हादिसे इसलिए हैं होने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
हादिसे इसलिये हैं होने लगेकश्तियां नाखुदा डुबोने लगे ।
लोग चुपचाप ज़ुल्म सहते रहे
ज़ुल्म ढाकर हैं आप रोने लगे ।
नींद पूरी नहीं हुई आपकी
दिन चढ़ा और आप सोने लगे ।
मौत की मांगने लगे हैं दुआ
खुद पे भी एतबार खोने लगे ।
काम करते रहे बुरे उम्र भर
खुद पे भी एतबार खोने लगे ।
काम करते रहे बुरे उम्र भर
अब नहा कर हैं पाप धोने लगे ।
लोग खुशियां तलाश करने चले
दर्द का बोझ साथ ढोने लगे ।
फूल हमने दिए सभी को मगर
खार ' तनहा ' सभी चुभोने लगे ।
लोग खुशियां तलाश करने चले
दर्द का बोझ साथ ढोने लगे ।
फूल हमने दिए सभी को मगर
खार ' तनहा ' सभी चुभोने लगे ।

1 टिप्पणी:
Bahut badhiya ghazal sir
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