अप्रैल 30, 2023

72 साल की दास्तां ( मुसाफ़िर हूं मैं राहों का ) डॉ लोक सेतिया

         नहीं उदास नहीं ( सफ़रनामा ) डॉ लोक सेतिया 

    कुछ उथल-पुथल सी है मन में , बस जाने क्यूं लिखना चाहता हूं या फिर शायद समझना , जीवन के सफ़र को लेकर सोचना चाहता हूं किधर से चलते चलते कहां आ गया हूं और किस तरफ जाना है । ज़िंदगी के मोड़ आते रहते हैं और रास्ते ढूंढते ढूंढते बढ़ते रहते हैं सवाल उम्र की गिनती का नहीं खोया क्या पाया क्या का भी नहीं थोड़ा ठहर कर आंकलन करने का होता है । लगता है मिला बहुत है शायद नसीब से बढ़कर और मेरी काबलियत कोशिश मेहनत से भी ज़्यादा ही इसलिए किसी से भी कोई गिला शिकवा नहीं ऊपरवाले से भी शिकायत का अधिकार नहीं । फिर भी इक ख़ालीपन-सा अथवा  कुछ अधूरापन का एहसास-सा  है जिस का कारण मुझमें कुछ कमियां हमेशा रहीं हैं चाहता हूं  कुछ , और हालात कुछ और करने को विवश करते हैं । सब पास है फिर भी इक प्यास है चाहत की प्यार दोस्ती मुहब्बत की जो हासिल होता भी है लेकिन जहां से चाहते हैं वहीं से क्यों नहीं होता । मुझे नहीं शिकायत किसी से भी बस अफ़सोस है हर शख़्स को मुझसे शिकायत क्यों है लाख कोशिश कर के भी उम्र भर किसी को भी उतना नहीं दे पाया जितना सबको उम्मीद रही है मुझसे मिलने को । मुझे जिस की चाहत या ज़रूरत रही है वो खूबसूरत जहां कल्पना हो सकता है वास्तविकता में कहीं मिलना संभव ही नहीं , बस अपनी वही दुनिया बनाने तलाश करने में ज़िंदगी बिताई है तभी शायद असली दुनिया का सब छूट गया है । वास्तविक दुनिया ज़माने से नाता ठीक से बना ही नहीं बनते बनते टूटता रहा है । 
 
 अजब दुनिया है निराले दस्तूर हैं हर किसी को शर्तों पर ज़िंदगी मिलती है समाज देश दुनिया किसी को उसकी मर्ज़ी से जीने की आज़ादी नहीं देते हैं । बिना अपराध सभी गुनहगार बनकर खड़े रहते हैं जनाब कृष्ण बिहारी नूर की ग़ज़ल सच कहती है  ' ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं , और क्या जुर्म है पता ही नहीं '। मैंने चाहा ऐसी दुनिया बनाना जिस में कोई किसी को बड़ा छोटा ऊंचा नीचा ख़ास आम कुछ भी भेदभाव नहीं करता हो किसी को किसी से बिल्कुल भी नफ़रत नहीं हो हर इंसान जैसा है उसको उसी तरह से अपनाया जाए अपनों को ही नहीं बेगानों को भी अपनाया जाए । जीवन की यादें बहुत हैं कुछ खट्टे मीठे अनुभव भी सब को होते हैं परेशानी यही है क्यों लोग बाक़ी लोगों से चाहते हैं कि जैसा उनको पसंद है उसी तरह से जिएं । ऐसा मुमकिन ही नहीं कि कोई भी सबकी पसंद पर खरा साबित हो सके जितने संगी साथी जितने दोस्त जितने रिश्ते सबकी ख़्वाहिश को देख जीने लगते हैं तो खुद अपनी ख़्वाहिशों को दफ़्न करना पड़ता है । समझौतों पर ज़िंदगी जीना ऐसा लगता है जैसे हर सांस की कीमत चुकानी पड़ती है ।  

    72 साल की उम्र बहुत होती है लेकिन इतने बरसों में ज़िंदगी को जिया है या उम्र गुज़ारी है ये समझ नहीं आता बड़ा कठिन सवाल है । दिल चाहता है सब को सब कुछ जो भी ज़रूरी है देना , मगर क्या सब अपने बस में है शायद नहीं , हां कोशिश है चाहता हूं पर होगा कितना कितना नहीं संभव होगा नहीं जानता । हमेशा दिल में इक  बात रहती है कि सभी से इस बात की क्षमा मांगना कि जो भी उनकी आपेक्षा रही नहीं कर पाया या जिस भी कारण से किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची उस की माफ़ी चाहता हूं , पर कभी कभी ये भी होता है कि अकारण खफ़ा हुए लोग इस को गलती स्वीकार करना और बिना अपराध किए  दोषी साबित होने का प्रमाण मान कर और भी सितम ढाते हैं ।  अधिक सफाई देना भी खुद को गुनहगार बनाने जैसा लगता है लोग शराफ़त को शराफ़त  समझते नहीं और सोचते हैं उनको अधिकार है किसी को नीचा दिखला कर खुद को ऊंचा दिखाने का । निभाना अच्छी बात है पर हम ही रिश्ते नाते दोस्ती से सभ्य ढंग और शिष्टाचार निभाते रहें और लोग हमसे अनुचित और अशोभनीय व्यवहार करते रहे ऐसा कब तक सहना मुमकिन है । इक सीमा से अधिक किसी के गलत आचरण को अनदेखा करना खुद अपने स्वाभिमान को क्षति पहुंचाता है । अब लगता है सबको लेकर बहुत सोचा और अपनी मर्ज़ी को अनदेखा कर दुनिया की समझाई राहों पर चलते चलते वहां पहुंच गए जहां सामने कोई मोड़ तो क्या सभी रस्ते बंद दिखाई देते हैं । शायद अपनी कविता की डायरी की शुरूआती कविता फिर से पढ़ने की ज़रूरत है ताकि ज़िंदगी की किताब या डायरी के बाक़ी बचे खाली पन्नों पर जो लिखना है मुझे वो लिखना भी है और उसी दिशा को ज़िंदगी को अपनी नई राह बनाकर आगे बढ़ाना भी है । ज़िंदगी जीने की शुरुआत अभी भी संभव है सोचता हूं आज 72 साल का होने पर ।

मुझे लिखना है  ( कविता ) 

कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या ।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या ।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या ।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या ।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या ।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या ।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या ।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या ।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या ।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की ।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की ।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहां ।

बस खुशियां ही खुशियां हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों ।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में । 
 

 
 

अप्रैल 29, 2023

ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया

    ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया 

       भूल जन की बात करते मन की बात  , सुन चुके सब आपकी ठन ठन की बात ।   

        ख़त्म आखिर एक दिन होगा सब खेल  , क्या मिटेगी भूख सुन राशन की बात ।    

  
कोई उनको दिलाए याद अहले वतन की बात , देश पर न्यौछावर करेंगे तन मन धन की बात । कब तलक कोई सुनेगा बिना बारिश बदल से घन घन की बात । बिजलियों से गुफ़्तगू करते जो लोग जानते कब भीगे किसी सावन की बात । अपने मन की बात जानते हैं सभी लोग , ज़माने को मन की बात सच सच कोई भी बताता नहीं है यही फ़ासला है जनता और सत्ता का झूठ मीठा लगता है सच भाता नहीं है । ईमानदार कभी नज़रें चुराता नहीं आईना झूठ को कभी भाता नहीं आपकी महफ़िल की कोई बात क्या करे घना अंधेरा है कोई दिया जलाता नहीं । सच कहने की यही उलझन है दिल में रहता लबों तक आता नहीं , हमसे नाम पता ठिकाना सब जान कर कौन है वो क्या है बतलाता नहीं । दर्द सहते रहो मुस्कुराते रहो , रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । पत्थरों के शहर को जाने वाले , वहां से वापस लौट कर कोई आता नहीं । कल इक फूल ने किया अर्थी से अजब सवाल , दुल्हन को कोई इतना सजाता नहीं । दवा कह कर खिलाते हैं कुछ चारागर , ज़हर जान बूझ कर कोई खाता नहीं । ज़मीं है अपनी न कोई आसमान अपना है कहने को तो सब जहान अपना है । सोचने की बात है सब सोचना क्या यही हिंदुस्तान अपना है । अपना देश अपनी रिवायत अपनी सियासत कुछ और थी बचाना सब है ये इम्तिहान अपना है । बंद तालों को खोल कर देखो क्या लुट गया सारा सामान अपना है । 
 
