Wednesday, 18 April 2018

हसरत ही रही ( अधूरा ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया

       हसरत ही रही ( अधूरा ख़्वाब ) डॉ लोक सेतिया 

अकेला चला जा रहा था ,
राह में मिले कुछ लोग ,
वही पुरानी पहचान थी , 
वही बचपन की बातें हुईं। 
उन्हें भी गांव ही जाना था ,
रास्ता कब कैसे कट गया ,
पैदल चलते चलते नहीं पता ,
कोई थकान नहीं थी किसी को। 
घर की गली में आते याद आया ,
किसी जगह जाना था सभा में ,
थोड़ा समय अधिक हो गया था ,
सोचा पहले मां से मिलता हूं। 
दिल में इक हसरत थी उठी ,
आज अपनी झाई ( मां ) से ,
पांव छूने की जगह पहले जाते ,
कस कर लगना है मुझे गले। 
याद नहीं आता मुझे कभी भी ,
हुआ होगा ऐसा वास्तव में ,
सोचा भी नहीं लगता अजीब ,
दरवाज़ा खोला गया करीब। 
सब अपनों से राम राम हुई ,
रसोई में बना रही थी मां कुछ ,
बाहर से खुशबू आ रही थी ,
सुनाई दिया स्वर मां गा रही थी। 
गले मिलता पांव छूकर तभी ,
पास जाता अपनी मां के करीब ,
नींद खुली अधूरा रह गया ख़्वाब ,
हसरत दिल की हसरत ही रही। 
कितने बरस बीत गए इस बीच ,
दुनिया से चली गई मां भी ,
बचपन कहां अब बुढ़ापा है ,
नहीं उस गली गांव से नाता है।

क्या हुआ क्यों हुआ को छोड़ो - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     क्या हुआ क्यों हुआ को छोड़ो - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

        जो लोग हमेशा अनुचित कार्यों को अनदेखा करते रहे , शायद अब उनको समझ आये कि बुराई को शुरुआत में ही मिटाया जाना चाहिए। निप दि ईविल इन दि बड। बात महिलाओं के साथ अपराध तक सिमित नहीं है। समाज के हर भाग में अनुचित ढंग से काम करने पर विरोध नहीं जताना , उसको अनदेखा करते जाना , और आखिर में समाज का उसे स्वीकार कर लेना , सब तो गलत है। मैंने जब भी किसी भी बारे खुलकर विरोध किया कुछ समझदार कहलाने वाले लोगों ने हर तरह से हतोत्साहित किया। आप इस तरह से तो किसी संगठन किसी संस्था में नहीं टिक सकते , हां नहीं रहना जहां करनी और कथनी में विरोधभास हो। आप दावा कुछ करें और वास्तव में कुछ और ही मकसद हो तो उसे समर्थन देना गलत को बढ़ावा देना होगा। 
अभी भी जाग जाओ , समाजसेवा धर्म और तमाम बुद्धिजीवी लोगों के काम , शिक्षा स्वास्थ्य सेवा और देश का प्रशासन तक कोई निजि स्वार्थ साधने की जगह नहीं हैं। मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों को छोड़ अपनी आमदनी , अपने स्वार्थ , नाम शोहरत हासिल करने को इनका दुरूपयोग नहीं किया जाना चाहिए। हर दिन देश इक बेहद भयानक डरावने भविष्य की तरफ जाता लगता है और हम खुद को देशभक्त कहने वाले खामोश हैं कुछ करना तो क्या बोलते तक नहीं हैं। इन सभी बातों ने हालत इस हद तक पहुंचा दी है। आजकल जो हो रहा है उसके लिए सरकारों अधिकारीयों और कानून और न्याय व्यवस्था के दोषी होने के साथ गंदी राजनीति और हमारे चुप चाप अनदेखा करने का भी हाथ है। बस अब अंत होना चाहिए।

Saturday, 14 April 2018

रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ( समाज और सरकारी संस्थाओं की वास्विकता ) डॉ लोक सेतिया

                रास्ता अंधे सबको दिखा रहे 

      ( समाज और सरकारी संस्थाओं की वास्विकता ) डॉ लोक सेतिया

      सब से पहले साफ़ करना चाहता हूं कि इस आलेख का एक ही मकसद है खुद को अपने समाज को अपनी सरकार को प्रशासन को समाजिक धार्मिक संस्थाओं को वास्तविकता बताना , आलोचना करने के लिए आलोचना करना कदापि नहीं और न ही किसी व्यक्ति या संस्था पर आक्षेप ही है। अभी की इक घटना से शुरआत करना सही होगा क्योंकि इस से सभी की आंखे खुल सकती हैं। मगर उनकी नहीं जो वास्तव में गंधारी की तरह आंखों पर पट्टी बांधे हुए हैं। महाभारत की बात नहीं करनी मगर सोचता हूं अगर किसी औरत का पति अंधा हो तो उसे अपनी आंखे खुली रखनी चाहिएं उसकी सहायता को या फिर खुद को खुद को अंधेरों में कैद कर लेना चाहिए। 
         खबर पढ़कर मन विचलित हुआ कि बलात्कार का विरोध करने को कैंडल मार्च में किसी महिला के साथ अनुचित आचरण किया गया। यही इस समाज का सच है जो खुद गंदी मानसिकता वाले हैं वो दूसरों को गलत बता खुद अपने गिरेबान में नहीं झांकते हैं। आज से नहीं अन्ना हज़ारे के आंदोलन में भी देखा रिश्वतखोर लोग मंच से भाषण देते रहे। मैं जयप्रकाशनारायण जी के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का साक्षी रहा हूं और जानता  हूं कि तब जो लोग शामिल थे बाद में सत्ता मिलते ही कैसे साबित हुए। आज भी लोग किसी भी काम में समाजिक सुधार करने को या समाज की सेवा करने को नहीं बल्कि उसको सीढ़ी बनाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करने को शामिल होते हैं। कुछ लोग जो किसी के सुख दुःख में शामिल नहीं होते समय का अभाव का बहाना होता है वही सरकारी विभाग की बनाई संस्था में सदस्य बनने को सब कुछ करते हैं और बाद में अधिकारीयों की हाज़िरी भी लगाते हैं। उन्हें अपने नाम के साथ लिखवाना होता है अमुक अमुक की समिति का सदस्य है। 

                                  उलटी गंगा बहाना

      पहले समझना होगा कि सरकार या कोई विभाग या अधिकारी जब कोई समिति बनाता है तो उसका घोषित मकसद क्या होता है। दावा किया जाता है कि जो लोग सरकारी अधिकारी से मिलने में डरते हैं या खुद विभाग में जाकर शिकायत नहीं करना चाहते उनसे ये समिति खुद मिलकर सहयोग कर सकती है और उनकी बात विभाग तक पहुंचा सकती है। मगर ये लोग कभी आम लोगों के पास जाकर नहीं पूछते कि आपको कोई समस्या या परेशानी हो तो हमें बताओ हम आपकी बात पहुंचा सकते हैं। उल्टा ये लोग चाटुकार बनकर जब किसी आम नागरिक ने किसी विभाग से कोई शिकायत की हो या कोई जानकारी दी हो गलत काम होने की तब उस विभाग के पैरोकार बनकर उस से कहते हैं हमें बताओ क्या बात है। ताकि उस विभाग की बातों पर परदा डालने को उस व्यक्ति से लिखवा सकें सब ठीक है बिना कुछ भी ठीक हुए। समिति जनता की बात की है या सरकारी विभाग और अधिकारी की बचाव की। मगर इन में शामिल लोगों को इन बातों का मतलब नहीं , उन्हें तो अपने नाम के साथ समिति का सदस्य होने का फायदा उठाना होता है समाज में ही नहीं सरकारी कामकाज में भी। उनके पर कोई अधिकार नहीं आपकी समस्या के हल का उनका काम डाकिये की तरह आपकी चिट्ठी ले जाने लाने का है। मगर डाकिये बहुत भले लोग हुआ करते थे जो सब के सुख दुःख में शामिल होते थे , अब तो डाकिया खत समय पर दे जाता है तो उपकार करता है। 

                   कुछ पुरानी संस्थाओं की असली बातें

      मुझे एक लेखक को अपनी जाति की नहीं सबकी बात करनी चाहिए , फिर भी कई साल पहले इक संस्था का गठन किया ताकि समाज में बुराइयों को भेद भाव को मिटाने का काम किया जाये। मगर कुछ ही दिन में किसी को नाम शोहरत और रुतबा पाना था इसलिए असली मकसद छोड़ बाकी सब काम किये जाने लगे तो किनारा कर लिया। आज भी बहुत लोग उस में हैं तो किसी संस्था की सम्पति के अघोषित मालिक बनने की खातिर या तमगा लगा सही गलत की बात को दरकिनार करने को। धार्मिक काम का नाम रखकर कारोबारी तरीके अपनाना तो और भी अनुचित है। शाकाहारी भोजनालय नाम और खाते खिलाते सब कुछ तो ये विश्वास और भरोसे को तोडना है। 
                 कुछ साल पहले इक मंदिर की सभा के अध्यक्ष बनने की खबर पढ़कर उन मित्र से पूछा कि आप तो भगवान को नहीं मानते और नास्तिकता की बातें करते हैं फिर आप इस में कैसे शामिल हैं। कहने लगे कल को राजनीति करनी है तो धार्मिक होने का दिखावा करना पड़ता है। दो चार हज़ार में ये सौदा महंगा नहीं है। यकीन मानिये तमाम धार्मिक संस्थाओं सभाओं धर्मशालाओं स्कूलों अस्पतालों में यही हालत है। उन्हें किसी देवी देवता से मतलब नहीं , कुछ लोग मंदिर भी जाते हैं जब उस मंदिर के स्वामी जी आते हैं। मंदिर भगवान के नहीं इन्हीं लोगों के हैं और ऐसा सभी धर्मों में है मस्जिद गुरूद्वारे सब के मालिक हैं कुछ लोग। 
       इक बार इक और संस्था का गठन किया था , बदलाव की बात थी। फिर होने लगा कि महीने बाद मिल बैठ मस्ती की और इक पत्र लिख भेज दिया अधिकारी को , जनहित की बात मकसद नहीं था , कहा गया उनको मालूम होना चाहिए हम लोग संगठित हैं और हम जब बड़े अधिकारी के दफ्तर जाएं तो आदर से अंदर बैठ उनके साथ अख़बार वालों की तरह चाय पकोड़े या ठंडा पीकर शान बढ़ाएं। 
                                       अंत में कुछ शेर :-

            रास्ता अंधे सबको दिखा रहे , वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे। 

            सुन रहे बहरे भी बड़े ध्यान से , गीत मधुर गूंगे मिलकर गा रहे। 

दुष्यंत का शेर भी :- यहां दरख्तों की छांव में धूप लगती है , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।


