Monday, 21 September 2020

मांगी किसी ने मिली किसी को ( आज़ादी-आज़ादी ) डॉ लोक सेतिया

 मांगी किसी ने मिली किसी को ( आज़ादी-आज़ादी ) डॉ लोक सेतिया 

   कहते हैं हम आज़ादी ढूंढ कर लाये हैं अभी तलक किसान गुलाम बनकर रह रहे थे। बिन मांगे ही नहीं बिना चाहे सरकार मेहरबान होकर आज़ादी की खैरात बांटना चाहती है मगर किसान हैं जो उनकी आज़ादी से डर रहे हैं। बात डरने की नहीं है मरने की है समझने की नहीं भटकने की है क्योंकि लोग भूले तो नहीं कन्हैया पर इल्ज़ाम लगा था हमें चाहिए आज़ादी जैसे नारे लगवाने का देश विरोधी काम किया था। बिन मांगे मोती मिलें मांगे मिले न भीख। मैं आज़ाद हूं अमिताभ बच्चन की असफल मगर लाजवाब फिल्म थी जिस में अख़बार वाले इक किरदार काल्पनिक खड़ा करते हैं आज़ाद नाम से रोज़ चिट्ठी छापते हैं तब टीवी चैनल नहीं होते थे आजकल यही वो मिलकर करते हैं कंगना रिया सुशांत उनकी कल्पना की उड़ान हैं। कन्हैया का आज़ादी मांगना अपराध जनाब का अभी तक किसान आज़ाद नहीं थे कहना अच्छी बात खूब है। ज़िंदा रहने को माहौल नहीं मरने को सिर्फ कोरोना नहीं है बड़े नाम वाले अमीर लोग दौलत के नशे के साथ नशीली ज़हरीली दवाओं का भी मज़ा उठाते हैं। सत्ता वालों का नशा आसानी से नहीं उतरता है। राजनेता और धर्म वाले नफरत की आंधी से आग लगाने वालों को अच्छा और प्यार मुहब्बत करने वालों को खराब बताते हैं। सियासत का मुहब्बत से छत्तीस का आंकड़ा है ईबादत बगावत अदावत खिलौने हैं सत्ता की थैली भरी पड़ी है। मैं आज़ाद हूं साबित करने को फिल्म में नायक को ऊंची ईमारत से छलांग लगाकर ख़ुदकुशी करने की बात निभानी पड़ती है। सोशल मीडिया वालों से टीवी चैनल वाले तक मौत का ख़ौफ़ बेच रहे थे अब सरकार भी अपने झोले से आज़ादी का खिलौना निकाल लाई है। सबसे बड़ा खिलाड़ी पुराना अभिनेता नहीं है आजकल कोई और है जिसका खेल लोग समझ नहीं सकते फिर भी ताली बजाते रहे अब हाथ धोते धोते थक गए हैं ताली नहीं बजती थाली को लेकर संसद में विचार किया जाने लगा है। संसद में सवाल पूछना बंद है अन्यथा लाख नहीं लाखों करोड़ का सवाल यही है शासक क्या करते रहे हैं आज भी जिस थाली में खीर हलवा पकवान खाते हैं वो जनता की खून पसीने की कमाई की फसल से बनाई रोटी होती है उसी में छेद करते हैं। बात मुंबई की नहीं दिल्ली की भी है और हर राज्य की राजधानी की भी। नेता अधिकारी कर्मचारी खाते जनता की हैं बजाते लूटने वालों की हैं। दुष्यंत कुमार के शब्द हैं , " इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीक ए जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।

Wednesday, 16 September 2020

कांच का लिबास संग नगरी ( बात निकली है ) डॉ लोक सेतिया

  कांच का लिबास संग नगरी ( बात निकली है ) डॉ लोक सेतिया 

    उनकी नकाब हट गई तो उनका असली चेहरा सामने आएगा जो खुद उन्हीं को डराएगा। आईना उनको कोई दिखा नहीं सकता है दाग़ ही दाग़ हैं बता नहीं सकता है। उनको खुद अपनी सूरत से अधिक अपनी सीरत से घबराहट होती है। कला की देवी ये देखती है और खामोश कहीं छुपकर रोती है। उनकी दुनिया उनके तौर तरीके उनके ढंग शायद हम कल्पना भी नहीं कर सकते बाहर से दिखाई देते हैं विशाल बेहद मज़बूत मगर भीतर से खोखले और कागज़ के फूल की तरह थोड़ी हवा से या छूने से बिखर जाते हैं। तभी उनकी वास्तविकता की चर्चा कोई करता है तो हंगामा खड़ा हो जाता है जबकि उनको हक है देश समाज की हर बात पर बोलने का ही नहीं जब जिस को जैसे चाहे अच्छा बुरा साबित कर अपनी आमदनी बढ़ाने सफलता का परचम लहराने को खलनायक के किरदार से लेकर हिंसा को बढ़ावा देने और सामाजिक मूल्यों मर्यादा को ताक पर रख कर फिल्म कला के नाम पर अश्लीलता और अपराध को बढ़ावा देने महिमामंडित करने का। कभी आपने सोचा है उनको देश से अपने दर्शक वर्ग से कितना सरोकार है सच तो ये है कि फ़िल्मी अभिनय से लेकर टीवी अख़बार में विज्ञापन देने तक जो सामने नज़र आता है उनकी असलियत से विपरीत है। उनकी आम आदमी के लिए कोई संवेदना ही नहीं होती है उनके लिए धन दौलत शोहरत और सबसे ख़ास समाज जिसको जो भी चाहे करने की छूट मिली हो की अपनी दुनिया है जो किसी और को अपने बराबर नहीं समझती है यहां तक कि देश के राजनीतिक दल भी उनके मोहपाश और स्वार्थ की खातिर उनको समाज के नियम नैतिक मूल्यों और देश के कानून की परवाह नहीं करने को उचित समझते हैं।  ये दोनों इक दूजे के लिए हैं मगर पति पत्नी की तरह नहीं इनका रिश्ता मतलब रहने तक का है। चोरबाज़ार में सबसे बड़ी दो दुकान इन्हीं की हैं। इनका संबंध चोर चोर मौसेरे भाई जैसा है मगर हम आज केवल फिल्मनगरी की बात करते हैं। आपको जो टॉनिक बेचते हैं तेल मालिश करवाते हैं न खुद आज़माते है नहीं खाते न लगवाते हैं। हम लोग कर चोर से दिल चोर कहलाते हैं मगर फिल्म वाले कहानी क्या फिल्म तक कहीं से चुरा लाते हैं अपनी बनाकर खूब धन कमाते हैं। आपको झूठी बातें बतलाते हैं नायक गरीब है ईमानदार है महनत उसूल से रईस बन जाता है उल्लू बनाना यही कहलाता है। ये कमाने को सब कुछ करते हैं किसी सच पर नहीं पैसे पर मरते हैं।

  बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी तभी फ़िल्मी नायिका को ऐतराज़ है कोई अंदर की बात बाहर कहे क्योंकि अंदर सब तरह की गंदगी भरी हुई है जिसको कोई सामने नहीं लाने देता है। टीवी अख़बार वालों का स्वार्थ जुड़ा रहता है उनको नायक महानयक बनाकर अपना उल्लू सीधा करने को। सदी का तथाकथित महानायक जालसाज़ी भी करता है किसान होने का झूठा दस्तावेज़ हासिल करने को किसी राज्य की सत्ताधारी सरकार से मिलकर गांव की पंचायत की ज़मीन अपने नाम करवाता है ताकि लोनावला में जो ज़मीन किसान ही खरीद सकता है गैर कनूनी हथकंडे अपना कर खरीद सके। कभी सोचा है जो अभिनेता ईमानदारी और सच्चाई के किरदार निभाता है वास्तव में आचरण में सब कुछ कर सकता है। और उनकी पत्नी जो किसी दल की सांसद थी तब क्या उनको देश अपने पद और कायदे कानून की चिंता थी। इतना ही नहीं जब अदालत ने अमिताभ बच्चन को पंचायती ज़मीन लौटने की बात की तब भी चालबाज़ी से उस ज़मीन को जिस दल की सांसद उनकी पत्नी थी उसी दल की और सांसद के एनजीओ को देने का काम किया जबकि उनको पंचायत को वापस देने का वादा निभाना था। ये कोई अकेली घटना नहीं है सुनील दत्त का बेटा संजय दत्त अपने घर में अवैध हथियार रखने और गुनहगार लोगों का साथ देने का दोषी होता है। कोई और अपनी गाड़ी से किसी को कुचलता है कभी नियम को तोड़कर काले हिरण का शिकार करता है। जाने कितने ऐसे लोग हैं जिनको कानून की रत्ती भर भी परवाह नहीं है जो मन चाहा करते हैं। ये आपको कोई खेल खेलने को उकसा रहे हैं पैसे कमाने का नहीं आपको बर्बादी का रास्ता दिखला रहे हैं मगर ये इसी की कमाई से मौज उड़ा रहे हैं।

    आज का सिनेमा उसकी फ़िल्में कहानी संगीत अपने मार्ग से वास्तविक उद्देश्य से भटक गया है। अन्यथा कभी इस के अभिनेता निर्देशक और संगीतकार गीतकार उच्च आदर्श और सामाजिक मूल्यों को सबसे अधिक महत्व देते थे। पैसे कमाने को दर्शक को गलत संदेश नहीं देना चाहते थे। सोच विचार और सामाजिक कर्तव्य निभाने को लेकर आधुनिक सिनेमा पहले से ऊपर जाने की जगह नीचे ही गिरता गया है। खुद दिशाहीन ही नहीं हुआ बल्कि साथ में बाक़ी समाज को भी गलत दिशा को ले जाने का ही काम किया है। वास्तव में मुंबई नगरी में ऐसी कितनी घटनाएं सामने ही नहीं आती हैं ये इक विडंबना भी है कि देश की बड़ी बड़ी समस्याओं को छोड़ हर कोई किसी एक अभिनेता की मौत पर अटका हुआ है और नतीजा राजनीति और जाने किस किस के मकसद जुड़ने से हर दिन कोई जिन्न इस बोतल से बाहर निकलता रहता है। कोई जादू का चिराग़ किसी ने बिना जाने समझे बस यूं ही मसल दिया और नहीं मालूम ये क्या बला है इस से कैसे निपटा जा सकता है। ये ऐसी नगरी है जिस में कांच का लिबास पहने हुए लोग हैं संग का बना हुआ शहर है अर्थात पत्थर के लोग भगवान इंसान सभी चलते फिरते भावनाशून्य हैं। उनकी हंसी खोखली और आंसू नकली हैं दिखावे के उनका सरोकार खुद के सिवा किसी से नहीं है। कोई ऐसे भी हैं जिनकी छवि देशभक्त वाली है जबकि उनकी नागरिकता किसी और देश की है क्यों है वही जानते हैं खाने कमाने को ये देश है और बसने को कोई और भाता है।

   आपने देखा है टीवी शो पर जब भी आते हैं जाने कैसी कैसी बातें बनाते हैं उनकी गंदी वाहियात बातों पर दर्शक तालियां बजाते हैं। कुछ लोग उनसे कहने को प्यार का रिश्ता बनाते हैं मंच पर उनके संग झूमते हैं गाते हैं उनको अपना आशिक़ चितचोर कहते हैं बेशर्म होकर बहुत कुछ बताते हैं और उनके अपने बैठे मुस्कुराते हैं वास्तविक जीवन में ये हो तो ख़ुदकुशी कर जाते हैं। चुल्लू भर पानी मिले डूब के मर जाते हैं। उनकी शोहरत की बुलंदी झूठ की बुनियाद पर टिकी हुई है कुरेदने भर से कलई उतर जाती है ये दुनिया बस इसी बात से घबराती है। उनकी कमाई की रोटी को कोई नानक निचोड़ दे तो खून की नदिया बह जाएगी। हम जो भी हैं वही नज़र आते हैं ये तो अंधेरा बढ़ाने वाले हैं फिर भी सितारे कहलाते हैं। नाम की ज़रूरत नहीं हैं तमाम अभनेता नायिकाओं के किस्से सभी जानते हैं दुनिया जिस को मुहब्बत की कहानी मानते हैं वास्तविकता को नहीं पहचानते हैं। ये आपकी दुनिया के किरदार नहीं हैं भले जो भी ये कभी वफ़ादार नहीं हैं ये बेवफ़ाई करते हैं मगर गुनहगार नहीं हैं। ज़मीर क्या होता ईमान किसे कहते हैं कहते हैं अभिनय करते हैं खुद होते नहीं है जैसे नज़र आते हैं अदाकार हैं कोई किरदार नहीं है। ये लाईलाज रोग है समाज को बीमार कर रहा है ये आपके लिए कोई उपचार नहीं है। कोई  शायर कहता है , इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं , कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। रौशनी छीन के घर घर से चिराग़ों की अगर , चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। आखिर  में मेरी इक ग़ज़ल भी पेश है।

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें
सुनाते रहे बस कहानी की बातें।

तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने
हमें पूछते अब निशानी की बातें।

गये डूब जब लोग गहराईयों में
तभी जान पाये रवानी की बातें।

रही याद उनको मुहब्बत हमारी
नहीं भूल पाये जवानी की बातें।

हमें याद सावन की आने लगी है
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें।

गये भूल देखो सभी लोग उसको
कभी लोग करते थे नानी की बातें।

किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें। 

Thursday, 10 September 2020

नचा रहे हैं धागे उनके हाथ हैं ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   नचा रहे हैं धागे उनके हाथ हैं ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

