Monday, 27 March 2017

कबूलनामा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

तमाम उम्र जीने का इक गुनाह किया है ,
हर रोज़ खुद अपने हाथ से ज़हर पिया है ,
मैं दुनिया में हर किसी का गुनाहगार हूं ,
न जाने कितना सभी से कर्ज़ लिया है।
हर रोज़ अपनी नाकामी का गवाह रहा हूं  ,
चाहा जो आज तलक कर नहीं सका हूं ,
इक अपराधबोध है मेरा जीवन तमाम ,
जाने ये कैसी आग में दिन रात जला हूं।
कुछ भी मैं मांगता तुझसे और मेरे खुदा ,
बस चाहता हूं खत्म कर दो जीने की सज़ा ,
शायद जी के नहीं मर कर ही दे सकूं कुछ ,
चुका सकूं कुछ तो कर्ज़ है यही इक इल्तिज़ा।
आंसू मेरे भी शायद नहीं काम कर सके कोई ,
फरियाद किस तरह करूं जो सुन सके कोई ,
कैसे सभी से भीख क्षमा की मांगने को जाऊं ,
ये चाहता हूं मुझे कभी न माफ़ भी करे कोई।


Sunday, 26 March 2017

कोई मुझे उसका पता बता दे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

कोई मुझे
उसका पता बता दे ,
जिस गांव जिस शहर
जिस राज्य में ,
कोई अधिकारी
खुद को राजा नहीं समझता ,
कोई सरकारी कर्मचारी
घूस नहीं चाहता हो ,
कोई थानेदार बेगुनाह पर
ज़ुल्म नहीं करता हो ,
किसी की फरियाद हाकिम
अनसुनी नहीं करता हो ,
किसी नागरिक को
अपने अधिकार भीख की तरह
मांगने नहीं पड़ते हों ,
जिस गली में
कोई गंदगी दिखाई नहीं देती हो ,
किसी तरह की भी गंदगी ,
जिस सरकारी दवाखाने में
कोई रोगी बिना इलाज
नहीं मरता हो ,
जिस अदालत में
न्याय इतने विलंब से
नहीं मिलता कि अन्याय लगे ,
जिस जगह
आम नागरिक होना
जुर्म नहीं समझा जाता हो
अभी तलक ,
कोई नेता
कोई मंत्री
कोई मुख्यमंत्री
कोई प्रधानमंत्री
मुझे भी बता दे वो जगह ,
जिस जगह को
उसने वास्तव में
आज़ादी से जीने के काबिल
बना दिया हो अब तो ,
मुझे पल दो पल
देखना है उस
सपनों के आज़ाद भारत
की तस्वीर को ज़िंदा रहते ,
वो ख्वाब जन्नत का
वो सपना स्वर्ग जैसे
सारे जहां से अच्छे वतन का सबका ,
किसी को कभी तो
सच हुआ आया ही होगा नज़र
मुझे देखना है
एक बार खुद जाकर ,
सभी सरकारी
विज्ञापनों वाला हिंदुस्तान
जिसकी खबर छपती है
हर अख़बार में अब।

आम राय से फैसला ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

दो पक्ष बन गये थे और तमाम प्रयास करने पर भी कोई निर्णय हो नहीं पा रहा था। उधर तारीख भी नज़दीक आती जा रही थी , सवाल आने वाले को पूरी तरह खुश करने को था। बस वो खुश होकर मनचाहा वरदान दे जाये मसीहा बनकर डूबती नैया को किनारे लगा जाये। इक टीम चुनी गई जिसको तय करना था कौन कौन सा फल टोकरी में डालकर भेंट करना , कौन कौन सा फूल गुलदस्ते में सजाना स्वागत में पेश करने को। कौन कौन सी मिठाई खिलानी और किस हलवाई की बनाई। सब चाहते थे सही चुनाव किया जाये , मगर तभी इक सदस्य ने आरोप लगाकर कि मुझपर दोनों पक्ष दबाव डाल रहे हैं उनकी पसंद की दुकान से कमीशन लेकर खरीदारी करने का। और ऐसे में हम निष्पक्ष होकर फैसला एकमत से नहीं कर सकते , ये बात दोनों पक्षों को सूचित कर दी गई। उसके बाद जो इतने दिनों से नहीं हो पा रहा था ठीक वक़्त पर हो गया। मगर ये कैसे हुआ ये इक राज़ की बात है। दोनों पक्षों की दो दुकानें हैं बाज़ार में सब्ज़ी की। जिस जिस को टीम में लिया गया था वो सब भी अलग अलग फल बेचते हैं। दो फल महंगे लगे उनको छोड़ दिया गया बाकी हर फल का एक एक पीस शामिल कर लिया टोकरी में। फूल और मिठाई पर मतभेद होना लाज़मी था , जो मधुमेह रोग से पीड़ित थे उनको कठिनाई थी सामने होते पसंद का मिष्ठान नहीं खाना परहेज़ की खातिर। बाकी जगह चुप चाप छुप कर स्वाद ले लेते थे पर सब के सामने करना मुश्किल था। फूल भी कुछ लोग सुगंध से एलर्जी के कारण पास नहीं देख सकते थे , और ये भी लगा कि फूलों को तोड़ना गलत है साथ ये मिलते भी बहुत महंगे दाम हैं। इसलिए सब्ज़ियों का इक टोकरा सजाया गया जो मसीहा को दिया जाना है जिसका उपयोग वो बाद में कर सकेगा।
प्याज़ आलू भिंडी बैंगन मूली गाजर खीरा गोभी सब को मिला दिया गया , मिक्स वेज का काम और साथ में सलाद भी। और सब मान भी गये , सब की दुकान से कुछ न कुछ शामिल किया गया।
                 जब भरी सभा में उनको भेंट किया गया तो उनको पसंद आया ये नुस्खा , उन्होंने पूछा ये असंभव कार्य किस तरह संभव हुआ , सब को साधना सहज नहीं होता। तब किसी ने उनको इक पुरानी कहानी पढ़कर सुनाई। एक बार किसी बड़े आदमी के खानसामा से बेहद महंगी कोई डिश बेस्वाद बन गई , अब फिर से सब सामान मंगवाना आसान नहीं था और कुछ ही देर में महमान आने को थे। खानसामा ने बाकी सब खाने का सामने रख दिया मगर उस डिश को आखिर में खिलाने को रख लिया। साथ में इक तेज़ नशे की शराब भी पिलाने को प्रस्तुत करता गया। शराब के नशे में धुत सब महमान जो जैसा था खाते गये , आखिर में उस डिश को सभी को अपने हाथ से खिलाने को सुंदर महिलायें सोलह श्रृंगार किये बुलाई गईं। खाने वाले स्वाद से अधिक उनके सौंदर्य का रस पीते रहे और सब को उस बिना स्वाद की डिश सब से अच्छी लगी। बस कुछ इसी तरह सब को खुश किया गया उनको इशारे से समझाया गया। 

