अक्टूबर 13, 2026

POST : 2130 बहुत देखी आज़ादी ग़ुलामी देखिये ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बहुत देखी आज़ादी ग़ुलामी देखिये ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

आपको अभी भी समझ नहीं आया तो सरकार क्या करे , शुरू में ही आपको आगाह किया गया था विरोध अनुमति ले कर ही कर सकते हैं । अनुमति मिल भी गई थी तब भी काक्रोच जनता पार्टी को अंजाम दिखाई देना था पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी दमन करने में , सरकार समझौता कर कब बदल जाये मुकर जाये उसको कौन रोकेगा ।  फिर भी कोशिश थी इशारों इशारों से सावधान करने को चेतावनी कितनी तरह से दी गई दी जाती रही ।  जनता नासमझ है समझदार होती तो ये सभी दलों के राजनेता संसद की जगह किसी कैद में हो सकते थे , देशभक्ति ईमानदारी और संविधान कानून की बातें करने वाले राजनेता आला अधिकारी और ख़ास समझा जाता धनवान वर्ग कभी जनता और समाज के प्रति निष्ठावान नहीं होते हैं । कुर्सी और सत्ता उनका एकमात्र ध्येय रहता है , लोग उनकी शिकायत भी उन्हीं से करते हैं नतीजा शून्य मिलता है । आखिर सरकार ने सभी पर्दों को हटा दिया है और उसकी असली सूरत सीरत सामने है ।  विरोध प्रदर्शन करने को जंतर मंतर नहीं जहां सरकार को परेशानी नहीं हो दूर कहीं जाकर लोकतंत्र का मातम मनाते रहना , शायद तेहरवीं या श्रद्धांजलि सभा की तरह कुछ फूल चढ़ाकर औपचारिकता निभाते रहें ।  
 
सरकार ने आपको नई व्यवस्था समझानी है , आपको आज़ादी विरोध प्रदर्शन इत्यादि बेकार की बातों को छोड़ कुछ नया आधुनिक सीखना समझना होगा ।   आप सत्ता का गुणगान करिये जहां मर्ज़ी जैसे मर्ज़ी सरकार खुश हो कर आपको मालामाल करेगी , यकीन नहीं हो तो टीवी चैनलों गोदी मीडिया से पूछिए । उनको ऐसा चश्मा मिलता है महंगा धन दौलत का जिस से उनको चारों तरफ विकास की चमक दमक दिखाई देती है कोई अन्याय अत्याचार कोई ज़ुल्म नहीं नज़र आता है  । आप जिनको अंधभक्त कहते हैं उनसे जानिए कि ऐसा करने से क्या परमसुख प्राप्त होता है । पहले ग़ुलामी का मज़ा चखिए फिर कहिए आज़ादी का क्या करना है क्या अचार डालोगे । 79 साल की बूढी है आज़ादी उसकी हालत क्या पूछते हैं ज़िंदा है कि मर गई आपको खबर ही नहीं है ।  
 

 

अक्टूबर 12, 2026

POST : 2129 चिड़िया चुग गई खेत ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

        चिड़िया चुग गई खेत ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया  

खाये आम ख़ुद पर हैं बबूल बोये  
समझते काम अच्छा कबीरा रोये  
जनाज़ा लोकतंत्र का निकाल रहे 
नशे में चूर हैं लगते हैं खोये खोये । 
 
बजाओ ताली कहता हर मदारी 
भुलाने को दुःख दर्द जितने ढोये 
घूंघट हटा कर के नाचना झूमना है 
नंगे हम्माम में हैं लाज शर्म धोये ।  
 
उसूलों पर जिए लोग सब मर गए  
उनका नाम लेकर हैं लोग तर गए  
पाबंदी सरकारी दिल्ली मत आना 
कितने बेगुनाह हैं जेलों में भर गए ।  
 
जनता ख़ामोश रहना बोलना मत 
सुनकर आवाज़ शासक भी डर गए 
खेलते रहे सभी मिल चोर सिपाही 
लुटेरे आये काम अपना वो कर गए । 
 
साहूकारों को दिया सब कुछ जब बेच 
पछताए से क्या चिड़िया चुग गई खेत ।  
 

 
 
 
 
 
 
 

POST : 2128 इंदिरा गांधी जयप्रकाश संवाद ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

       इंदिरा गांधी जयप्रकाश संवाद ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया  

किसी और दुनिया में ख़ुद ही स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री लोकनायक से मिलने पहुंची बहाना था 11 ऑक्टूबर का जन्म दिन का अवसर उचित लगा ।  मुझे देश क्षमा नहीं करेगा लेकिन मुझे आपसे क्षमा मिल जाएगी जानती हूं , पिता समान हैं आपने चाचा होने का फ़र्ज़ निभाया था हमेशा ।  मेरे पिता आपका बड़ा आदर किया करते थे भले उनकी आपकी दोनों की राजनीतिक विचारधारा अलग अलग थी , लेकिन दोनों की राष्ट्रभक्ति एक समान थी ।  रास्ते अलग अलग थे मंज़िल एक ही लक्ष्य समाज देश विशेषकर शोषित वंचित जनता को अधिकार और बुनियादी सुविधाएं देने का संकल्प था ।  मुझे याद है कि एक बार चुनाव में जब जवाहर लाल नेहरू जी भाषण दे रहे थे और उनको जानकारी मिली थी कि उनके कुछ समय बाद वहीं  उस शहर में आपने जनता को संबोधित करना है तब उन्होंने एकत्रित भीड़ को कहा था कि मुझे मालूम हुआ है जयप्रकाश जी ने भाषण देना है मेरा आपसे आग्रह है कि आप उनको अवश्य सुनिए , हमारे बीच राजनीतिक मतभेद हैं लेकिन वह बहुत ही शानदार व्यक्ति हैं उनकी बात सुनकर आपको सुखद अनुभव होगा ।  ये बात मुझे ध्यान रखनी चाहिए थी और आपने जो 25 मार्च 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में भाषण में बोली थी , वो बिलकुल सही थी और मैंने उसको कारण बनाकर आपात्काल की घोषणा कर गलती ही नहीं बल्कि बड़ा अपराध किया था ।  आपने पुलिस सुरक्षाबलों और प्रशासन से उचित ही कहा था कि वो सभी किसी सत्ताधरी शासक सरकार या राजनेता के नौकर नहीं देश कानून और संविधान के प्रति कर्तव्य निभाना उनका मकसद है , इसलिए कोई भी जनता या नागरिक पर लाठी गोली चलाने का आदेश देता है उनके शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन करने पर तब आपको उनका आदेश नहीं मानना है और विवेकपूर्ण न्यायसंगत निर्णय लेते हुए शासक से इनकार कर सकते हैं ।  आज वही बात मेरा पोता जनता और सत्ता को बताना चाहता है लेकिन किसी पर कोई असर ही नहीं हो रहा है , मेरी तरह से सत्ता का अहंकार किसी और को गुमराह कर रहा है ।  लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई बात कितनी खरी साबित हुई है बस आपसे क्षमा याचना से रूह को चैन मिलेगा ।   
 

 

अक्टूबर 10, 2026

POST : 2127 अपनी मौत का सामान ले चले ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         अपनी मौत का सामान ले चले  ( तरकश )   डॉ लोक सेतिया

कभी कभी ख़ामोशी जो कहती है शब्दों से नहीं ब्यान किया जा सकता लेकिन आजकल शोर शराबा बहुत है ऐसे में जिसको ख़ामोशी की आवश्यकता होती है ढूंढते हैं कोई जगह कहीं मिल जाये ।  ऐसा क्यों है जिस दौर से हम पचास साल पहले गुज़र चुके हैं लगने लगा है वही दौर वापस लौट कर पहले से बढ़कर दुश्वारियां सामने खड़ी कर रहा है ।  तब कोई शख़्स था जो दिखाई देता था साहस और यकीन के साथ उस कोहरे को हटाकर खुले आसमान को दिखाएगा । लेकिन आज तो घना अंधकार छाया हुआ है मगर कोई उजाला करने वाला दूर दूर तलक दिखाई नहीं देता । कहने को कितने लोग जतलाते हैं कि वो सब कुछ जिसको ध्वस्त किया जा चुका ही नहीं निरंतर ध्वस्त करने का प्रयास जारी है उस सब को फिर से दोबारा पहले जैसा बना देंगे , लेकिन तब किसी की बात उसके मकसद पर शंका का सवाल ही नहीं था जबकि आज चाह कर भी फिर किसी पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता ।  ऐसा इस कारण है कि उस एक शख़्स जैसा कभी कोई दूसरा नज़र कभी नहीं आया जिस को ख़ुद अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए था सिर्फ देश जनता की चिंता थी । अब तो बार बार यही हुआ है कि जिसे समझते कुछ था पर अवसर मिलते ही वही आदमी कुछ और ही निकला और जितनी आशाएं जगाई थी उस से कहीं अधिक कई गुणा निराशाओं का कारण साबित हुआ ।  तभी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहना है और कहना भी किस को है इधर कोई किसी की बात सुनता ही नहीं है । सभी बोलना जानते हैं वह भी बिना सोच विचार किए ही ।  
 
