Thursday, 13 December 2018

संविधान को फुटबॉल समझने वाले ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    संविधान को फुटबॉल समझने वाले ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   लोग सरकार बदलते हैं मगर वास्तव में चेहरे बदल जाते हैं आचरण नहीं बदलता है। जो दल दावा करता था सबसे अलग है सत्ता मिली तो सभी जैसा ही नहीं बन गया बल्कि पहले जो थे उनसे चार कदम आगे बढ़कर मनमानी करने लगा। इस देश में संविधान राजनेताओं के लिए भरोसे या आदर करने को नहीं केवल शासन पाने को उपयोगी  होने तक ज़रूरत को ही है। जब खुद किसी दल में लोकतंत्र नहीं है तो उनसे उम्मीद भी कोई क्या कर सकता है। विडंबना की बात ये है कि हमारे सामने ये सब गंदा खेल चलता रहता है और हम चुप चाप देखते रहते हैं। मोदी जी मनमोहन सिंह को कठपुतली बताते थे और परिवारवाद पर तलवार भांजते थे मगर जब खुद सत्ता मिली तो हर राज्य में अपनी पसंद के आरएसएस से जुड़े लोगों को सत्ता पर बिठाते रहे और अदालत सीबीआई आरबीआई सब जगह अपनी पसंद के लोगों को नियुक्त किया जो अभी भी जारी है। आरबीआई के नया गवर्नर अर्थशास्त्री नहीं आईएएस अधिकारी है जो नोटबंदी के समय रोज़ आकर नया नियम घोषित किया करता था सरकार की बात करता था। कांग्रेस पर आरोप लगाते थे दिल्ली से राज्य की सरकार चलाते हैं खुद आकर दल की भी नहीं दो लोग देश भर की सरकार चलाने लगे और संवैधानिक संस्थाओं को ही पंगु बना दिया। अब चुनावी नतीजे में सरकार बदली तो भी बदला नहीं तौर तरीका और राज्यों का सीएम कौन हो इसका फैसला आलाकमान पर छोड़ दिया गया है। संविधान में आलाकमान शब्द है भी या नहीं कोई नहीं सोचता है। उधर अपने अपने राज्य में अपने दल के अपनी पसंद के नेता के पक्ष में नारे पोस्टर लहरा रहे हैं ताकि जो दिल्ली से आये उसे बता सकें बहुमत किस को चाहता है। क्या इनको पता नहीं है कि संविधान क्या चाहता है क्यों विधायकों को अपनी सभा में खुद तय नहीं करने दिया जाता कि उनकी राय क्या है। मगर बात तो उससे पहले की ही है जब हर दल टिकट बांटता है तो संसदीय क्षेत्र या विधानसभा क्षेत्र के कर्यकर्ताओं या दल को नहीं दिल्ली या राज्य की राजधानी में बैठे पदाधिकारी बंदरबांट करते हैं और मापदंड होते हैं जाति धर्म पैसा बाहुबल और किसी बड़े नेता की नज़दीकी। इतना ही नहीं जब कोई विधायक या सांसद मर जाता है तो उसके परिवार को उपचुनाव में टिकट देना सहानुभूति की बात नहीं बल्कि ऐसा लगता है जैसे कारोबार की दुकान पर बाप की गद्दी बेटे को मिलती है। जो दल अपने विधायकों को सांसदों को अपना नेता नहीं चुनने देते उनसे आम जनता को संविधान द्वारा मिले अधिकारों का सम्मान करने की अपेक्षा करना मृगतृष्णा के समान है। 
                                  जब तक हम इतनी भी बात नहीं समझते कि संविधान किसी को पीएम या सीएम घोषित करने को नहीं मानता है संविधान का नियम है कि चुने हुए विधायक संसद अपना नेता सदन का चुने। ऐसा कब हुआ था शायद लालबाहुदर शास्त्री जी के समय देश में हुआ था कि कोई नहीं जनता था जिस सभा में नेहरू जी के बाद कौन नेता हो खुली बहस में नाम तय हुआ तो जिसका नाम सामने आया वो छोटे कद का महान नेता हाल के आखिर में नीचे सीढ़ी पर बैठा हुआ था जब कोई कुर्सी खाली नहीं दिखाई दी और नाम सामने आने पर पता चला और उनको मंच पर बुलाया गया। उसके बाद से दल पर अधिपत्य जमाये लोग देश के और अपने दल के संविधान को तोड़ते मरोड़रते रहे और ये हर दल में हुआ वामपंथी से दक्षिणपंथी कोई भी हो , जो दल बने ही किसी एक नेता के नाम पर उनका कोई संविधान रहा ही नहीं और बाप दादा ससुर या अन्य संबंध ही दावेदार बनाते रहे हैं। अपने हर दल में अनुशासन कायम रखने की बात सुनी होगी जो वास्तव में अनुचित बात को रोकने की बात नहीं है बल्कि बड़े नेता की गलत बात को गलत नहीं कहने को बनाया इक तानाशाही नियम है। अगर आपको पगता है कि चुनाव के बाद दल अपने विधायक संसद के साथ क्या सलूक करते है उनकी समस्या है तो आप गलत हैं जो विधायक अपने अधिकार पर खामोश रहते हैं अनुशासन के नाम पर उनसे जनता की समस्याओं की बात पर आवाज़ उठाने की आशा ही नहीं की जा सकती है। जिस दिन वास्तव में नियम उसूल और संविधान की सही मायने में पालना की जाने लगेगी हर नागरिक को समानता का अधिकार खुद ब खुद हासिल हो जाएगा। अफ़सोस की बात ये है कि भाजपा कांग्रेस या वामपंथी समाजवादी या अन्य राज्यों के दल कोई भी देश के संविधान की भावना का आदर नहीं करता है और जो भी सत्ता पर आसीन होता है संविधान की न्याय की शपथ उठाकर उसे भूल जाता है। क्योंकि हम संविधान की शपथ को देशभक्ति की भावना की बात नहीं मानते और केवल औपचारिकता निभाते हैं। देश का संविधान जिसकी बात कही जाती है दुनिया का सबसे अच्छा संविधान है उसकी अहमियत राजनीति में फुटबॉल की जैसी है और हर राजनेता और दल उसके साथ खिलवाड़ करता है। मगर इसके बावजूद मेरा भारत महान है।

Sunday, 9 December 2018

बेवफ़ाई भी नहीं किस्मत में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बेवफ़ाई भी नहीं किस्मत में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

      हर कोई बात करता है वफ़ा नहीं मिली। हम से पूछो जो बेवफ़ाई को भी तरसते हैं। कोई मिल जाता फिर चाहे वफ़ा के बदले वफ़ा नहीं जफ़ा ही मिलती हम उसे भी खुशनसीबी समझते और बेवफ़ाई का गिला भी नहीं करते। मगर काश कोई होता मुहब्बत इश्क़ प्यार का स्वाद पता चलता और कुछ नहीं तो तजुर्बा ही हासिल कर सकते। रोग है दिल का तो क्या हुआ दिल लगाना कोई दिल्लगी की बात तो नहीं है। हर कोई चाहता है कोई दिल को इतना भा जाये कि दिल जिस पर आये बिना उसके रहा ही नहीं जाये। जाने क्यों स्कूल तो क्या कॉलेज की पढ़ाई में भी इस पर कोई विषय ही नहीं था कि मुहब्बत प्यार इश्क़ क्या होता है कैसे होता है किया नहीं जाता। कहानियों में फिल्मों में गीतों में देखते सुनते थे दिल धड़कता है नींद नहीं आती ख्वाब देखते हैं और हसीन सपने सजाते हैं। लोग कहने को कहते थे प्यार खुदा की इबादत है मुहब्बत बिना ज़िंदगी बेकार है लेकिन कभी अख़बार में खबर छपती दो प्यार करने वालों का दुनिया वालों ने क्या बुरा हाल नहीं किया तो लगता दुनिया दुश्मन होती है मुहब्बत की क्यंकि उसकी आदत है जो खुद को हासिल नहीं किसी और को मिले तो जलते हैं। कहते हैं हर किसी को कोई न कोई दुनिया में सब से हसीन सब से अलग लगता है मुझे तो कोई भी लड़की ऐसी नहीं लगी जो बाकी लड़कियों से अलग हो। यकीन नहीं होता तो कुछ बातें बताता हूं जिस पर आप चाहो तो किसी भी लड़की से बात कर सकते हैं सभी की राय एक ही होगी। हर लड़की यही चाहती है कि .......
                           खुद भले कैसी लगती हो उसे चाहने वाला बेहद खूबसूरत और समझदार होने के साथ पैसे वाला भी हो। जो उसको चांद तारे तक तोड़ कर लाकर दे सकता हो और ज़िंदगी भर उसकी हर आरज़ू पूरी करना चाहता हो। उसकी ख़ुशी की खातिर जान देने की बात करता हो और उसे फूलों की रानी बनाकर रखना चाहता हो। खुद कंगाल हो तब भी अपनी महबूबा को महल बना देने का वादा करता हो , सबसे बड़ी बात बड़े बड़े सपने सच करने की कसम खाता हो और कभी झूठ नहीं बोलने की भी बात करता हो। इतना ही नहीं हर लड़की जिस को दिल देती है उस से किसी भी हाल में नाराज़ नहीं होने और जैसे वो चाहती हो उसी तरह जीने को राज़ी होने की शर्त भी जोड़ती है। इस तरह की हज़ार बातों को मनवाने के बावजूद भी कोई मान सकता है कि प्यार मुहब्बत में सैदेबाज़ी नहीं होती है कोई बंधन नहीं शर्त नहीं रखी जाती है। मालूम नहीं लोग किस तरह से अपने लिए कोई आशिक़ या माशूका ढूंढ लेते हैं जो इन सारी बातों पर खरा साबित हो। मुझे तो यही समझ आया कि ये इश्क़ प्यार मुहब्बत राजाओं और रईसों के भी बस की बात नहीं है तो हम जैसे आम लोग इतना कीमती सामान देख सकते हैं हासिल नहीं कर सकते हैं।
                   हमारे समय में प्यार चोरी चोरी किया जाता था और बड़े साहस वाले किया करते थे। कुछ लोगों की बात पता चल जाती थी जब बात बिगड़ जाती और कभी कभी कोई खुद ही अपनी बात बताया करता था दोस्तों को। लेकिन सच तो यही है कि दोनों सूरत में अंजाम एक ही देखते थे। आपको कुछ घटनाओं की बात बताता हूं। इक हॉस्टल में कमरे में साथ रहे को कभी किसी कभी किसी दूसरी से इश्क़ होने का एहसास होता रहता था और आखिर में एक उसके साथ जन्म जन्म का रिश्ता निभाने को तैयार भी हुई थी। साल भर मुलाकात होती रही और अमीर लड़का खूब पैसे उड़ाता भी रहा मगर जब लड़की के घरवालों को पता चला तो जमकर पिटाई कर आशिक़ी का भूत उतारा गया और लड़की की शादी किसी और लड़के से कर दी गई। जी नहीं इसे उनकी कहानी का अंत नहीं समझना आप , घरवालों को इस बारे बताने वाली छोटी बहन बाद में उस से प्यार पींग पर झूलती रही और किसी तरह उस से शादी भी कर ली थी। मगर यहां भी कहानी खत्म नहीं हुई और एक तरफ उसे दूसरे शहर में घर लेकर साथ रखा पति पत्नी बनकर और उधर माता पिता के अनुसार एक और लड़की से शादी कर प्यार और शादी का खेल जारी रखा। अधिक विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं है बस इतना समझ लो प्यार जैसा कुछ भी नहीं था इक रोग था और लाईलाज था।
        इक और साथी की बात और भी अजीब है बेहद भले सवभाव का बहुत सुंदर लड़का था और डॉक्टर बनने वाला था साल भर बाद। शहर के बड़े अधिकारी की लड़की से प्यार हुआ और हॉस्टल के कॉलेज के दोस्त सोच भी नहीं सकते थे वो कोई ऐसा काम भी करता है। हंसमुख दोस्त जब उदास रहने लगा तब मुश्किल से पता चला कि जिस लड़की से मिलने शहर के दूसरे कॉलेज जाता था किसी खूबसूरत लड़की से उसकी सगाई अफ़्सर पिता ने किसी आईएएस लड़के से कर दी थी वो भी खुद लड़की की मर्ज़ी से ही। ये जनाब एक विकल्प थे और बेहतर विकल्प को चुना था लड़की ने। ऐसी तमाम कहानियों से समझ आया कि दिल आने और फ़िदा होने की कोई बात नहीं है बात अवसर पर चौका छक्का जड़ने की होती है। इक ग़ज़ल याद आई उस समय की फिल्म की। ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफान होते हैं। मुहब्बत सबकी महफ़िल में  शमां  बनकर नहीं जलती  , हसीनों की नज़र सब पर छुरी बनकर नहीं चलती। जो हैं तकदीर वाले बस वही क़ुर्बान होते हैं। शमां की बज़्म में आकर ये परवाने समझते हैं , यहीं पर उम्र गुज़रेगी ये दीवाने समझते हैं। मगर इक रात के वो तो फख्त महमान होते हैं। आप समझ गये होंगे हम तमाम लोग केवल किनारे पर बैठ कर लहर देखने वाले ऐसे ही रहते हैं।
                          अभी तलक आपको ये बात नहीं समझ आई होगी कि जब दिल लिया दिया नहीं और कोई तजरुबा ही नहीं तो फिर नसीब की बात कहां से बीच में ले आये हैं। कहने को हमने भी इश्क़ किया है लिखने से जुनून की हद तक मगर लोग बताते हैं कि ग़ज़ल कविता में बगैर आशिक़ी वो बात नहीं आती है। केवल ख्वाब में किसी को महबूबा समझ ग़ज़ल कहना और किसी से चोट खाकर ग़ज़ल कहना दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है। तभी ग़ज़लकार कविता पाठ करने वाले मंच पर बेवफ़ाई की खुलकर बातें किया करते हैं जबकि किसी कहानी में पढ़ा था जिसको चाहते उसकी रुसवाई नहीं कर सकते। तब सोचता हूं लोग जिनकी बेवफ़ाई के चर्चे करते हैं खुद भी वफ़ा निभाते तो कभी ऐसा नहीं करते। बेवफ़ा तो आप भी हैं फिर उनकी बेवफ़ाई की शिकायत किसलिए करते हैं। मुहब्बत करना आता है निभाना नहीं आता वर्ना कोई किसी को चाहता तो उसी की बुराई भला कैसे करता। मेरा इक शेर आखिर में पेश है।

किसी को बेवफ़ा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता ,

निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं।


Saturday, 8 December 2018

मायने बदल गये हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         मायने बदल गये हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      मकसद जनता का ध्यान सरकार के वास्तविक वादों को नहीं पूरा करने की सच्चाई से भटकाना है और अगले चुनाव को फिर एक बार नया झांसा देकर किसी भी तरह जीत कर सत्ता से चिपके रहने की ख्वाहिश को पूरा करना है। मगर ऐसे राजनीतिक कार्य को धर्म सभा नाम दिया जा रहा है अर्थात धर्म वालों को सोचना पड़ेगा कि क्या यही इस युग का धर्म है कि धर्म को ढाल बनाने से आगे तलवार बनाने का कार्य किया जाये। धर्म सभा धर्म को समझने को हुआ करती थी कभी इधर धर्म को समझना तो दूर धर्म का पालन करना भी उनका मकसद नहीं है उनको धर्म की आड़ लेकर वोटों की राजनीति करनी है। ऐसी इक सभा से लौटकर कोई अपने भगवान को लेकर एक नई आधुनिक कथा लिखने का कार्य कर रहा है उसे समझ आ चुका है भविष्य में यही सब से महत्वपूर्ण और आवश्यक बन सकती है और जिस तरह कभी अटल बिहारी वाजपेयी जी की जीवनी की किताब को बेचने में यूजीसी ने सभी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया था उसे फिर से दोहराया जा सकता है। पहले मेरे दो पुराने व्यंग्य। 

               1       मेरी भी किताब बिकवा दो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

