की तरह गरीबों की सहायता करते हैं। 
                       हम तब हैरान होते हैं जब किसी ताकतवर के विरुद्ध कोई मुकदमा हो तो भीड़ उस का साथ देने को खड़ी ही नहीं हो जाती बल्कि उसका बचाव करती है। समझती है वो निर्दोष नहीं है तब भी उसे सज़ा नहीं मिलनी चाहिए चाहती है। हैरानी की क्या बात है , कोई बड़ा नेता खुद मानता है उसी ने रेल की दुर्घटना कराई थी बंब फेंका है मगर सत्ता मिलते ही मुकदमा वापस लिया जाता है। अभी पिछले सप्ताह ही हरियाणा सरकार अदालत गई थी दंगा करने वालों के केस वापस लेने को मगर अदालत ने झाड़ लगाई। शायद आज भी कोई सरकार यही चाहेगी सामाजिक सदभाव कायम रखने को अपराधी का पक्ष लेना। सामने बेशक कुछ नहीं कहे मगर आज भी अधिकारी और नेता यही करते हैं कानून व्यवस्था कायम रखने के नाम पर विशेष लोगों से मिलकर रास्ता निकालते हैं। कानून और अपराध में टकराव क्यों नहीं होना चाहिए। जब कानून लागू करने वाले तोड़ने वालों से सहयोग मांगते हैं तब समझ लिया जाना चाहिए सत्ता कितनी कमज़ोर है न्याय के साथ खड़ा होने तक को तैयार नहीं है। अब गुनाह करना जुर्म नहीं है। बेगुनाही जुर्म है।

Sunday, 20 August 2017

कुछ बंधे हुए कुछ खुले हुए हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      कुछ बंधे हुए कुछ खुले हुए हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

           देखने में दोनों एक जैसे हैं , काम भी दोनों एक समान ही करते हैं। फिर भी अंतर बहुत है , जो खुले हैं गरीबी रेखा की बात करते हैं।  जो बंधे हुए हैं वो अब बड़ी बड़ी बातें करते हैं कभी की थी गरीबी रेखा की बातें आजकल बदलाव की विकास की बातें , महान लोगों की बातें , फ़िल्मी नायक नायिकाओं की , खिलाडियों की बातें करते हैं। उनके लिए यही वास्तविक देश और समाज है बाकी 80 फीसदी जनता केवल इक आंकड़ा है। उस की बात तभी करनी होती है जब भूख से ख़ुदकुशी से हादसे से आपदा से उनकी मौत होती है। वो भी कुछ पल की खबर होती है। इनका काम कभी रखवाली करना हुआ करता था , चौकीदार की तरह जागते रहो की आवाज़ से सब को सावधान रखना और खबर की परिभाषा समझी जाती थी वो सूचना जो कोई लोगों तक नहीं जाने देना चाहता उसे तलाश करना और सब को बताना। आजकल खबर वही है जो नेता भाषण देते हैं , लोग खुद जाकर बताते हैं प्रेस नोट देकर। अधिकारियों की सभा बयान खबर हैं नेता की सरकार की हर बात खबर है। उनके कपड़े उनकी दोस्ती उनकी दुश्मनी उनकी घर की ही नहीं पूजा अर्चना जैसे व्यक्तिगत कामों की विस्तृत खबर। अख़बार टीवी सोशल मीडिया मिलकर एक हो गए हैं।
                जो किसी के बंधे हुए नहीं हैं उनका भी सपना है किसी के साथ बंधने का। जो बंधा हुआ है उसका मालिक उसको आदेश देता है जाओ और खबर उठा कर लाओ। ठीक अपने पालतू जानवर की तरह जो उन्हीं की फैंकी बॉल को वापस उनको लाकर देता है। वो बार बार फैंकते है और उसे बार बार लाना होता है। अपने साथ बांधे हुए की ख़बरों को देखते हैं , खबर देखी जाती है पढ़ी नहीं , कुछ खबरों पर हड्डी डालते हैं और समझते हैं उनको हज़्म कर जाओ। कुछ खबरों पर विशेष ध्यान देने को कहते हैं जिनका संबंध पैसे से विज्ञापन से या किसे से मधुर संबंध से होता है। अपने मालिक के इशारे पर पट्टे से बंधे हुए टीवी पर ज़ोर ज़ोर से निडरता की स्वतंत्रता की निष्पक्षता की बातें कहते हैं। उनका हौंसला मालिक की ताकत है बिना मालिक की अनुमति उनकी आवाज़ बाहर नहीं निकलती है। उनको बड़े बड़े इनाम मिलते हैं बेबाक आवाज़ उठाने के लिए जबकि उनकी कही हर बात संपादित हुई होती है। संपादक उस खिलाड़ी का नाम है जो खेलता नज़र नहीं आता मगर वास्तविक खेल वही खेल रहा होता है अपने आका की ख़ुशी और ज़रूरत के लिए।
          अभी अभी इक टीवी चैनल पर बहस जारी है , कल शाम को इक रेल दुर्घटना हुई जिसमें बहुत लोग मारे गए और घायल हुए , पता चला कि दुर्घटना का कारण रेलवे विभाग की लापरवाही है क्योंकि जिस पटड़ी पर रेल चल रही थी उस पर अभी पटड़ी की मुरम्मत का काम चल रहा था। विपक्षी दल की नेता के ये बात कहने पर कि जब यही नेता पिछले चुनाव में दावा करते थे कि उनकी सरकार आने पर रेलवे सुरक्षा में कोई कमी नहीं रहने दी जाएगी और ज़िम्मेदारी तय की जाएगी , तब सत्ताधारी दल के नेता के कुछ भी कहने से पहले एंकर ही कहने लगा कि आपकी सरकार के समय कितनी घटनाएं हुई थीं। अर्थात उस तथाकथित पत्रकार को लोगों की मौत और हादसे से अधिक चिंता सत्ताधारी दल की तरफ से सरकार और रेलवे विभाग का बचाव करना था। क्योंकि एंकर बंधा हुआ है और मालिक की ख़ुशी नाराज़गी का ध्यान रखना है अपने फ़र्ज़ की चिंता नहीं करनी। आज़ादी का जश्न मनाना और बात है और आज़ाद रहना अलग बात। आजकल जब हर कोई बिका हुआ है कोई उसके पास कोई इसके पास तब उनसे आम नागरिक की आज़ादी और न्याय की बात कहने की उम्मीद कौन करेगा।
                                              बड़ी बड़ी बातें करना किस काम का जब आप पैसे के लिए अंधविश्वास बढ़ाने से लेकर झूठ का प्रचार करने तक और तमाम ऐसी बातें ऐसे विज्ञापन दिखाते हैं जो महिलाओं को एक वस्तु की तरह की मानसिकता को उजागर करते हैं। सब को सही गलत की परिभाषा बताने वाले खुद अपने आप को क्यों नहीं देखते कि उनकी पैसे की हवस ने समाज को कितना नुकसान दिया है। कोई करोड़पति बनाने के नाम पर जनता को इक झूठे सपने दिखलाता है तो कोई बिग बॉस के शो में हर तरह की गंदी बात को मनोरंजन के नाम पर पैसा बनाने को उपयोग करता है। अपनी आज़ादी का जितना अनुचित इस्तेमाल मीडिया ने किया है और जैसे खुद को धर्म राजनीति और हर बात पर सब से अधिक जानकर मानकर अपनी राय को थोपने तक का काम किया है और सब इस तरह से खुद को निर्णायक ही समझने लगे हैं वो कितना अनुचित है। आप कुछ हज़ार लोगों से बात करने का दावा करते हैं और घोषणा करते हैं देश की जनता किस को चुनाव में मतदान करेगी। क्या ये लोकतंत्र है , आप कौन हैं जनमत की भविष्यवाणी कर किसी के पक्ष विपक्ष करने वाले। काश सब को आईना दिखलाने वाले खुद अपनी सूरत भी देखते और समझते कि आपका खुद का पतन किस कदर हुआ है। इक मकसद होता था कभी जनता को सच बताना जागरुक करना जो आजकल पैसे बनाने को अपना सब से बड़ा ध्येय समझ इसी को सफलता समझने लगे हैं।

 



 



Friday, 18 August 2017

ग़ज़ल 222 मुर्दा ज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो -डॉ लोक सेतिया

      ग़ज़ल 222 ( मुर्दा ज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो )

                                डॉ लोक सेतिया " तनहा "

मुर्दा ज़मीर लोगों के किरदार मत लिखो ,
जो आदमी नहीं , उसको अवतार मत लिखो। 

आवाम जान पाया नहीं था फरेब था ,
आईन देश का है गया हार मत लिखो। 

सुन शोर झूठ का आप हैरान हैं मगर ,
क्या क्या बयान देती है सरकार मत लिखो। 

अब पूछना हुआ क्या वो वादा बहार का ,
बेचैन हो के कहते हैं इंतज़ार मत लिखो। 

औलाद शासकों की तो बेहद शरीफ है ,
कुछ भी करे उसे तुम गुनहगार मत लिखो। 

उनकी किताब क्या और उनका हिसाब क्या ,
संतों का काम और कारोबार मत लिखो। 

चालीस चोर "तनहा " यहां एक साथ हैं ,
सारा गिरोह शामिल है दो चार मत लिखो।





नया इतिहास रचने वाले ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         नया इतिहास रचने वाले ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया   

