Thursday, 1 December 2016

जनता बोलो ये होना चाहिए या नहीं , मोदी जी पूछते हैं बार बार ( सवाल ) डॉ लोक सेतिया

         गरीब जनता को ही त्याग करने को कहा जाता है  हर बार , कभी किसी राजनेता से किसी ने नहीं कहा त्याग करने को। जनता को समझा रहे हैं इस में तुम्हारी भलाई है , अभी थोड़े से काम चला लो कुछ दिन फिर सब अच्छा हो जायेगा। भाषण में बार बार पूछते हैं सरकार काला धन बंद होना चाहिए या नहीं , फिर उस सवाल को दोहराते हैं , आप तैयार हैं थोड़ा कष्ट झेलने को। जनता को कितना चाहये भला सत्ता तय करती है , दो हज़ार बहुत है ए टी एम से रोज़ निकलवाने को , सप्ताह में चौबीस हज़ार क्या काम हैं। मान लिया जो भी आपने हुक्म दिया पर किसी को कभी तो लगता ऐसा ही परिबंध जनता के सेवक कहलाने वालों पर भी लगाया जाये जिनको हर महीने तमाम तरह से वेतन भत्ते और सुविधाओं के रूप में लाखों नहीं करोड़ों बिना मांगे मिलते हैं। प्रधानमंत्री जी आप बताओ क्या उन पर अंकुश लगाया जाना चाहिए या नहीं , अगर जनता को आदेश देते हैं कि कुल मुद्रा के 1 6 प्रतिशत से काम चला लो तो खुद अपने भी खर्चे इतने न सही एक चौथाई कर काम चला लेने की बात करते। मगर किसी सांसद किसी विधायक किसी मंत्री पर कोई रोक नहीं लगी , आपको ढाई ढाई एकड़ के बंगले चाहिएं , तमाम सुरक्षकर्मी भी जनता के धन से और अपनी मर्ज़ी से निजि स्टाफ भी देश के ख़ज़ाने से। मोदी जी किसी भाषण में ये सवाल भी पूछते तो जनता बार बार दोहराती जी सरकार लोकतंत्र के नाम पर सभी लुटेरों की लूट अब तो बंद हो। कभी तो ये फैसला हो कि देश की आम जनता की आमदनी और मंत्रियों जनप्रितनिधयों पर खर्चे में कोई अनुपात रखा जाये। क्यों नहीं आप सभी पर इक शर्त लगाई जाये कि आपको सभी साधन सुविधाएं तभी मिलेंगी अगर जनता को जितना ज़रूरी उतना मिल सके ऐसा प्रबंध आप कर सकें। अगर आप में काबलियत ही नहीं देश की जनता की हालत को सही करने की तो कब तक मुफ्त में आपका बोझ सहती रहे जनता। आज आपको बताता हूं आपने किया क्या है।
                इक पुरानी कहानी नये ढंग से लिखनी पड़ेगी मुझे। सूरज ने वादा किया था मछलियों से उनको मगरमच्छ से सुरक्षित रखने का , बताया गया कि उसको बस में  करने का उपाय है 8 0 प्रतिशत पानी को सुखाने का।  थोड़ी सी परेशानी होगी कुछ दिन प्यास सतायेगी फिर सब ठीक हो जायेगा , सूरज का शासन था उसको सब करने का अधिकार मिल गया था।  अपनी ताकत की गर्मी से उसने तमाम पानी सुखा दिया और जिस जिस तालाब या नदी नाले के पास पानी था उसको जल्द ही वापस सरकार के समंदर में डालने का हुक्म सुना दिया जिस का पालन नहीं करना अपराध था। धीरे धीरे मछलियां मरती गई लेकिन मगरमच्छ को कुछ नहीं हुआ। आखिर सूरज को लगा मगरमच्छ को भी जीने का अधिकार है , और निर्णय किया गया आधा पानी मगरमच्छ को मिले और आधा सरकार के समंदर में भेंट कर अपने सारे अपकर्मों से मुक्त हो जाये। मछलियां अभी भी मर रही हैं पर मगरमच्छ सरकार की बात मानते हैं या नहीं कोई नहीं जानता।
           सीमा पर भी जैसा दावा किया गया था दुश्मन को समझ आ गई है वैसी बात दिखाई नहीं दे रही। यही तो सत्तर साल से होता आया है हर सरकारी दावा खोखला साबित होता रहा है। हर बार इक नई योजना पुरानी की जगह उसी की तरह और नाम से।  आज तक हर सरकार ने देश की जनता की तकलीफ को बढ़ाया ही है कम नहीं किया है। मोदी जी शायद अगले चुनाव में यही सवाल खुद से करेंगे जो किया नहीं पांच साल तक वो करना चाहिए था कि नहीं।  पर जवाब नहीं मिल सकेगा लगता है , मिल सकेगा फिर कोई नया नारा।

Monday, 28 November 2016

काला धन मिल गया , गरीबों के पास ( सत्ता का उपहास ) डॉ लोक सेतिया

         हा-हा-हा  , खुल कर हंसो सभी , उनका चुटकुला मज़ेदार है।    
आखिर पता चल ही गया काला धन उन्हीं के पास है जिनके जनधन खाते सरकार ने खुलवाये थे। थानेदार यही हमेशा से करते आये हैं चोरी की रपट लिखने से पहले ही घर के नौकर चाकर को पकड़ लाते और बहुत बार उनसे चोरी की मनवा भी लेते हैं। इस में इक राज़ छुपा रह जाता है कि चोर पुलिस का भाईचारा बना रहता है। कितनी बार जिस की चोरी हुई पुलिस उसी को चोर साबित कर देती है , आपने देखा था किसी को घर में घुसते जैसे सवाल इतना उलझाते हैं कि लोग हाथ जोड़ कहते हैं माफ़ करें कोई चोरी नहीं हुई। सामान गया भाड़ में जान सलामत है इतना क्या कम है। यकीन करें चोरी की शिकायत करना घर पर आफत को बुलाना है। अब सरकार को मालूम हो गया है काला धन बड़े बड़े महल में रहने वालों अमीरों के पास नहीं है , काला धन जनधन खाते वालों के पास जमा है। उनको बता रहे हैं सच सच बता दो अगर बचना है। बस मान लो काली कमाई है और आधा-आधा बांट लो सरकार से। तो बात यहां तक पहुंच ही गई। कमाल है मोदी जी।
               मगर आप सोचते होंगे ये जितने नोट सरकार के ख़ज़ाने में वापस जमा होंगे उनका करेंगे क्या। क्या ये कागज़ के टुकड़े रद्दी वाला खरीदेगा।  जी नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा , प्रधानमंत्री जी उनको किसी ऐतिहासिक प्रमाणपत्र की तरह सहेज कर रखेंगे और सभी को दिखाया करेंगे अपना महान कारनामा। आदेश दिया गया है उन तमाम पांच सौ और हज़ार रुपये के नोटों को सरकारी दीवारों में जितनी दरारें दिखती हैं उनको छुपाने को भीतर से चिपका दिया जाये सत्ता की गोंद के साथ। इस तरह किसी को भी कुछ दिखाई नहीं देगा , अंदर क्या है बाहर क्या है। भाई ये जो पब्लिक है नहीं कुछ भी जानती है। आखिर में दुष्यंत कुमार जी की ग़ज़ल के शेर।
                                      अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
                                      घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।
                                     इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके-जुर्म हैं
                                     आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।
                                     आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं
                                      राहगुज़र रोके हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार।
                                    दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर
                                     हर हथेली खून से तर और ज़्यादा बेकरार।

बेवफ़ा तेरे प्यार में ( हस-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         वो हर किसी को बेहद सुंदर लगती है , सब उसको अपना बनाना चाहते हैं। मेरी हो जाये सभी चाहते हैं , सत्ता रूपी सुंदरी के मोहजाल से भला कोई बच सकता है। राजनीति का महल उसी की खातिर तो बना है , हर राजनेता उसका वरण करना चाहता है। वो सदा ही नवयौवना बनी रहती है , सदा सुहागिन का वरदान भी उसे मिला हुआ है। कभी विधवा नहीं हो सकती और बार बार विवाह रचाने के बाद भी रहती कुंवारी ही है। उस को देख सभी ठंडी आहें भरते हैं , हासिल करने को उतावले रहते हैं। सब सोचते हैं कि हम ही उस के योग्य वर हैं। जानते हैं सभी कि सत्ता रूपी सुंदरी कभी किसी एक की बन कर नहीं रहती फिर भी अनजान बन जाते हैं। सभी मानते हैं कि हमीं उसके सच्चे आशिक़ हैं दिलोजान से प्यार करते हैं। और यकीन करते हैं कि उस के दिल में हमारी ही छवि बसी हुई है , ये किसी को भी मालूम नहीं कि इस सुंदरी के सीने में दिल नाम की चीज़ होती ही नहीं। ये इक पत्थर की मूरत है जो लगती वास्तविक है , जबकि है इक छलावा। बस मैं भी उस की चाह में राजनीति की दलदल में खिंचा चला आया था। यहां आने के बाद वापसी को कोई राह बचती ही नहीं , निकलना चाहो भी तो और फंसते चले जाते हैं। किसी जानलेवा रोग की तरह है जो मरने तक जाता नहीं है।
      मैं आपको अपनी प्रेम कहानी सुनाना चाहता हूं ताकि आप मुझे गलत न समझें। आज सब सच सच बताना है इसलिये कोई कसम नहीं खाऊंगा , उम्र भर शपथ लेकर उसको भुलाता रहा और कसम खाकर झूठ बोलने वालों में शामिल रहा हूं। हम नेताओं का कुर्सी की खातिर ऐसी कसमें खाना इक रिवायत ही है , इसका कोई महत्व असल में नहीं होता। आज सच बोलकर अपने दिल का बोझ हल्का करना है , झूठ बोल बोल खुद अपनी ही नज़र में पहले ही बहुत गिर चुका हूं। जो अधिक शिक्षित लोग होते हैं वो अपनी जीवनी लिख पुस्तक छपवा लेते हैं , मैं अधिक पढ़ा लिखा नहीं इसलिये कहानी सुना रहा हूं। शायद मेरी कहानी किसी को अच्छा सबक सिखा सके हालांकि खुद मैंने औरों के लाख समझाने पर भी कोई सबक कभी नहीं सीखा है। गुरु जी ने पहला पाठ यही तो पढ़ाया था कि हर चमकती वस्तु सोना नहीं होती , फिर भी चमक देख आगे बढ़ता गया दलगत राजनीति में। दूसरा सबक भी वही था कि सुंदरता रंग रूप एक जाल है धोखा है इस से बच कर रहना , जो इस जाल में फंसता वो कहीं का नहीं रहता है। उन शब्दों का अर्थ समझ किसी हसीना के इश्क़ में तो नहीं फंसा , मगर उनके शब्दों का भावार्थ नहीं समझ पाया और इस बेवफ़ा की चाहत में उलझ गया और उसी से मेरा जो भी हाल बदहाल हुआ आपके सामने है।
                             कल तलक मैं मंत्री था , आज आरोपी हूं भ्र्ष्टाचार का और घोटालों का। आप कल तक मेरी जय-जयकार करने वाले आज मुझे गलियां दे रहे हो। जब तक कुर्सी पर था सभी जान पहचान वालों को हर प्रकार से सहयोग देता रहा , आज मेरी बुराई करने वालों में वो भी शामिल हैं जिनकी खातिर मैं बुरा बना। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं ये कहावत सभी पर लागू होती है सिर्फ नेताओं पर ही नहीं। वो क्या था , परिवारवाद कहें , जातिवाद कहें , धनबल या फिर बाहुबल या कोई दूसरा नाम दे लें गंदी राजनीति का , जिस ने मुझे चुनाव जिताया और मैं सत्ता पर आसीन हो गया। मंत्री पद की शपथ लेते कसम खाई थी निष्पक्ष रहने , सब से न्याय करने और देश के संविधान की रक्षा की। मगर जैसे मेरी मनोकामना पूरी हुई शासक बनने की , मैं उस सत्ता रूपी सुंदरी के जाल में फंस चुका था। जो सोचता था कि मैं जो मर्ज़ी करने को स्वतंत्र हूंगा वो इक भ्र्म साबित हुआ , मुझे वही करना पड़ता था जो सत्ता सुंदरी चाहती थी। कहने को मैं शासक था मगर असल में इक गुलाम था उस व्यवस्था का जिस ने मुझे कुर्सी दी थी। अपनी सोच अपनी नैतिकता अपने आदर्श सब का त्याग करना पड़ा था कुर्सी पर बने रहने को। अपनों के अनुचित काम करने को विवश और आम जनता के उचित काम भी करना कठिन था , प्रशासन और लालफीताशाही के कारण। बस सत्ता सुंदरी का आलिंगन मुझे जकड़े हुए था।
                   हम सभी राजनेता उसी सत्ता सुंदरी के पागल प्रेमी हैं , उसकी खातिर इस दलदल में घुस चुके हैं। आशिक प्रेमिका को पाने को किसी भी हद तक जा सकते हैं जानते हैं आप भी। अपने पुराने युग की , हीर-रांझा , लैला-मजनू , रोमियो-जूलियट की प्रेम कथायें सुनी होंगी , इस युग की सब से महान कहानी यही है जो केवल मेरी अकेले की नहीं हर नेता की है। अफसोस इसका है कि हमारी प्रेमिका की वफ़ा सत्ता बदलते बदल जाती है , उसकी वफ़ा पुराने को छोड़ नये के प्रति हो जाती  है। बेवफा की याद सताती है पल पल क्या करें बताओ। क्या से क्या हो गया , बेवफ़ा तेरे प्यार में।

