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सितंबर 16, 2026

POST : 2118 प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

प्यास को हर जगह पानी लिखेंगे
हम अगर अपनी कहानी लिखेंगे । 
 
उम्र भर जो दर्द देते रहे हैं 
शुक्रिया लिख मेहरबानी लिखेंगे ।  
 
कोशिशें की भूल पाए न लेकिन 
फिर सभी बातें पुरानी लिखेंगे । 
 
कश्तियों को जो डुबोती हैं हर दिन 
रोज़ लहरों की रवानी लिखेंगे । 
 
क्या कहें कैसा नया दौर लगता 
राह से भटकी जवानी लिखेंगे । 
 
अश्क़ अपने सूख कब से गए हैं 
ख़ुश्क आंखों की ज़ुबानी लिखेंगे । 
 
लिख रहे ' तनहा ' नहीं लोग समझे 
एक दिन वो ख़ुद ही म'आनी लिखेंगे ।   
 

 
 
  

अगस्त 29, 2026

POST : 2117 हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
हम सभी से  , उम्र भर डरते रहे हैं 
कब जिए हम रोज़ बस मरते रहे हैं ।
 
दुश्मनी को दोस्ती का नाम दे कर 
दोस्ती की , इल्तिजा करते रहे हैं । 
 
खा के ठोकर भी नहीं संभले कभी हम 
फिर फ़िसल कर के , वहीं गिरते रहे हैं । 
 
था सुना  , कुछ लोग होते थे जहां में  
जो पराये  दर्द  को ,  हरते रहे हैं ।  
 
क्या किया सरकार ने कैसे बताएं 
खेत माली  सब यहां  चरते रहे हैं । 
 
कौन सच की बात करता है यहां पर  
झूठ से गागर सभी भरते रहे हैं ।  
 
नाख़ुदा बन कश्तियां ' तनहा ' डुबोते 
आसरा तिनके का , ले तरते रहे हैं ।    
 
 

 

अगस्त 23, 2026

POST : 2115 दोस्त कोई मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       दोस्त कोई  मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
दोस्त कोई  मिला नहीं
इस जहां से गिला नहीं । 
 
कौन शिकवा करे भला 
जब रहा सिलसिला नहीं । 
 
चल रहे सब अलग अलग  
एक भी  काफ़िला नहीं । 
 
अपना अपना नसीब है 
फूल दिल का ख़िला नहीं । 
 
हार सब आंधियां गईं 
एक पत्ता हिला नहीं । 
 
कल इमारत बुलंद थी   
आज साबुत शिला नहीं । 
 
देख ' तनहा ' उधर ज़रा  
बच सकेगा किला नहीं ।  
 

 
 
 
 
 
 
  

अगस्त 22, 2026

POST : 2113 जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं 
झूठ को सच भी बना देते हैं । 
 
बात क्या उनको बताई जाए 
राज़ ग़ैरों को बता देते हैं ।  
 
बात करते हैं अदावत की वो  
दोस्ती का यूं सिला देते हैं ।  
 
जो न पहुंचाए कभी मंज़िल तक 
रास्ता ऐसा दिखा देते हैं । 
 
लोग करते हैं सियासत हर दम 
जलते शोलों को हवा देते हैं । 
 
ज़हर हाथों से पिला कर हमको  
लोग  जीने की दुआ देते हैं ।  
 
ख़ुद गए जो छोड़ कर ' तनहा ' को 
बेवफ़ाई का गिला देते हैं ।  
 
 

 

अगस्त 19, 2026

POST : 2111 ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है 
मौत लेकिन सफ़र सुहाना है । 
 
ज़िंदगी ख़्वाब इक अधूरा सा 
नींद खुलते ही टूट जाना है ।   
 
वक़्त को कौन रोक पाया है 
जो नया आज कल पुराना है । 
 
थे जो अपने ,  हुए पराये हैं 
याद करना नहीं , भुलाना है ।
 
हो गई इन्तिहा सितमगर अब  
क्या सितम और तुमने ढाना है । 
 
आ सको आज तो चले आओ 
कल किसी ने नहीं बुलाना है । 
 
चल दिए शहर छोड़ कर ' तनहा '  
क्या , कहीं और भी ठिकाना है ।   
 

 