   क़त्ल वो बार बार करता रहा , खुद ही मैं उस के हाथों मरता रहा । रह न जाएं कहीं निशां बाक़ी कत्ल के , सोच कर क़ातिल की ख़ातिर मैं डरता रहा । ख़ुदकुशी करने का ख़त था जेब में , याद मज़मून उस का करता रहा । प्यार मुझको बहुत आया क़ातिल पर , खुश रहना यही दुआ करता रहा । वक़्त-ए -रुख्सत पशेमान भी था वो , ज़िक्र मज़बूरियों का करता रहा । उसको सब हुनर जीतने के आते थे , हारना आता था मुझे हर कोई हरता रहा । मुझे भी प्यास थी बहुत लगी ज़हर के जाम , पीता गया वो भरता भरता गया । बात अपनी अपने मन में रही , उनकी खुशबू अहले चमन में रही । सबको मिली सज़ाएं सरकार तेरे दर पे  , हम बेगुनाह खड़े बन फिर गुनहगार तेरे दर पे । झूठी उम्मीदों पर ज़िंदा हैं पर कब तक , कहते फिरेंगे ठोकर खाने वाले , बार बार तेरे दर पे । ये क्या किया है तुम कहते थे हो मसीहा सताया कितना , कोई नहीं करेगा कभी देखना दोबारा ऐतबार तेरे दर पे । उनके मन की बात कुछ और है ये सियासत का नया तौर है नाचता उनका मनमोर है हर किसी का नहीं चलता ज़ोर है शोर थम गया है सन्नाटा हर ओर है कटी पतंग लूटने वालों के हाथ देश की बागडोर है । 
 
आपको बनाया रहनुमा जनता को मिला बनवास है , कहते हैं खुद को कौन हूं मैं बताओ सत्ता का कॉमेडी शो है गरीबों का पल पल उपहास है । सुहानी शाम राजनीति की जनता की सुबह उदास उदास है मौसम का बदला मिजाज़ है आंधी तूफ़ान कभी गर्म हवाएं आपके महलों की रौनक क्या कहे कोई ये भी कोई मधुमास है । खोटे सिक्कों से शराफ़त खरीदना दस्तूर उनको रास है । पल पल हार जीत की बाज़ी का खेल है , तय करने को होने लगा टॉस है । बदलती हैं तारीख़ें तकदीरें नहीं बदलती दिल्ली बहुत दूर है वाशिंगटन कितनी पास है । भीड़ बन कर खो बैठे हैं अपनी पहचान सभी लोग , और ऊंचे मंच पर खड़ा अजनबी चेहरा उनका बड़ा ही ख़ास है । खुले आम क़त्ल करने वाले कैद से रिहा हुए जब उनकी जय-जयकार होने लगी लिखना नया इतिहास है न्याय का पलड़ा बराबर होता ही नहीं इस तरफ सत्ता का बोझ उस तरफ इंसाफ़ है । मन की बात क्या बताएं मन बड़ा चंचल होता है आदमी करता इबादत मन किसी बाज़ार में भटकता होता है । उनके मन की बात कोई नहीं जानता न कभी कोई समझेगा शायद फिर भी मन को पा लिया तो ईश्वर को पा लिया इक फ़िल्मी भजन की शुरुआत है , प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस बिधि पाऊं तोहे , प्रभु कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे । चलो पूरा भजन सुनते हैं मन क्या है समझते हैं । 

तोरा मन दर्पण कहलाये  तोरा मन दर्पण कहलाये भले बुरे सारे कर्मों को ,  देखे और दिखाये ।

मन ही देवता , मन ही ईश्वर , मन से बड़ा न कोयमन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय

इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये । 

तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये 

सुख की कलियाँ , दुख के कांटे , मन सबका आधारमन से कोई बात छुपे ना , मन के नैन हज़ार 

जग से चाहे भाग लो कोई , मन से भाग न पाये ।

तोरा मन दर्पण कहलाये ,  तोरा मन दर्पण कहलाये ।

भले बुरे सारे कर्मों को , देखे और दिखाये

तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये ।

 

  

अप्रैल 21, 2023

बोझ ढोते झूठी विरासत का ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

     बोझ ढोते झूठी विरासत का ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

ख़ुद आप क्या विरासत छोड़ जाओगे , सोचने लगे तो घबरा जाओगे । पाया क्या क्या खोया अपने गणित में उलझ कर शून्य अंक से आगे बढ़ नहीं सकोगे झूठी बातों को सच समझते समझते झूठों की सरकार कहलाओगे । जिस झूठी विरासत का बोझ ढोते ढोते हम मरते हैं जी नहीं सकते उस की असलियत कब तक खुद से हर किसी से छुपाओगे । ज़िंदगी भर इंसान भी नहीं बन कर रहे शैतान को भी मात देते रहे बाद मरने फ़रिश्ता कहलाने की आरज़ू में अपने चेहरे पर कितने नकाब लगाओगे कभी आईना देख लिया तो अपनी सूरत नहीं पहचान पाओगे । जिसे देखो बताता है हमें यही विरासत मिली है उसी को आगे बढ़ाना है मानो कोई बड़ा अनमोल खज़ाना है छुपाना है कि दिखाना है । अंधों की बस्ती है राजा है जो काना है , दुनिया अंधेर नगरी है , हमने अंधों को अपना इतिहास पढ़वाना है । जो उल्लू बनाता है ज़माने को इक वही बस स्याना है । 

  हम ख़ानदानी लोग हैं ख़ुशनसीब हैं नाम वाले हैं चाहे कितने ही बदनाम हैं , आम लोग झूठे मक्क़ार दगेबाज़ बेईमान हैं हम सब गुनाह कर के भी नादान हैं अपनी आन बान शान है । बड़े लोगों के बाबूजी होते थे बाक़ी के पिताजी बापू की बात क्या औकात क्या सूखा और बरसात क्या । कोई बताता है उनकी दरबार में बड़ी ऊंची शान थी ज़मींदार साहिब की अपनी ज़ुबान थी अंग्रेजी हुकूमत से मिला ख़िताब था नवाब साहिब का रुतबा जनाब था । ख़ास लोग अपने से बड़े कद वालों के सामने सर झुकाते हैं तलवे चाटते हैं हैसियत बढ़ाते हैं । ये बात कोई नहीं जानता सब से छुपाते हैं छुपते छुपाते बदनाम गलियों में जाते हैं शराफ़त को छोड़ जो भी चाहे करते हैं गुलछर्रे उड़ाते हैं । अंधेरों में जीते हैं उजालों से नज़र बचाते हैं हम रसूख़दार लोग सब पर हुक़्म चलाते हैं पर अक्सर किसी आहट से डर कर अपने ही पिंजरे में क़ैद होकर ज़िंदगी बिताते हैं । अपनी तथाकथित झूठी विरासत के गुणगान करने वाले बेहद मतलबी और स्वार्थी ही नहीं होते बल्कि वक़्त आने पर गधे को बाप और बाप को गधा बना सकते हैं । शूरवीरता के किस्से सुनाने वाले सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस नहीं दिखलाते और हवा का रुख देख बदल जाते हैं । आपको इक ताज़ा ग़ज़ल सुनाते हैं क्योंकि समझदार इशारों को समझ जाते हैं ।  

