Sunday, 19 February 2017

श्री पूरन मुदगल ( मित्र लेखक ) की रचनाएं और परिचय

        श्री पूरन मुद्गगल जी का हरियाणा के साहित्यकारों में बहुत ऊंचा स्थान तो है ही , उनका लेखन राष्ट्र स्तर के तमाम उच्च कोटि के पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने से देश भर में विख्यात भी है। कविता कहानी आलोचना और कुछ महान लोगों की जीवनी लिखने के साथ इक पुस्तक वे पन्ने जिसमें , स्थान-शहर , व्यक्ति , पुस्तकों ,  कुछ जगहों के साथ तमाम घटनाओं के प्रसंग भी शामिल हैं। 8 5 वर्ष की आयु में उनकी कलम निरंतर चल रही है निडरता से और समाज की वास्तविकता को उजागर करती है। फाज़िलका पंजाब में 2 4 दिसंबर 1931  को जन्में मुदगल जी अब हरियाणा में साहित्य की राजधानी सिरसा में रहते हैं। किसी भी लेखक की शख्सियत को समझना हो तो उसके लेखन को पढ़ना और समझना ज़रूरी है। मगर इक बात महत्वपूर्ण होती है कि कौन क्या लिखता से पहले क्यों लिखता है इसको जानना। बहुत लोग कभी न कभी ऐसा कहते हैं कि मैं भी लिखना चाहता था , बस लिखने की चाहत और लिखने के लंबे सफर में ज़िंदगी गुज़र जाती है। लिखना उतना सहज नहीं जितना लिखने की चाह। आज इसी बात से समझते हैं कि मुदगल जी कैसे लिखने लगे। अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे इक छात्र के रूप में जब इक सहयोगी की रचना प्रकाशित हुई देख कर उनको प्रतीत हुआ कि मैं भी लिख सकता हूं। और उन्होंने एक रचना लिखी और उसी जगह भेजी छपने को जिस में मित्र की छपी थी , मगर वो खेद सहित लौट आई थी। कुछ दिन बाद यात्रा करते हुए उन्होंने जो देखा उस घटना ने उनको झकझोर दिया , इक किसान गठड़ी में चावल लेकर जा रहा था बेटी का शगुन देने , मगर तब चावल ले जाना वर्जित था यात्रा में बाहर कहीं। इस तरह इक लेखक का जन्म होता है जब वो कल्पना से नहीं जीवन की घटना से लिखने को प्रेरित से बढ़कर विवश होता है। वो कहानी , तीसरे दिन शीर्षक की 5 जून 1950 को जलंधर के हिंदी अख़बार मिलाप में प्रकाशित हुई थी। इसी तरह एक दिन रेडियो पर खबरें सुनते हुए उनसे श्रीमती जी ने सवाल किया कत्ल लूट की खबरें सुन कि ये बंदूक तलवार बनाते ही क्यों हैं। सुन कर उनको हिरोशिमा की याद आई , कहीं जाते रस्ते पर लुहार को छुरी की धार तेज़ करते देखा और ख्याल आया ,
इस को क्या पता तेज़ धार किसी का गला काटकर आदमी ही नहीं इक विचार को भी कत्ल कर सकती है , सिर्फ उंगली नहीं कटती दिशा दिखाने वाली राह भी गम हो जाती है। तब उनकी पहली कविता का जन्म हुआ इस बात को सोचते , धार शीर्षक की कविता। पेश हैं उनकी कुछ चुनी हुई रचनाएं।
          *************************************************************
                         फ्रीज़ हुए दृश्य ( कविता )
अनुभव
जो एक-एक कर हुए संचित
धीरे-धीरे झर गए
समय की मुट्ठी से
बचे कुछ
रह गए सुरक्षित
तेरे-मेरे पत्रों में
फ्रीज़ हुए दृश्यों से से ,
तुम्हारे छुअन से भीगे हुए अक्षर
सूखने पर हो गए शिलालेख
जो पढ़े जाएंगे
हर युग में ,
ठहरी पलकें
रुकी हुई प्राणों की धड़कन
मोहक रूपाकार
नखशिख वर्णन-
महाकाव्य की कथा-कहानी
क्या होती है कभी पुरानी ,
वृक्ष से लिपटी लता को
अलग करने का जतन
एक नादानी।
*********************
                 लटकी हवा ( कविता )
हवा हिली नहीं
वह लटकी हुई है
नाचते मोर के पंख पर

हवा लटकी रही
मरुस्थल में
पकी खजूर पर
कारवां के इंतज़ार में

हवा हिली नहीं
तुम बहुत चुपके से आई
और छोड़ गई बयार मेरी पलकों पर
जो एक मुद्दत से ठहरी है वहीं !

तुम्हारे लौटते कदमों के इर्द-गिर्द
बरसों से झुका है आसमान
हवा के थिर कन्धों पर
और
उन कदमों के निशान
संग्रहालय में रखी कलाकृति जैसे
अतीत की मुखर ख़ामोशी -से !
हवा है कि हिलती ही नहीं !
*********************
              ठहरा हुआ सच ( कविता )
जैसे गर्मी की रात में      
चाँद को ढाँप ले बादल-धूल    
पगडंडी से भटक जाएं कदम-
यात्री संभालने लगे
अपनी लाठी से बंधा पाथेय।
जैसे चित्र में अंकित रथ -
घोड़े फुलाते रहें नथुने
उठाए हुए पुख्ता कदम।
जैसे नदी
अधर से उतरे हिम राक्षस को देख
हो जाए यकायक सफेद
रुक जाए बहती धार।
फ़िलहाल इतना ही
तब तक के लिए
जब तक कि -
यात्री
अपनी लाठी से नहीं तोड़ता
अंधेरे की मकड़ी का बुना बादल जाल
घोड़े नहीं सिधाए जाते
सूर्य रथ खींचने की कला
सोई नदी
नहीं लेती अंगड़ाई
उठने के लिए।
तब तक के लिए
फ़िलहाल इतना ही।
*********************
             अबीज ( लघुकथा )
अजनबी ने गेंहूँ की एक पकी बाल तोड़ी ,
बहुत मोटी है बाल , उसने किसान से कहा।
किसान ने बाल से कुछ दानें निकाल कर अपने हाथ पर रखे और अजनबी से कहा , देखो ,
देखते-देखते सब दानें दो दो टुकड़ों में खिल गए।
अजनबी ने कहा ये दानें साबुत क्यों नहीं रहे ?
यह नए बीज की फसल है !
पिछले पांच सालों से हम यही खा रहे हैं।
चार-पांच गुना झाड़ है इसका , लेकिन  . .  .  .
किसान के चेहरे पर अजाने में किसी गलत दस्तावेज़ पर किये दस्तखत - जैसी लिखाई उभर आई।
क्या . . . ?
यह विदेशी बीज है। मेरे बेटे इसे बाहर से लाए हैं , इसकी फसल तो अच्छी होती है पर बीज के काम नहीं आती।
क्यों ?
बाल से निकलते ही दाने के दो टुकड़े हो जाते हैं , देखा नहीं तुमने अभी।
मेरे बेटे निक्का और अमली चोरी छिपे ले आते हैं यह बीज।
लेकिन जिस फसल से बीज न बने वह किस काम की। किसी साल विदेश से बीज न आया तो  . . .  . अजनबी चिंता का स्वर पीछे छोड़ता हुआ चला गया।
लोग फसल काटने में व्यस्त थे। निकट ही हवा में तैर रही ढोल की आवाज़ किसान को पहली बार बेसुरी लगी।
वह अपनी हथेली पर रखे गेंहूँ के टुकड़ा-टुकड़ा दानों को देखने लगा जिनका धरती से रिश्ता टूट गया था।
*************************************************************************
                  पहला झूठ ( लघुकथा )
   बच्चे ने कब मेरी जेब से पेन निकाला , मुझे पता ही नहीं चला। देखते-देखते उसने पेन की कैप उतार ली।
निब फर्श पर मारने को हुआ तो मैंने तुरन्त उसके हाथ से पेन छीन लिया।  वह ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा।
उसे शांत करने के लिए पेन देना पड़ा। उसने तुरन्त कैप खींची और पेन का रिश्ता फिर फर्श से जोड़ने लगा।
पेन बहुमूल्य था और मैं नहीं चाहता था कि बच्चा खेल खेल में उसे बेकार कर दे।
    मैंने बच्चे का ध्यान बंटाया। पेन उसके हाथ से छीनकर फुर्ती से अपना हाथ पीठ के पीछे किया , दूसरे हाथ से ऊपर की ओर संकेत करते हुए कहा - पेन .  .  . . चिया। इस बार वो रोने की बजाय आकाश की ओर नज़र उठाकर चिड़िया को देखने लगा। उसके भोले मन ने मान लिया कि पेन चिड़िया ले गई।
     एक दिन वह बर्फी का टुकड़ा खा रहा था। मैंने कहा - बिट्टू बर्फी मुझे दो।
उसने तुरन्त बर्फी वाला हाथ पीठ के पीछे किया और तुतलाती भाषा में कहा -
बफ्फी चिया।
   