Sunday, 27 November 2016

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         नारद जी क्या कह रहे प्रभु को बिल्कुल समझ नहीं आया। कौन हैं जो भूखे हैं गरीब हैं। प्रभु को तो नहीं दिखाई दिये ऐसे लोग। रोज़ जो भी आते हैं उनके मन्दिरों मस्जिदों गिरिजाघरों गुरुद्वारों में सभी कितना अच्छा स्वादिष्ट प्रसाद लाते हैं और इतना अधिक धन उनको देते हैं चढ़ावे में कि अंबार लगे हुए हैं। रोज़ कितनी धूम धाम से कोई न कोई त्यौहार मनाते हैं। स्वर्गलोक से भी देखो तो धरती कैसी सुंदर अप्सरा जैसी चमकती हुई लगती है। वहां की रौशनी देख सभी देवी-देवताओं की आंखें चुंधिया जाती हैं। शासन करने वालों की कितनी जय-जयकार होती रहती है रोज़ हर तरफ। उनकी निराली शान देख कर तो प्रभु भी आह भरते हैं कि काश मेरे पास भी इतना सब कुछ होता। जिस देश के शासक का ऐसा ठाठ हो उसकी जनता भला भूखी कैसे रह सकती है। लोकतंत्र स्थापित यही सोच कर तो किया था कि जनता खुशहाल हो सके। नारद जी बोले मैं आपको कैसी समझाऊं जो सब जान समझ भी नासमझ बने हुए हो। आप अपनी महिमा का गुणगान सुनते सुनते इतना खो गये कि आपको बाकी कोई दिखाई नहीं देता। किसी शायर ने सही कहा है
                      " खुदा मुझ को ऐसी खुदाई न दे , कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे। "
यही हाल धरती पर आपके भारत देश का है। आपने तेतीस करोड़ देवी देवता बना डाले , उन्होंने कुछ हज़ार सांसद विधायक मंत्री और ऊंचे ऊंचे ओहदे बना लिये जिनको वी आई पी नाम दे दिया। बस उनको सभी कुछ चाहिए अपने लिये और सभी भाड़ में जायें। आप सोच रहे हो जनता के पास हर अधिकार है वही बनाती है नेताओं को शासक फिर उसको अनदेखा कोई किस तरह कर सकता है। आप ही बताओ आप भगवान बन गये पर बनाया किस ने , यही लोग हैं जिन्होंने आपको अपना भाग्य विधाता समझा और सब छोड़ दिया आप पर। युगों से ये आप ही के भरोसे जी रही है मगर आपने उनकी सुध ली नहीं कभी। अपनी आरती पूजा और स्तुतिगान में इतने मुग्ध हो गये कि ये भी याद नहीं रखा कि इतनी बड़ी दुनिया बना दी तो उसकी हालत भी अच्छी रखनी है। संतान को पैदा किया पर लालन पालन को अपना कर्तव्य नहीं समझा , काश जब लोग भूख से बिलखते और उनको रातों में नींद नहीं आती खाली पेट तब आपको उस हालत का एहसास होता।
                              भगवान है का विश्वास बेचारे लोगों को छलता रहा है , सभी सोचते हैं कभी तो भगवान उनकी सुनेगा और अच्छे दिन आयेंगे। उसे क्या पता भगवान अपनी इक अलग दुनिया में बड़े सुख चैन से रहता है दुनिया को उसके हाल पर छोड़कर। धरती पर शासक भी आपकी तरह हैं जब जनता से उसका सब कुछ छीनना चाहें पल भर में छीन लेते इक आदेश से ही , मगर जब जनता को थोड़ा भी देना हो तब विवशता की बात करते हैं। अच्छे दिन का वादा तो करते हैं मगर वादा पूरा कब तलक होगा कभी नहीं बताते। सत्ता मिलते वो वादा भूल जाते हैं और जनता को बहलाने को कोई नई चाल चलने लगते हैं। जनता को वही दिखाई देता है जिस का शोर होता है।
                                         भगवान भी पछता रहे हैं दुनिया बनाकर , अकेले भगवान कुछ भी नहीं कर सकते , आज तक किसी भी देवी देवता ने उनको असलियत बताना ज़रूरी ही समझा। इन देवी देवताओं को ही तो नियुक्त किया था संसार की भलाई करने को , सभी खुदगर्ज़ बन गये अपना अपना स्वर्ग धरती पर बनाने में लग गये। अब उनको सुधारा भी नहीं जा सकता न ही खुद उनको अधिकार भी है उनको हटाने का , यही भूल हुई थी बनाते समय उनको ठीक कार्य नहीं करने पर हटाने का प्रावधान रखना था। नारद जी बोले भगवान तब भी कुछ नहीं होता , लोकतंत्र में पांच साल बाद जनता को सरकार बदलने का अधिकार है फिर भी जनता के लिये कभी बदलता कुछ भी नहीं।  केवल सत्ताधारी लोग बदल जाते हैं। पर नहीं अब भगवान और तमाशाई नहीं बने रहेंगे , बुलवा भेजा है सभी देवी-देवताओं को। देखते हैं क्या निर्णय करते हैं सभी मिल कर। नारद जी चल पड़े हैं सभी को बुलाने। नारायण नारायण।

आपकी सुन ली हमने , अब तो हमारी भी सुनो सरकार जी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

           आप जो भी सत्ता में हो , आपके पास हर साधन है , सुविधा है , तरीका भी है अपनी बात हम लोगों को बताने का समझाने का ही नहीं मनवाने का भी आदेश देकर। आपने कहा हमने सर झुका स्वीकार कर लिया कि आप हमारी और देश की भलाई चाहते हैं। आप टीवी से प्रसारण करें या सभा बुला भाषण दें , अपनी हर बात रख सकते हैं। कभी तो हो ऐसा भी कोई ढंग कि वोट डालने के सिवा भी हम किसी तरह अपनी बात कह सकें और आपसे अपने सवाल पूछ सकें। क्या ये ज़रूरी नहीं जनतंत्र में। आज बहुत साधारण से सवाल मुझे पूछने हैं देश की जनता की ओर से।
                           पहला ज़रूरी सवाल :-
  आपने बहुत कुछ समझाया लोग समझ गये कि आप गरीबों की गरीबी मिटा देंगे , पर कब , कोई समय सीमा तो तय कर दो कि इस अवधि तक जनता को और झेलना है परेशानियों को हंसते या रोते। बस इतना बता दो कब कोई भूखा नहीं होगा , किसी को स्वास्थ्य सेवा की या शिक्षा की कोई कमी नहीं होगी गरीबी के कारण। बस इंसान की तरह जी सकें हम भी इतना ही चाहते हैं , और कितना इंतज़ार करना है।
                   दूसरा ज़रूरी सवाल  :-
आप सभी जनप्रतिनिधि कब तक इसी तरह खुद अपने पर जनता का सरकारी पैसा खर्च करते रहोगे , जैसे आप जनता और देश के सेवक नहीं मालिक हैं , राजा हैं। लोकतंत्र के नाम पर जारी ये लूट क्या कभी खत्म होगी। क्या जनता के लिये जैसे मापदंड बनाये हैं कि इतना है तो गरीब नहीं उसी तरह नेता मंत्री के लिये भी कोई सीमा अधिकतम की होगी। और उस में और आम जनता में अंतर ज़मीन और आसमान जैसा नहीं होगा। कभी हिसाब लगाना और जनता को भी बताना कि इतने सालों में कितने लाखों करोड़ सिर्फ सरकारी मंत्री और अमले पर ही खर्च होते रहे हैं , जिन से देश से गरीबी कभी की मिट सकती थी। लोग भूखे हैं क्योंकि आप नेता अफ्सर ज़रूरत से बहुत बहुत अधिक खुद पर बर्बाद करते हैं। सत्ता के अधिकारों का दुरूपयोग आपराधिक सीमा तक कर रहे करते आये हैं।
             तीसरा ज़रूरी सवाल :-
ये आज तक का सब से बड़ा घोटाला है। जितना धन इस में बेकार बर्बाद किया जाता रहा और लगातार किया जा रहा है हर सरकार द्वारा चाहे केंद्र की हो या राज्यों की , उतना शायद बाकी सभी घोटालों में भी नहीं लूटा गया होगा। वो घोटाला है अनावश्यक सरकारी प्रचार के विज्ञापन का। कुछ मुट्ठी भर लोगों अख़बार टीवी वालों को छोड़ और किसी को इन से कुछ नहीं मिलता है।
                            जवाब कौन देगा
क्या पत्रकार जनहित की बात करने वाले कभी ये सवाल पूछेंगे जब भी सत्ताधारी नेता या प्रशासनिक अधिकारी से साक्षात्कार हो उनसे।  कभी तो अपना स्वार्थ छोड़ सच का पक्ष लें मीडिया वाले।

Saturday, 26 November 2016

उधर थे जो कल , आज इधर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           हंगामा हो गया उस इक बात से , हर जगह वही मुद्दा छाया हुआ है। अख़बार टीवी समाचार फेसबुक ट्विट्टर व्हाट्सऐप संदेश से गली पार्क में आपसी चर्चा उसी विषय की है। ऐसे में इस पर बहस आमंत्रित करने का विचार बना तमाम बुद्धिजीवी वर्ग को पत्र लिख कर पूछा कि आप किधर हैं , पक्ष में बोलना चाहते हैं अथवा विरोध में बात रखना चाहते हैं। जो भी चाहें करें मगर आयोजकों को कार्यक्रम से एक घंटा पहले सूचना अवश्य दें ताकि बहस को सार्थक बनाया जा सके इक संतुलन दोनों पक्ष में बना कर। लेखक चिंतक विचारक आलोचक और पत्रकार सभी को शामिल किया गया बहस में भाग लेने को। सभी को मांगने पर जो जो प्रश्न पूछे जाने हैं उनका विवरण उपलब्ध करवा दिया गया। लोकतंत्र की सफलता विफलता से लेकर अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी तक हर बात शामिल थी सवालों में। नैतिक मूल्यों से देश की बिगड़ी हालत तक , नागरिक अधिकारों से सभी में समानता लाने की बात तक सब कुछ बहस में शामिल होगा। अधिकतर ने शुरू में ही विरोध में भाग लेने का मत प्रकट किया मगर उनको कहा गया अभी जल्दी नहीं है दो दिन बाद कार्यक्रम का आयोजन है तब तक मुमकिन है घटनाएं और रूप में सामने आयें और आपकी सोच बदल जाये इसलिये आप तय दिन बहस शुरू होने से एक घंटा पहले बताना जो चाहते हों। आप समर्थन करें या विरोध उसका मतलब आपकी निजि राय ही नहीं है अपितु समझना है कि उचित या अनुचित क्या है।
                बहस आयोजित करने का जम कर प्रचार किया गया , तमाम जाने माने लोगों को बुलावा भेजा गया , इक अपने रसूख वाले टीवी चैनल को भी शामिल किया गया ताकि बहस के अंश खबरों में दिखाये जा सकें। लोग भी अधिक आयेंगे ये पता चलने पर कि श्रोता  बन कर ही सही टीवी पर चेहरा दिख तो सकता है। पहले भी अलग अलग विषयों पर चर्चा आयोजित करते रहे हैं और सभी सरकारों की अनुकंपा पाते रहे हैं , इस सरकार से पाने में सफल होंगे उनको भरोसा है। दो दिन भी उनके पास है और नई जानकारी नये तथ्य जुटाने के लिये। उधर हर तरफ शोर बढ़ता जा रहा था और उनको ख़ुशी हो रही थी मामला गर्म है अभी ठंडा नहीं हुआ। जो भी उनको तो हर हाल में बहस करवानी ही थी।
                           दो घंटे पूर्व सभी वक्ता आ गये थे और आयोजक ने फिर याद दिलाया था कि ठीक एक घंटा बाद आपको लिखित में अपना निर्णय उनको बताना है कि आप उधर हैं या इधर , मतलब पक्ष में बात रखना चाहते हैं या विपक्ष में। क्योंकि उनको इक चिंता थी कि बहस एकतरफा नहीं हो जाये अगर सभी समर्थन में ही बोलना चाहें इसलिये उनहोंने ये सूचना दे दी थी कि विरोध में बोलने वालों को काफी अधिक राशि का मानदेय मिलेगा प्रयोजकों की तरफ से जबकि पक्ष में बोलने वालों को दूसरे प्रयोजक उतनी राशि का मानदेय नहीं दे सकते। इस को भेद भाव नहीं हमारी विवशता समझना , विरोध करने के प्रयोजक धनवान हैं , पक्ष में बोलने वालों के थोड़ा कम अमीर हैं हालात के मारे हैं। कोई इस पर आपत्ति नहीं जता सकता , मगर चाहें तो अपना मत बदल सकते हैं और बता सकते हैं अब आप किधर खड़े होना चाहते हैं।
                             सभी ने बंद लिफाफे में लिख कर दे दिया था किस तरफ हैं। जब सभी लिफाफे खोले गये तो पता चला सबने अपना इरादा बदल लिया है। सभी विरोध में बोलना चाहते हैं। मत बदलने का कारण भी सभी ने बताया था , निडर होकर सच का साथ देने का कर्तव्य निभाना। जो अभी तलक उधर थे अब इधर हैं , बहस का अंजाम जो भी हो , ये बात ज़ाहिर हो गई थी कि पैसे के महत्व पर सब एकमत हैं।