           कभी पढ़ा था आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते हैं मगर सब को हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बना सकते। फिर भी इक बात अधूरी रह गई थी कि कौन कितने लोगों को कितने समय तक मूर्ख बनाकर रख सकता है। अधिकतर लोग कहते हैं मैं किसी की बातों पर यकीन करता रहा मगर बहुत बाद में उसकी असलियत सामने आई। उसे क्या समझा और वो क्या निकला। नेता बदनाम हैं जनता को मूर्ख बनाते हैं मगर बार बार जनता चुनाव में साबित करती आई है कि उसने भी नेताओं से मूर्ख बनाने का बदला ले लिया है। उसको जितवाया भी था उसकी बातों में आकर और इस बार उसकी ज़मानत भी नहीं बचने दी है। अभी तक नेता चालाकी से दोबारा भी जनता को बहला फुसला कर सत्ता हासिल करते आये हैं और दोबारा भी वही दोहराते आये हैं। मगर अभी तक देश की आधी से अधिक अर्थात पचास फीसदी जनता को कोई मूर्ख नहीं बना पाया। और जनता का बहुमत यही सोचकर खुश होता रहा कि हमने इस सरकार को वोट नहीं दिया था इसलिए हम गलत लोगों को चुनने के अपराधी नहीं हैं। देश में कहने को लोकतंत्र है मगर कभी किसी को भी डाले गए वोटों का पचास प्रतिशत मिला हो ऐसा देखा नहीं है। अर्थात देश की जनता का बहुमत उन सभी को चुनने का दोषी नहीं जिन्होंने देश को बदहाली तक पहुंचाया है। मगर फिर इस युग का अपना नया इतिहास रचने को इक कलयुगी अवतार आ गया जो सूरज नाम रखकर आकाश में धुंआ बन छा गया। झूठ और सच के अंतर सभी मिटा गया , उसके सामने कोई भी रह नहीं पाया खड़ा , भूखा था कई जन्मों का वो और भूख बढ़ती ही गई। सब का साथ देने के लिए हर किसी को खा गया। हर तरफ इक शोर सा होने लगा भागो भागो , बचना नहीं उस सर देखो देखो वो आ गया। लेकिन बड़ी ही मधुर उसकी कटु मुस्कान थी , दिल लुट गया अपना भी क्या क्या हुआ बतला गया।
         संविधान की किताब को धर्म वालों की तरह , बस सर झुकाने की औपचारिकता निभा गया। मतलूब लोगों के शासन का ज़माना आ गया , अपने चाटुकार लोगों को हर जगह बिठा गया। तालिब कोई भी नहीं ये कैसा जनतंतर आ गया। तिनका भी नहीं था वजूद जो आसमान पर छा गया। देखे नहीं थे जो कभी ऐसे भयानक दिन लाकर , लो अच्छे दिन हैं यही सब को यही समझा गया। दिल में थी छुपी नफरत जाने किस किस बात की , आओ गले लग जाओ मेरे दोस्त बनकर इक मुहब्बत का नग्मा सुना , दुश्मनों को ही नहीं नाम तक को उनके मिटा गया। आधार कोई भी न था पास उसके कभी , नींव नहीं रखी कोई दीवार ऊंची बनवा गया। क्या क्या किया क्या नहीं किया कोई भी नहीं जानता , इक राज़ की तरह दिल दुनिया का दहला गया। तय कर लिया उसने यही बस एक सच्चा है वही , हर झूठ को अपने सच से वो जितवा गया। राजा नंगा था मगर कोई भी न कह सका , कैसी कैसी पोशाक हर दिन पहनकर आ गया। देश क्या समाज क्या कोई नहीं उसके सिवा , आंधी की तरह , तूफ़ान की तरह , बाढ़ की तरह। उड़ा दिया , मिटा दिया , डुबा दिया क्या क्या नहीं समझा गया। बस इक वही सब से भला हर दीवार पर इश्तिहार है , जितने लगे थे दाग़ खुद पर वो सभी को छुपा गया। सिकंदर हूं मैं मुझे राज करना विश्व पर , कैसे है कैसे नहीं कोई नहीं ये सोचना , खाली हाथ आया मगर सब कुछ अपना ठहरा गया। त्राहिमाम त्राहिमाम की खामोश इक आवाज़ है , डरते हो क्यों मुझसे तुम कह और दहशत दिखला गया। हर तरह विनाश ही विनाश आता है नज़र विकास जिसको आकर है वो बतला गया। फिर वही पुरानी कहानी को दोहरा रहा है , देश है बदहाल नीरो बंसी बजा रहा है।
           चोरों को सज़ा देनी थी जिसे खुद चोर सभी हैं बन गये। जितने भी थे कातिल सभी उसकी शरण में आ गए और इल्ज़ाम कोई नहीं उनपर अब सब मसीहा बन गए। इक आग का है खेल जिसमें बचेगा कोई नहीं , किसको बुझानी आग है आये कोई तो नज़र कहीं। घर को जलाकर लोग बाहर खड़े हैं देखते , ज़िंदा भी कोई जल गया होगा नहीं अब सोचते। सोने की लंका जली रावण की लगाई आग से , राम और हनुमान तो हैं दूर ही से देखते। विनाश काले विपरीत बुद्धि का युग फिर आया है। हर पाप को पुण्य नाम से मिलवाया है। फिर से लिखो भाषा भी तुम बलिदान की , मिट गई किताबों से कहानी देश इक महान की।                                          

Thursday, 17 August 2017

आंखों वाले अंधे ( तीर-ऐ-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

       आंखों वाले अंधे ( तीर-ऐ-नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

      अभी जब सुबह सैर को गया रास्ते पर चौराहे पर देखा इक बोरी में कुछ डाल गया था कोई चौराहे पर। किसी ने उसको बताया होगा ऐसा करने से अच्छे दिन आ जायेंगे। अक्सर जादू टोने और लाल किताब वालों के ऐसे उपाय लोग आज़माते हैं। कभी मैं भी खुद शामिल रहा हूं इस सब में मुझे ये स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है कि पढ़ लिख कर भी हम कूप मंडूक बने रहते हैं। लोग विदेश में जाकर देखते हैं कोई गंदगी नहीं करता इस तरह। क्योंकि उनको ने केवल सभ्य रहना किसे कहते हैं समझाया गया है बल्कि असभ्य होने पर शर्मिंदा ही नहीं सज़ा और जुर्माना भी भरना होता है। हमारा प्रशासन कभी गलत होने को रोकता ही नहीं है। गलत होते को देख कर भी अनदेखा करता है। आप जाकर बताओ तब भी विवश होकर भी उसे अपना फ़र्ज़ निभाना पसंद नहीं और कोई करवाई नहीं करने के सौ बहाने बनाता है। मैंने इक अधिकारी को बताया कुछ लोग जो खाने पीने का सामान बेचते हैं अपना कूड़ा और गंदगी बीच सड़क डालते हैं और सड़क या फुटपाथ पर चलना मुश्किल हो गया है। हर विभाग किसी दूसरे पर दोष देता है। ये काम नगरपरिषद का है , नगरपरिषद वाला बताता है विकास प्राधिकरण की जगह है उनको अपनी जगह पर अवैध कब्ज़े हटाने हैं , विभाग बताता है हम पुलिस को बताते हैं करवाई करे। शहर के अधिकारी स्वच्छता पर भाषण देकर खुश हो जाते हैं इनाम पाकर। सरकार को बेईमानों को अपना फ़र्ज़ नहीं निभाने वालों को कुछ नहीं कहना , केवल ईमानदारी का तमगा लगा गिनती करते जाना है। ईमानदारी क्या कोई स्लोगन है। कोई भी विभाग ईमानदार होकर अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता और आपकी सरकार ईमानदार है। आजकल शर्म नहीं आती किसी को भी। कहते कुछ हैं करते कुछ भी नहीं। 
                              बैंगलोर में झील का पानी ज़हरीला होकर झाग बनकर उड़ता है क्योंकि सत्तर उद्योग उस में अपनी गंदगी डालते रहे और प्रशासन आंखे बंद किये रहा। तमाम नदियों तालाबों को गंदा कर दिया है। आप पूजा पाठ के नाम पर कितना कूड़ा नहर में बहाते हैं , इक गंगा ही नहीं हर नदी पवित्र है आपने सब को मैली कर दिया। ये धर्म नहीं है। बहुत अनुष्ठान धर्म नहीं हैं , जो समाज को ज़हर दे प्रदूषित करे उसे पूजा पाठ नहीं कहना चाहिए। लोग अपने पड़ोसी के घर के बाहर कुछ डालते हैं ताकि उस का बुरा हो , अपनी नफरत अपनी जलन को भी लोगों ने धर्म से जोड़ दिया है। अख़बार में विज्ञापन देते हैं दुश्मन को खत्म करने वाले यंत्र और खुद को धनवान बनाने वाले यंत्र। ये क्या है , अपराध ही है , ठगी है। मानसिक दिवालियापन है।  कोई नेता कोई अधिकारी सोचता ही नहीं जो गलत है उसको होने नहीं देना है।  पुलिस और निरीक्षक लोग तो चाहते हैं लोग गलत करें ताकि उनकी कमाई चलती रहे।  ईमानदारी तो हर सरकारी दफ्तर की दीवार पर टंगी हुई है जब दिखानी हो अधिकारी ओढ़ लिया करते हैं। ईमानदार होना नहीं कहलाना है।

