अगस्त 14, 2022

जादूगर शहंशाह की कथा ( तरकश / कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

  जादूगर शहंशाह की कथा ( तरकश / कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

सदियां बदल गई युग बदलते रहे झूठ बोलने वाले सभी को छलते रहे , भोले भाले लोग झांसे में आकर घर लुटाते रहे चालबाज़ फूलते फलते रहे। ठगी का कारोबार दुनिया भर में शान से चलता है चोर डाकू चाहे कितना धन दौलत जमा कर लें जीवन भर भटकते रहते हैं ठग नाम शोहरत ऐशो आराम से सपने दिखला सब से वाहवाही लूटते चैन से रहते हैं । जादू का खेल दिखलाना जादूगरी कहलाता है फिर भी देखने वाले समझते हैं नज़र आने वाला दृश्य झूठा छल है , जैसे दुष्यंत कुमार कहते हैं :- 

     ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो । 

    जादू आशिक़ भी किया करते हैं और हुस्न वालों का जादू कब किसी को दीवाना कर दे कोई नहीं समझ पाता। राजनीति और सिनेमा में करिश्मा अभिनेता नेता नायिका का ग़ज़ब ढाता है मगर कब किसी का करिश्मा काम नहीं आये बेअसर हो जाये कोई नहीं जानता। ऐसा पहली बार देखा किसी की जादूगरी का नशा ऐसा चढ़ा है कि लोग ज़हर भी ख़ुशी ख़ुशी पीने लगे हैं । उसकी अदाएं निराली हैं मीठी मीठी बातें मतवाली हैं । लोग बेकार नहीं रोज़गार नहीं बजाते थाली हैं देते ताली पर ताली हैं । उसका नशा छा गया है धरती पर झूठ का फ़रिश्ता आकर दुनिया को तिलस्म से भरमा गया है । उसने सबको अपने जादू से सम्मोहित किया है पास उसके सत्ता का जलता दिया है लोग खुद बनकर बाती जलते हैं राख होने तक अरमान पलते हैं । सिसकियां भरना नसीब हो गया है रोते रोते ज़माना गहरी नींद सो गया है । जादूगरी से मिला कुछ भी नहीं सब अपना गुम हो गया है । खिलाता ख़ास लोगों को मीठा बताशा है कोई तमाशबीन बन गया है हर शख़्स बन गया तमाशा है । ख्वाबों ख्यालों की बेचता मिठाई है दुकान नहीं कोई शोरूम नहीं इक तस्वीर ऑनलाइन मिलती है स्वाद लाजवाब है बिना चखे सब कहते हैं । राजा नंगा है कहानी जैसे लोग शहंशाह के मुल्क में रहते हैं । निदा फ़ाज़ली जी की ग़ज़ल सुनते हैं। 
 
 
मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है

औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है

जब-जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनियादारी है

ऐब नहीं है उसमें कोई , लाल परी न फूल गली
यह मत पूछो, वह अच्छा है या अच्छी नादारी है

जो चेहरा देखा वह तोड़ा , नगर-नगर वीरान किए
पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेज़ारी है ।
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 

अगस्त 10, 2022

देशभक्ति का प्रमाणपत्र ज़रूरी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    देशभक्ति का प्रमाणपत्र ज़रूरी (  तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      क्या आपके पास है प्रमाणपत्र , मुझे भी ज़रूरत है , बता दो कहां से मिलेगा। बहुत जल्दी में घबराये हुए आये और सवाल दाग दिया। समझ नहीं आया कैसा प्रमाणपत्र , धर्म जाति का , अगड़े पिछड़े का , किसी संस्था के सदस्य होने का। पूछा आराम से बैठो तो फिर कहो क्या चाहते हो। बोले बैठने को फुर्सत नहीं राजधानी जाना है , सुना है इसकी ज़रूरत पड़ेगी। हमने कहा किस प्रमाणपत्र की , क्या आधार कार्ड परिचय को। नहीं वो तो है पर मैं देशभक्त हूं इसके सबूत का कोई प्रमाण नहीं मेरे पास। मैंने पूछा आप देशभक्त हैं इसका सबूत कौन मांगता है , हर कोई देशभक्त होने की बात कह सकता है। वो बोले भाई आजकल इस पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है हर जगह , टीवी चैनेल से लेकर सड़क तक। जो किसी को देशद्रोही नहीं मानता उसको देशभक्त नहीं मानते , जो किसी की देशभक्ति का कायल है वही देशभक्त है। कुछ समझ नहीं आया कौन देशभक्त कौन देशभक्त नहीं। हमने कहा भाई आजकल देशभक्ति की क्या आवश्यकता पड़ गई वो तो कब की प्रचलन से बाहर है। जब देश आज़ाद है तब क्या करना देशभक्ति का , मौज मस्ती करो और देश प्रेम के गीत गाओ , इतना काफी है। मगर वो फिर भी अड़े हुए हैं कि राजधानी जाने से पहले इक तमगा लगा कर जाना ही है। उनको जाकर इसी विषय पर चर्चा में हिस्सा लेना है। उनकी तसल्ली को आज़ादी के मुकदमें किताब निकाली ताकि देशभक्तों की जीवनी पढ़कर समझ सकें ये क्या चीज़ होती थी। तब पता करेंगे किसी बाजार से मिलती है या नहीं , पहले मालूम तो हो कहते किसको देशभक्ति। 

               इतिहास में कहीं नहीं मिला किसी ने खुद को देशभक्त साबित करने को किसी को कोई सबूत दिखलाया हो , न ही किसी ने दूसरे से मांगा ही कोई सबूत। क्या आजकल के सब नेता प्रशासनिक अधिकारी देश के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखते हैं , निस्वार्थ भाव से देश को अपनी सेवा देते हैं। क्या वो भी देशभक्त हैं जो सत्ता की खातिर कुछ भी करने को तैयार हैं , साम दाम दंड भेद सभी अपनाते हैं कुर्सी पाने को।

     या सब दूसरे को देशद्रोही घोषित कर मानते हैं इसी से वो देशभक्त हैं। तभी पता चला अपने नगर में भी आज इक जलूस निकाला जा रहा है , मशाल लेकर और नेता जी की प्रतिमा पर जाकर अपने खून से इक पोस्टर लिख राजधानी भेज रहे हैं। जाना पड़ा समझने को। जाकर देखा इक डॉक्टर सिरिंज से एक सी सी ब्लड निकाल इक बोतल में एकत्र करता जा रहा है , उसका उपयोग प्रमाणपत्र बनाने को किया जाना है। अभी दस लोगों की धमनियों से खून लिया था और सौ लोग कतार में खड़े थे , कोई पूछ रहा था इस तरह खून देने से कोई नुकसान तो नहीं होगा , किसी तरह का कोई रोग तो नहीं होगा , आपकी सिरिंज की सुई कीटाणुरहित तो है। कोई दूसरा सवाल कर रहा था कि सब अलग अलग ग्रुप के ब्लड को एक साथ जमा करना क्या उचित है। क्या सब का ब्लड ए , बी , ओ , और एबी , के लेबल से नहीं रखना चाहिए। कोई हिचकिचा कर ऊंची जाति नीची जाति के खून को एक साथ रखने पर सवाल कर रहा था। तभी राज्य स्तर के नेता जी आये और उनके साथ इक सहयोगी इक बाल्टी जिस में लाल रंग का पदार्थ भरा दिखाई दे रहा लिए हुए था। नेता जी ने समझाया और किसी को रक्तदान नहीं करना है , खून का रंग पक्का नहीं होता खून से लिखे प्रमाणपत्र जिन के पास थे भी नष्ट हो गये या कर दिए गए। ये रंग जिस कंपनी का है उसका दावा है पांच साल तक रंग कायम रहने का। जो लोग खून दे चुके उनकी फोटो टीवी और अख़बार वालों को दिखा देंगे , बाक़ी सभी के लिए इस रंग की सिहायी से लिख प्रमाणपत्र दिये जायेंगे , चंदा लेकर। आप चंदे की रसीद की फ़िक्र मत करना , कानून भले बीस हज़ार की या फिर दो हज़ार की सीमा बताये आप लाखों दे सकते बिना किसी पैन नम्बर के भी।

                    तभी हैलीकॉप्टर से देश के नेता जी भी पहुंच गये सभा स्थल पर , उन्होंने आते ही भाषण देना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया आपको कुछ नहीं करना है , हम राजधानी से प्रमाणपत्र बनवा साथ लाये हैं , मगर लाल रंग हमारा नहीं है इसलिये लाल को छोड़ हर रंग का प्रमाणपत्र है। हम किसी एक दल के नहीं हैं गठबंधन में सभी का अपना अपना रंग तो है ही और वक़्त बदलते हम खुद भी रंग और दल कपड़ों की तरह बदलते रहते हैं। जिसको नीला पसंद उसको नीली स्याही वाला , जिसको काला पसंद उसे काली वाला , हरा , पीला सतरंगा सभी हैं अभी ले सकते।  जिस को दुविधा है जितने रंग के चाहे खरीद सकता है। देशभक्ति किसी एक रंग की नहीं हो सकती। आपको देश को कुछ भी नहीं देना , दो बूंद खून भी नहीं , बस ज़ोर ज़ोर से वही दोहराना है जो मंच से बोलने वाला बोलने को कहे। सत्ता का राग अपने राग को मिला एक सुर में जुगलबंदी करते अलापना है। राग दरबारी सभी को सीखना ज़रूरी है। याद रखना बयालीस साल पहले जो हुआ था , इक लोकनायक ने भाषण दिया था कि सुरक्षाकर्मी सरकार के आदेश पर बेकसूर जनता पर गोली नहीं चलाएं दमन नहीं करें , और उसको बगावत को  भड़काना कहकर आपात्काल घोषित किया गया था। सत्ता को गंधर्व राग सुनना है तो आपको गदहे की तरह मधुर स्वर में जय जयकार करनी होगी।  इक सबक ध्यान रखना है हम देशभक्त हैं इसके प्रमाणपत्र की कीमत तभी है जब हम साथ मिलकर शोर मचाते रहें कि जो हमको देशभक्त मानते नहीं वो असली देश भक्त नहीं हैं। दूसरे की देशभक्ति पर सवाल उठाकर ही खुद अपने आप देशभक्त साबित हो जाते हैं। जो खाली जेब आये थे उनको प्रमाणपत्र नहीं मिल सका , सब पैसे वाले , साधनयुक्त लोग , अपना अपना प्रमाणपत्र सोशल मीडिया पर दिखला रहे हैं। देशभक्ति आजकल फेसबुक व्हाट्सऐप और ट्विटर पर ही अधिकतर होती है।  
 

                                      नया अध्याय :-

 
   ये सात साल पुरानी रचना है ऊपर दोहराई गई है। अब देशभक्त होने का प्रमाण सबको हासिल हो सकता है मिल रहा है जगह जगह घर घर गली गली नगर नगर गांव गांव जिसको चाहिए ले कर प्रदर्शित कर सकता है । मान्यता सरकारी खुद ब खुद मिल जाएगी जिस ने तमगा लगाया होगा उस से कोई सवाल नहीं कर सकेगा। लगता है बहुत जल्दी देशभक्ति का नशा समाज देश पर इस कदर छा जाएगा कि धनवान उद्योगपति बड़े बड़े पैसे वाले रिश्वतखोर अधिकारी से घोटालेबाज़ नेता तक अपना काला सफेद धन देश को देकर  समाज से गरीबी भूख बेरोज़गारी बड़े छोटे का भेदभाव खत्म कर वास्तविक आज़ादी सब को समानता न्याय की लेकर ही रहेंगे। 
 

 

जुलाई 28, 2022

देशभक्ति तमाशा बन गई ( तरकश ) डा लोक सेतिया

        देशभक्ति तमाशा बन गई ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     कुछ लोग गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं। देशभक्ति की बात हो रही है। कोई सवाल उछालता है , ये क्या चीज़ है , सुना है बड़े काम आती है आजकल। एक नवयुवक बताता है मनोजकुमार की फिल्म का गीत गाना देशभक्ति का काम है , मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। जो जितना ऊंचे स्वर में गाता है वो उतना ही महान देश भक्त समझा जाता है। वैसे और भी गीत हैं , कुछ सरकारी विज्ञापन भी हैं , मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा एवं कम-आन इंडिया , दिखा दो। ये भी देशप्रेम को प्रदर्शित करने का ही काम करते हैं। क्रिकेट का खेल देखते हुए तिरंगा लहराना और अपने चेहरे या वस्त्रों को तिरंगे के रंगों में रंगना भी देशप्रेम का प्रमाण है। छबीस जनवरी या पंद्रह अगस्त को दूरदर्शन का सीधा प्रसारण देखते हुए गप शप करना हो , चाहे छुट्टी का मज़ा लेते हुए पिकनिक मनाना ये भी देशभक्ति का ही अंग हैं। देशभक्ति ही वो सलोगन है जो प्रतियोगिता में जीत दिलवा सकता है। ये वो फार्मूला है जो हमेशा हिट रहता है , सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सुंदरियां तक अपने जवाबों में इसकी मिलावट करके अच्छे अंक बटोर सकती हैं। इसलिये वे देश से अनपढ़ता और गरीबी को मिटाने के उदेश्य की बात करती हैं। मगर जब प्रतियोगिता में जीत जाती हैं तब इन सब को भूल कर बड़ी बड़ी कंपनियों के विज्ञापन करने और चमक दमक वाले कार्यक्रम करती हैं देशभक्ति समझ कर। 
 
