दिसंबर 03, 2022

लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

  लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

लेखक बहुत दिन से चिंतित था कुछ भी नया विषय लिखने को ध्यान में नहीं आ रहा था । बिस्तर पर करवट बदलते बदलते सामने रखी अलमारी पर निगाह जाकर ठहर गई कुछ हलचल सी भीतर महसूस हुई । लगा कोई किताब कह रही है मुझे इस बंद अलमारी से बाहर निकलना है । चाबियों का गुच्छा लिया मगर कोई भी चाबी ताला खोलने में सफल नहीं हुई तो सोचा कल सुबह उठ कर चाबीवाले को घर बुलाना होगा । आंख लग गई और सपने में किताब अपनी चुप्पी तोड़कर खुद बोलने लगी । लेखक पुस्तक संवाद होता रहा और लिखने वाले की नया विषय की तलाश पूर्ण हो गई और लिखी गई आत्मकथा किताब की । 
 
किताबें असंख्य विषयों पर लिखी जाती हैं साहित्य सांस्कृतिक ऐतहासिक धार्मिक देश काल विश्व भर की नित नई जानकारी खोज शोध से लेकर शिक्षा जगत स्कूल कॉलेज से विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई को लेकर । लेकिन साधारण ढंग से किताबों को दो मुख्य भागों में बांट कर रख सकते हैं । पहली वो जो पाठक को किसी और काल्पनिक दुनिया में लेकर जाती हैं जहां चमक दमक जगमगाहट और असंभव को संभव होते दिखाई देते हैं चमत्कार से सब होता है लेकिन उन कथा कहानियों को लेकर शंका सवाल सोचने समझने की किसी को अनुमति नहीं है । लिखा है आपको बगैर सोचे विश्वास करना होगा अन्यथा आपको नादान नासमझ आदि कहकर नकारा जा सकता है । ऐसी तमाम किताबें आपको मानसिक तौर पर आज़ाद होकर चिंतन की अनुमति नहीं देती हैं । दूसरी वो जो पाठक को वास्तविक जीवन से परिचित करवाती हैं और जिन से सबक लेकर सीख कर पाठक ज़िंदगी में उनका उपयोग कर समस्याओं को समझने और समाधान खोजने का कार्य कर सकते हैं । 
 
इधर किताबें लिखने की दौड़ लगी हुई है लेकिन मकसद समाज को बदलना नहीं बल्कि नाम शोहरत और अन्य भौतिक वस्तुओं की चाहत हो गया है । लिखने वाला खुद लिख कर भूल जाता है और पाठक को देश समाज को कोई मार्गदर्शन अथवा सकारात्मक योगदान को लेकर उदासीन है । प्रकाशक किताब की गुणवत्ता परखे बिना छापते हैं सामान्य कारोबार की तरह धन दौलत कमाने की खातिर । बड़े बड़े शहरों में किताबों का बाज़ार लगाया जाता है जहां किताबों को तोलकर खरीदा बेचा जाता है किसी भाजी तरकारी या धातु या सामान की तरह से । किताब में लिखा कितना मूलयवान है महत्वपूर्ण है अथवा व्यर्थ की गतिविधि ही है कुछ फर्क नहीं पड़ता है सब एक भाव है टके सेर भाजी टके सेर खाजा जैसी बात है । किताबों की ऐसी दुर्दशा हमारे समाज की कड़वी वास्तविकता को दिखलाता है जहां इंसान से लेकर सामाजिक आदर्श और मूल्य तक कहीं फेंक दिए गए हैं । खोखली बातें करते हैं अनुसरण करना अनावश्यक लगता है । आधुनिक शिक्षा ने आदमी को बेजान मशीन जैसा बना दिया है जैसे कोई रॉबट या कम्प्यूटर जैसा प्रोग्राम किया गया है करता है । चिंतनशील विचारवान विवेकशील नहीं बनने देती आधुनिक शिक्षा । 
 
शिक्षा विज्ञान विकास और विनाश को नहीं परखते हैं , साधन बनाने की खातिर समाज को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां बर्बादी और मानवीयता के अंत को सामने देख हैरान हैं । अब कोई सोचता तक नहीं कि हम कब कहां भटक गए और देश समाज दुनिया को बेहतर बनाने की जगह खतरनाक गहरी खाई में ले आये हैं जबकि समझते रहे कि शिखर पर चढ़ रहे हैं । जवीन उपयोगी किताबों को बंद अलमारियों में सजाकर रखना पढ़ना छोड़ कर यही करते रहने का परिणाम है । इक ताला जो हमारे दिमाग़ को लगा है खुलता नहीं है और बंद अलमारी में रखी किताबों की तरह दीमक की तरह खोखला कर रहा है । जिनके ज़हनों में अंधेरा है बहुत , दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत । मेरी इक पुरानी ग़ज़ल का मतला याद आता है ।    
 

 

नवंबर 28, 2022

बेजान बेज़ुबान की बेबसी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     बेजान बेज़ुबान की बेबसी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कितने दिनों से तैयारी चल रही थी जिस खूबसूरत महबूबा की मिलन की अपने चाहने वालों से मगर हम ढूंढते ही रहे उसके निशां तलक नहीं दिखाई दिए । शायद मुझे छोड़ किसी को ज़रूरत ही नहीं थी तभी किसी ने उस के अस्तित्व को लेकर कोई शब्द तक नहीं बोला घंटों इधर उधर की चर्चा करते रहे सभी । जैसे हर कोई अपने आप में गुम हुआ हुआ था , मंच पर बैठे डायस पर खड़े संबोधित करने वाले सभी संवेदनारहित बुत जैसे लगे किसी कठपुतली की तरह धागे कोई और थामे अपने इशारों पर नचा रहा उनको । जिन को लेकर शोर था साक्षात दर्शन करवाते हैं खुद अपने आप को नहीं पहचान सकते थे ऐसा लगा । विवाह समारोह जैसी रौनक लगी थी लेकिन शोक सभा सा मातम छाया हुआ था ख़ुशी की जगह झूठी मुस्कुराहट सिर्फ दिखावे को होंटों पर टांग रखी थी । अभी तक उसके निधन की खबर नहीं सुनी पढ़ी थी फिर ये उदासी हर चेहरे पर क्यों नज़र आ रही थी । अधिकांश उपस्थित लोग अपने अपने स्मार्ट फोन पर सोशल मीडिया कोई गेम खेलने या तस्वीर लेने में व्यस्त थे सभा में बैठे चल रही गतिविधि से अनभिज्ञ अनजान । शायद लोग अपने अपने उद्देश्य से आये थे और इंतज़ार कर रहे थे मकसद पूरा होते जाने की वापस , यहां औपचरिकता निभानी थी बस यही होता रहा । 
 
  बड़े लोग छोटे दिल वाले होते हैं तभी नहीं समझते सोचते क्या बोला जो कदापि नहीं बोलना चाहिए था । कुर्सी पद धन अधिकार का नशा छाया हुआ था । कोई सभा की संख्या कितनी थोड़ी है बता कर खुद मिले करोड़ रूपये की पुरुस्कारों की धनराशि और लाखों की भीड़ की बात करने के साथ किसी और जगह होने वाले आयोजन की आलोचना करते हुए आरोप लगा रहे थे वहां गलत लोग होते हैं शामिल । कोई हद से बढ़कर कहने लगे उनको लोग स्वार्थ मतलब से मिलते हैं जबकि उनको सरकारी पद मिला ही इसी उद्देश्य की ख़ातिर है । छाज तो छाज छलनी भी बोली थी व्यर्थ इतना सब लिखने की ज़रूरत क्या है नासमझ इतना नहीं सोचा कहां किस कारण क्यों पधारे हैं । अजीब विवाह समारोह था दुल्हन का अता पता नहीं था और सभी शुभकामनाएं भी इस तरह दे रहे थे जैसे संवेदना जताने आए हैं । 
 
   ये इक दिन इक शहर की घटना भर नहीं है देश समाज में संविधान धर्म संस्कृति को लेकर जश्न का आयोजन किया जाता है मगर चर्चा होती है मातम की तरह । खुद ही क़ातिल हैं क़त्ल खुद किया जानकार या भले अनजाने में और उसी को ज़िंदा रखने की कसमें खाते हैं । 
   मुझे अपनी ग़ज़ल का शेर याद आया है :-
 
                 ' तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले। '
 
ज़िंदा लाश की तस्वीर पर फूलमाला पहनाना ये कैसी अजीब रिवायत इस दौर की बन गई है ।  
आखिर में इक नज़्म पेश करता हूं । 

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं।
 
 
 जिंदा लाश | Hindi Tragedy Poem | Nitu Arora

नवंबर 17, 2022

भारत सरकार को ज़रूरत है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

     भारत सरकार को ज़रूरत है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

कितने साल हो गए हैं  देखते सुनते , सोचा ही नहीं समझा ही नहीं भारत देश को आर्थिक दशा भूख गरीबी तमाम जनता की बुनियादी ज़रूरतें ख़्वाहिशें मनोकामनाएं आरज़ूएं सपने पूर्ण करने को आवश्यकता है तो बस इक विभाग की       ' करोड़पति बनने बनाने के खेल की '  अमिताभ बच्चन जी हैं इस सब की परिभाषाएं समझने वाले विभाग उन्हीं के हवाले किया जाना उचित होगा । उनको अगर  सरकार कहेगी तो वो अवश्य मान ही जाएंगे , सदी के महानायक कहलाने वाले । चलो शायद इसी बहाने देश समाज को कुछ वास्तव में सार्थक उन्होंने दिया भी है उसका भी प्रमाण भी उपलब्ध होगा , अन्यथा अभी कोई नहीं जानता उनका देश समाज को सकारात्मक योगदान क्या है । जब भी उनका खेल टीवी पर देखते हैं लगता है हम अपनी दुनिया से अलग किसी दुनिया में हैं जहां सब वास्तविकता से विपरीत सुनहरा रंगीन और लाजवाब है । दर्शक तक जिनको शो में साक्षात दर्शन का सौभाग्य मिल गया होता है अपना जीवन सफल हुआ समझते हैं जिस प्रतिभागी को साहब के सामने बैठने का मौका मिलता है खुद जनाब इशारों में समझाते हैं दुर्लभ है बार बार क्या जीवन में दोबारा नहीं मिलता है । यकीन करें डेढ़-दो घंटे तक सभी सम्मोहित रहते हैं इक जादूगर का जादू अपना असर दिखलाता है तो बाहरी सारी दुनिया व्यर्थ की लगने लगती है । कुछ क्षण कुछ पल सब परेशानियां सारे दुःख दर्द उड़नछू हो जाते हैं । अक्सर लोग कहते हैं अमिताभ बच्चन जी से मिले बात की उनके करीब बैठे स्वर्ग-सुख़ की अनुभूति हो गई उसके बाद कुछ हासिल करने को बचा ही नहीं मगर पैसा फिर भी पैसा है लक्ष्मी का आदर करना चाहिए बस इसी ख़ातिर सवाल जवाब होते हैं अन्यथा तथाकथित हॉटचैयर पर बैठना सिंहासन पर विराजमान होने से कम नहीं है । खिलाड़ी और खेल खिलाना वाला दोनों जतलाते बतलाते रहते हैं कि ऐसा होने से किसी की काबलियत का लोहा मान लेते हैं सभी मान सम्मान प्रतिष्ठा बढ़ जाती है और व्यक्ति सातंवे आसमान पर होने का गर्व गौरव अनुभव करता है । 