Saturday, 25 March 2017

परस्तिश की आदत हो गई ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कल किसी ने प्रधानमंत्री मोदी जी की महिमा का बखान करते हुए उसको मसीहा तक घोषित कर दिया। इतना काफी नहीं था , उसके बाद यह तक लिख डाला अगर ये मसीहा कुछ नहीं कर सकता तो कोई दूसरा मसीहा कभी नहीं आयेगा फिर। बहुत बातें ध्यान में आईं जो शायद इस संदेश भेजने वाले को पता ही नहीं हों। दिन में अठाहर घंटे काम करना और खुद को प्रथम देशसेवक बताना सब से पहले बिना प्रचार या अहंकार अगर किसी ने किया तो वो जवाहर लाल नेहरू जी ने। मैं किसी व्यक्ति का उपासक नहीं हूं , जब नेहरू जी का देहांत हुआ तब मैं मात्र तेरह बरस का छोटा सा बच्चा था। नेहरू जी का जन्म दिन बाल दिवस के रूप में तब भी मनाया जाता था , क्योंकि उनका बच्चों से बेहद प्यार चर्चा में था। ये शायद उसी का असर था कि मैंने पहली कविता नेहरू जी पर लिखी थी। सताइस मई को याद करो चल बसे थे चाचा प्यारे। मगर स्कूल में कार्यक्रम में कई दिन तैयारी करवाने के बाद ठीक समय पर अध्यापक ने मुझे मंच पर जाने से रोक दिया था क्योंकि मैं इक गांव का रहने वाला छात्र पेंट नहीं पायजामा डाल सभास्थल पर चला आया था। आज इक बात सोचता हूं क्या आज किसी के वेशभूषा से पहनावे से भेदभाव किया जाये तो सोशल मीडिया में शोर मच जाता। मेरे मन में वो बात आज तक गहरी से बैठी है जो तब किसी को बताने का साहस तक नहीं कर पाया था। मगर आज बात नेहरू जी और देश की करनी है। शायद यहां ये साफ़ करना ज़रूरी है कि युवक होते मेरी मानसिक परिपक्वता देश समाज और राजनीति को समझना तब शुरू हुआ जब 1975 में इंदिरा गांधी का समय था। और कुछ चाटुकार व्यक्ति पूजक उनको देवी बताने लगे थे। मैं तब से ऐसी राजनीति का विरोधी रहा हूं और नेता ही नहीं कोई खिलाड़ी या अभिनेता भी जब बहुत लोगों को विशेषकर टीवी अख़बार वालों को भगवान लगता है तब मुझे वो इक गुलामी की मानसिकता लगता है। ये सभी अपने अपने मकसद को अपना काम करते हैं निस्वार्थ कुछ भी नहीं , इंसान बन जाना बड़ी बात है भगवान नहीं बन सकते। आपको आज धर्म-ग्रन्थ की परिभाषा बताना शायद सही होगा , देवता वो लोग होते हैं जो अपना सब लोगों में बांटते हैं , और दैत्य वो जो औरों से सब छीन लेना चाहते हैं , राक्षसी स्वभाव आपको सत्ता का साफ दिखाई दे सकता है , हर सत्ताधारी हज़ार लोगों से अधिक खुद चाहता है, उपयोग करता है  , तब भी उसकी हवस मिटती नहीं। तीन साल में मुझे मोदी जी की सरकार में जो जो उनका दावा था वो कहीं वास्तव में दिखाई नहीं देता। भ्र्ष्टाचार और जनता से अभद्र व्यवहार आज भी आपको पहले की तरह मिलेगा जाकर देखो कभी सरकारी दफ्तर। ट्विट्टर  और व्हाट्सऐप से आपको असिलयत दिखाई नहीं दे सकती है। नेहरू जी की गलतियां आपको पता होंगी जिन में जीप घोटाला और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरों पर कठोर करवाई नहीं करने से लेकर कश्मीर समस्या तक की बात है। शायद उनका पंचशील समझौता भी कुछ लोगों को इक गलती लगता है , जो पड़ोसी देशों से किया गया था शांति की खातिर। क्या उनका विचार गलत था कि जो देश आज़ाद हुए हैं उनको देश के विकास पर ध्यान देना चाहिए जंग पर हथियारों पर धन बर्बाद नहीं करना चाहिए। मगर उनके भरोसे को तोड़ा गया चीन द्वारा आक्रमण कर के सीमा पर और 1962 की उस हार ने देश और देश की जनता को बेहद विचलित किया था। उसकी टीस अभी भी बाकी है। आपको मालूम है आज देश जिस दिशा में बढ़ता जा रहा है उसको निर्धारित किस ने किया था। वो नेहरू जी थे जिन्होंने तय किया कि बांध बनाना कारखाने लगाना और समय के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ना है। परमाणु विज्ञान की बात पर आलोचना हुई कि देश की गरीबी मिटाने से पहले परमाणु बंब पर धन खर्च करना कितना उचित है।  मगर वो चाहते थे दोनों काम साथ साथ हों , विज्ञान भी आगे बढ़ता रहे और देश की समस्याओं पर योजनाएं भी चलती रहें। उन्होंने कभी नहीं कहा कि उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने देश की आज़ादी में अपना सब दे दिया था , जैसे आजकल लोग कुछ किये बिना घोषणा करते हैं हमारा जीवन देश को समर्पित है। जब कि उनका ध्येय सत्ता का विस्तार और खुद को एक मात्र देशभक्त कहलाना है। मोदी राज में स्वच्छता अभियान से लेकर हर योजना प्रचार में ही दिखाई देती है , जनता का धन खर्च कर विज्ञापनों पर , धरातल में कहीं नहीं। गंदगी हर जगह है और व्यक्तिवाद की परकाष्ठा है जब हर राज्य में मुख्यमंत्री विधायक नहीं दो चार लोग मनोनित करते हैं। मोदी जी में बहुत कुछ अच्छा होगा मगर लोकतंत्र के प्रति आदर कदापि नहीं है। बस संसद की चौखट पर माथा टेकना काफी नहीं , जब आपको संसद को जवाब देना था आप जनसभा में भाषण देकर लोकतांत्रिक मर्यादा की खिल्ली उड़ाते रहे। आपको खतरा है जान का , इतनी सुरक्षा में ऐसा कहना क्या जनता को बरगलाना है , नेहरू जी के साथ इक सिपाही मात्र डंडा लिए होता था और वो पैदल टहलते हुए अपने ग्रह मंत्री के घर किसी समस्या पर बात करने चले जाते थे। किसी नेता को प्यार मिलना और विश्वास हासिल होना बड़ी बात है , सत्ता पर रहते जयजयकार होना बड़ी बात नहीं होती। इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि भारत में लोकतंत्र की नींव मज़बूत करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने में नेहरू जी का बहुत योगदान रहा है। परिपक्ष की संख्या बेशक कितनी कम रही हो तब भी विपक्ष की बात को अनसुना कभी नहीं किया जाता था। आज कोई प्रधानमंत्री किसी विपक्षी दल के नेता का इस तरह आदर शायद ही दे सकता हो जैसे नेहरू जी ने अटल बिहारी वाजपेयी जी को लेकर कहा था आप ज़रूर कभी देश के महान नेता कहलाओगे , काश आप हमारे दल में होते। आज के नेता इक दूसरे को नीचा बताने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। बेशक नेहरू इक धनवान परिवार में पैदा हुए और देश के गरीबों की दशा को मुमकिन है ठीक से नहीं समझ सके , मगर उनमें अभिमान या सत्ता का अहंकार रहा हो कभी ऐसा उनके विरोधी भी नहीं कह सके। ये उनकी स्थापित लोकतांत्रिक मर्यादा ही थी कि उन्होंने अपने परिवार से या दल से किसी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का कोई प्रयास नहीं किया था। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि जब नेहरू के बाद सांसद अपना नया नेता चुनने को सभा कर रहे थे तब लाल बहादुर शास्त्री जी जब पंहुचे तब उनको कोई खाली कुर्सी नज़र नहीं आई और वो प्रवेशद्वार से नीचे आती सीढ़ियों पर ही बैठ गये थे। जब किसी नेता ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा तब सब की नज़रें उनको तलाश करने लगीं और तब किसी ने शास्त्री जी को बताया आप को अगली पंक्ति में जाना है आपका नाम का प्रस्ताव किया गया है। ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी आम परिवार के सदस्य को चुना गया था काबलियत को देखकर , बिना किसी की कृपा के। आजकल जैसे पहले से निर्धारित किया जाता है कि दल के बड़े नेताओं द्वारा तय व्यक्ति के नाम पर विधायक अथवा सांसद केवल मोहर लगाते हैं उसको संविधान और लोकतंत्र का उपहास ही नहीं निरादर कहना होगा। जिन को गलतफहमी है मोदी जी चाय वाले से देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं उनको पता होना चाहिए कि उनको गुजरात का मुख्यमंत्री पद भी बिना जनता द्वरा चुने इक संस्था द्वारा अपना प्रचारक होने के कारण मिला था और जब 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दल का नेता घोषित करना था तब भी वही दोहराया गया। तभी से मीडिया और कुछ सुविधा संम्पन लोग उनके नाम की माला जपने लगे थे बिना ये समझे कि ऐसा करना कितना खतरनाक हो सकता है। यही पहले इंदिरा गांधी के लिए किया गया था और इंदिरा इस इंडिया तक कहने लगे थे चाटुकार लोग ठीक इसी तरह जैसे आज मोदी मोदी रट रहे हैं। अभी तक जो समझ आता है वो इंदिरा गांधी की ही तरह लगता है। खुद को देश में गरीबों की मसीहा ही नहीं चौगम और गुट-निरपेक्ष देशों की सब से बड़ी नेता कहलाने की महत्वाकांक्षा में तमाम आयोजन विश्व बैंक और आई एम एफ से कर्ज़ लेकर करवाना। सत्ता और जब अंकुशरहित पूर्ण सत्ता मिलती है तब शासक के विस्तारवादी होने की चाहत होना इक खतरा होता है।  शायद मोदी जी उसी दिशा में अग्रसर हैं। मगर विडंबना देखिये जिन लोगों ने मोदी जी को आगे बढ़ाया मोदी जी को कोई भी उनमें अपने से ऊंचा नहीं लगा तभी उनको , महात्मा गांधी और सरदार पटेल की प्रतिमाओं को स्थापित करना पड़ा, उधार लेकर । ये महान लोग किसी दल के नहीं देश के होते हैं , मगर इनको अपने स्वार्थ की राजनीति में उपयोग करना उचित नहीं।  नेहरू जी को मोदी कभी उस तरह सामने नहीं लाना चाहेंगे क्योंकि ऐसा उनकी राजनीति और एकछत्र शासन की महत्वाकांक्षा के हित के बीच आता है।  ये भी इक विसंगति है एक धोती में सादगी से रहने वाले गांधी की बात करने वाला क्या शान से सज धज कर रहता है 15 एकड़ के बंगले में और सत्ता मिलते ही करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी किसी मंदिर में सरकारी ख़ज़ाने से दान देता है। जो लोग नेहरू जी की विलासिता की बात करते हैं कि उनके कपड़े विलायत से ड्रायक्लीन होकर आते थे उनको पता होना चाहिए ऐसा उनकी निजि आमदनी से हुआ था देश के ख़ज़ाने से नहीं। इक और घटना शायद नेहरू के व्यक्तित्व को और साफ करती है , उनके सहायक रहे इक अधिकारी ने लिखा है अपनी किताब में कि जब वो साक्षात्कार देने गये तब खुद नेहरू जी उठकर पहले दरवाज़ा खोला अंदर आने को फिर साक्षात्कार के बाद दोबारा शिष्टाचार निभाने दरवाज़े तक छोड़ने आये थे। देश की सब से बड़ी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति इस तरह विनम्र हो सकता है , ये तब वास्तव में था। आज कहना पड़ता है हम को जीत मिली है तो विनम्र होना चाहिए , ऐसी विनम्रता खुद आप में अभी तलक मुझे तो नज़र नहीं आई मोदी जी। मैं किसी दल का समर्थक नहीं , विरोधी नहीं। मगर किसी को खुदा या फरिश्ता नहीं मानता। नेता लोग देवता नहीं होते फिर दोहराता हूं। इक शेर बशीर बद्र जी का।
                         सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा ,
                        इतना मत चाहो उसे , वो बेवफ़ा हो जायेगा।  

Thursday, 23 March 2017

अकेले चलना है अपने सफर में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

मैं क्या करूं  , किधर जाऊं , सब खुदा बने हुए हैं , आदमी कोई है ही नहीं जिस से कोई बात कहूं। ये शहर इशारों का शहर है , मुझे इक मित्र की ग़ज़ल का इक शेर याद आता है। दिन भर भटकता ही रहा कोई बात तो करे , मुझको थी क्या खबर ये इशारों का शहर है। इशारे गूंगे लोगों की भाषा होती है , मैं बोलता हूं , बोल सकता हूं , मैंने सीखी ही नहीं ऐसी भाषा। इशारों इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तूने सीखा कहां से। महफ़िल में चला जाता हूं भूले से कभी कभी , नहीं समझता तौर तरीके आजकल की दुनिया के। सब दावा करते हैं कोई उनका आदर्श है वही उसके अनुयायी हैं भक्त हैं। और अपना कॉपी राईट चाहते उस नाम पर अपनी दुकान चलाने को। देश धर्म क्या पशु पक्षी तक सब को बांट दिया है। जिसे देखो वही पहाड़ पर चढ़ना चाहता है , ये सोचता है कि ऊंचाई पर खड़ा होने से उसका कद बड़ा हो जायेगा। कोई नहीं समझता कि पहाड़ पर चढ़ बौना आदमी और बौना दिखाई देता है। मुझे पहाड़ पर चढ़ने का शौक नहीं है , ज़मीन पे रहना चाहता , पहाड़ों से फिसलते देखा है अक्सर लोगों को। ये और बात है कि लोग रसातल में गिरने को भी मानते हैं आकाश को पा लिया है। कथनी और करनी में ऐसा विरोधभास देख मुझे घबराहट होती है। जो खुद अपने आप को नहीं पहचानते वो कहते हैं आपको भगवान से मिलवा देंगें। मैं बड़ा कहलाना चाहता हूं चाहना खुद अपने आप को छोटा बनाता है। विडंबना है लोग पल भर में अपनी सोच बदल लेते हैं , जो नहीं करना कभी कहते , अगले ही पल वही करते नज़र आते हैं। चेहरा कुछ है मुखौटा कोई और लगा रखा है। ऐसी झूठी नकली दुनिया में कोई किस तरह जी सकता है। मुझे हर बार यही समझ आया है ऐसे लोगों के बीच रहने से कहीं अच्छा है , अकेले रहना। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।  

Wednesday, 22 March 2017

अमर शहीदों की याद में ( श्रधासुमन ) डॉ लोक सेतिया

देश की आज़ादी का इतिहास बिना कुछ मुकदमों के नहीं लिखा जा सकता। ऐसे आज़ादी के मुकदमों पर इक किताब जाने माने साहित्यकार बालमुकुंद अग्रवाल जी की लिखी हुई है। उस में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव पर चले मुकदमें के इलावा गांधी सुभाष और अन्य लोगों पर चलाये अंग्रेजों द्वारा मुख्य मुकदमों की जानकारी है।
भगत सिंह जी के मुकदमें की बात लिखने से पहले कुछ शब्द जवाहर लाल नेहरू जी की जीवनी से उद्यत किये गये हैं। जो ये हैं :-
              भगत सिंह एक प्रतीक बन गए थे। उनका कार्य ( सांडर्स की हत्या ) भुला दिया गया , लेकिन प्रतीक याद रहा और कुछ ही महीनों में पंजाब के शहर और गांव में तथा कुछ हद तक बाकी भारत में भी उनका नाम गूंजने लगा। उन पर अनेकों गीत रचे गये और उनको जो लोकप्रियता मिली वह अद्वितीय थी।
    कुछ लोग बिना पूरी जानकारी दो अलग अलग तरह की विचारधारा के आंदोलनों को परस्पर विरोधी बताते हैं , जो सही नहीं है। सब का अपना महत्व है और सभी का मकसद एक ही था। मंज़िल एक थी रास्ते अलग अलग थे। जो गांधी सुभाष भगतसिंह को अपना अपना कहते हैं अपने हित साधने को बांटते हैं वो किसी भी देशभक्त की भावना को नहीं समझते। आज अधिक नहीं कहते हुए कुछ जाने माने शायरों के कलाम से समझने का प्रयास करते हैं , आज़ादी का अर्थ क्या है।
                इक़बाल के शेर :-
अपनी हिकमत के खम-ओ-पेच में उलझा ऐसा ,
आज तक फैसला-ए -नफ़ा-ओ-ज़रर न कर सका।