आधा-आधा , फिफ्टी-फिफ्टी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        सिक्के के दो पहलू होते हैं , हर बात के दो पक्ष होते हैं। लोकतंत्र का खेल तमाशा भी सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों से चलता है। कुछ कुछ याद आता है बचपन में खेलते थे चोर-सिपाही आधा-आधा। काला धन भी पूरा ही काला नहीं होता , उसको भी सफेद किया जा सकता है। अभी जब नोट बंद हुए हज़ार और पांच सौ वाले तो खबर पता चली दस बीस प्रतिशत कम देकर नोट बदल देने की। तब सरकार ने चेतावनी भी दी कि ऐसा करते पकड़े गये तो दंड मिलेगा। कानून की यही बात बहुत अच्छी है पकड़े जाओ तभी अपराधी नहीं पकड़ में आओ तो सभ्य नागरिक। पकड़े भी गये तब भी खुद को निर्दोष साबित करने को एक नहीं अनगिनत अवसर मिलते हैं। रंगे हाथ पकड़े गये और जुर्म कबूल भी कर लिया तब भी अदालत में कसम खाकर मुकरने की इजाज़त है। आर्थिक अपराध यूं भी चोरी नहीं कहलाते , समझौता कर लो या जुर्माना भर दो मामला निपट जाता है।  जब प्रधानमंत्री जी ने अचानक नोट बंदी की बात की और भाषण दिये हर दिन ये कहते हुए कि जो लोग सालों से लूट रहे थे अब उनकी खैर नहीं , उनको घोषित करने का अवसर पहले ही दिया जा चुका है। अब फिर बात होने लगी है काला धन घोषित करो और पचास प्रतिशत जुर्माना भर बाकी पचास प्रतिशत सफेद करा लो। क्या बात है चोर-सिपाही आधा-आधा। अब समझ लो ये काला धन कभी खत्म नहीं होगा , जब मर्ज़ी रंग बदलता रहेगा। आज काला है जो वही कल सफेद ही नहीं अल्ट्रा-वाइट होगा। लो जी भ्र्ष्टाचार जी आपका डर खत्म चिंता खलास। कबीरा तू क्यों भयो उदास।
                                                    बस सारी बातें चंद दिनों की थीं , महीना भी नहीं बीता और देश वापस वहीं जहां था। मगर सरकार यू-टर्न नहीं लेगी इस को लिख कर रखा हो तो मिटा देना। असल में सत्ता इक गोलचक्र में घूमती है उसको वापस आने को यू-टर्न लेने की ज़रूरत नहीं होती। आपने दिल्ली में इंडिया गेट देखा होगा , इक बड़ा घेरा है चौगिर्दा लोग घूम कर आनंद लेते नज़ारा देखते। अब वहां से रास्ता हर तरफ जाता है , पत्थर की हवेली से तिनकों के नशेमन तक , इस मोड़ से जाते है कुछ सुस्त कदम रस्ते कुछ तेज़ कदम राहें। सही याद आया आपको ये आंधी फिल्म का गीत है। राजनीति आज भी वही है जनता को भावनाओं से बहला शासन पाना। खिलाड़ी बदलते रहे खेल नहीं बदला , किसी ने तब खेल दिखाया कोई आज दिखा रहा है।
                 लो जी अभी तो पार्टी शुरू हुई है , सब खुश इधर वाले भी उधर वाले भी। जनता तू भरोसा रख काला धन आया है तो अच्छे दिन भी लाया ही होगा। देखना तेरी गरीबी कैसे मिटती है , दुख भरे दिन बीते रे भईया अब सुख आयो रे। डरता काहे को है जो भी धन किसी ने डाला तेरे खाते में आधा तेरा आधा सरकार का। सीधा सा हिसाब है कोई बनिया का बही खाता नहीं जो गिनती में चूक हो जाये। जन धन खाते इसी सोच से खुलवाये थे समझे आप , बेचारे जिन्होंने अपने खाते में औरों को काला धन नहीं डालने दिया फिर गरीब के गरीब ही रहे बदकिस्मत लोग। अभी भी दिन बाकी हैं अगर साहस हो कुछ करने का , क्योंकि गलत काम बिना साहस नहीं किया जा सकता। डरपोक कभी अमीर बन ही नहीं सकते। सुबह देश के सब से बड़े न्यायधीश कह रहे थे अदालतों में न्यायधीश के पद रिक्त हैं न्याय का क्या हो। जब भृष्ट लोगों का काला धन काली कमाई का आधा लेकर ठीक करना हो तब क्या ज़रूरत न्यायपालिका की भी। देखो हिस्सा मिला और इंसाफ हुआ उनका , ये कोई मुगलेआज़म फिल्म का फ़िल्मी तराज़ू नहीं जो झुकता दिखाई देगा। कहते थे विदेश तक में नाम रौशन होगा देश ईमान की राह चल पड़ा है , क्या नाम दिया था जंग है अपराध आतंकवाद नशे का कारोबार और रिश्वत तथा लूट के खिलाफ। कसमें वादे बातें नारे सब खोखले साबित होंगे क्या पूछना उन से शायद बता सकें , छल फरेब धोखा कोई शब्द बचा ही नहीं कहने को लगता है। चलो थोड़ा हंस लिया कुछ दिन अब थोड़ा रो लो दोबारा अपनी हालत पर। हंसना-रोना फिफ्टी-फिफ्टी , आधा-आधा फिफ्टी-फिफ्टी।

Friday, 25 November 2016

ज्योतिष वास्तुशास्त्र और देश की हालत ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

               मैं भूल गया था , फिर से याद दिला दिया आपने , ऐसा अक्सर होता ही है हम सभी के साथ। ओह याद आया , काश पहले याद आ जाता तो समस्या ही नहीं होती। हर समस्या का समाधान है हमारे ज्योतिष शास्त्र और इधर लोकप्रिय हुए वास्तुशास्त्र के पास। कारण चाहे जो भी हो अख़बार टीवी वाले भी इस से सहमत हैं , तभी हर दिन इनको प्रचारित करते हैं। इन्हीं की अनुकंपा से मालामाल भी हैं। नया राज्य बना और नये मुख्यमंत्री को पता चला कि हैदराबाद का पुराना मुख्यमंत्री निवास वास्तु दोष से ग्रस्त है। खुद अपना घर होता तो उनसे सलाह लेकर कोई दरवाज़ा कोई खिड़की बदलवा उसको ठीक कर लेते। कोई पौधा किसी दिशा में लगाते या रसोई घर की जगह बदल जाती। खुद अपनी सुरक्षा का भी उपाय है , घर को किसी खास रंग में पेंट करवा महंगे फर्नीचर से सजा कर मुख्यद्वार के दोनों तरफ धातू की बनी ऊंची ऊंची योद्धा की मूर्ति रख लेते। वास्तु वाले इनको सुरक्षा कवच बताते हैं , हम भी ऐसा करने को बुरा नहीं बताते। जब बाकी नेताओं अधिकारियों को अरबों रुपये खर्च कर पाल सकते हैं सफेद हाथी बनाकर जो किसी काम नहीं आते तो ये भी स्वीकार कर लेते। मगर ये तो ज़रूरी नहीं था कल खबर सुनी कि ऐसा किया गया वास्तु दोष के कारण।
                                      इक नया मुख्यमंत्री आवास बनाया गया आठ महीने के काल में इक रिकॉर्ड की तरह 3 8 करोड़ की राशि खर्च कर के। इसको लोकतंत्र कहते हैं , राजा का हुक्म हुआ और ताजमहल बना दिया गया जनता के धन से सभी ने वाह ताज कहा चाय की चुस्की लेकर। देखो उनकी जान को खतरा है , उनका स्नान घर तक बुलेट प्रूफ है शयनकक्ष ही नहीं। ऐसे मौत से डरे लोग भाषण देंगे जनता को साहस से काम लो निडर बनो और भगवान पर भरोसा रखो। इनको तमाम पूजा पाठ हवन यज्ञ करने करवाने के बाद भी भगवान पर इतना यकीन नहीं कि इनको बेमौत नहीं मरने देगा। इनकी जान कीमती है जनता की सेवा करनी है इसी तरह बहुत साल तक , बस चले तो आखिरी सांस भी सत्ता की गद्दी पर बैठे लेना चाहेंगे। हैरानी की बात है अपने देश के नेताओं की धर्म में बड़ी आस्था रहती है खुद की खातिर , मगर जब ईमानदारी से राजधर्म का पालन करने की बात हो तब उनको कुछ याद ही नहीं रहता।
                                          याद आया अटल जी ने कभी उनको राजधर्म निभाने का संदेश दिया था। सत्ता मिलते सीस झुकाया जिस मंदिर की चौखट पर आजकल उसी में प्रवेश करने से बचते हैं। जब आपने कुछ गलत किया ही नहीं तो छप्पन इंच की छाती ठोक देते जवाब विपक्ष को। मगर इक सच मनोविज्ञानिक बताते हैं कि जो सुरक्षा कर्मी रखते हैं उनको डर सब से अधिक लगता है। लगता है अभी उनको समझ नहीं आ रहा कि अपने उचित निर्णय को उचित साबित कैसे करें , उनको सवाल पूछने वाले ही गलत लगते हैं। इसलिये नाराज़ प्रेमिका की तरह कहना चाहते हैं जाओ मैं नहीं बोलती। वे मैं नहीं बोलणा , क्या गीत है , तेरे सामणे बैठ के रोणा दिल दा दुखड़ा नहीं खोलणा। जाओ कोई उनके आवास पर उनके आंसू पौंछ कर मना लाओ , बस बहुत हुआ रूठना अब मान भी जाओ ।  ओह बात कुछ और हो रही थी कहां बीच में काला धन आ गया , करें क्या आजकल यही हो रहा है। सवाल आया था कि क्या नोट बंद करने से सब ठीक हो जायेगा और जो अभी तलक काले कारनामे करते रहे उनके पाप इस से धुल जायेंगे। क्या ये गंगा स्नान है सभी नेताओं के इतने साल तक दो नंबर के धन से चुनाव लड़ने के बाद उसका प्रायश्चित है। इक कथा है मां पार्वती ने शिवजी से यही पूछा था , और शिव जी ने जवाब दिया कि जो केवल तन गीला करते हैं उनको मोक्ष नहीं मिलता पर जो मन को पवित्र करते स्नान कर बस उन्हीं के पाप समाप्त हो जाते हैं। मगर कौन मात्र तन से नहाया कौन मन का मैल भी धोता कैसे पता चले पूछा पार्वती जी ने। शिवजी इक कोड़ी का रूप बना और पार्वती को सजी धजी सुंदर औरत बनाकर उसी डगर पे बैठ गये जिस से लोग गंगा स्नान कर वापस लौट रहे थे। लोग पास आते तो पार्वती जी बताती कि ये मेरे पति हैं और मैं इनको कंधे पर लादकर लाई हूं गंगा स्नान को , थक गई इसलिये विश्राम कर रही हूं। लोग बुरी नज़र से देखते और सुंदर नारी देख प्रलोभन दे अपना बनाना चाहते , पार्वती चुप चाप शर्मसार हो जाती ये हालत देख। संध्या को इक पुरुष आये और उनकी बात सुन उसकी आंखों से आंसू की धारा बह निकली , उसने कहा चलो मैं आपकी सहायता करता हूं। उसने शिवजी को अपने कंधे पर उठाकर तट पर पहुंचा दिया और जो सत्तू था उसके पास वो भी खिला दिया। शिवजी पार्वती का प्रयोजन पूरा हो गया था और वो चले गये अपने लोक। देखते हैं इस कलयुगी उपाय से क्या काला राक्षस खत्म होता है अथवा नहीं।
                             विषय पर आते हैं , ज्योतिष शास्त्र की बात की जाये। शुभारंभ बहुत ज़रूरी होता है , और जन्म समय और तिथि ही नहीं जगह भी मिलकर किसी का भविष्य तय कर देते हैं। ये सभी ज्योतिष विशेषज्ञ बताते हैं। हिंदुस्तान जब आज़ाद हुआ और इंडिया नामकरण किया गया तभी भविष्य निर्धारित हो गया था। तब ग्रह सिथ्ति बन गई थी , आज़ादी मिली चौदह - पंद्रह की आधी रात को , तभी आज़ादी का पक्ष सदा अंधेरा ही रहा , उजाला ढूंढने वाले निराश हुए और काले कारनामे और धंधे वालों को पूरी आज़ादी रही। पी एम कहना प्रधानमंत्री नाम रखना भी ऐसा ही था , पी एम शाम का समय होता है और प्रधानमंत्री जीवन की शाम में ही बने लोग। इक युवा बने तो उनकी आयु भी कम ही रही। अभी कल पूर्व प्रधानमंत्री बता रहे थे नोट बंदी से कितने प्रतिशत क्या कमी होगी , वही पी एम कहते थे मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं जो बता सकूं महंगाई कब कम होगी। महंगाई डायन और गरीबी पापिन दोनों की कुंडली बनवा देखी जाये कब उनको राहू केतु की दशा खत्म करेगी। चलो आखिर में आज की नई इक कथा लिखते हैं ताकि सनद रहे और ज़रूरत पर काम आये , अरे ये तो वकीलों की भाषा है। पर इधर कथा पुराने ढंग की समझता कौन है इसलिये यही उचित है।
                उस माता के दो पुत्र हैं , नेता और अधिकारी , और एक बेटी है जनता अनचाही औलाद जैसी। बड़े बेटे को सत्ता सभी अधिकार खुद देती है , छोटा जानता है नहीं मिलें तो कैसे छीन सकते हैं। देश की एक तियाही जनता की तरह बेटी को लेकर मां सोचती है अच्छा होता ये अभागी जन्म ही नहीं लेती। यही मापदंड है समाज का बेटा अपकर्म लूट मर करता रहे तब भी बुरा नहीं , बेटी की ज़रा सी बात भी बदनामी का सबब बन जाती है। गरीबी इक कलंक है जनता की दशा इक अभिशाप। कसूर किसी का नहीं विधाता ने इनका भाग्य ऐसा ही लिखा है। कितने उपाय किये सभी ने , आरक्षण देने से महिला आयोग बनाने , और मनरेगा से पहले भी कितने सूत्री कार्यक्रम चलाकर। कोई पता करे किसी वास्तु शास्त्र वाले या अंक शास्त्री अथवा ज्योतिष पंडित से , कोई उपाय ऐसा ही सही , और सब आज़मा लिया सबने।

