Saturday, 28 November 2020

जनसेवकों के लिए न्यूनतम समर्थन वेतन तय हो ( बात लाख टके की ) डॉ लोक सेतिया

  जनसेवकों के लिए न्यूनतम समर्थन वेतन तय हो ( बात लाख टके की )

                                            डॉ लोक सेतिया 

सबसे पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य का मकसद समझते हैं। किसान को समझाया जाता रहा है कि आपको अनाज पैदा करना है मगर क्योंकि हर किसी को पेट भरना है इसलिए पैदावार की कीमत सरकार तय करेगी जो सरकारी हिसाब से फसल की लागत और खेती करने वालों की महनत मज़दूरी उतनी जितने में महनतकश का गुज़र बसर हो जाये ज़रूरी है। किसान की खेती कोई मुनाफ़े कमाने का कारोबार नहीं है देश की सेवा है। सरहद पर देश की रक्षा करने को भी किसान के बेटे बेटियां काम आते हैं। राजनीती करने वाले झूठे मक्कार लोगों और पढ़ लिखकर कर शासन का अंग बन चुके शिक्षित वर्ग और किसी तरह से धनवान बन गए उच्च वर्ग को जीने को तमाम सुख सुविधाएं और अधिकार छीनने की छूट कानूनी है। किसी भी अन्य कारोबारी पर लागत मूल्य से कितना अधिक मुनाफा लेना उचित है ऐसा नियम कभी नहीं मनवाया जा सकता है। ये सभी देश सेवा देशभक्ति पर भाषण देते हैं देश समाज को देते नहीं कुछ भी अपनी तथाकथित सेवाओं की मुंहमांगी कीमत बढ़ा चढ़ा कर खुद रखने का हक रखते हैं। संसद और संविधान इनके हाथ में बंदर के हाथ तलवार की तरह से खतरनाक हथियार है जिस का उपयोग कर उन्होंने तमाम तौर तरीके अपनाकर रिश्वत को कोई और भला सा नाम दे दिया है। विधायक सांसद की निधि इसकी मिसाल है जिसको शुरू ही राजनितिक स्वार्थ हासिल करने के लिए किया गया था। जनता की सेवा के नाम पर लाखों करोड़ की राशि उनकी मौज मस्ती और शाही रहन सहन पर बर्बाद कर देश की आज़ादी और संविधान के सबको समान अधिकार न्याय देने की अवधारणा को दरकिनार किया गया है। 
 
ये नौकर हैं मगर मालिक पर शासन करते हैं जनता वास्तविक मालिक होकर भिखारी की तरह हाथ पसारे खड़े होने को विवश है। किसी भी राजनैतिक दल ने कभी देश के नागरिक के लिए जीने की बुनियादी ज़रूरतों को अधिकार समझ कर पहले उनको उपलब्ध करवाने की समय सीमा नहीं तय की है। उनके आलिशान दफ्तर मूर्तियां मरने के बाद समाधिस्थल तक ज़रूरी हैं और ये सब पलक झपकते हो जाता है। नेताओं की रैलियां सभाएं और अधिकारी वर्ग की मौज मस्ती देश विदेश सैर सपाटे उनके अधिकार तो हैं बस उनको जनता देश की समस्याओं का समाधान करना है ये फ़र्ज़ बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं है। खाने को हलवा पूरी और काम करने को कोई पूछने वाला नहीं कि आपको जो करना था किया क्यों नहीं। किसान समर्थन मूल्य की बात करते हैं जबकि वास्तव में उनको अपनी पैदावार का उचित मूल्य उसी तरह मिलना चाहिए जिस तरह से बाज़ार में अन्य उत्पादों की कीमत समय के साथ बढ़ती है और सरकारी कर्मचारी अधिकारी का वेतन भत्ते बढ़ते हैं।
 
   किसानों को दिल्ली आने से रोकना सत्ता का अनुचित इस्तेमाल कर तमाम तरह से , उनको अपनी बात दिल्ली की बहरी सरकार को सुनाना कोई अनुचित कार्य नहीं है जिसके लिए आंसू गैस और सर्दी में ठंडे पानी की बौछारों से जैसे अमानवीय कदम उठाये जाने चाहिएं थे। देश भर के लोगों का पेट भरने को अनाज पैदा करने वाले अन्नदाता को कोई इस ढंग से अपमानित नहीं कर सकता है। ये तो बेशर्मी की हद है कि सत्ता पर बैठा कोई खुद को जनता का सेवक कहने वाला किसान को मिलने को निर्देश देकर कहे कि अभी जाओ वापस और तीन दिसंबर को आने को बुलावा मिला है तब दिल्ली आना। उनका अधिकार है किसानों के लिए बनाये कानूनों पर आंदोलन करना विरोध जताना। शायद दिल्ली में सत्ता के गलियारों में बसने वालों को देश की वास्तविकता का पता नहीं है कि भारत गांव खेत खलियान में बसता है महानगर के आलिशान भवनों में नहीं और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति के उतार चढ़ाव और इतिहास बनाने बदलने की बुनियाद वहीं पर है। जिन ऊंचे महलों में बड़े बड़े लोग राजसी शान से रहते हैं उनका निर्माण गांव के ही किसान मज़दूर के खून पसीने से करते रहे हैं। ये महनतकश लोग जिस दिन अपना हिस्सा मांगेंगे सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों ही नहीं तमाम धनवान और तथाकथित ख़ास वर्ग वालों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाएगी। 
 
    अब नयी बात सामने आई है शर्त रखी गई है कि पहले जिस जगह सरकारी फरमान है किसान वहां जाकर जैसे पुलिस कहती है उस ढंग से आंदोलन करें तभी उनसे चर्चा होगी। कहा कुछ जाता है इरादा कुछ और होता है ये आपसी सहमति नहीं चालाकी से किसी को अपने बिछाए जाल में फंसाने की साज़िश लगती है। शायद इस देश की भोली भाली जनता के संयम को आज़माने की कोई सीमा बाकी रही नहीं है। विदेशी शासक भी कहते कि जिनको आज़ादी चाहिए उनकी इजाज़त से आंदोलन कर सकते हैं तब क्या आज़ादी के दीवाने मंज़ूर कर लेते और क्या ऐसा होता तो देश कभी आज़ाद होता ही नहीं। बस बहुत सत्ता की चोरी और सीनाज़ोरी हो चुकी है। अब देश की मालिक जनता वंचित लोगों का बहुमत जो तीन चौथाई जनसंख्या है उनको खैरात नहीं अपने अधिकार मांगकर नहीं छीनकर लेने होंगे। और समर्थन मूल्य की तरह देश सेवा को निर्वाचित सांसदों विधायकों और शासन की देखभाल करने वाले सरकारी अमले को वेतन सुविधाएं सिमित करनी होगी। देश के नागरिक देश हैं मुट्ठी भर ख़ास वर्ग देश नहीं हो सकता है।

Wednesday, 25 November 2020

इक भगवान की इक सोशल मीडिया की दुनिया ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

    इक भगवान की इक सोशल मीडिया की दुनिया ( आठवां सुर ) 

                                      डॉ लोक सेतिया 

हाहाकार मचा हुआ है ऐसे में भी कुछ लोग कोरोना की परवाह नहीं करते समझाने वाले बहुत हैं मगर उनको अपने मन की करनी पसंद है नारद मुनि जी भी मनमानी करते हैं ईश्वर ने अनुमति नहीं दी जाने से रोका भी नहीं समझाया अवश्व। कहा अभी कोई आवश्यकता नहीं है धरती पर जाना अब सुरक्षित नहीं है हर कोई मास्क उपयोग करता है नकाब की तरह जब जहां जैसे ढकना या दिखना होता है चेहरे की असलियत को कभी लगाते कभी भूल जाते सुविधा अनुसार। नारद मुनि को टिक कर रहना मंज़ूर नहीं रहा है। नारद जी आधुनिक युग की चीज़ों को पहले से जानते थे मगर बदले समय में देखने पर पता चला स्मार्ट फोन का महत्व इतना अधिक बढ़ गया है कि केवल उसी से संसार की हर गतिविधि चलती है और इक स्मार्ट फोन हर किसी को घर बैठे जो भी चाहे करने की सुविधा दे सकता है। दफ्तर स्कूल बाज़ार दोस्तों रिश्तेदारों से ख़ुशी और ग़म बांटना हर काम उसी से चलता है किताब अख़बार टीवी सरकार सभी आपकी जेब में हैं बस इंटरनेट होना चाहिए। चार घड़ी बाद नारदजी वापस ठिकाने पर चले आये स्मार्ट फोन हाथ में मीणा की जगह उसकी आवाज़ गूंजती हुई। 
 
सभी देवी देवता उनकी वाणी सुनने को पास चले आये ईश्वर खुद अपने सिंहासन से खड़े हुए नमस्कार अभिवादन आदान प्रदान हुआ और अचरज से देखने लगे। संकेत साफ था नारदजी को अपनी कथा सुनानी थी हर कोई सुनने को व्याकुल था। नारदजी कहने लगे ये अध्याय ईश्वर विधि के रचे विधान में नहीं मिलेगा ये भगवान की बनाई दुनिया से अलग इक और ही संसार है जिसका कोई आर पार कोई सीमा कोई ऊंचाई कोई गहराई का अता पता चलता नहीं है जितना आगे जाओ और अधिक विस्तार होता जाता है उसको सोशल मीडिया की दुनिया कहा जाता है। ईश्वर अल्लाह जीसस वाहेगुरु सभी सोशल मीडिया में समाये हुए हैं कुल डेटा का बेहद छोटा सा हिस्सा सागर में कतरे की तरह। धरती पर जिस दुनिया को मैंने देखा वहां ठहरना मेरे लिए असंभव लगा और मैं बड़ा बेचैन होकर आपके पास चला आया। चार घड़ी में जितना देखा चार युग बीतने पर शायद कभी नहीं दिखाई दिया होगा मुझे इस से पहले। 
 
कोई घर था जिसका मालिक कौन है नज़र नहीं आता मगर उसके आदेश उसके बदलते नियम और पल पल बदलती बिगड़ती उसकी मर्ज़ी की सोच घर में टिकने को हर सदस्य को सूली पर लटकती तलवार के नीचे खुद अपना सर रखने को विवश करती है। परमात्मा की सत्ता को चुनौती दे सकते हैं बिगबॉस को कोई चुनौती नहीं दे सकता है। खेल कितने हैं खिलाड़ी कितने हैं लोग खतरों के खिलाड़ी से अधिक करोड़पति कौन बनेगा खेल खिलवाने वाले को चाहते हैं ऐसा टीवी देखने पर मालूम होता है। ज़िंदगी 15 सवाल का जवाब एक करोड़ 16 वें जैकपॉट सवाल का सात करोड़ को देने से सफल होती है जिस में इक दो नहीं चार चार सहायता के विकल्प भी मिलते हैं। भगवान तेरा ही सहारा है अब इस से बात बनती नहीं है। कोरोना नाम का दैत्य विश्व भर को भयभीत किये है मगर राजनेताओं देशों की सरकारों टीवी चैनल वालों और झूठ का बाज़ार जो लोग हैं जिनको मानव जीवन संवेदना से अधिक महत्वपूर्ण अपने अपने स्वार्थ लगते हैं ऐसे सभी लोग रत्ती भर भी चिंता नहीं करते हैं। पुलिस सरकारी व्यवस्था न्यायपालिका समझते हैं कोरोना उनके सामने घुटने टेकेगा ही इक दिन। बस इक बार कोरोना की वैक्सीन सफल होने का इंतज़ार है उस के बाद मौत को जीतने की जंग शुरू होनी पहला मकसद होगा। कोई किसी भी तरह से मरेगा ही नहीं भगवान की बनाई व्यवस्था नाकाम हो जाएगी। लोग ज़िंदा रहेंगे या मरेंगे ये खुद उनकी मर्ज़ी से होगा जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली बात होगी। 
 
इतनी बात सुनते ही देवी देवताओं को पसीने छूटने लगे जब विधाता की ही कोई अहमियत बचेगी नहीं तब उनके विभाग के होने नहीं होने का कोई अर्थ बचेगा कैसे। ये समझते ही नारदजी ने चुप्पी साध ली और ऊपर ईश्वर को समस्या पर निर्णय देने हाथ खड़े कर निवेदन कर बैठ गए। ईश्वर को अपनी सत्ता और पद से अधिक अपने द्वारा नियुक्त देवी देवताओं की चिंता को समझते हुए अपनी ख़ामोशी भंग कर सच सच बताना ज़रूरी लगा। बोले कितनी सदियां आपने व्यर्थ अपने गुणगान अपने अपने भक्तजन अपने अपने धार्मिक स्थल निर्मित होने देने पर बर्बाद की हैं जो कार्य आपको सौंपा गया उसको भूलकर धरती की सरकारों अधिकारियों विभागों की तरह ताकत शोहरत और अधिकार सुख सुविधा चढ़ावे की चाह में लगे रहे। उनकी तरह आपकी उपयोगिकता मेरी भगवान होने की ज़रूरत को औपचारिकता बनवा दिया। दिखाने को सभी नतीजा किसी के होने नहीं होने से कुछ फर्क ही नहीं। आपको जो लगता है ये सोशल मीडिया वाली दुनिया बड़ी और लाजवाब है बहुत जल्दी ही उसका भी अंजाम हम और आप से भी खराब होने वाला है। 
 
ये एक काल से दूसरे काल में होने वाले बदलाव का समय है। जैसे लोग मनघड़ंत कथाओं कहानियों को तर्क की कसौटी पर परखने लगे हैं और हम सभी की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं उसी तरह स्मार्ट फोन के बुने जाल और सोशल मीडिया के रचे चक्रव्यूह को लांघकर निकल जाएंगे लोग। विवेकशील शिक्षित समाज खुद इंसान और इंसानियत की खातिर इक वास्तविक समाजिक सभ्यता और मानवधर्म को आधार बनाने वाली व्यवस्था स्थापित करने में कामयाब हो जाएगा। आखिर आदर्श समाज समानता और न्यायपूर्ण मानवीय संवेदना को समझने वाला बन जाएगा , तब आपकी मेरी तथाकथित बड़े बड़े सत्ताधारी नेताओं , धनवान लोगों , उपदेशक समझदारी के ठेकेदार लोगों की कोई जगह बचेगी ही नहीं। आदमी अपनी खुद इक अच्छी दुनिया बना लेगा यही आदमी की पहचान है और ताकत भी।

Monday, 23 November 2020

उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      उपन्यास क्या लघुकथा तो होती ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 सुबह भाषण दे रहे थे सरकार जनाब उनकी सरकार ने कमाल कर दिया है। ख़ास लोगों के रहने को ऊंचे ऊंचे महल बनवा दिए हैं। और कई नाम वाले भवन बनवा दिए हैं जाने किस किस को मरने के बाद कितना कुछ दिया है जो उनको जीते हुए शायद नहीं मिला शायद सोचा नहीं चाहा नहीं। बाद मरने के कितना कुछ उनके नाम है। ये खबर उस वास्तविक हालात को ढकने में सफल होती नहीं कि आज भी जीने की सुविधा का अभाव है लोग स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली से परेशान हैं सही समय पर ईलाज मिलता नहीं देश अंतरिक्ष में पहुंच गया धरती पर जीने की चाहत किसलिए। बड़े बड़े लोग आसमान में उड़ते हैं छोटी छोटी बातें गरीबी भूख शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य सेवाओं की समाज में होता भेदभाव अन्याय असमानता और बढ़ती खाई अमीर गरीब की बीच की ये व्यर्थ की चिंता करने को फुर्सत नहीं है। आंकड़े भर हैं देश के सामन्य नागरिक सरकारी कागज़ पर लिखने को ज़रूरत हो तभी उपयोग किया जाता है। कोई रात को टीवी शो पर करोड़पति खेलने वालों को नया इतिहास बनाने का कीर्तिमान बना रहे हैं ऐसा घोषित कर रहा था और हर खिलाड़ी को वही जाने क्या क्या नज़र आ रहा था। मुझे कोई समझा रहा था जो झूठ को सच बतला रहा था उसका झूठ सारा का सारा बिक गया था झूठ का धंधा चलता जा रहा था। कोई हंसी हंसी में आपको रुला रहा था किसी महानगरी में ज़हर हर किसी को भा रहा था नशा बढ़ रहा था नशा सा छा रहा था। सुनसान अंधेरी रातों में कोई बंद कमरे में गीत गाकर पुरानी यादों को दोहरा रहा था खुद अपने अश्कों से लगी आग दिल की बुझा रहा था। 
 
