Friday, 13 September 2019

विद्या बेचारी हिंदी जैसी ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    विद्या बेचारी हिंदी जैसी ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 लिखते हुए मन में इक खालीपन लग रहा है बात हिंदी दिवस पर हिंदी के गौरव की करनी चाहिए मगर जो सामने है हिंदी का उपहास लगता है। बस हिंदी से उसका दर्द मिलता जुलता लगता है तभी किताबी हिंदी की बात छोड़ टीवी सीरियल की बात करने लगा हूं। दो चार कड़ियां दिखाई गई हैं विद्या नाम से धारावाहिक शुरू हुआ है। नायिका विधवा है ससुराल में चुपचाप सहमी हुई रहती है सब काम घर का करती है मेधावी है पंडित जी का बताया मंत्र इक बार याद हो जाता है। बचपन में पिता के पास एक के लिए किताब खरीदने को पैसे थे इसलिए बेटे को किताब लाकर स्कूल भेजते हैं और बेटी की ख़ुशी मां के साथ रसोई में हाथ बंटाने में है। विद्या बेटी जो है कोई शिकायत नहीं करती चुपचाप मान जाती है और जिस से परिवार गठबंधन करवाता है विवाह कर ससुराल चली जाती है। हिंदी भाषा की तरह बदनसीबी साथ रहती है और विधवा हो जाती है इक शहीद की विधवा को सरकार पचास लाख देती है मगर पैसे ससुराल वाले खा जाते हैं हिंदी दिवस के बजट की तरह सरकारी लोग क्या यही नहीं करते हैं। मगर रिश्वत की मेहरबानी से ससुराल वाले विद्या को सरकारी स्कूल में अध्यापिका नियुक्त करवा देते हैं बिना उसकी मर्ज़ी के ही और उसको आदेश देते हैं सुबह उठकर साइकिल पर दूर गांव जाकर अंग्रेजी पढ़ाने को क्योंकि सरकार ने टीवी वालों के विज्ञापन के शब्दों में जिसका अंग्रेजी का ए बी सी डी का डब्बा गोल है उसे बच्चों को अंग्रेजी पढ़ानी है। अब कौन कौन उसका शोषण करता है और कौन कौन उसको मूर्ख बनाता है कहानी लंबी है और बाकी है देखने को। मगर विद्या नाम से ही बेचारगी का एहसास होता है हिंदी की तरह। टीवी वाले उसका नाम भी हिंदी अंग्रेजी को मिला कर लिखते हैं जो उनकी मानसिकता है। अर्थात विद्या या हिंदी दया की पात्र हैं। 

   चलो टीवी सीरियल को छोड़ हिंदी की बात करते हैं। हिंदी लिखने वाले हर साल ख़ुशी मनाते हैं और गर्व करते हैं घोषणा करते हुए कि हिंदी जगत की भाषा बन गई है। मगर शिक्षा की बात होती है तो निजि विद्यालय अंग्रेजी स्कूल और सरकारी स्कूल हिंदी वाले का अंतर साफ लगता है। किसी को रूखी सूखी किसी को हलवा पूरी मिलने की बात है। मगर हिंदी लेखक हैं जो भूखे रहकर लिखते हैं और अपनी पूंजी खर्च कर किताबें छपवाते हैं और बिकती नहीं हैं तो उपहार में बांटने का काम करते हैं जबकि जिनको मुफ्त उपहार मिला पुस्तक को पढ़ना क्या देखते भी शायद हैं। किताब पढ़ने को फुर्सत किसे है जब दिन भर खाली समय मनोरंजन करना मकसद है और सोशल मीडिया पर उल्टी सीधी पढ़ाई पढ़ते हैं सबको ज्ञान देने की बात करते हैं। व्हाट्सएप्प फेसबुक स्मार्ट फोन की अनुकंपा है जो पढ़े लिखे और अंगूठा छाप एक समान हैं बल्कि अनपढ़ लगता है चार कदम आगे हैं। चलो शुभकानाओं का आदान प्रदान करते हैं हिंदी दिवस मनाते हैं और बाकी सब भूल जाते हैं। 

   हिंदी दिवस पर हिंदी का गुणगान करने की रचना पढ़ते हैं गीत गाते हैं कविता कहानी सुनाते हैं। अपनी किताब का विमोचन करवाते हैं बधाईयां पाते हैं इतराते हैं। कितने ईनाम पुरुस्कार मिले बतलाते हैं खुशियां मनाते हैं। क्या लिखा था साहित्य का मकसद क्या है भूल जाते हैं जाने किस दुनिया से आये हैं और किस दुनिया की तरफ चले जाते हैं। साहित्य कहते हैं सच का दर्पण है तो आईने को आईना दिखाते हैं। हम कहते हैं इक ऐसा समाज बनाते हैं जिस में छोटे बड़े का भेदभाव सब भूल जाते हैं मगर हम खुद को बड़ा किसी को छोटा भी समझते हैं समझाते हैं। राह कौन सी जाना है हम किस रास्ते बढ़ते जाते हैं। क्या समाज में बदलाव हुआ है साहित्य कर्म सार्थक है या कोशिश है अन्याय नहीं न्याय की बराबरी की बात हो ये चर्चा करते हुए घबराते हैं शर्माते हैं। अपना असली चेहरा ढकते हैं छुप जाते हैं। सरस्वती वंदना गाते हैं देवी को मनाते हैं मगर उसकी तस्वीर पर जमी धूल को इक ख़ास दिन साफ़ करते हैं सामने दीप जलाते हैं। अंधेरों से हम साल भर दोस्ती निभाते हैं किस का नाम लिया जाये कैसे कैसे लोगों के दरवाज़े पर सर झुकाते हैं झोली फैलाते हैं खैरात ले आते हैं अधिकार पाने की बात नहीं करते हैं डर जाते हैं। अपने हिंदी दिवस मनाने का निमंत्रण भिजवाया है क्या पता भूल गए गलत पते पर आकर घबराया है किसी नेता ने रद्दी की टोकरी में फिंकवाया है। देख कर किसी को दर्द आया है चुपके से रद्दी की टोकरी से उठाया है और सर माथे लगाया है क्योंकि ऊपर सरस्वती देवी की तस्वीर लगी थी सह नहीं पाया है। कैसे उस सभा में शामिल हो सकता है ये लेखक जिस में अंगूठा छाप को मुख्य अतिथि बनाया है। हिंदी के नाम पर इस साल भी दिल भर आया है।

Thursday, 12 September 2019

हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जब तक नौकरी व्यवसाय में रहे वो सब किया जो करना चाहा जो करना पड़ता था जो करना नहीं चाहिए था मगर करते रहे विवशता की आड़ लेकर अपने फायदे अपने स्वार्थ लोभ लालच जैसे कितने ही कारण बहाने गिनवा सकते हैं। लेकिन जैसे ही हम ने अपना काम व्यवसाय नौकरी से निजात पाई हम सभी को ज्ञान की अनुभूति हुई कि जो भी जीवन भर किया सब झूठ था व्यर्थ था और वास्तविक आनंद लोभ मोह को छोड़ धर्म कर्म के अच्छे कर्म करने से मिल सकता है। इस सब बताने का अर्थ कदापि ये नहीं है कि हम लोगों को अपने अनुचित आचरण करने कर्तव्य ईमानदारी पूर्वक नहीं निभाने से कोई पछतावा कोई ग्लानि है। हम आज भी गर्व करते हैं कि हम कितने बड़े पद पर रहे और कैसे कैसे हमने अपनी इच्छाओं की पूर्ति की और जो भी मन किया करते रहे हैं। जब कोई इंसान घर बार छोड़ सन्यासी बन जाता है तो उसके पिछले सभी किये अपकर्म भूल जाते हैं और धर्म चिंतन करने से पिछले पापों से मुक्त समझा जाता है। हम ने कोई लिबास बदला नहीं है और घर परिवार से बिछुड़ किसी जंगल में नहीं रहने लगे हैं फिर भी हमारे पिछले सभी बुरे कर्म सेवानिवृत होते ही अपने आप खत्म हो गए मान लिए जाते हैं। तब जो जो भी अनुचित किया हम ने नहीं किसी अधिकारी कर्मचारी व्यवसायी ने किये जो अब हम नहीं हैं और हम इंसान हैं पुरानी पहचान कोई झूठा सपना था और सपने में कोई भी अपराध किया गया गुनाह नहीं होता है।  मंच संचालक अपनी बात कह रहे थे और बारी बरी सभी सदस्य अपनी सच्ची कथा बता रहे थे।

    मैं इक सरकारी अधिकारी था कभी समय पर दफ्तर जाना ज़रूरी नहीं था सेवानिवृत होने के बाद इक संस्था ने शामिल होने और मंच पर विशेष बनकर बैठने का अधिकार दिया तो रविवार को भी सुबह सबसे पहले आना याद रहता है। मेरा कायाकल्प हो गया बहुत कुछ था कुछ भी नहीं रह गया तब पता चला आम ख़ास का अंतर कितना है। लोगों को कितना भटकाया फोन पर बात नहीं की मिलने आने पर मिलने से इनकार किया और अपनी ताकत का जमकर उपयोग किया। जो ख़ास लोग थे उनके लिए हाज़िर किया सब कुछ शासन का मज़ा लूटा जी भर कर और करना क्या चाहिए कभी विचार नहीं किया। अब सबको सीख देता हूं सही राह पर चलने की खुद कभी सही राह गया ही नहीं। सच तो ये है मैंने कभी भगवान खुदा के होने की नहीं होने की चिंता की ही नहीं  धर्म के नाम पर आडंबर किया है केवल जीवन भर मैंने।

     मैं शामिल था पुलिस विभाग में खुद कोई नियम नहीं पालन किया और सीधे सादे इंसानों से ऐसी भाषा में और इस तरह व्यवहार किया करता था जैसे खुद मैं जुर्म और गुनाह से नफरत करता हूं। मगर अपराधी लोगों से खुद ही सम्पर्क भी करता रहा उनको सहयोग भी दिया उनसे डरता भी था। न्याय के साथ खिलवाड़ करना मेरी आदत थी और बड़े अधिकारी या सत्ताधारी नेताओं के गैर कानूनी अनुचित आदेश भी जी हज़ूर कह कर मानता रहा और बदले में सब सुख सुविधा पाता रहा। कभी गलत करता पकड़ा भी गया तो भी मुझे बचाने को अधिकारी नेता खुद आते थे अपनी ज़रूरत को अपनी चमड़ी बचाने को। पुलिस का कर्तव्य क्या है इस की फज़ूल की चिंता मुझे नहीं रही अब जिस संस्था से जुड़ा हूं मानवाधिकार की बात करती है। यू टर्न लिया नहीं है सड़क की गलत दिशा जाने की बात है आपको समझ नहीं आएगी शायद।

    मैंने  गरीबों का हक छीना , उनसे उचित काम करने की रिश्वत वसूल की , ईलाज करने को सरकारी अस्पताल की जगह अपने घर नर्सिंग होम बुलाता रहा। दवा कंपनियों से फायदा उठाकर लूट का भागीदार बना और दाखिल करने से ऑपरेशन करने के लिए अपनी फीस के नाम पर रिश्वत लेता रहा। आजकल समाज सेवा का काम करने का तमाशा करता हूं तो खुद पर हंसता हूं जब अवसर था नहीं किया सही ढंग से काम अब दिखावे को जाने कितना कुछ करता रहता हूं। नेता भी बना कारोबार भी किया और कोई अपराध नहीं जो मैंने किया नहीं। खूब नाम झूठी शान और दौलत जमा की है अब दानी बनकर सभाओं में शान से शोभा बढ़ाता हूं।

      और इस तरह सब ने सेवानिवृत होने के बाद अपनी बात सच सच बताई क्योंकि इक साधु महात्मा ने उनको कहा था ऐसा करने पर आपको फिर से अगले जन्म में जो चाहोगे अवश्य मिलेगा। अब आखिर में उनकी इच्छा की बात संक्षेप में सचिव पढ़कर सुना रहे हैं।  सभी ने अपनी आरज़ू लिख कर पेटी में डाली थी महात्मा जी के कहने पर। सार यही था ये सब कोई मोक्ष की चाहत नहीं करते हैं। स्वर्ग उनको लगता है वही था जो उनको मिला था ज़रूरत से बढ़कर बिना मांगे या छीनकर भी और ये मिला जिस जगह वही नर्क का शासन ही तो है। उनको इसी देश में सब अपकर्म करने की छूट और अधिकार स्वर्ग से भी ऊपर लगते हैं उन्हें यही फिर से दोबारा चाहिए। जी भरा नहीं मनमानी कर के भी और किसी स्वर्ग में भजन कीर्तन करने से अच्छा है यहां इस नर्क में शासक बनकर स्वर्ग से बढ़कर सुख सुविधा हासिल की जाये। सार की बात यही है महत्मा बन जाना वक़्त और हालात के कारण होता है कोई भी साधु संत महात्मा होना नहीं चाहता है। बन जाने के बाद भी मन चाहता है ये झूठ की नकाब छोड़ खुल कर मौज मस्ती करने को। हर महात्मा अपना चोला उतार कर फिर से ज़िंदगी के मज़े लेना चाहता है बुराई की राह लुभाती है अच्छाई सच्चाई की राह चलने से कोई ख़ुशी कोई चैन नहीं मिलता है क्योंकि हमने चुना नहीं है ये सब छोड़ना मज़बूरी थी छोड़ना पड़ा है। अब कोई महात्मा महात्मा बनकर रहना चाहता नहीं है। 

Wednesday, 11 September 2019

मदहोशी के आलम में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        मदहोशी के आलम में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 जिस समय इक महिअलों की समानता के अधिकारों की पैरवी करने वाली महिला नेता जी के शासन को राम राज्य घोषित कर रही थी ठीक उसी समय नेता जी का गला काट दूंगा की धमकी का महान आदर्शवादी वाक्य उच्चारण करने वाला वीडियो सामने आया। ये कोई बोतल का नशा नहीं है जो आसानी से उतर जाये धतूरे से सोने का नशा सौ गुणा अधिक होता सुनते थे मगर सत्ता और पद का नशा उससे लाख गुणा बढ़कर सर चढ़ कर नाचता नचवाता है , उतरता है जब सत्ता नहीं रहती तभी। क्योंकि जब तक सत्ता है इक हजूम साथ रहता है जो उनकी पसीने की बदबू को भी गुलाब की खुशबू कहता है। अब ये इंसान की कमज़ोरी कुदरती है कि झूठी तारीफ सुनकर चेहरे पर खिसियानी हंसी आ जाती है। कितनी खूबसूरत लग रही हो किसी महिला से कहो तो काला रंग गुलाबी हो जाता है। मन उछलने लगता है और खुद पर काबू नहीं रहता , हंसी तो फंसी इस को ही कहते हैं सयाने। 

    हे राम गांधी जी ने आखिरी सांस लेते कहा था आजकल लोग जाने किस किस को राम घोषित करने लगे हैं। ये सारे राम सत्ता पर विराजमान होने से राम लगते हैं उस से पहले कोई इनको कुछ नहीं समझता और सत्ता जाने पर राम को मानने वाले खुद राम बनने की ताक में रहते हैं। राम होने की बात इतनी अजीब हुई है कि राम नाम सत्य है लोग कहते हैं जब अर्थी उठती है। राम नाम याद आखरी वक़्त आते हैं मगर जिसका वक़्त अंतिम सांस ले चुका वो बोल नहीं सकता सुन नहीं सकता बाकी लोग समझते नहीं इस का मतलब क्या है। भावना नहीं होती है बस समय बिताने को रास्ता काटने को इक साधन बन गया है। लोग जाने क्यों मुर्दे से घबराते हैं जबकि मरने के बाद कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है और जो मर गया उसको कोई मार नहीं सकता है। ये राजनीति काठ की तलवारों की जंग है सब सैनिक कठपुतलियां बनकर लड़ते हैं किसी के इशारे पर नाचते हुए। 