Wednesday, 23 November 2016

ग़ज़ल 219 ( सुन लिया आपने जो कहा कह दिया , आप अच्छे ज़माना बुरा कह दिया ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

सुन लिया आपने जो कहा कह दिया 
आप अच्छे ज़माना बुरा कह दिया। 

मर्ज़ क्या आपने हमसे पूछा नहीं 
पी भी जाओ ये कड़वी दवा कह दिया। 

आपकी बात को जो नहीं मानते 
हैं गरीबों का करते बुरा कह दिया। 

साथ मेरा न दोगे अगर वक़्त पर 
ढूंढते फिर रहोगे खुदा कह दिया। 

इक पुरानी कहानी सुनाई हमें 
और किस्सा सुनो इक नया कह दिया। 

बेख़ता लोग इतने मरे भीड़ में 
क्या किया आपने , मरहबा कह दिया। 

सुनके तक़रीर " तनहा " कहे और क्या 
कातिलाना बड़ी है अदा कह दिया।

Tuesday, 22 November 2016

हमने दुनिया के सवालात का हल ढूंढ लिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                        हमने दुनिया के सवालात का हल ढूंढ लिया
                        क्या बुरा है जो ये अफवाह उड़ा दी जाये।
     शायर ने पहले ही सुझाव दिया था , किसी ने समझा ही नहीं। अब आया समझ इक नेता जी को और उन्होंने घोषणा कर दी है गरीबी को खत्म करने का तरीका उनको पता चल गया है। बस उन्होंने ये राज़ राज़ ही रखा है कि पता चला कब और कैसे , अभी चला या पहले से जानते थे। अगर पहले से जानते थे तो इतने दिन तक उसको आज़माया क्यों नहीं। लोग उनके पहले दिए भाषणों को फिर से सुन रहे हैं और सोच रहे हैं कि तब तो कुछ और ही बातें कहते रहे , फिर अचानक ये क्या हुआ जो सरकार इतना बदल गये। वास्तव में कुछ दिन पहले उनको इक पुरानी डायरी मिली थी अपने सचिवालय के तयखाने से जो कभी इक अर्थशास्त्री ने लिख कर भेंट की थी तब के शासक को , गरीबी का अंत करने का एक मात्र उपाय यही है समझाने को। लेकिन उस शासक ने देश के सभी राजनेताओं की भलाई समझते हुए डायरी को अति गोपनीय घोषित कर दिया था , साथ ही उस अर्थशास्त्री को आदेश सुना दिया था कि राष्ट्रहित में इस बारे कभी किसी को नहीं बताना है। मगर उस अर्थशास्त्री को सम्मान और पुरुस्कार भी दिया था , यही उचित था उनकी काबलियत को मानना ज़रूरी था और उनको खामोश रखना भी। चलो आपको उस डायरी के प्रमुख अंश पढ़ कर सुनाते हैं।
                                  प्रधानमंत्री जी , आपने संकल्प लिया है गरीबी हटाने का और सभी से सहयोग एवं सुझाव भी मांगे हैं। मैं आपको बताता हूं देश से गरीबी का सदा सदा के लिये खात्मा करने का एक मात्र उपाय क्या है , इसको छोड़ दूसरा कोई रास्ता है ही नहीं। संक्षेप में गरीब को गरीब ही बनाये रखना और उसको खैरात बांटना वोट हासिल करने को , इस खेल को बंद करना होगा और जो जनता के धन से राजा महाराजा की तरह ठाठ से रहते हैं उनको बदलना होगा। अकेले देश के राष्ट्रपति के निवास को इतना बड़ा महल होना लोकतंत्र का उपहास ही तो है। उस भवन के रख रखाव पर हर महीने करोड़ों रुपये खर्च किया जाना इक अपराध है जब देश की असली मालिक जनता को बुनियादी सुविधाएं भी हासिल नहीं हों। गरीबों की चिंता सब से पहले वहीं से शुरू की जाये फिर आप खुद भी ये विलासिता पूर्ण जीवन त्याग साधारण नागरिक की तरह रहें। आपके मंत्री और मंत्रालय के बड़े बड़े अधिकारी भी अपने फज़ूल खर्चों को बंद करें। सांसद विधायक सभी राज्यों के राज्यपाल मंत्री से लेकर जनता के सेवक प्रशासनिक अधिकारी समझें कि जब तक देश की जनता को उसको सभी अधिकार शिक्षा आवास स्वास्थ्य सेवा और रोज़गार उपलब्ध नहीं करवाते अपनी योजनाओं द्वारा तब तक खुद भी आम नागरिक की तरह ही रहें। लाखों रुपये वेतन भत्ते किसलिए जब आपको जो करना चाहिए वही कर ही नहीं पाये अभी तलक। अगर नाकाबिल नेताओं और प्रशासन के अधिकारियों को उनकी नाकामी का ईनाम आलीशान घर और सभी सुख सुविधाओं के रूप में मिलता रहा तो जनता कभी खुशहाल हो ही नहीं सकेगी। आपको नियम बनाना होगा कि ऐसी योजनायें बनानी हैं जिन से जनता को उतना पहले मिले जितना आप नेता और अफ्सर चाहते हैं पाना देश की जनता की कमाई से। जब ये मालूम होगा कि जनता की भलाई से ही खुद हमारा भला जुड़ा है तभी पूरी सरकार जनता को समर्पित होगी। ये कर के देखो कैसे सब अपने आप होता है। आखिर सेवक कब तक छपन भोग खाते रहेंगे और जनता भूखी सोती रहेगी। मगर तब के नेता जी को लगा था ऐसा किया तो हम कहने को ही शासक होंगे वास्तविक शासन तो जनता का होगा। उनके सभी सलाहकारों ने भी यही विचार प्रकट किये थे कि ये राज़ सदा को राज़ ही रहने दिया जाये। मगर हर बार चुनाव में ऐसा वादा किया जाता रहे कि हमारा मकसद आपकी गरीबी दूर करना है। पहले हम खुद अपनी उसके बाद अपने नाते रिश्ते वालों की फिर आस पास के लोगों की तो गरीबी मिटा लें तब बाद में जनता की भी बारी आएगी कभी। और डायरी पर लिख दिया था जब हमारे पास इतना धन जमा हो जाये कि उसको रख पाना ही असंभव हो जाये तब जनता की गरीबी मिटाने की शुरुआत की जाये। अब वो दिन आ गये हैं सभी बड़े बड़े लोग अपना धन कहीं गहरे में दबा देने को सोचने लगे हैं। इतना धन सभी के लिये सरदर्द बन गया है और अपनी नींद चैन सब का अंत हो गया है , तब ऐसे पैसे से क्या लाभ। प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की है देश की खातिर सब कुछ त्याग करने की , वास्तविक त्याग। वो त्याग नहीं जिस में सन्यासी महलों में राजसी शान से रहे।
               थोड़े दिन मांगे हैं प्रधानमंत्री जी ने , फिर सब बदल जायेगा , गरीब लोग सुख चैन से रहेंगे और सारी बेचैनी हर परेशानी नेता मंत्री और सरकारी तंत्र झेलेगा। अफवाह है अगले बजट से यही होने वाला है। आने वाले हैं अबके आम लोगों के अच्छे दिन। आखिर में दुष्यंत कुमार का शेर :-----
                                            खुदा  नहीं न सही आदमी का ख्वाब सही ,
                                           कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।

Monday, 21 November 2016

कैसे होते हैं अच्छे दिन सरकार जी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                          तीस महीने से इंतज़ार था जिनका क्या वही अच्छे दिन हैं आजकल , जनता सोच रही है कतार में खड़ी। नेता लोग टीवी पर बहस में उलझे हैं ताकि जनता को अपनी अपनी परिभाषा समझा सकें कि अच्छे दिन होने का मतलब क्या है। ऐसे में लोग हर बात को बेबस हैं और समझ रहे हैं जीवन का सार क्या है , कुछ भी हो सकता है अनुपम खेर जी बताया करते हैं। मौत की बात करना बुज़दिली है , मौत आनी है आयेगी इक दिन , कब कहां कैसे क्या फर्क पड़ता है। जनता का जीना मरना यूं भी इक आंकड़े से अधिक कुछ नहीं होता। रोज़ बिना वजह मरना ही जनता की नियति है। ये टीवी वाले भी जले पर नमक छिड़कते हैं , जब सरकार जनता को दो हज़ार रुपये का महत्व समझा रही है तब खबर वाले बताते हैं एक एक सांसद एक एक विधायक एक एक मंत्री पर कितना खर्च हर दिन हर महीने हर साल होता है। आह भर सकते हैं आप , काश ऐसी देश सेवा का अवसर आपको भी मिल जाये। अच्छे दिन की सही परिभाषा अब समझ आई है , हम ने पहले ही बता दिया था , जिनको सत्ता मिली उनके अच्छे दिन हैं। थोड़ा कमी रह गई जो ये नहीं समझे कि सत्ता नहीं भी रही जिनकी उनके भी दिन बुरे नहीं हैं। ये बारी बारी का खेल है , पहले उनकी टीम बॉलिंग कर रही थी इनकी फीलडिंग , अब उल्टा है। खेल खेल भावना से खेलते हैं दोनों , जनता दर्शक बन भले किसी की जीत किसी की हार से खुश हो या दुखी हो। खेल में भी सब से अधिक महत्व पैसे का होता है , और पैसा दोनों टीमों को मिलता है चाहे जीतें या हारें। नेताओं का ठाठ बाठ बराबर है इधर भी उधर भी। जनता ज़िंदा रहे या मरे राजनेता सलामत रहने चाहिएं। मुझे तो लगता है मौत भगवान की मर्ज़ी नहीं सरकार की अनुकंपा से मिला वरदान भी हो तो बुरा क्या है। मेरा इक शेर अर्ज़ है :---
                                        " मौत तो दर असल एक सौगात है ,
                                         पर सभी ने उसे हादिसा कह दिया। "
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                   अच्छे दिन की बात स्वर्ग की बात होती है , स्वर्ग मौत के बाद ही मिलता है। स्वर्ग की कामना भी करते हो और मरना भी नहीं चाहते ये भला कैसे मुमकिन है। ज़िंदा रहते स्वर्ग का सुख केवल राजनेताओं को मिलता है , जनता के लिये ये धरती नर्क है तो नेताओं के लिये स्वर्ग। जो उपदेश देते हैं धर्म का वो साधु संत महात्मा और गुरु भी खुद मोह माया काम क्रोध लोभ अहंकार का त्याग नहीं करते , आपने देखा नहीं क्या। वास्तव में जिनको नर्क का भय नहीं है वही जो मर्ज़ी करते और स्वर्ग का सुख पाते हैं। पाप पुण्य में उलझे लोग स्वर्ग की राह देखते रहते हैं तब भी मानते हैं कि उनके बाद कोई उनकी खातिर दान आदि पूजा पाठ या अन्य कर्म करेगा तभी स्वर्ग मिलेगा। खुद पर भरोसा नहीं हो तो कुछ भी नहीं मिलता है , न स्वर्ग न ही अच्छे दिन।
                                  ये बातें लोग आजकल भूल गये हैं , पहले याद रखते थे। मुझे दादा जी बताया करते थे अपने बाग होते थे आमों के और क्या बात होती थी उन दिनों। पिता जी को इक पैसा जेब खर्च मिलता था और वो झोला भर मिठाई खरीद लिया करते थे। पांच रुपये वेतन वाला क्या शान से रहता था , क्या ज़माना था , ये कहानियां सुना करते थे हम हैरान होकर। आज सब सामने है ज़रा दूसरे ढंग से , पिछले महीने जो लाख रुपये की कद्र नहीं करते थे आज हज़ार की कीमत समझने लगे हैं। यार क्या दिन थे और कैसे दिन आ गये हैं।
                             चलो कुछ अच्छी बातें करते हैं , सोचो अच्छे दिन कैसे होंगे अगर कभी आये तो। मेरा इक सपना है अच्छे दिनों का , वो बताता हूं आपको। जब कोई बड़ा कोई छोटा नहीं होगा , कोई शासक कोई जनता नहीं होगा , कोई धनवान कोई गरीब नहीं होगा , न कोई भूखा होगा न किसी के पास ज़रूरत से अधिक खाने को , कोई ताकतवर नहीं होगा न ही कोई कमज़ोर , सभी को सब बराबर हासिल होगा , कोई आम नहीं होगा न ही कोई ख़ास , कोई किसी से अधिकार की न्याय की भीख नहीं मांगेगा जिस दिन वही होंगे अच्छे दिन। चलो इक पुराना गीत गुनगुनाते हैं :--------------
               वो सुबह कभी तो आएगी , वो सुबह कभी तो आएगी ,
               जब अंबर झूम के नाचेगा जब धरती नग्में गाएगी ,
               वो सुबह कभी तो आएगी।
               माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की कीमत कुछ भी नहीं ,
               मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की कीमत कुछ भी नहीं ,
               इंसानों की इज़्जत जब खोटे सिक्कों में न तोली जाएगी
              वो सुबह कभी तो आएगी , वो सुबह कभी तो आएगी।

