Thursday, 7 July 2016

कुछ भी ठीक नहीं है सरकार ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

भ्र्ष्टाचार की खबर नहीं होना ही काफी नहीं है , उसका नहीं होना साबित किया जाना भी ज़रूरी है। बिना देखे प्रचारित करना कि मिट गया है भ्र्ष्टाचार जनता को धोखे में रखना है। आम आदमी जब सरकारी दफ्तर जाता है कोई शिकायत लेकर क्या तब उसको न्याय मिलता है ? नहीं। तब हर अधिकारी यही चाहता है शिकायत करने वाले को किसी तरह निपटाया जाये न कि उसकी परेशानी दूर की जाये। उसको टाला जाये या कहा जाये कि यहां नहीं वहां जाओ , और उलझाया जाता रहे। अदालतों में जाकर देखो आम लोग कितने परेशान हैं मगर उनको सालों साल न्याय नहीं मिलता। पुलिस थाने की बात सब जानते हैं , वहां जो नहीं हो वही कम है। इस देश में नेता अफ्सर धनवान और ख़ास लोगों को शायद ही सही गलत की कोई परवाह होती है , क़ानून को ये इक अनावश्यक वस्तु मानते हैं जिसकी कोई कद्र नहीं है। अख़बार हों या टीवी वाले उनको भी रोज़ की छोटी मोटी रिश्व्त की बात बेमानी लगती है क्योंकि उनको ये कभी देनी नहीं पड़ती है। पत्रकारिता का तमगा आपको एक सुरक्षा कवच देता है ताकि कोई आपसे छोटी छोटी बात पर पैसा नहीं मांग सके। प्रेस शब्द लिखा होना आपकी कार को चलान से बचाता है और आपको आम से ख़ास बना देता है। पत्रकारिता के मायने बदल गये हैं , खबर की परिभाषा भी। अब कोई पत्रकार खबर को ढूंढ़ता नहीं है , खबरें उस तक खुद आती हैं , जिनको खबर छपवानी हो खुद दे जाते हैं।
        अब किसी सरकार को गरीब आम आदमी की चिंता नहीं है , जिसको हर दिन रोटी कमानी होती है वो कैसे न्याय पाने को बार बार सरकारी अफसरों की हाज़िरी लगाता रहे बिना कोई समाधान पाये। और कभी अधिकारी आये नहीं , कभी मीटिंग में व्यस्त हैं जैसे बहाने सुन निराश होता रहे। अभी केंद्र सरकार के कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया गया है जो औसत आम आदमी की आमदनी से पचास गुणा अधिक है , चाहे उसको और भी बढ़ा दो तब भी उनको ये कभी काफी नहीं लगता। उनको तब भी ऊपर की कमाई चाहिए।
इतना वेतन पाकर भी ये लोग अपना काम ईमानदारी से करना नहीं चाहते , क्या ये देशद्रोह नहीं है ?
आज तक देश की जनता की हालत केवल इसी कारण नहीं सुधरी है क्योंकि पुलिस प्रशासन और नेताओं ने वो सब किया ही नहीं जो किया जाना था। विडंबना है इनको जो करना वो नहीं करने की कोई सज़ा ही नहीं मिलती है। किसी शायर ने भी कहा है :::::::::::::
               वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता ,
              तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं।
देश की जनता की भी बस इतनी ही शिकायत है , सरकार को जो करना था कभी किया ही नहीं। सब ठीक है के विज्ञापन हमेशा देखते रहे हैं लोग , सब ठीक हुआ नहीं कभी भी। कोई चाहता ही नहीं सब ठीक करना , उनकी कुर्सी उनके स्वार्थ कुछ भी ठीक नहीं होने से हैं।

Tuesday, 5 July 2016

मेरा सुंदर सपना टूट गया ( कड़वा सच ) डॉ लोक सेतिया

दो साल हो गये हैं इंतज़ार करते करते , जनता को वो अच्छे दिन कहीं दिखाई नहीं देते। दिखाई देते हैं तो बस नित नये सरकारी विज्ञापन। भ्र्ष्टाचार मिटा दिया है ऐसा नवीन विज्ञापन आया है , तब तो देश ईमानदार समझा जाना चाहिये , फिर क्यों आज भी वहीं का वहीं है सूचि में बहुत नीचे। भ्रष्ट देशों में प्रथम आने की ओर। किसी ने वादा किया था राक्षसों का अंत करने का , राक्षस जैसे थे वैसे ही हैं , शायद सरकार ने उनका नामकरण फिर से कर कोई और नाम दे दिया है। बस एक नारे से समस्या हल हो जाती है , अगर देशवासी कूड़ा नहीं करें तो कोई गंदगी नहीं कर सकता। कूड़े के ढेर लगे हैं और स्वच्छ भारत के विज्ञापन भी। विज्ञापन में टीवी पर जनता को शर्मसार किया जाता है गंदगी करने को , सफाई करना सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है , गंदगी मत करो का सबक पढ़ाना सरकार का काम है। लोग कूड़ा कहां डालें , शौच को कहां जायें ये सरकार का सरोकार नहीं है। रिश्वत बिना कोई काम नहीं होता तो क्या , आप रिश्वत दें ही नहीं रिश्वत का नामोनिशान मिट जायेगा , ऐसा विज्ञापन फिर से आना चाहिए। ये पहले भी हुआ था , दफ्तरों में रिश्वत नहीं देने की तख्तियां लगी थी। अब फिर से बापू के तीन बंदर सबक सिखायेंगे। गंदगी को मत देखो , भ्र्ष्टाचार है मत बोलो , सच कोई बोले कि सभी कुछ पहले सा ही है तो मत सुनो। लो जी अच्छे दिन आ गये हैं। बुरे दिन समाप्त नहीं हुए हैं , उन्हीं को अच्छे दिन घोषित कर दिया गया है। तानाशाही आज भी जारी है प्रशासन की सत्ताधारी नेताओं की , बस उसको लोकतंत्र नाम दे दिया है। बिना कुछ किये सभी कुछ हो गया है। चमत्कार है। कुछ दोहे राजनीति के नाम पर ::::::::::::::::::::::::::
                             नतमस्तक हो मांगता मालिक उससे भीख ,
                             शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।
                             मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर ,
                             कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।
                             नेता आज़माते रहे गठबंधन का योग ,
                              देखो मंत्री बन गये कैसे कैसे लोग।
                             झूठ यहां अनमोल है सच का ना व्योपार ,
                             सोना बन बिकता यहां पीतल बीच बाज़ार।
                             चमत्कार का आजकल अद्भुत है आधार ,
                             देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

