Sunday, 28 May 2017

Meri Maan Smt. Maya Devi Ji Gaya karti Thee BHAJAN

ये भजन मेरी माता जी हर समय गाती - गुनगुनाती रहती थी। मैंने फिल्मों में और सभी जगह बहुत भजन सुने हैं मगर मुझे जो अलग बात इस भजन में लगती है कहीं और नहीं मिली अभी तलक। भजन का मुखड़ा ही याद है उसके बाद उस भजन की बात को खुद मैंने अपने शब्दों से सजाने का प्रयास किया है। ये भजन अपनी प्यारी मां को अर्पित करता हूं।
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भगवन बनकर तू अभिमान ना कर , तुझे भगवान बनाया हम भक्तों ने।
पत्थर से तराशी खुद मूरत फिर उसे , मंदिर में है सजाया हम भक्तों ने।
तूने चाहे भूखा भी रखा हमको तब भी , तुझे पकवान चढ़ाया हम भक्तों ने।
फूलों से सजाया आसन भी हमने ही , तुझको भी है सजाया हम भक्तों ने।
सुबह और शाम आरती उतारी है बस , इक तुझी को मनाया हम भक्तों ने।
सुख हो दुःख हो हर इक क्षण क्षण में , घर तुझको है बुलाया हम भक्तों ने।
जिस हाल में भी रखा है भगवन तूने , सर को है झुकाया हम भक्तों ने।
दुनिया को बनाया है जिसने कभी भी , खुद उसी के है बनाया हम भक्तों ने।

Mujhe Nahin Banna Achchha Aadmi - Dr Lok Setia

सच अगर मीठा होता तो कोई झूठ नहीं बोलता , अब सच का स्वाद अगर कड़वा है तो सच बोलने वाला क्या करे। मगर इधर लोगों की शक्ल खराब है और बुरा भला दर्पण को कहते हैं , दर्पण झूठ न बोले जो सच है वो सामने आया , हंस ले चाहे रो ले। हम कैसा सभ्य समाज हैं जो खुद बोता है कांटें और चाहता फूल हासिल करना। सच सच बताओ कौन कौन सच के साथ खड़ा होता है। मुझे सामने बेशक नहीं बोलते मगर पीठ पीछे कहते हैं ये अच्छा आदमी नहीं है , भला कोई अधिकारी कर्तव्य नहीं निभाता , पुलिस अपराधी का बचाव करती है , नेता अपने चहेतों को मनमानी की छूट देते हैं , शिक्षक विद्या को दान नहीं वयापार समझते हैं , करबारी अपने मुनाफे की खातिर हर अनुचित तरीका अपनाते हैं , डॉक्टर हॉस्पिटल ईमानदारी से मरीज़ का इजाल नहीं करना चाहते बल्कि किसी भी तरह अधिक से अधिक पैसा बनाना चाहते हैं , लूट करना सभी की आदत बन गई है। सेवा की आड़ में स्वास्थ्य से खिलवाड़ होता है , लगता ही नहीं शराफत और मानवीय मूल्य किसी को याद भी हैं। कितना धन कमा लो क्या होगा , इक मित्र जो जाने कितने धंधे कर चुके हैं और अब दलाली का धंधा करते हैं , मुझे बता रहे थे मैंने क्या क्या नहीं बना लिया। उनको लगता है इन सब से उनका नाम अमर हो जायेगा , लोग याद किया करेंगे क्या क्या ज़मीन जायदाद उनकी बनाई हुई है। मैंने कहा आपको अपने पिता जी से जो मकान दुकान मिले क्या आपको अभी लगता वो उनकी है। आप किसी को बताते हैं ये मेरी नहीं पिता जी की बनाई हुई है मुझे विरासत में मिली है। चुप लगा ली क्योंकि उनको लगता है अब ये सब उन्हीं का है पिता जी के बाद। मैंने कहा ठीक ऐसे आपके बेटे और उनकी संतानें जब उनको जो मिला उसे खुद अपना ही समझेंगे आपका नहीं। आप को अपने लिए जितना चाहिए उतना आप बिना ठगी या धोखे के कारोबार किये कमा सकते हैं। सब धर्म बताते हैं अपनी संतान को काबिल बनाओ तो वह खुद अपनी काबलियत से कमा सकती है। और अगर नाकाबिल हो तो आपका जमा किया भी खत्म कर सकती है। इक बात उनको बताना बेकार था मगर आपको बताता हूं , आपकी जमा पूँजी कोई छीन सकता है चुरा सकता है , मगर आपकी काबलियत कोई नहीं छीन सकता। उनको ही नहीं तमाम बाकी लोगों को भी लगता है मैंने कुछ नहीं जमा किया कोई धन दौलत बढ़ाई नहीं। मगर मैं मानता हूं मेरा रचनाकर्म मेरी सब से बड़ी पूंजी है , जो मेरे बाद भी मेरी ही कहलाएगी किसी और की नहीं। मेरी संतान भी इसको अपना नहीं समझेगी बल्कि याद करेगी ये हमारे पिता की लिखी रचनाएं हैं। बस यही किया है मैंने , भले  घर फूंक तमाशा देखना कहे कोई।
वो जिनको मुझ से गिला है कि मैं बेबाक कहता और लिखता हूं हर किसी के अनुचित आपराधिक कृत्यों को लेकर उनको चिंतन की ज़रूरत है। आप अधर्म कर धार्मिक कहलाना चाहते हैं , तमाम नियम कायदे कानून तोड़ कर अपने अनैतिक कामों को सभ्य नागरिक होने के दावे से ढकना छुपाना चाहते हैं। मुझे समाज के अंधियारे को उजाला नहीं बताना अच्छा कहलाने को। आपको बुरा लगता हूं तो मेरे लिए ऐसा बुरा कहलाना अपमान की नहीं गर्व की बात है।

Saturday, 27 May 2017

Khairat Mil Rahi Hai ( Tarkash ) Dr Lok Setia

आपके भी अच्छे दिन आ ही गए , मैंने अपने पत्रकार मित्र को बधाई दी। हरियाणा सरकार ने घोषित किया है हर उस पत्रकार को हर महीने दस हज़ार रूपये पेंशन मिलेगी जिस को बीस साल हो गए किसी अख़बार की खबरनवीसी करते। लो कोई मतभेद नहीं छोटे बड़े किसी अख़बार से ताल्लुक हो , जाति धर्म कोई होता नहीं मीडिया वालों का , सब का भला हुआ। तमाम ऐसे लोग हैं जो व्यवसाय कोई और करते मगर नाम को पत्रकारिता का तमगा लगाया हुआ ताकि धंधे में प्रशासन और सरकार का सहयोग भी मिलता रहे और समाज में दबदबा भी रख सकें। हर कोई डरता है पत्रकारों से , और हर जगह उनको खास स्थान दिया जाता है। मगर अभी तक कोई नहीं जानता था कि अधिकतर स्ट्रिंगर्स को मिलता क्या है , शायद कोई सोच भी नहीं सकता इतने कम पैसे मिलने पर भी कोई किस तरह शाही ढंग से रह सकता है। इस राज़ को कोई नहीं जान पाया कभी भी , कोई जादू की छड़ी है जो सब देती है। फिर भी किसी ने इनकी सुध ली तो।
      ये सरकार भी अजीब चीज़ होती है , जिस को ज़रूरत उसको देने को कुछ नहीं , और जिसको देना उसके लिए सब कुछ है। बीस साल क्या पचास साल कोई और काम किया तमाम लोगों ने उनको क्या मिलती इतनी पेंशन कहीं। बुढ़ापा पेंशन तो सभी को बराबर मिलती है फिर कुछ विशेष वर्ग की अलग व्यवस्था कितनी सही है। मगर कोई टीवी या अख़बार इस पर सवाल क्यों करेगा , हर सरकार ने मीडिया को विज्ञापनों का चारा डाला है। नेता और अधिकारी तो साफ कहते हैं ये नहीं होगा कि खाओ भी और चिल्लाओ भी , हड्डी मिलती है तो दुम हिलाना ज़रूरी हो जाता है।
      वास्तव में सरकार का मकसद आपको स्वालंबी बनाना नहीं भिखारी बनाना है। और सरकार खुश है कि लोग अधिकार मांगते नहीं भीख चाहते हैं। भीख सब्सिडी की हो या आरक्षण की अथवा कोई और , नेता और अफ्सर समझते हैं हम दाता हैं। जनता का धन जनता को ही वापस देना उपकार की तरह वह भी जिन को मर्ज़ी हो। कहते हैं हमने कोई घोटाला नहीं किया , भाई देश की सत्तर प्रतिशत जनता भूखी नंगी बदहाल है और आप खुद हर दिन जनता का धन व्यर्थ के आडंबरों पर बर्बाद करते हैं। कभी जनसभा कभी धार्मिक आयोजन कभी देश विदेश की यात्रा , इसको शाही ठाठ कहा जाता है जनसेवा नहीं। अपने प्रचार पर लाखों करोड़ खर्च करना देश का सब से बड़ा घोटाला है। ये अजीब बात है हम झूठे प्रचार को देखते हैं अपने सामने की असलियत को नहीं , अन्यथा किसी नेता अभिनेता को मसीहा नहीं बनाते। इन सब को खुद अपने लिए सब पाना है आपको देना कुछ भी नहीं। राजसी शान से रहते सादगी की बातें करना सब से बड़ा फरेब है। हम शोर सुन सुन मानते हैं सब बदल गया है।  बदला निज़ाम है तौर तरीका नहीं , अंधे की रेवड़ियां पहले भी बंटती रही आज भी अंधा सत्ता की गद्दी पर बैठा वही कर रहा और दरबारी लोग भीख लेकर तालियां बजा रहे हैं। क्या भिखारी होना अच्छी बात है।