      जब कोई लगातार अनाप-शनाप बोलने लगता है समझते हैं मनसिक संतुलन बिगड़ गया है उसकी कही बात का बुरा नहीं मानने की बात की जाती है। सत्ता मदहोश कर देती है और मदहोशी में बहुत कुछ हो जाता है जो माफ़ करना नशे में था कहने से छोड़ने को कहते हैं। मगर कितनी बार कोई बार बार यही करता है जो उसकी जगह पागलखाना हो सकती है। आगरे का पागलखाना बरेली का मशहूर हुआ करता था आजकल पागलखाने को भला सा नाम दे देते हैं। कितने पागल खुद को शहंशाह बताते हैं ख़ामोशी फिल्म को देखा है पागल आशिक़ कभी ठीक नहीं होते हैं पागल बना सकते हैं जैसे ख़ामोशी की नायिका वहीदा रहमान अंत में खुद ही पागल हो जाती है पागल आशिकों का ईलाज करते करते। नेताओं की मुहब्बत सत्ता की कुर्सी होती है उनको बस उसी से इश्क़ होता है और ये सत्ता कब हमेशा किसी की हुई है। यही वफ़ा की कहानी है और इसकी बेवफ़ाई का दर्द हर किसी को झेलना पड़ता है। महबूबा का साथ छूटता लगता है तब खुद पर अपनी ज़ुबान पर काबू नहीं रहता है। ऐसे में ईलाज भी यही है सत्ता से बाहर होना और दर्द भी इसी का होता है। ये खुमार चढ़ा हो तो कोई किसी को संभाल नहीं सकता न संभलने को कहने का कोई असर होता है। जाने दो नशा उतरते ही बंदा अपनी औकात में चला आता है।

Monday, 9 September 2019

बेक़सी हद से जब गुज़र जाये ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया

    बेक़सी हद से जब गुज़र जाये ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया 

     किसी शायर ने कहा है। तू है सूरज तुझे मालूम कहां रात का दुःख , तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बाद। तूने देखा है कभी एक नज़र शाम के बाद , कितने चुपचाप से लगते हैं शजर शाम के बाद। इतने चुप-चाप कि  रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म , छोड़ जाएंगे किसी रोज़ नगर शाम के बाद। लौट आती है मेरी शब की इबादत खाली , जाने किस अर्श पे रहता है खुदा शाम के बाद। ये जो कुछ लोग अपनी खातिर नहीं देश की समाज की खातिर बेचैन परेशान रहते हैं कहते हैं ऐसा क्यों है जबकि बहुत लोग उसी को देख कर भी अनदेखा करते हैं ये कहकर कि ये तो होता रहता है इन दोनों में अंतर संवेदना का है। कुछ अपने से हटकर सबकी बात करते हैं और बहुत लोग अपने मतलब से मतलब रखते हैं। भला किसी की ऐसी फितरत कैसे हो सकती है हम देखते हैं तो समझ नहीं आता है। कोई सरकारी अधिकारी सत्ताधारी नेता के तलवे चाटता नज़र आता है जबकि ऐसा करना उसकी मज़बूरी कदापि नहीं है होना तो ये चाहिए कि सरकारी कर्मचारी अधिकारी अपना कर्तव्य देश और जनता के लिए निष्ठा रखते हुए निभाते और राजनेताओं की मनमानी नहीं स्वीकार करते। संविधान कानून उनको सत्ता पर बैठे नेता की अनुचित बात नहीं मानने का अधिकार देता है इतना ही नहीं आईएएस आईपीएस अधिकारी नहीं चाहे तो बड़े पद पर बैठकर भी कोई नेता घोटाला नहीं कर सकता है। अर्थात आज तक हर घोटाला इन लोगों की मर्ज़ी और सहयोग से ही हुआ है। मगर इन पर कोई कठोर करवाई होती नहीं है क्योंकि अपने पर जांच से लेकर दंड तक देने का काम खुद इनको करने का चलन है। जैसे टीवी अख़बार सोशल मीडिया वाले सबको लताड़ते हैं खुद क्या करते हैं कोई उनसे नहीं पूछता। बिक चुके हैं और निष्पक्ष होकर जागरुकता की बात नहीं सत्ता का पैसे वालों का गुणगान करते हैं। 

      अख़बार में कभी पाठकनामा कॉलम छपता था लोग अपनी समस्या लिखते थे और सरकारी विभाग को जवाब देना लाज़मी लगता था। शायद ही कोई अख़बार अब वो करता है। इधर सोशल मीडिया पर कितनी तरह से उनकी असलियत सामने लाने का काम किया जाता है जो कनून के रखवाले बनकर कानून से खिलवाड़ करते हैं पुलिस की वर्दी पहन अपराधी की तरह आचरण करते हैं। मगर ऐसे अधिकारी नेताओं का नाम एक दिन चर्चा में होता है उसके बाद हुआ क्या किसे मतलब है। जब सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं तो कौन किसे दंडित कर सकता है। इक रिवायत या आदत हो गई है सत्ताधारी शासक नेता उनके दल के लोगों के आदेश पर सब उचित अनुचित करने की। सोचता हूं अब लिखना बेकार है कुछ भी कहने से कोई असर नहीं होता सरकार नेता अधिकारी सब चिकने घड़े बन गए हैं मगर क्या उनकी वास्तविकता को उजागर नहीं करना भी उनके कर्तव्य नहीं निभाने और जब जो जैसे जहां मनमानी करने को बढ़ावा देना नहीं होगा। ऐसा पहले तो नहीं होता था जब भी कोई शिकायत करता या ध्यान दिलाता कहीं कोई अनुचित बात को लेकर अथवा उचित काम नहीं करने की बात करता तो कुछ न कुछ असर किसी न किसी पर अवश्व होता था। लेकिन आजकल जैसे कर्तव्य की बात क्या समाज की चिंता की बात क्या सरकार उसके अधिकारी नेता सभी अपने मतलब को जैसे भी मनमानी पूर्वक समाज की अनदेखी कर अपने हित साधने को नियम कानून ताक पर रख अनुचित आचरण करते संकोच नहीं करते हैं।

        आजकल सत्ताधारी दल राज्य भर में रोज़ किसी शहर में सभाओं का आयोजन अलग अलग नाम से कर रहा है। नेताओं की खातिर खूब सजावट और शोर दिखावा किया जाता है और स्थानीय नेता भी अपने नाम इश्तिहार और अपनी राजनीति करने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। शहर में एक नहीं कितनी जगह अपने मकसद को भीड़ जमा की जाती है और खूब पैसा खर्च किया जाता है शानो शौकत पर। अधिकारी और सरकारी विभाग भी उचित अनुचित की चिंता छोड़ ख़ास लोगों को सब उपलब्ध करवाने में आम नागरिक की आपराधिक अनदेखी करते हैं और रास्ते बंद कर देते हैं अवरोध खड़े कर देते हैं। कुछ घंटे के राजनीतिक आयोजन की खातिर सरकारी विभाग कितने दिन लगा रहता है और सत्ताधारी दल के नेता भी अपनी मर्ज़ी से जो चाहते करवाते हैं। लेकिन उनका काम हो जाने के बाद जिस जगह को शानदार ढंग से सजाया गया था उस को गंदगी सड़क पर रुकावट से लेकर तमाम समस्याएं पैदा कर छोड़ जाते हैं। जैसे कोई मेला लगता है और मेले के खत्म होने के बाद हर रतफ मंज़र हैरान करने वाला हो जाता है। रौशनियों की जगह घना अंधेरा छाया नज़र आता है। ये नेता ये अधिकारी सरकार दावे करती है जनता की भलाई के मगर वास्तव में आम नागरिक की परेशानी के लिए उदासीन रवैया होता है। जो भी सड़क पर रुकावट या अन्य गंदगी उनके आयोजन से हुई उसको खुद ठीक करने की बात छोड़ बार बार बताने पर भी कोई कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं होता है। कोई किसी और पर करने का फ़र्ज़ बताकर पल्ला झाड़ता है तो कोई करने को कहने के बाद करता नहीं है। 

       जिस देश में इतनी गरीबी है कुछ लोग कैसे इतना पैसा सरकारी खज़ाने से या खुद सत्ता की आड़ में चंदे के नाम पर जमा कर ऐसे हर दिन शानो शौकत दिखाने को सभाओं की सजावट पर बर्बाद करते हैं। अपनी गंदी स्वार्थ की राजनीति की खातिर भीड़ जमा करने को हथकंडे अपनाते हैं फिर भी तमाम जगह पंडाल खाली नज़र आ ही जाते हैं। मगर उनको क्या उनकी कोई ईमानदारी की मेहनत की कमाई नहीं थी जो बेकार हुई। किसी न किसी तरह उन्हीं गरीब लोगों से ये वसूली होती है। जितने भी नियम हैं जनता पर कड़ाई से लागू करने वाले खुद उनको तोड़ने में हिचकिचाहट नहीं महसूस करते हैं उनको ये याद ही कहां रहते हैं। शासक अधिकारी खुद पर बेतहाशा धन बर्बाद करते हैं तभी देश की जनता बदहाल है गरीब है। जब हर दिन इनके आयोजन समारोह सरकारी विभाग के भी और राजनीतिक दलों के भी आयोजित किये जाते हैं जीना हासिल वास्तव में कुछ भी नहीं होता सिवा उनके शोर और खुद अपने गुणगान करने के ताकि उनकी वास्तविकता की बात कोई नहीं करे , तब आम नगरिक देख कर सोचता है काश इतना पैसा गरीब लोगों की हालत ठीक करने को खर्च किया जाता तो बहुत कुछ बदल सकता था। चांद की बात पर जश्न मनाने से देश की धरती की बदहाली की बात को अनदेखा करना क्या देशभक्ति है। देशभक्ति देशसेवा की बात करते जाने से आपका अपने खुद पर करोड़ों रूपये ऐश आराम सुख सुविधा और मनमाने ढंग से दुरूपयोग करना कोई हद नहीं बची है। सपने देखने से कि सब बढ़िया हो जाएगा कुछ होता नहीं है खुस परस्ती की आदत ने नेताओं और अधिकारीयों ही नहीं टीवी अख़बार वालों से धनवान लोगों तक को स्वार्थ में अंधा कर दिया है ये सब किसी बेरहम शासक की शानदार महल में गुलछर्रे उड़ाना चाहते हैं जब महल से बाहर मंज़र बदहाली का हो।

Saturday, 7 September 2019

क्या से क्या हो गया ( समाज सरकार भटक गये ) डॉ लोक सेतिया

 क्या से क्या हो गया ( समाज सरकार भटक गये ) डॉ लोक सेतिया 

  पढ़ाई लिखाई शिक्षा इंसान को सभ्य बनाने को थी हम जितना अधिक शिक्षित हुए उतने ही असभ्य होते गए तो बेहतर था अनपढ़ रहते। जो संस्थाएं संसाधन ज्ञान देने को थे अज्ञानता का पाठ वही पढ़ाने लगे। टीवी अख़बार रेडियो जैसे सिनेमा थिएटर जागरूकता लाने को थे भटकाने को नहीं बने थे। मनोरंजन ही इनका मकसद नहीं होना चाहिए और वो भी घटिया अनैतिकता को नग्नता को बेशर्मी को बढ़ावा देने लगा तो वही हुआ आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। चलो देश समाज की वास्तविक तस्वीर को देख कर समझते हैं कि क्या से क्या हो गया है। 

  हम तथाकथित सभ्य कहलाने वाले लोग जिस किसी संस्था संगठन पर काबिज़ हैं उनको चलाने बढ़ाने को नियम संविधान को दरकिनार कर सब करने को उचित ठहराते हैं। धर्मशाला संस्थाओं के स्कूल अस्पताल समाज की भलाई छोड़ व्यौपार करने लगे हैं कहने को समाजिक कार्य मगर वास्तव में लूट ही है। यही करना था तो इनकी ज़रूरत ही क्या थी बनाने की। शिक्षा स्वास्थ्य सेवा भी धर्म का चोला पहन कर कारोबारी ढंग से करते हैं तो उसको समाज सेवा का नाम मत दो। 

 सरकार कितना कुछ सामान बना कर रखती है जनता की सुविधा देने के नाम पर मगर वास्तव में तमाम ऐसी चीज़ें उन्हीं के उपयोग की खातिर रखी रहती हैं। जब भी शासक अथवा अधिकारी लोग आएं तब सब ठीक भी और मुहैया भी करवाते हैं मगर उनका आयोजन खत्म होते ही सब फिर किसी गोदाम में जमा हो जाता है या कई बार ख़ास लोगों के काम आने को उनके हवाले करते हैं। नेता जो भी सत्ता मिलते ही सरकारी अधिकारियों संसाधनों और भवन से लेकर जनसुविधाओं का सामान तक निजि उपयोग को इस्तेमाल करने में लज्जा अनुभव नहीं करते हैं। 

   पर उपदेश कुशल बहुतेरे की बात है। सबको कायदे कानून बताने वाले खुद किसी नियम कानून की रत्ती भर भी परवाह नहीं करते हैं। सत्ता है तो उनको अधिकार है जो उनको पसंद हासिल करें नागरिक की परेशानी की चिंता छोड़कर। खुद जनता का धन अपनी सुविधाओं पर बर्बाद करना उनको अधिकार लगता है। धर्म का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षा लोभ मोह लालच को छोड़ने और सादगी से जीने की देकर खुद ये सब करते हैं। इक बात घर परिवार समाज सरकार सभी जगह नज़र आती है कि सब औरों से अपने निर्देश का पालन करने की अपेक्षा रखते हैं जैसे हम चाहें सबको करना होगा जब भी अधिकार है औरों की आज़ादी का हनन करते सोचते नहीं हैं। सब को अपनी आज़ादी पसंद है बाकी लोग भी आज़ाद हैं ये कोई समझता नहीं है। आप अपने बड़े अधिकारी की अनुचित बात से असहमत नहीं हो सकते विरोध की बात ही क्या। यही हर राजनीतिक दल का अलिखित संविधान है कि आपको दल की दल के नेता की अनुचित देश हित विरुद्ध बात को भी अच्छा बताना होगा। अन्यथा किसी भी दल में आपकी जगह नहीं है। साफ समझा जाये तो हम गुलामी पसंद हैं गुलामी करते हुए शर्मिंदा नहीं होते और किसी को गुलाम बनाते कोई अपराधबोध नहीं महसूस करते हैं। 

 देखा जाये तो हम दिखाई अच्छे देते हैं अच्छाई की बात को छोड़कर आचरण खराब करते हैं। हमने अपने चेहरे किसी नकाब से छुपा रखे हैं असली शक्ल सूरत बड़ी बदसूरत है बस मेकअप से सजते संवरते हैं।

Friday, 6 September 2019

उससे पहले और उसके बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   उससे पहले और उसके बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

      उन्होंने अपनी पसंद के इक लेखक को बुलाया है और लिखवाना चाहते हैं कुर्सी की व्यथा कथा इस तरह से जैसे ईस्वी से पहले और ईस्वी के बाद बांटकर इतिहास लिखते हैं। चलते चलते बात देश की अर्थव्यवस्था की होने लगी तो समझाने लगे राज़ की बात है फिर भी आपको बताने में कोई हर्ज़ नहीं है मेरे पास हर मर्ज़ की दवा है। बस जल्दी ही देश का सारा उधार चुकता कर देना है वो भी नकद भुगतान कर के। जिस जिस ने देश की संस्था या कोई विदेशी सरकार हो बकाया लेना है उनको बुलावा भेजा जाएगा कि जितना भी हिसाब बकाया है आकर नकद ले जाओ अन्यथा उस तारीख के बाद सब क़र्ज़ बही खाते से मिटा दिए जाएंगे। लालजी की गद्दी की तरह अपने बैंक की तिजोरी खोल कर जो जो आता गया थैला भरकर पैसे देकर विदा किया जाएगा। क्या अभी भी इतना पैसा बचा हुआ बाकी रखा है बैंक की तिजोरी में पूछा तो कहने लगे बेशक। मगर खबर तो थी सब आपने हथिया लिया है और तिजोरी नाम को है। अभी थोड़ा इंतज़ार करो सब आपके सामने ही होगा हंसते हुए बताया गया। 