     देशभक्ति वो विषय है जिसपर कुछ खास दिनों में लिखता है लेखक , छापते हैं अखबार वाले और पत्रिका वाले। अध्यापक को भी ये विषय पढ़ाना होता है छात्रों को ताकि परीक्षा में अच्छे अंक मिल सकें। इस सबक को समझना ज़रूरी है न ही समझाना ही। रटने का सबक है , तोते की तरह हम सब रटते रहते हैं। कुछ अन्य लोगों के लिये ये एक रंगारंग कार्यक्रम की जैसी है वे देशभक्ति के नाम पर कितने ही आयोजन आयोजित किया करते हैं। कभी किसी दौड़ का नाम , कभी मानव श्रृंखला बनाकर प्रदर्शित की जाती है देशभक्ति। पहले कभी देशभक्ति के मुशायरे और कवि सम्मलेन भी आयोजित किये जाते थे मगर आजकल उनका चलन बाकी नहीं रह गया। अब देशभक्ति पर पॉप संगीत के कार्यक्रम सफल होते हैं। आई लव माई इंडिया गाते हुए नाचना इस युग की वास्तविक देशभक्ति समझी जाती है। इस नज़र से देखो तो युवा पीढ़ी देशभक्ति से भरी पड़ी है।

          इन दिनों कई तरह की देशभक्ति दिखाई देती है। आधे घंटे का सीरियल जिसमें दो कमर्शियल ब्रेक हों , और तीन घंटे की फिल्म भी जिसको कई कंपनियां मिल कर प्रयोजित करें। टीवी के हर चैनेल में देशभक्ति का तड़का ज़रूरी है , उदेश्य भले पैसा बनाना ही हो , बात देश प्रेम की ही करनी होती है। सब चैनेल अपने को बाकी से बड़ा देशभक्त साबित करने का प्रयास करते हैं। इन टीवी सीरियल और फिल्मों के नाम और विज्ञापन लुभावने तो होते हैं मगर देखने पर इनका प्रभाव दूसरा ही नज़र आता है। दर्शक सोचते हैं कि देशभक्ति कोई समझदारी का काम नहीं है। बस एक बेवकूफी है , पागलपन है। क्या मिला देशभक्तों को जान गवांने से , क्या काम आई उनकी कुर्बानी। न देश को कुछ मिला न जनता को। बस मुट्ठी भर लोगों ने सब की आज़ादी को , लोकतंत्र को ढाल बना अपनी कैद में कर लिया। आजकल ज़रा दूसरी तरह की देशभक्ति होती है , आंदोलन होते हैं , दंगा फसाद करवाते हैं , तोड़ फोड़ की जाती है। जनता को मूर्ख बना सत्ता हासिल करने को समझौते किये जाते हैं। चुनाव जीत सरकार बनाते ही सब भूल कर वही दुहराते हैं जिसका विरोध किया था। शासक बन ऐश करते हैं , झंडा फहराते हैं ,सलामी लेते हैं , देशभक्त कहलाते हैं। अफ्सर लोगों के लिये देशभक्ति ऐसा ब्यान है जिसे कभी भी किसी भी अवसर पर दिया जा सकता है। जनता के धन से खुद हर सुख सुविधा का उपयोग करते हुए गरीबों की हालत से दुखी होने की बातें करना और गरीबी मिटाने को कागज़ी योजनायें बना उनको कभी सफल नहीं होने देना , देश के विकास के झूठे आंकड़े बनाना देशभक्ति है। सत्ताधारी नेता की चाटुकारिता , मंत्री के आदेश पर हर अनुचित कार्य करना , पद का दुरूपयोग करना भी देशभक्ति है।

           नेताओं के लिये देशभक्ति ऐसा नशा है जिसको अपने भाषणों द्वारा जनता को पिला मदहोश कर उससे मनचाहा वरदान पा सकते हैं। देश को लूट कर खाने वाले नेता डंके की चोट पर देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का दावा करते हैं। चुनाव करीब आते ही नेताओं पर देशभक्ति का ज्वर चढ़ जाता है। हर नेता नई रौशनी लाना चाहता है , सत्ता मिलते ही फिर अंधेरों का सौदागर बन जाता है। एक बार कुर्सी मिल जाये तो हर नेता उसे अपनी बपौती समझने लगता है। देशभक्ति इनके लिये कारोबार है , कभी गल्ती से देशभक्ति के नाम पर कोई जेलयात्रा कर आया हो तो वो ही नहीं उसका परिवार भी मुआवज़ा पाने का हकदार बन जाता है। कुछ लोगों की देशभक्ति जनता पर चढ़ा हुआ ऐसा कर्ज़ है जिसका भुगतान करते करते उसकी कमर टूट चुकी है , तब भी वो चुकता नहीं हो रहा , कुछ लोगों के वारिसों को उसका ब्याज ही मिला है , असल बाकी है। 
 
    आज़ादी मिले 75 साल होने को हैं आज़ादी की आयु की चर्चा होने लगी है , वर्षगांठ मनाते मनाते पचीसवीं पचासवीं से पिहचतरवीं तक संख्या पहुंच गई है । गुलामी सैंकड़ों साल की रही है आज़ादी को सौ वर्ष होने को अभी 25 साल और कौन इंतज़ार करता । कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , वास्तव में आज़ादी के अर्थ तक बदले गए हैं । आज़ादी खो गई है या कहीं गुम है , अभी पिछले दिनों इक पुरानी फिल्म " मैं आज़ाद हूं " दोबारा देखी टीवी पर । अमिताभ बच्चन जी का किरदार लाजवाब है इक अखबारी कॉलम लिखने वाले का काल्पनिक किरदार जनता से सरकार तक शोहरत हासिल कर लेता है । ऐसे में इक बेबस भूखे गरीब को लालच देकर नकली आज़ाद बन कर सबको दिखलाना पड़ता है । टीवी पर अमिताभ बच्चन जी कौन बनेगा करोड़पति शो का संसाचल करते हैं कितने सालों से , विज्ञापन टीवी पर दिखलाया जा रहा है आज़ादी की पिहचतरवीं वर्षगांठ मनाने को लेकर । फिल्म में आज़ाद ख़ुदकुशी कर मर जाता है  , उसको मारने की कोशिशें करने वाले उसको ख़ुदकुशी नहीं करने देना चाहते बल्कि क़त्ल करने की कोशिश करते करते बचाने की ज़रूरत महसूस करते हैं । अमिताभ बच्चन को अपनी असफल रही कमाल की फिल्म की याद कभी न कभी आती होगी , 7 अगस्त को शो की शुरुआत करते हुए किरदार की कड़वी याद आए तो उनका तमाशा सिर्फ तमाशा बन जाएगा । ये देश आजकल तमाशाओं के भरोसे चल रहा है । देशभक्ति का खेल तमाशा इस दौर का सबसे अधिक बढ़िया कारोबार बन गया है । कौन खिलाड़ी है कौन तमाशा दिखलाता है और तमाशाई कौन है सवाल सबसे बड़ी उलझन है। कीमत बढ़ कर सात करोड़ पचास लाख हो गई है करोड़पति बनाते बनाते लोग कंगाली में आटा गीला होने की चिंता करते हैं।



जुलाई 24, 2022

माली की नज़र में प्यार नहीं ( फूल चमन में कैसा खिला ) डॉ लोक सेतिया

माली की नज़र में प्यार नहीं ( फूल चमन में कैसा खिला ) डॉ लोक सेतिया 

कल किसी की पोस्ट पढ़कर न जाने कितनी बातें अंतर्मन में उभरती रहीं । कुछ अजीब बात या किसी की सिमित दायरे की समझ की बात है । लिखा था जो माता पिता अपनी संतान के परीक्षा में बढ़िया प्रदर्शन पर गौरव और ख़ुशी जताते हुए पोस्ट लिखते हैं उनको पढ़कर कम अंक पाने वाले बच्चे हीनभावना का शिकार हो जाते हैं । ये समझने का सही ढंग नहीं है लेकिन उनकी बात को अनदेखा नहीं कर सही पक्ष सामने रखना ज़रूरी है । विस्तार से इसकी चर्चा करते हैं । माता पिता भाई बहन दादा दादी एवं दोस्त रिश्तेदार पीठ थपथपाते हैं तो बढ़ावा देते हैं और महनत करने सफलता अर्जित करने को । समस्या उनको लेकर है जिनकी आदत होती है अपनी संतान की तुलना अन्य किसी से कर उस में हीनभावना पैदा करने की । उनको अपने बच्चे को समझना चाहिए और उसकी प्रतिभा को जानकार उनको जिस कार्य में रूचि है उसी क्षेत्र में शिक्षा अथवा कार्य करने को प्रोत्साहन देना चाहिए । जब अपने ही परिवार के सदस्य किसी से तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करते हैं तब ठीक वैसा होता है जैसे कोई छोटा सा पौधा किसी बंजर ज़मीन पर उग आया हो जहां बाड़ बनकर खेत की रखवाली वाला बागबां उस को मसलता कुचलता है । कोई नहीं जानता ऐसा अनचाहा पौधा कैसे खुद को बचाए रखता है हर दिन कोई पैरों तले कुचलता है कोई जानवर खा जाता है लेकिन वो फिर फिर उगता रहता है । अनचाहा बनकर जीना कितनी बार मरना होता है । 
 
जीवन में सब किसी की मर्ज़ी से नहीं होता है और खुश होकर जीने का आनंद लेना चाहते हैं तो जो मिलना संभव नहीं उसकी चिंता छोड़ कर जो हासिल है उसकी कीमत और अहमियत समझनी चाहिए । अजीब बात है जिस से मनचहा सभी कुछ पाना चाहते हैं उसी को गरियाते लताड़ते रहते हैं । नफ़रत तिरिस्कार ज़हर की तरह होते हैं जीवन को फलने फूलने नहीं देते हैं । प्यार भरे शब्द अपनेपन का व्यवहार नई ऊर्जा नए साहस का संचार करते हैं । आप धन वैभव ताकत भौतिक सुविधाओं से आपसी रिश्तों में मिठास और भरोसा नहीं जगा सकते हैं साधन मिलने से वास्तविक संतोष और खुशी नहीं मिलती है । कस्तूरी मृग की तरह भीतर के एहसास को समझे बगैर हम मृगतृष्णा के पीछे भागते भागते बिना जिए मर जाते हैं । शायद हमारी अनावश्यक कामनाओं अधिक और सब कुछ आसानी से पाने की आरज़ू ने भीतर के अमृतकलश के प्यार को सुखा दिया है । सब चाहते हैं उनको प्यार अपनापन मिले मगर खुद बांटते नहीं प्यार दुनिया में , हर किसी से टकराव अहंकार नीचा दिखाने की भावना ने आपसी सद्भाव और पारस्परिक मेल मिलाप को बर्बाद कर दिया है । संबंध औपचरिकता निभाने को सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर बधाई शुभकानाएं अभिवादन तक रह गए हैं । दोस्ती रिश्ते नाते जब कारोबारी नज़र से दिखाई देते , बनते-बिगड़ते हैं तब उनका हासिल कुछ भी नहीं रहता है । ढाई आखर प्यार वाले पढ़ना पढ़ाना छोड़ दिया है । चमकती हर चीज़ सोना नहीं होती है । अनमोल हीरे की परख नहीं पत्थर को जाने क्या समझने लगे हैं समंदर किनारे सीपियां मिलती हैं मोती गहराई में जाकर तलाश करने पड़ते हैं । नाम शोहरत पाने और अपने को सबसे बड़ा या ऊंचा साबित करने की कोशिश ने छोटा बना दिया है नैतिक गिरने को ऊपर उठना नहीं कहते हैं । अपने किरदार को सच के दर्पण  में देखना कठिन है दुनिया पर उंगली उठाना सब जानते हैं ।
 
 

जुलाई 20, 2022

ज़ालिम को फ़रिश्ता कहना है ( व्यंग्य-कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 ज़ालिम को फ़रिश्ता कहना है ( व्यंग्य-कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

    घोषणा करता हूं ये वास्तविक कहानी है कोई कपोल कल्पना नहीं ,  अक्सर फ़िल्म वाले अलग ढंग से बताते हैं , ये काल्पनिक कथा है किसी से सरोकार नहीं घटना का । वास्तव में असली बात सच को झूठ से मिला कर पेश करते हैं अभिनय करने वाले लोगों का नाम तौर तरीका पहनावा सब किसी किरदार से मिलता जुलता है । दर्शक वही समझते हैं जो निर्देशक चाहता है समझाना , यहां नाम चेहरे नहीं मिलते लेकिन किरदार असली हैं हमारी वास्तविक दुनिया वाले । बात की शुरुआत करते हैं आधुनिक युग की असलियत को जानते समझते हुए कि शराफत ईमानदारी सच्चाई आत्मा की आवाज़ नैतिक मूल्य बड़े आदर्श आजकल बेकार की बातें समझी जाती हैं किताबी और उपदेश देने को अमल करने को हर्गिज़ नहीं । इस कहानी को इक निर्माता-निर्देशक की तलाश है ।
 