Tuesday, 28 June 2016

नया फैशन सरकार का ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

सरकार का नया विज्ञापन आया है। ईमानदार सरकार का। अब ईमानदारी की सभी की अपनी परिभाषा होती है। मेरे शहर में बड़े अधिकारी की ईमानदारी यही है कि वो जिन से घूस लेता है उनको हर गलत काम खुल कर करने देता है। आप कितनी शिकायत करते रहो वो अपने कान बंद रखता है और आंखें भी। उसको किसी का अवैध कब्ज़ा नज़र आता ही नहीं न ही नियम तोड़ना , आप सड़क पर कब्ज़ा करें या फुटपाथ को रोक गंदगी फैलाते रहें आपको सब की अनुमति है। एक पुलिस अफ्सर नशा मुक्ति की बातें करता है और यह भी जानता है खुद उसका विभाग ही नशे का कारोबार करवा रहा है। जब किसी बस्ती के लोग शिकायत करते हैं और अफ्सर अपने अधीन अधिकारी को धंधा बंद कराने को कहता है और अधिकारी आदत के अनुसार कुछ नहीं करता तब अफ्सर को दिखाना होता है कि वह ईमानदार है। मगर जो पुलिस को बाकयदा हिस्सा देकर नशे का कारोबार करते हैं उनके प्रति अफ्सर भी ईमानदार होते हैं और जब ऐसे नशे की दुकान की शिकायत होती है तब खुद पुलिस के लोग खड़े होकर दूसरी जगह नई दुकान , या खोखा बनवा कारोबार चलाने वाले को अपनी ईमानदारी का सबूत देते हैं। नशे की लत से जब किसी की जान चली जाती है तब पुलिस का सभी अधिकारी खुद दखल देते हैं ताकि उस मौत को स्वाभाविक मृत्यु घोषित किया जा सके , ऐसे में सब चोर चोर मौसेरे भाई बन जाते हैं और डॉक्टर भी हार्ट अटैक से मौत होना घोषित कर देते हैं। सभी ईमानदार हैं , जिसकी खाते हैं उसकी बजाते हैं।
            इक अभिनेता ने इक राज्य में शराब बंदी पर बयान दिया कि वह उस राज्य में नहीं जाया करेंगे। उनका मानना है इस से अवैध ढंग से शराब बेचने वालों का धंधा चलता है और पीने वालों को अच्छी शराब नहीं मिलती है। बात तो ईमानदारी की है , यही होता है , देखा गया है। लेकिन बात सरकार की ईमानदार होने के विज्ञापन की हो रही थी। इक प्रधानमंत्री हुए हैं जिनके नाम के साथ भी ईमानदारी का तमगा लगा हुआ था , उनके काल में इतने घोटाले हुए इतना भ्र्ष्टाचार हुआ फिर भी उनका तमगा कायम रहा। जबकि वास्तव में जब एक कलर्क भी रिश्वत लेता है तब देने वाले को सरकार भ्रष्ट नज़र आती है। किस की चुनरी में दाग नहीं लगा , सभी कहते हैं लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे। अब तो लोग कहते हैं दाग अच्छे हैं। मगर जाने क्यों इस सरकार को चकाचक सफेद पोशाक पहनने का महंगा शौक चर्राया है जो ये विज्ञापन बनवा लिया है। मुझे भी कभी सफ़ेद पैंट - शर्ट पहनने का शौक हुआ करता था और जब भी पहनी बरसात हो जाती थी और कहीं न कहीं से कोई छींटा दागदार कर देता था। अब बरसात का मौसम भी आने को है , खुदा सरकारी पोशाक की लाज रखना। मगर चिंता की कोई बात नहीं है , हर फैशन दो दिन बाद बदल जाता है। मुमकिन है सरकार भी अभी से अगले विज्ञापन को लेकर चर्चा करने लगी हो। क्योंकि हर कुछ दिन बाद सरकार को लगता है उसका विज्ञापन अब ऐतबार के काबिल नहीं रहा और उसको बदल देती है। ये नया फैशन भी सरकार का जल्द ही बदलेगा उम्मीद तो यही है।
                                    नर्म आवाज़ भली बातें मुहज़ब लहज़े ,
                                    पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं।
                                           ( किसी शायर का शेर है )

Sunday, 26 June 2016

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ( ग़ज़ल 215 ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

जुर्म हम लोग बस एक करते रहे ,
अश्क़ पीते गये आह भरते रहे।
किस को झूठा कहें किस को सच्चा कहें ,
बात कर के सभी जब मुकरते रहे।
रात तूफान की बन गई ज़िंदगी ,
बिजलियों की चमक देख डरते रहे।
मुख़्तसर सी हमारी कहानी रही ,
जो बुने ख्वाब सारे बिखरते रहे।
हर कदम पर नये मोड़ आये मगर ,
हौंसलों के सफर कब ठहरते रहे।
लोग सब प्यार को जब लगे भूलने ,
दो सितारे ज़मीं पर उतरते रहे।
कुछ सितमगर सितम रोज़ ढाते रहे ,
और इल्ज़ाम "तनहा " पे धरते रहे।
 

Sunday, 12 June 2016

फिर से इक बार ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

हमारी आंखों पर
बंधी हुई थी कोई पट्टी
और हम कोल्हू के बैल बन कर
रात दिन चलते गये चलते गये
पहुंचे नहीं कहीं भी
थे चले जहां से ,
रहे बस वहीं ही।
सोच रहे हैं अब
उतार फैंकें इस पट्टी को
और चल पड़ें
नई राह बनाने को जीवन की
ताकि बर्बाद न होने पायें
बाकी बचे पल जीवन के
शायद अभी भी
अवसर है हमारे पास
कुछ फूल खिलाने का
कुछ दीप जलाने का
कोई साज़ बजाने का
कोई गीत गुनगुनाने का।

Wednesday, 8 June 2016

रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

बहुत शोर करते हैं वो जब भी उनको लगता है कोई उन्हें मनमानी नहीं करने देता। बस तभी उनको विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की याद आती है। किसी और को भी आज़ादी है कुछ कहने की ये नहीं सोचते वो कभी भी। टीवी और सिनेमा का जितना दुरूपयोग इसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किया जा रहा है उतना शायद ही सही मकसद से हुआ हो। क्या ये भी अभिव्यक्ति की आज़ादी ही है कि जब आपकी फिल्म को जैसा आपने बनाया उसी तरह अनुमति नहीं मिलने पर आप निजि आरोप लगाने लग जाओ अथवा बिना जाने समझे किसी का समर्थन करने लगो। इक अभिनेता का ब्यान देखा जिसमें उनका कहना था , मुझे इस बारे जानकारी तो नहीं है मगर सिनेमा पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए। अर्थात इनको सब करने की छूट होनी चाहिए , वास्तव में यही तो है , इनसे कोई नहीं पूछता आपने क्या किया। सही या गलत। क्या दिखा रहे हैं मनोरंजन के नाम पर। महिलाओं के प्रति बढ़ती दूषित मानसिकता का प्रमुख कारण आप हैं। फिल्म ही नहीं समाज में कहीं भी किसी भी मंच पर आप औरत को मात्र इक वस्तु की तरह देखते हैं दिखाना चाहते हैं। कभी फुर्सत मिले तो सोचना आपने कैसे आदर्श प्रस्तुत किये हैं। ज़रा पुरानी फिल्मों को देखना जिन में समाज की समस्याओं पर सार्थक कहानियों की फ़िल्में बनी थीं , और फिर देखना आज की बनी फिल्में और उनका संगीत। शायद समझ आये आप कितना नीचे गिर चुके हैं। जब सफलता और बॉक्स ऑफिस सफलता ही एक मात्र ध्येय हो तब और क्या हो सकता है। फिल्म उद्योग धनवान हुआ होगा पैसे से मगर विचारों से नहीं , शायद कंगाल हो चुका है।
          वास्तव में सब कुछ पाने की भूख ने इनको विवेकशून्य कर दिया है और सही या गलत की समझ ही बाकी नहीं रही है इनको। इनको फिल्मों में अभिनय ही नहीं करना विज्ञापन भी करने हैं पैसे के लिए और विज्ञापन झूठे हैं या लोगों को नुकसान देते हैं , अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं या भर्मित करते हैं , इनको क्या मतलब। इस के बावजूद ये महान लोग हैं , कुछ भी बेचते हैं वो भी जो नहीं बिकता तो अच्छा था। अब तो इनको राजनिति भी करनी है भले राजनिति की समझ भी नहीं हो। इनको तो सांसद बनना है ताकि इक तमगे की तरह नाम के साथ ये शब्द भी जुड़ सके।
                                   रास्ता अंधे सबको दिखा रहे ,
                                   इक नया कीर्तिमान हैं बना रहे।
                                   सुन रहे बहरे बड़े ध्यान से ,
                                   गीत मधुर गूंगे जब हैं गा रहे।
                                   