कोरा कागज़ रद्दी बन गया है कीबोर्ड पर उंगली चला रहा हूं खुद लिख रहा खुद पढ़ता रहता हूं कौन पढ़ता है किसको पढ़वा रहा हूं। सच की कीमत कुछ भी नहीं है सच अनमोल है सोचकर खुद को बहला रहा हूं। झूठ वाले बाज़ार में खड़ा कबीर कबीर चिल्ला रहा हूं। ख़याली पुलाव बनाकर भरपेट मज़े से खा रहा हूं फ़ाक़ामस्ती फ़कीरी मौज जैसे शब्द रखे हैं समझ नहीं आता ये उलझन क्या है जिसे सुलझा रहा हूं। खुद अपनी अर्थी उठाये चलता जा रहा हर कोई यहां पर नहीं जानते लोग मंज़िल किधर है कौन हमराह रहबर कौन रहजन किसे कहें सोचना है ठहरकर। गुबार छाया हुआ आस्मां में धुंवां ही धुंवां है सूरज किसी और पर मेहरबां है उजाले हैं रातों को और हैं दिन काले नसीब अपना अपना कहीं रेशमी कालीन कहीं पांव पर छाले ही छाले। सदा सुन रहा है ओ ऊपरवाले रहम कभी बदनसीबों पे भी खा ले नहीं ज़िंदगी देता मत दे उठाले पास अपने बुलाले। 
 
बहुत यादें सताने लगी हैं बता दो कैसे उनको भुलाएं सभी अजबनी लोग नहीं अपना कोई आएगा कौन इधर किसको बुलाएं। फिर अपनी ग़ज़ल पहली इक बार दोहराएं , हम अपनी दास्तां किसको सुनाएं , कि अपना मेहरबां किसको बनाएं। ग़ज़ल अगली को लिखकर मिटाएं , नया दोस्त फिर से कोई अब बनाएं , नया ज़ख़्म सीने पर इक और खाएं। ये अगली ग़ज़ल कौन समझेगा , नहीं किसी ने कभी किसी काबिल समझा पागल सबने समझा साईल नहीं समझा। ये ग़ज़ल जाने कैसे कही थी रिमझिम रिमझिम क्या हुई कभी थी नहीं याद आई कभी वो घड़ी थी , भीगा सा मौसम हो और हम हों , भूला हुआ हर ग़म हो और हम हों। हैरानी की बात है कोई नहीं था कोई तसव्वुर में भी नहीं मिला था प्यार इश्क़ मुहब्बत अपनी ज़िंदगी की किताब में ये सबक आया ही नहीं कभी। खुद ही अपने साथ हमने मुहब्बत काश की होती किसी दिन अकेले अकेले सफर तय किया है। ये क्या कह दिया ये क्योंकर लिखा है ये मेरी ज़िंदगी की किताब क्या बस खाली सफ़ा है हर पन्ने पर लगा कोई हाशिया है नहीं लफ़्ज़ कोई किसी ने लिखा है। ये लगता है मैला सा जो इक धब्बा हर जगह है ढलका कोई आंसू इक इक पन्ने पर गिरा है। सोचते रह गए भूल गई लिखनी थी जो कहानी कहां खो गया राजा खो गई उसकी रानी। मुझे काश मिलती बचपन में सबको मिलती जैसे इक दादी इक नानी। मेरी प्यास बुझाता नहीं दरिया का पानी कोई कतरा करता नहीं मेहरबानी। जीवनी उपन्यास नहीं बन पाई लघुकथा तो बन सकती थी , ये भी नहीं हुआ।

Sunday, 22 November 2020

आपको कब किस पैथी से ईलाज करवाना चाहिए ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       आपको कब किस पैथी से ईलाज करवाना चाहिए ( आलेख ) 

                                       डॉ लोक सेतिया 

सबसे पहले ये बताना ज़रूरी है कि मैंने जी ए एम एस ( आयुर्वेदाचार्य ) कोर्स पांच साल का किया था 1973 वर्ष में जो अलोपैथी और आयुर्वेद दोनों की शिक्षा का इंटीग्रेटेड सिस्टम का डिग्री कोर्स हुआ करता था। मैंने 45 साल तक निजी क्लिनिक में स्वास्थ्य सेवा देने का कार्य किया है शुरुआत में दोनों पैथी से उपचार किया मगर पिछले दस साल से मुख्यता आयुर्वेद का उपयोग किया है। मैंने आयुर्वेद की जानकारी को लेकर पहले कई बार पोस्ट लिखी हैं मगर मेरी कोई निर्धारित धारणा अथवा निहित स्वार्थ नहीं रहा है मकसद रोगी को उचित सलाह देना रहा है। अपने लेखों में मैंने सोशल मीडिया अख़बार इश्तिहार टीवी विज्ञापन और किसी के हज़ारों की भीड़ भरी सभाओं में देसी अथवा आयुर्वेदिक उपचार करने की अनुचित बातों का विरोध किया है और ऐसा करने वालों को आयुर्वेद का शुभचिंतक नहीं उसका दुश्मन कहा है। वास्तव में आयुर्वेद या अन्य पैथी एलोपैथिक होम्योपैथिक सिद्ध एवं यूनानी पद्धति कोई मुनाफ़ा कमाने का व्यवसाय नहीं होकर समाज को स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाना मुख्य मकसद था और होना चाहिए। 
 
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि हमने पुरानी सभी पैथियों को कितने सालों तक कोई महत्व नहीं देकर बड़ी भूल की है जबकि आधुनिक अलोपैथी को बदलते समय के साथ और अच्छा और उपयोगी बनाने का काम किया है। रोग की जांच से उपचार और दवाओं के शोध अदि से स्वास्थ्य सेवाओं को गंभीर रोगों का ईलाज सफलता पूर्वक करने का लाजवाब काम किया है। ऐसा आयुर्वेद या बाकी पैथी पर ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि सरकार देश या राज्य की का स्वास्थ्य सेवाओं का करीब करीब पूरा बजट अलोपथी पर खर्च किया जाता रहा है। लेकिन इधर आजकल सरकार और लोगों का ध्यान आयुर्वेद की तरफ होने लगा है ये समझ कर कुछ लोगों ने आयुर्वेद को ईलाज दवा रोग जांच अदि की समझ या चिंता परवाह छोड़ अवसर का फायदा उठाने को अनुचित ढंग से उपयोग करना शुरू कर दिया है। बगैर शोध या सबूत झूठे दावे कर घटिया स्तर की दवाओं का सामान की तरह उपयोग करने का चलन शुरू कर लोगों को गुमराह करना शुरू किया है। 
 
आपको सावधान रहना चाहिए क्योंकि जब आपकी ज़िंदगी का स्वास्थ्य रहने का सवाल हो तब आपको सबसे अच्छे और कारगर उपचार को अपनाना चाहिए। जो भी आपको हृदय रोग उच्च रक्तचाप कैंसर मधुमेह जैसे रोगों या चर्बी मोटापा घटाने को देसी नुस्खे बताते हैं उनका कोई शोध आधुनिक समय अनुसार किया नहीं गया है अत: भरोसा करना कठिन है कि फायदा होगा या नहीं होगा। क्या सीमा पर किसी सैनिक को ऐसा हथियार देना सही होगा जिसका यकीन नहीं हो कि जंग होने पर काम करेगा या नहीं। रोग होने पर आपको रोग के कारण से लड़ने और जीतने तंदरुस्त होने को ठीक उसी तरह निर्णय करना चाहिए। सस्ता महंगा नहीं असरकारी उपचार होना चाहिए। 
 
आपको शायद ये बात बहुत पहले समझनी चाहिए कि अपने स्वास्थ्य को हमेशा महत्वपूर्ण मानकर नियमित रूप से अपने विश्वसनीय डॉक्टर की सलाह लेते रहना चाहिए। फीस बचाने के लालच में खुद अपने डॉक्टर नहीं बनना चाहिए न ही बिना शिक्षा पाए लोगों की बात मानकर खुद अपनी ज़िंदगी से खिलवाड़ करना चाहिए। सतर्क रहें सावधान रहें विज्ञापन सुनते हैं आरबीआई कहता है , बस उसको यहां भी ध्यान रखेंगे तो नुकसान से बच सकते हैं। ध्यान रहे आपकी जान की कीमत आपकी बैंक राशि से कहीं बढ़कर है बेशक जमाराशि करोड़ों करोड़ ही क्यों नहीं हो। आपको ये बात सही लगे तो अपने दोस्तों और जानने वालों को संदेश भेज सकते हैं। 
 
आयुर्वेद हज़ारों साल पुराना होकर भी अधिकांश बातों में आधुनिक संदर्भ में सही साबित होता रहा है अपने काल में किसी लैब में टेस्ट की सुविधा नहीं होने के बावजूद जानकर वैद्यों ने अनुभव और निदान के ढंग से उपयोग करने के बाद तार्किक विश्लेषण किया तभी औषधि एवं उपचार विधि घोषित की थी। सबसे महत्वपूर्ण उनका हानिकारक लक्षण नहीं होना और हमेशा सही पाया जाना उसकी उपयोगिता को महत्वपूर्ण बनाता है। साथ ही ज़रूरत है उसको और भी आधुनिक वैज्ञानिक ढंग से जांचने परखने की आवश्यकता को अपनाना। बेशक इस काम को अंजाम देने को बहुत कार्य करना अभी बाकी है। मगर हमें इस बात को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि बहुत रोग अभी भी ऐसे हैं जिनका उपचार आयुर्वेद से ही पूर्णतया संभव है। वास्तव में कोई भी अकेली पैथी देश या विश्व भर के स्वास्थ्य के लिए काफी नहीं है और सभी पैथी के शिक्षित चिकित्सक आपसी तालमेल बिठाकर अपने उद्देश्य को हासिल कर सकते हैं। 
 
जैसे हमने कहीं जाना होता है तो हम पैदल चलकर या किसी वाहन से अथवा हवाई जहाज़ या जलमार्ग से कश्ती या अन्य साधन उपयोग करते हैं। मकसद जिस मंज़िल को पाना है उसको ध्यान में रखकर अपनी ज़रूरत और सुविधा को समझ कर निर्धारित करते हैं। खतरे और दुर्घटना के साथ सुविधाजनक होने तक सभी का विचार रहता है मगर घर बैठे मंज़िल नहीं मिलती है जाना होता है। जीवन के सफर में कठिनाई मुश्किल डगर मिलती है तब साहस से आगे बढ़ते हैं यही हमने रोग होने पर स्वस्थ होने की राह चलने को करना होता है। भविष्य कोई नहीं जानता फिर भी आशावादी सोच रखते हैं कि भविष्य अच्छा और बेहतर होगा।

Saturday, 21 November 2020

महिमा लॉक डाउन की ( खेल करोड़पति का ) डॉ लोक सेतिया

    महिमा लॉक डाउन की ( खेल करोड़पति का ) डॉ लोक सेतिया 

     महानायक कहलाते हैं कोई किसी को कॉल करता है तो उपदेश दे रहे हैं अभी आप घर बैठे खेलिए जब तक उपचार नहीं कोई तकरार नहीं। आप खुद घर बैठ ठाठ से रह सकते थे कोई दाल रोटी की चिंता नहीं थी हिसाब नहीं लगाया कितना धन बैंक खाते में जमा है। आयु भी वरिष्ठ नागरिक वाली है लोग भले कहते रहें आपकी जवानी का क्या राज़ है। बड़े और महान लोग जो आपको समझाते हैं खुद नहीं समझते कभी। हर सवाल पर इसको उसको उनको लॉक किया जाये पूछते हैं कर देते हैं आप खुले में सांस लेते हैं। घर एक नहीं कई बंगले हैं चैन घर में नहीं उस जगह मिलता है जहां धन दौलत की बारिश हो। नसीब वाले हैं शासक की तरह शान भी रखते हैं गुणगान भी करवाते हैं और भगवान भी बन जाते हैं। तुलसीदास की नहीं आधुनिक काल के राम की कथा सुनाते हैं झूमते हैं नाचते नचवाते हैं खुद पर इतराते हैं। सात करोड़ का सवाल है सोचकर जवाब देना दोहराते हैं। घर बैठे भी आमदनी होती रहती है फिर भी करोड़पति खेल से दिल बहलाते हैं टीवी चैनल से मिलकर धंधा चलाते हैं। आपको दो गज़ दूरी हाथ धोना है ज़रूरी पाठ पढ़ाते हैं बहती गंगा है मनोरंजन और तकदीर आज़माने का खेल जुआ मत कहना समझदारी बतलाते हैं।

  सबसे पहले लॉक डाउन लक्ष्मण जी ने रेखा बनाकर समझाया था इस से बाहर निकलोगी तो रावण बनकर कोरोना अपहरण कर सकता है। सोने का भाव महंगा है लेकिन आपको हिरण चाहिए सोने का पहले सुरक्षित रहने का उपाय जान लो अन्यथा सोने की लंका मिलेगी फिर भी खुश नहीं रहोगी। आदमी को नसीब दो गज़ ज़मीन भी होती नहीं है क़फ़न तक नापकर देते हैं फिर भी कितना कुछ और चाहिए। बंद ताले में कितना धरा रहेगा तिजोरी का खज़ाना और बैंक बैलेंस साथ जाता नहीं जिनको मिलेगा उनकी काबलियत पर भरोसा रखते तो हज़ार झूठ वाले धंधे जाने किस किस को ठगकर लूटकर रईस बनने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है गायक मुकेश गीतकार शैलेंदर संगीत शंकर जयकिशन फिल्म तीसरी कसम। सच बोलना मुश्किल नहीं होता लेकिन सच बिकता नहीं बाज़ार झूठ से चलता है। अदालत भी गवाही सबूत पर फैसला करती है और गवाह झूठी गवाही देकर कमाई करते हैं सबूत घड़ने को देश की पुलिस सीबीआई का कोई सानी नहीं है टीवी चैनल कल्पना करने में बेमिसाल हैं जो नहीं हुआ खबर बन सकता है और जो हर जगह घटता है खबर में नहीं होता है। 

    बैंक और सोने के गहने का विज्ञापन से लेकर भुजिया खाने तक सभी मुनाफ़ा कमाने के काम आते हैं। जब किसी को बोलने के पैसे मिलते हैं तो उसको वही बोलना होता  है जो बाज़ार वाले चाहते ख़रीदार को पसंद आये सच है चाहे झूठ या फिर छलने की बात । फोन पर समझाते हैं हर उलझन को सुलझाते हैं सोचते हैं लोग नासमझ हैं बार बार समझाते हैं ज्ञान की गंगा जिधर मर्ज़ी बहाते हैं। लालच बढ़वाते हैं फिर लोभ मोह माया छोड़ने का संदेश भी सिखलाते हैं। सप्ताह के दिन तक गिनते गिनवाते हैं दुनिया में लोग खाली हाथ आते हैं खाली हाथ वापस जाते हैं ये जो मोह माया से बचने की राह दिखाते हैं अपने दिल पर काबू नहीं रख पाते हैं। हर सप्ताह किसी वास्तविक सामाजिक कार्यकता को कर्मवीर नाम से बुलवाते मिलवाते हैं कमाल है दर्शक फिर भी असली और नकली का अंतर समझ नहीं पाते हैं। ऐसे लोग जब देश समाज की दुर्दशा पर दर्द भरी वास्तविकता बतलाते हैं कभी कभी महानायक दांतों तले उंगली दबाते हैं हैरानी जतलाते दिखलाते हैं मगर शायद ही सोचते हैं खुद जो खेल खेलते खिलवाते हैं क्या वास्तव में कोई सही दिशा दिखलाते हैं। बदनसीब बाल मज़दूरों शोषण की शिकार महिलाओं और करोड़ों लोगों की जीवन की वास्तविक समस्याओं की बात जानकर शायद भूलकर किसी फ़िल्मी कहानी की तरह अपने बोलो डायलॉग की तरह मख़मल के बिस्तर पर चैन से सो जाते हैं। करोड़पति खेल टीवी शो नहीं इक सुनहरे सपनों का जाल है जानते हैं मगर कभी अपने खेल की सच्चाई समझाने वाले सवाल किसी से पूछे नहीं जाते हैं।

सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है

सजन रे झूठ मत बोलो, 
खुदा के पास जाना है
न हाथी है ना घोड़ा है, 
वहाँ पैदल ही जाना है

सजन रे झूठ मत बोलो, 
खुदा के पास जाना है
न हाथी है ना घोड़ा है, 
वहाँ पैदल ही जाना है
सजन रे झूठ मत बोलो 
 
तुम्हारे महल चौबारे, 
यहीं रह जाएंगे सारे
तुम्हारे महल चौबारे, 
यहीं रह जाएंगे सारे
अकड़ किस बात की प्यारे
अकड़ किस बात की प्यारे, 
ये सर फिर भी झुकाना है
सजन रे झूठ मत बोलो, 
खुदा के पास जाना है
 
भला कीजे भला होगा, 
बुरा कीजे बुरा होगा
भला कीजे भला होगा, 
बुरा कीजे बुरा होगा
बही लिख लिख के क्या होगा
बही लिख लिख के क्या होगा, 
यहीं सब कुछ चुकाना है
सजन रे झूठ मत बोलो, 
खुदा के पास जाना है
 