Thursday, 12 April 2018

आओ यारो रल मिल गलां करिये - डॉ लोक सेतिया

     आओ यारो रल मिल गलां करिये - डॉ लोक सेतिया

पहली गल कि सारी गलती मेरी नहीं , जे कर मेरी वी ए की मैं तेरी नहीं। 

ओ कहंदा ए प्यार ते जंग विच जायज़ है सब , मैं केहनीं हां ओहो हेरा फेरी नहीं। 

कितना डर दा धोखा जांदा नींदर नू , तू की जांणे तेरे घर ज्यूं बेरी नहीं।

मेरी मन्न ते अपणे अपणे राह पईए , की केहनां ऐं जिंनी रही वधेरी नहीं। 

     कल किसी ने पंजाबी की ये रचना भेजी विडिओ में , मुझे अच्छी भी लगी और शिक्षाप्रद भी। शायद आपको मुहब्बत इश्क़ की बात लगेगी , मगर नहीं मुझे ये चार शेर ज़िंदगी के हर मुकाम में सही सबक लगे। चलो देश की घर की दोस्ती की रिश्तों की सभी की बात करते हैं इसी को लेकर। आपको क्या लगता है देश की सब से बड़ी समस्या गरीबी भूख बेरोज़गारी आपसी टकराव है। नहीं ये सब ठीक होना संभव है अगर जिनको ये सब करना हैं वो ईमानदारी से करना चाहें। जब सरकारी प्रशासन अपने काम अपने आप करता है तो गलत होने की संभावना रहती ही नहीं। बेशक सत्तर साल में सरकार किसी दल किसी नेता की रही हो अगर कार्यपालिका ने अपना फ़र्ज़ निभाया होता तो देश की समस्याएं हल हो गई होती। आप नेताओं की गलतियां समझते हो जो वास्तविकता भी है मगर शायद आपने विचार किया ही नहीं कि कोई भी नेता बिना अधिकारीयों के कुछ भी नहीं कर सकता , वो चाहे विकास हो या फिर घोटाले। ये हैरानी की बात हो सकती है मगर सच है विदेशी राज में यही अधिकारी सरकारी अमला ईमानदारी से काम किया करता था , क्यों देश की आज़ादी के बाद वही लोग ईमानदार नहीं रहे और कभी नौकर और गुलाम बन कर काम करने वाले आज़ादी का अधिकार मिलते ही खुद को शासक और मालिक समझने लगे। यहां फिर वही पहली बात कि सारी गलती उनकी भी नहीं , हम लोग ही उनको सलाम करने और जनाब हज़ूर साहब कहने लगे। उनको लगा कल तक विदेशी लोगों के गुलाम थे अब हमारे हैं। सब से पहला काम हमने उनसे अपने कर्तव्य निभाने की बात करनी थी और जो सही नहीं किया उसका हिसाब मांगना था , लेकिन हमारी मानसिकता गुलामी की रही और अपने अधिकार नहीं खैरात मांगते रहे। 
                 अब नेताओं की बात तो उन्होंने सत्ता हासिल करने को हर हथकंडा अपनाना सही मान लिया और हमने कभी उनसे नहीं सवाल किया कि लोकशाही में लोकलाज की उपेक्षा करने की हेरा फेरी नहीं। वो हमें अपने स्वार्थ में बांटते रहे और हम उनकी चाल में फंसते रहे। आज भी वही लोग जो आज़ादी के समय देश के विभाजन के विरोध की बात करते हैं आज भी , वास्तव में देश को धर्म के नाम पर और तमाम तरह की भेदभाव की दीवारें खड़ी कर बांटना चाहते हैं। जिनकी निष्ठा देश की जनता तो क्या अपने दल के लिए भी नहीं और अभी भी उस संगठन के लिए वफादारी निभाते हैं जो सामने आकर राजनीति नहीं करती और पीछे से कठपुतलियां नचवाती है। देशभक्ति केवल भाषण नहीं होते हैं , जब आप सत्ता में आसीन हैं तो आपको सभी देशवासिओं को एक समान न्याय दिलवाना चाहिए जिसकी शपथ ली थी आपने संविधान के अनुसार। खेद है सभी नेता वही पाठ औरों को पढ़ाना चाहते जिसे खुद याद नहीं रखते। 
          अगली बात , जिसके पांव न फ़टी बुआई , वो क्या जाने पीर पराई। ये नेता और अधिकारी जो गरीब जनता के धन से शाही ठाठ बाठ से रहते हैं उनको क्या पता लोग बदहाली में कैसे जीते हैं। अंत में बस बहुत हो गया गंदी झूठ की राजनीति और सरकारी प्रशासन की मनमानी से देश को रसातल तक ले आये। अब अपने सही रास्ते पर आ जाओ। अगर इसी तरह हालत बिगड़ते रहे तो देश ही सही सलामत नहीं बचेगा तब आप भी कहां शासन करोगे। ये लूट ये छल कपट और केवल चुनावी जीत हार की राजनीती देश सेवा नहीं कहला सकती है। अभी पुराने लोगों के इतिहास को पलटना चाहते हो मगर शायद भविष्य में जो इतिहास लिखा जायेगा उस में आप सभी अपराधी ठहराए जाओगे जिन्होंने स्वार्थ में देश का बदहाली में पहुंचा दिया है। आखिरी बात हम लोग भी अपने निजि स्वार्थ के इलावा भी देश और समाज के लिए कुछ सार्थक करें। अपना देश है कोई बाहरी लोग आकर नहीं उसको सही करने वाले।

उपवास भी उपहास भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          उपवास भी उपहास भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  सरकार भी उपवास पर , विपक्षी दल भी उपवास पर। जनता का उपवास हमेशा से रहा है। ज़रूर किसी डॉक्टर या वैद ने सलाह दी होगी। बहुत खा चुके पहले वाले भी छप्पन भोग अब छोले भठूरे खा रहे हैं। आप भी न खाऊंगा न खाने दूंगा कहकर आये थे , और कितना खाओगे चार साल में जनता के धन पर खूब ऐश आराम किया अब एक दिन तो उपवास रख लो। सेहत के लिए अच्छा है। उपवास की परिभाषा कभी किसी को समझ नहीं आई। कोई फलाहार करता है कोई नमक नहीं खाता तो कोई पानी की एक बूंद तक नहीं पीता है। पंडित जी बताया करते हैं किस दिन का उपवास क्या फल देता है। इक बात पक्की तरह तय है कि हर उपवास फलदायी होता है। मैंने भी कभी मंगलवार के उपवास रखे थे और जब शाम को एक बार खाना होता था तो परांठे और मलाई में शक़्कर मिलाकर खूब पसंद से भरपेट खाता था , नतीजा मेरा वज़न और अधिक हो गया तो बंद करना पड़ा। मुझे समझाया गया कि हर दिन थोड़ा खाना उचित है , न एक दिन अधिक खाना सही है न ही एक दिन उपवास रखना ही। लोग उपवास अकारण नहीं रखते हैं। महिलाएं पति की लंबी आयु चाहती हैं ताकि खुद सदा सुहागिन रहें। सत्ता की कुर्सी की बात अलग है वो कभी विधवा नहीं रहती , इक शासक जाता है तो दूसरा उस पर बैठ कुर्सीपति हो जाता है।
     नेता कभी भूखे नहीं रहते मगर उनकी भूख कभी खत्म भी नहीं होती है। इनकी भूख रोटी की नहीं होती है सत्ता की शासन की भूख होती है। सत्ता मिलते ही सब कुछ खा जाते हैं चारा खाते हैं दलाली खाते हैं और इंसान और इंसानियत तक को बिना डकार लिए हज़्म कर जाते हैं। सब से पहले सच को खा जाते हैं ज़िंदा ही। कोई भी उपवास हो उस में सत्य का आचरण और झूठ नहीं बोलना ज़रूरी होता है। सत्ताधारी दल में सभी को इस बात की चिंता है कि उनका महान नेता कहीं उपवास में अपनी झूठ बोलने की कला को छोड़ सच नहीं बोलने लगे। इसी डर से इक मुंहलगे ने चेतावनी की तरह कह ही दिया सरकार आप उपवास नहीं रखें तो चलेगा क्योंकि सब जानते हैं आप कितने बड़े झूठे हैं और उपवास में झूठ नहीं बोलना होता है। हंस दिये नेता जी , कहने लगे तुम लोग हर बात को सीरियसली ले लेते हो। हमारा उपवास खुद ही झूठा है तो झूठ बोलने नहीं बोलने से क्या अंतर होगा। आज लोकतंत्र को खतरे की बात हम कर रहे हैं जबकि लोकतंत्र को खतरा कभी विपक्षी दलों से नहीं होता है। सत्ताधारी सत्ता नहीं छोड़ना चाहता तभी खतरा होता है। मुंहलगे ने कहा मुझे यही तो डर था जो सच होता लग रहा है जो आप सच बोल रहे हैं कि डेमोक्रेसी को खतरा आपसे है। नेता जी फिर हंस दिए , बोले तुम को इतना भी नहीं मालूम मैं जनता हूं किस जगह झूठ को सच कैसे साबित करना है। उपवास राजनीति में छल ही होता है , हमारे लिए वास्तविक उपवास तभी होता है जब हम सत्ता के भूखे होते हैं। तुमने स्वच्छ भारत अभियान नहीं देखा , हम झाड़ू लेकर सफाई करते दिखाई दिए थे तो क्या हम वास्तव में गंदगी साफ करने लगे थे। हमारी हर योजना यही है बिना कुछ किये सब कर दिया दिखलाने वाली।
               अभी जनता को समझाना है उसे भी भूखे रहने का मज़ा लेना चाहिए हमारी तरह। अभी हमारी ऐप बनी नहीं है जिस से सभी को रोटी स्मार्ट फोन पर खुद डाउनलोड करते मिल सकेगी। तब तक लोग उपवास रख सकते हैं। मैंने पहले भूल से पचास दिन मांगे थे सब ठीक करने को , मगर इस बार पचास साल की बात कहनी है। पहले दूसरे दल को पचास साल मिले अब हमारी बारी है। मुंहबोले का मुंह खुला रह गया। कल तक 2022 की बात करते थे अब पचास साल की करते हैं , जाने क्या इरादा है जनाब का। शायद आधे घंटे के उपवास में भूख ने सोचने समझने का संतुलन बिगाड़ दिया है। उसकी मन की बात समझ गए मन की बात करने वाले , कहने लगे ये सब तो हंसी मज़ाक की बात है तुम चिंता नहीं करो। ये उपवास भी उपहास है जान कर वो खिसिया कर हंसने लगे।