         मुझे भी अपनी किताब बेचनी है। अब मुझे ये भी पता चल गया है कि किताब कैसे बेची जा सकती है। बस एक सिफारिश का पत्र  यू.जी.सी. चेयरमैन का किसी तरह लिखवाना है। जैसा १६ अक्टूबर २००२ को यूजीसी के अध्यक्ष अरुण निगवेकर ने लिखा है सभी विश्व विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थाओं को , प्रधानमंत्री जी की जीवनी की पुस्तक खरीदने की सलाह देते हुए। "जननायक " किताब की कीमत अगर चार हज़ार रुपये हो सकती है तो मुझ जैसे इक जनलेखक की किताब चालीस रुपये में बिक ही सकती है। कुछ छूट भी दे दूंगा अगर कोई सौ किताबें एक साथ खरीद ले। मुनाफा न सही छपाई का खर्च तो निकल ही आएगा। मुफ्त में मित्रों को उपहार में देने से तो अच्छा है। समस्या यही है कि यूजीसी वाले मुझे नहीं जानते , मैं उनको जनता हूं ये काफी नहीं। मगर अभी पूरी तरह कहां जानते हैं लोग उसको।  अभी तक सुना था वो अनुदान देते हैं , किताबें भी बिकवाते हैं अब पता चला है। इक सत्ताधारी मुझे समझा रहे थे कि ये ज़रूरी होता है , बिना प्रचार के कुछ नहीं बिकता , साबुन तेल से इंसान तक सब को बाज़ार में बिकने को तरीके अपनाने ही पड़ते हैं। अब प्रधानमंत्री जी के प्रचार के लिये क्या इस देश के गरीब चार हज़ार भी खर्च नहीं कर सकते। आखिर कल यही तो इतिहास में शामिल किया जायेगा। उधर पुस्तकालय वालों का कहना है कि उनको कोई एक दो प्रति थोड़ा खरीदनी होगी , थोक में खरीदनी होती है। यूजीसी कहेगी तो प्रकाशक से छूट या कमीशन कौन मांग सकता है। मुझे मेरी बेटी ने बताया कि दूसरी कक्षा में पास होने के लिये उसकी अध्यापिका ने भी सभी छात्रों को एक किताब खरीदने को विवश किया था। मैंने जब स्कूल के अध्यापक से पूछा कि आप कैसे किसी किताब को ज़रूरी बताते हैं तो उनका कहना था कि जो प्रकाशक उनसे मिलता है आकर उसी की किताब को ही अच्छा बता सकते हैं जो मिला ही नहीं आकर उसकी किताब को किसलिये सही बतायें। उनकी बात में दम है , मुझे भी किसी तरह यूजीसी के चेयरमैन से जानपहचान करनी ही चाहिये। क्या खबर वे भी यही सोचते हों कि मैं उनको मिलने आऊं तभी तो वे मेरी किताब की सिफारिश करें। शायद वो इसी इंतज़ार में हों कि मैं मिलूं तो वे पत्र जारी करें।
                                सोचते सोचते उन नेता जी की याद आई जिनकी सुना है राजधानी तक पहचान है। लगा कि वे फोन कर देंगे तो बात बन सकती है। मगर नेता जी को पता ही नहीं था कि यूजीसी किस बला का नाम है। वे आठवीं पास हैं , कभी सुना ही नहीं था कि ये किस चिड़िया का नाम है। फिर ध्यान मग्न हो कुछ सोचने लगे , अचानक नेता जी को कोई उपाय सूझा जो वो मुझे पकड़ कर अपने निजि कक्ष में ले गये। मुझे कहने लगे तुम चिंता मत करो , तुम जितनी किताबें छपवाना चाहो छपवा लो , मैं सारी की सारी खरीद लूंगा। अगर मैं भी उनका एक काम कर दूं। वे चाहते हैं कि मैं उनकी जीवनी लिखूं जिसमें उनको नेहरू -गांधी से भी महान बताऊं। मैं अजीब मुश्किल में फंस गया हूं , इधर कुआं है उधर खाई। घर पर आया तो देखा श्रीमती जी ने रद्दी वाले को सारी किताबें बेच दी हैं तोल कर , पूरे चालीस किलो रद्दी निकली मेरी अलमारी से आज शाम को। एक और रचना भी भगवान को लेकर है जो शायद आपको कल्पना से बढ़कर वास्तविकता लग सकती है। मैंने धर्म मीडिया वालों से लेकर भगवान तक को लेकर व्यंग्य लिखने का कार्य किया है और कई लोग समझते हैं ऐसा करना नास्तिकता की बात है मगर वास्तव में धर्म समझने की बात है और जिस को अपने समझना है उस पर मन में सवाल खड़े होना लाज़मी है। धर्म सभा आयोजित की इसी लिये जाती रही हैं कि विचार विमर्श किया जाये और अपने धर्मं की विसंगतियों विडंबनाओं को सही किया जाये। मैं मंदिर जाता हूं और आगे जिस घटना की बात है वो मंदिर जाने पर ही संभव हुई मगर उस रचना को छापना हर संपादक को मंज़ूर नहीं था फिर भी छपी थी। पढ़ सकते हैं।

            2          लेखक से बोले भगवान ( कटाक्ष ) डा लोक सेतिया 

          आज फिर वही बात , जब मैंने हाथ ऊपर उठाया मंदिर का घंटा बजाने को तो पता चला घंटा उतरा हुआ है। मन ही मन मुस्कुराते हुए भगवान से कहना चाहा " ऐसा लगता है तुम्हारे इस मंदिर के मालिक फिर आये हुए हैं "। जब भी वह महात्मा जी यहां पर आते हैं सभी घंटे उतार लिये जाते हैं , ताकि उनकी पूजा पाठ में बाधा न हो। ऐसे में उन दिनों मंदिर आने वाले भक्तों को बिना घंटा बजाये ही प्रार्थना करनी होती है। कई बार सोचा उन महात्मा जी से पूछा जाये कि क्या बिना घंटा बजाये भी प्रार्थना की जा सकती है मंदिरों में , और अगर की जा सकती है तब ये घंटे घड़ियाल क्यों लगाये जाते हैं। पूछना तो ये सवाल भी चाहता हूं कि अगर और भक्तों के घंटा बजाने से आपकी पूजा में बाधा पड़ती है तो क्या जब आप इससे भी अधिक शोर हवन आदि करते समय लाऊड स्पीकर का उपयोग कर करते हैं तब आस-पास रहने वालों को भी परेशानी होती है , ये क्यों नहीं सोचते। अगर बाकी लोग बिना शोर किये प्रार्थना कर सकते हैं तो आप भी बिना शोर किये पूजा-पाठ क्यों नहीं कर सकते। बार बार मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि किसलिये महात्मा जी के आने पर सब उनकी मर्ज़ी से होने लगता है , क्या मंदिर का मालिक ईश्वर है अथवा वह महात्मा जी हैं। ये उन महात्मा जी से नहीं पूछ सकता वर्ना उनसे भी अधिक वो लोग बुरा मान जाएंगे जो उनको गुरु जी मानते हैं। इसलिये अक्सर भगवान से पूछता हूं और वो बेबस नज़र आता है , कुछ कह नहीं सकता। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि भगवान ऐसे मंदिरों में कैद है , छटपटा रहा है।
                   कुछ दिन पहले की बात है। मैं जब मंदिर गया तो देखा भगवान जिस शोकेस में कांच के दरवाज़े के पीछे चुपचाप बैठे रहते हैं उसका दरवाज़ा खुला हुआ था। मुझे लगा शायद आज मेरी आवाज़ भगवान सुन सके , कांच की दीवार के रहते हो सकता है मेरी आवाज़ उस तक नहीं पहुंच पाती हो। मैं अपनी आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहा था कि अचानक आवाज़ सुनाई दी " हे लेखक तुम सब की व्यथा लिखते रहते हो , कभी तो मेरे हाल पर भी कुछ लिखो " मैंने चौंक कर आंखें खोली तो आस-पास कोई दिखाई नहीं दिया। तभी उस शोकेस से भगवान जी बोले , " लेखक कोई नहीं है और यहां पर , ये मैं बोल रहा हूं तुम सभी का भगवान"। मैंने कहा प्रभु आपको क्या परेशानी है , कितना बड़ा मंदिर है यह आपके लिये , कितने सुंदर गहने - कपड़े आपने पहने हुए हैं , रोज़ लोग आते हैं आपकी अर्चना करने , सुबह शाम पुजारी जी आपका भोग लगाते हैं घंटी बजा बजा कर। किस बात की कमी है आपको , कितने विशाल मंदिर बने हुए हैं हर शहर में आपके। जानते हो भगवान आपके इस मंदिर को भी और बड़ा बनाने का प्रयास किया जा रहा है , कुछ दिन पहले मंदिर में सड़क किनारे वाले फुटपाथ की पांच फुट जगह शामिल कर ली है इसको और सुंदर बनाया जा रहा है। क्या जानते हो भगवान आपकी इस सम्पति का मूल्य अब करोड़ों रूपये है बाज़ार भाव से , और तेरे करोड़ों भक्त बेघर हैं। साफ कहूं भगवान , जैसा कि तुम सभी एक हो ईश्वर अल्ला वाहेगुरु यीशू मसीह , तुम से बड़ा जमाखोर साहूकार दुनिया में दूसरा कौन हो सकता है। अकेले तेरे लिए इतना अधिक है जो और भी बढ़ता ही जाता है। अब तो ये बंद कर दो और कुछ गरीबों के लिये छोड़ दो। अगर हो सके तो इसमें से आधा ही बांट दो गरीबों में तो दुनिया में कोई बेघर , भूखा नहीं रहे।
       प्रभु कहने लगे " लेखक क्यों मज़ाक कर रहे हो , मेरे जले पर नमक छिड़कने जैसी बातें न करो तुम। मुझे तो इन लोगों ने तालों में बंद कर रखा है। तुमने देखा है मेरे प्रमुख मंदिर का जेल की सलाखों जैसा दरवाज़ा , जिस पर पुजारी जी ताला लगाये रखते हैं। क्या जुर्म किया है मैंने , जो मुझे कैद कर रखते हैं। इस शोकेस में मुझे कितनी घुटन होती है तुम क्या जानो , हाथ पैर फैलाने को जगह नहीं। ये कांच के दरवाज़े न मेरी आवाज़ बाहर जाने देते न मेरे भक्तों की फरियाद मुझे सुनाई पड़ती है। सच कहूं हम सभी देवी देवता पिंजरे में बंद पंछी की तरह छटपटाते रहते हैं "।
                     तभी किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी और भगवान जी चुप हो गये अचानक। मुझे उनकी हालत सर्कस में बंद शेर जैसी लगने लगी , जो रिंगमास्टर के कोड़े से डर कर तमाशा दिखाता है , ताकि लोग तालियां बजायें , पैसे दें और सर्कस मालिकों का कारोबार चलता रहे। पुजारी जी आ गये थे , उन्होंने शोकेस का दरवाज़ा बंद कर ताला जड़ दिया था। मैंने पूछा पुजारी जी क्यों भगवान को तालों में बंद रखते हो , खुला रहने दिया करो , कहीं भाग तो नहीं जायेगा भगवान। पुजारी जी मुझे शक भरी नज़रों से देखने लगे और कहने लगे आप यहां माथा टेकने को आते हो या कोई और ईरादा है जो दरवाज़ा खुला छोड़ने की बात करते हो। आप जानते हो कितने कीमती गहने पहने हुए हैं इन मूर्तियों ने , कोई चुरा न ले तभी ये ताला लगाते हैं। जब तक मैं वहां से बाहर नहीं चला गया पुजारी जी की नज़रें मुझे देखती ही रहीं। तब से मैं जब भी कभी मंदिर जाता हूं तब भगवान को तालों में बंद देख कर सोचता हूं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर भी अपने अनुयाईयों के आगे बेबस हैं। जब वो खुद ही अपनी कोई सहायता नहीं कर सकते तब मैं इक अदना सा लेखक उनकी क्या सहायता कर सकता हूं। इन तमाम बड़े बड़े साधु , महात्माओं की बात न मान कौन इक लेखक की बात मानेगा और यकीन करेगा कि उनका भगवान भी बेबस है , परेशान है। 
              भगवान आज भी बेबस हैं क्योंकि बात भगवान के मंदिर की नहीं की जाती कभी भी , मंदिर भगवान की ज़रूरत नहीं हैं उनकी मज़बूरी हैं जो धर्म की राजनीति करते हैं। वास्तविक धर्म से उनको कुछ लेना देना नहीं है उनके लिए भगवान आस्था का नहीं सत्ता हासिल करने का रास्ता हैं। धर्म सभा में चर्चा तो इसको लेकर की जानी चाहिए कि भगवान को ऐसे लोगों के चंगुल से कैसे मुक्त करवाया जाये जो धर्म का कारोबार करते हैं। धर्म समझाता है संचय मत करो और दीन दुःखियों की सेवा उनके कष्ट दूर करना भगवान की पूजा है इबादत है जबकि तमाम धार्मिक स्थल अकूत धन वैभव संम्पति जमा किये हुए हैं। मानव कल्याण पर धन खर्च करने की जगह मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनाना धर्म नहीं हो सकता है। 

Friday, 7 December 2018

अनुभव फिल्म से फ़िल्मी यादों का सफर ( अपनी बात ) डॉ लोक सेतिया

          अनुभव फिल्म से फ़िल्मी यादों का सफर ( अपनी बात ) 

                                             डॉ लोक सेतिया 

      संजीव कुमार और तनुजा की श्वेतश्याम फिल्म थी वो। ऐसी फ़िल्में कम हैं जो मुझे न केवल पसंद आईं बल्कि जिनकी कहानी संगीत और डायलॉग तक मुझे याद रहे इसलिए कि उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा जीवन में सार्थक सोच विकसित होने के कारण। सच्चा प्यार क्या है जब मैंने इस पर आलेख लिखा तब उस में नायिका का ये डायलॉग शामिल था , " हां हम दोनों कॉलेज के समय से इक दूजे को चाहते रहे हैं। तब हमें मिलने को कभी दस कभी बीस मिंट मिला करते थे। अगर उस सारे वक़्त को जोड़ें तो मुश्किल से हम सात घंटे भर साथ रहे होंगे , लेकिन उन सात घंटों में मुझे जितना प्यार उससे मिला आपसे शादी के सात सालों में भी नहीं मिला है और हां उसने मुझे कभी छुआ तक नहीं। " उस फिल्म का इक गीत मन्नाडे जी आवाज़ में भी ऐसा बहुत कुछ समझाता है , फिल्म में वो गीत रिकॉर्ड प्लेयर पर बजता है सुन कर देखते हैं। 
फिर कहीं कोई फूल खिला चाहत न कहो उसको , फिर कहीं कोई दीप जला मंदिर न कहो उसको। 
             मगर आज इस फिल्म की याद किसी और कारण से आई है। संजीव कुमार इक अख़बार का संपादक है जो समझता है कि समय को बर्बाद नहीं करना चाहिए , कुछ इस तरह से समझाता है इक डायलॉग उसी फिल्म का ये भी ध्यान से पढ़िए। नायक कहता है , हम रोज़ दिन में आठ घंटे सोते हैं जिसका मतलब है कि अगर हम साठ साल ज़िंदा रहे तो उसके बीस साल का समय हमने केवल सोकर बिता दिया इसी तरह दो तीन साल हमने  खाना खाने में गुज़र दिये पांच सात साल नहाने में लगा दिए और इस तरह वास्तविक काम करने को हमने कितना समय दिया ये हिसाब ही नहीं लगाया कभी। 
       ये बात मुझे मोदी जी की बात से याद आई कि उन्होंने अभी तक एक दिन भी अवकाश नहीं लिया है , मगर जब जानने की कोशिश की गई तो पता चला देश के पीएम को अवकाश लेने का कोई प्रावधान ही नहीं है और उनसे पहले भी किसी ने भी छुट्टी नहीं ली है। मगर ऐसा भी नहीं कि चौबीस घंटे काम करते रहे हैं। खुद अपने लिए ऐसा प्रचार भी उनको छोड़ किसी ने नहीं किया क्योंकि उनको मालूम था ये उनका कर्तव्य है कोई एहसान नहीं जैसा मोदी जी समझाना चाहते हैं। फिर भी जब उन्होंने हिसाब की किताब खोली है तो पल पल का हिसाब रखते भी होंगे। ऐसे में आप उनका हिसाब जांचने लगे तब पता चलेगा जनाब कितने साल इधर उधर देश विदेश घूमते रहे , दिन में कितने घंटे सजने संवरने पर लगाए और अपनी छवि बनाने को विज्ञापन फोटोशूट करने में खर्च किये , कितने हज़ारों दिन अपने दल को चुनाव जितवाने को भाषण देने पर लगाए और अपने खुद के धार्मिक आयोजन करने धार्मिक स्तलों पर माथा टेकने पूजा अर्चना करने पर व्यतीत किये कितने समय अपने दल को चंदा देने वाले कारोबारी दोस्तों के संग बिताये कितने दिन मनोरंजन करते रहे ढोल नगाड़े बजाते रहे। अगर इन सब को साथ जोड़ा जाये तब पता चलेगा देश और जनता के काम करने को अपने घर या दफ्तर में कितने घंटे काम किया है। इसी के साथ ये भी हिसाब जोड़ना होगा कि उनके ऐसे तमाम रहन सहन आने जाने और ठाठ बाठ पर देश का कितना धन खर्च किया गया तब पता चलेगा देश की चौकीदारी करने वाले पर हर मिंट कितने करोड़ खर्च हुआ है। बदले में किसे क्या मिला है। अनुभव।