       ऐलान किया गया अमुक तारीख को सभी लेनदार आकर भुगतान ले जाएं बाद में कोई उधार नहीं बाकी का इश्तिहार छपवा देंगे। कितने पुराने क़र्ज़ वसूली करने को चले आये और सभी ने अपना अपना हिसाब का कागज़ का पन्ना दे दिया। जिस जिस ने जितना लेना बताया था उसको बंद थैले में उतना पैसा बाहर लिखा हुआ भीतर कितना पैसा है देकर रसीद लिखवा ली गई। सरकारी मोहर लगी थी विश्वास करना था किसी को भी गिनती करने या थैला खोलने की ज़रूरत नहीं थी। सब चले गए अपने अपने देश या देश के लोग अपने शहर में। ये कमाल कोई और नहीं कर सकता था नामुमकिन को मुमकिन करना उन्हीं को आता है। 

    अभी भी उनको कुछ और करना था देश के लोगों को वादा किया था उनके खाते में धन जमा करवाने का उसको भी निभाना था। ऐलान किया अगले दिन बैंक के सामने पहले की तरह कतार में लगकर जिसे जितना चाहिए नकद ले जा सकता है। और हर कोई धनवान गरीब अपने अपने हिस्से का थैला लेकर खुश था। मगर देश विदेश के सभी लोग ये देख कर दंग रह गए कि जो थैले मिले थे सभी पुराने हज़ार रूपये और पांच सौ रूपये के चलन से बाहर किये जा चुके नोटों से भरे थे। सब ने पूछा क्या ये नोट दोबारा बाज़ार में चलने लगेंगे सरकार फिर  आदेश दे रही है। समझाया गया देश में नहीं चल सकते तो क्या हुआ विदेश वाले अपने देश में जारी कर सकते हैं अभी भी उस पर लिखा हुआ है धारक को देने का वादा करता हूं। वादा है और विश्वास पर दुनिया चलती है। मगर जिनको देश में नकद मिला वो इसका क्या करेंगे सवाल किया गया। नहीं जानते जो पुरानी करंसी उपलब्ध नहीं होती है चलती नहीं बाज़ार में फिर भी उसकी कीमत कई गुणा हुआ करती है। मुझसे पहले की कीमत रूपये की ऊंची समझी जाएगी ही और मेरे बाद रूपये की कीमत क्या होगी मत पूछना। लोग पुराने हज़ार रूपये और पांच सौ रूपये के नोट शीशे के फ्रेम में जड़वा कर सजाकर रखा करेंगे ताकि आने वाली पीढ़ियां देख सकें उनसे पहले और उनके बाद की करंसी की खनक कितनी अलग है। उनसे ये सब सुनता रहा लेखक और कल्पना कर देखने की कोशिश करता रहा फिर भी ऐसे लिखना खुद अपने आप और लिखवाने वाले का भी उपहास करवाना होगा।

  विचार करने के बाद उनको याद आया इक फिल्म में सलमान खान को अमिताभ बच्चन भगवान बनकर कुछ दिन को अपनी शक्ति दे देते हैं ताकि दुनिया को अपने हिसाब से चलाये क्योंकि उस फिल्म में अभिनेता सलमान खान को ऊपर वाले से शिकायत रहती है कि दुनिया को ढंग से नहीं चला पाए हैं। ऊपर वाले को कहते हैं सलमान कि तुम से तो बेहतर चला सकता हूं मैं दुनिया को। लेकिन मिले हुए दिन बीत जाते हैं और सलमान खान जो चाहता होता रहता है मगर समय समाप्त होते होते अभिनेता सलमान खान अपने ही बुने जाल में उलझ जाता है और भगवान से विनती करता है सब पहले जैसा कर दो। और भगवान समय का पहिया वापस घुमा कर पीछे ले जाते हैं और सब पहले की तरह हो जाता है बीच के दिन गायब हो जाते हैं। अब कैसे कोई भगवान ऐसा करिश्मा दिखला सकता है जिस से 8 नवंबर 2016 से लेकर आज तक जो जो भी हुआ वापस पहले जैसा हो जाये। देश की अर्थव्यवस्था को पहले की तरह बनाने का कोई और उपाय उनको सूझता नहीं है। चांद पर जाकर भी हासिल कुछ भी नहीं होगा जो देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर वापस ले जा सकता हो। उनकी उलझन यही है कि कैसे इतिहास और दुनिया की जानकारी से नोटबंदी की याद तक को मिटाया जा सके। बस पुरानी बंद की करंसी हज़ार पांच सौ के नोटों के बंडल फिर उपयोग करने से बात बन सकती है।

Thursday, 5 September 2019

शिक्षक दिवस पर मन की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 शिक्षक दिवस पर मन की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      पिछले साल मैंने शिक्षक दिवस पर अपने गांव के मास्टरजी गुलाबराय जी और शहर के बचपन के अध्यापकों की बात लिखी थी। उनका आदर आज भी सभी लोग करते हैं जिन्होंने बिना कोई सुविधा होते हुए भी सरकारी स्कूल खोला था बड़े जतन से और शिक्षा देकर हम सभी को इंसान बनाने की कोशिश की थी। मैंने बताया था उनके पास बड़े शहर में घर था और सरकारी स्कूल की नौकरी कोई मज़बूरी नहीं थी उनका उद्देश्य था शिक्षा का विस्तार करना और उन्होंने जो किया कहीं दर्ज भी नहीं बस उन बच्चों और उनके माता पिता की मधुर स्मृति में हमेशा रहते हैं। मगर कल मुझे कुछ और अनुभव हुआ जिसको कल लिखना उचित नहीं था मगर लिखना ज़रूरी है। अब जो कल लिखा था उस से पहले जो नहीं लिखा गया उसी से शुरुआत करता हूं। कल से इक बेचैनी सी है मन उदास है। जो हुआ आपको बताता हूं अक्षर दर अक्षर सत्य केवल सत्य। 

      महिला दिवस पर भी ऐसी महिलाओं को शुभकामना संदेश भेजना आदत है और शिक्षक दिवस पर जो भी अध्यापक फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट में हैं उनको फोन करता हूं भले उनसे मैंने कभी शिक्षा नहीं पाई मगर कितने और लोग हैं जिनको उन्होंने पढ़ाया है। बीस तीस लोगों से बात की और तमाम लोग खुश हुए ये जानकर कि कोई उनकी समाज को दी शिक्षा की कीमत को समझता है आदर देता है। चार पांच लोग थे जो शिक्षा देने का काम छोड़ चुके हैं और किसी भी और मकसद को जी रहे हैं , फिर भी सभी शिक्षक होने पर गर्व करते हैं और दो लोगों का कहना था अगले जन्म भी शिक्षक बनना चाहते हैं। मगर अचरज हुआ इक महिला की बात सुनकर जो अध्यापिका रही और अच्छी शिक्षा देने को राष्ट्रपति से पुरुस्कार भी मिला जाने कैसे पर आज उनको शिक्षक दिवस की शुभकामना देने पर शिक्षा को लेकर बात करना ही पसंद नहीं था क्योंकि उन्होंने अपने ससुर की मौत के बाद उनकी राजनीति की विरासत को लेकर शायद जो पढ़ा पढ़ाया भूलकर अपनी महत्वाकाँक्षा को महत्व देना और सत्ता का उपयोग करना ज़रूरी समझा। ससुर की जगह विधायक बन किसी दल के बदनाम हो चुके नेताओं के करीब रहने के बाद समय बदलते ही दलबदल कर सत्ताधारी दल का दमन थाम लिया। कल उनको अपने दल के नेता को शहर के बाकी कई नेताओं की तरह खुश करना मनाना था अगले चुनाव में टिकट पाने को। जब मैंने कहा मुझे उनकी या किसी की राजनीति या विचारधारा से मतलब नहीं है और केवल आलेख इक रचना लिखना चाहता हूं शिक्षक दिवस पर उस पर विचार जानना चाहता हूं आपकी राजनैतिक सभा की बात से हटकर। वो जैसे नराज़ हुईं कह दिया आप उचित नहीं कर रहे हैं , जी यही कहा था , शिक्षक दिवस पर शिक्षा की बात करना किसी स्कूल की मुख्य अध्यापिका रही महिला से जिनसे अच्छा परिचय रहा है खट्टे मीठे अनुभव को छोड़ केवल शिक्षक से लेखक की बात इस विषय पर कैसे गलत हो सकती है। मगर शायद अपने राजनैतिक हित के सामने उनको बाकी कुछ भी दिखाई नहीं दिया और मैंने आखिर उनसे बेबाक कह दिया कि आज आपको फुर्सत नहीं बात करने की तो कल टिकट मिलने के बाद आप किस तरह वोट मांगने मेरे पास आ सकोगी। राजनीति करनी है मगर पहचान के लोगों से ऐसा व्यवहार करते हैं तो आम अजनबी लोगों से जाने किस भाषा में बात करती होंगी। ये अनुभव भी इक शिक्षा की तरह है तभी जो लिखा कल की पोस्ट से ऊपर शुरुआत इसी से की है।
     अब कल लिखी बात। युग बदल गया है आजकल सरकार स्कूल कॉलेज पढ़ाई की बात ही नहीं करती है। आपके पास स्मार्ट फोन है हर काम के लिए ऐप्स हैं सदी के महानायक तक इधर उधर जाने से मना करते हैं। पास बैठे नादान युवक से फोन लेकर सब को डिलीट कर इक वही ऐप इनस्टॉल कर देते हैं जो उनको विज्ञापन करने को ढेर सारा पैसा देती है। टीवी वीडियो कॉल के युग में कोई रेडियो पर मन की बात सुनाता है आपको वापस किसी पिछली दुनिया में जे जाता है। पढ़ कर बेरोज़गार बनोगे क्या मिलेगा पकोड़े बेचने का सबक सिखाता है बरसात का मौसम आता है जाता है पकोड़े वाला हर शहर में मशहूर है जो करोड़ों कमाता है। कौन पकोड़े नहीं खाता है कौन जलेबी खाने से घबराता है। शिक्षक दिवस पर संबोधन कोई और पढ़कर बताता है क्या पढ़ना है कैसे पढ़ना है समझता नहीं खुद आपको जो समझाता है। पहला सवाल हर साल पांच सितंबर क्यों आता है। 

पढ़ना लिखना आपका काम नहीं है पोथी पढ़कर जो सुनाते हैं उपदेशक कहलाते हैं स्कूल क्या लेने जाते हैं जो समझदार बच्चे हैं कीर्तन सुनते हैं ताली बजाते हैं। हाथ जोड़ मांगते हैं और पाते हैं भीख लेने की बात क्यों भूल जाते हैं। दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया और भीख मांगना अपराध नहीं है मज़बूरी है ये बात खुद न्यायधीश बतलाते हैं। मन की बात कहने वाले भीख मांग कर जीवन भर रहे आजकल शहंशाह कहलाते हैं। कोई भिखारी मर गया आयकर वाले फुटपाथ पर नोट गिनते हैं गिनते जाते हैं। भीख की महिमा सबको बताते हैं। कौन कहता है सरकारी लोग रिश्वत खाते हैं चढ़ावा लेकर ऊपर पहुंचाते हैं अपने मंदिर जाकर देखा नहीं भोग कैसे लगवाते हैं। भगवान को पर्दे के पीछे खिलाने की रस्म निभाते हैं आपको थोड़ा देते हैं बाकी रखते जाते हैं धर्म की दुकान की शान बढ़ाते हैं। 

मन की बात वाले जानते हैं विश्वगुरु इसी तरह कहलाते हैं विदेशी ज्ञान हासिल करने आते थे आजकल लोग विदेश पढ़ने ईलाज करवाने जाते हैं। शिक्षा आम होने से बेरोज़गारी की समस्या है अनपढ़ लोग दिहाड़ी मज़दूरी कर लेते हैं राजनैतिक सभा में भीड़ बनकर ताली बजाने को काम मिलता है साल में सौ दिन नहीं जितने दिन भी चाहो मिल सकता है थोड़े दिन ही कर गुज़र बसर हो जाता है। ज़िंदाबाद कहना किसको नहीं भाता है अनपढ़ भी बोलना सीख जाता है। पढ़ लिख कर डॉक्टर इंजीनयर बन ख़ाक छानोगे या गाली खाओगे जान से जाओगे इस तरह पैसा कमा कर चैन से रह पाओगे। अनपढ़ रहोगे मौज उड़ाओगे और लंबी आयु तक नहीं जी पाओगे , अस्पताल स्वास्थ्य सेवा से आयु बढ़ जाने का काम करते हैं देश की आबादी को कितना बढ़ाओगे। ये जीना कोई जीना है ज़िंदा कैसे रहते हैं नहीं जान पाओगे हर दिन ज़िंदगी पर पछताओगे। खाओ कसम कभी स्कूल कॉलेज नहीं जाओगे बच्चों को शिक्षक के पास नहीं लेकर जाओगे , खेलना कूदना मज़दूरी करना पकोड़े तलना चाय बनाना काबिल बन कर बोझ अपना खुद उठाओगे। कमाई हो नहीं भी हो कर फिर भी चुकाओगे। चिंता की कोई बात नहीं है जैसे जिओगे उसी तरह मर भी जाओगे खाली हाथ आये थे क्या साथ लेकर जाओगे।

Tuesday, 3 September 2019

ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) डॉ लोक सेतिया

       ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

चलो इस तरह हमने दिखला दिया कि हम संवेनशील समाज हैं। साल में दो चार बार ऐसा होता है जब हमारे बीच किसी की संवेदना जाग उठती है और कोई खबर की सुर्ख़ियों में आकर सोशल मीडिया पर छा जाता है। जैसा अभी रानू मरिया मंडल के कोलकात्ता की रेलगाड़ी में इक प्यार का नग़्मा है गीत गाने को लेकर हुआ। हर दिन हादसे का शिकार हो रहे लोगों का वीडियो बनाने वाले किसी भूखे बच्चे और गिद्ध की तस्वीर लेने वाले संवेदनारहित लोग नाम कमा लेते हैं। कोई नहीं सोचता ये किस दुनिया में हम रहते हैं जहां ऐसे हज़ारों लाखों नहीं करोड़ों लोग हुनर क़ाबलियत होते हुए भी जाने कहां कहां अंधेरी दुनिया में घुट घुट कर जीते हैं मर जाते हैं। टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में मंच पर बैठे और देखने वाले दर्शक दो पल को पलकें भिगो कर इंसानियत का दिखावा करते नज़र आते हैं। और इस के पीछे इक सच छुपा रह जाता है कि उस के इलावा और कितने गुमनामी में बेबसी भरा जीवन जीते हैं क्योंकि यहां काबलियत को नाम पहचान यूं ही नहीं मिलती है मिलती है किसी बड़े की ख़ास शख्सीयत की निगाह ए रहमदिली पड़ने के बाद। और कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो में कितनी तरह से कैसे भी कमाई करने वाले लोग दयालु बनकर उभरते हैं और उनके पास धन दौलत के अंबार कैसे जमा हुए इसकी बात कोई नहीं करता है। आपको ख़ुशी होती है किसी एक की भलाई हुए जानकर मगर कितने नहीं आये सामने कोई नहीं सोचता है। हम जिसे संवेदनशीलता समझते हैं वास्तव में वो हमारी समाज की और उच्च वर्ग की बेहरमी को दिखाता आईना हो सकता था जिसको शोषण करने वाले वर्ग ने ही तमाशा बना दिया है। 