Friday, 6 April 2018

कहने को बहुत है अगर कहने पे आए हम ( चिंतन ) लोक सेतिया

कहने को बहुत है अगर कहने पे आए हम ( चिंतन ) लोक सेतिया

आजकल अख़बार टीवी चैनल से लेकर सोशल मीडिया तक हर दिन कुछ नया चर्चा में होता है। ख़बरों में रहना चर्चा में रहना आजकल उतना भी कठिन नहीं रह गया है। मशहूर होने की चाहत सभी की रहती है। कभी ये भी कहते थे बदनाम हुए तो क्या नाम तो हो गया। हालत ये हो गई है कि मशहूर लोग गली गली मिलते हैं और होता ये भी है कि खुद अपने मुंह से मियां मिठू बन सवाल करते हैं आप मुझे नहीं पहचानते मैं वही हूं कल जिसकी खबर टीवी पर थी। अभी भी पुराने लोग अखबार में अपनी छपी फोटो को दिखाया करते हैं अपनी फाइल खोलकर इतने साल तक संभाले रखा है। आजकल सेल्फी ने ऐसा सितम ढाया है कि लोग देश के पी एम के साथ फोटो में दिखाई देते हैं तो इसी बात पर हंगामा हो जाता है कि कैसे कैसे लोग किस किस के कितने करीब हैं। इनाम खिताब तमगे इस तरह आम हो गए हैं जैसे फोन की हालत है , कभी बेसिक फोन भी किसी किसी के घर होता था , फिर आम मोबाइल फोन कम लोग रख सकते थे क्योंकि उनका खर्चा बहुत महंगा हुआ करता था , आजकल महंगे से महंगा स्मार्ट फोन हर कोई रख सकता है काल दर और डाटा इतना सस्ता हो गया है। लेकिन आजकल मोबाइल फोन होने से किसी का रुतबा नहीं बढ़ता है। ये इक सामाजिक विज्ञान की बात है की जो वस्तु बहुतियात में हो जाती है उसकी कीमत चाहे जो भी हो कदर कम हो जाती है। हर किसी के पास महंगी कार , हर गली मुहल्ले में कोई लेखक कोई खबर बनाने वाला मिलते हैं। इक ज़माना था बी ए की डिग्री होना शान की बात थी , उच्च शिक्षा हासिल करने वाले लोग ही कोट पेंट पहन टाई लगाया करते थे। कीमत सामान की बढ़ती जा रही है आदमी की कम होती जा रही है , हर आम आदमी अपने को ख़ास मानता है समझता है और साबित करता है। ये ऐसा काम है जिस की खातिर सब कुछ भी करने को तैयार हैं। भला चंगा आदमी तलवे चाटता है किसी अधिकारी नेता या हर उस के जिस से कोई तमगा हासिल हो सकता है जो उसे आम से ख़ास बना सकता हो। संभावनाओं की कोई कमी नहीं है। आपको किसी समिति का सदस्य मनोनित किया जा सकता चंदा लेकर तो कोई अमीर राज्य सभा की सदस्यता खरीद लेता है।
              गोरे शासक खिताब देने का ऐसा चलन बना गए कि हम आज़ादी के बाद भी उन्हीं की निति पर चलते हैं। शहर से राज्य की राजधानी से देश की राजधानी तक आये दिन इनाम पुरुस्कार और तमगे खिताब बंटते हैं। सैनिक जान पर खेल कर सीने पर मेडल सजाया करते हैं और बहुत को मरने के बाद भी मेडल मिलते हैं जिनकी शान ही अलग है। मगर इधर हर सरकारी अधिकारी को उत्कृष्ट सेवा के लिए और तमाम उन कामों के लिए जिन में ईमानदारी और समाज सेवा शामिल हैं सम्मानित किया जाता है जो वास्तव में उन्होंने कभी नहीं किया होता है। जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते रहे और पद का दुरूपयोग कर रिश्वत खाते रहे उनको भी सम्मानित होते देखा है। साहित्य में तो रेवड़ियां हमेशा बंटती रही हैं और बीस पचास किताबें छपा खुद को इतिहासकार साहित्यकार कहलाने वाले देश और समाज को कुछ भी सार्थक नहीं दे पाते। कोई राह नहीं दिखला सकते कोई शमां नहीं जला सकते। जिस को पढ़कर पढ़ने वाला कुछ कर दिखाने की सोच भीतर से अनुभव करे ऐसी कोई बात लगती ही नहीं। अधिकतर शब्दों का बदलाव मात्र है नया विचार नई ऊर्जा नहीं है लेखन में। कभी लोग खादी के कपड़े पहन कर भी शान से रहते थे , इधर ब्रांडेड पहन कर भी चिंता रहती है किसी और की शान मुझसे अधिक नहीं हो जाये। इंसान की नहीं कपड़ों की शान है। बड़े से बड़े नेता को भी अपने छोटेपन का भीतर एक एहसास रहता है क्योंकि कथनी और करनी में विरोधाभास कब सामने आ जाये क्या पता। आदर्शवादी होने की बात गाली लगती है जब आपके संबंध तमाम अपरदियों और बदमाशों के साथ हों , सत्ता की खातिर दागदार नेताओं को गले लगाकर आप देश भक्त नहीं बन सकते। आपको चंदा किस किस से मिला किसी को नहीं बताते और क्यों मिला ये बता दें तो सारी प्रतिष्ठा दांव पर लग जायगी।
      जब ऐसे बाज़ार से कीमत देकर तमगे लाओगे तो क्या कहलाओगे। ऊंचाई पर चढ़कर और छोटे हो जाओगे। बहुत झूठ का सामान जमा कर लिया है झूठी शान बढ़ाने को , फिर भी हवस रहती है अभी और भी पाने को। मृगतृष्णा का शिकार होकर चमकती रेत को पानी समझ भागते जाते हैं अंजाम मालूम है। अभी कुछ दिन पहले किसी के शव को तिरंगे में लपेटने पर बहस करने लगे कुछ लोग , जब उनको पदम् पुरूस्कार मिलते हैं तब कहां थे। किसी अभिनेता को जुर्म की सज़ा सुनाई जाती है तो शोर मच जाता है , ये कैसा समाज है कैसा मीडिया है। अपराध भी आम ख़ास होने लगे हैं। मानसिक दिवालियापन है हर पत्थर को खुदा समझ लेते हैं , समाज को देश को क्या दिया है कुछ मशहूर नाम वालों ने। अपने लिए धन कमाया तो क्या बड़ी बात की। महान वो कहलाते थे जो अपना सर्वस्व देश पर समाज पर लुटवाते थे। आज अगर आप देश में बड़े बड़े ईनाम सम्मान पुरूस्कार और तमगों वा प्रशस्तिपत्र प्रमाणपत्र वालों की सूचि बनाओ तो संख्या करोड़ों की होगी लाखों की नहीं। आजकल तो ये भी महान कार्य बन गया है कि किस की कितनी बड़ी जागीर है भले जागीर बनाई ज़मीर बेचकर ही हो।
               कभी कभी सोचता हूं जैसे भारत देश में बताया जाता है कि छतीस करोड़ देवी देवता हैं , और ये सभी वरदान देते हैं मनोकामना पूरी किया करते हैं सैकड़ों सालों से नहीं युगों युगों से। फिर भी इतनी लंबी लंबी कतारें लगी हैं भूखों की बेबसों की , ये भगवान के समान समझे जाने वाले और बाकी सभी धर्मों वाले भी खुद आलिशान भवनों में बड़ी शान से रहते हैं और भक्त जन दरिद्र हैं। क्या उधर भी भारत सरकार जैसी हालत है अधिकारी नेता ठाठ बाठ से रहते हैं और जनता भूखी रहती है। सोचता हूं कि जिस देश में इतने भरत रत्न और जाने क्या क्या हैं समाज की देश की सेवा करने वाले करोड़ों की संख्या है उन्होंने किया क्या है जो अभी भी देश की हालत बदहाली की है। यहां एक एक साधु संत ने समाज को बदल दिया था , नानक कबीर विवेकानंद से गाँधी विनोबा भावे तक सब जीवन भर यही करते रहे और बहुत सारी कुरीतियों का अंत हुआ या फिर उन में बहुत कमी आई उनके प्रयास से। तब इतने देशभक्त नेता अधिकारी और अन्य तमाम लोग जो कहलाते हैं युग के महान नायक हैं उनका किया हुआ दिखाई क्यों नहीं देता देश की दशा और समाज में अच्छाई के रूप में। अगर इन सब से देश और समाज का कोई भला हुआ नहीं है तो किसलिए हम लोग उनकी जयजयकार करते हैं उनकी बढ़ाई की बातें करते हैं उनका गुणगान करते हैं।
          सब जानते हैं इक दीपक जलाने से दूर तक रौशनी हो जाती है। ये सब अगर उजाला बांटने वाले हैं तो फिर अंधकार ही अंधकार क्यों छाया हुआ है। धर्म उपदेशक बहुत हैं धार्मिक आयोजन भी हर दिन हर जगह होते हैं फिर धर्म कहीं नज़र क्यों नहीं आता। पाप ही पाप है अधर्म ही अधर्म है , किसी को किसी पर भरोसा नहीं है। जिस का बस चलता है वही चोर बन जाता है ईमानदारी आचरण में नहीं है जिसे बेईमानी का मौका नहीं मिलता वही ईमानदार है मज़बूरी से। इस सब की सीमा कोई नहीं कहां तक चर्चा की जाये। आखिर में इक पुरानी बात याद आई है। समझाया जाता था , धन गया तो समझो कुछ भी नहीं गया , स्वास्थ्य गया तो समझो कुछ गया , मगर चरित्र गया तो समझो सब कुछ गया। आज चरित्र की कीमत ही नहीं और धन तो जीवन का मकसद बन गया है रही स्वस्थ्य की बात तो हमारा समाज ही बीमार है। किस किस रोग की दवा करें किस किस अंग को ठीक करें , सब कुछ तो रोगग्रस्त है।
                
           

Thursday, 5 April 2018

ग़ज़ल 224 ( हमीं नहीं थे गलत , न तुम हमेशा सही , मिला खुदा जो कभी , सवाल करना यही ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ग़ज़ल 224  ( हमीं नहीं थे गलत , न तुम हमेशा सही , मिला खुदा जो कभी , सवाल करना यही ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "


Wednesday, 4 April 2018

क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां यही है - डॉ लोक सेतिया

   क्या सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां यही है - डॉ लोक सेतिया 

        शायद इस से बड़ा झूठ कोई नहीं है , अगर यही अच्छा है तो बुरा क्या है। अक्सर किसी से चालीस साल पुरानी घटना इमरजेंसी की और उस से पहले के शासनकाल की बात पूछते हैं तो तमाम मेरी उम्र के लोग जिनके सामने ये सब हुआ था नहीं बता पाते कुछ भी। लोकनायक जयप्रकाशनारायण किसी को याद नहीं है उस काल की फ़िल्में गीत याद हैं। मधुबाला याद है लाल बहादुर याद नहीं। सवाल किसी नेता की याद का नहीं है सवाल ये है कि खुद अपने देश और समाज को लेकर हम कितने संवेदनशील हैं। कहने को किताबी शिक्षा से लेकर गूगल पर सब कुछ समझने और सोशल मीडिया पर उपदेश देने वाले आधुनिक ज्ञानी लोग हैं , मगर इतिहास तो छोड़ो जीवन की समस्याओं पर जानकारी कुछ भी नहीं रखते हैं। मगर बहस देश की समाज की हर समस्या पर करते हैं। वो सब जो वास्तव में मानते हैं हमारा देश महान है मुझे बतलाएं और दिखलाएं। मुझे देखना है सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां। मुझे जो नज़र आता है पहले उसकी बात करता हूं। 
                 हम किसी खेल में जीत हार से खुश और दुखी होने वाले , कभी कभी विशेष दिन देशभक्ति के गीत गाने को और पतंग उड़ाने को देश से प्यार बताने वाले , अपने ही देश की बदहाली को खामोश होकर देखते हैं और मुझे क्या सोचते हैं। हम नागरिक आज़ादी का मतलब मनमानी करने की छूट समझते हैं और किसी कानून का पालन करना और समाज के नैतिक मूल्यों की कदर करना ज़रूरी ही नहीं समझते। देश क्या है केवल ज़मीन नहीं होता है देश , देश एक सौ पचीस करोड़ नागरिक हैं और देश का संविधान हमारा सब से पहला धर्मग्रंथ है। अपने स्वार्थ में संविधान की भावना का निरादर करना और खुद अपने ही देश के बाकी लोगों के समानता के अधिकारों से खिलवाड़ करना देश के साथ प्रेम कदापि नहीं हो सकता है। किसी को भी दूसरों की आज़ादी उनके मौलिक अधिकारों के हनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। ये तमाम लोग जो अपनी मांगें उचित या अनुचित मनवाने के लिए कानून हाथ में लेकर सब नागरिकों को बंधक बनाते हैं हड़ताल बंद की आड़ लेकर उनको आगजनी रास्ता रोकने जैसे अपराध करने का हक संविधान नहीं देता है। संविधान सब को बराबरी का अधिकार देता है और किसी को भी दूसरों की आज़ादी और अधिकार छीनने की अनुमति नहीं मिल सकती है। क्या भीड़तंत्र और अराजकता होना देश को सारे जहां से अच्छा बनाता है।
        राजनेता अपनी सत्ता की हवस पूरी करने के लिए , वोट बैंक की गंदी राजनीति करने के लिए , नफरत की आग फैलाते हैं और जाति धर्म अगड़े पिछड़े के नाम पर विभाजित करते हैं लोगों को। ऐसे स्वार्थी लोग क्या देशभक्त कहला सकते हैं। खुद अपने पर करोड़ों रूपये जनता के धन से बर्बाद करना क्या इसे जनता की देश की सेवा कह सकते हैं। दल कोई भी हो देश की सम्पति और धन का दुरूपयोग करना देश को लूटना इनकी आदत बन गई है। सफ़ेद हाथी बन गए हैं ये सब , इनको पालते पालते जनता अपना सब लुटा चुकी है। और अगर सवा सौ करोड़ की आबादी में कुछ हज़ार लोग भी हम ऐसे नहीं चुन सकते जिन्हें अपने लिए गाड़ी बंगला और तमाम सुविधाएं नहीं चाहिएं और जो ईमानदारी से बिना अपने लिए कुछ भी चाहे देश और जनता की सेवा करना चाहते हैं तो फिर देश की भलाई कैसे हो सकती है और सारे जहां से अच्छा देश अपना किस तरह बन सकता है।
               अंत में सब से महत्वपूर्ण बात। अदालत अपना काम करती है और हर बार सजग रहती है। सेना भी रात दिन अपना कर्तव्य निभाती है। मगर कार्यपालिका को अभी तक अपना फ़र्ज़ समझना नहीं आया अन्यथा देश की सभी समस्याएं कब की समाप्त हो जाती अन्य तमाम देशों की तरह जो हमारे साथ या बाद में आज़ाद हुए हैं। सब से बड़ी समस्या यही प्रशासन है जो आज तक भी खुद को विदेशी राज के समय की तरह शासक मानता है और खुद अपने आप कुछ भी नहीं करता। रिश्वत यही लेता है , सत्ताधारी नेताओं को उनके हर अनुचित काम में यही साथ देता है और सरकार में मंत्री बने लोगों की चाटुकारिता कर खुद मनमानी करता है। अगर अधिकारी नहीं शामिल हों तो कोई भी नेता किसी भी पद पर बैठ सत्ता का दुरूपयोग नहीं कर सकता है। जनता को आम नागरिक को अन्याय की या किसी भी समस्या की शिकायत करनी ही नहीं पड़ती अगर ये लोग अपना काम मुस्तैदी से ईमानदारी से और देश के लिए वफादारी और संविधान के लिए सच्ची निष्ठा से किया करते। ये सब से बड़ी समस्या है। इक और हैं जो लिखते हैं अख़बार टीवी चैनलों पर पत्रकारिता की बातें करते हैं उनको भी इक सजग प्रहरी की तरह काम करना था चौकीदारी करनी थी जो खुद थानेदार बन गए और न्यायधीश भी। मुझे सब तरफ अंधेरा दिखाई देता है कहीं कोई रौशनी नज़र नहीं आती। केवल नारे लगाने से भारत माता की जय बोलने से और देशभक्ति के गीत गाने से कुछ भी हो सकता है।