  शोर ही शोर है चहुंओर है चोर नहीं है चौकीदार है ज़रा मुंहज़ोर है । मनमौजी है शाही लिबास है दुनिया भर में वही सबसे ख़ास है । सिंघासन पर बैठा अंधेरा है रौशनी उसी के पास है । उसका बड़ा नाम है , ऊंचा सबसे दाम है , दुनिया सब बेनाम है , जाने कौन गुमनाम है अनजान है , फिर भी निराली शान है। लंगड़ा उसका घोड़ा है दौड़ा दौड़ा दौड़ा है जिसके हाथ में लाठी है भैंस उसी की हो जाती है । सब कुछ जिसने तोड़ा है साबुत कुछ नहीं छोड़ा है उसका बड़ा कमाल है बेचा घर का सारा माल है उसका शौक निराला है तन गोरा है मन काला है । तिजोरी का रखवाला है खुल जा सिम सिम का ताला है अलीबाबा चालीस चोर है हिजाब है न कोई नकाब है बेहिसाब सब हिसाब है । उसका बही-खाता है जो मसीहा उसको बताता है मनचाही मुराद पाता है । घर फूंक तमाशा देखने वाला इस कहानी पर फिल्म बना सकता है पटकथा तैयार है ये सिर्फ इक छोटा सा दृश्य है जैसे इक इश्तिहार है ।
 
कहानी का नायक मसीहा कहलाता है ज़ुल्म भी करता है तो लोग आह नहीं भरते वाह-वाह करते हैं । ग़ज़ल पेश है :-

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) 

डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

रंक भी राजा भी तेरे शहर में
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में।

नाव तूफां से जो टकराती रही
वो किनारे जा के डूबी लहर में।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है
रोक रोने पर भी है अब कहर में।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में।
 
मत कभी सिक्कों में तोलो प्यार को 
जान हाज़िर मांगने को महर में। 
 
अब समझ आया हुई जब शाम है 
जान लेते काश सब कुछ सहर में। 
 
एक सच्चा दोस्त "तनहा" चाहता 
मिल सका कोई नहीं इस दहर में।
 
 
 

 



 

जुलाई 16, 2022

ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

  ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजब-ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया 

उसको लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है वहां चोर लुटेरे ठग अपराधी गुंडे बदमाश शान से बैठते हैं ये राजनीतिक दलों की मज़बूरी है सत्ता पाने को दूसरा कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। धनबल बाहुबल झूठ धोखा फरेब कपट सब करना पड़ता है जनता को उल्लू बनाने की खातिर अन्यथा नेताओं की मंशा उनकी सत्ता हासिल कर मनमानी करने की हवस की वास्तविकता मालूम हो तो ज़मानत ज़ब्त हो जाये। लेकिन बड़ी बदनामी होती है जब रिश्वत भ्रष्टाचार घोटाले और बहुमत के दम पर तानाशाही करने को देश समाज की भलाई साबित किया जाता है और कुछ निडर लोग विपक्ष वाले या बिना बिके मीडिया वाले झूठ को झूठ बताने की बात करते हैं । उस तथाकथित मंदिर में भले जैसा भी व्यक्ति सुशोभित होता है उसको आदरणीय माननीय कहना होता है उनको लेकर असभ्य शब्द उपयोग नहीं किये जाने चाहिएं। अब चाहे उनका किरदार कैसा हो उनकी सोच कितनी घटिया हो और उनको सही गलत की कोई समझ नहीं हो और उनको अपनी ज़ुबान पर बोलते समय लगाम लगाना नहीं आता हो नासमझ बच्चों की तरह शरारत करना उनकी आदत हो उनको अनुशासन सिखाना ज़रूरी है। घर की भीतर की बात बाहर नहीं जानी चाहिए आपस में टकराव का असली कारण देश की जनता को पता नहीं लगने देना है और विश्व भर में सबसे बड़े लोकतंत्र कहलाने का क्या लाभ जब ये सब को समझ आने लगे कि यहां लठ तंत्र लूट तंत्र और झूठ का बोलबाला है । सत्यमेव जयते लिखा हुआ है मगर सत्य से किसी को कोई मतलब नहीं है। 
 
फ़िल्मी नायक जिनकी आदत होती है डायलॉग बोलने की और सिनेमा पर अपनी ताकत और शक्ति दिखाकर दर्शकों की तालियां बटोरने की उन से भाषण सभाओं में नर्म मुलायम शब्दों का उपयोग करने की आपेक्षा करना व्यर्थ है। टीवी फिल्म से लेकर न्याय-व्यवस्था स्थापित करने वाले सभी अंगों में नियुक्त लोग लाठी डंडे और ज़ोर ज़बरदस्ती सब करने को जायज़ समझते हैं यहां तक कि सत्ताधारी शासक के अनुचित गैर कानूनी आदेश का पालन करते हर देश और संविधान की भावना नागरिक आज़ादी और विचारों को अभिव्यक्त करने के मौलिक अधिकार तक की अवेहलना करते हैं । ऐसे खतरनाक भयानक वातावरण को छोड़ शब्दों के बोलने पर रोक लगाने की चिंता करना ऐसा है जैसे भीतर जिस्म सड़ा गला हो सभी अंग बेकार हों लेकिन उसके बहरी पहनावे की सुंदरता और बुझे हुए चेहरे के पीलापन उदासी निराशा को ढकने को सजाने की कोशिश की जाए। 
 
शराबखाने में शराब पीने की छूट हो मगर होश की बात करने की शर्त हो , किसी जिस्म फ़रोशी के बाज़ार में गंदा धंधा करने की आज़ादी हो पर वहां गाली गलोच की भाषा पर ऐतराज़ हो । अजब ग़ज़ब है घर गली दफ़्तर से टीवी सीरियल सिनेमा तक शराफत की तहज़ीब की धज्जियां उड़ाना खराब नहीं है बस उन सभी बातों को छुपाए रखना अनिवार्य हो । कल चमन था आज इक सहरा हुआ , देखते ही देखते ये क्या हुआ।
मुझ को बर्बादी का कोई ग़म नहीं , ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ। 
 



 

जुलाई 14, 2022

सात्विक भाषा के शब्द का शब्दकोश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   सात्विक भाषा के शब्द का शब्दकोश ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

वहां कोई अपराधी कोई झूठा कोई रिश्वतखोर निर्वाचित होकर नहीं बैठ सके ये करना संभव नहीं है स्वीकार कर लिया गया है। लेकिन भरी सभा में झूठ भ्रष्टाचार जैसे शब्द उपयोग नहीं किए जाएं ऐसा करना मुमकिन हो सकता है उन शब्दों पर प्रतिबंध लगा सकते हैं । किसी नियम बनाने से सभी को ईमानदार बनाया नहीं जा सकता तो क्या हुआ बेईमानी करने वाले को बेईमान नहीं कहा जाए ये नियम लागू किया जा सकता है । मगर चिंता नहीं करें नेताओं को सत्ताधारी या विपक्ष वालों को भाषण देते समय अपशब्द बोलने से लेकर गोली मारो सालों को से हिंसा और नफरत फ़ैलाने की छूट रहेगी । कल तक जो सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी पर ब्यान दे रहे थे कि टीवी पर किसी शासक दल के प्रवक्ता को अपने ब्यान की क्षमा मांगनी चाहिए उनको इस बदलाव पर खामोश रहना उचित होगा । सभ्यता मर्यादा शिष्टाचार का पालन सिर्फ एक जगह होना चाहिए अथवा हमेशा हर जगह ऐसे सवालों के जवाब खोजने लगे तो कितने सवाल खड़े हो सकते हैं । कोई जांच आयोग कितने साल तक शोध करेगा तब सामने आएगा पिछले इतने सालों में किस किस ने कितनी बार ऐसे असभ्य शब्दों का उपयोग किया है । कोई शरीफ़ शराफ़त से चर्चा करता शायद ढूंढना कठिन लगे हर किसी ने कोई न कोई शब्द कभी न कभी उच्चारित किया होगा चोर को चोर क़ातिल को क़ातिल घोटाला करने वाले को हिस्सा लेने वाला पाए जाने पर अथवा आरोप लगाने को । जब किसी को ऐसा कहना खुद अपराध समझा जाएगा तब जुर्म हुआ होगा मुजरिम सामने होगा फिर भी आरोप लगाना नियम का उलंघन होगा। समस्या गंभीर है इसलिए भाषा विभाग को असभ्य आचरण करने वालों की गरिमा का ध्यान रखते हुए शब्दकोश में प्रतिबंधित शब्दों की जगह पर्यायवाची सात्विक शब्द घड़ने होंगे क्योंकि पुराने शब्द खरे साबित नहीं हुए हैं। 
 
अभी शुरुआत हुई है धीरे धीरे किताबों से कहानियों से ऐतहासिक दस्तावेज़ों से जाने किस किस जगह से संशोधन कर सब फिर से लिखना पढ़ना पढ़ाना होगा । लगता है हमको अभी तक उलटी पढ़ाई पढ़वाते रहे हैं अब सब सीधा करना होगा । जसपाल भट्टी जी नहीं हैं अन्यथा उनकी तमाम बातें उल्टा-पुल्टा होती थी उनकी बोलती बंद हो जाती या ऐसा भी संबव है सरकारी शिक्षा विभाग उन्हीं से नया शब्दकोश बनवाने का अनुबंध करना चाहता । हिंदी भाषा के जानकार विशेषज्ञ पीएचडी वालों को अवसर का उपयोग कर कोई आधुनिक शब्दकोश बनाने का कार्य कर गाली गलोच की जगह आदर सूचक शब्द सुझाने का कार्य शीघ्र करना ज़रूरी होगा।



अल्फ़ाज़ किस को पेश करें ( मुश्किल बड़ी है ) डॉ लोक सेतिया

   अल्फ़ाज़ किस को पेश करें ( मुश्किल बड़ी है ) डॉ लोक सेतिया 

अल्फ़ाज़ एहसास से भरे होते हैं खोखले शब्द निरर्थक होते हैं जिनका कोई मसलब नहीं होता है । मेरी किताबें मुझे जान से अधिक प्यारी हैं ज़िंदगी भर की महनत का नतीजा है । कभी कभी महसूस हुआ है कोई ख़फ़ा ख़फ़ा सा है बात कोई नहीं उसको लगता है मैंने अपनी किताब उसको भेंट नहीं की । उसे पढ़ने में कोई रूचि नहीं है मैं जानता हूं उसको ये फज़ूल की बात लगती है उसको फुर्सत ही नहीं जाने कितने काम हैं उसके लिए ज़रूरी पैसे का कारोबार सबसे महत्वपूर्ण है । धार्मिक सामजिक संस्थाओं से जुड़ना नाम शोहरत सबसे जान पहचान बढ़ाना उसको विचारधारा की नहीं शान ओ शौकत की बात लगती है । जाने कितनी किताबें उसने अलमारी जैसे शोकेस में सजा रखी हैं दिखाने को कभी खोल कर पढ़ी नहीं लेकिन सब जानता है का भाव हमेशा रहता है । जिनको लेकर मुझे लगता है साहित्य से अनुराग है किताबों से लगाव है उनको किताब भेंट की है मगर जब किसी के बारे पता है उनको किताब पढ़ना समय की बर्बादी लगता है उनको किताब देना किताब का निरादर करना लगता है ।
 
सालों पहले किसी के पास इक लेखक की पुस्तक देखी थी और पूछा कैसी लगी आपको , सुनकर हैरान हुआ था उनका दोस्त है उपहार में नहीं बाकायदा कीमत लेकर दे गया है । सौ रूपये निकालो मांग कर किताब थमा गया है उन्होंने उनकी किताब मुझे दे दी थी ऐसा कह कर कि उनके लिए ये किसी काम की नहीं रद्दी की टोकरी में फैंकनी होगी किसी दिन । लोग मुझे जानते हैं खरी खरी बात पसंद हैं इसलिए बतला देते हैं । इक बार उनकी रद्दी की टोकरी से शहर के सबसे बड़े अधिकारी की काव्य रचनाएं उठा लाया था उनके बताने पर कि उन का कर्मचारी प्रेस-नोट के साथ दे गया है । इक शिक्षक जो निजि विद्यालय चलाते हैं राजनेता भी समझे जाते हैं मिलने आये अपने दल की चुनावी पत्रिका भेंट करने मुझे सच पता चला खुद उन्होंने पढ़ा नहीं था उस में क्या लिखा है । मैंने पढ़ कर ब्लॉग पर लिखा था खूबसूरत कवर और बढ़िया कागज़ अच्छी छपाई है मगर झूठ का पुलिंदा है तथ्य और वास्तविकता से कोई नाता नहीं क्या चुनावी घोषणापत्र ऐसे होते हैं जिसको पढ़ना किसी काम का नहीं कभी निभाए नहीं जाते जो उन वादों की बात होती है । खैर उन्होंने बताया उनको सिर्फ वही किताबें पढ़ना पसंद है जो आर्थिक फायदे की होती हैं , उनको स्कूल की पढ़ाई की किताबें भी पढ़ने की फुर्सत नहीं मिलती है बच्चों को शिक्षा देने को अध्यापक नियुक्त कर रखे हैं वेतन पर। 
 