उठा कर फैंक दो बाहर गली से , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे।
इलेक्शन मिम्बरी कौंसिल सदारत , बनाये खूब आज़ादी के फंदे।

          जाँनिसार अख्तर के शेर :-

जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं , देखना ये है कि अब आग किधर लगती है।
सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है , हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है।

वतन से इश्क़ गरीबी से बैर अम्न से प्यार , सभी ने ओड़ रखे हैं नकाब जितने हैं।

         दुष्यंत कुमार के शेर :-

परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं , हवा में सनसनी घोले हुए हैं।
ग़ज़ब है सच को सच कहते  नहीं वो , कुरानो-उपनिषद खोले हुए हैं।

ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।
किसी भी कौम की तारिख के उजाले में , तुम्हारे दिन है किसी रात की नकल लोगो।
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           आखिर में कुछ शेर मेरी ग़ज़लों से भी पेश हैं :-  ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )

तुम्हें ताली बजाने को सभी नेता बुलाते हैं , भले कैसा लगे तुमको तमाशा खूब था कहना।
नहीं कोई भी हक देंगे तुम्हें खैरात बस देंगे , वो देने भीख आयें जब हमें सब मिल गया कहना।

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई , हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

Tuesday, 21 March 2017

बात मतलब की , पते की बात नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

न्याय क्या है आजकल इसको नहीं देखना चाहते लोग। सच की डगर चलना आसान नें बहुत कठिन है। लोग आसान राह चाहते हैं मुश्किल यही है , आसान रास्तों से मंज़िल मिल जाये ये मुमकिन नहीं है। देश की सब से बड़ी अदालत भी वही कहती है जो मेरे शहर का पुलिस का दरोगा कहता है। क्या मिलेगा कोर्ट कचहरी धक्के खाकर मिल बैठ समझौता कर लो सब मुसीबत से छुटकारा पाओ। इस युग में सत्यमेव जयते सिर्फ इक लिखा हुआ वाक्य है जिस को कोई नहीं पढ़ता। कुर्सी के पीछे की बात पढ़ना संभव ही नहीं है , शायद यही शब्द यही वाक्य कुर्सी पर बैठे अधिकारी नेता मंत्री न्यायधीश को सामने हर वक़्त पढ़ने को मिलते तो उनपर कुछ प्रभाव पड़ता भी। जब दो पक्ष लड़ते हैं और समझते हैं हम सही दूसरा गलत है , तब कोई न्याय दोनों को पसंद कैसे  आ सकता है। ऐसे में देश की अदालत अगर कई साल तक खामोश बैठी रहने के बाद मात्र सुझाव देती है किसी गांव की बिरादरी की पंचायत की तरह कि अच्छा है मिल बैठ सब भाई समझौता कर लो। चाहो तो हम बीच में मध्यस्थता को राज़ी हैं। भारत पाकिस्तान में अमेरिका कभी समझौता नहीं करवाना चाहेगा , उसका फायदा हमारी लड़ाई जारी रहने में है। अमेरिका भारत का मित्र नहीं हथियार का सब से बड़ा सौदागर है , और भारत और पाकिस्तान उसके खरीदार , बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बन सब खुद खाना उसका मकसद रहा है।
                        न्याय कभी अधूरा नहीं होता , आधा सच झूठ होता है। खेद की बात है अगर देश की सब से बड़ी अदालत इंसाफ नहीं समझौता पसंद है। आप कैसे राजनीति से अपराधीकरण को खत्म करोगे अगर आप चुप चाप लोकतंत्र की हत्या होते देखते हैं। जब विधायक नहीं कोई और निर्णय करता है कौन उनका नेता और मुख्यमंत्री बनेगा तब लोकतंत्र कहां बचता है। मनोनित लोग शासन करें और निर्वाचित हाशिये पर बैठ ताली बजायें तब लोकतंत्र और संविधान के साथ क्रूर उपहास ही किया जा रहा होता है।

फिर एक और सर्वदलीय बैठक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सुप्रीम कोर्ट में इक सरफिरे की याचिका पर चुनाव आयोग ने हलफनामा दायर कर कहा है कि वो निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रतिबद्ध है और याचिका दायर करने वाले की बात  से सहमत है। पिछली बार सर्वदलीय बैठक एकमत थी कि विधायकों सांसदों मंत्रियों आला अधिकारियों का वेतन भत्ते सुविधायें और कई गुणा बढ़ाना देश की जनता की गरीबी जैसी समस्याओं को मिटाने को अतिअवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट जाने क्यों बार बार आपराधिक और दागदार नेताओं को राजनीति से बाहर निकलना चाहता है , जब कि सब अपराधी विश्वास करते हैं यही अदालत उनको किसी दिन निर्दोष घोषित करेगी। न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी बंधी इसी लिये है , समझ नहीं आता सब अपना घर छोड़ दूसरे के घर में तांक झांक क्यों करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को पहले अदालतों का हाल देख उसको ठीक करना चाहिए , औरों को नसीहत देने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए। जो खुद शीशे के घर में रहते हों उनको दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकने चाहियें। मंच संचालक आज की सर्वदलीय बैठक की शुरुआत करते ये उदगार व्यक्त कर रहे थे , और उसके बाद बारी बारी सभी नेता गंभीर समस्या का निदान खोज रहे थे अपना अपना मत प्रकट कर संबोधन  में। इक वरिष्ठ नेता ने सवाल किया जब महिलाओं को उनकी आबादी के समान स्थान नहीं मिलने पर आरक्षण की बात की जाती है तब अपराधी क्या देश के नागरिक नहीं हैं। सभी दलों में तीस प्रतिशत उमीदवार आपराधिक पृष्ठ भूमि से होते हैं , जनता खुद भी अपराधी है ऐसे अपराधियों को पसंद करती अपने सर पर बिठाती और जितवाती है। जब हम इस विचारधारा को मानते हैं कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं , तब अपराधी से नफरत किसलिये। अपराध करना उनका कारोबार है पेशा है , और राजनीति उनकी देशसेवा है।
              याचिका दायर करने वाले का कहना है कि नेताओं के आपराधिक मुकदमों की एक साल में सुनवाई करवा जल्द फैसला किया जाये और दो साल की सज़ा मिलने पर उम्र भर का परिबंध चुनाव लड़ने पर लग जाये। ये तो पक्षपात होगा , जनता को भी बराबरी का हक है न्याय पाने का , जैसे किसी ने बीमा करवाया हुआ और जब ऑपरेशन की ज़रूरत हो बीमा कंपनी भुगतान नहीं करती। उसके बाद सात सात साल कोई इंतज़ार करता रहे खर्च किये पैसे वसूल करने को , जब मिलें तब डेढ़ लाख की कीमत जब खर्च हुए से इतनी कम हो चुकी हो कि मुकदमा करने वाला पछताता हो।  क्या ऐसे मुकदमों की सुनवाई जल्दी नहीं की जानी चाहिए। इक नेता का सवाल था क्या हर वोटर वोट देने से पहले शपथ खा सकता है कि उसने कभी कोई अपराध नहीं किया है। क्या घूस देना सिफारिश करवाना अनुचित नहीं है , पहले जनता को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी चाहिए तब नेताओं पर दोष लगाना चाहिए।
                अपराध भी इक हिस्सा है समाज के बहुत सारे बाकी कामों की तरह , और ये जितना कमाई वाला है उतना ही जोखिम वाला भी। ये भी याद रखना ज़रूरी है कि अपराधी बेशक जनसंख्या का पांच प्रतिशत हों , उनके कारण कितने लोगों की रोज़ी रोटी चलती है। पुलिस वकील न्यायपालिका सब का काम अपराध के सहारे चलता है। अपराधी अपराध छोड़ देंगे तो ये सब क्या करेंगे। फिर भी हम नेता अदालत का सम्मान करते रहे हैं करते रहेंगे। जल्दबाज़ी में कोई फैसला लागू नहीं किया जाना चाहिए , इस युग में ढूध का धुला कोई नहीं है। मगर हम सभी को घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है , चुनाव आयोग किसी के चुनाव लड़ने पर क्या रोक लगायेगा , जब संविधान के अनुसार कभी किसी विधानसभा के विधायक अपना नेता तक चुनने को आज़ाद नहीं हैं। हर नेता खुद इक बंधुआ मज़दूर की तरह है , आलाकमान का हुक्म सर्वोपरि है। क्या किसी अदालत को ये अलोकतंत्र दिखाई नहीं देता , हम छोटे अपराधी हैं किसी जुर्म में आरोपित हैं , जो देश के संविधान को बंधक बनाये हुए हैं , विधायकों सांसदों को अपनी मर्ज़ी से नेता तक नहीं चुनने देते उनका अपराध क्या है। कोई जनहित याचिका ऐसे अनुचित लोकतंत्र विरोधी फैसलों पर क्यों नहीं दायर की जाती। चलो इक नया नया शेर सुनाता हूं :-
                       मतलूब सब हाकिम बने , तालिब नहीं कोई यहां ,
                       कैसे बताएं अब तुम्हें कैसी सियासत बन  गई ।
                     चुनाव आयोग और न्यायपालिका को सब से पहले संविधान और लोकतंत्र की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए। हम लोग अपराधी थे , शायद अब अपराध छोड़ चुके हैं , जो खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं , जनता के निर्वाचित प्रितिनिधियों से इतर किसी को मनोनयन से सत्ता पर बिठाना , उन को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए। कठपुतलियों का शासन लोकतांत्रिक नहीं है।
    लो इक ताज़ा खबर , सर्वोच्च न्यायालय सुझाव देता है , आप सभी पक्ष बाहर मिल बैठ समझौता कर लो , अगर ज़रूरत हो हम मध्यस्थ बनने को राज़ी हैं। वाह ! देश की सुप्रीम कोर्ट अब न्याय नहीं समझौता करवायेगी। इसका अर्थ क्या है , आपको क्यों सब को राज़ी करना है , आप न्याय करें। इतने साल तक सब आपकी तरफ देख रहे थे न्याय की खातिर। अब न्याय होगा या किसी गांव की पंचायत की तरह फैसला। नेताओ डरने की कोई ज़रूरत नहीं हमें भरोसा है कोई अदालत हम में किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ऐसे न्यायधीश होते थे कभी गुज़रे ज़माने में जो तब की प्रधानमंत्री के चुनाव तक को अवैध करार कर देते थे। इंसाफ आजकजल नहीं होता , बस समझौते की राह देखते हैं।  सच कहना अपराध है , अवमानना है।
                     

Monday, 20 March 2017

ग़ज़ल 220 ( खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ,
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में ,
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये ,
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।
( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई ,
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा ,
देखो किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।  

Sunday, 19 March 2017

सर्वेक्षण सेल्फी और पति की कीमत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