काले धन तेरा भी कल्याण हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                                       काले सफेद का भेद सभी की समझ नहीं आता , नोट कोई भी काली स्याही से नहीं बना होता , छपते भी सारे नोट एक ही जगह हैं। फिर ये भेद-भाव कैसा , काहे लक्ष्मी जी को बदनाम करते हो। भगवान ने दुनिया सभी के लिये एक समान बनाई थी , इंसानों ने उसको काले गोरे में तकसीम कर दिया। गोरों ने भारत देश पर दो सौ साल राज किया और हमने उनको निकाल बाहर किया देश को आज़ाद करवा कर। इस के बावजूद भी हम गोरे रंग के मोहजाल से निकले नहीं। काले से चिड़ आखिर किसलिये , काला होना अर्थात बुरा होना। दो नंबर की कमाई को काला धन बता इक शब्द ही नहीं इक रंग को भी नाहक बदनाम किया गया है। ठीक उसी तरह जैसे सोशल मीडिया ने सोनम गुप्ता बेवफा है हर नोट पर लिख दिया , बिना परखे कि नोट कैसा है काले धन वाला या सफेद। अपनी अपनी भड़ास लोग इसी तरह निकालते हैं। जो चाह कर भी धन एकत्र नहीं कर सके वही दूसरों के पास पैसा देख जलते हैं और बदनाम करते हैं काला है बता कर। 
            हमारा नाम हो शोहरत हो इस से सब से अधिक जलन उन्हीं को होती है जो हमारे मित्र कहलाते हैं मगर हम से आगे बढ़ना चाहते हैं पर हर बार और भी पीछे रह जाते हैं। अधिकतर ये हमारे करीब वाले होते हैं , पर कभी उनको भी तकलीफ होती है जिन से हमारा वास्ता ही नहीं होता। एक ही बिरादरी के लोगों में इक होड़ रहती ही है , और शायद ही कोई किसी दूसरे की सफलता से खुश होता हो। ये इक आम स्वभाव है दुनिया में इंसानों का , पशु पक्षी पेड़ पौधे इन बातों से बचे हुए हैं , तभी वो कभी रोते नहीं।  खुश होते हैं चुप भी रहते हैं और कभी शोर भी करते हैं पर उनको रोना नहीं आता। कई बार जानवर भी दूसरे जानवर को घायल देख संवेदना ज़ाहिर किया करते हैं जो दिखावे की नहीं होती इंसानों की तरह। आदमी अजीब है , जब पैदल होता है साइकिल वाले से जलन होती है , जब बस में होता है कार वाले से , कार मिल जाती है तो उनसे जलन होती है जो विमान में यात्रा करते हैं। वो सब से तेज़ भागना चाहता है और सब से जल्दी पहुंचना चाहता है मंज़िल पर , और अक्सर इसी दौड़ में ये भी भूल जाता है कि मंज़िल कहां है और जाना किधर है। ऐसा उनके साथ भी होता है जिनका काम ही औरों को राह दिखाना है , प्रवचन देने वालों को सब पता होता है फिर भी पता नहीं चलता क्या सही है और झूठ किसे कहते हैं। कुछ लोगों को लड़ने का शौक होता है , उनको जीतना पसंद है मगर जीतने के लिये लड़ना ज़रूरी है। अब लड़ना है तो कोई दुश्मन भी होना ही चाहिये , इसलिये दुश्मन भी खोज ही लेते हैं। अदालतों में हार जीत से अधिक महत्व विरोधी को मज़ा चखाना है का बन जाता है , खुद अपनी जीत से हासिल कुछ हो न हो विपक्षी की हार से इक अलग ही चैन मिलता है सुख मिलता है ख़ुशी मिलती है। किसी अमीर का महल जल गया हो जानकर छोटे मकान वालों को सकून मिलता है। लूट की दौलत से बनाया था , अब किया ऊपर वाले ने हिसाब बराबर।
                                            देश में आजकल यही हालत है , अधिकतर लोग कल तलक परेशान थे अपनी गरीबी को लेकर , जाने कब आयेंगे अच्छे दिन। जब उनके बुरे दिन आये जो बड़े बड़े अमीर थे तब खुश हैं कि किसी ने उनकी भी हालत खराब कर दी है। सरकार को भी समझ आ गया था कि सब के अच्छे दिन लाना उसके बस की बात नहीं है मगर जिन के अच्छे हैं उनके खराब दिन लाना बहुत आसान है। और ऐसा करने से वो भी थोड़ा तो खुश होंगे ही जिनके हमेशा ही बुरे दिन रहे हैं। चलो धरती पर हैं तो आकाश से नीचे गिरने का कष्ट तो नहीं झेलना पड़ा , अगर अमीर होते तो आज अपनी भी हालत पतली होती।बाग में सभी तरह के पेड़ होते हैं , सेब का पेड़ अमरूद के पेड़ से परे परे नहीं रहता खुद को खास समझ क्योंकि उसको लोग महंगे दाम देकर खरीदते हैं। न ही कोई पेड़ दूसरे पर अपने से ज़्यादा फल लगे देख उसको बुरी नज़र से देखता है। ये आदमी है जो धंधे में पड़ोसी दुकानदार की दुकान पर अधिक ग्राहक देख जल भुन जाता है। बुरी नज़र वालों से बचने को काले रंग का नजरबट्टू ही काम आता है। गाय और भैंस में काला सफेद होने की कभी तकरार नहीं होती , दोनों एक ही खूंटे से बंधी रहती ख़ुशी से। भैंस का दूध भी हीनभावना का शिकार नहीं होता , बिकते हुए। इंसान बिना कारण खुद उलझनों का शिकार हुआ रहता है , अपने चरित्र अपनी शख्सियत अपने सवभाव से अधिक महत्व रंग रूप वेशभूषा को देकर। कागज़ के नोट भी किसी को अपना पराया नहीं मानते , जिस की जेब में होते उसी के हो जाते हैं। उनको इस बात से भी कोई मतलब नहीं कि सरकार उनको किस श्रेणी में रखती है काले धन की या सफेद की। उनको मालूम है सरकार के खज़ाने में जाते ही दोनों एक समान हो जाते हैं , जब खुद सरकार को अपनी तिजोरी में काला धन रखते कोई लाज नहीं आती तो बाकी लोगों को काहे बदनाम करती है।
                               हमने तो भैया एक सबक सीखा है , सभी के लिये अच्छी दुआ करना , इक जेबतराश ने ये सर्वोतम ज्ञान दिया हमको आज। मधुर स्वर में इक गीत गाकर : ----
                                   " उपर वाले इस दुनिया में कभी जेब किसी की न खाली रहे ,
                                     कोई भी गरीब न हो जग में हर पॉकेट में हरियाली रहे। "
      चलो फिर आज हम भी साथ मिलकर उन सभी के वास्ते दुआ मांगते हैं जिनको नोट बंदी से क्षति हुई है। भगवान उनको समझ दे ताकि वो जल्द अपने काले धन को फिर से सफेद कर के पहले जैसे खुशहाल हो सकें। और उनको अब किसी की बुरी नज़र नहीं लग पाये। क्योंकि और की भलाई से अपनी भलाई होती है। इक दोहा यही समझाता है :------
                                   " चार वेद षट-शास्त्र में बात मिली बस दोय ,
                                    दुःख देवत दुःख होत है सुख देवत सुख होय। "

Sunday, 20 November 2016

हमाम में सभी नंगे हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          देश की राजनीति निर्वस्त्र हो गई है , कोई परदा बचा नहीं है , सभी कपड़े पहने हुए हैं फिर भी नंगे नज़र आ रहे हैं। एक एक कर सब की असलियत सामने आ गई है , जिनकी अभी छुपी हुई है वो भी घबरा रहे हैं , जाने कब उनकी भी बारी आ जाये। सफेद रंग की समस्या यही है उसको पहन भीतर से सब बाहर झांकता लगता है। सफेद रंग अब सादगी का नहीं आडंबर का प्रतीक बन गया है। बाहर से हर कोई सफेद अंदर से सभी काले हैं , सफेदपोश लोग ही काले धंधे करते हैं। बचपन में इक अध्यापक जिनका नाम शास्त्री जी था , चकाचक सफेद धोती कुर्ता पहनते थे , उनको बच्चों ने सफेद नाग नाम दे रखा था। क्योंकि उनका स्वभाव था हर किसी को डस लेते थे मौका मिलते ही। उनकी फुंकार दूर से सुनाई दिया करती थी , उन जैसे कितने नाग आजकल सरकारी दफ्तरों में विराजमान हैं। मान्यता है कि जहां भी कोई खज़ाना दबा होता है वहां ही नाग भी मिलते ही हैं , नाग को कितनी बार दूध पिलाओ वो अपना नहीं बनता , डसने की आदत रहती ही है। हमारे पड़ोसी देश की भी यही आदत रही है। जिनको सांप को वश में करना आता है वही सत्ता पर काबिज़ होकर नागों को अपने इशारों पर नचाने का खेल खेलते हैं। राजनीति और प्रशासन सांप नेवले का सहमति का प्रयोजित धंधा है। उनके खेल तमाशे पर तालियां बजती हैं पैसा बरसता है।
                   सांप और नेवला इक दूजे की जान के दुश्मन हैं , मगर मदारी उन दोनों को वश में कर अपना तमाशा दिखाता है। संसद और विधानसभाओं में बहुमत को इसी तरह काबू किया जाता है , यही नये दौर की गठबंधन की राजनीति कहलाती है। इस को पशुप्रेमी मेनका गांधी भी नहीं रोक सकती। इक प्रधानमंत्री ने इक दल को इसी तरह वश में किया था बहुमत साबित करने को , आत्मा की आवाज़ पर भी इसी कारण मत दिया गया था कभी। लोग नंगे होने के बाद भी शर्मसार नहीं हुआ करते , नाचते रहते हैं नचाने वालों के इशारों पर। बस एक बार बेशर्मी करने से समस्या हल हो जाती है , नंगई वरदान बन जाती है। वस्त्रों की उपयोगिकता खत्म हो जाती है। नंगा होना इक समाजवाद है , सभी एक जैसे लगते हैं , कोई खूबसूरत लगता है न बदसूरत। सब बराबर हो जाते हैं , अमीर गरीब का भेद दिखाई नहीं देता।
                        फिल्म वाले टीवी वाले विज्ञापन का कारोबार वाले , नग्नता का व्योपार करते हैं , बेचते हैं अपना और अपने समाज का नंगापन पैसे की चाहत का। बदन को इस तरह ढकना कि नग्नता और छलकती दिखाई दे , उसको सौंदर्य प्रतियोगिता कहा जाता है। सुंदरता तन ढकने की कला में ही है , पूर्ण नग्नता आकर्षित नहीं करती कभी। किसी पेन के विज्ञापन में बच्चा कहता है , सब कुछ दिखता है , तब सब समझते हैं कि हम सारे ही नंगे हैं। नंगा होने में हास्य रस ढूंढ सकते हैं। विद्रूप हास्य।