दिल में कितने अरमां थे जब किसी को ढूंढ कर लाए थे भिखारी से बादशाह बना बैठे , ये आशिक़ी भी ख़ुद ही अपनी जान की दुश्मन होती है । जितना भरोसा करते हैं उतना ही अधिक धोखा खाते हैं हम बदनसीब दिल में बसा कर प्यार अरमान ले चले हम आज अपनी मौत का सामान ले चले ।  ऐसे कितने फ़िल्मी गीत गाकर दिल को बहलाते हैं कि हमारे साथ जो हुआ जाने पहले किस किस के साथ होता ही रहता है ।  अब किसी की बातों पर यकीन नहीं करना बस सभी देवता लगते हैं साबित आदमी तक नहीं होते बाद में ।  जावेद अख़्तर जी फ़रमाते हैं ,   नर्म अल्फ़ाज़ , भली बातें , मुहज़्ज़ब लहज़े , पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं ।  ऐसे में किसी शायर की इक ग़ज़ल याद आई है उसी को पढ़ते हैं सोचते समझते हैं ।   
 

तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला 

मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला । 

मैं रफ़्ता रफ़्ता हुआ क़त्ल जिस के हाथों से 

वो बदनसीब  वो क़ातिल मैं आप ही निकला । 

     ( शायर का नाम मालूम  नहीं है )  


 

 
            

अक्टूबर 08, 2026

POST : 2126 दिन साल महीने गिनते ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

                  दिन साल महीने गिनते ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया  

मुसाफ़िर हैं चलना है चलते रहना है निर्धारित लक्ष्य अथवा मंज़िल तक पहुंचना ही नहीं मंज़िल को पाना भी है ।  लेकिन होता कुछ ऐसा है कि अधिकांश लोग अक़्सर एक सीमित  दायरे में या परिधि में ही चक्र लगाते रहते हैं जीवन भर  । कुछ सालों से इक व्यर्थ का चलन राजनीति में चल पड़ा है किसी सरकार का एक दो तीन चार वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने का जश्न मनाना ।  सत्ता या कुर्सी का ऐसा मोह वास्तव में शासकों को सही मार्ग से भटकाने का काम करता है  । शासन में बने रहना किस काम का अगर आपने देश समाज को कुछ भी बेहतर ही नहीं बनाया है तब ।  अभी किसी ने कहा कि किसी राजनेता का इतने साल निरंतर शासन में रहने का रिकॉर्ड बनाना महान बात है ।  ये कुछ वैसे ही है जैसे इधर कुछ लिखने वाले हर कुछ समय के बाद प्रकाशित किताबों की गिनती को बताते गर्व का प्रदर्शन करते हैं मगर कभी नहीं सोचते कि उनके लेखन में कितनी गहराई पहले से अधिक हुई है कुछ समाज को हासिल हुआ है या सिर्फ कुछ नाम शोहरत ईनामात पुरूस्कार का संचय करना ही लक्ष्य रहता है ।  हमने ऐसे महान राजनेता देखे हैं जो बहुत थोड़े समय तक पद पर रहे लेकिन उन्होंने उस समय में ऐसे कीर्तिमान बनाये जो कोई पचास वर्ष शासन कर भी नहीं कर सकते हैं  ।  नाम बताने की ज़रूरत तो नहीं है , सभी को लाल बहादुर शास्त्री जी इक ऐसे में ऊंचे शिखर पर खड़े दिखाई देते हैं , कभी कोई प्रयास नहीं किया बड़ा कहलाने का , छोटे कद का आदमी कितना बड़ा किरदार हर तरह से निभाया था ।  कोई हुआ जिस ने उनकी तरह रेल दुर्घटना होने पर त्यागपत्र खुद दे दिया हो ।  आज लोकतंत्र का विध्वंस करने वाले भी कितना विरोध होता रहे पद नहीं छोड़ना चाहते बल्कि इक मिसाल कायम कर रहे हैं लोकलाज को ताक पर रखने की । 
 
चलिए आपको कुछ और नाम याद दिलाते हैं बाबू जगजीवन राम जी को लेकर कभी सोचा है जिस जिस विभाग में मंत्री रहे तभी कितना बेमिसाल लाजवाब कार्य देश की सरकार ने किया ।  हरित क्रांति से बंगलादेश बनाने में बागडोर किस ने संभाली थी तब भी श्रेय किसे मिला कोई अंतर नहीं पड़ता है , लोकतंत्र में सरकार जब केवल किसी एक व्यक्ति को ही सबसे महत्वपूर्ण समझने लगती है तब समाज सही दिशा में प्रगति कभी नहीं कर सकता है ।  आज़ादी के 79 साल बाद भी अगर देश में आधी आबादी गरीबी और बदहाली में रहती है तब समझ लेना चाहिए शासन जिस किसी भी राजनेता के हाथ में रहा है वास्तविक समाज कल्याण किसी ने नहीं किया है ।  खेद है कि पिछले पचास सालों से देश की राजनीति इतनी ख़राब हो चुकी है कि सभी राजनेताओं को सिर्फ़ सत्ता की चाहत है देश सेवा और समाज कल्याण को मात्र मुखौटा बनाया जाता रहा है ।  शर्म की बात है कि आज फिर से 21 साल इंतज़ार करने की बात कहने लगे हैं कि 2047 तक देश शानदार बना देंगे जबकि अभी तक उस दिशा में इक कदम भी उठाया दिखाई देता  नहीं है ।  अब कौन जीता है कौन देखेगा कुछ भी कर दिखाना नहीं बस झूठे दिलासों से जनता को बहलाना चाहते हैं जबकि लोग अब इतने भी नासमझ नहीं उनको ये खोखली बातें प्रभावित ही नहीं करती हैं । 
 
कोई भी शासक नहीं जानता भविष्य में इतिहास उसको कैसे देखेगा , दुनिया में सैंकड़ों साल शासन करने वाले भी लोग हुए हैं जिनको लेकर कहते थे उनके साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं है लेकिन उनका आंकलन किया गया ये समझ कर कि उनके साम्राज्य में लोग खुश थे आज़ाद थे या बेबस और ग़ुलाम थे ।  जिनको लगता है उनके चाटुकार लोग या खरीदे गए लेखक पत्रकार मीडिया वाले उनकी छवि को शानदार दर्शाने को सोने की क़लम से सुनहरी रंग की सियाही से उनका कालखंड स्वर्णिम लिखेंगे उनको वास्तविकता मालूम नहीं है ।  शासकों के गुणगान करने वालों की झूठी बातें मनघड़ंत कहानियां कभी किसी को प्रभावित  नहीं करती हैं , राजाओं की झूठी कथाएं विश्वसनीय नहीं लगती बल्कि कितनी घटनाएं तब की साबित करती हैं कि उनके शासन में झूठ का परचम फहराता रहा था । 
 
सच सौ पर्दों में भी छुपाने से छुपता नहीं है और झूठ का कितना भी डंका पीटते रहो आखिर ढोल की पोल खुलती है और दिखाई देता है ढोल का शोर उसके भीतर के खोखलेपन का प्रतीक था ।  कोल्हू का बैल समझता है कितना लंबा रास्ता तय कर लिया जबकि घूमता उसी दायरे में रहता है । हाऊ मच लैंड ए मैन नीड कहानी आधुनिक युग का सच लगती है , कितना दायरा दुनिया भर को नापने के प्रयास में आख़िर हाथ मलते हैं , सब कुछ गंवा के भी होश नहीं आता तभी कुछ भी नहीं कर दिखाने वाले अपनी ख़्वाबों ख़यालों की दुनिया में खोये सच्चाई से बेखबर रहते खुद ही अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं ।  इक गीत है निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल का निशां मालूम नहीं ।  धर्म की बात कहते हैं तो ऐसे कहना होगा , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास  ।   इतिहास का काला अध्याय सुनहरी रंग में सोने की क़लम से लिखने से क्या मिलेगा । 
 

 

अक्टूबर 05, 2026

POST : 2125 छुट्टियों का अभिप्राय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

              छुट्टियों का अभिप्राय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया  

छुट्टियां अपना भावार्थ बदल चुकी हैं 
हमने भी छुट्टियां मनाना छोड़ दिया है   
बचपन की छुट्टियां अभी तक याद हैं 
लौट आते थे पढ़ने वाले सब बच्चे गांव 
शहर नौकरी काम करने गए सब लोग  
घर गांव गलियां लगती ख़ुशरंग कितनी  
 
घर परिवार का कोई बड़ा मुखिया तब 
पत्र भेजता या किसी को भेजता रहता   
बुलाने लिवाने सभी बेटियों को घर पर 
ससुराल से बाबुल के प्यारे आंगन में 
बड़ी प्यारी हुआ करती थी वो छुट्टियां ।    
 
दिन कैसे बीत गए पता नहीं चलता था 
वापस लौटते थे सभी बारी बारी तब 
ख़ूबसूरत यादों को साथ लिए हुए जिन्हें 
जीवन भर सालों बाद भी भुला नहीं पाये 
 
बड़े शहरों में रहते हुए खो गई हैं छुट्टियां 
सोसाइटी की सड़कें सुनसान वीरान हैं 
पड़ोसी अपने लगते अजनबी अनजान हैं 
भीड़ में अकेलापन तन्हाई का आलम है 
इधर उधर कहीं भागते फिरते हैं सब लोग 
जाने किस चीज़ की तलाश में मालूम नहीं ।   
 
पहाड़ों से हरी भरी वादियों जंगलों तक में 
कोई सुकून कभी नहीं मिलता ढूंढते फिरते 
रेगिस्तानों से लेकर नदियों झीलों किनारे 
कितना कुछ करते हैं चाहा अनचाहा कहीं 
उकताहट होती है समय लगता है थम गया 
कितना पैसा खर्च कर समय व्यतीत कर के 
लौटते हैं और भी ख़ामोश उदासी लिए हुए । 
 