अगस्त 12, 2026

POST : 2106 सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

  सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं  
कहानी ज़ालिमों की , दोहरा रहे हैं ।  
 
है जिन के हाथ में , इंसाफ़ का तराज़ू 
वही कानून के , पुर्ज़े उड़ा रहे हैं ।  
 
बुरा था वक़्त जब तब दूर हो गए थे 
नये हालात में , खुद पास आ रहे हैं ।
 
सुना तो रूह तक भी कांपने लगी है 
न जाने , लोग कैसे गीत गा रहे हैं ।   
 
उन्हीं के सामने क्यों हाथ जोड़ते हो 
तुम्हारी बस्तियों को जो जला रहे हैं । 
 
नहीं कीमत यहां पर जान की रही अब 
जो हैं ज़िंदा उन्हें मुर्दा बता रहे हैं ।
 
सियासत देख उनकी कह रहे हैं ' तनहा '
इशारे आपके  ,  सबको डरा रहे हैं । 
 

 
 


  

अगस्त 05, 2026

POST : 2101 इस देश को तुमने बहुत बर्बाद किया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 इस देश को तुमने बहुत बर्बाद किया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

इस देश को तुमने बहुत बर्बाद किया है 
हैं कौन जिनको आपने आबाद किया है । 
 
समझा तुम्हें था दोस्त तुम दुश्मन हो सभी के 
इंसाफ कैसा आपने ईजाद किया है । 
 
जो बात सबको याद  है तुम भूल गए हो 
तुमको पता है क्या कहां इरशाद किया है । 
 
बन कर सभी का चारागर  बस ज़हर पिलाया 
हर रोज़ ऐसा आपने उन्माद किया है । 
 
अर्थी शहीदों की पे कितने फूल चढ़ाए 
होता यही हर बार कुछ अपवाद किया है । 
 
ताउम्र सबको आपने जो अश्क़ दिए हैं 
उसका असर है जो तुम्हें नाशाद किया है । 
 
की क्या ख़ता कोई कभी ' तनहा ' ने बताओ 
कुछ तो कहो उसने कभी प्रमाद किया है ।  
 

 
 


 
 


 

अगस्त 03, 2026

POST : 2100 कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

      कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं
ये आलम अब सहा जाता नहीं । 
 
हुई सब कोशिशें , नाकाम हैं 
मगर मुश्किल से घबराता नहीं । 
 
जो आये मौत मर हम जाएंगे 
उठा कर ज़हर ख़ुद खाता नहीं । 
 
गिला हमसे सदा सब को रहा 
उन्हें जो चाहिए लाता नहीं । 
 
था जितना पास सबको बांट कर
कहा ख़ुद को , कभी दाता नहीं । 
 
अभी भी , क़र्ज़ , कितना और है
कभी बदले में , कुछ पाता नहीं । 
 
जहां ' तनहा ' बहुत दिलकश मगर 
करें क्या , हमको जो भाता नहीं । 
 

 


   
 
 
 

जुलाई 29, 2026

POST : 2094 यही सबसे बड़ी उनकी तो टेंशन है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   यही सबसे बड़ी उनकी तो टेंशन है  ( ग़ज़ल  ) डॉ लोक सेतिया

यही सबसे बड़ी उनकी तो टेंशन है 
हमेशा जीतना हर इक इलेक्शन है ।   
 
नहीं सरकार को इंसान लगते वो     
ये सारे लोग वोटों का कलैक्शन है । 
 
भले कुछ भी कहे जनता हमें क्या है  
हमारा काम करना बस करप्शन है । 
 
सियासत साफ़ सुथरी हो भला कैसे 
यहां सबको शराफ़त से रिएक्शन है । 
 
हुआ क्या क़त्ल जो तुमसे हुआ कोई 
तुम्हारा शासकों से गर कनैक्शन है । 
 
कहे सरकार जो भी तुमको करना है 
तुम्हारे वास्ते ही  , नोमिनेशन है । 
 
नतीजा जांच का ' तनहा ' बताए क्या 
नहीं होता कभी कोई भी एक्शन है ।  
 
 