सर्वेक्षण इक कारोबार है , सर्वेक्षण केवल चुनावों के ही नहीं किये जाते। जिनका धंधा है सर्वेक्षण करने का , कोई उन से जो चाहे सर्वेक्षण करवा सकता है। कोई भी सर्वेक्षण मुफ्त में नहीं होता , इस धंधे में कोई भाईचारा काम नहीं आता। एक हाथ दो दूसरे हाथ लो का नियम है , घाटे का व्योपार यहां नहीं होता। इधर दो बातें प्रचलन में हैं इक सेल्फी लेना दूसरी ऑनलाइन बेचना खरीदना। नई क्या पुरानी हर चीज़ बिकती है , किसी ने चेतावनी दी कि आपकी धर्मपत्नी आपकी फोटो ले रही हो तो संभल जायें , कहीं ऐसा नहीं हो कोई ओ एल एक्स पर मोलभाव कर रहा हो। आपको खबर तक नहीं हो और आपका सौदा तय हो चुका हो। पति अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगाते रहे हैं ये इतिहास पुराना है। कुछ साल पहले इक फिल्म में सहनायिका नायिका से उसके शादीशुदा पति का सौदा दो करोड़ में कर लेती है। सहसा यकीन नहीं होता , अपने पति परमेश्वर को बेच सकती कोई पत्नी खुद सौतन ला सकती घर। मगर पता चला फिल्मों से प्रेरित होकर जाने लोग क्या क्या नहीं करते। इक कंपनी जो सर्वेक्षण करवाती है को लगा ये नया आईडिया उसको खूब लोकप्रिय कर सकता है , और उस ने हमसे इक गोपनीय तरीके से ये सर्वेक्षण करने को कहा। हमने भी गोपनीयता की शपथ खाई सर्वेक्षण में शामिल हर महिला के सामने कि बंद लिफ़ाफ़े बिना नाम इक मतपेटी में डलवा बाद  में खोलने हैं।  सारे लिफ़ाफ़े एक जैसे होंगे ताकि हम भी न जान पायें किस का कौन सा लिफाफा है।
          अभी तक हम सर्वेक्षण कर चुके थे , फैशन , उत्पाद का रंग , पैकिंग , नाम को लेकर। इक कंपनी ने सर्वेक्षण करवाया और अपना नाम तक बदल लिया जो लोगों को बेहतर लगा रख लिया। आजकल लड़का लड़की क्या पसंद करते विवाह करने के अवसर पर , इक महिलाओं की पत्रिका ने ये भी सर्वेक्षण करवाया था। ये नहीं बताया जा सकता कौन कौन शामिल था और किस तरह संपर्क किया गया , मगर सर्वेक्षण बेचने वाली और खरीदार दोनों तरह की महिलाओं को मिलकर किया गया। बंद लिफाफों में क्या क्या क्या मिला सुन आप चौंक जाओगे। कुछ बातें जो निकली कुछ इस तरह की हैं। किसी ने सवाल लिखा था भला कोई करोड़पति महिला शादी ही क्यों करना चाहेगी , करोड़पति को पति की क्या ज़रूरत। फिर भी लेना होगा तो नया ही लेगी उपयोग किया सेकंड हैंड पति तो हर्गिज़ नहीं। दस लाख में डॉक्टर बीस में इंजीनियर पचास  में आई पी एस और एक करोड़ में आई ए एस बिकता है , इस से ऊंचे दाम में उद्योगपति क्या नेतापुत्र मिलते हैं। और अगर कोई फ़िल्मी नायक जैसा ईमानदार है तो आधे दाम भी कोई क्यों लेगी। मोल चुकाना है पूरा तो नया ही पसंद करेंगे , किसी का इस्तेमाल किया क्यों। फर्नीचर पंखें किताबें खरीद लेते सस्ती मिलती जब लगती नई सी हों।
इक और के विचार यूं भी पढ़ने को मिले , मेरा पति ईमानदार भी नहीं है , वेतन से दोगुनी ऊपरी कमाई है , ठीक ठाक काम भी देता ही है , फिर भी दो करोड़ क्या कोई एक करोड़ में खरीदना चाहती हो तो मौका नहीं गवाउंगीं। मैं व्योपारी पिता की होनहार समझदार बेटी हूं , जानती हूं पिता भी खुश होंगे जब पता चलेगा दो लाख में खरीद लाये जिसको पांच साल बरत कर भी करोड़ में बिक भी गया।
           तीसरी और आगे निकल गई , लिखती है मुफ्त में भी कोई नहीं लेगा इस निकम्मे को। जब से शादी की मैं खिला रही कमाकर। मेरी कमाई को शराब में उड़ाता है और पीकर मुझे ही पीटता भी है , ऐसे से पिंड छूटे तो चैन से रहूंगी अकेली। बहुत सारी पत्नियों ने लिखा क्यों ऐसा मज़ाक करते हैं , कोई और भला इसको पसंद करेगी।  मैं ही पागल थी जो फंस गई इनके जाल में , ये भी जानते हैं दूसरी कोई नहीं मिल सकती तभी मेरी उंगलियों पे नाचते हैं। इक और ने इतना ही लिखा था , काश ऐसा हो सकता। मेरा ऐसा नसीब कहां।

Friday, 17 March 2017

मीठा ज़हर , शब्दों का उलटफेर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आप कितना कमीशन लोगे  , आपको इतनी छूट देंगे , साथ में अमुक उपहार मिलेगा , इस  में आपको मुफ्त में और बहुत फायदा भी मिलेगा। ये सब बातें एक जैसी ही हैं , बेचने खरीदने की बात है। प्रलोभन देना कोई उचित कार्य नहीं होता , सीधे हाथ नहीं निकलता घी तब चालाक लोग समझदारी से टेड़ी उंगली से निकाल लेते हैं। समस्या ये है कि सब बेईमान खुद को ईमानदार कहलाना चाहते हैं , गुड़ खाना गुलगुलों से परहेज़ करना जैसी बात है। कभी सोचा है देश में जितने भी घोटाले हुए हैं , किसी ने किसी को साफ बोला होगा कि मंत्री जी आप हमें ये दिलवा दो हम आपको इतने करोड़ की घूस देंगे। नहीं , ऐसा कहा जाता होगा इस काम में आपको मुनाफे से इतना दिया जायेगा। इधर ऐसे अनुचित अनैतिक कामों को लोग प्रोफेशन बताने लगे हैं जो पाप को पुण्य , झूठ को सच , अधर्म को धर्म घोषित करना है। हालात इस सीमा तक खराब हैं कि लोग मानते हैं सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है। छोटा क्लर्क थोड़े में , बड़ा बाबू कुछ ज़्यादा में , अफ्सर ऊंचे दाम में , मंत्री मुंह मांगी कीमत में बिकते हैं। बड़ा जूता ज़्यादा पोलिश खाता है , चपरासी तक सब को समझाता है। मुझे अगर कोई आकर कहे आप मेरे पास ग्राहक भेजने की कितनी कमीशन लोगे तो मेरा दिल चाहेगा उसको झन्नाटेदार झापड़ रसीद करना। मुझे अपमान लगेगा जब कोई मेरी कीमत लगाना चाहेगा , मुझे मेरे ज़मीर को सिक्कों में तोलना चाहेगा। मुझे जब कोई डॉक्टर बताता है कि जिस की दुकान  में बैठ मरीज़ देखता था उस से दवा और जांच को लिखे टेस्ट से हुई आमदनी से कमीशन लेना बाकी है , और कोई झगड़ा नहीं है , तब समझ नहीं आता ये क्या है। इस तरह तो चोर का थानेदार को आधा हिस्सा देना भी अपराध नहीं आपसी भाईचारा है। सुनते थे सब से बहुमूल्य वस्तु या इंसान वो होता है जिस की कोई कीमत नहीं लगा सकता , जो आपको कितनी बड़ी राशि चुकाकर भी मिल नहीं सके। जो बिकाऊ नहीं है। लोग सिर्फ पैसे से ही नहीं बिकते , कुछ को धन दौलत या महंगा उपहार नहीं कोई सम्मान कोई ओहदा कोई तमग़ा चाहिए होता है। उनको इनाम पुरूस्कार से खरीद सकते हैं , सरकार और नेता बहुत लोगों को लाभ देकर खामोश करवाते हैं। जब कोई प्रशासन से आर्थिक फायदा भी लेता है और आलोचना भी करता है तब अधिकारी उसको बुलाकर साफ कहता है ये नहीं चलेगा। खाओ भी गुर्राओ भी। शायद इस से अपमानजनक गाली कोई नहीं हो सकती , मगर लोग हैं यही करते रहते हैं लाज शर्म छोड़कर। कभी लोग कहते हैं हमारे बारे जो बिना किसी स्वार्थ कड़वा सच लिखते हैं , आप प्रैक्टिकल नहीं हैं। आपको चुभने वाले शब्द नहीं उपयोग करने चाहिएं , थोड़ा लिहाज़ कर सभ्य ढंग से काला नहीं सांवरा सलौना लिखा जा सकता है।

Tuesday, 14 March 2017

लाठी भैंस को ले गई ( हास्य कविता ) भाग तीन - 23 - डॉ लोक सेतिया

भैंस मेरी भी उसी दिन खेत चरने को गई ,
साथ थी सारी बिरादरी संग संग वो गई।
बंसी बजाता था कोई दिल जीतने को वहां ,
सुनकर मधुर बांसुरी  सुध बुध तो गई।
नाचने लग रहे थे गधे भी देश भर में ही ,
और शमशान में भी थी हलचल हो गई।
शहर शहर भीड़ का कोहराम इतना हुआ ,
जैसे किसी तूफ़ान में उड़ सब बस्ती ही गई।
तालाब में कीचड़ में खिले हुए थे कमल ,
कीचड़ में हर भैंस सनकर इक सी हो गई।
शाम भी थी हुई सब रस्ते भी बंद थे मगर ,
वापस नहीं पहुंची भैंस किस तरफ को गई।
सत्ता की लाठी की सरकार देखो बन गई ,
हाथ लाठी जिसके भैंस उसी की हो गई।
 

