Sunday, 21 October 2018

शोध अच्छे दिनों पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        शोध अच्छे दिनों पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     दादा जी याद किया करते थे वो भी क्या दिन थे दो रूपये में घर की महीने भर की ज़रूरत का सामान मिल जाता था। अच्छे दिन की सही परिभाषा यही है। हर दौर में सुनते हैं ऐसे खराब दिन आएंगे ख्वाब में भी नहीं सोचा था। गुज़रा हुआ ज़माना आता नहीं दोबारा। तभी समझ जाना था जब कोई अच्छे दिन लाने की बात कर रहा था।  गया वक़्त कभी वापस लौट कर नहीं आता है हां आशिक़ ज़रूर कहते हैं मेहरबान होकर बुला लो मुझे जब चाहो , मैं गया वक़्त नहीं हूं जो आ भी न सकूं। गुज़रे वक़्त की ताबीर नहीं ला सकते तो तस्वीर दिखला रहे हैं , ज़ालिम क्या ज़ुल्म किया करते थे समझाने को ज़ुल्म ढा रहे हैं। देखो आपको भी वही पुराने दिन अच्छे थे समझ आ रहे हैं। बुरा वक़्त ठहरता है जाने का नाम ही नहीं लेता अच्छा वक़्त कब चला गया पता ही नहीं चलता है। जो लोग पछता रहे हैं दिल को अब इस तरह बहला रहे हैं चलो अच्छे दिन नहीं आये तो क्या बुरे दिन बस अभी जा रहे हैं। राज़ की बात है जो आज हम बतला रहे हैं आपको अच्छे दिनों से मिला रहे हैं। सामने देखो , उस तरफ मेरी तरफ नहीं दूसरी तरफ दो हमशक्ल साथ साथ आ रहे हैं। 
       अच्छे दिन बुरे दिन दोनों जुड़वां भाई हैं राम और शाम सीता और गीता की तरह। आते जाते रहते हैं उसी घर में बारी बारी से। जब जो जिस घर में रहता है तब उस घर में उसी के जैसे दिन रहते हैं। महलों वाले गरीबों से कहते हैं हम से मत पूछो कितने बेचैन रहते हैं अच्छे दिन हैं मगर बड़े ज़ालिम हैं हर घड़ी लगता है महलों को अभी ढहते हैं। अच्छे दिन का सुख रहता नहीं अधिक दिन जब तक रहता है और अच्छे दिनों की चाहत खुश होने नहीं देती है , बुरे दिन साथ निभाते हैं जाते नहीं आसानी से। इस दुनिया में खलनायक ही अच्छे दिन वापस ला सकता है शरीफ नायक तो बेचारा सितम सहता है। नायक किसी काम का नहीं खलनायक बड़े काम आता है। शराफत से अच्छे दिन नहीं ला सकते आदमी को थोड़ा खराब होना चाहिए , मौका मिलते ही बराबर हिसाब होना चाहिए। बर्बाद करने वाले को भी बर्बाद होना चाहिए। 
       अच्छे दिन पूछते हैं भाई बुरे दिन तुम रहते कहां हो , बुरे दिन कहते हैं तेरी तलाश में रहता हूं। हर कोई यही गलती करता है उनकी तलाश में रहता है जो आने नहीं हैं बीत चुके हैं। अच्छे दिन एक सपना है बुरे दिन वास्तविकता है। लोग सपनों के पीछे भागते हैं , राजनीति केवल रेगिस्तान की दूर दूर तक फैली गर्म रेत जैसी है जिसमें जनता प्यासे मृग की तरह लोग चमकती रेत को पानी समझ भागते रहे हैं प्यासे मरने को। शोध जारी है कल जाने किसकी बारी है।

जमुना मौसी का बुलावा ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

     जमुना मौसी का बुलावा ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

     गंगा मैया के बेटे मोदी पिछली बार मुझे देर से पता चला कि बेटे आजकल बुलावे पर आते हैं मां के पास। तुम गंगा के बेटे हो तो जानते तो होंगे जमुना मौसी को मुझे , इस बार कोई और बुला ले उस से पहले मैं बुला रही हूं। और कहीं दूर भी नहीं जाना उसी दिल्ली में ही मुझे मिल लेना , अब तो दिल्ली घर जैसी लगती भी होगी। ग़ालिब की दिल्ली ज़फर की दिल्ली , कौन जाता है दिल्ली की गलियां छोड़कर। जो लोग दिल्ली की लाख कमियां गिनवाते हैं वो भी दिल्ली से सब कुछ लेते हैं दिल्ली की बदनसीबी है दिल्ली से लेकर खाते हैं फिर भी गरियाते भी हैं। मेरा दिल भी दिल्ली की तरह विशाल है किसी से कोई भेदभाव नहीं करती। गंगा जमुना संस्कृति की बात सुनी ज़रूर होगी हम हिंदी उर्दू भाषा और सभी धर्मों के मेल की बात को सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं। चिंता मत करना मुझे किसी से कुछ भी नहीं चाहिए और मैं नहीं सवाल भी पूछूंगी कि गंगा कितनी स्वच्छ हुई अब तक। मन की बात दिल की बात दोनों एक ही हैं और दिल की बात देश का दिल कहलाने वाली दिल्ली से नहीं होगी तो किसी और से हो भी नहीं सकती है। मेरा महत्व इसी से समझ लेना कि सभी महान लोगों की समाधियां मेरे किनारे पर ही तो हैं। सबकी आत्माओं का मुझसे गहरा नाता है। तुम दिल्ली की जनता के मानस को गलत मत समझना उसे कोई नहीं जान पाया है , चिंता मत करना कि दिल्ली से तुम्हारे दल को बुरी पराजय मिली थी। साहस होना चाहिए दिल्ली का दिल जीतना मुश्किल नहीं है , मगर अहंकार से दिल्ली किसी को नहीं मिली इतिहास गवाह है। नफरत की जगह दिल्ली वालों को भाती नहीं है और दिल्ली का अनुभव है कि जो उसे छोटा समझता है उसे सबक भी सिखाती है। तभी जिसे सभी संसदीय क्षेत्र में जितवाती है विधानसभा में हरवा भी सकती है। गंगा स्नान से पाप धुलते हैं तो जमुना की डुबकी लगाने वाले पाप करने से ही तौबा किया करते हैं। मौसी बुलाए तो हिसाब नहीं लगाते कि जाना फायदे की बात होगी या नुकसान की , मौसी मां से बढ़कर प्यार करती है अगर दिल से बात करता है कोई। 
     कोई मांग नहीं है न मेरा कोई झगड़ा है किसी से भी। हरियाणा हो या दिल्ली हो मैं रोकने से रूकती नहीं , जो भी बाहें फैलता है चली आती अविरल बहती हर रुकावट को पार कर। कुछ लोग हैं जो मौसी के रिश्ते को समझते नहीं हैं अन्यथा हर मौसी अपने बच्चों की तरह सभी बहनों के बच्चों को प्यार करती है। मौसी सा रिश्ते निभाना चाचा ताऊ भाई जीजा साला मामा मामी कोई नहीं जानता है। जिनको मां भी कभी प्यार नहीं करती किसी भी कारण उनको भी मौसी सीने से लगाती है। लिखने वालों ने मौसी के किरदार को ठीक से समझा और पहचाना नहीं है वर्ना मौसी की बात पर शोले की बसंती की मौसी याद नहीं आती। यहां ये बताना ज़रूरी नहीं है मगर ध्यान दोगे तो याद आ जाये शायद जब कोई मां जान लेती है कि बच नहीं सकूंगी तब बच्चों का ख्याल रखने को जिसे कहती है वो मौसी ही हो सकती है। हो सकता है तुम्हारे मन में ये बात आये कि मैं खुद तुम्हें क्यों बुलावा भेज रही हूं , मेरा कोई स्वार्थ तो नहीं है। इशारे से समझ जाना मां को जब अपने बच्चे को बचाना होता है तो अपनी छोटी बहन से कहती है तुम उसे अपने घर बुला लेना मेरे पास आएगा तो डरती हूं कोई सज़ा नहीं मिल जाये। और मौसी कभी नहीं पूछती किस बात की सज़ा क्या शरारत की है उसने। भरोसा कर सकते हो सगी मौसी हूं सौतेली मां नहीं हूं। मुझे चुनाव तक तुम्हारा इंतज़ार रहेगा। अपना ख्याल रखना मैसी की ताकीद है।

Saturday, 20 October 2018

शुरू भी हमसे खत्म हमीं पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        शुरू भी हमसे खत्म हमीं पर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

          चार साल बाद फुर्सत मिली अपनी कुर्सी पर बैठे तो पीठ पीछे लिखे नामों को ध्यान से पढ़ने लगे। सचिव को बुलाया और सवाल दाग दिया मेरा नाम सबसे आखिर में इतना नीचे क्यों लिखवाया गया है। सचिव ने बताया कि हर दफ्तर में ऐसा ही चलन है शुरुआत पहले नंबर से की जाती है आप का नंबर आखिर में ही है पहले 13 और नेता पद पर रहे बारी बारी और एक बीच में कार्यवाहक भी बनाये गये थे। नेता जी को अपना नाम ऊपर चाहिए था इसलिए कहने लगे कि अगर इस को बदलकर उलटी तरह लिखा जाये तो क्या परेशानी है। सचिव ने बताया ये संभव नहीं है कि हर बार संख्या घटती हुई लिखी जाये ऐसे में शुरुआत किस संख्या से करेंगे क्योंकि ये सिलसिला आगे बढ़ता रहेगा। आपके बाद जो बनेगा उसका नाम आपके नीचे लिखा जायेगा। नेता जी को ये अच्छा नहीं लगा , उनको लगता है उनके बाद भी उन्हीं को ही बनना ही है। उनको तो जो नाम पहले लिखे उनको नीचे करना है और सबसे ऊपर अपना लिखवाना है। हमारा नाम वारणसी बाबू , बने हैं हम बनेंगे भी हम हमारा नाम वाराणसी बाबू। नेता जी सुबह शाम दिल ही दिल में यही सोचते रहे तो ये होना ही था कि दिल की बात ज़ुबान पर आ गई। दिन रात यही सोचते रहते और यही सपना देखते कि काश उनका नंबर सबसे ऊपर हो जाये।
             ऐसे में ख्वाब में मनचाही मुराद मांगने की बात सुनते ही कहा कि बस यही बात खलती है कि मुझे 14 वें 15 वें स्थान पर नहीं पहले स्थान पर होना चाहिए था। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि इस पद की कुर्सी और मैं एक दूसरे के लिए ही बने हैं। जब भी कुर्सी पर बैठता हूं मुझे लगता है जो जो भी पहले इस पर बैठे काबिल नहीं थे। जिस तरह हर कुंवारा चाहता है उसकी दुल्हन को किसी ने भी पहले छुआ नहीं हो , मुझे भी लगता है कि जब तक मैं नहीं बनाया गया था इस कुर्सी को दूसरे किसी को बैठने देना नहीं था। मेरा इंतज़ार करती रहती। सपना टूट गया वरदान मिलते मिलते रह गया। अपनी उलझन उसको बताई जो इस समस्या का समाधान कर सकता है। बताया कि अगर इस पद का नाम ही वारणसी बाबू हो जाये तो जो भी चुना जाएगा उसी को देश का चौकीदार नहीं वाराणसी बाबू ही कहकर पुकारा जाएगा। नेता जी की चिंता अपनी जगह है उनकी अपनी जगह। ज़िद पर अड़े हैं कि पद का नाम वाराणसी बाबू हो और उसके साथ संख्या एक से लेकर बढ़ती जाये। वाराणसी  शब्द  ही उनका नाम है। संविधान में बदलाव कर हमेशा को पद पर बैठे व्यक्ति को उसी तरह संबोधित किया जाना चाहिए जैसे एलिजाबेथ एक दो तीन हुआ करता था। मगर उलझन है कि नेता जी संविधान में संशोधन भी आज़ादी के बाद से करना चाहते हैं ताकि इतिहास में शुरुआत से ही उन्हीं का नाम लिखा जाये बदल कर। मगर संविधान लागू किया ही बाद में गया था 26 जनवरी 1950 को। अब उससे पहले की तारीख में संशोधन कैसे हो सकता है लेकिन उनका कहना है जब मेरे पास तीन चौथाई बहुमत है तो सब मुमकिन है। आज़ादी की तारीख तक बदल सकते हैं नेता जी का दावा है। नेता जी को पुराना इतिहास पसंद नहीं है बदलना चाहते हैं। सड़कों शहरों के नाम बदलने से बात बनती नहीं लोग तब भी पुराने नाम को याद करते हैं। नेता जी को लगता है इतिहास को दोबारा लिखवाया जाये और ऐसा घोषित किया जाये कि आज़ादी मिली ही उसी दिन जिस दिन उनको कुर्सी मिली थी। और देश की सत्ता जिस का हाथ हो उसको वाराणसी बाबू कहा जाये अभी खुद वाराणसी बाबू हैं तो लिखा जाना चाहिए वाराणसी बाबू एक उसके बाद जब तक उनकी सत्ता है संख्या पहली ही रहेगी जब कभी कोई और बनेगा तो उसको भी वास्तविक नाम से नहीं वाराणसी बाबू दो उसके बाद तीन चार लिखते रहेंगे ताकि अनंतकाल तक उन्हीं का ही नाम रहे। सोशल मीडिया पर बहस जारी है , उनके बाद भी उनकी ही बारी है। सत्ता की ज़िद हमेशा जीतती है कब भला हारी है। नाम लिखना नहीं मिटाना है दिल में बेकरारी है। नाम की भूखी दुनिया सारी है बड़ी मुश्किल से मिलती बारी है। क्या करना है मर्ज़ी हमारी है। निभानी थोड़ी सी मगर दुनियादारी है।
         मगर नेता जी असली बात भूल गये हैं , ख्वाब में जो उनसे बातें कर रहा था वो वाराणसी का गंगा का तट था। उसने बताया था आप को सत्ता मिली ही वाराणसी से जीत के कारण है। जिस दिन वाराणसी ने आपको ठुकरा दिया आप पुराने राज्य से जीत कर भी देश की राजधानी में सत्ता नहीं हासिल कर सकते हैं। वारणसी बाबू नाम दिया था उसी तट ने वो याद रहा मगर असली बात भूल गये। क्या वाराणसी अपनी राय बदलेगी या शायद खुद जनाब ही वाराणसी छोड़ कोई और किनारा तलाश करने लगेंगे। गंगा फिर से उनको बुलाएगी ऐसी संभावना लगती नहीं है। जब नाम ही नहीं रहा वाराणसी बाबू कोई दूसरा बन गया तो क्या होगा। ख्वाब की बात अक्सर आधी अधूरी याद रहती है। ख्वाब तो ख्वाब है उनके सपने भी कमाल के हैं खुद ही अपना नाम याद करते हैं इस डर से कि कहीं भूल ही जाऊं मैं कौन हूं कहां से आया हूं। सिवा अपने कुछ नहीं याद।