Wednesday, 16 August 2017

इश्क़ कोतवाली 2017 ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

   इश्क़ कोतवाली 2017 ( व्यंग्य  कथा ) डॉ लोक सेतिया 

                      कोतवाल साहब का बुलावा आया तो दिल धड़कने लगा न जाने क्या माजरा है। आजकल कुछ पता नहीं चलता कब किस पर क्या इल्ज़ाम लगवा कर थाने में बंद करा दिया जाये। अभी चलना पड़ेगा सिपाही से पूछा कोई वारंट जारी हुआ है , वो हंसने लगा। शायर जी आप भी कमाल करते हैं आपको बुलवाया है कोतवाल जी कोई कवि सम्मेलन करवाना चाहते हैं आप नाहक डर जाते हैं। कविता में तो शेर सा दहाड़ते हैं और थाने के नाम से कांपने लगते हैं वीर रस वाले कवि। कोई बात नहीं अभी थोड़ा सांस ले लो अपनी घबराहट को मिटा लो फिर चले आना साहब के निवास पर। सुनकर डर भाग गया और ख़ुशी का एहसास होने लगा। अब देरी करने का मतलब ही नहीं था। तभी चल दिए साथ हम भी। जाकर देखा तो बहुत हैरान हुए देखकर कोतवाल जी को , देवदास बने हुए थे। हमने पूछा साहब सब कुशल तो है , कहने लगे मत पूछो हमारे दिल पर क्या गुज़री है आज। आओ पहले दो घूंट ज़िंदगी के पी लो , हमने कहा भाई हम शराब नहीं पीते। बोले जानते हैं तभी आपको शुद्ध आयुर्वेदिक वाले दो घूंट साथ देने को दे रहे हैं। हमने कहा भाई उनकी बनाई स्वदेशी वस्तुओं को हम उपयोग नहीं करते मगर कारण नहीं पूछना बड़ी मुश्किल होगी। बाबा जी सरकारी हैं जो भी कहते हैं ठीक है। तब तक कोतवाल जी चार पैग लगा चुके थे और मूड़ में आ चुके थे। शायद उन्हें याद नहीं था हमको किस बात को बुलवाया है। कहने लगे भाई आप तो लेखक बंधु कोमल हृदय होते हैं सब की पीड़ा समझते हैं , मेरी दर्द भरी कहानी सुनोगे तो आंसू रोक नहीं पाओगे। तभी इक और सिपाही आकर बोला बुला आया हूं आपकी मुहब्बत को। साथ वाले कमरे में हैं जाकर मिल लो उससे।
              कोतवाल बोले कवि तुम भी साथ चलो आज देख लो हम कोतवाल भी इश्क़ करते हैं कोई पत्थर दिल नहीं हैं। ये पत्थर दिल तो वो हैं जो समझते ही नहीं हमारी मुहब्बत को हमारी मज़बूरियों को। देख लो ये इक कोठे वाली है और हमें शहर के कोतवाल को ही कोठे पर आने नहीं देती है। कितना बड़ा ज़ुल्म है इक बेचारे आशिक़ पर।  आज तुम ही बताओ कैसे इस रूठी महबूबा को मनाया जाये , कोई ग़ज़ल कोई कविता लिखनी आती नहीं हमें। इस की खातिर कवि सम्मेलन करवाना है और जैसे भी हो इसको मनाना है। अब उस अबला नारी से चुप नहीं रहा गया बोली कोतवाल जी बस करो और कितना झूठ बोलेगे सरकार की तरह। मैं तो आपकी गुलाम हूं देश की जनता जैसे नेताओं की गुलाम है। भला आपको नाराज़ कर कोई शहर में रह सकता है , हर कोठे से आपको रिश्वत भी मिलती है और आपकी हर चाहत भी पूरी होती है। फिर भी आपने इतना बड़ा झूठ बोला कि आपको कीमत लेकर भी बदले में नहीं मिलता कुछ हम सब से। अब इतना बड़ा इल्ज़ाम बेवफ़ाई का कोई कैसे सहे। कवि तुम ही सुन लो मेरी आपबीती और बताओ मैं क्या करूं जियूं या मरूं। सब लूट कर भी कोतवाल निर्दोष मासूम और खुद तबाह होकर भी हम गुनहगार मुजरिम। अदालत इनकी गवाह इनके फैसला करने वाले भी यही और इंसाफ की बात कौन करे।
                    अपनी कहानी सुनाने लगी जब तो कोतवाल की ज़ुबान बंद हो गई। कहने लगी मुझे इश्क़ के झांसे में फंसाया और सालों तक अपनी हवस मिटाते रहे। किसी और से शादी की और मुझे रखैल से कोठे वाली तक का सफर तय करवाते रहे। अपनी तरक्की की सीढ़ियां मुझे कुचल कर चढ़ते गए। कभी सोचा ही नहीं जो दो उपहार मुझे दिए इक बेटा इक बेटी के रुप में उनका क्या हाल है। खुद अपनी औलाद को जाने किस  की औलाद हैं बताते रहे। मुझ से दिल भर गया तो हर दिन किसी कोठेवाली के घर जाते रहे। जाने किस से इक जानलेवा रोग ले लिया और किस किस को रोगी बनाते रहे। अब जब सब को पता चला और सब कोठेवालियों के दरवाज़े बंद हुए तब मेरे दर पर दस्तक देने आते रहे। सब धन दौलत भी छीन लिया मुझ से किसी न किसी तरीके से। अब चाहते मुझे भी अपना रोग देकर और एहसान करना , मुझे भी आसान हो जाता इस तरह जीने से तो मरना। मगर क्या करूं उनका जिनका कोई दोष नहीं है , इस पिता को बच्चों का कोई होश नहीं है। निज़ाम है इन्हीं का तलवार भी इनकी है। कत्ल होने को इनकार भी नहीं है। पर इन आशिकों से कोई जाकर कैसे कहे आज खुद ही बिके हुए हो तुम सारे के सारे ही। जो खुद बिका वो होता खरीदार नहीं है।

Tuesday, 15 August 2017

गंदी बातें लगती हैं अच्छी ( बेबाक ) डॉ लोक सेतिया

     गंदी बातें लगती हैं अच्छी ( बेबाक ) डॉ लोक सेतिया 

         काजल की कोठड़ी में कितना भी स्याना जाए दाग़ लगता ही लगता है। नहीं ये सियासत की बात नहीं है। जिस का भूत हर किसी पर सवार है आज उसकी बात करनी है। डर भी लगता है आजकल लोग सवाल करने वाले को ही सवाल के कटघरे में लेकर उसकी हालत खराब कर देते हैं। मेरे ब्लॉग पर आज भी जो चार पोस्ट रोज़ सब से अधिक पढ़ी जाती हैं वो , रसीली - कहानी इक जिस्म फरोश की और इसी तरह की हैं। ये अलग बात है कि पढ़कर उनको जो सोचते हैं वो नहीं मिलता पढ़ने को। मगर जब वो कहानी मैंने लिखी थी वास्तविकता जानकर इक अपना जिस्म बेचने वाली महिला की उसकी दर्दनाक मौत के बाद भूख से तब इक मैगज़ीन के संपादक का खत मिला था मुझे लताड़ता हुआ। और फिर मैंने उसको कहीं और नहीं भेजा छपने को। लगा मैं घोर पापी अपराधी समाज को गलत रास्ता दिखला रहा हूं , मगर उसमें ऐसी कुछ नहीं था आप पढ़ सकते हैं। आज जो बात कहनी है वो फेसबुक सोशल मीडिया टीवी शो फ़िल्मी सितारों और कला संगीत सभी को लेकर है। विज्ञापनों के मॉडल से कॉमेडी करने वालों तक सभी की बात है। 
     पांच साल पहले करीब ब्लॉग पर लिखना शुरू किया और फिर फेसबुक पर शामिल हुआ। बार बार लिखा भी कि दोस्ती मेरा सब कुछ है और लिखना मेरा जुनून भी इबादत भी है। दो ही मकसद थे फेसबुक पर आने के। तीन साल पहले देखा लोग फेसबुक की पोस्ट ही नहीं ब्लॉग से दिए लिंक को भी खोलकर पढ़ते थे। बात भी अच्छी हुआ करती थी। मगर आजकल साफ पता चलता है कोई नहीं पढ़ता अच्छी बात को सब को गंदी बात करना पसंद है क्योंकि गंदी बात से आपको मनोरंजन मिलता है जब कि अच्छी सच्ची बात आपको झकझोरती है। आजकल हर कोई फेसबुक व्हाट्सएप्प जैसे माध्यम पर है , मगर हर अच्छी चीज़ भी सीमा से अधिक नुकसानदेह होती है। मैं आयुर्वेद का डॉक्टर होने से दो बातें समझता हूं इक समस्या या रोग के लक्षण नहीं उसकी जड़ को समझना और दूर करना लाज़मी है और दूसरा जो अच्छी वस्तु हैं वो भी नासमझी से खराबी करती हैं। शहद भी अच्छा है और शुद्ध देसी घी भी , मगर इन दोनों को समान मात्रा में मिलाकर खिलाओ तो ज़हर का काम करती हैं। इधर तमाम लोग दवा के नाम पर ज़हर ही देते हैं। आओ मुद्दे की बात पर चर्चा की जाये। 
                समाज में महिलाओं के साथ अनाचार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। लोग क्या करते हैं कैसे हैं दो दिन पहले की बात है इक महिला और उसका पति दोनों लिखते हैं फेसबुक बनाई इक साथ। दोनों की फेसबुक पर युगल की तस्वीर लगाई हुई थी। कुछ ही घंटों में महिला को दो सौ रिक्वेस्ट मिली और पुरुष को दो चार ही। और जिनको दोस्त बनती गई तमाम चैट  पर रोकने पर भी मैसेज करने लगे और शाम तक आंटी जी मैडम जी कहने वाले आशिकी की बातें करने लगे। बस यही देखकर और बनाये दोस्तों को हटाकर उन दोनों ने अपना अकाउंट बंद ही करवा दिया। हैरान थे क्या हमारा समाज इतना खराब हो गया है कि छिपी गंदी मानसिकता को बाहर आने में ज़रा भी देर नहीं लगती। टीवी शो को देखो तो लगता है संगीत का पावन माहौल भी एंकर किसी महिला से झूठी आशिकी की छेड़ छाड़ से दूषित कर रहा है। कॉमेडी शो में हर कोई दिल फेंक आशिक बना मंच पर दिखाई देता है। महमान कलाकार शो चलाने वाला और कोई जो अनावश्यक रूप से हिस्सा है वो भी अपनी गरिमा को भूल कर हर महिला को रिझाता हुआ वा दर्शक भी अवसर मिलते ही यही करने को बेताब। टीवी पर विज्ञापन देने वाले पैसे की चाह में किस सीमा तक समाज को प्रदूषित करते हैं। जब हर तरफ यही नशा है तब नतीजा क्या होगा। 
         कुछ लोग समझते हैं वो जो भी छुपकर करते हैं किसी को खबर नहीं होती।  भगवान की बात छोड़ो कौन डरता है भगवान से , उसे तो सोचते हैं मना लेंगे माफ़ी मांगकर अपराधों की या और तरीके पंडित मौलवी उपदेशक बताते हैं। मगर वास्तव में बच्चे देखते हैं बड़ों को क्या हो गया है जो सब काम छोड़ देते फेसबुक व्हाट्सऐप पर बात नहीं छूटती है। इक चमक दिखाई देती है बहन को बड़ी बहन के चेहरे पर और उसको पता चल जाता है ये खिला रंग रूप आशिकी का है। कोई महिला अपना दिल बहलाती है जब किसी से रात दिन बातें कर तब उस अकेली तलाक ले चुकी औरत की बेटी समझती है सब मगर कैसे समझाए अपनी नासमझ मां को कि जिसे अपना आशिक समझती उसका इरादा क्या है। मनोरंजन स्वस्थ होना चाहिए , फूहड़ बातों पर हंसिए नहीं झल्लाहट होनी चाहिए अगर आपकी मानसिकता सही है और उसे सही रखना भी है। बस इस पागलपन ने बहुत कीचड़ फैलाया हुआ है। इक दलदल है ये सब। दलदल से निकलना बहुत कठिन है , कोई आपको खींच कर बाहर नहीं निकालने वाला , वापस खींचने वाले तमाम लोग हैं। संभल जाओ इक अंधी सुरंग में जाते जा रहे जिस का अंत कहीं नहीं है , कोई रौशनी आगे आखिर तक नहीं है।