Sunday, 12 March 2017

बोलना भी है मना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

बोलना मना नहीं है मगर आपको वही कहना होगा जो हम चाहते सुनना। किस्से अलग अलग हैं एक ही समय की बातें हैं और सभी मतलब एक जैसा ही नहीं एक समान ही है। घर से शहर के सरकारी दफ्तर से शुरू हुई बात राज्य की राजधानी होती हुई देश की सरकार तलक जा पहुंचती है। जिस बात पर मुझ को लताड़ मिलती है , और कोई काम नहीं आपको सरकार और प्रशासन की कमियां ढूंढते रहते हैं , वही बात जब टीवी पर कोई कहता है तो पसंद की जाती है। पूछ लिया ये वही बात तो है , जैसा मैं कह रहा था , जवाब मिलता है उनकी बात और है वो चर्चित लेखक नाम शोहरत दौलत और देश भर में पहचान है। तुम कहां वो कहां। मुझे मेरी औकात समझा रहे हैं , अब समझा बात सही या गलत अथवा उचित अनुचित की नहीं है। छोटा मुंह बड़ी बात का मामला है। पहले अपना कद अपना रुतबा ऊंचा करूं तब बड़े लोगों की वास्तविकता पर बोल सकता हूं। बोलना मना है।
                    महिला दिवस पर शहर के प्रशासनिक अधिकारी सब काम छोड़ ऑफिस में एक साथ बैठे टीवी पर उस सभा का सीधा प्रसारण देख रहे हैं जिस में दूसरे राज्य के इक नगर में प्रधानमंत्री जी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण देना है। यही सब से ज़रूरी काम है बाकी प्रशासनिक कर्तव्य अनावश्यक हैं। उसी आयोजन में भाग लेने ज़िले के एक बड़े अधिकारी गये हुए हैं साथ इक महिला ज़िले के इक गांव की सरपंच कार्यक्रम में व्याख्यान देने गई हुई हैं। सीधा प्रसारण हो रहा है , अचानक इक महिला अपना विरोध जताना चाहती है प्रधानमंत्री जी को मिलकर बताना चाहती है कि उनका पी एम ओ बार बार निवेदन करने पर भी उसके गांव की समस्या सुन नहीं रहा है। मगर उस महिला को महिला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में महिला दिवस के दिन बलपूर्वक सुरक्षाकर्मी बाहर निकाल देते हैं। इक प्रधानमंत्री जो खुद को जनता का सेवक बताता है भूल जाता है उसने शपथ ली थी सब से न्याय की और सब के मौलिक अधिकारों की रक्षा की। देश भर के मीडिया वाले इस आपराधिक तमाशे को ख़ामोशी से देखते हैं , बस हंगामे की तस्वीर लेते हैं। कोई सवाल नहीं करता अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता का , न ही याद दिलाता है प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा आये दिन सोशल मीडिया पर अपने अच्छे कामों का बखान करते रहने का , ऐसा सच छुपाया जाता है कोई नहीं जान पाता। सच बोलना मना जो है।
             एक और भी पक्ष है जिसको तथाकथित स्वतंत्र मीडिया न खुद देखना चाहता है न किसी को दिखाना चाहता है। सरकारी विज्ञापनों की हड्डी मिलती रहती है जुबां सिल जाती हैं आंखें मोतियाबिंद की शिकार हो जाती हैं। काश आज कोई इनको पत्रकारिता का पहला सबक फिर से पढ़वा याद करवाये , जिस में समाचार की परिभाषा लिखी हुई है जो भूल गये हैं सब पत्रकार। खबर वो सूचना है जिसे कोई छुपा रहा जनता से और पत्रकार को उसका पता लगाकर खोजकर जन  जन तक पहुंचना है। पीत-पत्रकारिता किसे कहते हैं ये भी समझना होगा , क्या मीडिया पीलियाग्रस्त है आज , सोचना होगा। खबर क्या है , जो सामने है शहर की गली गली गंदगी आवारा पशु हर सड़क पर और झुग्गी झौपड़ी वालों की मज़बूरी खुले में शौच को जाने की , अथवा प्रशासन का झूठा दावा स्वच्छता अभियान और शहर को खुले में शौच और आवारा पशुओं से मुक्त करवा चुके हैं का एलान। इतना ही नहीं बिना किये ही इन सब के लिए किसी बड़े अधिकारी का सम्मानित और पुरस्कृत होना। इक आडंबर एक छल एक धोखा हर योजना के साथ यही खेल। बस इक चलता फिरता शौचालय सड़क किनारे खड़ा कर दिया नाम को , हज़ारों लोग जिन के पास शौचालय नहीं क्या हर दिन कई किलोमीटर चलकर आ सकते हैं बच्चे महिलायें भी। सच सब देखते हैं जानते हैं बोलना मना है।
                         इधर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राज्य में सरकार और विपक्ष मिलकर समारोह में शामिल होते हैं। पूर्व में मंत्री रही महिला आज की इक मंत्री महिला पर तंज कसती हैं , आप बोलोगी महिला अधिकार पर जिनके नाम पर सब काम काज उसके पति परमेश्वर देखते हैं। खुद कठपुतली हो पति के हाथ की और महिलाओं को सक्षम बनाने की बात करोगी भी कैसे। तू-तू मैं-मैं की तकरार में महिला खुद महिला को नीचा दिखाती है। ये सच किसी से भी छुपा नहीं है कि राजनीति में महिला प्रवेश करती है तो किसी पुरुष का सहारा लेकर , पति पिता भाई सास ससुर नहीं तो कोई प्रेमी ही सही। यही इतिहास है , राजनीति खुद ऐसी औलाद है जिस को पता ही नहीं उसको पैदा किस ने किया। सत्ता रुपी माता को तो पहचानते हैं सब राजनेता , जिस कर्तव्य रुपी पिता के कारण जन्म हुआ उसका नाम तलक कोई नहीं जानता। सच ही कहा जाता है कि राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के दो सब से पुराने धंधे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। मगर आज की वैश्या भी खुद को राजनेता से अच्छा मान सकती है खुद अपना जिस्म बेचती है ईमान नहीं। राजनेता खुद अपना ज़मीर ही नहीं बेचते देश तक को बेच सकते हैं। और देश के संविधान की इस्मत को रोज़ तार तार करते हैं , मगर सर्वोच्च अदालत लताड़ लगाये तब भी शर्मिंदा नहीं होते। पिछले पंचायत चुनाव में जब शिक्षा का नियम लागू किया गया तब आज तक सरपंच बनते रहे लोग अपने अनपढ़ पुत्र के लिये आनन फानन में पढ़ी लिखी लड़की ढूंढ उसको बहु बना लाये चुनाव से पहले। गांव में बियाह कर आई नई नवेली बहु को गांव वालों ने अपना सरपंच चुना क्योंकि वही सब से काबिल समझी गई गांव का भला करने को। पंचायत में आरक्षण लागू करने वाली किसी सरकार ने संसद में इसको लागू नहीं किया न ही अपने दल में ही इक तिहाई महिलाओं को खड़ा किया चुनाव में।  मगर बिना आरक्षण मांगे सभी दल वालों ने इस बार पांच राज्यों के चुनाव में एक तिहाई से अधिक आपराधिक छवि वाले बाहुबली लोगों को अपना प्रत्याशी बनाया , हत्या बलात्कार , अपहरण के दोषी सब को लोकप्रिय दिखाई दिये जो जीत सकते हैं और उनको बहुमत दिलवा सकते हैं। महिला सशक्तिकरण हो न हो राजनीति में अपराधी काम नहीं होने चाहियें ऐसा सब मानते हैं। अपराध क्या है , गरीब जो भी विवशता में करता गुनाह है , नेता अफ्सर और धनवान वही चोरी अपने को अमीर बनाने को करते हैं तो उसको देश और समाज की सेवा घोषित किया जाता है। न्याय और कानून सब के लिए एक समान कहां हैं। मगर चुप रहो कहीं किसी अदालत की अवमानना नहीं हो। वो अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये , हाथ अगर उसका छुवें आप तो वो दंगा है। राजा नंगा है। बोलना अपराध है , मना है बोलना।
            मुझे इक लेखक मित्र का फोन आया कौन कौन शामिल होगा राज्य की राजधानी में साहित्य अकादमी के तीन दिवस के हरियाणा साहित्य संगम नाम के आयोजन के कार्यक्रम में।  पूछा कब है , हमें तो जानकारी नहीं है , यूं भी खुद को साहित्यकार का तमग़ा लगाना कभी ज़रूरी समझा ही नहीं। जाने क्या सोचकर थोड़ी देर बाद अकादमी के दफ्तर में फोन किया और जो बात कर रहे थे उनसे इस बारे पूछा। मैं कौन बोल रहा पूछा उन्होंने और कहने लगे आपको निमंत्रित करना कैसे भूल गये निदेशक जी , आप मुझे अपना व्हाट्सऐप नंबर दो अभी भेजता आपको निमंत्रण। मैंने सवाल किया आप जानते हैं मुझे , जवाब मिला आपकी भेजी रचनाओं से मेलबॉक्स भरा हुआ है , क्या कमाल लिखते हैं बेबाक और निडरता पूर्वक। धन्यवाद आपको पसंद आया मेरा लेखन , यही कहना ही था।  निमंत्रण भेजने की बात को टाल दिया ये कहकर आपने खुद जब आने का आग्रह किया है तो वही बहुत है निमंत्रण पत्र की औपचारिकता की ज़रूरत नहीं , आना होगा तो बिना निमंत्रण पत्र भी चला आऊंगा। कार्यक्रम उन लेखकों की खातिर हर साल आयोजित किया जाता है जिनको सम्मान या पुरुस्कार देने होते हैं।
                                      मेरे शहर में कई साल पहले इक प्रशासनिक अधिकारी ने अपने समकक्ष इक और राज्य के अधिकारी से मिलकर इक आयोजन किया था। जिस में दो राज्यों की साहित्य अकादमियों का संगम हुआ था मगर उस में वास्तविक ध्येय उन दो अधिकारियों को महान साहित्यकार घोषित किये जाने का हुआ। हम इस राज्य और शहर के लेखक मात्र दर्शक और श्रोता बनकर शामिल हुए। ठीक समय पर मेरे शहर के अधिकारी ने मुझसे पूछा क्या आप को भी मंच पर स्थान चाहिए और अपनी रचनायें सुना सकते हैं। मैंने कहा महोदय आप जानते हैं मेरे साथ कुछ और भी स्थानीय लेखक मित्र हैं , मैं इस तरह अकेला ऐसा नहीं कर सकता , फिर भी आप कहो तो दो और लेखक साथ के शहर से आये हुए हैं आपके बुलावे पर आप उनको तो अवसर दे सकते हैं। उस आयोजन में उनको सम्मानित किया गया या यूं कहना होगा उन्होंने खुद को सम्मानित करवाया था , क्योंकि हमारे साहित्यिक मंच को भी उनको इक प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिन्ह देने का उनका अनुरोध हम ने स्वीकार किया ही था। उस दिन की बात मैंने इक कविता में लिखी थी। जो  कुछ इस तरह है , इक लेखक को सम्मानित किया सरकार ने और उनको पुरुस्कार के साथ इक सवर्ण जड़ित कलम भी भेंट की गई। जब कभी वो गरीबों की बात लिखना चाहते उनका हाथ कांपने लगता , शायद ऐसे किसी डर से या न जाने क्यों उन्होंने वही कलम मुझे भेज दी शुभकामना के साथ। मैं देखा उस कलम को जिस में मुझे लाल रंग की स्याही में दिखाई दिया लहू गरीबों का जिन के कल्याण की राशि से ऐसा आयोजन हुआ था। जब वो अधिकारी जाने लगे शहर से तबादला होने से , तब उन्होंने मुझे बुलवाया था ऑफिस में और इक चैक दिया था इस निर्देश के साथ के इस पैसे से हमारी संस्था इक कार्यक्रम आयोजित करे जिस में उनको मुख्य मेहमान बनाकर आमंत्रित किया जाये। वो चैक नहीं लिया था मैंने जो रेडक्रोस फंड से दिया जा रहा था हर किसी को जबकि उसका उपयोग किया स्वास्थ्य सेवाओं पर जाना चाहिए।
            सत्ता मिलते ही सत्ताधारी नेता अपने चाटुकार लोगों को साहित्य अकादमी , महिला आयोग , मानव अधिकार आयोग , नगर की समितियों आदि सब जगह पर नियुक्त करते हैं। और इस में भेद भाव नहीं करने या निष्पक्षता की ली शपथ कहीं उलझन नहीं बनती है। सत्ता का दुरूपयोग केवल योजनाओं का पैसा अपना घर भरने को उपयोग करना नहीं है। हर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री विधायक सांसद कल्याण राशि का सच जनता है। अव्यवस्था इस युग की व्यवस्था है। मगर ये बोलने पर सख्त मनाही है। 

काश सत्ता पाने जैसा प्रयास जनसेवा को भी किया जाता ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