Wednesday, 15 February 2017

और इस तरह देशभक्त हो गया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                                  हम सभी खुद को कैसा समझते हैं , क्या अपने आप को कभी आईने में तोलते हैं। कल मुझे एक लेखक की भेजी पुस्तक मिली , जिस में खुद उनकी एक भी रचना नहीं थी। मैंने पहली बार इस तरह की किताब पढ़ी जिस में इतनी विविधता थी , दो शहरों की बात , कुछ मंदिरों , इमारतों की बात और बहुत ऐसे लोगों की भी बात थी जिन्होंने जीवन में कुछ हटकर तमाम कार्य किये। सोचा ये सब पढ़ने और याद करने का अर्थ क्या है। मुझे लगा इन सभी से हमें स्पष्ट रूप से परिभाषायें समझ आती हैं। बस उसी को आधार बना कुछ निष्कर्ष निकालने की कोशिश की है।
                          आप नेता हैं राजनीति करते हैं , अगर देश जनता की भलाई नहीं केवल सत्ता हासिल करना ही आपकी चाहत है आदर्श है तो इस में देशभक्ति कहां है। आपने देश और समाज के नैतिक मूल्यों का पालन किये बिना किसी भी तरह चुनाव जीत लिया तो आप कानून और संविधान की अवहेलना करने वाले अराजक तत्व हैं जो शासक बन अन्याय और लूट ही कर सकते हैं। बड़े  से बड़े पद मिलने पर भी आपने अगर सच्ची निष्ठा और ईमानदारी से देश और राज्य में निष्पक्ष शासन नहीं दिया , लोकहित की नहीं दलहित परिवारहित की ही चिंता की तब आप देशभक्त कैसे हैं। अगर देश या राज्य के कोष का एक भी पैसा आपने व्यर्थ बर्बाद किया जिस से जनता का कुछ भी कल्याण नहीं हो सकता तब आप अच्छे शासक नहीं हैं। और अगर जनता का धन अपनी सुख सुविधा पे खर्च करते हैं जब लोग गरीब हैं भूखे हैं तब आप अमानत में खयानत के दोषी हैं।  जिस शासन में जनता को न्याय बुनियादी हक सुरक्षा और निडर होकर जीने का बराबरी का अवसर नहीं मिलता उसकी पुलिस प्रशासन न्यायपालिका सभी अपना कर्तव्य निभाने में असफल ही नहीं देश और समाज के अपराधी भी हैं। किसी आम आदमी को मरने तक न्याय नहीं मिलना , बिना अपराध जेलों में ज़ुल्म सहना और धनवान और ख़ास लोगों के अपराधों की सज़ा उनके जीवन काल में नहीं मिलना और उनकी मौत के बाद फैसला सुनाना सज़ा का ये न्याय नहीं न्याय व्यवस्था का उपहास है।
               बात केवल नेताओं और प्रशासकों की नहीं है , आप अगर डॉक्टर हैं लेकिन आपका मकसद रोगियों की सेवा या उपचार से अधिक पैसा बनाना है और उस के लिये आप तमाम गलत तरीके अपनाते हैं। तब आप अपने देश समाज और पेशे के प्रति ईमानदार नहीं बल्कि गुनाहगार हैं। देशभक्त तो कदापि नहीं। शिक्षक बनकर शिक्षा का व्योपार करने वाले तो अज्ञानी हैं जो खुद भटके हुए किसी दूसरे को सही दिशा नहीं दिखला सकते। कारोबार भी कुछ नियमों का पालन कर किया जाता है ईमानदारी से , बहुत अधिक मनमाने दाम वसूलना मुनाफाखोरी करना लूट होता है व्योपार नहीं। साहित्यकार लेखक और पत्रकार भी अगर सच की बात नहीं करते और अपने नाम शोहरत पैसा पुरुस्कार की चाह में दरबारी या फिर व्योपारी बनकर फायदा उठाते सच को गलत ढंग से प्रस्तुत कर तब उनका गुनाह अक्षम्य है। चौकीदार हैं आप रखवाली करनी है आपने , खुद को न्यायधीश या थानेदार न समझें।
                       देश के हर नागरिक को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। केवल नेताओं की बुराई की बातें करना काफी नहीं है। सोशल मीडिया पर संजीदा बातों को उपहास या मनोरंजन की बात बना देना भी अनुचित है , क्यों  नहीं सोचते आपका देश है आपको उसको बेहतर बनाना है जतन करके।  क्या आप देश के नियमों का पालन करते हैं , सोचते हैं आपने देश को या किसी नागरिक को कोई नुकसान नहीं देना। हो सके तो किसी को कुछ फायदा पहुंचना जनसेवा करके देशसेवा कर तभी देशभक्त हैं।  खाली बातों से देश प्रेम नहीं होता है। आज पर्यावरण की हालत देश की और खराब होती जा रही हर साल चालीस प्रतिशत बढ़ रहा प्रदूषण। देश में बीस लाख लोग इसी से मरते हैं हर सेकिंड बीस लोग। पेड़ काटना , वाहनों का धुवां , उद्योगों का धुवां - अन्य गंदगी से धरती और जल का प्रदूषित होना। सीमेंट की ऊंची बहुमंज़िला इमारतें बनाने में प्रदूषण ही नहीं धरती और धरती के नीचे के जल का गिरता स्तर। कौन कौन दोषी है। हर कोई समझता है चर्चा करता है मगर खुद भी किसी न किसी तरह शामिल है देश की बदहाली बर्बादी में। औरों पर सब आरोप लगा मैं देशभक्त नहीं हो गया।


Tuesday, 14 February 2017

चलना तो है ( कविता ) भाग - दो डॉ लोक सेतिया

अकेला हूं मैं
नहीं साथ कोई
राह कठिन है
हमसफ़र कोई नहीं।
तुम भी अगर
मेरी तरह हो अकेले
मुझे अपना बना लो
आ जाओ मेरे पास
या मुझको बुला लो।
पर सोच लेना
क्या निभाना है साथ
हमेशा पूरी डगर साथ रहकर
वह ही ये जान कर कि
जीवन के लंबे सफर में
आराम करने को रुकने को
नहीं आती कोई मंज़िल
कभी कहीं ठहरने के लिए।
बस चलते जाना है निरंतर
चलते ही जाना
चलना तो हर हाल ही होगा
चाहे चलो अकेले-अकेले
या साथ साथ बन हमसफ़र
साथ निभाने को ऐ साथी।

Monday, 13 February 2017

वास्तविकता ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

               रचना जब तक रोग-ग्रस्त रही , सुरेश रात-दिन उसके पास रहा देखभाल को , तभी इतनी गंभीर दशा से निकल कर फिर से पूरी तरह स्वस्थ हो सकी। आज दोबारा वही सवाल रचना के मन में आया और उसने सोचा आज साफ साफ पूछ ही लेती हूं। वो सुरेश से बोली क्या अभी भी तुमको नहीं लगता कि मैं ही वही लड़की हूं जिस से तुम्हें बहुत पहले ही विवाह कर लेना चाहिए था। सुरेश ने जवाब दिया , रचना मुझे तुमने इक बात कही थी बहुत साल पहले , मुझे आज भी याद है तुम भी भुला नहीं पाई होगी उस बात को। रचना ने कहा बिल्कुल याद है , मैंने यही कहा था सुरेश मैं तुम से अथाह प्रेम करती हूं , अगर शादी करूंगी तो सिर्फ तुम्हीं से। सुरेश ने याद दिलाया हां ये तो कहा था मगर इक बात और भी तुमने कही थी , कि अगर मैंने तुझे छोड़ किसी और लड़की से शादी की तो तुम जान दे दोगी। रचना बोली कही थी ये भी बात क्योंकि नहीं जी सकती तुमसे बिछुड़ कर , लेकिन तुमने नहीं बताया कि तुम मुझ से नहीं तो और किस से शादी करना चाहते हो। सुरेश ने कहा देखो रचना तब भी मैंने तुमसे यही कहा था कि हम बचपन के दोस्त हैं लेकिन मेरे मन में कभी तुम्हारे प्रति वो भावना नहीं आई कि मुझे तुम्हीं से विवाह करना चाहिये। बेशक मुझे और भी किसी लड़की से प्यार का कोई एहसास नहीं हुआ , मगर तुमने तब खुद कहा था कि तुम उस दिन का इंतज़ार करोगी जिस दिन मेरे दिल में भी वही भावना पनपेगी कि मुझे सिवा रचना के किसी से शादी नहीं करनी है। हम दोनों में कभी कोई झगड़ा नहीं हुआ , कोई अनबन नहीं मतभेद नहीं , तुम में कुछ भी कमी भी हर्गिज़ नहीं है , फिर भी मुझे नहीं पता क्यों मुझे उस तरह का एहसास हुआ नहीं जो तुम चाहती थी और चाहती हो आज भी। रचना आज जब हम दोनों पचास साल से अधिक आयु के हो चुके हैं , अकेले अलग अलग रहते भी अच्छे मित्र बने हुए हैं , तब मुझे फिर से पुराना सवाल अनावश्यक लगता है। मगर क्योंकि तुम्हें ये सवाल बेचैन करता रहता है तो हमें इसका उत्तर तो खोजना ही होगा। रचना क्यों न हम अपने गुरु जी से इस बारे चर्चा करें , वो इन दिनों यहीं आकर ठहरे हुए हैं थोड़े दिन को। रचना ने कहा सही बात है , तुम जाकर मिलो गुरु जी से और उन से अकेले में मिलने का समय ले सको तो मैं साथ साथ चल कर उन्हीं से पूछना चाहती हूं , शायद वही मेरी दुविधा को दूर कर सकते हैं।
                     सुरेश ने जब गुरु जी को बताया कि रचना तंदरुस्त नहीं है और आपसे मिलना भी चाहती है , तब वो स्वयं ही शिष्या से मिलने और उसका हालचाल पूछने चले आये रचना के घर। रचना की तबीयत की बात जानने के बाद गुरु जी बोले , बताओ बेटी आपको क्या पूछना है मुझ से। रचना ने तब अपने और सुरेश के बारे सब कुछ बताकर पूछा , गुरु जी मैंने इतने साल तक इंतज़ार किया है , तब भी सुरेश के दिल में अपने लिए प्यार क्यों नहीं जगा पाई। गुरु जी ने रचना से पूछा , बेटी क्या तुम मानती हो कि तुम सुरेश से सच्चा प्यार करती हो , जबकि सुरेश के मन में वो भावना नहीं है। रचना ने जवाब दिया गुरु जी मुझे तो यही लगता है। गुरु जी बोले बेटी तुम्हारा विचार सही नहीं है। मुझे लगता है सुरेश ही है जो तुम से सच्चा अटूट और अथाह प्यार करता है , तभी उस ने तुम्हारी ख़ुशी को समझ कहीं और विवाह की बात सोची तक नहीं , इस डर से कि तुम कुछ अनर्थ नहीं कर बैठो। तुम शायद आकर्षित रही हो सुरेश के प्रति , उसको पाना भी चाहती हो , मगर प्रेम कभी विवश कर हासिल नहीं किया जाता है। बहुत मुमकिन है अगर तुमने कोई शर्त नहीं रखी होती अपनी जान देने  की , और कहती सुरेश तुम्हें जिस किसी से भी शादी करनी हो कर लेना , मुझे किसी दूसरे से नहीं करनी फिर भी तुम्हारी ख़ुशी में खुश रह लूंगी अकेली रह के भी। तब मुझे लगता है सुरेश खुद ही तुम से कह देता मुझे तुम से अच्छी लड़की कोई नहीं मिल सकती। जैसा तुम मानती रही हो रचना , वास्तविकता उस के विपरीत है। जितना प्यार सुरेश के मन में है तुम्हारे लिए , तुम्हारा प्यार उसके लिए उसके सामने कुछ भी नहीं। रचना बेटी तुमने प्यार को समझा भी नहीं जाना भी नहीं , आज रचना को पहचान हो गई थी प्रेम  की। सुरेश ही नहीं रचना भी समझ गई थी वास्तविकता।