भीड़ और दंगों में जीने का कर ( आधुनिक मांग ) डॉ लोक सेतिया

  भीड़ और दंगों में जीने का कर ( आधुनिक मांग ) डॉ लोक सेतिया 

     जान है तो जहान है , आज़ादी है मगर ज़िंदगी की सुरक्षा आपकी अपनी ज़िम्मेदारी है। ओह माय गॉड फिल्म की तरह से बीमा वाले भी भीड़ से बचाने की सुरक्षा नहीं देते हैं। अक्षय कुमार समझाते हैं बीमा करवाते तो पछताते नहीं शायद उनके पास कोई पॉलिसी इस बारे भी हो। सरकार फसल बीमा से स्वस्थ्य बीमा तक देने की योजना बनाती है अब इस समस्या का भी समाधान ढूंढना चाहिए। जीना मरना ऊपर वाले की मर्ज़ी पर है हम सब तो उसके हाथ की कठपुतलियां हैं कब कौन कैसे उठेगा कोई नहीं जानता , हाहाहाहा। आनंद फिल्म में राजेश खन्ना जी अमिताभ बच्चन जी को बाकायदा रिकॉर्डिंग कर दे जाते हैं। बाबूमोशाय। 
     पहले गली में सड़क पर शोर सुनाई देता था तो लोग किवाड़ खोलकर बाहर निकल खड़े होकर देखा करते थे। बरात निकल रही हो या किसी राजनेता का जुलूस या कोई धार्मिक सुबह की फेरी या शाम की शोभा यात्रा निकलती हो। अब तो हर धर्म के त्यौहार तक इक डर के साये में गुज़रते हैं और शांति से बीत जाने पर राहत महसूस होती है। उल्लास नाम की बात अब गायब हो चुकी है।
           सरकार को पैसे की बहुत ज़रूरत होती है और जनता को बिना कर चुकाए कोई सुविधा नहीं हासिल हो सकती है। मगर संविधान जीने का अधिकार देता है ऐसा समझा जाता है इसलिए हर किसी को जितना भी सरकार उचित समझती हो उतना कर वसूल करने के बाद भीड़ और दंगों में जीने का उपाय अवश्य जिस भी तरह से संभव हो उपलब्ध करवाना चाहिए। अब इस में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए राज्य कोई भी हो धर्म कोई भी हो काम कोई भी करता हो या बेरोज़गार भी हो। ज़िंदगी की कीमत बराबर होनी चाहिए आम ख़ास वीआईपी सब इक समान हैं। शिक्षा स्वास्थ्य रोटी घर की छत और न्याय सब की बात बाद में पहले जीने का अवसर मिलना ज़रूरी है। जिनको भीड़ बनकर दंगे करने की आदत हो या जो भी ये सब करने को बढ़ावा देते हैं उनको शराफत का सबक कोई और नहीं पढ़ा सकता है और उनको देश कानून संविधान की कोई परवाह नहीं होती है। सरकार चलाने वाले राजनेताओं और विपक्ष के दलों को अगर भीड़ जमा करनी है तो भीड़ के अपकर्मों का भी फल भुगतना चाहिए। इसलिए जिस किसी ने भीड़ जमा की और उस भीड़ को दंगे करने से नहीं रोका उनको सार्वजनिक जीवन से बाहर करना ही उपाय है। उन पर रोक लगाना ज़रूरी है और सामूहिक सज़ा मिलनी चाहिए। ऐसी हर घटना साबित करती है कि सरकार पुलिस न्यायव्यवस्था नाम की कोई चीज़ बाकी नहीं रही है। ऐसे लोग खुद अपराधी हैं जनता को सुरक्षा की जगह दहशत देने लगे हैं।  
            तथाकथित विशिष्ट कहलाये जाने वाले मुट्ठी भर आपराधिक तत्वों को  जिनको इंसान का लहू बहाने में लुत्फ़ आता है को शराफत का पाठ पढ़ाना मुमकिन नहीं है । इनका कोई नाम नहीं है मगर तमाम संगठन और संस्थाएं जो भीड़ जमा करती हैं उन पर रोक लगाने से लेकर उनके सभी मौलिक अधिकार छीन लिए जाने चाहिएं और उन सभी को कोई काला पानी जैसी जगह भेजा जाना चाहिए ऐसी घटना होते ही । इंसानों की बस्तियों में कोई हैवान रहे इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती है। देश का हर सभ्य नागरिक इसके लिए बाकायदा कर देने को राज़ी है। महानगरों में डॉन हुआ करते थे या होंगे जो हफ्ता महीना वसूली कर लोगों को जान की खैर मनाने और चैन से रहने का अधिकार देते हैं और कोई बहरी डॉन आंख उठाकर नहीं देख सकता है। ऐसा नहीं हो लोग सरकार को छोड़ ऐसे लोगों से अपनी सुरक्षा हासिल करने लग जाएं। 

Wednesday, 5 December 2018

इक बेनाम चिट्ठी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         इक बेनाम चिट्ठी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    किताब लाया था पुराना इतिहास समझने को मगर किताब में इक चिट्ठी संभाल कर रखी हुई मिल गई है। बाहर लिफ़ाफ़े पर कोई पता नहीं लिखा किसने किसको लिखी कब लिखी  क्यों लिखी। मुनासिब तो नहीं मगर ये सोचकर कि शायद किसी की ज़रूरी बात नहीं लिखी हो खोल कर पढ़नी पड़ी ताकि जिस किसी के नाम लिखी हो उस तलक पहुंचा दी जाये। लिखा हुआ है ध्यान से पढ़ना और समझाना किसने किसके नाम लिखी है और हो सके तो मुझे उसका नाम पता बताना या उसी को कहना आपके नाम की चिट्ठी रखी है ले ले आकर।
       .................  आपका  नाम तो मन आत्मा पर लिखा है पल पल याद करती हूं मगर लिखना उचित नहीं आपके आदर की बात है आपस की बात है। सिंहासन पर बैठ कर भी मुझे भूले नहीं होगे जाने क्यों दिल कहता है कोई विवशता रही होगी मुझे अकेली को बेसहारा बेबस बिना कोई अपराध बतलाये छोड़ कर जाने की। पता चला महिलाओं की इधर बहुत चिंता होने लगी है शायद मुझे भी नारी होने की सज़ा से मुक्ति मिल जाये आपके राज में। ये मत समझना आपके इतने बड़े महल में दासी बनकर भी रहना चाहती हूं ऐसा कहूंगी। राजा की रानी बनने का ख्वाब नहीं देखती हूं और अब साथ आकर रहने का तो सवाल ही नहीं है। आपको पास बुलाने की भी बात नहीं है बात केवल न्याय की है इंसाफ की है। अपनी गलती पत्नी को इस तरह बीच अधर में छोड़ने की गलती स्वीकार करनी तो चाहिए। औरों को तलाक देने की चिंता है खुद किस खातिर त्याग दिया था कोई कारण तो बताओ मुझे भी। समाज पुरुष से सवाल नहीं करता है नारी पर लांछन लगाते हैं अग्नि परीक्षा लेने के बाद भी शक बाकी रहता है।
               कई जगहों पर जाते रहते हो कभी अयोध्या की खबर ली। राम को बड़ा होने दो शासन करने दो बहलाओ मत बच्चा मानकर अब तो समझने लगे हैं भगवान भी कलयुगी राजनीति को। राम का नाम ज़ुबान पर लाने से पहले मर्यादा की बात याद रखना और राम मन में रहते हैं मंदिरों में नहीं। राम के नाम पर देश के कानून संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले किसी और के भक्त होंगे। सत्ता हासिल करना किसी काम का नहीं होता अगर शासक बनकर देश जनता की सेवा करने की जगह खुद को महान बताने का कार्य करते हुई समय व्यतीत कर दिया। बड़े बढ़ाई न करें बड़े न बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल। देश की जनता को नासमझ मत समझना हीरे और पत्थर को पहचानती है। बड़ी बड़ी बातें करने से कोई बड़ा बन नहीं जाता है पहाड़ पर खड़े हो दूर से नज़र आते रहते हो और भी बौने लगते हो। जिनको छोटा बनाने की बात करते हो उनको हंसी आती होगी उनके बाद उनकी जगह कोई ऐसा भी उनकी जगह आया है देख कर।
      ये भारत देश है अहिंसा का पुजारी है प्यार मुहब्बत और भाईचारे की राह दुनिया को दिखलाता रहा है। यहां स्वार्थी अहंकारी और ताकत से राज करने वालों को कोई आदर से नहीं देखता है। कथनी और और वास्तविक जीवन में आचरण और ऐसे व्यक्ति से दूर रहना अच्छा है। महिला हूं इस से बढ़कर कुछ नहीं कह सकती हूं मगर शायद अभी भी मेरे साथ किये अन्याय की बात को स्वीकार करने का साहस जिस में नहीं उस से कोई अपेक्षा रखना फज़ूल है। मेरी कहानी में आपका कोई वजूद नहीं है मगर आपके धर्म में मेरे बिना आपका कोई भी कर्म अधूरा समझा जाता है। राम को भी यज्ञ करने को पत्नी सीता का सोने का पुतला बनवाना पड़ा था आपके बस में तो वो भी नहीं शायद। मुझे सोने की चाहत भी नहीं कभी सोने का हिरण मांगा भी नहीं क्योंकि जानती हूं ये छल होता है राजनीति का या अधर्म का। देश की जनता को भी समझ आ चुका है कि आपकी सोने के हिरण लाने की बात का वास्तविकता क्या है।
          जाने ये कैसी देशभक्ति है जिस में सत्ता भगवान लगती है और भगवान सत्ता की सीढ़ी लगते हैं। हर बात की सीमा होती है अपने ही घर को आग लगाने वाले समझते हैं खुद बच जाएंगे। सच से इतना डर लगता है कि झूठ की शरण जाने में भी संकोच नहीं है। दावे करते हैं अपराधी पकड़े हैं गुनहगार को सज़ा मिलेगी जबकि वास्तविकता और ही है। चोर मचाये शोर क्या वास्तव में चौकीदार ही चोर साबित होगा दिल धड़कता है ऐसा हुआ तो कयामत होगी। लोग भरोसे शब्द का उपयोग करने से घबराने लगे हैं अब किस पर यकीन करे कोई। झूठ को इतना बार बार बोलने का कीर्तिमान किस के नाम होगा सब पूछते हैं क्या सच में झूठ बोलने से पाप लगने की बात सही है अगर है तो कितने झूठ बोलने पर कितनी सज़ा देते हैं भगवान। कम से कम भगवान के मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे को तो झूठ से अलग रखते। धर्म की राजनीति से आगे क्या झूठ को भी तख्त पर बिठाने का इरादा है। साजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है।

Monday, 3 December 2018

किसी बहाने बात दिल की सुनाते हैं ( हाले दिल ) डॉ लोक सेतिया

   किसी बहाने बात दिल की सुनाते हैं ( हाले दिल ) डॉ लोक सेतिया 

                                      हां ज़िंदगी का साथ ऐसे निभाते हैं , किसी बहाने बात दिल की सुनाते हैं। सवाल इतना है करते क्या हैं मगर जवाब देने को तमाम ज़िंदगी कम पड़ जाती है। करना चाहते कुछ हैं करना पड़ता कुछ है और जो किया वो होता कुछ और है। लोग समझते हैं करने का मतलब यही है कि कमाई किस तरह करते हैं अगर आप उनको बताओ हम लिखते हैं तो कहते हैं वो ठीक है मगर काम क्या करते हो। बात इतनी भी नहीं है लिखने को काम समझने वाले इस से आगे पूछते हैं क्या लिखते हैं। माना जाता है कि कोई एक ढंग समझ कर उसी तरह जो चाहो लिखो। ये बंधन तो नहीं है मगर इस तरह लिखने से आप हर बात कह नहीं सकते हैं तभी मैंने कहा है।
    " कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है , करें क्या ज़िंदगी की बात कहना भी ज़रूरी है। "
              बात को साहित्य से अलग जीवन में भी समझते हैं। अधिकतर लोग सोचते हैं उनको उस कार्य में दक्षता हासिल करनी है जिस से आमदनी या व्यवसाय या कारोबार अथवा नौकरी में फायदा हो। मगर जीवन पैसे कमाने भर से नहीं चलता है। जिस तरह आपको पांव हैं मगर साइकिल कार चलाना आना चाहिए उसी तरह आपको बाहर के काम के साथ घर के काम भी आते हों तो आपको बेबसी नहीं होती है और समाज के बारे भी समझ होना कोई बेकार की बात नहीं है। जब हम चाहते हैं अच्छा समाज हो रहने को तो उसे अच्छा बनाना भी हमने ही है। जीवन में पग पग पर समस्याओं से घटनाओं से वास्ता पड़ता है मगर जब हम उनसे परिचित नहीं होते तो उनसे डरते हैं घबराते हैं। अगर समझ सकते हैं तो उनसे बाहर निकल जाते हैं। सबको इक सीमा तक जानकारी हर विषय की हासिल करनी चाहिए भले काम कोई भी एक जो चाहते हैं करें हम। मगर ध्यान रखने की बात ये भी है कि बिना समझे जाने हर विषय की बात करना और भी नुकसान देने का काम करता है। आपको जो नहीं मालूम किसी से समझना उचित है और समझे बिना किसी राह जाना उचित नहीं है। जिसका ज्ञान नहीं उसकी सलाह देकर आप किसी को खतरे में डालते हैं। राजनीति की बात हम समझते हैं बहुत आसान है मगर अक्सर हम बिना समझे उस पर बहस में उलझे रहते हैं। और हमारे देश के राजनेता हर बात पर भाषण देते हैं मगर समझते शायद किसी भी बात को कम ही हैं। तभी जिनकी हर बात भरोसे के काबिल होनी चाहिए उनकी किसी बात का कोई भरोसा नहीं करता है। ऐसा इसलिए है कि राजनीति में आये ही लोग राजनीति को बिना समझे हैं और उनको राजनीति केवल सत्ता अधिकार शान शौकत और धन ताकत पाने का माध्यम लगती है देश और जनता की भलाई या संविधान की भावना को नहीं जानते हैं। वास्तव में इनका धर्म की बातें करना भी ऐसे ही होता है इनका कोई धर्म नहीं भगवान नहीं खुदा नहीं उनको अपने स्वार्थ से सबसे महत्वपूर्ण लगते हैं। जब तक हम इनकी वास्तविकता को समझेंगे नहीं और सोचते नहीं हैं कि जो खुद संविधान की लोकतंत्र की उपेक्षा करते हैं दलगत राजनीति में जो मर्ज़ी करते हैं हमें कुछ भी नहीं दे सकते हैं। आपको किसी एक बात में तमाम जानकारी होना पैसा हासिल करवा सकता है मगर अच्छा जीवन नहीं क्योंकि हर समस्या का हल पैसे से होना संभव नहीं है। इस दायरे से बाहर आइये और समाज घर की हर तरह की जानकारी हासिल करिये। टीवी चैनल सोशल मीडिया पर समय बर्बाद होता है इन से आजकल मनोरंजन भी स्वस्थ रूप से नहीं होता बल्कि भटकाने का काम अधिक होता है। लोग सही गलत की परख किये बिना इन पर यकीन कर धोखा खाते हैं। लोगों से मिलना स्वस्थ चर्चा करना विचारों का आदान प्रदान करना छोड़ दिया है हमने और केवल वहीं जाते हैं जहां हम जो चाहते हैं वही सब होता हो। इसको कुवें का मेंढक कहते हैं जो इक बंद दुनिया को समझता है यही सब कुछ है। आजकल बच्चों को सब सिखाने की बात की जाती है किताबी पढ़ाई के साथ साथ कला नृत्य संगीत तैरना जैसे अनेक काम। खुद हम भी कोशिश कर बाकी चीज़ों को भी जानने का कार्य कर सकते हैं। ये संक्षेप में जीवन की बात थी अब अपने लिखने को लेकर बाकी बात।
        लिखना मेरे लिए अपनी और समाज की वास्तविकता को समझना और अपनी बात कहना है। कई लोग समझते हैं किसी एक विधा में निपुण होने से नाम शोहरत दौलत हासिल की जा सकती है मगर मुझे लगता है कोई एक विधा आपकी सभी बातों को बयां करने में नाकाफी है। ग़ज़ल में आप जो कह सकते हैं उस में निर्धारित मापदंड में ज़िंदगी की कहानी कहना मुमकिन नहीं है और अगर कोई ये समझता है कि सर्वोत्तम लिखना है तो इसकी सीमा कोई नहीं है कोई भी ग़ालिब निराला दुष्यंत मुंशी जी टैगोर दुनिया भर के लाजवाब लिखने वालों की कोई हद नहीं बना सकता है। इतना अवश्य है कि आपको जो भी जिस विधा में लिखना है उसके नियम समझ कर लिखना चाहिए कमियां रह सकती हैं और उस से बेहतर लिखा जा सकता है मगर गलतियां नहीं होनी चाहिएं और ऐसा नहीं होना चाहिए कि पढ़ने वाला कहे लिखना ज़रूरी ही नहीं था। आपके लिखने का कुछ मकसद होना चाहिए और लिखने की सार्थकता सबसे अहम है। मुझे लिखना ऐसे लगता है जैसे जो किसी से नहीं कह सकते खुद अपने आप से बात कर लिया करते हैं। मुझे जो काम नहीं आता वो है दुश्मनी करना जबकि मेरे दुश्मनों की कोई कमी नहीं है। दोस्ती की है निभाई भी बार बार फिर भी दोस्त बनाकर रखना मुझे नहीं आया अभी। लोग समझते हैं और बताते भी हैं कि वो फ़रिश्ते हैं मगर मैं तो गुनहगार इंसान हूं और कभी फरिश्ता होने की बात समझी नहीं सोची भी नहीं। आदमी बनकर रहना इस दुनिया में आसान भी नहीं है। किसी से गिला नहीं शिकवा नहीं है जफ़ा की जिस किसी ने कभी वफ़ा भी निभाई थी ये याद रहता है। कभी कभी सोचता हूं क्या लिखना चाहता हूं तो लगता है अभी लिखने की शुरुआत भी ठीक से नहीं हुई है मगर कुछ है ज़हन में जो लिखकर दुनिया से अलविदा होना चाहता हूं कोई इक ग़ज़ल ही सही और नहीं तो कोई शेर ही हो या कोई कविता कहानी व्यंग्य आलेख जो संक्षेप में सार में बयां कर दे मुझे जो भी कहना है। अधिक पढ़ने की फुर्सत किस के पास है।
         मैं कैसा हूं कहां हूं कोई नहीं जानता , बदनसीब ऐसा हूं कोई नहीं पहचानता मुझे। यहीं ज़िंदा हूं और इसी जगह मरना भी है इक दिन जहां कोई मेरी तरफ देखता तक नहीं। ज़िंदगी के पिंजरे में कैद हूं और अपने पिंजरे से पंछी को क्या प्यार होता है मुझे पिजंरा लगता ही नहीं अपना है। मगर पिंजरे में चहचहाता रहता हूं बाहर आसमान पर उड़ते पंछियों को देखता हूं तो सोचता हूं उड़ने लगा हूं। इस पिंजरे से देखता हूं कितना बड़ा है ये जहान ज़मीन आसमान लेकिन मैं न आकाश में हूं न ही ज़मीन पर ही। ज़मीं अपनी न आसमान अपना फिर है ये सारा जहान अपना।