   कठपुतली करे भी तो क्या धागे किसी और के हाथ हैं नाचना तो पड़ेगा। सिम्मी नायिका ने इक पुरानी फिल्म में ये डायलॉग जिस ढंग से बोला था कमाल था ये और बात है कि आनंद फिल्म में उसको बदले अंदाज़ में नाटकीय ढंग से बोलने पर उसकी पहचान हो गया मशहूर होना बड़ी बात है। कौन कठपुतली है कौन नचा रहा है ये रहस्य है सामने कोई और हैं पर्दे के पीछे जाने कौन कौन हैं। देश की कानून व्यवस्था को सरे आम बीच बाज़ार कोई नंगा करता है और चाहता है ये खेल हर किसी को दिखाया जाये उनकी हुकूमत है ये ज़रूरी है सबक सिखाया जाये। कोई अरमान जलाया जाये किसी की हस्ती को मिटाया जाये। यहां पर सभी उनके इशारे पर चल रहे थे जो मकसद था मीडिया वाले भी वही कर रहे थे। कोई  रोकने वाला नहीं था कोई टोकने वाला नहीं था सभी अधिकारी अपने आका का हुक्का भर रहे थे ज़ुल्म क्या होता है समझ नहीं इंसाफ कर रहे थे यही कह रहे थे। इंसाफ करने वाले बैठे थे अपनी शान से ये तमाशा चलता रहा आराम से। कोई उस कागज़ के पुर्ज़े उड़ा रहा था जिस पर लिखा हुआ था कोई शपथ उठा रहा था कोई कह रहा था कोई दोहरा रहा था। देश की एकता अखंडता न्याय की निष्पक्षता की भय या पक्षपात नहीं करने की बात को खोखली हैं ये बातें समझा रहा था। आज़ादी न्याय और देश का संविधान क्या है। लोग हैरान हैं परेशान बिल्कुल भी नहीं हैं लोग तमाशाई हैं उनको मज़ा आ रहा है। उधर कोई इंसाफ़ का तराज़ू लड़खड़ा रहा है उसको सब खबर है कोई ख़ंजर है कोई ज़ख़्म खाने खुद उसको बुला रहा है। ये जासूसी उपन्यास लिखा जा रहा है नज़र जो भी आता है समझ आ रहा है मगर राज़ की बात कौन बता रहा है पटकथा कोई लिखवा रहा कोई निर्देशन का हुनर दिखा रहा। रहस्य और भी गहरा रहा है।

    घर शीशे का लिबास भी शीशे जैसा ऐसे में हाथ में पत्थर रखने का नतीजा क्या होगा। मुश्किल यही है जो लोग आईने बेचने का कारोबार करते हैं उनको खुद आईना देखना ज़रूरी नहीं लगता है। अपने चेहरे पर लगे दाग़ उनको अच्छे लगते हैं डिटर्जैंट बेचने का सामान हैं। ये जंग है कि कोई खेल है बहुत अजीब ये घालमेल है किसी शतरंज की बिसात पर मोहरे हैं कितने जो बेमेल हैं। बाज़ी किसी की खिलाड़ी कोई है ये सियासत का अदावत मुहब्बत का इक दौर है। शराफत का कहीं नहीं कोई ठौर है जंगल में नाच रहा कहीं मोर है। चलो थोड़ा पीछे नज़र डालते हैं हर इक किरदार को फिर से पहचानते हैं यहां सच नहीं झूठ ही झूठ है ये इक बात सभी जानते हैं मानते हैं। कोई हारी बाज़ी की बात है बिछाई किसी ने नई बिसात है आधा दिन है आधी रात है नहीं शह नहीं कोई मात है ये बस घात है लात खाई है लगानी लात है। बादशाह खुद को समझते हैं लोग जीत हार की खातिर लड़ते मरते हैं लोग कौन समझाए क्या क्या कहते हैं लोग बात कहते हैं फिर मुकरते हैं लोग। फिर उसी ने अपनी कठपुतली को उंगलियों पर अपने नचाया है जब तेरा साथ है डर की क्या बात है पेड़ पर चने के चढ़ाया है जानते हैं खेल है प्यादों का कौन क्या है किसे क्या बनाया है। किसी शायर ने समझाया था कि " खुश न रहिएगा उठाकर पत्थर , हमने भी देखे हैं चलकर पत्थर "।

     ये आपदा को अवसर बनाने की बात है ख़ुदकुशी की नहीं क़त्ल की बात है। यही समय है ताकत को आज़माते हैं सच झूठ को मिलवाते हैं उनको कहते हैं झगड़ा निपटाते हैं खुद जीतने को उनको हरवाते हैं। फिर कभी जब धागे उलझ जाते हैं चाहते कुछ नहीं कुछ भी कर जाते हैं। बादशाह अपने दरबार में बैठकर चाल क्या चलनी है समझाते हैं कोई मोहरा है सूली पर चढ़ाते हैं घबरा मत हम तेरे साथ हैं उसको ललकार हम तुझे बचाएंगे मज़ा लेते हैं उसको मज़ा चखाते हैं। ये दो ऐसे नादान हैं जो समझते हैं हम बड़े पहलवान हैं हम खुदा हैं हम अपने भगवान हैं आप अपनी हम इक पहचान हैं। बस सी हुई चूक है इक मगरूर है मद में चूर है पर दुनिया का तो यही दस्तूर है सांड लड़ते हैं फसल बेल बूटे बर्बाद होते हैं दोनों थक जाते हैं पीछे हट जाते हैं। सब ने समझा था काठ की तलवार है ये सियासत की जंग है बेकार की हाहाकार है मगर चोट कोई कभी ऐसे लग जाती है ये ज़ुबां तख़्त पर जो बिठवाती है यही सूली पे भी कभी चढ़वाती है। पहले सोचो फिर तोलो फिर बोलो ये दादी नानी समझाती है जब ज़ुबां काबू नहीं आती है कोई महाभारत कहीं करवाती है। शब्द का ज़ख्म कभी भरता नहीं खंजर का ज़ख्म धीरे धीरे भर जाता है ज़हर पीकर भी लोग बच जाते हैं कोई पी के अमृत भी मर जाता है।

      डॉ बशीर बद्र जी कहते हैं उनकी ग़ज़ल के शेर हैं। अब है टूटा सा दिल खुद से बेज़ार सा , इस हवेली में लगता था बाज़ार  सा। बात क्या है मशहूर लोगों के घर सोग का दिन भी लगता है त्यौहार सा। इस तरह साथ निभाना है मुश्किल , तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा। जो था चारागर अब खुद बीमार है दुश्मन का दुश्मन है अपना यार है कठपुतली है उसकी उसका औज़ार है। या इस पार है या उस पार है अभी क्या खबर कोई मझधार है ये डूबती नैया लगती क्या पार है। कैसा मातम है खास लोगों का जश्न है कि कोई त्यौहार है। शराफ़त न जाने कहां छुप गई किसलिए वो भला शर्मसार है। ये शहर मुहब्बत का नहीं है यहां मुहब्बत भी शराफ़त भी ईबादत भी सियासत भी बिकती है इस शहर का मिजाज़ यही है। ग़ज़ल सुनते हैं इक जगजीत सिंह जी की आवाज़ में।

Sunday, 6 September 2020

कोरोना आपकी अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना आपकी अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

         फ़िल्मी अभिनेता की मौत का मातम मनाने से फुर्सत मिलते ही टीवी चैनल एक बार दोबारा से कोरोना राग अलापने लगे। जैसे ही इस को लेकर बहस होने लगी कि सत्तर साल में जितना विकास हुआ था उसका भी सत्यानाश हो गया है ये कोई विरोधी नहीं विश्व बैंक के अधिकारी रहने वाले ने कहा है। सरकार ने अपनी बला टालने की खातिर कोरोना को दोषी ठहराने की बात की तो कोरोना को मज़बूर होकर अपनी सफाई देने को सामने आना ही पड़ा। जैसा होता है सब ने देखा है टीवी चैनल वालों को खुद अपनी खबर भले नहीं होती है जिन आंतकवादियों अपराधियों मुजरिमों को पुलिस तलाश नहीं कर पाती उनका साक्षात्कार टीवी वाले दिखलाते हैं। ओसामा बिन लादेन से पहले भी ऐसा होता था उसके बाद ये रिवायत बन गई खुलेआम बताते हैं आज आपको उनसे मिलवाते हैं। रिया को भी अपनी कहानी खुद अपनी ज़ुबानी सुनानी पड़ी क्योंकि बात या असली मामला वही छीना झपटी पैसे दौलत का है। मरने वाले की आत्मा की शांति को श्राद्ध कौन करे बाद की बात है पहले उसका वारिस होना है तो क़ातिल कोई और है कहना ज़रूरी है ख़ुदकुशी करने का इल्ज़ाम कोई अपने पर नहीं लेना चाहता। कोरोना को भी जो अपराध किया नहीं उसका आरोपी बनाया जाना मंज़ूर नहीं है। 

      पहला सवाल था कोरोना आपको क्यों आना पड़ा इस देश में कोई कमी थी और सब कितना खराब था तुझे आकर पहले से मरे हुए लोगों को मारने की ज़रूरत क्या थी। कोरोना ने कहा मुझे बुलाया गया है बिना बुलाये मुझे इधर नहीं आना था मुझसे खतरनाक और बहुत थे देश की जनता का लहू चूसने वाले। क्या करता मुझे इस शानदार ढंग से नमस्कार करते हुए जान बूझकर बुलावा दिया तो कैसे नहीं आता। क्या आप नहीं जाने उनके बुलाने पर जिनकी हैसियत क्या कमाल की है नामुमकिन को मुमकिन करने वाले से हाथ मिलाना कौन नहीं चाहता है। हाथ मिलाने के बाद हाथ धोने की चर्चा भी अजीब लगती है गले लगाया था हाथ में हाथ भी थामा था कोरोना को जो होना था होना था बस वही कोना था जिस जगह बैठा कोरोना था। उसके बाद हर सरकार हर सत्ताधारी नेता ने खुद मनमानी की कोरोना को फैलाने का काम किया मुझे बदनाम किया खुद नहीं अपना काम किया। कोरोना की लूट की छूट ने उनकी वास्तविकता को सामने ला दिया। मैं जाना भी चाहता था मुझे रोककर अवसर बना दिया मेरे नाम से घर दफ़्तर सब बना लिया। 

     पहले कहते थे उनसे पहले किसी ने कुछ भी नहीं किया सभी ने लूटा है बर्बाद किया है अब जब सब कुछ खुद अपने हाथ से लुटवा बैठे या लुटवाना चाहते हैं तब अपने गुनाह का दोष मुझ पर लगाना ये तो झूठ की सीमा को पार करने के बाद बेगुनाह को सूली चढ़ाने की बात है। हाथ जोड़कर मुझे बुलाया था अब कहते हैं किस से पूछकर आया था। सच बताऊं तो मैंने उन पर एहसान किया है उनकी गिरती साख की लाज बच गई है मेरे बहाने उनके सर से बला टल गई है। दिल ही दिल से मेरा उपकार समझते हैं जो कभी नहीं समझते थे इस बार समझते हैं कोरोना को लोग खुद उनका नया अवतार समझते हैं। ओ चारागर लोग तुझे सबसे बड़ा बीमार समझते हैं अपने सर पर लटकी हुई तलवार समझते हैं सरकार है बड़ी बेकार समझते हैं तुझ से बढ़कर कोई नहीं लाचार समझते हैं। सबसे बड़े दुश्मन को सब यार समझते हैं इस पार ही नहीं लोग सभी उस पार समझते हैं। जाने है कौन देश का गुनहगार समझते हैं चौकीदार नहीं कोई सौ बार समझते हैं। सच तो है सरकार बहुत खुश है कोरोना वक़्त पे आया है क्या क्या नहीं सरकार ने कोरोना से पाया है कोरोना ने उनको बचाया है ये अवसर उन्होंने जमकर आज़माया है। फितरत है उनकी सितम करते रहे हैं अब झूठा ये इल्ज़ाम कोरोना पे लगाया है ये ज़ुल्म भी देखो सरकार ने ढाया है।

        कुछ कहते कहते कोरोना उदास हो गया है उसका इम्तिहान नहीं किसी और का इम्तिहान था जो ज़ीरो नंबर लेकर भी खुश है कोरोना सौ नंबर पाकर पास हो गया है। हर बात जैसे सरकारी मज़ाक हो गया है घोड़ा सत्ता का खुश है हर शख़्स घास हो गया है। अदालत का फैसला नया इतिहास बनाया है इक बेगुनाह को झूठे आरोप लगा मुजरिम बनाया है उसको बाइज्ज़त बरी किया झूठ बोलने वाले पर जुर्माना लगाया है। क्या सरकार को निर्णय मंज़ूर नहीं होगा कोरोना बेकसूर है तो किसी और का कसूर होगा। आखिर वही हुआ जिसका डर था चोरी की है उसी ने खुद जिसका ये घर था। दरवेश कह रहा ये कौन है जो शाहंशाह बन कर आ गया है दौलत सारी दोस्तों को लुटा गया है भीख मांगता था खुद भिखारी सबको बना गया है।

Saturday, 5 September 2020

लॉक-डाउन की महिमा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    लॉक-डाउन की महिमा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

 
     लॉक-डाउन को लेकर दुविधा में हैं लोग कब से कब तक और कितना कैसा कोई नहीं जानता खुद घोषित करने वाले अनजान हैं। हटते हटते ज़माना लगता है लगाने को चुटकी बजाना लगता है है हक़ीक़त मगर फ़साना लगता है आपको झूठा बहाना लगता है। मुश्किल बाहर जाना मुसीबत को घर बुलाना लगता है। अंधों में काना ही अब स्याना लगता है कोरोना को भगाना थाली बजाना लगता है। किसी को अवसर भुनाना लगता है किसी का खाली खज़ाना लगता है बारिश का मौसम सुहाना लगता है रोज़गार पकोड़े बनाना लगता है। सीबीआई को बुलाना पड़ेगा कोई गुनहगार पकड़वाना पड़ेगा कोरोना को मज़ा चखाना पड़ेगा उसे अब तो सूली चढ़ाना पड़ेगा तरीका वही आज़माना पड़ेगा गधे को बाप सबको बनाना पड़ेगा। किसी को कहीं से हटाना पड़ेगा किसी और देश को भाग जाना पड़ेगा नहीं सुनता कोई सुनाना पड़ेगा कुछ और ज़ोर से चिल्लाना पड़ेगा। ये सारा का सारा बोझ उठाना पड़ेगा नहीं सजदा करना मगर सर फिर भी झुकाना पड़ेगा दुष्यन्त कुमार को दोहराना पड़ेगा जो सच है आखिर बताना पड़ेगा। लॉक-डाउन लगाकर हटाना पड़ेगा चिड़िया चुग गई खेत बाद में पछताना पड़ेगा। कभी तो हर किसी को जाना पड़ेगा ये सिलसिला चलता है चलाना पड़ेगा रिवायत को आखिर निभाना पड़ेगा किसी को उठाकर बिठाना पड़ेगा। लॉक-डाउन का मतलब पढ़ाना पड़ेगा अनलॉक-डाउन तुझको समझना और समझाना पड़ेगा।