Facebook Ka Safar ( Aalekh ) Dr. Lok Setia

फेसबुक पर आप चाहे नये हों चाहे पुराने , इसके आदी होते देर नहीं लगेगी। मैं भी करीब चार साल से फेसबुक का बीमार रहा हूं , मैं फेसबुक पर दो बातों की खातिर आया था , पहली शायद कोई मित्र मिल जाये कहीं भी और दूसरा अपनी लिखी रचनाओं के लिए पाठक पाने को। शायद साल भर बाद समझ गया था यहां दोनों नहीं मिलती। झूठी लाइक्स और मित्रता के नाम पर केवल छल। परेशान हुआ और फेसबुक छोड़  दी। मगर बार बार फिर से इक नशा वापस ले आता दो चार दिन को , जब कोई विशेष दिन होते। बहुत बदलाव हुआ है इस बीच , मगर इधर तो जब से व्हट्सएप्प और मेस्सेंजर जैसे साधन आये तब से स्मार्ट फोन पर चैट ही इक मनोरंजन का और समय बिताने का ज़रिया बन गया है। मैंने जब इनका उपयोग किया तो बीस दिन में ही परेशान होकर बंद कर दिया व्हट्सएप्प , और हज़ारों मित्रों की सूचि वाली फेसबुक बंद कर दूसरी बनाई बहुत कम नाम भर के दोस्तों वाली। अब मालूम है निराश नहीं होना , कोई मित्र नहीं मिलते न कोई पाठक। केवल अपनी पसंद की चीज़ें खुद ही शेयर करना और खुद ही देखते रहना है। फेसबुक वालों को लगा शायद उनकी उपयोगिकता नहीं बची और लोग फेसबुक खोल फिर व्हट्सएप्प पर ही सब करते हैं। तब इक डर लगा होगा धंधा मंदा होने का तभी बहुत नई नई बातें लेकर आये हैं। मुझे हैरानी होती है जब तमाम लोग फेसबुक के कहने पर कोई पोस्ट बनाते हैं , कौन आपके जैसा है , किस ने आपकी प्रोफाइल पिक सब से अधिक देखी , कौन आपको सच चाहता है , आपका फेसबुक कार्ड आपको पास ही करता है अंक देकर भले आप कितना कम रहे हों फेसबुक पर। अब तो तमाम कारोबार होने लगे यहीं फेसबुक पर , हद तो तब हुई जब आपकी कितनी उम्र बाकी से आपके दिन कब कब अच्छे आने वाले हैं की बात कोई लिंक आपको बताता है। मैंने सोचा इसकी असलियत को परखना चाहिए और अपनी तीन फेसबुक पर जिन पर खुद अपना नाम जन्म तिथि और फोटो तक इक समान है इन लिंक्स से यही मूर्खता कर देखा और सब में अलग अलग नतीजे सामने आये। शायद हमारी मानसिकता को समझ हमें किसी न किसी तरह फेसबुक पर उलझना उनकी ज़रूरत है। बहुत पहले किसी ने कहा था दुनिया में मूर्ख बनने को बहुत लोग तैयार हैं बस कोई बनाने वाला चाहिए। आप सोशल मीडिया पर रहें मगर कुछ सार्थक कार्य करने के लिए। मूर्ख बनने को बाहर दुनिया कम नहीं है। अच्छे दिन लाने वाले तक नहीं जानते कब कैसे आएंगे , सरकार बना खुश हैं अपने अच्छे दिन लाकर। आपके लिए अच्छे दिन कोई मसीहा नहीं लाएगा।

Wednesday, 24 May 2017

Mandir , Chaaleesa , Kaand , Aarti Ka Patent ( Tarkash ) Dr Lok Setia

कलयुगी अवतार प्रकट हो चुके हैं , तीन साल से हर तरफ यही शोर है। मुझे ख्याल आया क्या किसी ने उनके नाम से आरती , चालीसा , उनका कांड लिख छपवा लिया है। गूगल से सब जानकारी हासिल की जा सकती है , तुरंत पता चला अभी तक किसी ने ये महान कार्य नहीं किया। शायद मुझे ही करना हो तभी किसी ने इस बारे सोचा ही नहीं। मुझ से पहले कोई दूसरा नहीं लिख ले इसलिए सब से पहले मैंने आधुनिक भगवान का मंदिर , उनकी आरती , उनका चालीसा , उनका काण्ड सभी पर अपना कॉपी राइट करवा लिया है। जब तक लिखूंगा छपवाऊंगा तब तक उसका प्रमोशन भी शुरू कर रहा हूं , जिस को अपना कल्याण कराना हो और इस धरती पर जीते जी स्वर्ग का सुख पाना हो , उसको मंदिर में दर्शन से लेकर आरती चालीसा और काण्ड की प्रति आरक्षित करवा लेनी चाहिए मुझे अग्रिम भुगतान कर के। सिमित प्रतियां छपवाने की बात कहना ज़रूरी है ताकि लोग भाग भाग सब से पहले बुकिंग करवा मुझे आधुनिक बाबा जी की तरह मालामाल कर दें। ये बताना ज़रूरी है कि इन की केवल हार्ड कॉपी ही उपलब्ध होगी आप उसको गूगल व्हाट्सएप्प अदि पर तलाश करोगे तो निराश हो जाओगे। मुफ्त कुछ भी नहीं मिलेगा , मरने से देख तो लो स्वर्ग की असलियत क्या है , अन्यथा स्वर्ग की कामना करते मरोगे मगर जब ऊपर जाकर हाल देखा तो सोचोगे ये कितनी बड़ी भूल हुई। स्वर्ग की दशा भारत देश से बदतर मिली और सामने देखा कि नर्क में तो सब के मज़े हैं , तब आपको कोई वहां ट्रांसफर नहीं करेगा लाख विनती करना। इसलिए कुछ हज़ार की बात है आधुनिक कलयुगी अवतार के मंदिर में दर्शन और उसका गुणगान करने का हर मंत्र मेरी लिखी आरती , मेरा लिखा चालीसा और कांड पढ़कर अपने जीवन को सफल बनाएं। नहीं मैं ये सब कोई जनकल्याण की खातिर नहीं कर रहा हूं , और लोगों की तरह इतना बड़ा झूठ मैं नहीं कर सकता , शुद्ध व्यापार की तरह कमाई करने को कर रहा हूं। आपको भुगतान नकद काली कमाई से करने तक की छूट है।  मंदिर में अर्पित धन काले से सफेद हो जाता है ठीक राजनीतिक दल को मिले चंदे की तरह। पाप और पुण्य की भी कलयुगी परिभाषा आपको समझाई जानी है , जब कोई और दल या नेता करे तब जो अपराध और पाप कहलाता है , वही जब खुद सत्ता में आकर करते हैं तब राजधर्म बन जाता है। इक तथ्य सर्वविदित है राजा कभी गलत नहीं होता , भगवा वेस धारण कर आप अपशब्द भी बोलते हैं तब उसको प्रवचन माना जाता है।
                 अंत में जैसे कथा का सार बताना ज़रूरी होता है , हर कथा के आखिर में लिखा हुआ होता है , इस को पढ़ने से क्या फल प्राप्त होगा। उसी तरह ये बताना आवश्यक है कि सतयुगी देवी देवताओं की आरती पूजा कलयुग में किसी काम नहीं आती है। आप कलयुगी इंसान हैं आपके देवी देवता भी इसी युग वाले कल्याणकारी होंगे , सतयुगी भगवान , देवी देवताओं की उपासना से अभी तक आपका कल्याण हुआ है , इस बात पर विचार करना। और सब लोग अपने लिए आरक्षण करवा लें और आप बाद में हाथ मलते रह जाएं ऐसा नहीं होने दें। जितना जल्द हो अपनी बुकिंग करवा लो , अगर जेब खाली है तो लोन की सुविधा भी खुद आधुनिक भगवान ने हर बैंक में उपलब्ध कराई हुई है , बिना किसी गारंटी के। जल्दी करो , पहले आओ पहले पाओ का नियम लागू है।

Thursday, 18 May 2017

Achche Din Aaye Hain Bhajan ( Vyangya ) Dr. Lok Setia

जनता को उसने भरोसा दिलवाया था , अगर उसको चुन लोगे तो अच्छे दिन लेकर आएगा। वो समझता था जनता से अभी तक सभी ने बस झूठे वादे ही किये हैं और चुनाव जीत कर वादे निभाना किसी ने याद रखा ही नहीं। जैसे हम सब समझते हैं हम तो भले आदमी हैं बाकी दुनिया बड़ी खराब है , उसी तरह की मानसिकता उस नेता की भी रही। और उसकी बड़ी बड़ी बातों का जादू चल गया और जनता ने उसको शासन की बागडोर संभलवा दी। उसने आते ही हर जगह अपनी पसंद के खास लोगों को राज्यों की सत्ता हासिल कर कुर्सी पर बिठा दिया। उसको यही लोकतंत्र लगता था , कल तक परिवारवाद की आलोचना करने वाला व्यक्तिवाद और अपने महिमामंडन में अपने को इस दुनिया का भगवान समझने लगा। करोड़ों रूपये जनता के खज़ाने से लुटा टीवी अख़बार और अपने प्रचार के बड़े बड़े पोस्टर्स लगवा दिए। स्वच्छता अभियान मेक इक इंडिया जाने क्या क्या तमाशा हर दिन करना उसकी आदत हो गई। देश भर में भृमण करता रहा मगर जनता की बदहाली को देखने को नहीं अपनी जय जयकार करवाने को रोज़ लाखों करोड़ों खर्च कर। विदेश यात्रा करता रहा अपने को विश्व के महान लोगों में शामिल कराने को। उस ने और उसके मनोनित सत्ता पर बैठे लोगों ने हर जगह कोई स्थान बना दिया जहाँ जाकर कोई अपनी पहचान बताकर शिकायत लिखवा सकता था। उसको पता था देश में सत्तर साल से प्रशासन और व्यवस्था कितनी लचर और संवेदनहीन हो चुकी है। मगर उसने उन्हीं अधिकारियों को खुद को भगवान कहलाने को पंडित मुल्ला मौलवी का रुतबा दे दिया। अब जो भी शिकायत करने आता उसकी शिकायत दर्ज कर उसको इक कागज़ दिया जाता जो बताता था अच्छे दिन आ गए हैं। अब खुश हो जाओ अब रोना मना है , आह भरना गुनाह है।
           जब साल दो साल तक कोई समस्या हल नहीं हुई और लोग अपनी दी अर्ज़ी पर करवाई नहीं करने की शिकयत करने लगे जबकि अधिकारी कागज़ों पर लिख चुके थे कोई करवाई करने की ज़रूरत ही नहीं अथवा शिकायत का समाधान किया जा चुका है। तब राजधानियों को ये रास नहीं आया और आदेश जारी किया गया कि जो फिर से शिकायत दर्ज करवाने आये उसकी जांच की जाएगी। ऐसे लोग नास्तिक हैं जो भगवान को नहीं पूजते या मानते। ऐसे विलाप की विरोध की आवाज़ को बंद कर तानाशाही जैसे हालात लाकर बताया गया है सब ठीक हो गया है। गरीबी भूख बेरोज़गारी कोई भी समस्या नहीं  रही। जिसको आसपास गंदगी दिखाई देती है स्वच्छत भारत नहीं दिखाई देता या सुशासन नहीं तानाशाही नज़र आती है वह बागी है देश का दुश्मन है। हर समस्या का समाधान हो गया है केवल इक बात कर के , कि अब कोई समस्या है बोलना मना है। सब को सुबह शाम अच्छे दिन आ चुके हैं का सरकारी भजन गाना ज़रूरी है।