किस आज़ादी का जश्न ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया

     किस आज़ादी का जश्न ( खरी बात ) डॉ लोक सेतिया 

        शायद मैं औरों जैसा देशभक्त नहीं हूं। मुझे हर साल आज़ादी के दिन जश्न मनाने पतंग उड़ाकर ख़ुशी मनाने की चाह कभी नहीं होती। बल्कि कभी कभी लगता है इतना धन इस तरह ख़र्च करना कितना उचित है जब करोड़ों लोग गरीबी की रेखा से नीचे हैं आज भी। मगर आज शाम होने को है जब मैं लिखने बैठा हूं आज की बात बहुत भारी मन से। आज खबर सुनाई दी कि चंडीगढ़ में आज़ादी के जश्न में शामिल होकर जब इक लड़की घर को जा रही थी तब उस के साथ घिनौनी हरकत हुई। क्या देश आज़ादी के सत्तर साल बाद भी दो राज्यों की राजधानी और केंद्र शासित शहर में दिन दिहाड़े महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। और है तो क्यों। अभी कुछ दिन पहले इक नेता के बेटे ने जब चंडीगढ़ में इक लड़की का पीछा किया तो बहुत लोग बहुत बातें बोल रहे थे। शर्म की बात है कुछ लोग इस पर नेता का  पक्ष लेकर अपने अख़बार में लिख रहे थे कि उस की कुर्सी नहीं जानी चाहिए। फेसबुक पर बाकायदा उस नेता का साथ देने की बात भी पढ़ने को मिली। सवाल हमारी संवेदनहीनता का है जो महिला की आज़ादी और सुरक्षा से अधिक चिंता हमें किसी नेता की कुर्सी की होती है। सवाल ये नहीं कि दोषी बेटा है , सवाल ये है कि जब किसी दोषी का पिता सत्ताधारी दल के बड़े पद पर है तब क्या पीड़ित महिला को न्याय मिलेगा। कल फेसबुक पर किसी महिला से बात हुई जो कुछ महीनों से अमेरिका में गई हुई हैं।  शिक्षित महिला हैं कॉलेज में अध्यापन कराती रही हैं वो भी देश में महिलाओं की सुरक्षा और कानून व्यवस्था पर निराश थी जब मैंने यूं ही कह दिया ईस्ट ओर वेस्ट होम इज़ दा बेस्ट। मगर क्या सच सारे जहां से अच्छा गाने से देश वास्तव में अच्छा हो जायेगा। अच्छे दिन भी ऐसे होते हैं।  
        सवाल इतना सा नहीं है।  अभी कल ही उच्च न्यायलय ने हरियाणा सरकार को लताड़ लगाई थी क्योंकि सरकार दंगा करने वालों के खिलाफ केस वापस लेना चाहती है। यही सरकार हर दिन विज्ञापन देती है ईमानदारी के इतने दिन। कैसी ईमानदारी है अपराधियों के पक्ष खड़े होने की। तीन साल में इस सरकार में हर विभाग में अनुचित अवैध और गैर कानूनी काम खुले आम होते रहे हैं और सत्ताधारी बचाव करते रहे हैं अवैध कब्ज़ों और नियम कानून तोड़ने वालों का। जब  नेता सरकार और अधिकारी ही नहीं मीडिया वाले भी सही और गलत को नहीं अपने अपने स्वार्थ के नज़रिये से देखेंगे तब झूठ की जय जयकार और सच की हार ही होगी। सच कहते हैं कभी पराजित नहीं होता , मगर आजकल तो हर तरफ झूठ विजयी होता दिखाई देता है। क्या इसी बात  का जश्न मनाया जाये कि झूठ विजयी हो गया है। 
            

Monday, 14 August 2017

ख़ामोशी की आवाज़ ( विवेचना ) डॉ लोक सेतिया

      ख़ामोशी की आवाज़ ( विवेचना ) डॉ लोक सेतिया 

मैं सत्तर साल का हो गया हूं। हर साल गिनती करता रहा हूं। गिनती करने से हासिल क्या होगा। देश में आंकड़ों की संख्या लाखों करोड़ों से अरबों खरबोंतक जा पहुंची है। सत्तर साल बाद गरीबी की रेखा से नीचे की जनता की संख्या तीस से चालीस करोड़ है। मतलब एक तिहाई लोग भूखे हैं बेघर हैं बदहाल हैं और हम जश्न मनाते हैं आज़ादी का जिस पर हज़ारों करोड़ खर्च करते हैं उत्सव मनाने को। ये उत्सव कौन मनाते हैं , बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग जो अपना सब को बराबरी का अधिकार देने वादा और संकल्प भूल सत्तासुख भोगते हुए कहते हैं देशसेवक हैं। हर तरफ आज भी अन्याय लूट और कर्तव्य नहीं निभाने की सरकारी लोगों की आदत है जिस से जनता का जीना दुश्वार है। लोग हॉस्पिटल में उचित इलाज नहीं मिलने से मर रहे हैं , किसान क़र्ज़ से तंग आकर ख़ुदकुशी कर रहे हैं , बच्चे स्कूल नहीं शौचालय में पढ़ रहे हैं। और सत्ता के चाटुकार नेताओं की जय जयकार वाले नए नए नारे गढ़ रहे हैं। समाज में महिलाओं को सुरक्षा नहीं मिलती और आप महिला अधिकारों की कहानी पढ़ रहे हैं। गंदगी के ढेर लगे हैं हर शहर हर गली में सरकार के स्वच्छ भारत वाले विज्ञापन सच से मुकर रहे हैं। कुछ बिक गए कुछ बिकने को तैयार हो रहे हैं सच बोलने के नाम पर कत्ल सच को कर रहे हैं। सब को आज़ादी है मनमानी करने की जो ईमानदार लोग हैं सूली पर चढ़ रहे हैं। सुविधा सम्पन्न लोग छुट्टी मना रहे हैं , मस्ती में झूम कर कुछ गीत गा रहे हैं , छत पर पतंगों से कांटे लगा रहे हैं। कितने लोग कूड़ा चुनने को जा रहे हैं बस इसी तरह जिए जा रहे हैं। समाजवाद की खिल्ली उड़ा रहे हैं लोकतंत्र का उपहास कर मनोनयन से पद पर बिठा रहे हैं। लाशों पर जिनकी फूल चढ़ा रहे हैं वो रोज़ सत्ता की शतरंज बनकर मात खा रहे हैं। देश की वास्तविकता से नज़रे चुरा रहे हैं , घर नहीं मंदिर मस्जिद बना रहे हैं। पीने का साफ पानी अभी तक नहीं है मिलता मगर हमारे शासक बुलेट ट्रैन ला रहे हैं। गरीबी पर बहस हर रोज़ हैं करते और भूखों के नाम पर दावत उड़ा रहे हैं। सब के सब सत्ता के भूखे सब स्वार्थ के अंधे है जिनको रहनुमा लोग बता रहे हैं। मेरे आंसू थमते नहीं हैं और आप को कभी भी नज़र नहीं आ रहे हैं। आप ऊंची बनाकर अपनी ऊंचाई होकर ऊपर खड़े भाषण सुना रहे हैं और लोग आपको बहुत छोटे नज़र आ रहे हैं।  ताली बजवा कर आप मुस्कुरा रहे हैं। आये थे किधर से किधर को जा रहे हैं।

मिल गया मिल गया मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     मिल गया मिल गया मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

            मिल गया है सरकार को देश से भूख और गरीबी मिटाने का तरीका मिल गया है। शायद अभी ऐलान नहीं किया जा रहा क्योंकि मिला इक विदेशी कंपनी से है और सरकार को किसी देश की कंपनी से अनुबंध करवाना है बिचौलिया बनकर। समस्या ये है कि झामदेव जी चाहते हैं उनको साथ लिया जाये मगर ये बिना किसी को पता चले कि सवदेशी की बात कहने वाला विदेशी का साथ चाहता है। वास्तव में उसको किसी विदेशी कंपनी से कोई परेशानी नहीं है उसके लिए अपनी कंपनी को छोड़ बाकी सब नकली सामन महंगे दाम बेचने वाली लुटेरी कंपनी हैं। तीन साल से जिस की तलाश थी वो उपाय मिल गया है। सरकार को खेती किसानी और गेंहूं चावल की फसल उगाने वालों से अधिक विश्वास आधुनिक विज्ञान पर है। मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया जो नहीं कर पाया वो इक विदेशी दौरे पर मिल गया है। 
          इक नया सॉफ्टवेयर बन गया है जो बिना अनाज के अपने आप रोटी बनाया करेगा। जनता को अपने स्मार्ट फोन पर सरकारी ऐप डाउनलोड करना होगा और जब भूख लगे उस से रोटी लेकर पेट भरना आसान होगा। अभी सरकार को बहुत बातों पर विचार करना है , सब से महत्वपूर्ण बात दल के अध्यक्ष की राय है कि इस योजना को अभी नहीं 2019 के चुनाव से पहले घोषित किया जाये ताकि अगला चुनाव जीता जा सके। लोगों की भूख मिटे न मिटे सत्ता की भूख मिटनी ज़रूरी है। अभी सॉफ्टवेयर की रोटी पर शोध किया जाना चाहिए कि उसका उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो नहीं। हालांकि नेताओं अधिकारीयों और धनवानों को ऐसा रिस्क लेने की ज़रूरत नहीं है। तब भी उनको झामदेव जी का शुद्ध आता उपलब्ध करवाया जाता रहेगा। जनता भूख लगे तब घास फूस तक कुछ भी खा लिया करती है उसे सॉफ्टवेयर की सुंदर रोटी खाने में क्या संकोच होगा। लेकिन जब लोग सॉफ्टवेयर रोटी के आदि हो गए तब किसानों की उपज का क्या होगा। किसान को अगर खेती नहीं करनी पड़ी और बैठे बैठे रोटी मिलने लगी तब किसान मज़दूर क्यों कोई काम करेंगे। और बिना काम किये खाने की आदत नेताओं और अफ्सरों की तरह उन्हें भी निकम्मा बना देगी। राजनीति में पहले ही बहुत भीड़ है उसे इतना अधिक बढ़ाना बेहद खतरनाक होगा। 
           विदेशी कंपनी का क्या भरोसा कब तकनीक देने से इनकार  ही कर दे या फिर बदले में सरकार पर ही कब्ज़ा जमा ले। अभी ये भी शक है कहीं इस के पीछे विदेशी आंतकवाद या आई एस आई जैसे लोग तो नहीं। भारत दो सौ साल इसी तरह गुलाम रहा है। और मौजूदा सरकारी दल फिर से आज़ादी की लड़ाई में शामिल नहीं होने और विरोध करने की भूल नहीं दोहराना चाहता। जब खुद किसी विदेशी कंपनी को बुलाया तब उसका साथ देना ही होगा। अभी चिंतन जारी है और हिसाब लगाया जा रहा है कि फायदे का सौदा है या घाटे का। 15 अगस्त के भाषण से पता चलेगा कि खबर है या अफवाह है। अफवाह भी हो तो बुरी नहीं। 

                          हमने दुनिया के सवालात का हल ढूंढ लिया

                          क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाये।

Sunday, 13 August 2017

ग़ज़ल , कहानी , इतिहास , इबादत का सफर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

ग़ज़ल कहानी इतिहास इबादत का सफर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         कहनी तो सभी की बात है , मगर शुरुआत अपने घर से करना ही उचित होगा। ग़ज़ल दुष्यंत कुमार से राहत इंदौरी तक आ पहुंची है। मुलाहिज़ा फरमाएं। 

                     मत कहो आकाश में कुहरा घना है ,

                    यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। 

दुष्यंत जी ने समझाया था लोग समझ भी गए और चुप हैं सब सामने देख कर भी बापू के बंदर बनकर। 

लेकिन राहत जी बहुत अंदाज़ से अपनी ग़ज़ल को सुनाते हैं , हर शेर सुनाने से पहले पिछला दोहराते हैं। 