लड़कपन खेल में खोया, 
जवानी नींद भर सोया
लड़कपन खेल में खोया, 
जवानी नींद भर सोया
बुढ़ापा देख कर रोया
बुढ़ापा देख कर रोया, 
वो ही किस्सा पुराना है
सजन रे झूठ मत बोलो, 
खुदा के पास जाना है
 
न हाथी है ना घोड़ा है, 
वहाँ पैदल ही जाना है
सजन रे झूठ मत बोलो, 
खुदा के पास जाना है 

Thursday, 19 November 2020

शहंशाह का डरावना ख़्वाब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        शहंशाह का डरावना ख़्वाब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   आज पहली बार शहंशाह ने पिछले शासक की नकल छोड़ इक नया लिबास पहना था। इतना भारी परिधान पहनकर सोया नहीं जाता मगर उसको अपने बदन से अलग करना शासक को कठिन लगा जाने क्यों उसको लगा कहीं आधी रात पिछले शासक की आत्मा आकर उस को धारण नहीं कर ले। जो किसी की नकल करते करते अपनी असलियत को भूल जाता है परछाई बन जाता है उसको अक्सर खुद अपने साये अपनी परछाई से भी डर लगने लगता है। ख़्वाब ऐसे समय आने स्वाभाविक हैं जब जागते भी नहीं और गहरी नींद भी नहीं आती है। जागा जागा सा सोया सोया सा। सपने में उनको देखा जिनको लेकर सोचते रहते हैं और जब से सत्ता मिली है खुद को उन्हीं जैसा दिखने को उनकी फ़ोटोज़ की तरह अपनी फोटो करवाते रहते हैं। उनकी बुराई करने की कोई सीमा लांघने को छोड़ी नहीं बाक़ी उन्होंने , कहा जाता है आपके सबसे बड़े आलोचक वही लोग होते हैं जो वास्तव में आप जैसा बनना चाहते हैं मगर बन सकते नहीं हैं। पूछने लगे क्या आप वही हैं जवाब मिला आपने ठीक पहचाना मैं उनकी आत्मा हूं। शहंशाह बोले ये आत्मा कैसी होती है क्या राजनेताओं में आत्मा होती है उतर मिला आत्मा हर इंसान में होती है मगर बहुत लोग आपकी तरह सत्ता की चाह में अथवा अन्य स्वार्थ की खातिर अपनी आत्मा को जीते जी दफ़्न कर देते हैं। 
 
 आत्मा ने कहा अब क्या मुझे भी कोई बात सच सच बता सकते हैं , शहंशाह बोले आप पूछ सकते हैं मगर पहले समझ लेना कि मेरी कही हर बात सच समझी जाती है मेरे झूठ इस युग के सबसे बड़े सच होते हैं। आत्मा ने कहा आपका ये पहनावा भी शायद उसी तरह का है अर्थात आपने देश की राजनीति  को सत्ता के बड़े पद को भी अभिनय का मंच समझ लिया है। अभिनय करने वाले महान आदर्शवादी किरदार का जीवंत अभिनय करते हुए लगते हैं कि वो सच में उसी तरह के हैं। रामायण में भगवान राम और देवी सीता का किरदार निभाने वाले लोगों को उन्हीं की छवि लगते रहे हैं। क्या आपने सोचा है कि टीवी सीरियल फिल्म की तरह देश की राजनीति में मसीहा होने का अभिनय करना उचित नहीं हो सकता है आपको वास्तव में जो कहते हैं उसी ढंग से करना भी चाहिए। अन्यथा देश की जनता संविधान की भावना और पद की शपथ सभी के साथ अनुचित आचरण करना होगा। आपको फोटोसेशन करवाने का इतना शौक है तो राजनीति नहीं मॉडलिंग करना ठीक होता उस में आपको पैसे भी मिलते यहां आपकी इस चाहत की कीमत गरीब जनता के साथ पक्षी जानवर जाने किस किस को भरनी पड़ती है। झूठ का इश्तिहार नहीं सच की तस्वीर बनते तो अच्छा होता।
 
    शहंशाह खुलकर हंस दिए बोले किस युग की बात करते हो ये इक्कीसवीं सदी है मैंने झूठ को सच से बड़ा ही नहीं बना दिया है आप जैसे आज़ादी के दीवाने नायक को ख़लनायक घोषित करवा दिया है। आत्मा ने कहा मतलब तुम समझते हो किसी की रेखा को मिटाकर अपनी रेखा बड़ी दिखला सकते हो अर्थात खुद उनसे अच्छा और बड़ा बनने को कुछ कर नहीं सकते अपनी रेखा लंबी नहीं कर सकते तभी औरों की घटाने का व्यर्थ कार्य करते करते थक चुके हो। खुद अपने आप को आश्वस्त नहीं कर पाए कि वास्तव में तुमने जो सोचा वही हुआ है। कभी कभी लगता है जैसे किसी फ़िल्मी कहानी में नायिका नायक से नफरत करते करते प्यार करने लगती है तुम भी मुझसे इतनी नफरत करते करते वहां उस हालत में पहुंच गए हो कि जागते सोते मेरे ख्यालों में खोये रहते हो। तुम्हारी मुश्किल यही है कि मुझसे मुहब्बत का इज़हार भी नहीं कर सकते जबकि इनकार करना भी चाहते नहीं क्योंकि प्यार की खातिर तख़्त ओ ताज ठुकराना हर किसी के बस की बात नहीं होती है। 
 
       तभी देखा खुद बापू खड़े हैं नमस्कार किया आत्मा ने और शहंशाह ने भी औपचारिकता निभाई। कुछ सोच कर शहंशाह ने कहा बापू सच सच बताना आपने  इनको अपना वारिस बनाकर ठीक किया या उनको बनाते जिनको मैंने घोषित किया है और सबसे ऊंची मूर्ति बनवाई है। बापू बोले बात तुम दो की है किसी और को बीच में लाकर बिना कारण विषय से भटक रहे हो। जहां तक तुम दोनों का सवाल है ये आत्मा जीवन भर यही मानती रही कि उसका जो भी है देश का है और जीवन देश को समर्पित किया था जबकि तुमने समझा है कि देश तुम्हारी मलकीयत है और देश का सभी कुछ तुम्हारे उपयोग करने की खातिर ही है। तुमने आडंबर करने खुद को सज धज कर दिखाने को महत्व दिया है जबकि जिनकी तुम बुराई करते हो उसको खुद को दिखाने की कोई ज़रूरत कभी नहीं थी। किसी का शिक्षित और अमीर परिवार में जन्म लेना या किसी का गरीब माता पिता की संतान होना उनकी काबलियत को नहीं साबित करता है बड़े होकर अपनी सोच से देश समाज को ऊंचा उठाने या सामाजिक मूल्यों को नीचे लाने से उनका बड़प्पन या छोटी संकुचित मानसिकता का पता चलता है। शोहरत पाने की ख़्वाहिश करना उसके लिए समय और साधन बर्बाद करना अपराध है लोग उनको चाहते हैं जो औरों की खातिर देश समाज के भविष्य की खातिर निष्ठा रखकर कार्य करते हैं। तुमने अपना ध्यान वास्तविक कार्यों को छोड़कर खुद अपने नाम कारनामे दर्ज करने पर रखा है हमेशा ही। 

   लोग मुझे मेरे पुराने ढंग वाले चश्मे से ही पहचानते हैं और जिनसे अपनी तुलना करते हो उनको उनके सभी से मधुर संबंध रखने की सकारात्मक विचारधारा विपक्ष को आदर देने के  स्वभाव के सौम्य आचरण के लिए। भारतीय सभ्यता ताकत से जीतने वाले को नहीं प्यार मुहब्बत से दिल जीतने वाले को अपना आदर्श मानती है। तुम्हारे परिधान समय बदलने के साथ साथ देखने वालों को कभी बेहद अच्छे लगने के बाद नौटंकी वालों जैसे लगने लगते हैं जो पहनने वाले की असलियत से अधिक नाटकीयता को दर्शाते हैं। सादगी हमेशा भली लगती है शृंगार कुछ समय तक लुभाते हैं। नर्तकी की अदाएं और बनाव शृंगार यौवन ढलते ही बेहूदा लगते हैं। बापू ने कहा ख़ास तुम्हारे लिए इक आईना खोजा गया है देखोगे तो अपने आप को कीमती शानदार लिबास में भी अपनी असली शक़्ल देख डर जाओगे। राजा नंगा है कहानी का आधुनिक संस्करण राजा बाबू आज किस फ़िल्मी अदाकार की नकल की पोशाक बनवाओगे शीर्षक कथा लिखवाओगे।
 
 

Thursday, 12 November 2020

कुछ कहते नहीं समझते हैं ( दिल ए नादां ) डॉ लोक सेतिया

     कुछ कहते नहीं समझते हैं ( दिल ए नादां ) डॉ लोक सेतिया 

  उस दुकानदार ने समझा ये साधारण सा दिखता आदमी कहां जानता होगा आधुनिक शब्दों के अर्थ और अपने ज़रूरत की चीज़ को इस्तेमाल करने का तरीका समझ जानकारी। कहने लगा अंकल जी आपको लिख कर दे रहा जब कोई पूछे बस ये दोहरा देना। मैंने विचार ही नहीं किया कि वो जैसा सोच रहा है मैं उतना नासमझ नहीं और इंटरनेट और आधुनिक ज़रूरत की चीज़ों की जितनी जानकारी चाहिए रखता हूं। अच्छा लगा अपने कारोबार को चलाने को ही सही वो युवक शिष्टाचार निभाना और सहायता करना चाहता है। शायद कुछ लोग ऐसे में चुप नहीं रहते बोलते हैं मुझे नासमझ मत समझना आता है ये सब करना और भी बहुत कुछ जो तुम नहीं जानते मगर मैं आसानी से करता हूं। कोई चीज़ समझ नहीं आती तो पूछने में संकोच नहीं करता न इस को लेकर रत्ती भर शर्मिंदगी महसूस होती है कि बहुत कुछ मुझे पता नहीं है। शायद कितना कुछ मुझे पता है उस युवक को क्या खबर जब उसको मेरी पहचान बस उतनी पता है जितनी मेरे आधार कार्ड पर दर्ज है। बहुत बार ऐसा होता है मगर लगता नहीं किसी को कुछ कहना ज़रूरी है न मुझे खराब लगती है किसी की बात बल्कि विचार करता हूं उसको क्या मालूम मेरा परिचय और काम क्या है। 

 जो मुझे जानते हैं सोचते हैं मुझको मुझसे ज़्यादा समझते हैं वास्तव में कभी नहीं समझते कि ये जो कहने को बहुत साफ कहता लिखता है उसके भीतर कितना कुछ कितनी गहराई में छिपा हुआ है जिसे किसी और को बताना दिखलाना तो क्या खुद भी भूल जाना चाहता है भूले से भी मन में लाता नहीं दिल की बात। न जाने कब से उसने दुनिया को अपनी बात समझाना छोड़ दिया है मान लिया है दुनिया को कहां फुर्सत किसी को समझने की लोग हर किसी को परखते हैं जांचते हैं अपनी ज़रूरत के तराज़ू के पलड़े में अपनी खुदगर्ज़ी के बाट से तोलना चाहते हैं। कोई उनको कैसे समझाए कि उसने अपनी खुदी को कभी किसी को बेचना मंज़ूर ही नहीं किया है। खाली जेब होकर भी इस अनमोल दौलत को खोया नहीं है किसी भी हालात में। 

 कोई नहीं जान पाया कि वो कभी औरों के हाथ की कठपुतली बनकर नहीं रह सकता है। सबके बीच सभी के साथ होकर भी खुद अपना संग कायम रखता है अकेला होकर भी खुद अपने साथ होता है। कभी किसी को छोड़ता नहीं मगर किसी से साथ मांगना भी उसकी आदत नहीं है। ऐसे लोग कितना दुःख दर्द कितने ऐसे अनुभव खुद अपने आप से भी छिपाए रखते हैं समझते हैं ये दुनिया वाले चालाक बनते हैं मगर वास्तव में हैं बड़े ही भोले और नादान जो इतना करीब होकर भी उनको देख जान समझ पाते नहीं। कारण यही है कि जब कोई मानता है जो उसको पता है केवल वही वास्तविकता है वो कुछ भी किसी से समझना ज़रूरी नहीं समझता है और हम लोग चाहते हैं कुछ और गहराई से समझना सभी को खुद अपने आप को भी। मैं कोई गहरा समंदर जैसा अपनी गहराई किसी को बता नहीं सकता खामोश नज़र आता अनगिनत तूफ़ान अपने में लिए रहता हूं लोग लहरों की तरह अठखेलियां करते हैं मेरे साथ और मुझे आनंद का अनुभव होता है। जिनको तैरना नहीं आता उनको मेरे किनारे खड़े होकर नज़ारा देखना होता है लेकिन उनको मेरी पहचान उतनी ही होती है जितनी आस्मां के चांद सितारों बादलों और उन परिंदों की होती है जो बिलकुल मुझ जैसे उड़ान भरते भरते किसी पल आंख से ओझल हो जाते हैं।

Wednesday, 11 November 2020

करोड़पति खेलने का ख़्वाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    करोड़पति खेलने का ख़्वाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  विषय शोध का लगा मुझे भले ये खेल मुझे खेलना नहीं आता और मैंने हमेशा इसकी आलोचना ही की है। इतने साल में जितने भी खिलाड़ी हॉट सीट पर पहुंचे उन सभी ने इक राज़ खोला कि उनके पिता माता ने यही सपना देखा था अमिताभ बच्चन के सामने बैठना और खेल खेल में अमीर होते जाना। मेरी तरह आपके माता पिता ने भी ऐसा ख़्वाब देखा होता तो एक करोड़ सात करोड़ नहीं तो तीन लाख बीस हज़ार से पच्चीस पचास लाख तक की धनराशि हमारे खाते में भी तुरंत भिजवाते सदी के महानायक टीवी चैनल की मेहरबानी से। देश की गरीबी ख़त्म  और लोगों की ख्वाहिशें कब की पूरी हो गई होती अगर देश और राज्य की सरकारों ने अपनी योजना में इस नामुराद खेल को शामिल किया होता और राजनेता भाषण में समझाते कि सिर्फ राजनीति ही अमीर बनने का इकलौता साधन नहीं है और टीवी पर बैठे करोड़पति खेल खेलते खेलते भी को लाख कमा सकता है। पैसा क्या है हाथ का मैल है हम हाथ मलते नहीं रहते बहती गंगा में डुबकी लगाते और इस पार से उस पार पहुंच जाते अर्थात गुमनाम से नाम वाले हो जाते। 
 
  अब लगता है मेरे माता पिता ने करोड़पति खेल का सपना नहीं देखा क्योंकि उनके समय में टीवी पर ये होता ही नहीं था रामायण महाभारत सीरियल भी ठीक से उनको देखना नसीब नहीं हुआ। धार्मिक किताबें भजन और सदियों पुरानी धारणा पढ़ लिख कर अच्छे आदमी बनकर दिखाना जैसी नसीहत देते रहे पैसे के पीछे भागने की बात को गलत बताते रहे। सच्चाई ईमानदारी और भलाई की बातें इंसान को धनवान बनने नहीं देती हैं डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना शिक्षक बनकर शिक्षा का दान देकर सबको सोचने समझने की बात सिखलाना यही सबक पढ़ाते रहे। खूब धन दौलत कमाने का महत्व उनको समझाना ज़रूरी नहीं लगा था। मगर मैंने वही भूल कैसे दोहराई और अपनी संतान को काबिल मेहनती बनाने का पाठ पढ़ाया आसान ढंग से पैसा बनाने की राह दिखलाई ही नहीं। अगर आपने भी अपने माता पिता की तरह अपने बच्चों को करोड़पति खेल का महत्व नहीं समझाया तो मुमकिन है कभी बड़े होकर उनको आपसे ये शिकायत हो कि सबसे ज़रूरी बात उनको मालूम ही नहीं थी क्योंकि आपने उनको ये मार्ग बताया ही नहीं था। 
 