        लॉक-डाउन की कथा बनाई है लॉक-डाउन कोरोना का सौतेला भाई है दूध दूध है छाछ छाछ है मख्खन घी और मलाई है मिलकर रसमलाई बनाई है। नहीं मालूम किसने चुराई है लॉक-डाउन क्या कोई हलवाई है कोरोना है बड़ा कड़वा देखो तो लगता है कोई मिठाई है। बात मन की उसको जब सुनाई है क्या कहें कितनी उसको भाई है अब कसम सच्ची उसने खाई है सरकारी दामाद है कोरोना घरजवाई है। ऐलान जनाब ने किया आखिर आठ बजे सीधे संबोधन में कोरोना से बात बिगड़ी बन गई है ठन गई थी मगर फिर टनाटन गहरी छन गई है। वैक्सीन नहीं कोई दवाई नहीं हम कथा उसकी सुनाएंगे कोरोना संग लॉक-डाउन की भी महिमा गाएंगे सुबह शाम उसको जब मनाएंगे नाचेंगे झूमेंगे और गाएंगे बीमार चंगे हो जाएंगे। हम ये राज़ दुनिया से छुपाएंगे कोरोना क्या है कुछ भी नहीं मगर सब कुछ है ये समझा कर और उलझाएंगे। हमारे पास बेचने को रखा क्या है दुआ भी है बद्दुआ क्या है किया क्या और हुआ क्या कौन समझे ये माजरा क्या है। लॉक-डाउन चीज़ कितनी अच्छी है बात झूठी भी लगती सच्ची है हमने छाना कोना कोना है छिप गया डर कर जब कोरोना है हमने उसको ज़िंदा छोड़ने का किया वादा है पेश हो जाओ पक्का इरादा है।  सीबीआई  ने जाल बिछाया था तब कोरोना बहुत घबराया था दुहाई है दुहाई है कोरोना बहना है और  लॉक-डाउन उसका भाई है। राम ने खूब मिलाई है जोड़ी इक अंधा है दूजा है कोड़ी बात रहती है ज़रा अभी थोड़ी सुना रहे हैं उसको लोरी। गहरी नींद उनको जब आएगी अर्थव्यस्था पटड़ी पर खुद चली आएगी कथा सुनाने को नई ऐप्प बनाई जाएगी आरती भजन कीर्तन सतसंग जनता ताली भी बजाएगी सरकार कोरोना संग निभाएगी मगर जब सब जनता मनाएगी भाई लॉक-डाउन चला जाएगा बहना कोरोना भी भाग जाएगी।
        

Wednesday, 2 September 2020

फ़िल्मी नायक हैं असली नहीं ( बोल फ़रीदा ) डॉ लोक सेतिया

  फ़िल्मी नायक हैं असली नहीं ( बोल फ़रीदा ) डॉ लोक सेतिया 

        नामुमकिन को मुमकिन करने वाले नायक या फिर ख़लनायक का अभिनय करते हुए सिनेमा के पर्दे पर सब कुछ कर सकते हैं वास्तविक ज़िंदगी में उनकी सच्चाई बिल्कुल अलग होती है। सच्चाई ईमानदारी और आदर्श की कहानी का किरदार निभाने वाले वास्तविक जीवन में झूठ छल कपट धोखा और समाज के नैतिक मूल्यों को ताक पर रख कर बिना संकोच या लाज शर्म उस सीमा तक अनुचित आचरण करते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। और उनके अच्छे बुरे क्या खराब और गुनाह समझे जाने वाले कर्मों को भी हम चाव से सुनते हैं और कितनी अजीब बात है देख कर पढ़ कर सुनकर भी उनके लिए खराब भावना नहीं होती है। इक झूठ फरेब की नकली चमकती दुनिया को हमने हक़ीक़त से बढ़कर समझ लिया है उनके अफ़साने हक़ीक़त को झुठलाते हैं। हमने किसी को नायक किसी को महनायक किसी को भगवान तक कह दिया उनके अभिनय या खेल या कोई कला को दिखला सफल होने के कारण। उस कलाजगत खेलजगत का वास्तव में देश समाज और हमारे साधारण लोगों के जीवन से कोई मेल तो क्या सरोकार भी शायद ही होता है। शायद उनको मालूम ही नहीं है कि साहित्य कला संगीत और अभिनय नृत्य का वास्तविक मकसद आम व्यक्ति की ज़िंदगी और सुख दुःख दर्द परेशानी समस्याओं को जानकर उन पर चिंतन करना होना चाहिए। मगर ये बेहद खेदजनक है कि सफलता पाने का अर्थ पैसा दौलत कमाकर इंसान इंसानियत के एहसास से दूर केवल अपने स्वार्थ को ध्यान में रखना बन गया है इसलिए उनके किरदार से समाज को अच्छा संदेश नहीं मिलता बल्कि भटकाने की बात होती है। कभी शायद कोई सोचेगा कि कभी समय हुआ करता था जब सिनेमा फिल्म और कहानी गीत कितने सार्थक मार्गदर्शक की तरह अपना कर्तव्य निभाते थे और उन नैतिक आदर्शों की खातिर अपने स्वार्थ को छोड़ने में कोई संकोच नहीं होता था पैसा उनका भगवान नहीं होता था। अब टीवी सीरियल फिल्म और सोशल मीडिया भी हम सभी को सच से दूर किसी झूठी काल्पनिक दुनिया में भटकाने का ही काम करते हैं। उनका मकसद धन दौलत हासिल करना होता है कोई सामाजिक कर्तव्य निभाना नहीं।

    ये बताना ज़रूरी था विषय को समझने की खातिर। डायलॉग बोलने की तरह भाषण देकर तालियां बजवाने वाले नायक भी नहीं बहरूपिया कहना उचित होगा को हमने समझ लिया कि वो चुटकी बजाते ही हम सब की देश की जनता की समस्याओं को हल कर सकता है। जैसे किसी बकवास विषय पर बनी हिट फिल्म को फिर से बार बार बनाते हैं उस ने नायक का किरदार निभाते हुए कितने तमाशे रोज़ दिखला दिखला कर हम सभी को सोचने समझने ही नहीं दिया कि उसका कोई करिश्मा देश की जनता के लिए कुछ भी कर नहीं पाया है और हमने उसको अनावश्वक ही कोई मसीहा समझने है मानने की गलती की है। अब पता चला आकाश छूने की बातें करने वाले ने देश को पाताल में धकेल दिया है विकास विकास करते करते विनाश को लाते रहे हैं। फिल्म की कहानी में लेखक अपने बनाए किरदार को सही अंजाम तक ले जाने में पग पग साथ रहकर बचाए रहता है लेकिन यहां खुद नायक का अभिनय करने वाला जब जैसे चाहा मनमानी करते हुए जनता की ज़िंदगी की कहानी से खिलवाड़ करता रहा है। उसको रत्ती भर भी एहसास नहीं है कि उसने क्या किया है क्यों किया है और क्या से क्या हो गया है। कहानी अभिनय निर्देशन सभी उसी का है जिसको कुछ भी मालूम नहीं उनके बारे में।

        फ्लैशबैक में पिछली कहानी को देखते हैं। उसने कितने रंग कितने रूप बदल बदल कर मनोरंजन करने का काम किया है। अभिनेता संजीव कुमार ने सात रंग जीवन के सात किरदार निभाए थे मगर गोविंदा ने इक फिल्म में अनपढ़ होते हुए भी वकील डॉक्टर पुलिस अधिकारी की पोशाक पहन कर फोटो करवा घर में लगवाई हुई थी। जिसे देख नायिका भी चक्कर खाई थी। डबल रोल करने वालों की गिनती करना ज़रूरी नहीं है गब्बर सिंह कहता है पचास पचास कोस दूर की दहशत मगर जनाब के लिए हज़ारों मील की भी दूरी कोई दूरी नहीं है। कभी फोटोग्राफी कभी पहाड़ों की सैर कभी शेर चीते हाथी से याराना कभी इस कभी उस देश जाना अपना तमाशा बनाना खुद तमाशाई बन इतराना अपने मुंह मियां मिट्ठू कहलाना। बाबुल की दुआएं लेती जा रुलाने वाले गीत पर झूमना ठहाके लगाना क्या नहीं कर दिखाया है हर शाख पे उल्लू बैठा है किसी ने किस किस को नहीं उल्लू बनाया है। इक छलिया आया है कोई जोकर संग लाया है अच्छे अच्छों को उसने तिगनी का नाच नचाया है।

     खीर बनाने लगे थे कढ़ी बन गई है रोटी पकते पकते तवे पर जल गई है उसकी चाय लेकिन बिना आग पर रखे उबल गई है। उसने लिट्टी चोखा भी खाया है आपदा को अवसर उसने बताया ही नहीं बनाया है। ये कौन जाने किस जहां में सबको लाया है समझा रहा है सब झूठी मोह माया है। अब हर कोई लगता है जैसे घबराया है रात को डरावना सपना किसको नहीं आया है। इक गंभीर कहानी की फिल्म नासमझ बच्चों की खातिर बनाई कार्टून फिल्म बन गई है सब दोस्तों से दुश्मनी होने लगी है उसकी सभी से ठन गई है। हालत बिगड़ गई है फिर भी उसका दावा है कि बात बन गई है। मन ही मन खिचड़ी कोई पकाता है देता नहीं किसी को सबको दिखलाता है खुद चटखारे ले कर खाता है अफ़सोस फिर भी भूखा का भूखा रह जाता है। सपने देखने को जागते ही फिर से सो जाता है। इतिहास के पुराने मंज़र को दोहराता है सब तोड़ता है तोड़ता ही जाता है कहता है फिर से नया देश बनाता है। कोई नशा है जादू है जाने क्या है बर्बाद करता है सभी को फिर भी मनभाता है का शोर मचाता है सच को हमेशा कुचलता है उसकी लाश को छिपाता है। सब कहने लगे हैं भागो भागो वो इधर आता है। ऐलान कर दिया भगवान बन गया है इंसान है हैरान क्या इंसान बन गया है उसका कोई अरमान बन गया है देश में सभी से महान बन गया है। अभिशाप मिला है सबको इक वही वरदान बन गया है। आपने डुप्लीकेट देखे हैं किसी नायक की नकल करते हैं कुछ ऐसा ही है हर महान नायक देश के बड़े बड़े इतिहास के लोगों की नकल करते करते खुद को असली उनको नकली साबित करते करते जोकर बन गया है। झूठ की पहचान होती है कि उसके पैर नहीं होते समझते रहे हैं मगर झूठ बोलने वाले की कोई ज़ुबान नहीं होती है बढ़बोला होना उसकी निशानी है। यही आज की कहानी है समझनी है समझानी है।

Tuesday, 1 September 2020

मैं गोरा तू काला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           मैं गोरा तू काला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      रंग गोरा होना चाहिए फिर चाहे नज़र नहीं लग जाये उस से बचने को कालिख का टीका लगवाना पड़ जाये। ये सिर्फ महिलाओं की चिंता नहीं है पुरुष भी सब से आकर्षक दिखाई देने को क्या नहीं करते हैं। ये जो गोरा और काला होने का सवाल है ये शक़्ल सूरत पर नहीं हर जगह मुंह उठाये खड़ा रहता है। अगर ऐसा नहीं होता तो काला धन बिना बात बदनाम नहीं होता उसको किसी और बैंक ने जारी नहीं किया हुआ है। विदेशी बैंक में जमा होने से बदरंग नहीं हो गया जो फिर लौट कर राजनीतिक दल को मिलते ही खुशरंग हो जाता है। काले गोरे का भेद भाव आखिर कब तक ये समस्या उनकी खड़ी की हुई है जिनको अपने चेहरे के दाग़ छुपाने को बाकी सभी पर कालिख पोतनी पड़ती है। उनका ढंग यही है खुद को ऊंचा साबित करने को औरों को बदनाम कर कर छोटा साबित कर दो। सभी को देश के दुश्मन कहने से आपकी देशभक्ति का सबूत मिल जाता है। किसी कवि की हास्य कविता सुनकर समझ कर कोई विश्व का सबसे बड़ा निंदक बन गया है उसने निंदा करने को छोड़ कोई और काम नहीं किया है और उस से तमाम लोगों की निंदा सुनकर देशवासी उस के अनुयाई बन गए हैं। पहले जो सरकार की आलोचना करते थे उसकी कमियां निकालते थे आजकल सरकार को तमाम गलतियों नाकामियों और अनुचित बातों को छुपाने से लेकर अच्छा बताकर गुणगान करने का काम करने लगे हैं। खुद उनकी इस बात को लेकर निंदा हो रही है मगर उनको अपनी निंदा की चिंता नहीं है ये निंदा भी उनको भाने लगी है पैसा विज्ञापन टीआरपी लुभाने लगी है। उनके मनोरंजन से दुनिया उकताने लगी है भोर होते ही उबासी आने लगी है उनकी नग्नता देख कर देखने वालों को शर्म आने लगी है। कोई महिला दिलकश अदाएं दिखलाने लगी है ज़ुल्फ़ों को लहराने लगी है मस्ती ही मस्ती छाने लगी है झूठ को सच बनाकर सुंदरी इतराने लगी है। 