                   अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है ,

                  ये सब धुंआ है कोई आसमान थोड़ी है। 

अब लोग समझ नहीं पा रहे कि करें तो क्या करें।  दम घुट रहा और ऑक्सीजन नहीं है तो शायरी से सांस ली जाये। राहत जी का ही पुराण शेर है , मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में अब कहां जा के सांस ली जाये। दुष्यंत जी ने तो समझा भी दिया था। यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए। 
                 बात  को आगे बढ़ाते हैं। 1942 ऐ लव स्टोरी से टॉयलेट इक प्रेम कथा तक सिनेमा का सफर है। विकास शायद यही है। इधर विकास बहुत बदनाम हो गया फ़िल्मी ढंग से लड़की को सताते हुए थाने तक का सफर तय कर लिया। विकास किस का है अब मामला समझ नहीं आता , भाजपा का होकर भी कैसे नहीं है। इतिहास पर लोग लड़ रहे हैं कि इतिहास में कौन नायक था कौन खलनायक। फिर से लिखवाया जा रहा है इतिहास , इक बच्चे ने सबक सीखा था गाय पर लेख लिखना है या भैंस पर कोई अंतर नहीं है। दोनों दूध देती हैं और दूध का रंग सफेद होता है। आगे गाय भैंस का नाम बदलना है और दूध की बात लिखनी है। इम्तिहान में लेख लिखना था पिता पर और बच्चा याद कर लाया था दोस्ती पर लिखने को। बस दोस्त शब्द की जगह पिता लिखता गया और लिख डाला। 
               सब गलत होता आया है हमने आकर सब कुछ बदलना है , कहते रहे  मगर आकर बस सब को सही बताने लगे और बुरा है शब्द जिस जिस पर लिखा था ज़रूरी है लिख दिया। जो लोग गंदे थे उनको अपने रंग के कपड़े पहनाये और साफ होने का तमगा लगा दिया। दिल्ली शहर की बात कभी बज़ुर्ग किया करते थे तो कहते थे दिल्ली शहर नमूना अंदर मिट्टी बाहर चूना। भीतर सब खोखला है और बाहर से चमकता लगता है। तीन साल तक यही किया गया है रंग बदलने का काम। खुद भी गिरगिट से बढ़कर रंग बदले हैं। कभी कोई भी इतिहास की किताब पढ़ना आपको उसकी जिल्द बहुत सुनहरी दिखाई देगी मगर भीतर पढ़ोगे तो समझोगे किताब में मुट्ठी भर लोगों की महिमा का वर्णन है। मुश्किल से दो पांच प्रतिशत लोग , नेता अभिनेता , कारोबारी , धर्म और समाज के अगड़े लोग या धनवान लोग सफल लोग। नब्बे प्रतिशत देश की जनता की किताब में कोई बात तक नहीं है। किसका इतिहास है। 
                  आज इक बहुत शिक्षित व्यक्ति से बात हुई सैर पर। यूं ही पूछा क्या हाल है देश का क्या कुछ ठीक हुआ , जवाब दिया उन्होंने हमारे जीते जी तो कुछ नहीं बदलने वाला। ऐसे सोचने वालों का बहुमत है। मेरे मन में विचार आया जाकर पूछूं ऐसे लोगों से क्या आप ज़िंदा हैं , जी ठीक याद आया लोहिया जी ने कहा था ज़िंदा कौमें पांच सात तक इंतज़ार नहीं किया करतीं हैं। और हम ने क्या किया है सत्तर साल तक। आज या कल भगवान कृष्ण जी की जन्माष्टमी है। बहुत बुरा किया था इक वादा कर के जब जब धरती पर पाप बढ़ता है मैं आकर जन्म लेता हूं धर्म की स्थापना करता हूं। हम बस उस मंत्र को पढ़ते रहे और कभी धर्म और अधर्म की लड़ाई में शामिल ही नहीं हुए , जबकि कृष्ण जी महाभारत में दोनों तरफ थे। पांडवों की सेना में खुद और कौरवों की सेना में अपने सैनिक दिए हुए थे। राजनेता उस राह चलते हैं सदन में टीवी पर लड़ाई और वास्तव में चोर चोर मौसेरे भाई। बताओ किस ने घोटालों की सज़ा है पाई।  काला धन भी रंग बदलवा कर साफ सफेद चमकदार बना दिया। जनता का काला धन खराब और राजनेताओं का काला धन अच्छा ही नहीं ज़रूरी।  वाह री सत्ता की मज़बूरी , कुर्सी की चाहत नहीं होती कभी पूरी। 
             अब औरों को दोष देना छोड़ खुद जनता की बात की जाये। हम खुद बड़ी बड़ी हौसलों की बातें करते हैं। कभी चौराहे पर मिलकर किया करते थे आजकल फेसबुक व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया पर देशभक्त बनते हैं। मगर जो देश को कानून को संविधान को ताक पर रखते हैं हम उन्हीं की स्तुति भी गाते हैं। बुराई को अच्छाई बताते हैं बुराई को बुरा कहने से घबराते हैं। सच की जय का नारा लगाने वाले सच से नज़रें चुराते हैं। ये मेरा काम नहीं है विरोध करना सोचकर दिल को बहलाते हैं। हज़ारों साल से यही करते आते हैं। जब भी कठिनाई आती है हम आरती गाते हैं भगवान को बचाने को बुलाते हैं। हर बार ठोकर खाते हैं और जिसे देवता समझ पूजा उसी को राक्षस बताते हैं। हमारे भगवान देवी देवता बार बार बदल जाते हैं , कभी मंदिर कभी मस्जिद कभी गिरिजाघर कभी गुरूद्वारे चले जाते हैं। कितने गुरुओं की शरण में चले जाते हैं , तस्वीर लेकर आकर दीवार पर सजाते हैं मगर जो सबक पढ़कर आये नहीं समझ पाते हैं। खुद कुछ भी नहीं करना चाहते कोई और करेगा आस लगाते हैं। मुझे इक शेर अपना कहना है सभी को फिर आखिर में दुष्यंत का। 

              जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ,

              दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत। 

हम बदलने की कोशिश ही नहीं करते अन्यथा सब बदल सकता है। दुष्यंत कहते हैं। 

               कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता ,

               एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।  


दोस्ती और फेसबुक फ्रेंडशिप ( दिल के एहसास ) डॉ लोक सेतिया

  दोस्ती और फेसबुक फ्रेंडशिप ( दिल के एहसास ) डॉ लोक सेतिया

          शायद खुद मुझे भी नहीं मालूम था पिछले रविवार अपनी दोस्ती की बातें लिखने के बाद इस रविवार इक और पक्ष फेसबुक फ्रेंडशिप को लेकर लिखूंगा। पिछले सप्ताह जिस शिद्द्त से मैंने दोस्तों से बात की और उनके फोटो भी मंगवाए उस से कई दोस्त भी थोड़ा अचंभित थे। कुछ दोस्तों से सम्पर्क नहीं किया जा सका मुझे इस बात की कमी खली भी। इक बहुत अच्छी बात हुई , इक दोस्त जो दुनिया में ही नहीं है 15 साल से उनकी फोटो जब उनके घर से लेने को गया तब उनकी बेटी मिली थी घर में क्योंकि दोस्त की पत्नी और उनकी बेटी की मां अपने मायके गई हुई थी राखी बांधने भाई को। वापस आकर जब उन्हें बेटी ने बताया तो उनका फोन आया बहुत भावुक होकर कहा आप उनसे कितना प्यार करते हैं जो इतने साल बाद भी इस कदर उनको याद करते हैं। मैंने उन्हें बताया मेरी कई कविता कई कहानी और ग़ज़ल उन्हीं की दोस्ती पर ही हैं। अगर मुन्नवर राणा जी की ग़ज़लें मां पर हो सकती हैं तो मेरी रचनाओं में दोस्ती क्यों नहीं हो सकती जब मेरा मज़हब मेरा जुनून मेरी तलाश हमेशा से एक ही रही है दोस्त की तलाश। 
     आज अपनी फेसबुक खोली और कई घंटे तक बारी बारी सभी दोस्तों की वाल पर देखा। फेसबुक पर इक ऑप्शन है योर फ्रेंडशिप। हर एक से देखा उस ऑप्शन पर , चार हज़ार पांच सौ दोस्त बन गए कुछ ही महीने में व्यंग्य साहित्य नाम से बनाई फेसबुक पर। मगर अधिकतर से पता चला कभी कोई बात ही नहीं हुई। मेरी आदत है मैं दोस्ती की बात पर किसी को दोष नहीं देता बल्कि सोचता हूं शायद उन को मुझ से वो नहीं मिला जो वो मेरे करीब नहीं हो सके। जो मुझे समझ आया वो ये कि लोगों ने फेसबुक पर इक अजीब चूहा दौड़ लगानी शुरू की हुई है संख्या बढ़ाने को। शायद पांच हज़ार की सीमा फेसबुक ने तय की हुई है। मैं शायद इस मामले में दुनिया से अलग हूं कि मैंने बहुत फेसबुक बनाई साहित्य समाज की बात ग़ज़ल की बात महिलाओं की बात से लेकर लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी और सत्येंद्र दुबे जी की याद को ज़िंदा रखने को। मगर दोस्ती की चाह रखने के बावजूद मैंने अपनी हर फेसबुक पर उन लोगों को सूचि से हटा दिया जो कुछ भी अनुचित या बेअदबी की बात करने लगे या जिनको मुझे लगा कि बस कहने को ही बनाते हैं दोस्त। और आज मैंने आधे दोस्तों को अलविदा कह दिया है। 
                    शायद आपको लगे ये कैसा पत्थर दिल है जो बिना कारण ही इतने दोस्तों को एक दिन में हटा रहा है। मगर एक एक को अनफ्रेंड करते मुझ पर क्या बीती नहीं शब्द बताने को। और जिनको हटाया उन्हें क्या फर्क पड़ेगा कुछ भी नहीं। इस तरह समझना उन सब की पॉकेट में दो तीन चार पांच हज़ार सिक्के थे , और इक सिक्का कहीं खो गया उन्हें पता ही नहीं चला होगा , मगर मेरी जेब में से आधे सिक्के ही लगा खोटे हैं और रखना फज़ूल है। मेरा तो खज़ाना ही आधा ही नहीं हुआ अभी बहुत और भी इसी अंजाम को पहुंचेंगे दो दिन में। आपको मेरी बात समझ नहीं आएगी क्योंकि मुझे किसी के भी नाम के साथ इक तमगा बनकर नहीं रहना पसंद। और मेरे इतने दोस्त हैं फेसबुक पर का मेरे लिए कोई महत्व नहीं रहा कभी भी। कल ही इक पोस्ट लिखी थी फेसबुक पर महिलाओं से दोस्ती और उनसे चैट करने को लेकर , शायद उसी के बाद ध्यान आया कि वास्तव में दोस्ती क्या है। फेसबुक का उद्देश्य तक बदल गया है। अब व्हाट्सएप्प और मेस्सेंजर पर व्यर्थ की वार्ता और मनोरंजन  लगता है जैसे लोगों का ध्येय ही समय बिताना हो गया है। जो बहुत कीमती नाता होता था अब इतना सस्ता हो गया है कि किसी को न दोस्ती करने की ख़ुशी महसूस होती है न खोने का कोई दर्द। मगर तब भी मेरी तलाश जारी रहेगी दोस्त को लेकर। मुझे दोस्त ही नहीं उनसे मिला दर्द भी अच्छा लगता है। मुझे ग़म भी उनका अज़ीज़ है कि उन्हीं की दी हुई चीज़ है।

