Friday, 22 June 2018

झूठ की किताब कितनी खूबसूरत है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    झूठ की किताब कितनी खूबसूरत है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     बस नाम बदलते हैं और तस्वीरें बदलती हैं। शाइनिंग इंडिया , भारत निर्माण , सब से अच्छा हरियाणा , जाने क्या क्या। सत्ताधारी दल के पैसा सबसे अधिक आता है इस में राज़ क्या है। अब ऐसे में जब चुनाव आने वाले होते हैं नेता लोग पुस्तक छपवाते हैं जिस में लोगों को बताया जाना होता है कि जो आपको सामने नहीं दिखाई देता लो पढ़ कर समझ लो। लोग जैसे अंधे हैं और मूर्ख तो हैं ही जो उनको इतना भी दिखाई नहीं देता कि आपकी भलाई की जा चुकी है सब समस्याओं का समाधान किया जा चुका है और थोड़ी सी कुछ कमी रही भी होगी तो अगली बार हो जायेगा सब ठीक। मैं यकीन से कह सकता हूं ये सब बातें किसी राजनेता की कलम से नहीं किसी किराये के लिखने वाले की कलम से लिखवाई गई हैं। अच्छे दिन आने वाले हैं लिखने वाला भी फ़िल्मी गीतकार निकला। झूठ कितना अच्छा लगता है आप किसी शैतान को देवता कह कर देखो। और सच नामुराद कभी मीठा होता ही नहीं स्वाद उसका। 
                   विज्ञापन का अर्थ ही यही है , जिस सामान को सही बनाया हो उसे लोग खुद ढूंढते हैं खरीदते हैं। जो वास्तव में काम का नहीं होता उसे ही बेचने को लुभाना पड़ता है। छूट और सेल या इश्तिहार यही हैं। आपको लगता है आपको फायदा हुआ मगर कमाई बेचने वाले की होती है जेब आपकी खाली होती है। आज कोई हैरान हो सकता है कि अभी भी बहुत अच्छी कंपनियों का बनाया सामान खुद बिकता है। मैं ऐसी आयुर्वेदिक कंपनियों की दवाएं खुद मंगवाता हूं बिना किसी एजेंट के आने के बावजूद भी क्योंकि उनकी गुणवत्ता और कीमत दोनों उचित हैं। उस कंपनी को इश्तिहार की ज़रूरत नहीं होती है। ऐसे ही जो अच्छे डॉक्टर होते हैं उनको अपना जन संपर्क अधिकारी और कमीशन देने का काम नहीं करना पड़ता। मिला इक न्यूरो सर्जन से जो कहने लगे वो हर दिन सात सर्जरी ही कर सकते हैं और उनके पास सप्ताह तक कोई समय नहीं है आपके रोगी को तुरंत ज़रूरत है किसी और से करवा लो। पांच लाख का लालच नहीं था क्योंकि वो पैसों की खातिर इलाज नहीं करते हैं इलाज करने के पैसे लेते हैं। इन दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है। 
              उनका दावा है वो सिफारिश पर नौकरी तबादला नहीं करते हैं। ये समझ नहीं आया कि जब किसी राज्य का मुख्य मंत्री या देश का राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति बनाना हो तब काबलियत किसी एक संस्था का सदस्य होना दिखाई देती है। कथनी और करनी में इतना विरोधभास। देश की बात दिखावे को मगर आपकी आस्था किसी दल ही नहीं किसी एक व्यक्ति में। आचरण में नहीं दिखाई देता जो भाषण में या सभाओं में कहते हैं। झूठ की दास्तान की किस किस बात की बखिया उधेड़ूं। बाहर लिबास साफ़ है भीतर मन में मैल भरा पड़ा है। लेकिन आपको इसी सहारे आगामी चुनाव लड़ना भी है और जीतना भी चाहते हैं। कहा तो ये जाता है कि काठ की हांडी बार बार चढ़ती नहीं , कौशिक कर के देख लो शायद जनता फिर मीठी बातों में आ जाये।

क्या मिलिए ऐसे लोगों से ( बात बेबात की ) डॉ लोक सेतिया

   क्या मिलिए ऐसे लोगों से ( बात बेबात की ) डॉ लोक सेतिया 

  भारत भूषण मिढा जी से फोन पर काफी बार बात हुई है। सत्ताधारी दल के नेता हैं और उनको हमेशा बताया है हरियाणा सरकार और सरकारी अधिकारीयों को लेकर। सी एम विंडो को लेकर और तमाम ऐप्स की असलियत। बहुत बार उन्हें खुद आकर मॉडल टाउन में पपीहा पार्क के पास गंदगी और आपराधिक गतिविधियों को देखने की बात हुई मगर वो कभी नहीं आये। आना मुश्किल भी था क्योंकि उनको पता था उनकी सरकार की नाकामी और तमाम स्वच्छ भारत अभियान जैसी योजनाओं की हालत सामने देख कर कोई जवाब नहीं हो सकता था देने को। आज सुबह इधर काफी सफाई की गई है और कुछ ही दिन को उनके दल के नेताओं के सहयोग से जो लोग गंदगी फैलाते हैं उनको रोका गया है केवल मुख्य मंत्री के राहगिरी कार्यक्रम में रविवार को शामिल होने की खातिर तो उनको आकर अपने दल की पुस्तिका देना संभव हुआ। मगर वास्तव में उनके पास हरियाणा सरकार के अभी तक किये कार्यों पर कोई जवाब नहीं था। चार साल में क्या अच्छा किया मुझे सामने दिखलाने को कुछ भी नहीं था न ही बता ही पाए। केवल कागज़ों पर अपना इश्तिहार बांटने तक और उसका फोटो लेने से क्या हासिल होगा। मैं नियमित मोदी सरकार और मनोहर लाल खटटर सरकार की जनविरोधी नीतियों और आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की वास्तविकता उसी तरह लिखता रहा हूं जिस तरह चालीस साल से बाकी सरकारों की आलोचना की है।  मगर ये पहली बार देखा है कि कोई सरकार जनहित की बात कहने और सच बोलने वाले को बदले की भावना से परेशान करे। हो सकता है कोई इस तरह औपचारिक बैठक को अपने दल और सरकारी नीतियों का समर्थन किया जाना बताने का झूठ बता दे मगर हमारी बात में मैंने कोई भी ऐसी बात नहीं कही न ही मिढ़ा जी ही मुझे बता ही सके। शायद उनको कोई औपचारिकता निभानी है दल को दिखाना है जन सम्पर्क किया है।  ऐसे दलगत प्रचार के इश्तिहार अच्छे दिन आने वाले हैं की तरह जुमला साबित होते हैं वोट हासिल करने को।
              कल ही इक और नेता का ब्यान पढ़ा कि खटटर जी वी आई पी कल्चर को खत्म करना चाहते हैं। उनका नंबर मिला किसी से तो सवाल किया किसे कहते हैं वी आई पी कल्चर। जो गंदगी तीन साल से हटाई नहीं गई मॉडल टाउन के निवासी हज़ार बार शिकायत करते रहे उसको सी एम के आने से तीन दिन पहले कुछ ही घंटों में साफ किया गया। इसको क्या वी आई पी कल्चर नहीं कहते। ऐसा भी नहीं कि ये सफाई बाद में भी नियमित रहेगी , ये पिछले साल भी एक दिन को हुआ था स्वच्छता अभियान पर चंडीगढ़ से अधिकारी आये थे यात्रा करते बड़ी बड़ी बसों में आरामदायक और वातानुकूलित सैर करते हुए। ये तो आम जनता के साथ भद्दा मज़ाक होता है जब ख़ास नेता या अधिकारी के आने पर साफ सफाई की जाती है। इस जगह गंदगी का कारण जो फुटपाथ पर पार्किंग की जगह को रोककर या हुड्डा के प्लॉट्स पर अवैध कब्ज़ा कर कारोबार करते हैं मगर अपनी गंदगी सड़क पर फैंकते हैं जिस से बदबू और प्रदूषित वातावरण रोग बढ़ाते हैं , उनको वी आई पी के आने पर तीन दिन को मना किया गया है ताकि मुख्य मंत्री को गंदगी दिखाई नहीं दे। जो लोग यहां बसते हैं वो इंसान नहीं हैं।
                              पार्क में जिम लगाने से लोग स्वस्थ होंगे या नहीं मगर इस गंदगी से रोग मिलता है ये सब को पता है। अगर इस जगह ये सब कार्य किया जाना उचित है तो कुछ दिन को रोकना कैसे सही है। लोगों को बताया जाता है सरकार ने जिम दिया मगर जो वास्तविक समस्याओं को हल नहीं किया उसकी बात नहीं करते सुनते। आपने कोई सेवक रखा हो और वो आपके पैसे से ही आपको कुछ दे तो उसको उपकार या मस्जिद एहसान नहीं कहोगे।  किसी भी नेता ने अपनी जेब से कोई विकास नहीं किया जो भी किया जनता के पैसे से फिर उसको बढ़ाई समझना कैसे सही है। मोदी जी और खटटर जी आपको देश की समस्याओं को हल कर दिखाना है। आप जब गिल्ली डंडा खेलते हैं ड्रम बजाते हैं नाचते झूमते हैं तो लगता है देश जल रहा है और नीरो बंसी बजा रहा है। सत्ता पाकर अपनों को रेवड़ियां पहले भी बांटते रहे हैं लोग और आज आप भी तो फिर अंतर क्या है। माफ़ करना बेपनाह अंधेरों को सुबह नहीं कह सकता , दुष्यंत कुमार की तरह सोचता हूं। ये कवि शायर लोग ऐसे ही परेशान रहते हैं सब गलत देख कर। ग़ालिब को नींद क्यों नहीं आती थी , मौत का डर नहीं था जानते थे एक दिन आनी ही है।

Thursday, 21 June 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात - कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ) भाग - 2 डॉ लोक सेतिया

               जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम 

            ( टीवी शो की बात - कुछ हक़ीक़त कुछ फ़साना ) भाग - 2 

                                      डॉ लोक सेतिया 

ज़िंदगी के क्रूसरोड्स।  अभी शुरू हुआ है सोनी टीवी पर इक शो। कुछ दिन पहले लिखा उसकी दो कहानियों को लेकर , कल रात की कहानी कुछ हटकर थी। कल इत्तेफाक से इक हास्य कविता लिखी थी सोशल मीडिया की प्यार की कहानी के अंजाम पर। सुबह सैर पर गया तो दोनों कहानियां डगमग हो गईं। पहले रात की बात। बहुत ही अच्छा परिवार पुराने ढंग से आपस में तालमेल से ख़ुशी से जीता हुआ। बेटा नौकरी करता है मगर सब कुछ पिता के हाथ में है , पूरा वेतन घर पर देता है और पिता घर पत्नी को बेटे को ज़रूरत को देता ही नहीं है बल्कि घर पर काम करने वाली महिला को बच्चों की शिक्षा की खातिर एडवांस देने की बात जब पत्नी बताती है तो इंसानियत की मिसाल बनकर पत्नी को और अधिक पैसे रखने को कहता है ताकि बाद में उस महिला के बच्चों को किताबों के लिए भी दिए जा सकें। टीवी पर अधिकतर दर्शक इन सब को शायद ही ध्यान से देख रहे थे। तभी पिता अपने बेटे की शादी की बात पत्नी से करता है और जिस लड़की की बात करता है उस में कोई कमी नहीं है पत्नी भी जानती है। बेटे को पिता सूचित करता है हमने तेरे लिए लड़की देख ली है और तारीख तय कर बता देंगे तुम अपनी पसंद से शादी का कार्ड छपवा लेना। आजकल के अधिनिक सोच वालों को पिता किसी तानाशाह से कम नहीं दिखाई देता होगा। 
      अब पत्नी की बात जो वास्तव में घर ही नहीं सब को संभालती है। बेटा अपनी मां को बताता है उसे किसी लड़की से प्यार है तीन साल से जनता है और शादी का वादा कर चुका है। मां पति से बात करती है और पहली बार शादी के तीस साल बाद कुछ मांगती है अपने बेटे की ख़ुशी। क्योंकि बेटे की इक कही हुई बात उसके दिल को छू जाती है कि मां के बाद उसके जीवन में यही महिला महत्वपूर्ण है। पति बेटे की शादी का निर्णय पत्नी पर छोड़ देता है। यहीं से इक दोराहा सामने आता है। लड़की देखने जाने पर मां का सामना जिस लड़की से होता है उसे चार साल पहले किसी अस्पताल में देख चुकी मिल चुकी है वो भी जब लड़की अपना गर्भपात करवाने आई होती है। पिता नहीं जनता बेटा भी नहीं जनता फिर भी मां उस लड़की को बहु बनाने को हामी भर देती है। टीवी स्टूडियो में बहस होने लगती है कुंवारी लड़की लड़के को लेकर। कोई कहता है हम बाहर जो कहते हैं अपने घर में स्वीकार नहीं करते। इक लड़की जिसका पिता भी बैठा है दूसरी लड़की की बात का जवाब देती है और पूछती है क्या मेरे चेहरे पर लिखा है या दिखाई देता है कि मैं कुंवारी हूं। 
        शादी के बाद लड़की चाहती है सास से अलग होकर रहना। दर्शक समझते हैं ये खराब बहु है जबकि वास्तव में किसी के लिए भी किसी ऐसी महिला के साथ रहना जो उसके अतीत के बुरे अनुभव को जानती हो हर दिन इक अपराधबोध में रहना होगा जो बेहद कठिन है। मगर बेटा नहीं चाहता घर से अलग होना। तभी इक और हादिसा होता है बहु का पहला आशिक उसको ब्लैक मेल करने को बुलाता है और आठ लाख की मांग करता है ये बात भी सास सामने उनसे छिपकर देख सुन लेती है। लोग फिर बहस में उलझे हैं और कुछ भी कह रहे हैं।  किसी और पर फैसला करते हुए हम वो नहीं होते जो खुद पर आती है तब होते हैं। बेटा अपनी मां से कहता है कि उसकी पत्नी को किसी शादी में जाना है और आपके गहने पहनना चाहती है। मां कहती है जब बहु को मेरा साथ रहना भाता नहीं तो फिर मेरे गहने भी उपयोग नहीं कर सकती उसके अपने गहने हैं वही इस्तेमाल कर सकती है। कोई नहीं जनता इस कहानी की मां का किरदार किस ऊंचाई पर होगा। वो जानती है उसे गहने किस काम को चाहिएं। बहु के फोन से उसके पुराने आशिक को मिलने को बुलाती है और अपने गहने बेच कर आठ लाख उसे देकर साफ़ कहती है कि दोबारा उस लड़की की ज़िंदगी में दखल दिया तो मैं किसी भी सीमा तक जा सकती हूं। स्टूडियो में और टीवी पर देखने वाले अभी भी ठीक से नहीं समझ सकते उस नारी को जो आज की सीता भी है और मां भवानी भी। 
       कहानी का अंत कोई कल्पना नहीं कर सकता है।  घर आने पर पति को जब पता चलता है कि पत्नी ने बैंक लॉकर से निकल गहने बेच दिए तो पूछता है किसलिए।  अगर नहीं बताया तो मतलब होगा कोई गलत काम किया है जो छुपाना है।  तब पति साफ कहता है तुम्हारा मेरा कोई रिश्ता नहीं रहेगा , हम एक साथ एक छत के नीचे रहकर भी अजनबी होंगे। ये सब सामने देख रही बहु कुछ भी नहीं बोलती मगर उसकी ख़ामोशी उसकी नज़रें सब कहती हुई लगती हैं। आपको आगे कुछ भी नहीं दिखाया जाना मगर उस सास बहु में जो रिश्ता बना है वो सब से अलग है।  इक महिला ही दूसरी महिला के दर्द को समझ सकती है बांट सकती है और इक मां अपने खुद पर तपती लू झेल कर भी बच्चों को गर्म हवा नहीं लगने देती है। किसी कहानी में किसी महिला का किरदार इससे ऊंचा नहीं हो सकता है। 
           कल की लिखी पोस्ट की बात। महिला अपना सब दांव पर लगाकर जिस लड़की और लड़के का साथ देती है समाज के खिलाफ जोखिम उठाकर। आज वो खामोश है। घर से भागकर शादी करने वाली लड़की हालात से तंग आकर आशिक के साथ पति पत्नी की तरह रहने के बाद घर वापस लौट आई है और समझौता कर फिर से किसी से विवाह कर लिया है। आजकल की युवा पीढ़ी को डिलीट करना आसान लगता है , फोन में कॉन्टैक्ट से नाम हटा दिया और फेसबुक से तस्वीरें मिटा दीं इतना सा संबंध है। मगर मैं जो कहानी लिख चुका उसको झुठला नहीं सकता। पन्ने फाड़ देने से भी कुछ नहीं होगा। और मेरी सब से अच्छी कहानी कितनी जगह छप भी चुकी है और तमाम महिलाओं को संदेश भी देती है आंचल को परचम बनाने को।

फेसबुक प्यार से नफरत तक ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

  फेसबुक प्यार से नफरत तक ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया 

लिखी थी उन दो आशिक़ों की ,
प्यार की कहानी भी मैंने ही ,
जीने मरने की साथ खाई थी ,
कसमें  लिखकर अपनी अपनी ,
दोनों ने फेसबुक की वाल पर। 

वो तीन चार पहले का युग था ,
सोशल मीडिया पर जान पहचान ,
बन जाती थी कभी हादिसा भी ,
कभी किसी को लगता था ऐसा ,
सपनों की यही दुनिया है सब कुछ। 

घर से भाग कर शादी भी कर ली ,
कुछ दिन तक था प्यार ही प्यार ,
फिर न जाने क्या किया किसने ,
बात बात पे होने लगी तकरार ,
प्यार में ये कोई और नहीं था बीच में ,
राजनीति ने किया कैसा है अत्याचार। 

तुम चाहती किसी और नेता को हो ,
मेरी नेता मेरी वही है जाति की ,
उनका टूटा गठबंधन सब जानते ,
भाई बहन से जानी दुश्मन बन गए ,
आमने सामने खड़े हो गए पति पत्नी ,
तलाक बिना लिए बिना दिए। 

मुझसे बोली नायिका मेरी कहानी की ,
तुम मिटा दो लिखी हुई हमारी कथा ,
डिलीट कर दिया हमने सारा डाटा ,
आपको किसलिए हुई है सुन व्यथा ,
और लिख सकता मिटा सकता नहीं ,
ओ मेरी फेसबुकी दोस्त करूं क्या बता। 

मेरी इक गुज़ारिश सभी दल वालों से ,
आशिक़ी में न अपना दखल रखना ,
ताज को राजनीति का मोहरा बनाकर ,
इस तरह शाहजहां मुमताज को अब ,
बदलकर इतिहास अलग कर नहीं देना ,
तुम आज हो जाने कल हो न हो। 

मुहब्बतों की कहानियां सभी हैरान हैं ,
लिखने वाले सभी हम परेशान हैं ,
हीर रांझा को रहने दो जो भी हैं ,
लैला मजनू की दास्तां बदलना नहीं ,
धर्म जाति में बांटों जनता को मगर ,
आशिकों को मरने बाद मरना नहीं।

Tuesday, 19 June 2018

नारद मुनि जी की वापसी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    नारद मुनि जी की वापसी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    द्वारपाल ने भगवान से जाकर पूछा कि उसे बताएं दरवाज़ा खोले या बंद करे। चार साल से जो नारद जी गायब थे और आपके संदेश सुन तक नहीं रहे थे जवाब देने की तो बात ही क्या। नारायण नारायण की रट भी लगाना छोड़ दिया था और आपको नियमित रूप से घटनाओं की सूचना देना भी छोड़ दिया था। भगवान ने कहा तुमसे कभी मैंने या किसी देवी देवता ने कहा है कि नारद जी के लिए अथवा किसी के भी लिए द्वार बंद रखना है। द्वारपाल होता ही है सभी आने वालों को आदर सहित भीतर लेकर उचित स्थान देकर बिठा कर मुझे या जिस किसी से कोई मिलना चाहता हो उसे सूचना देने को। द्वारपाल ने कहा भगवान मुझे ये मालूम है मगर खुद नारद जी ने ऐसा पूछ कर आने को कहा है , उन्हें चिंता है कि शायद उनको पहले की तरह से आदर सहित यहां स्थान नहीं दिया जाये। भगवान ये वचन सुनते ही खुद उठकर द्वार पर चले आये और नारद जी को जाकर कहा मुनिवर आप को क्या हुआ है जो अपने ही घर वापस आने में ये संकोच कर रहे हैं। नारद जी ने धरती के इक भाग जो भारतवर्ष का एक राज्य है के सत्ताधारी का जारी फरमान का दिखाया जिस में अधिकारीयों को आदेश दिया गया था कि किसी विधायक या सांसद के आने पर कुर्सी से उठकर सम्मान देना है , भले आने वाला कोई दाग़दार और कई अपराधों का गुनहगार ही क्यों नहीं हो। भगवान सब समझ गये और मुस्कुराते हुए बोले मुनिवर आप किस दुविधा के शिकार हो गए हो। आपने मेरी कॉल्स को नहीं सुना और न ही कोई खबर भेजी तो क्या हुआ , मैं तो हर पल तुम्हारे सही सलामत होने की जानकारी लेता ही रहा। जब से आपने ही सी सी टीवी का विचार दिया तभी से सभी देवी देवताओं को घर बैठे दर्शन करने का लाभ उठता रहता हूं। आपके बारे यही समझा कि आप ज़रूर लोक कल्याण को कोई महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं चार साल से जो फुर्सत नहीं मिली मुझे आकर साक्षात दर्शन देते। आप आराम करिये और भोजन आदि के बाद कहिये जो भी आपने समझा है धरती पर रहते हुए ताकि आपके सुझाव के अनुसार जो ज़रूरी हो किया जा सके। 
                     नारद जी बोले आपसे छुपा कुछ भी नहीं है मगर मुझे चार साल की हर बात खुद बतानी है , इतना ही नहीं अपनी भूल और गलती की क्षमा नहीं सज़ा भी मांगनी है। मुझे चार साल पहले धरती पर जाने पर हर तरफ इक शोर सुनाई दिया कि कोई नया मसीहा आया है जो दावा करता है कि उस से पहले सभी खराब लोग शासन करते रहे और केवल वही जनता को अच्छे दिन दिखलाने को आया है। जिधर देखो उस के नाम की गूंज थी और ऐसा लगता था वास्तविक भगवान यही है। उस के भक्त होने का दावा करने वाले किसी को उसके विरुद्ध एक शब्द नहीं बोलने देते थे और उसका विरोध देश का विरोध घोषित कर दिया जाता था। कोई कुछ भी समझ नहीं पाता था कि जो मंदिर मंदिर जाकर पूजा पाठ करता है वो पहले जो जो कहता रहता था सत्ता पाकर उसके विपरीत कहने लगा था। सच के बराबर कोई तप नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं है ये सब जानते हैं फिर भी उसके झूठ को किसी ने पाप नहीं समझा ये कैसा धर्म कैसी भक्ति है। मेरी मति भी मारी गई सोशल मीडिया के शोर में कुछ सोचने की फुर्सत कहां थी। चार साल बाद कहीं भी अच्छे दिन दिखाई नहीं देते हैं और जो बात सामने आई है वो ये है कि इक व्यक्ति खुद को देश से बड़ा समझने लगा है और उसको जनता से कोई मतलब नहीं है , केवल अपने दल और संगठन के लोग ही दिखाई देते हैं। उसे एक ही काम करना है हमेशा अपना शासन बनाये रखना वो भी देश को कुछ काम दिखला कर नहीं बल्कि इक खौफ दिखला कर कि उसके सिवा कोई भी देश की बागडोर नहीं संभाल सकता। भगवान उस से पहले कितने लोग आये और चले गए मगर कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई समझता कि देश उसी के आसरे है। ये तो भगवान आपने भी कभी नहीं समझा कि बिना आपके दुनिया नहीं रहेगी। आपको तो उस महिला का वो भजन भी पसंद है जिस में वो कहती है :-

          भगवन बनकर तू मान न कर , तेरा मान बढ़ाया भक्तों ने ,

          बनाई होगी दुनिया तुमने पर , भगवान है बनाया भक्तों ने। 

भगवान मेरा मन घबरा रहा है कहीं यही चलता रहा तो लोग आपको छोड़ उसे ही भगवान नहीं घोषित कर दें। जब जब किसी ने खुद को भगवान घोषित किया है बहुत बुरा होता रहा है। मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है जो एक सत्ता के लालची को मसीहा समझने वालों की बातों में बहक गया था और आपको भी अनदेखा करने लगा। आपको कोई अंतर नहीं पड़ता है मुझे मालूम है। भगवान हैं आप किसी की स्तुति से खुश नहीं होते न ही जो आपका गुणगान नहीं करता उससे नाराज़ होते हैं। आप सभी से प्यार करते हैं मगर किसी से राग नहीं द्वेष नहीं रखते हैं। किसी भी धर्म की किताब में आपने नहीं आदेश दिया कि मेरे सामने आकर सीस झुकाओ , लोग खुद ही सर झुकाते हैं मगर आप को इस से कभी अंहकार नहीं हुआ है। अहंकारी लोगों का अहंकार कभी रहता नहीं है। मुझे डर है ये खुद को भगवान समझने वाले और धर्म की उल्टी व्याख्या करने वाले भारत देश को किस दिशा में ले जाएंगे। अगली बार सत्ता मिली तो और निरकुंश होकर बंदूक तानकर अपना आदर सम्मान करवाएंगे।