Saturday, 13 May 2017

Aap KI Shikayt , Aap Khud Mujrim ( Vyangya ) Dr. Lok Setia

भगवान कहलाना सब चाहते हैं , भगवान बनना किसी को नहीं आता है। मालूम नहीं तब क्या होता था , मगर हमने किस्से कहानियां बहुत सुनी हुई हैं , बादशाह इंसाफ करने या न्याय देने को इक घंटा महल के द्वार पर लगवा देते थे। दावा किया जाता है कि कोई भी आकर घंटा बजा सकता था और अपने साथ हुए अन्याय की फरियाद कर न्याय की गुहार लगा सकता था। अब उस घंटा बजाने का कोई रजिस्टर तो होता नहीं था कि बाद में हिसाब पता चलता कितने लोग घंटा बजाने आये और उन में से कितनों की परेशानी का अंत हुआ। सोचा जाये तो कौन जाकर बादशाह से उसी की कार्यपालिका की शिकायत करने की सोचता भी होगा। और फिर राजा का आदेश ही न्याय कहलाता है इसलिए शासक जो भी करता इंसाफ ही माना जाता होगा। मगर बादशाह सोचते थे कि वही ईश्वर का सवरूप हैं इसलिए चाहते थे जनता उनके दरवाज़े पर आये इंसाफ और न्याय की याचिका लेकर और उनसे दया की विनती करे। अपने भारत देश में जब से लोकतंत्र के नाम पे वोटतंत्र का खेल चालू हुआ है राजनेताओं को खुद को भगवान की तरह सब की विनती सुनने का शाही शौक होने लगा है। कभी नेता आते जाते थे जब किसी शहर तब लोग उनका भाषण सुन बाद में किसी रेस्ट हाउस में अपनी अपनी अर्ज़ियां दे आते थे और इतने से खुश हो जाते थे कि मंत्री जी ने अर्ज़ी ले ली। इसका कोई ऐतहासिक प्रमाण नहीं मिलता कि उन सारी अर्ज़ियों का क्या किया जाता था। मगर देश की बिगड़ती दशा से समझ आता है की उन सभी अर्ज़ियों को रद्दी की टोकरी में ही डाला जाता रहा होगा। 
         इधर नेता भी समझ चुके हैं कि अब पुराने ढंग से जनता को नहीं बहलाया जा सकता है। इसलिए हर राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री सी एम विंडो या टॉक टू पी एम ओ जैसे नाम से से बादशाही घंटे जैसा कुछ नया शुरू कर देते हैं। हम लोग ऐसे नासमझ हैं जो हर बार छले जाते हैं तब भी वही तमाशा बदले नाम से देखने चले जाते हैं। समस्या और बढ़ गई है जब से सब ऑनलाइन होने लगा है , आपने शिकायत की और आप देख सकते हैं आपकी समस्या का क्या समाधान किया गया है। अब सरकार अपना डंका पीटने लगती है कितनी अर्ज़ियाँ मिली और उनका निदान कर दिया गया। बस ये कोई नहीं बताता कि उन सब को इंसाफ मिला या इंसाफ के नाम पर और अधिक अन्याय किया गया। बुरा हो सूचना के अधिकार और सोशल मीडिया का जिस पर हर प्रशासन और सरकार के झूठे दावों की पोल खुल जाती है वह भी प्रमाण सहित। मगर हर नेता मकड़ी की तरह अपने ही बुने जाल में फंस जाती है वाली दशा को पहुंच जाता है। उनकी खोली खिड़की जनता की शिकायत दर्ज करने के बाद उसी विभाग के उसी अधिकारी को भेज मान लेती है अपना दायित्व निभा दिया। और खुद गुनहगार लिखता है अर्ज़ी पर कि शिकायत पर कोई करवाई करने की ज़रूरत ही नहीं है। और इक एस एम एस भेज देते हैं शराफत से शिकायत करने वाले को कि आपकी शिकायत का निपटान किया जा चुका है आप साइट पर देख लें। 
              समझदार को इशारा बहुत होता है , फिर भी कई नासमझ पत्र लिख कर मंत्री जी को या पी एम अथवा सी एम को सूचित करने की जुर्रत करते हैं कि सब तो अनुचित है फिर भी आप कोई करवाई क्यों नहीं करना चाहते। और कभी कभी सबूत इतने साफ होते हैं कि शिकायत दोबारा खोलनी पड़ती है। मगर किया कुछ भी नहीं जाता , जब जिस नगर में मंत्री जी जाते हैं इक दिखावे की कोशिश करते हैं कि सब मिल सकते हैं समस्या बताने को। मगर मिलने की अनुमति उन्हीं विभाग के अधिकारी से ही मिलती है , और इस तरह चूहे बिल्ली का खेल जारी रहता है। मुश्किल ये है कि सब छुपाने का प्रयास सफल होता नहीं और किसी न किसी तरह सामने आ जाता है कि असली काम नहीं हुआ और कागज़ी बहुत किया गया है। ऐसे में इधर इक बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है , हरियाणा सरकार की सी एम विंडो नाम की जनशिकायत की जगह पर अब ये देखना छोड़ कर कि इसने किया क्या समस्याओं पर , उल्टा ये आदेश दिया गया है कि पता लगाओ कौन कौन बार बार शिकायत करते रहे हैं  उन पर कठोर करवाई की जाये ये समझ कर कि उनकी शिकायत झूठी और किसी निजि हित साधने को की गई है। अब घंटा बजाने वाले को गुनहगार साबित करने को वही अधिकारी ज़ोर शोर से लग जायेंगे ऐसा लगता है। ये न्याय का अनोखा ढंग है जिस में कोशिश की जाएगी कि लोग शिकायत करने से परहेज़ करें। 
                  वास्तव में इस सब की शुरआत की गई थी भगवान के मंदिर में घंटा लगाकर , लोग जाते हैं और भगवान के सामने घंटा बजाकर प्रार्थना करते हैं। अब भगवान को सुविधा है कि उसको सामने आकर जवाब देना नहीं पड़ता न ही कोई हिसाब कहीं से हासिल किया जा सकता है। पत्थर के भगवान को किसी शोर किसी विलाप किसी की सिसकियों से शायद कोई परेशानी नहीं होती और वह आराम से चैन की नींद सोता किसी ऐसी जगह जहाँ कोई नहीं जाकर देख सकता न पूछ सकता क्या किया मेरी विनती का। अब तो मंदिर वाले पुजारी लोगों ने भी समय तय कर दिया है , भगवान भी हर समय नहीं सुनते विनती। ये भगवान ने नहीं किया होगा , मंदिर या धर्मस्थल चलाने वालों ने अपनी सुविधा से किया है। सी एम या पी एम अगर भगवान जैसा होना चाहते हैं तो उनको भी पुजारिओं की तरह सब अधिकारीयों को मनमानी करने देना ही होगा। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को भगवान कहलाना है तो बिना पंडित पुजारियों के सम्भव नहीं है। बात समझ आई आपको या नहीं।