Friday, 19 October 2018

क्या सच लिखने वाले नहीं थे ( सवालिया निशान ) डॉ लोक सेतिया

  क्या सच लिखने वाले नहीं थे ( सवालिया निशान ) डॉ लोक सेतिया 

       ये मामला अजीब लगता है दुनिया काली और सफ़ेद दो रंगों की नहीं हो सकती। मगर जितने भी महान समझे जाने वाले ग्रंथ हैं उन को पढ़कर लगता है ऐसा थी दुनिया। जो अच्छे थे बहुत अच्छे थे और जो बुरे थे बहुत खराब थे। इतना ही नहीं बुरे खलनायक को भी समझाने वाले अच्छे लोग थे मगर उसको बुराई अच्छी लगती थी मरना मंज़ूर था अच्छा होना नहीं। दार्शनिक बताते हैं ये वास्तविकता हो नहीं सकती है , असली दुनिया में न कोई फरिश्ता बनकर जी सकता है न ही शैतान होकर जीना चाहता है। फिर लिखने वालों ने ऐसा क्यों किया , जो जीता जंग उसको नायक और जिसकी हार हुई उसको खलनायक बना दिया। झगड़ा ईनाम वज़ीफ़े का रहा होगा , किसी को खुश करने को भगवान कहना पड़ा। आज भी कितने लोग हैं जो अपने स्वार्थ को किसी को भगवान घोषित करते हैं , उसकी कोई कमी कोई बुराई उनको दिखाई दे ही नहीं सकती। जाने किसकी खुराफ़ाती दिमाग़ की उपज है जो मसीहा देवी देवता पय्यमबर होने का भी प्रमाण बना दिया कि असंभव को संभव कर दिखाना। जिस किसी ने अंधविश्वास के खिलाफ बात की उसी को सूली चढ़ा दिया ज़हर पिला दिया या समाज से बाहर निकाल दिया। ऐसे ऐसे कारनामे करने का दावा किया गया जो आधुनिक विज्ञान लाख जतन कर आज भी नहीं कर सकता। चलो मान लिया उनकी काबलियत इनसे बढ़कर रही होगी तो उन सभी ने तो सबकी भलाई को किया था जो भी कर सकते थे फिर अपनी किसी भी खोज को सभी की भलाई को बाकी लोगों को बताते ताकि दुनिया को बांटते अपने ज्ञान की दौलत। मगर जब वास्तविकता नहीं केवल कल्पना से बात बनाई हो किसी को मसीहा या खुदा या पय्यमबर बनाने को तो ये तो झूठ की बुनियाद पर महल खड़ा करना हुआ। मगर कोई सवाल भी नहीं करे इसके लिए आस्था की ऊंची ऊंची दीवारें बना दी गईं। सवाल करना अपराध है नास्तिकता है। सांच को आंच नहीं तो सच को छुपाने बचाने का कोई तर्क नहीं है। सच को तो खुद सामने आकर साबित करना चाहिए , झूठ को छिपाना पड़ता है लाख पर्दों के पीछे।
      कई लोग चाहते हैं ईश्वर भगवान खुदा जो भी है सामने आकर दर्शन दे। मुंबई से इक अख़बार निकलता है जिसका नाम ही है। " भगवान सामने आकर दिखाई दो "। आपको सनक लग सकती है उनको आस्था लगती है। मगर सोचो अगर जो भी कोई है जिसने दुनिया बनाई है सामने आकर कहे तो कितने लोग कितने सवाल खड़े करेंगे उससे सबूत मांगेंगे। उसको क्या पड़ी है खुद के होने का प्रमाण उनसे पाने की जिनका खुद होना नहीं होना कब तलक है उनको नहीं मालूम। शायद तभी वो सामने नहीं आया न कभी आना चाहेगा। लोग हर किसी पर शक करते हैं उसे भी इतना तो पता है फिर जिसे भरोसा नहीं उसे भरोसा करवाना किसलिए। मानो चाहे नहीं मानो उसको क्या। मदिर मस्जिद गिरजाघर बना लिए और गुरूद्वारे भी मगर उन में ईश्वर है भी कि  नहीं कोई नहीं जानता , सोचना मना है क्योंकि सोचोगे तो समझ आएगा कि अगर है तो उसी के घर में वो सब कैसे हो रहा है जो कभी नहीं होना चाहिए। धर्म और भगवान सबसे बड़ा कारोबार बना लिया गया है , कोई नुकसान नहीं है मुनाफा खूब है। ये सब कहते हैं वो एक ही है फिर कितनी दुकानें कितने नाम और सब एक दूसरे से मुकाबला करते हुए क्यों हैं। ईश्वर हो भी तो कितना बेबस होगा कि कैसे किस किस को समझाए। जिनको तलाश करनी थी उन्होंने चिंतन किया भटकते रहे दुनिया भर में मगर पाने का दावा नहीं किया। जो कुछ भी नहीं कर सकते थे उन्होंने हमेशा अपने आस पास किसी को ईश्वर का रुतबा देने की बात कहकर खुद अपने को महाज्ञानी महात्मा घोषित करवा लिया। उपदेश दिया सबको बांटने का मगर खुद अपने पास संचय करते रहे , पर उपदेश कुशल बहुतेरे। औरों को नसीहत खुद पालन नहीं और हम उनकी हर बात को तब भी सही समझते हैं तो आंखे होते हुए भी अंधे हैं। उदारहण नहीं दिये क्या क्या लिखा हुआ किस किस किताब में जो वास्तविकता हो नहीं सकता केवल कल्पना है। इक सपना है जो ठगी करने वालों ने दिखाया अपने धंधे की खातिर। धरती पर सभी इंसान हैं फ़रिश्ते ज़मीं पर नहीं आते ये केवल ख्वाब है। लोग ख्वाब भी बेचने लगे हैं आजकल। दुष्यंत कुमार का शेर भी अब लगता है अर्थ खो तो नहीं रहा कभी।

                                 खुदा नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,

                                 कोई हसीं नज़ारा तो है नज़र के लिए।


Thursday, 18 October 2018

मुफ्त दवा दे देना मुफ्त सलाह मत देना ( अनुभव ) डॉ लोक सेतिया

 मुफ्त दवा दे देना मुफ्त सलाह मत देना ( अनुभव ) डॉ लोक सेतिया 

     जब मैंने डॉक्टर बनकर अपनी क्लिनिक खोली तब मुझे कुछ महीने साथ रखकर शिक्षा देने वाले विशेषज्ञ डॉक्टर ने मुझे नीले रंग का अंर्तदेशीय पत्र लिखकर जो बातें समझाईं थी उनमें ये भी शामिल था कि कोई गरीब हो तो बेशक उसे अपनी फीस से कई गुना महंगी दवा बिना पैसे लिए दे देना मगर कभी भी अपनी सलाह की फीस किसी को भी नहीं छोड़ना। मैंने उनकी समझाई अन्य तमाम बातों को भरसक कोशिश कर पालन करने का ध्यान रखा मगर अपनी फीस को लेकर कभी ऐसा नहीं कर सका जो वास्तव में उचित था। आज भी मैं समझता हूं अधिकतर लोग मुफ्त मिली सलाह की कीमत नहीं समझते हैं। डॉक्टर की फीस हर किसी को अनुचित लगती है मगर दवा कितनी महंगी हो या जांच पर कितने पैसे खर्च होते रहें उनको अनुचित नहीं लगता है। जबकि सबसे अधिक कीमत डॉक्टर की राय की ही होती है और समझी जानी चाहिए। मुझे लगता है अधिकतर जिन छोटे शहरों में मरीज़ डॉक्टर को उचित फीस नहीं देना चाहते उनसे ही उससे भी अधिक दवाओं और जांच करवाने पर खर्च करवाते हैं डॉक्टर। पुरानी कहावत है पानी पुल के नीचे से सी बहता है , सीधी तरह नहीं मिलती तभी लोग उलटी तरह से वसूल करते हैं। जो लोग रस्ते चलते या कहीं भी मिलते डॉक्टर से राय लेते हैं उनको पता होना चाहिए इस तरह की अधकचरी सलाह हानिकारक हो सकती है। मगर लोग केमिस्ट से या किसी के भी कहने से दवा लेकर खुद अपनी ज़िंदगी से खिलवाड़ करते हैं। कई लोग डॉक्टर के पास जाते हैं तब भी खुद ही बहुत जल्दबाज़ी करते हैं और डॉक्टर को अपनी बात बताने और उसके बाद डॉक्टर की सलाह को ठीक से समझते तक नहीं है। सही निदान सही दवा भी रोगी को ठीक नहीं कर सकती अगर सही ढंग से ली नहीं जाये तो। मैंने कई लोगों को ऐसा करते पाया है , पांच दिन की दवा ली मगर दस दिन बाद आकर बताते हैं आज खत्म की है अर्थात अपने सही डोज़ नहीं ली है और कम डोज़ से आप ठीक नहीं हो सकते हैं। अपने डॉक्टर पर भरोसा रखना ज़रूरी है और ये भी समझना होगा कि हर डॉक्टर अपने रोगी को तंदुस्त करना चाहता है। अगर आप केवल डॉक्टर की फीस से बचने को खुद दवा खाते हैं किसी भी तरह से जानकारी लेकर तो आपको ऐसा करना बहुत महंगा पड़ सकता है। बिना डॉक्टर की राय दवाएं खाई जाती हैं भारत देश में जिनसे रोग और बढ़ते जा रहे हैं ऐसी चेतावनी विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार देता रहता है। आपको एक बात समझनी ज़रूरी है कि हर दवा के दुष्प्रभाव होते हैं और जिन दवाओं की ज़रूरत नहीं हो लेकर आप कोई बीमारी खरीद रहे हो सकते हैं। जिस दिन आपको डॉक्टर की सलाह का सही अर्थ समझ आएगा आपको डॉक्टर की फीस अधिक नहीं लगेगी और आप खुद चाहोगे डॉक्टर अपनी फीस ले मगर आपका उपचार उचित ढंग से हो। केमिस्ट जांच लैब दवा कंपनियों से हिस्सा नहीं लेंगे डॉक्टर तो अपने जो फीस दी उससे अधिक फायदा आपको खर्च में भी होगा और अच्छी दवाओं और ज़रूरी टेस्ट पर भी कम खर्च होगा। इस बार किसी भी डॉक्टर से ईलाज करवाने जाओ तो ये बात खुद कहना आपको फायदा ही होगा कोई नुकसान नहीं।

Tuesday, 16 October 2018

पुरानी राह से बच कर गुज़रना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 पुरानी राह से बच कर गुज़रना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

पुरानी राह से , बच कर गुज़रना है 
कभी फिसले थे अब वापस निकलना है। 

नशे में रात जिसके साथ हम नाचे 
नहीं अब याद दिन चढ़ते मुकरना है। 

उसे , पहचानते कैसे , भला यारो ,
है कहता साथ लेकर तुमको मरना है। 

किसी को सादगी अच्छी बहुत लगती 
उसी के वास्ते सजना संवरना है।
निभाना है नया किरदार कुछ ऐसे
फरिश्ता बन के सारे जुर्म करना है। 

हुई थी भूल तुम भी भूल जाओ सब 
संभल जाओ नहीं अब फिर फिसलना है। 

ऊंचाई पर रहोगे कब तलक "तनहा"
कभी आखिर ज़मीं पर ही उतरना है।



Sunday, 14 October 2018

हर जान की कीमत जानते हैं ( बेसुरी तान ) डॉ लोक सेतिया

   हर जान की कीमत जानते हैं ( बेसुरी तान ) डॉ लोक सेतिया 

     मुझे आज रात भर नींद नहीं आई , खुद को गुनहगार समझता रहा। जाने उनको कैसे आती होगी नींद जो बेवजह किसी की जान ले लेते हैं। पत्नी ने मना किया है मत लिखना इस विषय पर फिर भी लिख रहा हूं। क्या इसे पानी में रहते मगर से बैर कहते हैं। जो लोग सरकारी विज्ञापन से अपनी ज़ुबान पर ताले लगा लेते हैं शायद समझदार होते हैं। कुछ लोग जो ज़्यादा जानते हैं , इंसान को कम पहचानते हैं , ये पूरब है पूरब वाले हर जान की कीमत जानते हैं। जहां दिल में सफाई रहती है होठों पे सच्चाई रहती है , हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। ग़ालिब को भी नींद नहीं आती थी , मौत का एक दिन मुअयन है नींद क्यों रात भर नहीं आती , कहते हैं। मुझे तो मौत से डर नहीं लगता है मकतल खुद ही चला जाता हूं , डरता हूं तो रहबरों से। हुआ यूं कि पत्नी ने बताया पूरब की ही बात है उत्तर प्रदेश के सीएम उस महिला के घर गए शोकसभा पर और कई लाख और नौकरी देने की बात कह आये उसकी पत्नी को जिसके पति को सरेराह कोई पुलिस वाला मिल गया था और गोली मार दी थी। हुई होगी शायद इंसाफ की भी बात वहां पर मगर मेरी पत्नी को उस महिला की चिंता थी चलो अच्छा हुआ बेचारी का जीना आसान हो गया। मैंने यूं ही सोचा और कहा भी कि क्या अभी कल ही जिस जज की पत्नी और का कत्ल और बेटे को गोली मार घायल किया उसी जज की सुरक्षा को नियुक्त पुलिस वाले ने क्या उस पति को भी इसी तरह पत्नी की मौत का मुआवज़ा पाकर संतुष्ट किया जा सकता है। पत्नी को गुस्सा आया आप पुरुषों को किसी महिला की भलाई भाती ही नहीं। रात भर लगता रहा मैं ही गुनहगार हूं जिस सरकार और उसकी पुलिस एनकउंटर करती कराती है बड़ी दयालु हैं। जाँनिसार अख्तर का शेर याद आया है। 