वर्तमान से नज़रें चुराते लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     वर्तमान से नज़रें चुराते लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   मुझे तीन किताबें भेजी हैं मेरी बेटी ने , अभी पहली पढ़ रहा हूं। कुछ पन्ने पढ़ने के बाद सोच रहा हूं कि बहुत मशहूर लोगों ने इन को पढ़ने का सुझाव दिया हुआ है क्या सोचकर। भगवान है या नहीं और किसी ने खोजा था या इक कल्पना है , क्या ये महत्वपूर्ण होना चाहिए या हमें आज के वर्तमान को और भविष्य को ध्यान में रखकर लिखना पढ़ना चाहिए। आज के आधुनिक युग में बाहुबली जैसी फ़िल्में और सपनों की दुनिया की परिकथाओं जैसी बातों में कहीं हम वर्तमान की वास्तविकता से नज़रें चुरा कर भागना चाहते हैं। कहानियां क्या वो नहीं होनी चाहिएं जो कोई संदेश देने का काम करें और इंसान और इंसानियत की संवेदनाओं को जगाने का काम करें न कि मनोरंजन के नाम पर किसी नशे की तरह  छा जाएं। इधर नशे का कारोबार बहुत होने लगा है , लोग नशे के आदी होते होते ज़रूरत से अधिक खुराक लेकर मर भी जाते हैं। धर्म को भी अफीम की तरह बताते हैं कुछ लोग। टीवी शो रियल्टी की आड़ में लोगों को इक जाल में जकड़ रहे हैं , आपको सपने दिखलाते हैं अपनी जेबें भरने को। लिखने वाले कलाकार कवि शायर संगीतकार को समाज की वास्तविकता को सामने लाना चाहिए न कि कपोल कल्पनाओं में बहकाना बहलाना चाहिए। नेता सरकार झूठे वादे सपने बेचकर जनता के सेवक होने की बात करते हैं मगर चाहते शासक बनकर खुद अपने सपनों को पूरा करना हैं। जो लोग देश के प्रशासन को चलाने को नियुक्त किये जाते हैं वो उल्टा जनता को न्याय की जगह अन्याय का शिकार करते हैं , दुष्यंत कुमार के अनुसार , यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है। कहीं आज के बुद्धीजीवी लोग सत्ता से रेवड़ियां पाने की चाहत में ही तो कठोर धरातल की बात को छोड़ सपनों में सब को नशे की नींद सुलाना चाहते हैं ऐसा तो नहीं होने लगा है। मुंशी प्रेमचंद के वंशज भटक गए हैं , मोह माया और इनाम तमगों की चाह में। अख़बार और सोशल मीडिया तो वास्तविकता का सामना करना ही नहीं चाहता। अपने लिए विशेषाधिकार और इक ख़ास रुतबे की अंधी दौड़ में फ़र्ज़ की बात याद तक नहीं है। क्या क्या परोस रहे हैं। जिसे देखो औरों को आईना दिखलाता है खुद नकाब ओढ़ कर।
  मुझे लगता है कि हमारे धार्मिक ग्रंथ जो शिक्षा देते हैं उसका महत्व है। लोक कथाओं नीति कथाओं में बहुत अच्छे संदेश हैं समझने को , उनको वास्तविक जीवन में लागू करना चाहिए न कि केवल माथा टेकने और आरती उतारने तक सिमित करना चाहिए। जिन्होंने भी ये सब किताबें लिखीं उनका मकसद हर किसी को अपना कर्तव्य निभाना समझाना था और अगर सब अपना फ़र्ज़ निभाएंगे तो उसी में दूसरों के अधिकार की रक्षा भी अपने आप हो जाएगी , आप अन्याय नहीं कर सकते तो सब को न्याय खुद ही मिल जायेगा।

Sunday, 17 June 2018

मेरे लेखक होने का अर्थ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      मेरे लेखक होने का अर्थ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 हम सभी देशभक्त होने का दावा करते हैं , और कुछ लोग तो औरों की देशभक्ति पर सवाल भी करते हैं तो कुछ लोग देशभक्त होने का प्रमाणपत्र भी बांटते हैं। कोई मान्य परिभाषा मिलती नहीं किसी शब्दकोश में , फिर भी थोड़ी चर्चा की जा सकती है। अगर आप अपने रिश्तों को तब भी बड़ा मानते हैं जब बात देश की हो तो आपकी देशभक्ति सच्ची नहीं है। सब से पहले हर नागरिक को देश और देश के संविधान और देश के कानून तथा देश के आदर को सब बातों से ऊपर रखना चाहिए। फिर जो भी देश हित के खिलाफ हो हम उसके साथ नहीं हो सकते। भाई दोस्त रिश्ते कोई संस्था कोई दल कोई नेता अभिनेता नायक या आप किसी भी संगठन के सदस्य हों , देश सब से पहले है। जो लोग अपने स्वार्थ साधने को इन सब को अनदेखा करते हैं और अपनी मांगें मनवाने को संविधान कानून को ताक पर रखते है व औरों के अधिकारों का हनन करते हैं , उनको देश से अधिक स्वार्थ महत्वपूर्ण लगते हैं तो उनकी देशभक्ति कैसी है। आप आम नागरिक हों या फिर सरकारी कर्मचारी अधिकारी , पुलिस या न्यायपालिका से जुड़े लोग , डॉक्टर शिक्षक अथवा लेखक या अख़बार टीवी से जुड़े लोग। अगर आपको अपना कर्तव्य देश के लिए पूरी ईमानदारी से निभाना नहीं आता और अपने लाभ को अधिक महत्व देकर झूठ बेईमानी ठगी और हेरा फेरी करते हैं , जो भी आपसे सम्पर्क रखता उसके साथ अनुचित करते हैं या जो उचित है और करना चाहिए करते नहीं हैं तो खुद को देशभक्त नहीं समझ सकते। विशेषकर जो भी पढ़ लिख कर कोई भी काम अपना करते हैं उनको विचार करना चाहिए कि हम अपने देश और समाज को क्या देते हैं , सभी को अपने हिस्से का योगदान देश की भलाई और देश को आगे ले जाने में देना चाहिए। मुझे ये सबक सरिता पत्रिका के कॉलम से मिला था 1974 में डॉक्टर बनने के बाद। तभी से मैं देश की समस्याओं और सरकार प्रशासन और विभागों की बदहाली को लेकर निर्भीकलिखता रहा हूं और लिखना भी चाहता हूं। मुझे इससे कोई आर्थिक मकसद नहीं पूरा करना , मुझे ऐसा करने से कोई नाम शोहरत नहीं मिलती है , अधिकतर परेशानियां मिलती हैं और बहुत लोग मुझसे नाराज़ भी रहते हैं। साफ और बेबाक सच बोलकर हर किसी को अपना विरोधी बना लिया है , इक ऐसी लड़ाई लड़ रहा हूं जिस में हारता रहता हूं हर बार। शायद हासिल कुछ भी नहीं होना है और बदलता भी नहीं कुछ भी मेरे चाहने से फिर भी खामोश रहना कठिन लगता है , सांस घुटती है। जीवन भर ऐसा काम करना जिस में आपको मुफलिसी के सिवा कुछ हासिल नहीं होना , सब लोग मानते हैं ऐसा काम नहीं करना चाहिए। मुझे लेकिन लगता है मेरा कर्तव्य है समाज की बात लिखना। लेखक होना इस देश में किसी अपराध जैसा है। तमाम लिखने वाले इस से बहुत कुछ हासिल करना चाहते हैं और अपनी चाहत पूरी करने को समय की धारा के साथ बहते हैं मगर मैं सदा धारा के विपरीत लहरों से टकराता और भंवर में जाने की मूर्खता करता आया हूं। मुझ से रात को दिन नहीं कहा जाता है न ही मैं इस तरफ या उस तरफ का होकर रहा हूं। चाटुकारिता नहीं सीखी और चुप रहकर भी वक़्त गुज़ारना नहीं आया मुझे। किसी योद्धा की तरह अपनी कलम से अकेला लड़ रहा हूं। यही जीवन का मकसद बन गया है। मुझे बिना समझे बिना मेरा लिखा पढ़े ही लोग मेरी आलोचना करते हैं कि मैं निराशा की ही बात लिखता हूं , जो मिला है वही तो देंगे , हम ग़मज़दा हैं लाएं कहां से ख़ुशी के गीत। देंगे वही जो पाएंगे इस ज़िंदगी से हम। गुरुदत्त की फिल्म की तरह है मेरा हाल भी। शायद मुझे कोई और राह बनाकर चलना चाहिए था मगर मेरे हाथ में कभी नहीं रहा फैसला अपनी राह खुद चुनने का और हमेशा हालात की आंधी मुझे अपने संग उड़ा कर ले जाती रही है। जो भी चाहा कभी नहीं मिला या सफल होने की काबलियत ही नहीं है मुझमें। ज़िंदगी के लंबे सफर में इतना आगे आकर वापसी का कोई विकल्प नहीं है न ही कोई और रास्ता ही है। कुछ नहीं पता कल क्या होगा शायद अंत का इंतज़ार जब मौत विराम लगा देगी और किसी को नहीं फुर्सत भी कि सोचे मैं कौन था क्या था किसी के सपने नहीं पूरे कर पाया और मेरा कोई सपना शायद था ही नहीं बस जैसे तैसे गुज़र बसर करने के सिवा और इक कल्पना में जीना कि कोई कभी मेरे लेखन की कुछ तो कीमत समझेगा। खाली हाथ आते हैं सब और खाली हाथ जाते भी हैं मगर जीवन में सार्थक किया क्या यही महत्व रखता है। मेरा प्रयास मेरा लेखन कितना सार्थक है मैं खुद तो नहीं तय कर सकता और लोग इसका मोल समझेंगे या नहीं मेरे लिए अनमोल है ये। 

Friday, 15 June 2018

नींद क्यों रात भर नहीं आती ( खामखा की बात ) डॉ लोक सेतिया

  नींद क्यों रात भर नहीं आती ( खामखा की बात ) डॉ लोक सेतिया 

      बुरा हो जिसने अखबार का विचार शुरू किया। हर दिन कोई खबर उदास कर देती है। लोग न जाने कैसे चैन की बंसी बजाते हैं जब आस पास आग ही आग लगी हो। कबीर कहते हैं करेंगे सो भरेंगे तू क्यों भयो उदास। आपको क्या लगता है कबीर मस्ती करते थे , उदास नहीं होते थे। उदास होते थे मगर यही सोचते थे कि मेरे उदास होने से होगा क्या। रेणु जी कहते थे तुम कबीर न बनना मगर खुद सारी ज़िंदगी कबीर बने रहे। आजकल लोग खुश होने का पाठ पढ़ाते हैं वो भी सोशल मीडिया पर। ख़ुशी मिलती कहां कोई पता नहीं बताता है। नानक बाबा उदासी की बात करते हैं , उदास होना अर्थात विरक्त होना मोह माया के जाल से। नहीं हुआ जा सकता लाख कोशिश की , न काहू से दोस्ती न काहू से बैर। कंचन लोह समान , कोई डर नहीं किसी से न ही किसी को डराना है। तब अख़बार टीवी नहीं थे फिर भी खबर सब को होती थी , अब खबर सुनकर भी बेखबर रहते हैं। खबर इक दूजे को भेजते हैं दिन भर व्हाट्सएप्प पर खुद बिना सोचे समझे , झूठ सच की परख भी कोई नहीं करता। टीवी वालों को खबर तलाश नहीं करनी पड़ती , खबर खुद चल कर आती है और वो दिन भर उस पर बहस करवाते हैं। सब वॉयरल वीडियो का सच बिना समझे समझाते हैं। खबर बड़े लोगों की होती है और मनोरंजन को होती है , रोने धोने की फुरसत किसे है। आप इस पर मत लिखना ये विषय बेहद गंभीर है किसी को आहत नहीं करना चाहिए। मत कहो आकाश में कोहरा घना है , ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। खबरची लोग सीना तान कहते हैं ऐसा हमारी खबर का असर है , खबर की नहीं मगर होती खबर है। हमको इस सब से क्या लेना देना है , वास्तविक खबरों पर यही विचार आता है। कुछ सालों से अख़बार टीवी वाले सर्वेक्षण करते हैं लोग क्या खबर पढ़ना चाहते हैं , खबर भी लोगों की पसंद की हो सकती है। इक दोस्त लेखक की कविता है , कोई अच्छी खबर लिखना। बहुत कठिन है अच्छी खबर लिखना आजकल , अच्छे दिन की बात याद करते डर सा लगता है। सब तरफ यही हाल है जो नहीं करना करते हैं और जो करना है वो करते नहीं।  मैं भी मौत की बात लिखकर किसी की मौत को पल भर की खबर नहीं बना सकता , मौत आनी है आती है मगर ऐसे नहीं।  मौत का व्यौपार होने लगा है , लाशों पर रोटियां सेकने लगे हैं नेता ही नहीं खबरची भी। इस पर भी चर्चा थी सीमा पर सैनिक को आंतकवादी बंधक बनाकर मौत से पहले उसके साथ वीडिओ बनाते हैं बात का और वॉयरल भी करते हैं , उसकी खबर को महत्व देना है या इक पत्रकार की हत्या को। आम नागिक की मौत खबर नहीं होती है , उसका विज्ञापन छपता है शोक सभा का। किसी नेता की अस्पताल में जांच हो रही है तो दिन भर उनको इस तरह याद करते हैं टीवी वाले जैसे यमराज से सूचना मिली हो अभी अवसर है उनकी पुरानी बातों को याद कर लो। ज़िंदगी अब बता किधर जाएं , ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं। ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं , और क्या जुर्म है पता ही नहीं। बड़ी अच्छी ग़ज़ल है इक शायर की। लोग ग़ज़ल सुनते हैं आवाज़ की मधुरता और संगीत का लुत्फ़ उठाने को , समझते नहीं है अर्थ क्या है।  हर शेर पर तालियां नहीं बज सकतीं , बहुत शेर सन्नाटा मांगते हैं , ख़ामोशी। मगर ये शायर भी अजीब हैं वाह वाह चाहते हैं आह की बात पर आह निकलती नहीं किसी की ये कैसी संवेदना है। लोग जाते हैं अफ़सोस जताने कुछ पल को , अफ़सोस चार कदम बाद खो जाता है और कुछ और हो रहा होता है।  ये संवेदना भी संवेदनहीनता जैसी है। क्या हुआ है क्या लिखना है जो लिखा नहीं जाता कैसे कहूं। कोई समझेगा क्या राज़ ए गुलशन , जब तक उलझे न कांटों से दामन। बोये हैं बबूल तो कांटें हिस्से में आने ही थे , अब समयो रम गयो अब क्यों रोवत अंध। हर तरफ आग है दामन को बचाएं कैसे , रस्मे उल्फत को निभाएं तो निभाएं कैसे। बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते , ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे। पिता के कंधे पर बच्चे की लाश से बढ़कर बोझ क्या हो सकता है। किसी के साथ नहीं हो ऐसा खुदा , संभल जाओ हवाओं में ज़हर घुला हुआ है सांस लेना भी मुश्किल हुआ है। इस तरह किसी घर का चिराग नहीं बुझे कि उसके धुएं में तमाम उम्र दम घुटता रहे।