Tuesday, 7 June 2016

पापी पेट का सवाल है बाबा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

इक विज्ञापन देख रहा हूं कुछ दिन से टीवी पर , कुछ बच्चे आते हैं इक बूढ़े आदमी के घर , देखते ही वो कहता है , कल ही बोल दिया था मैं इस बार ईद पर ईदी नहीं दे पाऊंगा। बच्चे अपनी अपनी गुल्लक साथ लाये होते हैं , कहते हैं इस बार ईदी वो देंगे , मगर आपको नहीं घर को। तब फ़िल्मी अभिनेता शाहरुख़ खान आते हैं और घर को पेंट करने सजाने का काम करते हैं। इस विज्ञापन में बहुत कुछ छिपा है , लगता है लोग बड़े संवेदनशील हैं किसी की हालत देख खुद चले आये हैं सहायता को। मगर पता चलता है उनको इंसान की भूख की बदहाली की फ़िक्र नहीं है , फ़िक्र है घर की सजावट की रंग रोगन की। क्योंकि वही दिखाई देता है सभी को , आदमी के दुःख कहां देखता है कोई। सरकारी विज्ञापन भी इस से अलग नहीं हैं। गरीबों की रोटी की खातिर रोटी पर और टैक्स बढ़ा देती है। जो भी काम करती है मुनाफे का ही करती है , हर बार उसका खज़ाना और भर जाता है। जब कोई व्यापार करता है तब वो कुछ भी अपने पास से देता नहीं है , जितनी कीमत की वस्तु होती है उस से अधिक ही वसूल करता है , तभी उसका मुनाफा कभी कम नहीं होता। शायद बाबा रामदेव भी यही कहते हैं , वो जो भी कमाई करते हैं समाज सेवा के लिए ही करते हैं। ये समाज सेवा और धर्म शब्द हज़ारों साल से छलते आ रहे हैं लोगों को। भगवान के मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे अगर बांटते तो कब के खाली हो जाते उनके कोष , मगर उनकी दौलत है कि बढ़ती ही जाती है। मतलब साफ़ है छीनते अधिक हैं बांटते कम ही हैं। देने वाला कौन है ? सभी तो खुद और जमा करना चाहते हैं , चाहे जनहित की बात करती सरकार हो या दया धर्म की बात करते खुदा को बेचने वाले लोग। राजनेताओं और सरकारी लोगों के ठाठ बाठ गरीब देश की जनता के दम पर हैं तो इन धर्म के कारोबारियों की ऐश भी उन्हीं से ही है। सभी को आपके दुःख दर्द को बेचना है अपने धंधे की खातिर।

Monday, 6 June 2016

थकान ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जीवन भर चलता रहा
कठिन पत्थरीली राहों पर
मुझे रोक नहीं सके
बदलते हुए मौसम भी
पर मिट नहीं सका
फासला
जन्म और मृत्यु के बीच का ,
चलते चलते थक गया जब कभी
और खोने लगा धैर्य
मेरी नज़रें ढूंढती रहीं
किसी को जो चलता
कुछ कदम तक साथ साथ मेरे
और प्यार भरे बोलों से
भुला देता सारी थकान ,
जाने कहां अंत होगा
धरती - आकाश से लंबे
इस सफर का
और कब मिलेगा
मुझे आराम।

Tuesday, 31 May 2016

ये किन लोगों की बात है ( मानवाधिकारों की बात ) डॉ लोक सेतिया

आज जैसे मेरे अंदर सोया हुआ कोई फिर से जाग गया। बहुत दिन से अखबारों में चर्चा थी 3 1 मई को फतेहाबाद में मानव अधिकार आयोग की सभा आयोजित होनी है। सोचा चलो चल कर देखते हैं शायद कुछ विशेष मिल जाये जो सार्थक हो। पता चला कि सैमीनार आलीशान बैंकट हाल में होना है क्योंकि सरकारी सभी इमारतों के हाल वातानुकूलित नहीं है , और बड़े बड़े लोग आने हैं भाषण देने को। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा प्रवेश के मुख्य द्वार पर बैठे पुलिस वाले आम लोगों को दूसरे रास्ते से भेज रहे हैं। मैंने पूछा क्या सभा उधर हो रही है , तो बताया गया कि नहीं सभा तो यहीं ही है मगर , मैंने कहा , क्या ये दरवाज़ा ख़ास लोगों के प्रवेश के लिये सुरक्षित है। तब इक पुलिस वाले ने इशारा किया दूसरे को कि मुझे यहीं से अंदर जाने दे , और मैं भीतर चला गया। हाल भरा हुआ था और अधिकतर सरकारी लोग , पंचायतों के सदस्य , और तमाम बड़े तबके के लोग या संस्थाओं से जुड़े लोग ही नज़र आ रहे थे। जिन गरीबों मज़दूरों , घरों में दुकानों में काम करने वाले बच्चों को कोई अधिकार नहीं मिलता , उन में से कोई भी वहां नहीं दिखाई दिया मुझे। देखते ही किसी शानदार पार्टी का आयोजन जैसा प्रतीत हो रहा था। सभा शुरू हुई तो बात मानवाधिकारों की हालत पर चिंता की नहीं थी , संचालक अधिकारीयों की महिमा का गुणगान करने लगा था। मुझे इक मुल्तानी कहावत याद आई , तू मैनू महता आख मैं तैनूं महता अखेसां। उसके बाद आयोग के लोग बताते रहे कि दो तीन साल में ही हरियाणा का मानव आयोग एक कमरे से शुरू होकर आज एक पूरे भवन में काम कर रहा है। बिलकुल सरकारी विकास के आंकड़ों की तरह , जिसमें ये बात पीछे रह जाती है कि जिस मकसद से संस्था गठित हुई वो कितना पूरा हुआ या नहीं हुआ। बस कुछ सेवानिवृत लोगों को रोज़गार मिल गया , यही अधिकतर अर्ध सरकारी संस्थाओं में होता है जहां करोड़ों का बजट किसी तरह उपयोग किया जाता है , साहित्य अकादमी भी ऐसी ही एक जगह है।
भाषण होते रहे और अधिकतर मानवाधिकारों के हनन की बात से इत्तर की ही बातें हुई। लगता ही नहीं कोई समस्या भी है किसी को मानवाधिकार नहीं मिलने की। अच्छा हुआ कोई पीड़ित खुद नहीं आया वहां वरना निराश ही होता , जो कुछ लोग थोड़ी समस्याएं लेकर गये उनको भी पुराने सरकारी ढंग से स्थानीय अधिकारियों से मिलने की राय दी गई। और जिनकी शिकायत उन्हीं को हल निकालने की बात कह कर समस्या का उपहास किया गया जैसे। तीन चार घंटे चले कार्यक्रम में कहीं भी चिंता या मानवाधिकारों की बदहाली पर अफसोस जैसा कुछ नहीं था , मानों कोई दिल बहलाने को मनोरंजन का आयोजन हो। बार बार संवेदना शब्द का उच्चारण भले हुआ , संवेदना किसी में कहीं नज़र नहीं  आई। वास्तव में ये सभी वो लोग थे जिनको कभी जीवन में अनुभव ही नहीं हुआ होगा कि जब कोई आपको इंसान ही नहीं समझे तब क्या होता है।