Saturday, 11 February 2017

इक ईमानदार की मौत ( आलेख-विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

कुछ भी काल्पनिक नहीं , केवल सच। इक ईमानदार मर गया। बस इतनी सी बात है कोई खबर नहीं। पर क्यों और कैसे मरा पता चला तो लगा ये तो देश की वास्तविकता दिखाती कहानी है। बहुत साल पहले इक सरकारी विभाग में नौकरी करता था , कभी कुछ भी अनुचित नहीं किया। बहुत बार ऊपर के अधिकारी चाहते तब भी गलत काम नहीं कर पाते क्योंकि वह इक बाधा बन बीच में आ जाता था। उसको नहीं मालूम था बड़े अधिकारी उसको नापसंद करते हैं ईमानदार होने के कारण। उसको पीलिया रोग हो गया कुछ दिन इलाज हुआ छुट्टी लेकर , जब डॉक्टर ने उसको स्वस्थ बता दिया तब विभाग के बड़े अफ्सर ने और छुट्टी देने से मना कर दिया। उसे दफ्तर जाना ही पड़ा , मगर क्योंकि बिमारी से बहुत कमज़ोरी महसूस कर रहा था , इसलिये उसके सहयोगियों ने वहीं रखी चारपाई पर लेटने को कह दिया आराम करने को। तभी ऊपर के बड़े अधिकारी वहां आ गये थे और उसको सोता देखकर शराब पीकर लेटने का इल्ज़ाम लगा उसको निलम्बित कर दिया। वास्तव में उसने शराब का कभी सेवन किया ही नहीं था। उसने नोटिस मिलने पर जो बात सच थी लिख दी जवाब में , ये भी कि वो शराब नहीं पीता और ये आरोप झूठा और निराधार है। जब सेवा पर बहाल नहीं किया गया तब उसको न्याय पाने अदालत जाना पड़ा और अदालत ने उसकी बात को सही पाया दफ्तर के ही बाकी लोगों की गवाही और डॉक्टर के भी शराब नहीं पीने की बात को सही बताने पर। मगर बड़े अधिकारी अदालत के निर्णय के खिलाफ ऊपरी अदालत जाते गये तीस साल तक चुनौती देते और वो मरने तक इंसाफ होने का इंतज़ार ही करता रहा। उसके सेवानिवृत होने की उम्र बीत चुकी थी सालों पहले मगर उसे पेंशन कभी नहीं मिली , अभी फैसला आना बाकी था मगर मौत ने अपना फैसला पहले सुना दिया।
                  ये कहानी इतनी ही नहीं है , अभी असली बात बाकी है। वो शख्स इस सब को नियति समझ जी ही रहा था , अचानक कुछ दिन पहले उसको बताया डॉक्टर ने कि आपके हृदय का ऑपरेशन करना होगा। उसका पुत्र विदेश में नौकरी करता है वो आया और अपने पिता का ऑपरेशन दिल्ली के इक हॉस्पिटल से करवा वापस चला गया। लेकिन थोड़े दिन बाद उसको रात को सांस लेने में तकलीफ होने पर जब उनके अपने शहर में एक हॉस्पिटल ले गये तब जांच में पता चला कि ऑपरेशन करते समय उसको इंफेक्शन हो गया था और फिर ऑपरेशन की ज़रूरत है। दो लाख पहले जमा कराओ तब इलाज होगा , आधी रात को आजकल जब नोट बंदी की वजह से आप बैंक से भी नहीं निकाल सकते दिन में भी , रात को नकद राशि का प्रबंध करने में समय तो लगना ही था। जब तलक पैसे जमा करवाते वो शख्स ज़िंदा ही नहीं रहा , सरकार हैरान होती है जब हमने वादा किया हुआ है सब ठीक होने का फिर लोग कैसे बेवजह मर जाते हैं। पर लोग क्या करें जब ज़िंदगी नहीं मिलती मौत को गले लगाना ही पड़ता है। नोट बंदी में जो मरे उनके नाम पता होंगे कुछ लोगों को , ख़ुदकुशी करने वालों की भी पुलिस लिखती है एफ आई आर , मगर ऐसे लोग मरे कत्ल हुए या मरने को विवश कोई नहीं बता सकता। होनी प्रबल है कहकर सब बरी हो जायेंगे , किसी को कोई अपराधबोध तक नहीं होगा , जिन्होंने इक छोटी सी गलती सरकारी दफ्तर में खाट पे लेटने की को शराब में धुत होने का झूठा इल्ज़ाम लगा कर नौकरी से निकलवाया , अथवा जिस विभाग ने तीस साल तक न्याय होने नहीं दिया , कोई भी खुद को मानवता का दोषी नहीं मानेगा। शायद ऐसा पहली बार आपने भी देखा सुना होगा। मैं दो ऐसे लोगों को जानता हूं जिनको कभी वास्तविक दोष के कारण हटाया गया सरकारी नौकरी से और बाद में बहाल कर दिया गया।
        चालीस साल पुरानी बात है , इक पी डब्लयू डी के जेई को विभाग का सामान का गबन करने पर हटा दिया गया। दो साल तक घर बैठे आधा वेतन लेते रहे , दो साल बाद उनके इक मित्र विभाग में में एस डी ओ के पद पर उसी ऑफिस में आये तो उनको खुद पत्र भेजकर बहाल होने की जानकारी दी , उनसे कहा गया कि आप तीस हज़ार विभाग को राशि का भुगतान करें जिस का सामान गायब मिला था। कमाल की बात ये हुई थी कि उन्होंने तीस हज़ार भरने को दोबारा नौकरी में जाते ही तारकोल बेच उस पैसे का प्रबंध किया था। ऐसी इक और घटना भी है। इक डॉक्टर जिस जगह नियुक्त था नौकरी करना नहीं चाहता था अपने घर से दूर , बिना त्यागपत्र दिये चला आया और निलंबित कर दिया गया। उसने अपने शहर अपनी निजि प्रैक्टिस कर ली। बीस साल तक चलता रहा इसी तरह , फिर इक जान पहचान के नेता के मंत्री बनते उसको केवल नौकरी पर वापस बहाल ही नहीं किया गया बल्कि पिछले सालों का सारा वेतन लाखों रूपये भी मिल गये।
        जिस देश  में दोषी बच जाते हों , और निर्दोष सज़ा भोगते भोगते दुनिया से अलविदा हो जाते हों , उसकी व्यवस्था को क्या कहा जा सकता है। मुझे  इक पंजाबी गीत याद आ रहा है।
                          सच्चे फांसी चढ़दे वेखे , झूठा मौज मनाए ,
                        लोकी कहन्दे रब दी माया , मैं कहन्दा अन्याय।
                        की मैं झूठ बोल्या , की मैं कुफ्र तोल्या , कोइना भई कोईना।  

Thursday, 9 February 2017

कलयुग का अच्छा नामकरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

सरकार को कलयुग नाम काले धन की तरह लगता है इसलिये गुप्त ढंग से प्रभु से सीधी मन की बात करने का तरीका खोज ही लिया गया। अब क्योंकि प्रभु को संदेश ही यही भेजा गया था कि सरकार केवल भारत देश ही नहीं पूरे विश्व में स्वच्छता अभियान से लेकर अपनी हर योजना को पहुंचाना चाहती है ताकि सब के दुःख-दर्द खत्म हो सकें तो प्रभु इनकार नहीं कर सके। उत्सुक थे भारत की सरकार की कौन सी ऐसी योजना है जो वो कर सकती है जो खुद प्रभु नहीं कर पाये अभी तक उसको जानने समझने को। सरकार इक प्रस्ताव लिखित में लाई थी जिस में अनुरोध किया गया था कलयुग का नाम बदलने को , क्योंकि घोटाले शब्द की तरह कलयुग भी बेहद बदनाम हो चुका है और सरकारी दल अगला चुनाव इसी को लेकर लड़ना चाहता है कि हमने कलयुग का अंत कर सतयुग ला दिया है। प्रस्ताव को समझ प्रभु ने कहा आपका विचार तो शुभ है और सतयुग का आगमन हो भी सकता है , मगर उस में कुछ भी छुपा नहीं होगा। आप कुछ करते कुछ कहते और सोचते कुछ और हैं तो आपको कठिनाईयां झेलनी पड़ेंगी। सब जनता की आमदनी ही नहीं खुद अपने चंदे की पाई पाई का हिसाब साफ रखना ही होगा , खासकर झूठी शपथ , झूठे वादों  की जो परंपरा आपकी रही है हर जगह उसी से बहुत भयानक परिणाम सामने आएंगे और आपकी मुश्किलें बढ़ाएंगे। झूठी शपथ लेते ही प्राण पखेरू उड़ जाएंगे , वादा नहीं निभाया तो आप जी भी नहीं सकेंगे और आपको मौत भी नसीब नहीं होगी। वास्तव में सतयुग लाने की खातिर आप जितने भी कलयुगी प्रवृति के लोग हैं उनका विनाश प्रलय द्वारा करना होगा। सब से महत्वपूर्ण ये है कि सतयुग में आपका ही शासन हो ये असंभव होगा। अब बतायें आपको वो सतयुग चाहिए जिस में कोई दूसरा शासक हो आपकी जगह।
                   ऐसा है तो ये रहने दो मगर कोई दूसरा विकल्प हो तो बतायें , हमें निराश वापस नहीं भेजें। जिस में कलयुग का अंत तो हो मगर शासन मेरा इस ही नहीं अगले कार्यकाल भी चलता रहे। तब आपको मेरे त्रेता युग के अवतार श्री राम जी से जाकर विनती करनी चाहिए , शायद वो फिर दोबारा अवतार लेने को राज़ी हो जायें तब त्रेता युग लाया जा सकता है। जैसे ही श्री राम जी को जानकारी मिली कि ये लोग उसी दल से संबंधित हैं जो राम मंदिर बनाने की बात किया करता था तो उनहोंने सरकार से मुलाकात करने तक से मना ही कर दिया। कहा मुझे ऐसे भक्तों से डर लगता है जिनके लिये मैं इक मोहरा हूं राजनीति का। जब श्री राम जी नहीं मिले तो श्री कृष्ण जी याद आये , किसी तरह उनसे मिलने का रास्ता निकाल ही लिया। चलो सतयुग त्रेता युग न सही द्वापर युग भी हो तो क्या बुरा है। श्री कृष्ण थोड़ा ध्यानमग्न होकर सोचने समझने लगे और जान गये इनका अभिप्राय क्या है , सतयुग नहीं , त्रेता युग भी नहीं तो द्वापर ही सही। क्या क्या समझौते करते हैं बिना विचारे , भला इनसे क्या निभेगी। श्री कृष्ण बोले मैं तो जब जब धरती पर अधर्म बढ़ता है आता ही हूं सब जानते हैं , मगर है कोई अर्जुन भी तो हो जिसका सारथी मुझे बनना है। अर्जुन दिखाई नहीं देता मगर कंस गली गली मिलते हैं और आपकी राजनीति तो दुर्योधनों से भरी पड़ी है। कितनी सभाओं में उन्हीं को गदा धनुष और तलवार तक भेंट की जाती रही है।  एक भी युद्धिठर भी नहीं कोई। किसको शासक बनाने को धर्मयुद्ध किया जायेगा , मुझे समझाओ तो। किस को मेरे ज्ञान की ज़रूरत है , आप सभी तो खुद को महाज्ञानी मानते ही हो। जिस तरह आपने हर अवतार को देवी देवता को हर धार्मिक ग्रन्थ को अपने मकसद को इस्तेमाल किया , अपनी सुविधा और मर्ज़ी से परिभाषित कर अर्थ का अनर्थ किया बार बार उस जानकर कोई अवतार कोई देवी देवता क्यों जाना चाहेगा धरती पर धर्म किसको कहते हैं ये समझाने। आप को क्या मालूम है जिन जगहों पर आप उपासना या दर्शन करने जाते हैं उन में कोई देवी देवता या अवतार रहता ही नहीं है। कोई दूसरे ही लोग हैं जो उनके नाम पर कारोबार करते हैं झूठा दावा और प्रचार कर के कि वो किस का मंदिर या कोई धर्मस्थल किसी भी धर्म का है। मुझे छलिया कहकर बुलाया जाता है मगर मैंने अपने स्वार्थ के लिए छल किया नहीं कभी किसी के साथ।
                         श्री राम जी और श्री कृष्ण जी से निराश होकर फिर सरकार प्रभु की शरण में आये तो प्रभु बोले अब मेरे बस में कुछ नहीं है जब कोई देवी देवता कोई अवतार तुमसे सहमत नहीं है। तब सरकार ने अपनी फाइल से इक नया प्रस्ताव सामने रख दिया , जो पहले से तैयार कर लाये थे अपनी आदतानुसार। प्रभु आप कलयुग को कोई और नाम दे दो अच्छा सा। प्रभु बोले ये है तो अजीब बात ही जैसे तुम राजनेता लोग सत्ता पाते ही पुरानी सरकार की योजना को अपनी पसंद का नया नाम दे देते हो , फिर भी इतना हठ बार बार नये नामकरण का करते हो तो जाकर घोषणा कर दो कि आगे से कलयुग को हठयुग कहकर बुलाया जायेगा। यही नाम उचित है आपको देखकर प्रतीत होता है , लेकिन ये समझ लो कि बाल हठ , स्त्री हठ , में कोई समस्या नहीं है पर राजहठ का परिणाम कभी कभी बहुत बुरा हुआ करता है। तुम अगर अपना हठ त्याग सको तो अच्छा होगा , अन्यथा किसी नये अवतार का धरती पर आना तुम्हारे लिये भी शुभ तो कदापि नहीं होगा।