                                   ग़ज़ल

विरासत बोझ बनती जा रही है 
सियासत बस यही समझा रही है ।  

करेंगे ज़ुल्म  दहशतगर सभी पर 
वो चुप रहने के गुर सिखला रही है । 

सभी भूखे मनाओ मिल के खुशियां 
हां सबको याद नानी आ रही है । 

नचाती सबको तिगनी नाच सत्ता 
वीभस्त राग सुर में गा रही है । 

हुक्मरानों की बातें राज़ हैं सब 
बुढ़ापों पर जवानी छा रही है । 

थी जनता आ गई झांसों में उनके 
उन्हें दे वोट खुद पछता रही है । 

करो मत बात आदर्शों की  ' तनहा '
रसातल तक पहुंचती जा रही है । 
 

 

विरासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   विरासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

विरासत बोझ बनती जा रही है 
सियासत बस यही समझा रही है ।  

करेंगे ज़ुल्म  दहशतगर सभी पर 
वो चुप रहने के गुर सिखला रही है । 

सभी भूखे मनाओ मिल के खुशियां 
हां सबको याद नानी आ रही है । 

नचाती सबको तिगनी नाच सत्ता 
वीभस्त राग सुर में गा रही है । 

हुक्मरानों की बातें राज़ हैं सब 
बुढ़ापों पर जवानी छा रही है । 

थी जनता आ गई झांसों में उनके 
उन्हें दे वोट खुद पछता रही है । 

करो मत बात आदर्शों की  ' तनहा '
रसातल तक पहुंचती जा रही है । 
 

 

अप्रैल 20, 2023

ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां 
नहीं कोई खबर रहती कहां खुशियां । 
 
जुदा होकर मिलन होगा किसी दिन तब 
रहेंगी फिर हमारे दरमियां खुशियां । 
 
जहां पर दर्द का बाज़ार सजता है 
ज़माना ढूंढता फिरता वहां खुशियां । 
 
सभी से प्यार अपनी तो हक़ीक़त है 
नहीं शायद हमारी दास्तां खुशियां । 
 
न जाने कब से हम इंतिज़ार करते हैं 
कभी आएं हमारे घर यहां खुशियां । 
 
हमेशा ख़्वाब देखे , जागते सोते 
यकीं लगती कभी लगती गुमां खुशियां ।  
 
किसी दिन इस जहां को छोड़कर ' तनहा '
रहेंगे जा वहीं मिलती जहां खुशियां । 
  


अप्रैल 19, 2023

यह नया दौर है हर तरफ शोर था ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    यह नया दौर है हर तरफ शोर था ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

यह नया दौर है हर तरफ शोर था
इक अंधेरा घना सा चहुंओर था । 
 
साए में ख़ौफ़ के जी रहे थे मगर 
थम गई धड़कनें दिल ही कमज़ोर था । 
 
कल थे इनकी तरफ आज उनकी तरफ 
क्या बताए कोई कौन किस ओर था । 
 
आंख खोलो नज़र रौशनी आएगी 
जाएगा छट अंधेरा जो घनघोर था। 
 
पूछना मत हुआ क्या जुदा जब हुए 
मैं था उसकी पतंग वो मेरी डोर था । 
 
सुन के फ़रियाद उसने किया फ़ैसला 
घर का मालिक है जो ख़ुद वही चोर था । 
 
सच कभी भी पराजित न ' तनहा ' हुआ 
झूठ ने तो लगाया बड़ा ज़ोर था ।  



 


अप्रैल 18, 2023

सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 21-07-2003

  सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

सच बोलना तुम न किसी से कभी 
बन जाएंगे दुश्मन , दोस्त सभी । 
 
तुम सब पे यक़ीं कर लेते हो 
नादान हो तुम ऐ दोस्त अभी । 
 
बच कर रहना तुम उनसे ज़रा 
कांटे होते हैं , फूलों में भी ।  

पहचानते भी वो नहीं हमको 
इक साथ रहे हम घर में कभी । 

फिर वो याद मुझे ' तनहा ' आया 
सीने में दर्द उठा है तभी ।
 

 


बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

बेदिली से दुआ की है
तुमने भारी खता की है ।

मारकर यूं ज़मीर अपना
खुद से तुमने जफ़ा की है ।

बढ़ गया है मरज़ कुछ और
ये भी कैसी दवा की है ।

तुम सज़ा दो गुनाहों की
हमने ये इल्तिज़ा की है ।

बिक गये चन्द सिक्कों में
बात शर्मो-हया की है । 

 

कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।

वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।

हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।

ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।

लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।

 

जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जो भूला लोकतंत्र आचार 
हुई सत्ता की जय जयकार ।

चुना था जिनको हमने , वही
बिके हैं आज सरे-बाज़ार ।

लुटा कर सब कुछ भी अपना
बचा ली है उसने सरकार ।

टांक तो रक्खे हैं लेबल
मूल्य सारे ही गए हैं हार ।

देखिए उनकी कटु-मुस्कान
नहीं लगते अच्छे आसार ।

 

अप्रैल 17, 2023

कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे ( सूरते हाल ) डॉ लोक सेतिया

  कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे ( सूरते हाल ) डॉ लोक सेतिया

                             यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे

                            कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे ।

                            बचाता हमें कौन लूटा सभी ने

                            बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे ।

ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई न ही आखिरी बार हो इस की किसी को चिंता है , कभी वक़्त था शहर गांव में कोई कोई समझदार समझा जाता था । आजकल सब समझदार बने हैं सोशल मीडिया पर मनचाही ब्यानबाज़ी करते हैं अधिक गहनता से सोचना समझना फ़िज़ूल लगता है क्योंकि किसी का कोई उत्तरदायित्व नहीं है । लेकिन क्या हमारे देश में सही गलत कुछ भी कहीं कैसे होता है उस के लिए सरकार सरकारी संगठन संस्थाएं प्रशासन न्यायपालिका से सुरक्षा को नियुक्त कितने अलग अलग विभाग अपना पल्ला झाड़ सकते हैं । यही वास्तविक सवाल है संसद विधानसभाओं से लेकर पुलिस अदालत तक सभी पर कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता कि कितना धन कितने साधन संसाधन खर्च किए जाते हैं अगर ये देश के नागरिक की कोई भलाई नहीं कर सकते बल्कि कड़वा सच है करना ही नहीं चाहते तब इनकी आवश्यकता क्या है । ये गरीब देश बदहाली सहकर भी क्यों इतने सफेद हाथियों को पालते रहने को मज़बूर है । सालों तक अपराधी पकड़े नहीं जाते उनको सज़ा नहीं दिलाई जा सकती बल्कि कितने अपराधी उच्च पदों पर नियुक्त या निर्वाचित हैं और जिस पुलिस को उनको गिरफ़्तार करना है वही उनकी सुरक्षा को तैनात ही नहीं बहुधा उनके तलवे चाटती दिखाई देती है । किसी अपराधी से कोई सहानुभूति कदापि नहीं हो सकती लेकिन जिन गुनहगारों को पुलिस और अदालत सज़ा देने में सालों साल विलंब करती है खुला छोड़े रहती है उन्हीं को कुछ बदमाश पुलिस की हिरासत में खुले आम क़त्ल कर देते हैं तो देश का कानून न्यायपालिका के लिए गौरव की बात नहीं है बल्कि साबित होता है कि उनका होना नहीं होना इक समान है ।   

कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।

वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।

हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।

ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।

लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।

देश की जनता की बेबसी और सहनशीलता की भी सीमा होती है लोग आखिर कब तक झूठे वादों के भरोसे ज़िंदा रह सकते हैं । इंसाफ़ की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी है लेकिन उसको सब दिखाई देता है जो उस को देखना पसंद है और जो शासक धनवान ख़ास वर्ग चाहता है दिखाना बस उन को राहत मिलती है बात न्याय की नहीं है उनकी परेशानी को जांचे परखे बिना दूर करना लाज़मी है क्योंकि उनकी पहुंच उनका पैसा उनको सब उपलब्ध करवाता है न्याय भी उनको पहले मिलता है ये विडंबना ही है । गंभीर अपराधी को सज़ा नहीं देने वाली अदालत किसी की अवमानना के मुकदमे को जब जैसा शिकायत करता चाहे सुनती है और फैसला भी तुरंत करती है । अचरज की बात है किसी पर सबसे बड़ी अदालत की अवमानना साबित होने पर एक रुपया जुर्माना सज़ा देते हैं तो किसी पर दो साल की जेल की सज़ा , ये क्या दिखाई नहीं देता न्याय के तराज़ू का पलड़ा बराबर नहीं है । बादशाहों के ज़ुल्म और इंसाफ़ में बहुत कम अंतर होता है मुगले आज़म का इक डायलॉग है । 