Sunday, 22 May 2016

हैं कहां ऐसे भले लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

समझ नहीं आता सच क्या है बनावट क्या है। अभी देखा इक टीवी शो में भाई भाई से बेइंतेहा प्यार करते हैं , बहन से दोस्तों से माता पिता से। देखते हैं किसी की दुःख भरी दास्तान सुन कर  सभी भावुक हो जाते हैं , आंखें हमारी भी नम हो जाती हैं। मगर यही सब अपने आस पास जीवन में नहीं दिखाई देता , किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है। हमें क्या बस यही नज़र आता हर किसी की निगाह में। नतीजे घोषित हुए और हर प्रथम द्वितीय रहने वाले लड़के लड़की का यही बयान था कि डॉक्टर शिक्षक आई ए एस , आई पी एस बन देश की सेवा करना चाहते हैं। उम्र भर यही सुनता आया हूं और फिर तलाश करता रहा कि वो कहां गये जिनका ऐसा ईरादा था। नेता भी देखे सभी दलों के बड़ी बड़ी बातें करते हुए मगर जब सत्ता मिली तब केवल अपनी सत्ता को स्थापित रखने या विस्तार देने की ही बात करते रहे या फिर आये दिन नये नये तमाशे जनता को बहलाने को दिखाते रहे। कुछ भी बदलना किसी की प्राथमिकता नहीं था। आज तक किसी भी नेता को ये बात अनुचित नहीं लगी कि जिस देश के करोड़ों लोग भूख और बदहाली के शिकार हों उस देश के जनप्रतिनिधि को खुद पर इतना धन खर्च करना किसी संगीन अपराध से कम नहीं है। ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें लोक को तंत्र खाये जा रहा है। ऐसे देश का राष्ट्रपति इक ऐसे महल में रहे जिसके सैंकड़ों कमरे हों और उस के रख रखाव पर करोड़ों रूपये मासिक अथवा लाखों रूपये हर दिन खर्च किये जाते हों , जितने पैसे से हज़ारों भूखे लोगों का पेट भर सकता हो। अर्थशास्त्र के अनुसार जब एक को इतना अधिक मिलता है तब लाखों करोड़ों से किसी तरह छीन कर ही मिलता है। आज जितने भी तथाकथित बड़े लोग महानायक समझे जाते हैं वो केवल अपनी मेहनत से नहीं बल्कि तमाम हथकंडे अपना कर और किसी भी तरह सफल होकर केवल अपने लिये और अधिक पाने की कोशिश से शिखर पर पहुंचे हैं , और खुद उनको भी नहीं पता कि कितने इसलिये पीछे या वंचित रह गये क्योंकि उनको कुछ भी नहीं मिला तभी हमें ज़रूरत से अधिक मिला है।  और ये तकदीर की बात नहीं है , सभी को समानता के अधिकार नहीं मिलने की बात है। जब ऐसे धनवान लोग आडंबर करते हैं गरीबों की सहायता का तब ये इक क्रूर मज़ाक होता है गरीबों के साथ। हम ये सब अपने मुनाफे के लिये नहीं समाज सेवा के लिये कर रहे हैं , ऐसा दावा करने वालों की हवस कभी पूरी नहीं होती , उनको सभी कुछ बेचना है जो भी बिक सके।
धर्म के नाम पर संचय क्या धर्म यही सिखाता है , आपके मंदिर मठ आश्रम दौलतों के अम्बार जमा करते हैं जबकि लोग दाने दाने को तरसते हैं , बेघर हैं बेइलाज मरते हैं। ऐसे धर्म ऐसे भगवान किस काम के। शिक्षा के मंदिर कहलाने वाले शिक्षा को बेच रहे हैं तो उनसे कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है , चिक्तित्स्या के नाम पर भी यही होने लगा है , क्या शिक्षा और उपचार केवल धनवानों के लिये है। जब सरकार इन बातों की अनदेखी करे तब देश की भलाई कैसे हो सकती है। इक अंग्रेज़ी कहानी " हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स " याद आती है ,
गांधी जी ने भी कहा था देश में सभी की ज़रूरत पूरी करने को बहुत है मगर किसी की हवस को पूरी करने को काफी नहीं है। बस कुछ लोगों की हवस कभी नहीं मिटती तभी बाकी लोग भूखे प्यासे हैं। आपने देवता और दैत्यों की कथायें सुनी होंगी मगर इनकी परिभाषा शायद ही समझी हो। जो अपने पास जितना है औरों को बांटते हैं वो देवता कहलाते हैं , और जो बाकी लोगों से उनका सभी कुछ छीन लेना चाहते हैं वो दैत्य कहलाते हैं। विश्व में अधुक्त्र दानव ही शासन करते रहे हैं , देवताओं को कभी शासन की चाह ही नहीं होती है। राजनीति में सज्जन पुरुष बेहद कम हुए हैं और वो कभी शासन की गद्दी पर नहीं आसीन हुए हैं।