ख़ास नाम वाले लोग नेता लोग अधिकारी और उच्च पद पर आसीन लोग सभाओं में मुख्य अतिथि बनकर भाषण देते हैं साहित्य को लेकर समझ नहीं रखते कभी । जाने माने लेखकों की शानदार बातें रटी हुई दोहराते हैं बिना सोचे भी कि उनका विषय से कोई संबंध है भी या नहीं । लेकिन इस बात को जान कर भी कई लिखने वाले उनको अपनी किताब भेंट करते हुए फोटो लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं । कई बार कोई लेखक किसी बड़े साहित्यकार होने का रुतबा पाये व्यक्ति को किताब भेंट कर देता है जिस की रचनाएं कितनी गहराई लिए हों वो खोलते तक नहीं सोचते हैं नवोदित रचनाकार की लिखी कहां उच्च स्तर की होंगी । वास्तव में खुद को बुलंदी पर पाने वाले अन्य को छोटा देखते हैं जैसे पहाड़ पर खड़ा आदमी नीचे के लोगों को कीड़े मकोड़े जैसा देखता है जबकि नीचे से खुद और बौना लगता है पहाड़ पर खड़ा हुआ । शोहरत की बुलंदी हमेशा कायम नहीं रहती है । 
 
आधुनिक लोग पढ़ाई लिखाई समझने ज्ञान पाने को नहीं नौकरी पैसा आमदनी और जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं को हासिल करने को करते हैं ।  उच्च आदर्श और नैतिकता सच्चाई अच्छाई जैसे मापदंड रहे नहीं हैं और धन दौलत से आदर सम्मान को आंका जाता है । वास्तव में अच्छे साहित्य की ज़रूरत आज पहले से अधिक है भटके हुए समाज को राह दिखलाने को अंधकार मिटाने रौशनी लाने को । समस्या गंभीर है हमारे गांव में कहावत है आप बैल को तालाब पर ले जा सकते हैं मगर प्यास नहीं है तो पानी नहीं पिला सकते हैं , छी-छी कहते रहने से बैल पानी नहीं पीता है । पाठक में पढ़ने की प्यास नहीं तो किताब पास होने से कोई फायदा नहीं है । विडंबना है लोग जिन महान पुस्तकों ग्रंथों की उपदेशों की बातें करते हैं उनकी पूजा अर्चना करते हैं अध्यन नहीं करते , उपहार में बांटते हैं ऐसी किताबों को । संविधान की रट लगाने वाले संविधान को पढ़ते समझते नहीं अनुपालन क्या करेंगे । शिक्षित समाज सभ्य तभी हो सकता है जब उसको शब्दों का अर्थ भी मालूम हो । अपने अल्फ़ाज़ व्यर्थ बर्बाद नहीं करें सोच समझ कर पेश करें। गागर में सागर भरने की तरह संक्षेप में इतना कहा है ।

जुलाई 06, 2022

सिर्फ उसी दोस्त के नाम कताबें ( मकसद ) डॉ लोक सेतिया

   सिर्फ उसी दोस्त के नाम कताबें ( मकसद ) डॉ लोक सेतिया 

   ये सवाल इक न इक दिन सामने आना लाज़मी था , मुझे जो भी कहना है इस ज़ालिम ज़माने से नहीं कहना है । किसी को फुर्सत कहां मेरी दास्तां मेरी बात मेरी ज़िंदगी के एहसास दिल के जज़्बात को समझने की । बचपन से जवानी की तरफ बढ़ती उम्र का खूबसूरत ख़्वाब था बस एक दोस्त की तलाश जो मेरा अपना हो पूरी तरह से जीवन भर को । नाम पता मालूम नहीं जाने किस गांव नगर बस्ती गली में रहता हो । पब्लिशर को नहीं समझ आती मेरी मन की बात क्योंकि कारोबार की घाटे मुनाफ़े की बात नहीं है और सामान्य पाठक वर्ग को साहित्य कविता ग़ज़ल कहानी व्यंग्य काल्पनिक रचनाएं लगती हैं या किसी की नाम शोहरत दौलत पाने की चाहत । लेकिन मुझे इनकी ज़रूरत नहीं है , जीवन भर प्यास रही है कोई एक अपना हो जिस को ज़िंदगी की दास्तां सुननी हो मुझे सुनानी भी हो । फिल्म आनंद के बाबुमोशाय या तलाश फिल्म की नायिका की तरह हंस परदेसी के आकर मिलने की आरज़ू । कभी किसी दिन मेरी कोई किताब पढ़कर शायद उसको मेरी ही तरह से ख़्वाब को हक़ीक़त बनाने की तरकीब समझ आ जाए और हम मिल जाएं तब सार्थक होगा मेरा लिखना ।




 
 

जून 02, 2022

चुनाव का अधिकार सभी को है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  चुनाव का अधिकार सभी को है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

अपना अध्यक्ष शहर वाले चुनेंगे , घोषणा होते ही तमाम अन्य क्षेत्रों से मांग आने लगी है उनको भी अपना अपना नुमाईंदा चुन कर सभा गठित करने का अधिकार मिलना चाहिए। सबसे मुखर आवाज़ कुत्तों की है कुत्ते - कुत्ते का अंतर भेदभाव भूलकर गली के आवारा कुत्ते रईस लोगों के नेताओं धनवान लोगों के और आधुनिक महिलाओं के पालतू कुत्ते एक साथ मिल कर अपनी सभा गठित करने को व्याकुल हैं। पुलिस और सरकारी अफ्सरों ने खबर मिलते ही अपने विशेषाधिकार वाले कुत्तों को अलग रहने की हिदायत जारी कर दी है। उनको भर पेट हड्डियां मिलती रहती हैं भौंकने की आज़ादी नहीं दी जा सकती है खाओ जितना गुर्राना मना है। लेकिन उन को शहरी कुत्तों का चुनाव करवाने का कार्यभार सौंपा जा सकता है। जिन लोगों ने कुत्ते पाले हुए हैं उनको अपने पालतू कुत्ते को चुनाव लड़ने की खातिर गले में बांधी पट्टी या रस्सी अथवा ज़ंजीर से मुक्त कर उन्हें छुट्टी देकर उनका साथ निभाना ज़रूरी होगा ऐसा नहीं करने पर उनको पशु विरोधी घोषित कर पशु पालन करने से वंचित किया जा सकता है। सभी जीव जंतु पेड़ पौधे धरती हवा में पानी में रहने वाले पंछी मछलियां कुदरत के लिए इंसान की तरह समान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लेकिन कुत्तों की बात और है कुत्ते अब कुत्ते नहीं रह गए हैं इंसान तक कुत्ता होकर शान से रहने को तत्पर है बल्कि कितने आदमी आदमीयत को छोड़ कुत्तापन अपनाये हुए हैं। कुत्तों ने अपनी आज़ादी की समानता की मांग रखी है साथ ही जिन्होंने कुत्ते पाले हुए हैं उनको इस में सहमत होकर शामिल होने की शर्त लागू कर दी है अन्यथा उनके कुत्ते उन्हीं को काटने को विवश हो सकते हैं। कुत्तों से वफ़ादारी की चाहत रखने वालों को खुद वफ़ादारी निभानी होगी। देश की सरकार राज्य की सरकारों को अपने बनाये सभी नियम कानूनों का पूर्ण रूप से पालन करने को एक मांगपत्र भिजवा दिया गया है। जिनको मालूम नहीं उनको जानकारी देनी ज़रूरी है कि देश का संविधान गधों को तमाम अधिकार देने तक को नियम बना चुका है। 
 
  कुत्तों की निर्वाचित सभा को क्या क्या अधिकार मिलते हैं और कितना बजट मिलेगा इस पर सरकारी बड़े अधिकारी समिति बनाकर अपने कुत्तों को सलाहकार नियुक्त कर सकते हैं। सरकार तय कर चुकी है कि ये सिर्फ और सिर्फ कुत्तों की सभा का गठन और चुनाव कर नुमाईंदा चुनने की बात है बाकी जानवर को इस में शामिल नहीं किया जा सकेगा। भेड़ बकरी गाय भैंस जैसे जानवर वैसे भी केवल करोबारी मकसद के लिए होते हैं जिनको खरीदा बेचा जाता है धंधा करने को मुनाफ़ा देख मूल्य निर्धारित किया जाता है उनको वोट देने चुनाव का हक़ देने की भूल नहीं की जा सकती है। रईस धनवान लोग अपने अपने घर के गेट पर तख़्ती लगवाने की बात पर विचार करने लगे हैं । सर्वसम्मति से घोषित किया गया है कि कुत्ते किसी जाति धर्म संप्रदाय या किसी भी राजनैतिक दल से कोई संबंध नहीं रखते हैं उनका अपना अस्तित्व है जिस को कोई मिटा नहीं सकता है। मुमकिन है सरकार भी इस नई पहल का सेहरा अपने सर बांधने को क्रांतिकारी कदम घोषित कर इतिहास बदलने की बात भाषणों में ज़ोर शोर से उठाकर भविष्य को उज्जवल बनाने का दावा करे। आम आदमी शायद कुत्तों के भाग्य से ईर्ष्या करने लग जाएं। 
 
   अजब विडंबना है जब इंसान चुनाव लड़ने को अपने गले में किसी दल किसी संगठन  के नाम का तमगा बैनर वाला पट्टा ढूंढ रहे हैं क्योंकि उनको किसी बैसाखी की तलाश है चुनावी जीत हासिल करने को खुद पर भरोसा नहीं तब कुत्ते अपने खुद के भरोसे इस भंवर को चुनौती देने को तैयार हैं।

मई 29, 2022

तस्वीर देखी है मुलाक़ात नहीं हुई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   तस्वीर देखी है मुलाक़ात नहीं हुई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   आपको जैसा लग रहा है वैसा हर्गिज़ नहीं है। किसी फ़िल्म की बात नहीं जिस में कोई किसी की तस्वीर लिए उस से मिलने को नायिका के गांव जा रहा है मधुर गीत गुनगुनाता हुआ। न ही उस फ़िल्म की बात है जिस में कोई कलाकार अपनी कल्पना से अपनी महबूबा की तस्वीर बना रहा होता है और नायिका अपनी तस्वीर देख इक अनजाने अजनबी से इश्क़ कर बैठती है। आधुनिक युग में असली तस्वीर से अधिक खूबसूरत तस्वीर किसी ऐप से बन सकती है कैमरे से सुंदर छवि कैद करने का ज़माना खो गया है। माजरा जिस का है वास्तव में लोग उस की तलाश उसकी चाहत अब नहीं करते हैं सब समझदार हो गए हैं कि भगवान को ढूंढना उसको पाना ज़िंदगी भर भटकना है कौन इतनी अनथक कोशिश करे । इक खेल खेलते हैं जगह जगह इमारतों में उसकी निशानियां खोजने लगे हैं और जाने किस किस चीज़ को देख दावा करते हैं कि ये उसी के पांव या कोई अन्य अंग के बाक़ी निशां हैं। सोचता हूं कभी किसी दिन किसी को वास्तविक भगवान मिल जाए तो होगा क्या कुछ ऐसा हो सकता है। 
 
उस खण्डर में घायल फ़टे हुए कपड़े आंखों से बहती अश्रुधारा वाला शख़्स देख सोचने लगे कोई आदमी नहीं कोई भिखारी है जिसको चोरी करते पकड़ किसी ने अच्छी तरह मरम्मत की हो। ऊंची आवाज़ में पूछा उस से कौन हो यहां छिपकर क्या कर रहे हो। उसने जवाब दिया आपको क्या चाहिए क्या खोजने इधर आये हो। हम सब भगवान के भक्त हैं ढूंढ रहे हैं इस इमारत में उसकी कोई निशानी कहीं ये उसका निवास तो नहीं क्या तुम जानते हो इस बारे में कुछ। वो बोला नहीं पहचाना मैं साक्षात भगवान ही तो हूं , सुनकर सभी हंसने लगे। कोई पागल लगता है सोचने लगे ये जानकार सब कुछ जानने वाला भगवान बोला जैसा आप सब समझ रहे मैं कोई भिखारी नहीं न ही पागल ही हैरानी है मुझे जानते पहचानते नहीं बस मेरी निशानियां तलाश कर रहे हो। जाति न पूछो साधु की , पूछ लीजिए ज्ञान , मोल करो तलवार का , पड़ा  रहने दो म्यान । कबीर जैसे संत आपको समझा गये मगर आप नहीं समझे कि बाहरी आवरण को छोड़ कर वास्तविक अनमोल वस्तु की कीमत जानो और भीतर की वास्तविक चीज़ को फैंक कर निशानियां देख रहे हो सोचते हो भगवान के निशान हैं । 
 