  सबकी कहानी अलग अलग मिसाल होती है हर शाम कमाल से बढ़कर कमाल होती है । सबकी मुहब्बत जवान होती है खिला हुआ लाल गुलाब या कोई रेशमी रुमाल होती है । कुछ सवाल पर पर्दादारी है क्या ये खेल सच है फरेब है कोई हक़ीक़त है या छल है कहीं ये कोई लाईजाज रोग है मानसिक बिमारी है । कितने आबाद हुए कितने हुए बर्बाद आज किस की कल किस की आनी बारी है । मुझे ही नहीं मुमकिन है और भी तमाम लोगों को लगता होगा कि हमारी समझ और काबलियत पर सवालिया निशान है आज तलक केबीसी में चयन नहीं होना किसी अवगुण से कम नहीं है । टीवी चैनल और शो प्रस्तुतकर्ता का यकीन है कि हर समस्या का समाधान उनका खेल है देश की जनता की सभी चिंताओं आर्थिक परेशानियों से व्यक्तिगत तक का हल संभव है उनके मायाजाल में शामिल होकर । नौकरी कारोबार नहीं खेल खेल में धनवान बनने की बात होती थी लेकिन आजकल खेल को अलविदा कह चुके खिलाड़ी विज्ञापन से पैसा कमाते हैं और अपने प्रशसंसकों को पैसा बाज़ार की राह दिखलाते हैं और क्या क्या खरीदने को कहते हैं भले उनके घर खाने को दाने नहीं हों अम्मा चली भुनाने कहावत चतिरार्थ करते हैं । देश की महानता सरकारी योजनाओं का गुणगान करने वाले नहीं बताते आज़ादी के इतने साल बाद गरीबी बदहाली क्यों है अधिकांश जनता के लिए जबकि कुछ ख़ास लोगों के लिए धन दौलत नाम शोहरत ऐशो-आराम सब मुंहमांगी मुरादें मिलती हैं । जबकि इन सभी ने कभी शायद केबीसी खेल खेला क्या देखा भी नहीं होगा , तो क्या ये इक छल है झूठा दिलासा झूठे सुनहरे ख़्वाब दिखला कर उलझाए रखने को । 
 
  लेकिन अगर ये रामबाण तरीका है तो चलो यही सही इक विभाग इक मंत्रालय देश की राजधानी से है शहर नगर गांव की गली गली इसका प्रंबध करवा कर नया कीर्तिमान स्थपित किया जाना चाहिए । आधुनिक युग में कुछ भी मुमकिन है संभव हो सकता है इक ऑनलाइन ऐप्प की मदद से । 
 
 यहां हो मछली का निशान तो सम्मान और पैसा दोनों मिलेंगे

नवंबर 08, 2022

काले धन की आत्मकथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       काले धन की आत्मकथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

मेरा नाम काला है जबकि वास्तव में मैं सबसे खूबसूरत और रंगीन हूं । मैं अजर अमर और हर युग काल देश में रहा हूं और हमेशा रहूंगा कोई मुझे मिटा नहीं सकता है । जिनको मुझसे जितना अधिक प्यार है वही मेरा नाम हर दिन जपते रहते हैं मुझे खत्म कोई नहीं करना चाहता बल्कि सभी मुझसे दिल जान से बढ़कर मुहब्बत करते हैं । जैसे कोई आशिक़ अपनी महबूबा को लेकर आहें भरता है उसको ज़ालिम क़ातिल कहता है मुझे प्यार करने वाले काला धन बर्बाद करता है की रट लगाते हैं लेकिन रात को नींद नहीं आती मेरी चिंता चाहत में जागते रहते हैं । कुछ साल पहले इक शासक को मेरे मोहजाल में इस कदर जकड़ लिया कि उसने इरादा कर लिया सारा का सारा काला धन अपने पास जमा करने का । फरमान जारी हुआ और जिस के पास जितना काला धन अपराध रिश्वत लूट घोटालों से जमा किया हुआ था बदल कर सफेद कर बदलवा दिया । शोर मच गया काला धन ख़त्म हो गया है जबकि मैं ऐसा राक्षस की तरह हूं जिस की हर खून की बूंद से इक नया दैत्य पैदा होता जाता है । 70 साल में जितना काला धन मेरे चाहने वालों की तिजोरियों में जमा हुआ था उस से दस गुणा पिछले सात सालों में इकट्ठा हो गया है और सबसे अधिक उसी के खुद के पास और उसके ख़ास दोस्तों के पास है जिस ने मुझे ख़त्म करने की कसम उठाई थी । झूठी कसमें मुहब्बत में खाना इक पुरानी रिवायत है । काला धन कोयले की खान जैसा है जो सोना बन जाता है बाज़ार में आकर शकल बदल जाती है । काले धन की तस्वीरें सुंदर लगती हैं जब रईस लोग शान से बड़े बड़े मंदिरों में चढ़ाते हैं गरीबों का लहू चूसकर धनवान बनने पर । हर सत्ताधारी शासक की सेज पर दुल्हन बनकर आलिंगन करती हुई भविष्य के दिलकश सपने संजोती हूं अगले चुनाव की रणनीति के रूप में । राजनेताओं धर्म उपदेशकों बड़े बड़े उद्योगपतियों ने मेरा दामन कभी छोड़ा नहीं है । पैसा बाज़ार से मुंबई के मनोरंजन कारोबार तक सिर्फ मेरा ही जलवा दिखाई देता है काला टीका बुरी नज़र से बचाता है इस बात से मेरा महत्व समझ सकते हैं । 

मैंने सिर्फ लिबास बदला है जैसे अभिनेता राजनेता बाहरी आवरण बदलते हैं अंदर से वही रहते हैं झूठे बेईमान और बदचलन बदनीयत इंसान । शराफ़त से मेरा कोई रिश्ता न कभी था न कभी हो ही सकता है शरीफ़ लोग गरीबी और बदहाली का ज़ेवर पहनते हैं चांदी सोना उनकी किस्मत में नहीं होता है । बचपन में इक सहपाठी जिसका रंग सबसे गोरा चिट्टा था सब उसको काला कहकर बुलाते थे क्योंकि उसकी मां ने उसको यही नाम दिया था बुरी नज़र नहीं लगे इस की खातिर । काला धन बदनाम है खराब नहीं है खराब लगता है जब किसी और की जेब में होता है खुद अपनी तिजोरी का काला धन लक्ष्मी बनकर पूजा जाता है । अब की दीवाली भी काले धन वालों की शानदार रही है खूब रौशनी पटाखे और उपहार लेना देना जुआ खेलना शुभ समझते हैं ।
 
 
 black-money

नवंबर 07, 2022

सोच विचार कर , भीड़ बनकर नहीं ( सही-गलत निर्णय ) डॉ लोक सेतिया

सोच विचार  कर , भीड़ बनकर नहीं  ( सही-गलत निर्णय ) डॉ लोक सेतिया 

 इधर तमाम लोग समझते हैं कि मौजूदा शासक पुराने सत्ता के उच्च पदों  पर रहे राजनेताओं नायकों के नाम सड़कों भवनों पर लिखे हुए बदल कर हटवा कर कोई विशेष महत्वपूर्ण सराहनीय कृत्य कर रहे हैं । जबकि अधिकांश ऐसे नाम उनके देश समाज के नवनिर्माण को समर्पण और योगदान को समझते हुए रखे गए थे । किसी राजनितिक लाभ या गुणगान के लिए हर्गिज़ नहीं । अपनी विचारधारा के विरोधी लोगों के नाम अपनी संकीर्ण राजनीती की खातिर बदलने से उन लोगों की छवि को कोई फर्क नहीं पड़ता है बल्कि भविष्य में खुद अपनी मानसिकता को उजागर कर  प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं , कि हमने सत्ता हासिल कर निराशाजनक और नकारात्मक ढंग से कार्यशैली अपनाई थी । क्या खुद आपके पास सार्थक कर दिखाने को कुछ भी नहीं सूझता है ।  

   ऐसे कार्यों का समर्थन करने वाले लोगों ने  पुराने देश को समर्पित राजनेताओं एवं उनके समाज के प्रति सरोकारों को समझे बगैर उनको लेकर संकीर्ण विचार बना लिए हैं  , गहराई तक जाने उस समय की सामाजिक दशा को जाने बिना मनचाहे ढंग से । काश उनको मालूम होता कि देश समाज के हित में क्या ये उचित है कि पुराने बुद्धिजीवी समाजिक  चिंतक विद्वान लोगों की कोशिशों की सराहना करना छोड़ आधुनिक समय की नकारात्मक बातों को उचित ठहराया जाना चाहिए । शायद  बाद में इस सरकार के शासकों को भी पछतावा हो कि पिछले लोगों की आलोचना करने को छोड़ खुद कुछ सार्थक कल्याणकारी कार्य उन्होंने किया ही नहीं है । आजकल के युवाओं को हवा के साथ चलने वालों को धारा के विरुद्ध खड़े होकर बदलाव लाने का मतलब पता नहीं है । जो शासक सत्ता पर काबिज़ होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा को नहीं समझता और चाहता है कि कोई विपक्ष रहना ही नहीं चाहिए क्या उसका समर्थन किया जाना देश और संविधान के अनुसार सही होगा अथवा जिस शासक ने अपने कार्यकाल में विपक्ष को आदर देना और महत्वपूर्ण समझा देश को एकता और शांति भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़ना जैसे मूल्यों को अपनाया उसका समर्थक होना चाहिए । सबसे पहला सवाल जिस धार्मिक विचारधारा की बात करते हैं क्या उसी के अनुसार किसी व्यक्ति के ज़िंदा नहीं रहने के बाद उसको लेकर असभ्य और अपमानजनक बातें करना क्या कहलाता है । अपनी सुविधा और साहूलियत से किसी एक को अच्छा और किसी एक को खराब साबित करने का प्रयास जबकि वास्तव में वो दोनों उस समय में साथ साथ मिलकर आपसी राय सहमति से निर्णय करते रहे हों क्या निम्न स्तर की कार्यशैली नहीं है । 

 बात निकली तो सामाजिक राजनैतिक से आगे साहित्य पर भी हुई । साहित्य के भव्य आयोजन का अर्थ उत्कृष्ट साहित्य को बढ़ावा देना नहीं होता है । साहित्य सृजन करने वाले लेखकों को अपने समय की देश समाज की सही तस्वीर दिखलानी चाहिए जबकि कुछ जाने माने ख़ास लोगों ने इस में दोहरे मापदंड अपनाए हैं और धन दौलत नाम शोहरत सत्ता से नज़दीकी हासिल करने को वास्तविकता को उजागर करने का कर्तव्य नहीं निभाया है । उनकी फिल्मों गीतों कथाओं कहानियों ने आम दर्शक को भटकाने का कार्य किया है , आधा सच आधा झूठ मिलाकर वास्तविकता को अफ़साना बना दिया है और जो हक़ीक़त नहीं उसको वास्तविकता बनाकर अपनी लेखनी के साथ अन्याय किया है । सच नहीं लिख सकती जो कलम उसको कागज़ काले करना छोड़ना बेहतर होगा । शिक्षित वर्ग को केवल अपने हित की ही नहीं समाजिक सरोकार की भी चिंता होनी चाहिए और संवेदनशीलता पूर्वक न कि औपचरिक हल्की फुलकी बातें करने तक । काश उनको ध्यान आये कि देश गुलामी की जंज़ीरों से ही नहीं सामाजिक आडंबरों और दिखावे की कुरीतियों से अभी मुक्त नहीं हुआ है और किसी भी राजनेता दल या व्यक्ति की चाटुकारिता स्वयं में इक समस्या है गंभीर सवालात खड़े करती हुई । ग़ालिब के अप्फाज़ में नींद क्यों रात भर नहीं आती । बदलाव होना चाहिए मगर कैसा ये सवाल अवश्य समझना सोचना होगा  , सड़कों इमारतों संस्थाओं के नाम बदलने से देश की तस्वीर नहीं बदलेगी न तकदीर ही बदल सकती है । 



 

नवंबर 01, 2022

बिना शर्त कुछ नहीं कुछ भी ( ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

      बिना शर्त कुछ नहीं कुछ भी ( ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

खुदा ईश्वर या विधाता जो भी है इंसान को जन्म देता है मगर बतलाता नहीं उसकी भी शर्त है दुनिया में जितना भी जैसे भी हासिल करते रहना आखिर मौत के बाद कुछ भी किसी का नहीं रहता है । लेकिन पैदा होते ही रिश्तों संबंधों की अनगिनत शर्तें लागू होती रहती हैं और लाज़मी होता है उनको मंज़ूर करना । जन्म देने वाले संतान को पालते हैं बड़ा करते हैं बहुत प्यार से तमाम तरह से शिक्षा विचार से बुद्धिमान शक्तिशाली बनाते हैं मगर साथ साथ इक अंकुश लगा रहता है उनकी बातों को बगैर कोई सवाल किये मानते रहना । बस जहां चुपचाप हां में हां नहीं मिलाई वहीं टकराव की शुरुआत हो जाती है । कोई समझ नहीं पाता है भविष्य में ऐसे कितने नियम कायदे स्वीकार करने होते हैं ज़िंदा रहने को कदम कदम । और ये सब इस तरह चलता रहता है कि इंसान जानता तक नहीं कैसे इक अजब अनचाहे मोहजाल में फंसता चला जाता है और उन सब में खुद का अस्तित्व दिखाई नहीं देता है । अधिकांश सोचते समझते नहीं उनका जीवन क्या है किसलिए जी रहे हैं बस साल दर साल उम्र की सालों की संख्या बढ़ती जाती है जबकि सौ बरस की ज़िंदगी में जिए कभी नहीं होते सही मायने में ।  