सवाल सिर्फ पुलिस और कानून व्यवस्था का ही नहीं है सरकारी तमाम विभाग सामन्य नागरिक से कभी आदर पूर्वक तो क्या इंसानियत का व्यवहार तक नहीं करते हैं । साधारण दस्तावेज़ पाने को बनवाने को कलर्क से लेकर बड़े अधिकारी तक इतना परेशान करते हैं कि आदमी की आधी ज़िंदगी इनकी लापरवाही और मनमानी की भेंट चढ़ जाती है । सरकारी दफ़्तर जनता की सेवा की खातिर होने चाहिए लेकिन ये लगते हैं आम नागरिक को प्रताड़ित करने का कार्य करते हैं दोष यही कि आपकी पहचान सिफ़ारिश नहीं और बिना रिश्वत कोई काम करना उनको स्वीकार नहीं जो तरह तरह से जनता से धन लूट कर सरकारी खज़ाना इसलिए भरते हैं ताकि बाद में विकास के नाम पर कई गुणा अधिक कीमत ठेकेदार या कंपनी को फायदा देने के बदले कमीशन ले कर घर भर सकें और अधिकांश विभाग में ये लूट ऊपर तक बांटी जाती है । कितने अधिकारी हैं जिन  के घर छापे पड़ने  पर करोड़ों की नकद राशि बरामद होती है , रंगे हाथ पकड़े जाने वाले कर्मचारी कुछ दिन बाद फिर से बहाल हो जाते हैं । घोटालों की बड़ी चर्चा होती है लेकिन कभी किसी ने नहीं पूछा या बताया कि सरकारी धन बिना आईएएस अधिकारी के हस्ताक्षर और स्वीकृति खर्च हो ही नहीं सकते । कोई विधायक संसद मंत्री खुद इक पैसा खर्च नहीं कर सकते यहां तक की जिस कल्याण राशि की बात सब जानते हैं उसे भी सरकारी अधिकारी से मिलकर खर्च किया जाता है । 

सोशल मीडिया अखबार टीवी का कोई भी संवैधानिक विशेषाधिकार नहीं हो सकता है लेकिन इन सभी ने इक गठजोड़ कर खुद को चौथा सतंभ करार दे दिया है । और आजकल ये करते क्या हैं असली खबरों को ढकने को बेफ़ज़ूल की बहस में उलझाए रखते हैं वास्तव में ये सब से खतरनाक चिंता की बात है । देश में आज तक किसी भी घोटाले में इतना धन किसी को फायदा पहुंचाने को बर्बाद नहीं किया गया है जितना सरकारी विज्ञापनों की लूट पर इनको फ़ायदा पहुंचाने को नियमित हर दिन बर्बाद किया जा रहा है । किस काम की इतनी बड़ी कीमत वसूल रहे हैं ये खुद को सच का झंडाबरदार कहने वाले जिनको झूठ सच से अच्छा लगता है । टीवी चैनल अखबार आपराधिक छवि वाले बाहुबली से हिंसा फैलाने वाले अपशब्द बोलकर लोगों को उकसाने भड़काने वाले नेताओं को बढ़ावा देते हैं और इनके शो से सीरियल तक समाज को गलत संदेश देने का काम करते हैं चंद पैसों की खातिर । आदर्श की ईमानदारी की परिभाषा से ये अनजान हैं सब से सवालात करने वाले अपने गिरेबान में कभी नहीं झांकते हैं । सरकारी विज्ञापन की बैसाखी के बगैर इक कदम नहीं चल सकते हैं । 
 
कल सोशल मीडिया पर कोई समझा रहा था कि रामायण और महाभारत में भी किस किस को ऐसे ही छल पूर्वक मारा गया था । आज सैर करते हुए सुनाई दिया कि उन बदमाशों को क़त्ल करने वालों ने बड़ा ध्यान रखा ताकि किसी और को कोई हानि नहीं हो , मानो उनको वो अपराधी कोई मुजरिम नहीं अवतार लग रहे हों जो पापियों का अंत करने को आये हों । धर्म का अधकचरा ज्ञान पाकर लोग सही गलत ही नहीं बल्कि अधर्म को धर्म समझने की बात कर रहे हैं । हमने कैसे कैसे लोगों को नायक समझ लिया है बड़े खूंखार डाकुओं से सोने चांदी के मुकट स्वीकार करने वाले चुनावी सभाओं में मंच पर अपराधी से मिलकर उसकी बढ़ाई करने वाले और सत्ता या बहुमत पाने चुनाव जीतने को अपराधी लोगों को दल में शामिल कर सब करने वाले क्या जनता का कल्याण कर सकते हैं । तस्वीर बताती है कहानी सब को मालूम है । 



अप्रैल 11, 2023

वैधानिक चेतावनी ख़तरा है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     वैधानिक चेतावनी ख़तरा है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

बात सबको भाई , दूल्हे ने सीटी बजाई , दुल्हन ने पिस्टल से गोली चलाई , हमको इक पहेली याद आई । किसी ने ठोकर खाई बच गया उपरवाले ने जान बचाई , पूछा उस से शादी जब थी मैंने रचाई क्यों नहीं तब समझाई सच्चाई , फंस गया मैं राम दुहाई । तमाम तरह की चेतावनियां हर जगह दिखाई देती हैं  शराब सिगरेट से दवाओं खाने पीने के पदार्थों से सड़क पर सुरक्षा की बात समझाने को और तो और आजकल चोर तक को सावधान रहने की हिदायत देते है सीसीटीवी कैमरे की सूचना लिखी हुई मिलती है । ख़तरे ज़िंदगी का हिस्सा हैं और बहुत लोग जानते हुए भी ख़तरे मोल लेते हैं सच लिखना भी ख़तरनाक़ होता है समझदार सबक सिखलाते हैं कड़वे सच पर झूठ की चाशनी लगा कर परोसते हैं लोग खाते हैं मुस्कुराते हैं व्यंग्य लिखना आसान नहीं चुटकुले से काम लेते हैं अख़बार में हर सप्ताह कॉलम छपवाते हैं नाम शोहरत ईनाम ख़िताब पाते हैं शोकेस में सजा कर घर की शान ओ शौकत और रौनक बढ़ाते हैं । बधाइयां देने वाले फ़ल फूल मिठाई लाते हैं इक फोटो साथ करवाते हैं सोशल मीडिया पर लगाकर अपनी औकात बनाते हैं । ख़तरों के खिलाड़ी हम नहीं हैं शादीशुदा बंदे हैं जिनकी बनाई रोटी खाते हैं उनको सब समझते हैं भले हम उनको कैसे भी लगते हैं हम नहीं झूठ बोलते तुम से अच्छा कोई नहीं डायलॉग हर बार दोहराते हैं । ये बात सच है उनको भी यही लगता है कुछ और बात माने नहीं माने इस बात को मान जाते हैं । शादी का लड्डू खाने वाले और नहीं खाने वाले कहते हैं जानकार दोनों पछताते हैं ये अजब पहेली है अनसुलझी रहने देते हैं वैधानिक चेतवनी की बात को आगे बढ़ाते हैं चलो उस बारात में शामिल हो जाते हैं ।    
 