  ये समाज रहमदिल नहीं रहा है हम अपने आस पास बेबस लोगों से कोई सहानुभूति नहीं रखते हैं कोई किसी को सहारा नहीं देता है कोई गरीब भूखे को खाना खिलाना इंसानियत नहीं समझता है। हम जाकर किसी दिन किसी को पैसे भोजन देते हैं औपचारिकता निभाने को रस्म अदायगी को अमावस को किसी त्यौहार के दिन। हमारी सरकार भी यही करती है मतलब और शोहरत की खातिर कोई ऐलान करती है और साथ साथ कोई और ढंग अपना कर अपनी तिजौरी भरती जाती है। दान का चर्चा घर घर पहुंचे लूट की दौलत छुपी  रहे , नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी  रहे। क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे।  इज़्ज़त फ़िल्म का ये गीत बड़े लोगों की असलियत को ब्यान करता है। फिर बार बार दोहराना पड़ता है अपने नाम शोहरत या कोई मकसद हासिल करने को कितना पैसा बर्बाद करते हैं रईस लोग राजनेता अमीर लोग और सरकारी विभाग भी इश्तिहार छपवाने लगवाने पर क्या उस से कोई समाज की भलाई करने की बात सोचता है। दान भी देते हैं तो नाम लिखवा कर अपनी दयाशीलता का दिखावा करने को। अधिकांश लोग उन्हें दान देते हैं जिनको शायद सहायता की ज़रूरत नहीं होती और उन्होंने इस को धर्म का नाम देकर अपने लिए सुख सुविधा का उपाय कर लिया है। वास्तविक धर्म ये नहीं कहता है सच्चा दान वो है जो आप किसी अपने पहचान वाले की तसल्ली को नाम को दिखावे को नहीं देते जब किसी को असहाय देखते हैं तो चुपचाप दे देते हैं। सच बताओ अब किस किस धर्म की जगह भूखे की भूख मिटाने का धर्म निभाया जाता है किस जगह कोई मुसाफिर या बेघर आसरा पा सकता है। 

     हम सब की अपनी चाहत और अधिक पाने की और शानो शौकत दिखाने की हमको किसी और की मज़बूरी किसी की तकलीफ़ दर्द मुसीबत समझने देती ही नहीं है। हमारा समाज अजीब है जो आडंबर पर जितना बर्बाद करता है उतने से बहुत सार्थक भलाई का काम किया जा सकता है। हर दिन समाज सरकार कितना धन खर्च करती है अनावश्यक आयोजन करने आदि पर और नेता अधिकारी अपने खुद पर। जितना खाते हैं उस से अधिक फैंकते भी हैं किसी कचरे के डिब्बे में या कभी गटर में भी जाता है भोजन। अपने कितने ऐसे दाग़ को ढकने को कभी कभी ऐसा कुछ करते हैं तो भी अपने नाम का डंका पीटते हैं। हमारा देश और समाज कुछ और हुआ करता था जैसे कोई चमन हो अब तो इक सहरा बन गया है किसी रेगिस्तान की तरह है और ये जो हम समझते हैं पानी है सबकी प्यास बुझाएगा वास्तव में इक मृगतृष्णा है। ये चमक झूठी है भटका रही है।

Monday, 2 September 2019

पाप अधर्म लूट अनैतिक असंवैधानिक अनुचित शब्दों के अर्थ - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   पाप अधर्म लूट अनैतिक असंवैधानिक अनुचित शब्दों के अर्थ

                           ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं मैं कोई धर्मों का जानकर नहीं संविधान का विशेषज्ञ नहीं पढ़ाई लिखाई भी साधारण सी है और दुनिया की सैर या ज़माने भर का अनुभव भी मुझे नहीं है। किसी गुरु से सीखा नहीं किसी साधु संत का अनुयाई नहीं कोई विशेष लगाव किसी एक धर्म से भी नहीं है। फिर भी चिंतन मनन से अनुभव से जीवन के जो भी समझ पाया हूं उस से इन शब्दों का सही अर्थ समझ सकता हूं। जैसे भी हो आजकल राजनीति में शामिल नहीं होकर भी कोई भी अछूता नहीं रह सकता देश राज्य की राजनीति के असर से। बेशक यहां बात समाज की है मगर राजनीति को अलग रखकर संभव नहीं है इसलिए उद्दाहरण वहां से लेना ज़रूरी है। 

शासक हैं सत्ताधारी नेता या विपक्षी दल से नेता हैं अथवा अधिकारी हैं जन सेवक कहलाते हैं अगर आप देश की बदहाली की चिंता नहीं करते और केवल अपने स्वार्थ की बात सोचते हैं तो अपना कर्तव्य अपना धर्म नहीं निभाते हैं फिर चाहे आप कितनी पूजा अर्चना धर्म की किताब की पढ़ाई या धार्मिक कार्य करते रहें। 

देश में लोग बेघर हैं भूखे मरते हैं और आप नेता बनकर बड़े ओहदे पर राजसी शान से रहकर देश का पैसा अपने ऐशो-आराम अपनी इच्छाओं की पूर्ति या मौज मस्ती करने पर सज धज कर महल में रहने पर खर्च करते हैं तो संविधान की भावना का अनादर करने वाले गुनहगार हैं। 

अपने भाषण दिए सभाएं आयोजित की अपनी महत्वआकंक्षा की खातिर सत्ता का दुरूपयोग किया अपनी झूठी शोहरत की खातिर देश के खज़ाने को कुछ ख़ास लोगों को देने का पाप किया और आपकी बात में अधिकांश बेमतलब की बात थी या सच नहीं झूठ बताने का जतन किया या सच पर पर्दा डालने का काम किया तो लोग कितनी भी तालियां बजाते रहें कुदरत उसको अनैतिक आचरण समझेगी और वास्तविकता सामने आने पर आपकी सारी शान बेकार जाएगी। 

राजनैतिक मकसद से जो लोग अपने नाम और पहचान का दिखावा करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं और दावा करते हैं समाज सेवा और ईमानदार होने का उनका स्वार्थ की खातिर अपने पैसे का ऐसा दुरूपयोग चाहे वो पैसा किसी भी ढंग से कमाया गया हो धर्म के ख़िलाफ़ है। शायद उतने पैसे से कितना कुछ किया जा सकता था कितने गरीबों को रोटी रहने को घर या शिक्षा स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाई जा सकती थी। और जिस जिस ने वास्तविक धार्मिक और सामाजिक कार्य की जगह ऐसा किया उसने देने वाले दाता की अनुकंपा का अपमान किया है। क्योंकि हर धर्म अधिक धन होने पर असहाय लोगों की सहायता करना कर्तव्य बताया है। 

सरकारी अधिकारिओं को देश और जनता की सेवा निष्ठा से करनी चाहिए न कि शासक दल या नेताओं की ख़ुशी और मर्ज़ी को देख उनके राजनीतिक मकसद पर ध्यान देना चाहिए और जो ऐसा करते हैं देश समाज और संविधान के गुनहगार हैं। अपने जो अनुचित किया उसका दायित्व किसी और का नहीं है और उस का फल आपको मिलना ही है। 

हम आम लोग भी इतने नासमझ नहीं हैं जो इन सब बातों को नहीं समझ सकते फिर भी जानकर भी अनुचित को उचित ठहराना या झूठ को सच समझना मूर्खता से बढ़कर अज्ञानता है। और सच नहीं बोलना या झूठ की महिमा का गुणगान करना तो कायरता है ऐसा करने के बाद अपने पूर्वजों की महानता की कथाओं की बात करना आडंबर ही नहीं छल है खुद अपनी आत्मा से भी। आपको कोई जंग नहीं लड़नी है मगर इतना अवश्य कर सकते हैं कि जो जो भी इस तरह से पाप अधर्म लूट अनैतिक कर्म असंवैधानिक और अनुचित काम करते हैं उनका आदर सम्मान नहीं करें उनको मंच पर फूलमाला नहीं पहनाएं। अधर्म का साथ नहीं देकर भी अच्छा कर्म किया जा सकता है।

Sunday, 1 September 2019

वक़्त के साथ न बदलने वाले ( पुराने चावल ) डॉ लोक सेतिया

  वक़्त के साथ न बदलने वाले ( पुराने चावल ) डॉ लोक सेतिया 

आधुनिकता से जी घबराता है तो हम पुरानी बातों को याद करते हैं। क्या दिन थे क्या ज़माना था वो भी बहुत कुछ नहीं था फिर भी कोई कमी नहीं लगती थी और आजकल कितना कुछ है फिर भी महसूस होता है कुछ भी नहीं है जैसे। किस बात की कमी है या हर बात की कमी है। चलो आज देखते हैं हम कितना बदले लोग कितने बदले हैं ये नया दौर का लाया है और पिछले दौर का हमने क्या खोया है आधुनिक बन क्या पाया है। 

कल शाम खूब झमाझम बरसात हुई सावन का महीना पानी को तरसते बीता तो पहली बार बारिश ने सब भिगोया। तन भीगे मन भीगे नहीं शायद क्योंकि हर कोई सोशल मीडिया पर घबराया हुआ लग रहा था। किसी बिरहन ने याद पिया की आये नहीं लिखा। खबर शहर से राजधानी पहुंच गई फोन आने लगे सब ठीक है , बरसात नहीं हो जैसे मुसीबत हो। ये टीवी चैनल वालों की शरारत है जो हर मौसम का मज़ा खराब कर दिया है अजीब अजीब भयानक शीर्षक देकर खबर के। बारिश के मौसम में बरसात नहीं होगी तो क्या लू चलेगी कुदरत को इल्ज़ाम देना अच्छी बात नहीं है। 

बरसात में कभी गरीब की झौंपड़ी को घबराहट हुआ करती थी , कोई सजनी साजन से लिपट जाती थी बिजली से डरने के बहाने। अब हैप्पी रैन से लगता है बारिश की नहीं रात की बात है बुरा हो इस नामुराद सोशल मीडिया का व्हाट्सएप्प पर संदेश लिखा कुछ पढ़ा कुछ जाता है। आई लव यू इतना सस्ता हो गया है कि पढ़ कर धड़कन बढ़ना तो दूर की बात लगता है रस्म निभाने की बात है। ऐसे में कोई आशिक़ पहले की तरह हाले दिल लिख बैठे तो उधर बिना पढ़े ही डिलीट कर ट्रैश के कूड़ेदान से भी बाहर कर देता है कोई। बारिश ने अमीर लोगों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। होटल जाने का मन था मगर घर पर ही ऑनलाइन मंगवा खाना पड़ा है। आशिक़ बादल को चाहते हैं महबूबा को धूप से डर लगता है चेहरा ढक कर रखते हैं रंग काला नहीं पड़ जाये या मेकअप ही धुल गया पसीने में तो मुसीबत होगी कोई पहचान नहीं सकेगा। 

कितना अच्छा था अख़बार कम पढ़ने वाले कई होते थे चौपाल में मिल बैठते इक पढ़ा लिखा पढ़ कर बताया करता ताज़ा खबर और बाकी लोग सुनते रहते। अब हर कोई पढ़ लिख कर नासमझी का शिकार है खबर क्या है कोई नहीं जानता और अफ़वाह से लेकर बकवास तक को समाचार समझने लगे हैं। शिक्षित होने से समझ नहीं आती है और चिंतन मनन की आदत नहीं रही फुर्सत भी किसे है। यार मुझे क्या किधर क्या हादिसा हुआ लोग दुर्घटना को मनोरंजन समझने लगे हैं। सामाजिकता निभाने को दिन बना लिए हैं स्मार्ट फोन पर संदेश भेज औपचारिकता निभाई जाती है। हंसते हैं खुश नहीं होते और आंसू बहाते हैं दुःख दर्द का एहसास नहीं करते हैं। लगता है इंसान मशीन बन गया है जिस में हलचल होती है शोर भी सुनाई देता है संवेदना नहीं होती है। बाहर शीतल पवन चलती है और मैं मूर्खता कर रहा बंद कमरे में ये फालतू बात लिख रहा जिस को कोई पढ़ेगा भी नहीं। फेसबुक पर कभी लोग पढ़ते थे अब लाइक करने तक उपकार करते हैं शीर्षक से ही मान लेते हैं जो हम समझते हैं वही लिखा होगा। 

पुराने चावल की खुशबू हुआ करती है मगर अब बाज़ार में सब नकली है पुराने चावल खरीद लाए उस पर पिछले महीने की तारीख लिखी थी। चावल पुराने नहीं हैं बेचने वाली दुकान कितनी पुरानी है ये कहते हैं। ऐसे में कोई ढाबे वाला सौ साल पुरानी दाल खिलाता है कमाल की बात है। नदी से पानी बहता रहता है तो कोई उसको बता सकेगा ये कितनी सदियों से बहकर समंदर में जाता रहा है। समंदर जिस का नाम है सबसे प्यासा वही है उसकी प्यास बुझती नहीं कभी भी। उलझन ऊपर से नीचे तक वही है चलना सबको है राहें कितनी हैं मगर मंज़िल का अता पता किसी को नहीं है। मैं भी कब से खड़ा हूं वहीं पर जहां से चला था दुनिया बदल रही थी मैं देखता रह गया।

Saturday, 31 August 2019

साहिर की बात कौन समझा ( अमृता-इमरोज़ की बात ) डॉ लोक सेतिया

      साहिर की बात कौन समझा ( अमृता-इमरोज़ की बात ) 

                                            डॉ लोक सेतिया 

    कल अमृता के सौंवे जन्म दिन पर मैंने भी उन्हें याद किया था। मगर कुछ लोगों ने ऐसा करते हुए साहिर को लेकर कुछ ऐसे चर्चा की मानो उनका अपराध था अमृता से या किसी से प्यार नहीं करना। कहते हैं इश्क़ पर बस नहीं चलता हो जाता है किया नहीं जाता तो फिर साहिर को कोई प्यार करने को विवश कैसे कर सकता है। किसी का किसी से प्यार सच्चा और गहराई से हो सकता है मगर जिस से हो उसको भी होना लाज़मी नहीं है। मगर जाने क्यों लोग किसी को इल्ज़ाम देने लगते हैं जबकि वास्तव में जिस से जितना प्यार जिस तरह मिला उसी को बहुत समझना चाहिए। मैंने इक ग़ज़ल में इक शेर कहा है :-

                  किसी को बेवफ़ा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता ,

                   निभाई थी कभी उसने भी उल्फत याद रखते हैं।      

 
   मैंने इक कहानी लिखी थी वास्विकता शीर्षक से जिस की नायिका जिसे चाहती है विवाह नहीं करने पर दिल में मलाल रहता है क्यों हुआ ऐसा। अंत में समझ आता है कि नायिका से बढ़कर उस की चाहत थी जिसने केवल खुश करने दिखाने को प्यार करता है विवाह नहीं किया था। कितनी बार अमृता को लेकर पढ़ा किसी का लिखा हुआ तो लगा जैसे साहिर ने कोई गुनाह किया अमृता के प्यार को स्वीकार नहीं कर के। एकतरफा प्यार दिल में रखते हैं जिसको चाहते हैं उसको विवश नहीं किया करते और कोई साहिर अगर किसी अमृता को प्यार नहीं करता तो झूठ का दिखावा कर उसको धोखा नहीं देता साफ कहता है उसको ऐसी कोई अनुभूति नहीं है तो वो सच्चा इंसान है। साहिर की ज़िंदगी अपनी थी उसके जीवन का अनुभव अपने पिता के मां को छोड़ने से अलग था और कितने लोग जानते हैं उसको मां से बढ़कर कोई नहीं लगता था। मगर शायद कम लोग इस बात को जानते हैं कि औरत को लेकर साहिर की सोच कितनी अच्छी थी। 