Tuesday, 3 April 2018

अंदोलन कैसे करें सीखने का कॉलेज ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   अंदोलन कैसे करें सीखने का कॉलेज ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      बहुत काम लोग होते हैं जो कुछ नया तलाश करते हैं , बहुत लोग से पुराने किसी काम को फिर से आधुनिक रूप में सामने लाते हैं और लोग समझते हैं ये इसी की खोज है। मगर ऐसे चतुर लोग पुराने पर नया लेबल लगा खूब माल बनाते हैं। किसी ने पहले नहीं सोचा था कि योग करना सिखाना भी करोड़ों का धंधा हो सकता है। इसी तरह धर्म समाज सेवा और निशुल्क शिक्षा और ईलाज भी कमाई का साधन बनाया हुआ है तमाम चतुर लोगों ने। मुझे अब समझ आ रहा है भविष्य में किस क्षेत्र में अधिकतम संभावनाएं हो सकती हैं। आजकल आंदोलन आये दिन होते हैं मगर कोई अंदोलन किस तरह करे कोई इस की शिक्षा नहीं देता है। छात्रों के अंदोलन होते हैं मगर उनकी इक सीमा है और अंदोलन बिना स्कूल कॉलेज में दाखिल हुए भी हो सकते हैं ये कोई पढ़े लिखों का विशेष अधिकार नहीं है। मुझे चालीस साल हो गए हैं आंदोलनों को देखते हुए। इतना अनुभव काफी होना चाहिए खुद को शिक्षक घोषित करने के लिए। इसलिए मैंने राज्य में ही नहीं देश भर में पहला स्कूल कॉलेज खोलने का फैसला किया है जो सभी को बिना भेदभाव के अंदोलन करने की पढ़ाई पढ़ाया करेगा। 
                  आप चाहे कोई भी शिक्षा पा चुके हों या पाना चाहते हों , आपको नौकरी करनी हो या कारोबार अथवा नेतागिरी ही करनी हो , हर दशा में अंदोलन की समझ अनिवार्य है। अंदोलन करने वाले महात्मा गांधी , लोकनायक जयप्रकाशनारायण और आधुनिक काल में अन्ना जी तक खुद कोई भी कुर्सी पर नहीं बैठा मगर उनके आंदोलनों ने कितने मुख्य मंत्री और बड़े बड़े पदों पर बैठने वाले लोग दिए हैं। हम सब को इसकी पढ़ाई करनी ही चाहिए। शिक्षा ही ऐसा धंधा है जिस में जो लोग डॉक्टर इंजिनीयर आईएएस आईपीएस नहीं बन सकते और किसी तरह से डिग्री हासिल कर लेते हैं वो शिक्षक बन कर पढ़ाने से खुद अपना स्कूल कॉलेज खोलने तक का काम का सकते हैं। बाज़ार से हर विषय में अधिकतम अंक पाने वाले बेकार पढ़े लिखे बेरोज़गारों को सस्ते दाम रखते हैं और पढ़ने वालों से सौ गुणा फीस वसूल करते हैं।
       लेकिन मुझे दो बातें पहले से कहनी हैं , भले बाद में इन बातों का कोई अर्थ नहीं रहे। पहली बात ये है कि मैं अपना घर बार छोड़ कर देशसेवा करने को ये काम करने आया हूं और सब को सबक सिखाना मेरे जीवन का मकसद है। समझ गए आप सबक सिखाने की बात। अब दूसरी ज़रूरी बात ये है कि मैं उनकी तरह नहीं हूं जो लोभ लालच में नकली और बेकार की पढ़ाई करवाते हैं , मुझे खुद अपने लिए कुछ नहीं चाहिए जो भी आमदनी होगी समाजसेवा पर खर्च करनी है। आप मेरे धंधे को समाजसेवा समझ सकते हैं। अभी मेरे स्कूल कॉलेज का नाम पेटेंट के लिए आवेदन भेजा है और पंजीकरण के बाद इसके अश्तिहार सब को दिखाई दिया करेंगे। सरकार का आभार जो फेक न्यूज़ की इजाज़त दे दी है अन्यथा मुझे भी कठिनाई हो सकती थी। आप मेरे धंधे में शामिल होकर खूब कमाई कर सकते हैं जिस के लिए आपको मेरी एजेंसी या शाखा अपने शहर में खोलने के लिए आवेदन भेजना होगा।
               हम केवल शांतिपूर्वक अंदोलन करने की शिक्षा देंगे , ऐसा घोषित किया जाना ज़रूरी है। इधर जब तक हिंसा नहीं हो अंदोलन हुआ की खबर तक नहीं छपती। हिंसा और लोगों को उकसाना भड़काना अब केवल राजनेताओं का काम नहीं रह गया है। टीवी चैनल हर घटना को बार बार दिखला कर ऐसा माहौल बना देते हैं कि राई भी पहाड़ बन जाती है। हम उन सभी एंकरों की सेवाएं भी लिया करेंगें उनके भड़काऊ अंदाज़ सीखने बेहद ज़रूरी हैं। नेताओं की तो शांति कायम रखने की अपील काफी होती हैं आग लगाने को। सब से पहले हम हर अन्दोलनकारी को अदालत का और कानून का आदर सम्मान करने की शपथ खाने के बाद जो चाहे करने की हिदायत देना चाहेंगे। फिर बेशक धारा 144 और कर्फ्यू की परवाह नहीं करें।

                       आंदोलन कौन कौन करते हैं ( भूमिका )

      जनता कभी अंदोलन नहीं करती है , जनता को ज़ुल्म सहने की आदत होती है और उसे आज़ादी और गुलामी में भेद करना नहीं आता है। किसी न किसी की जयजयकार करना उसकी ज़रूरत ठीक उसी तरह है जैसे कोई न कोई भगवान चाहिए बंदगी करने को। विपक्ष वाले अंदोलन तभी करते हैं जब पांच साल पूरे करने को होती है सरकार और चुनाव में जनता को अपने पक्ष में करना होता है। क्योंकि सत्ता से बाहर रहते आन्दोलन और सभाओं का आयोजन करना कठिन होता है। खुद सरकार को भी जब लगता है लोग खुश नहीं हैं तो धर्म और भेदभाव की दीवार खड़ी करने को अंदोलन की ज़रूरत होती है। मगर सब से अधिक अंदोलन करवाने के पीछे सत्ताधारी दल के असंतुष्ट लोग होते हैं जो विपक्षी नेताओं से लेकर तमाम संस्थाओं तक को उकसाते हैं और सरकार की कमियां बतला कर अंदोलन करने की सलाह देते हैं। मुझे मालूम है मेरे पास जो है उसका खरीदार कौन कौन है। इसलिए अपनी दुकान में हर खरीदार भगवान है। जिन को अंदोलन करवाना हो उनको एक सप्ताह पंद्रह दिन और महीने का क्रैश कोर्स भी करवाया जायेगा। पहले आओ पहले पाओ , इंतज़ार करते हुए नहीं पछताओ।    

Monday, 2 April 2018

जाकी रही भावना जैसी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

    जाकी रही भावना जैसी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

          इक अपना पक्ष है इक उनका पक्ष भी है। अपने को अपना सही लगता है उनका गलत लगता है , उनको खुद उनका सही लगता है और जो अपना है उनका नहीं हो सकता है गलत लगता है। तर्क दोनों के पास हैं निष्पक्षता से दोनों को आपत्ति है। सत्ता पक्ष का गठबंधन सफल होता है क्योंकि उसी में सब का पेट घर और तिजोरी भरती है। विपक्षी एकता हमेशा अधर में लटकती रहती है कभी सफल नहीं होती। जनता हमेशा टुकड़ों में बंटी रहती है और उसके टुकड़ों के भी टुकड़े होते रहते हैं। राजनेताओं में अपने अधिकारों पर अपने वेतन भत्तों पर और अपने लिए नियम कानून लागू होने पर आम सहमति बनते देर नहीं लगती। बात उनके अपराधों और चुनाव लड़ने की हो या महिला आरक्षण से अपने वर्चस्व की उनकी एकता देखते ही बनती है। वो आपस में विरोधी और दुश्मन लगते हैं मगर होते नहीं हैं वास्तव में इनमें गज़ब का भाईचारा है। अपने विरोधी को भी गले इस तरह मिलते हैं जैसे बिछुड़े हुए भाई और बचपन के दोस्त मिलते हैं। एकता की इस से अच्छी मिसाल कोई नहीं हो सकती , यही एकता कभी चोरों-डाकुओं में हुआ करती थी। सब अपने अपने इलाके के मालिक होते थे। 
                आजकल न्याय भी टीवी अख़बार वाले बताते हैं कि किस किस तरह का है , उनको ऐसा ज्ञान राजनेताओं से मिलता है। अगड़ों से अन्याय अलग है पिछड़ों से अलग। हिंसा भी दो तरह की है सरकारी हिंसा कानूनी है और आतकंवादी और उपदर्वी हिंसा और है। तर्क भी हैं टीवी चैनल पर बताते हैं अलगाववादी नेता आंतकवादी हिंसा पर खामोश रहते हैं और सेना और सुरक्षाबल आंतकवादी को मारते हैं तो वो बिलबिलाते हैं। इधर धर्म वाले दंगे करवाते हैं और गुनहगार भी सद्गुरु कहलाते हैं। सब लोग भीड़ बनकर कहर ढाते हैं और आगजनी और गुंडागर्दी को अपनी बात मनवाने का हथियार बनाते हैं। देश को आग लगा कर भी देशवासी कहलाते हैं अपने अपराध करने पर इतराते हैं। ये महान देश है जिस में कोई भारतवासी नहीं रहता है हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई रहते हैं। जाट पंजाबी बनिया पंडित तो हैं इक और भी सवर्ण-दलित की दीवार है। किसी का न्याय किसी पर अत्याचार है। ये व्यवस्था किस किस को सही करेगी जो खुद ही बीमार है। 
      हम सब खुदा के बंदे हैं मगर अपने अपने स्वार्थ में सब के सब ही अंधे हैं। हर कोई अपनी आंखों पर अपने रंग के शीशे वाला चश्मा लगाता है और भीड़ बनते ही इंसान हिंसक जानवर बन जाता है। खुद ज़ालिम की ज़ुल्म ढाता है फिर भी अपने साथ न्याय चाहता है। कोई नेता है जो केवल माफ़ी मांगकर जान बचाता है उसका आरोप लगाने में किसी का क्या जाता है। हर झूठ आजकल अटल सत्य कहलाता है। हम सोचते हैं और कहते हैं आगे बढ़ रहे हैं मगर अभी भी उल्टा सीधा इतिहास गढ़ रहे हैं। तमाम देश अपनी इतिहास की गलतियों को समझ सुधर रहे भविष्य की तरफ कदम धर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन हम अभी नफतरों की फसल बोने की बातें कर रहे हैं खुद मार रहे खुद ही मर रहे हैं। लाशों पर चढ़कर कुछ लोग सत्ता की बुलंदी पर चढ़ रहे हैं , इंसानियत को बार बार शर्मिंदा कर रहे हैं। आग बुझाने की बात कर हवा देने का काम कर रहे हैं।  हमेशा से कोई एक दिन पहली अप्रैल को मूर्खता दिवस कहलाता था , हंसी हंसी में बीत जाता था। अब तो महीना साल लगातार मूर्खताएं करते हैं फिर भी समझदारी का दम भरते हैं। अंत किस बात से करें चलो दो शेर याद करते हैं जाने माने शायरों के। 

                     रहनुमाओं की अदाओं पर फ़िदा है दुनिया ,

                     इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो। 

                   कौम के ग़म में डिन्नर करते हैं हुक्काम के साथ ,

                     रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।


Sunday, 1 April 2018

मेरे मन की बात ( बेसिरपैर की बात ) डॉ लोक सेतिया

    मेरे मन की बात ( बेसिरपैर की बात ) डॉ लोक सेतिया

न तो मैं कोई सत्ताधारी नेता हूं और न ही मुझे आज पहली अप्रैल को किसी को मूर्ख बनाने की मूर्खता ही करनी है। मुझे इस अवसर पर खुलकर मन की बात करनी है। मन की बात सभी से नहीं की जाती न कर ही सकते हैं। मन की बातें मन ही जानता है और मन ही मन से मन की बात करता है। कुछ साल पहले तक माना जाता था कि मन या दिल की बात किसी एक से ही कर सकते हैं मगर जीवन भर ऐसा कोई मिलता ही नहीं जिस से हम अपने मन की बात कहें भी और वो समझे भी। याद आया मन की बात शीर्षक से मेरी इक कविता भी है लिखी हुई। ग़ालिब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात। आज सोचा जब देश का मुखिया मन की बात करता है रेडिओ पर चाहे कोई सुने न सुने समझे न समझे तो हम भी कह सकते हैं। मन की गहराईयां बहुत होती हैं और मन की थाह पाना आसान नहीं होता। इक दोहा है :-