आज़ादी शब्द को लेकर इक जाल बुना गया है चालाक लोगों ने शासन करने को सबको गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है । कुछ मुट्ठी भर लोग मनमानी करने ऐशो आराम से शान ओ शौकत से रहने की कीमत भोले लोगों से वसूलते हैं छीनते हैं झूठे वायदे और उनकी देश समाज की भलाई की बातों वाले भाषण देकर । सब नियम सारे कानून संविधान दावा करते हैं अधिकार देने का जबकि दरअसल इसकी आड़ में आपको बेबस और कमज़ोर करते हैं कोई सरकार कोई अदालत कोई सुरक्षा व्यवस्था आपको अधिकार न्याय समानता देने को विवश नहीं है । आपको कायदे नियम पालन नहीं करने पर दंडित करने वाले खुद कर्तव्य नहीं निभाने पर किसी तरह से दंडित नहीं हो सकते हैं । समय बदलता रहता है मगर आम ख़ास बड़े छोटे का भेदभाव नहीं मिटता है । अमीर और अमीर ताकतवर अधिक ताकतवर बनता जाता है और शासक सत्ता बेरहमी से लूट का कारोबार करती रहती है । सामाजिक व्यवस्था समाज की भलाई नहीं करती और परंपराओं की बेड़ियां आदमी को अनचाहे अनुचित बंधनों रीति रिवाज़ों की कैद से मुक्त नहीं होने देती हैं ।
 
किसी आसमान पर कोई भगवान या खुदा ईश्वर है या नहीं लेकिन धरती पर जिसे देखते हैं खुदाई की बात करता है । खुद को साबित करने को कितने हथकंडे अपनाते हैं सभी तथाकथित महान बड़े लोग । माजरा यही समझ नहीं आया किसी को अच्छाई करने वाले को अच्छा कहलाने की चाहत नहीं होती है ।  खराब लोग बुराई करते हैं लेकिन कहलाना भले इंसान चाहते हैं तभी धनवान लोग शासक देशभक्ति का दम भरने वाले धर्म उपदेशक समाजसेवक होते कुछ हैं करते जो भी हैं दिखलाते उसका विपरीत हैं आडंबर करते हैं । लगता है बल्कि यकीनन ऐसा ही हो सकता है कि भगवान ने अपना गुणगान अपनी उपासना इबादत अर्चना की ज़रूरत ही नहीं समझी हो एवं कोई और हैवान जैसा भगवान बनकर अपने खराब कार्यों पर पर्दा डालने का कार्य कर रहा है । अपनी इस दुनिया की हालत देख कर यही लगता है कि यहां शैतान का शासन चलता है हैवान की हैवानियत फलती फूलती है और भलेमानुष लोग बर्बाद होते रहते हैं । शैतान भगवान को असहाय कर मौज मस्ती कर रहा है ।    
 
 

 
  

 

 

 

अक्तूबर 28, 2022

 मुफ़लिसी पर गर्व था खैरात ने रुसवा किया ( जज़्बात ) डॉ लोक सेतिया 

किसी और जहां की तलाश है हमको , इस जहान की चाहत नहीं रखते । गांव की गलियां बड़ी भाती हैं हम शहर में रहने की ख़्वाहिश नहीं करते । अपनी मुफ़लिसी की कभी शिकायत नहीं रही हम ज़माने की तरह रास्ते में हमसफ़र नहीं बदलते । हमको तमाशा पसंद नहीं है मंज़ूर उनको भी मखमल में टाट का पैबंद नहीं है । हमने हक़ भी मांगे नहीं फरियाद कर के खुश थे दुनिया सबकी आबाद कर के । बड़े बड़े शहरों की ऊंची ऊंची इमारतें किसी मुसाफिर को ठहरने को जगह नहीं देती हैं सर्द हवाओं में तपती लू और बारिश में पल भर को भी सायबान का साया नहीं देती हैं । कुछ भी किसी का अपना नहीं है सब कड़वा सच है कोई खूबसूरत सपना नहीं है । बच कर निकलने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती है नर्क कितने हैं बस इक जन्नत नहीं दिखाई देती है ऊंचे मीनार हैं गहराई नहीं दिखाई देती है , रुसवा हैं लोग मगर उनको खुद की रुसवाई नहीं दिखाई देती है पहाड़ तनकर खड़े हैं नीचे उनके कितनी गहरी है खाई नहीं दिखाई देती है । अजब सी भूलभुलैया में खो गया हूं मैं कहीं से कोई आवाज़ नहीं देता मुझको , जाना किधर है किधर से था आया इसी उलझन में खड़ा हूं खामोश ग़ुज़रा वक़्त नया आज नहीं देता मुझको । हक़ीक़त को ढक दिया गया है छुपा दिया है घना कोहरा है जिसको शानदार आकाश बताया जाने लगा है । मेरा दिल इस अजनबी भीड़ में घबराने लगा है , मुझको गांव अपना याद आने लगा है । हर शख़्स यही सोच कर पछताने लगा है । बहुत कुछ और कहना है ग़ज़ल से काम लिया है । 

हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल )  
 
हक़ नहीं खैरात देने लगे
इक नई सौगात देने लगे।

इश्क़ करना आपको आ गया
अब वही जज़्बात देने लगे।

रौशनी का नाम देकर हमें
फिर अंधेरी रात देने लगे।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए
आप सबको मात देने लगे।

बादलों को तरसती रेत को
धूप की बरसात देने लगे।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की
एक झूठी बात देने लगे।

जानते सब लोग "तनहा" यहां
किलिये ये दात देने लगे।
 
  तुम मेरी फ़क़ीरी को कहाँ लेके चले आये|| मे टाट का | Nojoto...

अक्तूबर 24, 2022

ओ रौशनी वालो ( अंधकार की आवाज़ ) डॉ लोक सेतिया

    ओ रौशनी वालो ( अंधकार की आवाज़ ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

उजाला उस जगह करना चाहिए जिस जगह अंधेरा हो , रौशन सड़कों महलों बाज़ारों को चकाचौंध रौशनी से सजाना बाहरी दिखावा करने से भीतर का अंधकार मिटता नहीं बल्कि और अधिक बढ़ाता ही है । जब काली अंधेरी अमावस की रात को दिये जलाकर अंधेरा मिटाया गया होगा तब उसकी अहमियत रही होगी । आज जब चारों तरफ जगमगाहट है सजावट को दिये जलाना अंतर्मन के अंधकार को कम नहीं करता है । कोई बतला रहा था भगवान राम की इक ऐसी मूर्ति बना रहे हैं जो हर दिशा से एक जैसी नज़र आएगी । कण कण में भगवान दिखाई देने की बात कोई नहीं करता आजकल । राजा राम पत्नी सीता संग बनवास से वापस लौटे थे और अयोध्या वासियों ने स्वागत करने को दीप उत्सव मनाया था , अब शासक तो राजाओं से बढ़कर शाही शान-ओ-शौकत से  चकाचौंध चुंधयाती रौशनी में रहते हैं जनता को बनवास मिला हुआ है जिसका कोई अंत दिखाई नहीं देता उन के जीवन में उजाला कब होगा उस दिन वास्तव रामराज और दीपोत्स्व का त्यौहार मनाया जाना चाहिए । जिस देश की अधिकांश जनता भूख गरीबी शोषण अन्याय अत्याचार और असमानता के वातावरण में रहने को अभिशप्त हो वहां त्यौहार का उल्लास केवल धनवान और सुवधा साधन सम्पन्न वर्ग को हो सकता है वो भी तभी अगर उनको आम इंसानों के दुःख दर्द परेशानियों से कोई सरोकार नहीं हो । ऐसे में शासक वर्ग का देश का खज़ाना आडंबर पर बेतहाशा बेदर्दी से खर्च करना लोकतंत्र और संविधान के ख़िलाफ़ गुनाह ही समझा जाना चाहिए । अधिक विस्तार से कहना व्यर्थ है अपनी पहली कविता दोहराता हूं । मन की बेचैनी अभी भी कायम है ।  

  बेचैनी ( नज़्म )  

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास।
 

Awaaz - Hindi poetry | Quotes, Poetry

अक्तूबर 11, 2022

इक ख़्वाब जो हक़ीक़त नहीं बन सका ( ज़िंदगी की मज़बूरी ) डॉ लोक सेतिया

    इक ख़्वाब जो हक़ीक़त नहीं बन सका ( ज़िंदगी की मज़बूरी ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

कितनी बार यही सपना दिखाई देता है सुबह होते भूल जाता है या नहीं मालूम भुलाना पड़ता है । कभी कभी सोचता हूं शायद हौसला किया होता तो भले कुछ भी हुआ होता दिल में ये मलाल नहीं रहता कि काश । सपना यही आज रात आया कि बचपन में ही मैं सभी रिश्तों नातों की परवाह छोड़ अनचाही कैद से कितने ज़ुल्मों की ऊंची दिवारों से आज़ाद होकर भाग रहा हूं अजनबी राहों पर अनजानी मंज़िल की तरफ । अक्सर लोग बनी बनाई राहों पर चाहे-अनचाहे चलते जाते हैं घबराते हैं अपनी अलग राह बनाकर चलने के जोखिम से और ज़िंदगी भर पछताते हैं काश साहस किया होता ।  मैंने ज़िंदगी को हक़ीक़त में नहीं जिया है ज़िंदा रहा हूं सपनों के सहारे आपको पागलपन लगता है मेरे लिए किसी जन्नत के ख़्वाब जैसा हसीन हमेशा सच होने की उम्मीद ।  दो कविताओं में यही बात कहनी चाही है मैंने ।
 

 सपनों में जीना ( कविता ) 

देखता रहा
जीवन के सपने
जीने के लिये 
शीतल हवाओं के
सपने देखे
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के
सपने देखे
कांटों से छलनी था
जब बदन
मुस्कुराता रहा
सपनों में
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए
सपने देखे
जी भर खाने के
प्यार सम्मान के
सपने देखे
जब मिला
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में
जब नहीं रहा बाकी
झोपड़ी का भी निशां 
राम राज्य का देखा सपना
जब आये नज़र
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के
देखे प्यार इंसानियत
भाई चारे के ख़्वाब
लगा कर पंख उड़ा गगन में
जब नहीं चल पा रहा था
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में
देखे सदभाव समानता के सपने
आशा के सपने
संजोए निराशा में
अमृत समझ पीता रहा विष
मुझे है इंतज़ार बसंत का
समाप्त नहीं हो रहा
पतझड़ का मौसम ।

मुझे समझाने लगे हैं सभी
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता
सब की तरह कर लूं स्वीकार
जो भी जैसा भी है ये समाज
कहते हैं सब लोग
नहीं बदलेगा कुछ भी
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास ।

सच हुए सपने ( कविता ) 

सपने तो सपने होते हैं
देखते हैं सभी सपने
मैंने भी देखे थे कुछ
प्यार वाले सपने।

कोई अपना हो
हमराज़ भी हो
हमसफ़र भी हो
हमज़ुबां भी हो
चाहे पास हो
चाहे कहीं दूर हो
हो मगर दिल के
बहत ही करीब
जिसको पाकर
संवर जाये मेरा
बिगड़ा हुआ नसीब ।

सब दुनिया वाले
यही कहते थे
किस दुनिया में
रहता हूं मैं अब तक
और किस दुनिया को
ढूंढता फिरता हूं
ऐसी दुनिया जहां
कोई स्वार्थ न हो
कोई बंधन न हो
और हो सच्चा प्यार
अपनापन  भरोसा
अटूट विश्वास इक दूजे पर ।

मगर मेरा विश्वास
मेरा सपना सच किया है
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम
जी उठा हूं जैसे फिर से
निकल कर जीवन की निराशाओं से
तैर रहा आशाओं के समंदर में ।