Sunday, 8 May 2016

मुझे सज़ा दे दो ( मंथन ) डॉ लोक सेतिया

कब से खड़ा हूं कटघरे में , सुन रहा हूं इल्ज़ाम सभी के ,
सर झुकाये खड़ा हुआ हूं , नहीं है कोई भी जवाब देने  को ,
मानता हूं नहीं पूरे कर पाया , सभी अपनों के अरमानों को ,
हो नहीं सका कभी भी जीवन में सफल , टूट गये सभी ख्वाब मेरे।
कभी कभी सुनता हूं , किसी को हर कदम किसी ने दिया प्रोत्साहन ,
कुछ भी करने को देकर बढ़ावा , किया भरोसा उसकी काबलियत पर ,
लगता है तब मुझे कि शायद कोई तो कभी मुझे भी कह देता प्यार से ,
बेशक सारी दुनिया तुमको समझती है नासमझ और नाकाबिल ,
मुझे विश्वास है तुम्हारी लगन और कभी हार नहीं मानने की आदत पर।
बस इतना ही मिल जाता तो शायद मैं कभी भी नहीं होता नाकामयाब ,
कैसे समझाता किसी को किसलिये हमेशा रहा डरा सहमा उम्र भर ,
मेरा आत्मविश्वास बचपन से ही कभी उठ नहीं सका ऊपर ,
खुद को समझता रहा मैं अवांछित हर दिन हर जगह हमेशा।
इक ऐसा पौधा जो शायद उग आया अनचाहे किसी वीरान जगह पर ,
जहां कोई नहीं था देखभाल करने वाला , बचाने वाला आंधी तूफान से ,
हर कोई कुचलता रहा , रौंदता रहा मुझे बेदर्दी से कदमों तले ,
कोई बाड़ नहीं थी मुझे बचाने को , बेरहम ज़माने की ठोकरों से ,
बार बार उजड़ता रहा फिर फिर पनपता ही रहा अपनी बाकी जड़ों से ,
और बहुत बौना बन कर रह गया , इक पौधा जिस पर थे सूखे पत्ते ही।
कभी ऐसा भी हुआ , जिनको मुझ से कोई सरोकार ही नहीं किसी तरह का ,
उनकी नज़रों में भी मुझे नज़र आती रही हिकारत छिपी मीठी बातों में भी ,
किसलिये लोग अकारण ही किया करते हैं मुझ जैसों को प्रताड़ित ,
जाने क्या मिलता उनको औरों का दिल दुखा कर हमेशा।
चाहता था मैं भी सफल होना , सभी की उम्मीदों पर खरा साबित होना ,
शायद ज़रूर हो जाता कामयाब जीवन में अगर कोई एक होता जो ,
मुझे समझता , मुझे परोत्साहित करता , मेरा यकीन करता ,
और मैं कर सकता हर वो काम जो कभी नहीं कर पाया आज तक।
मगर आज मुझे नहीं देनी कोई भी सफाई अपनी बेगुनाही की ,
खड़ा हूं बना मुजरिम सभी की अदालत में कटघरे में सर झुकाये।
मांगता हूं सज़ा अपने सभी किये अनकिये अपराधों की खुद ही ,
मुझे सज़ा दो जो भी चाहो मुझे मंज़ूर है आपकी हर सज़ा मगर ,
बस अब अंतिम पहर है जीवन का , बंद कर दो और आरोप लगाना ,
गुनहगार हूं मैं , मुझे नहीं मालूम क्या अपराध है मेरा , शायद जीना।

Monday, 25 April 2016

आप क्यों रोये ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

ये क्या हुआ , कैसे हुआ , कब हुआ , ये ना पूछो। बस उनकी पलकें भरी सभा में छलक आईं। नेता जी परेशान हो  गये देखकर , कहना ही पड़ा आपकी आंखों में आंसू नहीं देख सकते। जल्द ही कोई समाधान आपकी समस्या का खोजेंगे मिल बैठ कर। 6 8 वर्षों से जनता रो रही उनको कभी कुछ नहीं हुआ , उनको रोता देखा तो परेशान हो गये। उस न्याय की देवी से इतना लगाव , बेबस डेमोक्रेसी की भी कभी सुध लेते आप जैसे नेता तो देश की जनता बदहाल नहीं होती। उनके आंसू खुद पौंछना चाहते हैं अपने हाथ से , अपने दामन से नेता जी। टुकड़े हैं मेरे दिल के ऐ यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू। आप क्यों रोये जो हमने दास्तां अपनी सुनाई। तेरी आंख के आंसू पी जाऊं ऐसी मेरी तकदीर कहां , तेरे ग़म में तुझको बहलाऊँ ऐसी मेरी तकदीर कहां। ये सब देख कर हमसे भी रहा नहीं गया , पता लगाना ही पड़ा वो रोये तो क्योंकर रोये। जानकर वास्तव में दुःख हुआ। औरों को न्याय देने वालों को खुद किसी से उम्र भर न्याय नहीं मिला , और उस पर मज़बूरी ये कि कोई अदालत भी नहीं जहां जाकर फरियाद करते। जिसे आप समझ रहे थे कि काम के बोझ से परेशान हैं वो तो अपनी इकलौती पत्नी से पीड़ित निकले हर पति की तरह। बेबसी तो बहुत है न्याय देने वाले भी अन्याय सहते हैं ख़ामोशी से उम्र भर। बहुत कीमत होती है बड़े लोगों के आंसूओं की वो भी टीवी कैमरे के सामने। उसपर घर जाने पर पत्नी ने फिर ताना दिया , क्या ज़रा सी बात पर रोतेरहते हो पुरुष होकर भी। कितनी बार समझाया है कुछ तो समझो , पूरी उम्र समझती रह जाती हैं हम पत्नियां। बिना बात हमदर्दी मिल गई आपको , जानती हूं जो बोझ है आप पर , जो चिंता है। आपको क्या पता अन्याय क्या होता है , देश की गरीब जनता से पूछो कौन अन्याय करता है कौन न्याय। अपनी आंखों पर बंधी काली पट्टी खोलो तो नज़र आये सच क्या है। इस देश के नेताओं और सरकारी  अधिकारीयों को ही भरोसा है आप पर कि वो जो भी करते रहें आप उनको बचाते रहेंगे हर अदालत में , कितने घोटाले कितनी लूट , कितना भेदभाव इन्हीं की कृपा से होता रहा हो रहा और होता ही रहेगा , कौन चाहता रोकना।
       देश की जनता हर दिन रोती है खून के आंसू , किसी नेता को , किसी सरकार को दिखाई नहीं देते उसके बहते आंसू , आपकी आंख गीली हुई तो लगा जैसे पूरा देश ही बह जायेगा इस सैलाब में। जो खुद ही अपना रोना रोने लगे , सभी अधिकार हर सुख सुविधा पाकर , उसको दूसरों का दर्द ख़ाक पता चलेगा। बताओ कितने प्रतिशत लोग हैं जिनको वो सभी कुछ हासिल है जो आपको मिला है। आम लोगों के आंसू खुद कभी देख नहीं सके या देखना चाहे ही नहीं , काश इस बात पर रोते कि आपको जिनके आंसू पौंछने , वो नहीं पौंछ सके। इक आक्रोश होता तब आपकी बात में बेबसी नहीं। बुरा नहीं मानो मैं इनको मगरमच्छ वाले दिखावे के आंसू समझती हूं जो आप अपनी नाकामी को छुपाने को बहा रहे थे। क्या आपके आंसुओं को देख हम भूल जायें कि विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र में न्याय का मात्र तमाशा होता है न्याय किया नहीं जाता। आप किस के सामने रो रहे थे , जो बार बार अपनी सुविधा से क़ानून बदलते हैं अपने स्वार्थ के लिये। संविधान और न्याय के प्रति इन सभी दलों के नेताओं का रवैया एक जैसा है , खुद को क़ानून और संविधान से बड़ा मानते हैं। काश इसको लेकर भी कभी आपको आंसू आते और वो चाहते उनको पौंछना। दो तरह के आंसू होते हैं , एक जो खुद के दुःख दर्द में आते वो बस पानी होते हैं और दूसरे जो किसी और का दुःख दर्द देख कर आते वो मोती होते हैं। देश की गरीब जनता की भूख निराशा बदहाली और पल पल सत्ता की बेपरवाही का ज़ुल्म सहने से जो आंसू बहते रहते हैं उनको किसी नेता ने समझा ना ही आपने जिनका कर्तव्य ही यही था।  शोर मचा हुआ आपके रोने का , आपने जाने कितनो को रुलाया है , कोई नहीं सोचता , आप क्यों रोये ये चिंता हर किसी को सता रही है। मुझे मालूम है आप क्यों रोये , मगर क्या करूं किसी को बता भी नहीं सकती , मैंने आपकी राज़दार होने की शपथ ली हुई है , और सभी भूल सकते हैं मैं अपनी शपथ कभी नहीं भुला सकती।
( ये मेरी व्यंग्य रचना है , अप्रकाशित है , आज ही लिखी ब्लॉग पर। आप अख़बार में , पत्रिका में छाप सकते हैं )
डॉ लोक सेतिया , फतेहाबाद ( हरियाणा )