      जब मिले ज़ख्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये। 

      हमने इंसानों के दुःख दर्द का हल ढूंढ लिया , क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाये। 

    ये किसी के ज़ख्मों पर मरहम लगाना है जो तमाम जीवन याद रहेगा कि किस के कारण क्या मिला था। बात जिस देश में गंगा बहती है के गीत की थी। गंगा की हालत यही है कि सरकार गंगा का बेटा खुद को बताने वाला चला रहा है और करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद गंगा और गंदी हो गई है और कोई नासमझ गंगा की सफाई की खातिर अनशन पर बैठा रहा मगर सरकार पर कोई असर नहीं हुआ और 111 दिन बाद निधन हो गया। शायद उस 85 साल के देवता की भी कीमत सरकार आंक सकती है। कोई नेता जाकर भाषण देकर उनके सपनों को सच करने की घोषणा कर सकता है।  बस 2022 नहीं तो 2050 तक तारीख़ बढ़ती जाएगी गंगा बहती जाएगी। 
       ये खबर आजकल खबर बनती ही नहीं कि कहां कहां पुलिस ने किसे क्या समझ कर मार डाला। लोग अपनी रंजिश निकालने को पुलिस से सहायता लेते हैं , नेता अधिकारी तो अधिकार समझते हैं अपने दुश्मन क्या विपक्षी को भी सबक सिखाने को। सीबीआई का मकसद यही हो गया है , किसी को नकेल डालनी हो तो जांच के नाम पर पर्दे के पीछे सब होता है। ये जाने कब से होता आया मगर हंगामा हुआ था 1984 में जब इंदिरा गांधी को उनके सुरक्षा करने वालों ने कत्ल कर दिया था। उनके बेटे को मुआवज़ा बिना मांगे मिल गया था गद्दी पर बिठाया था किसी ने उपकार का बदला चुकाने को। जाने कितने बेकसूर लोगों को दंगों की आग में जलाया गया और समझाया गया जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। हम आम लोग तो पेड़ पौधे क्या घास भी नहीं हैं कीड़े मकोड़े की तरह हैं जो मसले जाते हैं कुचले जाते हैं। अभी तक किसी ने भी वास्तविक समस्या पर गहराई से चिंतन ही नहीं किया , जब बचाने वाला मारता है तो ऊपर वाला भी नहीं बचा सकता है। हमने जिनको देश के नागरिकों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी है जब वही खतरा बन जाएंगे तो कौन किसे बचाएगा। मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। आम नागरिक पर कब कौन सी धारा लगा दी जाये उनकी मर्ज़ी है हम तो धारा  144 से ही डर जाते हैं। जो धारा 144 लगी होने पर भी पंचकूला पहुंच जाते हैं उन पर अदालती बयानबाज़ी भी किसी काम नहीं आती। जान की कीमत नहीं लगाई जा सकती मगर लगाते हैं सत्ता वाले भी और बाकी लोग भी जब पचास लाख करोड़ की बात होती है। आम नागरिक का जीना मरना एक समान है। किसी शायर को तो लगता है कि  " हाथ खाली हैं तेरे शहर से जाते जाते , जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते "। हम ज़िंदा कब हैं जो हमें मरोगे। राख के साथ बिखर जाऊंगा मैं दुनिया में तुम जहां खाओगे ठोकर वहीं पाओगे मुझे। आह भरना भी गुनाह है आखिर में :-

       हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम , वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।


शोध करने का नया विषय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      शोध करने का नया विषय ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    रसिकलाल जी ने पी एच डी के लिए आधुनिक विषय चुना है। मीटू से पहले मीटू मीटू के समय और मीटू मीटू के बाद। इंतज़ार था अच्छे दिनों का , अदालत ने निर्णय दिया विवाहित महिला अपनी मर्ज़ी से शारीरिक संबंध बनाने को आज़ाद है पति की जायदाद नहीं है। कोई गुनाह नहीं है मगर पति चाहे तो तलाक मांग सकता है। इससे पहले जाने क्या बला है ये गे कहलाने वाले उनको भी न्याय मिल गया था। ऐसे में किसी ने सालों पहले अपने साथ की छेड़खानी की बात कही तो सभी इसी बहस में शामिल होते गये। कोई कत्ल करता है कोई किसी को घायल करता है कोई डूबता नज़र आता है तो लोग बचकर निकलते हैं या फोटो लेते विडिओ बनाते हैं आगे बढ़कर कोई किसी को बचाता नहीं है। मगर मी टू की चर्चा में टीवी चैनल अख़बार फेसबुक व्हाट्सएप्प सब शामिल हो गये हैं। कभी सरकार के लोगों और गुंडों के खिलाफ इतनी भीड़ होती तो कितना अच्छा होता। मगर इस विषय पर किसी ने शोध नहीं किया होगा ऐसा सोचकर रसिकलाल आगे आये हैं। देखते हैं राख के ढेर से कितनी चिंगारियां निकलती हैं और कैसी ज्वाला भड़कती है। 
         यार उस बदशक्ल काली कलूटी को लोग छेड़ते रहे कितनी हैरानी की बात है। सुंदर महिलाओं का कोई अकाल पड़ा था। जिसने किसी पर बदनीयती का आरोप लगाया था अपनी सहेली के भी उसी पर आरोप लगाने से नाराज़ होने लगी कोई दूसरा नहीं मिला हमेशा यही करती है उतरन की आदी है। इक फ़िल्मी कहानी में जिस महिला से अनाचार किया गया , बाद में सालों तक कोई वकील कोई पुलिस वाला कोई और जो कहने को दर्द बांटने वाला था , उसकी रूह को सवाल पूछ पूछ कर ज़ख़्मी करते रहे। किस किस ने उसके साथ वही कितनी बार किया उसी समझ नहीं आया कि वास्तविक अपराधी से अधिक गुनहगार बाकी समाज कब क्यों हो गया। समझना कठिन है कि लोग खाली हैं और समय बिताने को फालतू की बहस या चर्चा में लगे रहते हैं या कि किसी को किसी के लिए भी फुर्सत ही नहीं है। सब कहते हैं वक़्त नहीं बेकार की बातों के लिए मगर वास्तव में सभी बेमतलब की बातों में रात दिन वक़्त बर्बाद करते हैं।
       आज जो बात लगता है देश और समाज की सबसे पहली चिंता की बात है अगले ही दिन पता चलता है उसमें कोई दम ही नहीं था। हर टीवी चैनल खबर को दरकिनार कर अखबर को खबर बनाता है , जो हुआ ही नहीं उस पर दिन भर बहस चर्चा और जाने क्या क्या किया जाता है फिर अंत में राज़ खुलता है कि ये विडिओ वास्तविकता से हज़ारों मील दूर है। सब का दावा है सच्चे होने का मगर सच लापता है किसी की दुकान में मिलता ही नहीं। झूठ खूब बिकता है और झूठ को मनचाही कीमत मिलती है। इक नया चलन शुरू हुआ है जिस पर आरोप लगाया जाता है उसी को जांच करने को भी अधिकार हासिल है और निर्णय भी वही करता है। कोई दलील किसी काम नहीं आती है जिसकी लाठी उसकी भैंस बस यही हाल है। आज के हालात पर इक ग़ज़ल  मंज़र भोपाली जी याद आती है।

अब अगर अज़मत ए किरदार भी गिर जाएगी
आपके सर से ये दस्तार भी गिर जाएगी।

बहते धारे तो पहाड़ों का जिगर चीरते हैं
हौंसले कीजे ये दीवार भी गिर जाएगी।

हम से होंगें न लहू सींचने वाले जिस दिन
देखना कीमते-गुलज़ार भी गिर जाएगी।

सर फरोशी का जुनूं आपमें जागा जिस दिन
ज़ुल्म के हाथ से तलवार भी गिर जाएगी।

रेशमी लब्ज़ों में न क़ातिल से बातें कीजे
वर्ना शाने लबे-गुफ़्तार भी गिर जाएगी।

अपने पुरखों की विरासत को संभालो वर्ना
अब की बारिश में ये दीवार भी गिर जाएगी।

हमने ये बात बज़ुर्गों से सुनी है मंज़र
ज़ुल्म ढाएगी तो सरकार भी गिर जाएगी।
                        आपको शायद लगता होगा कि मामला तो हल्का फुल्का था ये इतनी संजीदा बात ऐसे में लाने की ज़रूरत क्या थी। जब देश की सियासत वास्तविक समस्याओं को छोड़ केवल दलगत राजनीति और किसी भी ढंग से चुनावी खेल में लगी हो तो कोई रचनाकार मनोरंजन नहीं परोस सकता है। ये लिखने वाले की विवशता है कि कड़वे यथार्थ को भी चासनी चढ़ानी पड़ती है अन्यथा कोई पढ़ता ही नहीं। देश जलता है जले लोग हास उपहास में मस्त रहना चाहते हैं। अब अगर नैतिकता को भुलाया जाएगा , तो सर उठाकर शान से जीना असंभव है। अगर देश की खातिर सुभाष की बात को याद कर लहू नहीं देंगे हम तो आज़ादी मिली नहीं मिलने जैसी होगी। कायरता को छोड़ सरफ़रोशी की तम्मना लेकर चलेंगे तभी ज़ालिम की तलवार का सामना होगा। ये जो लोग देश को लूट रहे हैं या बर्बाद करने को लगे हैं सत्ता और अधिकारों के गलत उपयोग कर रहे हैं उनके सामने नतमस्तक होना तो देश समाज को रसातल को ले जाना होगा। अपने महान देशभक्तों और शहीदों की विरासत को क्या हम सहेज संभाल नहीं सकते हैं। ये कब तक नेता हमें वास्तविक अधिकारों से वंचित रखकर कुछ खिलौनों से बहलाते रहेंगे और हम उनकी बातों में आते रहेंगे। सरकार गंगा की सफाई पर करोड़ों रूपये बर्बाद करती रहेगी और गंगा पहले से भी गंदी होती जाएगी और कोई सच्चा गंगा का बेटा जी डी अग्रवाल 111 दिन अनशन के बाद सरकारी संवेदनहीनता से मर जाएगा मगर हम मी टू मी टू की उलझनों में उलझे रहेंगे।

Friday, 12 October 2018

इन्हीं लोगों ने ले लीना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     इन्हीं लोगों ने ले लीना ( तरकश  ) डॉ लोक सेतिया

   महानगर की महिलाओं की सभा हालात पर चर्चा कर रही है। इक अतिथि महिला ख़ास तौर पर बुलाई गई है जो इस विषय पर कितनी बार शोध करने का नाम कमा चुकी है। उसने पहले ही इक बात कह दी है कि आज सब सच बताना है और दुनिया की बातों से नहीं घबराना है। आज सभी ने खुद को पाकीज़ा बताना है और इल्ज़ाम सभी लोगों पर लगाना है। अर्थात अब सब एक हैं और मिलकर पाकीज़ा फिल्म का गीत गाना है। इन्हीं लोगों ने ले लीना दुप्पटा मेरा। मेरी न मानो सिपहिया से पूछो , मेरी न मानो बजजवा से पूछो , रंगरजवा से पूछो , बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। हर बात के सोचने के दो तरीके होते हैं , गलास आधा खाली है भी सही है और अधूरा भरा हुआ है ये भी ठीक है। मुझे किसी की पुरानी बात याद आई है कि कुदरत ने केवल औरत को ऐसी विशेषता दी है जिस के सहारे हम अपनी रोज़ी चला सकते हैं कमाई कर सकते हैं खुद अपनी कीमत लगा सकते हैं। हम जो चाहें करें अपनी मर्ज़ी है मगर इधर बात थोड़ा उलझन की है , किसी ने खुद किसी को छेड़खानी करने दी या किसी के साथ बिना इजाज़त छेड़खानी की गई समझने की बात है। किसने जिस्म की कीमत वसूली किसे कीमत नहीं मिली ये भी समझना है। आपको इक कहानी सच्ची सुनाते हैं। 

