अधिकार आलोचना का ( कविता - विमर्श ) डॉ लोक सेतिया
हां आपको हक़ है सरकार की राजनीति की आलोचना का
प्रशासन की कार्यप्रणाली की अधिकारी कर्मचारी वर्ग की
भ्र्ष्टाचार मनमानी और पक्षपात की व्यवस्था की नाकामी की
सामाजिक बुराईयों की कड़ी से कड़ी आलोचना करने का लेकिन
तभी जब आप अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने वालों के साथ खड़े हैं ।
मगर तब जब आप खुद ऐसी बातों का केवल अर्थ ही नहीं जानते
समझते हों अपितु आचरण में सामाजिक मेल जोल में देते हैं बढ़ावा
असामाजिक तत्वों का क्योंकि उनसे आपका हित सधता है कोई
अपने व्यवहार में खुद भी पालन करते हों चलकर सही राह पर तब
आप भी शामिल हैं उनके आपराधिक कार्यों में सहयोगी बनकर उनके ।
सभी को झूठा बताने से पहले खुद अपने आप को दर्पण समझकर कभी
अपनी अंतरात्मा में देखना झांक कर पूछना वही सवालात अपने खुद से
शायद जवाब पाकर झुक जाएं आंखें ईमानदारी को छोड़ कर बेईमानी से ।
स्वार्थी बनकर बनाते है संबंध कभी बिना मतलब नहीं मिलते किसी से
किसी दूसरे को रिश्वतख़ोर बेईमान कर्तव्य नहीं निभाने वाला कहने से पूर्व
अपनी कथनी और करनी पर विचार करना क्या एक हैं दोनों हमेशा होते ।
हमारे समाज में नैतिकता के मापदंड बदले नहीं बल्कि खो गए हैं धीरे धीरे
ख़ुदगर्ज़ बन कर अपनी सुविधा से हम नियम कायदा कानून ही नहीं बल्कि
मानवीय संवेदनाओं से लेकर आचरण में न्यायपूर्ण विवेक की उपेक्षा करते हैं
हमने निर्मित किया है इक असंवेदनशील स्वार्थी और निर्दयी समाज खुद ही ।
सभी कुछ हासिल करने की चाहत में चलते उन राहों पर जिन पर नहीं जाना था
सामाजिक आचार व्यवहार में आजकल हमको दिखाई देती है दौलत और शोहरत
भागते हैं इनको पाने के पीछे अंधी दौड़ में आदर देते हैं यही देख कर सभी का हम
शराफ़त की नकाब पहन कर दुनिया से छुपकर चोरी लूट सभी अपकर्म करते हैं अब ।
नहीं सोचते समझते जानना चाहते किसी ने कैसे कैसे तौर तरीके अपना किया हासिल
अपने से छोटे इंसानों को अपमानित करते हैं अपने अहंकार में विवेक खोकर हम लोग
हमको अच्छे नहीं लगते सच्चे लोग क्योंकि उनका जीवन साधन सुविधाओं से वंचित है
आदर्शों मूल्यों का पालन करने अनुचित मार्ग पर नहीं जाने को अब मूर्खता समझते हैं हम ।
सभी ने सुनी है इक पुरानी कहानी जिस में किसी को सज़ा देने को हाथों में पत्थर लिए थे
भीड़ से इक संत ने कहा था पहला पत्थर वो मारेगा जिस ने कभी कोई गुनाह नहीं किया हो
तब सभी के हाथ से पत्थर गिर गए थे तब उनको धर्मात्मा साबित करना नहीं था दुनिया को ।
आज ऐसा भी साहस हम सभी नहीं दिखा पाएं कोई गिनती नहीं कितने गुनाह करते रहते हैं
खुद को ईमानदार साबित करने को मुमकिन है हर कोई दूसरे पर कीचड़ ही फेंकने लग जाएं
हमने सभी को अपने जैसा बदरंग बनाना चाहा है अपने रंग में रंगकर अपराधबोध नहीं होता ।
सरकार प्रशासन राजनेता ख़ास बड़े बड़े लोग सभी स्वीकार करते हैं उनमें कोई ज़मीर नहीं
लेकिन शायद हमने भी उनकी तरह से ही अब आदर्शवादी सत्यवादी होने को अवगुण समझ
खुद को ऐसी बातों से अलग करना उचित समझा एवं अपना ली है उल्टी राह जल्दी में शायद ।
लोभ लालच की राह चुन ली है जीवन में अपने लेकिन हमको सभी बुरे लगते हैं गलत लगते हैं
खुद उनसे भी अनुचित व्यव्यहार आचरण कर इक चादर सी ओढ़ लेते हैं असलियत ढकने को
आवरण हटते ही छुपा नंगापन दिखाई देता है आडंबर भरा आचरण खोखलापन अपनाया हुआ ।
आजकल सोशल मीडिया से चर्चाओं में सभी ढूंढते बतलाते रहते हैं सभी में बुराईयां अवगुण ही
किसी को औरों में कोई भलाई दिखाई नहीं देती भला जो देखन मैं चला भला यहां नहीं कोय
घोषित करते हैं आजकल पुण्यात्मा सभी खुद को बिन परखे ही कहते लोग हमसे भला न कोय ।
( 19 मई 2012 की लिखी डायरी से )