Sunday, 17 April 2016

तुझसे कि खुद अपने आप से ( गुज़ारिश ) डॉ लोक सेतिया

सारी उम्र यही होता रहा ,
मुझे क्या पता ,
कौन करता रहा।
हर कदम ,
निराशा , हताशा ,
इक जंग किसी तरह जीने को।
जाने ये क्या है ,
मेरी नाकामी मेरी काबलियत की कमी ,
अथवा मेरी बदनसीबी।
ज़िंदगी में कभी भी ,
कुछ भी जो चाहा मैंने ,
मिला नहीं मुझे।
प्यार नहीं पैसा नहीं ,
नाम नहीं शोहरत नहीं।
इक उम्मीद फिर भी ,
जगाता रहा मैं किसी न किसी तरह ,
कि एक दिन सब बदलेगा , बदलना है मुझे।
बहुत किया विश्वास ,
मांगी हर दिन दुआ भी ,
करता रहा प्रार्थना परमात्मा से।
नहीं सुनी जाने क्यों ,
तुमने मेरी कभी फरियाद ,
नहीं हुआ मुझ पर कभी दयालु तू।
माना नहीं जीता कभी मैं ,
मगर मानी नहीं कभी हार भी ,
बिना तकदीर के सहारे भी जिया हूं मैं।
शायद मुझे छोड़ देनी चाहिए ,
अब जीने की हर इक उम्मीद ,
मगर नहीं टूटी अभी भी मेरी आशा।
मेरी कहानी में ,
बेशक नहीं होगा कोई सबक जंग जीतने का ,
लेकिन मेरी जंग कभी थमी नहीं होगी जीते जी।
कोई आगाज़ नहीं था मेरा ,
कुछ भी नहीं रहा बीच में विस्तार या ऊंचाई ,
फिर भी इक अंत ज़रूर होगा मेरा जानता हूं।
शायद कोई नहीं जानता ,
जीने के लिये कैसे खुद को और सभी को ,
छलता रहा हूं मैं , जो नहीं वो होने का आडंबर करके।
अगर तू है विधाता कहीं पर कोई ,
तो तू समझता होगा मेरी हर परेशानी ,
जो मेरे सिवा नहीं समझा कोई भी दुनिया में।
ये मेरी शिकायत है या प्रार्थना ,
तुझ से है या फिर खुद अपने आप से ,
नहीं मालूम मुझे , क्या मालूम है तुझे ऐ खुदा।

Sunday, 10 April 2016

भगवान की भी सुनो ( इक विचार ) डॉ लोक सेतिया

इक मंदिर में हादसा हो गया , आग लगी और लोग जल कर मर गये , कितने ही तड़प रहे दर्द से। क्या भगवान की यही मर्ज़ी थी। यही सवाल किया उसकी मूर्ति के सामने जाकर , क्या तुम थे वहां मंदिर में या कहीं और मस्ती कर रहे थे अपने परिवार और देवी देवताओं संग। क्या तुम बचा नहीं सकते थे अपने पास आये भक्तों को। क्या तुमने उनको खुद कोई सज़ा दी उनके पापों की ऐसे अपने ही मंदिर में। देखा भगवान की मूर्ति भी आंसू बहा रही है। मैंने कहा अब पछताने से क्या फायदा , पहले ही ये सब नहीं होने देना था। इक आवाज़ सुनाई दी , बस करो मुझे और परेशान न करो मैं पहले ही बहुत दुखी हूं। तुम लोग हर बात के लिए मुझे ही दोषी ठहराते हो , खुद क्यों नहीं सोचते क्या सही क्या गलत। जब खुद मंदिर का प्रशासन देखने वाले जो नहीं किया जा सकता वो करते हैं तो ये होना ही था , क्या भगवान ने कभी ऐसा कहा है कि नियम कायदे का पालन नहीं करो। अब जिस जगह ऐसे कायदे कानून की अनदेखी होती हो उस जगह कभी भगवान हो सकता है। लोग बेकार भटक रहे हैं इधर उधर , भला भगवान को उन सभी जगहों से क्या लेना देना जहां धन संम्पति की , सोने चांदी की , हीरे जवाहरात की , चढ़ावे की बात की जाती हो। मेरा कोई बाज़ार नहीं है , बिकता नहीं हूं मैं। तुम जहां खोजते वहां नहीं हूं मैं। देखना चाहते हो तो कहां नहीं हूं मैं। बस जहां समझते , वहां नहीं हूं मैं।

Sunday, 3 April 2016

साक्षात्कार भगवान श्री राम का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