       काले और गोरे रंग की जोड़ी दुनिया की सबसे अच्छी जोड़ी है। बिना एक के दूजे की पहचान नहीं बचती है काली साड़ी गोरी पर क्या जचती है माना हम भी काले हैं लेकिन हम दिलवाले हैं ये कहते सभी मतवाले हैं गोरी हम तेरे रखवाले हैं। ख़िज़ाब बालों पर लगाते थे काला बनाते थे आजकल जितने गुलाब वाले हैं लगते जैसे हैं सब कमाल रंगने का है भीतर से काले थे काले हैं। आपने देखा है बड़े लोगों को पहन कर काला लिबास नज़र आते हैं अपने बेडौल जिस्म को रंग काले से छिपाते हैं काले रंग को नाहक बदनाम किया है सच कहो कोई सफेद काम किया है। निंदा करने का मज़ा क्या है या इलाही ये माजरा क्या है। उसने सबसे बड़ा निंदक होने का ख़िताब पाया है महिलाओं को कितना देखो भाया है। ख़िज़ाब अपने बालों पर नहीं लगाया है दुश्मनों को कालिख़ लगाने का हुनर आज़माया है उसकी सजधज बड़ी निराली है अच्छी लगती है उसकी गाली है। हर कोई बनकर खड़ा सवाली है सबकी झोली भरनी थी किया था वादा अभी तक मगर खाली खाली है। कौन असली है कौन जाली है बात सच्ची है पर निराली है दाल में काला नहीं है उसकी पूरी की पूरी दाल ही काली है।

  सात रंग की जो कहानी थी वो कहानी बहुत पुरानी थी उसने लिखी ऐसी कहानी है जिस में प्यास ही प्यास है नहीं चुल्लू भर भी पानी है। याद आने लगी सबको अपनी नानी है कौन राजा है कौन राजा जानी है कहते हैं देश की जनता बड़ी भोली है मगर फिर भी बड़ी स्यानी है। बस  वही इक देने वाला है बाक़ी लोग तो भिखारी हैं चतुर सुजान है कोई हम क्या हैं निरे अनाड़ी हैं। अपना था जो भी लुटवा बैठे हैं रहबर कैसा बना बैठे हैं रंग इतने बदलते बदलते अपने चेहरे भुला बैठे हैं। अब कोई रास्ता नहीं मिलता है भटकने लगे हैं ऐसे जंगल में सभी ये वीराना कभी गुलशन था फूल सतरंगे खिलते थे कभी। अब  सभी इक उसी के रंग में रंगे हैं ये हम्माम हैं सभी नंगे हैं जो ख़राब हैं बस वही चंगे हैं।


     


Monday, 31 August 2020

ये आईने तोड़ के फैंक दो ( सच के क़ातिल ) डॉ लोक सेतिया

   ये आईने तोड़ के फैंक दो ( सच के क़ातिल ) डॉ लोक सेतिया 

    सच वो है जो भगवान से भी सवाल करे विधाता ये दुनिया को कैसा बनाया किसी को सभी कुछ किसी को कुछ भी नहीं। हम जिस को देखते हैं वो पत्थर का भगवान अमीरों का लगता है खुद सबसे बड़े आलीशान भवन में हीरे मोती सोना चांदी लिबास भी चमकदार और पूजा अर्चना की गूंज में स्वादिष्ट पकवान। गरीब उसके पास जाकर भीख की तरह दया करने को कह सकता है अपने अधिकार की बात नहीं कर सकता अन्यथा पूछता आपने जन्म दिया तो ज़िंदगी और ज़िंदा रहने का हक भी देता। मगर उस भगवान की बेबसी है वो अपनी वास्तविकता खुद ब्यान भी नहीं कर सकता है। कुछ लोग खुद ही भगवान बन बैठे हैं आज ऐसे ही तमाम लोगों की बात कहते हैं खरी खरी कहने की ज़रूरत है। अन्यथा दुष्यन्त कुमार की तरह कहना होगा " तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान ए शायर को , ये एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिए "। 

   ये सच के झंडाबरदार बने फिरते हैं बेचते हैं अपना झूठ सच साबित कर ऊंचे दामों पर और खुद पर कोई अंकुश नैतिकता का नहीं मानते हैं। ख़ास लोग जब चाहते हैं उनको बुला सकते हैं और उनकी कही हर बात इनको गीता कुरान बाईबल लगती है उनको बात जैसे जब उनकी मर्ज़ी ये दर्शकों को सुनवाते ही नहीं मनवाते भी हैं। जिसकी खाते हैं उसकी बजाते हैं उसी की महिमा बखान कर आगे ऊपर बढ़ते जाते हैं झूठ के परचम को सच बताते हैं लहराते हैं। दर्द की मत करना बात सबसे बेदर्द और बेदिल बेज़मीर यही नज़र आते हैं। मगर आम जनता के हालात इनको समझ नहीं आते हैं उनकी घनी अंधेरी रात को ये चांदनी बताते हैं। कभी किसी को गुनहगार जब बताते हैं उस से पूछो कितना ज़ुल्म ढाते हैं जाने कहां कहां से मनगढ़ंत सबूत ले आते हैं और खुद वकील गवाह न्यायधीश सब बनकर अपनी अदालत में मनमर्ज़ी का फैसला सुनाते हैं। ये ज़हर देते हैं खुद को चारागर बतलाते हैं। ये खुद पागल हैं इनको पीलिया हुआ है पागलपन करते जाते हैं खबर ढूंढते नहीं हैं खबर बनाते हैं बेखबर की खबर को अखबर बनाते हैं। हाथ जोड़कर इनसे लोग जान अपनी बचाते हैं पर जान की कीमत इनको चुकाते हैं तभी बच पाते हैं। इक ग़ज़ल उनकी बातों की सुनाते हैं उसके बाद कोई और दरवाज़ा खटखटाते हैं। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।

मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।


        चलो अगली चौखट पर सर को झुकाते हैं अपने पर हुए ज़ुल्म की दास्तां उनको भी सुनाते हैं जिनके पर इंसाफ़ का तराज़ू है न्याय का मंदिर कहलाते हैं। कोई तोला है कोई माशा है उनका भी अजब सा तमाशा है। वो जो कहते हैं यकीन से कहते हैं समझते हैं जैसे आसमान पर रहते हैं आम लोग उनको दिखाई नहीं देते हैं। खुदा हैं उनकी खुदाई है हां मगर सत्ता पर बैठा जो अपना भाई है कुछ मत पूछो वो करिश्माई है बस उसी ने सभी को राह दिखाई है। चोर चोर मौसेरा भाई है दौलत मिल बांटकर सभी ने खाई है ये खज़ाने की इक खुदाई है लूट है देशसेवा कहलाई है। कनून क्या है संविधान क्या है इधर कुंवां उधर खाई है माखनचोर माखन चुराता है देखती रहती उसकी माई है ये दूध है वो मलाई है। यहां बिकता है ज़मीर भी सर झुकाता है राजा फकीर भी जिसकी फूटी हुई है तकदीर भी उसको मिलती नहीं नज़ीर भी। बस उनको कुछ कहना भी गुनाह होता है सच की बात है फ़नाह होता है। इक ग़ज़ल उनको भी कहती है जनता ज़ुल्म सहती कुछ नहीं कहती है ख़ामोशी बोलती नहीं फिर भी कहती है। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

फैसले तब सही नहीं होते ,
बेखता जब बरी नहीं होते।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें ,
दर हकीकत वही नहीं होते।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर ,
सबके उन जैसे ही नहीं होते।

क्या किया और क्यों किया हमने ,
क्या गलत हम कभी नहीं होते।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका ,
कह के सच हम दुखी नहीं होते।

जो न इंसाफ दे सकें हमको ,
पंच वो पंच ही नहीं होते।

सोचना जब कभी लिखो " तनहा " ,
फैसले आखिरी नहीं होते। 

         इक और है जो खुद हमने बनाया है इक निज़ाम खुद अपना अपनाया है वो कुछ नहीं बस हमारा साया है मगर ये साया शाम का बढ़ता साया है इंसान से लंबा उसका साया है। सांसद विधायक हमने बनाया है हमको डराता है बहुत दूर बच के रहते हैं चेहरा नहीं नक़ाब लगाया है देशभक्ति का गीत गाकर जब सुनाया है मत कहो क्या है क्या बताया है। उनकी हर बात बात होती है दिन उनके उनकी रात होती है उनसे भला मुलाक़ात होती है कोई श्मशान है कोई बरात होती है सूखा मचाती हुई बरसात होती है। बात को मुख़्तसर बनाते हैं फिर ग़ज़ल इक उनको लेकर पढ़ते सुनते सुनाते हैं। सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा , क्या तराना है मिलकर गाते हैं। 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 
सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है। 

       झूठ ही झूठ है सच कोई नहीं देखता न दिखलाता है। इन सभी आईनों को तोड़ कर फैंक दो इन में कुछ भी दिखाई नहीं देता है इन अंधों को आईना समझ बैठे हैं लोग। चुप रहना ज़ालिम को मसीहा कहना ज़ुल्म सहकर यही किया है देश की जनता ने। अपने अधिकार मांगने से नहीं मिलते हैं छीनने पड़ते हैं सर झुकाकर नहीं उठाकर जीना होगा तभी आज़ादी का कोई मतलब होगा। झूठ को जो सच कहते हैं उनको बताना होगा हम जानते हैं सच क्या है समझाना होगा। हौंसलों को अपने फिर से आज़माना होगा झुकना नहीं टकराना होगा अपने स्वाभिमान को जगाना होगा। आस्मां को ज़मीं पर लाना होगा इक और ग़ज़ल है अपना यही तराना होगा।

   ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम तो जियेंगे शान से,
गर्दन झुकाये से नहीं।

कैसे कहें सच झूठ को ,
हम ये गज़ब करते नहीं।

दावे तेरे थोथे हैं सब ,
लोग अब यकीं करते नहीं।

राहों में तेरी बेवफा,
अब हम कदम धरते नहीं।

हम तो चलाते हैं कलम ,
शमशीर से डरते नहीं।

कहते हैं जो इक बार हम ,
उस बात से फिरते नहीं।

माना मुनासिब है मगर ,
फरियाद हम करते नहीं। 

एक रूपये की इज़्ज़त का सवाल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   एक रूपये की इज़्ज़त का सवाल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    इधर लोग अपनी इज़्ज़त की बात लाखों नहीं करोड़ों में करने लगे थे। मानहानि के दावे की रकम की कोई सीमा नहीं थी ऐसे में कोई अपनी अवमानना करने के गुनहगार को जुर्म साबित होने के बाद माफ़ी मांगने को भी कुछ दिन देकर इंतज़ार करने पर विवश होकर एक रुपया जुर्माना लगाने का निर्णय कर खुद ही अपनी वास्तविकता उजागर करता है। हालत यही है अपने अपमान को तोलने लगे तो एक रुपया भी मुमकिन है कड़ी सज़ा लगा है। दे दो दे दो बाबा को एक रुपया दे दो , ये आवाज़ नहीं सुनाई देती है , अब भिखारी भी नहीं मांगते इक दो रुपया आजकल। सच में देश में महंगाई बढ़ी होगी मगर कुछ संस्थाओं की कीमत घटकर उस जगह पहुंच गई है कि हर कोई खरीद सकता है बेचने वालों ने कमाल कर दिया है देश को कंगाल और कंगालों को मालामाल कर दिया है। मगर कोई चाहे तो इसी को दूसरी तरह से देख सकता है इक रूपये की कीमत क्या है कोई हिसाब लगाएगा कि जुर्माना लगाने पर मुकदमे पर कितना समय और पैसा खर्च हुआ। गणित का सवाल बनता है एक रूपये में हाथी बिकता है बाज़ार भाव में मगर खरीदने वाले को उसको रखने पर लाखों खर्च करने पड़ते हैं तो कितने हाथी कोई महल में रख सकता है। लेकिन शायद ये घोषित किया जाना ज़रूरी है कि हर कोई किसी की आबरू को एक रूपये में तार तार नहीं कर सकता है सामने के पलड़े में तराज़ू पर एक रुपया किस की जेब से आएगा ये भी विचार किया गया होगा। ये इंसाफ़ का तराज़ू है मगर उसके तोलने के बाट बदलते रहते हैं माथा देख का तिलक लगाने जैसी बात है। 

     कॉमेडी शो ऐसी जगह है जहां मज़ाक मज़ाक में किसी की भी ऐसी की तैसी की जा सकती है मगर कहते हैं हंसना हंसाना आसान नहीं है हंसाना बड़ी अच्छी आदत है मगर किसी और को हंसाने में खुद अपना ही मज़ाक बनाना पड़ता है। आमदनी की बात बहुत होती है हर एपिसोड की कीमत करोड़ों में आंकते हैं और आने जाने वाले से एक करोड़ दे दो ना कहकर भीख भी करोड़ रूपये की मांगते हैं। रुपया डॉलर के सामने कितना भी नीचे गिरा हो इस से अधिक नहीं गिर सकता कि किसी की इज़्ज़त की सज़ा एक रुपया होने तक पहुंच जाये। न जाने क्यों मुझे इक पुरानी गांव की कहानी जैसी बात याद आई। इक पटवारी गांव की गली से गुज़र रहे थे की गली की कुतिया उनको देख कर भौंकने लगी। पटवारी जी बोले अगर तेरे नाम भी दो बिस्वा ज़मीन लगी होती तब देखता तू मुझ पर कैसे भौंकती। पटवारी की औकात को पहचानने को खुद आपकी हैसियत होनी चाहिए तभी बड़े बूढ़े समझाते थे हर किसी की बात को महत्व नहीं देते हर ऐरे गैरे की बात से परेशान होने से अपना रुतबा घटता है। कुछ बातें सुनकर अनसुनी करना अच्छा होता है कोई आपको अपशब्द कहता है तो आपको भी अपशब्द बोलने की ज़रूरत नहीं है चांद की तरफ थूकने से अपने खुद पर थूक आती है। 