Wednesday, 8 February 2017

अब अच्छे दिन आये हैं ( हास्य-व्यंग्य कविता ) 2 1 भाग तीन , डॉ लोक सेतिया

सुन लो  बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं ,
तिगनी का नाच नचाने को हमने , लंगड़े सभी बनाये हैं ,
अब सब का इक जैसा होगा , काले भी गोरे बन जायेंगे ,
अपने रंग में रंगना सब को , अपनी फेसक्रीम ले आये हैं।
मुर्दों की अब बनेगी बस्ती , ऐसी योजना बनाई है ,
हर घर लाशों हैं मिलती , भाई का कातिल खुद भाई है ,
अपने दल की टिकेट देकर , जितने अपराधी खड़े किये हैं ,
माननीय बन शरीफ कहलायें , इंकलाब क्या लाये हैं।
सुन लो बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं।
सब इश्तिहार हमारे देखो तुम , झूठे हैं या सच्चे हैं ,
हम सब छप्पन इंच के हैं अब , बाकी तो अभी बच्चे हैं ,
मत देखो जो कुछ भी बुरा है , तुम गांधी जी के बंदर हो ,
जो सत्ता कहती सच वही है , सच की परिभाषा बनाये हैं !
सुन लो बहरो , देखो सारे अंधो , हम अच्छे दिन लाये हैं।

सत्ता के मद में हैं जनाब ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

शायद इसकी कल्पना किसी को नहीं थी जिस तरह से सत्ता अपने मद में चूर हर किसी को अपमानित कर रही है। बेशक जिन से सत्ता छीनी है जनता ने और आपको सत्तासीन किया है उन्होंने बहुत गलत किया था , जिस की राजनीतिक सज़ा उनको चुनाव में हार के रूप में मिली है। पर आप शायद भूल गये उनके अपकर्मों की सज़ा देने को ही आपको जिताया देश की जनता ने आप पर भरोसा कर के कि आप जनता की बदहाली को दूर करेंगे। पिछली सरकार के घोटालों की जांच और कानूनी सज़ा दिलवाना आपका काम है , मगर उसी तरह जैसे निष्पक्ष न्याय किया जाता है। मगर जिस तरह आप संसद में विपक्ष को निम्न स्तर की भाषा से अपमानित करने का कार्य कर रहे  हैं उस से खुद आपके भीतर का डर दिखाई देता है। कैसी विडंबना की बात है आप ऐसा करते हुए इतिहास और नीति की बात कर रहे हैं जब की खुद उसी का पालन नहीं कर रहे हैं। सुना तो आपने भी होगा जिस पेड़ पर फल लगते हैं वो झुकता है। किसी को अपमानित करना भले वो आपका विरोधी भी हो आपका गौरव नहीं बढ़ाता है। जब आपको संसद में सवालों के जवाब देने थे तब आपने संसदीय मर्यादा की चिंता छोड़ अपनी मर्ज़ी से जनसभा में अपनी बात रखी ताकि आप पर सच या झूठ कहने  के लिये किसी नियम में संसद में कोई करवाई  नहीं हो सके। आपने भाषणों  में जिसे चाहा काले धन का समर्थक घोषित कर दिया और ये साबित करना चाहा केवल आप और आपका दल ही सच्चा देशभगत व ईमानदार है। अदालत आपकी वकील आप न्यायधीश भी आप , ये कैसा लोकतंत्र है। आपने देश को जो वादे किये थे वो अभी तलक सच हुए लगते तो नहीं। आपने कहा इतिहास को पढ़ते रहना चाहिए मगर शायद आप खुद भूल गये देश का पुराना नहीं आज़ादी के बाद का इतिहास। जिसे बुरी तरह हराया जनता ने लोकतंत्र की रक्षा की खातिर , जब देखा नये शासक सत्ता का दुरूपयोग बदले की भावना से करने लगे तब उनको भी हटाकर फिर  से उसी को चुन लिया , पांच साल भी नहीं रही वो सरकार। आज आपको अगर खुद अपने कामों पर यकीन होता कि आपने सत्ता पाकर अच्छे काम किये हैं जिन से जनता खुश है तो आप अपने काम पर वोट मांगते , जब कि आज भी आप दूसरे लोगों की गलतियों की ही बात करते हैं भाषण में। क्यों नहीं कह सकते देखो मेरी सरकार ने वास्तव  में अच्छे दिन ला दिये हैं। क्योंकि आपकी घोषित की सभी योजनाएं उसी तरह भ्र्ष्टाचार और लालफीताशाही से असफल की जा चुकी हैं। आप हर बार रावण बताकर किसी को बुरा साबित कर भी लें तब भी आप राम हैं ये साबित नहीं हो सकता। कब तक आपको केवल इसी लिये सत्ता मिलती रह सकती है कि कोई दूसरा बुरा है। आप खुद कब अच्छे बनकर दिखाओगे।
                                इक कहानी है , इक बुरा आदमी शराबी जुआरी और धूम्रपान करने वाला होता है , दूसरा जो ये सब नहीं करता और खुद को शरीफ समझता है , अन्यायी और अत्याचारी साबित होता है , जब कि पहला अत्याचार को मिटाने वाला बन नायक कहलाता है। पहले की बुराईयां सिर्फ खुद उसी को नुकसान पहुंचा रहीं थीं जबकि दूसरे की सारे समाज को।

Tuesday, 7 February 2017

सत्ताधारी और विपक्षी दोनों समधी-समधी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था , ये पुरानी कहावत कितनी सच है क्या पता। मगर दो दिन  से देश की संसद में लगता है शुद्ध मनोरंजन की बातें की जा रही हैं। होता है जब हमारे पास करने को कुछ नहीं होता तब हम गप शप करते हैं टीवी देखते हैं या पूरा दिन फेसबुक व्हाट्सऐप पर बेकार की बातों को ज़रूरी मान कर समय बिताते हैं। इक अजीब बात है समय नहीं है का बहाना बनाते हैं अक्सर जब कि समय सभी के लिए एक समान है चौबीस घंटे। समय तब नहीं बचता जब प्राण जाते हैं छूट , राम नाम  की लूट है लूट सके तो लूट , सुबह होते ही मंदिर से भजन कीर्तन सुनाई देता है। उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है , जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है। तो संसद में बहस के नाम पर जनता की बदहाली की बातें  नहीं आपसी छेड़-छाड़ , ताने व्यंग्य , हास-परिहास चल रहा था। ठहाके लगा रहे थे शायद जनता की समझ पर हंस रहे थे किन नेताओं को मसीहा समझ उनकी जय जयकार करती है। किसे फ़िक्र है जनता की , जो देश में होता है होने दो , पहरेदारों को सोने दो , जनता रोती है रोने दो। तब होगा बचाव का काम शुरू घर बाढ़  को और डुबोने दो। आज समझ आया पक्ष और प्रतिपक्ष कोई दुश्मन या विरोधी नहीं हैं , इनका बहुत मधुर रिश्ता है समधी-समधी वाला हास उपहास छेड़-छाड़ वाला। बुरी  नहीं लगती आपसी बात , मेरे ताया जी कहते थे समधी को तो कोमल पुष्प की तरह रखते हैं। बड़ा ही नाज़ुक रिश्ता होता है , मगर आजकल दहेज और दिखावे की चाहत ने इस नाते में खटास ही नहीं कटुता भी ला दी है। सत्ता पक्ष विपक्ष भी सत्ता के मोह  में अंधे होकर संसद और लोकतंत्र की गरिमा को भूल गये हैं।
                        हर दल देश की सत्ता  को अपनी बहु समझता है , जिसे गरीब जनता ने उनको सौंप दिया है। किसी  को भी वो अपनी बेटी लगती ही नहीं। बहु के आंसू झूठे लगते हैं , उसकी तकलीफ बहाना , पता  नहीं नेताओं की अपनी बेटियां होती भी हैं कि नहीं। समधी लोग मिलते रहते हैं हर अवसर पर , मगर खुद को बेटी का पिता कोई नेता नहीं मानता , हर नेता बहु का ससुर ही समझता खुद को। अपने समधी की कमियां निकालना उसका मज़ाक बनाना असभ्यता नहीं समझा जाता , ये प्यार की लड़ाई है। इस सत्ताधारी और विपक्ष वाले नाते में दोनों तरफ से पिसती बेचारी जनता की बेटी है जिसे हर कोई बहु मानता सेवा करवाने को। बहु को घर की मालकिन कोई नहीं समझता। संसद विधानसभाएं जैसे सिनेमा हाल या पीवीआर हैं जहां राजनेता अभिनय करते हैं जनता को दिखाने को कभी झूठ मूठ बेटी के पिता बनकर तो कभी सच में बहु के ससुर का किरदार निभाते हुए। समय आ गया है अब आपको इक और कर भी चुकाना चाहिए , मनोरंज कर। बाकी जो आप देते रहते हैं सभी दल के नेताओं को वो तो आपको अपनी बेटी की ख़ुशी नहीं सुरक्षा की खातिर देना लाज़मी है।

Monday, 6 February 2017

ग़ज़ल 1 1 4 ( आया नहीं दाग अब तक छुपाना ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आया नहीं दाग अब तक छुपाना ,
मैली है चादर हमें घर भी जाना !
हम ने किया जुर्म इक उम्र सारी ,
बस झूठ कहना नहीं सच बताना !
सुन लो सभी यार मुझको है कहना ,
की जो  खताएं उन्हें भूल जाना !
मुझ से बुरा और कोई नहीं है ,
मैं खुद बुरा हूं भला सब ज़माना !
दस्तूर मेरा यही तो  रहा है ,
जीती लड़ाई को खुद हार जाना !
तुमने निकाला हमें जब यहां से ,
फिर ठौर अपना न कोई ठिकाना !
"तनहा" जहां छोड़ जाये कभी जब ,
सबको सुनाना उसी का फसाना !