Friday, 12 May 2017

Facebook WhatsApp Aur Social Media Ki Daldal ( Alekh ) Dr. Lok Setia

सोशल साइट्स की इधर धूम मची हुई है , हर कोई ट्विटर फेसबुक मेस्सेंजर व्हाट्सएप्प पर मग्न है। मुझे कभी कभी हैरानी होती है देख कर कि तमाम लोगों ने बिना सोचे समझे इनको अपनी ज़रूरत बना लिया है। इक अलग तरह का नशा छाया हुआ है , शायद अधिकतर लोग जानते तक नहीं इसकी उपयोगिकता कितनी है और क्या इनका इस्तेमाल कर कुछ सार्थक हासिल कर रहे हैं। मेरा विचार है अक्सर इन पर अपनी सब से कीमती चीज़ समय को हम बर्बाद करते हैं और बदले में मिलता है इक झूठा संतोष लोकप्रिय होने या जानकर होने का। शायद चार साल पहले अनजाने में ही मेरी पहली फेसबुक बन गई थी , बिना समझे जो सामने विकल्प आता रहा क्लिक करता गया और मुझे खबर भी नहीं हुई कि मैं फेसबुक पर शामिल किया जा चुका हूं। जब भी मेल खोलता सन्देश मिलता किसी ने मित्रता की रिक्वेस्ट भेजी है। ये क्या है नहीं मालूम था , फिर पता चला कि ये मित्रता की जगह है तो लगा ये तो बहुत अच्छी बात है। मित्रता मेरा दीन धर्म क्या जूनून है और मुझे उम्र भर किसी सच्चे दोस्त की तलाश रही है। इक आशा की किरण दिखाई दी कि शायद इस तरह ही सही कोई मुझे मिल जायेगा वास्तविक दोस्त। और मैं बहुत चुन चुन कर दोस्त बनाता गया , कुछ दोस्त बहुत अच्छे लगने लगे। विशेष कर जो साहित्य में लेखन में रूचि रखते थे वो लोग। मगर कुछ ही दिन में लगने लगा फेसबुक की मित्रता केवल इक संख्या मात्र है। वास्तविक जीवन में इसका कोई अर्थ ही नहीं है , कुछ निराश हुआ और बहुत बातें ऐसी भी नज़र आई जिन से इक डर सा लगने लगा। मित्रता की आड़ में अन्य मकसद पुरे करना चाहते थे अधिकतर लोग। बहुत समय लगता लिखने में फेसबुक पर मगर समझ आया किसी को पढ़ना नहीं न ही दोस्ती जैसी कोई बात ही करनी है। एक मिंट में जब लोग बीस पोस्ट्स पर लाइक्स करें तब समझने में कठिनाई नहीं हुई कि ये केवल दिखावे की झूठी दोस्ती है। और फिर मैंने इक दिन अपनी फेसबुक बंद ही कर दी। मगर कुछ दिन बाद इक दिन इक मित्र का फोन आया ये पूछने को कि मैं ठीक ठाक तो हूं। शायद पहली बार लगा कोई है जो मेरी तरह फेसबुक की मित्रता को भी मन से जुड़ कर समझता है निभाता है। उन महिला मित्र को मेरा मोबाइल नंबर अख़बार में छपी ग़ज़ल से मिला था , उनकी भावना और उनकी दोस्ती की सच्चाई ने मुझे दोबारा फेसबुक पर वापस आने को विवश किया।
            बहुत तरह के अनुभव होते रहे और मैं फेसबुक के मोहजाल में कभी फंसता रहा और कभी मोहभंग होता रहा। अतिभावुकता के कारण जल्द विचलित होता रहा और फेसबुक बदल कर दूसरी बनाता गया जाने क्या तलाश करना चाहता था। जिस वास्तविक दोस्त की चाहत है वो फेसबुक पर मिलना शायद सम्भव ही नहीं था। फिर बार बार मैंने कई प्रयोग किये कोई सार्थक कार्य करने को , कभी आयुर्वेदिक उपचार की निस्वार्थ सलाह तो कभी ग़ज़ल क्या है ये सबक सिखाने को पेज बनाना। धीरे धीरे समझ आया कि मैं जिस को सोशल साईट समझ कोई काम समाज और समाजिकता से सरोकार का करना चाहता हूं लोग वहां केवल अपना मन बहलाने अपने अकेलेपन को मिटाने का इक खोखला जतन करते हैं और अपने वक़्त को बेकार बर्बाद करते हैं। इक अंधेरा है जिसको लोग रौशनी का नाम देकर समझते हैं उजियारा कर रहे हैं। आज देखता हूं फोन पर मेस्सेंजर और व्हाट्सऐप पर महान विचार भेजे जा रहे दिन भर , जबकि उन्हीं लोगों के अपने वास्तविक जीवन में इन बातों को महत्व कुछ भी नहीं। ये कुछ अजीब लगता है , हम नासमझ नहीं हैं सब समझते हैं भलाई क्या है बुराई क्या है फिर भी भलाई को अपने जीवन में अपनाते नहीं हैं। बुराई की राह को छोड़ नहीं सकते बस इक दिखावा एक आडंबर करते हैं भलाई की बातें कर के। कितने नकली चेहरे हैं हम सभी के , भीतर का चेहरा और और बाहर दिखाने को इक मुखौटा और लगाया हुआ है।
              हम अपने आस पास वही सब देख खामोश रहते हैं और कभी अवसर मिले तो सोशल मीडिया पर उसी पर भाषण व्याख्यान देने लगते हैं। कैसी मानसिकता है हमारी जो हम किसी की समस्या परेशानी को देख उसकी सहायता करने की बात नहीं सोचते अपितु उसको अपने फोन में वीडियो बनाकर सोशल साइट्स या टीवी वालों को भेजने लगते हैं। और जब कोई बदहाल हालत में खबर बनता है तब तमाम लोग दिखावे की झूठी संवेदना लेकर अपने प्रचार को वहीं पहुंच जाते हैं। कितना आगे बढ़े हैं या कितना नीचे गिरते जा रहे हैं। सब से अधिक हैरानी की बात ये है कि देश की सरकारें केंद्रीय और राज्यों की इक अनोखी प्रतियोगिता में शामिल हो गई हैं सोशल साइट्स और मीडिया पर अपना प्रचार करने का। असली काम पीछे छूट गए हैं और हर दिन सोशल मीडिया का प्रबंधन इक बड़ा मकसद हो गया है। जनता का धन जनता की भलाई पर लगाने की जगह विज्ञापनों पर व्यर्थ बर्बाद किया जा रहा है। अख़बार टीवी वाले सरकारी विज्ञापनों की कीमत पर अपना असली मकसद भुला चुके हैं , लगता है जैसे सब के सब बिक चुके हैं या बिकने को बेताब हैं। शायद ही कोई इस से बच सका है , अब तो इनको लगता है जैसे बिना सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियों के ये इक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते। फिर भी सब दावा करते हैं तेज़ दौड़ने का। बात राजनीति की किसी चुनावी जीत या हार की हो अथवा कुछ और सब राजनेता टीवी पर बहस या सोशल मीडिया पर शोर में उलझे हुए दिखाई देते हैं , वास्तविक देश और जनता की समस्याओं से जैसे किसी को कोई सरोकार ही नहीं है।
                          ये सब देख लगता है देश में असली दुनिया के समानांतर कोई दूसरी सपनों की दुनिया है जिस में कुछ लोग खोये हुए हैं। उनको पता ही नहीं कि जिस काल्पनिक दुनिया के आकाश में वे रात दिन विचरण करते हैं उस का कोई अस्तित्व है ही नहीं। हम को जीना है और कुछ भी पाना या खोना है तो इसी धरती की असली दुनिया की हक़ीक़त को समझना होगा। जिस आकाश को हम अपना सर्वस्व समझने लगे हैं उसका अस्तित्व इक परछाई की तरह है। आकाश में आपका घर नहीं बन सकता है। विज्ञान की प्रगति पर सोचते थे कि इस से समय और साधन के सदुपयोग होगा और हम बेहतर जीवन जी सकेंगे मगर जो विकास सोशल नेटवर्किंग से हुआ उसके नतीजे कुछ और ही बताते हैं। अन्यथा नहीं लिया जाये तो कहना होगा कि फेसबुक ट्विटर और व्हाट्सऐप जैसे साधन इक ऐसा तालाब बन गए हैं जिस में जाकर लोग कीचड़ में धसते ही जा रहे हैं। इस दलदल से निकलना शायद असम्भव नहीं भी हो तो कठिन अवश्य है।

Sunday, 7 May 2017

Dil Se Khelte Daulat Wale ( Vyangya ) Dr. Lok Setia

दिल को कभी दौलत के तराज़ू में नहीं तोला जाता , जिस पलड़े में तुले मुहब्बत उसमें चांदी नहीं तोलना , याद आया बॉबी फिल्म का गीत। मगर तब की बात और थी वो दौर और था , दिल प्यार की निशानी उसकी कहानी उसके गीत ग़ज़ल कविता हुए करते थे। आज दिल इक कारोबार का साधन है दिल के डॉक्टर करोड़ों की टर्नओवर का धंधा कर रहे हैं। व्हट्सऐप पर इक दिल का धंधा करने वाले डॉक्टर का मैसेज आया है कैसे दिल को बचा कर रख सकते हैं। भला घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या , वही और उन जैसे तमाम डॉक्टर कभी नहीं चाहते लोग दिल की बीमारी से बचे रहें। हर दिन नए नए तरीके अपनाते हैं , शहर शहर छोटे डॉक्टर्स को हिस्सा देते हैं उनके भेजे मरीज़ की ली फीस से। जितने भी मरीज़ आएं उनको थोड़े लगते हैं , इक बार नाम पहचान बन गई तो अपने नाम पर कितने हॉस्पिटल खुलवा लेते हैं। अब कौन वहां किस का ऑप्रेशन करता है किसे पता , और कितनो को वास्तव में ज़रूरत थी कितनो का कमाई को किया ऑप्रेशन किसे सोचना है। हर कोई आजकल अपने आप को बेचना चाहता है , अपना नाम बेच हज़ारों करोड़ का कारोबार करने वाले भगवा वेशधारी हैं तो खिलाड़ी भी अभिनेता भी। पैसा पैसा पैसा। मगर दिल को तो बख्श देते भाई दिल को खिलौना नहीं जिस से आप खेल रहे हैं। मैंने आज दिल से पूछा क्या हाल है , उसने जो जवाब दिया वही लिखता हूं आगे आप ध्यान पूर्वक पढ़ना और दिल से काम लेना दिमाग से नहीं। ये दिमाग बस अपने फायदे की बात समझता है और अपने मुनाफे की खातिर तर्क भी घड़ लिया करता है। जैसे ये दिल के डॉक्टर चाहते कुछ और जतलाना कुछ और चाहते हैं। दिल की दर्द भरी दास्तां अब पढ़ो।
                   ये आज की बात नहीं है , मेरे नाम पर हमेशा से लोग खेल खेलते आये हैं। भला किसी पर कोई आशिक हुआ तो बीच में मैं कहां से आ गया। दिल हूं कोई पागल नहीं , धड़कना मेरी आदत है , मेरी धड़कन में किसी का नाम नहीं , अगर अभी भी गलतफहमी है तो अँजिओग्राफी करा देख लो। जब दिल वाले डॉक्टर का उपकरण जाता कोई दूसरा घायल नहीं होता जिसका दावा हो दिल में रहने का। मुझे बिना कारण बदनाम किया जाता रहा , कोई किसी को पत्थर दिल कहता अगर उसके प्यार को नहीं माना दूसरे ने। दिल तो है दिल दिल का ऐतबार क्या कीजे , हद हो गई दिल ही तो है जो आपको ज़िंदा रखता हर हाल में , अगर मुझ पर नहीं तो फिर किस पर ऐतबार करोगे। आपके पैदा होने से पहले से धड़कना शुरू करता और आखिरी सांस तलक साथ निभाता और क्या सबूत चाहते भरोसा करने को। कोई और है आपका अपना या दोस्त तो क्या शरीर का कोई अंग भी। आजकल हर कोई दिल को बचाने को सब करना चाहता है , जैसे दिल की बिमारी नहीं होती तो कोई मरता ही नहीं , सभी हज़ारों साल ज़िंदा रहते और जब चाहते इच्छा मृत्यु पा स्वर्ग सिधार जाते। खुद दिल के डॉक्टर भी दिल का ख्याल नहीं रख पाए और पता ही नहीं चला खुद उनको कब ये नामुराद रोग लग गया। दिल लगाने की बात करते और दिल को बचाना भी चाहते , दिल का रोग बुरा नहीं कभी विचार करना।
                               मैं तो तभी से हैरान था जब से दिल की तरह के गुब्बारे बाज़ार में बिकने लगे थे , लोग इक दूजे को अठन्नी का गुब्बारा देकर कहते ये लो मेरा दिल तुम्हारा हुआ। कोई आशिक ने किया साहस अपना दिल सीने से निकलवा किसी को उपहार में देने का। अब तो दिल भी बदलने लगे हैं डॉक्टर , अब क्या नया वाला लगवाया दिल उसी से मुहब्बत करेगा जिस से वो पुराना बीमार हुआ दिल करता था। या जो प्यार करते वो कहेंगे जनाब आपने तो उस दिल को ही बदलवा लिया जिस में हम रहा करते थे। कौन जाने इस किसी और के दिल को किस से प्यार था और वही बसता होगा अभी भी इसी में। क्योंकि प्यार तो कभी मरता ही नहीं , मौत के बाद भी ज़िंदा रहता है। मेरी मुब्बत जवां रहेगी सदा रही है सदा रहेगी। चिता में जलके भी न मिटेगी , सदा रही है सदा रहेगी। अब तो संभल जाओ मान भी जाओ दिल पर किसी का ज़ोर नहीं , दिल को इस तरह ज़ोर ज़बरदस्ती मत धड़काओ। आपने दिल के नाम पर कितने खेल खेले अभी तक , मैंने कुछ नहीं कहा। लेकिन अब कोई दिल को धनवान बनने का साधन बना रहा तो आप सब मुझ दिल नादान को अपनी मौत का सामान समझ बैठे हो। मेरी चिंता छोडो दिल खोल कर जीना सीखो , ऐसे तो आप हर दिन मरते हो , भला मेरे धड़कते आपको चिंता की क्या ज़रूरत है। आपको जो बात कोई डॉक्टर नहीं समझा सकता मैं बताता हूं , बेकार दिल की चिंता में दिल को रोगी नहीं बनाओ। चिंता चिता समान है , चिंता मुक्त होकर जीना सीखो , दिल खुश रहेगा तो कभी दग़ा नहीं देगा। दिल वाले डॉक्टर की नहीं मेरी सुनो खुद अपने दिल की।