   देर आये दरुस्त आए जनके बच्चे छोटे हैं उनको समझाना चाहिए , खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब पढ़ोगे लिखोगे हो जाओगे बर्बाद। पढ़ने को कौन बनेगा करोड़पति के सवाल काफ़ी हैं बस कुछ भी और पढ़ना किसी काम का नहीं है। इसी सप्ताह इक दिन पहले मकेनिकल इंजीनरिंग के सभी विषयों में पहला स्थान पाने वाले राष्ट्रपति से सम्मानित युवक इस खेल में तीन लाख बीस हज़ार तक भी नहीं पहुंचे तो दर्शक सोचने लगे क्या ख़ाक पढ़ाई की। मुझे अफ़सोस हुआ ये सोचकर की सिरसा हरियाणा के होनहार युवक ने हमारे इलाके और राज्य की शान को अपनी वास्तविक योग्यता से कितना ऊंचे शिखर पर पहुंचाने के बाद अपनी नासमझी से करोड़पति खेल में फ़िसड्डी साबित होकर कहां ला खड़ा किया है। जाने कितनी किताबें रटी मगर कहीं से कोचिंग नहीं हासिल की सबसे महत्वपूर्ण 15 - 16 सवालों का जवाब देने का चार चार हेल्पलाइन उपयोग करने के बाद। कल दिल्ली की इक महिला एक करोड़ जीती तब ध्यान देने पर समझ आया कि उनको कई बार सवालों के सही जवाब नहीं पता थे फिर भी उनका कहना था रिस्क लेना उनकी आदत है ज़िंदगी खतरों का खेल है इक खतरा और सही और इस तरह खतरों से खेलते खेलते खेल खेल में करोड़पति बन गई। खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान।   
 
   लेकिन कौन बनेगा करोड़पति खेलने के लिए उस शो की औपचारिकता पूरी करना ही काफी नहीं है। आपको वहां जाने से पहले कोई पांच समझदार जानकर लोग भी चुनने होते हैं जो आपकी सहायता वीडियो कॉल पर बहुत कम समय में सही जवाब देकर कर सकते हों। मुझे बड़ी कठिनाई होती किसको रखना किसको छोड़ना चाहिए जब इधर वास्तविक जीवन से सोशल मीडिया तक जान पहचान वाले खुद को सभी विषयों को जानने वाले बतलाते हैं और साथ भी लेकर जाने को हौसला बढ़ाने वाले व्यक्ति का चुनाव आसान नहीं होता। मुझे यकीन है मैं जिस किसी से बात करता मुझे यही सलाह मिलती जनाब आपके बस की बात नहीं है क्योंकि मुझ में इतना साहस संयम और आत्मविश्वास ही नहीं है। मुझे तो पता होता है किसी बात का सच क्या है फिर भी कोई सामने गलत को सही बताता है तो खामोश रहता हूं मालूम है लोग गलत होकर भी गलती मानते नहीं जबकि मुझ जैसे सही होने पर भी अपना अपराध स्वीकार कर शर्मिंदा हो जाते हैं। मैंने केबीसी में जाने को कोई आवेदन कभी किया नहीं फिर भी कितनी बार यही सोचकर दिल घबराता है कि अगर बिना आवेदन ही मुझे बुलावा मिल गया किसी दिन तो क्या होगा। समझ गए कितना ख़ौफ़ है मेरे मन में इस खेल को लेकर।

Tuesday, 10 November 2020

खुश होना भी ख़ुशी बांटना भी ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

    खुश होना भी ख़ुशी बांटना भी ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

कल किसी ने जानकारी दी थी कोई पिछले कितने सालों से कभी दुखी नहीं हुआ और उसको दुनिया का सबसे खुश व्यक्ति माना जाता है। पिछली बार वो दुखी हुआ था अपने गुरु की मौत होने पर क्योंकि वह इक बौद्ध भिक्षु है और उसने खुश रहने के पांच तरीके भी खोजने का दावा किया है। सुःख दुःख जीवन के दो रंग हैं और अगर कोई कभी दुःखी महसूस नहीं करता है तब उसको ख़ुशी का अनुभव भी नहीं हो सकता है। आपने अगर वास्तव में साधु संतों की बातों को पढ़ा सुना समझा है तो उनकी चिंता उनकी परेशानी उनका दर्दमंद होना अपने खुद के सुख दुःख के कारण नहीं होता था बल्कि आस पास समाज में औरों को बदहाल देख कर उनका हृदय मन आत्मा विचलित हो जाते थे। कोई भिक्षु भगवा वेश धारण कर उपदेश दे सकता है उसको क्या क्या करने से ख़ुशी मिलती है ये उसकी अपनी सोच और पसंद हो सकती है मगर हर कोई उनकी तरह पांच कार्य करने से खुश हो सकता है ऐसा सोचना उचित नहीं है। उनकी पांच बातें हैं सुबह पीले रंग को देखना कोई ख़ास व्यायाम करना साथ अपनी उपलब्धि को सोचते हुए अपने को पसंद व्यक्ति या वस्तु की फोटो पास रखना अखरोट खाना और ठहाके लगाना। 

मुझे नहीं लगता दुनिया की तमाम दुविधाओं चिंताओं और समस्याओं का इन से निदान या समाधान संभव है। और अगर आपके आस पास सब खराब घटता दिखाई देता है मगर आपको उसे देख कर कोई दुःख दर्द का अनुभव नहीं होता है तब उसको ख़ुशी नहीं संवेदनहीनता कह सकते हैं। ख़ुशी क्या है उसको समझना उसको ढूंढना और ख़ुशी सभी को बांटना ये वो कार्य है जो केवल साधु संतों सन्यासी भिक्षु ही नहीं हम सभी को करना चाहिए। केवल खुद खुश रहने की बात कहना ख़ुशी को समझे बिना सही नहीं है ख़ुशी उनकी समझाई बातों से मिलती तो बहुत सस्ती होती और हर कोई खुश हो सकता मगर ऐसा है नहीं। खुश रहने को आपके भीतर ख़ुशी होनी ज़रूरी है और ख़ुशी बाजार से खरीदी नहीं जाती बिकती भी नहीं उपजती है आपके अंर्तमन से। ख़ुशी ढूंढने का काम करने से पहले ख़ुशी उपजती किस तरह है इसको लेकर विमर्श करते हैं। 

आपको कोई कुछ देता है और आप ख़ुशी का अनुभव करते हैं तो ऐसी ख़ुशी हमेशा किसी को नहीं मिल सकती है बल्कि ये तो आपको बेबस और मज़बूर बना देता है। वास्तविक ख़ुशी पाने वाले को नहीं उसको मिलती है जो सभी को ख़ुशी बांटने का काम करता है बदले में कुछ भी चाहता नहीं है। लेकिन विषय की वास्तविक बात जिस पर चिंतन किया जाना चाहिए वो ये है कि क्या खुश रहना जीवन का मकसद होता है। बहुत लोग ख़ुशी का अनुभव करते हैं किसी भी तरह कुछ हासिल कर के , जीत धन शोहरत या सफलता अथवा ऐशो आराम के साधन जो कभी भी स्थाई होते नहीं हैं। ये ऐसी ख़ुशी होती है जो आप दुनिया को अपनी अहमियत जताने को अर्जित करते हैं। आपने महाभारत सीरियल देखा महात्मा विदुर का किरदार समझा जो सभी को बहुत सार्थक संदेश देने का कार्य करते रहे। कौन किस पक्ष का कौन किस उच्च पद पर आसीन है इसकी परवाह कभी नहीं की। चलो उनकी बताई कुछ बातें जिसे मृत्युलोक के छह सुःख कहते हैं उनको समझते हैं। 

पहला सुःख स्वस्थ्य तन , दूसरा सुःख अपनी ज़रूरत की कमाई से गुज़र करना , तीसरी अपने देश में रहना , चौथा निडरता पूर्वक जीना , पांचवा अच्छे लोगों से संबंध रखना और आखिरी अच्छा जीवन साथी और संतान का होना। सोचेंगे तो यकीन होगा इनसे बढ़कर कुछ भी खुश रहने को नहीं चाहिए। लेकिन मेरा मानना है कि केवल खुश रहने को जीवन की सार्थकता नहीं समझा जा सकता है। वास्तविक ख़ुशी सभी के लिए शुभकामना और सुखी जीवन की कामना और एक ऐसा समाज का निर्माण करना जिस में प्यार दोस्ती और मानवता के कल्याण की भावना हर किसी के भीतर हो बनाकर मिल सकती है। शायद ये संभव भी है मगर पहले निजी स्वार्थ और खुद अपने लिए ख़ुशी पाने की सोच को बदलना होगा , ख़ुशी अकेले नहीं सभी से मिलकर हासिल की जा सकती है और अनुभव की जानी उचित है।

Monday, 9 November 2020

ज़िंदगी से पहचान हुई ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी से पहचान हुई ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

  याद करना अच्छी बुरी मीठी कड़वी बातों को पुराने अनुभवों को और बात है ज़िंदगी का रोना धोना सभी करते हैं। कभी ज़िंदगी को समझना जान पहचान करना उसको प्यार करना चाहे जैसी भी रही हो बड़े ही तथस्ट भाव से आंकलन करना बहुत ज़रूरी है जो कभी नहीं किया अब कर के देखते हैं। आज रात सपने में मिला खुद से अपनी ज़िंदगी से इधर उधर उस से अकेले में सबसे छुपकर बात कहना चाहता था मगर कभी कोई कभी कोई आस पास दिखाई देता। दिल की बात सभी के सामने की जाती नहीं है अवसर मिलते ही पूछ लिया क्या मुझे चाहती हो लगा मुस्कुराई ज़िंदगी जैसे कह रही हो सवाल ये नहीं है सवाल होना चाहिए क्या तुम खुद को अपनी ज़िंदगी को चाहते हो मुझे प्यार करते हो। पल भर में बिना इक शब्द बोले उसने मुझे किसी फ़िल्मी फ्लैशबैक की तरह पिछली ज़िंदगी को दिखला दिया। और मैं अभी तक समझने की कोशिश कर रहा हूं अपनी ज़िंदगी के बीते हुए सफर की खुद अपनी कहानी जो जाने कैसे कोई लिखवाता रहा मेरे ही हाथ से मेरी कलम से। जैसे स्कूल में बच्चे अध्यापक जो बोलता है लिखते हैं अपनी नोटबुक पर याद रखने को। विधाता हालात और जाने क्या क्या मुझे जब जिधर चाहते उधर ले जाते रहे और मुझे लगता रहा मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी का सफर तय कर रहा हूं। शायद अब तक फुर्सत नहीं मिली थी मुझे अपनी ज़िंदगी से पहचान करने की भी मुहब्बत करने से पहले जान पहचान होना ज़रूरी है। 
 
     चलता रहा लगातार चलना पड़ता है मगर थोड़ा रुककर ठहरकर ज़िंदगी से पहचान करने के बाद उसको भी बात समझ कर हमराह बनाकर चलना था अकेले अकेले नदी के दो किनारों की तरह नहीं। अब समझ आया ज़िंदगी मुझसे फ़ासला रखकर क्यों चलती रही हमेशा। लंबा रास्ता मंज़िल का कोई पता नहीं और सभी दुनिया के लोग चलते रहते हैं कारवां साथ लिए फिर भी अकेले अकेले। किसी से क्या खुद से भी दूरी रखकर। सोचते सोचते लगने लगा है राह में कभी फूल खिले कभी पतझड़ आई कभी ठंडी हवा कभी तपती लू कभी गुलशन कभी वीराना कभी आसान रास्ते कभी कठिन डगर कभी कोई पगडंडी कभी किसी के कदमों के निशां तक नहीं जिन पत्थरीली चट्टानों पर मुश्किल से चढ़ना। ये सब वास्तव में ज़िंदगी के नज़ारे थे कितने रंगीन क्या क्या रंग नहीं थे। मैंने ही उन सभी से तालमेल नहीं बिठाया उनको स्वीकार नहीं किया और नाहक चिंता दुविधा और हैरानी से बचने की चाहत करता रहा। ज़िंदगी होती ऐसी ही है हम चाहें या नहीं चाहें ज़िंदगी एक जैसी कभी नहीं रहती है ज़िंदगी पल पल बदलने का नाम है। जब जैसी जिस रंग की है उसे जीना उस से पहचान करना अपनाना यही ज़िंदगी जीने का सलीका है। 
 
    अभी हम ने ज़िंदगी को जिया मगर जीने का ढंग नहीं सीखा है। ज़िंदगी को हमने उसकी मर्ज़ी से नहीं खुद अपनी ज़रूरत को देख कर बदलना चाहा है जो हमारी उलझन का कारण है। जीने का अगर अंदाज़ आये तो बड़ी हसीं है ये ज़िंदगी। ज़िंदगी शीर्षक से कितनी कविताएं कहानियां ग़ज़ल गीत हैं लिखा भी पढ़ा भी बहुत है समझा नहीं समझ पाया नहीं अन्यथा ज़िंदगी लघुकथा ही तो है। घर समाज दुनिया नाते रिश्ते सभी जाने क्या क्या शिक्षा जानकारी दुनियादारी और तौर तरीके बताते हैं समझाते हैं स्कूल कॉलेज की पढ़ाई से सबक लेते हैं नौकरी कारोबार सब कुछ करने की जानकारी हासिल करने को किताबें पढ़ते हैं। ज़िंदगी क्या है उसको समझना और जीना क्या होता है इस की कहीं कोई चर्चा तक नहीं होती जबकि इस से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी होना नहीं चाहिए। ज़िंदगी को हमने ऐसी पहेली समझ लिया है जिसका जवाब कोई नहीं जानता और ये सवाल हर किसी को हल करना होता भी है। 

     आर्ट ऑफ़ लिविंग अर्थात जीने का सलीका कहने को कोई गुरु बन गया मगर खोजा पहाड़ निकली चुहिया वो भी मरी हुई जैसी हालत है। इसको भी नाम शोहरत दौलत रुतबा पाने का ज़रिया बना लिया और हर जगह अपने नाम से धंधा व्यौपार करने लगे देश विदेश शाखाएं बनवाते रहे। जिनको लगता है ये सब जीवन का मकसद है उनको ज़िंदगी का सच मालूम ही नहीं और जो आपके पास खुद है ही नहीं वो कैसे किसी और को बांटते फिरते हैं। ज़िंदगी से ऐसा खेल खेलना अच्छा नहीं है आपको कारोबार करने को यही समझ आया जो दौलत के तराज़ू में हर्गिज़ नहीं तोलना चाहिए उसको सिक्कों से तोलने लगे ज़िंदगी को सामान बना दिया बाज़ार में बेचने को। इस से अच्छा होता हवा को भरकर गुब्बारे बनाते बेचने को। 

     ज़िंदगी से जान पहचान हुई भी तो इतनी देर से मगर शायद अभी भी जीने का सलीका समझ कर जितनी बची है उस ज़िंदगी को ढंग से जीना छोटी बात नहीं है। क्योंकि ज़िंदगी को सालों से नहीं नापनी चाहिए। ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं बाबू मोशाय , गुलज़ार ने लिखा था ये डायलॉग आनंद फिल्म के लिए। कुछ और गीत हैं ज़िंदगी को परिभाषित करने के लिए। किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है। ज़िंदगी इक सफर है सुहाना , मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया , ज़िंदगी मेरे घर आना , तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी  हैरान हूं तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं , ज़िंदगी गले लगा ले। जीवन चलने का नाम , चलते रहो सुबह शाम। ग़ज़ल भी तमाम हैं मगर मुझे जनाब जाँनिसार अख़्तर जी की कही ग़ज़ल बहुत पसंद है , ज़िंदगी ये तो नहीं तुझको संवारा ही न हो कुछ न कुछ हमने तेरा क़र्ज़ उतारा ही न हो। दिल को छू जाती है यूं रात की आवाज़ कभी , चौंक उठता हूं कहीं तूने पुकारा ही न हो। ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको , दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो। शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहां , न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो। 

   ज़िंदगी को जीने का फ़लसफ़ा यही है हाथ पसारने मांगने का नहीं मुमकिन है तो जितना भी बांट सको बांटने का नाम ही जीवन है दुनिया को देश को समाज को कुछ दे कर जाना अच्छा है। प्यार से बड़ी दौलत कोई नहीं है मुहब्बत पाना है तो सच्चा प्यार बांटना सीखना होगा इंसान को इंसान बनकर आपस में प्यार मुहब्बत से रहना , ज़िंदगी जीने का यही तरीका है सलीका भी यही है। प्यार ही ऐसी दौलत है जो जितनी बांटते हैं उतनी बढ़ती जाती है। आखिर में इक गीत चल अकेला चल अकेला चल अकेला तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला।





Saturday, 7 November 2020

15 लाख मिलने के बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    15  लाख मिलने के बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