       मुझे इक घटना याद आई कुछ साल पहले इक बैंक की खिड़की पर वाऊचर भर कर देने पर इक व्यक्ति को सौ रूपये की राशि देने से इनकार किया गया मुझे लगा शायद उसके खाते में पैसे नहीं होने से ऐसा कहा है। मगर बैंक अधिकारी ने बताया कि उसके जमा खाते में छह हज़ार रूपये हैं फिर भी केवल सौ रूपये निकलवाने का अर्थ बैंक को उस भुगतान पर ही इतना खर्च आता है तभी मना किया है। ये अचरज की और अनुचित बात लगी मुझे जिस को जितनी ज़रूरत है अपने पैसे क्यों नहीं निकलवा सकता है। बात तो खुद अपनी ही रुसवाई की है फिर भी बता रहा हूं मुझे अख़बार वाले दो सौ रूपये का चैक भेजते थे और जब बैंक से निकलवाता तो कैशियर की नज़र मुझे अजीब तरह से देखते लगती थी लेकिन ये तीस साल पहले की बात है अब बात हज़ार रूपये तक की होने लगी है। मगर जाने जिस की अवमानना हुई उसको सौ रूपये पाकर कितनी राहत अनुभव होगी। इक कवि ने हास्य कविता सुनाई थी कौन बनेगा करोड़पति को लेकर। कवि जब हज़ार रूपये की राशि जीते तो अमिताभ बच्चन जी ने सवाल किया इतने पैसे का आप क्या करोगे। उन्होंने बहुत कुछ खरीदने की बात कही तो अमिताभ बच्चन जी बोले आप मज़ाक कर रहे हैं भला हज़ार रूपये में ये कैसे मिलेगा। कवि ने कहा मज़ाक की शुरुआत आपने ही की थी। ये कुछ ऐसी ही बात लगती है मज़ाक करते करते खुद अपना मज़ाक बना लिया है। रुपया हंस रहा कि रो रहा मालूम नहीं उसकी खुद की इज़्ज़त आबरू को क्या हुआ अच्छा हुआ या बुरा हुआ कुछ हुआ तो है।

    आखिर में जीवन मृत्यु फिल्म से इक ग़ज़ल के शेर की बात है। डुबोकर दूर साहिल से नज़ारा देखने वाले , लगाकर आग चुपके से तमाशा देखने वाले। तमाशा आप बनते हैं तो क्यूं हैरान होते हैं। 



Saturday, 29 August 2020

तुझे हंसना मना है जुर्म रोना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 तुझे हंसना मना है जुर्म रोना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तुझे हंसना मना है , जुर्म रोना है 
यहां औरत है क्या बस इक खिलौना है।

नई कोई कहानी लिख नहीं सकते 
तुझे फिर से ज़लीलो-खार होना है। 

समझते लोग खुद को सब फ़रिश्ते हैं 
शराफ़त बोझ तेरा तुझको ढोना है। 

मुहब्बत ढूंढना मत जाके महलों में 
नहीं उसके लिए कोई भी कोना है। 

सरे-बाज़ार बिकना तुझको आखिर है 
तुम्हारी लाश पर चांदी है सोना है। 

बताओ कोख़ हर इक पूछती सब से 
उगाये फूल कांटों का बिछौना है। 

न पूछो हाल "तनहा" क्या हमारा है 
ये आंचल आंसुओं से रोज़ धोना है।

Friday, 28 August 2020

समाज के और कानून के दोहरे मापदंड ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

 समाज के और कानून के दोहरे मापदंड ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया 

      सामाजिक आदर्श और मूल्य तथा नियम कानून व्यक्ति या लोगों की सुविधा के अनुसार नहीं होने चाहिएं। कोई जाना पहचाना नाम हो या कोई अजनबी हादिसा ख़ुदकुशी या क़त्ल होने पर विचलित हर किसी को दोनों ही सूरत में होना चाहिए मगर ऐसा लगता नहीं है। समस्या ये है कि जिस की अनुमति कानून देता है समाज उसको ख़ास वर्ग को लेकर स्वीकार करता है सामन्य वर्ग को लेकर नहीं। विशेष वर्ग ख़ास समझे जाने वाले लोग सामाजिक बंधनों की परवाह नहीं करते जब जिस से रिश्ते बनाते तोड़ते हैं यहां तक कि कोई कानून विरोधी कार्य करते हैं हथियार रखते हैं गुंडागर्दी करते हैं नशे के आदी होते हैं और बिना सोचे समझे खुले आम नग्नता का प्रदर्शन करते हैं बेहद आपत्तिजनक बेहूदा हरकते करते हैं और हम इन सभी में कोई खराबी नहीं मानते बल्कि उनके चाहने वाले होने कादम भरते हैं। हमने इक बात को भुला दिया है कि बबूल बोकर आम नहीं खा सकते हैं और अच्छे बुरे कर्मों का फल सामने आता ही है। 

    आजकल लगता है जैसे सुशांत राजपूत के साथ जो भी घटना हुई देश में किसी और से कभी नहीं होती है। सब जानते हैं रोज़ कितने लोग इस सब का शिकार होते हैं मगर उनको लेकर कोई सोचता नहीं विचलित होने की तो बात ही क्या। क्या वो लोग इंसान नहीं होते हैं और सुशांत जैसे लोग क्या वास्तव में बड़े नादान और मासूम होते हैं जिनको कोई अपने जाल में फंसा सकता है। अपनी ज़िंदगी में बहुत कुछ उन्होंने खुद अपनी मर्ज़ी से किया होगा और मुमकिन है सब उनकी चाहत के हिसाब से नहीं रहा हो। मगर हम सभी को ज़िंदगी में खट्टे मीठे अनुभव को स्वीकार करना पड़ता है। बेशक किसी की मौत के बाद उसकी निजि जीवन की बातों की चर्चा से बचना चाहिए लेकिन बिना सच सामने आये किसी और को कटघरे में खड़े करना भी उतना ही अनुचित होगा। दो लोग साथ रहते हैं अपनी मर्ज़ी से उनके बीच कितनी बातें हो सकती हैं और ऐसे रिश्ते जिस तरह बनते हैं उसी तरह बिखर भी सकते हैं। आपसी संबंध को सही बनाना दोनों पर निर्भर करता है। 

   मुझे रिया चक्रवर्ती से कोई मतलब नहीं है सुशांत की मौत या ख़ुदकुशी अगर क़त्ल हुआ तो और भी दिल को झकझोरता है ये सोच कर कि क्या प्यार मुहब्बत का ये अंजाम होना था या फिर आजकल इश्क़ मुहब्बत खेल बन गया है जब तक चाहा खेले दिल भर गया तो अलग अलग हो गए। लेकिन जब हम उनके रिश्ते की चर्चा करते हैं और किसी को दोषी मानते हैं तब क्या उन रिश्तों की भी बात सोचते हैं जो अच्छे समय और पैसे होने या ज़रूरत पड़ने पर याद आते हैं मगर खराब वक़्त में गरीबी में निराशा में किनारा कर लेते हैं। क्या आपको नहीं लगता जब किसी की ज़िंदगी में कोई परेशानी चिंता होती है तब ऐसे दोस्त वास्तव में रिश्ता निभाते तो बहुत हादिसे या अनहोनी हो ही नहीं। पर हम बड़े अजीब लोग हैं ज़िंदा इंसान को प्यार नहीं देते उसको बदहाली में छोड़ देते हैं मगर मरने के बाद उस पर फूल चढ़ाते हैं। सुशांत के अपने या दोस्त शायद पहले उसके साथ होते तो उसको रिया की चाहत की ज़रूरत नहीं होती या किसी नाते के रहने बिगड़ने से ज़िंदगी दांव पर नहीं लगती। 

    कुछ दिन बाद ये घटना भी पुरानी होकर यादों की गर्द में खो जाएगी और हम शायद सोचेंगे भी नहीं कि उस का अंजाम क्या हुआ कोई मुजरिम साबित हुआ कोई गुनहगार था कोई जुर्म किसने किया। जाने कितने मुकदमे सही अंजाम तक पहुंचते नहीं कभी। पुलिस न्याय व्यवस्था की बात सब जानते हैं पैसे और ताकत रसूख से क्या नहीं होता है अभी भी सामने है कि परिवार की ताकत और पहचान कितना महत्व रखती है। लेकिन समाज को आपको मुझे सभी को क्या इस घटना दुर्घटना या हादिसे से कोई सबक मिलता है सोचा नहीं होगा। आपको अच्छे लोगों की संगत और दोस्ती हमेशा रखनी चाहिए और खराब लोगों से हमेशा बचकर रहना चाहिए। मगर सच उल्टा है हर कोई शोहरत दौलत के पीछे भागता है जाने माने लोग अभिनेता खिलाड़ी राजनेता अधिकारी कितने बदचलन हों हम जानते हुए भी उनसे करीब होने को व्याकुल रहते हैं उनसे बचना तो दूर की बात है। हमने क्या सीखा है धर्म नैतिकता की बातों से क्या यही कि बुराई नफरत करने की जगह हम किसी को बुरा साबित करने को तर्क घड़ते हैं खराब व्यक्ति से मतलब आने पर रिश्ते बनाने की बात करते हैं।








Wednesday, 26 August 2020

ज़िंदगी मिली अजनबी सी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      ज़िंदगी मिली अजनबी सी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मिली ज़िंदगी फिर भी मिलती नहीं 
दूर रहती कभी पास आती ही नहीं

कुछ ख़राबी नहीं अच्छी लगती नहीं 
जैसी हम सोचते हैं वैसी होती नहीं। 

जिन्हें महफ़िल की चाहत अकेले हैं 
एक हम हैं जो तन्हाई अपनी नहीं 

कोई अपना सा कहीं मिलता कभी 
वरना तन्हाइयां हमको खलती नहीं। 

फ़ासले भी नहीं करीबी अजीब है ये 
कुछ कहते नहीं कुछ भी सुनते नहीं

दो किनारे हैं बहती इक नदी बीच में 
चलती रहती कहीं भी ठहरती नहीं। 

जानते नहीं कोई भी अजनबी नहीं
मिला हमको वो कम भी तो है नहीं 

जीने को जीते हैं जीते मगर हम नहीं 
ख़ुशी ज़िंदगी नहीं कोई ग़म भी नहीं। 

ग़ज़ल कविता नहीं और कहानी नहीं
प्यास बाक़ी नहीं मिलता पानी नहीं 

कौन समझे ख़ामोशी की दास्तां को 
जो नहीं समझे उसको सुनानी नहीं।


   







Tuesday, 25 August 2020

शासक की परेशानी और है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     शासक की परेशानी और है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  आपको नहीं समझ आएगी उसकी चिंता उसकी परेशानी। जनता ने उसको बनाया था अपने दुःख दर्द मिटाने को मगर उसने सत्ता हासिल की थी अपनी चाहत अपनी ख़ुशी पाने को सबसे ऊंचाई पर खुद को खड़ा देखने का शौक जहां से नीचे लोग कीड़े मकोड़े लगते हैं। शासक बनकर कोई दुःख दर्द नहीं रहता न किसी के दर्द तकलीफ़ की बात अच्छी लगती है अच्छी लगती है खुद अपने मन की बात अपना गुणगान करना खुद अपने मुंह से और करवाना सभी से। चाटुकार बताते हैं लोग बड़े खुश हैं आपके शासन में सब अच्छा ही अच्छा है सावन के अंधे हैं हरियाली ही हरियाली चहुं ओर है। मगर उसको मालूम है उसके आने से कुछ भी अच्छा हुआ नहीं है लोग पहले की तरह बदहाल हैं उनकी बदहाली बढ़ती जा रही है। शासक जानता है लोग सोचते हैं उम्मीद रखते हैं सत्ता सरकार उनकी दशा को देखे समझे महसूस करे। महल में रहकर कोई फुटपाथ झौंपड़ी की व्यथा को जानना चाहता है भला शासक महल में रंगरलियां मनाते हैं कोई राजा बनकर कैसे नाखुश रह सकता है। दुःख दर्द चिंता परेशानी जनता की गरीबों की होती है सत्ता की सरकार की धनवान की चिंता परेशानी एक ही होती है जो है उस से हाथ नहीं धोना पड़े इसलिए उसको जकड़े रखना ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण काम होता है। 

    जनता को दिखाने को नकली आंसू मगरमच्छ के बहाने पड़ते हैं दिल में कुछ ज़ुबान से कुछ और कहना पड़ता है मुखौटे बदल बदल कर रहना पड़ता है। सत्ता सिंहासन के पास वस्तविक सच्ची संवेनशीलता होती ही नहीं है झूठी संवेदना जताने का आडंबर कितनी बार दोहराना पड़ता है। कभी जश्न कभी मातम मनाना पड़ता है झूठ को सच बनाना पड़ता है। मन मयूर झूमता है फिर भी खामोश उदास होकर दिखाना पड़ता है कभी सजना कभी संवरना कभी रोकर दिखाना कभी रोने की बात हो मुस्कुराना पड़ता है। दोस्त को दुश्मन दुश्मन को दोस्त बताना पड़ता है बहती गंगा में डुबकी लगाना पड़ता है ठंड लगती है और ठंडे पानी से नहाना पड़ता है उसके बाद गंदे पानी को स्वच्छ जल बतलाना पड़ता है। रोज़ को खेल तमाशा लगाना पड़ता है झूमना पड़ता है गाना पड़ता है गले पड़ा ढोल बजाना पड़ता है।