सब ठीक ठाक हो गया , वरमाला उन्हीं के गले में पहना दी। फिर भी वही पुराना डर मन में इस बार भी है। आज़ादी के बाद से सभी यही वादा करके उनसे भाग्य विधाता बनते रहे हैं कि हम अपने सुख की खातिर नहीं आये तेरे द्वारे पर बरात लेकर , हमारा मकसद तो तुझे मालिक बनाना है , सब कष्ट मिटा हर ख़ुशी तुझे देना चाहते हैं। काश जितनी कड़ी मेहनत नेता चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने को करते हैं , उतनी जनता की समस्याओं को दूर करने को करते तो आज कोई समस्या बाकी ही नहीं होती। मगर वो क्या करे बोल भी नहीं सकती ऐसे बंधन में जकड़ी गई है खुद ही बार बार। ये अजब रिवायत है उसकी दशा द्रोपती से भी खराब है , घूंघट में दुल्हन और चेहरा छुपाये दूल्हा , बाद में कोई और तय करेगा किस के नाम की वरमाला पहनाई थी। इक हरियाणवी कथा भी है दुनिया में बेबस दो ही हैं एक कन्या और दूसरी गाय , कन्या का पिता जिस को चुनता है उसकी हो जाती चुप छाप , और गाय का मालिक जिस के हाथ रस्सी दे देता उसी के साथ चल देती। जनता क्या है गरीब पिता की बेटी या गाय , शायद दोनों। सोचने लगी पूजा अर्चना तो मैं भी हर दिन करती रही फिर भी मेरी विनती कभी किसी भी भगवान देवी देवता खुदा यीसु वाहेगुरु ने स्वीकार नहीं की। सत्तर साल से बदहाली में जीती रही हूं , और ये बड़े बड़े नेता लाखों करोड़ों रूपये खर्च कर जो पूजा हवन आदि करते , करोड़ रूपये का चंदन मंदिर में दान दे आते सत्ता मिलते ही , उनको सब देता रहता भगवान भी। पूछूंगी इन से आप भ्र्ष्टाचार मिटाने की बात करते हैं , क्या भगवान भी धनवान की सुनता है। गरीब कहां से लायें इतना पैसा जिन को दो जून रोटी भी नसीब नहीं होती। मगर तीन साल से देश की जनता खामोश है , उसे भी अगले पांच साल इसी तरह चुप रहना है। खुद वरमाला डाली है तो फिर जैसा भी है उसका सम्मान करना है , उसका निरादर करना घोर अपराध है। वो अगर निरादर भी करे तब भी उसको अधिकार है , मुझे सहना है। मैं धरती हूं सब सहना जानती हूं , ये आकाश की तरह हैं आज़ाद हैं , आकाश क्या है इक सीमा मात्र है नज़र की। जाने ये कैसे लोग हैं जो जानते हैं इस सच को कि आखिर आदमी को  दो गज़ ज़मीन ही मिलती है। बहादुर शाह ज़फ़र जैसे बादशाह को अपने वतन में वो भी नहीं मिली इसी का ग़म था उनको। हर शासक और अधिक की चाह में दौड़ता रहता है।

Tuesday, 7 March 2017

टुकड़ों में बंटी औरत की कहानी के टुकड़े ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 

महिला की भावना को लेकर और भी बहुत कुछ कविता कहानी ग़ज़ल या बाक़ी सभी विधाओं में लिखा है मैंने अभी तलक। लेकिन आज जब चाहा लिखना कुछ महिला दिवस पर तब समझ नहीं पा रहा किस पर लिखूं मैं , हज़ारों साल से दुनिया की महिलाओं की कहानी एक ही थी जो आज जाने कितने टुकड़ों में बंट चुकी है। मालूम नहीं किस ने किया ऐसा , मगर ऐसा हो चुका है। टीवी पर कुछ महिलाओं की चर्चा हुई जिन्होंने खुद अपने दम पर कई बड़े और हैरान करने वाले काम किये हैं। फिर उनसे उस महिला से मिलवाने की बात हुई जो विश्व सुंदरी है या सिनेतारिका है या उस से जो किसी धनवान की पत्नी है और पैसे से कोई एन जी ओ चला शोहरत हासिल करती है। एक तरफ आम गांव की महिला है जो सरपंच चुनी जाती है और बाक़ी समाज को अपने बूते कुछ विशेष कर दिखाती है , तो दूसरी तरफ वो है जो आज भी बिना पति की दौलत कुछ भी नहीं है। फिर भी उसी को बड़े बड़े इनाम पुरुस्कार और पहचान मिलती है। ऐसी ही महिलाओं में कुछ और नाम भी शामिल हैं , जो खुद अपनी प्रसव पीड़ा किसी और महिला को सहने को मनाती हैं बहुत सारा धन देकर। औरत जब धनवान बन जाती है तब वो भी दूसरी औरत की मज़बूरी या ज़रूरत को खरीदती है। वो भी महिलाएं हैं जो खुद पढ़ लिख कर नौकरी करती हैं और साथ में घर और बच्चे भी संभालती हैं , वो मात्र इक संख्या हैं अपने पैरों पर खड़ी महिलाओं की गिनती में। समाज में उनका योगदान कभी चर्चा में नहीं रहता भले चर्चा आयोजित भी कोई टीवी की चर्चित महिला ही करती हो। मॉडल और फ़िल्मी नायिका सौन्दर्य प्रसाधनों का प्रचार करते हैं करोड़ों लेकर , और इक झूठा सपना आम औरत को दिखलाते हैं सुंदर बनने का। अपने बदन अपनी नग्नता को बेचती हैं कुछ महिलाएं विज्ञापन के लिए बिना समझे कि उनका ऐसा करना केवल उनका अधिकार नहीं है , ऐसा करके वो महिला को इक वस्तु बना रही ही नहीं समाज की मानसिकता को औरत के प्रति विकृत भी करती हैं। आज आठ मार्च को ये सभी महिलाएं जश्न मनाएंगी नाचेंगी झूमेंगी और सज धज कर किसी आयोजन में शामिल होंगी। मगर देश की महिलाओं जिनको आधी दुनिया कहते हैं का आधा भाग वो महिलाएं जो किसी के घर खाना बनाती हैं , किसी के घर या दफ्तर में सफाई या और छोटे मोटे काम करती हैं , जो मज़दूरी कर पेट पालती हैं , या जो किसी बस्ती में रहती हैं गंदगी भरे माहौल में , उन्हें पता ही नहीं होगा आज कोई ख़ास दिन है।

          पर हर चीज़ की कहानी जब लिखी जाती है तब बताया जाता है सालों पहले क्या था और कैसे कैसे बदलाव होते आज क्या है। कहां से कहां पहुंची किसी की कहानी , जिस तरह इंसान बंदर से बदलते बदलते आदमी बन गया। इस तरह जब सोचा तो समझ आया युग के साथ क्या बदलाव हुआ नारी जगत में। नानी से शुरू करते हैं अधिक पुरानी बात नहीं है। नानी या दादी माना घर में रहती थी मगर उनको पराधीनता का आभास शायद ही होता था , अधिकार से बात करती थी और परिवार के पुरुष भले खुद को मर्द होने से धन दौलत और कारोबार का मालिक समझते हों , मां बहन भाभी चाची मौसी से आदरपूर्वक ही पेश आते थे। उनकी हालत इतनी भी खराब नहीं थी जितनी बाद में होती गई। मां का समय बदल गया था और समाज में औरत आगे बढ़ना चाहती थी कुछ करना चाहती थी। बहुत मुश्किल से कुछ काम उसके हिस्से आते थे जो उसको किसी न किसी पुरुष की अनुमति से किसी पुरुष के अधीन रहकर ही करने होते थे। मगर इन महिलाओं ने ही संघर्ष किया और अपनी बेटियों को और संघर्षशील बनाया भी। लेकिन जब महिलाओं की प्रगति की चर्चा की जाती है तब इनकी बात हाशिये पर होती है। अध्यापिका क्लर्क या नर्स अथवा थोड़ी सी जो डॉक्टर भी बन सकीं अपनी मेहनत और काबलियत से। इस से अधिक विडंबना की बात उनकी है जो महिला जगत का आधे से अधिक भाग होकर भी उपेक्षित हैं। उनको जाकर कोई बताता तक नहीं कि तुम भी हम जैसी औरत ही हो।
        शायद देखने को दस बीस प्रतिशत महिलाओं को बहुत कुछ समानता का अधिकार मिला है , मगर अधिकतर या बड़ी संख्या उनकी है जिन को समानता का हक तो क्या जीने का अधिकार भी नहीं हासिल है। बेशक कितनी प्रगति की महिलाओं ने तब भी आप हर महिला अकेली है डरी सहमी और असुरक्षित है , पर महिला दिवस पर इसकी बात नहीं होती। इक गीत लता जी का गया रुलाता है , औरत ने जन्म दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया। आज खुद औरत जब औरत को बाज़ार में लेकर आई है तब कौन क्या कहे और किस से जाकर कहे।  बात महिला की समझनी भी महिला को , मैं पुरुष बीच में क्या कर रहा हूं। 

Monday, 6 March 2017

इस तरह महिला दिवस मनाया गया ( व्यंग्य-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

हर साल शहर की महिलाओं का संगठन आठ मार्च को महिला दिवस मनाता ही है , जिस में शहर के सब से वरिष्ठ अधिकारी की धर्मपत्नी और विधायक और सांसद की पत्नियां मुख्य अतिथि होती हैं अध्यक्षता करती हैं। उनको महीना भर पहले से अनुरोध करना पड़ता है ताकि वो सभी उस दिन उपस्थित रहकर सभा की शोभा बड़ा सकें और महिलाओं का मार्गदर्शन कर सकें। इस बार भी ऐसा ही दोहराया गया और बड़े अधिकारी से मिल उनकी धर्मपत्नी को अध्यक्षता करने की विनती की गई। अधिकारी प्रशासनिक कार्य करने के साथ साथ लेखन का कार्य भी करते हैं और उन्होंने कहा आप बतायें हर साल आप कैसे मनाती हैं महिला दिवस। उन्हें बताया गया उस दिन सब शिक्षित और धनवान घर की महिलायें एकत्र होती हैं किसी जगह और महिलाओं के अधिकारों और उनकी समस्याओं पर भाषण दिये जाते हैं सुनकर तालियां बजाई जाती हैं। सब बन ठन कर आती हैं और कई तरह से मनोरंजक खेल खेले जाते हैं , सौंदर्य प्रतियोगिता , फैशन और कैसे खुद को फिट रखती हैं पर विमर्श किया जाता है। शहर में सब से सुंदर महिला का ख़िताब दिया जाता है और विवाहित महिला होकर भी खुद को बेहद आकर्षक बनाये रखने वाली महिला को सम्मानित किया जाता है। गीत संगीत होता है नाच गाना होता है और शीतल पेय से शुरू होकर स्वादिष्ट भोजन कई प्रकार का परोसा जाता है , अंत में चाय कॉफी और स्मृति चिन्ह मिलते हैं सभी महिलाओं को। इस तरह उस दिन महिलायें केवल मौज मस्ती करती हैं दिन भर और साबित किया जाता है कि आज की महिला जागरुक है और किसी भी तरह पुरुष से कमतर नहीं है।
                                         अधिकारी को सब समझ आ गया और उसने कहा ये तो बहुत अच्छी बात है , पर क्या मैं भी उस आयोजन में शामिल होकर कुछ नया और सार्थक प्रयास कर सकता हूं। मैं चाहता हूं इस बार प्रशासन ये सब प्रबंध शानदार तरीके से करे और किसी बड़े मंत्री की पत्नी को भी आमंत्रित किया जाये। महिला संगठन इस पर राज़ी हो गया तो अधिकारी ने इक आग्रह और किया कि क्यों नहीं इस बार हम मिलकर समारोह तीन दिन पहले करें और आठ मार्च को उन महिलाओं से मिलकर उनके लिये कुछ सार्थक किया जाये जिन को शायद पता ही नहीं रहता किस दिन महिला दिवस है। इस तरह निर्णय हो गया तीन दिन पहले ही महिला दिवस मनाने का। और सब जैसा हर साल होता था उसी तरह और भी शानदार ढंग से किया गया , सारा प्रबंध भी प्रशासन ने किया और आलीशान बैंकट हाल में। आखिर में अध्यक्षीय संबोधन में अधिकारी ने प्रस्ताव रखा कि जो महिलायें आपके हमारे घरों में काम करती हैं उस दिन उनका अवकाश रख उनको महिला दिवस का उपहार दिया जाये , जो महिलायें मज़दूरी करती हैं उनको उस दिन छुट्टी देने की खातिर हम में से जो महिलायें सुख सुविधा से जीती हैं इक दिन उनका काम उनकी जगह करें। बोझ उठाना खेत में काम करना इंटें उठाना मिट्टी गोबर का काम करना , किसी ऑफिस की सफाई करना जैसे जितने भी काम उनको साल भर बिना अवकाश करने होते हम करें ताकि उनकी दशा हम समझ सकें। अधिकारी ने मंच से ही पूछा सभी बतायें क्या उस दिन वो ये करने को राज़ी हैं। सब ये सुनकर अचंभित भी थीं मगर दिखावे को सब ने हामी भी भर दी तालियां बजाकर। और घोषणा हो गई आठ मार्च को सुबह ही फिर से उसी जगह एकत्र होने की ताकि अधिकारी के बताये हुए स्थान पर जाकर सब अलग अलग अपना दायित्व निभा महिला दिवस को सार्थक बना सकें। आज महिला दिवस है मगर कोई भी महिला मंच की महिला आई नहीं है , सब ने कहलवा दिया है व्यस्त होने के कारण उपस्थित नहीं हो पाने की क्षमाप्राथी हैं। इस तरह देश की अधिकतर महिलाओं की तरह मेरे शहर की भी अधिकतर महिलायें आज भी अपनी रोज़ी रोटी की जद्दोजहद में लगी नहीं जानती ये महिला दिवस क्या बला है , इस को मनाने में किसका भला है।