Friday, 5 May 2017

Vasvikta Se Nazren Churate Log ( Aalekh ) - Dr. Lok Setia

कल इक नई फिल्म देखी बाहुबली। ऐसा लगा जैसे कोई सपनों की दुनिया है। क्या लाजवाब बड़े बड़े भव्य महल पहाड़ नदियां और नज़र को लुभाते चकाचौंध करते दृश्य। दैव्य शक्तियों की अनुभूति और मन को लुभाते नज़ारे। सब से अजीब था आज की विज्ञान की दुनिया में कोई देवता सा शक्तिशाली मसीहा जो असम्भव को आसानी से संभव बनाता हुआ। मनोरंजन के नाम पर हम वास्तविक दुनिया से भाग इक झूठी काल्पनिक दुनिया में खोना चाहते हैं और सिनेमाकार केवल पैसा बनाने को हमें यही परोस रहे हैं। बेशक तकनीक और भव्यता की इक मिसाल दिखाई दी मुझे भी , मगर लाख चाह कर भी , बहुत सोच कर भी मुझे इस फिल्म की कोई सार्थकता समझ नहीं आई। इसके विपरीत मुझे ये लोगों को भटकाती हुई लगी , ताकि इसको देख हम अपनी  दुनिया की कठिन वास्तविकताओं से बचकर खो जाएं सपनों की लुभावनी सुनहरी दुनिया में। सच कहता हूं मुझे समझ नहीं आया मैं इस फिल्म को देख कर क्या राय दूं। फिल्म देखना मेरा जूनून रहा है , कोई समय था जब हर फिल्म का पहला शो देखना मेरी पहली प्राथमिकता या ज़रूरत हुआ करती थी। फिल्म देखना और संगीत ये दो ही काम मैंने अय्याशी की हद तक किये हैं। मगर उन दिनों फिल्म की कहानी डायलॉग और गाने कितने दिनों तक दिमाग पे छाए रहते थे। हर फिल्म देश समाज से जुड़ी कोई सच्चाई उजागर करती  थी , या प्यार अथवा अन्य किसी विषय पर इक सोच प्रकट करती थी। नया दौर , सफर , ख़ामोशी , कागज़ के फूल , दिल इक मंदिर , नया ज़माना , प्यासा , उपकार , हक़ीक़त , रोटी कपड़ा और मकान , जैसी लाजवाब फिल्मों का युग और जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं जैसा झकझोरने वाला गीत , या फिर महिलाओं की वास्तविकता बताती लता की आवाज़ में दर्द भरी वो रचना , औरत ने जन्म दिया मर्दोँ को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया , आज भी सुन कर सिरहन सी पैदा करती है। कहने को फ़िल्मी दुनिया कितनी तरक्की कर चुकी है मगर वास्तव में क्या अपने आदर्श अपने उद्देश्य और अपने धर्म से भटक नहीं चुकी है। मात्र मनोरंजन ही क्या हम सब का मकसद बन गया है। आज हर कोई फेसबुक व्हाट्सऐप पर महान आदर्शवादी दिखाई देता है जबकि वास्तविक जीवन में हम सभी आदर्शों और नैतिक मूल्यों को ताक पर रख चुके हैं। ऐसे में सही मार्गदर्शन देने की जगह अगर लिखने वाले अभिनय करने वाले और फिल्म या टीवी सीरियल बनाने वाले धन कमाने की खातिर इस तरह खुद भी भटक कर दर्शकों को भी भटकाने का कार्य करें तो इसको उचित नहीं कहा जा सकता। आज देश में समाज का हर हिस्सा जैसे अपने कर्तव्य से विमुख हुआ हुआ है तब साहित्य और कला को और संवेदनशील होना चाहिए। मगर इधर लगता है पैसे की चमक ने सभी को अंधा कर दिया है। टीवी वाले इस को इक महान उपलब्धि बता रहे हैं कि ये फिल्म हज़ार करोड़ की कमाई कर सकती है। जबकि सवाल होना ये चाहिए कि हज़ार करोड़ के बदले आपने दर्शकों को दिया क्या है। अपनी असलियत से नज़रें चुराकर इक झूठे ख्वाबों की दुनिया में जीने का पल भर का धोखा देता एहसास , क्योंकि हाल से बाहर निकलते ही आपका सामना अपनी वास्तविक दुनिया से होना ही है।    

Wednesday, 3 May 2017

Kavita ( Mujhe Mil Gaya Dost ) Dr. Lok Setia

मिल गया मुझे सच्चा मित्र ( कविता )
( डॉ लोक सेतिया )

न जाने कब से ,
मुझे तलाश थी ,
इक सच्चे दोस्त की।
कोई ऐसा जो ,
मुझे समझे और ,
अपना बना ले मुझे ,
मैं जैसा भी हूं ,
बिना कोई कमी बताये।
जो हर हाल में निभाए ,
साथ मेरा उम्र भर ,
सुःख -दुःख में ,
जीवन की कठिन डगर पर ,
नहीं बिछुड़े कभी भी मुझसे।
और मैं आज तक उदास रहा ,
जिया इक निराशा को लेकर ,
कि मुझे इस सारी दुनिया में ,
नहीं मिल सका कोई भी ,
दोस्त जैसा मेरी कल्पना में था।
आज सोचा शायद पहली बार ,
समझा और किया एहसास भी ,
कोई कदम कदम चलता रहा है ,
जीवन भर मेरे साथ बनकर दोस्त ,
बिना मुझे महसूस हुए भी ,
और मेरी हर परेशानी को ,
हर कठिनाई को दूर करता रहा ,
बिना कोई एहसान या उपकार ,
करने का दुनिया वालों की तरह ,
मुझे करवाए ज़रा सा भी मुझे।
मैंने जाने कितनी बार अपना भरोसा ,
उस प्रभु के होने नहीं होने का ,
टूटता बिखरता हुआ अन्तरमन में ,
किया है महसूस भी अक्सर ,
तब भी बिना मेरे विश्वास के ,
होने या नहीं होने का विचार किये ,
कभी किसी कभी किसी रूप में ,
उसने आकर मेरा हाथ थामा है ,
और पल पल डोलती मेरी जीवन नैया ,
को हर मझधार हर तूफ़ान से ,
बचाकर लाया है हर बार किनारे पर।
सामने नहीं दिखाई देता फिर भी ,
वही एक है जो मेरा ही नहीं ,
हर किसी का साथ देता ही है ,
नहीं बदले में चाहता कुछ भी ,
कभी रूठता नहीं खफ़ा नहीं होता ,
अपनाता है हर किसी को सदा ,
उस से अच्छा सच्चा दोस्त ,
पूरी दुनिया में दूसरा कोई नहीं ,
मैं जिस को ढूंढता रहा इधर उधर ,
वो तो पल पल था मेरे पास ही ,
मैंने ही उम्र गंवा दी उसको ,
समझने पहचानने  में कितनी ,
मिल गया है मुझे मेरा सच्चा मित्र ,
कभी जुदा नहीं होने को आज।

Saturday, 22 April 2017

झूठ सब का दीन-धर्म है ( आज का समाज ) डॉ लोक सेतिया

अख़बार में इश्तिहार मिला जिस में दावा किया गया है श्री श्री आयुर्वेदा द्वारा नाड़ी परीक्षण और आयुर्वेद चिकित्सा "आर्ट ऑफ लिविंग " बैंगलोर आश्रम से प्रशिक्षित अमुक आयुर्वेदिक चिकत्स्क बिना किसी जांच मात्र दो मिंट में हर रोग का निदान और उपचार इक दवा की दुकान पर आकर करेंगे। इक विज्ञापन टीवी पर आता है बाबा रामदेव का फोटो दिखाते जिस में करोड़ों लोगों पर सफल प्रयोग करने और तमाम देसी जड़ी बूटियों को खोजने की बात की जाती है। बहुत महान कार्य कर रहे हैं ये सौंदर्य प्रसाधन बनाकर महिलाओं को खूबसूरत बनाने में सहयोग कर के। क्योंकि असली रोग तो सब पहले ही योग और दो घूंट पीने से ठीक हो गये हैं। रोज़ नया शोर सरकार का सुनाई देता है , स्वच्छता अभियान तीन साल में वास्तविकता तो कहीं नहीं दिखाई देती। और भ्र्ष्टाचार आज भी कोई सरकारी काम बिना सिफारिश या रिश्वत होता नहीं , कोई अधिकारी आज भी आम नागरिक की परेशानी समझता ही नहीं , आज भी अफ्सर चाटुकारिता कर तरक्की पाते हैं। हर विभाग और अधिक धन जनता से वसूल करने में लगा हुआ है। देश में आम जनता आज भी त्रस्त है बदहाल है और शासक जनता के खून पसीने की कमाई अपने ऐशो-आराम पर खर्च कर गर्व महसूस करते हैं। आम लोग हमेशा की तरह चढ़ते सूरज को प्रणाम करते हैं , बिना समझे कि वास्तव में उसने सत्ता पाकर किया क्या है। क्या देश की जनता की हालत सुधरी है , कोई सवाल नहीं करता , कोई सोचता तक नहीं। सब को अपने अपने अनुचित कार्य उचित लगते हैं , सब की कथनी और है करनी कुछ और। नियम कानून सही गलत और नैतिक अनैतिक की परवाह किसी को नहीं है। अपने आप को कोई नहीं देखता कि मैं जो कर रहा वो मेरा कर्तव्य है अधिकार है अथवा केवल स्वार्थ है। धर्म वाले उपदेश कुछ देते हैं खुद कुछ करते हैं। शिक्षा को भी लूट का धंधा बना लिया है और ज्ञान नहीं देते शिक्षा को बेचते हैं। बड़े बड़े अस्पताल स्वास्थ्य सेवा नहीं किसी भी तरह अधिक से अधिक धन कमाने में रोगियों का शोषण करते हैं अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हैं। हज़ारों रूपये के टेस्ट कमीशन की खातिर , बिना ज़रूरत दवायें लिखना , जो कभी नीम हकीम किया करते थे आज उच्च चिकिस्या की शिक्षा हासिल किये लोग उस से बढ़कर आपराधिक ढंग से उपचार के नाम पर करते हैं। लोग हर सरकार की तरह आज की सरकार की कमियों को नाकामियों को अनदेखा कर उस के प्रचार को सच समझ मानते हैं सब ठीक होने वाला है। नहीं हो रहा ये कहने का साहस कोई आम नागरिक क्या तथाकथित समाज का दर्पण कहलाने वाला मीडिया और साहित्य भी नहीं कर रहा। सब को अपने अपने हित की चिंता है , जब खुद ईमानदार नहीं हैं अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं तब दूसरे की कमी देख भी कैसे सकते हैं। हर तरफ हर कोई खुद को मसीहा साबित करने को व्याकुल है , मगर किसी की भलाई कोई नहीं करना चाहता। सब अपने पापों को पुण्य कहलाना चाहते हैं। झूठ आज का धर्म है आदर्श है ईमान है। झूठ की जयजयकार करना सभी की आदत बन चुकी है। सच की पहचान किसी को नहीं है , सच घायल हुआ कराहता रहता है , उसकी पुकार किसी को सुनाई नहीं देती है।