Saturday, 1 December 2018

मेरी ज़िंदगी से सीखो सबक ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

     मेरी ज़िंदगी से सीखो सबक ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

     इक बोधकथा है जिसमें कोई किसी के पास काम करता है और जब कई साल बाद घर वापस जाने लगता है तो उस से कुछ सलाह देने को कहता है और वो व्यक्ति तीन सलाह देता है जिनका अर्थ उसे बाद में समझ आता है। आज मैं भी अपने जीवन भर की असफलताओं को सोचता हूं तब समझ आया है मुझे क्या करना चाहिए था और क्या नहीं करना चाहिए था। और देर से ही सही मैंने अब ये तय कर लिया है कि उन बातों से सबक लेना है और भविष्य में फिर किसी दोराहे पर रुकना नहीं है। 
          मैं हमेशा अनचाहे बंधन की तरह इक कैद में रहता आया हूं और नहीं चाहते हुए भी उन राहों पर चलता रहा जिन पर कभी कोई कभी कोई मुझे चलने को कहता रहा है। मुझे खुद को जंजीरों से मुक्त करवाना चाहिए था जो किया नहीं और सोचता रहा कोई मसीहा मुझे आज़ाद करवाएगा। किसी के कहने पर गलत दिशा को जाना उचित नहीं होता है इस की जगह उनको अपनी राय और समझ से सहमत करवाने का कार्य करता तो शायद कोई बीच का रास्ता बन सकता था बिना टकराव अथवा अपने निर्णय पर चलने से मन में ये पछतावा नहीं होता कि मुझे अपने विवेक के अनुसार चलना था तब अपनी नाकामी का दोष खुद पर लेते हुए कोई खेद नहीं होता। कोई आपको सलाह दे सकता है कुछ करने की मगर उस काम की सफलता या नाकामी आपको अपनी लगती है किसी दूसरे की नहीं। आत्मविश्वास होना ज़रूरी है मगर अभिमान नहीं और अति आत्मविश्वास जो ज़िद की तरह हो उस से बचना चाहिए। समय के अनुसार सोच समझ कर निर्णय करना चाहिए और जल्दबाज़ी में भावावेश में आवेश में आकर फैसला नहीं करना चाहिए। पिछली बातों से सीख कर उनसे आगे बढ़ना चाहिए और उन पर बार बार निराश नहीं होना चाहिए। ज़िंदगी को हर दिन फिर से शुरुआत करने का अवसर समझना चाहिए बीते समय में जीना उचित नहीं है। कोई भी सभी को खुश कर नहीं सकता है इसलिए सबके साथ संबंध अच्छे रखना अच्छी बात है मगर अपने मर्ज़ी को छोड़ औरों के अनुसार जीना कभी नहीं चाहिए। जो आपको आपकी ख़ुशी से वंचित करते हैं वो आपके नहीं हो सकते बल्कि किसी स्वार्थ से साथ हैं ऐसे में उनकी अधिक चिंता नहीं करनी चाहिए। समय बदलता रहता है मगर कोई भी पंडित या ज्योतिष विज्ञान कभी सही मार्गदर्शन नहीं दे सकते हैं उनका कारोबार आपको उलझाने का है जो आपको कभी सामने दिखाई नहीं देता है। अगर आपको भाग्य और नियति पर विश्वास भी हो तो कोई इंसान किसी इंसान का भाग्यविधाता नहीं हो सकता है। उनको खुद अपना कल क्या होने वाला है की जानकारी नहीं होती जो दुनिया को भविष्यफल बताते हैं।

Thursday, 29 November 2018

सेल लगी सस्ते दाम बिकता सब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   सेल लगी सस्ते दाम बिकता सब ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    कभी मेला लगता था त्यौहार पर छूट की लूट होती थी। इक ज़माना था लोग बस में जल्दी आ जाते थे बस से आते जाते बस अड्डे पर बारी बारी सामान बेचने वाले आते और रस्ते का माल सस्ते में बेच कर भी कमाई कर जाते थे। बेचने बिकने का धंधा इतना बढ़ा कि लोग ईमान धर्म इंसानियत तक बेचने लगे और ऐसा कर करोड़ों अरबों की कमाई करने लगे। राजनीति का धंधा चौखा है जिस में जीत हार जो भी हो तिजौरी कभी खाली नहीं होती और राजनीति के बाज़ार में दुकान खोलना ज़रूरी है उसके बाद आपकी दुकान में क्या सामान है कोई नहीं देखता है। हाथ से कोई सामान देना नहीं है वादा भर करना है जीत जाने दो जो मांगोगे पाओगे। नहीं जितवाया तो पछताओगे हाथ मलते रह जाओगे। बस में खट्टी मीठी गोलियां चूर्ण मंजन सुरमा बेचते थे मेले में खिलौने से लेकर खाने पीने का सामान और नौटंकी से लेकर बंदरिया का नाच और रस्सी पर चलती लड़की और पिंजरे के तोता मैना जो घर लाते ही बोलना भूल जाते थे। ऐसे सभी दुकानदार समय बदलते ही राजनीति के शोरूम्स और मॉल खोल कर नियमित राजनीति का सामान बेचते हैं। देश बेचने से देशभक्ति बेचने तक सब करते हैं जिस से कमाई हो जाये। 
           किसी दल ने गांधी को बेचा और गरीबी हटाओ नारा बेचकर सिंहासन पर बैठे रहे। पिछली बार किसी दूसरे ने अच्छे दिन का वादा बेचा और सत्ता हासिल की मगर बाद में समझाया ऐसा कोई सामान होता ही नहीं है और जिस डिब्बे में अच्छे दिन बंद थे उसको खोला तो नोटबंदी और जाने क्या क्या भयानक अनदेखे अनुपयोगी सामान को ऊंचे दाम खरीदने को विवश किया गया। अपनी तिजौरी भरने को सरकार ने सभी की तलाशी ली और देश की जनता को चोरों की तरह खड़ा कर दिया। चौकीदार बनकर मालिक को हड़काने वाला और खुद शाही अंदाज़ से रहने वाला पहली बार दिखाई दिया जो सबको झूठा बताता और खुद अपने तमाम झूठों को सच समझने को मज़बूर करता। नकली रौशनियों से सबकी आंखों को चुंधिया कर जो नहीं हुआ देखने की बात और जो सामने दिखाई देता उसके अनदेखा करने की बात करने लगा। राजा नंगा है कहानी का नया अध्याय लिखा जाता रहा और दो ठग भरी सभा में जो कपड़ा था ही नहीं उसकी तारीफ करवाते और मुंह मांगी कीमत के साथ ईनाम पुरुस्कार लेकर उल्लू बनाते रहे मगर जब उस कपड़े की पोशाक बनाकर पहनी तो पता चला कि सबको नंगा कर दिया है। सीबीआई सीवीसी पीएमओ कितने लोग नंगे नज़र आने लगे हैं। 
                   मगर उसको अपनी पोल खुलने की चिंता नहीं है उसे मालूम है लोग लुभावने इश्तिहार के झांसे में आकर फिर उसकी दुकान का धंधा बढ़ा देंगे और विज्ञापन की कला का वही उस्ताद है। जो लोग इश्तिहार बांटने छापने और दिखलाने का कारोबार करते हैं सभी उसने खरीद लिए हैं और सब उसी का गुणगान करते हैं। उन लोगों ने किसी का योग बेचने से हर वो सामान जो उसने बनाया तक नहीं मगर इतना अधिक बिकवाया जितना देश भर में है ही नहीं फिर भी असली का लेबल लगाकर। धर्म बेचते हैं अंधविश्वास को बेचते हैं अपने कार्यकर्म में शो में सीरियल में अश्लीलता और अपराध को बढ़ाने का अपराध करते हुए खुद को सबसे महान समाज की बात और सच का झंडाबरदार बताते हैं। झूठ पर सच का लेबल लगाने की ही नहीं झूठ को सच साबित करने में किसी भी सीमा तक चले जाते हैं। सबको असली चेहरा दिखाने की बात करते हैं मगर खुद अपने चेहरे के दाग़ धब्बे नज़र नहीं आते हैं। वास्तविक समाचार की जगह फेक न्यूज़ चलाते हैं। खुद अपने गुण गाते नहीं शर्माते हैं। वास्तविकता से नज़रें चुराते हैं और बेकार बहस में उलझाते हैं। आगे बढ़ने की चाहत में नीचे गिरते जाते हैं। खुद बिके हुए हैं खरीदार कहलाते हैं।
           अच्छे दिन विकास सबका साथ किसान मज़दूर शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य की बात को छोड़ कर वही दुकानदार अपने नये बनाये आलिशान भवन रुपी मॉल में भगवान बेचने का धंधा करना चाहता है। जनता को बुनियादी सुविधाएं सरकार नहीं भगवान से मांगनी होंगी। भगवान अब एक नहीं है उनकी दुकान पर कई देवी देवता हैं आपको जो पसंद हो उसी को चुन सकते हो। देश पहले भी लोग मानते थे इतना सब गलत है फिर भी कायम है तो ज़रूर भगवान भरोसे चल रहा है। अब उस में भी विकल्प मिलने की बात होने लगी है दलित लोग अपना भगवान कौन है समझ सकते हैं। अदालत को सलाह धमकी की तरह देने लगे हैं कि इंसाफ तथ्य को परख कर नहीं अधिकांश जनता की भावनाओं को देख कर निर्णय करें अन्यथा फैसला लागू नहीं होगा। ये किसी संविधान को नहीं जानते हैं जो धर्मनिरपेक्षता की बात करता है। इनका न्याय भीड़ का फैसला है भीड़ बनकर कानून की धज्जियां उड़ा सकते हैं। धर्म की राजनीति की बात कोई नहीं करता है इनकी राजनीति की साहूलियत से अधर्म को धर्म साबित किया जा सकता है। कानून जिसे गुनाह मानता है इनको ऐसे अपराध करना गर्व की बात लगती है मगर जहां सत्ता की बात आती है वहां भगवान को भी दरकिनार कर देते हैं। इन्हें भगवान चुनावी नैया पार लगाने को याद आते हैं अन्यथा जो जो कहते थे सत्ता मिली तो करना है सब छूट गया है। ऊंची दुकान फीके पकवान भी नहीं इनकी दुकान में कोई सामान ही नहीं है सब जादू का खेल है और जादूगर का शो जब तक है बहुत कुछ दिखलाएगा मगर जब लोग हॉल से बाहर निकलेंगे तो कुछ भी नहीं होगा सब गायब हो चुका होगा। आपकी जेब खाली होगी और घर भी आप खाली हाथ जाओगे। क्या अपनी भूल फिर से दोहराओगे , कितनी बार धोखा खाओगे पछताओगे।

Wednesday, 28 November 2018

दलीलों के बाज़ार में ( दिया कबीरा रोय ) डॉ लोक सेतिया

    दलीलों के बाज़ार में ( दिया कबीरा रोय ) डॉ लोक सेतिया 

     सोशल मीडिया पर संभव है सभी कुछ। आप लिख दो ग़ालिब चचा कह गये हैं कौन पूछेगा जाकर उनसे आपने ऐसा कैसे कह दिया था वो भी उस ज़माने में। चाणक्य नाम से राजनीति पर कुछ भी बकझक लिख दो कोई रोकने टोकने वाला नहीं है। कुतर्क जब तर्क बना लिए जाते हैं तब बेगुनाह अपराधी साबित हो कर सूली चढ़ जाते हैं ऐसा मुझे नहीं पता पहले किसी ने बोला हो या लिखा हो। मुझे ऐसा समझ आया है कितने लोग फांसी पर लटका दिये गये मगर बाद में साबित हुआ गुनहगार सज़ा देने वाले खुद ही थे। आजकल यही किसी नेता को लेकर कहा जा रहा है इस के साथ चाणक्य का नाम जोड़कर कि उन्होंने कहा था जब सारा विपक्ष किसी का विरोध करे तो समझो बाकी सब झूठे और केवल वही सच्चा है। अब ऐसे नासमझ लोगों को कौन बताये कि चाणक्य के युग में लोकशाही नहीं थी पक्ष विपक्ष नहीं था राजपाट था और राजा की हर बात सच मानी जाती थी। राजा नंगा है कहना अपराध था मगर अब लोग चुनते हैं अपना शासक नहीं सेवक और अपनी गलती पर सर धुनते हैं। जिनको लगता है बुराई होना अच्छे होने का सबूत है उनको बदनाम लोगों के नाम याद करवाने होंगे। लालूजी को ही ले लो बदनामी से उनकी शोहरत ऐसी है कि चारा घोटाला अपनी मिसाल खुद है। बदनाम होने से भी नाम होता ही है मगर बदनाम के सामने हाथ जोड़ते हैं डर से आदर से नहीं। लोकशाही में डराने वाला नेता नहीं चाहिए जो गब्बरसिंह की तरह घोषणा करे कि मुझ से मेरे सिवा कोई नहीं बचा सकता है। मगर दलील देने वाले चाहते हैं भयभीत होकर भी उसी को चुनें लोग और यकीन भी करें जिसकी किसी बात का कोई भरोसा नहीं जानते हैं। सिरफिरे आशिक़ कहते हैं तुझे किसी और की होने नहीं दूंगा मेरी नहीं तो किसी की नहीं ऐसे ज़ोर ज़बरदस्ती से कोई प्यार नहीं किया करता। ये लोग बहशीपन को मुहब्बत साबित करना चाहते हैं। देश की जनता कोई बेबस नारी नहीं है जो विवश होकर किसी को वरमाला पहना देगी सवा सौ करोड़ लोग किसी दल या नेता के भरोसे नहीं हैं अपने जीवट से जीते हैं शान से हर हाल में अपना सर उठाकर। चाणक्य या किसी नाम पर कुछ बोलने से आपकी गलत धरना सही साबित नहीं हो सकती है। 
                      बात परंपरा की करते हैं तो लोग मानते हैं कि किसी को गाली देने से अपनी ज़ुबान खराब होती है और बदमाश से घबराते नहीं उसे अहमियत नहीं देते हैं। जनता को ख़ामोशी को कमज़ोरी समझने वाले कहीं के नहीं रहे इतिहास बताता है। हम उस तरह के लोग हैं जो बड़े से बड़े मुजरिम को माफ़ करने का मादा रखते हैं और जिसका हर कोई विरोधी बन गया है उसने किसी का कोई भला नहीं किया होगा अन्यथा हम बुराई में भी अच्छाई देखने वाले लोग सोचते हैं उसने ऐसा बड़ा गुनाह किया तो किया कैसे देखने में तो कितना भला लगता था। शायद चाणक्य की दलील देने वाले इस बात को भूल गये हैं कि अधिक वक़्त नहीं हुआ जब उसी को सर आंखों पर बिठाया था विश्वास किया था चुना भी था तब आपको चाणक्य की कही कोई बात नहीं याद आई थी बताने को कि ऐसी भूल करने का अंजाम क्या होता है। हां आज आपको इक कहावत याद दिलवानी है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती है। लोग इतने नासमझ भी नहीं हैं कि हर बार मीठा ज़हर खाने की भूल करें। झूठ कितना मीठा लगता हो इक दिन सच के सामने आकर अपना वजूद खो देता है। दूध का जला छाछ को भी फूंक फूंक कर पीता है और हम लोग फिर आसानी से किसी के भी , जी हां उसके ही नहीं किसी और के भी झांसे में नहीं आने वाले हैं। लोग ऐसे सबक को खुद याद रखते हैं किसी चाणक्य या किसी और की कही बात से हर बात नहीं समझी जाती है। इस युग के लोग अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी समझा जाएंगे हर चमकने वाली चीज़ वास्तव में सोना नहीं होती है। आपके पीतल की वास्तविकता सामने है और उस पर चढ़ी परत कभी की उतर चुकी है अब आपकी हर दलील बेअसर है।

