वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया
शायर दुष्यंत कुमार की याद आई है , कहते हैं ' वे कर रहे हैं इश्क़ पर संजीदा गुफ़्तगू , मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है '। आखिर में पूरी ग़ज़ल पढ़ना , अभी ध्यान जिस तरफ है उस की बात करते हैं। सुबह सुबह सैर पर जाते दूर कहीं से योग दिवस पर भाषण की आवाज़ सुनाई दे रही थी पार्क के एंट्रेंस पर भी कोई योग से किसी सीमेंट कंपनी से जोड़ कर अपना कारोबार करता दिखाई दिया और पार्क में महिलाओं की टोली का फोटो अपने बैनर के साथ लेकर वापस अपने ठिकाने चला गया। पार्क में घूमते घूमते कोई पिता दिवस पर ख़ास छूट खून की जांच इत्यादि में दस हज़ार के टेस्ट दो हज़ार में का उपहार घोषित कर रहा था। आस पास कितने ही लोग विशेष अवसर पर आयोजित आयोजन को कैमरे में कैद कर रहे थे। योग दिवस की धूम मची हुई है कौन इस में शामिल नहीं होगा मगर मेरा दुष्यंत कुमार की तरह कहीं और ध्यान है। सब कुछ तो याद नहीं कुछ कुछ ध्यान में अभी तक भी है , कॉलेज के दिनों स्वामी विवेकानंद जी की ज्ञान योग कर्म योग ध्यान योग की कुछ किताबें पढ़ने को मिली थी। उन में बताया गया था योग का अभिप्राय संयम संयमित आचार विचार व्यवहार से खुद अपने पर भाषा से सामाजिक व्यवहार तक कितना कुछ शामिल है। योग केवल इक शारीरिक व्यायाम की बात नहीं है और आसान तो कदापि नहीं हैं कठोर साधना और मन मस्तिष्क पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। आप गीता को योग से जोड़ते हैं जबकि गीता का योग बिल्कुल अलग बात है , हमने शब्दों को सुना पढ़ा और जैसा चाहा उपयोग करना शुरू कर दिया है। आधुनिक संदर्भ में योग को स्वास्थ्य से जोड़ने पर ध्यान है जिस में सरकार के साथ तमाम लोग शामिल हैं मगर क्या इस पर सही ढंग से शोध और विमर्श किया जाता है।
निरोगी काया ही नहीं स्वास्थ्य में मानसिक ही नहीं सामाजिक आचरण में भी कुछ नियमों कुछ मूल्यों को अपनाना होता है। सत्य और नैतिक आदर्शों को अपने जीवन में सबसे पहले महत्व देकर सभी जीव जंतुओं पेड़ पक्षी प्रकृति से तालमेल बिठाना होता है। ईमानदारी से देखा जाये तो आधुनिक समाज भौतिक स्वरूप में भले बेहतर लगता हो मगर आध्यात्मिक और नैतिक रूप से भीतर से खोखला और गंभीर बीमार लगता है। हमने लगता है आडंबर करने को कितने ही दिन मनाने की परंपरा बनाई है लेकिन किसी भी को लेकर वास्तविक चिंतन मनन करने को हमारे पर वक़्त ही नहीं है बस कुछ पल को औपचरिकता निभाते हैं। सोशल मीडिया की तस्वीरों की बातें वास्तविक सामाजिक जीवन में दिखाई नहीं देती हैं। कहीं हम किसी भेड़चाल या ऐसी मानसिकता के शिकार तो नहीं हो गए हैं जिस में रेगिस्तान में चमकती रेत को पानी समझ दौड़ते दौड़ते प्यासे मरने की राह पर चल पड़े हैं।
हमने अपने देश और समाज के वास्तविक रोग को जाना नहीं समझा नहीं और नीम हकीमों की तरह हर रोग का ईलाज योग को समझने लगे। गीता का ज्ञान योगी बनने को कहता है कर्तव्य पथ पर निरपेक्ष भाव से कर्म करने को कौन अपना कौन नहीं की बात को छोड़ सत्य और धर्म को सामने रखना है। आज का आधुनिक योग अपने स्वार्थ अपनी कामनाओं अपनी वासनाओं पर काबू पाने की बात नहीं समझाता है। आप योग मुद्रा में भी सोचते देखते समझते चाहते कुछ और ही हैं आपका अंतर्मन भटकता है आप हो कर भी नहीं हैं। रोज़मर्रा के कार्य में आपको सत्य असत्य सही अनुचित से अधिक चिंता अपने लाभ हानि की रहती है योग से कुछ भी बदलाव नहीं हुआ जीवन में । कोल्हू के बैल की तरह हम उसी इक परिधि में घूमते रहते हैं इक रस्सी से बंधे हुए। योगी कहलाते हैं चाहते हैं भोगी बनकर सभी कुछ हासिल कर आनंदित होना , ये विरोधाभासी चलन इक साथ कैसे हो। श्री आर पी शर्मा महृषि जी किसी शायर की तज़मीन इस तरह करते हैं।
जिसको देखो वही हिर्सो - हवा का रोगी
है सदाचार के बहरूप में कोई भोगी
उसकी साज़िश की शिकार आज भी सीता होगी ,
' ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी
आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह।
( राम प्रसाद शर्मा महृषि )
ग़ज़ल : दुष्यंत कुमार
वो आदमी नहीं है मुक़म्मल बयान है
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है।
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू
मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है।
सामन कुछ नहीं है फ़टेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।
उस सिरफ़िरे को यूं नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है ।
फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए
हमको पता नहीं था कि इतनी ढलान है ।
देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं
पांवों तले ज़मीन है या आसमान है ।
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है ।