शहरी समाज की सभी छुट्टियां लगती जैसे
बोझिल हवाएं लिए जिन में सांसें घुटती हैं 
लगती थी बचपन वाली खुशियों की छुट्टियां 
छोटी छोटी बातों जिनकी कीमत कुछ नहीं थी 
कितनी अनमोल स्मृतियां संजोये प्रतीत होती 
दिल चाहता तो है लौटना गांव छुट्टियों में कभी 
मगर हम भूल गए गांव जाने वाले सब रास्ते 
गूगल भी नहीं बता सकता लोकेशन हमको ।    
 

 

अक्टूबर 04, 2026

POST : 2124 नाम बड़े और दर्शन छोटे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                नाम बड़े और दर्शन छोटे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कहावत बचपन से सुनते आये हैं आज ऐसे ही लोग तमाम जगह दिखाई देते हैं ।  दुनिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति को ऐसा करते हुए देखा शांति का नोबेल पुरुस्कार पाने की हसरत की खातिर लाज शर्म छोड़  कोशिशें करते रहे ।  मैंने जॉर्ज सविले की इक बात को बार बार दोहराया है जो उद्धरण नीचे दिया गया है ।  लेकिन आजकल शोहरत पाने का पागलपन छाया हुआ है और जिसे देखो खुद ही अपनी बढ़ाई करना करवाना चाहता है ।  देश का ख़ज़ाना लुटवाया जाता रहा है किसी को देश ही नहीं दुनिया में सबसे बड़े शिखर पर दिखलाने को यशस्वी उपाधि जोड़ने से यशोगान करने से ख्याति नहीं मिलती है उल्टा इक कसौटी सामने खड़ी हो जाती है ।  इतिहास में जितने भी महान लोग हुए हैं उन्होंने महान कहलाने की ख़ातिर कभी कुछ नहीं किया उनके कार्यों ने उनको महानता के शिखर पर बिठा दिया । अब लोग प्रयास करते हैं उस शोहरत को पाने की ही नहीं उनको छोटा साबित कर खुद को बड़ा साबित करने की भी कोशिश करने से खुद और भी छोटे दिखाई देते हैं ।  जिस शोहरत को पाने को पैसा खर्च कर विज्ञापन देने से लेकर प्रतिदिन आडंबर करने को तमाशे दिखाने पड़ते हों ऐसी खोखली शोहरत को कहते हैं शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है , शायर डॉ बशीर बद्र जी  का शेर है ।  इधर जब किसी की  ऐसी ही हालत हुई है तब लोग उसको भारत रत्न देने की बात उठाकर क्या जले पर नमक छिड़कने की बात करना चाहते हैं  ।  ऐसे दोस्त  दुश्मन से बढ़कर ख़तरनाक होते हैं मगर यही होता है जब किसी को चाटुकारिता भाने लगती है तब कुछ स्वार्थी उसकी जय-जयकार गुणगान कर बदले में कुछ न कुछ हासिल करते रहते हैं ।  सुनते थे बादशाह अपने दरबार में कुछ ऐसे भांड रखा करते थे लेकिन जानते थे भांड ऐसा अपने बादशाह को झूठी ख़ुशी देने को करते हैं यही उनका धंधा हुआ करता था हुनर आता था सरकार की ख़ामियों को भी ख़ासियत बताना ।  बादशाहों को दिल बहलाने को ये सब कुछ करना पसंद हुआ करता था बदले में इनामात दिया करते थे और सभी दरबारी बादशाह की वाहवाही पर तालियां बजाते थे ।  लेकिन लोकतंत्र में यही सब से बड़ा रोग क्या अपराध कहलाता है तब भी हर खोटा सिक्का खुद को बेशक़ीमती समझने की भूल दोहराता है पैसे खर्च कर अपने नाम तस्वीर के बैनर लगवाना वैसा ही है जैसे कोई किराए पर हंसने रोने वाले बुलाकर ख़ुशी अथवा दुःख का तमाशा करता है , रुदाली फ़िल्म का यही विषय था ।  आज यही चलन बन गया है राजनीति नहीं प्रशासन के अधिकारी भी अपने वास्तविक कर्तव्य को निभाना छोड़ इसी को लेकर प्रयासरत रहते हैं स्थानीय अख़बारों से सोशल मीडिया तक पर खुद मिंयां मिट्ठू बनना आदत बन जाती है ।  काश बड़े अधिकारी बड़े पद पर बैठ अपना फ़र्ज़ ईमानदारी से निभाने पर ध्यान केंद्रित करते तो उनको जो मिलता वो सही और सार्थक होता भले उस से अपने निजी स्वार्थ अधूरे रहते धन दौलत और पदोन्नति के लेकिन भीतर कोई आत्मग्लानि नहीं रहती कुछ अनुचित करने की । 
 
आज किसी को मुंह छुपाए रहना पड़ रहा है , देश के साथ धोखा छल कपट कर  इतने बड़े पद पर रहकर भी आपने आपराधिक आचरण अनुचित हथकंडे अपना कर खुद अपने साथ इक महान संस्था की गरिमा को छलनी छलनी कर दिया है ।  विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र क्या इतना नीचे गिर सकता है ,  इतिहास में आपके समय को कितना कालिख़ भरा और अंधकारमय लिखा जाएगा जिस से देश समाज  की प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी । ' ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने , लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ' मुज़फ़्फ़र रज़्मी जी का शेर आधुनिक युग की कड़वी हक़ीक़त बन गया है । 
  

 

 

सितंबर 28, 2026

POST : 2123 सत्तासुंदरी का चीरहरण ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

          सत्तासुंदरी का चीरहरण ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

सभा आयोग की है , चर्चा महाभियोग की है , राजनीति को लग चुके गंभीर लाईलाज रोग की है ।  मुखिया को इक ऐसा वरदान उपहार में दिया गया जिस से उस के सौ नहीं करोड़ नहीं असंख्य अपराध करने पर भी कोई सज़ा की तो बात ही क्या कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं किया जा सकेगा ।  ऐसा अभयदान मिलना कोई छोटी बात नहीं थी लेकिन जब ये साबित हो गया कि आयोग में कोई आधुनिक दुर्योधन सत्तासुंदरी का चीरहरण निरंतर कर रहा था और सभी मंच पर आसीन सदस्य ख़ामोशी से तमाशाई बन जो होता है होने दो को चतिरार्थ करते रहे , लेकिन अपनी असहमति दर्ज भी ऐसे करते रहे जैसे कोई महसूस करता है कि उनका इस से कुछ लेना देना नहीं है , अकेला इक व्यक्ति लाभार्थी है ।  खुल कर कहते तो रासलीला में उनको शामिल ही नहीं किया गया वो दोनों तरसते ही रहे ।  रोकने की चेष्टा उन्होंने की ही नहीं का मतलब वही जानते है क्योंकि सब गैरकानूनी ढंग से हो रहा समझ कर भी उनको अपने कर्तव्य निभाने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई कभी ।  जब बात खुली तब उनको अपना बचाव याद आया देश की व्यवस्था को बर्बाद होते देख कर बचाना उनको महत्वपूर्ण नहीं लगा था ।  कुछ लोग जिनको हमेशा किसी धर्म को बचाने की चिंता रहती थी उनको धर्म अधर्म से कोई मतलब नहीं रहा है उनको यकीन हो गया कि सिर्फ आयोग के मुखिया ही इकलौते ऐसे शख़्स हैं जिनके कारण उनका कायम शासन कायम है , ऐसे में उनको देश का सबसे बड़ा पुरस्कार भारत रत्न देना कोई विशेष बड़ी बात नहीं है ।  
 
कब से सत्तासुंदरी का नृत्य देखने का आनंद उनको मिलता रहा था केवल उसी आयोग की अनुकंपा से ही बाक़ी जितना भी प्रयास किया गया धन दौलत प्रचार इत्यादि सब किसी काम नहीं आता बिना उनकी मर्ज़ी से  चुनावी राजनीति का गणित साधना असंभव  ही होता  ।  धार्मिक कथाओं कहानियों पर इधर कितनी फ़िल्में टीवी सीरियल बनाये जा रहे हैं लेकिन कोई नहीं जानता था कि आज भी कोई आधुनिक युग की महाभारत कथा की पटकथा लिख ही नहीं रहा बल्कि दुर्योधन का अवतार बन कर जीवंत किरदार निभा रहा है वो भी ऐसे कि कोई कृष्ण नहीं प्रकट हो सके बचाने को । आधुनिक शासन में शकुनी से लेकर सभी सभासद धृतराष्ट्र के पुत्रमोह का समर्थन खुल कर कर रहे थे किसी को भी कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता था क्योंकि सभी अपने अपने स्वार्थों और घर परिवार के मोहजाल में उलझे हुए अपनी मौज में निरपेक्ष भाव से सहभागी थे ।  आधुनिक युग की रामायण वास्तव में महाभारतकालीन कथा का नवीन संस्करण है , जनता रुपी सीता का अपहरण खुद जिस ने किया है उसने राजा राम का रूप वेशभूषा धारण कर अयोध्या ही नहीं सब दुनिया को भ्र्मजाल  में फंसा लिया है ।  
 