 इक पतित नारी की जीवन गाथा ( सत्य कहानी ) डा लोक सेतिया

बहुत साल पहले की घटना है , इक पत्रिका में किसी महिला की आपबीती प्रकाशित हुई थी। तब उम्र नहीं थी गहराई से उसको लेकर सोचने की , मगर मैं उस नारी की व्यथा को कभी भुला नहीं सका। जब फेसबुक पर मित्रता के नाम पर अशलीलता का फैला हुआ जाल देखा तब उसको अपनी कल्पना के माध्यम से इक लघुकथा का रूप दिया। आज कुछ कुछ उसी तरह की कहानी लिखने जा रहा हूं जो मुझे लगता है कि बहुत लोग जो फेसबुक पर हैं उनको खुद से जुड़ी लग सकती है। शायद जितना मैं लिख सकता उससे कहीं बढ़कर। चलो भूमिका को छोड़ आपको इक नारी की पीड़ा की उसकी बेबसी की उसके गंदगी में कीचड़ में फसने से रसातल में गिरने की कहानी सुनाता हूं। और उसका अंत जो हुआ वो भी , जो शायद होना ही था , होता ही है , लेकिन जो ऐसा करते हैं वो ये शायद ही सोचते हैं कि किसी दिन उनका बनाया जाल ही खुद उनको फंसा सकता है।
             नीता इक अध्यापिका थी , रौशन शर्मा की बेटी को टयूशन पढ़ाने उसके घर जाया करती थी। उसके घर की आर्थिक दशा उसको ऐसा करने को विवश करती थी। एक दिन जब नीता गई टयूशन पढ़ाने तब घर पर उनकी बेटी और पत्नी नहीं थी और रौशन अकेला था। नीता को रोक लिया था उसने ये बता कर कि बेटी अभी आने वाली है मां के साथ बाज़ार तक गई है। और उस दिन रौशन ने ज़ोर ज़बरदस्ती करके नीता की अस्मत लूट ली थी। अपना सर्वस्व लुटा कर जब नीता बिलख रही थी तब रौशन ने उसको बहुत सारे पैसे जितने शायद वो टयूशन से वर्ष भर में लेती थी देकर कहा था लो मेरी तरफ से कोई उपहार ले लेना। और ये बात किसी से मत कहना वरना तुम्हारी ही बदनामी होगी। नीता ने लिखा था तब अपना नाम बदल कर पत्रिका को कि तब उसको समझ नहीं आ रहा था कि अपनी अस्मत लुटने पर रोये या पहली बार इतने पैसे पाकर खुश हो। रौशन को आता था महिलाओं को चिकनी चुपड़ी बातों से बहलाना। उसने जब अपनी बात का असर होता देखा नीता पर तो कहने लगा मुझसे भूल हो गई है तुम्हारे हुस्न का जादू चल गया था मुझ पर और मैं तुमसे सच में प्यार करता हूं। लेकिन मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिये थी , कसम खाता हूं अब कभी नहीं करूंगा ऐसा दोबारा। लेकिन अगर तुम चाहोगी तो मैं तुमको जो भी चाहिये देता रहूंगा। तुम ये बात मन से निकल दो कि हमने कुछ गलत किया है , जिस बात से हमको ख़ुशी मिलती हो और किसी का कोई बुरा नहीं उसमें बुराई नहीं है। आखिर अपना तन मन हमारा है , हम जो पसंद हो करें , किसी को बताने की कोई ज़रूरत नहीं , इस तरह रौशन ने नीता को मना लिया था कि इस घटना का ज़िक्र किसी से नहीं करेगी। मगर अभी तक वो कश-म-कश में उलझी थी कि क्या करे क्या नहीं , इसलिये उसने अब किसी के घर जाकर टयूशन पढ़ाना ही बंद कर दिया था। जिनको पढ़ना हो वो उसके घर आ सकते हैं , रौशन चाहता था नीता को अपने जाल में फंसाये रखना इसलिये उसने भी बेटी को नीता के घर टयूशन पर भेजना शुरू कर दिया। नीता चाह कर भी उस घटना को भुला नहीं पा रही थी। मगर फिर उसने अपनी आर्थिक मज़बूरी से विवश हो कर एक दिन रौशन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। रौशन उसके घर आता अपनी वासना पूरी करता और नीता को बहुत से पैसे देता। मगर क्योंकि नीता अपने घर पर हमेशा अकेली नहीं मिलती थी इसलिये उसने नीता को अपनी ही एक जगह उपलब्ध करवा दी थी टयूशन का काम करने को। यूं सब को यही मालूम था कि किराये पर ली है जबकि किराया उसको अपना बदन सौंप कर ही चुकाना होता था।
                                          वक़्त बीतता गया और नीता ने खुद को बदल लिया था समय के साथ। अब वो दिखाने को टयूशन का काम करती थी मगर वास्तव में उसी को अपना कारोबार बना लिया था , हर किसी से शारीरिक संबंध बनाना और पैसे लेना। रौशन की बेटी जवानी की दहलीज पर थी और नीता के घर अभी भी नियमित आती जाती थी। नीता उसको कई प्रकार से सहयोग किया करती , उसको परीक्षा में नकल करवाना , उसकी बुरी आदतों को पूरा करने को जब तब पैसे देना। रौशन की बेटी को नीता बहुत प्यारी लगती थी , क्योंकि वो उसको जो चाहती वो करने में सहायता देती रहती थी। शायद कहीं अनजाने में वो अपने साथ उसके पिता द्वारा किये अपकर्म का बदला ले रही थी उसकी बेटी को उसी राह जाते देख कर। अक्सर जब कोई नीता के पास आता तब वो रौशन की बेटी को कुछ अशलील तस्वीरें देखने को , कुछ ऐसे पत्रिकाएं पढ़ने को देकर साथ के कमरे में चली जाती अपना कारोबार करने। तब वो छुप कर दरवाज़े की दरार से नीता को सब करते देखती कितनी बार। और ऐसे में उसने एक दिन नीता को ये बता दिया था कि क्या मुझे ये सब सिखा सकती हैं। और इस तरह रौशन की बेटी ही नहीं और लड़कियों को भी नीता ने उसी जाल में फंसा लिया जिसमें खुद मज़बूरी में फंस गई थी।
                                    रौशन नहीं जनता था कि जिस रास्ते पर उसने नीता को डाला था आज उसकी जवान बेटी उसी राह पर भटक रही है। ऐसे में इक दिन रौशन ने नीता को होटल में आने को कहा तो उसने पूछा क्या मेरी बजाय कोई नई जवान लड़की अगर हो तो आपको क्या चाहिये मैं या वो। और रौशन ने कहा था कि अगर कोई नई और जवान मिल जाये तो अधिक पसंद है। जब होटल के कमरे में नीता अपने साथ उसी की बेटी को लेकर पहुंची तब उसको होश ही उड़ गये। बहुत नाराज़ हुआ वो नीता को बदचलन बताया , नीता ने वही बात दोहराई जो कभी रौशन से उसको कही थी। किसी को भी अपना बदन अपनी मर्ज़ी से किसी को भी ख़ुशी से सौंपने में बुराई नहीं है। जो तुमने किया और मुझे सिखाया वही तुम्हारी बेटी ने भी सीख लिया है , अब तुम लाख चाहो जो हो चुका उसको बदल नहीं सकते। रौशन ने नीता को और अपनी बेटी को वहां से जाने को कह दिया था और ये विनती की थी कि ये सब किसी को नहीं बताना , मैं समझ गया मुझे अपने कर्मों का फल ही मिला है। वो चली आई थी , अगली सुबह होटल के कमरे से रौशन की लाश मिली थी।  उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। सुसाईड नोट छोड़ गया था कि अपनी मौत का वो खुद जिम्मेदार है।
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          सवाल कई हैं कोई अपने साथ गलत होने पर डाकू बन जाती है और बदला लेती है। कई हैं जो रात गई बात गई समझ भूल जाती हैं। आज जब नाचने लगी हैं तो घूंघट क्यों नहीं उठाती हैं , इक फ़िल्मी डायलॉग बोलकर पिंड क्यों नहीं छुड़ाती हैं। कुछ गलती पुरुषों की गंदी मनसिकता की थी कुछ हमारी कायरता की भी थी बोलना है तो क्यों शर्माती हैं। अभी चार दिन लोग सहानुभूति जताएंगे फिर हर किसी को कुल्टा बताएंगे , जो ये करते रहे सीना तान बतलाएंगे किस किस का नाम नहीं सामने लाएंगे।  गड़े मुर्दे जो उखाड़े जाएंगे कितने लोग फिर बच पाएंगे। सच और झूठ आपस में जो मिल जाएंगे इक नया इतिहास बनाएंगे। हमारी तर्ज़ पर पुरुष भी कोई गीत गाएंगे। वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और के सर जाये तो अच्छा।  कितनी कहानियां ऊंची ऊंची दीवारों में कैद हैं किस किस को सुनाओगी खुद रोओगी उनको नहीं रुला पाओगी। आज चुप रहने पर पछताती हो कल शायद बोलने पर पछताओगी , बदनाम किसी पुरुष को करोगी बदनामी अपने घर लाओगी। ये जो सच है दोधारी तलवार है कोई कत्ल होगा या बचेगा तुम खुद ज़रूर ज़ख़्मी औरत बन जाओगी। क्या ब्यानबाज़ी से आगे जाओगी अपने पर अत्याचार का हिसाब बराबर कर आओगी। या इसी तरह ख़ामोशी से अपनी बात कहोगी औरों की सुनोगी तालियां बजाओगी , जब घर जाओगी तो सोचोगी कौन है जिस को घायल नहीं किया समाज में मैं अकेली ही तो न थी। यही समझ तसल्ली पाओगी।

मैं भी मैं भी मैं भी ( नंगा समाज ) डॉ लोक सेतिया

       मैं भी मैं भी मैं भी ( नंगा समाज ) डॉ लोक सेतिया 

     बंद कमरों की राज़ की बातें जब खुलती हैं तो बहुत कुछ ध्वस्त होता है। हम जिसे सभ्य समाज मानते रहे वो कितना बड़ा फरेब था हर कोई हैरान है। नहीं उन महिलाओं पर अविश्वास नहीं करना चाहता मगर ये सवाल ज़रूर आता है कि इतनी लंबी ख़ामोशी उस समाज की जो महानगर में आज़ाद था किसी गांव में या वीराने में बंदी नहीं था कि बोल भी नहीं सके। अपने साथ अनुचित होने देना चाहे आर्थिक विवशता रही हो बाकी महिला जगत को भी गलत संदेश देता है और जो पुरुष कुछ भी करने के बाद शान से रहे उनके गलत इरादों को भी बढ़ावा देता है। मगर इस में दोष हमारे समाज का भी है जो अमिताभ बच्चन और रेखा को लेकर अलग सोच रखता है , हेमा मालिनी के विवाहित पुरुष से विवाह को मंज़ूर करता है , राजकपूर के साथ कितनी नायिकाओं को जोड़ते हुए और राय रखता है।  लेकिन अपने आस पास किसी को मुहब्बत करने की अनुमति नहीं देता है। अभिनेता तक अपनी सिक्स ऐप्स को दिखाते हैं टीवी फिल्म शो में। जो महिलाएं चाहती तो ये सब पहले ही बता सकती थीं मगर खामोश रहीं क्या उनका दोष नहीं है अपने समाज को और गंदा होते देखते रहने का। शायद तब उनको खुद को छोड़ बाकी महिला समाज की चिंता ही नहीं रही थी। यही महिलाओं की सब से बड़ी गलती है। आज भी तमाम महिलाओं को अपनी शख्सियत से अधिक चिंता अपने सुंदर दिखाई देने को रहती है। आज भी क्यों नारी पुरुष से उपहार पैसे सोना चांदी के गहने की अपेक्षा रखती है। समानता क्या यहां नहीं ज़रूरी है। माना पुरुष की मानसिकता गंदी होती है जगज़ाहिर है मगर क्या कई महिलाएं अभी भी मेनका की तरह खुद भी ये करने की दोषी नहीं हैं।

 अपराधी महिला जगत के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

आप हां आप भी
शामिल हैं महिलाओं के विरुद्ध
बढ़ रहे अपराधों में
किसी न किसी तरह ।
आप जो अपने कारोबार के लिये 
परिधान के विज्ञापन के लिये 
साबुन से लेकर हर सामान
बेचने की खातिर दिखाते हैं
औरत को बना कर
उपभोग की एक वस्तु ।
आपकी ये विकृत मानसिकता
जाने कितने और लोगों को
बनाती है एक बीमार सोच।
जब भी ऐसे लोग करते हैं
व्यभिचार किसी बेबस अबला से
होते हैं आप भी उसके ज़िम्मेदार।
आपके टी वी सीरियल
फ़िल्में आपकी जब समझते हैं 
औरतों के बदन को मनोरंजन का माध्यम
पैसा बनाने कामयाबी हासिल करने के लिये।
लेते हैं सहारा बेहूदगी का
क्योंकि नहीं होती आपके पास अच्छी कहानी
और रचनात्मक सोच
समझ बैठे हैं फिल्म बनाने सीरियल बनाने को
सिर्फ मुनाफा कमाने का कारोबार।
क्या परोस रहें हैं  अपने समाज को
नहीं आपको ज़रा भी सरोकार
आप हों कोई नायिका चाहे कोई माडल
कर रही हैं क्या आप भी सोचा क्या कभी
थोड़ा सा धन कमाने को 
आप अपने को दिखा  रही हैं 
अर्धनग्न  सभ्यता की सीमा को पार करते हुए।
आपको अपनी वेशभूषा पसंद से
पहनने का पूरा हक है मगर पर्दे पर
आप अकेली नहीं होती
आपके साथ सारी नारी जाति
का भी होता है सम्मान
जो बन सकता है अपमान।
जब हर कोई देखता है बुरी नज़र से
आपके नंगे बदन को आपका धन या
अधिक धन पाने का स्वार्थ ,
बन जाता है नारी जगत के लिए शर्म।
ऐसे दृश्य कर सकते हैं  लोगों की
मानसिकता को विकृत
समाज की हर महिला के लिये।
हद हो चुकी है समाज के पतन की
चिंतन करें अब कौन कौन है गुनहगार। 
   मुझे अपनी पुरानी लिखी कविता लिख कर शुरुआत करनी पड़ रही है। इसका मतलब हर्गिज़ ये नहीं है कि मैं पुरुषवादी अनुचित सोच को सही समझता हूं। मैं मानता हूं हमारे समाज में अधिकतर पुरुषों की सोच आज भी बेहद खराब है और महिला को ऐसी ही नज़र से देखते हैं।  मगर मुझे उन महिलाओं से शिकायत है जो अपने बदन की नुमाइश करती हैं पैसे की खातिर। आगे वास्तविक विषय की बात से पहले मेरी इक और कविता लिखना चाहता हूं जो मेरी सोच ही नहीं मेरा विश्वास भी है कि हर औरत को ऐसा सोचना चाहिए।

औरत    ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

तुमने देखा है
मेरी आँखों को
मेरे होटों को
मेरी जुल्फों को,
नज़र आती है तुम्हें 
ख़ूबसूरती नज़ाकत और कशिश
मेरे जिस्म के अंग अंग में ।
तुमने देखा है 
केवल बदन मेरा 
प्यास बुझाने को 
अपनी हवस की
बाँट दिया है तुमने
टुकड़ों में मुझे
और उसे दे रहे हो 
अपनी चाहत का नाम।
तुमने देखा ही नहीं
कभी उस शख्स को 
एक इन्सान है जो 
तुम्हारी तरह जीवन का
हर इक एहसास लिये 
जो नहीं है केवल एक जिस्म 
औरत है तो क्या। 
                                क्या अभी भी हम इस सब का अंत नहीं करना ज़रूरी समझेंगे। सोशल मीडिया टीवी सीरियल फिल्मों का काम क्या समाज को रसातल में धकेलना होना चाहिए केवल अपनी आमदनी के लिए। मंदिर शिक्षा के विद्यालय की तरह समाज को राह दिखाने की बात भूल कर किसी कोठे वाली जिस्म फरोश या नाचने वाली वैश्या की तरह पैसे की खातिर सब करना दोनों का अंतर साफ है।

Thursday, 11 October 2018

कानून उनके लिए फुटबॉल है ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) डॉ लोक सेतिया

         कानून उनके लिए फुटबॉल है ( अंधेर नगरी चौपट राजा ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

