Expressions by Dr Lok Setia ( डॉ लोक सेतिया का लेखन )
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जुलाई 22, 2026
POST : 2088 सीएजी का कॉपीराइट ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
POST : 2087 लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया { ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया }
लोकनायक जयप्रकाश को गलत आपात्काल को उचित साबित कर दिया
( आलेख ) डॉ लोक सेतिया
ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने ,
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ।
। । मुज़फ़्फ़र रज़्मी । ।
आखिर में शायर कुलदीप सलिल जी की लाजवाब ग़ज़ल आधुनिक दौर में सार्थक है :
इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं
रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
चाँद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना
आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
सीख ले दोस्त भी कुछ तो तजुर्बे से कभी
काम ये सिर्फ मेरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
खूब तू खूब तेरा शहर ता उम्र मगर
एक ही आबो हवा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
हूं मैं कुछ आज अगर तो हूं बदौलत उसकी
मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।
हो चरागां तेरे घर में मुझे मंज़ूर सलिल
गुल कहीं और दिया हो मुझे मंज़ूर नहीं।

जुलाई 19, 2026
POST : 2086 संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
संविधान की खोज ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
देश के वर्तमान हालात पर वक़्त के दोहे : -
( डॉ लोक सेतिया )
मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।
तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।
दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।
झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।
नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।
चमत्कार का आजकल अदभुत है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता यह अपना ईमान।
जुलाई 16, 2026
POST : 2085 ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 15, 2026
POST : 2084 आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
आईना झूठ बोलने लगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 14, 2026
POST : 2083 हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
हर किसी के अहसान बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 06, 2026
POST : 2082 लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जुलाई 05, 2026
POST : 2081 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
POST : 2080 दुनिया की पहचान ख़ुद से अनजान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
दुनिया की पहचान ख़ुद से अनजान ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जून 27, 2026
POST : 2079 देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया
देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया
छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता )
डॉ लोक सेतिया
जून 21, 2026
POST : 2078 वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया
वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया
जिसको देखो वही हिर्सो - हवा का रोगी
है सदाचार के बहरूप में कोई भोगी
उसकी साज़िश की शिकार आज भी सीता होगी ,
' ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी
आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह।
( राम प्रसाद शर्मा महृषि )
ग़ज़ल : दुष्यंत कुमार
जून 20, 2026
POST : 2077 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
जून 18, 2026
POST : 2076 मंदिर में चोरी , भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
मंदिर में चोरी , भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
जूतों में बंटती दाल हैअब तो ऐसा हाल है
मर गए लोग भूख से
सड़ा गोदामों में माल है ।
बारिश के बस आंकड़े
सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही
नित नई मिसाल है ।
भाषणों से पेट भरते
उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए
वो बकरा हलाल है ।
कालिख उनके चेहरे की
कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है
बड़ा सरकारी रुमाल है ।
झूठ सिंहासन पर बैठा
सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
घोटालों का देश है
मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं
बस वही अस्पताल है ।
कल जहां था पर्वत
आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी
हो चुका मालामाल है ।
बबूल बो कर खाते आम
हो रहा कमाल है
शीशे के घर वाला
रहा पत्थर उछाल है ।
चोर काम कर रहे
पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया
दर्द से बेहाल है ।
जीने का तो कभी
मरने का सवाल है ।
ढूंढता जवाब अपने
खो गया सवाल है ।

जून 13, 2026
POST : 2075 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
ग़ज़ल : डॉ लोक सेतिया

अप्रैल 01, 2026
POST : 2074 मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया
मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया
हैरान हैं भगवान ( क्षणिकाएं : हास्य - व्यंग्य )
क्षणिकाएं ( हास्य - व्यंग्य कविताएं )
1
2
3
4
राजनेता ( व्यंग्य - कविता )
सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता )
मार्च 22, 2026
POST : 2073 आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया
आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया
यहां तो आफ़ताब रहते हैं ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
यहां तो आफताब रहते हैंकहां , कहिये ,जनाब रहते हैं ।
शहर का तो है बस नसीब यही
सभी खानाखराब रहते हैं ।
क्या किसी से करे सवाल कोई
सब यहां लाजवाब रहते हैं ।
सूरतें कोई कैसे पहचाने
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं ।
पत्थरों के मकान हैं लेकिन
गमलों ही में गुलाब रहते हैं ।
रूह का तो कोई वजूद नहीं
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं ।
ख़ुदा से बात ( कविता )
डॉ लोक सेतिया
कहते हैं लोगदुनिया में अच्छा-बुरा
जो भी होता है
सब होता है तेरी ही मर्ज़ी से ।
अन्याय अत्याचार
धर्म तक का होता है
इस दुनिया में कारोबार ।
तेरी मर्ज़ी है इनमें
मैं कर नहीं सकता
कभी भी स्वीकार ।
सिर्फ इसलिए कि याद रखें
भूल न जाएं तुझको
देते हो सबको परेशानियां
दुःख दर्द समझते हैं
दुनिया के कुछ लोग ।
ऐसा तो करते हैं
कुछ इंसान
कर नहीं सकता
खुद भगवान ।
खुदा नहीं हो सकता
अपने बनाए इंसानों से
इतना बेदर्द
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़ ।
लगता है
कर दिया है बेबस तुझको
अपने ही बनाए इंसानों ने
जैसे माता पिता
हैं यहां बेबस संतानों से ।
अपने लिए सभी
करते तुझ से प्रार्थना
मैं विनती कर रहा हूँ
पर तेरे लिए ।
बचा लो इश्वर
अपनी ही शान
फिर से बनाओ अपना ये जहान
होगा हम सब पर एहसान ।
अब फिर बनाओ दुनिया इक ऐसी
चाहते हो तुम खुद जैसी
अच्छा प्यारा खूबसूरत
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ।
जिसमें न हो दुःख दर्द कोई
मिलती हों सबको खुशियां ।
अन्याय अत्याचार का
जिसमें न हो निशां
ऐ खुदा अब बनाना
इक ऐसी नई दुनिया ।
मार्च 18, 2026
POST : 2072 भारत से हथियार मांगे अमेरिका ने ( मानो या न मानो ) डॉ लोक सेतिया
भारत से हथियार मांगे अमेरिका ने ( मानो या न मानो ) डॉ लोक सेतिया