                    प्राणि अपने प्रभु से पूछे किस बिद्ध पाऊं तोहे ,

                     प्रभु कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे।

जिसको मन की बात कहनी थी समय पर नहीं कह सके तो अब सब को कहते हैं , मगर ये सच में मन की बात नहीं है। मन की बात कभी झूठ नहीं होती , मन जानता है। आप देश की जनता को दुनिया को मूर्ख बना सकते हैं मन को नहीं। आपका मन जानता है आप झूठे हैं और झूठी तालियां महंगी पड़ती हैं। बहुत दिन तक बहुत लोगों को मूर्ख बना सकते हैं मगर सभी को हमेशा के लिए नहीं। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है। यहां भी आप सोचोगे मुझे तो रामजी के पास जाना है खुदा से मुझे क्या लेना देना , लेकिन वहां ईश्वर की अलग अलग दुकानें नहीं हैं एक ही है ज़रा सीबीआई जैसी एजेंसी से पता लगवा लो। मन भी कितना अजीब है अपनी बात करनी थी और उसकी करने लग गया जिस के पास मन नाम का कुछ भी नहीं। नेताओं के पास दिल ज़मीर ईमान और ईमानदारी के नाम पर पोशाक ही होती हैं जिनको ज़रूरत अनुसार बदल लेते हैं। अभी देखो इक खिलाड़ी शायरी करता है टीवी पर मगर नेता बनकर कल एक नेता पर जो चोरी का शेर पढ़ता था अब नाम बदल दूजे पर चिपकाता है। छोड़ो उनकी बात आगे करते हैं सच्चे मन की बात। 
                    मुश्किल बहुत है भाई मन की बात दिल की बात भीतर ही रह जाती है जुबां पर आती ही नहीं। अगर दिलबर की रुसवाई हमें मंज़ूर हो जाए , सनम तू बेवफ़ा के नाम से मशहूर हो जाए। खिलौना फिल्म भी कमाल थी इक नाचने वाली इक पागल से इश्क़ कर बैठी। ये इश्क़ होता ही पागल है मूर्ख लोग इश्क़ किया करते हैं। समझदारी पास हो तो किसी हसीना से प्यार नहीं होता कभी। देशभक्ति भी इश्क़ ही है जिनको सत्ता की भूख हो वो समझदार राजनीति कर सकते हैं और देशप्रेम पर केवल भाषण दे सकते हैं। मित्रो मैंने गलत तो नहीं कहा , ठीक कहा है ना। ताली बजाओ। 
                पढ़ते पढ़ते आपको लगा ये लेखक भी पहली अप्रैल को मूर्ख तो नहीं बना रहा जो अभी तक मन की बात बताई ही नहीं। माफ़ करना मन भटक जाता है जो सोचता है नहीं समझ आता है। मन मन ही मन अपनी मूर्खता पर मुस्कुराता है। मूर्ख बन जाना बुरा नहीं होता , बुरा होता है दूसरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना। अपने देश की हालत खराब समझदार लोगों ने ही की है मूर्ख लोग कभी देश का कबाड़ा नहीं करते हैं। हम में अधिकतर मूर्ख और नासमझ लोग हैं जो खुद को समझदार दिखलाना चाहते हैं मगर कोई यकीन नहीं करता अपनी बात पर। सब यही मानते हैं ये मूर्ख अपने को अक्लमंद समझता है। और जो वास्तव में समझदार लोग हैं वो खुद को बेहद मासूम और भोला दिखलाते हैं और हमपर राज करते हुए दावा करते हैं हम सेवक हैं। अब देखो आम लोग चार साल में दुबले क्या सूख कर कांटा हो गए हैं और कोई सेवक बनकर अठाहर घंटे काम करने की बात कहता फिर भी देश विदेश भाग दौड़ करने के बाद भी और तंदरुस्त और मोटा ताज़ा हो गया है। मन की बात का कमाल है। हम हैं कि आज भी मन की मन ही में रही कहने की चाह थी कह सकते थे मगर नहीं कही। कहो मित्रो कैसी रही।  

Saturday, 31 March 2018

सबको करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) लोक सेतिया -भाग 2

सबको करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) लोक सेतिया 

                    सुनहरे रंग के चेक     {  भाग 2  }

  अच्छे दिन आने वाले थे और आये भी मगर उन्हीं के अच्छे दिन आये जिनकी किस्मत अच्छी थी। कुछ लोग ज़मीन से सीधे आसमान में पहुंच गए। कोई काबलियत नहीं कोई जनता से मतलब भी नहीं बस एक ही आधार था किसी व्यक्ति और उससे ही संबंधित संस्था का सदस्य होना। बाकी कोई भी सत्ता पर आसीन व्यक्ति को भरोसे के काबिल नहीं लगा। जो परिवारवाद को बुरा बताते थे उनको अपने घर से बाहर का कोई भी पसंद नहीं आया देश के सब बड़े बड़े पदों पर और राज्यों की सत्ता   पर बिठाने को। कठपुतलियां चुन चुन कर देश के संविधान और जनतंत्र को भुला दिया गया। इससे अच्छे दिन उनके कैसे हो सकते थे। नसीब बदलता है यही होता है। जनता की बदनसीबी कभी खत्म ही नहीं होती। जनता किसी शायर की ग़ज़ल का इक शेर दोहरा सकती है। 
    " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।
लेकिन आप निराश नहीं हों , आखिर उनको याद आ ही गया है कि फिर से जनादेश लेने का समय अगले ही साल आने वाला है। अच्छे दिन की हांडी काठ की दोबारा नहीं चढ़ाई जा सकती। ऐसे में जनता को ही लालच देकर बहलाया फुसलाया जा सकता है और तीन साल और मांगे जा सकते हैं उन सब कामों के लिए जिनको पांच साल में पूरा करना था मगर शुरुआत तक नहीं हुई बल्कि ऐसे बुरे दिन आये हैं कि पहले वाले दिन भी लगता है ऐसे बुरे तो नहीं थे। इस बार अच्छे नहीं सुनहरे दिन लाने की बात की जा रही है और उन सुनहरे दिनों के सपने पर यकीन दिलवाने को करोड़ करोड़ रूपये का सुनहरी चमक वाला चेक सभी को तीन साल बाद भुगतान की तारीख डालकर बांटने की योजना है। 
           आप खुश हो सकते हैं कि अभी तक जनता का वोट शराब की बोतल या साड़ी और थोड़े नकद पैसों से खरीदते थे नेता अब उसी को और ढंग से किया जायगा ऊंचे दाम देने का वादा कर के। जिन लोगों के करोड़ों नए बैंक खाते खुलवाए गए थे और बाद में आधारहीन तरीके से उनको आधार देते रहे फिर उन्हीं पर ये आरोप भी उछालते रहे कि गरीबों के खातों में काला धन हो सकता है। ऐसे में वही लोग फिर से झांसे में आसानी से नहीं आने वाले और भारतीय रिज़र्व बैंक की लिखी इबारत पर विश्वास नहीं करेंगे ये समझ कर सुनहरे चेक विश्व बैंक एयर आईएमएफ से प्रमाणित होंगे। 
          जाल बुना जा चुका है और बिछाने की तैयारी है। कल सुबह पहली अप्रैल को नई योजना की घोषणा करने पर मंथन चल रहा है। कोई कह रहा है यही अवसर है ताकि बाद में कोई कुछ बोल भी नहीं सकेगा जब समझेगा कि अप्रैल फूल बनाया गया था। लोग मूर्ख बनते रहे हैं मगर कभी खुद को मूर्ख बनाने की बात मानते नहीं हैं। मगर दूसरे कुछ कहते हैं ऐसा करने पर लोग नहीं फंसे तो खुद हम ही फूल बन जायेंगे चुनाव में। और तीन साल गुज़रते पता नहीं चलता कुर्सी के मद में लेकिन किसी तरह लोग फिर से बहक भी गए लोभ में तब भी तीन साल बाद चेक का भुगतान कौन करेगा कैसे करेगा। जाल बुनने वाला मुस्कुराते हुए समझाता है यही तो राजनीति में चुनावी रणनीति होती है। अभी चुनाव जीतना लक्ष्य है आगे की बाद में देखते हैं। इतना चमकीला चेक वो भी करोड़ रूपये लिखा हुआ अच्छे अच्छों की मति मारी जाती है। पंछी दाना चुगने आएगा और जाल में फंस छटपटायेगा फिर पिंजरे में खैर मनाएगा। भोलेनाथ का बंदा कभी नहीं समझ पायेगा कि भविष्य क्या क्या नहीं दिखलायेगा। तीन साल तक संभाल कर रखेगा मगर ये सपने में भी नहीं सोच पायेगा कि जिस दिन भुगतान लेने को बैंक में जमा कराएगा बैंक अधिकारी ध्यान दिलवाएगा। किसी के हस्ताक्षर तो हैं ही नहीं चेक पर सुनकर घबराएगा। तब गलियों में शोर मचाएगा और सरकार की शरण में आएगा। सरकार बहलायेंगे कि गलती से खाता नंबर और हस्ताक्षर अंकित नहीं हुए मगर भूलसुधार किया जा सकता है। अपने चेक इक ख़ास ऐप पर बदल सकते हैं और नया सुनहरी चेक ऑनलाइन निकलवा सकते हैं। लोग सरकार की बात मान जायेंगे और जब नया चेक मिलेगा तो चकरायेंगे कि उस पर कई और साल बाद ब्याज सहित भुगतान की शर्त पाएंगे और उसे पहले ही स्वीकार कर लिया था भी पढ़कर सब जान जाएंगे। भागते चोर की लंगोटी को घर लेकर आएंगे और अपने वारिसों के नाम वसीयत लिख कर मर जायेंगे।
             कितने बाप दादा की बात भूल ही जायेंगे जो याद रख लेने भुगतान जाएंगे तब वास्तविकता जान पाएंगे। कोई बैंकवाले मरे हुए के हस्ताक्षर करवाने की बात से डरायेगा तो कोई राज़ की बात और रहस्य से पर्दा उठाएगा। जिस अधिकारी के हस्ताक्षर हैं विभाग ने कब का उनकी जगह नया अधिकृत किया था और समय पर उनसे हस्ताक्षर करवाने थे। अब इस चेक की उपयोगिकता केवल फ्रेम में जड़वा कर घर पर सजाने को टांगने की रह गई है। सभी सुनहरे फ्रेम में सुनहरी चेक जड़वा कर इतरायेंगे करोड़पति कहलायेंगे।
 
  

Friday, 30 March 2018

सब को करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया ( भाग एक )

 सब को करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                            ( भाग एक )

सब मिलकर वही पुराना गीत गाया करेंगे , ऊपर वाले तेरी दुनिया में कभी जेब किसी की न खाली रहे। कोई न गरीब रहे जग में हर पॉकेट में हरियाली रहे। सच कहता हूं सुबह सवेरे उठते इस से अच्छा भजन मुझे कोई नहीं लगता। सब की भलाई मांगना , सब का साथ सब का विकास , सब लोग इक समान बराबर। यही आदर्श स्थिति है , कल ही अन्ना हज़ारे जी ने उपवास त्याग दिया इतनी जल्दी तो उसमें राज़ की बात यही है। जिस तरह से अचानक नोटेबंदी की घोषणा की गई थी उसी तरह से पहली अप्रैल को कालाधन और सफेदधन का भेदभाव खत्म कर दिया जायेगा। इंडिया में काले गोरे का भेद नहीं कर किसी से अपना नाता है , कुछ और न आता हो हमको हमें प्यार निभाना आता है। है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत उसी के गाता हूं , भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं। गांधी जी से लेकर अभिनेता मनोज कुमार तक सभी महात्मा लोग हर देशवासी के लिए रोटी कपड़ा और मकान चाहते थे और उपकार की बात लालबहादुर शास्त्री और मनोजकुमार ने मिलकर समझी थी तभी जय जवान जय किसान का नारा पॉपुलर हुआ और देशभक्ति हमेशा हिट रही है। वास्तव में देशभक्ति से सुरक्षित कोई कारोबार नहीं है , जिस को इसका कारोबार समझ आ गया वही जनता के दिलों पर छा गया। 
        आपका सभी देशवासियों का इंतज़ार खत्म होने को है। पहली अप्रैल को भारत सरकार घोषणा करने वाली है कि उसी दिन से कालेधन और सफेदधन की बात करना भी मना होगा। उस अध्याय को ही बंद कर दिया जायेगा और सारा का सारा धन गुलाबी धन कहलायेगा। नया ज़माना आएगा नया ज़माना आएगा। फिर वही दृश्य सामने आएगा , अभिनेत्री हेमामालिनी गाती होगी और अभिनेता धर्मेंद्र सुन कर मुस्कुराएगा। उसकी किताब खलनायक ने अपने नाम छपवा ली तो क्या हुआ , अपनी चोरी की बात भूल खलनायक की बहन से इश्क़ लड़ायेगा। आप सब बेचैन थे असली आज़ादी समानता और सब लोगों की ज़िंदगी खुशहाल बनाने वाले सपनों जैसे अच्छे दिन क्यों नहीं आये हैं। चार साल से जिसकी चाहत सभी करते आये हैं। लो देखो जनाब आपके लिए क्या क्या नहीं लाये हैं। 
          सरकार अपना वादा निभाने जा रही है , इक सुनहरे रंग का लाखों का नहीं करोड़ करोड़ रूपये का चैक सब को भिजवा रही है। सदी के सब से बड़े महानायक कहलाने वाले के हस्ताक्षर वाला चैक छपवा सीधे सब के खाते में भिजवा रही है। देखो देश की जनता मध्यम सुर में गुनगुना रही है। गुलाबी धन की सुंदर करंसी घर घर आ रही है , बेटी नहीं पढ़ी लिखी तो क्या हुआ , चेहरे पर गुलाबी आभा छा रही है। वो देखो वो आ रही है ये देखो वो जा रही है। पूरी तैयारी हो चुकी है इस बार नोटेबंदी जैसी चूक नहीं होगी , किसी ज़माने में सरकार बांड के रूप में प्रमाणपत्र जारी किया करती थी , इधर उसका चलन नहीं रहा है , अब तो टीवी पर खेल खेलते खेलते महानायक आपका पैसा आपने खाते में भिजवा देते हैं। ये बहुत सुरक्षित है जल्दी हो जाता है और आसान भी है समझाते हैं। जिस तरह सिंगापूर की सरकार ने हर नागरिक को सौ डॉलर से तीन सौ डॉलर देने की घोषणा की है ठीक उसी तर्ज़ पर पहली अप्रैल से शुरू होने वाले वित वर्ष में सब करों को , जी बिल्कुल ठीक पढ़ा आपने सभी करों को , आयकर से जी एस टी तक सबको समाप्त करने का ऐलान करने जा रही है। सब को घर बैठे करोड़पति बनवा रही है इक सुनहरी रंग का चैक बंटवा रही है। 
       ( अभी इतना ही बाकी की रचना कल पहली अप्रैल को लिखी जाएगी )
शेष भाग कल के अंक में ,,,,,,, इंतज़ार करियेगा।