     सब कुछ हासिल कर लिया फिर भी कुछ भी नहीं मिला है अपनी तकदीर से शिकायत है दुनिया से भी गिला है। थमता नहीं है ये पुराना सिलसिला है जनता आम है कुछ पिलपिला है काटने की आरज़ू है चूसने को मिला है। दिल भरता नहीं आम खाने से उदास फिर हो जाते हैं मौसम बदल जाने से उनको आम खाने की चाहत अभी बाकी है। जनता बचा लो जान राहत अभी बाक़ी है आपको लगता है कयामत है यही उनकी मत पूछो जो हसरत अभी बाक़ी है। कयामत के बाद इक और क़यामत अभी बाक़ी है। सियासत कहती है बग़ावत अभी बाक़ी है सत्ता की आज़ादी से अदावत अभी बाक़ी है। ज़ुल्म वालों की सितम की हद नहीं होती है हर हद से गुज़रने की नुमाईश अभी बाक़ी है। ये दास्तां स्याही से नहीं लहू से लिखी है मैंने बहता है अश्क बनकर जो लहू अभी बाक़ी है। अभी बाकी है अभी बाक़ी है बहुत कुछ अभी बाक़ी है।

Sunday, 23 August 2020

हम जड़ता में जकड़े लोग ( तर्कहीन समाज ) डॉ लोक सेतिया

   हम जड़ता में जकड़े लोग ( तर्कहीन समाज ) डॉ लोक सेतिया 

          दुनिया अनुभव से सबक सीखती है और अनावश्यक अनुपयोगी अतार्किक बातों से पल्ला झाड़कर सही दिशा को भविष्य में आगे बढ़ती रहती है लेकिन हम खुद को समझदार विवेकशील आधुनिक जानकर कहने वाले लोग सदियों से अंधविश्वास और जड़ता की बेड़ियां खुद पहने वहीं ठहरे हुए हैं जहां सैंकड़ों साल पहले खड़े थे। काश हम चिंतन करते कि जिन चीज़ों का कोई हासिल नहीं है उनको खुद पर ओढ़े या लादे हुए बोझ की तरह को खुद से अलग कर वास्तविकता के धरातल पर अपने पांव जमाकर आगे बढ़ते। ज़िंदगी के सच्चे अनुभव और तजुर्बे से बढ़कर सबक कोई किताब नहीं सिखला सकती है। ईश्वर है ये विश्वास करने के बाद भी क्या भगवान और धर्म का अर्थ वही है जो हमने समझा और हमको समझाया गया इस पर विचार करना कोई बुरी या खराब बात नहीं है। सांच को आंच नहीं फिर जो सत्य है उसे सवालों से बचने घबराने की क्या ज़रूरत है और अगर कोई कहता है ये सत्य है मगर इस पर शंका नहीं की जा सकती तो फिर ऐसा सत्य सच नहीं हो सकता है कल्पना को सच मान सकते हैं सबित नहीं कर सकते हैं। जैसे हमने ख़्वाब में कुछ देखा मगर जागने पर समझ लिया कि वो सपना था वास्तविकता नहीं। कुदरत अपने ढंग से सभी को समझाती है और कुदरत की बातों को समझना भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाता है उसको नहीं समझ कर हम किसी पौराणिक कथा की तरह आंखें मिलने पर भी अपनी आंखों पर अंधविश्वास की पट्टी बांधे चलते रहते हैं और बंद आंखों से चलते चलते रास्ते पर पांव को छूने वाले हीरे जवाहरात को कंकर पत्थर समझ ठोकर लगते चलते रहते हैं। ऐसे लोग मिलने पर भी कीमती चीज़ को खो देते हैं , ये कथा पढ़ी है उसको सीखा नहीं जाना नहीं समझने की कोशिश नहीं की। 

      कोरोना क्या है उनको भी समझ नहीं आया जो समझते हैं उनको पता है दुनिया कब कैसे बनी और कुदरत के रहस्य क्या हैं। चांद पर मंगल पर जीवन की खोज कल्पना और खुद को सब कुछ करने में सक्षम समझने की नासमझी ने विचार करने नहीं दिया कि ज़रूरत किस बात की है अपनी धरती अपनी दुनिया को अच्छा बनाने की संवारने की या उसको बर्बाद करने की विनाशकारी हथियार और साज़ो-सामान बनाने की। कोरोना को मिटाने में कुछ भी काम आया नहीं आपकी विज्ञान भी बेबस और आपकी हर पद्धति नाकाफी साबित हुई अर्थात सब कुछ आपके बस में होने की बात छोड़ो कुछ भी आपके बस में नहीं है कुदरत जब चाहे आपकी औकात दिखला सकती है। सत्ता सरकार की ताकत धन दौलत शोहरत और महानता का दंभ चूर चूर हो जाता है पल भर में मगर हम झूठे अहंकारी लोग मानते ही नहीं है। कल तक जो एलोपैथिक डॉक्टर आयुर्वेद को आधुनिक विज्ञान के तराज़ू पर खरा साबित नहीं होने की बात कहते थे आज बिना किसी सबूत परख के सभी को काढ़े और देसी नुस्खे आज़माने की सलाह देते हैं ये क्या है जीत है या उनकी हार है जो उन बातों को लैब में साबित करने को कहते थे जिनको हमने हज़ार साल से उपयोग किया और अनुभव कर सही पाया है। मगर सिद्ध करने को आपकी कोई लैब सक्षम नहीं है तो वे गलत नहीं हैं इतनी बात नहीं समझी। 

  आस्था की बात करते हैं चलो बताओ किसी ईश्वर किस खुदा किस मंदिर मस्जिद मजार में कोई है जो सब करने में सक्षम है जो वहां आने वाले की मुराद पूरी करता है चलो उसी से कोरोना से बचने की बात करते हैं। सभी धर्म वालों ने मान लिया उनका भगवान खुदा देवी देवता भी कोरोना फैलने से रोक नहीं सकता है। मतलब उन जगहों पर सर्वशक्तिमान ईश्वर खुदा अल्लाह नहीं है केवल पूजा आरती ईबादत करने की जगह हैं जो कहीं भी की जा सकती है फिर आस्था के नाम पर लंबा चौड़ा कारोबार किनकी चाल है। इंसान के रहने को घर नहीं हैं और हमने इक भगवान के रहने को इतने इतने आलीशान भवन बना दिए बनाते जा रहे हैं। नहीं इसको धर्म कहना उचित नहीं है। ये आस्तिकता नास्तिकता की बात नहीं है मानवता की बात है हमने इंसान और इंसानियत को नहीं समझा और कुछ लोगों के स्वार्थ के कारोबार को धर्म समझते रहे हैं। आज कोई धर्मगुरु कोई साधु संत कोई खुद को मसीहा कहने वाला आपके किसी काम नहीं आया तब भी उनकी वास्तविकता को समझे बिना हम उनकी महिमा का गुणगान करते हैं तो हमसे अधिक नासमझ कौन है। अब अगर कोरोना से हमको विवेक से सोच समझ कर इतना भी सबक मिलता है सीखने को तो शायद हम भविष्य में वास्तविक ढंग से आगे बढ़ सकते हैं अपनी जड़ता और अंधविश्वास की बेड़ियां छुड़वाकर।

Friday, 21 August 2020

काला धन से कोरोना तक ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   काला धन से कोरोना तक ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

        बात दो राक्षसों की कहानी की है कहानी की शुरुआत कुछ साल पहले हुई। हर तरफ काला धन की चर्चा थी ये कोई दैत्य था जो देवताओं की नगरी में भेस बदल कर निवास करता था। कोई उसकी सही पहचान नहीं बता सकता था मगर देश की जनता को उस नाम के राक्षस का डर दिखला कर राजनीति की पायदान पर कितने लोग चढ़ते रहते थे। ऐसे में उसने आकर काला धन को पकड़ने और उसकी बिरयानी बनाकर हर देशवासी को बांटने की घोषणा कर दी थी। सब के मुंह में पानी आ गया था बात लाखों रूपये बैंक खाते में जमा होने की जो थी। काला धन नाम के राक्षस को मिटाने को उसने बहुत कुछ किया और इस तरह से किया कि लोग बस करो बस करो कहने लगे। मगर उसने ठानी थी काला धन को सफ़ेद बनाने की और अपनी तिजोरी भरने की। खेल खेलता रहा खेलने के नियम अपनी साहूलियत से बदलते रहे लेकिन काला धन किसी को मिला नहीं बस उसने काला धन नाम के दैत्य को अपने बस में कर अपनी कैद में बंद कर लिया और उसका रंग रूप बदल कर खूबसूरत बना लिया।

         उसको अपने मन की बात अच्छी लगती है मनमानी करता है। खेलना उसको पसंद है और उसकी मर्ज़ी है चाहे जिस से खेले दिल से भावनाओं से या नये नये ढंग से अपने खेल अपने मैदान अपने नियम बना कर। उसके पास शोले फिल्म वाला सिक्का है जिस में दोनों तरफ उसकी जीत तय है जो वो मांगता है दोनों तरफ वही अंकित है अभी तक कोई समझ नहीं पाया हर बार हर जगह उसकी जीत का अर्थ क्या है। अपने काला धन की तिजोरी से उसने विदेश से इक नया खिलौना मंगवा लिया कोरोना नाम का दैत्य की शक़्ल वाला। खबर सभी को पता चली और लोग भयभीत होने लगे इस आधुनिक राक्षस के नाम से। मगर उसने सबको कह दिया मुझे इस को बस में करना आता है चिंता मत करो जीत मेरी पक्की है। खेल शुरू हो गया खिलौना उसके हाथ नहीं आता था बस उसने सोच लिया ये कोरोना नाम का खिलौना क्या है मुझसे कभी कोई किसी खेल में जीता है न जीतने दूंगा किसी को। साम दाम दंड भेद हर नीति अपनाना आता है मगर मामला काला धन जैसा साफ नहीं था कोरोना को होना है नहीं होना है कुछ समझ नहीं आया मगर उसने भी खेल को समझा न सामने वाले खिलाड़ी को हराने का दम भरने लगे।

  कोरोना हंसता उसकी नासमझी की बातों पर , ताली बजाओ थाली बजाओ अंधेरा करने के बाद टोर्च जलाओ जैसे काम देख उसको लगता मनसिक संतुलन बिगड़ गया है। कोरोना की चाल उसको समझ नहीं आती थी कभी सबको घर में बंद कभी खुद और ख़ास लोगों को सब करने की आज़ादी कभी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बंद कभी मंदिर में पूजा पाठ कभी इधर कभी उधर। फिर सब बंद से सब खोलने तक की नादानी की की कसरत और सत्ता का गंदा खेल खेलने की आज़ादी। कोरोना को मनाने की कोशिश करते हुई समझौता वार्ता में उसको दिन भर की छूट देने की बात मगर वो भी ज़िद पर अड़ा रहा कोई बात मंज़ूर नहीं की। सप्ताह में इक दिन की दो दिन की छुट्टी भी कोरोना को स्वीकार नहीं हुई। उसने कितनी बार टीवी पर जनता से बात की और समझाया कि कोरोना को अवसर समझना चाहिए हमको इस से अपनी अर्थव्यवस्था को ठीक करने को उपयोग करना होगा। बस किसी ढंग से कोरोना अपनी जकड़ पकड़ में आये तो सही फिर उसको दुनिया भर को महंगे ऊंचे दाम पर बेचकर मालामाल होना तय है।

   देश नहीं बिकने देना की बात कहते कहते देश में जो भी नज़र आया उसको बेच दिया ये उसकी मॉडलिंग का करिश्मा ही है जो चाय से लेकर कुछ भी बेच सकता है। खरीदार मिलना चाहिए हर चीज़ बिकती है नेता क्या अभिनेता क्या अदालत क्या सियासत क्या ईबादत क्या तिजारत क्या कोरोना क्या हिफाज़त क्या। गांधी जी ने सत्य पर शोध किया जनाब ने झूठ पर शोध करने का कीर्तिमान स्थापित किया है। काला धन वाला राक्षस और कोरोना वाला महाराक्षस दोनों की नस्ल झूठ वाली है उनकी असलियत कोई नहीं जान पाया कोई जानना भी नहीं चाहता है।  

क्या इसी को जीना कहते हैं ( चिंतन मनन ) डॉ लोक सेतिया

  क्या इसी को जीना कहते हैं ( चिंतन मनन ) डॉ लोक सेतिया 

     जीने की हसरत ही दिल में रह जाती है दुनिया ने पहले से तय किया हुआ है आपको कब कब क्या क्या कैसे कैसे करना है। जन्म लेने से पहले और मरने के बाद तक भी उनके नियम पालन करने होते हैं अन्यथा जीते जी ज़िंदगी और मौत के बाद आपकी मिट्टी तक को बख़्शते नहीं लोग। क्या नहीं करना क्यों नहीं करना जैसे सवाल हैं मगर सवाल करने का अधिकार नहीं है क्योंकि सवाल हैं जवाब हैं ही नहीं। जैसे कोई सरकार नियम बनाती है लेकिन क्यों बनाये खुद उसको नहीं पता होता बस उसको शासन चलाना है तो नियम बनाना कानून लागू करना उसका हक है। ठीक इसी तरह लोग दोस्त माता पिता नाते रिश्तेदार पत्नी पति बच्चे सभी आपको नसीहत देते हैं ऐसे अच्छा है ऐसे अच्छा नहीं है। सोना जागना उठना बैठना चलना फिरना खाना पीना और कब कब क्या करना सब उनकी सुविधा है आपकी मर्ज़ी या ज़रूरत कोई मायने नहीं रखती। पल पल रात दिन बंधन ही बंधन हैं आपको ज़िंदा रहना है जीना नहीं है। और तो और धर्म वालों ने आपको बंदी बना लिया है भगवान से आदमी का रिश्ता क्या है ये भी भगवान इंसान की आपस की बात नहीं उनकी इच्छा से है भगवान के पास पूजा अर्चना बंदगी से दुआ और शिकायत हर बात में बीच में खड़े हैं कुछ लोग आपको भयभीत करते हुए अपने ही विधाता अपने ख़ुदा ईश्वर से। भगवान ने उन्हीं को ऐसा करने का आदेश क्यों दिया जब खुद वो हर किसी को आदेश दे सकता है उसकी मर्ज़ी बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो उसे किसी सहायक की ज़रूरत क्या थी। 