    कल की कई घटनाओं की बात आज। कल लोककनायक का जन्म दिन था।  कल गंगा सफाई के लिए अनशन करने वाले जी डी अग्रवाल का निधन हुआ। कल मुझे पुलिस वालों का परवाना मिला आज जाकर उपस्थित होने को। कल रात ही उत्तर प्रदेश के लखनऊ में आजतक टीवी चैनल वालों ने खबर में पुलिस वालों को सोते हुए दिखाया। इनका एक साथ बताना समझने को ज़रूरी है कि देश में नेताओं अधिकारीयों ने कानून को कैसे फुटबॉल बना रखा है। शुरआत 27 नवंबर 2015 से करता हूं। मैं तब 64 साल का था और बीमार भी था मगर उस दिन मैंने सी एम विंडो पर शिकायत दर्ज करवाई थी गैरकानूनी कार्यों और गंदगी को लेकर। कभी इधर कभी उधर भेजी जाती रही शिकायत करवाई को मगर सब विभाग और अधिकारी किसी और को करने की बात लिखते रहे , ये किसी ने नहीं कहा कि शिकायत झूठी है। मगर करीब साल भर बाद शिकायत दो बार बंद कर खुलने के बाद खुद सी एम के ऑफिस के पास चली गई। और मुख्यमंत्री दफ्तर द्वारा निपटान किया गया टिप्पणी लिखकर कि ये कोई शिकायत ही नहीं इक सुझाव मात्र है। मैंने इक खुला खत भेजा विभाग को मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री जी को कि आपको साल लगता है ये साबित करने में कि ये शिकायत है या सुझाव और इसी तरह हर ऐप्प पर दफ्तर में बैठे निपटारा किया जाता है तो ऐसी एप्प्स की उपयोगिता ही कुछ नहीं है। मगर हैरानी हुई जब विभाग से सूचना मिली कि उस खुले खत को ही शिकायत बना लिया गया है जिस पर लिखा हुआ था मुझे कोई शिकायत नहीं है। अर्थात आपकी मर्ज़ी है सुझाव को शिकायत बना सकते है और शिकायत को सुझाव। मगर करना कुछ भी नहीं केवल कागज़ी खानापूर्ति कर दिखानी है। अब कल की बात को लेकर वास्तविकता। 
            इक ऐसा ही जनहित का पत्र ईमेल से भेजा सभी अख़बारों और अधिकारीयों को करीब दस दिन पहले जब किसी नागरिक को उत्तर प्रदेश पुलिस ने एनकउंटर कर मार दिया और उसी दिन हरियाणा में एक नेता का ब्यान आया कि हरियाणा का साल में एकाध ही शहीद होता है इसलिए मुख्यमंत्री से कहकर सहायता राशि बढ़वा देंगे। लिखा था नशे में हैं जनाब , सत्ता का नशा है समझने नहीं देता क्या बोल रहे हैं। ये कनून व्यवस्था पर ध्यान दिलवाने को जनहित का खत था जिसको हरियाणा पुलिस ने न केवल शिकायत माना बल्कि खत लिखने वाले को ही दफ्तर आकर सफाई देने को फरमान भेज दिया। उनको लगता ही नहीं सरकार या विभाग को किसी सुधार की ज़रूरत है , जब जिस भी पुलिस वाले से बात हुई है उसी से सुना है जनता को सुधारना है। फिर ये सेवा सुरक्षा सहयोग का स्लोगन क्या है। 
               कभी अख़बार भी पाठकों के पत्र छापते थे और सरकारी विभाग भी चिट्ठी मिलने पर कुछ करवाई किया करते थे। उसके बाद जब लाज का घूंघट उतरा तो मिले खत रद्दी की टोकरी में डालने लगे। अब लोग ईमेल और सोशल मीडिया पर शिकायत करने लगे तो समस्या हुई है कि बिन में आप डाल सकते हैं भेजना वाला जाने कब तक नहीं डिलीट करता है। बड़े बड़े पढ़ लिख कर उच्च पदों पर आसीन लोग भी पढ़कर समस्या का समाधान नहीं करने पर विचार करते , ईमेल भेजने वाले को अपने दफ्तर बुलाकर जो मर्ज़ी बयान लिख कर हस्ताक्षर करवा मामला निपटाते हैं। समस्या की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है , बात व्यवस्था के ढंग को बदलने की है। कल ही इक पोस्ट लिखी थी जो इस तरह है :-

    कौन होते हैं हम लोग ( जनहित की बात वाले ) डॉ लोक सेतिया 

हम बहुत सारे लोग हैं कोई नाम नहीं कौन कौन कहां कहां है। न कोई संगठन न कोई एन जी ओ न किसी भी जाति धर्म से कोई वास्ता। मानवता है जो हर दिन याद रहती है। कहीं कुछ भी गलत होता है हम बेचैन होने लगते हैं। हम आवाज़ उठाते हैं अन्याय अत्याचार भेदभाव किसी के भी साथ होता देखकर। कोई डूब रहा है तो हम तमाशाई बनकर विडिओ नहीं बनाते। तैरना नहीं आता फिर भी दरिया के लहरों से टकराते हैं और चिंता नहीं करते मरने से नहीं डरते कोशिश करना छोड़ते नहीं है। हमने हार नहीं मानी है कि कुछ भी सुधर नहीं सकता है। हमने कोई सीमा नहीं बनाई हुई कि अपने गांव की गली की शहर की बात करनी है , राज्य की बात करनी है , हमने समाज की बात करनी है देश के हर भाग की बात करनी है। न किसी ने हमें आदेश दिया है न किसी का कोई निर्देश है , पुराने लोग पुरानी परंपरा बिभाते हैं। समाज को समाज का सच दिखलाते हैं। कोई वेतन कोई रुतबा कोई शोहरत नहीं मांगते हैं कहीं भी किसी का शोषण नहीं हो अराजकता नहीं हो कोई लाचार नहीं हो इतना चाहते हैं। जब भी जिस जगह कोई बात ठीक नहीं नज़र आती संबंधित लोगों विभाग को जाकर बताते हैं , उनको वास्तविकता बताने को कई ढंग अपनाते हैं। कभी खुद जाना होता था , कभी खत लिखकर सूचना देते थे कभी फोन पर समस्या बताते थे आजकल ईमेल और सोशल मीडिया से कर्तव्य निभाते हैं। कहीं कोई घायल है कहीं कोई दबा कुचला किसी का बंधक बना हुआ है कहीं शिक्षा स्वास्थ्य की कोई खामी है कहीं सरकारी विभाग की नाकामी है जब जो भी सामने आता है अपना कर्तव्य हमें बुलाता है। 
     देश समाज की समस्याओं को हमने अपना समझा है , कुछ कोशिश करने का बीड़ा उठाया है। निराश होकर नहीं बैठे थककर हार नहीं मानी कटु अनुभवों से मन नहीं घबराया है , हर दिन किसी न किसी तरह कोई सबक समझ आया है। आज ऐसे इक जी डी अग्रवाल की खबर आई है 85 साल की आयु है गंगा सफाई को 109 दिन से अनशन पर बैठे हैं। कोई किसी गांव में अकेला रास्ता बनाता है , कोई और सड़क किनारे बच्चों को खुद बुलाकर पढ़ाता है। कोई किसी मुसाफिर को मंज़िल बतलाता है बिना वर्दी यातायात को सुचारु ढंग से चलवाता है। ऐसे तमाम लोग अपने घर परिवार से बाहर सब को अपनाते हैं निस्वार्थ काम आते हैं। मगर जिस किसी की गलती पर उंगली उठाते हैं उसकी आंख का कांटा बन जाते हैं। सरकार सवाल करती है अधिकारी लताड़ लगाते हैं आप कौन हैं।  क्या बताएं कोई जवाब भी नहीं बस मौन हैं। समाजसेवक देशभक्त कई लोग हैं जो तमगा लगाए फिरते हैं हम अनाम गुमनाम कोई स्वार्थ नहीं अच्छा लगता है यही काम करते हैं। जिस किसी को दाग़ दिखलाते हैं उसी के कोप का भोजन बन जाते हैं। हम कोमल बदन कोमल दिल वाले लोग तूफानों से पत्थरों से टकराते हैं घायल होकर भी नहीं रुकना जानते चलते जाते हैं। जब भी कोई हमारे होने पर ऐतराज़ जताता है हमारी आवाज़ को खामोश करना चाहता है अपने शुभचिंतक को विरोधी समझता है , अफ़सोस बस जताते हैं। हम उजालों की बात करते हैं खुद को जलाकर रौशनी करते हैं मगर अब तो ये भी होता है अंधेरे हमीं पर इल्ज़ाम धरते हैं। सच की मशाल लेकर चलते रहे हैं झूठ की बस्ती से नहीं गुज़रते हैं। हम राहों से कांटे चुनने वाले लोग हैं जिधर से भी हम गुज़रते हैं फूल खिलते हैं। जाने ये कैसा निज़ाम आया है चलना गुनाह रेंगने तक की मनाही है। बार बार यही होता है , मुजरिम समझा जाता है जो फूल बोता है। आम खाने की बात करते हैं बबूल बोकर भी कुछ लोग , जिनको गुलों से लगाव नहीं है वो कहते हैं हम दरख्त हैं मगर मिलती लोगों को छांव नहीं। आज इतना ब्यान है मेरा कल फिर कोई इम्तिहान है मेरा। 
मुझे सरकार से कोई शिकायत नहीं है न ही उम्मीद है , केवल जनहित को बताया है। सफाई दे रहा हूं।

कौन होते हैं हम लोग ( जनहित की बात वाले ) डॉ लोक सेतिया

    कौन होते हैं हम लोग ( जनहित की बात वाले ) डॉ लोक सेतिया 

हम बहुत सारे लोग हैं कोई नाम नहीं कौन कौन कहां कहां है। न कोई संगठन न कोई एन जी ओ न किसी भी जाति धर्म से कोई वास्ता। मानवता है जो हर दिन याद रहती है। कहीं कुछ भी गलत होता है हम बेचैन होने लगते हैं। हम आवाज़ उठाते हैं अन्याय अत्याचार भेदभाव किसी के भी साथ होता देखकर। कोई डूब रहा है तो हम तमाशाई बनकर विडिओ नहीं बनाते। तैरना नहीं आता फिर भी दरिया के लहरों से टकराते हैं और चिंता नहीं करते मरने से नहीं डरते कोशिश करना छोड़ते नहीं है। हमने हार नहीं मानी है कि कुछ भी सुधर नहीं सकता है। हमने कोई सीमा नहीं बनाई हुई कि अपने गांव की गली की शहर की बात करनी है , राज्य की बात करनी है , हमने समाज की बात करनी है देश के हर भाग की बात करनी है। न किसी ने हमें आदेश दिया है न किसी का कोई निर्देश है , पुराने लोग पुरानी परंपरा बिभाते हैं। समाज को समाज का सच दिखलाते हैं। कोई वेतन कोई रुतबा कोई शोहरत नहीं मांगते हैं कहीं भी किसी का शोषण नहीं हो अराजकता नहीं हो कोई लाचार नहीं हो इतना चाहते हैं। जब भी जिस जगह कोई बात ठीक नहीं नज़र आती संबंधित लोगों विभाग को जाकर बताते हैं , उनको वास्तविकता बताने को कई ढंग अपनाते हैं। कभी खुद जाना होता था , कभी खत लिखकर सूचना देते थे कभी फोन पर समस्या बताते थे आजकल ईमेल और सोशल मीडिया से कर्तव्य निभाते हैं। कहीं कोई घायल है कहीं कोई दबा कुचला किसी का बंधक बना हुआ है कहीं शिक्षा स्वास्थ्य की कोई खामी है कहीं सरकारी विभाग की नाकामी है जब जो भी सामने आता है अपना कर्तव्य हमें बुलाता है। 
     देश समाज की समस्याओं को हमने अपना समझा है , कुछ कोशिश करने का बीड़ा उठाया है। निराश होकर नहीं बैठे थककर हार नहीं मानी कटु अनुभवों से मन नहीं घबराया है , हर दिन किसी न किसी तरह कोई सबक समझ आया है। आज ऐसे इक जी डी अग्रवाल की खबर आई है 85 साल की आयु है गंगा सफाई को 109 दिन से अनशन पर बैठे हैं। कोई किसी गांव में अकेला रास्ता बनाता है , कोई और सड़क किनारे बच्चों को खुद बुलाकर पढ़ाता है। कोई किसी मुसाफिर को मंज़िल बतलाता है बिना वर्दी यातायात को सुचारु ढंग से चलवाता है। ऐसे तमाम लोग अपने घर परिवार से बाहर सब को अपनाते हैं निस्वार्थ काम आते हैं। मगर जिस किसी की गलती पर उंगली उठाते हैं उसकी आंख का कांटा बन जाते हैं। सरकार सवाल करती है अधिकारी लताड़ लगाते हैं आप कौन हैं।  क्या बताएं कोई जवाब भी नहीं बस मौन हैं। समाजसेवक देशभक्त कई लोग हैं जो तमगा लगाए फिरते हैं हम अनाम गुमनाम कोई स्वार्थ नहीं अच्छा लगता है यही काम करते हैं। जिस किसी को दाग़ दिखलाते हैं उसी के कोप का भोजन बन जाते हैं। हम कोमल बदन कोमल दिल वाले लोग तूफानों से पत्थरों से टकराते हैं घायल होकर भी नहीं रुकना जानते चलते जाते हैं। जब भी कोई हमारे होने पर ऐतराज़ जताता है हमारी आवाज़ को खामोश करना चाहता है अपने शुभचिंतक को विरोधी समझता है , अफ़सोस बस जताते हैं। हम उजालों की बात करते हैं खुद को जलाकर रौशनी करते हैं मगर अब तो ये भी होता है अंधेरे हमीं पर इल्ज़ाम धरते हैं। सच की मशाल लेकर चलते रहे हैं झूठ की बस्ती से नहीं गुज़रते हैं। हम राहों से कांटे चुनने वाले लोग हैं जिधर से भी हम गुज़रते हैं फूल खिलते हैं। जाने ये कैसा निज़ाम आया है चलना गुनाह रेंगने तक की मनाही है। बार बार यही होता है , मुजरिम समझा जाता है जो फूल बोता है। आम खाने की बात करते हैं बबूल बोकर भी कुछ लोग , जिनको गुलों से लगाव नहीं है वो कहते हैं हम दरख्त हैं मगर मिलती लोगों को छांव नहीं। आज इतना ब्यान है मेरा कल फिर कोई इम्तिहान है मेरा।