Sunday, 5 February 2017

पीछे जो रह गये हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

                                           हर कारवां से कोई ये कह रहा है " तनहा "
                                           पीछे जो रह गये हैं उन को था साथ लाना।
मुझे अपनी ग़ज़ल का ये आखिरी शेर याद आया आज , जब इक टीवी शो पर देखा कभी एक साथ एक प्रतियोगिता में शामिल दो कलाकार इक मंच पर थे मगर एक निर्णायक की कुर्सी पर और दूसरा सालों बाद इक प्रतियोगी बन कर। सवाल प्रतिभा का नहीं है , सवाल किस्मत का भी नहीं है। सवाल अवसर मिलने का है और सवाल ये भी है कि काबलियत की पहचान से अधिक महत्व सफलता हासिल करने का है। ऐसे ही इक और टीवी शो में भी आज देखा , कल तक गांव के घर घर में काम करने वाली महिला का बेटा जब टीवी पर गा रहा तो तमाम गांव के लोग उसके  फोटो और नाम लिखी तख्तियां लेकर बार बार उसका नाम पुकार कह रहे हैं तुम ने गांव का नाम रौशन किया है। कौन जनता है यही लोग कल तक उसी को खुद से कितना छोटा समझते रहे हैं। मान लो अब वो शो का विजेता भी बन जाये मगर बाज़ार में सफलता नहीं हासिल कर सके तब फिर इन्हीं लोगों की नज़रें पहले की तरह दिखाई देने लगेंगी। सब इतनी तेज़ी से दौड़ भाग रहे हैं कि कोई ध्यान ही  नहीं देता कब कोई हमसफ़र किस जगह कैसे पीछे छूट गया कारवां से बिछुड़ गया। कभी बहुत देर बाद जब हमारे पास सब कुछ होता है मगर वो साथी नहीं होता जो अपना अकेलापन मिटा सकता था , तब समझ आता है उतना पाया नहीं जितना खोया है। इसलिए आज इक बात कहना चाहता हूं , हम मित्रता दिवस की बात करते हैं और बहुत संवेदना प्रकट किया करते हैं लेकिन बिछुड़ जाने पर कोई खबर ही नहीं रखते उसी मित्र की।  काश हम देशवासी यही सबक भूले नहीं होते कि अकेले खुद नहीं आगे बढ़ना , सभी को संग लेकर चलना है आगे और भी आगे। और ये बात राजनेताओं के झूठे और खोखले नारे जैसी हर्गिज़ नहीं है।
 

Saturday, 4 February 2017

{ 600 वीं पोस्ट } नये कीर्तिमान की योजना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                           नये कीर्तिमान की योजना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
                          *****************************************
सौ साल जीने का कीर्तिमान बनाना किसी काम का नहीं होता अगर आप वास्तव में कभी जीने का लुत्फ़ ही नहीं उठा सके। ज़िंदगी का मज़ा सही या गलत तरीके पर चल कर नहीं लिया जा सकता , जिनको मज़ा लूटना वो लोग हर ढंग अपनाते हैं। बात राजनेताओं और अधिकारियों की अथवा बड़े बड़े पत्रकारों अभिनय करने वालों या उद्योगपतियों धन्नासेठों की नहीं है। अपराधी से लेकर मनमानी करने वाले वास्तव में इसी मानसिकता वाले लोग होते हैं जो खुद मज़ा लेने को सब से बड़ा काम समझते हैं। ये तो इक भूमिका थी आपको समझाने की कि कीर्तिमान किस को कहते हैं। अब उस योजना की बात जो इक नया ही नहीं नवीनतम कीर्तिमान स्थापित करेगी। फरवरी महीने में 2 8 -2 9 दिन अभी तक होते रहे हैं , इस बार 3 0 दिन का महीना जल्द ही घोषित किया जा सकता है। कब कौन कैसे मत पूछना अभी इसको गुप्त रखना है नोट बंदी की तरह। मगर योजना का मकसद क्या है उसे बताया जा सकता है , यूं भी ये योजना उसी योजना का विस्तार है। बताने की ज़रूरत नहीं है कि नोटबंदी से न काला धन समाप्त हुआ है न गरीबी ही मिट सकी है। ये पैसे वाले अमीर लोग बेहद धूर्त और काइयां तरह के चालाक अवसरवादी होते हैं , इनको सब तरीके आते हैं अपना काम निकालने के। सरकार समझ चुकी है इन से कुछ हासिल नहीं हो सकता , उनको नाराज़ भी नहीं किया जा सकता ये मज़बूरी भी सब जानते हैं।
                   मगर सरकार को आगामी चुनाव से पहले देश से गरीबी नाम का अभिशाप जो विश्व में सब से बड़े लोकतंत्र के माथे का कलंक है उसको दूर करना ही है। तरीका ढूंढ लिया गया है। आपने स्वेच्छा से सबसिडी छोड़ने की बात सुनी होगी , कुछ कुछ उसी तरह की योजना है। गरीबी का प्रमुख कारण जनसंख्या भी है , इस योजना से एक तीर से दो निशाने लगने की बात सच साबित हो जायेगी। सरकारी अथवा गैरसरकारी सर्वेक्षण से पता चला है कि करोड़ों लोग ज़िंदगी से ऊब चुके हैं और मरना चाहते हैं। उनकी समस्या है कि उनको लगता है ख़ुदकुशी करना अपराध भी है और ऐसा करने वाले को लोग कायर भी कहते हैं। सरकार पुलिस पशासन खुद बेशक लोगों का जीना दुश्वार करते रहें , जो ख़ुदकुशी करता है उसके जुर्म का दोषी कौन ये तलाश करती रहती है ताकि ख़ुदकुशी को विवश करने का इल्ज़ाम लगाया जा सके। जबकि हम विश्वास करते हैं जो तकदीर में लिखा वही होता है , जनता की तकदीर में अच्छे दिन विधाता ने अगर नहीं लिखे तो कोई सरकार कोई प्रधानमंत्री कोई राजनेता क्या कर सकता है। तकदीर का लिखा कोई नहीं मिटा सकता है। आप किसी को दोष मत दो मेहरबानी करके।  चलिए अब मुद्दे की बात की जाये , योजना क्या है आगे बताता हूं  , मगर पहले आप शपथ खाओ इस को राज़ रखोगे जब तक खुद सरकार घोषित नहीं कर देती कि ये अफवाह सच है। सच पर यकीन करें अफवाहों पर ध्यान नहीं दें।
                                तीस फरवरी को जीवन मुक्ति योजना शुरू की जानी प्रस्तावित है जिस में सब से पहले जनता को मौत का अधिकार दिया जायेगा और जो भी ज़िंदा नहीं रह सकता या नहीं रहना चाहता उसको जान देने ख़ुदकुशी करने का हक कानूनन मिल जायेगा। धनवान लोग या सनकी लोग कोई बड़ा समारोह या पार्टी भी आयोजित कर शान से मौत को गले लगा सकेंगे। मगर सरकार केवल गरीबों की सहायता हर तरह से इस काम में करेगी क्योंकि ऐसा करने से गरीबों की संख्या के साथ देश की आबादी की जनसंख्या भी कम होगी। जो गरीब भी ख़ुदकुशी करने की अर्ज़ी देगा उसको उसकी मर्ज़ी  की मौत देने का प्रबंध निशुल्क किया जायेगा और किसलिए मरना चाहते जैसा सवाल पूछकर परेशान नहीं किया जायेगा। ख़ुदकुशी के बाद उसको इक शहीद समझा जायेगा और उसके परिजनों को खूब मुआवज़ा दिया जायेगा जिस से उनकी गरीबी खत्म हो सके। ऐसा करने से बहुत लोग ख़ुदकुशी करने को आकर्षित होंगे और सरकार इसको बढ़ावा देना चाहती है। जो लोग नोटबंदी में मारे गये उनको भी इस योजना में शामिल कर सभी लाभ देगी सरकार। अच्छे शहर और खुले में शौच की तरह ही कोशिश की जायेगी गांव - गांव तक ये सुविधा पहुंचाने की। जीवन मुक्ति योजना में सुसाइड सेंटर खोलने में जो भी शामिल होंगे उनको अनुदान मिला करेगा , हर पुरानी योजना की तरह मगर इस में झूठे नाम गलत आंकड़े नहीं चलेंगे। हर मौत का पंचनामा किया जायेगा और ख़ुदकुशी के सबूत रखने होंगे , जो इस योजना में अनुचित करेगा उसकी सज़ा खुद उसी सेंटर में सूली पर टांग कर दी जाया करेगी। 
           सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि कुकरमुत्ते की तरह फ़ैल रहे हैं कोचिंग सेंटर। रिहायशी इलाकों  में खोलने  पर अदालती आदेशों की पालना विभाग नहीं करते जिस से महिलाओं बज़ुर्ग लोगों और निवासियों को परेशानी होती है। अभी भी सरकार हर दिन नये नाम से ऐसे लूट के सेंटर खुलवा  रही है। हर योजना ठेकेदार या बिचोलिये असफल करते रहे हैं , उनको शिक्षा स्वास्थ्य या रोज़गार  की जानकारी होती है या नहीं कोई नहीं देखता। मगर मुझे इस योजना का सलाहकार पूरी जांच के बाद बनाया गया है। ख़ुदकुशी को लेकर मेरा चिंतन और शोध मेरे पूरे लेखन में दिखाई देता है। कहानियों कविताओं और व्यंग्य में बहुत जगह ऐसा विवरण मिलता है। मेरी ग़ज़लों में अनगिनित शेर ही इस विषय पर नहीं अपितु इक ग़ज़ल तो लिखी ही इसी को लेकर गई है। बाकी शेर बाद में , पहले मेरी ये पूरी ग़ज़ल पढ़ें :-
ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ,
ज़िंदगी तुझसे डर गया कोई।
तेज़ झौंकों में रेत से घर सा ,
ग़म का मारा बिखर गया कोई।
न मिला कोई दर तो मज़बूरन ,
मौत के द्वार पर गया कोई।
खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर ,
फिर से खुद ही संवर गया कोई।
"ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है" ,
उस पे इल्ज़ाम धर गया कोई।
और गहराई शाम-ए-तनहाई ,
मुझ को तन्हा यूं कर गया कोई।
है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक" ,
जीते जी कब से मर गया कोई।
**************************
    बहुत बार पहले ऐसा भी हुआ है , किसी  की मौत पर लोग जमा हुए मोमबत्तियां जलाईं , आंदोलन किया , नारे भी लगाये। सरकार ने तब बहुत बातें कही कोई फंड भी बनाया , मगर उस फंड से किया कुछ भी नहीं गया। लेकिन इस योजना को कोई भुला नहीं सकेगा , इतिहास में लिखा जायेगा कि जब सालों तक देश  की सरकारें गरीबी नहीं मिटा सकीं तब गरीबों को मरने का हक दिया गया। और तमाम अनाम गरीबों ने देश से गरीबी का कलंक धोने को अपनी जानें कुर्बान कर दीं। ये उन्हीं गरीबों  की शहादत है की देश खुशहाल हुआ।
अंत में उन्हीं गरीबों  आत्माओं के नाम मेरी कुछ ग़ज़लों के  कुछ शेर पेश हैं :-
                           ( निर्भया के नाम चार शेर सब से पहले )
बहाने अश्क जब बिसमिल आए , सभी कहने लगे पागल आए।
हुई इंसाफ  की बातें फिर भी ,  ले के खाली सभी आंचल आए।
किसी  की मौत का पसरा मातम , वहां सब लोग खुद चल चल आए।
नहीं सरकार के आंसू निकले , निभाने रस्म बस दो पल आए।
************************************************
                ख़ुदकुशी पर कुछ और शेर :-
मौत तो दरअसल एक सौगात है , पर सभी ने इसे हादिसा कह दिया।
सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना , लाशें खरीद कर जो शमशान बेचते हैं।
अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं , अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं।
ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी , यूं लगा है किसी ने पुकारा हमें।
हैं  कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर , ज़हर भी जो पिलाते हैं कहकर दवा।
हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां , इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा।
           अंत में देश के रहनुमाओं से इक बात :-
                              सब को जीने के  कुछ अधिकार दे दो ,
                              मरने  की फिर सज़ा सौ बार दे दो।
माना ये दवा बेहद कड़वी है , मगर इक बार पीनी होगी और तमाम समस्याओं से निजात मिल जाएगी।
अभी तलक  की सभी सरकारों  की नाकामियों और उनके अपकर्मों पर इस से पर्दा पड़ जाएगा।
सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां कहलाएगा।  
*******************************************************************
 