    औरत ने जन्म दिया मर्दों को , साधना फिल्म का गीत हर कोई नहीं लिख सकता है। साहिर की तरह मजाज़ ने भी औरत को लेकर बेहद संजीदगी से नज़्म लिखी है। तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था। और साहिर की नज़्म ताजमहल पढ़कर आपको समझ आएगा जिस को अक्सर लोग मुहब्बत कहते हैं वास्तव में प्यार नहीं है और साहिर कहते हैं तुम मुझे ठुकरा के भी जा सकती हो। तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। शायद फैज़ अहमद फैज़ की बात भी कम लोग समझ सकते हैं जो कहते हैं मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग। आपको कोई हसीना लगती हो सकती है मगर मुमकिन है शायर की चाहत उसका वतन उसका समाज हो। ऐसे लोग बहुत हैं शायद मैं भी ऐसा ही हूं जिसको किसी हसीना से अधिक और बढ़कर इश्क़ अपने देश से समाज से है और उसको लगता है जब देश में इतनी भूख गरीबी भेद भाव अन्याय है तब किसी की ज़ुल्फ़ों की छांव में उसको चैन कैसे मिल सकता है। 

 कितने आशिक़ हुए जिन्होंने विवाह नहीं किया आपस में हीर लैला का विवाह किसी और से हुआ।  राधा कृष्ण का प्यार महान है मगर क्या राधा ने कान्हा को पाने की चाहत की और नहीं मिलने की शिकायत की। महिलाओं की बात पर पुरुष को कटघरे में खड़ा करने वाले कभी किसी औरत के पुरुष को ठुकराने की बात या उसको उपयोग कर मतलब निकलते छोड़ने की बात पर खामोश हो जाते हैं। हेमा मालिनी और मीना कुमारी दोनों की कहानी को समझना होगा तब आपको धर्मजी की मुहब्बत सच्ची नहीं लगेगी। क्या किसी ने राज कपूर नगरिस ही नहीं उनकी और भी मुहब्बत की दास्तानें सुनी हैं अमिताभ रेखा की और बॉलीवुड की कितनी ऐसी कहानियां हैं। मगर हर रिश्ते की अपनी सीमा होती है और किसी को प्यार नहीं हासिल होता है तो उसको लेकर भी इक गीत है सुनो और समझो ज़रा। 


मगर कभी कोई भी दोषी नहीं होता है और किस्मत से मिलन नहीं होता है। मिलन फिल्म और सरवतीचन्द्र की कहानी ऐसी भी है। ये गीत भी सुनते हैं। 



  मगर अमृता को फिर भी कोई इमरोज़ मिला तो था जिसने उसकी वास्तविकता को समझ कर भी उसका साथ निभाया बहुत ठुकराये आशिक़ को कोई और नहीं अपनाता है। इसलिए हर कहानी को किसी एक किरदार की नज़र से नहीं बाकी किरदार की बात को भी शामिल कर समझना होगा तब मुमकिन है कहना पड़े। विवाह नहीं होना नाकाम मुहब्बत नहीं होती अगर सच्चा प्यार है तो समझते हैं ये भी कि :-

            न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं , मगर क्या करें अपनी रहें जुदा हैं।

Friday, 30 August 2019

ढंग आधुनिक राजनीति का ( उल्टी पढ़ाई ) डॉ लोक सेतिया -- ( सबक दो )

   ढंग आधुनिक राजनीति का ( उल्टी पढ़ाई ) डॉ लोक सेतिया 

                                        ( सबक दो ) 

 पहले सबक में आपने समझा था कि देशभक्ति का पेटेंट जिस सत्ताधारी दल के पास है आपको बस उसी में शामिल हो जाना है। कोई विचारधारा का लफड़ा नहीं है अब विचार आदर्श और मकसद एक ही है शासन करना और मौज मनाना। आपको मान लेना है कि उस दल को छोड़ बाकी सभी दल सत्ता तो क्या विपक्षी दल होने के भी अधिकारी नहीं हैं। लेकिन ध्यान रखना आपकी निष्ठा दल से नहीं समाज से तो कोई सरोकार ही नहीं और देश को लेकर कभी चिंता ही नहीं करनी है , आपके लिए बस कोई एक नेता जो बड़े पद पर है वही भगवान से भी बढ़कर है। उसको लेकर कोई शंका कोई विरोध कोई आलोचना आपको स्वीकार नहीं करनी है। उसकी हर बात आखिरी सच है और विवेचना से ऊपर शंका से परे विश्वास नहीं अंधा भरोसा करना है। अब आपको चुनावी खेल का खिलाड़ी बनना है और कोई नियम नहीं पालन करना है इस खेल का नियम ही यही है , जो जीता वही सिकंदर कहलाता है। हारी बाज़ी को जीतना जिसे आता है वही बाज़ीगर सबको भाता है , कोई बही है न कोई खाता है जो भी देता है वही पाता है। सबका सबसे यही रिश्ता है सभी का स्वार्थ का ही नाता है। 

नेता जी की उलझन बढ़ गई है सब को दल में शामिल करने से दाल किसकी गलेगी नहीं जानते हैं। इतने केंचुए पलड़े में हैं कोई किसी को छोड़ता नहीं है सब एक जैसे हैं टांगखिंचाई में माहिर हैं। किसी का अपना कोई जनाधार नहीं है सबका आधार ऊपरवाला है उसके नाम से डूबते पत्थर तैरते हैं कहते हैं। उसी की माया है उसी का करिश्मा है उसी के नाम का भरोसा है। धन दौलत क्या है अपना ईमान ज़मीर आत्मा तक बिक जाये कोई मलाल नहीं बस उम्मीदवार होने का अवसर मिल जाये। टिकट का सवाल है बाबा , हाथ पसारे पांव पकड़े आरती गाते भेंट चढ़ाते मन में यही चाहत रखते हैं। बंद कमरे में बिकवाली में हर कोई टिकट की कीमत बढ़ चढ़ कर अपनी हैसियत अनुसार लगाता है। जिसकी पॉलिश चमकीली जूता उसी पर रहम खाता है , चांदी का जूता क्या गज़ब ढाता है। फ़ैल गई ये माहमारी है हर बेटा बाप पर भारी है कोई भी रहा नहीं अनाड़ी है। नेता जी को सबने यही कहा है कीमत की कोई चिंता नहीं आप बताओ उस से बढ़कर देने को तैयार हैं। आपका हाथ सर पर होते ही धन दौलत की बरसात होती है टिकट मिली तो अमावस भी पूनम की रात होती है। 

आलाकमान को ऐसे में ख्याल आया है चुनाव आयोग को समझाया है कि बस दल के नाम पर बल्कि उनके नेता के नाम पर वोट मिलने हैं किसी भी व्यक्ति के नाम का कोई महत्व ही नहीं है। इसलिए ईवीएम मशीन में हर जगह उनके दल के चुनाव चिन्ह के सामने बड़े साहब का नाम लिखा हो और जीत के बाद उनकी मर्ज़ी जिस को विधायक सांसद घोषित कर दें और चाहें तो बारी बारी सब को साल या महीने या बेशक कुछ दिन को कुर्सी पर बिठा दें जब चाहें कुर्सी से गिरवा दें। एक दिन भी राज करने को मिल जाये कम नहीं होता है। एक दिन के बादशाह की कहानी सबने सुनी हुई है देखी नहीं अब देख कर मज़ा लेंगे। हर दिन या हर सप्ताह या हर महीने या फिर साल बाद नया शासक हर शहर को मिलेगा। सौ दो सौ साल की बात है सबकी बारी आएगी। सबको अच्छे दिन मिल सकेंगे। मामला विचाराधीन है। खाली झोली लिए हर कोई खड़ा है उसी दर पर भिखारी बनकर।

Wednesday, 28 August 2019

बदनसीबी विधायक-सांसद नहीं हुए ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  बदनसीबी विधायक-सांसद नहीं हुए ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      भटकती रहती हैं आत्माएं जीवन भर भी मौत के बाद भी रूह को चैन नहीं मिलता जिनकी चाहत अधूरी रहती है। कोई कोई खुशनसीब होता है जिस का भाग्य जागता है और आधी रात को दिल्ली से फोन आता है उठो जागो आपको सांसद का चुनाव लड़ना है। मेरे शहर में बदनसीब कितने हैं कोई संख्या का हिसाब नहीं मगर दो एक हैं जिनके भाग्य से छींका टूटा और बिल्ली शेर बन गई। ऐसे शेर , राजनीति वाले शायरी वाले नहीं , अभी भी ख्वाब बुनते हैं फिर से सितारा बुलंदी पर होने के। शायर फिर भरा पड़ा है खुद को भावी विधायक घोषित करने वालों के रंगीन इश्तिहारों से। खबर है किसी की करोड़ों की बेनामी संपत्ति ज़ब्त हुई है वो भी दिन थे उनका भी सिक्का चलता था और इक दिन उनके वालिद भी नसीब वाले थे जो उम्मीद से बढ़कर मिला था उनको। नसीब चालाक लोगों का चमकता है भोले भाले लोग नसीब के भरोसे पीछे रह जाते हैं। इक डॉक्टर साहब को डॉक्टरी से कुछ नहीं मिला सांसद बनवा दिया किसी दल के बड़े नेता ने तो आजकल खुद ही दल बनाए हुए हैं और इसी उम्मीद पर जीते हैं कि सितारे फिर बुलंदी पर होंगे। इक और सांसद बनकर भी धन दौलत का अंबार जमा करना नहीं सीख पाए उनका नाम भी लोग भूल गए हैं। कोई बहुत चालबाज़ भी हैं जिनकी किस्मत ने धोखा दिया बार बार और तमाम हथकंडे आज़मा कर भी झोली खाली है। अभी भी दिल में अरमान दबाए हुए हैं किसी दिन नसीब साथ देगा। ऐसे सभी लोग भूखे नंगे गरीब नहीं हुआ करते ये वो हैं जिनके पास सभी कुछ होता है चैन नहीं होता ऊपर जाने पहली कतार में जगह नहीं मिलने का मलाल रहता है। 

          राजनीति इक ख़तरनाक़ जंगल है जिस में हर जानवर छोटे जानवर को निगल जाने को ताक लगाए हुए है। यकीन करना इस जंगल में कोई किसी का अपना नहीं है जिस किसी के कांधे पर चढ़कर ऊंचाई पाई उसी को ठोकर लगाते हैं। मोक्ष स्वर्ग नर्क जन्नत दोजख कुछ भी नहीं मांगते हैं इनको शासन चाहिए भले किसी भी जगह का हो। जवानी में फ़िल्मी नायिका को पाने के ख्वाब देखना बुरा नहीं मगर जीवन भर ढलती आयु में भी राम नाम को छोड़ किसी नेता के नाम की माला जपना बदनसीब होने का सबूत है। पठान लोग इक कहावत सुनाया करते हैं जिस में शिक्षा विवाह घरबार से दौलत शोहरत सब को लेकर बताया है कि इस आयु तक नहीं मिलता तो कभी नहीं मिलेगा। सत्ता को लेकर ये लागू नहीं है हमने देखा है जिस की आखिरी सांसों की गिनती खत्म होने को थी अचानक किसी नेता का आकस्मिक निधन होने पर कुर्सी क्या मिली संजीवनी मिल गई। बुढ़ापे में फिर से जवानी लौट आई थी। सच्चा राजनेता इसी आस पर ज़िंदा रहता है। अभी तो मैं जवान हूं अभी तो मैं जबान हूं। सोशल मीडिया पर किस को टिकट मिलेगी से लेकर कौन बनेगा विधायक सांसद का खेल चलता रहता है। हर किसी ने नौकर चाकर नियुक्त किये हुए हैं जो उनको सबसे आगे साबित करने को हर दिन पोस्ट लिखते हैं। कितने ऐसे पढ़े लिखे लोगों को काम मिला हुआ है , मामला एक अनार सौ बीमार से बढ़कर हज़ारों को रोग लगा हुआ है। सब को देशभक्ति समाजसेवा करनी है और सत्ता बिना ये मुमकिन नहीं है। नामुमकिन को मुमकिन बनाने का नाम कुर्सी नाम की वस्तु है। 

            ऐसे में किसी ने खुद को विधायक घोषित ही कर दिया है। आजकल यही है जनता को कोई विकल्प देना खतरा मोल लेना है आपको मुझी को चुनना होगा का आत्मविश्वास होना कमाल की बात है। ऐसे सभी नेताओं को किसी दिन इक सभा उन लोगों की याद में आयोजित करनी चाहिए जो उनकी तरह अधूरे ख्वाब लेकर इस बेरहम दुनिया से चले गए उनकी याद भी किसी को नहीं आती। जिनको मौत के बाद नाम की चिंता है उनके लिए किसी शायर का इक शेर है। 

                   बाद ए फ़नाह फज़ूल है नाम ओ निशां की फ़िक्र ,

                         जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या। 

      सत्ताधारी दल हाथ जोड़ फिर से याचक बनकर आया है , पांच साल तक झूठ का परचम लहराया है सच को ठिकाने लगा जाने किस जगह दफनाया है ये देखो कौन कौन आया है। समंदर समझने वाला हर शख्स दो बूंद मांगने आया है इस खारे समंदर ने कितना तड़पाया है। जनसेवा की बात से कितना बहलाया है जनता जानती नहीं कितना धोखा खाया है। सामने मंच पर मासूम भला सा किरदार निभाते हैं मंच के पीछे बदले सुर नज़र आते हैं। दाग़ अच्छे हैं उनकी विचारधारा है हर अपराधी उनका सहारा है , किसी बाबा की याद दिल में आती तो होगी , कितना बड़ा उसका योगदान था जिताने में। उनका प्यार किस्सा शामिल रहा है इनके  फ़साने में , कातिल अपराधी को महत्मा बताने में। शर्म नहीं आई उसके अवैध निर्माण को वैध बनाने को नियम को बदलने को अध्यादेश लाने में। सुशासन क्या इसी को कहते हैं।  हर तरह घना अंधेरा है देश को समस्याओं ने हर ओर से घेरा है आप कहते हैं अमावस की अंधियारी रात को यही नया सवेरा है। आप की नहीं देश की जनता की बदनसीबी है। ये कैसी मुहब्बत है देश से प्यार की बातें सुनते हैं तो लगता है कोई भीड़ दहशत फैलाती है। अच्छे दिन की बात नहीं होती , गंगा भी मैली नज़र आती है। लो देखो ये बारात आई है मगर सबने चेहरे पर बांध रखा है सेहरा दूल्हा बना हर बाराती है। सेज अपनी सभी को सजानी है लूट की लिखी गई कहानी है। जिसको समझते हैं रुत सुहानी है घुटन और भी बढ़ानी है। ये महबूबा बड़ी मस्तानी है।

 

 


Monday, 26 August 2019

कड़वी दवा मीठा ज़हर खोखला धर्म भटका समाज गंदी राजनीति ( यहां से वहां तक की बात ) डॉ लोक सेतिया

   कड़वी दवा मीठा ज़हर खोखला धर्म भटका समाज गंदी राजनीति 

                      ( यहां से वहां तक की बात ) डॉ लोक सेतिया 

    आज बहुत विषयों को लेकर साथ साथ लिखना है। मगर पहले दो ख़ास बातें हैं जो अपने तस्वीर पर देखी हैं लिखी हुई पढ़ भी ली मगर समझी नहीं लगता है। पहली बात डॉ लियो रेबेलो कहते हैं कि। अपने आप को शिक्षित करें अन्यथा , 1 डॉक्टर्स मरीज़ों को मरेंगे। 2 इंजिनीयर के बनाए पुल गिर जाएंगे। 3 धर्मगुरु मानवता और इंसानियत का कत्ल करेंगे और बांटेंगे। वकील अधिवक्ता और न्यायधीश अन्याय अत्याचार का साथ देंगे। इसलिए वो शिक्षा हासिल करें जो शुद्ध विचार आचरण और सभी की बराबरी की शिक्षा देते हों। अन्यथा देश और विश्व और मानवता का विनाश होना तय है। 


पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं हैं मगर फिर भी ऊपर लिखी बातें पढ़कर लगता है वास्तव में हमारी शिक्षा में कुछ कमी रही है तभी हर कोई पढ़ता जो भी है सीखता पहली बात पैसा बनाना है किसी भी तरह से। जिस मकसद से पढ़ाई की थी शायद वो बात गौण हो जाती है और सफलता का पैमाना आपकी शोहरत और दौलत से आंकते हैं बेशक उसे पाने को अपने ईमान को भी मार दिया हो।