कोई संतान नहीं है लव कुश जैसी जो सभी को राजा राम की वास्तविक कथा सुनाते , नकली संताने कितनी हैं जिनको अपने आका का झूठा गुणगान करना पसंद है ताकि उनको सत्ता की रेवड़ियां मिलती रहें ।  आधुनिक अधर्म कथा का कोई अंत कभी नहीं होने वाला है बल्कि जाने कितने नये अध्याय आगे शामिल होने को तैयार हैं  ।  लोग कुछ भी कहते नहीं हैं भले भगवान के मंदिर से ही लुटेरे चोरी कर शान से भगवान भक्त कहलाते रहें ।  आयोग ने सर्वसम्मति से इक गीत को स्वीकृति प्रदान की है जिसे सभी कर्मचारियों को वितरित किया गया है समझने और पालन करने को तभी उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा ।  देश में करोड़ों लोगों को भले घना अंधकार नसीब होता रहे उनके लिए चकाचौंध रौशनी मिलने का इंतज़ाम किया जाता रहेगा ।    
 

   चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य - कविता ) 

सी लो लबों को और चुप  रहा करो 
ज़ुल्म भी हंसते हंसते सब सहा करो । 
 
चोर को साहूकार कहना सीखो भी   
अब ख़िज़ाओं को बहार कहा करो । 
 
ये ज़माना झूठे लोगों का है  ज़माना 
हमको तुम सब पर ऐतबार कहा करो । 
 
देश के रहनुमाओं का यकीन करो 
इश्तिहार पढ़कर सरकार कहा करो ।
 
उनकी हसरत मसीहा लोग समझें 
क़ातिल पर आता है प्यार कहा करो ।
 
जिनके तख्त ओ ताज़ हुक़ूमत हो  
बड़े अच्छे उनके सब यार कहा करो । 
 
आप अपने ही घर में रहकर खुद को   
हम यहां पर हैं किराएदार कहा करो । 
 
ज़िंदगी और मौत दोनों का यकीन नहीं 
जनाबेआली हम ख़ाकसार कहा करो । 
 
सितमगर है सितम की फ़ितरत भी है  
ज़ख़्म देता है दिया उपहार कहा करो । 
 

 
 


 

सितंबर 25, 2026

POST : 2122 सत्ता का हम्माम ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता का हम्माम ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सुबह - शाम करते रहते हर हर गंगे थे 
धुल जाते थे पाप सभी बन जाते चंगे थे 
 
जिस्म साफ़ सफ़ेद अंदर से बदरंगे थे 
सत्ता की राजनीति में हुए खुद नंगे थे 
 
मैली चादर थी चुनाव आयोग नाम की 
छुपाए हुए काले कारनामे काले धंधे थे 
 
दरबार था झूठों का झूठे सारे दरबारी थे 
शानदार लिबासों में चोर थे भिखमंगे थे 
 
एक अख़बार की पत्रकार लड़की ने मगर 
फैंक पत्थर कांच की दिवार तोड़ डाली थी 
 
जाने कहां आंधी में उड़ गए सब के सब 
झूठ के पर्दे सत्ता के गलियारों में टंगे थे 
 
अब कैसा शर्माना सभी ही इक जैसे हैं जब 
गऊ माता देख रही बाड़े में बंधे भैंसे हैं सब 
 
गठड़ी पापों की इनकी कौन उठाएगा भला 
कितनी मैली कर दी गंगा बोलते हर हर गंगे थे 
 
 
सुबह -  शाम करते रहते हर हर गंगे थे 
धुल जाते थे पाप सभी बन जाते चंगे थे 
 

 
 

 
   

सितंबर 20, 2026

POST : 2121 खोखली बातें विकसित भारत की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     खोखली  बातें विकसित भारत की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

तेरे वादे पे जिये हम तो ये जान ए झूठ जाना , कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।  मुझे आज भी याद है डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने 2020 में विकसित भारत बनाने का सपना 1998 में दिखलाया था ।  और तब ये बात कोई ऐसे ही हवा हवाई ढंग से नहीं कही गई थी उनके नेतृत्व में करीब 500 विशेषज्ञों की टीम ने विज्ञान और भौतिकी विभाग के तहत भारत के विकास का इक विस्तृत तैयार किया था विज़न 2020 नाम से दस्तावेज़ लिखित जारी किया गया था ।  2020 आया भी और कोई आहट तक नहीं सुनाई दी उस घोषित सपने का अंजाम क्यों कैसा हुआ चिंतन करते तो मुमकिन है शासकों को थोड़ा शर्मिंदगी का एहसास हुआ होता ।  उस से पहले भी कभी बीस सूत्री कार्यक्रम कभी कितने और अलग अलग योजनाओं की घोषणा होती रही मगर सभी का नतीजा शून्य निकला ।  दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की , लेकिन आधुनिक कार्यकाल में पिछले 12 सालों में अनगिनत योजनाओं की घोषणा का इतिहास रचा गया और शायद एक भी साधरण जनता की खातिर घोषित योजना सफल हुई नहीं बल्कि सभी झूठी कपोलकल्पनाएं साबित हुई हैं ।  लेकिन आज फिर से बात 2047 की करने लगे हैं कभी खुद अटल बिहारी बाजपेयी जी ने संसद में कहा था हम ने माना कि  तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन , ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक ।  आज 2020 से 2047 की बात के संदर्भ में उनकी बात सच साबित हुई है जैसा शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने 200 साल पहले कहा था । 
 
मुमकिन तो बहुत कुछ होता है लेकिन वादे करना अलग बात होती है इरादे करना दूसरी बात होती है ।  उदाहरण ढूंढने कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है अभी कुछ दिन पहले जेपी नड्डा जी ने ये रहस्य खोला था कि 2014 में केंद्र की सत्ता मिलते ही मोदी जी ने देश के सभी 768 जिलों में पार्टी के शानदार कार्यालय जिन में पांच तारा होटल से बढ़कर सुविधाएं हों बनाने का संकल्प लिया था , जिस में से लगभग 563 से अधिक बन चुके हैं और बाकी पर निर्माण कार्य जारी है ।  उनके लिए ज़मीन का अधिग्रहण किया जा चुका है और सभी जगह कार्यालयों में आधुनिक कॉन्फ्रेंस हाल मीटिंग रूम डिजिटल सुविधाएं दी जा रही हैं ।  कहते हैं हाथी के खाने के दांत अलग दिखाने के अलग होते हैं बिल्कुल उसी तरफ सत्ता अपने अपने दल से चंदा देने वालों की खातिर सब समय पर करती है जबकि जनता देश समाज को झांसे में रखने को दिखावे वाले दांत के अंदाज़ में आडंबर तमाशे आयोजित किए जाते रहते है जिनका हक़ीक़त से कोई लेना देना कभी नहीं होता है ।  जो उनकी विचारधारा की या महत्वाकांक्षा की बात थी राम मंदिर से नया संसद भवन ही नहीं कितने अन्य ऐसे कार्य भले घटिया निर्माण साबित हुए लेकिन जल्दी जल्दी पूरे किये जाते रहे हैं ।  
 
काला धन वापस लाना था मगर देश विदेश में काला धन और भी तेज़ी से बढ़ता गया है यहां तक कि कोई न्यायधीश भी कहते हैं कि नोटबंदी काला धन को सफ़ेद बनाने का माध्यम था , खुद मोदी जी भी कहते हैं उनको काले सफेद से कोई फ़र्क नहीं पड़ता निवेश होना चाहिए ।  शायद ही किसी विकसित देश में कथनी और करनी में इतना विरोधाभास होने पर भी सरकार और राजनीतिक दल खुद अपनी पीठ थपथपाते दिखाई दे सकते हैं , जिस बात को लेकर शर्मिंदगी होनी चाहिए उसी पर गौरान्वित होना भारत में संभव हुआ है ।  1998 में भी शायद उनको मालूम था 22 साल बाद 2020 की बात सभी भूल जाएंगे कितने ज़िंदा रहते हैं कितने मर जाते हैं इंतज़ार में सोचना ही ज़रूरी नहीं लगा होगा , अब वही इतिहास की भूल फिर से दोहराई जा रही है 21 साल बाद 2047 में कौन ज़िंदा रहेगा देखने को सोचने की आवश्यकता ही नहीं है ।  लेकिन पिछली सरकारों को पानी पी पी कर कोसने वाली सरकार के राजनेता अपनी उन्हीं नाकामियों पर कुछ भी नहीं कहते बल्कि कोशिश करते हैं कि गरीबी भूख बदहाली से अपने तमाम अनैतिक कार्यों पर पर्दा डालने का और लूट से संवैधानिक संस्थाओं का सत्यानास करने तक  समाज को ठगने छलने धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं ।  अभी भी कोई उनकी बातों पर भरोसा करेगा कभी नहीं देश की जनता को कुछ समय तक झांसे में रखना संभव है हमेशा को नहीं कभी भी नहीं । 
 

 

सितंबर 18, 2026

POST : 2120 कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

 ये पंजाबी लोक कहावत , या मुहावरा संत सुथरा शाह से जुड़ी हुई बात है ।  आग लगे बस्ती में मौज राम मस्ती में की तरह से दूसरों के सुःख दुःख से बेपरवाह अपने फक्क़ड़पन में बेफिक्र होकर ख़ुशी मनाता है ।  शायद संत सुथरे शाह का आधुनिक स्वरूप इस काल में सत्ता पर बैठा है कुछ भी नहीं करता सिर्फ़ मन की बात करना भाता है ।  चंचल मन का क्या है पल भर में दुनिया भर में विचरण करता है टिकता नहीं कभी किसी ठिकाने पर ।  संत सुथरे शाह ने अपने भीतर से आत्मा को कई साल पहले निकाल का छोड़ दिया था , जिसका साथ निभाना था उस आत्मा को अकेली छोड़ दिया था ।  आत्मा सीता की तरह बन बन भटकती रहती है उसको फुर्सत नहीं ये मोह माया की बात लगती है ।  लेकिन मोह माया शोहरत ताकत खुद उसे अपने लिए सबसे अधिक पसंद है जितना मिले थोड़ा लगता है सब हासिल है फिर भी ख़ालीपन है मन में लालसाओं का अंबार है ।  देश से राज्यों तक उनका विस्तार है अपनी सरकार की जय जयकार है मिटता नहीं अहंकार है कदम कदम दिखाई देता इक मझधार है नैया के डूबने का बन गया आसार है तब भी उनको नहीं मिलता चैन करार है नित नया तमाशा उनको दरकार है ।  कितने दीप जलाये तब भी बाहर  रौशनी भीतर घना अंधकार है  , लगता है जीत भी हुई बेकार है ऐसी जीत सबसे बड़ी हार है व्यर्थ हुआ हर इश्तिहार है सच अभी खामोश है तब भी झूठ बड़ा बेकरार है ।  जो उस पार था वही इस पार है अपनी ही कही हर बात खुद का उपहास बन गई है इंसान कितना लाचार है । 
 