   कितने धर्मों को बनाकर अनगिनत आलीशान भवन निर्माण कर क्या क्या नाम देकर कितना कुछ करते हो आरती पूजा ईबादत अर्चना उपासना के नाम पर कितनी जगहों पर। भगवान हैं भी उन स्थानों पर या नहीं विचार नहीं किया जिस ने जो चाहा लिख दिया लिखवा लिया ईश्वर अल्लाह जीसस के नाम पर उपदेश देने को खुद उन बातों को अपनाया नहीं बल्कि उनका कारोबार बना डाला। भगवान को बेचोगे खरीदोगे कभी सोचा है ये क्या है। मेरी खराब हालत किसी और ने नहीं की है आप जैसे तथाकथित आस्तिक लोगों ने आस्था को भी सामान बना दिया है और कौन धार्मिक कौन अधर्मी है इस का निर्णय कर प्रमाणपत्र बांटते फिरते हो। खुद ईश्वर भगवान विधाता के साथ छल कपट करने वाले खुद को भगवान समझने लगे हैं। 
 
एक बार सभी अपनी आंखें बंद करो आपको खुद दिखाई देगा किस की पूजा आराधना ईबादत करते हैं आप। कोई शिक्षित है डॉक्टर इंजीनियर कोई अधिकारी कोई उद्योगपति कोई राजनेता कोई धर्मगुरु कोई शिक्षक कोई समाजसेवक सभी का आवरण है बाहर अंदर लोभी लालची अहंकारी कर्तव्य नहीं निभाने वाला आदमी बैठा है। भीतर झांकोगे तो समझोगे आपका भगवान सिर्फ पैसा है और पागलपन ही है कि भले जितना मिलता रहे आपकी भूख बढ़ती रहती है। जिस के पास सब हो मगर अधिक पाने की हवस रहती हो वो दुनिया का सबसे दरिद्र व्यक्ति होता है ये सभी धर्मों की किताबों में समझाया हुआ है। ईमानदारी सत्य और सामाजिक कर्तव्यों नैतिकता को त्याग कर कोई ईश्वर भक्त नहीं बन सकता है। भगवान की भक्ति का अर्थ है सभी दीन दुखियों की बेबस असहाय लोगों की सहायता करना जबकि आप तो विपरीत आचरण करते हैं। पैसे को ही अपना भगवान नहीं समझते बल्कि पैसे की खातिर आप शैतान की भी वंदना करते हैं कितने शैतानों को सोशल मीडिया अखबार टीवी वालों ने भगवान मसीहा घोषित कर दिया है। शैतान हमेशा खुद को विधाता से ताक़तवर समझते रहे हैं लेकिन हर बार शैतान का अंत होता है सच्चाई की लड़ाई में सत्य कभी पराजित नहीं होता है। जिस दिन झूठ और सत्य की जंग होगी आपके महल आपकी शोहरत दौलत धन वैभव सभी राख में मिल जाएंगे और आप विधाता की अदालत में गुनहगार बनकर खड़े सज़ाओं के हकदार बन जाएंगे। 
 

 

मई 26, 2022

जनसेवा का अजब कारोबार ( गंदा है पर धंधा है ) डॉ लोक सेतिया

 जनसेवा का अजब कारोबार ( गंदा है पर धंधा है ) डॉ लोक सेतिया 

सभी चाहते हैं इस गंगा में स्नान करना , स्थानीय निकाय के चुनाव घोषित होते ही गली गली सड़क पर इश्तिहार बैनर लगने लगे हैं। खुद को ईमानदार और मिलनसार ही नहीं सबकी सहायता को रात दिन तैयार रहने वाला बताकर अपनी सेवा का अवसर मांगते हैं। साल भर पहले से अपना गुणगान खुद पैसे खर्च कर करने लगते हैं। लाखों की बात नहीं करोड़ों तक चुनाव पर खर्च करना चाहते हैं जो उनको समाज की देश की छोड़ो अपने शहर गली बस्ती की परवाह होती तो इतना पैसा लगाकर कई आस पास की समस्याओं का समाधान कर सकते थे मगर कभी नहीं करते। किसी संस्था को थोड़ा पैसा देते हैं अगर तो पहले हिसाब लगाते हैं फ़ायदा क्या होगा नाम शोहरत के साथ चुनावी गणित साधते हैं। कुछ साल पहले इक दोस्त के बड़े भाई टिकट हासिल करने को बड़े नेता को बुलाकर सभा आयोजित कर रहे थे। मुझसे मिलने आये निमंत्रण देने तो उनके छोटे भाई की आर्थिक दशा और स्वास्थ्य की हालत को लेकर चर्चा हुई। मैंने कहा आप इस पर लाखों खर्च करते हैं क्या भाई की सहायता नहीं कर सकते बल्कि उन्होंने बताया था भाई बहन और अन्य रिश्तेदार खराब हालत को देख मिलते तक नहीं शायद डरते हैं कुछ उधार नहीं मांग ले। जबकि उन्होंने नहीं मांगी आर्थिक सहायता किसी से कभी। जवाब मिला छोटे भाई की सहायता कर सकता हूं क्या आप मेरा पैसा सूद समेत लौटाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। मैंने कहा आपके भाई ने नहीं कहा मुझसे कोई क़र्ज़ दिलाने को ये तो मैंने आपसी परिवारिक संबंध को देख कर सलाह दी थी , लेकिन जिस चुनाव की टिकट की दावेदारी कर रहे हैं किसी ने उस टिकट की गारंटी दी है और टिकट मिल गई तो भी जीतने की कोई गारंटी देता है। क्या आप इक जुआ नहीं खेल रहे हैं इस राजनीति के कारोबार में किसी का कोई भरोसा नहीं है। आपसे जितना चंदा मांग रहे हैं दल वाले कोई उस से अधिक दे दे तो टिकट उसको मिल जाएगी। 
 
आज की बात पर आते हैं जितने भी लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं किसी राजनीतिक दल में शामिल होकर खुद को बिना विचारधारा की बात सोचे बंधक रखने को तैयार हैं। जब जिस को भी जीत कर कुर्सी मिली तब उसकी निष्ठा उसकी वफ़ादारी जनता के लिए नहीं उस दल के और नेताओं के लिए होगी। समाज सेवा जनता की भलाई की बात पीछे छूट जाएगी और बंदरबांट का खेल शुरू हो जाएगा। कुर्सी पर बैठ कर हर काम में मुनाफ़े में हिस्सा लेंगे कर्मचारी अधिकारी ठेकेदार मिलकर। कितनी संस्थाएं सामाजिक बदलाव से लेकर सफाई पर्यावरण नशा का कारोबार बंद करवाने की आड़ में खूब पैसा बना रहे हैं। संस्थाओं एनजीओ के नाम पर शान से गुलछर्रे उड़ाते हैं। यहां धर्मराज कहलाने वाले सत्ता पाने से पहले खुद अपना ईमान बेचते हैं और बहुत ऐसे लोग अपनी जाति बिरादरी को बंधक या गिरवी रखने की कोशिश करते हैं। अभी सबको फेसबुक व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते हैं मगर किसी से पहचान नहीं है फोन पर बात नहीं करते संदेश का जवाब नहीं देते कोई पूछे कौन हैं क्या जानते हैं मुझे। पता चला आप सभी से संपर्क करने को ठेके पर आई टी सैल बना लिया है कभी आप को ज़रूरत हो तब आई टी सैल किस काम आएगा उसको जिस काम का अनुबंध मिला चुनाव तक रहेगा। 
 
दौलत शोहरत ताकत पाने की ललक ने कितने लोगों को स्वार्थ में अंधा कर पागल बना दिया है । कितने ऐसे लोग जीवन भर भटकते रहे मगर कभी इधर कभी उधर के बनकर भी खाली हाथ चले गए दुनिया से। जाना सबको ख़ाली हाथ है बस कुछ सार्थक वास्तविक समाजसेवा करने वालों का जीना सार्थक हो जाता हैं और मर कर भी उनकी सच्चाई ईमानदारी बाक़ी रहती है। लेकिन कई ऐसे होते हैं जिनको सत्ता पद मिल भी जाते हैं तब भी उनकी लूट की भ्र्ष्टाचार की दौलत और शानो-शौकत उनके किरदार को ऊंचा नहीं छोटा बना देती है उनकी असलियत सामने आती अवश्य है हर कोई जानता है उनके महल गरीबों की लाशों पर बने हैं उनकी अवैध संपत्ति काली कमाई कारनामे सभी समझते हैं। ऊपरवाला भी हिसाब लिखता है। 
 
 
ये सच जिनको उजागर करना चाहिए जब देखते हैं उनका भाईचारा नेताओं अधिकारियों और प्रशासनिक कर्मचारियों से है और उनके वीडियो किसी का विज्ञापन किसी अधिकारी की चाटुकारिता उसकी महिमा का बखान करने पर केंद्रित हैं तब निराशा होती है। अपना कर्तव्य ईमानदारी से निष्पक्षता से निभाना है तो देश जनता समाज की सच्चाई सामने लानी ही होगी।
भटक गए हैं तो अभी भी सही राह पर चल सकते हैं अन्यथा झूठ को सच साबित करना कोई महान कार्य नहीं है।

मई 24, 2022

ग़लत सवाल का जवाब है बस ख़ामोशी - डॉ लोक सेतिया

      क्या हो पूछते हैं , मैं कौन हूं , नहीं जानते लोग ( उलझन ) 

                           डॉ लोक सेतिया 

    दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें , तुम को न हो ख़्याल तो हम क्या जवाब दें । मीना कुमारी की फिल्म " बहू - बेगम " का ये गीत मैंने कॉलेज में रैगिंग के दिन सुनाया था शायद हमेशा से मेरे मन में ये बात रही है वर्ना कितने और गीत मुझे पसंद थे जिनको सुना सकता था । ज़माना बदलता रहा लेकिन दुनिया का तौर नहीं बदला कभी भी कितनी अजीब बात है हर कोई पूछता है क्या हैं आप कभी कोई समझना नहीं चाहता जानने की ज़रूरत नहीं समझता कि कौन क्या है । ग़ालिब को कहना पड़ा हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ़्तगू क्या है। दुनिया तेरे बाज़ार से अजनान हूं मैं नहीं कोई ख़रीदार न ही बिकने वाला बाज़ारी सामान हूं मैं। सवालों से परेशान नहीं हैरान हूं मैं , सब होशियार हैं इस ज़माने में , नासमझ और नादान हूं मैं। सियासत और अदावत की दुनिया में मुहब्बत की अहमियत कुछ भी नहीं है खोटे सिक्के चलते हैं खरे की पहचान नहीं है , चलन में नहीं शराफत ईमानदारी और सच्चाई आजकल। काश सवालात करने वालों को खुद अपने बारे में मालूम होता कि उनकी वास्तविकता क्या है। जो दिखाई देते हैं जो कहलाना चाहते हैं जो सोचते हैं हम हैं दरअसल हो नहीं सकते उनकी विडंबना है झूठी ज़िंदगी जीते हैं दो किरदार निभाते हैं समाज में कुछ और एवं वास्तविक जीवन में उस के विपरीत। ये महलों ये तख्तों ये ताज़ों की दुनिया ये इन्सां के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है। लोग खुद को नहीं समझते दुनिया को समझने की बात करते हैं मैंने खुद को समझने जानने की कोशिश की है किसी और को समझने समझाने की फ़ुर्सत नहीं है।  
 
गलत सवालात के उतर कैसे सही हो सकते हैं उन सवालों को छोड़ देना उचित है अन्यथा जवाब की जगह इक सवाल पर हज़ार सवाल खड़े हो जाएंगे। ख़ामोशी का अर्थ ये नहीं कि हमको मालूम नहीं उनके पूछने का मकसद क्या है खामोश रहते हैं कि किस किस को कितनी बार समझाएं असली मुद्दा क्या है। जब लोग बचना चाहते हैं सच से तब सच पर सवाल खड़े करते हैं। बज़ुर्ग कहते थे जहां सलीके से बात नहीं हो रही हो और लोग असभ्य भाषा और कुतर्क का उपयोग करने लगें उस महफ़िल में चुप रहना ही बेहतर है। जब लोग सिर्फ यही सोचते हैं कि क्या हैं आप जानना नहीं चाहते कौन हैं आप तब उनसे वार्तालाप से कुछ हासिल नहीं हो सकता है। 
 

 
 

      

 
 

मई 16, 2022

मज़ाक मज़ाक में देश बर्बाद किया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सब बर्बाद हुआ किसलिए ( शहंशाह की मौज ) डॉ लोक सेतिया 