Thursday, 29 March 2018

शोर की ख़ामोशी , रौशनियों के अंधेरे - डॉ लोक सेतिया

   शोर की ख़ामोशी , रौशनियों के अंधेरे -  डॉ लोक सेतिया 

    कोई अजनबी बाहर से आये तो ये सब देख कर समझेगा कि लोग बेहद खुश हैं जो इतना संगीत का शोर है नाच गाना और मंच से बहुत अच्छी लगती बातें सुनाई दे रही हैं। बीच बीच में मंच संचालक निवेदन करता रहता है अमुक के लिए ज़ोरदार तालियां हो जाएं। आपको क्या लग रहा है मैं कुछ सोच कर लिखने बैठा हूं , जी नहीं मैं आपको वही बतला रहा हूं जो मुझे सामने दिखाई और सुनाई दे रहा है। इस बीच पंजाबी भंगड़ा शुरू हो गया है , यहां बहुत कुछ एक साथ हो रहा है। बताया जा रहा है कि ये पुलिस प्रशासन जनता से सम्पर्क कर रहे हैं , मगर जनता कहां है कोई नहीं जनता क्योंकि मंच पर सरकारी अधिकारी और कुर्सियों पर कुछ सत्ता से जुड़े लोग शोभा बढ़ा रहे हैं। जनता है मगर सार्वजनिक पार्क में सैर करने आई इस सब को इस नज़र से देखती है जैसे ये भी गली से गुज़रती बारात हो चाहे कोई अर्थी निकल रही हो उसको देखती है बिना ख़ुशी बिना ग़म की भावना के। थोड़ी देर बाद यहां सब सामान्य सा हो जायेगा। कुछ भी नहीं बदलेगा , पहले भी ऐसा किया गया था यहीं बाहर सड़क पर पिछले साल इस बार सड़क से पार्क तक का फासला तय हुआ है। अभी नगरपरिषद के लोग केवल सामने दिखाई देती गंदगी को साफ़ कर रहे हैं , जो छुपी हुई है या थोड़ी दुरी पर ढेर लगे हैं गंदगी के उनकी तरफ कोई नहीं देखता है। भंगड़ा हुआ तो कोई अधिकारी भाषण देने लगे हैं , ये वही हैं जो कल तक ही नहीं हर दिन अपने पास फरियाद करने और न्याय की आस लेकर आये नागरिक के साथ गाली गलौच की भाषा में ही बात करते हैं। कोई महिला भी पास हो तब भी इनको शर्म नहीं आती। आज जाने कहां से इतनी अच्छी भाषा सीख कर आये हैं , संचालक ज़ोरदार तालियां कहता है मगर तालियों की आवाज़ सुनाई देती नहीं है। सभाओं में तालियां बजाने को भाड़े पर नेता लाते हैं लोगों को , हर कोई ताली बजाना पसंद नहीं करता है। स्कूल के बच्चे क्या गीत सुना रहे हैं मालूम नहीं , उन्हें तो जो याद करवाया जाता है वही बालदिवस से लेकर सभी दिनों दोहराते हैं। ये सरकारी आयोजनों में मंगवाए जाते हैं बाकी सामान की तरह। इस से अजीब बात क्या हो सकती है कि जिन को कभी देश का भविष्य कहते थे उनको अपने हर आयोजन में इक वस्तु की तरह उपयोग किया जाता है। जी याद आया सर्वोच्च अदालत इस पर आपत्ति जता चुकी है मगर सरकारों और अधिकारीयों के कान पर जूं नहीं रेंगती है। बच्चे गए गीत सुना कर मगर मंच संचालक को तालियां बजवाना याद नहीं रहा। इधर जो महोदय बोल रहे हैं उनकी आवाज़ कानों को खटकती सी लगती है और कोई समझ नहीं पा रहा मतलब तक उनकी बात का। अभी इंतज़ार करने को कहा जा रहा है किसी मशहूर गायक का नाम लेकर। चलो इक मधुर स्वर कोई गायक का रिकॉर्डेड बजाया जा रहा साथ कोई नाच रहा है। गिध्धा हो रहा है , सब कुछ मिला जुला है। ये मनोरंजन भी अपनी तरह का है जो अपने मकसद को नहीं समझा पा रहा। 
        लो बीच में रोक दिया गया नाच गाना किसी ख़ास व्यक्ति के आने पर उनको आदर देने की बात और अब आते ही उन्हें अपनी बात कहनी है। ये सब अभी साथ साथ चल रहा जब मैं लिख रहा हूं , मुझे घर के सामने पार्क में होने वाली हर सभा का आनंद भी मिलता है और यही शोर और कोई काम भी नहीं करने देता। रात को ही पास में कोई जगराता था जिसने रात भर जगाये रखा या फिर सोने नहीं दिया। लेकिन इस बीच तालियों की मांग के साथ किसी का परिचय करवा रहे हैं। मुझे इक बात वास्तव में नहीं समझ आ रही कि इस तरह से पुलिस का आम लोगों से सीधा संवाद कैसे हो सकता है जिस का दावा सरकार और प्रशासन करते हैं। ये आसान रिवायत सी बन गई है जनसम्पर्कं का दिखावा करते हैं मगर जन से कोई वार्तालाप नहीं होता। अभी पहली अप्रैल दो दिन बाद है फिर अभी से मूर्ख बनाने का अभियान क्यों। दमा दम मस्त कलंदर गीत सुनाई दे रहा है , इतनी जल्दी दृश्य बदलता है कि समझना कठिन हो गया है क्या आगे होने वाला है। जिस तरह आजकल शादी में तमाम तरह के पकवान परोसे जाते हैं। स्टाल बदल रहा है और फिर हारमोनियम बज रहा है , मुस्कुराने की वजह तुम हो , कोई गा रहा है मधुर सुर में , ओ पिया रे , पिया जाने ना जाने ना। बस दो मिंट में कुछ और ये क्या हुआ , बहुत कुछ है मगर है कुछ भी नहीं। 
            शायद मंच संचालक को औपचरिकता निभानी है , सब को बताना है कौन कहां से आया हुआ है। इक तमाशा है केवल कोई संजीदा मकसद है ही नहीं , कोई इस पर हंसे कि रोये नहीं पता। शायद सब जानते हैं ये सब किसी मकसद हासिल करने को नहीं है विशेषकर जनसम्पर्क तो कतई नहीं है। जन से कोई मिलता ही नहीं बात करना तो दूर की बात। उपस्थित लोगों से निवेदन किया गया था अपने नाम लिखवा दें वहीं कोई यही काम कर रहा है। बस नाम जान लेने को संवाद नहीं कह सकते हैं। कुछ जलपान की भी बात होगी और कुछ और औपचरिकता स्मृति चिन्ह बांटने की और किसी इक संस्था का आभार जिस ने आयोजन का प्रबंध किया बदले में पैसे लेकर। ये आखिरी तालियां किसी के नाम की , अभी उबाऊ भाषण बाकी हैं। 
         अधूरी बात बाद में पूरी करनी है , घूमर नाच हो रहा है। ये क्या हरियाणा सरकार तो फिल्म पर रोक लगाने की बात करती थी। किसे याद है , तब का मतलब और था आज बिना मकसद है। समय का अभाव है घूमर नाच के बाद मंच संचालक कहते हैं। रुकिए मिलते बाद में। शोर में ख़ामोशी गुम हो गई है और रौशनियों ने आस पास अंधेरों को शायद और बढ़ा दिया है। जारी है कब से यही सब।

   

Wednesday, 28 March 2018

पंजीकरण मूर्खों का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        पंजीकरण मूर्खों का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        इस में कोई शक नहीं है कि पहली अप्रैल को मूर्ख बनाने वाले खुद भी साल भर मूर्खता करते ही रहते हैं। सब से महत्वपूर्ण बात ये भी है कि सभी दलों के नेता हमेशा से जनता को मूर्ख बनाते रहे हैं। लेकिन अब दावे से कहा जा सकता है कि देश की जनता को मूर्ख बनाने में इक नया कीर्तिमान जिस एक नेता न बनाया उसका नाम तक लेने की ज़रूरत नहीं है। जी नहीं डरने की कोई बात नहीं है जिस के सामने दूसरा कोई दिखाई ही नहीं देता और जिसको चुनाव से पहले ही विजेता घोषित किया जा चुका हो उसका मुकाबला किसी से करना उसकी तौहीन होगी और मैं ऐसा नहीं कर सकता। आप फिर गलत समझ रहे हैं भला मुझ लेखक को किसी मानहानि के मुकदमें की क्या चिंता हो सकती है। मैं किसी राज्य का मुख्यमंत्री भी नहीं जो पहले सब पर आरोप लगता रहूं और बाद में माफीनामा देकर पिंड छुड़ाता फिरूं। अब बात असली विषय की। जब सब से अधिक लोगों को मूर्ख बना ही चुका है तो उसको पहली अप्रैल को कोई उपाधि मिलनी ही चाहिए। अब ऐसी उपाधि कोई सरकार तो नहीं दे सकती है और कोई संस्था भी शायद ही मूर्ख बनने बनाने की बात पर ध्यान देने की चिंता क्यों करेगी , सब को तो खुद को समझदार और बाकी लोगों को महामूर्ख समझने का भरम रहता है। इसलिए पहली अप्रैल को इक सभा में सभी मूर्ख मिलकर देश की जनता को मूर्ख बनाने का कीर्तिमान स्थापित करने को उपाधि देनी है और उस सभा में शामिल होने के लिए खुद को मूर्ख घोषित करने को पंजीकरण करवाना लाज़मी है। आप उस के लिए काबिल हैं अथवा नहीं है इस बात का निर्णय खुद आप कर सकते हैं। लेकिन आपको थोड़ा बहुत मार्गदर्शन किया जा सकता है ताकि वास्तविक मूर्ख ही इस शुभ कार्य में शामिल हों और गलती से भी कोई समझदार इस का हिस्सा बनकर उल्लू नहीं बना सके। 
     सदियों से मूर्खताओं पर जानकारी मिलती आई है , ये काम करना पागलपन है , नासमझी है , मूर्खता है सब को बताया जाता रहा है। सच बोलना भी उस में शामिल है और ईमानदार होना भी। ऑफ दा रेकॉर्ड आजकल के नेता आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों को कुछ ऐसा ही बताते हैं , यूं सामने उनको महान बताते हुए भी सोचते हैं मज़बूरी है अन्यथा समझदार तो हम हैं और उन सभी से महान भी। चाह कर भी अपनी ऊंची ऊंची मूर्तियां बनवा नहीं सकते , जिस ने अपने चुनाव चिन्ह की पत्थर की मूर्तियां बनवाईं उसका हाल  भी सब जानते हैं। ये भी कोई  कम पागलपन नहीं है जो देश में लोग बेघर भूखे हैं और हम करोड़ों रूपये समाधियों और मूर्तियों पर बर्बाद करते हैं। लेकिन आप और हम क्या मूर्खता करते हैं या नहीं करते हैं आगे सब से अधिक महत्वपूर्ण विषय की बात करते हैं। 
       समय सब से मूलयवान होता है। अपने वक़्त का हमेशा सार्थक उपयोग किया जाना ज़रूरी है अन्यथा समय बर्बाद करना बहुत बड़ी मूर्खता कहलाता है। क्या आप फेसबुक व्हाट्सऐप ट्विटर आदि पर दिन भर महानता की बातें करते लिखते हैं जिस का आपको पता है कोई भी असर खुद अपने पर ही नहीं होता है। हर दिन गूगल संख्या बताता है इतने करोड़ सोशल मीडिया पर हैं। आपने बहुत काम किये हैं पहले भी , हर बार आपको मालूम है कि इतने साल पढ़ाई की तो क्या क्या हासिल हुआ। कारोबार किया नौकरी की या घर का कोई काम किया सामने नतीजा दिखाई दिया क्या मिला। कभी विचार किया सोशल मीडिया से कुछ और तो छोडो दोस्ती की बात करते हैं कोई वास्तविक दोस्त मिला आज तक। फेसबुक के हज़ारों दोस्त इक संख्या भर हैं वास्तविकता नहीं। हद तो आजकल ये है कि लोग सोशल मीडिया पर आपस में शब्दों की जंग लड़ते हुए मिलते हैं। ये सब से बड़ी मूर्खता है किस के लिए आपस में लड़ते हैं जो किसी के भी नहीं होते हैं। ये राजनीती बड़ी गंदी चीज़ है जो किसी को आगे बढ़ाता है वही उसी को किनारे लगा देता है। राजनेताओं से और बाज़ारू पैसे से बिकने वाली वैश्याओं से वफादारी की अपेक्षा रखना भी मूर्खता ही है। 
         आजकल साधु सन्यासी लोग भी हर जगह हर किसी को कोई उपाधि देते मिलते हैं। हमारे कई नेता जाने क्या क्या उपाधि अपने और अपने बाप दादा के नाम से आगे लिखवाते रहते हैं। हर शहर में हर दो लाइनें लिखने वाला खुद को महान साहित्यकार घोषित करता है। मीडिया वालों की तो बात ही नहीं करो समझते हैं वास्तविक सत्य उन्हीं की दुकान में मिलता है। सब को दर्पण दिखलाते हैं मगर खुद को आईने में देखने का साहस नहीं है। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। आजकल इश्क़ भी नकली हो गया है और दो दिन तो क्या दो घंटे में नया आशिक नई महबूबा होती है। लेकिन वास्तव में इश्क़ भी मूर्ख लोग ही किया करते हैं , चलो अच्छा है देश की सर्वोच्च अदालत ने निर्णय दिया उनके पक्ष में कि खाप पंचायत को बालिग लड़के लड़की के विवाह को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। 
            हम अधिकतर देशवासी अभिशप्त हैं मूर्ख बनने के लिए और कोई उपाय नहीं है बचने का भी। लेकिन जो सरकारें जो नेता जो अधिकारी सब को मूर्ख बनाते हैं उनकी मूर्खताएं भी कुछ कम नहीं हैं। हर दिन बेकार के आयोजन आडंबर और ऐसी ऐसी योजनाओं पर आये दिन सभाओं के आयोजन पर करोड़ों रूपये खर्च करते हैं जबकि जानते हैं इनका कोई लाभ नहीं होने वाला है। अपने खुद के इश्तिहार छपवाने और टीवी चैनलों पर दिखलाने पर जितना धन खर्च किया जाता है किया जाता रहा है और किया जाता रहेगा भी उस की राशि की कोई सीमा ही नहीं है। आप कभी हिसाब लगाना या हिसाब पूछना तो हैरान रह जाओगे कि अभी तलक हुए सभी घोटालों की राशि जोड़ने के बाद भी उतनी बड़ी धनराशि का घोटाला नहीं हुआ है जितना केवल सरकारी प्रचार के विज्ञापनों पर सत्तर साल में धन बर्बाद ही नहीं किया गया बल्कि कुछ ख़ास लोगों का मुंह बंद रखने को बेकार जनता का धन लूट की तरह बांटा गया है। अब कोई अख़बार कोई टीवी वाला खुद अपने पेट पर लात क्यों मारेगा। सभी शामिल हैं। हम मूर्ख हैं जो इतनी सी बात कभी नहीं समझे कि कौन कौन किस किस तरह किस किस ढंग से किस रूप में मूर्ख बनाते रहे हैं हमको। शायद मूर्ख दिवस पर थोड़ा चिंतन किसी को मूर्ख बनने से बचा सके। जी मेरा नाम मूर्खों में पंजीकृत है आप भी चाहें तो आवेदन भेज सकते हैं। हमारी शाखाएं नगर नगर गांव गांव ही नहीं गली गली में हैं , पधारें आपका हार्दिक अभिनंदन और स्वागत है।