Saturday, 19 November 2016

बातें राजा और बेताल की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        बेताल खुद वापस लौट आया और प्रधानमंत्री जी के कंधे पर लटक गया और बोला , " राजन अब आपको मौन रहने की ज़रूरत ही नहीं अब आप बेफिक्र हो जो भी कहना हो कह सकते हैं। अब मैं आपको छोड़ कहीं जा ही नहीं सकता क्योंकि जिस पेड़ पर मेरा ठिकाना था आपने उसे ही जड़ से काट कर उसका नामोनिशान तक मिटा दिया है। आपको हर दिन मैंने इक नई कहानी सुनाई है अभी तक , मगर आपने कभी खुद अपनी कहानी मुझे नहीं सुनाई। विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के आप निर्वाचित शासक हैं , आपकी ताकत का अंदाज़ा मुझे भी है। आपका पांच साल का कार्यकाल कब खत्म हो जायेगा आपको पता ही नहीं चलेगा , आपने देश की जनता को सुनहरे भविष्य का सपना दिखाया था और उसी से चुनाव जीता था। अभी तक जनता के जीवन में कोई ऐसा बदलाव हुआ दिखाई नहीं देता फिर भी आपको यकीन है अगला चुनाव भी आपका दल जीतेगा आपके ही भरोसे। आपके दल को भी आपके नेतृत्व और करिश्मे का ऐतबार है और सभी सोचते हैं आज आपसे लोकप्रिय कोई दूसरा नेता नहीं है न दल के भीतर न किसी और दल के पास। आप भी खुद को पहाड़ समझते हैं और बाकी सभी आपको बौने लगते हैं।
                                                      राजन आपने घोषणा कर दी है उस काले राक्षस का आपने अंत कर दिया है , जबकि आप भी जानते हैं उस दैत्य का ठिकाना जहां रहा है वहां तक जाने का साहस आप भी नहीं कर पा रहे हो। आप भी वही करने लगे हो जो पहले बहुत शासक करते आये हैं , शोले फिल्म के गब्बर सिंह की तरह सभी को समझाते हो कि मुझ से बचना है तो दूसरा कोई रास्ता नहीं है मेरी शरण में चले आओ। आपने किसी परिवार का अंत कर उसके मुखिया को अपाहिज बना डाला है , ताकि कोई आपसे लड़ने का साहस नहीं कर सके भविष्य में। आपके दल में सिर्फ आप ही आप हो और कोई कद्दावर नेता बचा नहीं है। आपके पास हर दिन इक नई योजना भी रहती है जनता को बताने को कि आप बहुत कुछ करना चाहते हैं। मगर आपको नहीं मालूम कि सवासौ करोड़ जनता को सुनहरे दिन किस तरह दिखाई दे सकते हैं , आप चाहते हो कि अगले चुनाव में जनता आपका पुराना वादा भूल जाये और इक नया नारा सुन कर फिर से आपकी बातों में आ जाये।शायद पिछले चुनाव में सुनहरे दिनों का सपना दिखलाते समय आपको लगा ही नहीं था कि जनता उस पर भरोसा कर आपको इतना बहुमत दे सकती है। आपने सोचा तक नहीं था वो सपना हकीकत बनाना किस तरह है। "
                          प्रधानमंत्री जी बोले , " बेताल तुम्हें लोकतंत्र की राजनीति का ज़रा भी ज्ञान नहीं है। जनता ने मुझे नहीं चुना था , जो पहले सत्ता में था उसको हराना था और विकल्प में मेरे सिवा कोई दूसरा दिखाई दिया ही नहीं उसको। पिछली सरकार की बदनामी मेरे बड़े काम आई , काला रंग सामने होता तभी सफेद रंग की चमक नज़र आती है। मुझे अपनी चमक बरकरार रखनी है पांच साल तक और अपने से ज़्यादा किसी को चमकने नहीं देना है , बस और कुछ भी नहीं करना है। रही जनता की बदहाली तो सरकार कोई भी हो उसकी चिंता अपना खज़ाना बढ़ाने की रहती है। कर तो जनता से ही वसूल करना होता है , और हर शासक अधिक धन चाहता है सत्ता की खातिर। यही अर्थशास्त्र है राजनीति का। चलो आज तुम्हें इक नीति कथा सुनाता हूं। जाग कर सुनना , कहीं नींद में आधी सुन बाद में भूल मत जाना , आम लोगों की तरह।
                       धरती का रस। यही नाम है उस कथा का। इक राजा शिकार को गया और रास्ता भटक अपने सैनिकों से अलग हो गया , दोपहर होने को थी और उसको गर्मी में प्यास लगी थी। चलते चलते उसको इक खेत में इक झोपड़ी नज़र आई तो वहां चला गया। इक बुढ़िया बैठी थी वहां , मगर सादा भेस में उसको राजा की पहचान मालूम नहीं हुई थी। राजा बोला मईया मुझे प्यास लगी है पानी पिला दो , बुढ़िया ने सोचा मुसाफिर है जाने कितनी दूर से आया है और आगे भी जाना होगा , इसलिये उसको पानी की जगह गन्ने का रस पिलाती हूं , और वो खेत से इक गन्ना काट लाई और उसका रस निकाल गिलास में भर राजा को दिया पीने को। रस पीकर राजा को बहुत अच्छा लगा और वो थोड़ी देर को वहीं छाया में चारपाई पर आराम करने लगा। राजा ने बुढ़िया से पूछा उसके पास कितनी भूमि है कितने बच्चे हैं और कितनी आमदनी होती है। बुढ़िया ने बताया उसके चार पुत्र हैं और चार जगह ऐसा ही इक खेत है सबका अपना अपना। चार रुपया आमदनी है , एक रुपया खर्च आता है और तीन रूपये बचत होती है , दो रूपये से घर चलता है , फिर भी एक बच ही जाता है जो बचत करते हैं। बात करते करते राजा सोचने लगा कि अगर मैं ऐसे हर खेत से एक रुपया अधिक कर लेने लग जाऊं तो मेरा खज़ाना कितना बढ़ सकता है। और उसको नींद आ गई थोड़ी देर को , जागा तो देखा दूर से उसके सैनिक आ रहे हैं। राजा ने बुढ़िया से कहा , मईया क्या मुझे एक गिलास और गन्ने का रस पिला सकती हो , बुढ़िया बोली ज़रूर , और फिर से खेत से इक गन्ना काट कर ले आई। मगर जब रस निकाला तो वो बहुत थोड़ा था इसलिए बुढ़िया इक और गन्ना लाई , मगर तब भी गिलास नहीं भरा , इस तरह चार गन्ने से एक गिलास रस मुश्किल से निकला। राजा भी ये देख हैरान हुआ और उसने बुढ़िया से सवाल किया , मईया पहले तो एक ही गन्ने से गिलास भर रस निकल आया था अब क्या बात हुई जो कम निकला रस। बुढ़िया बोली ये मुझे भी समझ नहीं आया कि इतनी देर में ऐसा क्या हुआ , मगर इतना सुनते आये हैं कि जब राज्य या देश का शासक लालच में आ जाता है और लोकहित को भुला देता है तब धरती का रस सूख जाता है। और प्रकृति में सब गलत होने लगता है। राजा समझ गया था ऐसा क्यों हुआ था। "
                            बेताल प्रधानमंत्री जी की कथा सुन कर हंस दिया , तो प्रधानमंत्री जी ने हंसने का कारण पूछा। बेताल बोला राजन कोई भी व्यक्ति देश से बड़ा नहीं होता , सभी को कभी न कभी सत्ता को छोड़ना ही पड़ता है। सवासौ करोड़ की जनता किसी भी नेता या दल के रहमोकरम पर कभी नहीं रही है। चाहे कोई खुद को कितना शक्तिशाली समझता रहा हो सभी को जनता ने जब चाहा बदल दिया है। जाने क्यों तब भी किसी को ये बात कभी समझ नहीं आई है। मैंने सभी को आगाह किया है , आपको भी बताना चाहता हूं , जनता को मूर्ख समझने की भूल मत करना। राजन मैं तुम्हें फिर से छोड़ कर जा रहा हूं , मुझे किसी राजा किसी शासक के कंधे की सवारी की ज़रूरत नहीं है , न ही कोई पेड़ मेरा ठिकाना है। आज तुम्हें समझाया है कभी पहले वाले को समझाया था , कल जो शासक बनेगा उसको भी समझाऊंगा ही। मैं अपना फ़र्ज़ निभाता आया हूं , कोई समझे न समझे , अब वक़्त जाने या इस देश की अभागी जनता , जो बार बार ठगी जाती है।
  (  पत्र पत्रिका के संपादक चाहें तो मेरी इस व्यंग्य रचना को प्रकाशित कर सकते हैं , सादर )

ईमानदारी का पाठ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने वाले को उस पर अमल करना कभी ज़रूरी नहीं होता। सरकारी स्कूलों में अक्सर ऐसा भी होता है कि जिस विषय का अध्यापक को बिल्कुल ज्ञान नहीं हो उसको वो भी छात्रों को पढ़ाना पड़ता है। किसी अध्यापक के छुट्टी पर होने पर मुख्य अध्यापक की मज़बूरी होती है जो खाली उपलब्ध हो उसी को आदेश देना छात्रों को पढ़ाने का। साधु संत महात्मा प्रवचक भी लोभ लालच का त्याग करने का उपदेश देने के बाद खुद अधिक चढ़ावे और आलीशान आश्रम व सभी आधुनिक सुख सुविधाओं की चाह रखते ही हैं। सरकार किसी की भी हो जनता से हर नियम कायदा कानून ईमानदारी से मानने की उम्मीद रखते हैं और भाषण देते हैं मंत्री बनकर कि उनके आदेशों का पालन किया जाना चाहिए। ऐसे में खुद कितने ईमानदार हैं कहां सोचते हैं। क्या उन्होंने चुनाव आयोग की बताई सीमा में खर्च किया था चुनाव लड़ते समय। क्या जीतने को तमाम अनैतिक हथकंडे नहीं अपनाये थे , दो नंबर का धन नहीं लिया था चंदे में , क्या जाति धर्म के नाम पर जनता को गुमराह नहीं किया था। क्या तब जनता से सब कुछ सच सच बोला था , जो कभी नहीं निभाने वो वादे नहीं किये थे। क्या जैसा वो कहते हैं कि हम तो जनता के सेवक हैं और हमें खुद अपने लिये कुछ नहीं चाहिए उसी तरह बनना चाहते हैं। क्या जनप्रतिनिधि बनते ही उनको मलाईदार पद पाने की इच्छा नहीं थी , मंत्री बनते ही क्या हर निर्णय ईमानदारी से करने लगे हैं। अपने ख़ास लोगों को कोई फायदा नहीं देते हैं , प्रशासन के कामों में अनावश्यक दखल नहीं रखते। किसी की सिफारिश न तो करते हैं न कभी मानते हैं। क्या ये सारी बातें उनकी ईमानदारी की परिभाषा में आती हैं।
                          क्या उनकी सरकार का हर विभाग अपना काम नियमानुसार करता है , उचित कार्य के लिए जनता को कोई कठिनाई नहीं होती है। क्या ईमानदारी सरकार और प्रशासन से ही शुरू नहीं होनी चाहिए ताकि जनता को किसी नेता की सिफारिश की ज़रूरत ही नहीं हो। क्या पुलिस और न्याय प्रणाली सभी के साथ एक जैसा बर्ताव करते हैं , क्या नेता उनका दुरूपयोग नहीं कर पा रहे। क्या ये सभी मंत्री नेता और उच्च अधिकारियों को खुश करने में नहीं लगे हुए , क्या उनकी तरक्की या तबादला निष्पक्षता से किया जाता है। क्या सरकार की प्राथमिकता अधिक कर वसूलना नहीं है , क्या नेता और अफ्सर देश पर इक बोझ नहीं हैं सफेद हाथी की तरह। क्या आपकी विकास की परिभाषा पूरी तरह गलत नहीं है , विकास किसका , लोगों का या इमारतों और सड़कों का , जनता की भलाई वाला विकास आपको कभी समझ आया है क्या। आपको केवल वही विकास पसंद है जिस से आपको खुद खाने को मिलता रहे। लोकतंत्र , लोकतंत्र , लोकतंत्र। कैसा लोकतंत्र , देश की जनता को शिक्षा देना आपकी प्राथमिकता नहीं उस निजि स्कूलों के भरोसे छोड़ दिया , ऐसे स्कूलों के हवाले जिनकी फीस केवल अमीर ही चुका सकते हैं। यही हालत स्वास्थ्य सेवाओं की है , प्राइवेट नर्सिंग होम जितनी मर्ज़ी कीमत वसूल करें बीमार लोगों से ईलाज की , उन पर कोई रोक नहीं कोई सीमा नहीं। क्या हॉस्पिटल में रोगी के उपचार को कमरे होते हैं या होटल की तरह महंगे अमीरों की सुविधाओं के लिए बनाये जाते हैं। शिक्षा स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी ज़रूरतों में इतना भेदभाव होना क्या गरीबों के साथ अन्याय नहीं है। मगर इस से अधिक गलत बात ये है कि आज तक सरकार ने कोई नियम ही नहीं बना रखा इन के लिये कि क्या क्या सुविधा क्या क्या मापदंड होने चाहियें अस्पताल या नर्सिंग होम के। कोई हद किसी उपचार पर कितना पैसा लिया जाना सही है , जानते हुए भी कि इस मानवीय सेवा के कार्य में हर चीज़ में कमीशन का गंदा खेल जारी है आप आंखें बंद किये हैं क्योंकि आपको जब ज़रूरत हो हर सुविधा मिल ही जाती है। क्या इस को जनता की सेवा कहते हैं और जनता की बेबसी को नहीं समझ इक फरेब करते हैं जनता को देश की मालिक बताकर।
                   देश को आज़ाद हुए सत्तर साल होने को हैं और देश की आधी आबादी बदहाली में जीती है , तब भी आपकी सुख सुविधाओं पर ही नहीं , आपके झूठे प्रचार पर भी व्यर्थ धन बर्बाद किया जाता है। कितने आडंबर प्रतिदिन करते हैं आप लोग शाही शान के साथ , गरीबों का उपहास करने जैसा। रोज़ आपकी बेकार की सभायें सिर्फ धन की बर्बादी ही नहीं होती उन में , सरकारी तंत्र भी हमेशा उसी में व्यस्त रहता है। आपने देश और जनता को न्याय देने की शपथ ली थी क्या याद आया कभी। अपनी शपथ को और देश के प्रति अपने कर्तव्य को कितनी ईमानदारी से निभाया है आज तक सभी नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों ने। क्या ईमानदारी का पाठ पढ़ाने की सब से ज़्यादा ज़रूरत आप ही को नहीं है। खुद को आईने में देखना ज़रूरी है जब औरों को नसीहत दो तो सोचो आपको हक है भी ऐसी शिक्षा देने का जिसको आपने कभी जाना नहीं समझा नहीं , अपनाया ही नहीं। सच तो ये है कि अभी तक आप सभी दलों की सरकारों ने जनता को सिर्फ झूठे वादों से बहलाया ही है सत्ता की खातिर। आज तक किसी भी दल के नेता को कितने बड़े घोटाले करने पर भी कोई सज़ा नहीं मिल सकी है। आपकी सभी योजनायें इक धोखा साबित हुई हैं जनता के विश्वास के प्रति। आपके दल में कितने अपराधी हैं जो सांसद या विधायक बने हुए हैं ताकि आपका शासन कायम रहे। हर थोड़े दिन बाद आप इक नया तमाशा जनता के सामने दिखलाते हैं और जो पिछला था उसको छोड़ देते हैं। कुछ भी वास्तव में करना या बदलना जनता की खातिर आपको कभी ज़रूरी लगता ही नहीं। आप कब क्या रंग बदल लें ये गिरगिट भी नहीं समझ पाता , जिस को कहते हैं राजनेताओं का प्रेरणास्रोत है। 
इक मतला और इक शेर मेरी ग़ज़ल का पेश है : -
                                            " लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ,
                                              एक बस हम खरे और सब चोर हैं। "
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                                                " हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे ,
                                             मिल गई कुर्सियां और मुंहज़ोर हैं।  "
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Friday, 18 November 2016