आधी रात को जागते सोते की मदहोशी छाई है तन्हाई में कोई आवाज़ दी सुनाई है जैसे मर चुकी आत्मा फिर जाग गई है दुहाई दुहाई है ।  कितना कुछ जोड़ लिया है कोई हिसाब नहीं कुछ भी संग नहीं रहता अंधकार मिटाता माहताब नहीं ।  कर्मफ़ल की बात नहीं है कोई भगवान आखिर किस किस का कितना हिसाब लिखता होगा , उस से छुपा सकते हैं दुनिया से छुपा सकते हैं मगर अपनी जो इक अंतरात्मा है कभी मरने के बाद भी मरती नहीं है बस उसका सामना कैसे करोगे खुद अपने ही साये से डरोगे ।  जनाब के माथे पर पसीना है अरे ये जीना भी कोई जीना है दिन गुज़रते साल गुज़रते जाते बदलता रहता महीना है ये समय बड़ा ही कमीना है ।  पर्वत के शिखर से फ़िसलने का भय सताता है तब आगाज़ भूल अंजाम नज़र आता है , कोई कहीं दूर गाता है जो खोता है बस वही पाता है ।  मगर खोने पाने के हिसाब नहीं आता है असली बही खाता बतलाता है क़र्ज़ बढ़ता जाता है लेकिन उनको चार्वाक ऋषि का संदेश दिल बहलाता है , क़र्ज़ ले कर घी पियो कौन अगले जन्म में क़र्ज़ मांगता है कौन चुकाता है ।  ज़रा सी आहट से जी घबराता है नींद से कौन बार बार जगाता है उनको अब सही गलत का अंतर नहीं समझ आता है कोई साधु वही बोल दोहराता है उठ जाग मुसाफ़िर भौर भई अब रैन कहां जो सोवत है ।  क्या क्या कहते थे कितना कुछ कर दिखाना है जनता को धरती पर इक स्वर्ग दिखाना है , मगर कुछ भी किया नहीं करना चाहा ही नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ खुद अपना दिल बहलाते रहे खुद हंसते सबको रुलाते रहे , जाना उधर था और जनाब किधर जाते रहे । 
 
सबसे शानदार महानायक बनने की हसरत थी लेकिन अभिनय करते करते कहानी को इस तरह बयां किया कि विदूषक बनकर रह गए हैं ।  दुनिया हंस ही नहीं रही आपका उपहास कर रही है महसूस होता है सही नायक नहीं चुना किरादर निभाने को ,  जनता को कितना रुलाया है सोचा था कुछ कर दिखाओगे दिल की बेचैनियां मिटाने को । आपको आता नहीं कुछ भी सिवा झूठे आंसू दिखाने और लोगों को रुलाने को ।  खुशियों का अंबार लगा है गली गली शहर शहर उनका दरबार सजा है फिर भी दिल की उदासी जाती नहीं है , चैन की नींद आती नहीं है ।  दिया बुझने लगा है तेल ख़त्म हो गया है कोई बाती क्या कोई थाती नहीं है जिसे सौंप कर जाते किसी को देश या समाज को ।  ख़ाली ख़ाली पिंजरा है बिना चिड़िया का बसेरा है न तेरा है न मेरा है ।  कोई सागर दिल को बहलाता नहीं बेखुदी में भी करार आता नहीं हालत ऐसी हुई है ।  
 
आज फ़िल्मी अदाकारा तबस्सुम , किरण सचदेव , हास्य कलाकार की बात याद आई , वो अक्सर इक मुक्तक सुनाती थी : 
 
बादलों की तरह बरसते रहे , 
उम्र भर हंसी को तरसते रहे । 
 
कहकहे सारी दुनिया को हमने दिए 
और तबस्सुम को हम ही तरसते रहे ।  
 
  
 
 

 

सितंबर 17, 2026

POST : 2119 जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

  जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जारी किया गया फिर ग़ज़ब तुग़लकी फरमान है
दिया जलाना आशीर्वाद का क्या निराली शान है
घोर निराशा छाई है जनमानस देश समाज में है 
पर उनको क्या खबर उनका सब तख़्त ताज में है  
  
 
जान है तो जहान है देश में आया हुआ तूफ़ान है 
सभी को खाना लाज़मी आज  ख्याली पकवान है 
नाचती है ज़मीन भी झूमता हुआ इक आसमान है 
सत्ता के मन भाता बहुत खुशियों का समूहगान है
 
 
राजा विक्रम सिंह ने भी जारी किया फ़रमान था 
भेस बदल कर निकला देखने मुआयना करने गया 
ढोल नगाड़े बज रहे थे हर तरफ़ दिखावे की ख़ुशी 
इक मोची अपनी चप्पल सी रहा भीगी आंखे लिए 
 
राजा क्रोध में उसके पास गया क्यों रो रहे बताओ 
शाही फ़रमान के उलंघन की मिलेगी सज़ा को पाओ
मोची बोला मेरी बेटी है बहुत बीमार पैसे नहीं पास
सज़ा दो है मंज़ूर झूठी ख़ुशी नहीं मना सकता हज़ूर 
 
सामने था सच जिसको दुनिया से छुपाया था आपने 
झौंपड़ी जलाई कितनी थी जब महल बनाया  आपने 
आपके जलाये दीप जितने कुछ देर में बुझ ही जाएंगे
आपकी कैसी ख़ुशी जनता को हर दिन सताया आपने  
 
कहानी में राजा को हुआ भूल का अपनी एहसास था 
आपने लेकिन दिया भगवान राम को दूसरा बनवास था 
आपने हर तरफ़ चलाई है गर्म हवाएं कहकर के मधुमास 
पछताते हैं नकली चमक दमक देख किया क्यों विश्वास  
 
आपका जवाब नहीं मगर जनता पूछती  इक सवाल है
कुछ लोगों की रईसी अधिकांश जनता हुई बदहाल है 
आपकी राजनीति सबको लगती करती बड़ा कमाल है 
सत्ता की मनमानी हमेशा चलती रहती बेढंगी चाल है   
 

 जूतों में बंटती दाल है ( कविता ) 

 
अब तो ऐसा हाल है जूतों में बंटती दाल है
मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है ।

बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है ।

भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है ।

कालिख उनके चेहरे की कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है ।

झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
गरीबी ऐसा सवाल है । 

घोटालों का देश है मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं बस वही अस्पताल है ।

कल जहां था पर्वत आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी हो चुका मालामाल है ।

बबूल बो कर खाते आम हो  रहा कमाल है
शीशे के घर वाला रहा पत्थर उछाल है ।

चोर काम कर रहे पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया दर्द से बेहाल है ।

जीने का तो कभी मरने का सवाल है 
ढूंढता जवाब अपने खो गया सवाल है । 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
   
 
    

सितंबर 16, 2026

POST : 2118 प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

प्यास को हर जगह पानी लिखेंगे
हम अगर अपनी कहानी लिखेंगे । 
 
उम्र भर जो दर्द देते रहे हैं 
शुक्रिया लिख मेहरबानी लिखेंगे ।  
 
कोशिशें की भूल पाए न लेकिन 
फिर सभी बातें पुरानी लिखेंगे । 
 
कश्तियों को जो डुबोती हैं हर दिन 
रोज़ लहरों की रवानी लिखेंगे । 
 
क्या कहें कैसा नया दौर लगता 
राह से भटकी जवानी लिखेंगे । 
 
अश्क़ अपने सूख कब से गए हैं 
ख़ुश्क आंखों की ज़ुबानी लिखेंगे । 
 
लिख रहे ' तनहा ' नहीं लोग समझे 
एक दिन वो ख़ुद ही म'आनी लिखेंगे ।   
 

 
 
  

अगस्त 29, 2026

POST : 2117 हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
हम सभी से  , उम्र भर डरते रहे हैं 
कब जिए हम रोज़ बस मरते रहे हैं ।
 
दुश्मनी को दोस्ती का नाम दे कर 
दोस्ती की , इल्तिजा करते रहे हैं । 
 
खा के ठोकर भी नहीं संभले कभी हम 
फिर फ़िसल कर के , वहीं गिरते रहे हैं । 
 
था सुना  , कुछ लोग होते थे जहां में  
जो पराये  दर्द  को ,  हरते रहे हैं ।  
 
क्या किया सरकार ने कैसे बताएं 
खेत माली  सब यहां  चरते रहे हैं । 
 
कौन सच की बात करता है यहां पर  
झूठ से गागर सभी भरते रहे हैं ।  
 
नाख़ुदा बन कश्तियां ' तनहा ' डुबोते 
आसरा तिनके का , ले तरते रहे हैं ।    
 
 