Tuesday, 27 March 2018

उसकी इसकी आपकी हमारी सबकी बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

उसकी इसकी आपकी हमारी सबकी बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

ये कैसे दोहरे मापदंड हैं कि जो सत्ताधारी देश के हर नागरिक की निजता को अनावश्यक मानता है , वो अपनी हर बात को गोपनीय रखता है। आपकी ईमानदारी तब दिखाई नहीं देती जब आप अपने शासनकाल में अपने दल को मिले चंदे की बात देश विदेश से मिले धन की बात और देश भर में चार साल में आपके दल और आपके दल के नेताओं की बढ़ती सम्पति और आमदनी की बात नहीं बताते हैं। सत्ताधारी दल हो चाहे बाकी दल वाले अगर फेसबुक और सोशल मीडिया से डाटा खरीदते हैं तो ऐसे अपराध पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता किसी के भी खिलाफ। आपकी हर योजना स्वच्छ भारत अभियान , गंगा की सफाई , जाने किस किस नाम की मगर किसी भी काम की नहीं सरकारी ऐप्स की असलियत और सभी दावे झूठे साबित हुए हैं। फिर भी आपके दल को अगर लगता है कि इक आपके सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं है तो आपके दल के लिए ये कोई गौरव की बात नहीं है। लेकिन आपको ये शायद याद करना होगा कि जब भी कोई खुद को देश से अधिक महत्वपूर्ण समझने लगता है या ऐसा प्रचारित करने लगता है तो इस देश की सवा सौ करोड़ जनता विकल्प खुद ढूंढ लेती है। 1977 का इतिहास भूलना नहीं चाहिए। 
       शायद आज की सरकार को लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी का वो भाषण ध्यान नहीं है जिस में उन्होंने कहा था कि शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन करना हर देशवासी का अधिकार है और अगर ऐसा करने पर कोई सत्ताधारी नेता या अधिकारी सुरक्षकर्मियों को दमन या बलप्रयोग का आदेश देता है तो वो अनुचित और असंवैधानिक होगा और सुरक्षाकर्मी देश के लिए निष्ठा रखें न कि सत्ता के लिए जनता का दमन करें। ये मेरी खुशनसीबी है जो मैं 25 जून 1975 को उनकी सभा में शामिल था और मैंने सुना था उनका भाषण। इस से अधिक विडंबना क्या हो सकती है कि मौजूदा सरकार आपत्काल में कैद में रहे लोगों को मुफ्त बस यात्रा और अन्य सुविधाएं देने की बात करने के साथ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सभा में विरोध के लिए काले झंडे दिखाने के लोकतांत्रिक तरीके पर ही जेल में दाल आपराधिक धाराएं लगवा देती है। कोई सरकारी विभाग के अनुचित कार्यों को बढ़ावा देने की बात कहता है तो सच बोलने वाले को प्रताड़ित किया जाता है और अनुचित कार्य करने वालों पर कोई करवाई नहीं की जाती। 
       ये इस देश का दुर्भाग्य है कि अभी भी तमाम लोग गुलामी की मानसिकता से निकल नहीं पाये हैं। और कभी एक कभी दूसरे की चाटुकारिता में कभी किसी को देवी तो कभी किसी को भगवान समझने लगते हैं। सब से पहले तो आप खुद धर्म और भगवान की बातें करने वाले वास्तविक भगवान अल्हा खुदा यीसु या वाहेगुरु को ही इक नेता के बराबर खड़ा कर अपमानित करते हैं। भगवान को किसी से बैर नहीं न ही किसी का पक्षपात करता है और आप किसी को भी जो तमाम महान लोगों से दुर्भावना रखता है , हर किसी को अपमानित करने का प्रयास करता है जो वास्तव में अच्छे इंसान होने का आधार है और खुद अपना गुणगान करवाता है उसे भगवान या खुद को उसका भक्त बताकर कितना अनुचित उदारहरण प्रस्तुत करते हैं। 
       राजनीती में खुद को सौ परदों में छिपाना और विरोधियों को नंगा दिखलाना इक बेहद गंदी सोच को दर्शाता है। सब जानते हैं भगवान से कुछ भी छिपा नहीं है और भगवान चाहता तो बाकी तमाम तरह के चमत्कार करने की तरह ये भी कर सकता था कि सब की छुपाई बातें औरों को पता चल जाएं। मगर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसे मालूम था वो इंसान बना रहा है और कोई भी इंसान सब तरह से परिपूर्ण नहीं हो सकता है। इंसान की सब से बड़ी कमी ही यही है कि वो औरों में कमियां ढूंढता है मगर खुद की बड़ी से बड़ी कमी को भी नहीं देख सकता है। ये आजकल की राजनीती उस वैश्यावृति के धंधे से भी नीचे गिर चुकी है जिस के बारे हमेशा से कहते आये हैं ये दो दुनिया के सब से पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। मगर कोई वैश्या भी ऐसा नग्नता का नाच नहीं नाच सकती जिस तरह से आज की राजनीती नाच रही है।

Friday, 23 March 2018

मैं जहन्नुम में बहुत खुश था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मैं जहन्नुम में बहुत खुश था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        कब से सुनते आ रहे थे कि आजकल कलयुग है , लेकिन वास्तव में सब कुछ अगर अच्छा नहीं भी लगता था तो उतना भी बुरा नहीं लगता था। कुछ अच्छा कुछ बुरा भी वास्तविक जीवन में दिखाई देता था। फिल्मों की कहानियों में ही देखते थे कोई देवता है तो कोई दानव खलनायक है। मगर इसके बावजूद हमने उन से भी लगाव महसूस किया और पसंद किया जो खलनायक नज़र आते थे। अभिनय में तो नायक से अधिक शोहरत खलनायक को मिलती देखी है शायद इसका कारण हम सभी में इक खलनायक छुपा होना हो सकता है। लेकिन इक ख़ास बात होती थी कि लोग हमेशा पुराने ज़माने को बेहतर बताया करते थे , हम उस युग के लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन काल में बहुत बदलाव देखे हैं। गांव में मीलों तक पैदल चलते थे पगडंडी पर कोई सड़क नहीं होती थी , बैलगाड़ी से साईकिल तक लंबा सफर तय किया है हमने। इक प्राथमिक विद्यालय जिस में पांचवी तक एक ही अध्यापक शिक्षा देता था और आज तक भी उन मास्टरजी का नाम हर गांववासी आदर से लेता है। वहां से बिजली सड़क बस स्कूटर कार से हवाईजहाज़ तक सब को देखा है और रेडिओ से टेलीविज़न के बाद मोबाइल फोन और स्मार्ट फोन और कम्प्यूटर लैपटॉप तक ही नहीं अंतरिक्ष तक सब के गवाह हैं हम लोग। इन सब में शहरीकरण के हवा पानी ही नहीं इंसान की मानसिकता तक के प्रदूषित होने को भी सामने देखा है। सब से अच्छी बात ये है कि हमने देश के आज़ाद होने के बाद जन्म लिया और हमारी मानसिकता गुलामी की नहीं रही लेकिन देश में लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही परिवारवाद से जातिवाद तक सब हमने देखा है और झेला ही नहीं उसके साथ जंग भी लड़ते रहे हैं। 
       जब सालों तक सभी दलों की सरकारों को बनाकर बदलकर भी नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा तो जनता ने मान लिया था कि इस देश में कुछ नहीं हो सकता है। मगर तभी किसी ने घोषणा कर दी कि केवल उसको ही जहन्नुम को जन्नत बनाने का तरीका आता है और अगर उसको जनता ने अपना सेवक चुन लिया तो वह खुद शासक की तरह नहीं रहेगा पहले वाले नेताओं की तरह बल्कि सेवक बनकर इस देश को नर्क से स्वर्ग बना देगा। खुद उसको भी भरोसा नहीं था कि उसका हर जुमला लोगों पर जादू सा काम करेगा और उसको उम्मीद से बढ़कर बहुमत मिलेगा। मगर उसे याद ही नहीं रहा क्या क्या सपने दिखलाये थे देश की जनता को तो उन वादों को पूरा करने की बात ही क्यों होती। लेकिन फिर उस ने देश और जनता की भलाई के नाम पर वो सब और भी अधिक बढ़कर किया जिसकी पहले उसी ने आलोचना की थी। उसका हर बोला गया झूठ सत्य घोषित किया जाने लगा और जन्नत बनाने की बात तो इक उपहास बना दी गई। कुछ इस तरह से समझाया गया कि आप लोग इतनी सी बात नहीं जानते कि जन्नत मरने के बाद मिलती है। तब से कितने लोग किन किन हालात में मर गए या मरने को विवश हुए कोई हिसाब नहीं। जो सब के हिसाब पूछता था खुद उसको अपना हिसाब किसी को देना नहीं ज़रूरी लगा। 
                       पांच साल की अवधि मिली थी लेकिन आधी अवधि बीतने के बाद देश की जनता पहले से बहुत अधिक बदहाली में खुद को पा रही थी और तब उसको अगले चुनाव की चिंता सताने लगी। ऐसे में लोगों को समझाया जा रहा है कि अभी जो आपको दर्द लगता है बाद में वही आपकी दवा का काम करेगा। ये तो शायरी की बात हो गई , दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना। फिर ये और शोर उत्तपन पैदा किया गया कि अभी चार साल बाद सब बढ़िया होने वाला है , बस 2022 तक सब्र करो अगर ज़िंदा बचोगे तो यहीं अन्यथा और किसी जहान में जन्नत तो मिलनी ही है। कुछ उसी तरह जैसे गंगा तट पर पण्डे यजमान की जेब खाली कर उनके पूर्वजों का कल्याण करने की आड़ में खुद अपने लिए धरती पर स्वर्ग पाते हैं लेकिन उनकी संतान कभी किसी दूसरे को पूर्वजों के कल्याण करने को कुछ नहीं देती हैं। आपको यकीन नहीं तो जाकर पूछना कभी। मगर कुछ दिन पहले इन्हीं नेता जी को पूजा करवाते इक भोले पंडित ने गलती से पूछ ही लिया यजमान आप को क्या वास्तव में जहन्नम को जन्नत बनाने का तरीका आता है। तो जवाब मिला ये राज़ की बात है किसी और को नहीं बताना। अभी तक लोग सोचते थे कि कलयुग है मगर उन्होंने कभी कलयुग की कल्पना नहीं की थी। आजकल उनको समझ आ रहा है यही घोर कलयुग है , मगर उनको इतनी बात भी नहीं पता कि कलयुग में राज कलयुगी लोग ही करते हैं , तभी तो हमारी सरकार ने अभी अभी देश की सब से बड़ी अदालत में बताया है कि हमारा संविधान अपराधियों को राजनितिक दल बनाने ही नहीं किसी दल का अध्यक्ष बनने की भी इजाज़त देता है। जब दल का अध्यक्ष अपराधी होगा तो भले खुद चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हो तब भी अपने संगी साथी अपराधियों को टिकट तो वितरित कर सकता है। 
        इस कथा का अंत रोचक है। नेता सेवक हैं तो टीवी और अख़बार वाले खुद को लोकतंत्र का रक्षक या रखवाला अर्थात चौकीदार बताते हैं। ये जनाब भी खुद को चौकीदार बनाने की बात करते थे और बन बैठे मालिक और दाता भी कहलाने लगे , ऐसे में मीडिया के चौकीदारों को हिस्सा देकर भाई भाई बना लिया। मौसेरे भाई चोर चोर होते ही थे आजकल चैकीदारी थानेदारी बन गई है तो रिश्ता और गहरा हो गया है। 

