सभी को स्वर्ग चाहिए ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया
अपनी यही धरती पहले स्वर्ग से सुंदर हुआ करती थी अधिकांश लोग अच्छाई सच्चाई ईमानदारी ऊंचे आदर्शों पर चलते थे । सादगी भरा जीवन वास्तविक आचरण में नैतिकता का पालन करते थे देश समाज स्वर्ग लगता था दुनिया को शानदार बनाने की कोशिश करते थे हमारे पूर्वज । तब सभी मरने के बाद कामना करते थे मोक्ष की प्राप्ति की स्वर्ग यही है जानते थे नर्क की चिंता नहीं थी क्योंकि भले कर्म सही मार्ग पर चलना जानते थे । लेकिन हमारी बदनसीबी है कि हमने खुद अपने समाज को स्वर्ग से नर्क बनने दिया और बनाने में खुद भी योगदान देते रहते हैं । आज भौतिकता स्वार्थी स्वभाव अहंकार लोभ लालच और किसी भी तरह से सभी कुछ हासिल करने की चाहत का पागलपन जिस में अवसर मिले तो छीन लेना लूटना सामन्य बात हो गई है । यही नर्क है और हमारा देश समाज किसी भी नर्क से कम नहीं है बल्कि ऐसे नर्क की कल्पना भी हमारे पुरखों ने नहीं की होगी । हम सभी समझते हैं कि आधुनिक समय में हम समझदार बन गए हैं शायद सभी कुछ जानते हैं समझते हैं जो हमारी अज्ञानता का प्रमाण है । हम सोचते तक नहीं हैं कि हमने कैसे अपने देश को इस हद तक बर्बाद किया है कि शानदार स्वर्ग को नर्क बना दिया है , लेकिन हम इस अपनी दुनिया को फिर से अच्छा नहीं बनाना जानते न ही बनाने की कोशिश करते हैं हमने इसको स्वीकार कर लिया है कि ये खराब है और इतनी अधिक खराब है कि सुधारना संभव ही नहीं है । विडंबना ये है कि हम इस वास्तविकता को अपने झूठ और दिखावे के आडंबरों से ढकना छिपाना चाहते हैं , सोशल मीडिया से तमाम अन्य प्रकार से प्रचार प्रसार आयोजन से इक पर्दा डालने का कार्य निरंतर करते रहते हैं । हम समझते हैं विधाता से कुछ भी छिपाया जा नहीं सकता फिर भी उस ईश्वर से भी छल चतुराई करने की नासमझी करते हैं ।
मरना सभी को इक दिन है भले मरने की तैयारी कोई नहीं करता सभी जीना चाहते हैं मगर मौत आनी है आएगी भी सभी कामना करते हैं मर कर स्वर्ग में जगह मिलने की । स्वर्ग कोई अगर जगह होगी तब उस में प्रवेश से रहने की अनुमति तक क्या इतनी आसानी से हासिल हो जाएगी लगता तो नहीं है । जैसी भी पूंजी चाहिए होगी हमने वो कभी अर्जित की भी है जीवन में , नफरत भेदभाव सभी से हेरा फेरी ज़िंदगी भर हमने कुछ और कभी अर्जित किया ही नहीं । पाप छल कपट की झूठी नाम की शोहरत उस दुनिया में प्रवेश पाने से वर्जित ही कर सकती है । बबूल बोकर आम खाने की आकांक्षा है अपनी दुनिया को नर्कीय बनाकर किसी स्वर्ग की कामना रखना । मान लो किसी कारण हमको स्वर्ग में प्रवेश मिल भी जाए तब क्या हमको स्वर्ग की आबोहवा वहां का वातावरण पसंद आएगा , कभी नहीं हमको स्वर्ग में पल भर ठहरना कठिन लगेगा । नर्क को हमने बनाया ही नहीं उसको अपनी आदत दिनचर्या में शामिल कर लिया है । यकीन मानिए हमको उस स्वर्ग में भी अपने इस धरती के नर्क की याद आती रहेगी और इतना ही नहीं