दूसरी तस्वीर अफ्रीका की कहावत की है जो ये बताती है कि , समझदार कभी भी सभी कुछ नहीं जानता ,  केवल मूर्ख  ही हैं जो सब जानते हैं। अपने आस पास समाज को देखते हैं तो सभी खुद को सब जानने वाला मानते हैं जिस की रत्ती भर जानकारी नहीं समझ नहीं उस को लेकर समझाते हैं हर किसी को। सुकरात कहते हैं जो सोचता है उसे सब पता है वो कुछ भी नहीं जानता और जिसको लगता है उसको सब कुछ नहीं मालूम वो कुछ जानता है।








       अब सिलसिलेवार स्वास्थ्य धर्म राजनीति समाज की वास्तविकता की बात। सबसे पहले हम लोगों की नासमझी की बात जो बिना विचारे समझने की कोशिश किये बातों में किसी की आकर खुद ही धोखा खाते हैं मगर सबक नहीं लेते हैं। मैं एक डॉक्टर हूं और 45 साल से अपना व्यवसाय करता रहा हूं और मैंने इस व्यवसाय से कोई दौलत नहीं कमाई है। खुद को सच्चा ईमानदार नहीं कह रहा मगर जो सच मेरा अनुभव है आपको बताता हूं। सही सलाह ईमानदारी से देने से शायद ही कोई मरीज़ खुश हुआ हो , ऐसा करने के बाद आपको आपकी फीस भी लोग नहीं देना चाहते हैं और अधिकतर मरीज़ आपको छोड़ जाते हैं। आपको कमाई करनी है तो उनकी मर्ज़ी से उनको दाखिल कर ग्लूकोज़ की बोतल और इंजेक्शन देना और अनावश्वक जांच लिख कर लैब से या घटिया दवा लिख कर केमिस्ट से कमाई का हिस्सा लेने का ढंग अपनाना होगा। जो लोग कहते हैं डॉक्टर्स लूटते हैं उनको ये करने पर विवश अपने ही किया है जो खुद चाहते हैं लाखों रूपये की आमदनी मगर डॉक्टर से उम्मीद करते हैं उचित ढंग से उपचार की फीस भी नहीं ले। हर कोई बड़े से बड़ा अमीर भी डॉक्टर से मुफ्त सलाह लेने की बात सोचता है। अब घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या। इस सब में हमारी सरकारों का भी बहुत अधिक योगदान है जो किसी गुनाह से कम नहीं है। सबसे पहले कोई नियम ही नहीं क्लिनिक अस्पताल को लेकर क्या क्या जगह सुविधा कितना स्टाफ कितना प्रशिक्षित और क्या सुविधा कितना उसका भुगतान लेना होगा। और कमीशनखोरी पर कोई अंकुश नहीं और अस्पताल है या कोई जानवरों का दड़बा है जिस में मरीज़ को साफ हवा पानी बैठने की जगह भी नहीं होती है। सरकार का कानून बनाने का लाभ क्या है अगर उसको लागू नहीं किया जाता और आज भी अस्पताल खुलते हैं जहां नियमानुसार नहीं खोले जा सकते हैं। अगर खुद को कोई ज़रूरत हो तो हम डॉक्टर शायद अपने जैसे किसी अस्पताल जाकर उपचार करवाना चाहते हैं हमेशा कोई अच्छा अस्पताल चुनते हैं और अधिकांश जो दवाएं अपने रोगियों को देते हैं खुद नहीं उपयोग करते और ये सभी पैथी के डॉक्टर्स की बात है। जानते हैं हम जो सुविधा देते हैं औसत दर्जे की है मगर दावा करते है यही सब से अच्छी है।

  आयुर्वेद को लेकर पहले भी लिखा है आज थोड़ा अलग ढंग से बात कहनी है। कोई बाबा जिस ने आयुर्वेद को लेकर कोई शिक्षा नहीं पाई और योग को लेकर जो मनचाहा कह कर कारोबार बनाया है कमाई की है। खुद उनका ही साथी योग के बावजूद बीमार होता है और आयुर्वेदिक दवाओं का पैरोकार होने के बाद और सबसे बड़ा झूठ कि हमने आयुर्वेद को लेकर शोध किया है कहने और हर रोग का उपचार जनता है दावा करने के बाद एलोपैथिक ईलाज करवाने को विवश है। बुराई अपने ईलाज या किसी पैथी में नहीं है बुराई लोगों को जो गुमराह किया उस से कितने लोग छले गए कोई नहीं जानता। मगर सरकार की आपराधिक लापरवाही है जो कोई कुछ भी झूठा सच्चा दावा कर सकता है और देश भर में अपने नाम पर नीम हकीम लोगों को ईलाज करने का अधिकार बांटता है और लोगों के जीवन से खलवाड़ करता है और ये अकेला नहीं है। आजकल आयुर्वेद के नाम पर रोग की दवा नहीं सौंदर्य प्रसाधन और ताकत की मानसिक परेशानी खत्म करने का तेल से निरोग रहने को च्वनप्राश या कोई टॉनिक बेचने जैसे काम पैसा बनाने को करते हैं मगर सरकार को कर को छोड़ कोई चिंता नहीं है। सच्ची बात ये है कि स्वास्थ्य सेवाओं से बढ़कर बीमार कोई व्यवस्था नहीं है।  हर पैथी अपनी जगह अच्छी है मगर सबकी सीमाएं भी हैं एलोपथिक दवाओं के दुष्प्रभाव भी हैं और आयुर्वेद को लेकर शोध की कमी भी है जिस का कारण सरकार का सौतेलापन रहा है , आज भी आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेद के बीच बजट की खाई बहुत बड़ी है।

     हैरानी की बात नहीं है कि देश की राज्य की सरकार को उचित शिक्षा और सही स्वास्थ्य सेवा उचित ढंग से उपलब्ध करवाने की ज़रूरत ही नहीं है। निजि लोगों के भरोसे छोड़ दिया गया है जनता को। आपको अच्छी स्वास्थ्य सेवा मिलती है आल इंडिया मेडिकल साईंसिस अस्पताल में ख़ास लोगों को तुरंत मगर जब कोई आम नागरिक जाता है दिल का वाल्व सिकुड़ गया है तब छह साल बाद की तारीख मिलती है। कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। सवाल मुश्किल नहीं है मगर जब स्वास्थ्य शिक्षा को लेकर चिंता ही नहीं और हर विभाग काबिल और उस विषय के जानकर को नहीं सौंपते मंत्री बना और बंदरबांट की जाती है तब कोई व्यवस्था सुधर कैसे सकती है। अभी भी सरकार ने इक ज़रूरी बात को नहीं समझा है कि किसी महानगर के बड़े अस्पातल में नहीं हर कम से कम जिला स्तर तक बुनियादी सुविधाओं का उपलब्ध होना ज़रूरी है। बड़ी सड़कें इमारतें या पार्क और खूबसूरत माहौल रौशनियां उतनी महत्वूर्ण नहीं हैं। 

  अपने सरकार का चलन देखा है खुद सबसे बड़ा झूठ उसके इश्तिहार हैं जिनकी कोई ज़रूरत नहीं होती अगर जो कहते हैं वही सच होता। धर्म और भगवान के नाम पर भी यही है। राजनीति में सत्ता पाना मकसद है और जनकल्याण या देश समाज की बात केवल भाषण देने को विषय हैं। चुनाव से पहले ही कितने लोग सत्ताधारी दल की टिकट के दावेदार बन कर बड़े नेताओं की चाटुकारिता करते हैं। खूब धन लुटाते हैं उनकी जयजयकार पर उनके झूठे महिमामंडन पर उनको बुलवा कर या शहर आने पर उनके साथ तस्वीर बनवा उसको सोशल मीडिया पर डाल करीब होने का दावा दिखावा करने जैसे काम करने पर ज़ोर लगा देते हैं। जनता की सेवा की बात पर कहते हैं विधायक सांसद बनकर की जा सकती है। मगर यही लोग खुद को समाजसेवक भी घोषित करते हैं बिना समाज को कोई भी योगदान दिए हुए। लिखने वालों को सम्मानित होने का चस्का हुआ करता है और नाम के साथ परिचय में बहुत विस्तार से विवरण बताते हैं लेकिन इधर बड़े बड़े नेता देश विदेश से सम्मानित होने तमगे जमा करने में भूल जाते हैं उनका उदेश्य क्या है। सत्ता या विपक्ष दोनों जितना धन चुनाव लड़ने जीतने पर खर्च करते हैं उसी को गरीबों की ज़रूरतमंद लोगों की भूखे नंगे लोगों की सहायता पर खर्च करते तो जो कहते हैं शायद करने की बात सच हो भी सकती थी। मगर राजनीति को मूलयविहीन और स्वार्थ में अंधी बनाने में किसी तथाकथित महान नेता को भी कोई संकोच नहीं है।

उद्योग कारोबार करने वालों ने कमाई का कोई ईमानदारी से मापदंड नहीं रखा है। जबकि सीमा से अधिक मुनाफा कमाना कारोबार नहीं चोरी लूट डाका डालने का अहिंसक तरीका होता है जो पुण्य नहीं अपराध है अपने ही देश समाज के साथ। चाहे कोई जो भी करता है खुद ईमानदारी का पालन नहीं करता मगर बाकी किसी की बात हो तो जमकर बुराई करते हैं। किसी की देशभक्ति पर सवाल करने वाले किसी पहले नेता को दोष देने वाले नहीं जानते खुद उनका क्या योगदान है क्या जिसकी बुराई करते हैं उन जैसा भी काम कर सकते हैं। शानदार ज़िंदगी जीते हुए उनको बुरा भला कहना जिन्होंने समाज और देश के लिए लड़ाई लड़ी अन्याय का विरोध किया बड़ा आसान है। मगर खुद सच बोलते हुए घबराते हैं कहीं कोई मुसीबत नहीं पड़ जाये। सत्ता और स्वार्थ की राजनीति देश समाज की भलाई की बात तो नहीं होती है।

     धर्म कोई भी हो धर्म के नाम पर केवल उपदेश देते हैं खुद उस पर नहीं चलते हैं। तमाम ऐसे गुरु जो समझाते हैं खुद समझते तो अच्छा होता। गली गली धर्मस्थल बनाने से बेहतर बहुत धार्मिक कार्य किये जा सकते थे। विलासिता से आधुनिक सुख सुविधाओं साधनों का उपयोग करते हुए सादगी से जीने का उपदेश और अपने पर धन दौलत संपत्ति जमा करते जाना क्या ये त्याग की बात है क्या खुद को महाज्ञानी बताना इक अहंकार नहीं है और अहंकारी लोग साधु संत महात्मा नहीं हुआ करते हैं। सच्चा धर्म का उपदेश कोई नहीं देता आजकल कि सच्ची ईमान की कमाई अच्छी है झूठ की दौलत से। कुल मिलाकर हम ऐसा समाज बन गए हैं जो अपनी असलियत को छुपाने को विवश है क्योंकि खुद अपनी नज़र में हम जो कहते हैं या समझते हैं ऐसा होना अच्छा है होते नहीं हैं। हीरा खोकर कंकर पत्थर जोड़ रहे हैं हम लोग लगता है। सब औरों से जो उम्मीद करते हैं खुद उस पर खरे नहीं उतरते हैं। हमने अपनी दुनिया को खूबसूरत नहीं बनाया और भी बदसूरत बनाते जा रहे हैं। नहीं जानते किस दिशा जाना है और किस तरफ हम चले जा रहे हैं।

      


Sunday, 25 August 2019

ऊपरवाले की डायरी से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया

    ऊपरवाले की डायरी से ( उल्टा-सीधा ) डॉ लोक सेतिया 

   ये इक काल्पनिक घटना है और इसका किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है। ये वास्तव में हुआ मगर आप इसको सपने की बात कह सकते हैं। घने जंगल से गुज़रते हुए आसमान से इक डायरी गिरती हुई नज़र आई जिस पर बहुत बातें लिखी हुई थीं जिनको समझना कठिन नहीं था मगर आसान भी नहीं था। जाने किस भाषा में लिखा था फिर भी बिना भाषा जाने ही डायरी का पन्ना खोलते ही जैसे कोई आवाज़ सुनाई देती है जो भी लिखा कोई पढ़कर सुनाता लगने लगा जबकि कोई भी आस पास नहीं था। उन सब से पहली बात समझ आई कि डायरी ख़ास वीवीआईपी लोगों को लेकर है। और इसका संबंध ख़ास लोगों की मरने की इच्छा को लेकर है। पहले इक लघुकथा जैसी बात याद आई है उसको सुनना काम आ सकता है। 

इक अधिकारी का कुत्ता मर गया तो उसको दफ़नाने को शहर भर के लोग जमा हुए और हर कोई उस कुत्ते की वफादारी के किस्से सुना रहा था जो अधिकारी ने बता रखे थे। मगर जब अधिकारी सेवानिवृत हो गया तब उसकी माता जी की मौत पर नाम को थोड़े लोग आये थे। ये सच सभी समझते हैं जानते हैं इसलिए नेता और अधिकारी लोग चाहते हैं काश उनकी मौत कुर्सी पर रहते या सत्ता पर होते हो और उनकी मौत का शानदार शोक का आयोजन किया जाये। इस डायरी की गोपनीय बातें जानकर समझ आया जिन ख़ास लोगों की मौत शानदार ढंग से समारोह पूर्वक किसी त्यौहार की तरह मनाई जाती है और समझते हैं ये असमय निधन हुआ है वास्तव में उन लोगों की इच्छा को ऊपरवाले ने स्वीकार किया था। सब जानते हैं हर कोई अनाम बनकर खो गया वक़्त बदलते ही की तरह जीना नहीं चाहता न ही मरना ही चाहता है। किसी की भी मौत पर कोई भी खुश नहीं हो सकता है न ही मरने के बाद कोई खराब बात कहना उचित है मगर इक बात सभी जानते हैं जाना सभी को इक दिन है और कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता , आनंद फिल्म का डायलॉग मशहूर है। ज़िंदगी और मौत तो ऊपरवाले के हाथ है , हम सब तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं कौन कब कैसे उठेगा कोई नहीं जानता है। 

     मौत को लेकर कुछ शेर हैं , मेरी इक ग़ज़ल का भी शेर कुछ अलग तरह का है। पहले उस शेर से शुरुआत करते हैं फिर जाने माने शायरों के भी शेर सुनते हैं। 

मौत तो दरअसल एक सौगात है , हर किसी ने इसे हादिसा कह दिया।  
( डॉ लोक सेतिया तनहा )

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं , और क्या जुर्म है पता ही नहीं। 
ज़िंदगी मौत तेरी मंज़िल है , दूसरा कोई रास्ता ही नहीं।                  
( किशन बिहारी नूर )

यहां हर शख्स हर पल हादिसा होने से डरता है , खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है। 
अजब ये ज़िंदगी की कैद है दुनिया का हर इंसां , रिहाई मांगता है और रिहा होने से डरता है। 
( राजेश रेड्डी ) 

डायरी पढ़कर सुनाने वाले ने आज इतना ही बताया है बाकी बाद में एक एक कर के बताने का वादा किया है। मगर इस पोस्ट पर आपको अपनी इक नज़्म भी सुनाता हूं क्योंकि मैंने भी इक आरज़ू दिल की कब की संजो राखी है। ये रचना तीस साल पुरानी लिखी हुई है। 

( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।   

Saturday, 24 August 2019

कोई मंज़िल नहीं इस राह की ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

      कोई मंज़िल नहीं इस राह की ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

बात कुछ शायरी से करते हैं।  

पहले मेरी तीन ग़ज़ल और इक ग़ज़ल फ़िल्म की बहुत पुरानी लता जी की गाई हुई मुझे पसंद है :-