संपादक जी के घर की कॉलबेल बजी , दरवाज़ा खोला तो देखा सामने बजरंग बली जी खड़े हैं। संपादक जी ने पूछा हनुमान जी आप , लगता है गलती से यहां आ गये हैं , मैं तो सभी धर्मों का आदर करने वाला हूं , मगर किसी देवी देवता का उपासक नहीं हूं। मैं अपने आप को सेकुलर मानता हूं और चाहता भी हूं कि मुझे सेकुलर ही समझा जाये। हनुमान जी बोले , महोदय मैं तो आपके लिये प्रभु श्री राम का संदेश लाया हूं  , आपको बुलाया है मिलने को। भगवान का बुलावा अर्थात मौत , सोचने लगे संपादक जी , तो बजरंग बली जी ने समझाया कि वो बुलावा नहीं , मैं तो आपको श्री राम के साक्षात दर्शन को ले जाना चाहता हूं और सकुशल वापस भी छोड़ जांऊगा। प्रभु को आपसे कुछ ख़ास बात करनी है , वो खुद भी आ सकते थे मगर इसलिए नहीं आये ताकि आपकी सेकुलर होने की छवि पर कोई प्रभाव नहीं पड़े। संपादक जी सोचने लगे बेशक वो सेकुलर ही हैं और सभी धर्मों को समान समझते हैं , मगर किसी धर्म के ईश्वर का साक्षात्कार छापने वाले पहले पत्रकार वो हो सकते हैं , ऐसा अवसर कभी छोड़ नहीं सकते। इसलिए अवसर को गंवाना नहीं चाहते और बजरंग बली जी से जल्द ले चलने को कह दिया। कागज़ कलम साथ लिये चल दिये हनुमान जी के साथ , हनुमान जी ने उनको अपनी हथेली पर बिठाया और उड़ कर सीधे राम दरबार में जा पहुंचे।
        संपादक जी ने देखा कोई सुरक्षा जांच नहीं , कोई परिचय पत्र नहीं , अपॉइंटमेंट नहीं , जो भी चाहे आ सकता खुले दरबार में अपनी बात कहने को। कोई प्रशासन का अधिकारी नहीं रोक सकता , कुछ बताने की ज़रूरत नहीं पहले से कि कोई शिकायत है या कुछ मांगना है या कोई अन्य काम है। पहुंचते ही श्री राम संपादक जी के अभिवादन का जवाब देते हुए कहने लगे , आपका हार्दिक स्वागत है , आपको यहां आने का कष्ट देना पड़ा कुछ बात ही ऐसी थी। आप जनता तक सभी की बात पहुंचाते हो , शायद हमारी भी लोगों को समझा सको , वर्ना हमें नहीं लगता हमारी बात लोग समझना भी चाहते हैं। संपादक जी को लगा शायद भगवान पूरे पेज का विज्ञापन अख़बार में देना चाहते हैं , अपनी बात का प्रचार करने को। संपादक जी बोले भगवान आपकी सेवा का अवसर पाकर हमें ख़ुशी होगी , हमारी विज्ञापन की दरें और भी कम हो गई हैं , हमारी प्रसार संख्या करोड़ों में है देश भर में , सभी सरकारी विभाग हमें विज्ञापन देते हैं। श्री राम बोले महोदय आप गलत समझ रहे हैं , हमने कोई विज्ञापन नहीं देना है न ही कोई शुल्क ही आपको मिल सकेगा , हमें पता चला आप जनता की बात लिखते हैं अपने कॉलम में और पाठकों की बात में भी , हम चाहते आप हमारी भी बात लोगों तक पहुंचा दो , जनहित की बात समझ कर। संपादक जी भांप गये कि भगवान का इंटरव्यू छपना है , कागज़ कलम लेकर बोले आपसे कुछ सवाल करूंगा जिनके जवाब आप देना ताकि आपकी बात ठीक से समझी जा सके। श्री राम बोले ठीक है।
                संपादक जी बोले मेरा पहला सवाल अयोध्या में आपके मंदिर को लेकर है , क्या आपको उसके अभी तक नहीं बन पाने से दुःख है या बन जाने से ख़ुशी होगी। श्री राम बोले यही बात तो उनको कहनी है , मुझे किसी ईमारत में कैद नहीं होना है , हम तो अपने भक्तों के मन में बसते हैं। हमारे परम भक्त हनुमान ने अपना सीना चीर कर दिखा दिया था , आपने रामायण नहीं भी पढ़ी हो तो टीवी सीरियल तो देखा ही होगा। मैं तो कण कण में बसता हूं कोई देखना चाहे अगर तो , मेरा मंदिर तो कभी हर घर में हुआ करता था , लोग सुबह शाम राम राम किया करते थे , अब जब कोई भी किसी मर्यादा का पालन नहीं करता तब मेरे भव्य मंदिर बनाने से मुझे क्या प्रसन्नता हो सकती है। भगवान उदास हो गये अपनी बात करते करते। संपादक जी बोले आपको नहीं पता लोगों ने अपने वस्त्रों पर आपका नाम लिखवा रखा है , पत्थरों पर आपका नाम लिख रहे हैं। राम बोले मुझे सब पता है , आह भर कर कहने लगे , मेरे नाम की चादर ओढ़ने से , मेरे नाम की माला जपने से कोई मुझे नहीं पा सकता है। मैं तो तुम सभी के अंदर रहता हूं , मुझे और किसी जगह मत खोजो , जिसको अपने भीतर नहीं मिलता उसको बाहर भी नहीं मिलेगा कोई भी ईश्वर। आप सभी तक मेरा ये संदेश पहुंचा सको तो बहुत अच्छा होगा। लोग अपने घरों में गलियों में , गांव में शहर में मेरे रहने लायक थोड़ी जगह बनायें , अपने आस पास सभी दीन दुखियों की सहायता करें , मैं उन्हीं में रहता हूं। पत्थरों में नहीं बसता हूं मैं। कम से कम मेरे नाम पर , मेरे नाम पर मंदिर बनाने की बात पर कोई राजनीति नहीं करें। मैंने कभी राज-पाठ का लोभ नहीं किया था ,
हमेशा जनता की भावनाओं का आदर ही किया , तभी इक धोबी के झूठे आरोप पर अपनी पत्नी देवी सीता का त्याग कर दिया। कोई ऐसा नहीं कह सके कि नियम क़ानून राज परिवार पर लागू नहीं होते। अब तो राम राज्य की बात करने वाले खुद शाही ठाठ से राजा बनकर रहते हैं जब लोग गरीबी और भूख से तड़पते हैं। क्या ये मेरे अनुयायी हो सकते हैं ?
         संपादक जी बोले भगवान आपकी बात शत प्रतिशत सही है , जब आपको लगता है यहां कितना बुरा हाल है तो फिर से अवतार लेकर सभी पापियों रावणों से लोगों को निजात क्यों नहीं दिला देते। श्री राम बोले संपादक जी रावण तो महापंडित था , ज्ञानी दुश्मन अच्छा होता है मूर्ख दोस्तों से। और ये खुद को मेरे भक्त कहने वाले कितने समझदार हैं तुमसे छिपा नहीं है। समझदार दुश्मन लाख अच्छा होता है नासमझ दोस्तों से।
                  अचानक संपादक जी की नींद खुल गई और वो अपने सपने के बारे सोचने लग गए , कि राम की बात को कहां जगह दें अख़बार में। संपादकीय में या पाठकों की बात में। सेकुलर इमेज की चिंता के साथ कट्टर-पंथियों के नाराज़ होने का भी डर है। "मानो या ना मानो " शीर्षक कॉलम में ही छापना सही होगा।
                             ( पांच सौवीं पोस्ट है ये मेरे ब्लॉग की )