शहंशाह को मज़ाक पसंद है ख़ास कर जिनको पसंद नहीं करते उनका उपहास करना किसी को ज़ख़्मी कर उस के घाव पर मरहम लगाने के नाम पर नमक छिड़कना उनको लगता है शासन करने का मज़ा इसी में है। उनके सभी झूठ देश की जनता के साथ गंदे मज़ाक ही होते हैं और कुछ भी नहीं सत्ता का नशा चढ़ता है तो मदहोशी की नहीं सुरूर की बात होती है। तोडना फोड़ना मनचाहे ढंग से मिटाना अहंकार गरूर की बात होती है। शासकों को सचिव से भरोसेमंद और कोई नहीं लगते हैं सचिव की हैसियत सचिवालय से बढ़कर होती है और हर सत्ताधारी का सचिव उसको भगवान से बढ़कर लगता है। शासन करते चुनाव जीतते बहुमत हासिल करते समय का पता ही नहीं चला तो इक दिन शहंशाह को सचिव ने अनुरोध किया उनकी जीवन कथा लिखनी ज़रूरी है। शहंशाह खुद नहीं लिख सकते सचिव जानते हैं सरकारी बाबू भी ये काम नहीं कर सकते जिन कलम वालों को शहंशाह ने खरीदा हुआ है उनकी लिखी जीवनी पर दुनिया यकीन ही नहीं करेगी। काफी सोच विचार कर इक निर्भीक साहित्यकार का चयन किया गया खोजबीन कर मिल ही गया कोई। शर्त थी लिखने वाले की यही कि जनाब को अपनी जीवन कथा लिखवानी है तो लिखने वाले को सच सच बताना होगा और उसकी किसी बात से खफ़ा बिल्कुल नहीं होना बल्कि सही आलोचना करने पार ठीक उसी तरह तालियां बजानी होंगीं जैसे लोग प्रशंसक उनके झूठ सुनकर बजाते रहे हैं । साहित्यकार ने बताया लोग आपको जैसा समझते हैं अगर आप साबित कर सकते हैं कि वैसे नहीं हैं और आपकी जीवनी का हर अध्याय दुनिया को अचरज में डाल कर चौंकाता हो तब कौतूहलवश सभी पढ़ना चाहेंगे अन्यथा किसी सरकारी लायब्रेरी की अलमारी में आत्मकथा दम तोड़ती रहती है। शहंशाह हमेशा सन्यासी होने की बात कहते रहे हैं सोचा अपने तमाम झूठों पर पर्दा डालने को इस एक बात को सच साबित करना उचित होगा। जीवन कथा उसी अवसर पर छपवाना तय किया गया क्योंकि जब सब त्याग कर जा रहे हों तब खोना क्या पाना क्या। शहंशाह की बात उन्हीं के शब्दों में ध्यान पूर्वक पढ़िए।
 
मैंने रिश्ते नाते सब छोड़ दिए थे परिवार पत्नी भाई मां सबको त्याग कर दर दर भटकता रहा भीख मांग कर गुज़र बसर करता रहा। किस्मत से मुझे सिकंदर बना दिया नासमझ लोगों ने ख़राबहाल बंदे के ख़्वाब बर्बादी को ख़त्म कर खानाबादी लाने की बात पर भरोसा कर अपनी बदनसीबी को खुद बुला लिया। भटकते भटकते मुझे आभास हुआ था कि लोग भौतिकता के जाल में धन दौलत मोह माया में राम नाम जपना भूल गए हैं। आधुनिक शिक्षा ने उनको सही मार्ग से भटका दिया है तभी जिस को खुद अपनी मंज़िल की खबर नहीं उस से राह पूछने की मूर्खता करने लगे थे। राजनेताओं से जनता की भलाई की उम्मीद करना बिल्ली से दूध की रखवाली जैसा काम था। चौकीदार बनकर चोरी करना नेताओं की फ़ितरत होती है। मैंने बहुत कमाल के तौर तरीके से जो कुछ भी पहले शासक बनाते रहे उन सब संगठनों संस्थाओं को मर्यादाओं को एक एक कर छिन्न भिन्न कर दिया और इस ढंग से टुकड़े टुकड़े कर दिया जिस को कोई फिर जोड़ नहीं सकेगा। देश समाज बर्बाद हुआ तो लोग कब तक आबाद रहेंगे उनको भी तबाह होना ही होगा धीरे धीरे। लेकिन ऐसे में उनको अपनी बर्बादी पर जश्न मनाने की आदत बनानी पड़ेगी और समझना होगा जब शहंशाह और सिकंदर ख़ाली हाथ दुनिया से रुख़सत होते हैं तो उनको पैसा और साज़ो-सामान की चिंता छोड़ राम नाम जपने और खाली पेट भजन कीर्तन करने का महत्व समझना होगा। 
 
लिखने वाला समझ गया उपरवाले की माया है उस ने किसी को दुनिया बसाने को भेजा होगा शुरआत में     कभी अब जब लगा कि ये दुनिया किसी काम की नहीं तो बर्बाद करने को इक शहंशाह को भेज दिया।
वास्तव में जब तक लोग ऊपरवाले ईश्वर को अपना विधाता समझते रहे उसको भी दुनिया की फ़िक्र होती थी लेकिन जब लोग खुद भगवान बनने लगे अपना भगवान यहीं धरती पर किसी को बनाने लगे तब दुनिया का अच्छा रहना संभव नहीं था। असली भगवान से नकली भगवान की तुलना नहीं की जा सकती है। हुआ ऐसा कि लोगों ने नकली मुखौटे लगाकर भेस बदलने वाले बहरूपिए को असली समझ लिया और उस की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया। गांव गांव शहर शहर गली गली चेहरा बदल भगवान बनकर लोगों की भावनाओं से खेल बहरूपिए अपना पेट भरते थे उनको महनत करना नहीं आता था मुफ्त भीख मांगने की आदत होती थी। शहंशाह ने शुरुआत नकली शासक बनकर नकली लालकिला बना भाषण देने से ही की थी। 
 
काठ की हांडी बार बार चढ़ाने का जादू पहली बार देखा है दुनिया ने। अब भला इस से बढ़कर खराब हाल क्या होंगे कि लोग अपने क़ातिल को मसीहा समझते हैं उसकी चाटुकरिता करते करते वास्तिक भगवान को भुलाकर उसकी भक्ति करते हैं। लोग मनोरंजन और खेल तमाशों से इस हद तक बहलने लगे हैं कि उनको मालूम नहीं पड़ता कि कब कोई बहरूपिया रूप बदल कर उनको तमाशा दिखलाते दिखलाते तमाशाई से तमाशा बना गया है। उसकी तरह झोला उठाकर सन्यासी बनना सबके बस की बात नहीं है। लेकिन शहंशाह बने बहरूपिए की ज़िद है सबको लोभ मोह माया छोड़ सन्यासी बनाने की। जीवनी लेखक ने जैसा कहा शहंशाह की कथा ने सबको सकते में डाल दिया है जब जनाब जाने किधर चले गए हैं। पर लिखने वाला स्तब्ध है कि असलियत जानकर भी लोग नाराज़ नहीं है उस नकली भगवान बने बहरूपिए को उसके बनवाये मंदिरों में मूर्तियां लगाकर आरती पूजा करने लगे हैं। उसकी लीला वही जाने कहते हैं फिल्म वाले इक और नई फ़िल्म बनाने पर विचार कर रहे हैं। बदलता कुछ नहीं नाम चेहरे बदलते रहते हैं इसी को राजनीति और लोकतंत्र कहते हैं।  


मई 13, 2022

सब कुछ पास , फिर भी ख़ाली हाथ ( खरी - खरी ) डॉ लोक सेतिया

  सब कुछ पास , फिर भी ख़ाली हाथ ( खरी - खरी ) डॉ लोक सेतिया 

बहुत दिन से आजकल के दौर के हालात को देख परेशान था। 

शीर्षक लिखते ही डॉ बशीर बद्र जी की ग़ज़ल का इक शेर ज़हन में आ गया। 

" कई अमीरों की महरूमियां न पूछ कि बस , गरीब होने का एहसास अब नहीं होता। " 

                        चलो आपको पूरी ग़ज़ल ही सुनाते हैं। 

अदब की हद में हूं  , मैं बेअदब नहीं होता , 
तुम्हारा तज़्किरा अब रोज़ो-शब नहीं होता। 
 
कभी-कभी तो छलक पड़ती हैं यूं ही आंखें ,
उदास होने का कोई सबब नहीं होता। 
 
कई अमीरों की महरूमियां न पूछ कि बस ,      
गरीब होने का एहसास अब नहीं होता। 
 
मैं वाल्देन को ये बात कैसे समझाऊं ,               
मुहब्बतों में हसबो-नसब नहीं होता। 
 
वहां के लोग बड़े दिलफ़रेब होते हैं ,             
मेरा बहकना भी कोई अजब नहीं होता। 
 
मैं उस ज़मीन का दीदार करना चाहता हूं ,    
जहां कभी भी खुदा का ग़ज़ब नहीं होता। 
 
जिस बात को लिखने को कितनी किताबें कम पड़तीं शायर ने इक ग़ज़ल में सब कह दिया। शायरी समझना सबको नहीं आता है जहां आह भरनी होती है लोग वाह वाह कहते हैं और जब अश्क़ बहने चाहिएं सुनने वाले जोश से भर कर तालियां बजाते हैं। कभी कभी ग़ज़ल की मुहावरेदार शैली से बात नहीं बनती तब खरी - खरी बात कहने को व्यंग्य की भाषा उपयोग करनी पड़ती है। लोग आलीशान घरों में रहते हैं धन दौलत नाम शोहरत ऐशो-आराम सब हासिल है मगर दिल भिखारी का भिखारी है। हाथ फैलाते रहते हैं मांगने को किसी को देते नहीं कभी कुछ भी यही बदनसीबी है बड़े बड़े उद्योगपतियों कारोबारी घरानों शहंशाहों शासकों धनवान लोगों की। हसरतें अधूरी हैं दुनिया भर की ज़मीन चाहते हैं अफ़सोस आखिर दो गज़ ज़मीन भी मिलना आसान नहीं होता है। 
 
पढ़ लिख कर भी इंसानियत शराफ़त ईमानदारी विनम्रता नहीं सीखी और अहंकार करते हैं अपने बड़े ज्ञानी होने पर। अज्ञानता और छोटापन है किरदार ऊंचाई को नहीं छूता रसातल की तरफ जा रहे हैं अपनी आत्मा को बेचते हैं अमीर होने को। खुद को सबसे जानकार समझने वाले मीडिया अखबार टीवी सिनेमा के लोग पैसे को भगवान समझ झूठ की जय-जयकार करते हैं। दर्शक पाठक को सही मार्ग नहीं दिखलाते बल्कि भाषा से लेकर अभिनय तक में अशलीलता गंदगी और हिंसक बनाने का कार्य करते हैं। समाज को गलत दिशा दिखला रहे हैं अमानवीय आचरण को उचित ठहरा सबको भटका रहे हैं। साहित्य के पुजारी तक राग दरबारी सुना रेवड़ियां पाकर इतरा रहे हैं। 
 
कल डॉ हैम जीनॉट जो बचपन की मनोविज्ञान से संबंधित रहे हैं जिन्होंने विनाश के दृश्य देखे थे बचने के बाद उनकी बात पढ़कर रौंगटे खड़े हो गए। मैं यातना शिविर से बच गया लेकिन जो मैंने वहां देखा कोई भी कभी नहीं देखे। मैंने देखा शिक्षित इंजीनियर गैस चैंबर बना रहे थे मानवता को ख़त्म करने को , फिज़ीशियन ज़हर देकर जाने ले रहे थे , नर्सें छोटे छोटे बच्चों को क़त्ल कर रही थी। उच्च शिक्षित लोग महिलाओं और बेबस इंसानों को बंदूक की गोलियों से मार रहे थे। उन्होंने सलाह दी है कि बच्चों को अच्छे इंसान बनाना केवल शिक्षित मनोरोगी और राक्षस नहीं बनाना किताबी शिक्षा नहीं सामाजिक आदर्शों मूल्यों की वास्तविक समझ देना ज़रूरी है। 
 
आस पास देखते हैं लोग शानदार पहनावा लिबास वाले लेकिन उनका व्यवहार उनका आचरण असभ्य और जंगली जानवर जैसा लगता है। किसी और की कोई परवाह नहीं उनको जो करना है करते हैं और कितना भी आपत्तिजनक कार्य करते उनको कोई शर्मिंदगी नहीं होती है। सत्ता पद पैसे ताकत का दुरूपयोग कर उनको गर्व का अनुभव होता है कहने को धर्म ईश्वर की बातें करते हैं मगर अधर्म करते संकोच नहीं करते हैं। हमारे आस पास कितने रईस लोग वास्तव में बेबस लोगों गरीबों से उनकी मज़बूरी का फायदा उठाकर अमीर बन गए हैं। शासक सरकारी अधिकारी नेता लोग बोलते कुछ हैं होते कुछ और हैं शिकायत करने विरोध करने वालों पर अन्याय अत्याचार करते उनको लज्जा नहीं आती जबकि वास्तव में उनका कर्तव्य जनता की सेवा करना है शासन का रौब दिखाना नहीं। पैसा किसी भी तरीके से कमाया हुआ है कोई नहीं देखता अपराध को बढ़ावा देकर अपराधियों का साथ देकर खुद को बलवान समझते हैं जो सही मायने में भीतर से खोखले होते हैं। 
 