 

अगस्त 24, 2026

POST : 2116 कैसे कैसे लोग मशहूर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       कैसे कैसे लोग मशहूर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

     ज़िंदगानी का कोई मकसद नहीं है  ,  एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है ।  

       पेड़ पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे , रास्तों  में एक भी बरगद नहीं है ।  

 
दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल है , जिस का भावार्थ है कि आज का समाज बेहद छोटी सोच वाला है  , कोई विशाल क़िरदार नहीं दिखाई देता कहीं भी जो समाज को छांव देता हो अन्याय की धूप से बचाने का काम करता हो ।  आगे की बात करने से पहले दुष्यंत कुमार की पहली ग़ज़ल की बात दोहराना ज़रूरी है , यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है  , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए ।  भावार्थ है कि जो जो संस्थान संविधान ने बनाये थे ताकि पीड़ित नागरिक को राहत देने को सहायक हों , उन्हीं से जब सामन्य नागरिक को पीड़ा दर्द और अन्याय मिलने लगे तब वहां से हमेशा को चले जाना चाहिए ।  पुलिस प्रशासन न्यायपालिका सभी जब सत्ताधारी राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर सरकार और धनवान  वर्ग की मनमानी में साथ देने लग जाएं तब कोई जाये तो कहां जाये ।  अफ़सोस है आजकल यही हो रहा है शासक प्रशासन जनता को न्याय नहीं देते बल्कि ज़ुल्म करते हैं लूटते हैं और अपने विवेक से कर्तव्य नहीं निभाते अहंकारी बन कर अनुचित कार्य बिना संकोच करते हैं ।  
 
लेकिन समाज में विडंबना दिखाई देती है जब हर तरफ ऐसे लोगों की चर्चा ही नहीं होती बल्कि मीडिया पर टीवी सोशल मीडिया पर उन लोगों से साक्षात्कार लेने उनकी राय पर सुर्खियां बनाने का कार्य होता है जिनकी शोहरत ही किसी बेकार घटिया काम घटना के कारण मिली होती है ।  हैरानी की नहीं चिंता की बात है कैसे कैसे लोगों को हमने अपना आदर्श बना लिया है जिनको मर्यादा तो क्या नैतिक मूल्यों भाषा तक की रत्ती भर परवाह नहीं होती है ।  माना अधिकांश लोग इधर कुछ भी तरीका अपनाकर सफ़लता हासिल कर धनवान बन जाते हैं लेकिन भारतीय सभ्यता कभी भी पैसे का  पुजारी बनने को उचित नहीं मानती है ।  सत्यमेव जयते , हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखता और हम झूठ की जय जयकार करने लगे हैं ।  संसद में तीन सौ सांसद आपराधिक मामलों में शामिल हैं और राज्यों में आधे राज्यों में खुद मुख्यमंत्री इसी कतार में आते हैं , विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में अपराधी बैठे हुए हैं ।  ऐसे में संविधान की शपथ सभी से एक समान न्याय करने और पक्षपात नहीं करने किसी से अनुराग या द्वेष नहीं रखने पर अमल क्या उसे याद भी कोई नहीं रखता है ।  आज शहीद राजगुरु का जन्म दिन है तो विचार आया कि क्या आज कोई है जो वास्तव में देश समाज की आज़ादी की खतिर या गुलामी की बेड़ियां काटने को अपनी जान कुर्बान कर सकता हो ।  कुछ लोगों ने खुदगर्ज़ी की आखिरी सीमा पार कर दी है अपने अधिकारों और कायदे कानूनों का अनुचित उपयोग कर लोगों का शोषण करने और शासकों की तिजोरियां भरने का काम करते हैं । शहीदों की आत्माओं से परमात्मा तक से धोखा करते हैं साधरण आदमी की समस्याओं को और भी अधिक बढ़ाकर । शासक वर्ग की लूट की आज़ादी से कौन देश को मुक्त करवाएगा कोई भी नज़र नहीं आता ऐसा नायक , खलनायक बहुत हैं जो खुद को नायक कहलाना चाहते हैं । 
 
 जिनका कर्तव्य है जनता की सेवा ईमानदारी से करने का उनको अपने अधिकार याद हैं लोगों के अधिकार समझना फ़र्ज़ निभाना भूल गए हैं , बल्कि वास्तविकता विपरीत है हर कोई ऐसे शासकों से घबराता डरता है और अवसर मिले तो उसका चाटुकार बनकर अपने लिए अधिकार सुख सुविधाएं पाना चाहता है ।  देश में अब वास्तविक नायक नहीं मिलते हमने नकली खोखले व्यक्तत्व वाले लोगों को अपना नायक घोषित कर समाज को बर्बादी की तरफ भेजने का कार्य करने लगे हैं ।  रसातल की तरफ जाने को कहने लगे हैं नई ऊंचाइयां छू रहे हैं ।  सच कहना हो तो लगता है जैसे कुछ नहीं अधिकांश लोगों को विशेषकर ख़ास तबके को खुद गुलामी पसंद है ,  जैसे कोई खाने को हड्डी डालता है तो कुत्ते दुम हिलाते हैं तलवे चाटते हैं , उसी तरह खास वर्ग की हालत हो गई  है ,  सब कुछ पास है पद पैसा लेकिन ज़मीर ज़िंदा नहीं  है ।     
 

 

अगस्त 23, 2026

POST : 2115 दोस्त कोई मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       दोस्त कोई  मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
दोस्त कोई  मिला नहीं
इस जहां से गिला नहीं । 
 
कौन शिकवा करे भला 
जब रहा सिलसिला नहीं । 
 
चल रहे सब अलग अलग  
एक भी  काफ़िला नहीं । 
 
अपना अपना नसीब है 
फूल दिल का ख़िला नहीं । 
 
हार सब आंधियां गईं 
एक पत्ता हिला नहीं । 
 
कल इमारत बुलंद थी   
आज साबुत शिला नहीं । 
 
देख ' तनहा ' उधर ज़रा  
बच सकेगा किला नहीं ।  
 

 
 
 
 
 
 
  

अगस्त 22, 2026

POST : 2114 भगवान पर संशय ख़त्म ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान पर संशय ख़त्म ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

कथा की शुरुआत करने का वही पुराना ढंग है लेकिन भगवान से भक्तों तक कुछ भी पुराना नहीं है इस मंदिर में सभी नवीनतम है ।  किसी पत्थर से नहीं पीतल तांबे लोहे से नहीं शुद्ध सोने से बनाई गई है मूर्ति भगवान की ।  अब किसी को कोई संशय नहीं रहना चाहिए कि भगवान है या नहीं है और अगर है तो वो कैसा है ।  छुप छुप कर नहीं जैसा उसको पसंद है करना खुले आम सभी के सामने कर दिखलाता है , कोई माई का लाल उसको नहीं रोक पाता है उसका कहना है वही सभी का दाता है । लाखों करोड़ को वो हर महीने खैरात बंटवाता है , उसका अपना इक बही खाता है जो उसके सामने नतमस्तक होकर शीश झुकाता है मनचाहा वरदान पाकर जाता है ।  उसका कद सबसे बड़ा है इक अकेला वही शान से खड़ा है देवी देवताओं तक को चुनाव में पराजित कर उसने अपना परचम हर जगह लहराया है ।  जिस जिस ने उसको पूजा है माना है रिझाया है मनाया है उसका कल्याण हुआ है जिसने नहीं भरोसा किया बहुत पछताया है इस देश में उसकी माया है सूरज चांद हवा पानी जंगल सभी पर उसका इख़्तियार है कहीं अंधेरा कहीं उजाला धूप कहीं कहीं शीतल छाया है ।  बस अब अधिकांश उसकी महिमा की बात करते हैं वही सब करता है सभी उस से हमेशा डरते हैं जिस पर तिरछी निगाह उसने डाली है उसकी तिजोरी हुई ख़ाली है ।  खुद अपने गुलशन को जो उजाड़ता है सिर्फ़ वही गुलशन का माली है ग़ज़ब की उसकी रखवाली है कुछ बचा ही नहीं होगा तो कौन फिर कुछ बिगाड़ सकता है ।  जब से धरती पर उसका शासन आया है उसने जितना इतिहास लिखा था पहले उसको मिटाया है इक अलग नया इतिहास उसने बनाया है यारों संग सभी खाया और रोज़ नाचने नचाने का दरबार सजाया है कौन कौन उसकी खातिर नाचा है किस किस को अपने अंगने में नचाया है आठवां सुर उसी ने बनाया है ।  सोने चांदी के भगवान हर घड़ी हंसते हैं मिट्टी के हम इंसान पल पल रोते हैं जो समझदार हैं जाग जाते हैं मिलता है उनको हम सभी खोते हैं ।  
 