Thursday, 31 March 2016

संकल्प ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जीवन में जाने कितनी बार ,
किया तो है पहले भी संकल्प ,
खुद को बदलने का संवरने का ,
मगर शायद कुछ अधूरे मन से ,
तभी जब भी आया इम्तिहान ,
नहीं पूरा कर सका में अपना संकल्प।
फिर से इक बार कर रहा हूं वही संकल्प ,
नहीं घबराना असफलताओं से ,
नहीं डरना ज़िंदगी की मुश्किलों से ,
छुड़ा कर निराशाओं से अपना दामन ,
साहसपूर्वक बढ़ाना है इक इक कदम ,
अपनी मंज़िल की तरफ बार बार।
नतीजा चाहे कुछ भी हो मुझे करना है ,
फिर से प्रयास पूरी लगन से निष्ठा से ,
कोई रुकावट नहीं रोक सकती रास्ता ,
मुझे करना ही है पार इस बार उस नदी को ,
और ढूंढनी ही है मंज़िल प्यार की यहीं ,
इसी जन्म में इसी दुनिया में इक दिन।

Monday, 28 March 2016

वजूद की तलाश में ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जाने कहां खो गया हूं मैं ,
खोजना चाहता हूं अपने आप को ,
वापस चला जाता हूं ,
ज़िंदगी की पुरानी यादों में ,
समझना चाहता हूं दोबारा ,
किस मोड़ से कैसे मुड़ गया था ,
रास्ता ज़िंदगी की राह का कभी।
शायद चाहता हूं जानना ,
कि क्या होता अगर तब मैंने ,
चुनी होती कोई और ही राह चलने को ,
तब कहां होता मैं आज और क्या होता ,
मेरा वर्तमान भी और भविष्य भी।
लेकिन समझ आता है तभी मुझे ,
ये सच कि कोई कभी भी ,
लिखी हुई किताब को दोबारा पढ़कर ,
बदल नहीं सकता है लिखी हुई ,
इबारत को , गुज़रे हुए पलों को।
हो सकता है मेरी ज़िंदगी की किताब में ,
बीते हुए ज़माने की ही तरह ,
पहले से ही लिखा हुआ हो मेरा ,
आने वाला कल भी भविष्य भी ,
शुरुआत से अंत के बीच ,
न जाने कब से भटकता रहा हूं ,
और भटकना है जाने कब तलक ,
अपने खोये हुए वजूद की तलाश में ,
मुझे।

Saturday, 26 March 2016

मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज इक बार फिर ,
इक कहानी पढ़ते पढ़ते ,
सोच रहा था ,
मुझे भी उस कहानी के ,
किसी पात्र की तरह ,
अच्छा , बहुत अच्छा बनना है।
सभी मुझे समझते हैं ,
मैं बहुत अच्छा हूं , सच्चा हूं ,
मगर खुद अपनी नज़र में ,
मुझ में कमियां ही कमियां हैं ,
सोचता रहता हूं ,
मैं क्यों नहीं बन पाया वैसा ,
जैसा बनना चाहिए था मुझे।
शायद इस दुनिया में अच्छा ,
सच्चा बनकर जीना ,
मुश्किल ही नहीं ,
असंभव काम भी है ,
और मैंने किया है उम्र भर ,
असंभव को संभव करने का प्रयास।
मुझे किसी ने पढ़ाया नहीं ,
सच्चाई और उसूलों का पाठ ,
बल्कि हर कोई समझाता रहा ,
दुनियादारी को सीखने की ज़रूरत।
बस मेरा किताबें पढ़ने का शौक ,
अच्छी फिल्मों को देखने का जुनून ,
मुझे समझाता रहा सही और गलत ,
अच्छे और बुरे का अंतर करना ,
और मुझ में मेरा ज़मीर ,
ज़िंदा रहा हर हाल में।
जो काम शायद किसी गुरु की शिक्षा ,
किसी प्रचारक के उपदेश नहीं कर सके ,
मेरे विवेक ने खुद किया हर दिन ,
वही काम मार्गदर्शन देने का मुझे ,
इसलिए हमेशा की तरह फिर ,
आज भी मैंने किया है निर्णय ,
तमाम कठिनाईयों के बावजूद ,
अकेले उसी राह पर चलते रहने का।

Thursday, 24 March 2016

आज मनाई होली इस तरह ( इक सच ) डॉ लोक सेतिया

सुबह से शाम हो गई है ,
सोच रहा हूं मैं होली के दिन ,
क्या ऐसे ही होती है होली
जैसे आज मनाई है मैंने।
कभी वो भी बचपन की होली थी ,
जब बक्से से निकाल के देती थी ,
मां हमें चमचमाती हुई पुरानी ,
स्टील और पीतल की सुंदर पिचकारी।
और घोलते थे रंग कितने ही मिला पानी में ,
भरने को दिन भर जाने कितनी बार ,
खेलते थे बड़ों छोटों के साथ मस्ती में ,
मन में भरी रहती थी जाने कैसी उमंग।
फिर होते गये हम बड़े और समझदार ,
बदलता गया ढंग हर त्यौहार मनाने का ,
सोच समझ कर जब लगे खेलने होली ,
नहीं रही मन की उमंग और होता गया ,
हर बरस पहले से फीका कुछ हर त्यौहार।
आज चुप चाप बंद कमरे में अकेले ही ,
खेली दिन भर हमने भी ऐसे कुछ होली ,
जैसे किसी अनजान इक घर में हो खामोश ,
पिया बिना नई नवेली दुल्हन की डोली।
फेसबुक पर कितनी रंग की तस्वीरें ,
कितने सन्देश कितने लाईक कमेंट्स ,
मगर दिल नहीं बहला लाख बहलाने से ,
किसी को नहीं भिगोया न हम ही भीगे ,
ये कैसे दोस्त सच्चे और झूठे जाने कैसे ,
नहीं आई घर बुलाने कोई भी टोली हमजोली।
की बातें फोन पर सभी से कितनी दिन भर ,
ली और दी हर किसी को होली की बधाई ,
बने पकवान भी कुछ मंगवाये बाज़ार से ,
लगी फिर भी फीकी हर तरह की मिठाई।
लेकिन हम सभी को यही बतायेंगे कल ,
बहुत अच्छी हमने ये होली है मनाई ,
नहीं जानते कैसे क्या क्यों बदला है ,
मगर खुशियां होली की हो गई हैं पराई।

Sunday, 20 March 2016

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ( ग़ज़ल 215 ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ,
इश्क़ की हर दास्तां खामोश है।
बस तुम्हीं करते रहे रौशन जहां ,
तुम नहीं , सारा जहां खामोश है।
क्या बताएं क्या हुआ सबको यहां ,
चुप ज़मीं है आस्मां खामोश है।
झूमता आता नज़र था रात दिन ,
आज पूरा कारवां खामोश है।
तू हमारे वक़्त की आवाज़ है ,
किसलिए तूं जानेजां खामोश है।