Saturday, 12 August 2017

पुरुष पीछे महिला आगे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      पुरुष पीछे महिला आगे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    आप शीर्षक से गलत अंदाज़ा नहीं लगाना , इस बात का किसी लड़के के किसी लड़की का आधी रात को पीछा करने से कोई सरोकार नहीं है। हैं इस में मनसिकता उसी तरह की ही है। आज भी वही हुआ फेसबुक पर भी जो सालों पहले अख़बार और पत्रिका वालों ने किया था। आपको लिखने वालों की लिखी कहानियां मिली होंगी पढ़ने को मगर उनकी खुद की असली जीवन की कहानी कभी नहीं मिली होगी पढ़ने को। जो भी खुद अपनी जीवनी लिखते हैं मीठा मीठा खुद और कड़वा बाकी को परोस देते हैं। दावा जो भी करते हों सच कहने का अपना सच बोलते होंट सी लेते हैं , नहीं बतानी जो बात उसको इस तरह कहते हैं कि सुनकर कोई समझ ही नहीं पाए मतलब क्या है। और इसी को गहराई की बात बताया जाता है। तो हुआ ऐसा कि इक लेखक को इक शरारत सूझी , उसको लगा कि अख़बार वाले उनकी अच्छी भली रचनाओं को खेद सहित वापस लौटा देते हैं जबकि कई महिला लिखने वाली लेखिकाओं की साधारण रचना भी छाप देते हैं। रचना छपने पर मानदेय भी खुद को ही मिले ये भी देखना ही था इसलिए अपनी वापस लौटाई रचनाओं को अपनी पत्नी के नाम से उन्हीं अख़बार पत्रिका को दोबारा भेजा। साथ में उसका फोटो भी बेहद सुंदर सा भेज दिया। हैरान हुए कई जगह वो रचनाएं बेहद जल्दी ही प्रमुखता से छपी भी। अब पत्नी को भी बताया कि तुम्हारे नाम पर मनी आर्डर या चेक आये हैं मगर रचना मेरी लिखी हैं। पति की हर चीज़ पर पत्नी का अधिकार होता ही है तो रचना और मानदेय पर भी होना ही चाहिए। धीरे धीरे पति की वापस लौटाई रचनाओं के पत्नी के नाम छपने की संख्या खुद उसके नाम से छपी रचनाओं से अधिक होने लगी। साहित्य अकादमी भी उनकी रचनाओं को महिला विशेषांक में आदर सहित छाप रही थी। पत्नी को लिखने का कुछ भी पता नहीं था फिर भी अपने नाम से छपी रचनाओं को देख फूली नहीं समाती और नगर में महिला लेखिकाओं की अध्यक्ष बन गई थी। ये बात राज़ ही रहती अगर इक दिन इक बहस  नहीं छिड़ी होती। इक नियमित कॉलम लिखने वाली ने बताया कि एक बार उसने अपने हस्बैंड को अपनी जगह कॉलम लिख भेजने को कहा तब उनको समझ आया लिखना कोई खाला जी का घर नहीं है। 
                          और झगड़ा इतना बढ़ा कि बात घर से बाहर जा निकली। लेखक ने अख़बार को इक नई व्यंग्य रचना भेजी जिस के अंत में साफ लिख दिया कि बहुत समय से मेरी रचनायें बीवी के नाम से छप रही हैं। संपादक जी ने अपनी गलती नहीं समझी बल्कि उस लेखक को दोषी ठहराया अपनी पुरानी रचनाओं को दोबारा भेजने और पत्नी के नाम से हस्ताक्षर कर मौलिक और अप्रकाशित बताने का। उनसे मिला मानदेय वापस करने और क्षमा मांगने को भी कहा गया अन्यथा जिस जिस जगह छपते उनको ये सुचना देने की बात भी की गई। आखिर में लेखक को स्वीकार करना पड़ा कि रचनाओं की वास्तविक लेखिका पत्नी ही हैं। इस तरह महिला होने से बहुत महत्व मिलता है सब जगह ही। राजनीति में तो सुंदर महिला होना अतिरिक्त गुण समझा जाता है। 
                          इधर फेसबुक की धूम है और हर लिखने वाले की फेसबुक और पेज है। महिला और अगर सुंदर लगती फोटो की प्रोफाइल भी है तो लाइक्स और कमैंट्स का अंबार लगा रहता है। मुझे शुरू शुरू में इक बात बड़ी अखरती थी जब मेरे ब्लॉग की शेयर की रचनाओं को एक मिंट में कोई दस बीस लाइक देता था। शायद बहुत लोग नहीं जानते कि ब्लॉग पर तो पता चलता ही है कितने लोगों ने पढ़ा पोस्ट को , फेसबुक भी दिखलाता है किस किस ने पढ़ा है और किस किस ने लाइक किया हुआ बिना पढ़े ही। आज की ही बात है इक जोड़ा लेखक लेखिका का देखना चाहता था फेसबुक पर कैसे लोग हैं और उन्होंने दो फेसबुक दोनों के नाम से शुरू की आज ही जिस पर दोनों की एक साथ की ही फोटो भी थी। बीस तीस पहचान वालों को दोस्त बना लिया दोनों ने ही और सुबह दोनों की सूचि समान थी। बिना कुछ भी पोस्ट लिखे ही दो तीन घंटे में जहां पति को एक भी रिक्वेस्ट नहीं मिली वहीं पत्नी के नाम वाली पर सौ लोगों की रिक्वेस्ट मिली। अभी अंजाम बाकी था , महिला ने साफ मना किया हुआ था चैट नहीं करने को , तब भी तमाम लोग तरह तरह से मैसेज भेजने लगे और मैसेज ब्लॉक करने पर कमैंट्स में कारण पूछने लगे। शाम तक दोनों ने फेसबुक से तौबा ही कर ली और डीएक्टिवेट ही कर दी फेसबुक। लेकिन कुछ ही देर में बहुत लोगों की असली सूरत दिखाई दे गई थी।

Thursday, 10 August 2017

भौंकने वाले और तलवे चाटने वाले ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     भौंकने वाले और तलवे चाटने वाले ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    आपको दस हज़ार में स्मार्ट फोन मिल सकता है बाज़ार में , और आप फेसबुक या व्हाट्सएप्प सोशल मीडिया पर मनचाही बात लिख सकते हैं , मगर लिखने की तहज़ीब आपको नहीं मिलती बाज़ार से। फेसबुक पर देखकर अफ़सोस होता है कि किसी की बात से सहमत नहीं हैं तो उसके लिए ही नहीं उसके जाति धर्म के लिए भी गालियां तक लिखते हैं। कल हामिद अंसारी जी ने जो कहा उनका अधिकार है वो कहना मगर आप खुद को समझते हैं बोलने का अधिकार है और उनकी बात पर उनको गाली देकर कहीं उनकी ही बात का समर्थन तो नहीं कर रहे। अधिकतर लोग पूरी बात सुनते ही नहीं हैं , उन्होंने बहुत सभ्य तरीके से आगाह किया है तो उसको किसी वरिष्ठ की सलाह समझना चाहिए न कि बिना समझे कुछ भी बोलना चाहिए। आप को अगर देश की इतनी ही चिंता है तब आप उस समय कहां होते हैं जब सत्ता का दुरूपयोग कर नेता संविधान की धज्जियां उड़ाकर अपना शासन किसी भी तरीके से कायम करते हैं। आप ही लोग दो दिन पहले किसी नेता के पक्ष में समर्थन की बात लिख रहे थे कि उसके बेटे ने किसी लड़की के साथ आपराधिक काम किया तो उस नेता को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए , सज़ा भी कैसी , कि कहीं उसे पद से हटा नहीं दिया जाये। भीड़ बनकर आप लूट मार सब करते हैं , जब मर्ज़ी कानून को ठेंगा दिखा आगजनी हत्या तक करते हैं। अपने दल के नेताओं के अपराधी साबित होने पर भी उन्हीं की जयजयकार करते हैं। मतलब को तलवे चाटते हैं और भड़काने पर भौंकने लगते हैं पालतू बनकर। बहुत बड़े समाज के चिंतक हैं तो घर बैठे फालतू की बहस को छोड़ बाहर निकल वास्तविक सार्थक काम करें , जिन के साथ अन्याय होता उनके साथ जाएँ , जो जो सरकारी दावे हैं मगर वास्तविकता नहीं हैं उसको देख कर सब को दिखलायें। सच की डगर पर चलते नहीं डगमगायें अपने पराये का भेद भूलकर झूठ को झूठ कहने का साहस जुटाएं। असली शेर हैं तो जाकर सत्ता से टकराएं कागज़ी हैं तो चुप चाप छुप कर गलियों की भाषा में रोयें और गायें। जाकर कहीं से आईना ले आयें और खुद को देख कर जो हैं समझ जाएं। अधिक नहीं कहना चाहता मगर इतना अवश्य कहना है उनकी पूरी बात पूरा भाषण सुनोगे तो समझोगे आपने क्या किया है। सूरज पर थूकने वालों की थूक उन्हीं के मुहं पर गिरती है। सभ्य भाषा नहीं आती तो खामोश रहना उचित है। गांधी जी की कही बात है आदमी बोलना कुछ साल में सीख जाता है मगर कैसे बोलना है इसे सीखने में ज़िंदगी लग जाती है। नफरत फैलाना आसान है , नफरत का अंत करना कठिन है। जो लोग फेसबुक व्हाट्सएप्प आदि पर इक साथ नफरत की बातें भी करते हैं और धर्म की बड़ी बड़ी बातें भी पोस्ट पर या फोटो के माध्यम से करते हैं उनको केवल औरों को घायल करने पर ख़ुशी महसूस होने की बीमारी है , सैडिस्टिक पलेयर।

दिल की फरियाद सुनो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     दिल की फरियाद सुनो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