Friday, 3 February 2017

सब दुखों की एक दवा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    बिजनेस मैनेजमेंट की क्लास में सभी विद्यार्थी अपना अपना शोध प्रस्तुत कर रहे हैं।  प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद  कौन क्या क्या कारोबार करेगा ये पता चल रहा है। इक होनहार छात्र बता रहा है आजकल सफल होने के लिये अपने उत्पाद के शुद्ध स्वदेशी सस्ता और असली साबित करना या ऐसा घोषित करना प्रचार द्वारा बेहद ज़रूरी है। आज हर उत्पाद पर किसी न किसी का दावा है उत्तम क्वालिटी का सस्ते दाम पर और प्रभावी होने का। मगर अभी भी ऐसी इक वस्तु है जो असली है और  प्रभावी भी ये कोई भी दावा कर बेचता नहीं है। ज़हर किसी का भी असली मिलता नहीं है उन्हें जो जीना नहीं चाहते ख़ुदकुशी करने को। ठीक होने के लिए दवा नकली खाकर लोग मर जाते हैं लेकिन नकली ज़हर से मौत भी मिलती नहीं है। आप सोचोगे सरकार भला ज़हर बनाने और बेचने देगी , जबकि सभी जानते हैं ऐसा करती है सरकार टैक्स की खातिर। आप ज़हर बनाते किसी और काम की खातिर मगर बिकता किसी और काम आने को है। आप विष का प्रचार किसी भगवान या सुकरात जैसे सच बोलने वाले का नाम जोड़ कर भी कर सकते हैं। यकीन रखें जिसका आजकल बहुत अधिक शोर है हर चीज़ असली बनाने बेचने का उसको मैं अपना ये नया विचार बताकर भी कमाई कर सकता हूं। क्योंकि उसको आता है ऐसा कारोबार कर धनपति बनना , मेरा आदर्श वही ही है। इस  देश में करोड़ों लोग हैं जो जीवन से तंग आ चुके हैं मगर ख़ुदकुशी करने को शतप्रतिशत गरंटी वाला विष मिलता नहीं है। सब दुखों की एक दवा है क्यों न आज़मा ले , स्लोगन भी मुझे उपयुक्त लगता है।  

Wednesday, 1 February 2017

बजट के पिटारे में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

इंतज़ार की घड़ियां लंबी बहुत थीं , पर जनता ने काट ही लीं। पिया ने वादा किया था इस बार गरीब जनता की बारी है। सब की गरीबी दूर की जाएगी। तीन लाख आमदनी वाले गरीबों से कोई आयकर नहीं लिया जायेगा। पांच लाख की आय वालों को पांच प्रतिशत की छूट दे दी गई है। किस किस को कितनी आमदनी वाले को कितना फायदा हिसाब बताया है। शायद फिर भूल गये उस बदनसीब को जिस की आमदनी है ही नहीं , जगह नहीं तो घर बनाने को कर्ज़ मिलने का क्या करें। जिनकी ज़मीन है उनको कृषि करने को सहयोग की बात की , मगर जो खेतिहर दिहाड़ीदार मज़दूर वो किधर जायें। उनको कैसे इतना मिलेगा कि ज़िंदा रह सकें , मनरेगा की बात लगता भूल गये किनको मिलता काम , ठेकेदार इंसान से नहीं मशीनों से तालाब खुदवाते कम पैसे से। कागज़ पर अंगूठा ही तो लगा दिखवाना है , फोटो भी बना ली जाती हैं। याद आया अब मज़दूरी बैंक के खाते में सीधे मिलेगी , मगर बैंक में खाता कैसे खुलेगा। पैन कार्ड कहां से बनवायें , अब ज़रूरी है। चलो किसी तरह सौ दिन मज़दूरी मिल ही गई तो क्या सब ठीक हो जायेगा।  आज़ादी का मतलब क्या दो वक़्त पेट भरना है , बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य उसका क्या होगा। वो तो आपने निजि कारोबारियों को पूरी छूट दे रखी है लूट की। कोई नियम कायदा ही बना देते डॉक्टर या हॉस्पिटल अथवा प्राइवेट स्कूल कितनी फीस ले सकते। ये दोनों पेशे सेवा का दम भरते हैं उनको लूट की इजाज़त नहीं दी जा सकती। सब बाकी बातों को भूल कर ज़रा इतना तो देखते जो पिछले साल बताया कितना वास्तव में किया है।
                       सब की नहीं इक योजना की मिसाल सामने है।  कहते हैं  पका है  देखने को इक चावल निकाल कर देख लेते हैं सब का पता चल जाता है। पिछले साल आठ लाख तालाब बनाये गये उनकी बात है। काफी तो अधूरे हैं जिनको पूरा बताया गया है। बहुत कुछ लोगों ने अनुदान लेकर अपने खेत में बनाये जो उनकी निजि ज़रूरत को काम आयेंगे।  मगर असली मकसद किसी से पूरा नहीं होगा , जल को संचित करने का ताकि भूमि के नीचे के जल का स्तर ऊंचा हो सके। सब तालाब ज़मीन पर ऊंचे बने हैं जिनमें पानी बाहर से जमा हो ही नहीं सकता , उनको भरने को नीचे से ही पानी निकाल भरा गया है। जिस से ज़मीन के नीचे का जल और नीचे जायेगा। यही हर सरकारी योजना का सच है। राजधानी के दफ्तर में बैठकर यही किया जाता रहा है हमेशा से।
                       आखिर में दो शेर :-
             हक नहीं खैरात देने लगे ,
             इक नई सौगात देने लगे !
             रौशनी का नाम देकर हमें
             फिर अंधेरी रात देने लगे।
             (  डॉ लोक  सेतिया )

Monday, 30 January 2017

कलयुग के अवतारों की बात ( तीरे-नज़र ) डॉ लोक सेतिया

                                कलयुगी अवतारों की बात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
                              ******************************************  
 आत्मा का मिलन प्रमात्मा से हुआ तो भगवन ने पूछा बताओ क्या क्या पाया जीवन भर में। आत्मा बोली भगवान मुझे नहीं पता क्या पाना था और कैसे पाना था , मुझे तमाम उम्र यही सवाल परेशान करता रहा कि मुझे जीवन मिला किसलिए है। सच बताती हूं मैं कभी जीवन को जी ही नहीं सकी , इसी में उलझी रही क्या इसी को जीवन कहते हैं। शिक्षक मिले धर्म-उपदेशक भी मिले और खुद भी बहुत तरह से प्रयास भी किया ज्ञान प्राप्त करने का मगर नहीं समझ पाई मैं क्यों धरती पर आई। भगवान बोले लगता तुम भूल ही गई तुझे भेजा था धरती पर क्या क्या हुआ क्या होता आया बताने को। तुमको लिखना सिखाया था ताकि जो जो देखो समझो लिखती रहो और याद रखो मुझे आकर बताओ जिन जिन को मैंने जिस जिस प्रयोजन से भेजा वो सब अपना काम ठीक से कर रहे भी अथवा नहीं। मैंने कहा भगवन आपको तो सब मालूम है सभी यही समझते हैं , आप जानते ही हैं दुनिया की हालत कितनी खराब है। लोग बिमार हैं भूखे हैं बदहाल हैं और बेबस और लाचार हैं। सब उम्मीद करते हैं कलयुग में भी आप कोई अवतार लोगे और सभी के दुःख-दर्द मिटाओगे। भगवन ने पूछा क्या तुम्हें कोई अवतार नहीं दिखाई दिया , मैंने तो बहुत भगवा धारी साधु संत सन्यासी और कितने ही जनता के सेवक भेजे हैं जनता का कल्याण करने को। अभी भी दो अवतार हैं भेजे हुए जिनको जनता की गरीबी भूख और बदहाली को , लूट खसूट को दूर करना है और लोगों को स्वस्थ रहने के उपाय समझाने हैं। भगवन ने उन दोनों के चित्र उसे दिखलाये , आत्मा पहचान भी गई मगर हैरान और दुखी भी थी। सोचने लगी भगवान को क्या बताये उसके भेजे कलयुगी अवतार क्या कर रहे हैं। मगर भगवन आत्मा की दुविधा समझ गये और बोले तुम मुझे बताओ ये क्या क्या कर रहे हैं। अब तक तो लोग सभी रोगों से मुक्त हो चुके होंगे और जनता की गरीबी भूख और बदहाली खत्म हो चुकी होगी। ऐसा होने के शोर की बात मुझे हर दिन आत्माएं आकर बताती रही हैं। तुम बताओ अच्छी तरह से कितना कुछ बदला है इन कलयुगी अवतारों ने अब तलक।
           वो आत्मा बोली जिस भगवा भेसधारी बाबा को सभी को निरोग रहने के उपाय समझाने थे , उसने तो लोगों को योग सिखाने का कारोबार कर खूब नाम और धन कमाया है मगर अभी तक रोग या रोगी तो कम हुए लगते नहीं धरती पर। अब तो उसकी इतनी शोहरत है कि उसका नाम बिकता है , हर शहर में उसके नाम से लोगों का उपचार किया जाता है , जाने किस किस को नियुक्त किया हुआ है उसने। बस उसी की बनाई दवायें बेचते हैं गली गली अप्रशिक्षित लोग नीम हकीमों की तरह। और ऐसा कर वो बाबा जी आज दुनिया के गिने चुने अमीरों में शामिल हो चुका है। आजकल तो उसका घी तेल आटा शहद फेस क्रीम सौन्दर्य प्रसाधन से हर चीज़ बिकती है।  ऐसा भी प्रचार है कि जैसे कभी राम जी का नाम लिखने से पत्थर तैर गये थे समुद्र में सेतु बनाने को ठीक उसी तरह उसकी कंपनी का नाम लेबल लगने से हर वस्तु शत प्रतिशत शुद्ध हो जाती है। दो घूंट पीने और योग करने से बताता है लोग रोगों के कुचक्र से मुक्त हो जाएंगे , फिर भी कितनी दवायें भी बेचता है। भगवन आपका ये अवतार तो आज का सफलतम व्योपारी है। दावा है शुद्ध और सस्ता बेचने का फिर भी खूब कमाई होती है , ऐसी अनहोनी पहले सुनी न देखी। लगता कोई घर फूंकने की बात कर भी ऐसी कमाई कर सकता है , कुछ तो राज़ की बात अवश्य है।
           आत्मा ने कहा जिस दूसरे अवतार की बात है उसने जनता को अच्छे दिन का वादा किया तो था , मगर कब आएंगे वो अच्छे दिन ये शायद बताना भूल गया। अभी तलक को अच्छे दिनों की परछाई भी नज़र नहीं आई , मालूम नहीं किसे अच्छे दिन कब नसीब होंगे। कहने को उसने हर दिन इक नया काम करने की घोषणा की है योजनाओं का अंबार खड़ा कर दिया मगर उनसे हुआ कुछ भी नहीं लगता। बस हर नेता की तरह कागजों पर बहुत विकास वास्तव में नहीं कुछ भी। स्वच्छता अभियान भी है इश्तिहारों में और गंदगी भी पहले की तरह ही नहीं शायद और भी अधिक , न गंगा साफ़ हुई , न मेक इन इंडिया , स्टार्ट अप इंडिया से घर घर शौचालय और सुंदर शहर कहीं सच में दिखते हैं। कितने लोग मर गये इक योजना में मगर न काला धन खत्म हुआ न ही नेताओं अधिकारियों की लूट ही बंद हुई है। जिनको सपने दिखलाये थे गरीबी मिटाने के वो ख़ुदकुशी तक करने को विवश हैं , सर्वोच्च अदालत भी परेशान है। राजनीति में अपराधी आज भी खुद उन्हीं की सभा में उनके साथ मंच पर बैठते हैं और उन्हीं के भाषण में महानता की उपाधि पाते हैं। शासक बनते ही अपनी सत्ता का विस्तार सभी राजनेता हमेशा ही चाहते रहे हैं , ये भी उन्हीं की राह पर हैं , अलग नहीं हैं। उनको जनता की बदहाली मात्र इक उपहास लगने लगती है शासक बनते ही। आये थे हरि-भजन को ओटन लगे कपास की तरह अच्छे दिन की बात कर आये थे और ला रहे और भी खराब दिन। व्यवस्था जैसी थी वैसी चल रही है , नहीं बदला कुछ भी केवल नाम ही बदले हैं। आत्मा सोच कर आई थी मरने के बाद स्वर्ग नहीं तो नर्क ही मिलेगा , मगर यहां तो कुछ भी दिखता , भगवन से पूछा मुझे किधर भेजोगे बता तो दो। भगवान बोले मैंने तो दुनिया को स्वर्ग ही बनाना चाहा है हमेशा और ऐसा कैसे करना इंसानों को राह दिखलाने और समझाने को अवतार भी भेजता रहा , मगर लगता कलयुग में उनकी मति मारी गई जो अपना दायित्व भुला बैठे हैं। परमात्मा अंतर्ध्यान हो गये हैं , आत्मा खड़ी है अकेली अचरज में भगवन की बातें सोचती।