आधुनिक भगवान ने सभी को समझाया है दुनिया की झूठी मोह माया ने सबको उलझाया है ख़ाली हाथ आदमी जाएगा ख़ाली हाथ आदमी आया है किसने लूटा किसने चुराया की बातों को छोड़ो ख़ामोश रहकर वक़्त गुज़ारो सबक पढ़ाया है सौ साल बाद आज़ादी के वाला सुहाना ख्वाब कोई दिखाया है ।  उस भगवान को खुद अपने लिए सभी कुछ चाहिए था जैसे भी मुमकिन हुआ सब कुछ हथियाया है आपको ठेंगा दिखलाने का समय तब आया है ।  उसकी कहानी काल्पनिक नहीं है सब सच है सामने है वन टू का फोर फोर टू का वन गीत उसको पसंद है यही भजन बजवाया है ।  यही होता है जिसने बनाया उसी का नाम मिटाते हैं तब इंसान से भगवान बनकर शोभा बढ़ाते हैं ।  अब कोई चेहरे पर रही नकाब नहीं है , वो कर्म उंगलियों पे गिनते हैं ज़ुल्म का जिस के कोई हिसाब नहीं है ।  आपके सामने हक़ीक़त है कोई भी सुनहरा ख़्वाब नहीं है , सही गलत का रखता वो हिसाब नहीं है सत्ता से बढ़कर कोई नशा नहीं कोई शासक पीता शराब नहीं खून इंसान का बहता है जिस नाम पर लिखी उस पर कोई किताब नहीं है ।  क्या भगवान से कम हैं आप नहीं आली जनाब नहीं ।    
 

 

POST : 2113 जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं 
झूठ को सच भी बना देते हैं । 
 
बात क्या उनको बताई जाए 
राज़ ग़ैरों को बता देते हैं ।  
 
बात करते हैं अदावत की वो  
दोस्ती का यूं सिला देते हैं ।  
 
जो न पहुंचाए कभी मंज़िल तक 
रास्ता ऐसा दिखा देते हैं । 
 
लोग करते हैं सियासत हर दम 
जलते शोलों को हवा देते हैं । 
 
ज़हर हाथों से पिला कर हमको  
लोग  जीने की दुआ देते हैं ।  
 
ख़ुद गए जो छोड़ कर ' तनहा ' को 
बेवफ़ाई का गिला देते हैं ।  
 
 

 

अगस्त 20, 2026

POST : 2112 सच का आईना दिखाऊंगा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     सच का आईना दिखाऊंगा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया  

सच बोलने की सज़ा ये पाऊंगा 
बेख़ता ही मार दिया मैं जाऊंगा । 
 
होगी न कभी खामोश मेरी ज़ुबान 
होगा जब ज़ुल्म आवाज़ उठाऊंगा । 
 
कर रहे  क़त्ल जम्हूरियत का सभी 
ये हक़ीक़त लोगों को मैं बतलाऊंगा । 
 
नाम पर सच बिकता है झूठ यहां  
तस्वीर इक रोज़  उसकी बनाऊंगा । 
 
चिराग़ कोई आप भी जलाते रहना
इक दिन मैं चला आखिर जाऊंगा । 
 
क़र्ज़ चुकाना सब शहीदों का बाकी है 
शीश फूलों की जगह पर चढ़ाऊंगा ।
 
वतन की मिट्टी में मिलना है मुझे 
बन के राख धरती पे बिखर जाऊंगा ।  
 
जनता को मिल जाएंगे अधिकार जब  
गीत वही तब मैं भी संग गुनगुनाउंगा । 
 
लोग गूंगे बहरे हैं नहीं सुनते यहां पर 
मैं उन्हें  सच का ये आईना दिखाऊंगा ।    
 

   

अगस्त 19, 2026

POST : 2111 ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है 
मौत लेकिन सफ़र सुहाना है । 
 
ज़िंदगी ख़्वाब इक अधूरा सा 
नींद खुलते ही टूट जाना है ।   
 
वक़्त को कौन रोक पाया है 
जो नया आज कल पुराना है । 
 
थे जो अपने ,  हुए पराये हैं 
याद करना नहीं , भुलाना है ।
 
हो गई इन्तिहा सितमगर अब  
क्या सितम और तुमने ढाना है । 
 
आ सको आज तो चले आओ 
कल किसी ने नहीं बुलाना है । 
 
चल दिए शहर छोड़ कर ' तनहा '  
क्या , कहीं और भी ठिकाना है ।   
 

 

अगस्त 15, 2026

POST : 2110 इंतज़ार क़यामत तक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          इंतज़ार क़यामत तक  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

पहले जाने कितनी बार किस किस ने भरोसा दिलवाया था लेकिन कोई भी अपने वादों पर खरा साबित नहीं हुआ , सच कहते हैं कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।  कहने से पहले थोड़ा खुद अपने भीतर भी झांकते तो क्या बुरा था , आपको जो जो करना था चाहते थे कर दिखाना था आपने सब दस साल में कर ही नहीं लिया बल्कि कोई भी अड़चन किसी तरह की आपको नहीं रोक पाई न कोई कानूनी न कोई नैतिक न ही कोई सामाजिक मान मर्यादा की परवाह ।  क्या क्या कैसे कैसे किया करवाया बताने की ज़रूरत नहीं है सभी सामने है , लेकिन जब जनता की दुर्दशा बदहाली को मिटाने की बात करनी पड़ी तब 2047 तक की बात कहने लगे जनाब ।  कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक ये जले पर नमक छिड़कने जैसा है कि हमको अपने अपनों के लिए अभी और करने दो जनता की बारी अभी जल्दी क्या है कुछ साल और गुज़ार सकते हैं उसके बाद ज़िंदगी रही तो देख लेंगे क्या हुआ तेरा वादा।  सत्ता पाने के बारह साल के समय में आपका दल दुनिया का सबसे धनवान राजनीतिक दल होने का दावा है , देश में शहर शहर आपके दल के शानदार दफ़्तर बनवा लिए हैं , खुद अपने लिए विशेष हवाई जहाज़ से कितना कुछ आपकी ख़ुशी मौज मस्ती और कितने रईसाना महंगे महंगे शौक पर देश के ख़ज़ाने को बेरहमी से खर्च किया गया है जिसे , किसी ऐसे देश में जिस में आधी आबादी की हालत इतनी खराब है कि उनके लिए अच्छी शिक्षा चिकित्सा  सेवाएं तो दूर जीने की बुनियादी ज़रूरतें नहीं पूरी होती , सामाजिक अन्याय और खुदगर्ज़ी कहना उचित होगा । अभी उनको 21 साल और इंतज़ार करने की बात करना दर्शाता है कि शासक सरकार में संवेदना का नितांत अभाव है ।  2014 से पहले की सरकार पर केवल इक काल्पनिक आधार पर घोटाले का आरोप लगाया गया था सी ए जी की रिपोर्ट में ऐसा कहते हुए की अगर बोली करवाई होती तो कितने करोड़ का फ़ायदा होता , आज उसी सी ए जी की कितनी रिपोर्ट सामने हैं जिस में आपकी सरकार के मंत्रालय और राज्यों की सरकारों के विभागों ने कितना पैसा कहां खर्च हुआ बताया तक नहीं है ।  पिछली सरकार की तर्ज़ पर कोई सी ए जी अवश्य आंकलन कर बता सकता है कि जितना पैसा आपने अपने दल और अपने ख़ास दोस्तों को फ़ायदा दिलवाया है उस से समाज में कितना कल्याण हो सकता था ।  ये कैसी देशसेवा है जिस में जनता बदहाल और शासक दल और उसके संगी साथी मालामाल होते जाते हैं तब भी आपको अन्य दल लुटेरे लगते हैं जिनके पास चालीस पचास साल सत्ता रहने के बाद भी इतना क्या इस से दसवां भाग भी नहीं है । ऐसा नहीं कहना चाहता कि पिछली सरकारों ने लूटा नहीं बल्कि सभी सरकारों ने सरकारी अधिकारियों ने मिल कर इतना लूटा नहीं होता तो देश कब का गरीबी भूख जैसे समस्याओं से निजात पा चुका होता ।  
 
आपने कभी अपने पिछले दो बार सत्ता में रहने वाले पांच पांच साल का सही हिसाब नहीं दिया है कि जनता को क्या क्या उपलब्ध हुआ है वास्तव में न कि झूठे आंकड़ों में । देश आज सब से खराब हालत में है आर्थिक तौर से भी सामाजिक तौर से भी और विदेशनीति कूटनीति सभी में असफ़ल साबित हुआ है किस लिए ।  क्योंकि आपको सिर्फ अपने खुद को बड़ा साबित करने की चाहत ने जनता और समाज की तरफ ध्यान देने ही नहीं दिया है विडंबना इस बात की है कि सब कुछ लुटवा कर बर्बाद कर के भी आपको समझ नहीं आया कि सिर्फ खोखली बातों से कुछ ठीक नहीं होने वाला है । आपात्काल की चर्चा करते हैं जबकि आज आपने तब से कहीं अधिक बढ़कर तानाशाही तौर तरीके अपनाये हैं और हर दिन लोग पुलिस और बिना वर्दी कुछ बदमाशों से पिटते हैं जब उनको कोई विरोध शांति पूर्वक करने नहीं दिया जाता ।  आप अपनी गलती को ढकने को उनको बदनाम करना चाहते हैं कुछ अपशब्द जैसा कह कर ।  लेकिन असमानता की सीमा बढ़ने पर जब शासक वर्ग और साधरण जनता में गहरी खाई बन जाती है तब लोग अपने अधिकार हासिल करने को साहस कर अन्याय करने वालों अपनी ताकत दिखाते हैं हमेशा । 
 