ये चिट्ठी डाकविभाग की गलती से जिनको भेजी गई थी उनको नहीं मिली और मेरे हाथ लग गई है शायद जिसे डाकिया दे गया उसको समझ नहीं आया चिट्ठी का मकसद क्या है। आदरणीय नाम लिखा हुआ है जो बताना ज़रूरी नहीं समझने की बात है। मैं आपके चाहने वालों में एक होकर भी अनेक होने की तरह होने जैसी बात है क्योंकि सभी जो आपको चाहते हैं सोचते हैं कि आपको अपनी कही बात पर खरे उतरना चाहिए 15 लाख की घोषणा जुमला वोट पाने को था ये सुनकर अच्छा नहीं लगता है। खज़ाना बेशक खाली है जो आपने ही किया है कोई और पिछले पांच साल से अधिक समय से लूटने नहीं आया है लेकिन अभी भी आपको अपनी कही बात पर खरा साबित होना है तो आपको बेहद आसान ढंग बताना है। चार साल पहले 8 नवंबर को आठ बजे रात आपने घोषणा की थी पांच सौ और हज़ार रूपये के नोट आधी रात के बाद बंद करने को लेकर। अब वही पुराने नोट आरबीआई की अलमारी में रद्दी की तरह पड़े हुए हैं जिनका कोई उपयोग नहीं है आपको उन्हीं बंद नोटों को जनता को बांटना है ये घोषणा खुद 8 नवंबर 2020 को ठीक 8 बजे करने की ज़रूरत है। हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चौखा आने का ये सबसे लाजवाब उपाय है। चलन से बाहर हैं तो क्या हुआ सरकार बांटेगी तो लोग कतार में खड़े होकर उन बेकार करंसी नोटों को भी ले लेंगे। मैंने सही पता लिख कर स्पीड-पोस्ट से उनको भेज दी है इसलिए मुमकिन है सही समय पर आपको ये घोषणा सुनकर सदमा नहीं लगे या आप विचलित नहीं हों इसलिए आपको सावधान किया जा रहा है। 

  कल्पना कीजिए ये सपना सच हो जाये तो क्या होगा। आपको टीवी पर सीधे भाषण में पचास दिन तक जिस जिस ने जितने पुराने नोट जमा करवाए थे उनका हिसाब आधार कार्ड से जोड़ने को कहा जाएगा। आपने भले इक नोट भी जमा नहीं करवाया हो पंजीकरण करवाना ज़रूरी होगा क्योंकि 15 - 15 लाख की खैरात सभी को बड़े छोटे रईस गरीब को इक समान मिलेगी। छोड़ो क्या फायदा कहने की मूर्खता मत करना क्योंकि ये हज़ार और पांच सौ वाले नोट वास्तव में बेकार नहीं हैं। अभी भी कुछ लोग उनको लकी मानते हैं और हमेशा जेब में रखते हैं उनका भरोसा है ऐसा करने से उनकी जेब कभी खाली ही नहीं होती है। वास्तव में उन पुराने नोटों को जब छापा गया था तब बड़े शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखा गया था इसलिए उनको खर्च नहीं करना केवल तिजोरी या घर की अलमारी में रखना ही फलदाई होता है। आपने पैसा पैसे को खींचता है ये सुना होगा बस यही नोट हैं जो चुंबकीय शक्ति वाले हैं आपको दीपावली पर लक्ष्मी पूजन उन्हीं से करना शुभ मंगलकारी साबित हो सकता है। लालच बुरी बला है लोग पढ़ लिखकर लालच में मूर्खता करते हैं ये अभी किसी डॉक्टर ने विदेश से आकर इक ठग से सोने का चिराग़ खरीदा दो करोड़ देकर। जब अपनी काबलियत से इतना धन कमाया था तब लालच में आकर बिना मेहनत धन पाने की चाहत रखना पागल बनना होता है। पागलपन में सही गलत की समझ नहीं रहती है। सावधानी के लिए फिर पुरानी कहानी याद करते हैं। 

किसी लालची को किसी ने वरदान मांगने को कहा और उसने यही वरदान मांग लिया कि जिस चीज़ को हाथ लगाए वही सोने की बन जाये। तथास्तु कह दिया वरदान सच साबित हुआ। जब उसने रोटी खानी चाही तो अनाज की रोटी सोने की धातु की बन गई जो चबाई नहीं जा सकती भूख नहीं मिटाती। उसने अपनी पत्नी बच्चे जिनको भी छुआ वो भी सोने के बन गए निर्जीव धातु की मूर्ति की तरह। कोई ऐसा वरदान पाकर सत्ता पर बैठा हुआ है और उसका नतीजा सामने है धन दौलत मौज मस्ती नाम शोहरत सब पाकर भी वास्तव में भूखा है खाली झोला लिए रहता है उठाकर चलने को मगर अब धरती पर चलने की आदत भूल गया है हवा में उड़ने की लत लगी है। अफ़सोस आसमान पर अभी कोई घर बनाकर नहीं रह सकता जिसने धरती पेड़ पौधों से नाता तोड़ लिया उसकी दशा वही जानता है। 15 लाख लेने से पहले ज़रा समझ लेना अंजाम यही हो सकता है।

Friday, 6 November 2020

उज्जवल भविष्य निर्माण का मार्ग तलाश करना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     उज्जवल भविष्य निर्माण का मार्ग तलाश करना ( आलेख ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

आशावादी ढंग से पिछले समय के अनुभव से सबक लेकर हमें विचार विमर्श करते हुए देश समाज और विश्व को तथा मानवता को ध्यान में रखकर भविष्य में कैसे सही दिशा का चयन और सामाजिक मूल्यों का निर्धारण करना है सिलसिलेवार ढंग से चिंतन करने का समय है। जो हुआ किस ने क्या अच्छा किया बुरा किया की बहस में उलझने से बढ़कर इक शानदार समाज और सभी के लिए उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है। जीने को केवल खुद के लिए सुख सुविधाओं की चाहत पर ध्यान देने की भावना को त्यागकर पूरे समाजिक वातावरण को सुंदर बनाने की सोच रखना ज़रूरी है। सभी की भलाई को देखकर आधुनिकता और झूठे आडंबर को छोड़कर सादगी का ढंग और उच्च आदर्श का मानवीय आचरण करना सीखना होगा। हर इक इंसान का जीवन महत्वपूर्ण है अपने रहन सहन में बदलाव कर केवल खुद या परिवार के लिए नहीं बल्कि समाज देश के लिए सोचना समझना होगा। कुछ लोगों का अत्याधिक हासिल करना बड़ी बड़ी महत्वांकांक्षाओं की पूर्णता करने की इच्छा में सीमा से बढ़कर मतलबी स्वार्थी बन जाना अनुचित है। 

देश की सरकार राज्य की सरकारों का स्वास्थ्य शिक्षा रोज़गार और नागरिक के जीने की बुनियादी ज़रूरतों को उनके मौलिक संवैधानिक अधिकार की तरह समझ अपना सबसे पहला कर्तव्य मानकर कार्य और योजना बनाना होगा इसको आज़ादी के सतर साल बाद और कितना इंतज़ार संयम रखने की बात की जा सकती है। खेद है कि शासक वर्ग नेताओं अधिकारीयों नीति बनाने वालों ने इस को लेकर बेहद असंवेदनशीलता दर्शाई है अभी तलक। देश के नागरिक ख़ास और आम या धनवान और गरीब बड़े और छोटे दो हिस्सों में विभाजित कदापि नहीं किये जा सकते हैं। शिक्षा जगत और चिकित्या जगत को भी इनको व्यवसाय नहीं समझ कर वास्तविक उद्देश्य ज्ञान और स्वास्थ्य उपलब्ध करवाने का दायित्व समझ आर्थिक लाभ को बाद में रखना होगा। समाज और सामान्य लोगों को भी शिक्षक और चिकित्सक को आदर और विश्वास पूर्वक स्थान देना सीखना ज़रूरी है। उनको लेकर अनुचित विचार या धारणा रखकर उनसे उच्च मापदंड की अपेक्षा एकतरफा नहीं रखी जा सकती है। 

साहित्य टीवी अख़बार सोशल मीडिया सच का समाज का आईना होने के साथ साथ उचित मार्गदर्शन करने को होते हैं। लगता यही है नाम शोहरत दौलत की चाहत ने इनको भटका दिया है अब इनके पास निडरता पूर्वक सच कहने का साहस बचा नहीं है और अपने लिए मतलब की खातिर झूठ को सच साबित करने लगे हैं। पीत रंग में रंग गई है पत्रकारिता देश की और लेखक सत्ता की रेवड़ियां पाने को चाटुकारिता करने लगे हैं। जिनको उजाला करना था अंधेरों को बढ़ा रहे हैं। धार्मिक राजनैतिक संगठनों संस्थाओं ने अपने संसाधनों का अनुचित उपयोग अपने स्वार्थ सिद्ध करने को करना शुरू कर दिया है जबकि उनका सही उपयोग जनकल्याण और सामजिक उत्थान की खातिर होना चाहिए। देश समाज को पतन की राह ले जाने के अपराधी यही सब हैं। सत्ता ताकत पैसे का पागलपन की हद तक अनुचित उपयोग किया जाने लगा है जो वास्तव में देश की बर्बादी गरीबी और अर्थव्यवस्था की बेहाली का कारण हैं। 

धर्म कोई भी हो उसका मकसद मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर बनाना नहीं मानवता के कल्याण और दीन दुःखी लोगों की भलाई सहायता होना चाहिए। धर्म इंसान को इंसान से बांटने और विषैले वातावरण बनाने को कभी नहीं होते हैं। अंधविश्वास और आडंबर को बढ़ावा देकर लोगों को दकियानूसी विचारों के जाल में उलझाना धर्म के नाम पर अधर्म ही कहा जा सकता है। हमने कुदरती हवा पानी पेड़ पौधे सभी को सुरक्षित रखने का फ़र्ज़ भुलाकर विश्व और पूरी मानवता को खतरे में ला खड़ा किया है। विकास और अपने जीवन को आरामदायक बनाने को हमने भविष्य में इंसान पशु पक्षी सभी के जीवन को संकट में लाने का पाप किया है। बात दवाओं की हो या कोई भी उत्पाद बनाने बेचने की हमने अपने फायदे के लिए अमृत को भी विषैला बनाने तक का आपराधिक आचरण किया है। अंजाम सामने है हम पल पल मौत के साये में मर मर कर जीने को विवश हो गए हैं। सवाल सभी को अपने अपने हिस्से का जुर्म स्वीकार कर खुद को बदलना है खुद अच्छे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण का मार्ग तलाश करना है।

Tuesday, 3 November 2020

बेगुनाही की सज़ा मिलती है ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    बेगुनाही की सज़ा मिलती है ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

काली रात के अंधेरे में सुनसान वीरान जगह उन सभी बड़े बड़े लोगों की दुनिया से बचकर इक दूसरे से भी छुपकर जाने किस से बैठक है ये समझना ज़रूरी था। हुआ ये कि मैं पंडित जी के कहने पर ऐसी जगह तलाश करने गया था जिस जगह मुर्गी को काटने पर कोई देखने वाला नहीं आस पास हो। मगर उनको देख कर हैरानी हुई उनको क्या छुपकर करना है। राजनेता धर्म उपदेशक बड़े धनवान लोग तथाकथित भगवान लोग उद्योगपति समाज सेवक देश कल्याण समाज कल्याण की बात करने वाले शासन की बागडोर जिनके हाथ रहती है अधिकारी शासन करने वाले सभी इक साथ फिर भी अलग अलग। तभी महाभारत सीरियल वाला मैं समय हूं की आवाज़ वाला घूमता हुआ गोलाकार पहिया नज़र आया। मुझसे मुख़ातिब होकर बोला आज पहली बार आये हो भूल से भटककर चले आये हो नहीं जानते पहले जान लो समझ लो ये सब अकेले अकेले हैं कोई किसी को देख नहीं सकता है आज के बाद तुम भी इधर आओगे तो मुझे छोड़ किसी को देख नहीं सकोगे मगर आज तुम खामोश रहकर देखना सच क्या है। ये लोग रोज़ इक कथा का पाठ करते हैं और साल दो पांच साल बाद इसी तरह मेरे पास आते रहते हैं जब उनको ज़रूरत होती है। तुम जान लो समझ भी लो लिखना चाहो लिख भी सकते हो कथा एक ही है मुझे हर बार दोहरानी पड़ती है। अचानक बैठने को मुलायम आसन मेरे सामने और सभी जो इक दूजे के होने की बात से अनजान थे उनके सामने था बैठने का आदेश मिला समय का सभी बैठ गए। आंखें खुली भी बंद भी क्योंकि कुछ भी गोलाकार पहिये को छोड़कर दिखाई नहीं दे रहा था। 
 
कथा को ध्यानपूर्वक सुनिए आवाज़ आई थी। ऊपरवाले ने कलयुग में सभी को इंसान बनाकर भेजा था आदमी बनकर गुनाह करने की हसरत रहती है आप सभी समझदार लोग गुनहगार हैं मगर गुनाह करने को अपना अधिकार मानते हैं। ऊपरवाला चाहता तो कोई गुनाह कर ही नहीं सकता जैसे आप सरकार पुलिस न्याय करने वाले जब किसी मुजरिम को पकड़ना होता है तो बच सकता नहीं है , समझ गए मतलब। उसने आपको चार दिन की ज़िंदगी गुनाह करने को ही दी है। आपको मालूम नहीं इक शायर कहते हैं " इक फुर्सत ए गुनाह मिली  वो भी चार दिन , देखे हैं हमने हौंसले परवरदिगार के "। फैज़ अहमद फैज़ की बात को आप सभी लोगों ने बिना पढ़े समझा तो नहीं अपना लिया है। बार बार चले आते हैं सोचते हैं चार दिन की ज़िंदगी कभी ख़त्म नहीं हो पर मैं विधाता नहीं समय हूं मुझे अपनी रफ़्तार कायम रखनी है आपके पास जितने दिन हैं जी भर कर गुनाह कर लो ऐसा नहीं  सीमाब अकबराबादी की तरह कहते रहो " उमर ए  दराज़ मांग के लाई थी चार दिन , दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में "। आप लोग ये शेर किसी शासक का समझते होंगे क्योंकि आपको जाने माने शायरों के अशआर गलत और बिना नाम के पढ़ना कहना गुनाह लगता नहीं जबकि ये जुर्म बेलज़्ज़त है। ग़ालिब से दुश्यंत कुमार तक को आपने जाने कितनी बार घायल ज़ख़्मी ही नहीं क़त्ल भी किया है। ये गुनाह करने को आपको इंसान नहीं बनाया गया था। चोरी करना किसी भी लिखने वाले की बात ऐसा अपराध है जिसकी माफ़ी मिलती नहीं है। ये जो ऊपरवाले की लिखी किस्मत को बदलने की बात कहते हैं उनसे बचकर रहना भगवान उनको कुछ नहीं समझा सके कोई और क्या समझाएगा खुद को विधि का विधान बदलने वाले अपनी तकदीर नहीं बदल सकते और झूठे दावे करते हैं आपकी समस्याओं का समाधान करने को राजनेता टीवी चैनल तक ऐसे भविष्य बांचने वालों को बढ़ावा देकर गुनाह से बढ़कर गुमराह करने की महापाप करते हैं। उनके झांसे में कभी मत आना अपने अच्छे बुरे कर्म का नतीजा उनको भी सामने आता ही है। 
 
बंदा गुनहगार है कौन नहीं जानता मगर सबकी हसरत होती है गुनाह करना मगर गुनहगार साबित नहीं होना अदालत यही करती हैं बेगुनाह सज़ा पाते हैं गुनहगार बच निकलते हैं। बेक़सूर भी बड़े दिलचस्प होते हैं , शर्मिंदा हो जाते हैं , ख़ता के बग़ैर भी। आप सभी ख़ास वीवीआईपी कहलाने वाले बेशर्म ही नहीं चिकने घड़े हैं आपकी असलियत सामने आने पर भी आपको लज्जा नहीं आती है और अपने गुनाह स्वीकार नहीं करते आरोप झूठे हैं मनघड़ंत हैं खुद को निर्दोष बताते हैं। झूठ बोलने और बेशर्मी की आदत आपकी महारत है क्योंकि आप खुद अपने आप से अपने मन आत्मा तक से सच छुपाते हैं। देश  समाज और दुनिया आपको जाने क्या मानती है जो आपकी असलियत से विपरीत है। आपको भरोसा है कोई ऊपरवाला आपको आपके गुनाहों की कभी सज़ा नहीं देगा जब भी ऐसी घड़ी आई आप को माफ़ी मांगना उल्लू बनाना आता है और दुनिया को दिखाने को आप यही किया करते हैं धर्म ईश्वर की उपासना करने मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाकर माथा टेकने और बहुत कुछ करने का दिखावा मगर आचरण धर्मानुसार कभी नहीं करना। यही कलयुग की पहचान है गुनाह करने वालों को इनामात और निर्दोष लोगों को बेगुनाही की भी सज़ा मिलती है। आम लोग भोले नादान लोग कहां ये समझते हैं आप जैसे ख़ास लोगों की तरह कि जब तक ज़िंदगी है मौज मस्ती से रहना है बाद में देखा जाएगा अगर कोई ऊपरवाला हिसाब मांगेगा तो रहम की भीख मांगकर बच जाएंगे क्योंकि वो दयालु है लाख बार भूल माफ़ करता है सुनते हैं। यूं भी मरने के बाद की चिंता में अभी जीना कैसे छोड़ दें भला। हमारे बाद हमारे लिए श्र्द्धांजलि सभा में कितने लोग ऊपरवाले से विनती करेंगे उनकी सुनकर ही सही वो हमें स्वर्ग जन्नत मोक्ष कुछ तो दे ही देगा। 
 