Tuesday, 12 June 2018

एक ही काफी है शुभचिंतक ( ज़िंदगी का सबक ) डॉ लोक सेतिया

  एक ही काफी है शुभचिंतक ( ज़िंदगी का सबक ) डॉ लोक सेतिया

     ये मेरे आपके सभी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जैसे पुरानी कहावत है एन एप्पल ऐ डे , कीप्स डॉक्टर अवे। अर्थात एक सेब हर दिन खाओ तो बिमार नहीं पड़ोगे। उसमें कितनी सच्चाई है नहीं पता मगर मुझे इतना पता है कि एक सच्चा शुभचिंतक आपको हज़ार समस्याओं से निजात दिलवा सकता है। मगर इस युग में एक सच्चा दोस्त एक सच्चा हमदर्द एक सच्चा हमसफ़र मिलना सब से कठिन है। आज जो बात या जो कहानी आपको बताने जा रहा हूं वो आजकल की ही नहीं है बल्कि उन दो भाइयों की है जिन से आप भी परिचित हैं। दूसरे शब्दों में बहुत बड़े जाने माने परिवार की बात है। ध्यान से सुनिए। 
      दौलत इतनी कि खुद उनको नहीं मालूम कितनी है। झगड़ा दो भाइयों का और झ्गड़े की वजह कुछ भी नहीं , केवल अहंकार। पचास पचास बड़े बड़े वकील दोनों ने कर रखे मगर अदालत को भी समझ नहीं आया कि फैसला कैसे हो। यहां इक बात बतानी ज़रूरी है कि हमारे देश में आम नागरिक को बेगुनाही में भी सज़ा देते जिन को ख़ास परवाह नहीं होती , उन्हें बड़े लोगों के मुकदमों का निर्णय करते बहुत चिंता रहती है कि किसी को भी नाराज़ नहीं करना है। ये सब से बड़ा सच है कि कोई भी अदालती निर्णय दोनों पक्ष को पसंद नहीं आ सकता है। बहुत सोच समझ कर अदालत ने उनका मुकदमा सहमति से समझौता करवाने वाले इक वरिष्ठ वकील के पास भेज दिया। बहुत कुछ दांव पर था , शेयर कंपनियां और अकूत दौलत भी। बहुत महीने तक दोनों की बातें उनके वकीलों की बातें सुन कर भी मध्यस्ता करने वाले वरिष्ठ वकील को समझ आया कि जीवन भर लड़ते रहेंगे दो भाई मगर कोई भी अदालत या पंचायत इनका समझौता नहीं करवा सकती न ही ऐसा फैसला ही कर सकती है जो दोनों को मंज़ूर हो। 
                  ऐसे में उस मध्यस्ता करने वाले वकील ने कहा मुझे नहीं लगता मैं इक गुत्थी को सुलझा सकूं इसलिए मुझे अदालत को सूचित करने से पहले इन दोनों भाइयों से अकेले में थोड़ी देर बात करनी है और सभी वकील बाहर चले जाएं। वो इक शीशे की दीवारों का बना हाल था और बाहर खड़े सौ वकील भीतर की आवाज़ नहीं सुन सकते थे , देख रहे थे कि क्या होने जा रहा है। उनकी धड़कन बढ़ी हुई थी क्योंकि दो भाइयों में आपसी समझौता होना उनको हर दिन मिलने वाले लाखों रूपये का बंद होना भी था , ये बात उस वरिष्ठ वकील को समझ आ चुकी थी कि सब वकीलों का मकसद निपटारा कभी नहीं होने देने और अपनी कमाई ही था और कोई भी उनका शुभचिंतक नहीं था। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या। दो घंटे दोनों भाइयों से एक साथ और अकेले अकेले बात करते मध्यथता करने वाले वकील को पता चला एक व्यक्ति है जिस पर दोनों भाई पूरा भरोसा करते हैं और उसका बहुत आदर करते हैं , मगर अभी तक वो सामने नहीं आया था। 
           वरिष्ठ वकील ने उसका फोन नंबर मांगा और तभी उस से फोन पर बात की। उसने बताया कि मैं हवाई अड्डे पर हूं और विदेश ज़रूरी काम से जा रहा हूं। वकील ने कहा कि क्या आप इन दो भाइयों के लिए अपने विदेश नहीं जाने से होने वाले नुकसान को भुला कर विदेश जाना छोड़ अभी आ सकते हैं। उस दोनों भाइयों के शुभचिंतक ने कहा कि अगर मेरे आने से ऐसा हो सकता है तो मैं अवश्य आ सकता हूं। मेरे लिए कारोबार में करोड़ों का फायदा नुकसान उतना महत्व नहीं रखता जितना इनकी भलाई। और वो व्यक्ति सीधा हवाई अड्डे से उस जगह चला आया था जहां ये सब चल रहा था। उसने दोनों भाइयों से आधा घंटा ही बात की और दोनों ही सहमत हो गए। सालों से जो काम सौ वकील और दोस्त रिश्तेदार नहीं करवा पाए थे पल भर में हो गया था। इस में कुछ भी झूठ या काल्पनिक नहीं है। आपका एक शुभचिंतक ऐसा हो जो आपकी भलाई के लिए अपना नुकसान भी बर्दाश्त कर सकता हो तो इस से अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता। 
       अंत भी वास्तविक है। समझौता होने के बाद एक भाई ने दूसरे से कहा , हम क्या कर रहे थे कुछ समझ नहीं आया।  कोई लड़ाई की बात थी ही नहीं इतना किसी ने समझाया ही नहीं। वरिष्ठ वकील ने बताया , आप केवल वकीलों की वकालत देख रहे थे और कुछ भी नहीं।  मैं समझौते करवाने में माहिर हूं फिर भी मुझसे ये काम नहीं हो सकता था जो आपके एक सच्चे शुभचिंतक ने कर दिया है। वकीलों को आपकी लड़ाई से ही फायदा था समझौते से नहीं , बहुत लोगों के घर बिकते हैं अदालती झगड़ों में और उन्हीं से वकीलों की कोठियां बंगले बनते हैं। आप को कुछ समझ आया। एक शुभचिंतक तलाश करिये जीवन आसान हो जाएगा।

Sunday, 10 June 2018

कहानी नहीं है ( बेबसी जुर्म है ) - डॉ लोक सेतिया

          कहानी नहीं है ( बेबसी जुर्म है ) डॉ लोक सेतिया 

   ऐसा हुआ विश्वास करने में अभी भी समय लगेगा। किसी फ़िल्मी कहानी में भी इतना शायद ही देखा हो। जो टीवी पर सीआईडी की तरह के शो में कहानी होती है ये उस से ज़्यादा उलझी हुई है। इस की पटकथा किस ने लिखी कभी कोई नहीं समझ सकेगा। कुछ पड़े लिखे सभ्य दिखाई देने वाले और धर्म और धार्मिकता की बड़ी बड़ी बातों से खुद को समाज की भलाई के पैरोकार समझने वाले या फिर ऐसा होने का लबादा ओढ़े लोग लगता था कितने भले हैं लेकिन वास्तव में अपना जाल बुनकर बिछा चुके थे। और हम इक छोटे शहर के खुद को शिक्षित समझने वाले परिवार के सभी सदस्य इस कदर नासमझ थे कि सामने देख भी नहीं देख पाये कि कोई हमें अपने जाल में फ़ांस रहा है। हमारे ही बीच से किसी को अपनी बातों से प्रभावित कर लिया था इस हद तक कि वो अपनी ही ज़िंदगी को दांव पर लगाने को राज़ी हो गया। जैसे किसी ने सम्मोहित कर लिया हो और अपने इशारों पर नचाता हो फिर भी ज़हर पीने वाला चुपचाप जानते हुए ज़हर पी जाये। उसे अभी भी लगता है ये उसकी शराफत थी जो उसने पहले से बता दिया था कि हम तुम्हारी ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं। वो जनता था कुछ दिन बाद ये राज़ खुलना ही है और सबसे बड़ा दोषी वही ठहराया जायेगा , इस तरह उसने बड़ी चालाकी से खुद को बचाने का उपाय कर लिया था। अपने को सब से समझदार समझने वाले हमारे परिवार के सदस्य को अपनी समझ और काबलियत पर इतना भरोसा था कि उसने सब जानते हुए भी अपने ही घर में किसी को नहीं बताया कि हम सब को कैसे ज़हर देने का काम किया जा रहा है। आज भी हम नहीं जानते कि हमारे साथ क्या हुआ क्यों हुआ , और हम समाज की परम्पराओं और मर्यादा के नाम पर लब सी कर अपने ही कातिलों को मसीहा कहते हैं ये जानते हुए भी कि वो मसीहा होने का लबादा ओढ़े हुए वास्तव में इंसान भी नहीं हैं। शायद मेरी गलती या भूल ही नहीं हद दर्जे की मूर्खता है जो मैंने इस ज़माने में हर किसी पर भरोसा करना छोड़ा नहीं बार बार धोखे खाने के बाद भी। आखिरी वक़्त तक मुझे ये एहसास होता रहा था कहीं कोई गड़बड़ है कुछ खतरा है और अंतिम पल तक वापस लौट जाना चाहिए। ये इक कठिन फैसला था जो मेरे इलावा कोई नहीं ले सकता था , मगर शायद हमेशा की ही तरह मुझे में आत्मविश्वास की कमी भी थी और बाकी लोगों पर अपने से बढ़कर भरोसा करने की आदत भी। सब समझाते रहे जैसा मुझे लगता है उस तरह का नहीं है और सब सही हो जायेगा बस थोड़ा आपसी समझ का अंतर है। नहीं अब कुछ भी नहीं हो सकता , अभी भी साहस नहीं कोई निर्णय लेने का , अब कोई राह ही नहीं बची है। आज कोई फैसला जो जो गलत हुआ उसे फिर से सही नहीं कर सकता है। जीवन भर इक दर्द तड़पाएगा मुझे , किसी कांटों की सेज पर सोने जैसा जो चैन से नहीं जीने देगा। पता नहीं यहां भगवान की बात करनी चाहिए भी अथवा नहीं , क्योंकि भगवान कभी किसी का बुरा नहीं करता है , भगवान कभी बुरे लोगों का साथ नहीं दे सकता। मगर भगवान उस पर भरोसा रखने वालों को बचा तो सकता है। उसने शायद समझाना भी चाहा मगर मुझी को समझ नहीं आया तब क्या करना चाहिए लेकिन आज अब इतना तो सोचता ही हूं कि क्या वास्तव में भगवान ऐसे जालसाज़ी धोखा छल कपट करने वालों को माफ़ कर देगा। कुछ भी नहीं है मेरे हाथ में सिवा उस भगवान पर भरोसा करने के कि ये सब जो भी जैसे भी हुआ तुम्हें ही इसे ठीक भी करना है और हम सभी की ज़िंदगी की कहानी को सुलझाना भी है। इक बात अब तय करनी ही है कि मैं अपने कातिलों को अपराधियों को मुजरिमों को जीवन भर माफ़ कभी नहीं कर सकता , बेशक मैं बेबस हो गया हूं और लाचार भी। इस बात को भूल जाना संभव भी नहीं और भुलाना भी गुनाह है। 