Wednesday, 1 March 2017

क्या आपके पास है प्रमाणपत्र ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   क्या आपके पास है प्रमाणपत्र , मुझे भी ज़रूरत है , बता दो कहां से मिलेगा। बहुत जल्दी में घबराये हुए आये और सवाल दाग दिया। समझ नहीं आया कैसा प्रमाणपत्र , धर्म जाति का , अगड़े पिछड़े का , किसी संस्था के सदस्य होने का। पूछा आराम से बैठो तो फिर कहो क्या चाहते हो। बोले बैठने को फुर्सत नहीं राजधानी जाना है , सुना है इसकी ज़रूरत पड़ेगी। हमने कहा किस प्रमाणपत्र की , क्या आधार कार्ड परिचय को। नहीं वो तो है पर मैं देशभक्त हूं इसके सबूत का कोई प्रमाण नहीं मेरे पास। मैंने पूछा आप देशभक्त हैं इसका सबूत कौन मांगता है , हर कोई देशभक्त होने की बात कह सकता है। वो बोले भाई आजकल इस पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है हर जगह , टीवी चैनेल से लेकर सड़क तक। जो किसी को देशद्रोही नहीं मानता उसको देशभक्त नहीं मानते , जो किसी की देशभक्ति का कायल है वही देशभक्त है। कुछ समझ नहीं आया कौन देशभक्त कौन देशभक्त नहीं। हमने कहा भाई आजकल देशभक्ति की क्या आवश्यकता पड़ गई वो तो कब की प्रचलन से बाहर है। जब देश आज़ाद है तब क्या करना देशभक्ति का , मौज मस्ती करो और देश प्रेम के गीत गाओ , इतना काफी है। मगर वो फिर भी अड़े हुए हैं कि राजधानी जाने से पहले इक तमगा लगा कर जाना ही है। उनको जाकर इसी विषय पर चर्चा में हिस्सा लेना है। उनकी तसल्ली को आज़ादी के मुकदमें किताब निकाली ताकि देशभक्तों की जीवनी पढ़कर समझ सकें ये क्या चीज़ होती थी। तब पता करेंगे किसी बाजार से मिलती है या नहीं , पहले मालूम तो हो कहते किसको देशभक्ति।
                                       इतिहास में कहीं नहीं मिला किसी ने खुद को देशभक्त साबित करने को किसी को कोई सबूत दिखलाया हो , न ही किसी ने दूसरे से मांगा ही कोई सबूत। क्या आजकल के सब नेता प्रशासनिक अधिकारी देश के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखते हैं , निस्वार्थ भाव से देश को अपनी सेवा देते हैं। क्या वो भी देशभक्त हैं जो सत्ता की खातिर कुछ भी करने को तैयार हैं , साम दाम दंड भेद सभी अपनाते हैं कुर्सी पाने को।
या सब दूसरे को देशद्रोही घोषित कर मानते हैं इसी से वो देशभक्त हैं। तभी पता चला अपने नगर में भी आज इक जलूस निकाला जा रहा है , मशाल लेकर और नेता जी की प्रतिमा पर जाकर अपने खून से इक पोस्टर लिख राजधानी भेज रहे हैं। जाना पड़ा समझने को। जाकर देखा इक डॉक्टर सिरिंज से एक सी सी ब्लड निकाल इक बोतल में एकत्र करता जा रहा है , उसका उपयोग प्रमाणपत्र बनाने को किया जाना है। अभी दस लोगों की धमनियों से खून लिया था और सौ लोग कतार में खड़े थे , कोई पूछ रहा था इस तरह खून देने से कोई नुकसान तो नहीं होगा , किसी तरह का कोई रोग तो नहीं होगा , आपकी सिरिंज की सुई कीटाणुरहित तो है। कोई दूसरा सवाल कर रहा था कि सब अलग अलग ग्रुप के ब्लड को एक साथ जमा करना क्या उचित है। क्या सब का ब्लड ए , बी , ओ , और एबी , के लेबल से नहीं रखना चाहिए। कोई हिचकिचा कर ऊंची जाति नीची जाति के खून को एक साथ रखने पर सवाल कर रहा था। तभी राज्य स्तर के नेता जी आये और उनके साथ इक सहयोगी इक बाल्टी जिस में लाल रंग का पदार्थ भरा दिखाई दे रहा लिए हुए था। नेता जी ने समझाया और किसी को रक्तदान नहीं करना है , खून का रंग पक्का नहीं होता खून से लिखे प्रमाणपत्र जिन के पास थे भी नष्ट हो गये या कर दिए गए। ये रंग जिस कंपनी का है उसका दावा है पांच साल तक रंग कायम रहने का। जो लोग खून दे चुके उनकी फोटो टीवी और अख़बार वालों को दिखा देंगे , बाक़ी सभी के लिए इस रंग की सिहायी से लिख प्रमाणपत्र दिये जायेंगे , चंदा लेकर। आप चंदे की रसीद की फ़िक्र मत करना , कानून भले बीस हज़ार की या फिर दो हज़ार की सीमा बताये आप लाखों दे सकते बिना किसी पैन नम्बर के भी।
                    तभी हैलीकॉप्टर से देश के नेता जी भी पहुंच गये सभा स्थल पर , उन्होंने आते ही भाषण देना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया आपको कुछ नहीं करना है , हम राजधानी से प्रमाणपत्र बनवा साथ लाये हैं , मगर लाल रंग हमारा नहीं है इसलिये लाल को छोड़ हर रंग का प्रमाणपत्र है। हम किसी एक दल के नहीं हैं गठबंधन में सभी का अपना अपना रंग तो है ही और वक़्त बदलते हम खुद भी रंग और दल कपड़ों की तरह बदलते रहते हैं। जिसको नीला पसंद उसको नीली स्याही वाला , जिसको काला पसंद उसे काली वाला , हरा , पीला सतरंगा सभी हैं अभी ले सकते।  जिस को दुविधा है जितने रंग के चाहे खरीद सकता है। देशभक्ति किसी एक रंग की नहीं हो सकती। आपको देश को कुछ भी नहीं देना , दो बूंद खून भी नहीं , बस ज़ोर ज़ोर से वही दोहराना है जो मंच से बोलने वाला बोलने को कहे। सत्ता का राग अपने राग को मिला एक सुर में जुगलबंदी करते अलापना है। राग दरबारी सभी को सीखना ज़रूरी है। याद रखना बयालीस साल पहले जो हुआ था , इक लोकनायक ने भाषण दिया था कि सुरक्षाकर्मी सरकार के आदेश पर बेकसूर जनता पर गोली नहीं चलाएं दमन नहीं करें , और उसको बगावत को  भड़काना कहकर आपात्काल घोषित किया गया था। सत्ता को गंधर्व राग सुनना है तो आपको गदहे की तरह मधुर स्वर में जय जयकार करनी होगी।  इक सबक ध्यान रखना है हम देशभक्त हैं इसके प्रमाणपत्र की कीमत तभी है जब हम साथ मिलकर शोर मचाते रहें कि जो हमको देशभक्त मानते नहीं वो असली देश भक्त नहीं हैं। दूसरे की देशभक्ति पर सवाल उठाकर ही खुद अपने आप देशभक्त साबित हो जाते हैं। जो खाली जेब आये थे उनको प्रमाणपत्र नहीं मिल सका , सब पैसे वाले , साधनयुक्त लोग ,
अपना अपना प्रमाणपत्र सोशल मीडिया पर दिखला रहे हैं। देशभक्ति आजकल फेसबुक व्हाट्सऐप और ट्विटर पर ही अधिकतर होती है।  