आप सभी जानते हैं जो आप सभी से चालाक चतुर सुजान कहलाता है उसने कैसे अपने से पहले के लोगों को देश समाज की बर्बादी का दोषी करार देने का काम किस ढंग से किया है। अब उसने सबसे बढ़कर देश को समाज को बर्बाद करने का कीर्तिमान स्थापित किया है मगर किसी की मज़ाल है जो उसके होते उसकी ये वास्तविकता सामने लाने की कोशिश करे जब उसने उन सभी को मुजरिम घोषित कर रखा है जो भी उसकी आलोचना करता है या उसके गुनाह का हिसाब बताता है। उसके बाद मालूम नहीं क्या हुआ समय का पहिया और तमाम लोग जो गुनाह करने का सबक पढ़ने आये थे गायब थे और मैं अकेला खड़ा था उलझन लिए कि जो था वो सच था कल्पना थी या कोई ख्वाब था आधा जागते आधा सोते देख याद करता कुछ भूल जाना चाहता हुआ।
 
 

 
 

Sunday, 1 November 2020

किया है बर्बाद मसीहा बनकर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       किया है बर्बाद मसीहा बनकर ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    जनता इक बेबस महिला है जिसको तलाश थी ऐसे देवता की जो उसको आदर पूर्वक सम्मान के साथ बराबरी के अधिकार पाने को भरोसा दे सकता हो। ये जिसको खुद उसने चुना था अपने वादे निभाना भूलकर छिपे इरादे पूरे करने को लोकलाज को त्यागकर सत्ता के मद में चूर खुद को सेवक नहीं मालिक समझ बैठा है। रखवाली करने की जगह जो पहले पुरखों ने छोड़ा था उसको मौज मस्ती में गुलछर्रे उड़ाने अंधे की तरह रेवड़ियां बांटने अपनों को देने में लगा है। घरबार छोड़ चुका है लगता है उसका मत है अवसर मिला है शान पूर्वक जी भरकर उड़ाओ खूब तमाशे लगाओ महफ़िल लगाओ अपनी वाह वाह करवाओ और ऐसा करने वालों को खज़ाने की चाबी का मालिक बनाओ। जनता नासमझ है उसको उल्लू बनाओ और खुद अंधे होकर रास्ता सबको दिखाओ। क़र्ज़ लो घी पिए जाओ कहावत पुरानी तुम दोहराओ , संतान अच्छी तो धन संचय क्यों खूब खाओ खिलाओ और संतान खराब तो धन संचय क्यों वो उड़ाएगी तुम भी उड़ाओ। जनता से कह दो जहनुम में जाओ।
 
 जनतारानी लिखने बैठी है अपनी बदनसीबी की सच्ची कहानी। तुम नादान हो भोली हो हर किसी ने तुमको लूटा है मुझसे तुम्हारा दर्द तुहारी पीड़ा देखी नहीं जाती। बस अब चिंता छोड़ दो दुःख भरे दिन बीते अब अच्छे दिन आने वाले हैं मुझे वरमाला पहना दो अपने को मेरे हवाले कर सुनहरे रंगीन सपने सजाओ। मैं जो भी कहूं हर बात पर ताली बजाओ राम नाम को छोड़कर मेरे नाम की धुन पर नाचो झूमो गाओ। सबको समझा तुमने मालिक मुझे सेवक अपना बनाओ मुझे भी आज़माओ मनवांछित फल पाना है मेरे गीत गाओ। चाय बनाकर पिलाऊंगा पकोड़े सबसे तलवाऊंगा सबको भूखा रखना है मौज अकेला खुद मनाऊंगा। कोई कैसे तुझको लूटेगा जब पास नहीं कुछ छूटेगा मैं सबकी लुटिया डुबाऊँगा बर्बाद चमन कर जाऊंगा। नफरत की आग लगानी है मेरी यही मेहरबानी है। इक भूल की मिली सज़ाएं हज़ार जनता नहीं देख पाई झूठ का नकली किरदार जो नहीं था अपनी पत्नी का भी वफ़ादार उसको मान लिया कैसे समझदार होशियार। खबरदार खबरदार चौकीदार समझा निकला बटमार। क्या राजनीति कैसी सरकार चौपट सब का कारोबार जीना मरना दोनों दुश्वार कर दिया सब को बदहाल बीमार। समझा था है जीत सभी की लेकिन बैठी जनता अपना सब कुछ हार। कुर्सी पर बैठा है दुनिया भर को ठगता है दोस्त नहीं किसी का रखता है दुनिया से बैर कौन कबीर किसको बतलाए मांगे कौन सबकी खैर। मौज मनाई खेला खेल भी खेल खेल में सब कुछ तोड़ा कुछ भी साबित कहीं न छोड़ा। उसका हाथी उसका घोड़ा लंगड़ा सबसे तेज़ भी दौड़ा सबकी टांगें बांधी सबकी राह में डाला रोड़ा खुद धरती पर कदम नहीं रखता उड़ता हवा में उसका सपनों का घोड़ा। उसका कुटंभ बढ़ता जाता जोड़ा साथ अपने सब से तोड़ा सब उसी के पास है फिर भी लगता है उसको है अभी थोड़ा। 
 
    याद करो बात पुरानी उसने हरदम की मनमानी सबको याद आई थी नानी जब उसने बिन समझे सब पर लादी जो भी ठानी। पैसा लत्ता सोना चांदी पहना हुआ जिस ने जो गहना सब कुछ जनता से लेकर बोला था तुमको होगा ये सब सहना। भरी तिजोरी खाली कर दी जाने क्या खोया क्या पाया कितने देशों की सैर की लेकिन लेकर कुछ भी नहीं आया। बर्बादी करता रहा और बर्बादी का जश्न मनाया जिस पर शर्मिंदा होना था उन बातों पर था इतराया। महल बनाने के सपने थे जो घर था बेचा बिकवाया सुबह उजाला भरी दुपहरी अंधियारा छाया। फिर से कहनी वही कहानी झूठ की ज़ुबानी सच की कहानी , झूठ और सच नदी में नहाने गये झूठ बाहर पहले ही आया सच के कपड़े पहन चल दिया और झूठ ने अपना नाम सच बताया। सच नहाकर बाहर आया देख कर उसका सर चकराया झूठ का लिबास पड़ा था नदी किनारे सच के कपड़े झूठ पहन गया था सच नंगा है घबराया। झूठ के कपड़े सच कैसे पहनता सच पर कैसा संकट आया। झूठ सिंहासन पर बैठा है सच का क़त्ल करने वाला यूं सच का पैरोकार कहलाया। पंजाबी का गीत याद है आया है :-
 
                          " सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये , 
                           लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय। 
                          ओ की मैं झूठ बोलिया की मैं कुफ़र तोलिया "। 
 
इक कहानी राजा नंगा है की थी जिस में ठग राजा को ठगने का काम कर गए बेचारा छोटा बच्चा सच बोलकर सज़ा का हकदार बन गया। अभी पढ़ा कोई पढ़ा लिखा विदेश से भारत लौटा शख़्स खूब धन देकर किसी से अलादीन का चिराग़ खरीद कर ठगी का शिकार बन गया। ठगने वाले पकड़े गए हैं पुलिस ने धर लिया है। जब मामला अदालत जाएगा तब समझ आएगा कौन सच्चा कौन झूठा सामने आएगा। पढ़ लिख कर लोग जब हर किसी की चिकनी चुपड़ी बातों में फंस जाते हैं तब मसीहा बनकर राजनेता से अभिनेता और खिलाड़ी से लेकर मदारी तक योग से रोग तक का धंधा करने वाले अनहोनी को होनी होनी को अनहोनी कर दिखाते हैं। अमर अकबर एंथनी मिलकर गाते हैं। हम हाथ मलते रह जाते हैं पहले मसीहा बनाते हैं फिर बनाकर पछताते हैं।
 

                            

 

Friday, 30 October 2020

इम्युनिटी बढ़ाने का तरीका ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    इम्युनिटी बढ़ाने का तरीका ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

           ये शोध मैंने किया है घर बैठे ही किसी लैब या अस्पताल में नहीं जाना पड़ा ज़रूरत ही नहीं है। मेरी दरियादिली देखिये मैंने अपने शोध को सार्वजनिक करने का काम खुलेआम किया है कोई मुनाफ़ा नहीं कमाना चाहता न ही ज़रा भी घबरा रहा हूं कि कोई खफ़ा हो सकता है। आजकल कितने विज्ञापन देखने को मिल रहे हैं इम्युनिटी बढ़ाने को कुछ भी बेचने का धंधा होने लगा है। किस किस उत्पाद की बात करें हम्माम में सभी नंगे हैं। मैंने चिंतन किया ध्यान लगाया अपने अध्यन और तजुर्बे को समझा तब जाना कि मेरे ज़िंदा रहने का सबसे बड़ा कारण मेरा विवाहित होना है क्योंकि अधिकांश कुंवारे पुरुष इतनी लंबी आयु तक जीवित रहते देखे नहीं हैं। महिलाएं समझती हैं ये उनकी देखभाल का नतीजा है और हमने बिना किसी सबूत महिलाओं की करवा चौथ से लेकर हर सफल पुरुष के पीछे किसी महिला का हाथ होने तक हर बात को स्वीकार कर कर लिया है। कल किसी महिला ने लिखा था महिलाएं अच्छा पति पाने को उपवास रखती हैं फिर भी उनको मनपसंद जीवनसाथी मिलता नहीं है। हर महिला अपने पति को जीवन भर सुधारती रहती है मगर पूर्णतया ऐसा होता नहीं जबकि पति अधिकांश कहते हैं अपनी पत्नी को तुझसे अच्छी मुझे कोई नहीं मिल सकती थी। ऐसा नहीं कहने वाले पति सुखी जीवन का रहस्य समझने में असफल रहते हैं। जो मिल गया उसी को मुकदर समझ लिया पुरुष की सोच यही होती है खुद अपने बिछाये जाल में फंसे चाहे माता पिता की मर्ज़ी के आगे सर झुकाया क्या फर्क पड़ता है। चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगे राम हर विवाहित अविवाहित को ये सलाह देकर सोचता है अपने जैसा हाल उसका भी होना चाहिए। दोस्त दुश्मनी निभाने को शायद यही करते हैं एहसान जतलाते हैं तेरी शादी मैंने करवाई थी। बेचारा पत्नी के सामने बोल भी नहीं सकता मत करता ये एहसान अच्छा होता। 
 
        शादी करके पछताते हैं तो अब मत पछताना क्योंकि शादी से आपको वो मिला है जो आजकल हर कोई चाहता है इम्युनिटी हासिल करना बढ़ाना ताकि ज़िंदा रहने को बीमारी से लड़ने की ताकत मिल सके। किसी भी रोगाणु से लड़ने की क्षमता उस से लड़कर उसे हराकर मिलती है। पत्नी आपको हर रोज़ कितनी बार लड़ने का अवसर उपलब्ध करवाती है। जानते हैं पत्नी से जीतना मुमकिन नहीं फिर भी हार नहीं मानते हैं कहने को गलती मान भी लेते हैं मगर दिल से कभी नहीं स्वीकार करते। ये भला कैसे कोई कर सकता है कि हर बार गलती पति की और पत्नी हमेशा ही सही हो। ये जंग जारी रहती है और आपको लड़नी पड़ती है लड़ाई चाहो या नहीं भी चाहो लड़ना मज़बूरी है। हम सभी वास्तव में खतरों के खिलाड़ी हैं हम खतरों को खुद अपने पास बुलाते हैं घबराते नहीं हैं खतरों से इक व्यंग्य कवि पत्नी को आफ़त मुसीबत से भी बढ़कर आतंकी बताते थे। खुद ही अपने घर पर बंब फैंकने को कहते थे। 
 
           मुहब्बत में और जंग में सब जायज़ होता है शादी मुहब्बत भी है और जंग भी ये कमाल का बंधन है अब तो कोई पुरुष और महिला कहीं भी पार्क बाज़ार या सिनेमा हाल से होटल तक लड़ते बहस करते नज़र आएं तो उनके पति पत्नी होने का पक्का सबूत समझा जाता है। वैसे तो दुनिया में महाभारत से लेकर कितनी ही लड़ाईयां किसी महिला के लिए या किसी महिला के कारण हुई हैं। लेकिन पति पत्नी की लड़ाई उन सभी से बड़ी और निरंतर जारी रहने वाली जंग है जिस को लेकर संख्या गिनती सुपर कंप्यूटर भी करने में नाकाम हैं। शादी आपकी सहनशक्ति का इम्तिहान भी है और आपके अदम्य साहस का सबूत भी है। आधुनिक सभ्यता वाले देशों में छोटी छोटी बात पर पति पत्नी अलग हो जाते हैं जबकि भारत में लड़ झगड़ कर भी साथ जीना संग संग मरना की कसम खाई जाती है निभाई जाती है। सात जन्म यही भूल दोहराई जाती है। आपस में लड़ने झगड़ने की ताकत हर दिन आज़माई जाती है कुछ इसी तरह से क्षमता बढ़ाई जाती है। हार जीत खेल की भावना से स्वीकार करते हैं हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं हर बार करते हैं। 
 
        अपनी इम्युनिटी बढ़ाने का ये सबसे बढ़िया तरीका है इस काम के लिए कुछ भी और नहीं चाहिए। बस इक पति बस एक पत्नी होना बहुत है। मुझे डर है कोई इसका गलत मतलब नहीं निकाल ले और सोचने लगे कि दो चार शादी करने से और अधिक फ़ायदा हो सकता है ये बेहद नुकसानदायक साबित हो सकता है क्योंकि एक साथ कितनी बिमारियों से कोई लड़ सकता है। सावधान जिनको पहले कई रोग मधुमेह या हृदय जिगर गुर्दे के होते हैं उनको खतरा बढ़ जाता है। इम्युनिटी बढ़ाने को एक ही काफी है झूठ कहना नाइंसाफी है। विवाह करवाने वाले मेरे शोध का इस्तेमाल नहीं कर सकते ये केवल निजी उपयोग के लिए है इसका वाणिजयक उपयोग करने की अनुमति कदापि नहीं है। चेतावनी आपके विवाह करने या नहीं करने तथा पति पत्नी के लड़ने झगड़ने का निर्णय आपका खुद का होगा और हम इसकी कोई ज़िम्मेदारी अपने पर नहीं लेते हैं। एलोपैथिक दवाओं की तरह इस से भी नुकसान फ़ायदे का गणित आपका होगा। ये काल्पनिक कथा की तरह है जिस का किसी से कोई संबंध नहीं है और अगर आपको लगता है कि ये आपसे संबंधित है तो ये केवल एक इत्तेफ़ाक़ की बात है।

Wednesday, 28 October 2020

मेरे दोस्त दोस्ती और मेरा लेखन ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

  मेरे दोस्त दोस्ती और मेरा लेखन ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

 ज़िंदगी में इक अच्छा सच्चा दोस्त दुनिया के सबसे बड़े खज़ाने धन दौलत से बढ़कर होता है। मैंने अपने लेखन के बारे पच्चीस तीस साल पहले इक चंडीगढ़ के अख़बार को साक्षात्कार देते समय कहा था कि मेरा लिखना दोस्त की तलाश है। दोस्ती को लेकर बचपन से मेरी सोच यही रही है कुछ लोग समझ नहीं पाते कि भला कोई किसी दोस्त के नहीं रहने पर भी 18 साल बाद हर दिन उसकी बात कैसे कर सकता है। मैंने डॉ बीडी शर्मा को कभी भी भुलाया नहीं है भूलना संभव ही नहीं उसने जो लोग आपकी आत्मा में बस कर आपका हिस्सा बन जाते हैं। कभी साथ लिखने वाले लेखक कहते थे आपको लिखने को दोस्ती विषय क्यों मिलता है। दोस्त दोस्ती शायद कम लोग इसका मतलब समझते हैं। साथ साथ मौज मस्ती करने वाले शाम को मिल बैठ महफ़िल जमाने पीने जाम से जाम टकराने वाले आपके साथ कारोबार धंधा करने वाले कभी मिलकर घूमने जाने वाले वास्तव में दोस्त हों ज़रूरी नहीं। ऐसे रिश्ते दुनियादारी के मतलब और ज़रूरत को बनते बदलते हैं आज साथ हैं कल कोई वास्ता नहीं होता उसको दोस्ती कहना सही नहीं है। कभी ऐसा एहसास हुआ कोई दोस्त आपको याद आया और बिना किसी मतलब आप चले गए उसके पास मिलने या कोई चला आया आपके पास जब आपने सोचा ही था। इक घटना याद आई है कॉलेज में पढ़ते थे मैं किराये पर कमरा लेकर रहता था अकेला ही , जाने क्यों चाय बनाने लगा तो दो कप चाय बनाकर दो कपों में डालकर बैठा था मुझे नहीं पता था दोस्त खिड़की से देख रहा था दो कप चाय डालते और समझा कोई होगा कमरे में साथ जो खिड़की से दिखाई नहीं दे रहा। फिर खुले दरवाज़े से भीतर आकर झांकने लगा कोई भी तो नहीं था , कहने लगा ये चाय दूसरा प्याला किस के लिए बनाया है। मैंने कहा जाने क्यों लग रहा था तुम आने वाले हो यही सोचकर एक नहीं दो कप चाय बना ली है। ये पागलपन दोस्ती होती है मेरी दोस्ती की चाहत हमेशा अधूरी रही है क्योंकि किस्मत में जिन दोस्तों से दिल मिलता उनका साथ अधिक दिन रहता नहीं था। दोस्ती बनी रहती मगर ज़िंदगी और हालात दूरी बनाये रहते मिलते तो लगता ज़िंदगी यही है बिछड़ के भी प्यार और अपनापन घटता नहीं था। कोई समय था चिट्ठी लिखते फिर फोन पर बात होने लगी जब मिल जाते तो लगता कभी बिछड़े ही नहीं। 
 