1 पहली ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ,
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में ,
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये ,
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई।
( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई ,
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा ,
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई।

 2  दूसरी मेरी  ये ग़ज़ल भी पढ़ कर देखते हैं :- डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इन लबों पर हसी नहीं तो क्या
मिल सकी हर ख़ुशी नहीं तो क्या।

बात दुनिया समझ गई सारी
खुद जुबां से कही नहीं तो क्या।

हम खुदा इक तराश लेते हैं
मिल रहा आदमी नहीं तो क्या।

दोस्त कोई तलाश करते हैं
मिल रही दोस्ती नहीं तो क्या।

ज़ख्म कितने दिए मुझे सबने
आंख में बस नमी नहीं तो क्या।

और आये सभी जनाज़े पर
चल के आया वही नहीं तो क्या।

यूं ही मशहूर हो गए "तनहा"
दास्तानें कही नहीं तो क्या। 

 3  तीसरी मेरी ये ग़ज़ल और :- डॉ लोक सेतिया "तनहा"

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ

न रौशनी का कहीं निशां। 

हैं लोग अब पूछते यही

कहां रहें जाएं तो कहां। 

बहार की आरज़ू हमें

खिज़ा की उसकी है दास्तां। 

है जुर्म सच बोलना यहां

सिली हुई सच की है ज़ुबां। 

जला रहे बस्तियां सभी

नहीं बचेगा कोई मकां। 

न धर्म कोई न जात हो

हमें बनाना वही जहां। 

उसी ने मसली कली कली

नहीं वो "तनहा" है बागबां। 

अब बात हमारे समाज की वास्विकता की है :-

घर रहने को कैसा हो ये बात नहीं चर्चा इस बात की है कि घर कैसा हो जो अपनी शान को बढ़ाए। सामान अपनी सुविधा को देख कर नहीं शानो शौकत दिखाने को महंगा  और बेमिसाल होना चाहिए। ये ऐसी भटकी हुई सोच है जो कोई राह ही नहीं मंज़िल तो खैर क्या होगी। जीने को सामान होना ठीक है सामान की खातिर जीना उचित नहीं और सामान को हासिल करने को जीना हराम करना तो पागलपन है। पागलपन की भी कोई सीमा होती है चांद को पाने को हाथ ऊपर करना अलग बात है थाली में पानी में चांद की छवि को पकड़ने की कोशिश बचपन की भोली बात होती है। लोगों को ये खेल भाने लगा है। 

  सरकार भी यही करती है जनता को बच्चा समझ कर थाली में पानी में चांद की छवि दिखाने की तरह भाषण विज्ञापन से देश को खुश करना चाहती है। बहुत कुछ बिना कहे समझा जा सकता है आखिर में इक पुरानी फिल्म की ग़ज़ल को सुनते हैं क्या खूबसूरत ग़ज़ल है :-

        चांद निकलेगा जिधर हम न उधर देखेंगे , जागते सोते तेरी रहगुज़र देखेंगे।

        इश्क़ तो होटों पे फ़रियाद न लाएगा कभी , देखने वाले मुहब्बत का जिगर देखेंगे। 

        ज़िंदगी अपनी गुज़र जाएगी शाम ए ग़म में , वो कोई और ही होंगे जो सहर देखेंगे। 

        फूल महकेंगे चमन झूम के लहराएगा , वो बहारों का समां हम न मगर देखेंगे। 

मोदी जो जाने किस किस खूबसूरत दुनिया की लाने की बातें करते हैं। सामने तो पहले से अधिक बदहाली दिखाई देती है। ये तो पंडित मौलवी जैसे लोगों का मौत के बाद जन्नत स्वर्ग मिलने का ख्वाब जैसा लगता है। वो लोग भी खुद आज सब कुछ का मज़ा लूटते हैं और बाकी लोगों को झांसे में रखते हैं अभी मर मर कर जी लो बाद में मरने के बहुत मिलेगा। सरकार राजनेता भी और क्या करते हैं।

Thursday, 22 August 2019

पढ़नी-पढ़ानी है उल्टी पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  पढ़नी-पढ़ानी है उल्टी पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     अध्यापक जी शब्दों के नये अर्थ खोज लाये हैं और पढ़ने वाले बच्चों को जिनकी आयु पचास से कम क्या होगी समझा रहे हैं। बचपन की शिक्षा अब काम की नहीं है आधुनिक काल की उल्टी पढ़ाई पढ़नी लाज़मी है उनको जिनको राजनीति की दुकानदारी करने का चस्का लगा है। शरीफ और शराफत का थोड़ा अंतर है जब तक बदमाशी सामने नहीं आती है कोई शरीफ माना जाता है और शराफत इसी को कहते हैं कि आपकी बदमाशी की बात आपको छोड़ किसी को खबर नहीं हो। राज़ को राज़ रखने को कोई राज़दार नहीं बनाना चाहिए नहीं तो हमराज़ ही राज़ फ़ाश किया करते हैं। अपराध अपराध नहीं होता जब तक सबूत नहीं सामने आये और बेगुनाही गुनाह बन जाती है जब आप साबित नहीं कर देते कि गुनहगार नहीं हैं। सीधी सच्ची बात है हर कोई चोर है पकड़े जाने तक साहूकार कहलाता है। 

    सरकार और विपक्ष उसी सिक्के के दो पहलू हैं जीत हार  सिक्का उछाल कर होती है हेड या टेल। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है हारी बाज़ी को जीतने वाला बाज़ीगर कहलाता है। सत्ता रहते जिसको लूटने का अधिकार कहते हैं विरोधी दल का हो जाने पर लूट का दोषी अपराधी हो जाता है , लूट की छूट इक विशेषाधिकार की तरह है। जुर्म और इंसाफ भी साथ साथ चलते हैं हाथ पकड़ एक दूजे का उनका नाता ही असली नाता है। जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज था हेरा फेरी की थी वक़्त बदला तो उनको सरकारी गवाह बना उनके ब्यान का ऐतबार कर किसी और को धर पकड़ते हैं जीना नाम ही पहले नहीं था फाइल में मगर जिनके खिलाफ मुकदमा था उन पर भरोसा किया जा सकता है क्या हुआ जो उन पर कोई और कत्ल का भी मुकदमा चल रहा है। गोलमाल है जी सब गोलमाल है सीधे रस्ते की ये टेढ़ी ही चाल है। शतरंज में वज़ीर की चाल इसी तरह की होती है राजा को बचाना है प्यादे की कोई औकात नहीं है सरकारी गवाह मुकरते हैं सालों बाद जांच एजेंसी साबित नहीं कर पटी गुनाह या करना नहीं चाहती बदले हालात में। ये जांच एजेंसी सरकार की कठपुतली है जैसे सत्ता चाहती है नचवाती है उसकी धुन पर नाचना होता है। सरकार की मर्ज़ी बिना बताये समझती है अदालत भी जानती है , देखो थोड़े दिन पहले न्यायधीश ने कहा था एजेंसी वाले लोगों से आप राजनीतिक मामले में बड़ी जल्दी करते हैं और मुकदमें लंबित पड़े रहते हैं। आज खुद अपनी कही बात को भुला दिया है। निज़ाम बदलता है तो न्याय का न्यायधीश का नज़रिया बदलते देर नहीं लगती है। 

   अदालत का काम न्याय करना होता है मगर देश की सबसे बड़ी अदालत बार बार मिल बैठ कर आपसी समझौता करने को कहती रहती है। इंसाफ इंसाफ होता है और समझौता कभी इंसाफ नहीं होता क्योंकि उस का मकसद ही सभी को खुश करने को थोड़ा थोड़ा न्याय थोड़ा थोड़ा फायदा भी नुकसान भी मंज़ूर करना होता है। लोग जब अदालती तौर तरीकों से तंग आ जाते हैं तभी मिलकर समझौता करते हैं। अदालत जब कहे आपस में समझौता कर लो तब अर्थ होता है अदालत को इंसाफ नहीं करना ज़रूरी लगता है। हमारे देश में इंसाफ जीते जी नहीं मरने के बाद मिलने की उम्मीद होती है मरना आपकी मर्ज़ी नहीं है और परेशान हो कर ख़ुदकुशी की तो इक अपराध और शामिल हो जाता है। कत्ल करने पर सज़ा मिले नहीं मिले ख़ुदकुशी की तो अदालत आपको छोड़ेगी नहीं। जो नेता कभी देश की अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था के रक्षक थे अब अकूत संपत्ति और अनुचित ढंग से आमदनी करने के आरोपी हैं , अगर उनके दल की सरकार होती तो जांच एजेंसी कानून अदालत बेबस होते जैसे उन लोगों के अपराधों को लेकर हैं जो अपराधी हैं मगर सत्ताधारी दल में शामिल हैं। यहां वक़्त बदलते ही खलनायक को नायक नायक को खलनायक बना दिया जाता है। देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से कौन उम्मीद करता है कभी उसको ऐसे भी हिरासत में लेने का ढंग अपनाया जा सकता है। चाहे किसी भी दल के नेता हों संविधान की पालना की उनसे अपेक्षा की जानी चाहिए। विडंबना है कोई ऐसे पद पर रहा है जिसको आज जकड़ा गया है और कोई जो पहले इसी तरह कानून से जांच एजेंसी से भागता रहा आंख मिचोली खेलता रहा तब पकड़ा गया आज पद पर है।

      मगर ये टिप ऑफ़ दी आइसबर्ग ,  हिमशैल का शीर्ष है। कोई नहीं जो इन सभी धनपशुओं की वास्तविकता को उजागर करने का साहस करे। हम्माम में नंगे राजनेता ही नहीं धर्मगुरु ही नहीं जाने कितने अधिकारी कितने इंसाफ के रक्षक और अधिकांश बड़े बड़े उद्योगपति कारोबारी हैं जिन्होंने देश की संपदा का अधिकांश इस तरह से हथिया रखा है कानूनी हथकंडों से सत्ता की मिलीभगत और दुरूपयोग से। इन की कथनी महान है आचरण बेहद निम्न स्तर का चोरों से भी बढ़कर डाका डालने वालों का है। देश सेवा की ओट में यही चलता रहा और चल रहा है मगर हम देख कर भी सोचते नहीं करोड़ों रूपये चुनावी खर्च का अर्थ यही है। जो टीवी अख़बार मीडिया कभी सच बताया करता था सरकारी विज्ञापन के रूप में चोरी के माल का भागीदार बनकर शामिल है इस लूट के खेल में। सब का अपना हिस्सा है और नतीजा देश की जनता को बदहाली के रूप में मिलता है।  कुमार विश्वास की इक कविता याद आई है सुनते हैं।



      आपको याद है कि भूल गए ये वही सीबीआई है जो अपने ही दफ्तर में आधी रात को छापा डालने जैसा काम करती है। सीबीआई की अदालत में सीबीआई के अधिकारी सीबीआई के अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हैं और आधी रात को जो किसी सीबीआई अधिकारी की जांच करवा रहा था उसको बदल दिया जाता है और जिस पर आरोप लगा था उसको जांच करने वाले की जगह नियुक्त कर न्यायधीश बनाने का काम किया जाता है। हम रोज़ अध्याय पढ़ते हैं भूल जाते हैं मगर राजनेता अधिकारी आपस में कुश्ती लड़ते रहते हैं। उनका ये अजब खेल हमने बचपन में खेला था , चोर सिपाही का। बारी बारी चोर सिपाही बनते हैं। मगर बच्चे भोले होते हैं उनको चोरी आती है न चोर को पकड़ना ही। मगर देश की सत्ता पर आसीन लोग जाने कब से यही खेलते हैं भरी सभा में भाषण देते हुए कितनी बार देखा है नेताओं को ये धमकी देते हुए कि सबके कच्चे चिट्ठे उनके पास हैं। उनको केवल अवसर आने पर उपयोग करना है कोई सच की न्याय की बात नहीं करनी है। 

Tuesday, 20 August 2019

उम्मीद का दामन छोड़ दिया ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

 उम्मीद का दामन छोड़ दिया ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

  नहीं मुझे किसी से कोई गिला नहीं कोई शिकवा-शिकायत भी नहीं है। इंसान तो क्या भगवान से भी कुछ भी नहीं कहना बाकी अब। बहुत मनाया हर किसी को सरकार से भी चाहा कहना सब हाल देश समाज का अपना भी उनका भी जो मुझे बेगाना समझते हैं। हर किसी को अपनाने की कोशिश में खुद अपने आप को ही खो दिया अब तो अपनी तलाश भी करने को फुर्सत नहीं है। मुझे न दुनिया समझ आई न दुनिया के दस्तूर न भगवान से सरकार तक पता चला कि है क्या और नज़र आता क्या है। सब ने कहा हमारा समाज धार्मिक है हमारा देश महान है यहां के लोग दया धर्म की मिसाल हैं बड़ी अच्छी अच्छी परंपरा की मिसाल देते हैं हर कोई भला होने का दम भरता है हर किसी को औरों में बुराईयां दिखाई देती हैं खुद को सब सोचते हैं सबका शुभचिंतक हैं। अब ऐसे अच्छे महान लोगों में मुझ जैसा आदमी जो किसी भी काबिल नहीं जीना चाहे भी तो कैसे जी सकता है। बचपन से सभी ने कमियां बताई हैं नहीं किसी को कुछ भी अच्छाई नज़र आई कभी मुझ में। गुनहगार समझते हैं लोग बेबाक सच कहता है जो भी।  भला इस सूरत ए हाल में कोई आदमी कैसे जी सकता है , हम सभी पल भर भी मरते  हैं  इसी कोशिश में कि शायद कोई अपना या बेगाना या कोई दोस्त या अजनबी या शहर गांव समाज का कोई खुश हो जाये मगर नहीं संभव होता है ये कभी भी। सच का पक्ष लेना साथ देना कोई नहीं चाहता , सच बोलने वाले को पागल कहते हैं और झूठ की जय जयकार करते हैं समझते हैं बड़ी अच्छी बात करते है।  चलो पुरानी सब बातों को छोड़ आज की बात करते हैं। 

          सरकार जनता की भलाई को बनाई जाती है और हर सत्ताधारी जनता का सेवक होने का दावा करता है। विकास के नाम पर सरकार कितनी इमारतें बनाती है ये जितने लोग हैं पहले से इनके पास कितने आलीशान भवन हैं बंगले महल से बढ़कर सरकारी दफ्तर भी और तमाम विभाग के अनगिनत मकान ज़मीन और साधन भी। नहीं होता तो जिस मकसद से विभाग बनाये जनता की समस्याओं का निवारण का काम। आज सब से अधिक जगह भवन दफ्तर अन्य विभागीय जायदाद इन के पास है जिनका उपयोग तक नहीं होता है फिर भी और बनाने की बात की जाती है जबकि देश की करोड़ों की आबादी को रहने को घर नहीं पढ़ने को स्कूल कॉलेज धनवान लोगों के लिए अस्पताल भी गरीब लोगों के लिए कम रईस लोगों के लिए आधुनिक और तमाम सुविधा से लैस। महान देश की यही निशानी है कुछ को बहुत किसी को पेट भरने को दो वक़्त रोटी भी नसीब नहीं। जाने किस धर्म की बात करते हैं क्या नफरत सिखाने वाला कोई धर्म हो सकता है। ऐसे समाज में जीना कौन चाहता है। सरकार आदेश देती है सभा में नेता भाषण देते हैं हर दिन उनके इश्तिहार गली गली सड़क चौराहे पर नज़र आते हैं। आम नागरिक सुन सकता है बता नहीं सकता अपना दर्द अपनी व्यथा , नहीं किसी अधिकारी को नेता को सुनने की चाहत नहीं फुर्सत नहीं ज़रूरत नहीं। सब अपने खुद को जो नहीं हैं बताने की बात करते हैं। भगवान की बात क्या करें सरकार की तरह कितना उसी के नाम पर जाने किन किन लोगों ने जमा किया हुआ है जिसको धार्मिक कार्य दीन दुखियों की सहायता पर नहीं बाकी सब पर खर्च किया जाता है। संचय नहीं करने का उपदेश देते हैं मगर सबसे अधिक संचय वही करते हैं जो खुद को धर्म के जानकर बताते हैं। आशावादी कोई चाहे भी कैसे बना रह सकता है। विकास मानवता का होता तो कुछ बात थी सरकार और संस्थाओं ने अपने भवन अपने खातिर तमाम साधन खड़े करने को विकास नाम दे दिया है। अदालतों में इंसाफ की हालत दफ्तरों में काम की चाल बिगड़ी है मगर चमक दमक बढ़ रही है।