तुम्हारा हाथ थाम कर
मिलेगी अब ज़रूर
उस पार मेरी मंज़िल
इक सपनों का होगा
महल वहीं कहीं
जहां होगा अपना हर कोई
मुहब्बत वाला इक घर
जिसकी खिड़की दरवाज़े
दीवारें और छत भी
बने होंगे प्यार से
स्वर्ग सा सुंदर होगा
अपना छोटा सा आशियाना ।
 
 
 रात के इन सपनों का हकीकत में क्या होता है मतलब! – News18 हिंदी
 

सितंबर 27, 2022

अंधकार की निशानियां हैं , ये चकाचौंध रौशनियां ( इंसानियत के खण्डर ) डॉ लोक सेतिया

अंधकार की निशानियां हैं , ये चकाचौंध रौशनियां  ( इंसानियत के खण्डर )

                                   डॉ लोक सेतिया 

किसी की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता केवल अपनी सोच को व्यक्त करना चाहता हूं । तमाम लोग किसी शहर की रंग बिरंगी रौशनियां देख का आनंद और रोमांच का अनुभव करते हैं । कभी किसी जगह किसी दिन ख़ास अवसर पर सजावट और रौशनी का भव्य आयोजन किया जाता है । मुझे न जाने क्यों ये सब देख कर अलग तरह का एहसास होता है । सोचता हूं इन सब चमक दमक से देश समाज की बदहाली अंधकार क्या छुप गया है या शायद और भी अधिक दिखाई देता है । कुछ लोग बहुत सारा धन साधन कुछ पलों की इक दिखावे की ख़ुशी पर खर्च करते हैं पानी की तरह पैसा बहाते हैं वास्तव में बर्बाद करते हैं जबकि उनके हमारे आस पास गरीबी भूख बेबसी का जीवन जीते हैं करोड़ों लोग । इतना अंतर अमीर और गरीब का कोई विधाता की देन नहीं है बल्कि ये हमारी सामाजिक और सरकारी अमानवीय व्यवस्था के कारण होता रहा है हो रहा है और हम होने देना चाहते हैं । मेरी बात निराशाजनक लग सकती है जबकि निराशाजनक पहलू ये है कि हम अधिकांश से अधिक अथवा आवश्यकता से ज़्यादा पाकर खुद को भाग्यशाली और उन लोगों से बड़ा या बेहतर समझते हैं जिनको दो वक़्त रोटी भी नसीब नहीं है । लेकिन इस के बावजूद हम मानवता की देश दुनिया के कल्याण की बातें करते हैं और खुद को सभ्य मानते हैं । ये अजीब मंज़र है कोई नंगे बदन है भूख से बिलखता है जीने की बुनियादी सुविधाओं से वंचित है तो कुछ हैं जिनकी चाहतें हसरतें ख़्वाहिशें बढ़ती जाती हैं ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती । धर्म की बात करें तो हर धर्म बताता है वास्तविक धर्म दीन दुःखियों की सहायता करना है संचय करना और व्यर्थ के आडंबर पर बर्बाद करना धर्म नहीं होता है , सबसे महत्वपूर्ण बात जिन के पास सब कुछ है लेकिन तब भी उनको और अधिक हासिल करने की चाहत है वो सबसे दरिद्र लोग होते हैं । 
 
पुरानी ऐतहासिक इमारतों को देखने लोग आते हैं और आचम्भित होते हैं शासकों के शानदार ठाठ बाठ और शाही तौर तरीके की निशानियां देख कर । मुझे वहां जाना अच्छा नहीं लगता है जाना होता है कभी किसी कारण तो देख कर सोचता हूं उन राजाओं ने शासकों ने इतना पैसा केवल अपनी विलासिता पर खर्च किया तो कितने आम नागरिक से कर वसूल कर और क्या उसी से देश राज्य समाज को ख़ुशहाल नहीं बनाया जा सकता था । ऐतहासिक स्थलों पर ये रईसी देख कर , और हाथी घोड़े पालकी की सवारी का लुत्फ़ उठाकर क्या समझते हैं कि हम शहंशाहों की तरह है जबकि वास्तव में हमको आधुनिक लोकतंत्र में सोचना कुछ और चाहिए वो ये कि ऐसा करना देश समाज राज्य के साथ अनुचित आचरण करना था और है । अन्यथा किताबों में ग्रंथों में नीति निर्धारक कथाओं में राजा को जनता का पालक और रक्षक नहीं बताया गया होता । जिन कार्यों का हमको विरोध करना चाहिए उन्हीं का गुणगान करते हैं इसी से समझ आता है कि हमको गुलामी दास्ता और आज़ादी का अंतर नहीं मालूम या उनके अर्थ नहीं समझते हैं । कितना अजीब विरोधाभास है हम महानगरीय जीवन जीना चाहते हैं शानदार बड़े बड़े राजमार्ग पर तेज़ गति से वाहन चलाना चाहते हैं लेकिन खण्डर जंगल को देखना चाहते हैं खेल तमाशा समझ कर । हमको जो बताया जाता है वो किसी सत्ताधारी द्वारा लिखवाया इतिहास का एक पक्ष है और उसका वास्तविक पहलू शायद कभी सामने नहीं आता है । उसको समझना ज़रूरी है इन सब बातों पर चिंतन विमर्श कर खुले दिमाग से । लेकिन हम नहीं करते ऐसा कभी भी क्योंकि ये हमें चिंतित और परेशान उदास कर सकते हैं जबकि हम ख़ुशी और आनंद की तलाश करते हैं चिंताओं से भागते हैं चिंतन से घबराते हैं । 
 
मृगतृष्णा की बात होती है , मुझे लगता है हमारा समाज और लोग उसी का शिकार हैं । चमकती हुई रेत को पानी समझ कर दौड़ रहे हैं उम्र भर भागते रहते हैं और आखिर प्यासे ही मर जाते हैं । कहीं ये किसी का अभिशाप तो नहीं जो हम सोचते हैं कोई वरदान मिला है । लिखने को बहुत है समझने को इतना काफी है। 
 

 

सितंबर 13, 2022

हर ख़ुशी हमारे लिए ( राज़ की बात नहीं ) डॉ लोक सेतिया

     हर ख़ुशी हमारे लिए ( राज़ की बात नहीं ) डॉ लोक सेतिया  

राज़ की बात नहीं थी खुद हम ही नादान और नासमझ थे जो इतनी सी बात समझने में सालों लग गए कि जिनको हमारी ख़ुशी हमारी पसंद से कोई मतलब नहीं था सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहते थे बदले में मुझे क्या किसी को भी खुश देखना नहीं चाहते थे उनकी चाहत में दुःखी होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए । चलो देर ही से सही ये नुस्खा समझ आया तो सही । अश्कों से रिश्ता निभाता रहा बिना बात मुस्कराया तो सही । ख़ुशी कब से खड़ी हुई थी उसको बुला कर खुद अपने दिल में बिठाया तो सही । दुनिया से जो प्यार कभी मिलता नहीं वही अपने आप से पाया तो सही । हम अकेले नहीं खुद साथ हैं अपने ज़माने को कर के दिखाया तो सही । ग़मों से दामन छुड़ाया भी नहीं खुशी को गले से लगाया तो सही । चमन कुछ उदास था मुद्दत से बहारों का मौसम आया तो सही । कोई सूरज कोई चांद नहीं दिखाई देता इक छोटा जुगनू टिमटिमाया तो सही । निराशा के घने बदल छाए हुए थे पर आशा का दीपक जलाया तो सही । तकदीर ने लिखी नफ़रतें ही नफ़रतें साहस से लकीरों को मिटाया तो सही । दर्द के गीत कितने मधुर लगते थे ख़ुशी का नग़्मा महफ़िल को सुनाया तो सही ।
 
भूल हुई जो हमने बेदिल बेरहम दुनिया वालों से जीने की इजाज़त मांगी , मरने की सज़ाएं देने वाले भला किसी को अपनी ज़िंदगी पर इख़्तियार देते हैं । हमको हंसता मुस्कराता देख पूछते हैं माजरा क्या है कैसे ऐसे हालात में खुश रहते हो , रोने की आदत नहीं फिर भी कभी आंखें नम हों तो ज़माना उस पर भी तंज कसता है । हमदर्द ज़माना नहीं है किसी के लिए भी । चतुराई चालाकी चालबाज़ी झूठ का आडंबर नहीं सीखा हमने कभी जिन्होंने इन सभी को आज़माया बहुत कुछ छीना चुराया आखिर उनका अंजाम भी सामने नज़र आया इक दिन उनको खाली हाथ पाया । सच से नज़रें चुराने वाला हमेशा है पछताया दुनिया वालो ने जाने क्यों झूठ का परचम लहराया । हमने कभी नहीं दोस्तों को परखा न कभी आज़माया फिर भी अफ़सोस नहीं है भरोसा किया और धोखा खाया । ऐतबार पर ऐतबार करते हैं ये ख़ता है तो हो हम तो खताएं बार बार करते हैं । आखिर इक बात कहनी है अपनों-बेगानों सभी से , बस और कुछ नहीं चाहता किसी से भी ।
 

         जीने के मुझे पहले अधिकार दे दो , मरने की फिर सज़ाएं सौ बार दे दो।  

 

 
           

सितंबर 12, 2022

एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान

   एहसासों के फूल  ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान 

                           रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया  

गत वर्ष मुझे डॉ सेतिया ने फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी शीर्षक से अपनी पहली किताब भेजी थी , जिसकी भूमिका से मुझे एक पंक्ति अभी तक नहीं भूली है । वह कहते हैं :- लिखना मेरा जूनून है , मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको इबादत की तरह समझा है । इसी वर्ष उनकी तीन किताबों का सुंदर ढंग से छपकर आना वाकई उनके जूनून को दर्शाता है , उन्हें बधाई । और उनकी जुनूनी इबादत को सलाम । 
 
उनके ताज़ा कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' में लगभग 75 छंदबद्ध कविताएं एवं मुक्तछंद रचनाएं संग्रहीत  हैं जो सहज सीधी ज़बान में बदलती अनुभूतियों और एहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं । उनमें कोई शब्दाडंबर नहीं , कोई गूढ़ दर्शन की बोझिल बातें नहीं लेकिन सब में ठोस ज़िंदगी की तरल बातें हैं , जो उनके 71 वर्ष के जीवन अनुभव से निचुड़ी हुई आई हैं । 
 
 
प्रेम अनुभूतियाँ ज़िंदगी की सबसे तरलतम और सघनतम , उदास किंतु सुखद , और सृजन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण अनमोल अनुभूतियाँ होती हैं । ऐसी कविताएं सिरहाने के नीचे रखी जाती हैं , युवावस्था में  , और प्रौढ़ावस्था में हृदय की तहों के नीचे या स्मृतियों में । ऐसी कुछ कविताएं और ग़ज़लें हैं : वो दर्द कहानी बन गया , जाने कब मिलोगी तुम , मन की बात , उमंग यौवन की , मेरे ख़त , मेरी खबर आदि ।    
 
 
कवि केवल प्रेमिका की याद से उपजी उदासी को ही नहीं उकेरता बल्कि वृद्धावस्था में हर उस मां की उदासी को भी शिद्दत से महसूस करता है जो युवा संतान की उपेक्षा सहती है । यह ऐसा है जैसे कोई किसान युवा हुई फसलें काट लेता है और पीछे कटी हुई जड़ों का दर्द ही टीसता रह जाता है  , माँ के आंसू ऐसी ही कविता है । 
 
 
कवि का जीवन संघर्षों में और संघर्षशील मनुष्य के जीवट और आत्मविश्वास में पूरा विश्वास है । वह एक कविता में लिखता है : जीवन इक संग्राम तो क्या \ नहीं पल भर आराम तो क्या । ' थकान ' में कहता है : जीवन भर चलता रहा \ कठिन पत्थरीली राहों पर \ पर मुझे रोक नहीं सके \ बदलते मौसम भी । 
 
 
कवि नये ज़माने की नयी नारी का उद्यघोष सीता के पश्चाताप की आवाज़ में करता है , मुझे नहीं करनी थी चाहत \ सोने का हिरण पाने की ,  और एक अन्य कविता 'औरत ' में जो संग्रह की पहली कविता है वह उसकी आवाज़ यूं बनता है : " तुमने देखा है \ केवल बदन मेरा \ प्यास बुझाने को अपनी हवस की \ बांट दिया है तुमने टुकड़ों में मुझे \ और उसे दे रहे हो चाहत का नाम । एक और खूबसूरत कविता है ' हमारा अपना ताज ' पति-पत्नी का अपना प्यार का छोटा सा बसेरा । 
 