Thursday, 26 January 2017

कोई नन्हा फ़रिश्ता आज भी आ जाता ( बात फिल्मों-संगीत-साहित्य-कविता-कहानियों की ) डॉ लोक सेतिया

                     मैं , मेरी फ़िल्में , मेरे गीत , मेरी शिक्षा ( लोक सेतिया )
मुझ में अगर थोड़ा सा कोई अच्छा इंसान है , इंसानियत की समझ है , दूसरों के दर्द को समझने की संवेदना है , तो वो किसी शिक्षक किसी धर्म प्रवचक या किसी गुरु का दिया ज्ञान नहीं है। ये सब मुझे मिला है इक आदत से जो किसी ज़माने में अच्छी आदत नहीं समझी जाती थी। बचपन से संगीत का चाव और मेरी आवाज़ भले बहुत सुरीली नहीं हो तब भी हर दम गाने-गुनगुनाने का शौक। कॉलेज गया तो फिल्मों से जैसे इश्क़ ही हो गया। सोचता हूं अगर आज के इस युग में मैं पला बढ़ा होता तो कैसा बनता , कठोर हृदय मतलबी , चालबाज़ ,
खलनायक , या कोई ज़ालिम जो बदले की आग में कातिल बन गया। भगवान का शुक्र है मैं उस युग में पला और बढ़ा जिस में माफ करना और नफरत को प्यार से जीतना सिखाया जाता था। आज सुनते हैं किसी फिल्म ने कितने सौ करोड़ का कारोबार किया , मगर किस कीमत पर , इंसान को हैवान या शैतान बनाने की कीमत पर। आज मैं खुद लिखता हूं ग़ज़ल कविता कहानी , मगर मुझे अभी तक लगता नहीं कुछ भी वास्तविक सार्थक लेखन किया है मैंने। इतने साल कलम घिसाई ही की है , काश इक कविता इक ग़ज़ल इक कहानी ऐसी लिखता जो सच में संदेश देती मानवता का। थोड़ा प्रयास किया है , हिलती हुई दिवारें कहानी , औरत कविता , दोस्त बनाने चले हो ग़ज़ल , सत्ताशास्त्र जैसा व्यंग्य जैसी कुछ रचनाएं हैं जिनको मैं समझता हूं कुछ तो सोचने को विवश करती होंगी। मेरी पसंद की फिल्में कई हैं , सफर , ख़ामोशी , बहारें फिर भी आएंगी , नया दौर , नया ज़माना , सैकड़ों हैं। मगर इक फिल्म जिसकी मुझे लगता आज भी फिर से बनाने की या उसी को फिर से दिखाने की बेहद ज़रूरत है वो है " नन्हा फरिश्ता "।
                        हम सब अपने भीतर झांक कर देखें तो अपने अंदर इक डाकू इक ज़ालिम इंसान इक बेरहम लुटेरा मिल सकता है। इक छोटी सी बच्ची तीन डाका डालने आये डाकुओं को घर में अकेली मिलती है जिसे इक डाकू उठा साथ ले जाता है। और पूरी फिल्म झकझोर देती है भावनाओं को जब इक मासूम फरिश्ता उन खूंखार डाकुओं को अच्छे इंसान बना देता है। मुझे भी लगता है मैं आज भी बहुत बुरा हूं और चाहता हूं कोई उस जैसा नन्हा फरिश्ता मुझे बदल दे और मेरे भीतर से सारी बुराई को मिटा मुझे अच्छा आदमी बना दे। काश कोई फिल्म निर्माता दोबारा ऐसी कहानियों पर फिल्म बनाये बेशक उस फिल्म से करोड़ों रूपये नहीं मिलें पर करोड़ों दिलों को बदल दे जो।
************************************************************************

Tuesday, 24 January 2017

इक गुनाह है गरीबों से मज़ाक है ( जश्न कैसा ) डॉ लोक सेतिया

मना लो जश्न कि वतन आज़ाद है , कौन करता गरीबों से मज़ाक है , झांकियां देखना ताकतवर हैं हम , मत बताना किसी को कि भूखे हैं हम। हर साल ये बेरहमी का नज़ारा होता है , किसको मालूम गरीबी में कैसे गुज़ारा होता है। आज तक देश के रहनुमाओं से नहीं सवाल किया , अब बताओ तो क्या क्या है कमाल किया। कितना धन किया बर्बादी के सामान पर , कर सकते जंग पानी में और आसमान पर। जंग लड़नी थी भूख से गरीबी से ,
नहीं गिला हमको आपकी अमीरी से। चलो आज पूछते हैं उसी से जिसने बताया था सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा , आज देख लेता तो मिटा देता नहीं लिखता दुबारा। सबको याद उसका यही गीत रहा , कोई नहीं सोचता उसी ने था ये भी कहा।
                    उट्ठो मिरी दुनिया के गरीबों को जगा दो ,
                      काखे-उमरा के दरो-दीवार हिला दो।                     ( काखे-उमरा = अमीरों के महल )

                  जिस खेत से दहकां को मयस्सर नहीं रोज़ी ,           ( दहकां = किसान )
                  उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो।          ( ख़ोशा-ए -गन्दुम = गेहूं की बाली )
आज तक किसी ने ये नज़्म आपको सुनाई , इसको शायर ने " फरमाने-ख़ुदा " शीर्षक दिया था। चलो आज उसी की ज़ुबानी सुनते हैं कुछ और भी जो कल भी सच था और आज भी सच है।
                 सुन तो ले मिरी फरियाद , ये भी इक़बाल जी का कलाम है , ज़रा दो शेर देखते हैं :-
                         असर करे न करे सुन तो ले मिरी फरियाद ,
                        नहीं है दादा का तालिब यह बन्दा -ए -आज़ाद।          ( वाह वाह चाहने वाला नहीं हूं मैं )
               
                       कसूरवार -ओ-गरीबउदयार हूं लेकिन ,
                     तिरा खराबा फ़रिश्ते न कर सके आबाद।
********************************************************************************
    कल जो नेता भाषण देंगे बड़ी बड़ी बातें कहेंगे देश की प्रगति की। हम कितने ताकतवर हैं , क्या क्या नहीं कर सकते अब। वही चुनाव में घोषणा कर रहे हैं मुफ्त में दाल रोटी से ज़रूरत का हर सामान तक। कैसा लोकतंत्र है कौन दाता है किसको भिखारी बना दिया है , लानत है ऐसी देश सेवा पर जो खुद ऐश आराम से राजा की तरह रहते और जनता को मालिक से गुलाम बना रहे और इसको भी उपकार समझते।  करोड़ों लोग भूख से और समस्याओं से मरते हों और आप हर दिन जश्न मनाते हैं इसको गुनाह ही समझना होगा। जाने कब इनके पापों का घड़ा फूटेगा।  क्या आप शामिल होंगे ऐसे आज़ादी के जश्न के आयोजन में , देश की बदहाली को अनदेखा कर के। सोचना ज़रूर।  