ढोल बजा बैंड बजा और बजने लगी शहनाई दुल्हन दूल्हे संग नाची झूमी ज़रा भी नहीं शर्माई सीटी बजाई दूल्हे ने दुल्हन ने गोली चलाई । पंडित जी नहीं घबराए सबको विवाह की आधुनिक काल की नई रीत है ये बात समझाई । दूल्हे राजा को समझ आ गया भविष्य में कभी सीटी बजाई तो दुल्हन जानती है पिस्टल चलाना सीटी की आवाज़ पर गोली की आवाज़ भारी पड़ती है समझे राजा जंवाई । शादी से पहले सावधान करना ज़रूरी है डरते हो तो वक़्त है भाग सको तो भाग लो वर्ना गोली की आवाज़ को रखना याद समझ नहीं पाओगे कब शामत आई अपनी बात सब को ख़ास लगती है और साधारण सी बात है कहते हैं जब हो पराई । विवाहित जीवन सुंदर सपना लगता है असलियत होती है बड़ी कठिनाई आपको लगता है सामने कुंवा है पीछे भी है गहरी खाई । चलती नहीं कोई चतुराई होशियारी जिस ने दिखलाई उल्टा उसने मुंह की खाई । हमने बस इक उनको देखा जिन्होंने घर बार छोड़ खाक़ छानी गलियों की किस्मत उनकी जब रंग लाई आख़िर माना की थी शादी नहीं निभाई भाई है तन्हाई । मन की बात सबको सुनवाई फिर भी समझे नहीं जो उनकी समझ अपनी जनाब ने खैर मनाई , जाओ जो करना कर लो हरजाई ।  इक राज़ है उनकी बात नहीं जानता कोई भी किस लिए अपनी नई नवेली दुल्हन को बीच मझधार छोड़ आये थे बड़ी देर बाद असलियत उनकी समझ आई है । बंदे की यही आदत उसकी चतुराई है किरदार बदलता रहता है कभी चोर कभी सिपाही कभी राजा कभी भिखारी कभी शहंशाह कभी फ़क़ीर होने का दम भरता है मगर वास्तव में हर कर्तव्य अपने किरदार का फ़र्ज़ निभाने से डरता है सब कुछ कर सकता है यही सभी समझते हैं और वो कुछ भी नहीं करता बस इक यही काम करता है । खुद नहीं पीता न किसी को पिलाता है पीने नहीं देता ख़ाली जाम भरता है और मस्ती में उस भरे जाम को पत्थर से टकराता है , शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है यही गीत उसको सबसे अधिक भाता है । ख़ाली जाम उस मयकदे से हर प्यासे को मिलते हैं प्यास नहीं मिटाता प्यासा रखता है और प्यास को बढ़ाता है । ये खेल राजनीति कहलाता है उसको बड़ा मज़ा आता है अपने हुनर पर उसको गर्व है बड़ा इतराता है ।  

सरकार ने तलाक पर बड़ी गहराई से विचार विमर्श किया और नियम कायदा कानून बनाया है , तलाक की तरह शादी को लेकर भी चिंतन किया जाना ज़रूरी है । नियम बना सकते हैं विवाह करने से पहले भविष्य की तमाम बातों पर ध्यान दिलाने को इक चिन्ह और इक स्लोगन  शादी कार्ड से लेकर विवाह स्थल तक लगाया जाना आवश्यक हो सुरक्षित जीवन के लिए सावधानी भली होती है । 
 

 

अप्रैल 07, 2023

ग़ुलामी हमारी पसंद रही है ( इतिहास भूगोल से कथाओं तक ) डॉ लोक सेतिया

   ग़ुलामी हमारी पसंद रही है ( इतिहास भूगोल से कथाओं तक ) 

                                   डॉ लोक सेतिया 

लिखने लिखवाने की बात नहीं है समझने और समझाने की बात है । हम पर कोई हुकूमत कर सके दुनिया में किस की औकात है । आगे आगे देखिए होता है अभी तो बस इक शुरुआत है हम खुश हो कर कहते हैं जोरू के हैं ग़ुलाम शर्म की क्या बात है । हम शूरवीर दुश्मन को ख़ाक में मिलाने वाले , अपनी आज़ादी का जश्न मनाने वाले , महान पूर्वजों की संतान हैं शेर की मांद में घुसकर उसे मज़ा चखाने वाले , कायरता से नहीं कोई रिश्ता नाता रहा किसी ताकत से कभी नहीं घबराने वाले । माना हमारी फितरत नहीं भयभीत करना मगर हम नहीं किसी से डर जाने वाले । हमारे देश में करोड़ों देवता बसते थे ईश्वर कितने अवतार लिया करते थे हम किसी से कम नहीं जिनको नहीं पता नादान हैं उनको समझाने वाले । युग पहले हमारे पर ब्रह्मास्त्र थे पुष्पक विमान से पर्वत को उठाने संजीवनी लाने वाले भगवान थे संजय जी के पास कहीं दूर लड़ी जा रही महाभारत को देखने सुनने और धृतराष्ट्र जैसे शासक को बताने वाले ज्ञानचक्षु थे । अचूक निशाने पर लगते तीर थे अग्निबाण से जाने क्या क्या पास हमारे था बड़े विशाल थे फिर भी महीन थे । किसी को पत्थर बना दिया किसी को शिला से वापस जिला दिया हमने अनहोनी को कर के दिखा दिया सोने की लंका को आग लगा कर जला दिया । सोने का हिरण इक माया था छलावा था भगवान भी जानते थे ज़िद थी अर्धांगनी की जादू चला दिया । रावण बड़ा ज्ञानवान था शूर्पणखा की बात से परनारी पर बुरी नज़र डाल कर कर बैठा जो गुनाह सब फल तपस्या के क्षण में गंवा गया । हां सब बिलकुल सच है बस यही झूठी बात है किसी मुगल शासक ने हमको अपना ग़ुलाम बना लिया या किसी ब्रिटिश राज ने हमारे देश पर अपना सिक्का चला लिया और हमसे अपनी रानी के गुणगान का गीत लिखवा लिया । देश सोने की चिड़िया था हमने शाख शाख पर उल्लू बिठा दिया गुलशन को बर्बाद करने को दुश्मन की क्या ज़रूरत खुद हमने बाड़ बन कर सारा खेत खा लिया । 
 
ऊपर सिर्फ भूमिका लिखी है सोचने समझने को कि ग़ुलामी कोई अभिशाप बन कर नहीं मिली हमको बल्कि हमको ग़ुलाम होना इतना रास आया कि भले देश को विदेशी शासकों से मुक्ति मिल गई देश आज़ाद हो गया हम लोग मानसिक दासता से पीछा नहीं छुड़ा सके । किसी न किसी की चरणवंदना कर हमारे मन को परम सुख और आनंद की अनुभूति होती है तभी हमने कितने और कैसे कैसे खुदा बना लिए हैं । कैफ़ी आज़मी की इक नज़्म कितनी बार दोहराई है इक बार और सही । कुछ लोग इक अंधे कुंवे में कैद थे और भीतर से ज़ोर ज़ोर से शोर कर आवाज़ दे रहे थे , हमको आज़ादी चाहिए , हमको आज़ादी चाहिए । जब उनको बाहर निकाला गया तो घबरा गए रौशनी से उनकी आंखें चुंधिया गईं और उन्होंने वापस कुंवे में छलांग लगा दी । और फिर वही शोर मचाने लगे कि हमें आज़ादी चाहिए हमें रौशनी चाहिए ।  
 
महानायक कहलाते हैं जो इतिहास को रचते हैं इतिहास को बदला नहीं जा सकता है भूगोल को बदल सकते हैं जो घटा उसको झुठलाना खुद वास्तविकता से नज़रें चुराना है । गौरवशाली इतिहास से सीख कर बहुत कुछ कर सकते हैं और जो भूल जो गलतियां इतिहास में दर्ज हैं उन से सबक लेकर भविष्य में दोहराना नहीं है ऐसा प्रयास कर सकते हैं । देश का विभाजन गांधी जी की हत्या आपत्काल और शासकों की मनमानी या तमाम घोटाले दंगे फसाद भ्र्ष्टाचार बहुत कुछ हैं जो दाग़ हैं और दाग़ अच्छे नहीं लगते ये विज्ञापन धोखा है अपने फायदे को , लेकिन जब दाग़दार लोग सत्ता को भाते हैं बहुमत साबित करने को काम आते हैं तब तमाम आदर्श खोखले साबित होते हैं और इक काला अध्याय लिखवाते हैं । कभी इक ईस्ट इंडिया कंपनी को घर बुलाया था नतीजा बड़ी देर से समझ आया था आजकल किस किस कंपनी किस किस साहूकार का चलता बढ़ता साम्राज्य है बस उन्हीं का भाग्य जनता का दुर्भाग्य है । ये भविष्य की इक तस्वीर है रूठी हुई अपनी तकदीर है नहीं दिखाई देती कोई तदबीर है ।
 