 
सामाजिक सरोकारों की कविताओं में ' काश ' शीर्षक से कविता मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमें कवि सच्ची धर्मनिरपेक्षता सर्व धर्म समभाव का पक्षधर तो बनता है लेकिन उससे बढ़कर वह समूची मानवता के दर्द के एहसास को प्रमुखता देता है न कि मंदिर मस्जिद जाने को । कवि प्राकृतिक परिवेश का प्रेमी है और पर्यावरण संरक्षण में विश्वास रखता है । ' ठंडी ठंडी छाँव ' वृक्ष कहता है : काटना मत मुझे कभी भी \ जड़ों से मेरी \ जी नहीं सकूंगा \ अपनी ज़मीन को छोड़कर  , मैं कोई मनी प्लांट नहीं हूं । मानि वह प्राकृतिक उत्पाद के बाज़ारवाद का भी आलोचक है । 
 
 
साहित्य में कागज़ के फूल सजाने वाले कई लोग पत्थर के फूल भी बन कर नफरती बोल बोलकर बाल श्रमिकों का कैसे दिल दुखाते हैं , ये पीड़ा एहसासों के फूल खिलाने वाले डॉ सेतिया जी बखूबी समझते हैं । उनकी दृष्टि में वो साहित्य कहीं गुम हो गया है जो सद्भावना और संवेदना से खुशियों की महफ़िलें सजाता था ।  अब तो घुटन में उन्हें इस तालाब का जल प्रदूषित लगता है और सब फूल कुम्हलाए हुए । 
 
 
समाज में फैली इन दुष्प्रवृतियों से दुःखी हो कर वह कृष्ण को उनका वायदा याद दिलाते हैं जो उन्होंने अधर्म  जाने पर नया अवतार ले कर आने को कहा था । यहां उनका संस्कृति प्रेम झलकता है ।  इस प्रकार कविता दर कविता सेतिया जी जीवन यात्रा की अच्छी बुरी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति करते चलते हैं । हां कहीं कहीं उनकी घिसी-पिटी उपमाएं अखरती भी हैं , यथा , फूल ही फूल खिले हों \ हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।  फिर भी बहुत ताज़गी है उनकी कविताओं में शिल्प तथा सादी ज़बान में।  उनके लिए साधुवाद की कामना करता हूं ।  
 
  अमृत लाल मदान 
अध्यक्ष , साहित्य सभा 
कैथल ( हरियाणा ) 136027 
मोबाइल नंबर - 94662-39164 

उपरोक्त पुस्तक समीक्षा आदरणीय मदान जी ने 11सितंबर 2022 आर के एस डी ( पी जी ) कॉलेज में विमोचन करते समय पढ़ कर सुनाई । मुझे याद नहीं उनसे कभी पहले आमने सामने मुलाक़ात हुई या कोई वार्तालाप हुई हो । शायद कोई बेहद संवेदशील साहित्य सृजक ही ऐसा कर सकता है केवल पुस्तक को पढ़ कर रचनाकार की मन की भावनाओं को समझ कर इतनी सही सार्थक समीक्षा करना । मुझे अपनी रचनाओं की इस से बढ़कर कोई कीमत नहीं मिल सकती है । अमृत लाल मदान जी का धन्यवाद शब्दों में नहीं किया जा सकता है । 

(   पाठक वर्ग की सुविधा के लिए ' एहसासों के फूल ' कविता संग्रह की पुस्तक व्हाट्सएप्प नंबर 
8447540078 पर संदेश भेज मंगवा सकते हैं । जल्दी ही अमेज़न पर भी उपलब्ध करवा दी जाएगी। )
 

 

सितंबर 06, 2022

कौन समझेगा कहानी मेरी ( कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया

   कौन समझेगा कहानी मेरी ( कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया 

शब्द नहीं एहसास हैं , मैंने अपनी दास्तां सुनाने को कुछ फ़िल्मी गीत कुछ और बातें उधार ली हैं । मेरे अल्फ़ाज़ जाने कैसे कहां गुम हो गए हैं । मैं कौन हूं कहां हूं देखता कोई नहीं , रहता हूं जिस बस्ती में मुझे जानता कोई नहीं । बंद हूं इक कैद में ज़िंदगी की चाह में , कफ़स के परिंदों को उड़ने को छोड़ता कोई नहीं । कभी बेवजह हंसता अश्क बहाता कभी जाने क्यों , इस दुनिया की भीड़ में मेरी तरफ देखता कोई नहीं । दोस्त खुद का नहीं , दोस्ती का घर बना लिया , दुश्मन बहुत मेरे यहां , मुझे मांगने पर मगर मारता कोई नहीं । ये इक नज़्म है जिसकी कोई बहर नहीं मिली कोई मीटर काफ़िया नहीं मिल सका लाख कोशिश करने पर भी । जिस डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखी हुई थी खो गई आज ढूंढी तो नहीं दिखाई दी । उसी तरह जैसे इधर उधर घर बाहर ज़माने भर के अपने बेगाने लोगों में प्यार की चाहत की इक ओस जैसी बूंद भी मेरे लिए कभी नहीं थी । इक दोस्त अजीब लगता था उसकी बातें अच्छी लगती थीं मगर समझ नहीं आती थीं शायद अब थोड़ा थोड़ा समझने लगा हूं । याद आया उस की तबीयत खऱाब थी मिलने गया तो उसकी पत्नी ने जैसे इक शिकायत की थी बोली थी भाई साहब देखना आपका दोस्त इस तस्वीर बनाकर क्या समझाना चाहता है । बड़ी सी पेंटिंग दीवार पर टांगी हुई थी निजी कक्ष में जिस में कोई बदन पर कांटेदार तारों से बंधा हुआ था । शायद सबकी नज़र नहीं जाती थी वहां जहां इक छोटा सा दिल का निशान बना हुआ था । कॉलेज के समय से ही उसको ऐसे पेड़ों की पेंटिंग बनानी पसंद थी जिस की शाखाओं पर कोई पत्ता तक नहीं होता था सूखे ठूंठ जैसे दरख़्त की तस्वीर बनाता रहता था । उस ने अपने घर में गमलों में पौधे लगा रखे थे जिन में फूलदार कम और कंटीले कैक्टस अधिक थे । मुझे घर बनाने पर कुछ कैक्टस गमले में उपहार दे गया था कोई कुछ भी समझे मैं जानता हूं उसके दामन में मेरे लिए एक भी शूल नहीं था फूल खिलाना चाहता था शायद मगर साथ साथ कांटे भी होंगे गुलाब में छुपे हुए इस वास्तविकता को समझाना भी चाहता था । 
 
 उम्र बीत गई तब जाकर समझा खुद अपने आपको सबकी बात को । ये दुनिया किसी प्यासे जलते तपते रेगिस्तान की तरह है और हम लोग प्यासे हैं प्यार अपनापन और चैन सुकून की तलाश में दौड़ते रहते हैं ।  यही मृगतृष्णा जीवन का अभिप्राय है चमकती हुई रेत को पानी समझ भागते भागते आखिर प्यासे ही मर जाना है । मुझे फ़िल्में देखना बेहद पसंद रहा है , लोग अपने आनंद मनोरंजन के लिए सिनेमा देखते हैं मुझे जैसे किरदार भाते हैं आस-पास नहीं मिलते फ़िल्म देखता तब दिखाई देते हैं । पागलपन ही सही मुझे प्यार रहा है ऐसे किरदारों से अथाह मुहब्बत की है , आनंद फिल्म में एक दोस्त मिल जाता है जिसको बिना जाने पहचाने किसी नाम से पुकारने पर जवाब में उसी तरह का किरदार सामने खड़ा दिखाई देता है । आनंद किसी मुरारीलाल को नहीं जानता फिर भी कभी किसी से मिलने बात करने की चाहत हो तो इस नाम से आवाज़ देकर पुकारता है राजेश खन्ना को जॉनी वाकर गुरु बन जयचंद नाम से जवाब देता है । मुझ जैसे लोग कितने होंगे जिनको उनका मुरारीलाल जयचंद आनंद को मिले कितने दोस्तों की तरह वास्तव में मिलते नहीं हैं । 
 
लेकिन आजकल की फ़िल्में टीवी सीरियल की कहानियों में दोस्ती मुहब्बत हमदर्दी वाले किरदार नहीं होते हैं , दिखाई देते हैं चालाक चालबाज़ हिंसा को बढ़ावा देने वाले ख़लनायक वाले किरदार । खलनायक आजकल नायक से अधिक पसंद किए जाने लगे हैं , हमको सिनेमा टीवी अखबार से टीवी समाचार चैनल तक डराने लगे हैं । सपने सुहाने अब नहीं दिखाई देते भयानक ख़्वाब आधी रात को जगाने लगे हैं । फूलों की बात क्या बताएं इधर बाज़ार में ऊंचे दाम बिकते हैं । मैंने फूलों की बात जब भी किसी से की लगा सब को प्लास्टिक या पत्थर के फूल पसंद हैं गुलदान में सजाकर रखने को । मेरे खिलाए फूल भरी बहार में क्यों मुरझा जाते हैं मैं नहीं जानता कोई राज़ होगा छुपा इस में मुमकिन है । चलते चलते इक पुरानी ग़ज़ल सुनाता हूं ।
 

फूलों के जिसे पैगाम दिये ( ग़ज़ल ) 

फूलों के जिसे पैग़ाम दिये
उसने हमें ज़हर के जाम दिये ।

मेरे अपनों ने ज़ख़्म मुझे 
हर सुबह दिए हर  शाम दिये ।

सूली पे चढ़ा कर खुद हमको
हम पर ही सभी इल्ज़ाम दिये ।

कल तक था हमारा दोस्त वही
ग़म सब जिसने ईनाम दिये ।

पागल समझा , दीवाना कहा
दुनिया ने यही कुछ नाम दिये ।

हर दर्द दिया , यारों ने हमें
कुछ ख़ास दिये , कुछ आम दिये ।

हीरे थे कई , मोती थे कई
" तनहा " ने  सभी बेदाम दिये ।
 


 

सितंबर 05, 2022

सोशल मीडिया की पढ़ाई , शिक्षक दिवस है भाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   सोशल मीडिया की पढ़ाई , शिक्षक दिवस है भाई ( हास-परिहास ) 

                          डॉ लोक सेतिया 

इक फिल्म तक से संदेश पाया था , तीन महा मूर्खों की कहानी थी थ्री इडियट्स , ज्ञान की गंगा बहती है जिधर से मिले बटोर लो । अब करोड़पति का झांसा देने वाले आगाह करते हैं पहले टटोल लो । सुबह हो गई नानू अपना अपना फेसबुक , व्हाट्सएप्प खोल लो । दोस्तो मैंने सोशल मीडिया फेसबुक को जाना परखा और आज़माया है लौट कर बुद्धू बनकर हर समझदार घर वापस आया है । उलटी पढ़ाई पढ़ने पढ़ाने में इस आधुनिक युग ने उम्र गंवाई है , बाप नहीं कोई किसी का न कोई भाई है बिना बात की यहां लड़ाई है । किसी को वास्तविकता बिल्कुल समझ नहीं आई है फिर भी हर किसी ने अध्यापक उपदेशक बनने की कसम खाई है । सबक कितने हैं कोई हिसाब नहीं कोई कलम दवात नहीं कोई किताब नहीं दोस्ती क्या दुश्मनी किसको कहते हैं समझना चाहो तो इस से बेहतर कोई किताब नहीं । झूठ धोखा है इक तिलिस्म है ग़म नहीं कोई यही इक ग़म है जो नहीं नज़र आए बस वही कम है । खुशियां हैं और बड़ा मातम है क्या कहें बस ज़ुल्म ओ सितम है लबों पर मुस्कुराहट भी आंख भी नम है । पढोगे लिखी इक नई नज़्म है :-

झूठे ख़्वाब ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जीवन भर महसूस होता रहा