संक्षेप में सार की बात इतनी है कि हमने सच्चाई अच्छाई की राह को छोड़ कर जुगाड़ और छोटा रास्ता चुन लिया है जिस में अमीर बनने शोहरत ताकत हासिल करने सुख सुविधा झूठी शान दिखाने को अपना लिया है। हमारे शब्द शानदार लगते हैं जिनका अर्थ कुछ भी नहीं है बस व्यर्थ की बातों में ज़िंदगी गुज़ार ही नहीं रहे बल्कि जीने का मकसद तक बचा नहीं है। जिधर देखते हैं छल कपट वाले इश्तिहार दिखाई देते हैं मगर दावा यही किया जाता है समाज शिक्षा जनहित कल्याणकारी कार्य है कारोबार नहीं मतलब झूठ की सीमा नहीं है। किसी शायर ने कहा है " वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से , मैं ऐतबार न करता तो क्या करता।

मई 08, 2022

वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

          वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

दिल के जज़्बात यही थे , मेरे तेरे एहसास यही थे 
पास थे और दूरियां थीं , तब भी दिन रात यही थे। 
 
नहीं मिलने की थी मज़बूरी , कुछ कदम की थी दूरी
नज़रें समझतीं थी बस , होंठों पर अल्फ़ाज़ नहीं थे। 
 
डर ज़माने का यही था , मिलते थे मिल पाते नहीं थे 
धड़कनों की आवाज़ यही , जानते थे समझते नहीं थे। 
 
ज़िंदगी कैसे बिताई हमने , दास्तां सुनी सुनाई हमने 
अलग-अलग रहकर भी पर , दिल से बिछुड़े नहीं थे। 
 
प्यार की मज़बूरियां कुछ , कुछ हौंसलों की भी कमी 
थे जुदा  क्योंकि दोनों , इक मंज़िल के राही नहीं थे। 
 
सोचता हूं मैं आज तुम भी , सोचती हो बात यही कि 
ज़िंदगी पर हक़ होता काश , नसीब तो अपने नहीं थे। 
 
वो प्यार था पहला हमारा , याद है हमको वो नज़ारा 
दिल की बातें दिल में रखीं , कहना जो कहते नहीं थे। 
 
सोचता रहता हूं मैं जो , क्या तुम्हें भी महसूस होता है 
आज कुछ और बात है , मगर हालात कभी ऐसे नहीं थे।

मई 05, 2022

सपनों की दुनिया की तलाश ( दोस्ती - प्यार ) डॉ लोक सेतिया

  सपनों की दुनिया की तलाश ( दोस्ती - प्यार ) डॉ लोक सेतिया 

शायद कोई कहानी कोई उपन्यास कोई नाटक कोई फिल्म बचपन में असर कर गई और मैंने ज़िंदगी उसी दोस्ती - प्यार की तलाश के नाम कर दी। सोचा नहीं समझा नहीं कहीं से पता ठिकाना नहीं पूछा कोई डगर नहीं मिली जिस पर कोई नाम लिखा हुआ होता कि यही वो रास्ता है जो मुहब्बत की बस्ती नगर गांव को जाता है। भरोसा था कोई तो होगा जिसको मेरी चाह होगी मुझे ढूंढता होगा। ज़माना ठोकरें लगाकर सबक सिखाता रहा कोई पागलपन बताकर हंसता रहा मगर दिल को भरोसा था कोई कुछ भी कहे मुझे रुकना नहीं है जीवन भर अपनी तलाश जारी रखनी है। इधर उधर भीड़ में सुनसान राहों में खिले हुए गुलशन में उजड़े हुए चमन में धूप में छांव में रेगिस्तान में समंदर में सब जगह तलाश किया यहां तलक कि फेसबुक इंटरनेट पर वास्तविक दोस्ती की उम्मीद कर मृगतृष्णा का शिकार हो प्यास से निढाल हुआ। दोस्त बनाए मिले बिछुड़े और हक़ीक़त और ख़्वाब की बात समझ आती गई। सोशल मीडिया से आधुनिक साधन से इंटरनेट से गूगल से सर्च की खबर पता चली तो अचानक विचार आया ये ख्याल पहले क्यों नहीं आया। बस और समय बर्बाद नहीं करना जहां खुली आंख वही सवेरा समझते हैं सोचकर इस को आज़माया है। 
 
गूगल से पूछने पर सब मिलता है इश्तिहार देखा कितनी बार , ढूंढा कोई गली कोई सड़क कोई बस्ती कोई गांव कोई नगर कोई जगह जहां वो दुनिया हो जिस में दोस्ती प्यार हो कोई और दुनियादारी का झगड़ा कोई पराया बेगाना कोई छोटा बड़ा अमीर गरीब का भेदभाव नहीं होता हो। इतने विकल्प बताए गूगल ने बस वही नहीं दिखलाया जिसकी बात की थी। अचानक ध्यान आया कोई मंदिर कोई पीर पैयम्बर की जगह कोई नदी तालाब जहां जाकर मांगने से मुराद पूरी होती हो उसकी खोज करते हैं। धन दौलत नाम शोहरत दुनिया भर की भौतिक वस्तुओं की मनोकामना पूरी होती हैं जहां ऐसे कितने अनगिनत विकल्प सामने थे लेकिन दोस्ती-प्यार जहां मांगने से मिलता हो कोई ऐसा स्थल कहीं नहीं था। जाने कैसे इक अजनबी से वार्तालाप हो गई जिस ने अंतरिक्ष में खोज करने में ज़िंदगी भर काम किया हुआ था। बहुत सोच समझ कर मेरी तलाश की बात पर गंभीर विमर्श कर उन्होंने कहा कि ज़रूर ऐसी कोई दुनिया हो सकती है लेकिन हमारी इस धरती पर संभव नहीं है। दार्शनिक बनकर समझाने लगे इस दुनिया में हर कोई हर नाते रिश्ते संबंध से जुड़ता है संपर्क में रहता है अपनी इच्छा की पूर्ति की खातिर जिस नाते रिश्ते से कोई लाभ कोई ज़रूरत कोई चाहत नहीं पूरी होती हो उसको छोड़ने में क्षण भर भी देरी नहीं करते हैं। सबको औरों से पाने की हसरत होती है और नहीं मिलने पर शिकायत रहती है। निस्वार्थ दोस्ती-प्यार इस दुनिया में समझदार लोग करते नहीं हैं यहां कोई मूर्खता करने की बात नहीं करता है मूर्खताएं करते हैं मगर मूर्ख कहलाना बनना नहीं चाहते लोग। 
 
 यहां कथाओं कहानियों में प्यार मुहब्बत दोस्ती की बातें मिलती हैं लोग राधा श्याम मीरा घनश्याम से लेकर हीर रांझा सलीम अनारकली की पुराने और कुछ आधुनिक काल की सिनेमा टीवी सीरियल की काल्पनिक कहानियों की बात शान से करते हैं लेकिन वास्तविक जीवन में ये सब किसी काम के नहीं लगते हैं। हर कोई भौतिकता बाहरी शारीरिक सुंदरता और शानो-शौकत का तलबगार है यहां आधुनिक समय में प्यार का भी सजा हुआ बाज़ार है। दिल नहीं जैसे कोई इश्तिहार है दिल टूटता है फिर जुड़ जाता है कहीं किसी और पर आते देर नहीं लगती बसंत की ज़रूरत नहीं बहार की कोई कीमत नहीं वेलेनटाइन का दिन बड़ा शानदार त्यौहार है। फूल कहते हैं इंग्लिश में बुद्धू बनने को रंगबिरंगे फूलों का कारोबार है। प्यार कोई राज़ की बात नहीं है युगों से सदियों से इस खेल की बाज़ी खेलते रहे हैं सब कुछ खोने को पाना कहते हैं बंदे का ख़ुदा हो जाना कहते हैं। रूह की आत्मा की एहसास की कहानी होती है जिस्म की बात बेमानी होती है जहां जिस्मानी वासना की ख़्वाहिश होती है मुहब्बत भूली बिसरी कहानी होती है। 
 
चाहत इक ईबादत है उसको ज़रूरत और आदत बनाया तो क़यामत होती है। दिल मिलना नसीब की बात होती है इश्क़ की चांदनी रात अश्कों की बरसात होती है बड़ी हसीन वो मुलाक़ात होती है लफ़्ज़ों से नहीं आंखों आंखों में बात होती है। वो मुलाक़ात बड़ी मुद्दत के बाद होती है। सच्चा प्यार सबके मुकद्दर की बात नहीं है झूठी हसरतों ने हर किसी को भटकाया है जिस ने पाने को प्यार समझा है प्यार को नहीं समझ पाया है खुद को खोया है जिसने उसी ने मुहब्बत का ख़ुदा पाया है। प्यार तो दर्द का रिश्ता है इश्क़ से आदमी बनता कोई फ़रिश्ता है। ज़मी पर फ़रिश्ते जब उतरते हैं लोग सब इक दूजे से प्यार करते हैं। चली जब से नफरतों की आंधी है प्यार की अर्थी उठाए फिरते हैं लोग वो कोई और चीज़ है जिसको आशिक़ी समझते हैं लोग। किसी की पलकों से किसी के दामन पर गिरकर मोती बनता है कोई आंसू कीमत उसकी नहीं कोई लगा सकता ये गली है जिस में और कोई दूसरा नहीं समा सकता। 
 

 

मई 02, 2022

ख़ुद से मुलाकात नहीं होती ( सुकून की तलाश ) डॉ लोक सेतिया

   ख़ुद से मुलाकात नहीं होती ( सुकून की तलाश ) डॉ लोक सेतिया 

  होती है ज़माने से मगर अपने से बात नहीं होती है , इन उजालों में वो बात नहीं होती है शहर में कभी चांदनी रात नहीं होती है। सुबह कब हुई कब हुई शाम खबर नहीं , बादल होते हैं बरसात नहीं होती है दोपहर की धूप से बचना मुश्किल है कोई भी दिलकश सुहानी रात नहीं होती है। भीड़ में हर कोई खुश भी है परेशान भी बैचैन दिल को चैन मिलने की राह नहीं मिलती कश्ती किनारों से बच के निकलती है साहिल से मुसाफ़िर का नाता नहीं कोई फूल की खुशबू से पहचान नहीं है बाग़ों की तितलियों से बात नहीं होती है। 

सोचना याद करना यादों की मधुर बातों को कभी फुर्सत ही नहीं है उन झरोखों से झांककर देखने की। क्या दिन से महफ़िल से उकताहट होती थी तो कभी छत पर कभी खेत खलियान में अकेले पेड़ों की छांव में जा कर चैन मिलता था खुद अपने आप से बात करते थे। गाते गुनगुनाते कभी तन्हाई में अश्क़ बहाते चैन पाते थे अपने दुःख दर्द भरे मौसम छोड़ बहार लाते थे। दोस्तों की महफ़िल में नाचते झूमते गाते थे दिल को इस तरह बहलाते थे अश्कों के मोती बेकार नहीं बहाते थे। शाम ढले सुनसान राहों पर चलते चले जाते थे किसी नहर किनारे लहरों से बतियाते थे। ये कोई पागलपन नहीं था ये खुद को समझने चिंतन मनन करने का ढंग होता था। पढ़ना लिखना याद करना हो तो बाग़ में जाकर बैठते पेड़ से लगकर घंटों गुज़र जाते थे घर हॉस्टल में पढ़ना लिखना मुश्किल लगता था जब कमरे में लोग आते जाते आवाज़ लगाते थे बस करो कितना पढ़ोगे दोस्त मुश्किल बढ़ाते थे। 
 
  अब आजकल हर कोई अकेला है फिर भी दुनिया भर की बेमतलब की बातें बेचैन किए रखती हैं। सोशल मीडिया टीवी फेसबुक व्हाट्सएप्प जाने कितने झंझट जकड़े हुए हैं। आदत लत बनी नशा बन गई है दुनिया भर की खबर है लेकिन कितनी झूठी कितनी सच्ची नहीं समझते और खुद अपने आप से अजनबी हैं। खुद को जानते पहचानते नहीं खुद अपने से मिलते नहीं सोचते नहीं क्या हूं मुझे किधर जाना क्या करना है बस दौड़ रहे हैं भागते भागते थक गए मगर मंज़िल का कोई पता नहीं शायद मंज़िल से दूर होते जाते हैं उलटी दिशा को चलकर। ऋषि मुनि तपस्वी पहाड़ों पर जाते थे जीवन का अर्थ जीने का मकसद ढूंढने को , हम गांव शहर महानगर से पर्वत की सैर करने जाते हैं मौज मस्ती आनंद के कुछ पल व्यतीत करने को। और कुछ दिन बाद वापस उसी कोलाहल में आनंद का एहसास भूलकर बेचैनी को गले लगाते हैं। आदमी की बनाई इस दुनिया ने उसको वास्तविक कुदरती दुनिया से इतना दूर कर दिया है कि अब उस वास्तविक सुकून चैन आनंद की अनुभूति संभव नहीं रही है। मनोवैज्ञानिक शोध कर चौंकाने वाले तथ्य सामने ला रहे हैं असुरक्षा अनावश्यक भय आशंकाओं ने मन मस्तिष्क को घेर लिया है। हर कोई हर किसी को अविश्वास और शंका की निगाह से देखता है। सही बात का कोई और मतलब ढूंढते रहते हैं हमने खुद को इक जेल में कैद कर लिया है और फेसबुक व्हाट्सएप्प की अंधी गली को रौशनी समझने लगे हैं। कहने को कितने शानदार संदेश मिलते हैं भेजते हैं लेकिन आचरण में उनका कोई प्रभाव नहीं होता है। गंधारी की तरह सब लोग अपनी आंखों पर पट्टी बांधी हुए हैं स्वार्थ खुदगर्ज़ी की , लेकिन संजय धृतराष्ट्र को गीता का संदेश सुना रहे हैं जबकि उनका ध्यान मोह माया जीत हार और महाभारत की घटनाओं का आंकलन अपनी सुविधा से करने में लगा है। आधुनिक काल में महाभारत का स्वरूप बदला है गीता का अर्थ बदला है गीता का उपयोग जाने किस किस उद्देश्य से किया जाने लगा है। बगैर समझे ताली बजाना सर हिलाना आदत बन गया है। सोशल मीडिया ने दुनिया को इस ढंग से पेश किया है कि पांव आसमान पर सर धरती पर है मगर उड़ान कहते हैं रसातल की ओर जाने को। जिनको खुद अपनी पहचान नहीं है सबको उनकी तस्वीर दिखलाते हैं । बिकने वाले लोग खरीदार कहलाते हैं। तलवे चाटते हैं दुम हिलाते हैं। अंधे दुनिया को नई राह बताते हैं।
 