Saturday, 9 June 2018

इक्कीसवीं सदी में गुनाह है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   इक्कीसवीं सदी में गुनाह है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       ऐसा तो नहीं सोचा था पिछली सदी वालों ने कि जिस तरह वो जिए उसको जीना ही नहीं कहते। आज अच्छा है जो उस सदी के लोग इस सब को देखने से पहले चले गए दुनिया से। अन्यथा इस तरह से जीते जैसे मुजरिम हैं। ये सब नये मूल्य नये दौर के नियम बनाए किसने , हमने तो नहीं। किसी पुरानी किताब में धर्म नैतिकता की कहानियों में भी नहीं है। आम आदमी क्या महान कहलाने वाले लोग भी और अपनी अपनी रियासत के जागीर के मालिक भी ऐसे ही जिये हमेशा शान से। आज आपने डियो नहीं लगाया तो आप महफ़िल में बैठने के काबिल नहीं हैं। आपको आधुनिक ढंग से हाथ मिलाना और गले भी ऐसे लगाना जैसे इक औपचारिकता निभानी है , उस तरह से नहीं जैसे दोस्त मिलते या भाई या बहन या मां-बेटी तो लिपट जाते थे और अलग होने का नाम नहीं लेते थे। अब उस तरह से गले लगना गंवार होना है। बाज़ार वाले और कुछ बाज़ारू सामान बिकवाने वाले टीवी अख़बार में विज्ञापन में समझाते हैं ऐसे रहना चाहिए। मगर ऐसे कैसे रहें वो नहीं जानते कि जिनकी आय उनकी तरह करोड़ों में नहीं उन्हें शायद जीना ही नहीं चाहिए। उनका सुझाया साबुन उनका बताया शैम्पू और पहनावा भी उनकी बताई कंपनी का सिला हुआ। इन सब को अपने बाप दादा जो घर में मां के सिले कपड़े डालते थे और घर का घी दूध और घर पर पिसे मसाले और घर में बनाया अचार भोजन जिसको कुछ साल पहले तक समझा जाता था असली स्वाद उसी का है , आजकल उसको याद करना भी अनुचित समझते हैं। आपको बाहर किस का पिज़्ज़ा किसका डोसा किस का चाइनीज़ किस का इटेलियन स्वाद कैसा है इसकी जानकारी नहीं होना साबित करता है कि आप बेकार जीते हैं। आज भी आप नल का पानी पीते हैं बिसलरी नहीं मंगवाते न ही घर में आर ओ लगवाया है तो बड़े मुजरिम हैं आप। आपके घर का पानी भी पीना पाप है , ये धर्म की किताब में किसी और तरह से बताया जाता था या है। 
     आपको सादा जीवन उच्च विचार की बात को भूले से भी याद नहीं रखना चाहिए। दिखावे का शानदार रहन सहन और तुच्छ विचार हैं तो आप बड़े बड़े लोगों की सभा में बैठने के काबिल हैं , जिस में बात करते समय महिला केवल महिला है किसी की बेटी बहन मां या बीवी नहीं , उनको लेकर जो बातें घटिया मज़ाक और आचरण में निम्न स्तर का तरीका हो आप आधुनिक हैं। अपनी घर की महिलाओं को छोड़ बाकी सभी को कैसी भी निगाह से देखना और कुछ भी सोचना बोलना आपको बेहूदा आदमी नहीं कहलवाता है। आपको जीने का मज़ा लेना चाहिए और पैसा किसी भी तरह से कमाना चाहिए। आप चोरी करें डाका डालें ठगी करें धोखाधड़ी से अमीर बनें या अपना ज़मीर भी बेचते हों , धनवान हैं तो किसी की मज़ाल नहीं जो आपकी बुराई करने का साहस भी करे। आजकल दौलमंद होना सब को महान बनवाता है भले दौलत किसी भी तरह से कमाई हो। रिश्वतखोर से कभी लोग नफरत करते थे , कितने खराब लोग थे , कोई घूस लेता पकड़ा जाता तो उसको शर्मसारी होती थी और घर से निकलते घबराता था। कोई कुछ भी नहीं बोलता था मगर तब भी सब की निगाहों में उसको दिखाई देता था जैसे बोलती हों यही है वो ज़मीर बेचने वाला। आजकल अपनी खुद की बोली लगवाते हैं लोग और जिसका कोई खरीदार नहीं हो उसकी औकात दो टके की नहीं समझी जाती। जो लोग किसी भी कीमत में बिकने को राज़ी नहीं थे , जो सब ज़ुल्म सहकर भी खुद को दौलत के तराज़ू में नहीं तोलते थे और जिनको अनमोल माना जाता था , वो आदर्शवादी लोग आज होते तो गुनहगार बताये जाते। 
शायद समाज की तरह आने वाले समय में सरकार भी जब जन गणना में ऐसे सवाल करेगी तब अभी भी इस तरह से गुनहगार बनकर जीने वालों के लिए कड़ी सज़ा मुकर्रर करेगी। हम अब देश नहीं हैं , समाज नहीं हैं , केवल इक बाज़ार हैं , हैरानी की बात है कि सोचते हैं हमीं खरीदार हैं , जबकि वास्तव में हम इंसान नहीं हैं केवल सामान हैं।  सब पर कीमत का टैग लगा हुआ है , जो अधिकतम मूल्य है , मोलभाव करो तो सस्ता बिकने को भी कोई परेशानी नहीं है।  कुछ तो हमेशा एक पर एक मुफ्त या इसके साथ वो भी उपहार की तरह , सेल पर रहते हैं बारह महीने ही।

Thursday, 7 June 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( कुछ सच कुछ सपना -- टीवी शो की बात ) डॉ लोक सेतिया

  जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( कुछ सच कुछ सपना )

       सबको अपनी ही किसी बात पे रोना आया ( टीवी शो की बात )

                             आलेख -  डॉ लोक सेतिया 

     बहुत कुछ और भी याद आया , मगर पहले कल रात की बात। क्रॉस रोड नाम भी आकर्षित करता है और जब देखा तो नाम सार्थक भी लगा। जीवन में कभी कभी नहीं जैसा बताया गया शो में , मुझे लगता है अक्सर हम इक दुविधा में खड़े होते हैं , इधर जाएं कि उधर जाएं। कहानी वास्तव में लिखी ही किसी मकसद को लेकर जाती है और लिखने वाला जानता है जो सन्देश देना है उसे कहानी को मनपसंद और मर्ज़ी के अंत से ही समझाया जा सकता है। यही तय था और हुआ भी। कल रात की कहानी में जवाब बहुत मिले मगर हर जवाब अपने में कई सवाल खड़े करता हुआ। किसी को मज़बूरी है बेटी के इलाज और उसकी जान बचाने को जितने पैसे ज़रूरत हैं , ठीक उतने दस लाख उसे किसी और के पड़े बस में मिल जाते हैं। एक तरफ कहानी में उस इमानदार बस कंडक्टर का साथी सही मार्ग से भटकाता है दूसरी तरफ टीवी स्टूडियो में बैठे दर्शक उपदेशक बन कर अपनी अपनी राय देते हैं। किसी को भी कहानी के किरदार के लिए रोना नहीं आया , बात करते करते सब अपनी व्यथा सुना रहे थे। इस में कोई बुराई नहीं है कि औरों को दर्द में देखकर अपना दुःख दर्द याद आये , मगर क्या वास्तविक जीवन में हम हमदर्द बनते हैं , शायद नहीं। किसी ने टीवी स्टूडियो में मानवता की बात करने वाले से उल्टा सवाल पूछ ही लिया आप डॉक्टर जब किसी को मरते देख उपचार करने से पहले हज़ारों नहीं कभी लाखों रूपये जमा करवाने को कहते हैं तब मानवधर्म नहीं याद आता , उनका कहना था अब ऐसा नहीं होता , मगर उनको भी पता है हर दिन यही होता है। कहानी का नायक ज़मीर की बात सुनकर उस बैग को पुलिस थाने में देने जाता है मगर देने के बाद पता चलता है कि ये सभी थाने वाले खुद ही मिल बांट रखने की बात करते हैं। ऐसे में वो चुपके से बैग वापस उठाकर भागता है ताकि सही मालिक को पहुंचा सके। ये इक कड़वा सच है वही पुलिस वाले अब उसी के पीछे लगे हैं और एंकर उसको चोर बन गया बता रहे थे , मगर चोर तो पुलिस बनकर इमानदार को चोर घोषित करना चाहती है। ये कैसा समाज है , इस टीवी शो के साथ इक और टीवी रियल्टी शो भी आता है दस का दम। एक दिन पहले ही उसमें सवाल था कितने फीसदी लोग भगवान को मानते हैं और जवाब था नब्बे फीसदी। ये झूठ है अगर इतने लोग भगवान को मानते हैं तो समाज में सब इतना बुरा क्यों है। मेरा ख्याल है हम में अधिकतर भगवान को मानते नहीं हैं न ही आत्मा अंतरात्मा और ज़मीर की आवाज़ सुनते ही हैं , केवल दिखावा करते हैं और भगवान को भी छलना चाहते हैं। भगवान हमें याद अपनी सुविधानुसार आते हैं जब खुद परेशानी होती है , औरों को परेशान करते भगवान क्यों भूल जाते हैं। तब नहीं सोचते ऊपर वाला सब देख रहा है , टीवी का इक शो ये भी है , मगर क्या टीवी चैनल वाले मानते हैं ऊपर वाला भगवान सब देख रहा है , नहीं। इनका ऊपर वाला इक कैमरा है जो चुपके से सब देख सुन रहा है। कहानी का अंत सुखद होता है और पैसा जिस का था उसे मिल भी जाता है और इमानदार की बेटी का उपचार भी हो जाता है।  लेखक यही करते हैं सच नहीं कल्पना करते हैं कि ऐसा हो , मगर जीवन में वास्तविकता कल्पना से विपरीत होती है। सत्य पराजित होता या नहीं होता सत्य को प्रताड़ित अवश्य किया जाता है। झूठ खिलखिलाता है सत्य को ही रोना पड़ता है। बिग बॉस भी फिर आएगा और कोई फिर से करोड़पति भी बनाएगा। मगर इक सच है जो कभी सामने नहीं आएगा। हर शो से कोई और ही मालामाल होता जाएगा , दर्शकों और खिलाडियों के लिए ऊंठ के मुंह में जीरे की तरह बचा खुचा रह जाएगा। इस शो के एंकर से कोई नहीं सवाल करेगा , करोड़पति खेल अपने खेल की वास्तविकता पर सवाल नहीं बनाएगा। इतने सालों में कितना धन लोगों से किस किस तरह वसूला और किस किस को कितना मिला कभी नहीं बताएगा। ये मनोरंजन के नाम पर कमाई का धंधा किसी के योग के कारोबार करने , किसी के गुरु बनकर व्यौपार करने की तरह है।  सभी भगवान को मानते हैं मगर ऊपर वाले भगवान को नहीं , पैसा ही खुदा है सबका।  इक राजनेता मुफ्त बदनाम हो गए थे टीवी वालों के स्टिंग ऑपरेशन में ये बोलकर कि पैसा खुदा तो नहीं है कसम से पर खुदा से कम भी नहीं है। लोग ये बोलते नहीं हैं मगर वास्तव में उनका खुदा पैसा ही है , और ये पैसे की खातिर आम जनता दर्शकों और भोले भाले लोगों को मीठी मीठी बातों से ठगने वाले बेहद अमीर लोग हैं करोड़ों की आमदनी होने के बावजूद भी पैसे की खातिर सब कुछ करते हैं।

                   इक नया एपिसोड , नया विषय , नई कहानी

   टीवी शो की कल रात की कहनी की बात बताने से पहले कुछ कहना लाज़मी है। कुछ बातें ख़ास होती हैं जिनकी चर्चा खुली महफ़िल में नहीं की जा सकती है। कुछ लोग होते हैं जो खुद स्नानघर में भी नाहते हैं तो अंगोछा लेकर , मगर दावा करते हैं कि जब बच्चा जन्म लेते समय नंगा होता है तो बड़े होकर भी शर्माने कोई बात नहीं।  ये टीवी और अख़बार के खबरची ही नहीं कुछ घटिया सोच वाले लेखक भी किसी के मरने के बाद उसके इश्क़ के किस्से लिखते हैं उसकी आधी सच्ची आधी झूठी घटनाओं पर लिखते हैं जैसे सब सामने देखा था। इतना ही नहीं कुछ लेखक अपने ही तमाम महिलाओं के साथ निजि संबंधों की बात लिखकर अपने रिश्तों को बीच बाज़ार बेचने का अपराध करते हैं। कल का विषय ऐसा ही था। आधुनिकता की ये परिभाषा घड़ी जा रही है , बच्चे अब बच्चे नहीं हैं समझदार हैं और उनको अपने फैसले करने दो , आप राय भी नहीं लो , वो कहें मुझे ज़हर पीकर देखना है अगर कड़वा लगा तो वापस उगल देंगें। बेटी आकर पिता से अपने प्रेमी के साथ बिना शादी किये पांच छह महीने रहकर तजुर्बा करना चाहती है कि जान सके हम इक दूसरे के साथ निभा सकते हैं जीवन भर। और पिता अपनी पत्नी के विरोध के बावजूद भी इजाज़त दे देते हैं। यहीं दो सवाल आपके तथाकथित आधुनिक समाज को लेकर उठते हैं। लड़की को पिता से अनुमति लेनी है , लड़के के माता पिता कहीं नहीं हैं अर्थात लड़के को बिना अनुमति जो मर्ज़ी करने की छूट है। अगर ऐसे में लड़की बिना विवाह मां बनने की दुविधा में पड़ती है तो लड़के के पास खोने को कुछ नहीं , उसको तब भी कुंवारा समझा जायेगा। चलो साथ साथ लिविंग रिलेशनशिप के बाद भी सब ठीक रहता है और दोनों आकर शादी करने की घोषणा करते हैं।  मां भी खुश , घर टीवी देखने वाले दर्शक भी ऑनलाइन राय बताने वाले भी और स्टूडियो में बैठे लोग भी। पर ये ख़ुशी अगले पल खत्म हो जाती है जब लड़की घर वापस आकर पिता को फिर बताती है कि हमने अलग अलग रहने का निर्णय किया है और मुझे उस लड़के को तलाक देना है और उस से तलाक लेने में पिता का सहारा इक वकील के रूप में चाहती है। किसी पुरानी फ़िल्मी कहानी की तरह पिता उनको फ़िल्मी अंदाज़ से राह पर ले आता है। ऐसा वास्तव में संभव होता नहीं है , मगर मुझे अनुमान था लेखक अपनी बात को सही ठहराने की खातिर दिन में तारे दिखला सकता है। यहां मुझे अपनी इक कविता याद आई है , शायद ठीक लगे आपको।

                  है अधूरी कहानी ( कविता )

ज़िंदगी  नहीं है ,
कागज़ पे लिखी ,
पर्दे पर दिखाई गई , 
कोई पटकथा ,
जिसे ले जाता है ,
मनचाहे अंत तक ,
लिखने वाला लेखक , 
भटकने नहीं देता ,
कहानी के पात्रों को ,
बचाये रखता है ,
अपने पात्रों के ,
वास्तविक चरित्र को ,
संबल बन कर।