हम इस देश के वासी हैं ( उलझन ) डॉ लोक सेतिया

     हम इस देश के वासी हैं ( उलझन ) डॉ लोक सेतिया 

     साफ भले नहीं कहते क्योंकि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता फिर भी ऐसे लोग आज भी हैं जिनको लगता है भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं हिन्दु राष्ट्र होना चाहिए। उनकी नज़र में धर्म अलग अलग होने से एक ही अपराध अलग तरीके से परिभाषित किया जा सकता है। केवल वही नहीं तमाम लोग हैं जो ऐसा ही चश्मा जाति अथवा क्षेत्र को लेकर रखते हैं। खेद की बात है देश में अभी भी हम सभी भारतीय नागरिक हैं की भावना का अभाव है। पंजाब का बटवारा हुआ तो हरियाणा में कुछ लोग समझने लगे कि हरियाणा उनकी जाति का अधिकार है और उनकी नज़र में जो आज़ादी के बाद विभाजन में दूसरी तरफ से आकर बसे यहां वो शरणार्थी हैं। मगर उन लोगों ने मेहनत से हरियाणा को अपनाकर आगे बढ़ाने में बहुत योगदान दिया है। कुछ लोग आज भी उस वर्ग से बनाये मुख्यमंत्री को पसंद नहीं करता इसलिए नहीं कि उसे विधायकों ने नहीं चुना बल्कि थोपा गया है बल्कि इसलिए कि वो उसी जाति का है जो कभी दूसरे देश से आये थे विभाजन को। अब कम से कम खुद उनको तो किसी और को लेकर ऐसी संकीर्णता मन में नहीं रखनी चाहिए। ऐसे कई देश हैं जो बाहर से आये लोगों से बने हैं मगर वहां सभी खुद को उसी देश का नागरिक मानते हैं। जब भारत से कोई जाता है तो भले उनसे अपनेपन से मिलते हैं मगर इस का मतलब कदापि ये नहीं कि उनकी निष्ठा उस देश से नहीं है। ठीक इसी तरह जो लोग सीमा पार से आये थे उनकी बहुत यादें उधर से जुड़ी थी और उसकी बात भी किया करते थे लेकिन उनकी देश भक्ति भारत के लिए ही रही है और जब जब उस देश से जंग हुई उनकी भावना भारतवासी की ही थी और रही है। इसी तरह जो किसी भी धर्म वाले विभाजन में इस देश में रहने को चुनकर रहते आये हैं उनकी भी देश भक्ति की भावना भारतीयता की ही रही है। इसलिए जब कोई राजनेता धर्म के नाम पर बांटकर सत्ता पाना चाहता है तो उसकी चाल को समझना चाहिए। 
          सत्ताधारी दल और विपक्ष कोई दुश्मन नहीं होते हैं स्वस्थ्य लोकतंत्र की बुनियाद हैं। मगर इधर जो नफरत की और विचारधारा को छोड़ बेकार बातों की राजनीति करते हैं उनको बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। सबसे पहले हमारा संविधान किसी भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को नहीं चुनता है बल्कि सदन का सदस्यों का चयन होता है और सदन को चुनना चाहिए किसे नेता चुनना है जो अभी तक वास्तव में नहीं होता है। जो दल अपने सांसदों विधायकों को संविधान से मिले अधिकार से वंचित करता है उस से देश की जनता और सामान्य नागरिक के अधिकार की रक्षा की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है। इसलिए जब कोई आपसे वोट मांगने आये तो उससे अवश्य पूछना कि देश का संविधान अपने अधिकार और जनता के अधिकार को महत्वपूर्ण मानता है ये फिर किसी दल अथवा नेता के हाथ की कठपुतली बनकर आपको और सदन व संविधान को धोखा देने का कार्य करेगा। वास्तविक सवाल लोकतंत्र और संविधान का है और चुनाव केवल विचारधारा की बात को लेकर होना चाहिए। विचारों की शून्यता बहुत बड़ी चिंता का विषय है।

Tuesday, 27 November 2018

राधा मीरा और सीता ( वार्तालाप ) डॉ लोक सेतिया

      राधा मीरा और सीता ( वार्तालाप ) डॉ लोक सेतिया 

      विधि ने तीनों को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया। गले मिल कर तीनों अपनी अपनी कहानी याद करने लगी। सीता जी बोलीं तुम दोनों को आज भी लोग प्यार की देवी मानते हैं पूजते हैं कोई लांछन लगाने  की बात नहीं करता कभी। मैं आज भी समाज से इंसाफ की आस लिए तड़पती रहती हूं। तुम्हें आज भी कोई भला बुरा नहीं कहता कि जिस से सामाजिक संबंध नहीं था उसको चाहती रही। उसके नाम की रट लगाती रही मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोई। तुम रास रचाती रही कान्हा संग नाची झूमी उसकी सखी बन उसकी बांसुरी भी सुनती रही और बंसी को छीनती भी रही छेड़खानी भी की। कभी खुद को कृष्ण कन्हैया की दासी नहीं समझा तुमने। मैंने अपने राम के लिए महल छोड़ा बनवास झेला कभी सुख से नहीं रही फिर भी मुझे अग्नि परीक्षा के बाद भी त्याग दिया वो भी बिना अपराध बताए हुए ही। मेरा अस्तित्व आज भी अपने खुद का कोई नहीं समझता है और जिसने मुझे छोड़ा आज तक उसी की राम की पत्नी होना ही मेरी नियति है। राधा तुमने दूरी का दुःख झेला मीरा तुमने ज़हर का प्याला पी लिया मगर मुझे पल पल जिस विष को लांछन को चुप चाप सहना पड़ा और अपनी संतान को जन्म देने को इक राजा की बेटी इक राजा की पत्नी को इक वाल्मीकि की कुटिया में रहना पड़ा उसे जीना नहीं क्षण क्षण मरना कह सकते हैं। किसी राजा के लिए पत्नी कोई मूरत है जब यज्ञ में ज़रूरत तब सोने की सीता बनाकर काम चला लिया जिस में जीवन नहीं था निर्जीव पुतला था। शासक आज भी जीवित लोगों से अधिक मोह धातु के पुतलों से रखते हैं , जनता सीता की तरह बेबस भटकती है और शासक मनमानी करते हुए भी महानता का दम भरते हैं। आज की नारी अभी भी मेरी व्यथा को नहीं समझती है तभी पति से अलग अपना अस्तित्व नहीं खोजती है उसे आज भी सीता जो उनकी तरह इक महिला थी आदर्श नहीं लगती है और आज भी राम के मंदिर उसकी आरती की बात करती हैं। जो मुझे नहीं मिला इतने बड़े कुल की बेटी बहु को इनको मिल कैसे सकेगा उसी राह पर चल कर। मगर जानती हूं आजकल की महिलाओं को सीता राम की पत्नी को पूजना है और कुछ भी हो कितने अन्याय अत्याचार सहने पड़ें साथ रहना है अस्तित्वविहीन होकर मगर साहस से अधिकार अथवा खुद को अपने भरोसे न्याय को लड़ना नहीं है। रावण आज भी मनमानी करते हैं सज़ा आज भी उसी नारी को मिलती है जिसके साथ छल किया रावण ने साधु बनकर। महिलाओं को अभी भी रावण की पहचान नहीं है। राधा और मीरा दोनों ने इक साथ कहा कि हमने समझ लिया था जिसे चाहती हैं उसे पाना ज़रूरी नहीं है और खुद को मिटाकर तो हर्गिज़ नहीं। कोई हमें छोड़ता इसकी नौबत नहीं आने दी हमने प्यार की भीख नहीं मांगी उससे। हम हम हैं किसी के नाम के बिना भी हम खुद अपने दम पर रही हैं , दुनिया समाज कभी नारी को आज़ादी नहीं देती न कभी देगी ही जिस दिन महिलाओं को इतनी सी बात समझ आ गई वो अपने नाम को किसी के भी नाम से जोड़ना नहीं चाहेंगी वो चाहे पिता हो पति हो या संतान हो। मुझे लगता है मेरी बहन उर्मिला का दर्द मुझसे भी अधिक है मगर किसी ने उसकी चर्चा तक नहीं की।
        शायद बहुत लोग सोचेंगे कौन उर्मिला। आपको बताना चाहता हूं राजा जनक की ही बेटी मिथिला की छोटी राजकुमारी सीता जी की छोटी बहन और लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला थी। जिनको उनकी कथा मालूम नहीं कुछ लोग समझते हैं सीता जी तो महल को छोड़ बनवास में पति के साथ गई और शायद लक्ष्मण की पत्नी महल में सुख पूर्वक रहती रही मगर ऐसा नहीं है। बड़ी बहन और पति दोनों ने उर्मिला को बनवास साथ जाने नहीं दिया और महल में सभी की सेवा करने का आदेश दिया और जब ससुर दशरथ की मृत्यु हुई तो वो अकेली थी मगर पिता के कहने पर भी मिथिला जाने को नहीं मानी। घर सभी का ध्यान रखने के साथ इक और भी समस्या थी उर्मिला की। लक्ष्मण ने वन में कुटिया बनाई भाई राम और माता सीता के लिए और खुद बाहर रखवाली को खड़ा रहा। जब नींद की देवी सामने आई तब नींद की देवी से लक्ष्मण ने वरदान मांगा था भाई राम की सेवा और सुरक्षा को जागते रहने का और देवी ने बदले में 14 साल तक अपनी नींद किसी और को देने को कहा तो लक्ष्मण ने अपनी पत्नी को दे दी अपने हिस्से की नींद। उर्मिला को सोते रहने पड़ा। और इतना ही नहीं बनवास के बाद जब राम का राजतिलक हुआ तब देवी के आदेश अनुसार लक्ष्मण की बारी थी अगले 14 साल सोते रहने की और उर्मिला की उसके बाद जागते रहने की। नवविवाहिता को पति से अलग रहना और दोबारा मिलने पर भी उस से कोई संवाद तक नहीं कर पाना इससे बड़ी सज़ा क्या हो सकती थी। रामायण लिखने वाले ने सब कथा अपने राम को ऊंचा बड़ा और महान बनाने के अनुसार समझाई है और जब राम को भगवान बना दिया तो उसके आचरण पर सवाल उठाने का कोई जतन भी नहीं कर सकता है। 
    आपको ऐसा रामराज्य पसंद हो सकता है जिस में पत्नी भाई सभी अपना सुख त्याग करें और तब भी गुणगान शासक का हो। जो अपनी पत्नी तक को न्याय नहीं दे सकता उसका न्याय कैसा होगा जिस में अपनी आलोचना ही निर्णय करने को विवश करती हो। 

Sunday, 25 November 2018

न धर्म न देशभक्ति केवल तमाशा ( आडंबर ) डॉ लोक सेतिया

  न धर्म न देशभक्ति केवल तमाशा ( आडंबर ) डॉ लोक सेतिया 

    धार्मिक स्थल बनाना मंदिर मस्जिद गिरजाघर जाना गुरुद्वारे जाकर सीस झुकाना धर्म नहीं है। अगर आपको यही धर्म लगता है तो पढ़ कर बताओ किस धार्मिक किताब में ऐसा लिखा हुआ है या समझाया गया है। मुझे आज तक किसी किताब में मंदिर मस्जिद आदि बनाने और वहां जाने की बात पढ़ने को नहीं मिली है। सदकर्म करना सदमार्ग पर चलना सच बोलना न्याय का पक्ष लेना सबको प्यार करना भाईचारा कायम रखना ज़रूरतमंद की सहायता करना लोगों के दुःख दर्द समझना उनको दूर करना किसी को सहारा देना किसी को शिक्षा या ज्ञान पाने में सहायक होना यहां तक कि किसी डूबते को बचाना किसी को सही राह दिखलाना किसी अंधे अपाहिज को मंज़िल तक पहुंचाना जैसे सभी काम करना धर्म बताया गया है। अपने किसी धार्मिक किताब में देवी देवताओं द्वारा तपस्या करने की बात में कहीं भी नहीं पढ़ा होगा किसी धार्मिक स्थल पर पूजा अर्चना का ज़िक्र तक। नानक की उदासियां किसी गुरूद्वारे की बात नहीं हैं , बुद्ध किसी बड़े धार्मिक स्थल नहीं गये , समाज सुधारक महान लोग भी जगह जगह जाकर उपदेश और ज्ञान की बात करते थे और समाज को तमाम गलत परंपराओं को बंद करने को समझाते रहे। सबसे बड़ी बात किसी भी साधु संत गुरु या मसीहा फरिश्ता को आपस में नफरत करने की बात नहीं की है। कबीर जैसे लोग हर अंधविश्वास पर चोट करते रहे नानक भी और विवेकानंद भी कोई उनमें अंतर नहीं खोज सकता। इन सब को पढ़ो तो सामने जो आता है वो एक ही धर्म है मानवता का धर्म। जब इसको समझ लिया तब आपको आजकल जो नज़र आता है वो केवल आडंबर ही समझ आएगा और आडंबर दिखावा वही करते हैं जो वास्तव में उस पर नहीं चलते हैं। 
      जिनको लगता है सत्ता मिलने पर बाप दादा की कई एकड़ ज़मीन पर समाधि बनाने से वो महान हो जाएंगे या किसी नेता की ऊंची मूर्ति से उसका नाम बड़ा हो जाएगा वही संकीर्ण मानसिकता आडंबर करती है धार्मिक आयोजन या धार्मिक स्थल बनवा अपना नाम लिखवाने की खातिर। भगवान खुदा ईश्वर इनके लिए वास्तविक आस्था की नहीं अपने मकसद हासिल करने को हैं। धर्म की राह चलना कठिन है और धार्मिक लिबास या सवरूप धारण करना आसान है , इधर भगवा वेस धारण करने वाले या अन्य धर्मों का पहनावा धारण करने वाले धर्म के सिवा सब करते हुए दिखाई देते हैं। जिस देश में करोड़ों लोग बेघर हैं भूखे सोते हैं और लोगों को शिक्षा स्वास्थ्य पीने का पानी तक नहीं मिलता और जीवन की बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं हैं आज़ादी के 71 साल बाद उस में गरीबी और अन्याय की असमानता की बात को छोड़ कर धर्म के आडंबर की बात की राजनीति करने वाला हर दल देश और समाज की भलाई की नहीं सत्ता की मलाई की चाहत रखता है। धर्म धर्म नहीं अधर्म बन जाता है जब कोई धर्म को  भी स्वार्थ सिद्ध करने को उपयोग करने लगता है। 
        राजनेता कारोबारी लोग या फिर धर्म का चोला पहने मतलबी लोग जनता को मूर्ख समझते हैं और बातों से बहलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। इक्कीसवीं सदी में आधुनिक युग में भी अगर हम सही और गलत सच और झूठ असली और नकली का भेद नहीं कर सकते तो फिर हमारा कोई विवेक कोई ज़मीर ही नहीं है और विवेकशून्यता कोई उचित मार्ग नहीं बता सकती है। धर्म को समझने को विवेक पहली ज़रूरत है और ज़मीर बतलाता है उचित अनुचित का अंतर उसी को धर्म कहते हैं।

Saturday, 24 November 2018

चुनाव जीतने का शर्तिया घोषणापत्र ( व्यंग्य विनोद ) डॉ लोक सेतिया

चुनाव जीतने का शर्तिया घोषणापत्र (व्यंग्य विनोद)  डॉ लोक सेतिया 

    ( इस रचना के सभी अधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं कोई भी दल कीमत 

         दे कर हासिल कर सकता है। पहले आओ पहले पाओ की नीति है। ) 

    ................  दल शपथ पूर्वक वादा करता है कि जनमत मिलने और जीतने के बाद सरकार बना कर सुनहरे दिन लाएंगे। सुनहरे दिन को आप कोई झूठा सपना अथवा जुमला समझने की भूल नहीं करें क्योंकि ऐसा हमने चुनाव आयोग को बंद लिफाफे में दस्तावेज़ सौंपा है ठीक उसी तरह जैसे अदालत को कोई विभाग गोपनीय रिपोर्ट देता है। आपको सोशल मीडिया और टीवी अख़बार की झूठी खबरों पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि उनको कुछ भी मालूम नहीं है इस बारे में। सुनहरे दिन में आपकी कोई भी समस्या समस्या नहीं रहेगी बल्कि समस्या खुद समाधान बन जाएगी। आप सोचेंगे ऐसा कब तक संभव होगा तो हम पांच साल क्या पांच दिन भी नहीं मागेंगे अपनी योजना को लागू करने को। आप सभी मानते हैं कोई भी इंसान सब कुछ नहीं कर सकता है मगर ऊपर वाला चुटकी बजाते ही सब कर सकता है। आपको अभी तलक सरकारों पर निर्भर रहना पड़ा है मगर हमारी सरकार आपको भगवान पर भरोसा करने की राह चलाएगी। ऊपर वाला जो भी करता है अच्छे को करता है यहां तक कि हमारे दल की जीत हार भी उसी की मर्ज़ी से होगी। वो चाहेगा तो आप वोट देने को खुद विवश हो जाओगे। देने वाला इक वही है और किसी से मांगना भी उचित नहीं है। सुनहरे दिन कैसे होंगे बताने की ज़रूरत नहीं है बस समझ लो जैसे सुनहरे ख्वाब अपने देखे हैं उसी तरह के। 
        सबको बारी बारी सभी कुछ मिलेगा , सत्ता भी हर दिन बारी बारी हर सांसद को हासिल होगी। एक दिन की बादशाहत का चलन होगा और एक दिन आपको भी शहर में सत्ता का पद अधिकारी नियुक्त करना जैसा किया जाएगा कोई भी स्थाई नहीं होगा। पांच साल में कोई भी वंचित नहीं रहेगा सब को एक दिन चौबीस घंटे मनमर्ज़ी की पूरी छूट मिलते ही हर कोई जीवन भर के लिए सुख सुविधा जमा कर लेगा। संविधान की बात की चिंता मत करें संविधान की भावना यही है कि कोई छोटा बड़ा नहीं हो और सभी को हर अवसर मिलना चाहिए। कौन है जो ऐसा नहीं सोचता कि काश वो सत्ता पर आसीन होता तो सब समस्याओं का समाधान पल भर में कर देता। इस तरह आपको भी अवसर मिलेगा मगर तब आपकी मर्ज़ी है कि पहले के नेताओं की तरह अपने बारे सोचते हैं या बाकी सब के लिए जैसे हमारा दल विचार कर रहा है। एक दिन को किसी को भी कुछ भी बनाया जा सकता है पर आपकी मर्ज़ी है कि आपने सरकारी ऐप्प पर क्या बनने को दर्ज करवाया है नाम अपना। लॉटरी की तरह रोज़ सुबह नाम सामने आता रहेगा कि आज कौन किस जगह किस पद पर नियुक्त होगा। समझदार लोग अधिक ऊंचे पद की जगह ऐसे पद पर नाम दर्ज करवाएंगे जिस में भीड़ अधिक नहीं हो। चिंता उन लोगों को होगी जो खुद को स्थाई समझते रहे हैं जबकि इस दुनिया में कुछ भी स्थाई होता नहीं है। मगर क्योंकि उन्होंने इतने सालों में ज़रूरत से बढ़कर जमा किया हुआ है इसलिए उनको छुट्टी पर भेजा जाएगा आराम करने को। आपको पता ही है सरकार किसी को भी छुट्टी पर भेज सकती है जब भी चाहे भले आधी रात को ही और कब तक छुट्टी पर हैं इसका भी कोई पता नहीं होगा। जब पुराने ढंग से बात नहीं बनती तभी नये तरीके ईजाद किये जाने ज़रूरी हैं। आपने सभी दलों को नेताओं को आज़माया है सब एक जैसे हैं एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं। इस बार सबको ताश के पत्तों की फेंट कर देखना बाज़ी पलट सकती है। अब आपको गुलाम नहीं बादशाह बनना है और गलती से किसी नेता के चेहरे का मुखौटा मत लगाना क्योंकि अबकी बार वोटर ही होगा सरकार और राजनेताओं का करना है बंटाधार। आगे आप लोग खुद हैं समझदार , थोड़ा सोचना समझना करना विचार। चिंता करना छोड़ दो मेरे यार चिंता की चिंता है बेकार।