Sunday, 26 February 2017

आधा सच है आधा झूठ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    सदा सच बोलो। ये तीन शब्द बेहद खतरनाक हैं। जो इनको मान ले उसकी दशा खराब हो जाती है। सच बोलने का सबक पढ़ाने वाले खुद सच ही बोलें ये लाज़मी नहीं है। एक बार झूठ को बेनकाब करने वाले भी झूठे साबित हो गये मगर तब भी उन्होंने अपने झूठ को झूठ मानने से इनकार कर दिया , कहने लगे ये उनका अपना नज़रिया है। इस तरह सच की इक और परिभाषा बना दी उन्होंने। सच वही जिसे आप माने। इस बात से अभिप्राय यूं निकला कि सच और झूठ परस्पर विरोधी नहीं हैं। दो जुड़वां भाई हैं , बस ये पता नहीं चलता कौन बड़ा है कौन छोटा। एक जैसे दिखते हैं हमशक्ल भाईयों की तरह , देखने समझने वाला धोखा खा जाता है। अंतर केवल रंग का है सच गोरा है झूठ सांवला सलौना सब का मन मोह लेता है। चाल ढाल दोनों की अलग अलग है , सच फटेहाल है झूठ सूटेड-बूटेड है चमक दमक लिये है। सब उसी को पसंद करते हैं सच को लोग दूर से देख कतरा कर निकल जाते हैं बचकर। सच अभी कुंवारा है बेघर है , भटकता रहता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसको अपना बना ले। झूठ को हर दिन कोई न कोई वरमाला पहना देता है , उसके कितने ठिकाने हैं , बहुत घर हैं उसके। सच फुटपाथ पर रहता है तब भी खुश है इस बात पर लोग आचंभित हैं। झूठ का कुनबा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है , खूब फल फूल रहा है। सच के भूखे मरने की नौबत आ गई है , इस ज़माने में उसका साथी कोई भी नहीं है। सच पर इल्ज़ाम है कि उसने बहुत लोगों की नींद उड़ा रखी है जिससे उनका जीना मुहाल है , वो चाहते हैं सच को सूली पे लटका दिया जाये। सच पर तमाम मुकदमें दायर हैं।
                इक और दुकान खुली है सच बेचने का धंधा करने वालों की बस्ती में , जो दावा करती है असली सच उन्हीं की दुकान से मिलता है। जिसे ज़रूरत हो उनसे जब जितना सच चाहे खरीद सकता है , मुंहमांगे दाम चुकाकर। कीमत बाक़ी की दुकानों से थोड़ी अधिक है मगर उनका सच प्रमाणित है गारंटी वाला। सब लोग उनसे प्रमाणपत्र वाला सच खरीद अपने ड्राइंगरूम की दीवार पर टांग रहे हैं सच्चे कहला रहे हैं। किसी किसी ने तो घर के बाहर प्रवेशद्वार पर ही सच को टंगवा लिया है ताकि सब देख सकें। सच को हर कोई नहीं खरीद सकता , जिसकी हैसियत है वही मोल चुका सकता है। आजकल सच अमीर लोगों का रईसी शौक बन गया है , हर महंगी वस्तु की तरह। महंगा कालीन , महंगे शोपीस , बहुमूल्य पेंटिंग की तरह ही सच सजावटी सामान बन गया है। सच अब बोलता नहीं है उसके होंठ सिल चुके हैं , पिंजरे वाले तोते और गमले के पौधे के साथ इक कोने में शोभा बढ़ा रहा घर के मालिक की। आजकल सजावट में सूखा ठूंठ या कैक्टस का कांटेदार पौधा , मिट्टी के बर्तन घड़े जाने क्या क्या ऊंचे दाम खरीद लेते हैं।
                सच बेचने वाले कमाल के अदाकार लोग हैं। झूठ के पांव नहीं हैं तो सच के पैर काट उन पे झूठ का बदन लगा बहुत तेज़ी से भगा सब को खुश कर देते हैं। उनको ये कला आती है तभी इस धंधे में उनका नाम है , उनके दफ्तर से निकल छोटे से कस्बे से चलता झूठ राजधानी पहुंच जाता है। सच हर जगह कत्ल किया जा रहा है , सभाओं में , बाज़ारों में , सरकारी भवनों में , अदालतों की चौखट पर , सब कहीं उसी के लहू की लाली है। मगर कोई स्वीकार करना नहीं चाहता कि सच को मार दिया गया है। सब कहते हैं सच ज़िंदा है , उनकी तिजोरी में अलमारी में या दफ्तरी फाइल में सुरक्षित है। अभी उसकी ज़रूरत नहीं है जब भी ज़रूरत हुई निकाल लेंगें। सच का दम घुटता रहे तब भी उसकी मौत नहीं हो सकती , सच कभी नहीं मरता ये मान्यता है। झूठ की जय-जयकार हो रही है , सच पर मुकदमा चल रहा है। कटघरे में खड़े सच को झूठ साबित किया जा रहा है। झूठ दावा कर रहा है बहुमत उसी के साथ है। शासन करने का अधिकार उसी को है। अदालत बेबस है उसको सबूत नहीं मिले सच को कैद करने अपहरण करने या मार दिये जाने के। जांच करने वाले सभी झूठ के साथी हैं , निष्पक्ष जांच हो सकती ही नहीं।  अदालत जांचकर्ता को चेतावनी देती रही है कितनी बार मगर उस पर कोई असर नहीं होता है। झूठ किसी की परवाह नहीं करता , वो सच बनकर वातानुकूलित घर दफ्तर  में रहता है। कोई भी मौसम हो उसको कुछ फर्क नहीं पड़ता , हर तरह के मौसम से ज़ेड केटगरी की सुरक्षा उसको मिली हुई है।

इस दर्द की दवा क्या है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     सुना था जब दर्द हद से बढ़ जाता है तो खुद ही दवा बन जाता है। यही सोच हम दर्द सहते रहे ख़ामोशी से कि ये दवा बन जाये और हमें चैन आये मगर अभी तलक वो हद नहीं आई। वो हद जल्दी आये ये सोचकर हम तो दर्द को बढ़ाने के जतन ही करते रहे। अपना दर्द लाइलाज है इतना तो जानते हैं खुद चारागर हैं , फिर भी ज़िंदा रहते उस हद को देखना चाहते हैं जब दर्द दवा हो जाता है। बिना दर्द जीना किसे कहते हैं कभी तो हम भी देखें , दर्द सहकर जीना मुश्किल तो नहीं फिर भी। मेरे प्रिय मित्र जवाहर ठक्कर ज़मीर जी  की ग़ज़ल है  :-
                               " है कभी आसां कभी दुश्वार है ,
                                ज़िंदगी तेरा अजब आकार है। "
सोचते हैं आसां ज़िंदगी कैसी होती है , दर्द है बड़े काम की चीज़। फिल्मों में नाटकों में गायकी में दर्द बहुत काम आता है। निर्देशक कहता है चेहरे पर दर्द के भाव लाओ आवाज़ में दर्द की तड़प सुनाई देनी चाहिए। लोग दर्द बेच बेच करोड़पति बन गये हैं , कुछ लोग इसी दर्द से मर गये कि लखपति होकर भी पति नहीं बन पाये। लोग सोचते हैं क्या आज़ाद पंछी हैं न घर की फ़िक्र न बाहर की चिंता। शादीशुदा का दर्द कुंवारा कैसे समझे और कुंवारे कुंवारी की हालत शादीशुदा कभी नहीं समझ सकते। सब को अपना दर्द सालता है , पराया दर्द कौन समझता है दुनिया में। जिनको शादी कर लगता मुसीबत मोल ली उनको दो दिन बिना पति-पत्नी रहना पड़े तो बेचैन हो जाते हैं। मिठाई खाना भी पसंद और मधुमेह रोग से भी बचना  कुछ ऐसी सिथ्ति है। सरदर्द खुद लिया और दवा औरों से पूछते हैं। डॉक्टर मानते हैं दर्द से बड़ा कोई रोग  नहीं , जब तक दर्द नहीं होता कोई डॉक्टर को नहीं पूछता। तभी वो सब बाकी दवाओं से ज़्यादा दर्द निवारक दवायें लिखते हैं। दर्द की दवा खाते खाते लोग गुर्दे खराब कर लेते हैं , कोई कैसे बताये दर्द किधर होता है , कभी उधर कभी इधर होता है। इक दर्द और होता है इलाज के खर्च का दर्द जो पहले के दर्द से अधिक दर्द देता है। शरीर का दर्द घटता है मानसिक दर्द बढ़ जाता है।
               लोगों को जाने क्या मज़ा मिलता है किसी को दर्द देकर। परायों का दर्द सह लेते हैं अपने जो दर्द देते वो असहनीय होता है। मुहब्बत का दर्द सब से बड़ा है , हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय। कहते ये भी हैं दर्द का रिश्ता ही सब से गहरा होता है , जिसने दर्द झेला वही समझता दूसरे का दर्द क्या है। जन्म का दर्द बच्चा भूल जाता मगर मां को याद रहता किस बच्चे को जन्म देते कितना दर्द झेला था। ये शायर लोग भी अजीब हैं ज़माने भर का दर्द अपने जिगर में लिये फिरते हैं। चलो इक शायर का शेर भी याद  आ गया :-
                               रंग जब आसपास होते हैं ,
                               रूह तक कैनवास होते हैं।
                               खून दे दे के भरना पड़ता है ,
                               दर्द खाली गलास होते हैं।
                              सैकड़ों में बस एक दो शायर ,
                              गहरी नदियों की प्यास होते हैं।
इश्क़ के मरीज़ की बात ऐसी है , दर्द बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। मुहब्बत का फ़साना यही है , नाकाम इश्क़ ही इतिहास बनाता है। मुहब्बत कामयाब हो जाये तो हादिसा कहलाती है , शादी मुहब्बत को बचने कहां देती है। आम आदमी का दर्द छोटा और बड़े लोगों के दर्द बड़े होते हैं। जैसे कुछ बड़ी बड़ी बिमारियां अमीरों के लिये आरक्षित हैं उसी  तरह सत्ता जाने का दर्द जीने देता न मौत ही आती है। कुर्सी से बिछुड़ने का वियोग राजनेता ही जानते हैं , सब होता तब भी सब निस्सार लगता है। राजनीति में वोटर जो दर्द देता है उसकी शिकायत भी करना अलोकतांत्रिक है , जनता का फैसला मंज़ूर है कहना मज़बूरी है। जीत कर बहुमत जुटाने की पीड़ा और हारने पर खाली तिजोरी का दर्द दोनों सहने होते हैं। जो लोग हरदम मुस्कुराते हैं कहते हैं हज़ारों ग़म छुपाते हैं।
हम से मत पूछना क्यों दर्द भरे नग्में गुनगुनाते हैं। आज तक जितना भी साहित्य रचा गया है दर्द को समझ कर झेलकर ही लिखा गया है। सृजन की पीड़ा प्रसव पीड़ा की ही तरह होती है। दर्द मधुर स्वर होता है , हैं सब से मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं। दर्द दिल में होता है लोग गुनगुनाते हैं।  

अथ् श्वान कथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    हर शहर की हर इक गली में एक न एक कुत्ता रहता है। ये सारे कुत्ते खुद को गली ही नहीं समाज और देश का रखवाला बताते हैं। अपनी गली में ही नहीं बाहर भी सारे कुत्ते शेर हैं , अब इनकी आपसी लड़ाई अपनी जगह है , और इन सब के समान हित अपनी जगह। ये भौंकते ही नहीं काटते भी हैं , मगर जिस के हाथ में डंडा हो उस से डरते भी हैं। जो इनके सामने हड्डी डालता है उसके आगे दुम भी हिलाते हैं और मतलब को तलुवे भी चाटते हैं। इन्होंने अपनी एकता कायम रखने को संगठन भी बनाये हुए हैं , जिसकी सभा में एक सुर में राग अलापते हैं। फिर भी इन में कोई दूसरे का दोस्त नहीं सब खुद को बड़ा बाकी को छोटा मानते हैं। हर कुत्ता अपने को सब से सुंदर काबिल और मूल्यवान समझता और बाकी को बिकाऊ माल हैं। सच का झंडाबरदार हर कोई अपने आप को घोषित करता है , झूठ को सच के लेबल लगा बेचना जानते हैं सभी। हर दिन हर कुत्ते की मुलाकात किसी चोर के साथ तय होती है जिस में साथ साथ डिनर कर बाकी की बुराई की जाती है।  पालतू कुत्ते को खाने को अपने आप मिलता रहता है , जो किसी के पालतू नहीं उनको मालिक की तलाश होती है। ये सब खुद को ख़ास मानते हैं और हर सभा में अगली कतार में जगह आरक्षित होने को अपना अधिकार समझते हैं। नेता और प्रशासन इन से बहुत भय खाता है , इनका भौंकना बंद कराने को बोटियां भिजवाता है , हड्डियां डलवाता है।
       अभिव्यक्ति  की आज़ादी का अधिकार इन सब को भाता है , इनका भौंकना लोकतंत्र को बचाता है , ये बोलता हुआ औरों की आज़ादी को चबाता है खा जाता है। जब कोई कुत्ता नेता बन जाता है , उसमें इक और पागलपन छा जाता है। तब वो कुत्ता खुद को अल्सेशियन डॉग बतलाता है , सत्ता की दूध मलाई खाता है। इनका अंग्रेजी भाषा बोलना इन्हें हिंदी में भौंकने से ऊपर ले जाता है , सब को इन पर ज़्यादा प्यार आता है। पांच साल बाद जब चुनाव आता है , भाव इनका आसमान पे चढ़ जाता है। बंद कमरों में इनकी कीमत लगाई जाती है , रूठे को मनाने को हर सफाई दी जाती है। सरकार इन पर बड़ी मेहरबान रहती है। इनको बसाने को अलग आवासीय कॉलोनी बनाना चाहती है , पर इनकी आपसी महाभारत से घबराती है। इनका हर पल ध्यान रखती है।