 

अप्रैल 06, 2023

असर देखिये क्या हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          असर देखिये क्या हो  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया     

बदलना था जिनको हालात को ,  बदलने लगे हैं बात को । ज़माने को बदलने वाले खुद बदल गए हैं , दिन कहने लगे हैं काली अंधियारी रात को । अल्फ़ाज़ समझते नहीं मेरे मेहरबां , समझे नहीं हैं लोग भी क़ातिलाना से उनके अंदाज़ को । क्या क्या नहीं बदला दरो - दीवार से लेकर घर की बुनियाद तक हिला दी  है ,  सोज़ की समझ नहीं , समझेंगे क्या भला साज़ को । घनघोर घटाओं ने प्यास नहीं बुझाई , रहने भी दो अब शोले भड़काती इस बरसात को , ये कैसी शमां उजाला नहीं करती दामन कितने जलाए हैं बिरहा की इक रात को । हाथ से मिलाया हाथ हथकड़ी बन गई अब जा के लोग समझे रहनुमाओं की सौग़ात को । तकदीर गरीबों की भला संवारते हैं कभी सरकार , दुनिया की सभी ताकतें शतरंजी बिसात पर जनता को बना मोहरे लुत्फ़ लेते हैं कभी शह कभी मात को । इतिहास के पन्नों को पलटने से क्या होगा हर हर्फ़ भीगा हुआ अश्क़ों की बारिश से , कुछ मिट गए कुछ फाड़ दिए शरारती लोगों ने अपनी आसानी को , इक किस्सा रहा बाक़ी सुनाएगी ,  सुनोगे चोरों की नानी को ।  लिबास बदलने से किरदार नहीं बदलते हैं , झूठ सौ बार बोल देने से सच पराजित नहीं होता है , आग़ाज़ ही सही नहीं हो तो अंजाम कैसे सही होगा , चाहा था सभी ने हिसाब सही होगा कब सोचा था किसी ने  कोई  खाता न बही जो उनके मन भाये बस हर बार वही सही होगा । झूठ बैठा है सूरज बन कर सिंहासन पर सच को सूली चढ़ाया जाएगा । कलम थक गई है लिखने से क्या हासिल पढ़ने से पहले मिटाने का अंदेशा है खुद ही मिटा दिया खुद ही लिखा जा क्या क्या , कूड़ेदान में ढूंढना शायद बचा हो जो इतिहास मिटाया गया जाने किस किस की ज़रूरत से किसी की चाहत से आधी अधूरी रही हसरत से । ख़त्म इक दिन झूठा बनावटी अफ़साना होगा , ज़िंदगी का फिर से वही गीत सुहाना होगा , आएगी इक सुबह उजाला लिए सब घरों बस्तियों से अंधकार मिटाना होगा । जो आज है कल बीता पुराना ज़माना होगा । मौसम अभी ठीक नहीं है फ़िज़ाओं का मिजाज़ अच्छा नहीं पर देखेंगे हम सभी फिर वही मौसम आशिकाना होगा ।  हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ , जब भी मिलेंगे अंदाज़ पुराना होगा । मज़बूर फिल्म की ग़ज़ल से बात को विराम देते हैं ।
 

बदली है ज़माने की नज़र देखिये क्या हो ,

होना तो है कुछ आज मगर देखिये क्या हो । 



ये रात तो दिलकश थी बड़े खुश थे सितारे ,

तुम पास हमारे थे तो हम पास तुम्हारे ,

अब आयी है नजदीक सहर देखिये क्या हो ।  


ये कश्ती चली जाती थी मौजो के सहारे ,

सोचा था पहुच जायेंगे एक रोज़ किनारे , 

पर सामने आया है भंवर  देखिये क्या हो ।  

 

मुश्किल में सभी देते है उस दर पे सदाएं  ,

सुनते है के सुनता है खुदा सबकी दुआएं ,

मगर अपनी दुआओं का असर देखिये क्या हो । 

 

 



अप्रैल 05, 2023

चाह इक मिस कॉल की ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    चाह इक मिस कॉल की  ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ मत सोचना किसी इश्क़ प्यार मुहब्बत की नहीं देश की राजनीति की बात है । सैर कर पार्क से निकला ही था कि किसी ने रोका नाम नहीं पूछा काम नहीं बताया न खुद का कोई परिचय देना ज़रूरी था । बस इक मिस कॉल इक नंबर पर करने को आग्रह किया , मैंने बताया मुझे किसी भी राजनैतिक दल से कोई लगाव नहीं है मैं कौन हूं आपको पता है चलो आप कौन हैं बताओ तो सही । साथ इक और खड़ा था मुझे छोड़ उस को मुख़ातिब हो कहने लगे उधर देखो कितने लोग गुज़र रहे हैं इनकी बात मुझे सुनने दो । फिर मुझे कहने लगे आप कौन हैं क्या है हमको सिर्फ अपने राजनैतिक दल की मैंबरशिप बढ़ानी है बस इक मिस कॉल इक नंबर पर ही तो करना है । मुझे कहा या अपने साथी को मालूम नहीं बस बोले की हमारा टार्गेट पूरा करना है । ये भाषा कुछ कंपनी के मैनेजर जैसी लगी अपने अधीन कार्य करने वाले को समझाते हुए । ये कैसा अजब तमाशा है राह चलते हर किसी से मिस कॉल की खैरात मांगना , जाने किसे धोखा दे रहे हैं खुद को या किसी और को जिस को झूठे बनावटी आंकड़े दिखला कर उनकी नज़रों में निष्ठावान कहलाना । मैंने देश की दशा पर थोड़ा बात की तो बगलें झांकने लगे उनको कल क्या हुआ था किस कारण हड़ताल थी उनको खबर नहीं थी और देश राज्य की समस्याओं को छोड़ इक राजनैतिक दल की मैंबरशिप की नकली बढ़ोतरी उनको सब से महत्वपूर्ण कार्य लग रही थी । इतना कहते ही उनको बहुत बुरा लगा कि देश व्यक्ति दल से पहले होना चाहिए । जाने क्यों हर कोई सीधी बात को उल्टा समझता है जैसे मैंने कोई आरोप लगाया हो उन पर शायद सच कड़वा लगता है । 
 
जनता से विचारधारा की देश की जनता की समस्याओं की उनके समाधान की चर्चा कर जागरूक करने और सार्थक ढंग से संगठन को बनाने की जगह इस तरह सिर्फ दिखाने को संख्या बढ़ाने की कोशिश क्या समझदारी हो सकती है । सोशल मीडिया पर अकॉउंट खोल देशभक्ति करने की बातें देश में कोई बदलाव नहीं ला सकती हैं और लगता है ये किसी को चाहिए भी नहीं । इक मिस कॉल की चाह का एक ही अर्थ है बस सत्ता की इक आसान सीढ़ी बल्कि कोई लिफ़्ट जो नीचे से सीधे सड़बे ऊपरी मंज़िल तक तुरंत पहुंचा दे । सत्ता आजकल समाजसेवा करने को नहीं खुद को सबसे महान कहलाने और धन दौलत सुख सुविधा हासिल करने का साधन बन गई है । अपना सब देश समाज को देने प्राण न्यौछावर करने वाली देशभक्ति किताबों में मिलती है , विडंबना देखिए की पढ़ लिख कर लोग नैतिकता ईमानदारी नहीं सीखते धन दौलत और सभी अधिकार चाहते हैं वो भी कर्तव्य की बात को दरकिनार करते हुए ।  आज किसी शायर की ग़ज़ल के दो शेर  याद आये हैं सटीक बैठते हैं मौजूदा परिपेक्ष्य में पेश करता हूं ।  
 