Friday, 23 November 2018

वह दो खुशनसीब ( वास्तविक घटना ) डॉ लोक सेतिया

      वह दो खुशनसीब ( वास्तविक घटना ) डॉ लोक सेतिया 

    कल सुबह की बात है मुझे मेरी धर्मपत्नी ने आकर बताया कि देखना दो लोग अपने घर के सामने इक साथ बैठे हैं जो बेहद खुश दिखाई देते हैं। आजकल झूठी मुस्कान वाले लोग ही मिलते हैं सच्ची ख़ुशी देखे ज़माना हो गया है। ख़ुशी ऐसी दौलत है जो इधर खो गई है। मैं जाकर मिला उनसे बात की और पूछा भाई आपको ये दौलत मिली किस तरह से , पता चला बचपन के दोस्त हैं और अचानक मुलाकात हो गई है। उनकी बाकी बात बताने से पहले अपनी बात करता हूं ताकि आपको फिर से याद दिलवा दूं दोस्ती मेरे लिए इबादत है ईमान है। आज उनकी बात से फिर उम्मीद जागी है कि अभी भी दुनिया में दोस्ती कायम है और मुझे जिस दोस्त की तलाश है वो ज़रूर मिलेगा किसी दिन। कुछ दिन पहले की घटना याद आई फिर से , पार्क में दो लोग आपस में बहस कर रहे थे एक का कहना था कि तुम मुझे जानते नहीं मैं इस शहर को खरीद सकता हूं और दूसरा कह रहा था तुझे मालूम नहीं मैं कौन हूं तुझे जेल में बंद करवा सकता हूं और ज़मानत भी नहीं होगी। हुआ कुछ भी नहीं लकड़ी की नहीं कागज़ी तलवारों की जंग थी। पता चला एक पत्रकार है जो अख़बार की नौकरी करता है मगर शहर को खरीदने की बात कहता है और दूसरा सेवानिवृत सुरक्षाकर्मी है। अहंकार की दौलत हर किसी के पास है किस बात का अहंकार है कोई नहीं जनता। मगर अब दोस्ती की बात और दोस्ती पर मेरे कुछ शेर और रचनाएं छोटी छोटी। 

जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ,
ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए।

और कुछ भी तो हमको तम्मना नहीं ,
सांस लेने को थोड़ी हवा चाहिए।

हाल -ए -दिल आ के पूछे हमारा जो खुद ,
ऐसा भी एक कोई खुदा चाहिए।

अपनों बेगानों से अब तो दिल भर गया ,
एक इंसान इंसान सा चाहिए।

देख कर जिसको मिट जाएं दुनिया के ग़म ,
कोई मासूम सी वो अदा चाहिए।

जब कभी पास जाने लगे प्यार से ,
बस तभी कह दिया फ़ासिला चाहिए।

ज़िंदगी से नहीं और कुछ मांगना ,
दोस्त "तनहा" हमें आपसा चाहिए।
             मेरी निगाह में दोस्त खुदा से बढ़कर है और दोस्त मिल जाये तो दुनिया की सारी दौलत मिल गई है। मुझे दोस्त मिलते रहे और बिछुड़ते रहे हैं और दोस्त बनकर दुश्मनी करने वाले भी मिले हैं मगर फिर भी मेरा इक ख्वाब है कि कहीं कोई एक सच्चा दोस्त है जो मेरी तरह दोस्ती की चाहत रखता है। इक ग़ज़ल है यही सोच कर लिखी थी छह साल पहले जब बीमार होकर अस्पताल में भर्ती था।

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर।

यही काम करता रहा है ज़माना ,
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर।

किसी ने लगाया है काला जो टीका ,
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर।

           इक छोटी सी लघुकथा भी लिखी थी आजकल की हालत को देख कर। पढ़ सकते हैं।

      फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता। महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये
आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी "दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें"। तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।
                      मैंने पहले भी कई बार बताया है कि मेरा इश्क़ मेरा प्यार मेरा जूनून लिखना है। मैं लिखने से इतना प्यार करता हूं कि बिना लिखे रहना ठीक उसी तरह है जैसे सांस लिए बिना पल भर भी जीना संभव नहीं है। किसी और से मुहब्बत करना मुमकिन नहीं था क्यों प्रेम की गली में कोई दूसरा नहीं समा सकता है। मेरा लेखन उसी अनजान अजनबी दोस्त के नाम है सभी कुछ कविता ग़ज़ल कहानी जो भी है। अब कल जो दो लोग मिले उन दोस्तों की खुशनसीबी की बात बताता हूं।

                         घर का पता ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

     राजपाल और वेद यही उनके नाम हैं। गांव के बचपन के सबसे अच्छे दोस्त हैं। कोई दस साल पहले राजपाल गांव से शहर चला आया और वेद उसके पास किराये के कमरे पर दो बार मिलने आया भी। फिर फोन लिया दोनों ने और फोन पर बात करने लगे शादी पहले हो चुकी थी दोनों की ही। राजपाल ने शहर में इक बस्ती में जगह लेकर मकान बना लिया था मगर आजकल लोग घर का पता नहीं लेते देते और फोन नंबर से ही काम चलाते हैं। फोन नंबर था दोनों के पास घर का पता पूछना ध्यान ही नहीं रहा। कई साल पहले राजपाल ने जब फोन नंबर नया लिया जैसा इधर अधिकतर लोग करते हैं तब अधिक पढ़ा लिखा नहीं होने के कारण दोस्त का नंबर सुरक्षित करना भूल गया। और सम्पर्क टूट गया था सालों से मगर राजपाल कुछ कारण से गांव भी नहीं जा सकता था और वेद को याद किया करता था। उसने बताया कि दो दिन पहले उसको लगा कि सस्ती कॉल दर और डाटा के चक्कर में नंबर बदलना उसे बहुत महंगा पड़ा है और इत्तेफाक से अगली सुबह बस के अड्डे पर उसने वेद को बैठे देखा तो लगा जैसे भगवान ने उसकी सुन ली है। आपको ये बात बताने का मकसद ये भी है कि जब भी कोई अपना दूर हो तब उस से फोन नंबर ही नहीं लें दें बल्कि अपना घर का दफ्तर का पता भी बदलने पर लिख कर रखते रहें। फोन नंबर बदलता रहता है कभी पहुंच से बाहर होता है मगर घर मकान का पता होने पर जब दिल चाहे मिलने जा सकते हैं , बुला सकते हैं। मेरे दोस्त डॉ बी डी शर्मा की क्लिनिक पर इक इबारत लिखी रहती थी। दोस्त के घर तक की सड़क कभी लंबी नहीं होती है , स्वागत है।

Wednesday, 21 November 2018

बंद बक्से में छुपे राज़ ( पर्दे के पीछे ) डॉ लोक सेतिया

     बंद बक्से में छुपे राज़ ( पर्दे के पीछे ) डॉ लोक सेतिया 

    पर्दा उठता है तभी समझ आता है पीछे क्या क्या छुपा हुआ था। सीबीआई बनाम सीबीआई का सच ऐसा भी हो सकता है नहीं कल्पना तक की थी। आंच पीएमओ से आगे सुरक्षा सलाहकार तलक पहुंची तब लगा अभी कितनी पर्तें खुलनी हैं। देश का सुरक्षा सलाहकार जब सीबीआई में दखल दे रहा हो और बड़े बड़े अधिकारी अदालत को शपथ लेकर बता रहे हों कि उनको किस किस तरह से दबाव डालकर गंदा खेल खेला जा रहा था तब अदालत को इतनी गंदगी की सड़ांध से अधिक चिंता अपने आदेश की गोपनीयता की होना भी डराता है। आपको किसी संस्था की छवि बचाने की चिंता होनी चाहिए या ऐसे किसी संस्था को ठीक करने की , किसी के भीतर की गंदगी कालीन के नीचे दबाने छिपाने से उसको खत्म नहीं किया जा सकता है। जब कोई चेहरा दाग़दार हो तो आईने को दोष देना या उसे तोडना हल नहीं हो सकता। सब से बड़ी अदालत को सबसे पहले देश और संविधान की चिंता होनी चाहिए। सच जो भी है पूरा सामने लाना चाहिए बेशक सच कितना कड़वा ही क्यों नहीं हो। अदालत ने कहा कि आप सभी इस काबिल नहीं हैं कि आपकी बात सुनी जाए।  एक लाइन में बिना कहे सब समझा दिया सर्वोच्च न्यायलय ने सीबीआई केस की सुनवाई करते हुए इनकार ही कर दिया , पहले जवाब दो गोपनीय बात मीडिया तक लीक हुई क्यों। हो सकता है ऐसी तल्ख़ टिप्पणी को भी लोग चार दिन में भुला दें मगर समझा जाए तो ये बेहद चिंताजनक हालत है। बड़े बड़े पदों पर या नामी वकील समझे जाने के बावजूद भरोसा किस पर किया जाए नहीं समझ आता। ग़ज़ल कहने वाले गर्व करते हैं कि दो मिसरों में हर बात पूरी कर देते हैं मगर यहां कुछ शब्दों में एक लाइन में जो कहा उसका विस्तार बहुत है। बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। सोचता हूं कभी मकान बड़े ऊंचे नहीं हुआ करते थे पर उन में रहने वालों के कद उनके आचरण के कारण महान हो जाते थे। नैतिकता और ईमानदारी सच्चाई की राह पर चल कर इंसान होकर भी फरिश्ता लगा करते थे। कोई छोटा सा ओहदा मिलते ही भावना रहती थी कि अपने पद की गरिमा को कम नहीं होने देना है आज बड़े से बड़ा अधिकारी विचार ही नहीं करता कि उस जगह होते हुई कोई घटिया काम कर कैसे सकता है। राजनेताओं के ब्यान और कारनामें देख कर लगता है लाज शर्म को ताक पर रख आए हैं। किसी वकील ने किसी राजनेता के झूठ बोलने पर इक वाक्य बोला था , ये कहना बेकार है कि आपको शर्म आनी चाहिए। लेकिन आज तमाम बड़े बड़े पद वाले अधिकारीयों और राजनेताओं की दशा उस तरह की दिखाई देती है। वास्तव में बहुत देर हो चुकी है फिर भी इस पर अंकुश लगाना होगा और तय करना होगा कि जो भी बड़े पद पर अथवा सत्ता के सिंहासन पर हो उसको अपनी मर्यादा का पालन करना लाज़मी हो अन्यथा उसको कोई भी अनुचित कार्य करते ही पद से हटाया जाना चाहिए।
           नियम सब पर लागू होने चाहिएं , मीडिया पर भी धर्म वालों पर भी कारोबार करने वालों पर भी , सरकार के अधिकारी कर्मचारी चाहे पुलिस न्यायपालिका का हिस्सा बने लोग हों या खुद को ख़ास समझने वाले नायक अभिनेता खिलाड़ी जो भी हो। अधिकार पाना चाहते हैं मगर उत्तरदायित्व निभाने को तैयार नहीं कोई भी। मनमानी या सत्ता और अधिकार की निरंकुशता पर रोक लगाना ज़रूरी है। हम समय के साथ सभ्य और परिपक्व होने की जगह गैरज़िम्मेदार बनते गये हैं और सत्ता पद अधिकार पाकर अपने कर्तव्य निर्वाह करने को भूल खुद को नाकाबिल साबित करने लगे हैं। ज्ञान और शिक्षा इंसान को बेहतर बनाने को है और अगर डॉक्टर वकील अधिकारी  या अख़बार के संपादक टीवी चैनल के एंकर पत्रकार बन कर हम इंसानियत ईमानदारी नैतिकता और कर्तव्य को भूलते हैं तो अच्छा होता अनपढ़ गंवार ही रहते। आपको हथियार मिलता है औरों को सुरक्षा देने को मगर आप अगर उसका उपयोग किसी को कत्ल करने या घायल करने को करते हैं तो आपका अपराध अधिक गंभीर हो जाता है। आजकल यही होता दिखाई देता है। मगर सवाल इंसाफ का है और देश के संविधान को सुरक्षित रखने का पहले है। ऐसा पहली बार होता दिखाई दिया है कि कोई सत्ता पाकर सब कुछ अपने आधीन करने को व्याकुल है बेताब है और इसके लिए किसी सीमा तक जाने को तैयार है। अब अगर गोपनीयता को ढाल बनाकर सत्ता के असंवैधानिक कार्यों पर पर्दा डाला जाएगा तो देश का लोकतंत्र ही नहीं बचेगा। हर बड़े पद पर किसी एक संस्था या उसकी विचारधारा के लोग नियुक्त करना इक खतरनाक सोच को दर्शाता है। आज सामने आता है कि काला धन घोटाले की बात करने वालों को देश की कोई चिंता नहीं थी उनको ऐसी बातों को औज़ार बनाकर सत्ता पर काबिज़ होना था। जब सत्ता मिली तो ये सब उन विषयों पर खामोश हैं। सत्ता का दुरूपयोग और मनमानी करने से देश की आर्थिक दशा बदहाल कर दी है और अच्छा कोई भी काम किया नहीं है। मानसिकता बन गई है केवल एक दल भी नहीं बस एक नेता ही सही बाकी जो उसका विरोध करता है सब नेता नहीं देश के विरोधी हैं।
             अभी रिज़र्व बैंक तक को अपने आधीन करना चाहते हैं केवल सत्ता में जीतने को चुनाव में अच्छी तस्वीर दिखाने को। इतना संकीर्ण नज़रिया देश को किस तरफ ले जाएगा। मगर धन वो भी जनता का पैसा खर्च कर अख़बार टीवी चैनलों तक को विवश कर दिया है वास्तविकता नहीं दिखाने को और मीडिया देश हित और अपना कर्तव्य भूल कर सत्ता का पक्षधर बन गया है। ऐसे में सरकार और संगठन संस्थाएं कोई भी गैरकानूनी या अनुचित अथवा अनैतिक कार्य करें तो जनता को खबर नहीं होगी और जब कोई अधिकारी अदालत को बताना चाहे तो उसको सुनना ज़रूरी नहीं है क्या। क्या अंतर है उस बाबा में जो धर्म और समाजसेवा की आड़ में गुनाहों का अपना अड्डा बनाकर महान संत कहलाता रहा और उस सरकार में जो जनता को झूठे सपने दिखला कर सत्ता पर आसीन होने के बाद तमाम मर्यादाओं को ताक पर रखकर सत्ता की हवस और अपने विस्तार या गुणगान में मस्त हो गई है।