Monday, 23 January 2017

मोक्ष की चाह है सबको ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिये , ये हमारे वक़्त की सब से बड़ी पहचान है। दुष्यंत कुमार को तब भी पता था कुछ रस्ते आरक्षित हैं खास लोगों के लिये। मोदी जी से नासमझ लोग उम्मीद करते हैं कोई चमत्कार करेंगे , सब ठीक कर देंगे। परिवारवाद को खत्म करने , अपराधियों को राजनीति से निकाल बाहर करने की बातें क्या भाषण तक। अभी जिन राज्यों में चुनाव हैं उसकी असलियत क्या है ज़रा ध्यान देना। उम्र भर जो किसी ऐसे दल में था जिसको खुद मोदी जी इक घर की पार्टी बताते हैं , नब्बे साल की उम्र में अपने दल में शामिल कर क्या साबित करना चाहते हैं। सच तो ये है मछली जल में रहती है फिर भी बास अर्थात बदबू नहीं जाती , और ये राजनीति तो कभी का गंदा गटर बन चुकी है। आप विज्ञापनों से इश्तिहारों से उसको गंगा साबित नहीं कर सकोगे। आपके दल में तीस प्रतिशत उम्मीदवार बड़े बड़े राजनितिक परिवारों से जुड़े हैं , आपके गठबंधन में तमाम दल किसी एक नेता की जागीर हैं , आपने खुद तमाम बाहुबलियों को चुनाव में टिकट दिया है , कितने आपराधिक मुकदमें जिस पर दायर हैं उसको प्रधानमंत्री जी न केवल अपने मंच पर जगह देते हैं बल्कि उसका नाम लेते हैं सभा में आदर के साथ माननीय अमुक जी कहकर। मोदी जी जिस पर पर चलकर अभी तक सभी रसातल में जाते रहे हैं आप कैसे उसी पर चल आसमान को छू लेंगे। आपके दल में या बाकी दलों में ही जब कथनी और करनी में इतना विरोधाभास है तब होगा क्या। कितनी विडंबना की बात है कि आपने भी संविधान की भावना की कदर नहीं की , सभी नागरिक समान हों कैसे।
                     आप काला धन खत्म करना चाहते हैं ऐसा दावा करते हैं , आपकी सभाओं में अपार भीड़ है ये भी बताते हैं , मगर ये क्यों नहीं बताते कि हर सत्ताधारी की सभा में भीड़ क्यों और कैसे एकत्र की जाती है। मगर कहते हैं हवन करते हुए भी लकड़ी में जीव अगर होते हैं जल जाते हैं , हम शाकाहारी गोबर के उपले जलाते हैं मगर सोचते ही नहीं उसमें कितने जीव मर गये जलकर। हमारी पवित्रता की परिभाषा विचित्र है। ठीक उसी तरह नेताओं के मापदंड अपने लिये अलग औरों के लिये अलग होते हैं। उस दल का पापी अपने दल में आकर पुण्य आत्मा बन जाता है , आपने दल से जो दूसरे दल में चला गया वो पापी और स्वार्थी कहलाता है। कोई किताब है जो केवल नेताओं को पढ़नी आती है , जिस में अच्छा आरक्षण बुरा आरक्षण , अच्छा दलबदलू बुरा दलबदलू , और टिकट देने को अच्छा धनवान और बुरा धनवान , किसको समझते बताया हुआ है। आप जनता को झूठ से बहलायें तो देशहित और कोई और बहलाये तो दलगत स्वार्थ , शायद इसी को राजनेताओं का धर्म कहते हैं जिस में पाप ही पुण्य है और पुण्य भी पाप है। जीत वो मोक्ष है जिसकी चाहत सभी को है , मोक्ष जीते जी नहीं मिलता , जीत भी अपनी अंतरात्मा अपना ज़मीर और तमाम नैतिक मूल्यों को छोड़ कर ही मिलती है। राजनीति तभी कहते हैं वैश्या जैसी होती है , हर दिन बदलती है अपना रंग , अपना प्रेम का ढंग भी। 

Thursday, 19 January 2017

विकास हो रहा है ( कविता ) 125 भाग दो - डॉ लोक सेतिया

धीरे धीरे चली हवा , सत्ता को आया नहीं पूरा मज़ा ,
और तेज़ करनी है रफ्तार , कहती रही हर सरकार ,
हवा बन गई इक दिन आंधी , आंधी से बनी तूफ़ान ,
उड़ा ले गई झुग्गी झौपड़ी , तबाह होते गये किसान ,
बाहर रौशनी भीतर अंधकार , है ऐसा भारत महान।
इक राक्षस की नई कहानी , सुन लो आज मेरी ज़ुबानी ,
फैला इतना विकास देखो , विनाश की बन गया पहचान ,
जाने की राह चले हम , सोच सोच होते अब हैरान ,
कितने ऊंचे ऊंचे महल बने , कितने छोटे हैं इंसान।
किस को भगवान बनाया , किस को कहते शैतान ,
ऊंची ऊंची हैं दुकानें सत्ता की , फीके हैं सारे पकवान ,
इस राक्षस को मिली सुरक्षा , इसकी बड़ी निराली शान ,
पाया जनता ने क्या उससे , भाग भाग बचाई है जान।

Saturday, 14 January 2017

बिकाऊ माल अर्थात ब्रांड होना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                 " कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊं , बिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता। "
आज महत्व ब्रांड होने का है , ब्रांड होना ऊंचे दाम बिकना है। लोग अपने नेता को ब्रांड बता रहे हैं , उनकी शान बढ़ा रहे हैं। सच गांधी जी कोई ब्रांड नहीं थे , शुक्र है उनको लाख प्रयास कर के भी कोई बाज़ार में बिकता ब्रांड नहीं बना पाया। कभी वो लोग महान समझे जाते थे जिनकी कोई कीमत नहीं लगा सकता था , जो किसी भी दाम बिकने को तैयार नहीं होते थे। अब तो माना जाता है सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है बस मोल अपना अपना है। गरीब दो रोटी में बिक जाता है , मज़बूरी इक मां को दो हज़ार में बच्चा बेचने को विवश कर देती है , और गरीब की गरीबी और जनता की बदहाली की बातें कहकर कोई राजनीति करते हुए ब्रांड बन जाता है। कोई दूसरा ब्रांड योग और आयुर्वेद से लेकर हर शुद्ध वस्तु को बेच मालामाल हो जाता है , जबकि उसके पास आयुर्वेद की कोई शिक्षा ही नहीं है। वो अपने विज्ञापनों में कहता है " मेरा विश्वास है जो योग करेगा और दो घूंट रोज़ पियेगा वो रोगों के कुचक्र में ही नहीं फंसेगा। " आपको मालूम है इसका अर्थ , विश्वास है भगवान है , मगर विश्वास है ऐसा करने से रोग नहीं होंगे , में अंतर है। विज्ञान मात्र विश्वास पर नहीं चलता , आयुर्वेद भी इक चिकित्सया शास्त्र है कोई धर्मकथा नहीं। मुझे नहीं पता इस तरह किसी बात को बेचने को क्या कहा जाये , मगर इतना जनता हूं ऐसा कर किसी ने न आयुर्वेद न ही योग की भलाई की है। फिर भी अगर आप सवाल करें तो आपको बताना ज़रूरी है विज्ञान तथ्य और प्रमाण पर आधारित होता है। किसी भी दावे को परखा जाता है ये जांच कर के कि उसके उपयोग से कितनों को क्या लाभ हुआ। किसी की दुकान गली गली खुल गई इतना काफी है उसके व्योपार की सफलता के लिये , मगर कितने प्रतिशत रोग कम हुए या लोग तंदरुस्त हुए पहले से ये कौन बतायेगा।  स्वास्थ्य विभाग और डब्ल्यू एच ओ नहीं मानता देश में रोग या रोगी कम हुए।
      असली सवाल बाकी है , क्या बिकना और ब्रांड होना गर्व की बात है। उनके नाम से मुनाफा होता है उनके दल वालों को लगता है , फिर तो उनकी तस्वीर हर जगह लगवा दो , कुछ आधुनिक संत अपनी तस्वीर अपने अनुयायियों को कुछ हज़ार में अपने हाथ से आशिर्वाद के साथ देते हैं , चोखा धंधा है। कुछ अभिनेता भी अपनी फोटो किसी के साथ भी करवाते हैं पैसे लेकर , उनकी कमाई होती है इसी तरह। कभी लोग बाज़ारी होना अपमान समझते थे , आज बाज़ार बताता है आपका मोल कितना है। इक और दल के नेता का उपहास किया जाता है कि उसका खरीदार कोई नहीं , यहां कल क्या हो जाये क्या पता। कल वही सत्ता पर काबिज़ हो जाये तो लोग जनता क्या मीडिया तक उसका गुणगान करेंगे , उसके फोटो भी विज्ञापन में दिखाई देंगे नित नई योजना की घोषणा के साथ। अब समय आ गया ही शेयर बाज़ार में राजनीति के शेयर भी दर्ज हों और उनका भाव भी बढ़ता गिरता नज़र आता रहे। जब यही सब से बड़ा कारोबार है जिस में आकर सभी अरबपति बन जाते हैं तो इसको खुले बाज़ार की अर्थव्यवस्था में शामिल करना ज़रूरी है। कब तक आम आदमी दूर से तमाशा देखता रहेगा , सभी को सत्ता की भागीदारी की इजाज़त मिलनी चाहिए। जो चाहे जिस राजनितिक दल के शेयर खरीद सके और जब वो दल सत्ता में आये तब अपने शेयर मनचाहे भाव पर बेच सके। सरकार इसको गरीबी की योजना में शामिल कर सकती है। अजीत जोगी और जूदेव जैसे महात्मा पहले ही राजनीति में धन के महत्व पर प्रवचन दे चुके हैं। आज इंसान भी इक वस्तु बन चुका है और उसकी कीमत लगाई जाती है , विधायक और सांसद भी बिकते खरीदे जाते हैं ये भी अब राज़ की बात नहीं है। बड़े बड़े उद्योगपति हर दल को चंदा देने की तरह हर दल के शेयर खरीदा करेंगे और जिस दिन उनके पास इतना धन होगा की बहुमत संख्या के विधायक खरीद सकें सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। जो अभी तक परदे के पीछे होता आया चोरी से अब कानूनी तौर पर खुलेआम होगा। इधर इक दलाल बता रहा है कि राजनीति में ईमानदारी की कीमत माइनस में आ गई है और बेईमानी को मुंह मांगी कीमत मिलने लगी है। आप कुछ शेयर बेईमानी के खरीद कर और कुछ हेरा फेरी दल के भी साथ फ्री पाकर शुरुआत तो करो , इसमें सभी ब्रांड उपलब्ध हैं , लाल , भगवा , नीला  , हरा , अब तो काला भी शामिल हो चुका है , बहुरंगी तो है ही।
             ऊपर स्वर्ग लोक में बहस चल रही है , एक अंग्रेज़ की आत्मा भारतीय आत्मा से कह रही है , तुम क्या समझते थे हम देश को लूट रहे हैं , हमें बाहर निकाल दिया था। क्या शिक्षा दी थी तुमने चरित्र निर्माण की , आज हर बात को बेचा जा रहा खरीदा जा रहा , मूल्य आदर्श भी तोले जा रहे सत्ता के तराज़ू पर।  और  देख लिया झूठ का पलड़ा भारी है सब उधर झुके हुए हैं , सच की कद्र कुछ नहीं उसकी कीमत दो कौड़ी भी नहीं है। तुम सत्य अहिंसा की पुजारी थे , तुम्हारी समाधि पर फूल चढ़ाने वाले तुम्हारी सोच को कत्ल करते हैं। खुद विदेशी कम्पनियों को बुलाते हैं , स्वदेशी की बात कोई नहीं करता। गांव में देश बसता है तुम मानते थे , अब गांव भी गांव जैसे नहीं हैं , चरखा आज मिलता ही नहीं कहीं। आपको पता है लोग मन्नत मांगते हैं बहुत सालों से मांगते आये हैं और मन्नत पूरी होने पर चरखा लोहड़ी में जलाया करते थे , आज चरखा नहीं मिलता बस इक मॉडल छोटा सा बिकता है रस्म निभाने को। 2 अक्टूबर 3 0 जनवरी को रस्म निभाते हैं नेता। सत्तर साल हो गये हैं अभी तक देश के अंतिम आदमी के आंसू कोई पौंछता  क्या देखता तक नहीं है।