   दोस्त वह होते हैं जिनको आपको बताना नहीं पड़ता आप खुश हैं या उदास हैं। बिना बताये आपकी दशा समझते हैं आपकी हर भावना जान लेते हैं आपकी ख़ुशी में आपसे बढ़कर खुश होते हैं और आपको उदास देख कर उनकी पलकें भीग जाती हैं। आपको इक दोस्त ऐसा चाहिए होता है जिस के पास जाकर उसके कांधे पर सर रखकर आप रो भी सकते हैं और खुश हैं तो सबसे पहले अपनी ख़ुशी बतला कर ख़ुशी को हज़ार गुणा बढ़ा भी सकते हैं। मैंने हमेशा इक ख़्वाब सजाया है कि कोई इक घर हो जो दोस्ती का मंदिर हो जहां बस दोस्त और दोस्ती की बात हो कोई दुनियादारी की रस्मो रिवाज़ की मतलब की बात नहीं हो। प्यार की अपनत्व की बात हो बेगानापन आस पास नहीं हो ऐसे घर में कोई सुविधा सुख साधन उपलब्ध नहीं होने का कोई फर्क नहीं महसूस हो जन्नत से बढ़कर लगे जो छोटा सा घर दिल में जगह बड़ी बड़ी होनी चाहिए। बड़े ही खुशकिस्मत लोग होते हैं जिनको ज़िंदगी में ऐसे अच्छे दोस्त मिलते हैं। दोस्ती फिल्म आपने देखी है पुरानी श्वेत श्याम उसके गीत क्या लाजवाब थे। कोई जब राह न पाए मेरे संग आये की पग पग दीप जलाए मेरी दोस्ती मेरा प्यार। 
 

 

Monday, 26 October 2020

ऊंची शान झूठी पहचान ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

     ऊंची शान झूठी पहचान ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    जगमग रौशनियां क्या खूबसूरत नज़ारे रंग बिरंगे फव्वारे धरती पर चांद सितारे देखने आते हैं कितनी दूर से लोग कितने सारे। सबको भाते हैं दिलकश लाजवाब चमचमाते महल जैसे धार्मिक स्थल वाह-वाह भगवान को तमाशा  लिया बना रे। ईश्वर के दर्शन की प्यास नहीं सपनों सी दुनिया का देखने का लुत्फ़ उठाते हैं भजन फ़िल्मी धुन पर झूमते नाचते गाते हैं। गुरूजी कैसी कैसी लीला रचाते हैं कभी राधा कभी मीरा कभी कान्हा बन जाते है कभी किसी रूप में सजते संवरते हैं हाथी घोड़ा पालकी रथ पर सवारी निकलती है कभी आकाश में विमान से पुष्प बरसाते हैं। ईश्वर खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस सभी एक हैं लेकिन ये कौन हैं जो इनको अलग अलग समझते हैं समझाते हैं उल्टी गंगा को बहाते हैं खुदा के बंदों को क्या सबक पढ़ाते हैं। क्या भगवान धन दौलत शान ओ शौकत दिखलाते हैं ये सब देखकर मन में कितने सवाल आते हैं धर्म की किताब कभी पढ़ी भी है पढ़कर समझी भी या बस कहने को सर झुकाते हैं। भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस जिन लोगों ने दुनिया बनाने वाले विधाता की कल्पना की होगी चिंतन मनन किया होगा उन्होंने ये कदापि नहीं सोचा होगा कि कभी धर्म आस्तिकता को लेकर मानवता को छोड़कर ऐसे आडंबर की बात हर कोई हर तरफ करता मिलेगा। 
 
   हमने संसद बनाई उसको मंदिर कहा जनकल्याण की देश समाज की भलाई संविधान की भावना को महत्व देने को मगर उसका बदला रंग ढंग सत्ता हासिल करने का साधन और अपराधी बाहुबली लुटेरे सत्ता के लोभी नेताओं घोटालेबाज़ों की अय्याशी का अड्डा बन गया है। जनता की सेवा करने को शानदार दफ्तर और बड़ी बड़ी आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित इमारतें नहीं उस में नियुक्त अधिकारी कर्मचारी वर्ग की निष्ठा और समर्पण ईमानदारी से कर्तव्य पालन होना ज़रूरी है। जिन महान लोगों को हमने आदर्श घोषित किया उनकी ऊंची मूर्तियां शानदार समाधिस्थल की नहीं उनके दिखलाये मार्ग पर चलकर उच्च नैतिक मापदंड कायम रखने की ज़रूरत है। आपने मंदिर को बड़ा करने का काम किया है भगवान से मंदिर का कद बड़ा लगने लगा है। कोई सच समझने समझाने वाला सामने नहीं आता है जो धर्म क्या है ईश्वर की उपसना इंसान और इंसानियत की बात की अवधारणा को स्पष्ट करता। 
 
  जिस समाज में करोड़ों लोग भूखे नंगे बदहाल जीवन जीने को विवश हैं उस में वास्तविक धर्म दीन दुःखी लोगों की सहायता उनको जीने को बुनियादी सुविधाएं शिक्षा रोज़गार स्वस्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाना होना चाहिए। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे  बड़े विशाल और सोने चांदी के गहनों से जड़ित सिंघासन ईश्वर की उपासना को आवश्यक कदापि नहीं हैं। हम इन पर जितना धन खर्च करते हैं उतना मानव कल्याण को सोचकर जिनको वास्तव में ज़रूरत है उनकी सहायता करते तो यकीनन देश में कोई भूखा नंगा बदहाल नहीं रहता। आपने  कभी किसी किताब में आकार को लेकर अवश्य पढ़ा होगा अमुक दैत्याकार था अर्थात बड़ा आकार दैत्य का होता है। कितने मंदिर में भगवान देवी देवता किसी शिला या पत्थर की पिंडी की देवी अथवा कोई पांव के निशान या  आंखें आदि अर्चना करने को होते हैं और कितने विश्वास से उनके दर्शन लोग करते हैं। उपासना ईबादत नाम सिमरण जैसे कार्य करने को बड़े बड़े धार्मिक स्थल या मूर्तियों की ज़रूरत होती नहीं है। वास्तविक ध्यान समाधि शांत मन से एकांत में ही संभव है शोर शराबा भीड़ कभी ईश्वर परमात्मा के चिंतन के लिए उचित नहीं हो सकते हैं।  ईश्वर भगवान खुदा में भरोसा आडंबर पूर्वक दिखाने की नहीं अंतर्मन से महसूस करने की बात है। 
 
  हमने हर चीज़ को वास्तविक मकसद छोड़कर भव्यता और दिखावे को शानो शौकत का अवसर समझ लिया है। बचपन से बड़े होने जीने से जीवन के अंत तक हमने जीवन शैली को वास्तविक ज़रूरत से अधिक निरर्थक आडंबरों से भरकर खुद अपने लिए कितनी दुश्वारियां खड़ी कर ली हैं। हमारी कितनी समस्याएं खुद हमने पैदा की हैं इसी तरह बेकार बेमकसद के रंग ढंग रीति रिवाज़ और पुरानी दकियानूसी चीज़ों अंधविश्वास को बढ़ावा देकर। आधुनिक युग और इक्कीसवीं सदी में हम अभी भी गलत कुरीतियों का बोझ ढोने को बाध्य हैं। प्यार करने को ताजमहल बनवाना ज़रूरी नहीं है ये समझना चाहते हैं तो ग़ज़ल फिल्म में साहिर लुधियानवी जी की नज़्म अवश्य पढ़ना और ईश्वर अल्लाह खुदा वाहेगुरु को जानना है तो नानक कबीर को पढ़ना समझना। ईश्वर को पाना है तो आपको खुद अपने भीतर झांकना होगा बाहर कहीं खोजने की ज़रूरत नहीं है। मेरी इक ग़ज़ल शायद आपको पसंद आएगी पेश है आखिर में। 
 

 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु ) 
 

           साहिर लुधियानवी की नज़्म यूट्यूब के सौजन्य से आभार सहित।




 
      
 

                        

Sunday, 25 October 2020

दशहरे पर रावण का संदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       दशहरे पर रावण का संदेश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

    मन की बात कोरोना की चर्चा को छोड़कर पहले मतलब की बात करते हैं। किसी भी विषय पर तीन पक्ष हो सकते हैं इक हमारा मत क्या है दूजा उनका मत जो हमसे सहमत नहीं हैं और एक मत सच का होता है। दुनिया वाले हर तथ्य को अपने अपने अलग अलग नज़रिए से देखते हैं अपनी जगह अपनी सुविधा से उचित अनुचित की व्याख्या समझते हैं समझाते भी हैं। कल जो कहते थे तब वो ठीक था आज जो उसके विपरीत कहते हैं आजकल वही ठीक है इसका उदाहरण सत्ता मिलने से पहले और सत्ता मिल जाने के बाद राजनेताओं की बदली सोच और विचारधारा को देखकर समझ सकते हैं। सत्ता खोने वाले भी वास्तविकता को समझ पाते हैं जब चिड़िया खेत को चुग गई होती है। ट्विटर की चिड़िया की भाषा बदलने का यही कारण है। आज ये भूमिका समझाने की ज़रूरत है क्योंकि चाहे जो भी हो आज का दशहरा पर्व रावण का ही है आज राम की कृष्ण की बात नहीं रावण की बात करते हैं। दशहरे में जब पिछले साल से और ऊंचा रावण बनाकर जलाने का उत्सव मनाते हैं तब राम और लक्ष्मण दोनों रावण की परिकर्मा करते हैं उसको आदर देते हैं ये शायद हमने समझा नहीं दस दिन रामलीला देखी सबक लिया नहीं कोई भी। राम जीते रावण हार गया और समाज जीतने वाले की जय बोलता है लिखने वाले विजयी का गुणगान करते हैं। युद्ध सीता माता को लेकर नहीं हुआ था लड़ाई का कारण लक्ष्मण का रावण की बहन की नाक काटना और रावण का राम की पत्नी का अपहरण करना था दोनों ने इक दूजे को अपमानित करने को इक महिला को औज़ार बनाया जो अभी भी किया जाता है। क्या नारी शक्ति की बात अभी भी खोखले स्लोगन तक है या अब महिला का महत्व और आदर बिना किसी पुरुष के नाम के साथ जुड़े भी होता है। महिला क्या खुद इक शख़्सियत बन गई है जिसे पिता भाई पति बेटे के रूप में किसी पुरुष की कोई आवश्यकता नहीं है। रावण को आज इस विषय पर संबोधित करना पड़ा है क्योंकि भगवान राम सीता की अग्निपरीक्षा लेकर भी उस को अपनाते नहीं हैं और उनका उपासक तुलसी साफ कहते हैं ढोल गंवार पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी। अर्थात इनको जकड़ कर बंधन में बेड़ियों में कसकर रखना चाहिए इनको ढील देने से ये जाने क्या कर सकते हैं बिगड़ने का डर रहता है। 
 
   रावण जी मंच पर हैं माईक पकड़े और सभी कैमरे उनकी तरफ सीधा लाइव उदघोष की शुरुआत करने को तैयार। हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं अभिवादन सभी का जो जहां हैं मेरा अभिभाषण सुनने को व्यकुल हैं। शायद मुझे इसकी कल्पना नहीं थी कि सदियों बाद मेरा नाम ख्याति और मुझे आदर्श मानने वाले केवल लंका नहीं भारतवर्ष ही नहीं विश्व भर में इस कदर मुझे अपना समझ हर साल मुझे ज़िंदा रखने की कोशिश करते रहेंगे। जैसा कि आपको विदित है ये दुनिया ये समाज बहते पानी की तरह आगे बढ़ता रहता है रुकना थमना विनाश की निशानी होती है इसलिए मुझे आपको सदियों पहले वाले राम रावण के शासन और समाज वाले समय से आगे बढ़कर आधुनिक काल इस इक्कीसवीं सदी के रंग ढंग और सभ्यता के अनुसार समझने सोचने और जीने की बात कहनी है। आज किसी की बहन नाक कटवा कर घर वापस आती है तब कोई बिना समझे जाने जिसने नाक काटी उसको सज़ा देने नहीं चल पड़ेगा। जानेगा उसने जिन को पसंद किया उनसे प्यार का इज़हार किया वो क्या वास्तव में इतने अच्छे समझदार और गुणवान हैं और क्या उनके किसी के प्यार के अनुरोध को स्वीकार नहीं करने का कारण उनका केवल एक महिला से विवाह करने की परंपरा है। जब ये मालूम होगा कि दशरथ जी की चार रानियां थीं तब राम लक्ष्मण पर भी कोई रोक कदापि नहीं थी और सीता जी अपना पति स्वयंबर में चुन सकती हैं तो सभी महिलाओं को ये अधिकार होना चाहिए। कोई भी अस्वीकार कर सकता है प्यार या विवाह के अनुरोध को मगर इस के लिए अपमानित नहीं किया जा सकता है। 
 
   राजनीति हो या फिर शादी संबंध बनाने की बात जल्दबाज़ी करना सही नहीं होता है। मुझे घटनास्थल पर जाकर देखना समझना सोचकर निर्णय करना उचित लगा। ऐसा संभव था कि राम या लक्ष्मण मुझे अपनी बहन के योग्य लगते तो उनको अपहरण कर लाता अपनी बहन से क्षमा मंगवा कर विवाह करवाता। लेकिन आप खुद सोचकर बताना कि बनवास में कोई पत्नी सोने का हिरण पाने की चाहत करती है तो इसका क्या मतलब है। महिलाओं को अपने पति से असंभव को संभव करने की उम्मीद रखने का अंजाम यही होता है , हर पति को भी अपनी जीवन संगिनी से ये कहने का साहस होना चाहिए कि कोई भी किसी की सभी कामनाओं की पूर्ति नहीं कर सकता है भगवान देवी देवताओं तक कभी अपने जीवन साथी अपने भक्तजन अपने चाहने वाले अपने उपासकों को सब नहीं दे सकते थे। और अगर कभी किसी ने बिना विचारे सोचे समझे बगैर कोई वरदान दे दिया तो क्या क्या नहीं होता रहा। आपको जो करना था वो आपने समझा ही नहीं हमारी कथाओं कहानियों और क्या करने से क्या अंजाम होगा जैसे सबक सीखने की जगह आपने वही गलतियां दोहराने का काम किया है। 
 
     मेरा इक भाई कुंभकर्ण था आजकल आप कितने लोग जागते नहीं कोई लाख जगाने की कोशिश करता रहे। जानकर अपनी आंखें बंद रखते हैं सामने सच होता है आप नहीं स्वीकार करते। मैंने किसी की सही सलाह नहीं मानी थी अपने अहंकार में चूर था आप कब किसी की सुनते हैं हर शासक मनमानी करता है तब वो मेरा ही शागिर्द है राम का नहीं हो सकता है। मैंने कभी राम कहलाना नहीं चाहा लेकिन अब हर शासक किरदार रावण का निभाता है चाहता है उसको राम कहा समझा माना जाये। राम नाम सत्य है ये हर कोई अर्थी को उठाते समय ही कहता है वास्तविक जीवन में झूठ बोलते हैं सत सरी अकाल शब्द को समझते कब हैं। विभीषण को कोई लाख रामभक्त बताता रहे ऐसा भाई घर का भेदी लंका ढाये यही माना जाता है। कभी किसी ने अपनी संतान को विभीषण नाम देना स्वीकार नहीं किया है। 
 