Wednesday, 10 October 2018

उस एक दिन का असर ( जेपी की बात ) डॉ लोक सेतिया

    उस एक दिन का असर ( जेपी की बात ) डॉ लोक सेतिया 

     हर साल 11 अक्टूबर को मुझे अजीब ही नहीं खराब भी लगता था जब तमाम मीडिया टीवी चैनल वाले अख़बार वाले लोकनायक जय प्रकाश नारायण के जन्म दिन उनको भुलाकर इक फ़िल्मी नायक को महान नायक के संबोधन से सम्मानित कर रहे होते हैं। मगर अब बिल्कुल साफ़ है इन सभी लोगों का भगवान पैसा है और इनका मकसद कारोबारी है देश या समाज को लेकर नहीं है। कल भी यही होगा जनता हूं। मैं आज जो भी जैसा भी हूं शायद नहीं होता अगर उस विशेष दिन मैं उनकी सभा में शामिल नहीं हुआ होता। 25 जून 1975 की वो शाम मेरे जीवन में बेहद महत्वपूर्ण है इतनी अहमियत कि मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं उस दिन की गवाही बनने के कारण। उस दिन नहीं मालूम था ये दिन इतिहास में दर्ज होगा और सदियों तक याद किया जायेगा। मगर शायद ऐसा भी कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि तब जेपी के संपूर्ण क्रांति अंदोलन में शामिल लोग भी कभी सत्ता में होंगे और फिर लोकतंत्र पर खतरा मंडराता लगेगा। दुष्यंत कुमार को तब अंधेरी कोठरी में इक रौशनदान की तरह कोई बूढ़ा आदमी दिखाई तो देता था आज वो भी नहीं है। 
    आपात्काल की बात अक्सर होती है मगर शायद ही कोई बताता है कि जेपी जी के भाषण को आड़ बनाकर आपत्काल घोषित किस लिए किया गया था। उन शब्दों को दोहराना ज़रूरी है और ये भी कि आज भी कोई उन शब्दों को उपयोग करेगा तो सत्ता को उसी तरह से असहनीय होगा। चलो आपको उन शब्दों की याद दिलाते हैं।  उन्होंने कहा था :-

संविधान सभी को शांति पूर्वक विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है , इसलिए मुझे सुरक्षा बलों से कहना है (जेपी जी का )कि अगर कोई आपको शांतिपूर्वक विरोध करने वालों पर बलप्रयोग करने का आदेश दे तो अपने विवेक का इस्तेमाल कर देश के संविधान की भावना को समझ ऐसा मत करना। 

    क्या आज की सरकार भी इसको अनुचित मानती है। वास्तविकता और भी चिंताजनक है। विरोध की बात क्या अब नेताओं की सभा में काले रंग के कपड़े पहन कर जाने पर रोकते हैं पुलिस वाले। उनको इस से कोई मतलब नहीं है कि ऐसा करना देश के संविधान के खिलाफ है। आप अधिकारी हो या कर्मचारी सरकारी किसी भी विभाग में आपकी निष्ठा देश के लिए होनी चाहिए न कि सत्ताधारी दल या नेता के लिए। आजकल तो आला अधिकारी ये भी भूल गए हैं कि मंत्री विधायक सांसद सरकारी कामकाज में उचित दखल दे सकते हैं अनुचित नहीं , और सत्ताधारी दल के नेता का सरकार सरकारी कामकाज या किसी अधिकारी पर कोई आदेश देने का अधिकार नहीं है। जो लोग सत्ताधारी नेताओं की चाटुकारिता करते हैं वास्तव में खुद अपना और अपने ओहदे का अपमान करते हैं। उस दिन मेरी आयु 24 साल थी आज उसके 43 साल बाद मैं 67 साल का हूं मगर उस दिन जेपी जी की हर बात मेरे भीतर कुछ इस तरह बैठ गई थी जो कभी बिसरी नहीं मुझे। मुझे नहीं मालूम कोई और उन जैसा सार्वजनिक जीवन में ऊंचे आदर्श के मूल्यों पर चलने वाला दूसरा हुआ हो जिसने कितनी बार कितने बड़े बड़े पदों पर चुने जाने या स्थापित किये जाने अथवा मनोनीत किये जाने से साफ इनकार किया हो। बड़े से बड़े पद को ठुकरा कर जनता के बीच जनता की बात करने वाला गांधीवादी कोई और नहीं हुआ है। उनके भरोसे पर 500 डाकू हथियार डाल देते हैं , छात्र देश सेवा और भ्र्ष्टाचार के खिलाफ पढ़ाई छोड़ सड़कों पर निकल पड़ते हैं। मैं इक युवा डॉक्टर अपनी क्लिनिक बंद कर उनका भाषण सुनने बीस किलोमीटर दूर चला जाता है और इक दोस्त अपनी फैक्ट्री बंद कर साथ साथ बस से जाते है और बस को कई किलोमीटर पहले रोकने पर पैदल जाते हैं मगर ऊर्जा के साथ लौटते हैं। ऊर्जा उनके शब्दों से मिली हुई अभी भी कायम है। उस दिन उस सभा में नहीं गया होता तो मैं जो आज हूं नहीं होता। 

Tuesday, 9 October 2018

हर कानून से खिलवाड़ , कानून को रहे लताड़ - डॉ लोक सेतिया

   हर कानून से खिलवाड़ , कानून को रहे लताड़ - डॉ लोक सेतिया 

   पहले थोड़ा इनकी पहचान समझना ज़रूरी है। ये अलग अलग हैं जब आपस में मतलब नहीं मिलता तो एक दूसरे को बुरा बताते हैं। जब अवसर आये तब सर्वदल सहमति की तरह एक भी हो जाते हैं। इक इक की वास्तविकता दिखलाते हैं। उनका धंधा है सरकारी विभाग और कर चोरों का समझौता करवाते हैं ईमानदारी से रिश्वत का बराबर हिस्सा पाते हैं। इस बात को छोड़ो क्या कहलाते हैं दलाली करते हैं मगर दलाल नहीं समझे जाते हैं। किसी अनुचित निर्मित इमारत को सस्ते में खरीद कर मिलकर वैध कवराते हैं मगर उसके बाद असलियत पर आते हैं। जिस नक्शे पर विभाग से अनुमति मिली उसे कागज़ों पर समझाते हैं और अपनी मर्ज़ी से कानून को ताक पर रखकर निडरता से कुछ और बनाते हैं। कोई अधिकारी रिश्वत से नहीं मानता तो कई हथकंडे अपनाते हैं अपने होटल में अय्याशी मिलकर करते कराते हैं। हर काम को अपनी जगह किराये पर उठाते हैं लोगों की जान जोखिम में रखकर आग का खेल रचाते हैं। क्या नहीं कर सकते सब कर जाते हैं। विभाग को ठेंगा दिखलाते हैं। विभाग के सरकारी प्लॉट्स पर कब्ज़ा जमाते हैं चोरी करते सीनाज़ोरी दिखाते हैं। मगर धर्म कर्म वाले हैं धर्मध्वजा फहराते हैं। अब इक और से मिलवाते हैं , जो नहीं कल्पना की हमने वो कर दिखलाते हैं। पेड़ लगाने की बात समझाते हैं मगर पेड़ को काटने की इजाज़त नहीं हो तो नई राह खोज लाते हैं। किसी पेड़ की खाल तने से एक फुट गोलाई में छिलवाते हैं , पेड़ की डालियों पत्तों को भोजन नहीं जाता और पेड़ सूख जाते हैं। उसके बाद सूखे पेड़ को कटवाते हैं रास्ता बनाते हैं। नहीं ये अकेला नहीं कितने ढंग उनको आते हैं , ऊंचे पेड़ पर ऊपर से ऐसी दवा छिड़कवाते हैं कि पेड़ खुद ब खुद मर जाते हैं। मेरे शहर में ऐसे रईस बहुत हैं जो अपने साथ लगती गली को कब्ज़ा कर अपना बनाते हैं विभाग वाले उनके घर आते जाते हैं तभी नहीं घबराते हैं। नेता लोग हमेशा खाली सरकारी ज़मीन पर पार्क पर कब्ज़ा जमाते हैं दुकानें मकान जो मर्ज़ी बनाते हैं और किसी दिन कानून बदलवा मलकियत पा जाते हैं। दल की बनते लोग अपनी साहूलियत के कानून बनाते हैं और कुछ साल पटे पर रखने वाले मालिक बन जाते हैं। कई हैं किस किस की बात की जाये करोड़पति हैं चोरी की बिजली से कारखाने चलाते हैं। कुंडी चोर नहीं हैं धरती के भीतर से केबल डलवाते हैं मिल बांट खाते हैं। ऐसे सभी लोग कानून को रंडी समझते हैं उसको तार तार करते जाते हैं। किसी अधिकारी को अपना काम करने देने में अड़ंगे लगाते हैं। खुद नियम नहीं पालन करने वाले कानून की किताब लेकर आते हैं , सच ये है इक बात नहीं समझते हैं। आपके सभी के लिबास कागज़ के हैं और सरकारी विभाग वालों के पास आग के अंबार फाइलों में बंद हैं , चुप रहने वाले खैर मनाते हैं। हम तो इक बात याद दिलवाते हैं जिनके घर शीशे के होते हैं वो भूले से भी किसी पर पत्थर नहीं उठाते हैं। महल शीशे वाले बच नहीं पाते हैं।

Friday, 5 October 2018

सत्य के शोध से झूठ के उपयोग तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  सत्य के शोध से झूठ के उपयोग तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                         झूठ की है सरकार अब , अपनी अखियों को खोल रे।
                         झूठ का पलड़ा भारी है , सच न चलता मत तोल रे।।
     नारद जी का भजन नारायण जी को समझ नहीं आया तो हैरान होकर पास बुलाया और कहा मुझे आपका नया भजन कुछ समझ नहीं आ रहा। मगर कोई बात नहीं जनता हूं मेरे वास्ते ही बनाया होगा। नारद जी नई कोई जवाब ही नहीं दिया और मस्ती की धुन में गाते रहे। भगवान को कहना पड़ा , मुनीवर , किस चिंता में डूबे हुए हैं आज जो नारायण नारायण कहना भी याद नहीं रहा। आपको आराम की ज़रूरत है ये लग रहा है। धरती पर जब भी जाते हैं आकर हाल चाल बताते हैं मगर कभी इस तरह से तो नहीं वापस आते हैं। क्या हुआ इस बार कहो क्या फरमाते हैं। भगवन कहना है जो किस तरह बताऊं शब्द ही उलझते जाते हैं , इतनी जल्दी कहीं भला मापदंड बदल जाते हैं। सत्यमेव जयते वाले झूठ की महिमा सुनाते हैं। सरकार बदलने से किस तरह अल्फ़ाज़ बदल जाते हैं। कुछ मत सोचना क्या क्यों कैसे आपको सब बात बताते हैं सच कहने की कसम नहीं खाते झूठ नहीं बता सकते तभी हम आज बहुत घबराते हैं। कोई है जो लिख सकता है आज कलयुग की सच्ची कथा सुनाते हैं आपके लिपिक लिखते जाते हैं ताकि हर बात का मतलब जो भी आपको संशय हो बाद में सुलझाते हैं। 
                 मैं कभी झूठ नहीं बोलता जब भी कोई कहता है तब सबसे बड़ा झूठ यही होता है। मगर जब झूठ बोलने वाला शासक हो तो झूठ झूठ नहीं कहलाता है , उसका अपना बही खाता है। जो भी झूठ सत्ता बोलती है सच समझा जाता है। आजकल झूठ की बारी है सच्चाई झूठ से हारी है। झूठ पर शोध किया जाना बाकी है , सबको समझाना बाकी है। अभी जितना सामने आया कुछ भी नहीं पूरा झूठ सामने आना बाक़ी है। झूठ की पढ़ाई ज़रूरी है सच केवल गांधी जी की तरह मज़बूरी है। सच खुद को नहीं पहचानता है , सच मर चुका है खुद यही मानता है। सदियों तक सभी ने सच समझा समझाया है अब पहली बार झूठ का परचम लहराया है। झूठ पर सच की पॉलिश का कमाल है पीतल पर सोने का पानी खूब चढ़ाया है , अपनी चमक से दुनिया को भरमाया है। सब कहने लगे हैं यही है जो सच को ढूंढ कर लाया है। सच का कोई खरीदार नहीं है और झूठ जहां नहीं बिकता कोई बाज़ार नहीं है। झूठ झूठ झूठ कितने झूठ सामने आये हैं मगर झूठा गर्व से कहता है झूठ पर शर्मसार नहीं है। सारी पुरानी पढ़ाई व्यर्थ है झूठ का गहन बड़ा अर्थ है। झूठ की शिक्षा बहुत ज़रूरी है , हर शिक्षा बिना झूठ आधी अधूरी है। झूठ की कोचिंग क्लासेज का ज़माना है ये लाज़मी है अगर रोज़गार पाना है। जिस जिस ने झूठ की महिमा है गाई उस उस ने मनवांछित कामना है पाई। झूठ कल सबका भगवान कहलाएगा आपको भाएगा या नहीं भाएगा मगर जल्द ही ये भी सामने आएगा। झूठ जब ताज पहन कर सिंहासन पर बैठेगा सच सलाखों में बंद नज़र आएगा।
                इस कथा का अर्थ भी बताना ज़रूरी है , अभी तक कोई नहीं जनता था झूठ का कोई पेड़ ही नहीं सारा गुलशन झूठा है झूठ के पेड़ों पर इतने फल लगे हैं कि झूठों के चमन में हमेशा बहार का मौसम रहता है। सच को सूली पर चढ़ाने की बात पुरानी हुई नई कथा झूठ की तख्तपोशी की है। झूठ के सर पर बंधा सच्चाई का ताज है कोई नहीं जनता इस में छुपा क्या क्या राज़ है। भगवान अपने कितने देवी देवता बना दिये सब को अपना अपना विभाग सौंप दिया मगर मलाईदार पद की तरह झूठ का कोई देवी देवता नहीं बनाया। असली शक्ति को अपने पास रखा किसी को नहीं बतलाया। मुझे अब जाकर समझ आया है झूठ क्यों निडर रहता रहा दुनिया में आपकी मिली छत्रछाया है। भगवान बोले नहीं जाने कैसे हुआ है ऐसा , झूठ को मैं खुद गहरे समंदर में डूबने को छोड़ आया , मगर ये नहीं डूबा और तैराक बनकर लौट आया। झूठ को सभी ने समझ लिया अपना भगवान है , सच पल दो पल का कोई महमान है। जिस किसी के पास सच जाता है दो दिन में वही पछताता है , तोड़ता सच से अपना हर नाता है और भजन झूठ के फिर गाता है। माना सच कड़वा झूठ है मीठा भी , मगर लोग मीठा ज़हर खाने लगे हैं। झूठ को सच बताने लगे हैं। राह उल्टी को जाने लगे हैं। राम को नहीं मानते नानक को भी नहीं समझते , खुदा से भी मतलब नहीं उनको। जाने को सभी धर्मों के स्थलों पे जाने लगे हैं। तुम भी मेरा उपहास करने लगे हो मेरे भक्त बनकर लोग मेरा दर्द बढ़ाने लगे हैं। मुझे बाहर निकाल दिया सभी ने उनके आलीशान महलों के सामने जश्न मनाने को शामियाने लगे हैं। नारद जी अपनी बात पर पछताने लगे हैं , पश्चताप में आंसू बहाने लगे हैं।
                         