छोड़ दिया है शायद ,
अकेला और बेसहारा ,
विधाता ने ,
जीवन में हर पात्र को।

भटक जाती है ज़िंदगी ,
धूप - छावं में,
अनजान पथ पर चलते हुए ,
बार बार।

जाने कब ,
कहाँ कैसे ,
भटक जाते हैं ,
सभी पात्र ,
सही मार्ग से जीवन में ,
सभी करते रह जाते हैं प्रयास  ,
कहानी को ,
उचित परिणिति तक ,
ले जाने का ,
मगर आज तक ,
पहुंचा नहीं पाया कोई भी ,
पूर्णता तक उसको।

रह गयी है अधूरी ,
सब के जीवन की ,
वास्तविक कहानी ,
त्रिशंकु बन कर ,
रह गये  हैं ,
जीवन में तमाम लोग।

Tuesday, 5 June 2018

कविता लापता है या मर गई है ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

  कविता लापता है या मर गई है ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    कोई तो बताये , देखी है सुनी  है कविता।  कोई सुनाये मुझे कविता की प्यास है।  यू ट्यूब पर टीवी पर या किसी शहर के सभा हाल में। क्या ज़माना था खुले आसमान तले कविता का जलवा दिखाई देता था। क्या कहा यही है जो कोई महान कवि सुना रहा है और हज़ारों लोग तालियां बजा रहे हैं। इसे कविता कहते हैं , मंच पर आपस में बातचीत को , इधर उधर की बातों को जोड़कर। अकविता की कविता है , कवि हैं काव्य नहीं है। सुनने वालो क्या सुनी है कभी कविता। चलो इनकी बात को छोड़ो ग़ज़ल की बात ही करते हैं , बेहद नाज़ुक होती है और लयात्मक भी फूलों सी रेशमी एहसास लिए। ये कैसी ग़ज़ल कहने लगे जैसे तलवार लेकर घायल करना चाहते मगर किसको , लहू लुहान हो गई ग़ज़ल आपकी। इतना ज़ुल्म तो कोई नारी भी नहीं सहती आजकल। कविता ग़ज़ल माना फीमेल नाम हैं मगर डरती नहीं घबराती नहीं। आपने उनका बुरा हाल किया है कविता का सवभाव नहीं ग़ज़ल का मिजाज़ नहीं। 
       ये कोई सोशल मीडिया और टीवी चैनल वालों का कसूर नहीं है , किसी ने जो कहा आपने वही मान लिया तो फिर काहे को कवि शायर होने का दम भरते हो। कितने पैसे मिले होंगे , क्या इतने कि उसकी खातिर किसी को घायल कर दो। ये क्या है किसने कविता और ग़ज़ल की सुपारी ली है दी है। ऊंचे ऊंचे हाथ उठाकर ज़ोर ज़ोर से खड़े होकर वाह वाह करने वालो कविता से कभी जान पहचान की है। आपकी आवाज़ से डर गई कांपती थरथराती छुपी खड़ी होगी मंच के पीछे शायद। एफआईआर दर्ज कौन करवाए किसी की संतान है जो दुनिया में नहीं रहे। लावारिस है बिना माता पिता के बेबस है। घर बार नहीं ठौर ठिकाना नहीं , क्या हालत बना दी सभी ने। इस से तो अच्छा था किसी अख़बार के पन्नों में कहीं छपी रहना , कोई पढ़ लेता था तलाश कर के। ये मंच पर चढ़ने का चाव बहुत महंगा पड़ा है , जाने किस किस की कैसी निगाह है। सजी धजी बन संवर कर आई थी और दुप्पटा खो गया , लाज के मारे घर भी नहीं जा सकती। 
         जो लोग बेटियों का नाम कविता ग़ज़ल रखते थे शायद आजकल पछताते हों , नहीं ऐसा तो नहीं सोचा था। दो बहनों की दर्द भरी दास्तां है , कौन किसे तसल्ली दे ऐसे में। आयोजक अपना हिसाब लगाते हैं कविता ग़ज़ल कोई हिसाब किताब की बात नहीं हैं। भीड़ जमा होती है उनके नाम से मगर नाम जिस कारण हुआ जब वही नहीं बचा तो कवि शायर नहीं बिकाऊ सामान बन गए हैं। ये शोहरत भी बड़ी बुरी चीज़ है , सोचने ही नहीं देती सच और झूठ को। दरबार में बादशाहों का गुणगान करने वाले भी कविता की लाज रखते थे , अकविता नहीं करते थे। कविता के अस्तित्व का सवाल होने लगा है , छंद , दोहे , गीत , मुक्त छंद तक भी ठीक ही था मगर अकविता की कविता नहीं उचित।  थोड़ा तो रहम करो बेचारी कविता और ग़ज़ल वास्तव में रोने लगी हैं लोग हंसते है जिसे सुनकर वो ये नहीं हैं कोई और है।

Saturday, 2 June 2018

भूली बिसरी कहानी ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

      भूली बिसरी कहानी  ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया 

       बनने को तो ये उनकी कहानी उपन्यास भी बन सकती थी , मगर अब ज़िंदगी शीर्षक से लघुकथा बनकर रह गई है। अभी कुछ दिन हुए उसी मेरी लिखी पुरानी कहानी के दूसरे पात्र से फिर से मुलाकात हो गई। पहले आशिक से बात होती थी उसकी महबूबा का इतना ही पता उसने बताया था कि उस नाम की फेसबुक किसी दोस्त के बनाई है मगर फेसबुक पर रहती नहीं है केवल नाम को बना रखी है। उसने मेरी कुछ रचनाओं को कॉपी पोस्ट किया हुआ था जो मुझे पसंद नहीं और मुझे उसको ब्लॉक करना ही उपाय लगा। मगर इक दिन राह चलते अजनबी व्यक्ति से सफर में बात हुई तो मेरा नाम सुनकर उसने बताया कि अभी जिस लड़की से मिलने गया हुआ था वो मेरी रचनाओं की पाठक है और प्रशंसक भी है। सफर में उसने अपनी प्रेम कहानी बताई और लिखने को भी कहा नाम बदलकर। फिर मुलाकात नहीं हुई मगर कुछ महीने फोन पर बात करता रहा और जो जो होता बताया मुझे। अभी अधूरी थी कहानी मगर बाद में पता चला उस लड़की की किसी सहेली ने उनको घर से भागकर शादी करने में सहयोग दिया। उस आशिक का नंबर बदल गया और सालों से फिर बात नहीं हुई। 
                                कुछ दिन पहले फेसबुक पर दोस्त बनाया तब पता चला ये वही है। मगर समझ नहीं आया माजरा क्या है। फेसबुक पर विवाहित पति पत्नी की तस्वीर देखी तो हैरान हुआ , ये कोई और है जो मुझे मिला वो तो नहीं है। अपने दुविधा मिटाने को मैसेज किया शायद आप वही हैं जिनकी बात मुझे बताई थी किसी ने। कुछ दिन बाद जवाब मिला आपको याद है , मैंने कहा आपने ही कहानी में अपनी पसंद का नाम प्रेमी का दिया था ये भी याद है। पता चला जिस से इश्क़ किया था और घर से भागकर बगावत कर साथ साथ रहे उससे निभी नहीं और वापस घर चली आई है और अब शादी किसी और से की है। वास्तव में आधुनिक युग में ऐसा ही इश्क़ होता है जो कब आशिक और महबूबा के दिमाग से इश्क़ वाला भूत उत्तर कर ज़िंदगी की असलियत को समझने लगता है और भावना की बात त्याग देता है कोई नहीं जनता। मुझे कहा है जो बातें आपको बताई थी उसके आशिक़ ने किसी को मत बताना।  क्या नहीं बताना मुझे नहीं पता कोई भी बात राज़ की रही नहीं और किसी और को मैंने उनका नाम भी नहीं बताया अभी तक।  राज़ को राज़ ही रहने तो दूं मगर राज़ है क्या मुझे समझ नहीं आया। विवाह की शुभकामनाएं और उन दोनों का साथ इस जन्म बना रहे यही दुआ है।  अगले जन्म में कौन क्या होगा भगवान जाने।

Friday, 1 June 2018

विरोध की सच की आवाज़ अपनी साहूलियत के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   विरोध की सच की आवाज़ अपनी साहूलियत के साथ ( आलेख ) 

                                   डॉ लोक सेतिया 

    ये विषय तो बहुत पुराना है और मैंने इसको लेकर पहले भी लिखा भी है। मगर शीर्षक का विचार अभी अभी इक महिला के विडिओ यूट्यूब में उनकी बात सुनकर आया है। उन्होंने अपने विभाग के सरकारी नौकरी के काल में अपने अनुभव को लेकर बताया। ये भी बताया कि जिसको हमने पकड़ा आरोप लगाए और दोषी साबित किया वो वास्तव में अपराधी नहीं था , बकरा था। अर्थात गुनहगार कोई और था मगर हमने सज़ा किसी और को दिलवाने में इक हथियार बनकर काम किया। जब आप नौकरी में होते हैं तब तमाम गलत कार्यों में शामिल होते हैं अपनी मर्ज़ी से या मज़बूरी से , तब खामोश रहते हैं लेकिन जब आपका नाम हो जाता है तब पुरानी घटनाओं की असलियत बताते हैं मगर ये नहीं बताते कि आप भी हिस्सा थे सरकार और विभाग के आपराधिक कारनामों का। बहुत नाम हैं और बहुत विभागों से बड़े बड़े पदों पर रहे हैं , जब राजनीति में आये या फिर समाजसेवा की दुकान लगाई जिस में लाखों करोड़ों का चंदा दान और सरकारों से लाभ मिलता है , तब आप सच के पुजारी और झंडाबरदार बन पाक साफ़ दिखना चाहते हैं। अख़बार में कॉलम लिखते लिखते किसी दल में मंत्री बन गए तो सच लिखना क्या समझना भूल गए। सच तब सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते थे। इक घटना की बात बताई कि कुछ नेताओं पर संदेह था और फोन टेपिंग की जा रही थी , इक सुबह आगजनी और अपराध की बातें सुनकर करवाई की और जो नेता लोग चाहते थे नहीं हुआ , मगर सबूत थे और रिपोर्ट दर्ज की गई मुकदमा दायर किया गया मगर सालों तक अंजाम तक नहीं पहुंचा क्योंकि बड़े बड़े नेताओं के पास बचाव को बड़े बड़े वकील होते हैं जो सब के लिए नहीं होते हैं। और फिर इक दिन उनका मुकदमा ही सरकार ने वापस ले लिया था। ये बात आपने तब क्यों नहीं बताई अदालत को कि ऐसा क्यों किया जा रहा है , आपको अधिकारी मंत्री आदेश देता है अनुचित कार्य करने के और आप सवाल नहीं करते इनकार नहीं करते , विरोध नहीं करते साथ देते हैं। जब आपको सुविधा है कि आप पर आंच नहीं आएगी तब आप सोशल मीडिया और टीवी चैनल या अख़बार को बताते हैं और महान कार्य करने का दम भरते हैं। ऐसे लोग देश में सब बदलने की बात कहते हैं तो धोखा है। दोस्तो संभलना और सोचना उनकी बात का दूसरा पक्ष भी है जो इसी के पीछे छुपा हुआ है कि तब क्यों नहीं बताया और आज जब बता रहे तब क्या मकसद है।

