अगस्त 24, 2012

POST : 77 हादिसे इसलिए हैं होने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 'तनहा '

हादिसे इसलिए हैं होने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हादिसे इसलिये हैं होने लगे
कश्तियां नाखुदा डुबोने लगे ।

लोग चुपचाप ज़ुल्म सहते रहे 
ज़ुल्म ढाकर  हैं आप रोने लगे । 

नींद पूरी नहीं हुई आपकी 
दिन चढ़ा और आप सोने लगे ।
 
मौत की मांगने लगे हैं दुआ
खुद पे भी  एतबार खोने लगे ।

काम करते रहे बुरे उम्र भर    
अब  नहा कर हैं पाप धोने लगे ।

लोग खुशियां तलाश करने चले   
दर्द का बोझ साथ  ढोने लगे ।

फूल हमने दिए सभी को मगर   
खार ' तनहा ' सभी चुभोने लगे ।