अकेलापन लेकिन समझा यही  

मुझे चाहते हैं सभी लोग यहां ।

हादिसे नहीं इत्तेफ़ाक़ नहीं कोई 

छोड़ जाते हैं तोड़ जाते नाते सब 

अचानक बदल रास्ता कब कहां ।

कौन साथ कौन बिछुड़ा खबर नहीं

भीड़ भरे बाज़ार में ढूंढें कैसे भला 

धूल ही धूल कदमों के नहीं निशां ।

सबने ज़मीन से नाता तोड़ लिया 

और सपनों का बनाया इक आस्मां 

आंख खुली तो थे गायब दोनों जहां । 

कौन देगा सच के सच होने की गवाही 

झूठ का सिक्का चलता आजकल भाई

सभी पढ़ाते हैं यही पढ़ाई बधाई भाई । 



सितंबर 01, 2022

हमको राग-दरबारी नहीं आता ( तलवार की धार पर चलना - सच लिखना ) डॉ लोक सेतिया

     मेरी रचनाओं को लेकर खट्टी-मीठी यादें ( दिल से दिल तक ) 

                         डॉ लोक सेतिया 

अक्सर लेखक किताब छपवाते समय इनका उल्लेख किया करते हैं मैंने ऐसा नहीं किया क्योंकि आपसी निजी व्यक्तिगत बातों का उपयोग पाठक को पुस्तक पढ़ने को विवश करने को इस्तेमाल करना मुझे स्वीकार नहीं है । कितनी बार कोई किताब मिलती तो उस पर समीक्षा लिखवाई शुरुआत में दिखाई देती थी । पाठक को पढ़ कर राय बनाने से पहले प्रभावित करना सही नहीं लगता है । आज सैर करते करते याद आई इक घटना साथ चलते दोस्त की कही बात से , उनका कहना था राज्य के शासक को शुभारंभ करने को फुर्सत नहीं मिली कब से । मेरी व्यंग्य की किताब की पहली रचना  ' स्वर्ग लोक में उल्टा-पुल्टा ' की याद आई । मैंने जसपाल भट्टी जी के निधन के बाद उनको श्रद्धांजली देने को लिखी थी और उनकी धर्मपत्नी को भेजी थी डाक द्वारा । संक्षिप्त सा जवाब मिला था उन्होंने कहा था ये सबसे अच्छा ढंग है श्रद्धा-सुमन अर्पित करने का । 
 
     कुछ साल पहले के पी सक्सेना जी को इक रचना भेजी थी और उनका पोस्टकार्ड पर हरे रंग की स्याही से लिखा खत मिला था ,  ' हम सार्थक व्यंग्य लिखने वालों की बिरादरी बहुत कम है ' बनाए रखना । शब्द अंकित हैं अंतर्मन पर । कोई 600 से अधिक व्यंग्य रचनाएं प्रकाशित हुई हैं सभी अख़बारों पत्रिकाओं में । इक अखबार के संपादक जी ने फोन पर बात कर अनुबंध करने को कहा था मानदेय बढ़ा कर देने का प्रलोभन भी था , शर्त थी सबसे पहले हर रचना उनको भेजनी होगी और स्वीकृत नहीं होने पर कहीं और भेज सकते हैं । बंधनमुक्त रहना मेरी आदत है क्षमायाचना कर आग्रह स्वीकार करने में असमर्थता प्रगट कर दी थी । 
 
   लखनऊ की इक पत्रिका का पत्र मिला था कीमत घर की कहानी को लेकर नाराज़गी जताई थी , जब हमने स्वीकृत कर ली थी आपको किसी अन्य जगह नहीं भिजवानी चाहिए थी । मैंने जवाब दिया था मैं अपनी रचनाएं अलग अलग अख़बार पत्रिकाओं को एक साथ भेजा करता हूं किसी से कोई सहमति या लिखित अनुबंध नहीं किया और सवतंत्र लेखन करता हूं । साथ साथ भेजी रचना कोई पहले कोई बाद में पब्लिश करते रहते हैं अधिकांश लिखने वाले को मानदेय भी नाम भर को देते हैं इसलिए रचनाकार पर बंदिश लगाना अनुचित है । एकतरफा नियम नहीं होने चाहिएं । 
 
   व्यंग्यकार की समस्या यही है सबको कटाक्ष पढ़ कर आनंद आता है औरों को लेकर लिखा होने पर । जब भी जिस को अपनी संस्था संगठन को लेकर कड़वी वास्तविकता पढ़ने को मिलती सभी बुरा मानते हैं । ग़ज़ल की बात दूसरी है सभा में सामने बैठे लोग ताली बजाते हैं वाह वाह करते हैं बगैर समझे कि मतलब क्या है । मगर ऐसा अवसर कम मिलता है बेबाक सच कहने वाले को लोग सभाओं में बुलाने से घबराते हैं । कविता नज़्म का अपना एहसास होता है लेकिन वास्तविक सही जानकारी के आलेख लोग पढ़ना नहीं चाहते इसलिए किताबों को नहीं व्हाट्सएप्प फेसबुक को विश्वसनीय समझ गुमराह होते हैं । मैंने सबको लेकर निडरता पूर्वक सच लिखने की कोशिश की है और राजनीति धर्म समाजसेवा से पत्रकारिता पर ही नहीं खुद लिखने वाले लेखक और स्वास्थ्य सेवाओं डॉक्टर्स पर भी निसंकोच लिखा है । सात घर छोड़ने वाली और झूठ की चाशनी लगा सच बोलने वाली शैली नहीं अपनाई है ।
 
  सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि मुझे कभी भी राग-दरबारी नहीं भाया है किसी शासक किसी तथाकथित महानायक का गुणगान नहीं किया है । मुझे कुछ लोग आदरणीय लगते रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन देश समाज को समर्पित किया और सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया , लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी और लाल बहादुर शास्त्री जी जैसे गिने चुने लोग मेरे लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहे हैं । चाटुकारिता करने वाले लोग जिनको मसीहा बताते हैं अक्सर वो अच्छे इंसान भी साबित नहीं होते हैं । मेरी किताबों में आपको कोई भगवान कोई मसीहा कोई देवी देवता नहीं मिलेगा , शायद उनकी मसीहाई पर सवालात की बात अवश्य दिखाई देगी ।
 




अगस्त 25, 2022

ग़म का कारोबार नहीं करते ( आधी अधूरी कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   ग़म का कारोबार नहीं करते ( आधी अधूरी कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

   सच कहने और स्वीकार करने में संकोच नहीं करते हैं हम , लिखने वाले दुनिया के बाज़ार की परवाह नहीं करते हैं । हार जाते हैं हारते नहीं हैं , खरीदार ज़माना है झूठ का , और हम दुनिया के बाज़ार में बिकते नहीं हैं । कई बार कितने लोग मुझे चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए कहते थे आपकी लेखनी कमाल की है । मैं बहुत बार जानता समझता था कहने वाले ने मुझे पढ़ा ही नहीं है सिर्फ खुश करने या कोई मतलब होने के कारण झूठी तारीफ करता है । निसंकोच बताएं कोई सहायता कर सकता हूं तो अवश्य ख़ुशी से करना चाहूंगा । 25 साल की उम्र में ज़िंदगी से सामना हुआ तो कुछ महीनों में दोस्ती रिश्ते अपनापन की वास्तविकता समझ आ गई थी , हर कोई मुझे इस्तेमाल करना चाहता था और कोई कीमत नहीं समझ कर खरीदार बन कर मुझे पाना चाहता था बदले में देना कुछ भी नहीं चाहता था । होशियारी हमने कभी नहीं सीखी जीवन भर नासमझ रहे हैं । मैं समझता हूं कि मेरा लेखन कोई बड़े ऊंचे स्तर का नहीं है और कभी बड़े बड़े साहित्य कारों से तुलना करने की मूर्खता नहीं की है । इसलिए कहता था मेरा लेखन उच्च कोटि का नहीं मगर वास्तविक और मौलिक एवं सच्चाई को उजागर करता है। 
 
  उनको शायद उम्मीद नहीं थी ऐसा होने की जबकि मुझे अक्सर जैसी आशंका रहती है वैसा ही होता है तभी मैं नाकामी निराशा से घबराता नहीं , उन्होंने कहा आपकी किताब को जैसा उन्होंने सोचा था पाठक वर्ग से उतना प्यार मिला नहीं है । बहुत कारण हैं पहला मुझे खुद को बाज़ार की वस्तु बनकर संवरना नहीं आता है और कभी लोग जैसा चाहते हैं लिखना मंज़ूर नहीं किया । और दूसरा आधुनिक युग में सोशल मीडिया से लेकर अन्य दुनियादारी के तौर तरीकों से तमाम हथकंडे अपना कोशिश करने की आदत नहीं है । किसी को झूठी चमक - दमक से आकर्षित करना भले बाद में उसको लगे विज्ञापन के झांसे में गलती कर बैठा उचित नहीं होता है । सच को समझने में वक़्त लगता है और कितनी बार किसी को ज़िंदा रहते स्वीकार नहीं किया गया लेकिन मौत के बाद या सूली चढ़ाने के बाद समझा दुनिया ने कि सच क्या था । मंच पर वाह वह और तालियां बटोरने वाले सार्थकता से अधिक नाम शोहरत पैसा बनाने पर ध्यान देते हैं शायद नहीं समझते ये कुछ पलों की बात है कालजयी रचना का महत्व अलग होता है । सभी जिस राह चलते हैं आसान राह सफलता हासिल करने की मुझे भाती नहीं है खुद अपनी बनाई पगडंडी पर चलना पसंद है । 
 
     मेरी भी किताब बिकवा दो , व्यंग्य रचना लिखी थी बीस साल पहले जब अटल बिहारी बाजपेयी जी की किताब जननायक को लेकर यू जी सी से विश्वविद्यालयों को पत्र भेजा गया । 1000 रूपये मूल्य की किताब आज एक चौथाई कीमत पर उपलब्ध है कितनी पढ़ी गई खरीद कर कितनी विवश हो मंगवाई लायब्रेरी की अलमारी की शोभा बढ़ा रही ये राज़ की बात है । लेकिन अच्छे साहित्य लेखन की कटौती एक ही है वर्षों बाद कोई पढ़ता है तो क्या विचार आता है , क्या उस कालखंड में लोग यही सोचते समझते पसंद करते और लिखते पढ़ते थे या फिर ऐसा लगता हो कि तब भी ऐसे लीक से हटकर निडर होकर भीड़ में शामिल नहीं होने वाले विचारशील हुआ करते थे । मेरा मानना है कि कई साल बाद कोई पढ़ेगा मुझे तो यही समझेगा कि ये लिखने वाला शानदार शब्दों और कलात्मकता से प्रभावित भले नहीं कर सका हो लेकिन अपने समय की वास्तविकता को उजागर करने में पूर्णतया सफल रहा है । समाज की सही तस्वीर आईने में दिखलाना ही पहला और अंतिम मकसद होता है लेखन धर्म में। 
 
अपनी चार अभी तक प्रकाशित पुस्तकों को लेकर मैं दावा कर सकता हूं की सभी अपने नाम के अनुरूप रचनाओं का संकलन हैं ।
 
1  फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी , ग़ज़ल संग्रह में ज़िंदगी का फ़लसफ़ा है । 
 
2  एहसासों के फूल , कविता संग्रह में भावनाओं की कोमल छुवन है । 

3 हमारे वक़्त की अनुगूंज , व्यंग्य रचनाओं में इस समय की सच्चाई है ।
 
4 दास्तानें ज़िंदगी , ज़िंदगी की कहानियों को बयां करती दास्तानें हैं ।
 
 

 

अगस्त 24, 2022

यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         यहां भगवान बन जाते वहां शैतान बन जाते ( ग़ज़ल ) 

                 डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

यहां भगवान बन जाते , वहां शैतान बन जाते
हमेशा के लिए तुम क्यों नहीं इंसान बन जाते। 
 
ज़रूरत पर हमेशा ही झुकाए सर चले आये 
तुम्हारे पास आएं लोग तब अनजान बन जाते। 
 
तुम्हारे वास्ते दर खोलना महंगा पड़ा सबको 
निकाले से नहीं निकले जो वो महमान बन जाते। 
 
अदावत की सियासत से कभी कुछ भी नहीं मिलता 
न जो अभिशाप बनते काश इक वरदान बन जाते। 
 
बहुत करते रहे तुम सब अमीरों पर मेहरबानी 
गरीबों के लिए अच्छे सियासतदान बन जाते। 

भरी नफरत दिलों में , और आ जाते हैं मंदिर में 
समझते सब को अपना आप गर भगवान बन जाते। 