क्या गंगा स्नान से पापी पुण्यात्मा बन जाता है , पंडित जी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      बात समझने की है और समझते वही हैं जो समझदार हैं , समझदार शासक होता है , उसको जो उचित लगता है वो उसी तरह नियम बनाता है , लागू करता है और सभी को मानने पड़ते हैं। ये तो नहीं पता लिखा कहां है और लिखा किस ने है पर कहते हैं राजा अर्थात शासक कभी गलत नहीं होता। पहले कहा जाता था कि शासन की नाफरमानी करना बगावत होती है , मगर जब सरकार का कानून नहीं मानना बगावत बन कर बदलाव लाने में सफल हो जाता है , तब उसको क्रांति कहते हैं। आज़ादी का अंदोलन क्या था , क्या उसको तब की सरकार के क़ानून नहीं मानने की छूट मिली थी , अगर नहीं तो उस समय का विरोध सही था या गलत। आज भी सरकार मानती है जो उस से सहमत नहीं वो देश हित को नहीं समझता , ऐसे में लोग डरते हैं उसकी किसी बात को अनुचित कहने में। मगर सर्वोच्च अदालत ने सरकार की बात नहीं मानी है कि जो लोग नोट बंदी के खिलाफ अदालत जायें उनकी अर्ज़ी नहीं सुनी जाये। क्या ये वही लोग हैं जो अपने फैसले पर जनता की परेशानी को ऐसा कहकर उचित ठहराते हैं कि कभी किसी ने आपात्काल घोषित कर देश को उनीस महीने कैद में बंद कर दिया था। कोई सवाल करे कितनी जनता को बंद किया गया था , और पता चले कुछ लाख राजनीति से जुड़े लोगों को तो क्या समझा जाये वही लोग देश थे। मेरा मकसद आपत्काल को सही ठहराना नहीं है , और ये भी दोबारा दोहराता हूं कि मैं उस सभा में शामिल था दिल्ली के रामलीला मैदान में जिस में जे पी जी ने भाषण दिया था जिस को आधार बना इमरजेंसी लागू की गई थी। मैं तब भी सत्ता और सरकार के खिलाफ लिखता था मगर मुझे तो जेल में नहीं डाला गया आज तक कभी , जबकि हर सरकार का विरोध किया है मैंने , चाहे जब जब जिसकी भी सरकार रही हो। अफसोस होता है जो उस दौर में संविधान में बताये अधिकारों की बात करते थे और जेल जाने के डर से छुप छुप कर भागते रहे वही आज अपनी सरकार द्वारा लागू निर्णय का विरोध करने वालों को देश हित की बातें समझाते हैं। ऐसे में इक अंदेशा होना लाज़मी है हम किस दिशा को जा रहे हैं। लोकतंत्र में सरकार का विरोध अपराध नहीं हो सकता , और जिनको मोदी जी के नोट बंद करने से परेशानी हो उनको अदालत जाने से रोकने की बात सोचना ही बताता है कि सोच अलोकतांत्रिक और संविधान की भावना के विरुद्ध है। शुक्र है सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की बात मानने से इनकार करने के साथ इक चेतावनी भी दी है कि ज़रूरत से ज़्यादा जनता को दबाना खतरनाक हो सकता है , लोग इतने परेशान हैं कि दंगा भड़क सकता है। अब आप सर्वोच्च न्यायलय की बात  को किसी सिरफिरे केजरीवाल का बयान नहीं बता सकते।
                कुछ टीवी चैनेल समझते हैं जो उनकी सोच है वही उचित है , और कहने को वो हर दिन कोई बहस करवाते हैं अलग अलग लोगों को आमंत्रित कर के। मगर इनका लहज़ा किसी तानाशाह जैसा ही होता है , जैसे ही कोई उन के ठूंसे शब्द बोलने से मना करता लगता है वो किसी न्यायधीश की तरह नहीं किसी बंदूक धारी की तरह डराते लगते हैं। इतनी बात समझ लेना ज़रूरी है कि लोकतंत्र में विरोध या असहमति को स्वीकार करना लाज़मी है। विचारों को अभिव्यक्त करने का अधिकार केवल आप का ही नहीं है। जहां तक काले धन की बात है देश की जनता उसका विरोध करती है हमेशा ही , मगर कोई दल ये समझे कि उनको छोड़ बाकी सभी दल काले धन पर चलते रहे हैं तो ये अर्धसत्य ही नहीं पूर्ण झूठ होगा। आज़ादी के बाद से जनता के धन की लूट में , काली कमाई वालों से चन्दा लेने वालों में आप भी शामिल रहे हैं। इक निर्णय से आपके सभी पाप भी धुल नहीं सकते , आपको लगता है ये फैसला गंगा स्नान है , कि डुबकी लगाई और पापी से धर्मात्मा हो गये। माना ये निर्णय उचित है काला धन बंद किया जाना चाहिये मगर ऐसा करने में मनमानी और बिना सोच विचार हर दिन नियम बदलना बताता है सरकार को समस्या समझने में नाकामी हुई है। इक बात और भी मुझे लगता है कि अभी बेशक कुछ लोग खामोश है मगर उनको इस फैसले से परेशानी हुई है वो जैसा आप सोचते हैं , आपके ही समर्थक वर्ग रहे हैं कारोबारी लोग , अगली बार आपके विरोधी हो सकते हैं।  इसलिये देश हित में जनता को थोड़ा समय साथ देने को कहते हुए खुद भी इस बात के लिये तैयार रहें। जनता क्या सोचती है अक्सर कुर्सी पर बैठे नेता नहीं समझ पाते हैं।

Thursday, 17 November 2016

देश की राजनीति और हास्य रस ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    हंसना भी जीवन का एक अंग है , मगर हंसने हंसने में अंतर भी बहुत होता है। कभी अधिकतर चुटकुले सरदार जी को लेकर हुआ करते थे। आजकल पत्नी को लेकर पुरुष ही नहीं महिलायें भी चुटकुले सुनाती हैं। विशेष बात ये है की इधर हास्य रस में इक क्रांति सी आ गई है। अब चुटकुले शब्दों से अधिक कार्टूनों या तस्वीरों में दिखाई देते हैं। टीवी और सिनेमा में हास्य रस की दशा इतनी बिगड़ चुकी है कि फूहड़ता की सीमा लांघ लिया है। मज़ाक करने में और किसी का उपहास करने में ज़मीन आसमान का अंतर होता है। पुरानी फिल्मों में कुछ महान कलाकार हुए हैं जिन्होंने दर्शकों को हंसाने को कमाल के चरित्र दिखाये बनाये और निभाये हैं। आज उनकी कमी खलती है फिल्मों में , मगर कुछ सालों से नायक ही हास्य कलाकार का भी किरदार निभाने लगे हैं , शायद इसी से फिल्मों के नायक अब केवल मनोरंजन ही करते हैं , लोगों को सही राह बताने का आदर्श स्थापित नहीं करते। ये बदलाव अच्छा है या बुरा ये दूसरी बात है , मगर ऐसा हो चुका है और हमने भी स्वीकार कर लिया है। कॉमेडी शो में हास्य-रस को इस कदर घायल किया जाता है कि देखने वाले सोचते हैं हंसा जाये या रोया जाये। मैं इक व्यंग्यकार हूं और हास्य रस मेरा प्रिय रस है साहित्य में। मेरी आधी रचनाएं व्यंग्य ही नहीं हैं बल्कि मेरी ग़ज़ल कविता क्या कहानी तक में व्यंग्य शामिल रहता है। मुझे याद है महान व्यंग्य लेखक स्वर्गीय के पी सक्सेना जी ने मुझे खुद उन्हीं पर मेरे द्वारा लिखी व्यंग्य रचना पर इक पत्र भेजा था तारीफ का। जिस में उनहोंने लिखा था सभ्य व्यंग्य लिखने वालों की बिरादरी बहुत छोटी है और मुझे उस को ऐसे ही बनाये और बचाये रखना है। हरी सिहायी में लिखा वो खत मेरे पास आज भी रखा है इक कीमती पारितोषिक की तरह।
                                   राजनीति में हास्य रस होना अच्छी बात है , मगर राजनेताओं को आपस में या राजनीति पर हंसी मज़ाक करना चाहिये , जनता के साथ मज़ाक नहीं किया जाना चाहिये। मगर इन दिनों ऐसा किया जा रहा है , नेता लोग जनता की समस्या और परेशानी की गंभीर बात को टाल देते हैं , यूं ही कुछ भी बोलकर। जब कोई मुख्यमंत्री कहता है कि मुझे किसी ऑटो चालक ने बताया है कि अब वो मीटर से ही पैसे लेने लगा है क्योंकि पुलिस वाला रिश्वत नहीं मांगता , या किसी चाय वाले ने बताया है कि अब उस ने चाय सस्ती कर दी है क्योंकि घूस नहीं देनी पड़ती , तब आपको क्या लगता उनकी बात सही है यकीन किया जाना चाहिये या ये इक उपहास ही है। इसी तरह जब कोई देश का प्रधानमंत्री कहता है मुझे किसी बज़ुर्ग महिला ने कहा है कि नोट बंद होने से मेरे बेटे ने मेरे खाते में ढाई लाख जमा करा दिये हैं और वो मुझे आशिर्वाद देती है , तब भी क्या इसको सच माना जाये या जनता ही नहीं काला धन की बात के साथ भी इक उपहास कहा जाये। मगर खेद की बात है नेताओं को जनता की समस्याएं शायद मज़ाक ही लगती हैं जिनको वो उपयोग करते हैं वोट हासिल कर सत्ता पाने को। इन लोगों को कभी खुद अपने दिये भाषण की रिकॉर्डिंग सुननी चाहिये , ऐसा करते अगर थोड़ी शर्म भी महसूस हो तो कोई बुराई नहीं है , समझना अभी उनमें संवेदना बाकी है , पूरी तरह मरी नहीं।
                             जिनको पुराने युग के नेताओं की याद है उनको पता होगा देश की संसद में भी नेता सत्ता पक्ष या विपक्ष का मतभेद भुला हंसी मज़ाक आपस में किया करते थे।  भाषण तक में चुटकी लिया करते थे नेता नेता की बात पर। अटल बिहारी वाजपेयी जी भी ऐसा किया करते थे और भाषण देने की उनमें लाजवाब कला थी , मुझे आज भी याद है जब उनको बहुमत साबित करना था तब बहस के जवाब में उन्होंने ये कह कर चुटकी ली थी विपक्षी नेताओं से , " आप कहते हैं वाजपेयी जी अच्छे हैं पर गलत दल में हैं , तो आज आप उस अच्छे आदमी से क्या करने वाले हैं "। अपनी बात का अंत उन्होंने ये बोलकर किया था कि मैं इस्तीफा देने राष्ट्रपति जी के पास जा रहा हूं , शायद ऐसा करने से उनको खुद हार से ही नहीं बचाया था , साथ में उन नेताओं को दुविधा से बाहर निकाल दिया था जो उनको अच्छा भी बता रहे थे और हटाना भी चाहते थे। इक और नेता हेमवती नंदन बहुगुणा जी का भाषण भी याद है , इंदिरा गांधी की बात कि मैं बेटी हूं यहां की पर , कहा था ठीक है बेटी हो मानते हैं शगुन देंगे आदर प्यार भी मिलेगा लेकिन वोट नहीं देंगे। आज कल के नेता सत्ता मिलते ही सभ्यता की सीमा को भूल जाते हैं और हास्य नहीं क्रूर मज़ाक करने लगते हैं।