Thursday, 31 May 2018

आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      सोशल मीडिया पर कुछ लोग यही कर रहे हैं। ऐसे कहावतें बहुत हैं और अधिकतर उनमें किसी न किसी जीव जंतु की बात होती है। वैसे तो सिख गुरुओं की बाणी में भी उस बात पर सवाल उठाया गया है जिसमें मान्यता है कि धरती इक बैल के एक सींग पर टिकी हुई है और जब बैल थककर सींग बदलता है तो भूकंप आता है। सोचने की बात है कि  वो बैल भी खड़ा है तो उसके नीचे इक और धरती है फिर उस धरती के नीचे इक बैल और होगा।  ऐसे कितनी धरती कितने बैल।  विज्ञानिक चांद और बाकी ग्रहों तक जा पहुंचे अपने नीचे की धरती की सुध नहीं अभी भी। मगर बात आसमान की है , किस ने उठा रखा है। इक मान्यता की तरह कथा है कि इक बेहद छोटा सा जीव है जो जगता रहता है क्योंकि सब ने समझाया हुआ है कि जब कयामत आती है तो आसमान टूट कर धरती पर गिर जाता है , और जब भी उसको सोना होता है तब भी वो अपनी चारों टांगों को ऊपर की तरफ ही रखता है ये मानकर कि आसमान गिरा तो वो थाम लेगा। कुछ लोग खुद मानते हैं या नहीं मगर सभी को मनवाना चाहते हैं कि देश एक व्यक्ति के बिना नहीं कायम रह सकता। उन्होंने अपने हाथ पैर ऊपर आसमान की तरफ उठा रखे है ताकि उस नेता को सत्ता नहीं मिली तो वो उसी जीव की तरह कयामत को रोक लेंगे। उन्हें देश के इतिहास और संविधान का कुछ पता नहीं है उनके लिए जो उनका आका कहता है वही सच है। कितने झूठ पकड़े गए हैं और अभी भी झूठ पर झूठ बोल रहा है मगर तब भी आका को झूठा नहीं मानते हैं ये। 
       इक ऐसे बचपन के सहपाठी से बात हुई , हालांकि ऐसे लोग कभी विचार विमर्श और सार्थक वार्तालाप करने में यकीन नहीं रखते। जो उनकी बात से सहमत नहीं उसको भला बुरा कहने से देश का दुश्मन तक बता सकते हैं। उनको स्वस्थ लोकतंत्र में मतभेद और बहस का मतलब नहीं पता। बंद कुवें में कैद कैफ़ी आज़मी की कविता के लोगों की तरह , रौशनी चाहिए आज़ादी चाहिए का शोर मचाते हैं मगर कोई उनको कुंवे से बाहर निकाले तो घबरा जाते हैं खुली हवा और रौशनी को देख कर , और खुद ही  वापस छलांग लगा देते हैं कुंवे के अंदर। और फिर से नारे लगाने लगते हैं। मगर ये मेरे सहपाठी हैं और भले सीधे नहीं टेङी तरह से राजनीति में हैं फिर भी शिक्षित हैं और सभ्य दिखाई देना भी चाहते हैं , तो बात की जा सकती थी। मैंने कहा आपको क्यों लगता है वही नेता सब ठीक कर रहे हैं , कमियां नहीं बताता आप अच्छाई क्या है बतला दो। जो जो भी कहते थे हुआ हो या किया हो तो दिखाओ , जवाब देते नहीं बना। ऐसे में उनके पास तुरुप का पत्ता यही होता है कि दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। उनकी समझ पर दया आती है। क्या इतना बड़ा देश एक व्यक्ति का कोई विकल्प नहीं तलाश कर सकता , कितनी बार कितने लोगों का ये भ्र्म तोड़ा है देश की जनता ने। बात उल्टी है उनके पास या उस नेता के पास विकल्प नहीं है , और किसी देश में उनको कुछ भी नहीं मिल सकता। 
                       सालों से देखता रहा हूं इन लोगों को , कभी उस दल में कभी इस तो कभी किसी तीसरे दल में होते हैं। जिस दल में होते उसी के नेता को दंडवत चरण वंदना करते देखा है। अपनी आयु से बीस साल छोटे दल के नेता के सामने पांव को हाथ लगाते  भरी सभा में। एक दोस्त चुनाव से कुछ दिन पहले बता रहे थे ये दल किसी की कदर नहीं करता है तीस साल रहने पर कुछ नहीं हासिल हुआ तब अपमानित होकर दूसरे दल में शामिल हुआ हूं , यहां बहुत अच्छा है। मगर हैरान हुआ जब फिर से वापस उसी दल में चले गए वो भी आदर की बात भुलाकर क्योंकि चुनाव में टिकट उन्हें नहीं किसी और को दिया गया। साफ़ कर सकता हूं कि जिस की बात पहले की उनके परिवार में किसी को। मगर अब दोनों एक साथ एक दल में हैं , बराबर भी हैं क्योंकि एक को टिकट मिला नहीं दूसरा चुनाव हार गया। ये दोनों जब हारते हैं तो अपनी बिरादरी को दोष देते हैं और जीत जाते तो अपने नेता को श्रेय देते हैं। यही इनकी समझ है कि वोट देने वाली जनता का दिल से आभार कभी नहीं मानते हैं। 

                     आपने सुना होगा इक स्टिंग ओप्रशन कोबरा पोस्ट ने किया अभी अभी बताया गया है। उस में तमाम मीडिया वालों को टीवी चैनल वालों से लेकर पेटीएम तक उसी जीव की तरह पीठ के बल लेटकर शोर मचाना था कि अगर इक नेता को नहीं जिताया तो कयामत आने वाली है। वो सब ऊपर को चारों टांगें कर आसमान को गिरने से बचाने का काम कर रहे है , मगर देश की खातिर नहीं पैसे की खातिर।

      जिसकी बात है उसने पहले ही बताया था मैं आपका पहला सेवक हूं। कुछ लोग बार बार सेवक शब्द उपयोग कर याद दिलवाते हैं बहुत भोले हैं। सरकारी नौकरी भी सेवा कहलाती है , मगर आप एक बार जिसे रख लिया आसानी से हटा नहीं सकते हैं। काम नहीं करना नौकरी से हटाने का कारण या बहाना नहीं हो सकता। ये खुद को जनता का निर्वाचित सांसद समझ ले तो बात पांच साल की हो जाती है , सेवक बनकर हमेशा सर पर चढ़े रह सकते हैं। इरादा साफ है अभी भी नहीं समझे तो और उदाहरण भी हैं। इक दवा कंपनी में नौकरी मिली मगर काम नहीं करते थे , घटना वास्तविक है , कंपनी से मिले दवा के मुफ्त डॉक्टरों को देने वाले सैंपल बेच देते केमिस्ट को। पता चला तो कंपनी ने नौकरी से हटाया भी , कोई सरकारी नौकरी भी नहीं थी , मगर एम आर एसोसिएशन साथ खड़ा हुआ तो उसे वापस रखना पड़ा। मगर निजि कंपनी वाले भी कम नहीं होते हैं , उनको जाल बिछाना आता है। कुछ दिन बाद उस को तबादला कर मैनेजर बना दिया और उसके बाद मैनेजर को काम नहीं करने पर हटा दिया। अब समझ आया कि नहीं। सेवक जिस जगह काम करते हैं हमेशा ध्यान रखते हैं कोई और उस जगह उसकी जगह काम नहीं कर सके। किसी दूसरे को अपनी जगह आने ही नहीं देते हैं।
                             लोग आज तक समझे नहीं सेवा में मेवा है का अर्थ क्या है। कुछ साल पहले की बात है हमारी एसोसिएशन के दो सदस्य मीटिंग में अपने अपने नाम का समर्थन देने की मांग करने लगे। संस्था को राजनीति से कोई सरोकार नहीं है और किसी को भी समर्थन नहीं मिलना था उनको भी पता था। आपसी हंसी मज़ाक में बात करते करते उनसे पूछा गया कि इतना लालायित क्यों हैं विधायक बनकर क्या करोगे।  इक सदस्य खुशमिज़ाज हैं बोले यार पिछले दल में घर फूंक तमाशा देखा है , दलबदल किया ही है घाटे की भरपाई और कमाई करने को। ये कोई राज़ की बात नहीं है , लोग शहर के वार्ड के पार्षद बनते हैं तो मालामाल हो जाते हैं। सभापति बनने की चाह रखने वाले लाखों देते हैं ताकि सभापति करोड़ों लूट सके। सारा खेल पैसे का है।
                             आखिर में बात आसमान से शुरू की थी उसी पर आते हैं। आसमान का कोई अस्तित्व होता ही नहीं है , सब जानते हैं ये हमारी नज़रों की सीमा है और कुछ नहीं। डरिये नहीं आज तक आसमान के गिरने टूटने की कोई कथा कहानी तक नहीं लिखी मिलती है। ये जो आसमान उठाये हुए हैं का दावा करते हैं उनकी असलियत यही है। गांव वाले बताते हैं गड्डा , जिसे बैलगाड़ी कहते हैं , उसके नीचे नीचे इक कुत्ता चलता हुआ समझता है कि गड्डे का बोझ उसने उठा रखा है। देश चल रहा है जनता के दम पर किसी को मुगालते में नहीं रहना चाहिए।

Wednesday, 30 May 2018

तुझे किस बात का डर है ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

       तुझे किस बात का डर है ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

   गीता गीता रटते हो गीता को पढ़ा नहीं और पढ़ा भी तो समझा नहीं। पहली बात अत्याचारी अन्याय करने वाले लोग कभी शूरवीर नहीं होते हैं। कायर होते हैं डरे हुए होते हैं। आज जिस से डर रहे हो सच बोल नहीं सकते वो भी डरा हुआ है। उसे शिखर से गिरने का डर उसी पल से है जब से वो शिखर पर चढ़ गया था। हम नहीं जानते वो तब भी घबराया हुआ था। उसके पीछे इक भूत का डर था और उसी डर से भागता भागता वो शिखर पर जा पहुंचा था। सब को दिखलाता है मैंने कहां से कहां पहुंच गया मगर खुद अभी तक उसी अतीत वाले भूत का खौफ बाकी है। उसे अभी घबराहट है और भीतर से अंदेशा है कि जैसे पहले बहुत लोगों के साथ होता रहा है , ऊंचाई से नीचे गिरने का , आकाश से पाताल का सफर बहुत कठिन होता है। शोहरत से बदनामी का रास्ता अकेला कर देता है। गीता समझाती है मौत कुछ नहीं है , हथियार डालना मौत से भयानक है। अत्याचारी से लड़ना साहस की बात है , हार जीत महत्व नहीं रखते। तुम कवि हो वीर रस की कविता लिखना छोड़ इस दौर में खुशबू की फूलों की ज़ुल्फ़ों की आंखों की कविता लिखने लगे , रणछोड़ बन रहे हो। हर पल ही मर रहे हो। 
                           हर ज़ुल्म करने वाला जब हद से अधिक क्रूर हो जाता है तभी उसका अंत आता है। याद करो तानाशाहों के ज़ुल्म ही आज़ादी की आधारशिला रखा करते हैं। पापी के पाप का घड़ा भरता है तभी फूटता भी है। भूल गये जब तोप मुकाबिल हो कलम उठाओ , तलवार कभी जीती नहीं कलम से। अपने अंदर आग भर कर अपने शब्दों की ज्वाला से रौशन कर दो अंधेरे में डूबी महफिलों को। सौ बरस कायर बनकर जीने से बेहतर है कुछ दिन निडरता से साहसी बनकर जी लेना।
वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ,
शख्स जो सच की राह चलते हैं। 

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ ,
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं। 

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे ,
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें ,
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं। 

जान रखते हैं वो हथेली पर ,
मौत क़दमों तले कुचलते हैं। 

कीमत उनकी लगाओगे कैसे ,
लाख लालच दो कब फिसलते हैं। 

टालते हैं हसीं में  वो उनको ,
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं। 
 

अपनी ही ग़ज़ल को दोबारा दोहराता हूं , फिर से गुनगुनाता हूं।  सच की राह का मुसाफिर हूं , झूठ से टकराना है टकराता हूं।

कोई कानून नहीं , सब ठीक ठाक है ( स्वास्थ्य की बात ) - आलेख - डॉ लोक सेतिया

         कोई कानून नहीं , सब ठीक ठाक है ( स्वास्थ्य की बात )

                        आलेख - डॉ लोक सेतिया 

    अख़बार में ये खबर बहुत छोटी सी छपी है , न्यूज़ डायरी एक तरफ बहुत छोटी छोटी खबरें इक साथ देते हैं अख़बार वाले। कोई ध्यान ही नहीं देता , अख़बार वालों को भी ये महत्वपूर्ण नहीं लगती हैं। खबर लिखी है कि अब एक कमरे में नहीं खुलेगी पैथोलॉजी लैब। ये लिखा है कि आप हैरान होंगे कि अभी तक देश में कोई कानून ही नहीं था ठोस इस बारे में। साथ में ये भी जानकारी दी गई है कि स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा पारित , क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट भी कुछ ही राज्यों की सरकार ने लागू किया है जिसे बने कितने साल हो गए हैं। इस से समझ सकते हैं देश की सरकार और राज्यों की सरकारें नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति किस हद तक लापरवाह और गैर ज़िम्मेदार हैं। पिछले दिनों जब हरियाणा में गुड़गांव और दिल्ली में राजधानी में लाखों रूपये के बिल वसूलने की लूट जैसी घटनाओं का शोर मचा तो हरियाणा के बहुत बोलने वाले स्वस्थ्य मंत्री ने क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट एक्ट लागू करने की बात कही। मगर बाद में अस्पताल वालों के दबाव में जनता के हित दरकिनार कर घोषित किया गया कि पचास बिस्तर वाले अस्पतालों पर एक्ट लागू नहीं होगा। ये शायद हमारे देश के नेता ही कर सकते हैं , कोई कानून किसी पर लागू हो किसी पर नहीं , फिर संविधान की बात कहां है जो सब के साथ समानता और न्याय की बात करता है। यहां इक पुरानी बात याद करना ज़रूरी है , जिस कानून की बात की जा रही है और जिसको अधिकतर राज्यों में लागू नहीं किया है , उस से पहले डॉ रामदास जी ने स्वास्थ्य मंत्री होते इक कड़ा कानून लाने का प्रयास किया था जिस में विश्व स्तर के नियम लागू करने का विचार था ताकि लोगों की जान से खिलवाड़ कोई नहीं कर सके। मगर उनको स्वस्थ्य मंत्री पद से ही हटा दिया गया था। मनमोहन सिंह जी बेशक ईमानदार समझे जाते हैं मगर उन्हीं की सरकार में एक ईमानदार मंत्री को सही दिशा में काम करने पर हटा दिया गया। जब सभी लोग चाहते हैं उन पर कोई नियम कानून लागू नहीं हो और कानून हो तो भी पालन नहीं करना चाहते ये कहकर कि ऐसा संभव नहीं है तब कुछ भी ठीक कैसे हो सकता है।
                       सब से अधिक विडंबना की बात तो ये है कि सरकारों का सारा समय ध्यान ही अपनी अपनी सहूलियत की राजनीति साधने में और सत्ता विस्तार में रहता है। गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य उनके अजेंडे में ही नहीं हैं। नियम कानून बनाने में हम बीस तीस साल पीछे रहते हैं। जैसे अभी अस्पतालों को तो छोड़ दिया गया है मगर लैब पर एक्ट लागू करना चाहते हैं , क्या लैब पचास बिस्तर वाले अस्पताल से अधिक गलतियां कर सकती है। वास्तविकता को नेता सरकार समझते ही नहीं हैं , आजकल अधिकतर टेस्ट टेक्नीशियन या डॉक्टर नहीं करते मशीनों से होते हैं टेस्ट। बेशक लैब में क्वॉलिफाइएड डॉक्टर होने चाहिएं , मगर क्या पचास बिस्तर के अस्पताल में कितने डॉक्टर कितना स्टाफ हो ये ज़रूरी नहीं है। किसी सरकारी नागरिक अस्पताल में पचास बिस्तर होते हैं तो पचास डॉक्टर और दो सौ लोग बाकी नर्स कम्पाउंडर आदि रहते हैं। अगर निजि नर्सिंग होम बीस बिस्तर का है तो एक या दो डॉक्टर से कैसे सही उपचार किया जा सकता है। कोई नियम नहीं है स्टाफ कितना क़्वालिफ़ाइड हो , साथ में अपनी दवा की दुकान और लैब से टेस्ट करवाना और सब में हिस्सा लेना। ये कोई उचित तरीका नहीं है , बहुत अस्पताल बाहर लिखा होता है चौबीस घंटे सेवा की बात मगर वास्तव में कोई डॉक्टर रहता नहीं है हर समय। अधिकतर नर्सिंग होम दावा करते हैं जिन सेवाओं का उनका प्रबंध होता ही नहीं है।
                                         आजकल स्वास्थ्य , शिक्षा दोनों सेवा के नहीं अधिक से अधिक कमाई के कारोबार या धंधे बन गए हैं। सरकार भूल गई है कि ये दोनों बातें सभी की ज़रूरत हैं और आधी आबादी निजि स्कूलों की फीस नहीं भर सकते न ही निजि अस्पतालों के भी बिल भर सकते हैं। लेकिन सरकारी अस्पताल तो किसी सरकार को ज़रूरी लगते ही नहीं कि उनकी ही व्यवस्था सही की जाये। कितना धन बेकार के इश्तिहारों पर सरकारी विभाग बर्बाद करते हैं उसे बंद कर उतना धन स्वस्थ्य और शिक्षा पर लगते तो अच्छा होता। कानून बनाने से पहले ही उसे प्रभावी ढंग से लागू करने की भी इच्छाशक्ति होनी चाहिए और ये भी समझना चाहिए कि हमारे देश में उसे किस तरह संभव किया जा सकता है।