             दिल क्या करे कोई जगह ही नहीं दिल की फरियाद जहां सुनी जाये। कोई तो थाना होता जिस में जाकर दिल अपनी ऍफ़ आई आर लिखवा सकता। दिल को क्या समझ लिया है सभी ने , कोई खिलौना है जैसे चाहा खेल लिया। दिल से पूछा मन की बात करने वाले से मिलते जाकर , क्यों नहीं सोचा। दिल से आवाज़ आई भला मन की बात करने वाला क्या जाने दिल का दर्द। मन की बात सोच समझ कर बोलते हैं दिल की बात कब बताता कोई किसी को। दिल में लालच भरा है और भगवा चोला डाल बाबा जी खुद अपनी दुकान चला रहे हैं , स्वदेशी और शुद्ध का मतलब उनका माल होना है। आपको कहते हैं राष्ट्रवाद के नाम पर उनका सामान खरीदो। लोग समझने लगे हैं कि मौत केवल दिल के रोग से होती है और दिल के रोग से बचने को क्या क्या नहीं करते। इक योग सिखलाने वाले बीस साल से खुद दिल का दौरा पड़ने से दुनिया से विदा हो गए , किसी ने नहीं सोचा उनकी योगविद्या का क्या हुआ। इलज़ाम किसी और पर लग गया कि उसके कारण समय पर उपचार नहीं किया जा सका। दिल से पूछते दिल पर क्या क्या नहीं गुज़रती। आज दिल ने दिल से आकर दिल का हल बताया धड़कते धड़कते। सुनो आप भी। 
                दिल लगाने की ज़रूरत क्या है , किसी से इश्क़ लड़ाने की ज़रूरत क्या है। कोई कभी किसी का हुआ न कभी होगा किसी का , जान कर भी किसी को अपना बनाने की ज़रूरत क्या है। और अगर आपको इश्क़ मुहब्बत करना ही तो करते इक नाज़ुक से दिल को बीच में लाने की ज़रूरत क्या है। हर बात पर होती है तकरार हर दिन प्यार में फिर भी रूठने और मान जाने की ज़रूरत क्या है। दिल बहुत नाज़ुक है सीने में छुपकर रखते हर किसी को अपना दिल दिखाने की ज़रूरत क्या है। दिल की आवाज़ है दिल दिल से टकराता नहीं किसी के , किसी और के दिल से अपने दिल को मिलाने की ज़रूरत क्या है। तुम्हारी नज़रें देख कर किसी को नहीं कुछ भी कहतीं आंखों की बात जुबान पर लाने की ज़रूरत क्या है। सोचते रहते हो  किसी को किस तरह अपनी मुहब्बत का यकीन दिलवा सकते हो , दिमाग़ का फितूर है ये , दिल को दोषी ठहराने की ज़रूरत क्या है। जाने किस पर फ़िदा हो जाते हो , कितने झूठे हो दिल सच्चा है बार बार दोहराने की ज़रूरत क्या है। 
              दिल को बेचैन बेकार में करते हो तुम , दिल का दर्द बढ़ाने की ज़रूरत क्या है। दिल बहुत छोटा है मासूम है बच्चा है जी दुनिया भर को इसमें समाने की ज़रूरत क्या है। दिल को बस्ती नहीं ठिकाना नहीं घर नहीं है , आते जाते को दावत दिल में आने को देना , आफत खुद ही लिवाने की ज़रूरत क्या है। दिल ये कहता है मैं न बिकता हूं न कोई खरीदार हूं मैं , आपको बाजार बनाने की ज़रूरत क्या है। दिल से पूछा परेशान किस बात से हो बताओ , मेरा दिल भी दिल ही है मुझको बताओ। दिल ने दिल की बात कुछ इस तरह की है। 

                   दिल तो सागर है कोई साहिल नहीं है 

                   हर किसी के पास होता दिल नहीं है। 



मनचलों की परंपरा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       मनचलों की परंपरा (  हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

ये क्या हुआ कैसे हुआ कब हुआ , जो हुआ जब हुआ तब हुआ को छोड़ो। सब कहते हैं बुरा हुआ बहुत बुरा हुआ , मगर बात फिर आकर पहुंची है वहां पर , ज़माने पुराने मनचले होते थे कभी जहां पर। इक मनचले ने सत्ता के नशे में किया गुनाह , इक महिला को समझा खिलौना खेलने का , मगर इक नारी नहीं घबराई नहीं साहस हारी , उस मनचले की गई थी नशे में मत मारी। जब नहीं बस चला दुशासन और धृतराष्ट्र का ,
कहने लगे बेटी है मेरी बहन है मेरी वो तो। इस नई सच्ची कहानी की धूम है , नहीं सुरक्षित महिला शहर की भी , सरकार भी है बहरी और अंधा कानून है। मौके पर ही पकड़ा गया मनचला मगर अपराधी निकला सत्ता का सपूत। अब किसे दिखाई देते गुनाह के सबूत। पिता नेता जा पहुंचे थाने लेकर सौ समर्थकों को छुड़वाने। बदल गई निगाह छोटा हो गया गंभीर गुनाह। मगर जब होने लगे हर तरफ से सवाल। क्या इसी को कहते हैं ईमानदार सरकार का 1000 दिन का विज्ञापन , यही है आपके अच्छे दिनों का कमाल। हुई मुश्किल तो फिर से पकड़ना पड़ा मनचले को , बयान देना पड़ गया इक पिता को। कहने लगे जिसको किया गया इतना परेशान , महिला तो वो है मेरी बेटी के समान। मनचले ने इक पुरानी रस्म निभाई , बनाया उसको बहन खुद बन गया भाई। देखना जिस दिन होगी उस बहन की विदाई , बहुत आंसू बहाएगा मुंह बोला भाई। जिसको बुरी निगाह से देखा उसे ही अपनी अपनी बहन बोला तो क्या जाने वास्तविक बहन पर क्या गुज़री। किसी का सर ऊंचा हुआ किसी ने गर्दन झुकाई। भाई बहन के रिश्ते को खेल समझना राजनेताओं की है बेशर्म चतुराई। 

Wednesday, 9 August 2017

75 साल बाद की बात ( अंग्रेज़ो भारत छोडो ) डॉ लोक सेतिया

  75 साल बाद की बात ( अंग्रेज़ो भारत छोडो ) डॉ लोक सेतिया 

      कहने को संसद का सत्र बुलाया गया और खोखले भाषणों को दोहराया गया मगर वास्तविक चिंतन करने का साहस किसी में भी नहीं था। न कांग्रेस पहले सी रही न कोई विपक्षी उस तरह से बिना अपनी राजनीतिक उद्देश्य को सामने रख खुद को और सत्ताधारी लोगों को एक साथ कटघरे में खड़ा करने की हिम्मत दिखला पाया। सत्ताधारी दल को भी इसी में सुविधा थी क्योंकि बहुत कुछ इन दिनों सामने आने लगा है जो दिखलाता है कि सत्ता का नशा उनपर भी इतना चढ़ गया है कि अपराधी नेताओं या नेताओं की संतानों पर बेशर्मी से बचाव करते नज़र आने लगे जब  उनको साबित करना चाहिए था सुशासन क्या होता है। दुर्योधन को अंधे धृतराष्ट्र ही नहीं बचाते लगे अपितु भीष्म पितामह भी मूक दर्शक बने राज्य सभा को शतरंज की बिसात का मोहरा बना संविधान की मर्यादा से खेलते नज़र आये। अब ऐसे में 9 अगस्त 1942 की बात का सच कौन बोलता। कांग्रेस कैसे बताती कि  1935 से गाँधी जी उसके सदस्य ही नहीं थे। और आज की सत्ता संभाले लोग अपनी पुरानी विरासत को कैसे गलत ठहराते कि उन्होंने तब हिन्दू महा सभा के बैनर के नीचे न केवल भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया बल्कि उसे कुचलने का भी भरसक प्रयास किया। वामपंथी भी तब आंदोलन नहीं विदेशी सत्ता के साथ थे। जो लोग इतिहास से नज़रें चुराते हैं और इक अपराधबोध में चुप हैं मगर साफ नहीं कहना चाहते कि तब जिन नेताओं ने भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया था हम उनकी बात से सहमत नहीं हैं। क्योंकि वाम और दक्षिण दोनों पंथी उन्हीं को अपनी विरासत की प्रतिमाएं मानते हैं। अब उनको महात्मा गांधी के विरोध करने वालों को गांधी जी की तरह महिमामंडित भी करना है और गांधी जी की राह पर चलने की झूठी बात  कहनी है।
          कौन आज बताता कि तब सभी नेताओं के जेल में बंद होने के बाद भी आम किसान मज़दूर और जनता ही आंदोलन को जारी रखे रही और दिन को किसान खेत में हल चलाते और रात को सरकारी प्रतिष्ठानों पर हमले भी करते थे। सब से ख़ास बात ये थी कि तब जनता केवल विदेशी शासकों का ही विरोध नहीं कर रही थी बल्कि स्वदेशी राजाओं और जागीरदारों का भी विरोध कर रही थी। आजकल के नेता कुछ हज़ार की भीड़ जमा करने को इतिहास रचना बताते हैं। अभी तीन साल में देश की दशा में कोई वास्तविक बदलाव नहीं किया गया तब भी ऐसा माहौल घड़ने का प्रयास किया जा रहा है जैसे सब कुछ अच्छा हो गया है। राष्ट्रवाद की बात ही नहीं केवल अपने दल और उसकी विचारधारा को किसी भी तरीके से थोपने का काम किया जा रहा है। कोई मूल्यों की चिंता नहीं बस सत्ता विस्तार की आकांक्षा है।
         आज भी नेता अपने चहेतों को लूट खसूट करने को सहयोग दे रहे हैं। जो हरियाणा में हुड्डा की सरकार करती रही , भजनलाल और चौटाला ने किया वही आज मनोहर लाल की सरकार के काल में भी सरकारी ज़मीन विभाग के प्लॉट्स और जगहों पर अवैध कब्ज़े खुद सत्ताधारी दल की नेता अपने भाई सम्पदा अधिकारी से करवाती हैं और उनको अवैध कब्ज़े हटवाने से रोकती हैं। मगर खुद को ईमानदरी का तमगा देने वाली सरकार खामोश है। कोई मंत्री किसी सभा में जाकर मनमानी करता है और अधिकारी को अपमानित करता है अपनी सीमा का उलंघन कर के। तानाशाही और सत्ता की गुंडागर्दी ही नहीं तथाकथित विकास कार्यों में भ्र्ष्टाचार भी साफ दिखाई देता है।  घटिया स्तर की सामिग्री से पार्क सड़क आधे अधूरे पड़े हुए हैं। हर नेता शासन को दुरूपयोग करता है मगर अपना कर्तव्य निभाने में असफल अधिकारी सम्मानित किये जाते हैं और हर दिन कोई आयोजन उन कार्यों की सफलता का जश्न मनाने को होता है जो हुए ही नहीं। मगर आज की जनता खामोश है और सच का साथ देने को बाहर नहीं निकलती। गांधी जी ने कहा था सच बोलने पर लोग खासकर वो लोग जो खुद सच का सामना नहीं कर सकते आपको सज़ा दे सकते हैं मगर आपको सच बोलने पर माफ़ी नहीं मांगनी है। भारत छोड़ो की बात भाषण देने को नहीं है , आज के शासकों को भी अपनी मानसिकता छोड़ने को कहना ज़रूरी है। क्योंकि आज भी अंग्रेज़ों की तरह और आपत्काल के समय की तरह जो सत्ता से सहमत नहीं उसे देश विरोधी बताकर लोकतंत्र की भावना की अवहेलना की जा रही है। समय आत्मावलोकन का है।
            बहुत कम लोग जानते हैं कि 1935 के नियम जो तब का संविधान था में केवल अमीर लोगों को ही वोट डालने की आज़ादी थी। गाँधी जी भी 1921 मैं जो थे 1942 मैं वैसे नहीं रहे क्योंको भारत छोड़ो का नारा बेशक उन्होंने दिया था 8 अगस्त के भाषण में मगर आंदोलन उनके हाथ में नहीं था न वो किसी भीड़ के आगे चल रहे थे। तब अहिंसा की भी बात नहीं थी और हिंसा का सहारा लिया जा रहा था। अंग्रेज़ों के सरकारी प्रतिष्ठान हमले आगजनी का शिकार हो रहे थे। बहुत कुछ बदला हुआ था। सब से खास बात जो गांधी जी को महात्मा बनाती है उनका अपनी बात को ईमानदारी से स्वीकार करना। वो इक लेख लिखते थे और अगली बार दूसरे लेख में अपनी गलती को मान कहते थे मेरी वो बात गलत थी आप आज जो लिखा उसे ही मेरा विचार समझना। विचार बदलते रहना स्वाभाविक है चिंतन से। मगर राजनेताओं ने विचार को व्यक्ति बना पत्थर बनाकर उपयोग किया है , ठीक उसी तरह जैसे ईश्वर इक विचार है हमने उसे मूर्तियां बनाकर पूजने तक इक आडंबर बना दिया है। धर्म की बात का पालन नहीं करते धार्मिक होने का दिखावा करते हैं। आज कोई नहीं चाहता गांधी लोहिया या जयप्रकाश नारायण जैसे विचार को लोग समझें , वो कोई सत्ता के लालची नहीं थे।  अंग्रेज़ों भारत छोड़ो कहने वाले नहीं चाहते थे खुद शासक बनना। आज के नेता खुलेआम कांग्रेस ही नहीं सभी दलों को हाशिये पर लाना चाहते हैं , उनका मकसद भ्र्ष्टाचार या बाकी अनुचित बातें नहीं केवल खुद का शासन चाहना है। सत्ता को ध्येय बनाने वाले देश और समाज को कभी कुछ नहीं दे सकते। 1960 में हिंदू महासभा ने जिन मंदिरों का अधिकार मंगा था उन में राम मंदिर नहीं शामिल था। जो लोग धर्म को या गांधीवाद लोहियावाद या जे पी की विचारधारा को अपने लिए सत्ता की सीढ़ी मानते हैं उनको अपने स्वार्थ पुरे करने हैं।
                  बड़े लोगों का कद बड़ा उनके आचरण से हुआ करता है। आजकल लोग जनता का धन बर्बाद कर विज्ञापनों से महान कहलाना चाहते हैं।  सोशल साइट्स और मीडिया में खुद को महिमामंडित करवाते हैं। मुझे ये लोग बचपन की याद दिलाते हैं जब सिगरेट का विज्ञापन करने वाले बांसों की टांगों को लगाए बहुत ऊंचे दिखाई देते थे। बच्चे उनके पीछे तालियां बजाते घूमते थे। आज भी कुछ लोग यही कर रहे हैं ठूंठ की ऊंचाई के सामने नतमस्तक हैं।