लाख ब्लॉग व्यूवर्स का मतलब ( आज की बात ) डॉ लोक सेतिया

          कभी कभी लगता है किसी संख्या का विशेष महत्व है।  कुछ दिन से मैं जैसे इंतज़ार कर रहा था कि कब मेरे ब्लॉग पर पेज वीवर्स की ये संख्या हो एक लाख की जो अभी अभी हुई मालूम हुआ। फिर सोचता हूं इसका मतलब क्या है , मैंने जब लिखना शुरू किया था , ब्लॉग पर नहीं बहुत साल पहले डायरी पर , तब क्या सोच कर लिखना शुरू किया था , उस उद्देश्य का क्या हुआ। लिखना शुरू किया था इक अजीब सी सोच को लेकर कि कोई इक दोस्त कभी मुझे मिलेगा जो मुझे मेरी हर बात को समझेगा , उसको बताऊंगा अपनी जीवन की हर बात। हमेशा लगता था ये दुनिया और समाज जैसा होना चाहिए वैसा क्यों नहीं है। समाज और देश की दुर्दशा मुझे परेशान करती और राजनीति और पत्रकारिता को लेकर हैरान होता रहता। मौज मस्ती की बातें कभी ज़रूरी लगी ही नहीं और गंभीर बातें करना आदत बन गया जवानी की उम्र में ही। इक आक्रोश सा छाया रहता इक आग सी दिल में जलती रहती कुछ बदलाव करने की , और बगैर लिखे रहना कठिन लगता जैसे दम घुटता हो। नहीं मालूम कहां से इतना विद्रोह मेरे भीतर जमा होता रहा जिस से हर दिन मैं बेचैन रहता तड़पता रहता। कभी समझना ही नहीं चाहा कि जो भी बदलाव मैं लाना चाहता हूं वो अकेला मैं या कोई भी दूसरा अकेले नहीं ला सकता। फिल्मों का शौक बेहद रहा है और कई फ़िल्मी कहानियां मुझे प्रभावित करती रही हैं , कभी कभी लगता जैसे मैं कुछ पुराने युग का बंदा हूं।
                            पता नहीं कैसे इक सपना सा बुनता रहता हमेशा , कहीं इक खूबसूरत दुनिया बसाने का। जिस जहां में सभी अपने हों , इक दूजे से प्यार करते हों , कोई किसी से नफरत नहीं करता हो , किसी को कोई अपमानित नहीं करे उस दुनिया में। कोई मतभेद कोई टकराव कोई धोखा कोई छल कपट नहीं हो। यूं समझो धरती पर इक स्वर्ग की कल्पना किया करता था। अपनी दुनिया से हर दिन पूरी उम्र इक जंग लड़ता रहा हूं मैं , मेरे प्रयास कभी सफल नहीं हुए , हर बार हारता रहा हर किसी से। पर हार ही से ऊर्जा भी मिलती रही दोबारा खड़े होने की। आज जब तमाम लोग मुझे पढ़ते हैं ब्लॉग से कहीं अधिक अन्य पत्र पत्रिकाओं में , कितने कोई अंदाज़ा नहीं संख्या का , तब सोचना चाहता हूं फिर से अपने मकसद के बारे में। ये भी जानना चाहता हूं कि जो मेरा लेखन पढ़ते रहे हैं वो मुझे कितना जान पाये या समझते हैं। क्या अभी भी मुझे तलाश है किसी दोस्त की। मंज़िल क्या है नहीं मालूम , रास्ता कितना लंबा है नहीं पता , कोई कारवां साथ नहीं तब भी , यही चाहता हूं चलते जाना है , ठहरना नहीं है। जीवन का सफर जैसा भी है मुसाफिर हूं चलना ही मेरा काम है।
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   प्रिय पाठको ,
                     आपका आभारी हूं नियमित स्नेह देने के लिये। अपना संबंध ऐसे ही बना रहे यही कामना है।
   धन्यवाद ,
    डॉ लोक सेतिया

Wednesday, 16 November 2016

जुर्म है आम जनता होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       सत्ता का आदेश था , जनता को मानना लाज़मी था। कोई चारा नहीं होता आम आदमी के पास , विकल्प क्या है सर झुकाने के सिवा। लोग कतार में खड़े रहे आखिरी सांस तक तो विशेष क्या बात है। आप उनकी सुनो जो बतला रहे हैं अपने त्याग की बात। याद आया कुछ साल पहले भी विदेशी मूल की है का सवाल उठा तो किसी ने अपनी जगह इक ऐसे ईमानदार और काबिल व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया जिसने आगे चल कर नया इतिहास रचा। ऐसी कठपुतली कभी पहले देखी न सुनी जिस ने अपने शासन में घोटालों का पंचम इतना ऊंचा फहराया हो। आज तक उनको किसी ने अपराधी समझा , दी कोई सज़ा , कदापि नहीं। इनका भी त्याग महान है। काश सभी को घर बार छोड़ प्रधानमंत्री पद मिल सकता तो सभी इक बार क्या सौ बार छोड़ देते। मगर जो दुनिया ही छोड़ गये चंद रुपये अपने ही खाते से निकलवाते हुए , उनकी मौत पर आंसू भी कोई नहीं बहाता। दिन भर चिंता रही इक नेता की बीमारी की जिनको देश के सब से अच्छे एम्सस अस्पताल में सब से बेहतरीन स्वास्थ्य सेवा मिल रही है। कोई आम नागरिक नहीं होते नेता जो नोट नहीं बदलने पर बिना उपचार मर जाते हैं। कोई नहीं कहता आप कुछ सुधार नहीं करो , सब इतना ही चाहते हैं जैसे आप बड़े लोगों की खातिर हर प्रबंध हर हालत में हो जाता है उसी तरह मरते हुए ही सही आम और खास दोनों बराबर हो जायें। ज़िंदगी नहीं दे सकते आप जनता को सुकून की तो कम से कम मौत ही सुकून की दे दो। जनता होना क्या बेमौत मरना है , क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं।
                             पहली बार हैरानी हुई ऐसी मौत पर कोई मुआवज़ा भी सरकार ने घोषित नहीं किया , वरना शायद व्हाट्सऐप वालों को इक और चुटकुला मिल जाता मनोरंजन को। चार हज़ार लेने वाले को चार लाख मिले मर जाने पर। मगर नेता लोग सोचते हैं इन गरीबों का जीना क्या और मरना क्या , इक मोहरा ही तो हैं राजनीति की शतरंज की चाल का। चलो मर कर ही सही इस आज़ाद  देश में नर्क सा जीवन जीने से तो मुक्ति मिली , उनको न सही उनकी आत्मा को आभारी होना चाहिये सरकार और प्रधानमंत्री जी का। इनके पास आपकी हर बात का जवाब है , आपकी किसी भी समस्या का समाधान नहीं। सुनी उनकी बातें , अपना अपराध नहीं मानते औरों का याद दिलाते हैं , उन्होंने 1 9 महीने देश को जेल में बंद किया था , ... खाली स्थान भर लेना आप खुद आगे क्या कहना चाहते हैं। आपका इरादा क्या है बता देते आप भी। याद आया किसी वकील ने किसी नेता को पत्र लिखा था ये शब्द उपयोग करते हुए , " ये कहना बेकार है कि आपको शर्म आनी चाहिये "। किसी भी नेता की मौत कितनी बड़ी आयु में हो बयान वही रहता है देश को अपूरणीय क्षति का। इन कतार में मरने वालों से देश का कोई नुकसान नहीं हुआ , जो भी क्षति हुई बस किसी परिवार वालों को हुई। कहीं आग लगी तो मरने वालों को सरकार बताती है दोषी वो सिनेमा हाल का मालिक है , ऐसे मरने वालों की मौत का दोषी कोई भी नहीं। किसी को अफसोस नहीं , खेद नहीं , दुःख नहीं तो अपराधबोध का प्रश्न ही नहीं। आपको ऐसे ही मरना है क्योंकि आपका अपराध है आम जनता होना। भारतवर्ष में यही सब से बड़ा अपराध है।

पागलपन अपना अपना ( बुरी लगे या लगे भली ) डॉ लोक सेतिया

      सब से पहले मैं मानता हूं कि मैं इक पागल हूं , उम्र भर मैंने पागलपन ही किया है। कुछ साल पहले मैंने पहली अप्रैल को तमाम लोगों को आमंत्रित किया इक सभा आयोजित कर , ये बताने को कहा गया सभी से कि बताएं आपने क्या क्या और कैसी कैसी मूर्खतापूर्ण बातें जीवन में की हैं। मुझे तब सभी ने मूर्ख शिरोमणि का ख़िताब एकमत से दिया था इसी बात के लिये कि ऐसी सभा उस शहर में बुलाना जिस में साहित्य और अदब की बात शायद ही लोग समझते थे , केवल कोई पागल ही कर सकता था। मगर मेरे लिये उसी दिन शुरुआत थी इक नई तलाश की यहां साहित्य से सरोकार रखने वालों को जोड़ने की। मगर आज यहां इक और पागलपन की बात करनी है।
                                           देश में कुछ भी होता रहे कुछ लोग उस में हंसी मज़ाक ढूंढ ही लेते हैं। मगर इन दिनों जो दिखाई दिया वो हैरान करता है। लोग परेशान हैं किसी समस्या को लेकर और आप स्मार्ट फोन वाले व्हाट्सऐप पर चुटकुले बना बना अपना और औरों का मनोरंजन करने में व्यस्त हैं। फेसबुक पर बड़ी बड़ी बातें पोस्ट पर लिखने से चाहते हैं सभी को वह बात समझा दें जो खुद ही समझ नहीं रहे कि कर क्या रहे हैं। जैसे लोग प्यासे हों और आप पानी पानी लिख कर या पानी की तस्वीर दिखा कर अथवा जल शब्द का उच्चारण कर समझते हों उनको राहत मिलेगी। इतना ही नहीं लोग इसी को बहुत महान काम भी बता रहे हैं। कहते हैं ये इक क्रांति है नये युग की।
                                  हम किस हद तक असंवेदनशील बन गये हैं कि औरों का दर्द हमें रुलाता नहीं हंसाता है। क्या नेताओं से सीखा है हमने ये सबक , कृपया नेता मत बनिये , इंसान बनिये। सोचिये क्या हर विषय मात्र मनोरंजन का होना चाहिए। किस दिशा में अग्रसर हैं हम सभी। काश जितना समय या धन आपने बेकार के कामों में लगाया उसको किसी अच्छे और सार्थक प्रयास में लगाते तो मुमकिन था किसी का थोड़ा भला ही हो जाता। पागल बनो मगर किसी उद्देश्य की खातिर , व्यर्थ का पागलपन बंद करो। चलो कुछ शेर ही याद करते हैं पुराने शायरों के।
                          उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें ,
                         चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये।
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                      हसरतें और भी हैं वस्ल की हसरत के सिवा ,
                      और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा।
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                        हमें मालूम है तगाफुल न करोगे लेकिन , 
                       ख़ाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।
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