तमाशा आपका कभी ख़त्म नहीं होता मगर खेद की बात है कि आपने उन जगहों पर भी झूठ ही बोला हैं जहां पर सिर्फ सच ईमानदारी से बोलना चाहिए था । देश का बंटवारा भी आपको अपनी राजनीति करने का अवसर लगता है जबकि आप जब से सत्तारूढ़ हुए हैं सिर्फ लोगों को बांटने का की प्रयास किया है ।  15 अगस्त को बोलने वाले समझने वाले दोनों जानते थे की सब सिर्फ केवल औपचारिकता निभाना का कार्य कर रहे हैं । हैरान किया उस बाबा ने भंडाफोड़ कर कि सब कुछ गलत हो रहा है और नहीं बदले अगर आप तो उनको भी अपना धंधा छोड़ फिर आंदोलन करना पड़ सकता है ।  लेकिन खुद ही अपनी कहीं बात पर जैसे हंसते हुए दिखाई दिए , बात रोने की है उनको अभी समझ नहीं आया उनका खुद का एतबार कौन करता है । छाज तो बोले छलनी क्या बोले जिस में हज़ारों छेद होते हैं उनको अपने गिरेबान में झांकना चाहिए दोबारा भेस बदल कर भागना कठिन होगा समय बदल गया है ।  थोड़ा इस ग़ज़ल से समझ लेना कि सच की डगर पर वही चलते हैं जो जान हथेली पर रखते हैं जेल जाने से घबराते नहीं हैं ।  
 
 

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ( ग़ज़ल ) 

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं
शख्स जो सच की राह चलते हैं ।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं ।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं ।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं ।

जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं ।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं ।

टालते हैं हसीं में  वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं ।  
 

 
 
 
 
  

अगस्त 14, 2026

POST : 2109 आज़ादी एक अधूरा ख़्वाब ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     आज़ादी एक अधूरा ख़्वाब ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

भारत देश विदेशी शासन से मुक्त हो गया 1947 में ,  और हम 80 वीं वर्षगांठ मनाएंगे कल 15 अगस्त को  लेकिन वास्तव में साधारण लोग वंचित हैं , आज़ादी पाने आज़ादी से जीने से सभी को बराबर अधिकार मिलने का ख़्वाब अभी अधूरा ही है।  आज़ाद होने का मतलब बहुत बड़ा है हमको अभी कितनी तरह की गुलामी से छुटकारा पाना है , मेरी आयु 75 साल की है मगर अभी तक कभी भी आज़ादी से जीने नहीं दिया गया मुझे ।  बचपन में माता पिता से लेकर कितने अन्य लोग मुझे किसी न किसी तरह अपने आधीन रखने का कार्य करते रहे हैं उनका विचार था मुझको मनचाहे ढंग से रहने तो क्या सोचने समझने देखने बोलने की भी आज़ादी मिलना अनुचित होगा ।  बस ऐसी ही इक सोच सभी की रही है ख़ुद को मुझसे बड़ा समझदार जानकर और मेरा शुभचिंतक होने का अधिकारी मान कर मुझे अपने आधीन ख़ुशी से रहने को विवश करना उनका दायित्व था ।  ये सिलसिला कहीं पर भी कभी थमता नहीं है सिर्फ मुझी को नहीं जिसका जिस पर बस चलता है उसी को अपने आधीन  रखने की इक रिवायत चलती आई है ।  सरकार जिस में सांसद विधायक जनता चुनती है और कार्यपालिका से न्यायपालिका तक सभी को नियुक्त किया जाता है सही न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित रखने को वो सभी कभी भी नागरिकों की आज़ादी और अधिकारों की परवाह करते ही नहीं है ।  सामन्य जनता की कोई आज़ादी कोई अधिकार सुरक्षित नहीं है , बल्कि ये तमाम संस्थान संगठन उसका हनन करते रहते हैं बिना किसी संकोच के हमेशा ।  हमारा समाज जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसे नियम पर चलता रहा है धनवान बलशाली गरीब कमज़ोर से सब छीन लेते हैं बेबस कर जब भी जैसे भी । 
 
देश की राजनीति किसी गुलामों की मंडी से कम नहीं है जिस में कुछ लोग बाकी  सभी को अपने इशारों पर नचाते हैं बदले में उनको मिलता है सभी कुछ मगर आज़ादी कभी नहीं । राजनीतिक दलों का तौर तरीका कभी संविधान की भावना के अनुरूप नहीं रहा है । अदालत से निर्वाचन आयोग तक सभी ये सब होते देखते रहते हैं कुछ भी करते नहीं हैं क्योंकि उनको देश समाज संविधान से पहले स्वयं खुद की चिंता रहती है उनकी मनमानी चलती रहती है उनसे कोई सवाल नहीं पूछता कि  आपकी उपयोगिकता क्या है । सांसद विधायक बनना उनका यही इक  लक्ष्य था ताकि उनको शानदार जीवन रहन सहन सुख सुविधाएं मिलती रहें हमेशा , कोई कर्तव्य भी उनको निभाना होगा इस के लिए कभी भी  बाध्य नहीं किया गया उनको योग्यता का कोई पैमाना उन पर लागू नहीं होता है जैसे अन्य कहीं अयोग्यता असफलता से सज़ा मिलती है और हटाया जाता है  ।  उनकी ये भौतिकता की आज़ादी उनको मानसिक तौर पर गुलाम बनाने का ही परिणाम है उनकी सोच विचारधारा कोई मायने नहीं रखती है ।  सत्ता मिलते ही कुछ खास लोगों को आज़ादी मिलती है मनमानी करने से सभी को अपनी गुलामी करने को विवश करने वाले हालात पैदा करने की ।  उनके नियम कानून योजनाएं सभी उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने और जब तक मुमकिन हो अपनी सत्ता अपनी कुर्सी को बनाये रखने को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं ।  इस आज़ाद  देश के शासकों ने यही किया है धीरे धीरे  एक एक कर के सभी मौलिक अधिकारों पर डाका डालना और कहने को आज़ादी की रक्षक कहलाना । 
 
शायद हम भूल चुके हैं कि हम भी आज़ाद हैं तभी किसी न किसी को अपना मसीहा समझ उसकी जय जय कार करते हैं , किसी शासक की तानाशाही और अहंकारी आचार व्यवहार  या सत्ता का गलत उपयोग पर हम विचलित नहीं होते बल्कि सोचते हैं ऐसा ही होता है कौन नहीं करता है ।  सत्ता अधिकार और धन दौलत से शासक विवेकहीन बन कर देश को लूटने बर्बाद करने और केवल अपने ही ऐशो आराम को सबसे ज़रूरी समझने लगते हैं  लेकिन जनता छटपटाती है कुछ करने का हौसला नहीं कर पाती है ।  हम किसी पिंजरे में कैद खुद को असहाय समझते हैं और सोचते हैं कोई आकर हमको पिंजरे से आज़ाद करवाएगा ।  अभी एक कॉलेज के कानून की पढ़ाई करने वाले भावी वकीलों ने किसी ख़ास बड़े पद पर बैठे व्यक्ति से उपाधि या स्नातक की डिग्री लेने से असहमति जताई और संसथान को अवगत करवाया कि उनको नहीं बुलाया जाये जिनके कार्य न्याय को लेकर शंका पैदा करते हैं ।  लेकिन खबर है उनको इस कारण डिग्री मिलने में कठिनाई हो सकती है किसी ने अपने अधिकारों का उलंघन कर ऐसा आदेश निर्देश जारी किया मगर वापस लेने को बाध्य हुए विरोध को देख कर उनको अपने विवेक से ऐसा नहीं करना चाहिए समझ नहीं आया  । क्या छात्रों को  अपने विचार ऐसे सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करने का अधिकार  नहीं है ।  बहुत कम लोगों को याद हो शायद कभी अभिनेता अमिताभ बच्चन जी की इक फ़िल्म आई थी , मैं आज़ाद हूं , वास्तव में कोई भी शख़्स उस नाम का नहीं था फ़िल्म में इक अख़बार के संपादक ने सनसनी पैदा करने को कुछ ख़त छापे थे अनाम आज़ाद नाम वाले व्यक्ति का नाम लिखकर ।  उन खतों में सड़ी गली व्यवस्था पर सवाल या टिप्पणियां की जाती थी जो शासन प्रशासन को स्वीकार नहीं होता है ।  अंत में जिसको आज़ाद बनाकर सामने लाकर पेश करना था उसको अपनी जान देकर खुद को असली साबित करना पड़ा था ।  आजकल अख़बार टीवी चैनल वाले जनसमस्याओं की बात नहीं करते हैं सत्ता को अपना ज़मीर बेच कर उसका गुणगान कर मालामाल हैं ।  जिनका सब कुछ पैसा है उनको गरीबी भूख अन्याय अत्याचार दिखाई नहीं देता क्योंकि ये जिनके साथ घटता है उस जनता से मीडिया को कोई मतलब नहीं रहा है ।  आज़ादी मिली है दलालों को चोर लुटेरों को वो कुछ भी करते रहें कोई रोकने टोकने वाला नहीं है ।  हम उनके पिंजरे से बाहर निकलना ही नहीं चाहते हैं कैद में रहकर खैर मनाते हैं क़ातिल को खुद घर बुलाते हैं ।  वास्तव में हम ऐसा साहस कभी नहीं करते बल्कि जिस पिंजरे में कैद हैं उसी से लगाव हो गया लगता है ।  साधु और पिंजरे में कैद पंछी की कहानी याद है , इक बार फिर से पढ़ कर समझते हैं ।   
 
 

             साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )

 पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे आज़ाद करो ।  ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला ।  मगर पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया ।  अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़ सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है ।  उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना ।   अब साधु ने उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई में फेंक दिया ।  इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को ।  लेकिन आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही दिशा नहीं समझाने वाले ।  अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है ।  घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है । 
 

मैंने शुरुआत ख़ुद अपने आप से की थी आखिर में उस को ध्यान में रखते हुए अपनी किताब एहसासों के फूल से इक कविता पेश करता हूं ।  

 

   कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये ।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये ।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको ।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने 
खुद अपनी ही कैद से ।