तीसरा जहां ( अफ़साना ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया

     तीसरा जहां ( अफ़साना ए मुहब्बत ) डॉ लोक सेतिया 

     खुदा ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु ईसामसीह जो भी नाम उसका है उसने दो जहान बनाये थे यही सब जानते हैं। इक जहां धरती आसमान नदियां समंदर पेड़ पौधे पशु पक्षी हवा पानी आग जाने कितना कुछ बनाया इस दुनिया में और खो गये सभी उसको खोजने में जो भी नहीं था उसे बनाने में। मगर यही भूल हुई कि विधाता की बनाई दुनिया में विधाता बनना संभव ही नहीं था। ये जिस का रचाया खेल है उसने ही तय किया हुआ है कि जब जो भी विधाता बनने की कोशिश करेगा उसका नामो निशान बाकी नहीं रहेगा। मगर इंसान के दिमाग में ये खलल हमेशा बनी रहे विधाता रुपी खिलाड़ी का खेल यही है। हमेशा से लोग जन्नत स्वर्ग वैकुंठ जैसे जहान की बातें कर अपना उल्लू सीधा करते रहे , खुद लोभ मोह लालच करने और दुनिया वालों को इन में नहीं फंसने की शिक्षा देकर। मगर कभी कभी इसी दुनिया में ऐसे भी लोग हुए जिनको ये दुनिया नहीं भाती थी और दूसरी दुनिया स्वर्ग नर्क जन्नत दोजख वाली की भी चाहत नहीं थी। उन्होंने हमेशा कल्पना की थी इक तीसरी दुनिया की जिस में प्यार हो मुहब्बत हो अपनापन हो फूल हों चांदनी हो और कुछ भी खराब नहीं हो। वो लोग किसी धर्म देश वर्ग भेद की बात नहीं करते थे और इश्क़ में अपनी अलग दुनिया बसाने की बात किया करते थे प्यार की मुहब्बत की दुनिया। आज आपको उस दुनिया की सैर करवाते हैं। 
           अभी अभी दो नये बशिंदे आये हैं फरिश्ता उनको लाया है और छोड़ गया है ठीक उसी तरह जैसे बाकी युगल आये हैं बारी बारी। परंपरा की तरह उनका अभिनंदन किया जा रहा है और बताया जा रहा है अब आप आज़ाद हैं सुरक्षित हैं और इस अपनी दुनिया में रह सकते हैं। शर्त केवल सच्चे प्यार को बनाये रखने की है सब इस जहान में सिर्फ और सिर्फ प्यार करते हैं कोई तकरार नहीं कोई झगड़ा लफड़ा हर्गिज़ नहीं। साथ मिलकर नाचने झूमने गाने के बाद सब पहले के बशिंदों ने उन से उनकी मुहब्बत की कहानी पूछी। ये भी पूछा कि क्या आजकल भी लोग उनकी तरह प्यार मुहब्बत इश्क़ करते हैं। इस पर नये आये दोनों ने सवाल किया ये बताओ इस दुनिया में इंटरनेट सोशल साइट्स स्मार्ट फोन की सुविधा किस तरह मिल सकती है। ये सब क्या होता है और आपको उसका करना क्या है। वो बता रहे हैं जिस समय आप ने प्यार मुहब्बत की बातें की तब क्या ख़ाक मज़ा हासिल हुआ होगा आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप्प सोशल मीडिया के बिना कोई भी काम नहीं मुमकिन है। रात दिन संदेश विडिओ कालिंग और मौज मस्ती किया करते हैं सभी आशिक़। अब वो बात नहीं कि कोई छोड़ जाता है तो पागल बन ढूंढते रहो अगले पल कोई और सामने मिल जाता है। सात जन्म साथ की बात कोई नहीं करता सब जब तक निभती है साथ साथ होते हैं जब नहीं निभती तो अलविदा कहने में संकोच नहीं करते हैं। जान हो कहना ठीक है मगर जान कहने का मतलब जान से हाथ धोना नहीं है। पहली नज़र वाला प्यार अब नहीं होता है सोच समझ कर खूब हिसाब लगाकर चुनते हैं कौन सब से अच्छा विकल्प है। लड़का हो चाहे लड़की हो दोनों के पास और भी लोग रहते हैं किसी एक पर दिल आने की बात नहीं है। साल दो साल बाद भी किसी को लगता है अभी भी बंधन नहीं है विवाह करने से पहले कोई भी बहाना बना सकते हैं। घर वाले नहीं मानते हैं या कोई दूसरी मज़बूरी जता देते हैं। अधिकतर लोग समझदार हैं और उनको भी उस से बेहतर कोई दूसरा मिल जाता है। कभी कभी कोई सोचता है मैं इसको छोड़ दूंगा मगर दूजा उसके छोड़ने से पहले ही छोड़ जाता है। कोई तो कहता है बेवफाई करने से अच्छा है जुदा हो जाना। 
           आपके वक़्त कोई विरला आशिक़ महबूबा हुआ करते थे इधर कोई बचा नहीं जिसको कोई भी नहीं मिला हो। ऐसे ऐसे युगल मिलते हैं कि लोग हैरान होते हैं उनको इश्क़ हुआ किस तरह होगा। मगर इक खेल है और हर कोई खिलाड़ी है। वेलेनटाईन डे पर हर साल लोग पुराने को छोड़ नया बना लेते हैं अवसर मिलने की बात है। लेकिन पहले की तरह इश्क़ आसानी से नहीं हासिल होता है , मुहब्बत का भी बहुत बड़ा बाज़ार है और कारोबारी लोग करोड़ों की कमाई करते हैं। टीवी सीरियल और फिल्म वालों ने जो पहले वाला प्यार हुआ करता था उसका कबाड़ा कर दिया है और मुहब्बत में साज़िश से लेकर डर और बाज़ीगर तक क्या क्या नहीं शामिल कर दिया है। चर्चा होती है पहला प्यार आकर्षण होता है जो करीब आये उसी पर दिल फ़िदा हो जाता है। किस को कितनी बार इश्क़ हुआ कई लोग गिनती भी याद नहीं रखते हैं। ये सब सुनते कुछ की धड़कन बढ़ने लगी है तभी सबसे बज़ुर्ग आशिक़ ने चेतावनी देते हुए कहा कि ये सब कोई चाल है और भूले से उस दुनिया में फिर वापस जाने की बात मत सोचना। नये आशिकों का नशा कितने दिन बाकी रहेगा कोई नहीं जनता मगर नफरत की दुनिया की तरफ देखना भी गुनाह है। शायद अगर ये भूले से यहां चले आये हैं तो फरिश्ता देखता है इनको वापस ले जाएगा। हर चमकदार वस्तु सोना नहीं होती है , ज़रा इनकी भी परख होने देते हैं पीतल हैं या खालिस सोना हैं। अब आगे क्या हो सकता है आप भी सोचो तो समझ जाओगे। कई साल हो गये जो भी नये बाशिंदे फरिश्ता लेकर आता है कुछ ही देर में चुपचाप वापस लौट जाते हैं। जिन आशिकों को सोशल मीडिया की लत का रोग लग गया हो वो अपने आशिक़ महबूबा के बगैर जी सकते हैं फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप्प को छोड़ कर नहीं कभी भी नहीं। इसके बिना भी कोई जीना है , मरने का ग़म नहीं होता उनको जितना सोशल मीडिया से बिछुड़ने का दर्द होता है। प्यार की जुदाई सही जा सकती है सोशल साइट्स बिना जीवन सूना क्या मौत से बदतर लगता है। ऊपर वाला चाहे कहीं भेज दे मगर उस जहां में नहीं भेजे जिस में इंटरनेट की सुविधा नहीं हो फेसबुक की दुनिया न हो और व्हाट्सएप्प नहीं चलता हो।  

Tuesday, 20 November 2018

अपने होने का सबूत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      अपने होने का सबूत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    हौसला होता तो कभी सामने आता मेरे , बार बार सपने में आकर अपनी बात कहता है। मैं भी लेखक ठहरा सबकी बात लिखता हूं खुद अपनी भूलकर उसकी भी लिखता रहा कितनी बार। रात फिर आ गया तो मैं पहचान नहीं पाया कितने दिन बाद और कितना बदला बदला सा। कैसे यकीन करता यही भगवान है जो फटेहाल चीथड़े पहने और लहू लुहान बदन पर इतने घाव मगर फिर भी कोई आह नहीं कराहना नहीं बस इक ख़ामोशी लिए हुए। परिचय मांगा तो शिकवा करने लगा तुम आते थे मेरे स्थल तब कभी पूछा था मैंने कौन हो क्यों आते हो। मैंने कहा भाई माफ़ी चाहता हूं भूल गया यादास्त कम हो गई है बता दो बुरा नहीं मानो। मैं हूं दुनिया का बनाने वाला दो जहां का रखवाला सबका मालिक भगवान। मुझे यकीन नहीं आया देख का कहने लगा बदहाल हूं शायद तभी नहीं पहचान रहे हो चलो अपनी पुरानी तस्वीर दिखलाता हूं। और फिर पल भर में भगवान के कितने स्वरूप बदल बदल सामने आता रहा। हर धर्म के हर देवता पयंबर ईश्वर की तरह मगर मुझे फिर भी लगा कि इधर ठग लोग भेस बदलते रहते हैं कैसे यकीन करूं यही असली है। मैंने बताया देखो हमेशा भरोसा करता रहा भगवान है कोई ऊपर वाला मगर लाख कोशिश की मनाने की माना नहीं मुझसे तो जाना छोड़ दिया बाकी सब दिखावे के रिश्ते नातों की तरह। नहीं निभाए जाते झूठे रिश्ते अब और मुझसे। कहने लगा हम कितनी बार बहस करते रहे हैं और बहस करना फज़ूल है चलो तुम खुद बताओ किसे कैसे भगवान मान सकोगे कोई उद्दारहण तो दो। मैंने उसको बताया मुझे मिले हैं जीवन में तमाम लोग जिनसे मेरा कोई नाता रिश्ता संबंध नहीं था फिर भी उन्होंने मुझे वो सब दिया बिना मांगे ही जो तुमसे मांगने पर भी मिलता नहीं किसी को भी। और उन कुछ लोगों की वास्तविक कहानी उसको बताई मैंने।
       बात 1974 की है 44 साल बाद भी याद है। डॉक्टर बनकर अपनी क्लिनिक शुरू की उस शहर में मगर दूर के नाते पहचान वाले दो तीन लोग महीना भर भी नहीं लगा दूर होते। अकेला इक घर किराये पर लिया मगर नाम को चार बर्तन लाया था घर से और खाना बनाना आता नहीं था। तब उस शहर में एक ढाबा था जो इतनी दूर था कि खाना खाने जाओ तो वापस आते आते भूख लगने लगती। ऊपर से अजनबी लोग कोई बात करने को नहीं। कुछ दिन बेहद कठिनाई से बिताए जो लिखना संभव नहीं है। मगर साथ ही मकान मालिक का घर था और मकाम मालकिन ने इक बज़ुर्ग महिला को रखवा दिया जो घर की सफाई कपड़े धोना और खाना बनाकर रख जाना सब काम करती नाम को ही वेतन था 35 रूपये महीना। मगर मैं क्लिनिक चला जाता नाश्ता कर और वो माताजी बाकी सब काम कर चाबी मकान मालकिन को देकर चली जाती। कभी उनके आने से पहले मैं क्लिनिक चला गया होता और ध्यान नहीं होता कि घर की चाबी मकान मालकिन को देकर जाऊं तब वो माताजी छत से ही मकाम मालिक के घर से मेरे घर आती और सब काम करती चली जाती थी। इतना ही नहीं वो इतना ध्यान रखती थी कि मुझे जितना खाना है उतना बनाती और अक्सर रसोई का सामान भी खत्म होने पर गली की दुकान से उधार ले आती ताकि मैं भूखा नहीं रहूं। शायद अपनी मां की तरह से ही ध्यान रखा उन्होंने मेरा कई महीने तक। उस शहर की कड़वी यादें बहुत हैं मगर एक उनकी याद है जो आज भी मन भर आता है। मगर अफ़सोस है कि फिर कभी उस शहर जाना नहीं हुआ और मिल नहीं सका।
       बहुत लोग हैं जिन्होंने मुझे या फिर मुझ जैसे अन्य कितनों के जीवन को संवारने को अपना योगदान दिया। हो सकता है आपको पहली नज़र में ये छोटी सी बात लगे मगर मैं सोचता हूं अगर उन्होंने जो किया वो नहीं करते तो मैं और मुझ जैसे तमाम लोग शायद बहुत चीज़ों से वंचित भी रह सकते थे। आज शुरआत करता हूं गांव के उन मास्टरजी की याद से। मेरा गांव शहर से 15 किलोमीटर दूर था और सड़क से पांच किलोमीटर पैदल चलना होता था। तब कोई अध्यापक गांव आकर सरकारी स्कूल में अध्यापक बन कर शिक्षा देने को मुश्किल से ही तैयार होता था और जिस को सरकार भेजती वो भी गांव में कच्चे मकान में रहने की जगह शहर में रहना चाहते थे। मगर उन्होंने एक अकेले ही पांचवी तक की क्लास तक सभी को शिक्षा देने का कार्य शुरू किया जब तक बाकी अध्यापक नहीं आये। इतना ही नहीं स्कूल के समय के बाद घर पर भी बच्चों को पढ़ाया करते थे ताकि अच्छे नतीजे मिल सकें। उन दिनों कोई ट्यूशन फीस की बात नहीं होती थी। आज सोचता हूं कि हम जितने लोग उनसे पढ़कर डॉक्टर इंजीनीर या बैंक अधिकारी अथवा अन्य बड़े पद पर पहुंचे हैं उनके योगदान को शायद कभी याद भी नहीं किया होगा जबकि हमें हमेशा उनका आभारी होना चाहिए।
     डाकिया था गांव का सबको जनता था पहचानता भी था और सब भरोसा भी करते थे उस पर। चिट्ठियां बांटना लिख भी देना पढ़ कर सुनाना और बदले में हाथ जोड़ नमस्कार करना कुछ भी नहीं लेना न मांगना। घर का सदस्य लगता था जो कभी कभी खुद कह देता माता जी थक गया चाय पीनी है और चाय मिल जाती थी। चौकीदार था एक जो रात भर जागते रहो की आवाज़ लगाता और लोग चैन से सोते थे। उसको हर दिन थोड़ा आटा  मिलता था घर घर जाता कोई काम कहते तो कर देता और सबकी खबर देता लेता भी जैसे कोई हमदर्द हो। उसकी पत्नी हर किसी के बुलाने पर चली आती और सुख दुःख में घर पर महमान आये हों या कोई बीमार हो सब काम करने में सहयोग देती थी। एक तिरखान था जो किसानों ज़मीन वालों के हल कस्सी आदि बनाता था बदले में अनाज मिलता था मगर वो भला आदमी उन बच्चों को भी गिल्ली डंडा खिलौने बना कर देता जिनके घर से उसे कुछ भी मिलता नहीं था। ऐसे लोग हर जगह मिलते रहे जो खुद को महान नहीं समझते थे मगर वास्तव में अच्छे थे और अच्छाई ज़िंदा है इसका सबूत थे। उनकी तरह तेरे होने का कोई सबूत मुझे कभी दिखाई नहीं दिया। सपना खत्म नहीं हुआ मगर नींद खुल गई थी।
         सुबह सुबह बाहर से आवाज़ आ रही है जागते ही धन्यवाद करो भगवान का कि अभी भी ज़िंदा हो। मुझे इसका मतलब नहीं समझ आया तो क्या ये अनहोनी है। क्या मुझे ज़िंदा होना नहीं चाहिए था वास्तव में हालात कुछ जीने लायक हैं तो नहीं। क्यों ज़िंदा हैं सोचते हैं तो जवाब यही मिलता है क्योंकि मरे नहीं अभी। अगर यही जीना है तो जीकर क्या होगा। हर सुबह अपने वजूद को ढूंढना हर बार निराशा को भुलाकर आशा जगाने की नई कोशिश करना। किसी शहर की पहचान थी कि उस के हर चौराहे पर लिखा रहता था मुस्कुराइए कि आप इस शहर में हैं। लोग मिलते हैं तो लगता है बेवजह मुस्कुराने की कोशिश करते हैं। कोई वजह हंसने की रोने की जश्न मनाने की होनी चाहिए अकारण कुछ करना तो पागलों की सी बात है। मगर अब सरकार करोड़ों रूपये इसी पर खर्च करती है फील गुड फैक्टर इसी कहते हैं गंदगी के ढेर पर स्वच्छ भारत अभियान का विज्ञापन। सदिओं से यही परंपरा चली आई है सीता रुपी जनता सोने का हिरण मांगती है पति सरकार की तरह उसको जंगल में भाई पर सुरक्षा करने का कार्य सौंप हिरण तलाश करने चले जाते हैं सत्ता का। छोटा भाई  सीता माता को अकेली जंगल में छोड़ भाई के पीछे चले जाते हैं मगर सरकारी नियम कानून की तरह इक रेखा बना जाते हैं कि उसमें कैद रहते कोई डर नहीं है मगर जनता रुपी सीता उस रेखा से बाहर निकलती है और रावण उसको उठा ले जाता है। आज भी अपहरण करने वाले रेखा से बाहर निकलने की टोह रखते हैं। अपराधी अपराध करने से पहले विचार करते हैं रेखा को हमने नहीं लांघना है। नेता जी यही ब्यान दे रहे हैं कि अधिकतर बलात्कार बलात्कार नहीं होते हैं आज सीता जी होती तो दोष उन पर लगता रेखा से बाहर आई किसलिए। साधु भेस में रावण हैं क्या अभी समझ नहीं आया और सरकार को ऐसे रावणों की कितनी चिंता है वोट पाने को उनकी शरण जाते हैं। मगर सत्ता का आत्मविश्वास फिर भी कायम है जो दावा करते हैं हम लाख बुरे सही और राज्य को कितना बदहाल किया हो तब भी हर गली हर सड़क पर इश्तिहार बताते हैं कि जो भी वास्तविकता है वो सच नहीं है और हमारा झूठ ही सच्चाई है।
     धर्म की बात और भगवान की राजनीति करने वालों के युग में भगवान की दुर्दशा सपने में देख कर मन घबरा रहा है। भगवान की सहायता ऐसे में कौन कर सकता है। भगवान का कोई बस सरकार पर नहीं है खुद भगवान इक कठपुतली बन चुके हैं और कठपुतली करे भी तो क्या नाचना तो पड़ेगा धागे किसी और के हाथ में जो हैं। पिछली सरकार कहते थे कोई कठपुतली बन कर चला रहा है अब मामला और अजीब है भगवान भी कठपुतली बन गये हैं और बेबस हैं। मगर उनके पर कोई सबूत भी नहीं आधार कार्ड की तरह।