                      हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ,

                     दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है।


बात सवदेशी की और विदेशी दखल की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

बात सवदेशी की और विदेशी दखल की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  आज शहीदी दिवस है , भगतसिंह राजगुरु सुखदेव को याद करते हुए , महात्मा गांधी के विदेशी सामान को जलाने को भी याद रखते हुए आज फिर से विचार करना होगा क्योंकि इधर हमारी ज़िंदगी ही नहीं हमारी सोच पर भी विदेशी लोग मनचाहे तरीके से प्रभाव डालते हैं। फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने माना ही नहीं बल्कि उस बात की माफ़ी भी मांगी है कि उन्होंने डाटा चोरी या लीक होने दिया या फिर किया। ये कोई छोटी बात नहीं है। पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया पर तमाम लोग किसी नेता या दल की विचारधारा की बात करते हुए अभद्रता की हद तक पहुंच जाते हैं। कोई किसी को चाहता है किसी का समर्थक है तो उसको ये अधिकार नहीं मिलता कि जो कोई उसकी बात से असहमत हो उसको बुरा भला कहे। लेकिन जब बड़े बड़े राजनेता और राजनैतिक दल धनबल से भाड़े के लोगों से सोशल मीडिया पर अपना गुणगान और दूसरों को अपमानित करने का घटिया और निम्न स्तर का खेल करवाते हों तब उनकी निजी महत्वांकाक्षा देश के लोकतंत्र को अपमानित करती है जिस में सत्ता पक्ष को विपक्ष की असहमति का आदर करना ज़रूरी है। आज शायद गांधी जी और भगतसिंह जी दोनों ही एकमत होते कि इक विदेशी को हमारे देश की आज़ादी के साथ खिलवाड़ या छेड़ छाड़ करने पर उसपर रोक लगा दी जाये। 
         आज फेसबुक पर बड़ी बड़ी देशभक्ति की बातें लिखने वाले क्या वास्तव में देश हित को समझ फेसबुक और व्हाट्सऐप का विरोध कर सकते हैं। ऐसा करने में कोई भी कठिनाई नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग इनका उपयोग किसी सार्थक काम के लिए नहीं करते हैं और उनके लिए ये केवल समय बिताने और घटिया तरह का मनोरंजन करने का साधन है। विचार किया जाये तो ये सब एकतरफा संवाद है जहां आप जो भी लिखते हैं कोई अपनी असहमति नहीं जता सकता , कोई लाइक कर सकता है मगर कमेंट आपकी अनुमति से ही किया जा सकता है। भारत में बीस करोड़ लोग घंटों अपना समय हर दिन और पैसा भी बर्बाद तो करते ही हैं साथ ही कभी कभी मानसिक रूप से भी असामान्य आचरण करते हैं। जिस तरह दवाओं के दुष्प्रभाव होने पर उसकी ज़रूरत है या नहीं और उपयोग करनी है तो किस मात्रा तक ये देखना होता है उसी तरह इन सभी सोशल मीडिया के माध्यमों पर विचार किया जाना चाहिए।

Tuesday, 19 September 2017

अपराधी भी आप , अदालत भी आपकी ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

       अपराधी भी आप , अदालत भी आपकी ( आठवां सुर ) 

                          डॉ लोक सेतिया

            खुद को समझदार समझने वालों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। उधर नहीं जाना इधर नहीं आना ऐसे नहीं करना उस तरह नहीं इस तरह करना , हर कदम पर बेड़ियां डाली हैं मेरे पैरों में। मैं देश की जनता की तरह हर औरत की तरह बेबस खड़ी हुई। मगर मैं आज़ाद हूं , ये जाने किस तरह की आज़ादी है जिस में सांस भी अपनी मर्ज़ी से नहीं ले सकते हम। अपराधी कौन है , जो न्यायधीश बन अदालत लगाए बैठे हैं , वो क्या फैसला करेंगे। सरकार ने फैसला किया और लाख करोड़ का क़र्ज़ विदेश से ले लिया और बताया गया ये उनकी मेहरबानी है आपको पचास साल में चुकाना है ये क़र्ज़। आज जो बच्चा जन्म लेगा उस पर ये क़र्ज़ होगा , लिया जिस ने उसको नहीं भावी संतानों को क़र्ज़ भरना है। बाप दादा का क़र्ज़ चुकाना आपका धर्म है। ये भी इक धंधा है बाप दादा के नाम पर किसी को देते रहो और बच्चों को भूखा मरने दो। मेरे ताया जी इक कहावत सुनाते थे , आप मरी ढंड से बेटी के नाम रज़ाई कर गई। देश और जनता की भलाई और विकास की बात कौन करते हैं , वो जो हर दिन खुद अपने पर लाखों रूपये खर्च करवाते हैं सुख सुविधा , आडंबर और झूठी शान की सुरक्षा के नाम पर। अकेले आप पर गरीब देश के खज़ाने से लाखों रूपये रोज़ खर्च किये जाते हैं , आपको बड़े बड़े बंगले रहने को और शाही ठाठ बाठ चाहिएं। आप क्या ख़ाक समझोगे गरीबी का दर्द। देश का राष्ट्रपति आया भले गरीब परिवार से हो , रहता राजा की तरह सैंकड़ों कमरों वाले भवन में है जिस पर हर दिन कई लाख और हर महीने कई करोड़ या सालाना सैंकड़ों करोड़ खर्च किये जाते हैं। इन सब के मुंह से गरीबी और गरीब की बात किसी उपहास जैसी लगती है। 
                  धर्म की किताब में देव और दानव दोनों की बात लिखी है।  देवता वो हैं जो अपने पास कुछ नहीं रखते , जो भी हो बांटते हैं औरों को अर्थात जो देता है वही देवता है। भगवान दाता है किसी से कुछ लेता नहीं है , जो भगवान को भी सोचते हैं हम खुश कर सकते चढ़ावा चढ़ाकर उनको कुछ नहीं पता। भगवान हमारी तरह नहीं है जो अपना गुणगान सुन या और किसी तरह लालच से खुश हो जाये। धर्म को समझे बिना आप आस्तिक नहीं बन सकते। और दानव कौन हैं , जो औरों से सब छीन लेना चाहते हैं , दानवों की भूख कभी नहीं मिटती है। ये मेरा नहीं हर धर्म की किताब का कहना है। आज जितने भी लोग औरों से छीन कर अपना पेट भरते हैं उनको आप राक्षस ही समझना। और इस सूचि में नेता अधिकारी ही नहीं , लूट का ठगी का कारोबार करने वाले व्यौपारी , मीडिया वाले , डॉक्टर , शिक्षक जो अपने पेशे को केवल मुनाफे का कारोबार समझते हैं उन से लेकर तथाकथित समाज सेवक भी शामिल हैं। जिन पांच फीसदी लोगों के पास नब्बे फीसदी दौलत है वो सब ईश्वर की अदालत में गुनहगार कहलायेंगे।  भगवान ने सब को सब बराबर दिया है , जिन्होंने अपनी चालाकी से या किसी भी तरह ज़रूरत से अधिक हासिल किया हुआ है और किसी को बांटते नहीं हैं वो सब मानवता के अपराधी हैं। इक बात लिखी हुई है सभी धर्मोँ में , जिस के पास सब कुछ है तब भी और अधिक जमा करने की चाहत रखते हैं वही सब से दरिद्र हैं। जो आपको धरती पर भगवान लगते हैं और जिनकी आप महिमा का गुणगान करते हैं वो वास्तव में गरीब ही हैं। सत्ता की हवस जिन नेताओं की मिटती ही नहीं उनको भी आप गरीबों से गरीब ही समझना क्योंकि हर गरीब की थाली से कुछ जाता है उनके पेट भरने को। वास्तविक देश और जनता के सेवक कभी खुद राजसी ठाठ से शान से नहीं रहा करते। इन से कोई आशा मत रखो जिनकी खुद की चाहत की कोई सीमा ही नहीं है।

Monday, 18 September 2017

उचित राह चलना कठिन , अनुचित की आज़ादी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     उचित राह चलना कठिन , अनुचित की आज़ादी ( आलेख ) 

                           डॉ लोक सेतिया

                  सरकार क्या अख़बार क्या टीवी के खबरी चैनल क्या , सब इंतज़ार किया करते हैं किसी अनहोनी को घटने की। फिर कुछ दिन तक उसी बात का शोर मगर बेहद असंवेदनशील ढंग से। लगता ही नहीं किसी को दूसरों का दर्द समझना आता है। बयान बाज़ी और हादसों का भी उपयोग करना अपने मकसद को आम बात है। मानवता तो जैसे बची ही नहीं , आदर्श और नैतिक मूल्य केवल किताबी अक्षर बन गए हैं। काश किसी अनहोनी से देश की सरकार राज्यों की सरकारें और हम सभी सबक सीख लें और अपनी मदहोशी से जागकर कुछ सोचें विचार करें और कहीं भी ऐसी घटनाएं नहीं हों ऐसा उपाय करें। रायन स्कूल की बात यहीं खत्म नहीं होनी चाहिए , शायद यहीं से कुछ शुरुआत की जा सकती है। बहुत बातें हैं जो सामने हैं मगर हम सभी अनदेखा करते हैं। सब से पहले तो सरकारी सभी विभाग खुद अपने आप अपना फ़र्ज़ निभाना जानते ही नहीं , उनको खुद अपने काम करने होंगे बिना किसी की शिकायत या सिफारिश के। पुलिस को अपराध रोकना , नहीं होने देना कब ज़रूरी लगेगा। बहुत विभाग तो ऐसे हैं जो खुद अपराध करवाते हैं ताकि ऊपर की कमाई की जा सके। खुद ही अपनी ज़मीन पर कब्ज़ा कराना और महीना वसूलना , जिस विभाग को लोगों को घर प्लॉट्स उपलब्ध कराने हैं , वही खुद किसी नियम कानून का पालन नहीं करता है। केवल अपनी गलत आमदनी के लिए ये विभाग खुद ही अपराधी की तरह काम करता है। देश में सब से अधिक कदाचार इसी आवास से जुड़े विभाग में होता है और नेता भी शामिल होते हैं। किस राज्य में नेता अधिकारी ये अपराध नहीं करते देखे गए।
                              शिक्षा और स्वास्थ्य सब से ज़रूरी हैं मगर किसी सरकार को चिंता ही नहीं इस में कितनी बदहाली है। आपको दवा नकली मिलती है , खुद डॉक्टर्स घटिया दवा लिखते हैं कमीशन की खातिर। अगर आपको फल और सब्ज़ियां भी तेज़ाब से चमकी हुई मिलें तब आपको ज़हर ही खिला रहे हैं। खाने पीने का सामान कितनी घटिया सब्ज़ियों और तेल से कितनी गंदी जगह बनाकर गंदगी की जगह परोसा जाता है , जिस से कितने रोग बढ़ रहे है कोई नहीं देखता। सस्ता नहीं बेहद महंगा है ये सब जो आपको स्वादिष्ट लगता है। अगर कभी सरकार जाकर देखे तो हमारे अधिकतर होटल  , रेस्टॉरेंट ही नहीं , हॉस्पिटल और नर्सिंग होम तक स्तरहीन सेवाएं और तमाम तरह से खिलवाड़ स्वास्थ्य के साथ करते मिलेंगे। क्योंकि कोई देखने वाला नहीं कि कहां क्या हो रहा है। स्कूल हॉस्पिटल और खाने पीने का सामान बेचने वाले ही अगर किसी नियम गुणवत्ता के मापदंड पर खरे नहीं हैं तो फिर देश में सरकार क्या है। सब विभाग और नेता भाईचारा निभाने में जनता के जीवन से खिलवाड़ करते हैं।
          ऐसा शायद ही किसी सभ्य देश में होता है कि उचित ढंग से कोई काम नहीं हो सकता और अनुचित ढंग से कोई कुछ भी करता रहे कोई नहीं देखता , रोकता टोकता। ज़हर देना ही अपराध नहीं होता , समय पर दवा नहीं देना भी जानलेवा होता है और सभी विभाग अपना अपना कर्तव्य खुद समय पर नहीं निभा कर वही ही करते हैं। गुनहगार कौन नहीं है।