 
 

अप्रैल 30, 2022

कितने परेशान सवालात खड़े हैं ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया

   कितने परेशान सवालात खड़े हैं ( देश के हालात )  डॉ लोक सेतिया 

कहां से शुरूआत की जाए , भगवान जाने उसी को सब खबर होती है मानते हैं। मगर ध्यान आया ऋषि मुनि ईश्वर की खोज करते थे कठिन तपस्या के बाद दर्शन होते थे। इस आधुनिक युग में कोई विधाता दुनिया को बनाने वाले की तलाश कर भी ले तो क्या उनसे जवाब मिल जाएंगे। कोई उनसे कहे कि आपके लिए हमने या सरकार ने अथवा कुछ संस्थाओं संगठनों ने बड़े बड़े आलीशान शानदार महलनुमा घर बनवाए हैं जिन में चल कर आपको रहना होगा और जैसे मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनाने वालों ने निर्धारित किए हुए हैं उनका पालन करना होगा अपनी अर्चना ईबादत पूजा भक्ति स्वीकार कर वहां आने वालों को आशीर्वाद देकर उनकी आराधना का फल देना होगा। मुमकिन है ईश्वर को ये सब मंज़ूर नहीं हों और वो इन जगहों पर रहने को राज़ी नहीं हो। कोई भी ताकत भीड़ या सरकारी आदेश भी ईश्वर को विवश नहीं कर सकता उन स्थानों पर निवास करने को जिनका निर्माण सच्चाई ईमानदारी और पवन भावनाओं से नहीं तमाम तरह के स्वार्थ की खातिर मनमाने ढंग से किया गया हो। जिन को धर्म की देश सेवा की बात करनी चाहिए उनका पहला कर्तव्य इंसान की दुःख दर्द की चिंता होनी चाहिए ,  गरीबी भूख असमानता अन्याय को मिटाने पर बात छोड़कर भगवान और धर्म को अपनी मर्ज़ी से परिभाषित कर आदमी को आदमी से टकराव की राह भटकाने वालों पर वास्तविक ईश्वर मेहरबान नहीं हो सकते हैं। ऐसे सभी धार्मिक स्थलों में भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु निवास करते हों धर्मगुरुओं की शिक्षाओं ग्रंथों को पढ़कर लगता नहीं है। हम कैसे लोग हैं जो इतना भी नहीं समझना चाहते कि हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनवा सकते हैं मगर परमात्मा को पकड़ कर उन जगहों रहने को विवश नहीं कर सकते क्योंकि उनको जिस बंधन जिस कैद में रख सकते हैं वो प्यार मुहब्बत और आपसी सद्भाव भाईचारे से निर्मित इंसानियत का घर हो सकता है। नफरत की अलगाव की बुनियाद पर ताकत अहंकार और दौलत से खड़ी ऊंची दीवारों में विधाता को बंद कर रहने को मज़बूर नहीं किया जा सकता है। 
 
भगवान की बात के बाद समाज की देश राज्य न्याय व्यवस्था की आज़ादी और संविधान की बात करते हैं।राजनेता अधिकारी न्यायपालिका सुरक्षाकर्मी और साहित्य समाज की वास्तविकता की बात लिखने कहने दिखलाने वाले क्या होना चाहिए और क्या होता है इसका अंतर समझना ज़रूरी है कर्तव्य पालन करने को। लेकिन अगर खुद स्वार्थी और मतलब की खातिर झूठ को सच एवं सच को झूठ साबित करते हैं तो देश की बर्बादी के असली गुनहगार वही हैं। उनको खुद अपने लिए जितना चाहिए अधिकार मानते हैं पाने को नियम कानून कायदे कोई बाधा नहीं बन सकते लेकिन सामान्य नागरिक की बुनियादी ज़रूरत पूरी नहीं होने पर नागरिक बेबस हो अधिकार नहीं भीख मांगने की तरह खड़ा हुआ है 75 साल होने को हैं। ये कैसा विधान है जिस से मुट्ठी भर लोगों के पास देश का अधिकांश भाग है राजाओं की तरह रहने को जबकि बाकी तमाम लोग नाम भर को पाकर ज़िंदा हैं मौत से खराब हाल में रहकर। सरकार सरकारी विभाग अधिकारी कुछ धनवान लोगों उद्योगपतियों को मनमानी करने लूटने देते हैं और खुद भी तथा राजनेता भी मौज उड़ाते हैं और देश की जनता को कुछ नहीं मिलता झूठे आश्वासन और भाषण और कागज़ी आंकड़ों के सिवा। उनकी चाहत उनकी मर्ज़ी को पूरा करने को ख़ास वर्ग की कामना चुटकी बजाते हल हो जाती है करोड़ों का बजट उनकी महत्वांकाक्षा के लिए उपलब्ध होता है। उनके शाही अंदाज़ उनके राजसी ठाठ उनके शोहरत के इश्तिहार रोज़ करोड़ों सरकारी कोष से बंदरबांट कर अनावश्यक बोझ जनता को ढोना पड़ता है। मगर उसी आम जनता की शिक्षा स्वास्थ्य सेवा रोज़गार रोटी पीने का साफ़ पानी मुहैया करवाना सरकार को संभव नहीं लगता है क्योंकि राजनेताओं अधिकारी वर्ग न्यायपालिका देश की संस्थाओं संगठनों को इस पर सोचना ज़रूरी नहीं लगता है। 
 
    आजकल बिजली संकट छाया हुआ है ये समस्या हल हो सकती है । सूरज के आसन पर घने अंधेरे बैठे हैं। वास्तविक संकट उस घने अंधकार की है जिस पर अटल बिहारी बाजपेयी जी की कविता उपयुक्त लगती है।  पढ़ना समझना ये संकट गंभीर है।
 

 

अप्रैल 19, 2022

समझाने वालों ने बर्बाद किया ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

     समझाने वालों ने बर्बाद किया ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

 इधर व्हाट्सएप्प फेसबुक पर जैसे कोई आग जल रही है दोस्तों को जानपहचान वालों को प्यार शुभकामनाओं के संदेश औपचरिकता निभाने को भेजने वाले समाज को धर्म या विचारधारा के नाम पर बांटने वाले वीडियो और संदेश बड़ी शिद्दत से भेजते हैं। मुझे कितनी बार समझाना पड़ा है निवेदन किया कृपया मुझे ये किताब मत पढ़ाओ मुझे सिर्फ मुहब्बत का सबक याद रखना है। दोस्त दोस्ती भुला बैठे करीबी लोग रिश्ते नाते सभ्य शिष्टाचार की मर्यादा लांघ कर ऐसे वार्तालाप करने लगे कि बोलचाल बंद है। जाने ये कैसा धर्म कैसी आस्था कैसी अंधभक्ति है जिस ने तमाम लोगों को पागल कर दिया है । मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना वाली कहानी पुरानी है आजकल धर्म मज़हब लोगों को क़त्ल करना दंगे फसाद करने की सीख देने लगे हैं। कभी चालबाज़ अशिक्षित नासमझ लोगों को झूठ को सच बताते थे अब तो पढ़े लिखे लोग भी ऐसे स्वार्थी लोगों की बातों में आकर इस हद तक मूर्ख बन गए हैं कि झूठ की जय जयकार करने लगे हैं। बड़े बड़े पद नाम शोहरत वाले लोग किरदार में ख़लनायक को पीछे छोड़ चुके हैं। देश के रखवाले होने की नकाब पहन नेता देश की संपदा लूट कर खाने लगे हैं चालीस चोर अलीबाबा के दिल को लुभाने लगे हैं।   
 
  इतनी छोटी सी बात समझते समझते ज़िंदगी गुज़र गई कि समझदार कहलाने वाले लोगों ने मुझे उन राहों पर चलने को विवश कर बर्बाद किया जिन पर मुझे चलना पसंद नहीं था। अभी तुम छोटे हो बच्चे हो नासमझ हो जानते नहीं अच्छा बुरा क्या है हम तेरे शुभचिंतक हैं तुझसे बेहतर समझते हैं तुम्हें क्या करना चाहिए और किस तरह कहां कैसे जीना चाहिए।  जीवन के अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय मुझे इसी तरह लेने पड़े हैं क्योंकि मुझे भयभीत किया गया कि अपनी मर्ज़ी से चुनी राह पर चलना सुरक्षित नहीं नतीजे खतरनाक होंगे।  शायद उनकी आशंका उचित रही हो लेकिन खुद अपनी समझ से अपनी पसंद की डगर चलता तो इस बात का पछतावा नहीं होता कि मुझे अनचाही राहों पर चलकर हासिल कुछ भी नहीं हुआ।  और आज वही कहते हैं कि मुझे औरों की समझाई बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए था खुद अपनी मंज़िल चुननी चाहिए थी।  मगर कितनी अजीब बात है कि आज भी मुझे समझाया जाता है कि आपको तजुर्बा नहीं है हम शिक्षक हैं अनुभवी हैं तजुर्बेकार हैं तुम्हें वही करना चाहिए जैसा हम समझते हैं। कोई नहीं सोचता कि जिसकी ज़िंदगी जुड़ी है उसकी अपनी सोच इच्छा सबसे अधिक महत्व रखती है। मुझे जो चाहिए उसको छोड़ कर जो और समझते हैं उस को अपनाना चाहिए।  जबकि खुद ऐसे लोग हमेशा वही करते हैं जो उनको अच्छा लगता है उनको किसी की सलाह ज़रूरी नहीं लगती लेकिन सबको नसीहत देना पसंद है।  हमारी मुश्किल ये भी है कि हम उनसे शिकायत भी नहीं कर सकते कि उन्हीं के भरोसे उनकी बातों को मानकर हम चलते रहे अनचाही राहों पर खुद की मर्ज़ी को छोड़कर और नतीजा हम नहीं पहुंचे कहीं भी। नहीं ये मेरी ज़िंदगी की कहानी नहीं है  उन लोगों की बात है जो धार्मिक आस्था के नाम पर या किसी गुरु की भक्ति किसी व्यक्ति नेता अभिनेता खिलाड़ी के प्रशंसक बनकर अपने विवेक की समझ की तर्क की बात नहीं समझते और नफरत भेदभाव की इंसानियत को शर्मिंदा करने वाली बातें करते हुए खुद को देशभक्त एवं धर्म के झंडाबरदार समझते हैं। सारे जहां से अच्छा गीत लिखने वाले इक़बाल की दो रचनाओं से समस्या और समाधान की राह ढूंढते हैं।

                        1   नई तहज़ीब ( अल्लामा इक़बाल ) 

            उठाकर फेंक दो बाहर गली में , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गन्दे ।

         इलेक्शन , मिम्बरी , कौंसिल , सदारत , बनाए खूब आज़ादी के फंदे। 

                  2    फ़लसफ़ा - ओ - मज़हब ( इक़बाल )

 यह आफ़ताब क्या यह सिपहरे बरी है क्या 
 ( ये सूरज ये ऊंचा आकाश क्या है )
समझा नहीं तसलसुले शाम ओ सहर को मैं। 

अपने वतन में होके गरीबुद्दयार हूं 
डरता हूं देख देख के इस दश्त-ओ - दर को मैं। 

खुलता नहीं है मेरे सफरे - ज़िंदगी का राज़ 
लाऊं कहां से बंदा ए साहब नज़र को मैं। 

हैरां हूं बू अली कि मैं आया कहां से हूं 
रूमी यह सोचता है कि जाऊं किधर को मैं। 

जाता हूं थोड़ी दूर हर इक राहे - रौ के साथ 
पहचानता नहीं हूं अभी रहबर को मैं। 

जब कोई भी सोच कोई व्यवस्था कोई औषधि कोई आहार सड़ गाल जाता है तब उसका उपयोग ख़तरनाक जानलेवा साबित हो सकता है। हमारी राजनैतिक धार्मिक संस्थाओं संगठनों की हालत यही हो चुकी है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में " अब तो इस तालाब का पानी बदल दो , ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।