Tuesday, 8 August 2017

राम जी की पाती रामभक्तों के नाम ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  राम जी की पाती रामभक्तों के नाम ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  राम जी ने कितने खत लिखे मगर कोई जवाब नहीं आया तो मुझ को ये दायत्व सौंपा जाकर उन से पूछूं क्या हुआ सब ठीक ठाक तो है। मैंने कहा भगवान आप सब जानते ही हैं उनको फुर्सत ही नहीं अभी कितने चुनाव और जीतने बाकी हैं। कितने देशों में अभी जाना है , अभी तो दो साल बाकी हैं मगर चिंता अभी से है अगला चुनाव जीतना है। मुझे समझ नहीं आया भगवान को खत लिखने की क्या ज़रूरत थी। मेरे दिल की बात समझ कर बोले उन्होंने शपथ ली थी रामलला के मंदिर बनाने की , अब उनको पूरा बहुमत हासिल है और कोई बाधा नहीं रही फिर क्यों नहीं बात करते मंदिर बनाने की। मैंने कहा भगवान इक बात पूछना चाहता हूं अगर आप अनुमति दें आप। राम जी बिना बोले ही समझ गए , कहने लगे जनता हूं लेखक तुम जो कहना चाहते हो। वास्तव में मुझे किसी भी मंदिर की कोई ज़रूरत कभी थी ही नहीं। मेरा मंदिर तो घर घर में है और धरती के कण कण में बसता हूं मैं। मुझे उस मंदिर में रहना ही नहीं जो मर्यादा को तार तार कर बनाया जाये। मैंने कभी कहीं नहीं कही मंदिर बनाने की बात , मगर जब कोई आता है मेरे दरवाज़े पर और मन्नत मांगता है कि ऐसा हुआ तो मैं आऊंगा मन्नत पूरी करने को। तब जब उनकी इच्छा पूरी हो जाती है तब भी नहीं आते तो मुझे चिंता होती है उनकी कि अभी कोई और मांग रह गई है तो पता चले। मेरे दर से कोई निराश नहीं लौटे बस यही चाहता हूं। मैंने जाकर राम मंदिर वालों को बताया भगवान आपको याद कर रहे हैं , सुनते ही उनको पसीना आने लगा। मैंने समझाया घबराओ नहीं भगवान ने याद किया है बुलावा नहीं भेजा , अपने खत का जवाब मांगा है और जानना चाहते रामलला मंदिर बनवाना था उसका क्या हुआ। आजकल आप जो चाहते हासिल कर लेते हो तो अदालती बाधा को लांघना कोई कठिन नहीं है। अध्यादेश कानून सब आपके हथियार हैं , नोटबंदी की तरह साहस करो फैसला करने का और इसी सरकार के काल में बनवा दो। चिंता में पड़ गए वो , कहने लगे बात तो सही है। आज हम जो जो कहते थे सब कर सकते हैं कोई विरोध नहीं कर सकता , मगर क्या क्या करें। धरा तीन सौ सत्तर और समान नागरिक सहिंता लागू करने में तो कोई अदालत भी आड़े नहीं आने वाली , तब भी डरते हैं इससे कोई राजनीतिक हानि तो नहीं होगी। राम जी को तो कभी भी मना लेंगे मगर देश की जनता रूठी तब क्या होगा , भगवान भी नहीं बचा सकेंगे तब। राम मंदिर की हांड़ी जब चढ़ानी थी तब और बात थी अब उसका भरोसा नहीं है। मैंने कहा आपके नेता तो राम मंदिर पर सौ बार सरकार कुर्बान करने की बात कहते थे। मगर उनको अब राम जी कल्याण करेंगे ऐसा नहीं यकीन। राम जी को पता चला तो मुस्कुरा दिए। वाह मेरे भक्तो इसलिए नहीं वादा निभाते कि ऐसा किया तो अगला चुनाव नहीं जीत सकोगे। राम को मानते तो याद रहता मेरा आदर्श वाक्य। रघुपति रीत सदा चली आई , प्राण जाएं पर वचन ना जाई।

Monday, 7 August 2017

जूतों का उपदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          जूतों का उपदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       अभी अभी सैर पर इक पुराने दोस्त मिले , आजकल के हालात  की बात चली तो हमेशा की तरह खुद की बढ़ाई करने लगे। फिर मुझे समझाने लगे मैं भी उन जैसा बन जाऊं , जो सालों तक नहीं बन सका न कभी बनना चाहता। अपने फोन से अपने गुरु जी का वीडियो दिखलाने लगे , गुरु जी समझा रहे थे आप रास्ते के कांटें चुनोगे तो कभी खत्म नहीं होंगे वो , अच्छा है आप खुद को बचाओ और जूते खरीद लो पहनने को। क्या ये धर्म की बात है मुझे नहीं लगता , गनीमत है उन्होंने अपने ब्रांडेड जूते पहनने की बात नहीं की। मुझे तो इक शायर की बात अच्छी लगती है , 
      " माना चमन को गुलज़ार न कर सके , कुछ खार कम तो कर गये गुज़रे जिधर से हम "।
आप सोचोगे अच्छी बात है कोई मेरा हमदर्द तो है जो मुझे समझाता है कि सच बोलकर दुश्मन मत बनाओ दुनिया को अकेले पड़ जाओगे। सच चलता ही अकेले है , झूठ को ही जाना होता है सौ साथियों के साथ लेकर। उस रात अपने बेटे को पुलिस थाने से छुड़ाने को नेता जी अकेले जाने का हौसला नहीं कर सके सौ समर्थक साथ लेकर गए , बेटे की करतूत पर पर्दा डालने को। कल इक नेता बोले आधी रात को लड़की को घर से बाहर नहीं जाना चाहिए वो भी अकेली। कितनी महान सोच है इनकी , आधी रात को अकेली लड़की इनको अवसर लगती है आवारागर्दी करने का , क्योंकि आधी रात को इनकी संताने निकलती हैं सड़क पर। 
          अभी आपको समझाना बाकी है उन महोदय को मेरी चिंता क्यों हुई। हमेशा से लिखता रहा यही सब , हर नेता हर सरकार जो भी सत्ता में हो उसकी आलोचना की है निडरता से। और यही लोग तारीफ के पुल बांधते रहे हैं क्या बात लिखी आपने आईना दिखा दिया उनको। मगर आजकल उस दल की सरकार है जिस के समर्थक वो हमेशा से रहे हैं , कितनी मुश्किल से अच्छे दिन आये हैं उनके। इक और शायर याद आते हैं ,
          " हर मोड़ पे मिल जाते हैं हमदर्द हज़ारों , लगता है मेरे शहर में अदाकार बहुत हैं। "
लेकिन उनको दोष नहीं देना चाहता , सब अपनी चमड़ी और दमड़ी बचाने में लगे हैं। अभी बात किसी अनजान की बेटी की है अपनी पहचान की होती तो जाकर झूठी तसल्ली देते भगवान का शुक्र है बेटी सुरक्षित है।  उनकी खुद की बेटी है ही नहीं बेटे हैं सब , किसी रिश्तेदार की बेटी होती तब भी दिखावे को साथ जाते मगर अपनी खाल बचाकर। इक लड़की को मार दिया गया था ससुराल में तब बिरादरी के पंच बनकर सौदा करवा आये थे। ऐसे लोग न्याय नहीं निपटारा करवाते हैं। अच्छा है ऐसे गुरुओं से मैं दूर ही रहा हूं।