हमने विश्वास कर लिया है यही हमको सबसे शानदार लगता है इस नर्क से बिछुड़ना कोई नहीं चाहेगा । स्वर्ग मांगते हैं स्वर्ग को पसंद कदापि नहीं करते और मुमकिन है फिर किसी स्वर्ग को नर्क बनाकर पुरानी भूल दोहराना चाहते हों । स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा । स्वर्ग और नर्क की हक़ीक़त मालूम हो जाए तो मुमकिन है लोग अपना इरादा बदल कर मरने के बाद भी नर्क ही जाना चाहते हों , कविता पढ़ कर पुनर्विचार कर सकते हैं ।
श्रद्धांजलि सभा ( हास्य-व्यंग्य कविता )
डॉ लोक सेतिया
टेड़ा है बहुतस्वर्ग और नर्क का सवाल
सुलझाएं जितना इसे
उजझता जाता है जाल ।
आपको दिखलाता हूं
मैं आंखों देखा हाल
देखोगे इक दिन आप भी
मैंने जो देखा कमाल ।
बहुत भीड़ थी स्वर्ग में
बड़ा बुरा वहां का हाल
छीना झपटी मारा मारी
और बेढंगी थी चाल ।
नर्क को जाकर देखा
कुछ और ही थी उसकी बात
दिन सुहाना था वहां
और शांत लग रही रात ।
पूछा था भगवान से
स्वर्ग और नर्क हैं क्या
और उसने मुझे
ये सब कुछ दिया था दिखा ।
घबराने लगा जब मैं
थाम कर तब मेरा हाथ
बतलाई थी भगवान ने
तब मुझे सारी बात ।
श्रधांजली सभा होती है
सब के मरने के बाद
सब मिल कर जहां
करते हैं मुझसे फ़रियाद
स्वर्ग लोक में दे दूं
सबको मैं कुछ स्थान
बेबस हो गया हूं मैं
अपने भगतों की बात मान ।
शोक सभाओं में
ऐसा भी कहते हैं लोग
स्वर्ग लोक को जाएगा
आये हैं जो इतने लोग ।
देखकर शोकसभाओं की भीड़
घबरा जाता हूँ मैं
मुझको भी होने लगा है
लोकतंत्र सा कोई रोग ।
कहां जाना चाहते हो
सब से पूछते हैं हम
नर्क नहीं मांगता कोई
जगह स्वर्ग में है कम ।
नर्क वालों के पास
है बहुत ही स्थान
वहां रहने वालों की
है अलग ही शान
रहते हैं वहां
सब अफसर डॉक्टर वकील
बात बात पर देते हैं
वे कोई नई दलील ।
करवा ली हैं बंद मुझसे
नर्क की सब सजाएं
देकर रोज़ मानवाधिकारों की दुआएं ।
बना ली है नर्क वालों ने
अपनी दुनिया रंगीन
मांगने पर स्वर्ग वालों को
मिलती नहीं ज़मीन ।
नर्क ने बनवा ली हैं
ऊंची ऊंची दीवारें
स्वर्ग में लगी हुई हैं
बस कांटेदार तारें
नर्क में ही रहते हैं
सब के सब बिल्डर
स्वर्ग में बन नहीं सकता कोई भी घर ।
स्वर्ग नर्क से दूर भी
बैठे थे कुछ नादान स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।
फुटपाथ पे पड़ा हुआ था
जिनका सामान
उन्हें नहीं मिल सका था
दोनों जगह प्रवेश
जो रहते थे पृथ्वी पर
बन कर खुद भगवान ।
किया था भगवान ने
मुझसे वही सवाल
स्वर्ग नर्क या है बस
मुक्ति का ही ख्याल ।
कहा मैंने तब सुन लो
ए दुनिया के तात
दोहराता हूँ मैं आज
एक कवि की बात ।
मुक्ति दे देना तुम
गरीब को भूख से
दिला सको तो दिला दो
मानव को घृणा से मुक्ति
और नारी को
दे देना मुक्ति अत्याचार से
मुझे जन्म देते रहना
बार बार इनके निमित ।
मित्रो
मेरे लिये स्वर्ग की
प्रार्थना मत करना
न ही कभी मेरी
मुक्ति की तुम दुआ करना
मेरी इस बात को
तब भूल मत जाना
मेरी श्रधांजली सभा में
जब भी आना ।