 
 


 
 

जुलाई 23, 2026

POST : 2089 हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

हमें जो ज़िंदगी ने ना सताया होता 
उसे हमने भी दुल्हन सा सजाया होता । 
 
मुस्कराना हमें भी आ गया होता , गर 
गले हमको कभी अपने लगाया होता । 
 
किसी तस्वीर की तकदीर बनती हाथों 
ब्रश जो हाथ में मेरे थमाया होता । 
 
मेरी आवाज़ से आवाज़ जो मिल जाती 
सुरीला राग मिलकर साथ गाया होता । 
 
तुझी से हम शिकायत क्यों तुम्हारी करते 
था जितना बोझ मिलकर जो उठाया होता । 
 
बिना मांगे मुहब्बत मिल ही जाती हमको  
तुम्हारे सामने सर ना झुकाया होता । 
 
कभी ना मौत को आवाज़ ' तनहा ' देते 
किसी का साथ उनको रास आया होता । 
 

 

जुलाई 16, 2026

POST : 2085 ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे 
जब किनारे पास आते रहे । 
 
अजनबी सब लोग भाये हमें
जो थे अपने वो सताते रहे । 
 
पास , चाहे दूर सबसे रहे 
प्यार की रस्में निभाते रहे ।  
 
आप पंछी की तरह उड़ गए 
मौसमों से आते - जाते रहे । 
 
उनको आना था न आये कभी 
ख़्वाब में आ कर सताते रहे ।  
 
कल कहां था दिल कहां आज है 
ख़ुद ही खोकर दिल को पाते रहे । 
 
बेख़बर लहरों से ' तनहा ' रहे 
रेत के घर  , फिर बनाते रहे । 
 

 
  
 

जुलाई 15, 2026

POST : 2084 आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

आईना झूठ बोलने लगा है 
वो तराज़ू भी डोलने लगा है । 
 
अपनी कीमत बड़ा-चढ़ा रहे सब 
अपने को आप तोलने लगा है । 
 
हर तरफ लूटमार हो रही है 
अब लहू सबका खौलने लगा है ।  
 
क्या सियासत की बात पूछते हो 
फिर वही  ज़हर घोलने लगा है । 
 
चोर को छोड़ कोतवाल अब तो 
रह गया कुछ , टटोलने लगा है । 
 
चीज़ अनमोल मिल गई किसी को 
धूल में उसको  रौलने लगा है । 
 
जान से हाथ धोएगा किसी दिन 
' लोक ' सच रोज़ बोलने लगा है ।  
 

 

जुलाई 14, 2026

POST : 2083 हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
हर किसी के अहसान बहुत
दिल के बाक़ी अरमान बहुत । 
 
सीखना क्या है , सीख लिया 
झूठ - सच की , पहचान बहुत । 
 
बस हमीं रहते घर पे सदा 
आते - जाते महमान बहुत । 
 
हमको महफ़िल में देख वहां  
हो गए सब , हैरान बहुत । 
 
मिल रहा बस इंसान नहीं 
मिल ही जाते शैतान बहुत । 
 
कुछ शराफ़त का मोल नहीं 
बिक रहे हैं , ईमान बहुत । 
 
ग़म - ख़ुशी ' तनहा ' एक यहां 
भावनाएं ,  बेजान बहुत ।     
 

 

जुलाई 06, 2026

POST : 2082 लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं  
लोग कुछ इस तरह भी जीते हैं । 
 