Thursday, 20 April 2017

अहंकार की लाल बत्ती ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

मुझे माता पिता ने दिया क्या था , ये तो मेरी समझदारी और मेहनत है जो आज मेरे पास सब कुछ है। आप को अजीब लगेगा मगर ऐसा सोचने वाले लोग बहुत हैं। उनको मालूम ही नहीं होता कि किन हालात में माता पिता ने उनकी परवरिश कैसे की। शायद उनकी छिपी मेहनत का फल है जो खुद उनको नहीं मिला आपको मिला है। पेड़ लगाने वाला खुद फल नहीं खाता कभी उसके फल कोई और खाता है। आज जो लोग शोर मचाते हैं केवल हम ही सब अच्छा करते हैं और अभी तक बाकी सब सिर्फ बुरा ही करते आये हैं उनको बताना होगा कि आज आप जिस जगह हैं शायद होते ही नहीं अगर आपसे पहले वालों ने ऐसा अवसर सब को मिल सके वो सब नहीं किया होता। किसी नेता या दल की सरकार अगर ये मानती है कि वही सब को सभी कुछ दे रही है तो इसको उनका अहंकार कहना होगा। क्योंकि कोई दल कोई नेता अपनी जेब से या अपनी जायदाद बेच कर जनता को कुछ नहीं देता है , बल्कि देश की जनता के धन पर शाही ढंग से रहता है। शासन करना देश सेवा नहीं होता , देश और जनता की सेवा तब होती जब आप सफेद हाथी की तरह देश के खज़ाने पर बोझ नहीं होते। इसलिए आप जैसी भी राजनीति करें ये दावा नहीं करें कि आप कोई त्याग जैसा महान कार्य करते हैं। पिछली सरकारों ने जो किया जनता जानती है , आप को उनके किये पापों का ही नहीं अपने कर्मों का भी हिसाब देखना है। अभी निर्णय किया गया लाल बत्ती हटाने का जो सही है मगर ऐसा करना ही काफी नहीं है। वास्तविक काम सत्ता की राजनीति नेताओं और प्रशासन की सोच और तौर तरीके बदलने का है। आप ख़ास क्यों हैं जब देश का संविधान सब को बराबरी का हक देता है। और लोकतंत्र का पहला नियम है कोई आपका विरोध कर सकता है , और सत्ता में होते उनके विरोध करने के अधिकार की रक्षा करना आपका फ़र्ज़ है। ऐसा शायद पहली बार आजकल दिखाई दिया है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सभा में जाने वालों की वेशभूषा पर ऐतराज़ किया जाये और काली कमीज़ काली स्वेटर क्या रुमाल और जुराब तक उतरवा दी जाये। पूरा बहुमत फिर भी इतना डर। केवल सड़क पर ही नहीं आपके वाहन पर लाल बत्ती होती है , आप दफ्तर में या जहां कहीं भी हैं आपको खुद को आम नागरिक से अधिक महत्व अपना नहीं समझना चाहिए। ये बात नेताओं अधिकारीयों पर ही नहीं और सब पर भी लागू होती है।
        मैं सब से बड़ा जानकर ज्ञानी , मैं सब से बड़ा गुरु , मैं सब से धनवान , मैं सब से बड़ा दानवीर , मैं सब से पवित्र आत्मा , मैं सब से अधिक देशभक्त और ईमानदार , बड़ा संत साधु सन्यासी , सब से काबिल डॉक्टर वकील या न्यायधीश आदि आदि। मैं मैं मैं। मैं आम आदमी हूं लिखने वाले तक की मानसिकता खुद को सब से ख़ास बताने की नज़र आती है। पत्रकार होना क्या है , आप का ख़ास दर्जा है , आपको सब ख़ास समझें यही चाहते हैं। प्रैस शब्द अपने वाहन पर लिखवाना किसी लाल बत्ती लगवाने जैसा ही है। इसी तरह लोग अपनी कार पर दल का प्रधान या कोई ओहदा लिखवा या सत्ताधारी दल का चिन्ह या झंडा लगा चाहते हैं उनको पुलिस या अन्य लोग विशेष समझें। वास्तव में ऐसा करने वाले लोग भीतर से खोखले होते हैं , जैसे किसी की खुद की कोई काबलियत या पहचान नहीं होती। हर किसी को बताता है मैं उसका बेटा या क्या क्या हूं। अहंकार बड़े होने की नहीं छोटे होने की निशानी है। असली महान लोगों को किसी तमगे लगाने की ज़रूरत होती ही नहीं है।

Wednesday, 19 April 2017

की उसने मेरे कत्ल के बाद कत्ल से तौबा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

पच्चीस साल बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने माना उन्होंने आपराधिक षड्यंत्र किया था। सत्तर साल उनको समझ आया लाल बत्ती कल्चर सही नहीं है। जो उनको चुनते वो लोग आम और विधायक सांसद मंत्री ख़ास भला क्यों हो सकते हैं। तो अभी तक आप अनुचित करते आये और आज अनुचित करना छोड़ रहे क्या इसको महान कार्य कहोगे। सवाल इतना भर नहीं है , सवाल ये है क्या भविष्य में आप खुद को वी आई पी और ख़ास समझना छोड़ दोगे। मगर इंसाफ की इक अदालत और भी है जहां कोई वकील आपको बचा नहीं सकता है। उस ऊपर वाली अदालत में फैसला देरी से नहीं होता , न ही ऐसा देखा जाता है कि आप अभी किसी संवैधानिक पद पर हैं इसलिए आप पर मुकदमा चल नहीं सकता। हैरानी की बात नहीं है क्या , कोई षड्यंत्रकारी किसी राज्य का राज्यपाल है।  नैतिकता की बात कौन करता है। जब ऊपरी अदालत में फैसला होगा तब भगवान राम भी सवाल करेंगे आपने मेरे नाम पर देश और संविधान की मर्यादा से खिलवाड़ किया और खुद को मेरे भक्त बताते हो। अपनी स्वार्थों की राजनीति में मुझे अपना मोहरा बना दिया किस से पूछ कर। कब किस को मैंने कहा था मेरे लिये कोई मंदिर बनाओ , राम राज्य का अर्थ सब को न्याय और जीने के अधिकार होता है न कि मंदिर बनाना। मुझे महलों से कभी प्यार नहीं रहा इतना तो जानते हो और मैं सत्ता का लालची भी नहीं सब को पता है। ये कैसी अजीब विडंबना है आप अनुचित करना छोड़ते हो या छोड़ने की बात करते हो तब भी ये स्वीकार नहीं करते कि अभी तक आपने जो किया वो गलत किया।
           उस ऊपरी अदालत में सब से हर बात का हिसाब मांगा जायेगा। आप तो डॉक्टर थे आपने अपना कर्तव्य निभाया रोगियों की सहायता करने का या किसी भी तरीके लूट खसूट से धन ऐंठते रहे। आप जो दवा बेचते थे ज़हर बांटते रहे जानबूझकर। और न्यायधीश जी आपको उम्र लग गई इतना तय करने में कि उन्होंने कोई धर्म का कार्य नहीं षड्यंत्र रचा। अभी भी भगवा भेस धारण किये कोई दावा करता है जो किया खुल्ल्म खुल्ला किया सब के सामने। भगवान से छुपकर कोई कुछ नहीं कर सकता , उसको जवाब देना जो किया तेरे नाम पर किया , गुनहगार तुम और कीचड़ के छींटे भगवान के सर पर।
            एक दिन की बात चली है किसी ने एक दिन का अवकाश रखने का सुझाव दिया है , एक दिन उनको भी राजपाठ को छोड़ चिंतन करना चाहिए आपको सत्ता मिली किस उदेश्य के लिए थी और आपने उसे किस स्वार्थ की खातिर उपयोग किया है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है , न हाथी है न घोड़ा है वहां पैदल ही जाना है। लाल बत्ती वहां काम नहीं आती न कोई पद किसी का कवच बनता है उसकी अदालत में।