   भैतिक वस्तुओं में ऐशो आराम में सुख सुविधा के साधन में वास्तविक ख़ुशी मिलती नहीं चैन नहीं मिलता चाहे जितना जोड़ते जाओ और जिस में शांति मिले उस मार्ग पर आपको कोई नहीं जाने देता है। दुनिया के रास्ते से अलग कोई राह चलने लगे तो हंगामा खड़ा कर देते हैं आपको हज़ार इल्ज़ाम सहने पड़ते हैं नास्तिक पागल दीवाना घोषित किया जाता है। आपकी दशा ऐसी है जैसे आप घोड़े पर सवार हैं फिर भी आपके सर पर भारी बोझ की गठड़ी रहती है मूर्खताओं को समझदारी का नाम देती है ये दुनिया। इधर सोशल मीडिया पर हर कोई उपदेशक बनकर दोस्ती रिश्ते और जाने क्या क्या संदेश भेजकर आपको रोज़ इक दुविधा में डालने की बात करता है। कभी खुद को कटघरे में खड़ा पाते हैं कभी सब ज़माने वाले आपको मुजरिम नज़र आते हैं। आओ मिलकर समझते हैं समझाते हैं अपने सर से बोझ की गठड़ी हटाते हैं। ज़िंदगी का गीत अपने खुद के स्वर में गाते हैं छोड़ सब पुरानी कहानियों को नई कथा बनाते हैं। दुनिया में हम सभी आते हैं जीवन बिताते हैं चले जाते हैं शायद जीना चाहते हैं जी नहीं पाते हैं।

   जन्म कोई माता पिता की मर्ज़ी से नहीं होता है ईश्वर है कुदरत है या जो भी चलन है कहीं कोई और है जो निर्णय करता है। आपको लगता है किसी परिवार में जन्म खुशनसीबी या बदनसीबी होता है तो सही नहीं है क्योंकि जो उसकी मर्ज़ी है वही सबसे अच्छा है। विधाता ने जन्म देते समय कोई भी विधि अपने विधान की बताई नहीं है आपको क्या करना है कैसे करना है सब खुद जन्म लेने वाले पर छोड़ा है। हर किसी को सोचने समझने और अच्छाई बुराई समझने को दिल दिमाग़ और सब करने को तन बदन मन और विवेक एक समान दिया है। क्यों कोई माता पिता संतान को अपनी सोच अपनी मर्ज़ी खुदगर्ज़ी से बनाना चाहता है। और बड़े होकर किसलिए संतान अपने माता पिता से गिला शिकवा रखती है जो चाहते बच्चे उनको नहीं मिला। उनको जो उचित लगा उन्होंने किया आपको जो उचित लगता है करना चाहिए कोई किसी पर एहसान नहीं करता है कोई बोझ नहीं कोई वरदान नहीं है इक सामाजिक तानाबाना है जिसको और अच्छा बनाना है ख़ुशी से मन से मज़बूरी से कदापि नहीं। हर कोई क्यों किसी को बदलना चाहता है जो जैसा है उसे खुद निर्णय करने दो उसको खुद को अच्छा इंसान अच्छा पिता माता या संतान अथवा पति या पत्नी किस तरह बनना है।

    कुदरत ने किसी को शासक नहीं बनाया न किसी को गुलाम और कोई भी बड़ा छोटा नहीं है हर कोई अपनी तरह से समझदार है काबिल है। नासमझ वो हैं जिनको बाकी लोग पसंद नहीं आते खराब लगते हैं क्योंकि हम सभी को जिस किसी ने बनाया है जैसा बनाया ठीक बनाया है। वास्तव में दुनिया को बर्बाद उन्हीं लोगों ने किया है जो चाहते हैं दुनिया जैसी उनको अच्छी लगती है वैसी बन जाये। कुदरत और ईश्वर ने दुनिया को रंगीन बनाया है कोई क्यों उसको अपनी मर्ज़ी के किसी रंग में रंगना चाहता है। हम क्या हवा पानी मिट्टी पेड़ पौधों को बदलना चाहते हैं पक्षी जानवर सभी अपनी अपनी तरह के हैं कोई किसी को बदलने की कोशिश नहीं करता है। आदमी खुद को सबसे समझदार मानता है और चाहता है हर चीज़ को बदलना लेकिन बदलने का ढंग निर्माण का हो सकता है विनाश का नहीं होना चाहिए। खुद को सबसे अच्छा महान ताकतवर या रईस बनाने की कोशिश ने दुनिया को अशांत और असुरक्षित बनाने का काम किया है। जब आप मौत का सामान इकट्ठा करते हैं तब जीने की बात कैसे हो सकती है।

Sunday, 16 August 2020

अपना नहीं है बेगाना है , देश मुसाफिरखाना है ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

    अपना नहीं है बेगाना है , देश मुसाफिरखाना है ( अजब-ग़ज़ब ) 

                                       डॉ लोक सेतिया 

    दो तरह के लोग हैं पहले जो लूटते हैं और बाकी दूसरे जो लूटने की आरज़ू रखते हैं। सभी को पाने की हवस है किसी के पास मुझे देने को कुछ भी नहीं है। जैसे कोई पुरानी हवेली जिसका रखवाला कोई नहीं है जिसे भी जो दिखाई देता है जो भी हाथ लगता है उठाकर ले जाता है। सत्ता वाले सरकार कहलाने वाले बनाने की बात कहते हैं बनाते नहीं जो बनाया हुआ है उसको बर्बाद करते हैं मेरी बुनियाद को ही उखाड़ने लगते हैं। मेरी बर्बादी को देख कर कोई हैरान परेशान नहीं होता है फ़रिश्ते ही फ़रिश्ते हैं मगर कोई इंसान नहीं होता है। बस दीवारें हैं खिड़की नहीं दरवाज़ा नहीं और कोई आजकल रौशनदान नहीं होता है। मुसाफ़िर आते जाते हैं मगर उजड़े मुसाफ़िरख़ाने में ठहरने को मुसाफ़िर के कोई सामान नहीं होता है। हर कोई कहता है मुझे तुझसे मुहब्बत है भला मुझको शिकायत की ज़रूरत है। समझ आती नहीं किसकी कैसी ये चाहत है मुझे बर्बाद मत करना बस इतनी सी मेरी हसरत है। हज़ारों साल से तकदीर ने मुझको रुलाया है कभी उसने कभी इसने गुलाम मुझको बनाया है। कोई गांधी कोई सुभाष भगत सिंह कोई बिसमिल मुझे छुड़ाकर जंज़ीरों से बस ऐसे दीवानों ने हंसाया है। मगर उनको बताये कौन अब ज़माना जो आया है आंसू खून के मुझे रुलाया है सताया है।

       कहावत है कि इतिहास की नज़रों ने वो मंज़र भी देखा है लम्हों ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई। किसी देशभक्त नेता ने अपने दल के किसी नेता के दंगे करवाने के अपराध को अनदेखा किया था बस उसको नसीहत दे दी थी राजधर्म निभाने की खुद अपना राजधर्म निभाते तो अच्छा था। बस इक परंपरा चलती रही अपनों के सभी गुनाह माफ़ करने की और समाज अपराध की ऐसी दलदल में डूबता जा रहा है कि बचाने वाला कोई भी नहीं है। उनकी अकेले की बात लाखों लोगों को ऐसी समझ आई कि देश से बढ़कर लोग व्यक्ति की आराधना करने लगे हैं। सबकी आंखों पर पट्टी बंधी है झूठ को सच कहते हैं सच को देखते नहीं हैं जानकर भी। कोई नेता अधिकारी जब किसी चोर को रिश्वत लेकर छोड़ता है तो उसे बढ़ावा देकर डाकू लुटेरा ही नहीं खुद अपने भी कातिल बनाने का अपराध करता है। जब कोई गुनहगार मुठभेड़ में मारा जाता है तब भी ऐसे गुनहगार बनाने वाले अपना काम करते रहते हैं। लोग भी अपनी पहचान वाले दोस्त अथवा रिश्तेदार के गुनाहों में उनका बचाव करते हुए साथ नहीं देते बल्कि उनकी ज़िंदगी को बर्बाद करने में भागीदार बनते हैं। हमारे ऐसे गुनाहों का कोई तो हिसाब कहीं पूछेगा अवश्व अन्यथा फिर दुनिया में कोई भगवान नहीं है।

        भगवान के मंदिर बनाने की बात याद आई तो विचार किया क्या मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरिजाघर सदभावना से बनाये जाते हैं या फिर कोई लड़ाई लड़ कर इस बात का अहंकार रखते हुए धर्म स्थल की आधारशिला रखते हैं कि हमने जीत कर हासिल किया है ये अधिकार। कहते हैं कोई विजय पराजय से भी बुरी होती है अगर जीते हों जोड़ तोड़ साम दाम दंड भेद से या किसी भी अनैतिक तरीके से। हम जो भी चाहे इमारत को कह सकते हैं लेकिन ईश्वर कहां रहते हैं किस जगह निवास करते हैं उनकी मर्ज़ी है। भगवान किसी के बंधक नहीं हैं। भगवान कण कण में रहते हैं और भगवान एक ही हैं आपने ईश्वर को समझा नहीं पहचाना नहीं और उसके रंग रूप वेशभूषा से मान लिया कोई भगवान  किस का है जो आपके अनुसार नहीं दिखाई देता उसको भगवान नहीं मानकर बाहर निकाल दिया। आप धोती कुर्ता पहनते हैं कभी कोट पैंट या जीन शर्ट डाल ली तो आपके बच्चे आपको घर से बाहर निकाल सकते हैं क्योंकि आपका लिबास बदला हुआ है। आखिरी सबक सभी समझते हैं जानते हैं मां से बढ़कर भगवान भी नहीं है कोई इंसान या चाहने वाला या कोई भी आपका सहायक उस से बढ़कर नहीं हो सकता है। अपने देश की जन्मभूमि को माता कहते हैं मानते हैं उसकी जय बोलते हैं। मां के सभी बेटे बेटियां इक समान हैं जो बच्चे अपने ही भाई बहनों देशवासियों से प्यार नहीं करता उनसे कोई माता खुश नहीं हो सकती है। और हर धर्म बताता है अपनी माता को दुःख देने वाले से भगवान कभी खुश नहीं हो सकते हैं। मां के चरणों में स्वर्ग है जन्नत है।

    आपको घर से लगाव प्यार हो तो आपको घर में रहने वालों से मुहब्बत होती है लेकिन जिनको घर भी मुसाफिरखाना लगता है उनको अपने मतलब अपने सुख सुविधाओं से सरोकार होता है। ऐसे लोग घर में रहते हैं उसको सजाते संवारते नहीं उपयोग करते हैं। घर से लगाव प्यार होता है तो घर का सामन बेचते नहीं बनाया करते हैं पुरखों की बनाई चीज़ों को संभाल कर रखते हैं तोड़ते फोड़ते नहीं कभी भी। देश को कुछ लोगों ने सराय समझ लिया है लगता है।

Friday, 14 August 2020

कैद रहकर जश्न-ए-आज़ादी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   कैद रहकर जश्न-ए-आज़ादी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे , कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे। ग़ुलामी को बरकत समझने लगें , असीरों को ऐसी रिहाई न दे। शायर बशीर बद्र जी की ग़ज़ल याद आई। बंदी रहने को ख़ुशी समझने लग जाएं कैदियों को ऐसी रिहाई मत देना। मौजूदा सूरत ए हाल कुछ इसी तरह की बन गई है आज़ादी भी बंद कमरे के घर में मनाना चाहते हैं लोग। जाने ये जश्न है या कुछ और है इक अनहोनी का भय कोरोना का। कोई भी समारोह ख़ुशी का दिल में अनजाना डर लेकर आयोजित करना विवशता हो सकता है। अभी राहत इंदौरी जी का निधन हुआ तो सोशल मीडिया से लेकर हर जगह उनकी चर्चा हुई और लगा कि अदब वालों की अहमियत आज भी बरकरार है। लेकिन चार साल पहले शायर निदा फ़ाज़ली जी का निधन जैसे बड़ी ख़ामोशी से हुआ कोई चर्चा नहीं हुई टीवी अख़बार सोशल मीडिया सब चुप थे। मुझे दोनों ही शायर बेहद पसंद हैं मगर जो सच है वो भी अपनी जगह है कि निदा फ़ाज़ली की शायरी की गहराई और ऊंचाई बेमिसाल है। जिनको ग़ज़ल और ग़ज़लियत की समझ है उनको पता है ग़ज़ल की रिवायत सीधे सपाट बात कहना नहीं बल्कि मुहावरेदार भाषा में समझाना होता है। शायद निदा फ़ाज़ली जी का सबसे लाजवाब शेर ही उनको शोहरत की बुलंदी पर होने के बावजूद भी गुमनाम मौत देने की वजह बन गया। शेर पढ़ते हैं।

                   घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें ,

                     किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये। 

   राजनीति ने तो कब से शर्म लिहाज़ का घूंघट उतार दिया है। अब तो नासमझ लोग सच को समझे बिना सत्ता के विरोधी को अपशब्द कहने से लेकर पाकिस्तान भेजने की बात कहते हैं। ये उनकी किसी राजनीतिक दल या नेता की चाटुकारिता देश भक्ति नहीं हो सकती है। मगर उनको कुछ लोगों ने धर्म और देशभक्ति की उल्टी परिभाषा पढ़वा दी है जो अपने देश के लोगों से नफरत की भाषा में व्यवहार करते हैं। शायद उनको लोकतंत्र में असहमति होने का अर्थ नहीं पता अन्यथा जिनकी आज महिमा का बखान करते हैं क्या वो पहले पिछली सरकार नेताओं की आलोचना नहीं करते थे। अगर आपकी हमारी विचार अभिव्यक्त करने की आज़ादी ही खतरे में है तो जश्न किस बात का है। कोई उनसे पूछे क्या देशभक्ति की परिभाषा में जो विदेशी शासकों की मुखबरी करते थे और आज़ादी के दीवानों को पकड़वाते थे या अंग्रेज़ों को माफीनामे लिख देते थे और आज़ादी के भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध करते हुए कहते थे जितनी आज़ादी मिली हुई है अंग्रेजी हुकूमत से बहुत है उनके आचरण को देशभकि कहते हैं।