चारागर ढूंढते नहीं हम तो 
आप अपने ही ज़ख़्म सीते हैं । 
 
मयकदे में भी बैठे प्यासे हैं 
जाम मिलते ही जिनको रीते हैं । 
 
हम ख़िज़ा को बहार कह देते 
दिन युंहीं ज़िंदगी के बीते हैं । 
 
माल चोरी का बिक रहा ऐसे 
माप करने को बांस फीते हैं । 
 
आपको फ़ल मिला उसी का है 
कर्म जैसे भी रोज़ कीते हैं । 
 
पूछते लोग कौन ' तनहा ' हैं 
कुछ नहीं हम तो सिर्फ़ मनमीते हैं । 
 

  

जुलाई 05, 2026

POST : 2081 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 

मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं 
ख़ुद को कभी भी देखता ही नहीं ।  
 
हर रोज़ झूठ बोलते लोग पर 
ये बात कोई मानता ही नहीं । 
 
धनवान को तो सब हैं पहचानते 
मुफ़लिस को कोई जानता ही नहीं । 
 
इक रोज़ मर के जाएंगे सब समझ 
हर क़र्ज़ हो सका अता ही नहीं ।  
 
ज़िंदादिली से ज़िंदगी को जिएं  
थक टूट कर भी हारता ही नहीं ।  
 
खामोश रह के ज़ुल्म सहते रहे 
जो बोलना है बोलता ही नहीं । 
 
' तनहा ' बता जहान में कौन है 
जिस ने कभी भी की ख़ता ही नहीं। 
 

 

जून 20, 2026

POST : 2077 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

बिकते जहां पे नेता , बाज़ार मिल गया है
भटके हुओं को आखिर घर- बार मिल गया है ।   
 
अपना नसीब इक दिन शायद बदल ही जाए 
हलवा उन्हें  , हमें बस आचार मिल गया है । 
 
जितने गुनाह उनके सब माफ़ हो गए हैं 
देखो यहां खुला इक दरबार मिल गया है । 
 
सोना जहां पड़ा था , दौलत जहां पड़ी थी 
सब लुट गया है ख़ाली भंडार मिल गया है । 
 
जंगल में अब भी बाक़ी कुछ पेड़ तो खड़े हैं 
कुछ लोग कह रहे हैं विस्तार मिल गया है । 
 
देखो यहां नया इक भगवान आ गया है 
लो आपको ये सारा संसार मिल गया है । 
 
सच बोलना मना है ' तनहा ' न कुछ भी कहना 
बस झूठ लिख रहा है अख़बार मिल गया है ।  
 

 

मार्च 17, 2026

POST : 2071 फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
 
फिर वही सिलसिला हो गया 
बोला सच , वो खफ़ा हो गया । 
 
ज़िंदगी का मैं बोझा लिए 
आदमी से गधा हो गया । 
 
आई कश्ती जो मझधार में 
नाख़ुदा ही ख़ुदा हो गया । 
 
हाल दिल का न पूछे कोई 
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।  
 
हमने इल्ज़ाम सर पर लिया 
क़र्ज़ जितना , अदा हो गया । 
 
हम खड़े थे , खड़े रह गए 
इस तरह वो जुदा हो गया । 
 
ख़ुश है ' तनहा ' उसे देख कर 
दोस्त कितना बड़ा हो गया ।  
 
 

 
 

मार्च 16, 2026

POST : 2070 241 ( Repeat ) ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।  
 

 

मार्च 14, 2026

POST : 2069 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती  
ऐसी कोई  ,  मुलाक़ात और होती ।  
 
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
 
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें 
होता दिन और , वो रात और होती । 
 
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे 
झोली में वरना ख़ैरात और होती । 
 
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता 
ऐसे दूल्हे की , बारात और होती ।  
 
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही 
खेले हम होते , शह - मात और होती ।  
 
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई 
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।  
 

 
   

मार्च 13, 2026

POST : 2068 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

सच कोई किसी को बताता नहीं 
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।  
 
कहना तो आसां है मगर फिर भी 
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं । 
 
हम से वो हमारा पता जान कर 
नाम तक भी अपना बताता नहीं । 
 
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे 
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । 
 
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल 
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं । 
 
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर 
लौट के वहां से कोई आता नहीं । 
 
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग 
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।