मुहब्ब्बत उम्र भर " तनहा " रहे करते ज़माने से 
दिखावा लोग सब करते हैं झूठी शान बन जाते। 



 
 

अगस्त 23, 2022

ज़िंदगी भर ख़ुशी ढूंढते हैं लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी भर ख़ुशी ढूंढते हैं लोग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मिलती नहीं जीवन भर क्यों 
मिलती है ख़्वाबों में शायद वो 
और हम ने ख़्वाब सजाना ही 
हक़ीक़त से घबरा छोड़ दिया । 

वही मांगते हैं खुशियां उन्हीं से 
देते हैं जिनको दर्द की सौगातें 
इंसान इंसान हैं कोई पेड़ नहीं 
पत्थर खा देते हैं फल सबको ।
 
बना दिया है कारोबार उसे और 
कीमत लगाते हैं सब ख़ुशी की 
दर्द के बदले कौन बांटता है अब 
अपनों बेगानों को वास्तविक ख़ुशी । 
 
इक बार इक ख़ुशी मिली हमको 
करीब जा कर देखा उसकी आंखें 
अश्क़ों से भरी हुई थी दर्द सहते 
मुस्कराहट मगर लबों पे रहती थी ।
 
वो नन्हीं सी बिटिया चाहती थी 
उठा कर कोई चूमे माथा उसका 
फुर्सत थी किसे खेले संग कौन 
खिलौनों से बहलाना था आता । 
 
देख कर ग़म सभी भूल भूल जाएं 
मासूम ख़ुशी बड़ी हो गई धीरे धीरे 
घबराती अब सबसे करीब आने से
खुश होने लगे सभी उसे रुलाने से । 
 

 

 
 
 

अगस्त 20, 2022

लिखने वाले लेखक का दर्द ( आलेख ) डा लोक सेतिया

   लिखने वाले लेखक का दर्द  ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

    घटना कोई तीस साल पहले की है , लेखक का दर्द शीर्षक से व्यंग्य रचना लिखी थी अखबार को भेजी थी । शोषण पर संपादकीय पढ़ा था संपादक जी का तो ख्याल आया कितने बड़े बड़े अखबार पत्रिका वाले करोड़ों की आमदनी होने पर भी लिखने वाले तथा समाचार भेजने वालों को कुछ भी नहीं देते या नाम भर को मानदेय देते हैं जो सम्मानजनक कदापि नहीं लगता है । अफ़सोस हुआ जब इक संपादक ने रचना को लौटाया पुर्ज़े-पुर्ज़े कर फाड़ कर और लाल सियाही से काटने को लकीर लगा कर । सामान्य तौर पर खेद सहित रचना लौटाई जाती थी अन्य किसी को भिजवाने के लिए । तब ध्यान आया था जब किसी के यहां कोई मर जाता है तब उधर से फाड़ कर चिट्ठी भिजवाई जाती है , मैंने समझ लिया था उनका ज़मीर मर गया है । लिखना तलवार की धार पर चलना है हिंदी लेखक को शायद ही अपनी महनत का उचित मेहनताना मिलता है , सबके शोषण और मानवता के दर्द की बात लिखने वाला खुद अपना दर्द नहीं बताता कभी पाठक को । तीस चालीस साल लिखने के बाद किताबें छपवाई तब सोशल मीडिया पर जानकारी देने को पब्लिशर का संपर्क नंबर दिया और किसी दोस्त का जवाब आया पैसे लेते हैं दोस्त से उपहार देना चाहिए । उनकी बात वास्तविकता बताती है लोग किताब खरीद कर नहीं पढ़ते अधिकांश तौर पर , जब मैंने लिखना शुरू किया था इक पत्रिका में कॉलम छपता था , क्या आप मांग कर भोजन खाते हैं कपड़े पहनते हैं अन्य आवश्यक चीज़ें मुफ्त लेते हैं । अगर नहीं तो मांग कर नहीं खरीद कर पढ़ें और अपने परिवार को अच्छे साहित्य से जोड़ कर सही मार्गदर्शन पाने की आदत डालें । कुछ साल पहले सार्थक लेखन पर इक आलेख लिखा था जब इक बचपन के दोस्त के बेटे ने अपनी किताब के विमोचन पर कोई आलेख पढ़ने को कहा था , ढाई आखर प्रेम के लिखना बाक़ी है अभी , शीर्षक से रचना पढ़ कर सुनाई थी सभा में । मगर सुझाव उनको आलोचना क्यों लगा मुझे समझ नहीं आया था ।

      18 मई 2014 ( अभी बाक़ी है पढ़ना लिखना )                    

    बात करते हैं उनकी भी आज जिनका दावा है कि वो दर्पण हैं समाज का। बहुत जोखिम भरा काम है ये , आईने को आईना दिखाना। इतनी छवियां उनमें दिखाई देती हैं कि नज़रें हार जाती हैं उनको निहारते निहारते। ये विषय इतना फैला हुआ है कि इसका ओर छोर तलाशते उम्र बीत सकती है। इसलिये कुछ आवश्यक बातों पर ही चर्चा करते हैं ताकि ये समझ सकें कि आज का साहित्य , आज का लेखक कहां खड़ा है , क्या कर रहा है और किस दिशा में जा रहा है। जब भी कोई कलम उठाता है तब वास्तव में सब से पहले वो खुद अपने आप को तलाश करता है , मैं क्या हूं , मेरा समाज कैसा है , कहां है। तब सोचता है कि ये समाज होना कैसा चाहिये , मुझे क्या करना चाहिये इसको वो बनाने के लिये। इतिहास में जितने भी महान लेखक हुए हैं वो सभी अपने इसी मकसद को लेकर लिखते रहे हैं। उन्होंने ये कभी नहीं सोचा था कि उनको लिखने से क्या हासिल होगा या क्या नहीं मिलेगा। कुछ भी पाना या खोना उनका ध्येय नहीं था , केवल इक लगन थी जो उनको लिखने को विवश करती रही। और उन्होंने दुनिया को वो दिया जो सदियों तक कायम रहा। इधर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो लिखने को विवश नहीं होते , कोई विवशता उनको लिखने को बाध्य करती है।  जैसे अखबार या पत्रिका का संपादक नित लिखता है नये विषय पर इसलिये नहीं कि उसकी सोच विवश करती है , बल्कि इसलिये कि उसको इक औपचारिकता निभानी है।

                इधर देखते हैं इक भीड़ नज़र आती है लिखने वालों की , मगर ध्यान दें तो समझ नहीं आता इसको क्या कहना चाहिये। साहित्य सृजन या कुछ और या मात्र कागज़ काले करना। कुछ भी तो दिखाई नहीं देता जो सार्थक हो , कोई बताता है वो महिला विमर्श की बात कहता है , कोई जनवादी-वामपंथी लेखन का पैरोकार बना बैठा है , कोई दलित लेखन का दम भरता है। ये कैसा साहित्य है जिसको पूरा समाज नज़र नहीं आता , कोई खास वर्ग दिखाई देता है जिसमें। कितना भटक गया है आज का लेखक , क्या हासिल करना चाहता है वो समाज को इस तरह टुकड़ों में विभाजित कर के। सब की बात क्यों नहीं करना चाहता ये इस नये दौर का नया लेखक। जब लिखने वाला खुद को और अपने समाज को पहचानने के वास्तविक ध्येय से भटक जाता है , और चाहता है लोग उसको पहचानें , उसके लेखन का सम्मान हो , मूल्यांकन हो तब वही होता है कि आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। लगता है यही करने लगा है आज का लेखक। वह समाज को कुछ देना नहीं चाहता बल्कि उससे कुछ पाना चाहता है। अथवा जितना देता है उससे अधिक पाने की लालसा रखता है। कई-कई किताबें छपवा डाली हैं , शायद ही कभी सोचा हो कि उनमें लिखा क्या है। बहुत हैरानी होती है जब अधिकतर पुस्तकों में कुछ भी काम का नहीं मिलता , कुछ तो जो सार्थक हो , जो समाज को सही दिशा दिखाने का कार्य करे। अन्यथा व्यर्थ समय और शब्दों की बर्बादी से क्या हासिल होगा। अब उस पर शिकायत कि लोग पढ़ते ही नहीं किताबों को , क्या कहीं लेखन में कमी नहीं जो पाठक ऊब जाता है कुछ पन्ने पढ़कर। एक हास्यस्पद बात है , बहुत सारे लेखक खुद अपने ही लेखन पर फिदा हैं। जैसे कोई दर्पण में अपनी ही सूरत को निहारता रहे और अपने आप पर मोहित हो जाये। कहते तो हैं कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता , मगर मेरे कॉलेज के इक सहपाठी कहते थे कि दर्पण हर देखने वाले को बताता है कि तुमसे खूबसूरत दूसरा कोई नहीं है। शायद हम खुद अपने आप को बहलाना चाहते हैं। माना जाता है कि खुद को और बेहतर बनाने के लिये अपने से काबिल लोगों का साथ हासिल करना चाहिये मगर आजकल के लेखक उनका साथ पसंद करते हैं जो उनको महान बताकर हरदम उनकी तारीफ करता रहे। अपनी कमियों से नज़र चुराकर लेखक काबिल नहीं बन सकता है। सम्मान , पुरूस्कार आदि की अंधी दौड़ में शामिल लेखक सच से बहुत दूर हो जाता है। देश में और राज्यों में साहित्य अकादमी में लोगों को पद काबलियत को देख कर नहीं बल्कि सत्ताधारी नेताओं की चाटुकारिता करने से मिलते हैं और सत्ता के चाटुकार कभी सच्चे लेखक नहीं बन सकते। ऐसे लोग हर वर्ष अपनों अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम करते हैं। साहित्य भी गुटबंदी का शिकार हो चुका है , साहित्य अकादमी के पद पर आसीन व्यक्ति हर उस लेखक को सरकारी आयोजन में नहीं बुलाता जो उसको पसंद नहीं है। जिनको लोग समझते हैं कि अच्छे साहित्यकार हैं तभी पद पर हैं कई बार वो लेखक ही नहीं होते।

                    वापस मूल विषय पर आते हैं। हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरुद्वारे किसलिये जाते हैं , अक्सर ये याद नहीं रहता। क्या हम ईश्वर को देखने गये थे , दर्शन करने , स्तुति करने या केवल अपनी बात कहने।  कभी कुछ मांगने तो कभी कुछ मिलने पर धन्यवाद करने। कितनी बार तो हम श्रद्धा से नहीं किसी भय से या अपराधबोध से जाते हैं। कभी काश ये सोच कर जाते कि आज अपने भगवान का हाल-चाल पूछेंगे , कि वो कैसा है और वो बताता कि कितना बेबस है परेशान है अपनी दुनिया को देख कर। हम जो अपनी दुनिया में ये शिकायत करते हैं कि अब बच्चे स्वार्थी बन गये हैं , मां बाप से क्या पाया है कभी सोचते ही नहीं , हर दिन मांगते रहते हैं और अधिक , लौटाना जानते ही नहीं। भगवान को भी तो ऐसा ही लगता होगा कि हम कभी खुश ही नहीं होते , उसने कितना दिया है , क्या क्या दिया है , हम हैं कि सब अपने पास रख लेना चाहते हैं। भगवान को नहीं चाहिये हमसे कुछ भी , मगर हम इतना तो कर सकते थे कि जितना हमें मिला उसका आधा ही हम उसके नाम पर लौटा देते उनको देकर जिनके पास कुछ भी नहीं है। ऐसे हमारा आस्तिक होना किस काम का है , जब हमने धर्म की किसी बात को जीवन में शामिल किया ही नहीं।