Saturday, 17 November 2018

2019 नहीं क़यामत आ रही है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   2019 नहीं क़यामत आ रही है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   कयामत आने वाली है जैसे ऐसा शोर है जैसे देश में पहले कभी चुनाव ही नहीं हुए हों। मगर ये शोर मचा वो रहे हैं जिनके लब सिले हुए हैं आंखों पर स्वार्थ की काली पट्टी बंधी हुई है। कहते हैं उनके पास कभी सच बोलने वाली ज़ुबान भी हुआ करती थी और समाज की बात समझने समझाने को ज़मीर नाम का भी कुछ हुआ करता था। विज्ञापन और कारोबार व ताकत हासिल करने को ये दोनों चीज़ें गिरवी रख दी सरकार नेताओं उद्योगपतियों धर्म का धंधा करने वालों और मनोरंजन के नाम पर देश की जनता और दर्शकों को गुमराह करने वालों की टकसालों पर। अब उन सभी का झूठ ऊंचे दाम पर बेचते हैं और मालामाल हो रहे हैं चोर भी और रखवाले भी। चौकीदार शब्द का उपयोग नहीं किया क्योंकि इधर उसका पेटेंट किसी के नाम किया जा चुका है जो वास्तव में चौकीदार है नहीं बनना चाहता भी नहीं था मगर कहलाना चाहता था। अख़बार कभी जागरूकता लाने और देश समाज को आईना दिखाने को निकाला करते थे और पत्रकार खुद को चौकीदार ही मानते थे और जो चोरी घोटाला करता उसका पता लगाना और देश की जनता को सूचना देना अपना फ़र्ज़ समझते थे। आजकल ये खुद को सबसे ऊपर समझते हैं और अपने लिए कोई बंधन कोई नियम नहीं मानते है। इनको भरोसा है या वहम है कि यही सब जानते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। रात को दिन दिन को रात बना सकते हैं इनका दावा है। कभी नियम था कि किसी मकसद या स्वार्थ के लिए खबर छापना या छुपाना पीत पत्रकारिता होता है और इक गुनाह है। मगर आज फेक न्यूज़ या इस तरह से तमाम बहस कहानियां बनाकर झूठ को सच बताना इन्हें अनुचित नहीं लगता है। पीलिया रोगी बन चुके हैं और सही गलत की बात छोड़ इक अंधी दौड़ में भाग रहे हैं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास।
           लोग हर किसी को जो कोई कहता है नाम दे देते हैं मैं शरीफ आदमी हूं जो कहता है उसको शराफत का तमगा दे देते हैं जबकि शरीफ समझा जाना अर्थात बिना अपराध गुनाह मानने वाला और सज़ा कबूल करने वाला आदमी। ठीक जैसे घर में अधिकतर पति शरीफ होते हैं मगर बाहर निकलते ही शराफत छोड़ बदमाशी करना चाहते हैं। मगर बदमाशी करना सब के बस की बात नहीं होती है इसलिए ज़्यादातर शरीफ चाहकर भी शराफत का लबादा उतार नहीं पाते हैं। अब बात चुनाव की कयामत की। ये अफवाह जाने कब से उड़ चुकी है कि अख़बार टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने वाले बेकार लोग और कुछ राजनीतिक दलों के भाड़े पर लगाए लोग जिसे चाहे चुनाव जितवा सकते हैं। हर दल की नज़र इसी पर है इनको खुश करने से जीत हासिल हो जाएगी मानते हैं। कहने को सभी कहते हैं देश की जनता समझदार है मगर समझते हैं जनता नासमझ बच्चा है जो उनकी समझाई किताब पढ़कर उस पर अमल करेगा। वास्तविकता सब जानते हैं कि हमेशा देश की जनता ने समझदारी का परिचय दिया है। इनको लगता है जो हम लिखेंगे जो भी हम दिखाएंगे लोग उसी को सच मानेंगे। लोग यही मानेंगे कि देश की वास्तविक समस्याएं वो हैं जो मीडिया बताता है और जो खुद जनता की समस्याएं हैं वो कोई समस्या हैं ही नहीं। और लोग अन्याय अत्याचार भेदभाव  शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य की चिंता छोड़ धर्म और मूर्तियों तथा राजनीतिक दलों की सत्ता की चाहत को साम दाम दंड भेद भाव की अनीति को उचित समझ अपना मत देंगे। सभी दल सब नेता टीवी चैनल अख़बार 2019 में चुनाव को ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई कयामत आने वाली है। इन को और कोई चिंता ही नहीं है , कुवें के मेंढक को लगता है उसका समंदर विशाल है। जो लोग आज़ादी चाहिए रौशनी चाहिए का शोर मचाते हैं कैफ़ी आज़मी की कविता की तरह उनको केवल सत्ता की चाहत है और चुनाव संपन्न होते ही वापस अंधे कुंवे में कूद जाते हैं फिर से नारे लगाने को। 
                  इस देश की जनता की आदत आज भी सदियों पुरानी हैं चुप रहती है सब समझती है मगर बोलती नहीं है मगर सही समय पर अच्छे अच्छों को असली औकात दिखला देती है। किताबी ज्ञान वालों को ये समझना आसान नहीं है कि बड़े बूढ़े और तजुर्बे से बहुत सबक लोग सीखते हैं और जीवन के अनुभव से बढ़कर कोई स्कूल कोई कॉलेज कोई विश्वविद्यालय ज्ञान नहीं दे सकता है। बंद कमरों में बैठ कर देश को समझना संभव नहीं है। शायद कोई ये विचार नहीं करता है कि ये कितनी बड़ी मूर्खता है कि पहले इसकी चर्चा करना कि कौन किसे वोट देगा कौन जीतेगा कौन हारेगा और उसके बाद क्यों कोई जीता कोई हारा की बात की चर्चा करना। कभी पढ़ना यही काम सब से अधिक मूर्खता वाला बताया गया है तमाम महान ऐसे लोगों द्वारा जिन्होंने इसकी चिंता नहीं की और वास्तविक कार्य किया। गांधी भगत सिंह सुभाष जैसे लोग अगर इन बातों की चर्चा में उलझे रहते या नानक बुद्ध केवल यही करते अथवा अब्दुल कलाम ऐसी बहस में लगे रहते तो कुछ भी हुआ नहीं होता। विडंबना की बात है गीता की बात करने वाले कभी समझ नहीं पाए कि जंग लड़ क्यों रहे हैं और जीत हार से अधिक महत्व किस बात का है। समझदार लोग खामोश रहते हैं और दो कौड़ी के लोग शोर मचाकर अपनी बोली लगवा रहे होते हैं। देश की अधिकांश जनता खामोश रहती है और आज भी चुप है समय पर निर्णय देने को मगर ये राजनेता और मीडिया वाले कुछ तथाकथित जानकर विशेषज्ञ कहलाने वाले लोगों के साथ शोर मचाए हुए हैं कि कयामत आने वाली है। हम शरीफ लोगों की शराफत को कमज़ोरी या नासमझी नहीं समझो जिस दिन ये दबे कुचले लोग बोलने लगे आप सभी खुद को सब जानने वाले समझने वाले दंग रह जाओगे मगर घबराना नहीं कोई आफत कोई कयामत नहीं आएगी।
                    शायद आज भी बहुत लोगों को याद होगा कि देश में चुनाव कभी नफरत और बदले की भावना से नहीं विचारों की विभिन्नता को लेकर लड़े जाते थे और जनता को इक पर्व की तरह उत्साह होता था। राजनीतिक दलों की सत्ता की भूख के कारण अपराधी और धनवान और सरकार का दुरूपयोग करने वाले लोग देश को बर्बाद करने में सफल होते होते सरकार पर वर्चस्व स्थपित कर सके हैं। आज कोई भी दल देश और समाज की भलाई नहीं चाहता ये सब उस गंदे पानी के तालाब की तरह हैं जिस में जितना साफ पानी बाहर से मिलाओ उस को भी गंदा कर देते हैं। सवाल इस गंदी राजनीति के पूरे पानी को बदलने का है। शायद कुछ कमी है जो हम किसी न किसी को मसीहा समझ उसकी बंदगी करने लगते हैं जो वास्तव में गुलामी की निशानी है। भारत हो या कोई भी देश कोई भी राजनेता देवता नहीं होता है और जनता जो उनको चुनती है उसे सर झुकाने की आदत छोड़ अपने अधिकार मांगने  और उनको कर्तव्य निभाने की बात करनी होगी। जो भी नेता कहता हो उसने आपको कुछ भी दिया है उसको कहना होगा कि आपने दिया नहीं है हमारा है हमें मिलना चाहिए था। किसी भी अधिकारी से बात करते हुए सर जी कहना इस देश के पत्रकार और बुद्धीजीवी ही किया करते है अन्य किसी देश में नहीं होता है ऐसा। वास्तविक मालिक देश की जनता है और शासन करने वालों की अकर्मण्यता का सबूत है कि खुद सुख सुविधा से रहते हैं मगर जनता को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा सके आज तक। दो शेर आखिर में अपनी ग़ज़ल के अलग अलग। 

बोलने जब लगे पामाल लोग , 

कुछ नहीं कर सके वाचाल लोग। 

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,

देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।


Wednesday, 14 November 2018

कुछ भी समझ नहीं आता ( उलझन मन की ) डॉ लोक सेतिया

     कुछ भी समझ नहीं आता ( उलझन मन की ) डॉ लोक सेतिया 

    जब किसी से कोई गिला रखना , सामने अपने आईना रखना। शुरुआत अपने आप से करता हूं। लागा चुनरी पे दाग़ छुपाऊं कैसे , घर जाऊं कैसे। यकीन करें तो ये सत्ययुग ही है सभी भली भली बातें करने हैं ज्ञान की बातें करते हैं कितने सुंदर लगते हैं लिबास भी सज धज भी और आपस में बातें भी अच्छी अच्छी। मगर पल भर में भली बातें मुहज़्ज़ब लहज़े का रंग पहली बारिश में उतर जाते हैं। अब देखो अपनी बात कहने को किस किस की ग़ज़ल के शेर बिना पूछे उठा लिए हैं मगर मैं सच लिखता हूं ये भी दावा है जबकि सच लिखता उतना जितना साहूलियत है सुविधाजनक है। कल किसी ने कहा आप तो बहुत अच्छे व्यक्ति हैं मैं आपका काम तो बिना शुल्क लिए ही कर सकता हूं। सच सुन कर बेचैनी महसूस हुई क्या मैं भला आदमी हूं , अपने आप पर हंसी आई मुझे। लोग परेशान हैं मुझसे बचते हैं घबराते हैं जाने किस बारे क्या लिख देगा ये पागल आदमी। सोचते हैं मन ही मन खुद क्या दूध का धुला है। सच है ये हम सभी लोग ऐसे ही हैं जो होते हैं सामने दिखाई नहीं देता और जो समझते हैं वास्तव में बन पाते नहीं हैं। सोचता हूं अगर वास्तव में भगवान है और इक दिन जाना है किसी और दुनिया में और जाकर सामना करना है बाबुल का तो कैसे नज़रें मिला सकूंगा। अपनी बात लिख दी है अब बाकी दुनिया की कहनी है मुझे कुछ भी समझ नहीं आता ये दुनिया कैसी है। चलो सामने है आपको दिखलाता हूं। 
                                     सच के झंडाबरदार होने का दम भरने वाले कल खामोश नज़र आये और हर ऐरेगैरे के जन्म दिन की बात पर विस्तार से चर्चा करने वाले बालदिवस पर नेहरू जी को भूले भी नहीं मगर याद करने से बचते रहे। मौजूदा निज़ाम नहीं चाहता उसका कोई नाम भी लब पर लाये , चार साल पहले तक देश के दिलों की धड़कन बनकर राजनीति में सबसे लोकप्रिय होने वाले नेता को आज नायक से खलनायक घोषित करने की कोशिश कर खुद नया इतिहास रचने की जगह पुराना इतिहास मिटाना और बदलना चाहते हैं। क्या आपको आज के काल में जीना है और भविष्य की आधारशिला रखनी है या कुछ नहीं करना केवल पुराने इतिहास को दोहराना है गड़े हुए मुर्दे उखाड़ने की ओछी राजनीति करनी है। किसी को छोटा साबित करने से आप बड़े नहीं बन सकते हैं। जिसे आप समझ नहीं पाये जिस की सोच तक आपकी समझ जाती नहीं उस से मुकाबला करोगे उसके मर जाने के पचास साल बाद। भूत से डरते हैं लोग और इनको आज भी नेहरू जी भूत बनकर सताते हैं मगर गांधी जी का नाम और गोडसे की आरती एक साथ इनको भयमुक्त नहीं कर पाती है। राजनीति को इतना निचले स्तर तक ले आना देश को किधर ले जाएगा। मगर इनको ख़ुदपरस्ती की आदत हो गई है अपनी सूरत को सजाने में लगे हैं असली शक्ल कोई देखे तो कैसे।
                            बाबा जी हैं कहते हैं योग से सभी को निरोग कर दिया है कोई विश्व स्वास्थ्य संगठन से पता करे हुआ क्या है रोगी कम तो नहीं हुए अभी। कुछ बातें शोर बहुत होता है उनका मगर असलियत कोई नहीं समझता। विज्ञान अनुसंधान करती है तो सौ लोगों को कोई चीज़ अपनाने को और सौ को उसके बिना रहने को सामने रखते हैं और साल दो साल बाद देखते हैं उन दोनों में कितना अंतर है। और अगर अनुसंधान में कोई फर्क नहीं तो उसे उस काम के लिए उपयोगी नहीं मानते हैं। मगर जब बिना कोई अनुसंधान आपको झूठे दावे करने की सुविधा है इस देश में कोई जांच नहीं करने वाला आपके दावे की सच्चाई तो आप उल्लू बनाकर जो मर्ज़ी बेच सकते हैं। रोगी नहीं होने की बात भी और बिना डॉक्टर बने हर रोग की दवा बताने की बात भी एक साथ करना इतने कम समय में देखकर लगता है गीता के भगवान कृष्ण की तरह विराट स्वरूप होगा हज़ारों हाथ और मुंह खोलते ही सभी लोग अपने भीतर समाते हुए इक डरावनी सी मूरत। मगर इनकी हर वस्तु असली भी है और इनका मुनाफा भी समाज कल्याण पर खर्च किया जाता है। भाई पहले कमाई फिर भलाई में मिठाई खाने की बात समझ नहीं आई। समाज कल्याण करना है तो मुनाफा लेते ही क्यों हैं। ये धंधा सबको आता तो लोग गरीब रहते ही नहीं , मगर फिल्म वाले समझ नहीं पाए कि अमिताभ बच्चन और आमिर खान के रहते ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान कमाई क्यों नहीं कर पाई। अमिताभ जी वही हैं जो आपको खाने का स्वाद मसाले से होता है मां सबकी एक है का उपदेश देते हैं और चिंता मुक्त होने को तेल मालिश से शहद बेचने और आपके हाथ से आपका फोन लेकर आपकी डाउनलोड की एप्प्स को हटा इधर उधर क्यों जाते हैं जब उनकी बताई ऐप्प है। जनाब आप इधर उधर जिधर मन चाहे चले जाते हो वहीं टिके रहिये अभिनय करिये कितना पैसा चाहिए इस महानयक सदी के तथाकथित भगवान को। चलो छोड़ देते हैं आखिर तो इंसान ही हैं लोभ मोह अधिक की चाहत मिटती नहीं साधु संतों की भी।
       किस किस की बात की जाये , समाजसेवा वाले या न्याय वाले या कारोबार की लूट वाले सब हैं कुछ नज़र आते कुछ और हैं। मगर सरकार की और भगवान की बात किये बिना बात खत्म नहीं की जा सकती है। सरकार का काम क्या होता है उस चुनी हुई सरकार का जिसे जनता ने बनाया हो अपनी बदहाली का अंत करने का अच्छे दिन लाने का वादा करने पर। आप उसे कहोगे जाओ भगवान की शरण में अपनी समस्याओं को लेकर। उसके लिए पंडित मौलवी ज्ञानी साधु पहले से हैं आपको अपना काम करना था मौज मनाने को नहीं मिली थी सत्ता। अपने तो हद ही कर दी खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना , ये कोई किशोर कुमार की कॉमेडी है गरीबों से भद्दा मज़ाक किया है। नाम बदलने से सीरत नहीं बदलती और आपने देश की बुनियाद को उखाड़ने की सोच बना ली है जिस इमारत पर आज खुद को गुंबद की तरह देखते हो उसकी आधारशिला वो लोग हैं जिनकी आप उपेक्षा और अनादर करना चाहते हो। उन्होंने किया या नहीं किया कुछ भी इसका हिसाब लोग समझते हैं आपको अपना हिसाब देना है किया क्या है। झूठ का व्यौपार और खुद अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना ये करने लायक बात तो नहीं है। जिनको अपने खराब बताया उन्होंने कभी औरों को अपने आधीन गुलाम बनाने की सोच नहीं रखी मगर आपने जो आपको नहीं भाता उसे ध्वस्त करने का काम किया है। तोड़ना आसान है निर्माण करना कठिन है अपने जोड़ने की नहीं तोड़ने की बात की है। नफरत की गंदी राजनीति से कभी देश का भला नहीं हो सकता है।
              आखिर में भगवान की बात वो भी बिना किसी डर के साफ साफ। भगवान क्या यही धर्म है कि तेरे लिए मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे शानदार महल और सोना चांदी हीरे जवाहारात के भंडार जमा हों जबकि तेरे ही बंदे भूखे बेघर और बदहाल हों। ये किन लोगों का कारोबार है जो पढ़ाते हैं संचय मत करो दीन दुखियों की सहायता करो मगर आचरण में ऐसा नहीं करते हैं। जिनको खुद धर्म का पालन नहीं करना आता वही हम लोगों को धर्म की बात समझाते हैं। जितनी नफरत धर्म के नाम पर दिखाई देती है उस से लगता है धर्म की बात कहीं चालबाज़ लोगों का कोई जाल तो नहीं जो खुद भगवान से नहीं डरते बाकी लोगों को उसका भय दिखाकर अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं। सोशल मीडिया पर लगता है सब लोग धार्मिक हैं देवता समान हैं मगर वही लोग वास्तविक दुनिया में किसी राक्षस से कम नहीं लगते हैं। भगवान का नाम लेने से क्या होगा जब हर किसी से छल कपट धोखा और फरेब पल पल हर दिन करते हैं। जो दिखाना चाहते हैं सत्ययुग जैसा है पर जो वास्तव में दिखाई देता है कलयुग से भी खराब है। कुछ भी समझ नहीं आता कुछ भी नहीं।