छोड़ो कल की बात हमारे साथ चलो  ,

हाथों में ले  हाथ हमारे साथ चलो ।

साज़िश में कुछ लोग लगे दिन रात यहां  , 

बदलेंगे हालात हमारे साथ चलो ।  



अप्रैल 03, 2023

समरथ को नहीं दोष गौसाईं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

        समरथ को नहीं दोष गौसाईं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

श्री रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं , समरथ को नहीं दोष गौसाईं । अर्थात साधन सम्पन्न बलशाली प्रभावशाली का आचरण सुनिश्चित सामाजिक मर्यादाओं के विपरीत होने पर भी उसे नियम विरुद्ध आचरण का दोषी नहीं माना जाता है । यह ठीक उसी प्रकार है जैसे सूर्य की तीव्रता कितनी भी प्रचंड हो, वर्षा काल में गंगाजी अपने तटों को छोड़कर कितने भी क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लें और अग्नि अपनी प्रचंड ज्वाला में कुछ भी भस्म कर दे किन्तु उसे दोषी नहीं ठहराया जाता है ।
 
ये जो शब्द ऊपर लिखे हैं किसी धार्मिक व्यक्ति के व्याख्यान से बिना किसी फेर बदल लिए गए हैं । सदियां बीत गई और हम पढ़ लिख कर आधुनिक समाज का निर्माण करने के बावजूद भी उस पुरानी मानसिकता को छोड़ नहीं पाए हैं । कृष्ण बिहारी नूर कहते हैं धन के हाथों बिके हैं सब कानून , अब किसी जुर्म की सज़ा ही नहीं । सब बिकता है और धनवान खरीद लेते हैं नीचे से ऊपर तक कर्मचारी अधिकारी से राजनेता तक यहां तक की इंसाफ़ भी धनवान और उच्च वर्ग को मनचाहा और जल्दी से उपलब्ध हो जाता है जबकि सामान्य व्यक्ति ज़िंदगी भर कोर्ट कचहरी सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटता मर जाता है । 
 
राजनेता चाहे जिस भी दल के हों आज तक कोई कानून खुद पर अंकुश लगाने को नहीं बना पाए हैं । लाख डांट फटकार सर्वोच्च अदालत से मिलने पर भी संसद और विधानसभाओं में अपराधी बाहुबली गंभीर जुर्म करने वाले भी माननीय कहलाये जाने पर रोक नहीं लगाई है । अफसरशाही सब पर सख़्ती से नियम लागू करती है अपने को नियम कायदे कानून से ऊपर समझती है उनकी कलम जब जैसी ज़रूरत अपनी सुविधा साहूलियत से बदल कर कानून को नर्म मुलायम लचीला बना लिया करती है । 
 
यूं तो देश की व्यवस्था इतनी लचर और बदहाल हो जाने पर भी किसी शासक प्रशासक को रत्ती भर भी चिंता नहीं है फिर भी कभी कभी कोई शासक या प्रशासक या मंत्री विचार करता है और कुछ कानूनी बदलाव लाने की कोशिश करता है जिस से सबको शिक्षा स्वास्थ्य सेवा रोज़गार समानता से हासिल हो सके । तब कुछ लोग जिनके स्वार्थ जिनकी मनमानी पर अंकुश लगता है वे तमाम तरह से साम दाम दंड भेद का उपयोग कर अपने हित को साधने का कार्य कर लिया करते हैं । परहित सरिस धरम नहीं भाई , परपीड़ा सम नहीं अधमाई। ये भी पंक्ति श्री रामचरितमानस से उद्धित है । ये कितनी विडंबना की बात है कि हम दावा करते हैं मानवता और समाज देश के कल्याण का लेकिन अपने पास बहुत होने पर भी उनके लिए जिनके पास जीवन यापन को कुछ भी नहीं थोड़ा सा त्याग अपने स्वार्थ का नहीं स्वीकार करते सबकी भलाई की खातिर । आज़ादी को कुछ ख़ास लोगों ने बंधक बना लिया है और आम लोगों की आज़ादी तो क्या उनके मौलिक जीने के हक तक हासिल होने नहीं देना चाहते हैं । अजीब बात हुई शुरुआत बड़े लोगों की अनुचित बातों को भी गलत नहीं समझते से की तो आखिर अंत में परहित सरिस धरम नहीं भाई पर पीड़ा पर होने से विषय पूरा समझ में आया , अभी तक ऊपर शीर्षक की जगह खाली थी अब शीर्षक सही मिल गया है । समरथ को दोष नहीं दे सकते लेकिन साथ में आखिर में कहना ज़रूरी है समरथ लोग पर पीड़ा को नहीं समझते तो सबसे बड़ा अधर्म यही है । समरथ को नहीं दोष से लेकर पीड़ा देने से अधिक अधर्म कोई नहीं तक यही कथासार है । 




 

अप्रैल 02, 2023

पढ़ाई किसी काम न आई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   पढ़ाई किसी काम न आई  ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

किताबी पढ़ाई वक़्त पर नहीं काम आई , अनपढ़ सबको समझाते  हैं दुनिया की मत करो भलाई , हमको कभी नहीं समझ आई ज़माने भर की चतुराई । ढाई आखर प्रेम के पढ़ कर पंडित होना आसान नहीं है सब को चाहिए दूध मलाई पढ़े लिखो को छाछ भी मिल जाए यही बहुत है , ठंडी मीठी बर्फ मलाई सत्ता के हिस्से में आई सरकार ने  खूब खाई मौज मनाई । प्यार किया हमने सबसे समझदारी नहीं रास आई सबने हमको नादान बताया उनकी होशियारी नहीं हम समझे भाई । ज़िंदगी भर मुहब्बत को ईबादत माना नफरत करनी कभी न भाई मत पूछो कितना पढ़े हम कोई डिग्री नहीं कमाई ।  

कोई हमसे पूछे तो बताएं क्या , इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से निगाहों की ज़माने से , हो गया प्यार का जुर्म कैसे ज़िंदगी की खूबसूरत ख़ता है , हम भी करते थे मुकर जाएं क्या । ज़ुबां पर ताले लगे हैं राज़ भरी महफ़िल को सुनाएं क्या , सिलसिले ख़त्म हुए क्योंकर मेरे रकीब ये वाकया दोनों भूल जाएं क्या । दोस्तों से निभाना नहीं आसां दुश्मनों को अपने घर बुलाएं क्या । याद करते हैं भूले बिसरे गीतों को कुछ अल्फ़ाज़ छूट जाते हैं गाते गाते सुर की जगह बस तबला हार्मोनियम बजाएं क्या । कितनी तस्वीरें गुलाबी खत कितने क्या लिखा क्या पढ़ा क्या समझा उनकी ज़ुल्फ़ों को रुख से हटाएं क्या । बात कल की है पहली अप्रैल की महफ़िल में ज़िक्र चला किसी और पढ़ाई की डिग्री का हम ने छेड़ दी बात प्रेम की पढ़ाई की जिस को सब ने भुला दिया है और यूं ही चलते चलते तपती गर्म हवाओं का मौसम बदल कर बसंत का सुहाना मौसम हो गया । याद पिया की आये मोरा मन घबराए बाली उम्र की चाहत का यही होता है । शादी विवाह का गठबंधन होने पर सामाजिक प्रमाणपत्र जैसा सबूत मिलता है और आप आवारा से घर परिवार वाले पति - पत्नी बन जाते हैं कहलाते हैं । हर साल वर्षगांठ मनाते हैं दुनिया भर के रस्मो-रिवाज़ निभाते हैं ख़ुशी हो या ग़म साथ साथ निभाते हैं । कभी कभी पास रहकर दूर होते हैं कभी दूर होकर भी साजन सजनी को करीब पाते हैं । राजनेताओं की अपनी अलग परंपराएं  होती हैं उनके रिश्ते सत्ता की सौदेबाज़ी कहलाते हैं बनते कम बिगड़ते अधिक जाते हैं बस कोई नहीं समझा कयामत पर कयामत ढाते हैं उनकी बात का कोई भरोसा नहीं वफ़ा नहीं बेवफ़ाई का चलन चलते हैं और इसी पर इतराते हैं । 
 