                        
                                         

Thursday, 4 October 2018

लगे रहो मोदी भाई जी ( कथा कहानी ) डॉ लोक सेतिया

     लगे रहो मोदी भाई जी ( कथा कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

                    ऊपर से निर्देश आया है उधार के गांधी पटेल को छोड़ो उनकी कोई ज़रूरत नहीं है।  पहले पता होता तो दिल पर पत्थर रखकर गांधी गांधी काहे रटते। अपने आखिर अपने होते हैं , जब अटल बिहारी वाजपेयी को लोग इतना चाहते हैं तो हमारे दल को किसी और के बापू दादा को अपना बनाने की ज़रूरत क्या है। खुद भी अटल जी को समझो और सब दल वालों को भी समझाओ। अपनी तस्वीरें हटवा कर वाजपेयी जी की लगवाओ। अटल अटल अटल गाओ , अगले चुनाव में यही मुद्दा बनाओ। लोग इंदिरा की मौत पर राजीव की मौत पर उनके दल को वोट दे सकते हैं तो अटल जी को लेकर सहानुभूति की लहर चलाओ। अच्छे दिन खत्म होने को हैं फिर से बुलाओ , आओ आओ। इस बार खाओ और खिलाओ का नारा उचित है बिल्कुल नहीं शर्माओ।                                                                                                                               मोदी जी को अटल बिहारी वाजपेयी जी की जीवनी पढ़नी पड़ रही हैं , अब उनके सहारे नैया पार लगने की उम्मीद है। उनकी लिखी कविताएं और उन पर लिखी किताबें बार बार पढ़नी हैं ताकि इस बार कहीं कोई गलती नहीं हो जाये। मामला लगे रहो मुन्ना भाई जैसा बन गया है। पढ़ते पढ़ते मोदी जी को वाजपेयी जी नज़र आने लगे , उनसे बातें करने लगे समझने समझाने लगे। बात बात में भगवान राम जी की बात निकल आई तो वाजपेयी जी ने बताया खुद राम जी ने संदेश भिजवाया है। मोदी जी ने पूछा बताओ क्या आदेश दिया है उनको भरोसा रखना चाहिए 2022 तक मंदिर बनवा देंगें अभी शामियाने में गुज़ारा करना विवशता है। अटल जी ने कहा भगवान राम जी को भी कोई जल्दबाज़ी नहीं पसंद वो खुश हैं हर हाल में। बनवास की आदत रही है उनको सत्ता सिंहासन का मोह कब रहा है। फिर क्या चाहते हैं रामजी बताओ मुझे क्या करना है। अटल जी ने राम जी की लिखी हुई चिट्ठी मोदी जी को पकड़ा दी। मोदी जी पढ़ रहे हैं और क्योंकि वाजपेयी जी ने बताया कि ये गोपनीय है मुझे आपको देना था बिना पढ़े हुए इसलिए पढ़कर सुना रहे हैं। 
     मेरे भक्त मोदी जी आप और आपका दल पता चला है राम अर्थात मेरे भक्त ही नहीं देश भक्त भी बाकी सब से बढ़कर हो। हर किसी से देशभक्त होने का सबूत मांगते फिरते हो , ऐसे में अवसर उपयुक्त है आप और आपके दल के लोग और आपके बाकी देशभक्त संगठन भी अपनी सच्ची देशभक्ति और भगवान के भक्त होने की मिसाल कायम कर दिखलाएं। कोई तपस्या नहीं करनी केवल जब तक मंदिर नहीं बनवा लेते वो भी मेरी मर्यादाओं का पालन करते हुए सदभावना पूर्वक तब तक आप सभी को अपने बंगले महल और सभी सुख सुविधाओं को त्याग कर सादगी से रहना होगा। कोई मंत्री सांसद विधायक या आपके दल का सदस्य शानो शौकत से नहीं रहेगा , कोई सरकारी सुविधा का उपयोग नहीं करेगा और घर बार सभी धन दौलत देश के खज़ाने को सौंप देंगे ताकि दीन दुखियों के दुःख दर्द मिटाने का काम किया जा सके। आपके दल की संपत्ति गरीबों को घर बनाने पर खर्च की जाएगी और किसी भी नेता के पास कोई पैसा या साधन नहीं रहेगा। जी बिलकुल जैसे सन्यासी रहते हैं सादा ढंग से छोटे छोटे घरों में। आप अपने दल के सभी सदस्यों को मन की बात की तरह या टीवी पर देश को सीधे प्रसारण की तरह ये संदेश सुनाओगे। मोदी जी मुझे पता है पत्नी होते हुए भी उसका त्याग का सुख क्या होता है , मगर सीता जी की तरह इस बार अग्निपरीक्षा आपको और आपके दल को देनी होगी। आपका देश से प्यार और मुझसे नाता कितना खरा है साबित कर दिखाओ। छोड़ो सब कुछ और मेरी तरह रहकर दिखलाओ। या फिर मुझे भूल रामरहीम के गुण गाओ , हरियाणा से खटट्र को ले आओ। उसकी तरह लाज शर्म छोड़ कर निभाओ , चाहो तो अपने बाबा को बाहर ले आओ। 
           तुरंत मोदी जी अनुपालना की और अपने दल के साथ बाकी सभी दल वालों को भी विनती की , आजकल तो हमारे साथ आपके नेता भी भगवान को रिझाने में लगे हैं तो इस नेक काम में सबका साथ होना ही चाहिए। इसलिए संविधान में उचित बदलाव किया जायेगा ताकि भविष्य में धनबल की राजनीति का ही अंत हो जाये। जिसे वास्तव में देश सेवा करनी है वही राजनीति में आये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को। अभी इक लंबी ख़ामोशी छाई हुई है। देशभक्ति के साथ भगवान राम जी की आज्ञा दोनों की बात है। नहीं कोई केमिकल लोचा नहीं है , अटल जी ने खुद मोदी जी को बताया है भगवान का संदेश है। अटल जी और राम जी दोनों ही आशा की किरण की तरह हैं। विचार विमर्श जारी है , शायद सभी नेता त्याग की तैयारी कर रहे हों क्योंकि बाहर कोई दिखाई नहीं दे रहा है। राम जी भी इम्तिहान ले रहे हैं अब कोई चारा बाकी नहीं है। 

इंडिया और भारत अमीर और गरीब ( असमानता दो वर्गों की ) डॉ लोक सेतिया

   इंडिया और भारत अमीर और गरीब ( असमानता दो वर्गों की ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

  देश में अधिकार धन दौलत सत्ता सभी में बंटवारा साफ है। बीस तीस फीसदी के पास सभी कुछ बहुतयात में है और बाकी अधिकांश के पास नाम को ही हासिल है। योग्यता और मेहनत आधार नहीं है चालाक और उचित अनुचित की परवाह नहीं कर मुनाफा कमाने वाले लोग सरकार और संस्थाओं का उपयोग कर तथा सत्ताधारी दलों को चंदा देकर तमाम नियम कानून अपने हक में बनवाने ही से दिन पर दिन और धनवान होते जाते हैं। अर्थशास्त्र का नियम है उनकी अमीरी बाकी लोगों से लेकर ही कायम रहती है। ये बात सभी जानते हैं नेता संस्थाएं सरकारें और अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाले विभाग। अभी कुछ लोगों की कंपनियों के क़र्ज़ पर बैंक वालों ने मिल बैठ का आपस में समझौता किया है जिस में एक एक कंपनी का हज़ारों करोड़ के क़र्ज़ का 75 फीसदी से लेकर 94 फीसदी तक माफ़ कर दिया गया है। हैरानी की बात ये है कि  भारतीय रिज़र्व बैंक के बैंकों से बाकी कंपनियों को भी इसी तरह मामला रफा दफा करने की सलाह दी है। ठीक उसी तरह जैसे सड़क किनारे पुलिस वाले को सौ पचास देकर हज़ार रूपये भरने से बचते हैं लोग। मगर रिज़र्व बैंक को इतना प्यार निजि कंपनियों पर ही क्यों आता है। आपका काम है बैंक कोई धांधली नहीं कर सकें लेकिन आप पहले की हुई धांधली पर खुद ही ऐसे निर्देश देते हैं। आम जनता को ही अपराधी मानते हैं जो जब जैसे चाहे उसे परेशान करते हैं। आपको क्यों लगता है अगर इन कंपनियों को नहीं बचाया गया तो कोई अनहोनी घट जाएगी। जो ये बनाते हैं क्या कोई और नहीं बनाता जो अकाल की नौबत आ जाएगी। किसान को लेकर नहीं लगता आपको कि अगर किसान नहीं रहेगा तो अनाज दाल सब्ज़ी फल पहनने को कपड़े अर्थात कुछ भी नहीं मिलेगा किसी को। अगर किसी रिज़र्व बैंक अधिकारी ने किसानी को देखा होता तो समझते ये क्या है। अन्नदाता भूखा है और आप पेट भर खाते हैं किसी दिन थाली में रोटी की जगह सोना चांदी और तमाम सामान रखा हो आपके सामने तब समझोगे। किसान को कुछ लाख का क़र्ज़ भी मकान ज़मीन गिरवी रखकर देने वाले बैंक इन बड़ी बड़ी कंपनियों को हज़ारों करोड़ कैसे बिना किसी ज़मानत और उनकी जायदाद गिरवी रखे दे देते हैं। उद्योगपतियों और कारोबारियों को करोड़ों अरबों रूपये मुहैया करवाते हैं केवल भाईचारा निभाने को , भाईचारा समझते हैं न , रिश्वत लेन देन का ही नाम है। किसी अधिकारी का कुछ नहीं जाता बैंक घाटे में जाते हैं तो उनको क्या , जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं। हर बैंक वाला अपना अलग धंधा चलाये हुए है , आप जाते हैं बैंक तो सुनिए आप कतार में खड़े हैं मगर उनकी आपसी बातचीत किस विषय पर है। वेतन के साथ काम पर बैठे बैठे कमाई करना जानते हैं , कभी किसी बैंक वाले को आर्थिक तंगी में देखा है। जो लोग इनको फायदा पहुंचाते हैं ये उनकी खातिर नियम कायदा सब भूल जाते हैं। इधर सरकार आंकड़े देती है कि चार साल पहले जो एनपीए दो लाख छबीस हज़ार करोड़ था अब आठ लाख छयानवे हज़ार करोड़ हो गया है या घोषित कर दिया गया है कि ये वापस नहीं आ सकता और बट्टे खाते में डाल दिया जाता है। 
            अपने बहुत चर्चा सुना होगा सरकार ने दवाओं के दाम स्टंट के दाम कम करवा दिए हैं। मगर ये केवल धोखा है आज भी दर्द का एक इंजेक्शन जो 12 रूपये का था 25 रूपये का हो गया है जो रोज़ उपयोग किया जाता है मगर वही इंजेक्शन 5 रूपये का भी और कंपनी का है। अभी इक निर्देश सर्वोच्च न्यायालय का मिला डॉक्टर्स की एसोसिएशन का भेजा हुआ जिस में आपको दवा लिखने से पहले इक साइट पर दाम चेक करने की सुविधा है। क्या ये उपहास नहीं है सरकारी विभाग क्या करते हैं क्यों किसी दवा बनाने वाली कंपनी को मनमर्ज़ी की कीमत रखने की अनुमति दी जाती है। अब ये लगभग असंभव है कि हर डॉक्टर अपने हर रोगी को हर दवा लिखने से पहले इस काम पर समय लगा सके। वास्तविकता ये भी है कि जिन डॉक्टर्स के अपने अस्पताल में खुद अपनी दुकान खुलवाई हुई है या जिन बड़े बड़े हॉस्पिटल्स में केमिस्ट शॉप लाखों रूपये किराये पर चढ़ाई हुई है उन सभी जगहों पर केवल कई गुणा कीमत की घटिया दवाएं बिकती हैं। हर सरकारी अस्पताल के पास ये खुली लूट सरकार की मर्ज़ी से होती है। जब सरकार खुद किसी कानून को लागू करने की बात करती है मगर बाद में बदल कर उसे पचास बिस्तर से बड़े अस्पतालों पर ही लागू करने का धोखा करती है क्योंकि नेताओं को अरबों रूपये मिल गये हैं। जब किसान की फसल की लागत की बात करते हैं तो बाकी लोग चाहे जो भी बनाते हों बेचते हों उनकी भी कोई सीमा क्यों नहीं तय की जा सकती है। एक के साथ एक मुफ्त , इसके साथ ये मुफ्त आदि सब लूटने के ढंग ही हैं। उचित कीमत हो तो ये सब संभव ही नहीं है। सरकार किसी शायर की बात के अनुसार समंदरों की तलाशी नहीं लेती और गरीब लहरों पर पहरे बिठाये जाते हैं जैसे मार्ग पर चल रही है। आह भरने वाले बदनाम कत्ल करने वालों का चर्चा नहीं। किसानों को बता दिया गया है दिल्ली दूर से ही अच्छी है करीब आओगे तो ज़ालिम हो जाती है। उनकी नींद में खलल पड़ना सहन नहीं किया जा सकता। सत्ता की रैली में लाखों जमा हो सकते हैं अधिकार मांगने को आओगे तो धारा 144 है। जो पंचकूला में लगी थी मगर दिखाई नहीं दी थी सत्ता की मनमर्ज़ी है। शिक्षा स्वास्थ्य सेवा को मनमानी छूट देने का मतलब ही है उनका केवल अमीरों के लिए सुरक्षित अथवा आरक्षित कर देना। बराबरी कैसे हो सकती है। मगर जब नेताओं को केवल सत्ता की अधिकारीयों को अपने ऐशो आराम की उद्योगपतियों और कारोबारियों को अपने मुनाफे की चिंता हो और देश समाज की कोई सोचता ही नहीं हो तब विकल्प क्या है। इंडिया वालों को जितना भी मिल जाये उनकी हवस मिटती नहीं है और भारत जो वास्तव में गांव में बसता है और जिसका कोई संगठन है ही नहीं बंटा हुआ है उसकी सुध कौन लेगा। आखिर में इक ग़ज़ल दुष्यंत कुमार की शायद जो नहीं लिखा जा सका उसे बयां कर दे। कहने को बहुत बचा हुआ है। 

ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा , मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा। 

यहां तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां , मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा। 

कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में , वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा। 

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं , खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। 

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते , वो सब के सब परीशां हैं वहां पर क्या हुआ होगा। 

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुनकर तो लगता है , कि इन्सानों के जंगल में कोई हांका हुआ होगा। 

चलो अब यादगारों की अंधेरी कोठरी खोलें , कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा।


Wednesday, 3 October 2018

मैं खुदा आप होना चाहता हूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     मैं खुदा आप होना चाहता हूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

               बस यही इक खिलौना चाहता हूं , मैं खुदा आप होना चाहता हूं। 

   बच्चे अपने वालदेन से और महिलाएं अपने पति से ज़िद कर मनवा लेते हैं अपनी बात। मुझसे भी मेरी पत्नी कुछ भी नहीं मांगती है इक ताजमहल की दरकार रही है उसको।  सब कुछ खुदा से मांग लिया तुझको मांगकर , उठते नहीं हैं हाथ मेरे इस दुआ के बाद। ये कहने वाला शायर भी कमाल का था कोई तो इतना भी कहता है कि खुदा से भी मांगना क्यों पड़े अच्छा है हाथ उठाने लगा तो हाथ ही पत्थर के बन जाएं। मगर कोई है जो ज़िद पर अड़ा है कौन इस दुनिया में मुझसे बड़ा है। वास्तव में उसे कुछ भी नहीं चाहिए बस खुदा वाला रुतबा मिल जाए तो जान बख्श दे सभी की , उस से पहले कोई नेता आदमी कहलाने के काबिल नहीं था। सब के सब चोर थे लुटेरे थे देश को बर्बाद करते रहे उसी ने बनाया सभी जो भी बना दिखाई देता है। वक़्त लगता है सारे पत्थरों पर नाम बदलवाना तारीख बदलवाना कितना काम बाकी है अभी दस साल और लगेंगे सब पुराने नाम मिटाने में और उन पर खुद अपना नाम खुदवाने में। काश कोई सॉफ्टवेयर बना होता जो एक कमांड देते ही सब पुराना डिलीट कर आज की तारीख़ में उसका अपना नाम लिख सकता मगर उस तरह से जैसे आशिक़ का नाम गुदवाती है अपने बदन पर माशूका। 
            पहले कभी नहीं देखा सुना था जैसे आजकल हर नेता हर बात कहते हुए उसके नाम से पहले आदरणीय माननीय  .. ..... ....... ....... जी की सरकार शब्द उच्चारण करता है जैसे कई महात्माओं के नाम से पहले श्री श्री 1008 लगाना आदर सूचक ज़रूरी है। इक ऐसे महत्मा मंच संचालक को फिर से याद दिलवा रहे थे कि उनके नाम से पहले अब 108 नहीं 1008 लगाना है। ये कोई और तय नहीं करता खुद वही लोग तय किया करते हैं। अपने दल के सभी नेताओं को जितनी जल्दी ये पाठ याद करवाया है अगर कहीं चार शब्द संविधान में बताये सब नागरिक एक समान हैं और किसी जाति धर्म पुरुष नारी होने से कोई मतभेद नहीं किया जा सकता और कोई सरकार किसी के विरोध करने आंदोलन करने को रोक नहीं सकती न ही अपने विरोधियों का दमन कर सकती है ये सबक भी समझा देते तो कितना अच्छा होता। कुछ तो सकारात्मक भी किया होता , खुदा बनाता है मिटाने का इल्ज़ाम अपने सर नहीं लेता है। 
             सबसे पहले जिसको खुदा कहलाना हो उसे किसी दूसरे खुदा भगवान देवी देवता की चौखट पर नहीं जाना पड़ता है। पढ़ना जिस जिस ने खुदा होना चाहा क्या किया। आजकल मामला हर जगह समझ से बाहर है। अभी कुछ साल पहले तलक घूंघट पर हिजाब पर शायर कवि फ़िदा थे , कितने शेर कितनी कविताएं कितने गीत याद आने लगे , निकलो न बेनकाब , परदा है , रुख से ज़रा नकाब हटा दो , जाने किस किस की मौत आई है आज रुख पर कोई नकाब नहीं। तब महिलाएं विशेषकर शहरी पढ़ी लिखी समझती थीं ये बंदिश हमीं पर क्यों है। अब जब परदा करना चलन में नहीं रहा तो फिर से लड़कियां चेहरे को इस तरह ढकती हुई दिखाई देती हैं कि केवल उनकी आंखें नज़र आती हैं। मैंने भी इक शेर कहा है :-

    छुपा नहीं छुपाने से हुस्न कभी भी दुनिया से , हसीं सभी हटा अपना हिज़ाब क्यों नहीं देते।

कुछ लोग आजकल जहां भी जाते हैं अपनी शान बढ़ाने दिखाने जाते हैं। इनको भी यकीन है भगवान के सच्चे भक्त उतने बचे नहीं जितने उनके सच्चे भक्त हैं। मगर खुद अपना मंदिर तो नहीं बनवा सकते , कभी देखा सुना किसी भगवान ने अपना मंदिर बनाने को कहा हो। भक्त लोग समझते ही नहीं कब बनाओगे इतना इंतज़ार तो अमेरिका जाने का भी नहीं किया था। अभी तक जितने भी भगवान देवी देवता हुए हैं उन में किसी ने उनको भगवान देवी देवता मानने की बात किसी भी तरीके नहीं कही थी। लोगों ने जिसे चाहा खुदा मसीहा भगवान बना डाला। हम इंसानों को हर किसी को खुदा समझने की लत लगी हुई है मगर कोई खुद आकर नहीं कहता मुझे खुदा कहकर पुकारो। जाने कितने खुदा बने और मिट भी गये हमने तराशे भी और तोड़े भी , अभी कितने खुद को भगवान घोषित करने वाले कैदखाने की शोभा बढ़ा रहे हैं। असली दौलत तो खुद्दारी की होती है और शायर नुशूर वाहिदी जी का इक लाजवाब शेर है :-

                 यही कांटें तो कुछ खुद्दार हैं सहन ए गुलिस्तां में ,

                 कि शबनम के लिए दामन तो फैलाया नहीं करते।

  भगवान बनना है तो खुद को बुलंद करो किसी और को छोटा करने से कोई बड़ा नहीं हो जाता है। भगवान कहलाने की चाहत करना क्या है इक बात से समझाना चाहता हूं। मुझे मेरे बेटे ने कई साल पहले इक डायरी मरे 50 वें जन्म दिन पर दी थी उपहार में , जिस पर इंग्लिश में इक बात लिखी हुई थी जिसका हिंदी में अर्थ है। कि शोहरत इक गुनाह है जब उसकी चाहत की जाती है , ये  आपके नैतिक आदर्शों पर और अच्छे आचरण पर निर्भर है और खुद ब खुद हासिल हो जाती है।


   इश्तिहारों की शोहरत अस्थाई होती है , वास्तविक शोहरत अभी कुछ दिन पहले सभी ने देखी है। अटल बिहारी वाजपेयी जी के निधन पर देश भर में और दिल्ली में भी वो भी तब जब उनका राजनीति से कोई नाता बाकी नहीं था सालों से। भगवान की ही बात करें तो वो लोगों के दिलों में बसते हैं इमारतों में नहीं मिलते किसी को तलाश करने से।

Tuesday, 2 October 2018

तू कितनी अच्छी है ओ मां - माताजी माया देवी जी की बातें

   तू कितनी अच्छी है ओ मां - माताजी माया देवी जी की बातें 

   मां पता नहीं क्यों आंखें भर आती हैं , नहीं कोई भी नहीं समझता इस नाते को। मुझे तुम से प्यारा कोई भी नहीं लगा कभी भी। इस से पावन छवि भगवान की मूरत की भी नहीं लगती मुझे। याद आता है यही गीत जो मैं गया करता था और सब परिवार मेरी बहनों को सुनना कितना अच्छा लगता रहा है। मैंने किसी भी औरत के चेहरे पर ऐसी मासूमियत और पावनता नहीं देखी , सच की देवी थी तुम। दिल में बहुत कुछ है मगर शब्द नहीं पास मेरे लिखने को , नहीं कही जा सकती हर बार ज़ुबान से भी। कभी सोचा तो नहीं अगले पिछले जन्म के बारे फिर भी चाहता हूं इक और जन्म हो जिस में हम दोनों हर पल हर घड़ी साथ हों। आज भी मेरी आंखों में आंसू हैं मगर सामने तेरा चेहरा मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है। किसी और युग की थी तुम इस युग में तो नहीं होते ऐसे इंसान , नहीं समझा किसी ने भी शायद तुझे भी मुझे भी। साथ अपना भी कितना कम रहा जीवन में , भटकता रहा हूं इधर उधर नहीं रह पाया हमेशा साथ तुम्हारे। तरसता ही रहा हूं मैं वास्तविक सच्चे प्यार और ममता से अलग रहते हुए। पढ़ना लिखना कारोबार करना या दुनिया का हर काम इस से महत्वपूर्ण तो कुछ भी नहीं था। मां तू किस मिट्टी की बनी थी कभी कोई शिकायत नहीं की मुझसे भी नहीं किसी से भी नहीं। याद आती है वो प्यारी सी शिकायत कभी कभी जब किसी दिन मिलने नहीं आया तो हंसकर कहती थी , जानती भी थी कोई भी कारण हो नहीं सकता था। हम सब के लिए जो भी कर सकते हैं करने पर भी सभी को कमी लगती है , तुम मेरी भोली मां कितनी खुश हो जाती थी ज़रा थोड़ा भी कुछ देने पर।  सब वास्तव में तेरा ही तो था मां , मेरे पास था ही क्या जो तुझे दे सकता। आज भी लगता है नहीं चुका पाया ममता का क़र्ज़ , तुमने कब समझा किसी से कोई क़र्ज़ लेना है। देना ही जानती थी तुम सभी को , मगर मुझे लगता है तुझे हम सभी बच्चों ने जितना आदर सम्मान दिया वो कुछ भी नहीं था तेरे प्यार के सामने। लोग कहते हैं मां भगवान का ही रूप होती है मैंने देखा भी समझा भी है भगवान तुझसे बढ़कर नहीं हो सकता है। पता नहीं स्वर्ग नर्क होता है या नहीं मगर चाहता हूं मरने के बाद केवल इक तुम्हीं से मिलना उस जहां में। तब भी कहा कुछ भी नहीं जाएगा , तुम भी बिना बोले समझा दोगी सब मुझे। अपने आंचल में छुपा लोगी मुझे , मेरे सब दुःख दर्द मिट जाएंगे तेरी गोदी में सर रखते ही। नींद नहीं आती है कब से मुझे रातों को।

भुला कर तुम्हें हम याद करते हैं ( जयंती ) डॉ लोक सेतिया

  भुला कर तुम्हें हम याद करते हैं ( जयंती ) डॉ लोक सेतिया 

              तेरे नाम को बर्बाद करते हैं , भुला कर तुम्हें हम याद करते हैं। 

    शेर लगता है किसी आशिक़ का कहा हुआ है , नाकाम मुहब्बत की बात है।  मगर दरअसल ये राजनीति की बात है। गांधी जी लालबहादुर जी अभी भी नेताओं को मतलब को याद आते हैं। किसी को मौत भी मार सकती मगर उनके विचारों की अर्थी निकालने वाले जो नहीं कर गुज़रें वही कम है। अगर वास्तव में आत्मा होती है और देखती है अपनी समाधि पर आने वालों को तो गांधी जी को मेरी ग़ज़ल का ये शेर ज़रूर याद आता होगा शायद कहीं पढ़ा सुना हो आत्मा ने ही।  पेश है :-

तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले। 

देशसेवा का लगाए तमगा , फिरते हैं देश को खाने वाले। 

   महात्मा गांधी की अहिंसा और लालबहादुर की जय जवान जय किसान की बात , दोनों आज कहीं छिपती फिरती हैं। कहां गांधी विदेशी सत्ता के खिलाफ सवदेशी अंदोलन चलाते थे और कहां आजकल बुत भी विदेश से बनवाने वाले किसानों को दिल्ली आने की इजाज़त नहीं देने वाले। उनकी राह चलना आता नहीं मगर फूल चढ़ाकर समझते हैं अनुयाई बन गये हैं। सत्य के साथ प्रयोग करने वाले और झूठ की माला जपने वाले क्या कभी साथ हो सकते हैं। गांधी के नाम पर जो भी किया जाता रहा या किया जा रहा है उसकी नाकामी क्या ये नहीं जतलाती है कि सरकारों को उन महान लोगों के नाम की लाज तक रखनी नहीं आती है। साल बाद एक दिन स्वच्छ भारत अभियान का दिखावा करना उनकी आत्मा के साथ मज़ाक नहीं है। कहां उनकी सादगी और ईमानदारी की मिसाल और कहां आजकल के नेताओं का अपने पर करोड़ों रूपये बर्बाद करना। उनकी रूह तो हर दिन तड़पती होगी ये सब देखकर। आखिरी आदमी के आंसू पौंछने की बात का अर्थ नहीं जानते हैं जो गांधी गांधी कहते हुए लगता है अट्टहास करते हैं। हे राम !!