    बशीर बद्र जी की ग़ज़ल का शेर है। गुनहगार समझेगी दुनिया तुझे , अब इतनी ज़्यादा सफाई न दे। जिनको देशभक्ति और व्यक्तिपूजा का अंतर नहीं पता उनकी बात पर सफाई देना ज़रूरी नहीं है।  कुछ ऐसा सोचकर उनकी बात दोहराने की कोशिश कर रहा हूं। क्यों न इस बार जश्न ए आज़ादी ऐसे मनाया जाये , देश की लुटती विरासत को लुटेरों से बचाया जाये। क्या है आज़ादी क्या होती है ग़ुलामी जानते नहीं जो लोग , उनको समझाने को अर्थ इतिहास दोहराया जाये। किसी रहजन को रहबर मत समझ लेना कभी भूले से , शहीदे आज़म भगत सिंह की डायरी को पढ़ के सुनाया जाये। सियासतदान बदलने से नहीं बदलेगी सियासत देश की , काठ की हांड़ी को नहीं बारम्बार चढ़ाया जाये।

  आज़ादी चाहिए थी भूख से गरीबी से भेदभाव बढ़ाने वाली गंदी राजनीति से असमानता की बढ़ती हुई खाई को मिटाना था। हमने स्वराज को लाना था विदेशी को बाहर भगाना था मगर हमने राह वो चुनी जिस राह नहीं जाना था लूटने वालों को खुद घर नहीं बुलाना था। झूठ का गुणगान नहीं करना था सच को बचाना था , अपने हौंसलों से नया भारत खुद बसाना था। हमको सभी राजनेताओं ने भटकाया है सबको अपना अपना मतलब नज़र आया है। कब यहां आम लोग जश्न मनाते हैं ख़ास लोग कहने को झूठी देशभक्ति की कसम खाते हैं। देश सेवा के नाम पर उनकी मौज मस्ती है उनकी जान महंगी है जनता की जान सस्ती है। जिनके चेहरे पर आज़ादी की मस्ती छाई है , उसी ने ही जंज़ीरें जनता को पहनाई हैं। ये न पूरी है न ही अधूरी है आधी है , कैद में कैसी ये जश्न -ए -आज़ादी है। 

Thursday, 13 August 2020

आत्मनिर्भरता की पढ़ लो पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 आत्मनिर्भरता की पढ़ लो पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       शहंशाह का मूड आज बदला बदला है आज खास बैठक में बात आत्मनिर्भर बनाने की है। शुरुआत करते हुए बोले कि कितना अच्छा है जो कभी सोचा नहीं था कोरोना के लॉक डाउन ने करवा दिया है। जो पुरुष घर के काम को आसान समझते थे खुद करना पड़ा तो होश ठिकाने आ गए। जिन महिलाओं ने खुद अपने हाथ से चाय क्या पानी का गलास नहीं उठाया था पकोड़े बनाना उनको आ गया। देश के आत्मनिर्भर बनने की ओर ये पहला कदम है। सभी समझते हैं शादी विवाह ज़रूरी है कोई भी घर और बाहर दोनों जगह एक साथ काम नहीं कर सकता है। पति पत्नी दोनों इक दूजे की ज़रूरत हैं मुहब्बत नहीं मज़बूरी है बस यही गलत है इस आधुनिक युग में कोई किसी पर निर्भर क्यों रहे। मेरे परिवार ने भी मुझे आत्मनिर्भर बनाने की जगह मेरा विवाह रचाया था और मुझे उसी जाल में फंसाया था जिसको परंपरा समझ बनवाया था। मगर जैसे ही मुझे समझ आया था मेरे मन का पंछी पिंजरा छोड़ आया था। रसोई का काम मुझे भी नहीं भाया था मगर मैंने आत्मनिर्भर होने का अपना ढंग अपनाया था। तीस साल तक मैंने कहीं कोई चूल्हा नहीं जलाया था भीख मांग कर खाया था और स्वयं सेवक कहलाया था। मुफ्त का माल खाकर बड़ा मज़ा आया था इस से अच्छा कोई कारोबार नहीं है दुनिया भर को समझाया था। 

     देश की शिक्षा नीति को बदलना ज़रूरी है सभी को सब सीखना करना ज़रूरी है। मेरी बात और है मेरी शिक्षा में पढ़ना लाज़मी नहीं उपदेश करना ज़रूरी है। नवयुवकों को खुद खाना बनाना सीखना होगा उसके बाद गंभीरता से सोचना होगा बंधन में बंधना है या आज़ाद रहना है आप सभी घर परिवार वाले हैं कहो जो भी कहना है। शादी का लड्डू सभी खाते हैं कुछ खाकर कुछ बिना खाये पछताते हैं मैंने भी ये लड्डू खाया था किसी को खिलाया किसी का भोग लगाया था। मगर मुझे उसका स्वाद समझ नहीं आया था दिल में कुछ ज़ुबान पर कुछ करना था कर नहीं पाया था सच सोचकर ही ये बात घबराया था जब उसने जन्म जन्म के बंधन का अर्थ समझाया था। कोई बात थी दिल उकताया था मैं भाग आया था। शादीशुदा ज़िंदगी अनसुलझी कोई पहेली है आपका कोई दोस्त है आपकी कोई सहेली है जिस किसी ने आपको ये राह बताई है मत पूछो किस जन्म की दुश्मनी निभाई है। शादी वो इम्तिहान है जिसमें कोई भी पास नहीं होता है ज़ीरो नंबर मिलने से बढ़कर कोई एहसास नहीं होता। हमने शिक्षा नीति में शादी का विषय शामिल किया है सोलह अध्याय की किताब लिखवाई है लेखक किसी का साला नहीं है जीजा है न बहनोई और न किसी का सगा या सौतेला भाई है। बस इकलौता है और घरजवाई है नहीं कोई ननद न कोई भोजाई है सास ससुर शहद हैं दुल्हन रसमलाई है। सबने झूठी कोई कसम भी खाई है छाछ है कौन कौन मक्खन कौन दूध मलाई है।

  पहले अध्याय में गहराई है ऊंचाई है शादी की परंपरा कब किसने क्यों बनाई है। जाने किसने बेमेल जोड़ी बनाई है एक बकरा है एक कसाई है बारात है दूल्हा दुल्हन बजती शहनाई है। उलझन है हर किसी ने उलझन उलझाई है हर कोई कहता है तू बड़ा हरजाई है। भला कौन किसको खिलाता है हर कोई अपने नसीब का खाता है विधाता ही दाता है दुनिया भिखारी है कानून कितने हैं समाज के नियम हैं अदालत सरकारी है। ज़रा सी देर में अविवाहित विहाहित बन जाता है उसके बाद कोई रास्ता उधर नहीं जाता है। मुझे बस यही समझ आया है झूठे सभी बंधन झूठी मोह माया है। शादी से परेशान हैं भविष्य से अनजान हैं क्या किया क्यों किया सोचकर हैरान हैं। अलग होने का पूछते रास्ता बताओ अगर ज़रूरत है पास मेरे आओ तलाक की बात छोड़ो बंधन को तोड़ो भाग जाओ भूलकर फिर से नहीं शादी रचाओ जिओ उसको भी जीने दो का रास्ता आज़माओ। आत्मनिर्भरता की पढ़ना पढ़ाई उसके बाद सोचना क्यों करनी शादी क्यों करनी सगाई। मुझे देख लो मैं विवाहित नहीं न ही कुंवारा मुझे चाहिए क्यों किसी का सहारा। मैं ये बाज़ी खेला इस तरह से नहीं जीत पाया मगर नहीं फिर भी हारा। हर कश्ती को मिलता नहीं है किनारा नहीं सबको मांझी ने पार लगाया। ये दरिया है डूबकर पार कर लो मौत को ज़िंदगी मत समझना इसे छोड़ कोई और कारोबार कर लो।

 सरकार विवाह कानून में बदलाव करने पर विचार कर रही है। लड़के-लड़की की आयु के साथ साथ शादी की पढ़ाई विषय में पचास फीसदी अंक पाने की शर्त अनिवार्य की जा सकती है। सरकारी इश्तिहार टीवी अख़बार में नियमित दे सकते हैं कि गठबंधन करने से पहले सावधान रहना है जांच लें कि दोनों में आत्मनिर्भरता की पढ़ाई की है और शादी के विषय काअध्यन किया है अच्छे अंक मिलने वाले को ही चयन करने का सुझाव और हिदायत जारी की जाएगी। शादी विषय का अध्यन करना सभी के लिए कल्याणकारी है यही ईलाज है ऐसी बिमारी है। शादी कहते हैं खाना-आबादी है मगर कभी बन जाती ये भी बर्बादी है। पढ़नी इस की पूरी तरह से समझकर पढ़ाई है सभी की इसी में भलाई है। 

Tuesday, 11 August 2020

इक गुनहगार जैसी ज़िंदगी ( हिक़ायत ) डॉ लोक सेतिया

   इक गुनहगार जैसी ज़िंदगी ( हिक़ायत ) डॉ लोक सेतिया 

मैंने भूलना चाहा था भुलाया भी मगर भूली हुई कहानी हमेशा की तरह फिर से याद आई और मुझे तेरे मंदिर की चौखट पर ले आई चुपचाप आंसू बहाने को। कितनी बार पहले भी निराशा के घनघोर अंधेरे में चला आता रहा तेरे पास कोई और नहीं जिसको अपनी व्यथा कहता। जिनको हंसी ख़ुशी नहीं दे सका उनको अपने दर्द और बेबसी के आंसू कैसे दिखलाता उनके मन को और तकलीफ़ देने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। मैंने कभी किसी को कुछ भी नहीं दिया देना चाहा मगर दे पाया नहीं विवशता थी चाहे बदनसीबी। तुम हो भी कि नहीं हो क्या खबर लेकिन अपनी बदनसीबी का इल्ज़ाम और किसी पर कैसे धरता भला। भरोसा था कभी तो कोई उजाला होगा मेरे जीवन में पर इतनी लंबी ज़िंदगी में घना अंधेरा छोड़कर कोई सवेरा रात के बाद लेकिन मेरे जीवन में कभी किसी रात की कोई सुबह नहीं हुई। शायद कभी कभी थोड़ी रौशनी मुझे मिली भी तो जैसे मांगी हुई क़र्ज़ की तरह या उधार की अथवा चुराई हुई जिस पर मेरा हक नहीं था। मेरे हाथ खाली रहे और दामन में कांटे ही कांटे भरे हुए कोई फूल नहीं था किसी को देने क्या तुझे चढ़ाने तक को। मेरे आंसू मेरी आहें शायद तुझ पर भी कोई असर नहीं ला सकीं कभी। बस तेरे दर पर आकर रोने आंसू बहाने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता रहा और मुझे इक झूठी उम्मीद इक दिलासा मिलता रहा कि अब शायद मेरी फरियाद सुनकर तुझे रहम आएगा और मेरी परेशानियों का अंत हो जाएगा। 

     मुझे दुनिया से कोई गिला शिकवा शिकायत करने का कोई अधिकार ही नहीं था क्योंकि मैंने कभी किसी अपने की दोस्तों की आशाओं को पूरा नहीं किया था। चाहना कोशिश करना ये तो झूठे बहाने हैं अपनी हर नाकामी को छुपाने को। वास्तविकता यही है मुझसे किसी की उम्मीदें पूरी हुई नहीं कभी। हर कोई मुझे बड़ा खुशनसीब और अमीर समझता रहा जबकि मैंने हर दिन जीने को अपने दर्द आंसू और बेबसी का सौदा किया हालात से विवश होकर। भगवान मैंने कोई बहुत अधिक नहीं मांगा तुझसे बड़े छोटे छोटे सपने रहे हैं मेरे पल भर कोई हंसी ख़ुशी और जीवन में कुछ साल महीने या गिनती के दिन ऐसे जैसे कोई ख्वाब हो। मेरी मज़बूरी है तुझ पर आस्था विश्वास खोकर जीने को और कोई साहरा ही नहीं था। ये भी सच है कि मुझे आता नहीं है तुझे किसी तरह से मनाना भी जाने कैसे करते हैं तेरी पूजा आरती इबादत सभी लोग। मेरा मन भटक जाता है जब भी तेरे सामने बैठकर कोशिश की तुझे मनाने की तेरा गुणगान भजन कीर्तन करना नहीं आता है मन ही मन तुझसे अपनी बात कहना आता है अपने दुःख दर्द और अनचाहे भी बहने वाले आंसू रोकना नहीं आया मुझे तुझे भी देखना भला कैसे भाएगा जब कोई किसी को रोते बिलखते देख कर खुद को परेशान नहीं करना चाहता है। 

   कितनी बार सोचा था अपनी व्यथा कथा जीवनी लिखने को मगर लिखी गई नहीं क्योंकि दुनिया में किसी को दोष देना उचित नहीं था मुझे किसी अपने पराये से कोई शिकायत क्यों होती जब मैंने भी किसी की आशाओं को पूरा किया नहीं कभी। सभी का मुजरिम मैं रहा गुनहगार बनकर सज़ा मांगता रहा मिलती भी रही जीवन भर मुझे सज़ाएं। कभी तो तुझसे शिकवा गिला करता रहा कि तुमने मुझे दुनिया में जन्म दिया तो क्या इस तरह बेबसी भरी ज़िंदगी जीने को। कुछ तो लिखता मेरे नसीब में जो वास्तव में ज़िंदगी कहलाता। मांगना क्या है बताना किसे है तुम सभी कुछ जानते हो खुद ही समझ लो पता नहीं कितना और जीना बाकी है आखिर वक़्त ही सही चाहता हूं अपने मन के बोझ को उतार अपने सभी क़र्ज़ बकाया उधार चुकाकर तेरे पास कोई और दुनिया अगर है तेरी तो आकर इतना ज़रूर पूछूं मेरा कसूर क्या था जो इस तरह की ज़िंदगी मिली मुझे।