  जब मैंने देखा कि सीता जी के कहने पर राम सोने का हिरण लाने चले गए और लक्ष्मण भी सीता जी के कहने पर उनकी तलाश को चले गए तब मुझे लगा कि इस महिला को भी उसकी भूल की सज़ा मेरी नासमझ बहन की
हठ करने की सज़ा जैसे ही मिलनी नारी जगत के लिए सबक हो सकता है। बाल हठ नारी हठ और राज हठ सभी का अंजाम समझना चाहिए और किसी की ज़िद को मानकर अनुचित असंभव कार्य करना साहस की बात नहीं बल्कि मूर्खता की निशानी है। ये तो कितनी बार कहते हैं सुना है सभी ने कि राम भी रावण भी हम सभी के मन में रहते हैं और हमको अपने भीतर के रावण का अंत करना चाहिए न कि किसी रावण का पुतला जलाकर उसको और ऊंचा बनाते जाना चाहिए। आखिर में आर पी महरिष जी का इक शेर याद आता है। रावण अपनी बात कह कर चले गए हैं शेर मेरे गुरूजी का है। 

                      " ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी

                     आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह "।

 

Saturday, 24 October 2020

देखते रह गए दूर से ज़िंदगी ( सफ़रनामा ) डॉ लोक सेतिया

    देखते रह गए दूर से ज़िंदगी ( सफ़रनामा ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे याद है वो पल जब मैंने खुद इक दिन 
उसकी नर्म आगोश में समा जाना चाहा था 
 
मगर न जाने क्यों कोई मसीहा बनकर आया 
मुझे बड़े प्यार से हाथ थामकर समझाया था 
 
अंधेरा रात भर का है होने वाली है भोर नई
मेरे मन के दीपक को बनकर उजाले की किरन 
 
आशा का दीप जलाया था इक सितारा था वो 
घने अंधकार में भी जीने की राह ढूंढ लाया था। 
 
वो जगमगाता सितारा वो उजाले की किरन भी 
खो गई ज़िंदगी के सफर में चलते हुए इक दिन 
 
मैंने लेकिन निभाया जीने का वादा उसकी कसम 
मुश्किलों से टकराता रहा साहस नहीं छोड़ा कभी 
 
कितनी बार मौत ने मुझे पास अपने बुलाया और 
हर बार मैंने उससे दामन अपना बचाया बार बार 
 
उसने अपनी बाहें फैलाईं मुझे गले लगाने को जब 
अभी रहने दो मिलेंगे कुछ करना है खोना पाना है 
 
बहुत थोड़ा है फ़ासला मौत और ज़िंदगी के बीच 
तय होता नहीं वो भी चाहने बुलाने नहीं आने से
 
ये ख़्वाहिश उस हसीन घड़ी से मिलन की जीते हैं 
जाने क्या क्या सपने बुनते हैं नहीं पूरे होते मगर। 
 
शायद हमने समझा ही नहीं मौत की मुहब्बत को 
ज़िंदगी के दुःख दर्द ज़ख़्म परेशानी आशा निराशा 
 
सभी चिंताओं से मुक्त करती है सुकूं देती है वही 
कौन करता है किसी का इंतज़ार जीवन भर ऐसे 
 
इक वही है जो हमको अपनाती है गले लगाती है 
सभी रिश्ते नाते जाते छूट रूह और जिस्म वाले 
 
बस इक वही है वादा अपना निभाती है हर हाल 
ज़िंदगी कब तलक साथ देती है तोड़ देती नाता 
 
मौत आती है वफ़ा निभाने को अपनी चाहत की 
ज़िंदगी बेवफ़ाई है मौत लेकिन बेवफ़ा नहीं होती।
 
 
 
 
 
 

Thursday, 22 October 2020

सपनों के सौदागर लोग ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    सपनों के सौदागर लोग ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  आपको क्या चाहिए स्वर्ग धरती पर लाने चांद तारे तोड़ लाने के वादे आशिक़ से बढ़कर जान हाज़िर है कहने वाले भाषण में सभी कहने के बाद याद नहीं रखने की आदत राजनेताओं की पहचान यही है। देश की खातिर जीने मरने संविधान की शपथ न्याय का संकल्प सब औपचारिकता की तरह निभाते हैं इन का अर्थ उनको नहीं मालूम। सरकारी अधिकारी कर्मचारी कर्तव्य निभाने की कसम खाते हैं फ़र्ज़ को छोड़ सत्ता का उपयोग अधिकार हासिल कर मनमानी करते हैं। देशभक्ति देशसेवा जनता की समस्याओं का निदान उनकी चिंता का विषय नहीं होते हैं ये झंडा फहराने के बाद केवल लिखा लिखवाया भाषण दोहराना होता है हर बार। उनकी ईमानदारी की बात ईमान से कही जाती नहीं है। 

    आपने फ़िल्म नाटक में किरदार निभाते अदाकार को कितना साहसी कितना सच्चा कितना भलेमानुष का अभिनय कितनी लाजवाब शैली में देख कर तालियां बजाईं और वाह वाह की होगी। उनको खुदा नहीं खुदा से ऊंचा दर्जा देते हैं वास्तव में वही अभिनेता समाज में जीवन जीता है साधारण व्यक्ति की तरह धन पैसा दौलत शोहरत हासिल करने को लालायित और जितना भी मिले अधिक पाने की हवस रखता बेहद गरीब धर्म के अनुसार धनपशु होना। कलाकार संगीतकार समाज को दिशा दिखलाने का नहीं भटकाने का कार्य करते हैं। शिक्षक जब ज्ञान देने की जगह शिक्षा का व्यौपार करने लगते हैं तब पढ़ने वाले डॉक्टर बनकर भी स्वास्थ्य को बढ़ावा देने को छोड़ रोग को उपचार से अधिक धन अर्जित करने का साधन समझते हैं। 

धर्म उपदेशक धर्म की बात करते हैं धर्म की राह नहीं चलते , उनका आचरण उनकी बताई समझाई शिक्षा के विपरीत होता है। जिन धार्मिक किताबों उनमें वर्णित महान साधु संतों की वाणी का वर्णन करते हैं उनका पालन खुद करना तो क्या उनको समझते तक नहीं हैं। धर्म के नाम पर संचय और अपने स्वार्थ सिद्ध करने पर ध्यान देते हैं। अख़बार टीवी चैनल जिनका फ़र्ज़ था झूठ को बेनकाब करना सच को सामने लाना वो सबसे अधिक मार्ग से भटके लोग झूठ अधर्म अनीति और स्वार्थ की राजनीति से तमाम अन्य अनुचित आचरण करने वालों का साथ देते हैं झूठ का गुणगान और सच के क़ातिल बनकर अपने टीआरपी विज्ञापन के मोहजाल में अंधे हैं। 

रिश्ते नाते संबंध सभी मतलब और ज़रूरत के हिसाब से बदलते हैं कहने को अपनत्व वास्तव में बुरे समय कोई किसी के साथ खड़ा नहीं होता है। कहने को शादी विवाह या अन्य अवसर पर भीड़ नज़र आती है मगर मन से भावना से किसी का कोई लगाव नहीं होता है। ख़ास अपने लोग आपको ऊंचा बढ़ाने नहीं नीचा दिखाने को मौके की तलाश में रहते हैं। दोस्ती की बात कैसे छोड़ सकते हैं फेसबुक दोस्ती का मंच होता था जो आजकल बदल कर मतलब की बात से खुद अपने फ़ायदे और गुणगान का स्थान बन गया है। लगता है हम दिन में जागते हुए सपने देखते हैं बड़े खूबसूरत सुहाने ख़्वाब जो टूटने को ही होते हैं। 

अब लगता है दुनिया समाज कोई फूलों का चमन नहीं बस इक वीराना है कांटों भरा इक रेगिस्तान जिस में तपती लू और धूप में कहीं कोई पेड़ नहीं छाया देने को। लेकिन सभी ने इसको नकली कागज़ के फूलों से पत्थर से बने शानदार महलों में बनवटी सजावट से दिखाने को खुशनुमा बना दिया है। कौन है जो झूठे छलने वाले सपनों का सौदागर नहीं है। किसी काम की नहीं है आपकी ये दुनिया जिसका वास्तव में कोई वजूद ही नहीं है।

Tuesday, 20 October 2020

कोरोना रावण और उसके संबंधी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     कोरोना रावण और उसके संबंधी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     सभी उसकी दवा या उपचार अथवा उसको ख़त्म करने को वैक्सीन ढूंढते रहे और मैं चिंतन मनन करता रहा ध्यान लगाता रहा उसको समझने उसका साक्षात्कार करने के लिए। जो मुझे मिला आपको बताना है मानो चाहे नहीं मानो उसका रिश्ता बहुत पुराना है किसी का दादा किसी का परदादा किसी का लकड़दादा किसी का सगा संबंधी किसी का नाना है। आपने अपने आप को कभी समझा है कभी जाना है कभी खुद को पहचाना है। आपको आज कोरोना के परिवार से मिलवाना है। 
 
       क्या आपको जो लोग भाते नहीं अच्छे नहीं लगते नापसंद हैं आप उनको इस दुनिया में जीने नहीं देना चाहते उनसे इस कदर नफरत करते है कि आपका बस चले तो उनको जीने ही नहीं दें। और आप यही करते हैं जो कमज़ोर हैं उनको बर्बाद करते हैं जिनका आप कुछ नहीं बिगाड़  सकते उनसे बचते हैं डरते हैं उनके अंत की मन ही मन कामना करते हैं। फिर तो आप कोरोना ही हैं उस की संतान हैं जो किसी का सगा नहीं है जिसने उसको बनाया उसी को सबसे पहले कोरोना ने सताया तभी उस को समझ आया बनाकर पछताया। ईश्वर ने सभी को अलग तरह से बनाया है किसी को किसी जैसा नहीं बनाया है ये उसकी माया है सभी को जीने का सबक यही सिखलाया है जिओ और औरों को भी जीने दो आपने इसको नहीं आज़माया है। कौन आपका अपना है कौन यहां पराया है ये सुबह और शाम की बात है चढ़ता सूरज है ढलती छाया है। 
 
   कोरोना को कब से इंतज़ार था उसका युग आजकल आया है जिधर देखो ऐसे लोगों ने कोहराम मचाया है जो उनको नहीं भाते जिनसे वो सहमत नहीं उनको क्या क्या नहीं कहा कितना बदनाम किया कितना बुरा बताया है। ये असहमति को स्वीकार नहीं करने वाले खुद कोरोना से बढ़कर हैं उनकी नफरत किसी ज़हर से बढ़कर है। लेकिन ज़हर के असर उन पर भी होता है जो ज़हर बनाते हैं ज़हर बांटते हैं उनके भीतर ज़हर रहता है उनको खोखला करता है। ज़हर नफरत कोरोना बढ़ता जाता है ख़त्म नहीं होता सभी को खत्म करता है अंत में खुद बेअसर हो जाता है। कोरोना का असर कम होने लगा है कोरोना अपने जैसे नफरती लोगों को भी होने लगा है। रावण की तरह उसका अहंकार उसी को डुबोने लगा है। अच्छे अच्छे शासकों को औकात बताई है कोरोना उनका बाप दादा है बड़ा भाई है जमकर लाठी चलाई है सामने कुंवां है पीछे खाई है। खुद इन्हीं लोगों ने ये आफ़त बुलाई है। 
 
   सुनो समझो कोरोना जैसे विचार स्वभाव वालो सभी को ख़त्म करने का ख्वाब मत पालो बचना है जो खुद अपने को बचालो। अरे ओ शीशे के घर में रहने वालो हर किसी पर मत पत्थर उछालो सिकंदर कलंदर सभी चले गए दुनिया से रावण अभी ज़िंदा आप में छिपा हुआ है कोई पुतला मत जलाओ उसको अपने भीतर से निकालो। किसी और को ख़त्म करने से पहले अपने अंदर झांको नफरत वाले कोरोना को मार डालो जिओ और सभी को चैन से जीने दो सबक सीख लो उसे आज़मा लो। उनको ये रोग लगता देखा जो टीवी पर कोरोना से बचने और अपनी इम्युनिटी बढ़ाने की दवा टॉनिक का गुणगान करते थे पता चला वो धर्म वालों की तरह उपदेश देते थे उपदेश देना उनकी कमाई का साधन है उनको ऐसे किसी टॉनिक पर खुद भरोसा नहीं था। हर कोई आजकल आपदा को अवसर बनाने में लगा है खुद बचना ज़रूरी नहीं औरों को बचने की बात समझाने लगा है। 

  इंसान इंसान से घबराने लगा है झूठे सच्चे बहाने बनाने लगा है। दिल से सभी से दूरी बढ़ाने के बाद आजकल फासले बढ़ाने लगा है जिनसे मतलब उनके साथ मिलने मिलाने निभाने लगा है बाकी को मज़बूरी समझाने लगा है। ज़माना बदलने लगा है नये तौर अपनाने लगा है गले नहीं मिलते हाथ नहीं मिलाते बहुत दूर से हाथ हिलाने लगा है समझ लो कोई करीब से बड़ी दूर होना चाहता है छोड़ कर जाने लगा है। कोरोना कितने काम आने लगा है कोई गीत याद आने लगा है। जाना था हमसे दूर बहाने बना लिए , अब तुमने कितनी दूर ठिकाने बना लिए।
 
   

Monday, 19 October 2020

बेमतलब की बात कहता हूं ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    बेमतलब की बात कहता हूं ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

मतलबी दुनिया में रहता हूं मैं मगर बेमतलब की बात कहता हूं। कोई माने चाहे न भी माने लोग अब कुछ भी बिना स्वार्थ करते नहीं हैं। मंदिर तक भगवान के घर जाते हैं तब भी मकसद आस्था ईबादत नहीं कुछ और होता है कुछ मांगना है कुछ मिला है उसका आभार जताना है ताकि और मिलता रहे या कोई चिंता परेशानी है खुद जिस का समाधान करना नहीं ईश्वर पर दायित्व छोड़ते हैं तुम्हारा भक्त हूं तुझे ही करना है। भगवान देवी देवा अल्लाह वाहेगुरु जीसस से अपना हाल सभी बताते हैं कभी किसी ने उसका हाल चाल पूछा क्या समझना चाहा क्या जानने की कोशिश की कभी। कोई नहीं जानता खुद ऊपरवाला किस हाल में रहता है है भी कि नहीं बचा हमने उसको ख़त्म कर दिया है। आपको रोज़ वही बात सुनकर उसी इक जगह रहकर मीठा मीठा खाकर लगता है बस कुछ बदलाव होना चाहिए इस से तंग हो गए हैं उसको कितनी बार वही बातें वही भजन आरती वही रटी रटाई बात कब तक सहना होगा। कह भी नहीं सकता कितनी बार हुआ अब बस भी करो कुछ तो बदलना चाहिए , उसकी तकदीर में कोई बदलाव नहीं सभी अपनी तकदीर बदलवाने की चाह रखते हैं। 
 
  अब समझते हैं आपकी इस मतलबी खुदगर्ज़ दुनिया की बात। कोई बिना मतलब किसी के घर नहीं आता जाता सच बताता हूं मुझे ये खराब आदत थी किसी से मिलने को जी चाहा मिलने चला जाता। मिलते ही पहला सवाल यही पूछते कोई काम है आपने फोन किया क्यों कुछ ज़रूरत है यूं ही कह दिया माता जी नज़र नहीं आई तो पूछते हैं उनसे क्या काम है। सच तो ये है लोग मानते ही नहीं बिना मतलब कोई किसी से प्यार लगाव भी रख सकता है। आजकल की दुनिया में ऐसा करना मूर्खता होगा। अब मेरी आदत छूट गई है वर्ना आये दिन किसी न किसी को किसी न किसी बहाने फोन करता रहता था दोस्त से मिलने चला जाता था। खैर अब कोई दोस्त कोई अपना है भी नहीं जिस से बेतक़ल्लुफ़ मिलने बात करने का हौसला हो। अब डरते हैं बिना बात दिल की बात कहने से ताल्लुक ही नहीं बिगड़ जाये। सोचकर बोलना पड़ता है औपचारिकता निभाने की ज़रूरत होती है। 
 
राजनेता समाजसेवी कहलाने वाले या कोई भी कारोबार करने वाले कभी किसी के पास किसी जगह बिना मतलब किसी की समस्या समझने सुलझाने नहीं जाते हैं हर कोई जाकर अपना कोई न कोई हित साधना चाहता है। किसी को नाम शोहरत किसी को अपनी मंज़िल पाने को सीढ़ी बनाकर इस्तेमाल करना किसी को मेलजोल बढ़कर बाद में फायदा उठाना किसी को हमदर्दी का दिखावा कर खुद को महान कहलाना किसी को अपनी किसी संस्था संगठन में पद हासिल करना या अपने एनजीओ के लिए चंदा जुटाकर उस से सुख सुविधा की ज़िंदगी जीने शान बढ़ाने के उपाय करना। क्या क्या कहें किस किस की बात की जाये इस से अच्छा है खुद से मिला जाये खुद दिल से दिल की बात की जाये। रोज़ सुबह से दोपहर दोपहर से शाम शाम से फिर रात की जाये। आज यही सोचा कोई बेमतलब की बात की जाये।