Tuesday, 29 May 2018

इस दौर को परिभाषित करते मुहावरे और लोकगीत - डॉ लोक सेतिया

  इस दौर को परिभाषित करते मुहावरे और लोकगीत - डॉ लोक सेतिया

शेर ग़ज़ल :-

अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई। 
मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां ,
ऐसी हमारे देश की कैसे सियासत बन गई। 

( सब मनोनीत लोग सत्ता पर बिठाये हुए हैं , कठपुतिओं की तरह से , 
 ये लोकतंत्र में कैसे हुआ कि कोई भी जनता द्वारा निर्वाचित नहीं है ) 

दोहे :-

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर ,
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा है चोर। 
चमत्कार का आजकल अदभुत है आधार ,
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार। 
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इंसान ,
दो पैसे में बेचता ये अपना ईमान। 
झूठ यहां अनमोल है सच का ना व्यौपार ,
सोना बन बिकता यहां पीतल बीच बाजार। 

लकोक्तियां :-

राजनीति हो इश्क़ हो या दोस्ती , मुहब्बत प्यार कुछ नहीं ,
ज़रूरत है तो संबंध हैं , जो डराता है उसे खुदा बना लेते हैं। 

सखी वो ज़माना और था लोग पसंद करते थे उसे चुनते थे ,
अब आशिक डराता है मेरी नहीं बनोगी तो मर जाओगी। 
शासक भय पैदा करता है और इक शोर खड़ा करता है ,
मुझे नहीं चुनोगे तो बहुत पछताओगे , समझ लो इसे।

आदर्श , मूल्य , नैतिकता , धर्म :-

सरकार झुकती है इक अपराधी के सामने , जो चुनौती देता है देश को , 
खुद को धर्मगुरु बताकर , सब धंधे करता है , गुनहगार खुद है दोष औरों के बताता है। 
बेशर्म नेता सत्ता की खातिर हर सीमा तक नीचे गिर सकते हैं। 

कोई और है जो खुद को देश समाज की सेवा करने वाला सच्चा बताता है ,
बाकी सबको लालची मिलावटी सामान बेचने वाला कहकर खुद बेचता ,
जो कभी नहीं बनाता है मुनाफा कमाकर करोड़ो अरबों कमाता है ,
किसी को नहीं पता उसका अतीत , कोई नहीं जनता कैसा बही-खाता है। 

ये समुंदर खारा है नहीं इसका पानी कभी प्यास बुझाता है ,
सब मीठी नदियों का जल मिलता है फिर भी खारा है प्यासा है। 

धनवान :-

इनकी हवस बढ़ती जाती है कभी खत्म नहीं होती है ,
सब से अधिक गरीबी इन्हीं की सच में होती है। 
पैसा इनकी शान है पैसा ही इनका भगवान है ,
सभी कुछ है पास नहीं इनके पास केवल ईमान है। 
सब अमीर जानते हैं कैसा ये इक हम्माम है ,
विश्वास किसी धनवान का नहीं हर इक बेईमान है।
 

ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   पहले संक्षेप में आज ही की बात। कल रात को किसी व्यक्ति ने जौनपुर से फोन किया राष्ट्रधर्म पत्रिका में मेरा लेख पढ़कर। मेरे पास पत्रिका नहीं आई थी , डाकघर सामने ही है इसलिए सुबह जाकर देखा जहां डाक छांटते हैं मेरी दो पत्रिकाएं रखी थी। तब केवल सफाई करने वाले आये हुए थे और डाकखाना खुलने में अभी समय था। मैंने उस सफाईकर्मी को बताया कि मेरा नाम डॉ लोक सेतिया है और ये मेरे ही नाम की डाक है मैंने ले जा सकता हूं। जी नहीं उसने कहा आप बाद में आकर ले जाना जब डाकिया या और डाकघर के लोग आ गए हों तभी। मुझे बहुत अच्छा लगा उसका वो काम नहीं करना या करने देना जिसका अधिकार उसको नहीं है। उसी डाकघर में दो लोग काम करते हैं एक डाकिया जो डाक बांटने में कुछ देरी कर रहा था अन्यथा मुझे कल ही पत्रिका मिल जाती , और दूसरा ये जो जनता है कि जिस जगह वो काम करता है उस जगह रखी किसी चीज़ को छेड़ना उसका अधिकार नहीं है। सलाम उस सफाईकर्मी को। मुझे कई बातें याद आ गईं हैं पुरानी। बी के चम जी लिखा करते थे अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में कॉलम। अंत में उस लेख की बात बतानी है , पहले आज की बात। 

                                  अधिकारों के दुरूपयोग की बात

 सरकारें बदलती हैं सरकारी तौर तरीके नहीं बदलते , ढंग नहीं बदलते। कल कोई कर रहा था और कोई और कर रहा है। कल तक अधिकारी उस दल के नेता के लिए अनुचित कार्य करते थे अब इस दल के नेता के लिए करते हैं। बदला कुछ भी नहीं बल्कि और अधिक खराब हालत होती जाती है। हरियाणा रोडवेज़ की खबर आई है कि जो कंडक्टर क्लर्क का काम पर लगा रखे थे उनको अपने काम पर लगाया जायेगा ताकि बस सेवा सही हो सके। ये अकेली घटना नहीं है , शहर के पार्क पर नियुक्त बताये माली बड़े अधिकारी की कोठी पर काम करते हैं , इतना ही नहीं पुलिस के सिपाही अफ्सरों के घरेलू नौकर की तरह काम करते हैं। पुलिस के बड़े अधिकारी अपने विभाग के सिपाही से ऐसा काम लेने देते हैं और अधिकारी भी ऐसा करते संकोच नहीं करते। सत्ता और पद का दुरूपयोग तो है ही साथ में छोटे पद पर नियुक्त सुरक्षाकर्मी कुंठा का शिकार हो जाते हैं। हम सोचते ही नहीं क्यों किसी सिपाही ने ख़ुदकुशी कर ली या किसी को मार डाला। जिन लोगों को नियम कानून लागू करने हैं वो खुद किसी नियम किसी नैतिक मूल्य की परवाह नहीं करते हैं। मगर आम नागरिक पर नियम लागू करने में इनका रुख बदल जाता है। किसी से घूस लेते हैं तो उसकी बड़ी से बड़ी गलती भी नहीं दिखाई देती और किसी को परेशान करना चाहते तो अकारण ही कमियां तलाशते हैं। फिर से इक बात को दोहराना ज़रूरी है कि देश में कोई भी सत्ताधारी नेता कोई भी घोटाला बिना सचिव आईएएस अधिकारी की मिलीभगत नहीं कर सकता है , क्योंकि संविधान में किसी भी चेक या भुगतान पर पहले अधिकारी के हस्ताक्षर होना लाज़मी है। इसका मतलब यही हुआ कि हर नेता के हर घोटाले में अधिकारी वर्ग शामिल होता ही है। ये वास्तव में शर्मनाक है , जिनको आम नागरिक की आमदनी से कई गुना अधिक वेतन मिलता है , सुख सुविधा सुरक्षा मिलती है वही देश और संविधान के लिए ईमानदार और वफादार नहीं होते। 

                      काला धन और नोटबंदी तथा उसका नाकाम होना

        अब ये कोई राज़ की बात नहीं है कि नोटबंदी असफल रही है। कारण बहुत हैं और नीयत की भी बात साफ़ नहीं होना इसमें आती है। गरीब लहरों पर बिठाये जाते हैं पहरे , समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता। मगरमच्छ सुरक्षित हैं मछलियां मर गई सभी। मुझे लगा था जैसे कोई बाज़ार से आटा दाल सब्ज़ी घी तेल सब शुद्ध लेकर खाना पकाये और सबको प्यार से खिलाये मगर लोग बिमार हो जाएं। क्योंकि आपने जिन बर्तनों में खाना बनाया और परोसा वही साफ़ नहीं थे , खाना गंदा होना ही था। सरकार की रसोई में सभी बर्तन अर्थात जिन बैंकों से ये सब करवाया गया वही ईमानदार नहीं थे। कितने बैंक वालों ने बहती गंगा में खूब मस्ती की बहुत दिन तक नहाये नंगे होकर। आपके सब नियम बेकार हुए। मगर यहां भी अजीब घोटाला हुआ। सरकारी बैंकों में घोषित किया गया कि इस काम में जितने लोग ओवरटाइम करेंगे उनको उस समय के अतिरिक्त पैसे मिलेंगे। अब सब से अधिक काम उन्होंने किया जो लोग कैश काउंटर पर ड्यूटी देते हैं , लेकिन अधिकतर हुआ ऐसा कि मैनेजर और बड़े अधिकारीयों के लिए लिखा जाता रहा अधिक समय काम किया और जो स्टाफ काउंटर पर भुगतान करता जमा करता जिसे सांस लेने की फुरसत नहीं मिली उनको नहीं मिला कुछ भी या फिर नाम मात्र को। जब तक हस्ताक्षर करना काम समझा जायेगा और वास्तविक काम करने वाले की उपेक्षा की जाती रहेगी सही कामकाज नहीं हो सकता। 

                                    बी के चम के लेख की बात

   उन्होंने अपने लेख में तीन ईमानदार लोगों को लेकर लिखा था। मुझे दो घटनाएं याद हैं तीसरी भूल गई है। एक बार वो अपने इक अधिकारी दोस्त से मिलने गए तो पता चला वो नौकरी के लिए आये आवेदकों का इंटरव्यू ले रहे हैं। कमरे में जाते उनको फोन पर बात करते देखा सुना और लिख रहे थे कागज़ पर , समझ गया कि नेता जो मंत्री हैं किसी की सिफारिश कर रहे हैं। बेहद निराशा हुई ये भी सिफारिश पर किसी को नौकरी देते हैं। मगर तभी बात समाप्त करते हुए उनहोंने कहा मंत्री जी आपका दिया नाम लिख लिया है और आप उनको बता सकते हैं कि उनको साक्षात्कार के अयोग्य घोषित किया जा रहा है नियमानुसार ऐसा सिफारिश करवाना अयोग्य बना देता है। मान गए उनके हौंसले की बात को , कोई चिंता नहीं थी , क्या होगा अधिक से अधिक तबादला। 
    दूसरी घटना शिमला की माल रोड की है , इक बड़े अधिकारी कार में जा रहे थे कि इक सुरक्षकर्मी अवरोधक लगा कर खड़ा था , साहब ने ड्राइवर को भेजा बताओ कौन हूं और रास्ता खुलवाओ। नहीं माना वो तो खुद नीचे उतर कर उसके पास जाकर बोले जानते हो मैं अमुक विभाग का आला अधिकारी हूं और कभी किसी दिन तुम्हारी नियुक्ति मेरे आधीन भी हो सकती है। जी मैं जनता हूं उसने कहा। अधिकारी बोले सोचो तब क्या होगा तुम्हारा। उसका जवाब था सर , तब आपको यकीन होगा कि कम से कम एक आदमी आपके आधीन ऐसा है जो अपना कर्तव्य निभाता है ईमानदारी से। मेरी निष्ठा अपने काम और देश के लिए है। सैल्यूट किया था उस अधिकारी ने और धन्यवाद किया था ये सबक समझाने के लिए।