   जनता पर नियम लागू किया जाता है ये नहीं हुआ तो आपका परिसर बंद आपका कारोबार बंद किया जा सकता है। सरकारी विभाग हर काम में असफल रहते हैं उनको बंद करने की कोई बात नहीं करता। काश उन पर भी नियम लागू किया जाता जिस काम को विभाग बनाया जिस कर्तव्य को अधिकारी कर्मचारी नियुक्त किये वो काम नहीं हुआ तो उनकी होने की ज़रूरत क्या है। हर नियम की तलवार आम जनता पर दहशत कायम रखने को है और असंभव नियम बना देते हैं या फिर कमाल की बात सरकार अपने कानून को लागू करने पर बदलती रहती है पचास बिस्तर तक के अस्पताल पर कानून नहीं लागू किया जायेगा ऐसा करने से अपने तीन चौथाई लोगों को छूट दे दी। हर किसी पर समान नियम एक देश एक कानून की चर्चा होती है तो ऐसा किसी एक राज्य की बात क्यों हो देश भर में और सबसे पहले खुद कानून बनाने वालों पर सख्ती से लागू हो। किसी भी तरह का अपराध अनधिकृत निर्माण अवैध कब्ज़ा जिन सरकारी अधिकारियों के समय हुआ उन्होंने होने क्यों दिया उनके पद पर होने का औचित्य क्या था। ज़रूर उनकी मिलीभगत रही होगी उनको छोड़ना अर्थात वही सब भविष्य में होने देना।

       गरीबी की रेखा की बात कोई नहीं करता बल्कि अब सरकार आंकड़े देती है इतने करोड़ भूखे नंगे गरीबों को क्या क्या सहायता दे रही है। जनता को भिखारी रखकर देश का विकास नहीं हो सकता है। जिस बात पर सरकार को शर्म आनी चाहिए उसी को एहसान बता रहे हैं। ये भी लूट है कि आपको राजा महाराजा की तरह शानो शौकत से रहना पसंद है जिस देश में लोग दो वक़्त रोटी क्या साफ पीने के पानी को तरसते है मगर आपके सामने मिनरल वाटर की बोतल सजी रहती हैं। आपको सब सस्ते में मुफ्त में हासिल होना ये कैसी देश की जनता की भलाई है जनसेवा है। राजनीतिक चंदे को गोपनीय बनाना विदेशी चंदे का हिसाब नहीं बताना और हर दिन सभाओं पर बेतहाशा धन उड़ाना देश की जनता की बदहाली पर ठहाके लगाना है। नहीं जनसेवक नहीं हैं जो लोग संसद विधायक होने की कीमत जीवन भर लेते हैं। ये देश संपन्न है इसको गरीब रखा है कभी विदेशी लुटेरों ने तो अब अपने ही चुने विधायक संसद और नियुक्त अधिकारी कर्मचारी वर्ग ने। इनकी तथाकथित सेवा की बड़ी महंगी कीमत चुकाते हैं हम लोग। देश का मंत्री प्रधानमंत्री राज्य का मुख्यमंत्री या बड़े अधिकारी सफ़ेद हाथी की तरह हैं जिनका मकसद जनता की भलाई नहीं सत्ता की मलाई खाना है। जब ये अपने इश्तिहार छपवाते हैं तो कोई नहीं पूछता ये अपने दिया है या जनता को उन्हीं का धन भी नाम भर को देने को महान बताते हैं कोई श्वेत पत्र जारी हो कितना धन खुद इन पर खर्च किया गया और उसका औचित्य क्या है। देशभक्ति देशसेवा जनता की भलाई का नाम देकर जो किया गया उसको रहबर बनकर रहजनी कहते हैं अर्थात रखवाला बनकर लूटने का रक्षक बनकर भक्षक का काम करना। सबसे बड़ा अपराध इन्होने देश के संविधान को अपनी ज़रूरत या मर्ज़ी से बदला तोड़ा मरोड़ा है उसकी भावना को दरकिनार करते हुए। स्वार्थ में अंधे लोग देश समाज को नफरत की आग में झौंकते हैं सत्ता की रोटियां सेंकने को उनसे उम्मीद रखना खुद को धोखे में रखना होगा।

                                           

Sunday, 18 August 2019

चांद तन्हा है आस्मां तन्हा ( कहानी पाकीज़ा की ) डॉ लोक सेतिया

चांद तन्हा है आस्मां तन्हा ( कहानी पाकीज़ा की ) डॉ लोक सेतिया 

कहानी साहिबजान की है बाज़ार के कोठे से गुलाबी महल तक की सफर की। जिनको शौक होता है नाच देखने का उनको किसी औरत का दर्द कब समझ आता है। शुरुआत मीना कुमारी की शायरी से करते हैं। 

चांद तन्हा है आस्मां तन्हा , दिल मिला है कहां कहां तन्हा। 

ज़िंदगी क्या इसी को कहते हैं , जिस्म तन्हा है और जां तन्हा। 

बुझ गई आग छुप गया तारा , थरथराता रहा धुंआ तन्हा। 

हम सफर गर मिले भी कहीं , दोनों चलते रहे तन्हा तन्हा। 

जलती बुझती सी रौशनी के परे , सिमटा सिमटा सा इक मकां तन्हा। 

राह देखा करेगा सदियों तक , छोड़ जाएंगे ये जहां तन्हा। 




उनका निज़ाम है उन्हीं का फरमान है महिलाओं की भी चिंता है और जिनको खूबसूरती का लुत्फ़ लेने का रहीसाना शौक है उन लोगों को भी खुश करना है इसलिए गरीबी की दलदल से निकलने को उसको सभी का दिल बहलाने को नाचना गाना है। अब किस को फुर्सत है समझता उसकी मर्ज़ी क्या है किस किस ने कैसे कैसे कहां कहां उसका दुपट्टा छीना छेड़खानी की। लोग उतावले हो रहे हैं गुलाबी महल जाने को अब कोई कानूनी अड़चन नहीं है। खूबसूरत महिलाओं को अस्मत के बदले सोना चांदी गहने कपड़े और सजने धजने को बन संवर कर नाचना गाना सीख कर दिल बहलाने को सब मिल सकता है। लोग आएंगे उनसे खिलवाड़ करेंगे और लौट जाएंगे अपनी पाप की कोई निशानी देकर।  जब जब फूल खिले की कहानी कश्मीर की कली की कितनी कहानियां हैं मगर ताजमहल की कहानी की बात और है शहंशाह पहले अपनी पसंद की महिला को बेवा बनाते हैं उसके शौहर का कत्ल करते हैं फिर जी भर उसके साथ जिस्मानी प्यार खेलते हैं मर जाने पर उसकी बहन से निकाह करते हैं और अपनी मुहब्बत की यादगार ताजमहल बनवाते हैं। शाहजहां की सात बीविओं में छोटी थी मुमताज और चौदवहीं बार संतान को जन्म देते समय उसकी मौत हुई थी। किसी ने कहा था कि मुमताज बनने की आरज़ू मत करना क्योंकि ताजमहल लोगों ने देखा है मुमताज ने नहीं देखा।

  शासकों का इश्क़ पागलपन हुआ करता है जिसको अपनाना चाहते उसकी सहमति की ज़रूरत नहीं समझते हैं। बाद में मानने के इलावा कोई विकल्प नहीं होता है। मुग़ले आज़म फिल्म में कलाकार को राजा अनारकली तोहफ़े में देने की बात कहते हैं तब कलाकार कहता है अब समझ आया कि शहंशाहों के ईनाम और ज़ुल्म में कोई फर्क नहीं होता है। नाफ़रमानी का अंजाम हाथी के पांव तले कुचला जाना है समझाता है और इनकार कर देता है। अभी सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ ऐसा कहा भी है कि अभिव्यक्ति पर पाबंदी अनुचित है। मगर यही अदालत इस को अनदेखा करती है कि जिसके भविष्य की बात है उस से कोई नहीं पूछता उसको क्या चाहिए। इक कविता याद आती है महिला को लेकर , जो कहती है उसको सुनार को मत देना किसी लोहार संग ब्याह देना जो मेरी बेड़ियों को काट दे और मुझे आज़ाद कर दे। कोई भी महिला किसी की कैद में नहीं रहना चाहती
आप मैना को पिंजरे में बंद कर देंगे तो उसका मधुर संगीत नहीं सुनाई देगा। वो किसी बाज़ारी कोठे पर बिठाई गई हो या चाहे किसी शानदार राजभवन जैसे गुलाबी महल में उसकी आवाज़ का दर्द समान रहता है। किसी की आज़ादी छीनकर बदले में कुछ भी देने से कोई खुश नहीं होता है। गुलामी की ज़िंदगी से बेहतर समझा था जिन लोगों ने मौत को उन्होंने हंसते हंसते सूली को चूमा था।

    दुनिया का हर तानशाह शासक खुद को मसीहा और देशभक्त समझता रहा है। मगर वास्तव में तानाशाह को सत्ता को छोड़ किसी की चिंता नहीं हुआ करती है। पाकीज़ा फिल्म कमल अमरोही का शाहकार है जिस को बनाने में बीस साल का विलंब उन पति-पत्नी के संबंध खराब होने के कारण हुआ। कम लोग जानते हैं कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को गुस्से में आकर तलाक दे दिया था मगर बाद में पछतावा था लेकिन जब फिर से निकाह करने की बात की तब मुस्लिम धर्म गुरुओं ने पहले किसी और से निकाह और शारीरिक संबंध बनाने का नियम बताया जिस पर मीना कुमारी का कहना था अगर मेरी सहमति के बिना कोई भी मेरे साथ ऐसा रिश्ता कायम करता है तो मुझ में और किसी बाज़ारी वैश्या में क्या फर्क रह जाता है। जब चाहा पत्नी को छोड़ दिया जब मन चाहा फिर अपनाना चाहा इसको प्यार नहीं कहते हैं। संदेश समझ आया कि  नहीं एकतरफा मुहब्बत प्यार नहीं ताकत के दम पर सितम करना होता है। जिस को चाहते हैं अपनाना उसकी सहमति बिना किसी भय के है तभी उचित है।

 


 

 



  


संविधान बदलते बिना जाने बिना समझे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  संविधान बदलते बिना जाने बिना समझे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

       ये बात क्यों किसी ने नहीं सोची अभी तक कि जिनको संसद विधायक बनाते हैं या जिन अधिकारियों  को देश का संविधान लागू भी करना है और उसकी भावना का आदर करते हुए सुरक्षित भी रखना है पहले उनको देश के संविधान की समझ तो हो। हर उम्मीदवार को पहले ये इम्तिहान देना ज़रूरी हो कि संविधान का मकसद क्या क्या है। अन्यथा नहीं लें तो मुझे लगता है जिनको संसद विधानसभाओं में संविधान की अनुपालना करनी है उनकी परीक्षा ली जाये तो अधिकांश को उत्तीर्ण होने लायक अंक भी नहीं मिलेंगे। जिनको पता ही नहीं मतलब क्या है उन्होंने अपनी मनमानी अपनी मर्ज़ी या सुविधा से संविधान में बदलाव तक किया है। जैसे कोई अधिवक्ता अदालत में मुजरिम का जुर्म जानकर भी उसको बचाता है अपनी कमाई की खातिर और न्याय की आंखों में धुल झौंकता है न्याय का पक्ष नहीं अपने कारोबार को देखते हुए। डॉक्टर इंजीनयर या शिक्षक अगर अपनी जानकारी को इस तरह गलत मकसद से उपयोग करते हैं तो अनुचित है तो ये नियम सभी पर लागू होना चाहिए। अब जिन नेताओं को समझ ही नहीं संविधान की उनसे कानून और संविधान की सुरक्षा की उम्मीद बंदर के हाथ तलवार देने का काम जैसा है। क्या यही नहीं होता रहा सत्ताधारी नेताओं ने देश के संविधान को बदलने को उचित अनुचित की चिंता छोड़कर मनमाने ढंग से कोई भी तरीका या रास्ता अपना कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहा है। अब तो संभलना होगा उनको पता भी है उन्हें किस संवेदनशील विषय पर सोच विचार कर निर्णय करना है अपने विवेक का उपयोग करते हुए न कि किसी आलाकमान के आदेश पर देश और संविधान के हित को दरकिनार कर देश विरोधी कार्य करना है। देश संविधान किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता से बहुत ऊपर है। कहीं हम नीम हकीम खतरा ए जान जैसा काम तो नहीं करते आये हैं या फिर हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।



           ये कुछ उसी तरह है जैसे धार्मिक किताबों को हम पढ़ते नहीं समझते नहीं मगर उनको मानने की बात करते हैं उन की बताई राह चलना नहीं केवल हाथ जोड़ना सर झुकाना जानते हैं। माता पिता गुरु की बात नहीं मानते उनको नासमझ मानते हैं पर लोकलाज दिखावे को पांव छूते हैं हाथ जोड़ नमस्कार करते हैं उनका कहना नहीं मानते हैं। मंदिर कोई भवन नहीं केवल स्थापित मूर्ति नहीं हर धर्म देवी देवता की बताई सच्चाई अच्छाई न्याय की राह पे चलने का भाव रहने से धार्मिक स्थल बनता हैं अन्यथा आडंबर करना है। आज हम देखते हैं धर्म कोई सद्मार्ग दिखाने का नहीं इक कारोबार बन गए हैं भक्त बढ़ रहे हैं धर्म नहीं अधर्म बढ़ता नज़र आता है। हमने वोट मांगने आये नेताओं से कभी पूछा तक नहीं उनको संविधान की कितनी जानकारी है और क्या उनकी सच्ची आस्था है देश के कानून और संविधान में। जो लोग संविधान की धज्जियां उड़ाते हैं हम कैसे उनको संसद विधानसभा भेज सकते हैं।

      अब सवाल उठता है जनमत को लेकर तो सबसे पहली बात ये समझने की है कि हमारी व्यवस्था में कितने विधायक सांसद पचास फीसदी से अधिक मत पाकर विजयी होते हैं। आम तौर पर सरकार को जिस भी दल की हो देश या राज्य में हुए मतदान का पचास फीसदी से कम ही हासिल हुआ होता है। लेकिन तब भी अगर कहीं बहुमत किसी को दोषी समझ ले या ऐसा राय बना दी जाये जो किसी को अपराधी मानती हो मगर देश की अदालत और कानून उसको बेगुनाह निर्दोष समझते हैं तो भीड़ का न्याय लागू नहीं किया जा सकता है। देश का संविधान कानून के अनुसार चलता है कबीलाई इंसाफ से हर्गिज़ नहीं।


इक कहानी है पुरानी जिस में कोई घर का रखवाला बन जाता है मगर भीतर मन से डरा हुआ रहता है कहीं उसको मिला सब कोई चुरा नहीं ले जाये। बचाने को घर को हर तरफ आग के शोलों से घेर देता है और सब कुछ घर का जलाकर राख कर देता है। घर पर कब्ज़ा उसका कायम रहता है मगर घर का कुछ भी बचता नहीं है। नफरत की आग ऐसी लगाई है कि हर तरफ सभी उसी आग में खुद भी जलते हुए लगते हैं और बाकी लोगों को भी नफरत के लपेट में लेना चाहते हैं।