            यही हाल तो है साहित्य का भी। समाज के दुःख दर्द पर लिखना , क्या इतना ही काफी है। क्या हमें दूसरों के दुःख दर्द से वास्तव में कोई सरोकार भी है। करते हैं प्रयास किसी की परेशानी दूर करने का। सब से पहले हर लिखने वाले को चिंतन करना होगा कि जैसा उसका लेखन पढ़कर प्रतीत होता है क्या वो वैसा है। अधिकतर किसी का लेखन पढ़कर जो छवि मन में उभरती है , जब नज़दीक जाकर मिल कर देखें तो वह सही नहीं दिखाई देती। प्यार की , संवेदना की , मानवता की , परोपकार की बातें लिखने वाला अपनी वास्तविक ज़िंदगी में कठोर , निर्दयी और आत्मकेंद्रित होता है। ईर्ष्या , नफरत , बदले की भावना को मन में रख कर उच्चकोटि का साहित्य नहीं रचा जा सकता। जिसको देखो खुद को महाज्ञानी समझता है , खुद को सब कुछ जानने वाला समझना तो सब से बड़ी मूर्खता है। समझना है तो ये कि अभी हम कुछ भी नहीं जानते और जानने को कितना कुछ है। ढाई आखर प्रेम के पढ़ना बाकी है अभी। 
 

 

अगस्त 14, 2022

जादूगर शहंशाह की कथा ( तरकश / कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

  जादूगर शहंशाह की कथा ( तरकश / कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

सदियां बदल गई युग बदलते रहे झूठ बोलने वाले सभी को छलते रहे , भोले भाले लोग झांसे में आकर घर लुटाते रहे चालबाज़ फूलते फलते रहे। ठगी का कारोबार दुनिया भर में शान से चलता है चोर डाकू चाहे कितना धन दौलत जमा कर लें जीवन भर भटकते रहते हैं ठग नाम शोहरत ऐशो आराम से सपने दिखला सब से वाहवाही लूटते चैन से रहते हैं । जादू का खेल दिखलाना जादूगरी कहलाता है फिर भी देखने वाले समझते हैं नज़र आने वाला दृश्य झूठा छल है , जैसे दुष्यंत कुमार कहते हैं :- 

     ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो । 

    जादू आशिक़ भी किया करते हैं और हुस्न वालों का जादू कब किसी को दीवाना कर दे कोई नहीं समझ पाता। राजनीति और सिनेमा में करिश्मा अभिनेता नेता नायिका का ग़ज़ब ढाता है मगर कब किसी का करिश्मा काम नहीं आये बेअसर हो जाये कोई नहीं जानता। ऐसा पहली बार देखा किसी की जादूगरी का नशा ऐसा चढ़ा है कि लोग ज़हर भी ख़ुशी ख़ुशी पीने लगे हैं । उसकी अदाएं निराली हैं मीठी मीठी बातें मतवाली हैं । लोग बेकार नहीं रोज़गार नहीं बजाते थाली हैं देते ताली पर ताली हैं । उसका नशा छा गया है धरती पर झूठ का फ़रिश्ता आकर दुनिया को तिलस्म से भरमा गया है । उसने सबको अपने जादू से सम्मोहित किया है पास उसके सत्ता का जलता दिया है लोग खुद बनकर बाती जलते हैं राख होने तक अरमान पलते हैं । सिसकियां भरना नसीब हो गया है रोते रोते ज़माना गहरी नींद सो गया है । जादूगरी से मिला कुछ भी नहीं सब अपना गुम हो गया है । खिलाता ख़ास लोगों को मीठा बताशा है कोई तमाशबीन बन गया है हर शख़्स बन गया तमाशा है । ख्वाबों ख्यालों की बेचता मिठाई है दुकान नहीं कोई शोरूम नहीं इक तस्वीर ऑनलाइन मिलती है स्वाद लाजवाब है बिना चखे सब कहते हैं । राजा नंगा है कहानी जैसे लोग शहंशाह के मुल्क में रहते हैं । निदा फ़ाज़ली जी की ग़ज़ल सुनते हैं। 
 
 
मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है

औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है

जब-जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनियादारी है

ऐब नहीं है उसमें कोई , लाल परी न फूल गली
यह मत पूछो, वह अच्छा है या अच्छी नादारी है

जो चेहरा देखा वह तोड़ा , नगर-नगर वीरान किए
पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेज़ारी है ।
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 

अगस्त 10, 2022

देशभक्ति का प्रमाणपत्र ज़रूरी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    देशभक्ति का प्रमाणपत्र ज़रूरी (  तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      क्या आपके पास है प्रमाणपत्र , मुझे भी ज़रूरत है , बता दो कहां से मिलेगा। बहुत जल्दी में घबराये हुए आये और सवाल दाग दिया। समझ नहीं आया कैसा प्रमाणपत्र , धर्म जाति का , अगड़े पिछड़े का , किसी संस्था के सदस्य होने का। पूछा आराम से बैठो तो फिर कहो क्या चाहते हो। बोले बैठने को फुर्सत नहीं राजधानी जाना है , सुना है इसकी ज़रूरत पड़ेगी। हमने कहा किस प्रमाणपत्र की , क्या आधार कार्ड परिचय को। नहीं वो तो है पर मैं देशभक्त हूं इसके सबूत का कोई प्रमाण नहीं मेरे पास। मैंने पूछा आप देशभक्त हैं इसका सबूत कौन मांगता है , हर कोई देशभक्त होने की बात कह सकता है। वो बोले भाई आजकल इस पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है हर जगह , टीवी चैनेल से लेकर सड़क तक। जो किसी को देशद्रोही नहीं मानता उसको देशभक्त नहीं मानते , जो किसी की देशभक्ति का कायल है वही देशभक्त है। कुछ समझ नहीं आया कौन देशभक्त कौन देशभक्त नहीं। हमने कहा भाई आजकल देशभक्ति की क्या आवश्यकता पड़ गई वो तो कब की प्रचलन से बाहर है। जब देश आज़ाद है तब क्या करना देशभक्ति का , मौज मस्ती करो और देश प्रेम के गीत गाओ , इतना काफी है। मगर वो फिर भी अड़े हुए हैं कि राजधानी जाने से पहले इक तमगा लगा कर जाना ही है। उनको जाकर इसी विषय पर चर्चा में हिस्सा लेना है। उनकी तसल्ली को आज़ादी के मुकदमें किताब निकाली ताकि देशभक्तों की जीवनी पढ़कर समझ सकें ये क्या चीज़ होती थी। तब पता करेंगे किसी बाजार से मिलती है या नहीं , पहले मालूम तो हो कहते किसको देशभक्ति। 

               इतिहास में कहीं नहीं मिला किसी ने खुद को देशभक्त साबित करने को किसी को कोई सबूत दिखलाया हो , न ही किसी ने दूसरे से मांगा ही कोई सबूत। क्या आजकल के सब नेता प्रशासनिक अधिकारी देश के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखते हैं , निस्वार्थ भाव से देश को अपनी सेवा देते हैं। क्या वो भी देशभक्त हैं जो सत्ता की खातिर कुछ भी करने को तैयार हैं , साम दाम दंड भेद सभी अपनाते हैं कुर्सी पाने को।

     या सब दूसरे को देशद्रोही घोषित कर मानते हैं इसी से वो देशभक्त हैं। तभी पता चला अपने नगर में भी आज इक जलूस निकाला जा रहा है , मशाल लेकर और नेता जी की प्रतिमा पर जाकर अपने खून से इक पोस्टर लिख राजधानी भेज रहे हैं। जाना पड़ा समझने को। जाकर देखा इक डॉक्टर सिरिंज से एक सी सी ब्लड निकाल इक बोतल में एकत्र करता जा रहा है , उसका उपयोग प्रमाणपत्र बनाने को किया जाना है। अभी दस लोगों की धमनियों से खून लिया था और सौ लोग कतार में खड़े थे , कोई पूछ रहा था इस तरह खून देने से कोई नुकसान तो नहीं होगा , किसी तरह का कोई रोग तो नहीं होगा , आपकी सिरिंज की सुई कीटाणुरहित तो है। कोई दूसरा सवाल कर रहा था कि सब अलग अलग ग्रुप के ब्लड को एक साथ जमा करना क्या उचित है। क्या सब का ब्लड ए , बी , ओ , और एबी , के लेबल से नहीं रखना चाहिए। कोई हिचकिचा कर ऊंची जाति नीची जाति के खून को एक साथ रखने पर सवाल कर रहा था। तभी राज्य स्तर के नेता जी आये और उनके साथ इक सहयोगी इक बाल्टी जिस में लाल रंग का पदार्थ भरा दिखाई दे रहा लिए हुए था। नेता जी ने समझाया और किसी को रक्तदान नहीं करना है , खून का रंग पक्का नहीं होता खून से लिखे प्रमाणपत्र जिन के पास थे भी नष्ट हो गये या कर दिए गए। ये रंग जिस कंपनी का है उसका दावा है पांच साल तक रंग कायम रहने का। जो लोग खून दे चुके उनकी फोटो टीवी और अख़बार वालों को दिखा देंगे , बाक़ी सभी के लिए इस रंग की सिहायी से लिख प्रमाणपत्र दिये जायेंगे , चंदा लेकर। आप चंदे की रसीद की फ़िक्र मत करना , कानून भले बीस हज़ार की या फिर दो हज़ार की सीमा बताये आप लाखों दे सकते बिना किसी पैन नम्बर के भी।

                    तभी हैलीकॉप्टर से देश के नेता जी भी पहुंच गये सभा स्थल पर , उन्होंने आते ही भाषण देना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया आपको कुछ नहीं करना है , हम राजधानी से प्रमाणपत्र बनवा साथ लाये हैं , मगर लाल रंग हमारा नहीं है इसलिये लाल को छोड़ हर रंग का प्रमाणपत्र है। हम किसी एक दल के नहीं हैं गठबंधन में सभी का अपना अपना रंग तो है ही और वक़्त बदलते हम खुद भी रंग और दल कपड़ों की तरह बदलते रहते हैं। जिसको नीला पसंद उसको नीली स्याही वाला , जिसको काला पसंद उसे काली वाला , हरा , पीला सतरंगा सभी हैं अभी ले सकते।  जिस को दुविधा है जितने रंग के चाहे खरीद सकता है। देशभक्ति किसी एक रंग की नहीं हो सकती। आपको देश को कुछ भी नहीं देना , दो बूंद खून भी नहीं , बस ज़ोर ज़ोर से वही दोहराना है जो मंच से बोलने वाला बोलने को कहे। सत्ता का राग अपने राग को मिला एक सुर में जुगलबंदी करते अलापना है। राग दरबारी सभी को सीखना ज़रूरी है। याद रखना बयालीस साल पहले जो हुआ था , इक लोकनायक ने भाषण दिया था कि सुरक्षाकर्मी सरकार के आदेश पर बेकसूर जनता पर गोली नहीं चलाएं दमन नहीं करें , और उसको बगावत को  भड़काना कहकर आपात्काल घोषित किया गया था। सत्ता को गंधर्व राग सुनना है तो आपको गदहे की तरह मधुर स्वर में जय जयकार करनी होगी।  इक सबक ध्यान रखना है हम देशभक्त हैं इसके प्रमाणपत्र की कीमत तभी है जब हम साथ मिलकर शोर मचाते रहें कि जो हमको देशभक्त मानते नहीं वो असली देश भक्त नहीं हैं। दूसरे की देशभक्ति पर सवाल उठाकर ही खुद अपने आप देशभक्त साबित हो जाते हैं। जो खाली जेब आये थे उनको प्रमाणपत्र नहीं मिल सका , सब पैसे वाले , साधनयुक्त लोग , अपना अपना प्रमाणपत्र सोशल मीडिया पर दिखला रहे हैं। देशभक्ति आजकल फेसबुक व्हाट्सऐप और ट्विटर पर ही अधिकतर होती है।  
 

                                      नया अध्याय :-

 
   ये सात साल पुरानी रचना है ऊपर दोहराई गई है। अब देशभक्त होने का प्रमाण सबको हासिल हो सकता है मिल रहा है जगह जगह घर घर गली गली नगर नगर गांव गांव जिसको चाहिए ले कर प्रदर्शित कर सकता है । मान्यता सरकारी खुद ब खुद मिल जाएगी जिस ने तमगा लगाया होगा उस से कोई सवाल नहीं कर सकेगा। लगता है बहुत जल्दी देशभक्ति का नशा समाज देश पर इस कदर छा जाएगा कि धनवान उद्योगपति बड़े बड़े पैसे वाले रिश्वतखोर अधिकारी से घोटालेबाज़ नेता तक अपना काला सफेद धन देश को देकर  समाज से गरीबी भूख बेरोज़गारी बड़े छोटे का भेदभाव खत्म कर वास्तविक आज़ादी सब को समानता न्याय की लेकर ही रहेंगे।