हम होंगे कामयाब एक दिन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब , एक दिन।
कितना अच्छा लगता है , एक दिन सब अच्छा ही अच्छा होगा , जाने कब।
बस एक दिन सप्ताह में पेट्रोल पंप बंद रखो ईंधन की बचत होगी। बात मन की है। सलाह हो या सुझाव या फिर आदेश अथवा कानून सरकार का सर माथे। मालूम नहीं दिल्ली में ऑड इवन नंबर से नतीजा क्या निकला , फरमान था अमल किया सब ने। चलो इसे भी कर देखते हैं , एक दिन की ही तो बात है। हम मंगलवार शाकाहारी हो जाने वाले लोग हैं , एक दिन उपवास भी रख लिया करते हैं। ये दूसरी बात है कि इसी देश में करोड़ों लोग हर दिन भी इक समय उपवास करते हैं फिर भी प्रभु उनकी नहीं सुनता। मगर एक दिन और भी बहुत कुछ नहीं करने का सुझाव अपन आम लोग भी दे सकते हैं।
        हर रविवार को कोई नेता भाषण नहीं दे , कोई रैली रोड शो प्रदर्शन नहीं किया जाये। ध्वनि प्रदूषण से लेकर साम्प्रदायिकता का ज़हर तक घट सकता है , शांति रह सकती है देश भर में और बचत की बचत भी।
       हर रविवार अगर टीवी पर सरकारी विज्ञापन नहीं दिखलाये जायें न ही अख़बार में छपें तो जनता के धन का कितने करोड़ रूपये का फज़ूल खर्च कम हो जायेगा। मीडिया वाले भी भूखे नहीं मर जायेंगे।
    और अगर मीडिया वाले भी सप्ताह में एक दिन रविवार को केवल वास्तविक सच्ची खबरें ही दिखायें , कोई तमाशा नहीं , फालतू की बहस नहीं , खुद अपने आप का गुणगान नहीं। मगर पहले खबर किसे कहते हैं उस परिभाषा को तो पढ़ लें। वो सूचना जो कोई लोगों तक पहुंचने नहीं देना चाहता पत्रकार का कर्तव्य है उसका पता लगाना और उसको सार्वजनिक करना। जिस का खुद कोई शोर मचा रहा है उसको खबर नहीं कहते। फायदा होगा , सच सप्ताह में एक दिन खुल कर सांस ले पायेगा।
     पुलिस वाले , प्रशासन वाले , नेता लोग , वी आई पी समझे जाने वाले या कहलाने वाले , बड़े बड़े अभिनेता , खिलाड़ी , धनवान उद्योगपति , धर्म गुरु उपदेशक , सब को सादगी की बात समझाने वाले ,सप्ताह में एक दिन अपने सभी शाही ठाठ बाठ , शान-ओ -शौकत छोड़ आम नागरिक की तरह रहकर ये समझने का प्रयास करें कि देश में वास्तविक समानता के क्या मायने हैं। आप सोचोगे भला इस से क्या होगा , मुमकिन है कुछ लोगों को समझ आ सके कि उनकी शान-ओ -शौकत की कीमत कोई और चुकाता है। क्योंकि आपके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है इसीलिए करोड़ों के पास ज़रूरत लायक भी नहीं है।
       आखिर में इक शायर के लोकप्रिय शेर पर इक दूसरे शायर की ताज़मीने से :-
            ख्याल उसकी तरफ कब गया है मौसम का ,
           कभी जो पूछे सबब उस गरीब के ग़म का ,
          खुले भी राज़ तो फिर कैसे चश्मे-पुरनम का ,
         "चमन में कौन है पुरसाने-हाल शबनम का ,
             गरीब रोई तो गुंचों को भी हंसी आई "।
          (  चश्मे-पुरनम= अश्रुपूर्ण नेत्र।  पुरसाने-हाल=हाल पूछने वाला। ) 

Monday, 17 April 2017

लोक सेतिया केवल लोक सेतिया ही काफी है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

आपका नाम छापना है निमंत्रण पत्र पर , बड़ी विनम्रता से उन्होंने सवाल किया , थोड़ा बता दें क्या नाम छपवाना उचित रहेगा। थोड़ी हैरानी हुई , कहा महोदय आप इतने करीब से जानते हैं मुझे , भला आपको मेरा नाम याद नहीं। चलो कोई विशेष बात नहीं है , ये गलती मुझसे भी कभी कभी हो जाती है , कोई पहचाना हुआ मिलता है मगर तब भूल जाता हूं उसका नाम क्या है। आप मेरा नाम लोक सेतिया छपवा सकते हैं , यही मेरा नाम है। आप समझे नहीं , वो कुछ झिझकते हुए कहने लगे , ये तो अच्छी तरह पता है आप डॉ लोक सेतिया हैं , मगर सभी नाम से पहले कोई विशेषण अथवा अंत में कोई उपाधि लगाते हैं। आप क्या कहलाना पसंद करते हैं , लोग आपको क्या समझें। नाम तो हर आम आदमी का होता है विशिष्ट लोग खुद को साहित्यकार पत्रकार समाजसेवी वरिष्ठ नेता अथवा किसी धर्म या गुरु से जुड़ा कोई शब्द लगाकर नाम को ख़ास बनवा लिखते हैं। आप अभी सोच सकते हैं दो चार दिन बाद बताएं क्या उचित रहेगा। मुझे इक उलझन में डाल कर चले गये मित्र।
               मैं लोक सेतिया हूं मुझे यही मालूम है , मगर लोग मुझे क्या समझें ये मैंने कभी सोचा ही नहीं। जैसे किसी समारोह में देने को खूबसूरत स्मृति चिन्ह या ट्रॉफी बाज़ार से मिलती हैं उसी तरह कोई तो जगह होगी जहां अलग अलग नाम अपनी पहचान को परिभाषित करने को उपलब्ध होंगे। सब से पहले अपनी जानी पहचानी जगह चले गये उनके पास जो मेरी रचनाएं प्रकाशित करते हैं। उनसे मुझे प्रस्ताव मिला था कुछ दिन पहले पत्रकारिता और साहित्य को लेकर उनके साथ जुड़ काम करने का। मुझे अनुबंध में रहना पसंद नहीं इसलिए इंकार किया था ये साफ कर कि मुझे सब पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं छपवाना उचित लगता है और आपकी शर्त है किसी और को कभी अपनी रचना नहीं भेज सकता जो मेरे लिये कठिन है। मैं कई विधाओं में लिखता हूं और आपको मेरी केवल एक ही विधा की रचनाएं छापनी हैं। लेकिन उन से जब खुलकर बात हुई तो समझ आया उनके लिये सच मात्र इक साधन है कारोबार करने का।  उनको झूठ को सच बताकर बेचने या झूठ को सच साबित करने में कोई खराबी नहीं लगती , इसको प्रैक्टिकल होना मानते हैं। खरा सच बिकता ही नहीं आजकल उन्होंने समझाया , पीतल पर सोने की परत चढ़ाना ज़रूरी है। अच्छा हुआ जल्दी समझ आ गई बात और तय कर लिया खुद को ये नहीं होने देना है।
                                  इक संस्था बनी थी समाज की समस्याओं की बात को लेकर , समाजसेवा करनी है का दावा था। मगर चार दिन बाद सभा का मकसद प्रचार कर शोहरत हासिल कर प्रशासन पर अपना प्रभाव स्थापित करना ज़रूरी बताया गया। ताकि खुद कुछ नहीं करना सिवा मासिक बैठक में कोई प्रेस नोट जारी करने के प्रशासन से मांगना क्या क्या करे सरकार। मुझे लगा ऐसा तो मैं सालों से अकेला करता चला आ रहा ये कुछ ख़ास कैसे होगा , मगर तब कहा गया जब हम संगठन बनाकर एक साथ जाएंगे अधिकारी या नेता से मिलने तब वो हमें आदर सहित पास बिठा चाय ठंडा पिला हमारा रुतबा बड़ा करेंगे और कभी खुद हमारा कोई काम होगा तब ये जान पहचान ये संपर्क बड़े काम आएगा। तो ये समाजसेवा भी अपने मतलब से होगी , जब समझे तो अलग होना ही सही लगा। फिर इक लेखकों का संगठन भी मिला साहित्य की सेवा का दम भरने को , मगर वहां भी खुद से बड़ा कोई किसी को नहीं समझता मिला। सब को इक सीढ़ी की तरह संगठन को उपयोग करना उचित लगा। लिखना गौण हो गया और लेखक कहलाना महत्वपूर्ण। तालमेल नहीं बैठा अपना और समझ लिया साहित्यकार का तमगा किसी काम का नहीं है।
                  देशभक्ति और जनता की सेवा की बात करने वालों से भी मुलाकात हो गई इत्तेफ़ाक़ से , झंडा फहराना देश प्रेम के गीत गाना और भारतमाता की जय के उदघोष वाले नारे लगाना। करना क्या कोई नहीं बता पाया , बस खुद को देशभक्त कहलाना है। क्या देशप्रेम और देशभक्ति केवल प्रदर्शन या दिखावे की बात है। नहीं समझे इस से हासिल क्या होगा। धर्म वालों से भी मुलाकात हुई अक्सर , गुरु जी समझा रहे थे अधिक संचय मत करो और खुद आश्रम बनवा रहे थे जगह जगह। लाखों करोड़ों की ज़मीन जायदाद खुद की और प्रवचन दीन दुखियों की सेवा ही धर्म है वाला। मगर किसी गरीब की क्या मज़ाल जो उनके करीब भी आये , जो धनवान चढ़ावा चढ़ाते वही परमभक्त अनुयायी कहलाते हैं। किसी को समझा रहे थे कल मंच से मुझे एक सौ आठ नहीं एक हज़ार आठ बतलाना और मेरे नाम से पहले श्री श्री भी एक नहीं दो बार लगाना। अपना कद और ऊंचा करने में लगे हुए कोई बड़ा छोटा नहीं का उपदेश देते विचित्र लगे।
                   सब को पहाड़ पर चढ़ना है अपना कद बड़ा दिखलाना है। मुझे नहीं समझ आती ऐसी बातें। मैं कुछ नहीं हूं , समाजसेवी नहीं , पत्रकारनहीं , साहित्यकार नहीं  , देशभक्त होने का दावेदार नहीं , किसी धर्म का किसी गुरु जी का भक्त सेवक भी नहीं। मुझे लोक सेतिया ही रहने दो , यही रहना है मुझे कोई तमगा लगाना नहीं है।

Sunday, 16 April 2017

उनकी संवेदना उनका प्यार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

जनता बेचारी अबला नारी , नहीं समझी कभी क्यों हुई बलिहारी ,
जब जब जिस ने की प्रकट झूठी संवेदना उसकी दुर्दशा को देख ,
उसकी सेज सजा दी बिना जाने समझे गले में उसके माला डारी।
जिस जिस ने भोली भाली जनता से किया प्यार करने का वादा ,
उस उस को परमेश्वर समझ लिया कदमों में उसके समझा स्वर्ग ,
हर प्रेमी झूठा निकला बस उसका स्वामी बनकर लुत्फ़ उठाया।
नारी ही इक चाहत अपनापन और अपनी प्रशंसा सुन खुश होना ,
कितनी बार यही किया कितनी बार किस किस से धोखा खाया ,
सब उसी पर शासन करने आये नहीं किसी ने उसको रानी बनाया।
नेताओं की संवेदना होती है शिकसभाओं में दो पल का दिखावा ,
नहीं होता किसी को शोकसभा में किसी की मौत पर कोई दुःख ,
इक औपचरिकता निभाते हैं लोग बेदिली से होती है प्रार्थना भी।
तब भी हम ये झूठी रस्म निभाते चले जा रहे हैं बिना विचारे ,
ये सब तो हैं मझधार में जाकर साथ छोड़ने वाले नाम को अपने ,
नहीं मिला करती मंज़िल नहीं मिलते किनारे इनके सहारे।
हम फिर भी सुबह शाम उन्हीं की आरती हैं गाते फूल चढ़ाते ,
मतलबी लोग शासक बनकर नहीं कभी वादे किये निभाते ,
हम उनके झूठ पर कुर्बान जाते झूठ को सच वो बताते।
वो सब सुख देना वो सब कुछ तुम्हारा है की प्यारी बातें ,
मिला कभी नहीं कुछ जागते हुए काटी हैं हमने रातें ,
दिया कुछ नहीं सिवा कहने को प्यार संवेदना की बातें।

लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम ( आज के वक़्त की सरकार के नाम आखिरी खत ) डॉ लोक सेतिया

चालीस साल से अधिक समय हो गया है मुझे जनहित के पत्र लिखते लिखते। बेशक किसी भी सरकार से मेरी आशायें नेताओं और प्रशासन के संवेदनशील और वास्तविक लोकतांत्रिक होने की पूरी नहीं हुई हों , इंदिरा गांधी से लेकर सभी बदलती सरकारों में , जिन में वाजपेयी जी की भी सरकार शामिल रही है , और मनमोहन सिंह जी की केंद्र की और हरियाणा में भुपिंदर हुड्डा जी की सरकार तक। फिर भी शायद इक उम्मीद बची हुई थी कि किसी दिन मैं अपने जीवन में वो बदलाव देख सकूंगा जो मेरा ख्वाब है। कभी कोई नेता आयेगा जो खुद राजसी शान से रहना अपराध समझेगा जब देश की वास्तविक मालिक जनता गरीबी और भूख में जीती है। मगर आपके नित नये नये झूठे प्रचार के शोर में हर तरफ जब बस एक ही नाम का शोर है तब ऐसे सत्ता के होते विस्तार के जश्न भरे माहौल में भला किसी मज़लूम की आह या चीख किसी को सुनाई देगी। आपका सारा संवाद एकतरफा है मन की बात से तमाम तथाकथित ऐप्स तक की बात। तीन साल में आपको पी एम ओ ऑफिस में देश के भ्र्ष्टाचार और आपकी सभी योजनाओं की असलियत तक की जानकारी भेजी पत्र द्वारा। और आपके सभी दावे शत प्रतिशत झूठे साबित हुए। आपका स्वच्छ भारत अभियान और खुले में शौच मुक्त का दावा इस कदर कागज़ी और झूठा सब को नज़र आता है अपने आस पास। सब से अनुचित बात आपको कभी लगा ही नहीं कि प्रशासन को उत्तरदायी बनाया जाये उनका तौर तरीका बदला जाये। जो पहले मुख्यमंत्री हुए उन्होंने भी हर अफ्सर को यही निर्देश दिया था कि उनके दल के कार्यकर्ता की हर बात मानी जानी चाहिए। ये कैसा लोकतंत्र है , दल की सरकार का अर्थ क्या हर तथाकथित नेता का शासक होना है। संविधानेतर सत्ता जितनी आज है कभी नहीं रही। खेद इस बात का भी है कि पहले मीडिया का कुछ हिस्सा सत्ता के हाथ की कठपुतली बनता था आज सभी बिक चुके लगते हैं। जिस तरह हर राज्य में मनोनयन से मुख्यमंत्री बनाये जा रहे हैं उस से तानाशाही का खतरा साफ मंडरा रहा है। आज तक जितनी भी सरकारें आईं उन्होंने कभी भी सच बोलने वालों को इस कदर प्रताड़ित नहीं किया जितना भाजपा के शासन में जनहित की बात करने पर मुझे झेलना पड़ा है। सी एम विंडो की बात छोड़ो प्रधानमंत्री जी से जनहित की शिकायत भी बेअसर है। आपके ऑफिस में लिखे किसी पत्र का को उत्तर नहीं मिला न कोई प्रभाव। आपके मीडिया में खुद के सोशल मीडिया पर महानता के चर्चे बस आपकी इकतरफा बात है। सौ पचास की भलाई की बात को अपने प्रचार में बताते क्या कभी बताया कितने लाख या शायद करोड़ की अर्ज़ियाँ रद्दी की टोकरी में फैंक दी। हो सकता है आपकी लोकप्रियता चरम पर हो और तमाम लोग आपके नाम का गुणगान करते हों मगर मैं आपकी केंद्र की सरकार और हरियाणा में राज्य की सरकार से इस कदर निराश हो चुका हूं कि भविष्य में जनहित की बात सरकार प्रशासन या नेताओं को लिखना ही छोड़ रहा हूं। शायद आप सभी के लिए ये राहत की बात होगी कि मुझ जैसे लोग तंग आकर खामोश हो जायें।
                    लो आज हमने छोड़ दिया रिश्ता ऐ उम्मीद ,
                   लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम।

कौन कौन है सच का कातिल ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज इक फिल्म देखी जिस ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। नायक नायिका दोनों की आंखें नहीं हैं , खलनायक नायिका से अनाचार करते हैं और जिनको अपराधी को पकड़ना है वही शिकायत करने वालों को अपमानित और प्रताड़ित करते हैं। नायिका ख़ुदकुशी कर लेती है और नायक बाद में बदला लेता है खुद अपराधियों को सज़ा देता है। मुझे तभी कुछ लोग याद आये जो यही करते हैं , सी एम विंडो हरियाणा की शिकायत की जगह से पुलिस प्रशासन विभाग के अधिकारी से विभाग के बड़े ऑफिस तक सभी। उपयुक्त को महीनों अपना कर्तव्य याद नहीं रहता , विभाग इक जूनियर इंजीनियर को बार बार पत्र भेजता जिसकी प्रति शिकायत करने वाले को मिलती रहती साल तक। फिर कभी शिकायत निपटा देने कभी करवाई की बात का एस एम एस भेजते इक साथ। ये जानते हैं कि जो कर रहे उसका अर्थ अनुचित कार्य करने वालों का पक्ष लेना और जनहित की बात करने वाले को प्रताड़ित करना है। इस तरह ये तथाकथित देशभक्त जनता के सेवक सच को अपराध बना देते हैं और जो सरकार को अवैध कार्यों की जानकारी दे उसको खलनायक बनाना चाहते हैं। कोई विवेक कोई अंतरात्मा इनको झकझोरती नहीं है , इनको पता है फिल्म की तरह वास्तविक जीवन में कोई अपराधियों से खुद नहीं लड़ सकता , न ही इनकी अकर्मण्यता को साबित किया जा सकता है। पर शायद किसी दिन ऊपरवाला इनका इंसाफ करेगा , क्योंकि इनकी मर्ज़ी से किसी की शिकायत जब चाहे बिना कुछ किये बंद की जा सकती है , और उसके बाद बड़े अधिकारी से मिलने वाले पत्रों को जिन में ये बताने को लिखा होता है कि अभी आपने भेजा नहीं क्या किया , जवाब बिना दिये फैंका जा सकता है , मगर भगवान की फाइल खुली हुई है और उसको ये बंद नहीं कर सकते। हां इन्होंने प्रशासन और अधिकारीयों पर से , न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा खत्म कर दिया है। जो एक बार इनकी असिलयत देख लेगा वो दोबारा कोई जनहित की अथवा देश की व्यवस्था की बदहाली की शिकायत कभी नहीं करेगा। ऐसे लोगों ने कितने अपराधियों को बचाया और कितने बेगुनाहों को अपमानित व प्रताड़ित किया इक दिन तो हिसाब होगा ही।

Monday, 10 April 2017

स्वच्छ भारत , स्वच्छ हरियाणा , स्वच्छ फतेहाबाद शहर ( डेढ साल बाद वही तस्वीर ) डॉ लोक सेतिया

2 7 नवंबर 2 0 1 5 को आखिर मैंने भी मुख्यमंत्री को शिकायत का पत्र लिख दिया। और साल तक वो शिकायत भटकती रही दफ्तर दफ्तर। साल पहले की ली कुछ तस्वीरें ये हैं।



ये सभी अधिकारीयों को अख़बार वालों को भेजता रहा।
सरकारी विज्ञापन छापने वालों को भला ये कैसे दिखाई देता।
मालूम नहीं किस तरह मेरी शिकायत को साल बाद दाखिल दफ्तर का दिया गया।
पिछले महीने खबर छपी उपयुक्त को शहर को स्व्च्छ आवारा पशु मुक्त और खुले में शौच मुक्त कराने पर इनाम पुरुस्कार मिला। तब की ताज़ा तस्वीरें ये भेजी मैंने सभी को।




मगर ये भी किसी को दिखाई नहीं दिया। कागज़ों पर सभी योजनायें हर सरकार की तरह।
दो दिन पहले फतेहाबाद के विधायक का फोन नंबर मिल गया और उनको फोन कर सब असलियत बताई।
उस दिन 9 अप्रैल की भी तस्वीरें ले लीं उनको दिखाने को जो ये हैं।
कल 1 0 अप्रैल को जब विधायक जी को शिकायत का पत्र देने जाने लगा तब जो देखा सामने उसकी भी तस्वीर ले जाना उचित लगा और ये कल सुबह दस बजे की तस्वीर भी फोन में ले ली। जिस में नगरपरिषद वाले कूड़ा ट्रॉली में भर रहे और आधा वहीं आग लगा जला भी रहे थे।
दस बजे मैं विधायक जी के ऑफिस पहुंचा और शिकायत का पत्र दिया , बहुत आदर से पास बिठाया और चाय को पूछा। मैंने उनको पत्र दिया जिस को उन्होंने रख लिया , कहने लगे आप गंदगी से परेशान हैं। मैंने कहा नहीं मैं प्रशासन के तौर तरीकों से झूठ से और जनता की समस्याओं से परेशान हूं। चालीस साल से जनहित की बात लिख रहा मगर किसी शासक किसी अधिकारी पर कोई बदलाव दिखता नहीं। सब को अपना प्रचारित झूठ सच और जनता की असलियत झूठ लगती है। खैर उन्होंने फोन किया बिना अर्ज़ी को पढ़े ही नगरपरिषद प्रधान को कुछ इस तरह। " भाई ये डॉ साहब मेरे  पास बैठे हैं शिकायत कर रहे , आपका अपना वार्ड है मॉडल टाउन देखो "। कुछ समझे , जैसे उनको समस्या और इतने अरसे तक बदहाली की फ़िक्र नहीं , उनको तो विवश होकर फोन करना पड़ा जब कोई आया है। वास्तव में उनका ध्यान दो भगवा वेश धारी साधुओं की तरफ था जिनको वो पांच सौ रूपये दान देकर कोई पंचमुखी रुद्राक्ष ले रहे थे और उन से मंत्री बनाने को उनकी खातिर जप करने को कह रहे थे। शायद विपक्ष के विधायक को उनकी पूजा और आशिर्वाद ही मंत्री बनवा सकता है। अब जो खुद औरों से खुद अपने लिये सहायता चाहता हो मुझे उस से सहायता क्या मांगनी थी , मुझे तो उनको उनका कर्तव्य याद दिलाना था , कि आपका फ़र्ज़ है जनता की दशा देखना। मैंने उन्हें सब बताया भी दिखलाया भी आगे उनको मर्ज़ी है।