स्कूल कॉलेज की शिक्षा पढ़ कर मिलती है जो डिग्री उसकी हालत मत पूछो जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं और समझ सच में कुछ भी नहीं आता बल्कि ऊंची शिक्षा बड़े पद पर नौकरी मिलते ही बंदा किसी बेजान मशीन की तरह बन जाता है । आधुनिक शिक्षा ने अच्छे आदर्श मानवीय मूल्यों की किताब को बेकार घोषित कर सिर्फ भौतिकवाद की पढ़ाई को सफलता का मापदंड बना कर पेश कर दिया है और सफलता का अर्थ धन दौलत सुख साधन ऐशो आराम भरा जीवन जीने का इक सुनहरा ख़्वाब जिस का टूटना तय होता है कुर्सी से उतरते ही आदमी आकाश से ज़मींन नहीं नीचे पाताललोक पहुंच जाता है । जिस अधिकारी का पालतू कुत्ता मरा तो शहर शामिल था उसकी मय्यत पर खुद परलोक सिधारा तो कोई शोक जताने नहीं आया श्मशानघाट तक । जाने कितनी स्मृतियां ईनाम पुरुस्कार के प्रतीक बंद अलमारी में धूल चाटती कुछ किताबों के साथ ख़ामोशी से संवेदना व्यक्त करते रहे संवेदना के खो जाने का कितने सालों से चुपचाप साथ साथ । 
अजीब लोग हैं किसी की शिक्षा की डिग्री देखने की ज़िद करते हैं और लाजवाब फैसला है अदालत इस जुर्म पर जुर्माना लगाती है । देखने दिखाने से क्या होगा पढ़ कर क्या सीखा बिना पढ़े क्या जाना इक उम्र में इन सभी की ज़रूरत नहीं रहती है चलिए आपको दो छोटी छोटी कहानियां सुनाते हैं ।  
 

                                 कुनबा डूबा क्यों ( लोक कथा ) 

गणित के अध्यापक जी अपने परिवार को संग लेकर कहीं जा रहे थे , रास्ते में इक नदी आई तो मास्टरजी ने अपने हाथ पकड़ी इक छड़ी  जिस पर निशान लगे थे लंबाई गहराई नापने को उसे पकड़ नदी को इक किनारे से बीच के और हिस्सों से दूसरे किनारे तक की गहराई को नाप लिया और उन सब का औसत निकाला जो चार फुट निकला । अर्थात नदी में पानी कहीं एक कहीं दो कहीं पांच फुट था उनका औसत चार फुट निकाला गया । उस के बाद परिवार के छोटे बच्चों से पत्नी का खुद का कद मापा गया और सब के कद की ऊंचाई का औसत निकाला गया जो नदी के पानी की गहराई से अधिक था । मास्टरजी को अपनी शिक्षा पर यकीन था की जब परिवार के कद की औसत ऊंचाई नदी की औसत गहराई से बढ़कर है तो नदी में चलते हुए पार जाना सुरक्षित है । अध्यापक आगे आगे चले और सब को पीछे पीछे चलने की हिदायत दे दी । मास्टरजी जब नदी पार पहुंचे तो पीछे सब सदस्य डूब चुके थे । मास्टरजी ने फिर से हिसाब लगाया और सोचने लगे औसत ज्यों का त्यों तो कुनबा डूबा क्यों ।  

                             सबसे बड़ा झूठ ( लोक कथा ) 

स्कूल के बच्चे मैदान में खेल रहे थे अध्यापक उधर से गुज़र रहे थे , पूछा बताओ बच्चो क्या खेल खेल रहे हो । बच्चों ने बताया मास्टरजी हमने ये कुत्ते का पिल्ला इक शर्त पर रखा है , हम सब झूठ बोलने की प्रतियोगिता कर रहें हैं । हम में से जो भी सबसे बड़ा झूठ बोलेगा ये कुत्ते का पिल्ला उसी का हो जाएगा । सुनते ही मास्टरजी बोले जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो मुझे मालूम ही नहीं था झूठ क्या होता है और कैसे बोलते हैं । अध्यापक की बात सुनते ही सभी बच्चे बोल उठे , मास्टरजी आप विजयी हुए । ये कुत्ते का पिल्ला आपका है ले जाईये ।  आजकल सब कहते हैं हमने कभी झूठ नहीं बोला झूठ क्या है कैसा होता नहीं नहीं जानते अब क्या करें हर किसी को कुत्ते का पिल्ला कौन दे बस आगे कुछ मत पूछना भौंकने वाले भौंकते हैं काटते नहीं क्योंकि हड्डी मिल जाती है दुम हिलाते रहते हैं टीवी बंद करो समाचार नहीं इश्तिहार हैं सभी जानकर अनजान हैं।


 

अप्रैल 01, 2023

चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

   चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सी लो लबों को और चुप रहा करो ,
ज़ुल्म भी हंसते हंसते सब सहा करो । 
 
चोर को साहूकार कहना सीखो भी  , 
अब ख़िज़ाओं को बहार कहा करो । 
 
ये ज़माना झूठे लोगों का है  ज़माना , 
हमको तुम सब पर ऐतबार कहा करो । 
 
देश के रहनुमाओं का यकीन करो , 
इश्तिहार पढ़कर सरकार कहा करो ।
 
उनकी हसरत मसीहा लोग समझें , 
क़ातिल पर आता है प्यार कहा करो ।
 
जिनके तख्त ओ ताज़ हुक़ूमत हो  , 
बड़े अच्छे उनके सब यार कहा करो । 
 
आप अपने ही घर में रहकर खुद को  ,
हम यहां पर हैं किराएदार कहा करो । 
 
ज़िंदगी और मौत दोनों का यकीन नहीं ,
जनाबेआली हम ख़ाकसार कहा करो । 
 
सितमगर है सितम की फ़ितरत भी है , 
ज़ख़्म देता है दिया उपहार कहा करो ।  



 
 

अपना यही विचार है ( पहली अप्रैल ) डॉ लोक सेतिया

      अपना यही विचार है ( पहली अप्रैल ) डॉ लोक सेतिया 

कौन है अपना कौन पराया , पुराना हुआ ये विचार है 
सबकी महफ़िल सबकी रौनक , यही बस व्यौपार है । 
 
चोरों की बस्ती में चर्चा है यही , जो सबसे बड़ा मूर्ख 
सरदार बनेगा वही आज अप्रैल फूल का बड़ा त्यौहार है ।
 
सबसे पहले ईमानदारी की परिभाषा नई बनाई गई है 
जनता को कहना होगा सच्ची सरकार सच्चा सरदार है । 
 

                       परिभाषा एक ( कविता )  

है अपना तो साफ़ विचार
है लेन देन ही सच्चा प्यार ।

वेतन है दुल्हन  तो रिश्वत है दहेज
दाल रोटी संग जैसे अचार ।

मुश्किल है रखना परहेज़
रहता नहीं दिल पे इख्तियार ।

यही है राजनीति का कारोबार
जहां विकास वहीं भ्रष्टाचार ।

सुबह की तौबा शाम को पीना
हर कोई करता बार बार ।

याद नहीं रहती तब जनता
जब चढ़ता सत्ता का खुमार ।

हो जाता इमानदारी से तो
हर जगह सबका बंटाधार ।

बेईमानी के चप्पू से ही
आखिर होता बेड़ा पार ।

भ्रष्टाचार देव की उपासना
कर सकती सब का उध्धार ।

तुरन्त दान है महाकल्याण
नौ नकद न तेरह उधार ।

इस हाथ दे उस हाथ ले
इसी का नाम है एतबार ।

गठबंधन है सौदेबाज़ी
जिससे बनती हर सरकार ।
 

                      परिभाषा दो ( कविता ) 

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो
आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो ।

जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो
कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो ।

क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो
निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो ।

सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो
मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो ।

बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो
पाक करेगा दुश्मनी , उसको भाई लिखो ।

देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो
नहीं लगी दहलीज पर , कोई काई लिखो ।

पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो
जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो ।