जुलाई 24, 2021

चाय की कहानी उसकी ज़ुबानी ( अजीब दास्तां ) डॉ लोक सेतिया

 चाय की कहानी उसकी ज़ुबानी ( अजीब दास्तां ) डॉ लोक सेतिया 

चाय की चुसक्कियां लेते लेते लिख रहा हूं सामने भरी प्याली में गर्म गर्म चाय है इस हाथ टाइपिंग उस हाथ कप लिए। ये ज़रूरी था चाय की शर्त थी बस हम दोनों सबसे अलग इक साथ होंगे तभी अकेले में खुलकर बातें होंगी। चाय जैसी कोई नहीं है हुई नहीं होगी भी नहीं कभी भी। चाय इंसान इंसान में भेदभाव नहीं करती है जाने किसने झूठ कहा है चाय की प्याली और होंटों के बीच का फ़ासला इतना है कि कभी कभी सालों लग जाते हैं और प्याली के लबों तक पहुंचने में कितने जोख़िम हैं। चाय चाह का नाम है जहां चाह वहां राह होती है चाय से बिगड़ी बात बन जाती है सर्दी की धूप में चाय पीना लुत्फ़ और बढ़ा देता है तो गर्मी में गर्म चाय ठंडक पहुंचाती है। पत्नी महबूबा दिलरुबा इक प्याली चाय से मान जाती है सुबह की चाय ताज़गी लाती है शाम की चाय आशिक़ाना बनाती है। चाय की चाहत कम नहीं होती कभी ज़िंदगी भर साथ निभाती है बिछुड़ों को मिलाती है सब के मन को भाती है। खुद अपनी ज़ुबानी कहानी चाय सुना रही है कोई केतली रसोई में गुनगुना रही है खुशबू बाहर तलक जा रही है पड़ोसी को जैसे बुला रही है। 
 
मैं नहीं बदली दुनिया बदलती रही है प्याली कभी गलास कभी मग कभी लोटा भर कर कटोरी में डालकर पीना हज़ार ढंग बदले हैं पीने पिलाने वालों ने मेरा मिजाज़ नहीं बदला अंदाज़ नहीं बदला। मेरा साथ छोड़ा प्लेट प्याली का जोड़ा बिछुड़ा प्याली का अकार बदलता रहा मग का भरोसा नहीं कभी कितना बड़ा कितने संगी साथी कभी अकेला अलग अलग हुआ मगर मुझसे जुदा होकर नहीं रहा खुश कभी भी। कॉफी से मेरा कोई झगड़ा नहीं है कड़वाहट मिठास का रिश्ता होता नहीं है मुझे पीने वाले कभी बेवफ़ा नहीं होते हैं ये बात बतानी है कोई लफड़ा नहीं है। बिस्कुट से नाता मेरा सदियों पुराना है नमकीन से भी मुझको रिश्ता निभाना है बारिश में मौसम हो जाता सुहाना है कड़ाही संग टबलर मिल जश्न मनाना है गर्म पकोड़े चाय का रहता ज़माना है। चाय पीने को घर पर बुलाया है शायद मम्मी को बेटी की शादी का ख्याल आया है। चाय ने कितने संबंध बनाये हैं कारोबार कितने लोगों ने चाय साथ साथ पीकर बढ़ाए हैं। कौन है जिसने मुझे नहीं आज़माया है जब कोई नहीं देता साथ चाय ने निभाया है। 
 
पीने को बोतल शराब की भी कितनी हैं शर्बत कितने हैं और सबको लुभाती ढंडी रंग बिरंगी अनगिनत नाम की बाज़ारी जिस्मफ़रोश हैं बर्बाद करती हैं। लस्सी दूध को छोड़ सभी आदमी का सत्यानाश करती हैं। चाय पर कोई ऐसा इल्ज़ाम नहीं है दुनिया में कोई मेरा हमनाम नहीं है। चाय मुहब्बत का पैगाम देती है दोस्तों को बिठाती है साथ चाहे जिस जगह हो भूले नहीं ऐसा ईनाम देती है। घर की होटल की चायखाने की ढाबे की किसी चलते फिरते चायवाले की महंगी नहीं सस्ती नहीं बस गर्माहट देती है ठंडे रिश्तों को पल भर में नया करती है। प्याली खुद नहीं पीती बुझाती है चाह सबकी चाय की मस्ती है शहर गली बस्ती है। चाय के दुनिया में दीवाने बहुत हैं इक इक प्याली को याद अफ़साने बहुत हैं। चाय गर है साथ याराने बहुत हैं कहने को कई महंगे नज़राने बहुत हैं पर चाय की प्याली तूफ़ान खड़े करती है घर घर में रहती है सब चुपके से कहती है पीकर गाओ दिलकश तराने बहुत हैं। चाय की प्याली भी जिनको मिलती नहीं वही समझते हैं कितनी बड़ी कीमत है उसकी। ये मेरी चाय की प्याली नहीं है कहकर ढंडी आह भरते हैं अक्सर लोग।

You're my cup of tea drink sticker - TenStickers

जुलाई 22, 2021

धुंवा बनाके फ़िज़ा में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको।

   भगवान बेचते सब पैसे के पुजारी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

झूठ बोलते हैं अदालत में शपथ खाकर सच बोलने की संविधान की शपथ उठाकर धज्जियां उड़ाते हैं। हम सच नहीं कहते झूठ से पर्दा हटाते हैं जो देखते हैं उसकी असलियत समझते समझाते हैं। इधर उधर से ढूंढकर मुद्दे लाते हैं सिक्का नहीं उछालते नहीं किस्मत आज़माते हैं राज़ की बात भरी महफ़िल में कहते हैं बेआबरू होकर निकाले जाते हैं। खेल पैसे का है पैसा भगवान है कथा कहानी हक़ीक़त फ़लसफ़ा है। शुरुआत करते हैं टीवी पर इक नया विज्ञापन चल रहा है गांव के लोग बात कर रहे हैं स्कूल की ईमारत की हालत खराब है कुछ करना होगा सरकार ने हाथ खड़े कर दिये हैं। जब तलवार मुकाबिल हो अखबार निकालो आजकल कोई नहीं कहता क्योंकि अखबार टीवी चैनल खुद बंदर के हाथ उस्तरा बन गए हैं बंदर बांटता है बिल्लियां रोटी खाने की आस लिए बंदर का गुणगान करती हैं। कुछ मुहावरे की नकल की तरह उपाय ढूंढते हैं और निर्णय किया जाता है मुनादी करवाई जाती है केबीसी को फोन लगाओ गांव के समझदार सब उल्लू बन जाओ। लगता है सरकार ने अमिताभ बच्चन को ज़िम्मा सौंपा है हमसे नहीं होता आप केबीसी से विकास की गंगा लाओ जनता को समझाओ खाली दिमाग शैतान का घर होता है सबके दिमाग में कचरा भर कर उलझन को सुलझाओ नहीं सुलझती और उलझाओ। बस 15 सवाल हैं ज़िंदगी मौत का सवाल नहीं है कोरोना को छोड़ो धमाल नहीं मिसाल नहीं है। आपके सामने ऑप्शन होते हैं किधर जाना है सही दिशा कौन सी है दिमाग़ कहता है जिधर सभी जाते हैं उसी डगर चलना ठीक है दिल है कि मानता नहीं और आत्मा भटकती है कोई अलग रास्ता बनाने को चिंतन करती है लेकिन रटी रटाई बात याद आती है सत्य की खोज की ज़रूरत नहीं है आगे बढ़ना है तो जो जवाब पैसा दिलवाता है उसी को लॉक करना होगा। कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में सही जवाब का शोर मचाकर बच्चा यादव मंच को हिलाकर रख देता है। अमिताभ बच्चन और टीवी शो वाले खुद अपनी असलियत नहीं जानते दुनिया भर की जानकारी समझदारी की बातें करते हैं। दुनिया से जाना है खाली हाथ सबको मगर क्या कमाल है कुत्तों को खिलाते हैं जानवर से प्यार करते हैं इंसान को इंसान नहीं समझते आदमी आदमी को भूनकर खाने लगे हैं। दुष्यन्त याद आने लगे हैं घर मिल रहा जहां तहखानों से तहखाने लगे हैं। महल वालों के अंदाज़ नज़र आने लगे हैं घर वही है रहने वाले लोग वही हैं दरवाज़े अलग अलग होने लगे हैं करीब होकर दूर जाने लगे हैं बात करने से बचते हैं मिलने जुलने से कतराने लगे हैं। अपने भीतर शिकवे शिकायत बैर नफरत छुपा नकाब चेहरे पर लगाकर मुस्कुराने लगे हैं। 
 
सत्तावाले सोने चांदी के कलम भिजवाने लगे हैं जो बात लिखवानी है लिखवाने लगे हैं। सच की बात करने वाले झूठ के कदमों में सर झुकाने लगे हैं। टीवी सीरियल फिल्म गाने समाज को गलत दिशा दिखाने लगे हैं ज़मीर बेचने वाले धन दौलत कमाने लगे हैं। लोग खोटे सिक्कों को बार बार आज़माने लगे हैं। संसद विधानसभा में देश समाज की समस्याओं की चर्चा छोड़कर माननीय कहलाने वाले आपस में टकराने लगे हैं चाय की प्याली में तूफ़ान उठाकर अपनी ताकत को आज़माने लगे हैं। शून्यकाल में सवाल खड़े हैं जवाब खाली कुर्सियां हैं कौन सुनता है चीख पुकार आम लोग रोते बच्चे भूखे सो जाने लगे हैं। खड़ा हूं आज भी रोटी के चार हर्फ़ लिए , सवाल ये किताबों ने क्या दिया मुझको। धुंवा बनाके फ़िज़ा में उड़ा दिया मुझको , मैं जल रहा था किसी ने बुझा दिया मुझको। नज़ीर बाकरी जी की ग़ज़ल जगजीत सिंह की आवाज़ में हर लफ्ज़ हक़ीक़त है आज भी।
 

 


जुलाई 20, 2021

कुछ करना था कुछ कर बैठे ( सच के दर्पण में ) डॉ लोक सेतिया

  कुछ करना था कुछ कर बैठे ( सच के दर्पण में ) डॉ लोक सेतिया 

ढूंढने से जो नहीं मिला जीवन भर अचानक सामने खड़ा दिखाई दिया कहीं ये कोई ख़्वाब तो नहीं। नहीं ये सपना नहीं हक़ीक़त सामने नज़र आई मुझे बिल्कुल शीशे की तरह साफ जिसको तलाश किया इधर उधर मिला भी तो खुद अपने पास और इतना पास कि कोई फ़ासला नहीं था दोनों में ज़रा भी। मैंने चाहा उस से पूछना बहुत कुछ कितने सवाल मन में उठते रहे ज़िंदगी भर मगर कुछ भी कहने से पहले उसने सब कुछ बता दिया जैसे किसी परीक्षा में हर सवाल का जवाब लिखा हुआ हो। आधुनिक समय में होता है आपको सही और गलत का निशान लगाना होता है झट से पहले से दिए कॉलम में। पर यहां सोचने की ज़रूरत नहीं थी सही का निशान लगा हुआ था जैसे ऐसा गलत है साफ बताया हुआ था। आपको समझने में आसानी हो इसलिए आपको तमाम उलझनों समस्याओं परेशानियों चिंताओं का कारण भी समाधान भी बता देता हूं बस आपको हां या नहीं सच या झूठ जो उचित लगता है बोलना है खुद से खुद ही बात करनी है। आत्मचिंतन उसी तरह है जैसे हम आप अपनी मन की बात सोशल मीडिया पर लिखते हैं सोचते हैं लोग नासमझ हैं उनको समझाना ज़रूरी है खुद कभी नहीं समझा क्या समझना क्या समझाना है। ध्यान से पढ़ना खुली किताब को बिना समझे पन्ने नहीं पलटते जाना जैसे साल बढ़ते गए संख्या बढ़ी हम वहीँ रहे जहां थे। 
 
   क्या कुछ भी वास्तव में उस तरह का है जैसा होना चाहिए दुनिया में सब कुछ जैसा है कोई नहीं मानता कि बढ़िया है। लेकिन हम जिस चीज़ को अच्छा नहीं समझते बदलते रहते हैं अपने खुद की खातिर घर वाहन साज़ो-सामान खराब छोड़ बेहतर चुनते हैं हासिल करते रहते हैं। लेकिन जिस दुनिया में रहना है उसको अच्छा और सुंदर बनाने की जगह और भी खराब करते रहते हैं। किसी और ने नहीं हमने बर्बाद किया है इस कभी बड़ी खूबसूरत रही दुनिया को और कैसा बनाया है जैसा बनाना कदापि नहीं था। सरकार राजनेता अधिकारी न्यायपालिका पुलिस सुरक्षा शिक्षा स्वास्थ्य सेवा यहां तक कि धर्म भगवान समाजसेवा तक सभी जैसा होने चाहिएं उस के उल्ट हैं। धन दौलत शोहरत सुख सुविधा के पीछे भागते रहते हैं इक रेगिस्तान में मृगतृष्णा की तरह चमकती रेत को पानी समझ और मर जाते हैं प्यास से। प्यास बुझ सकती थी अथाह सागर था पास हमने जिसको देखा नहीं मुहब्बत इंसानियत और दोस्ती अपनेपन को छोड़ खुदगर्ज़ी को मकसद बना लिया है। 
 
कोई रिश्ता कोई संबंध सच्चा और निस्वार्थ नहीं बनाया है हमने सब को खराब किया है जो नहीं भाया उसको भी संवारा नहीं मिटाना चाहा है। बनाना नहीं सीखा बने बनाये को ख़त्म करना यही किया है। विधाता जो चाहता है हमने उसके विपरीत किया है मनमानी की है और विधि से मिला जो हम नहीं चाहते थे। जिस दिन अपनी मर्ज़ी छोड़ विधाता की मर्ज़ी को समझ सही आचरण करने लगे बदले में जिसकी हमको चाहत है विधाता वही देगा। बस हम उस से होड़ लगा बैठे हैं जिस के सामने अपना कोई बस नहीं चलता और बेबस हैं। हम खुद को नहीं बदलते विधाता को उसकी दुनिया को बदलना चाहते हैं। मगर किया क्या है दुनिया बनाने वाले की हर चीज़ को हमने चाहा है अपनी मर्ज़ी की बनाने को बदलने में जैसा था उस से खराब किया है। शायद ध्यानपूर्वक देखना होगा क्या ये सब जैसा होना चाहिए उसके उल्ट नहीं है जैसे सफ़ेद और काला रंग। लेकिन हमने कालिख़ को दाग़ को छुपाने को सब कुछ काले रंग में रंग दिया है। इतना ही नहीं हम काले रंग झूठ आडंबर और सभी गलत बातों को स्वीकार कर अपना लिया है। राह ही गलत चलते रहे हैं तो जिस मंज़िल की चाह थी मिलती कैसे और हम अपनी खूबसूरत मंज़िल से इतना दूर होते गए हैं कि हमारी राहें  भी खो गई हैं। 
 
सामने सच खड़ा हुआ है सच ही ईश्वर है और सच के दर्पण में सब कुछ दिखाई दिया है। कुछ करना था कुछ कर बैठे। ज़िंदगी का घड़ा भरता नहीं है जितना पानी डालते हैं रिसता जाता है जीवन को बहते दरिया की तरह बनाते तो प्यास बुझाते सबकी कुछ फूल खिलाते इक गुलशन था ये दुनिया इसको बर्बाद नहीं करते बचाते सजाते और सब पाने से अच्छा था कुछ दे कर जाते। 
 
 Money Quotes in Hindi: मैं पैसा हूँ - Afroj.In

जुलाई 15, 2021

कल्याणकारी मोदीमंत्र ( नवीनतम अध्याय ) डॉ लोक सेतिया

   कल्याणकारी मोदीमंत्र ( नवीनतम अध्याय ) डॉ लोक सेतिया 

आखिर मैंने उनको मना ही लिया उनके शिखर तक पहुंचने के निराले ढंग अजब तौर तरीके और अचूक निशाने पर लगने वाले रहस्यमयी बाणों का भेद खोलने को जनहित विश्वकल्याण की दुहाई देकर। आपको यहां तलक पहुंचने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योगदान किस का रहा है पहले ये सवाल करना लाज़मी था। क्या जनता का संपर्क संगठन का भरोसा या दल का समर्थन इसके लिए पहली सीढ़ी साबित हुआ। ताली बजाते हुए हंस कर कहने लगे इतना भी नहीं जानते हर कामयाब व्यक्ति के पीछे किसी महिला का हाथ होना लाज़मी है। मेरी धर्मपत्नी अगर चाहती तो मुझे अपने बंधन से मुक्त नहीं होने देती और मैं दाल रोटी कपड़ा मकान घर का सामान जमा करने में भटकता रहता। लेकिन उस महान आदर्शवादी नारी ने मुझे किसी झंझट में नहीं डाला मुझ पर गुज़ारा मांगने तक को मुकदमा नहीं किया। सोचो अगर अलग अलग रहने से विवाह बंधन से छुटकारा पाने को पंचायत का अथवा अदालत का दरवाज़ा खटखटाती तो मैं जितने साल खैरात मांग कर गुज़र बसर करता रहा इन चक्करों में फंसकर ज़िंदगी बिताने को मज़बूर हो सकता था। आज भी मेरे शासक बनने के बाद उस औरत ने कभी अपना अधिकार नहीं चाहा है जो कानून संविधान भी उसको इनकार नहीं कर सकता है। बात पते की लगी तो मैंने कहा किसी महीने मन की बात करते रेडियो पर उनका धन्यवाद या आभार ही जता देना उचित था किया नहीं किसलिए। उन्होंने कहा ये पति - पत्नी का आपसी मामला है इसको राजनीतिक चर्चा से अलग रखना चाहिए। 
 
ठीक है जैसा आपकी मर्ज़ी मगर आपके कितने मंत्र आये-दिन सुनते हैं कुछ ख़ास ऐसे सभी की भलाई के लिए बताओ। उन्होंने कहा मुझे जानवरों से बड़ा लगाव है प्यार है उनसे सीखने को बहुत मिलता है। बिल्ली और कुत्ता दो जीव हैं जिनको लोग पालते हैं मगर उनका सवभाव अलग अलग है सोच बिल्कुल उल्टी है। कुत्ते को कोई खिलाता पिलाता है रहने को जगह देता है उसको आराम से सोने को बिस्तर कपड़े देता है तब कुत्ता समझता है ये मेरा भगवान है मुझे सब देता है। इसलिए अपने पालने वाले के पांव चूमता है दुम हिलाकर उपकार मानने का इज़हार करता है। लेकिन यही सब बिल्ली को मिलता है तो उसको लगता है मैं भगवान हूं तभी ये मुझे खुश करने को रात दिन कोशिश करता है। बिल्ली जो मिलता है उसको अधिकार समझती है और कुत्ता उसी को उपकार समझता है। सियासत में ये दोनों महत्वपूर्ण सबक सिखलाते हैं। कुत्ते को हड्डी खिलाते हैं बिल्ली से दूध को बचाते हैं छिपाते हैं मुश्किल खड़ी तब होती है जब चूहे बिल्ली कुत्ते शेर दोस्ती निभाते हैं। ऐसा होता है जब चुनाव करीब आते हैं। लोमड़ी को सरे गुर आते हैं गिरगिट भी रंग बदलने में पीछे रह जाते हैं हम राजनेता मगरमच्छ हैं चबाते नहीं निगल जाते हैं लोग हमको बार बार आज़माते हैं। धोखा खाते हैं पछताते हैं सब सम्मोहित करने वाले मंत्र बस मुझी को आते हैं। असली बात आपको समझाते हैं बात कहते हैं बात से मुकर जाते हैं अच्छे दिन लाने की बात थी जानते हैं कैसे कैसे हालात दिखलाते हैं। किया जो जो छुपाते हैं जो कर नहीं सकते उसके सपने दिखलाते हैं बिना कुछ भी करे कर दिया का शोर मचाते हैं जब लोग समझने लगते हैं उनको भारतमाता की जय देशभक्ति जैसे नारों से उलझाते हैं हारी बाज़ी को जीतने वाले बाज़ीगर कहलाते हैं।

जुलाई 09, 2021

दर्शक ताली बजाओ मदारी बंदर नचाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

इक बस वही खिलाड़ी सब अनाड़ी ( सत्ता की बाज़ी ) डॉ लोक सेतिया 

ये उनकी राजनीति है उनके लिए खेल बदलते हैं मैदान बदल जाते हैं मगर मर्ज़ी उनकी रहती है। धर्मराज जुए में सब को दांव पर लगाते हैं हर बाज़ी हार जाते हैं फिर भी सच्चे अच्छे कहलाते हैं। उनके हाथ देश की बागडोर है सारी की सारी दुनिया चोर है उनकी बात और है दिल पर भला चलता किस का ज़ोर है। मन की बात करते हैं झूठ कहते हैं सब उनका झूठ सबसे बड़ा सच कहलाता है रोज़ बात से मुकरते हैं। आपको कुछ समझ नहीं आ रहा है कोई आपको देशभक्ति का सबक पढ़ा रहा है अपनी धुन में कोई दरवेश भजन सुनाता चला जा रहा है मधुर स्वर सुन कितना मज़ा आ रहा है। खुले आकाश से राजदरबार तक किसी मॉल से मल्टीप्लेक्स और थियेटर तक उसका तमाशा है आपकी हर निराशा उसकी बन जाती आशा है आदमी नहीं है इक बताशा है मिलने की आशा है। उसके हाथ हज़ार हैं सारी दुनिया में उसके यार हैं किस लिए लोग बेज़ार हैं। बर्बादी के जितने भी आसार हैं उनकी सत्ता के सभी अचूक हथियार हैं। अपनी अपनी कहानी है बिल्ली शेर की नानी है जनता की नादानी है जिसने बदहाल किया उसकी भी समझी मेहरबानी है। चलो इस किताब को खोलते हैं खामोश अल्फ़ाज़ कभी बहुत कुछ बोलते हैं राज़ की बात खोलते हैं उनको सच के तराज़ू में तोलते हैं। जिनकी शोहरत के चर्चे हैं आमदनी से बढ़कर जिनके खर्चे हैं उन का क्या क्या हिसाब है लिखा बही खाता में सौ खून माफ़ है। हर अध्याय मुक़्क़मल है समझना चाहो तो कोई नहीं मुश्किल है। 
 
पहला अध्याय। मैं आज़ाद हूं। अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्म है पर्दे से असलियत में कर दिखाया है किसी संपादक ने झूठा किरदार बनाकर अपनी कल्पना से सभी पाठकवर्ग को उल्लू बनाया है। रोज़ जिस नाम से कॉलम पढ़वाया है कोई नहीं बस इक साया है अचानक कोई भूखा बेबस नज़र आया है जिसने सड़क से फेंका झूठा सेब चुपके से उठाया है। उसकी मज़बूरी का फायदा उठाया है खूब खिलाया है और पैसे देकर झूठ बोलने का अनुबंध करवाया है। मैं आज़ाद हूं , सबसे दावा कर अमिताभ बच्चन से मिलवाया है। किरदार अभी तक सदी के महानायक निभाते हैं हर फिल्म में झूठा किरदार शिद्दत से निभाते हैं मालामाल होते जाते हैं। आपको करोड़पति बनने की राह दिखाते हैं खेल खेल में पैसा बनाते हैं समझदारी उसको बतलाते हैं। आजकल कितने लोग आपको जुआ खेलने को ललचाते हैं टीवी पर खेलो और जीतो विज्ञापन में उल्टी पट्टी पढ़ाते हैं ये गुमराह करने वाले नायक समझे जाते हैं। 
 
सबसे बड़ा खिलाडी। अध्याय दो। खोटा सिक्का उसने चलाया है कुछ भी नहीं आता फिर भी सब में हाथ आज़माया है। कभी शतरंज की बिसात बिछाई है जनता मोहरे हैं बादशाह की मौज मस्ती है सत्ता की खुमारी छाई है। हर कोई दुश्मन है हर कोई भाई है बस उसकी मुहब्बत और जंग की लड़ाई है जिस में सब जायज़ है कौन सच्चा आशिक़ कौन हरजाई है। चाल उसकी है मात खाई है मगर क्या लाजवाब की चतुराई है उसने बिसात पलटी है हारी बाज़ी जिताई है। अब कोई खेल नया खेलेगा ताश की बाज़ी में हार जाएगा पुलिस बनकर वापस ले लेगा। उसने ताश के पत्तों का महल बनाया है बस हवा का झौंका कहीं से आया है बिखर गए सभी पत्ते हैं। अभी नहीं समझे बड़े कच्चे हैं उनके सामने बूढ़े भी बच्चे हैं। सरकार कोहलू के बैल जैसी है चलती रहती है अपने दायरे में नहीं किसी मंज़िल पर पहुंचती है उसकी आंखों पर बंधी खुदगर्ज़ी की पट्टी है। खराब है मगर अपनी महबूबा है ज़ुल्म ढाये फिर भी प्यार आता है उनको करना हर वार आता है उनकी सूरत पे प्यार आता है। शोहरत की बुलंदी की बात मत पूछो हर घड़ी इश्तिहार आता है। उनको नींद नहीं आती है खबर उनको सच्ची नहीं भाती है उनकी शोहरत घटती जाती है जान जाती है रूह थरथराती है। 
 
        (  अभी जारी है किताब का अगला अध्याय अगली पोस्ट पर। )
 

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जुलाई 07, 2021

तस्वीर तेरी दिल में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       तस्वीर तेरी दिल में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आशिक़ आशिक़ होते हैं महबूबा की तस्वीर दिल में छुपा कर रखते थे कभी ज़माना था। किसी शायर ने कहा था कुछ हसीनों के खतूत कुछ तस्वीरें बुताँ बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला। अब उनको क्या मालूम था कितनी हैं अब तलक और कितनी अभी और बनानी हैं। बड़े दिलवाले लोग मुहब्बत बांटने में किफ़ायत नहीं किया करते हैं। आधुनिक युग है आशिक़ी का रोग छोटी उम्र में लग जाता है शायद कोई बचना चाहता है कोई नहीं बच पाता है। सोशल मीडिया ने झूठी मुहब्बत की कितनी कहानियां बनाई बिगाड़ी हैं फेसबुक पर बाज़ार सजा हुआ है सच्ची मुहब्बत की झूठी तस्वीरों का। किसी सिरफिरे ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर बंदे ने फेसबुक पर इक पेज बना डाला है सब पेज लाइक करने वालों को जिस किसी से मुहब्बत हुई उसकी बात तस्वीर के साथ शेयर करने को कहा है। खुद को बदनसीब बताया है क्योंकि उनकी ज़िंदगी में जो भी मिलती रहीं उनकी तस्वीर पास नहीं है लिखते हैं तस्वीर तेरी दिल में बसाई है। कोई वक़्त था लड़के अपने ख़ाली बटुए में तस्वीर रखते थे बस तस्वीर से बात करते थे उसको कहने से डरते थे। वहीं से कुछ टुकड़े आशिक़ों के दिल के बिखरे पड़े हैं लाया हूं आपको दिखाने को क्या ज़रूरी है हर मुहब्बत की अमर कहानी कोई लिखे जाने कितने बेनाम अनजान बदनाम आशिक़ सच्चे नहीं झूठे ही सही दुनिया में हुए हैं। इधर शायरी लिखने वालों ने खूबसूरत तस्वीर साथ लगाई है मिलती बधाई है। आपने अपनी कहानी क्या किसी को बताई है तौबा तौबा ये प्यार की रुसवाई है , देखा कोई पढ़ कर लज्जाई शर्माई है। 
 
     बचपन की मुहब्बत को दिल से न भुला देना , पोस्ट पर तस्वीर गुलाब के फूल की नहीं किसी भंवरे की लगाई है। समझ नहीं आई बात इतनी साफ समझाई है भंवरा बड़ा नादान रे , बगियन का महमान रे , फिर भी जाने ना जाने ना जाने ना कलियन की मुस्कान रे। किसी लड़की की फेसबुक वाले लड़के ने किसी की तस्वीर फेसबुक से लेकर उसकी तस्वीरों का गुलदस्ता बनाकर क्या कमाल किया है। बस जिसकी तस्वीर है उसी को नहीं पता कौन है उसने कि इसने ब्लॉक किया है। सोनम बेवफ़ा नहीं है किस्सा भूला नहीं है हर कोई उसकी गवाही देता था , सोनम ने अपनी बात लिखी है बस यही बताया है नाम पर मत जाना असली नहीं है बाकी सब सच है। सबसे लाजवाब बात इक महिला ने लिखी है जिस से सच्चा प्यार हुआ कभी इकरार नहीं इज़हार नहीं किया उसके लिए ज़िंदगी भर घर-बार नहीं किया उसके नहीं रहने पर उसकी नाम की माला जपती है खुद को मीरा कहती है राधा कहती है। जिस देश में गंगा बहती है कितनी फ़िल्मी कहानियां कितनी नायक नायिकाओं के किस्से लिखे हुए हैं। साहिर की बात से लेकर रेखा हेमा की कितनी कहानियां पढ़ कर लगता है मुहब्बत का तमाशा किसी मेले की नौटंकी में दिखाया जा रहा है। 
 
  सबसे बड़ी सच्ची मुहब्बत रूहानी होती है किसी ने ख़ुदा से ऊपरवाले से इश्क़ की कहानी लिखी है। पढ़कर किसी ने वीडियो बना डाला है कोई बादशाह किसी को खुले आसमान के नीचे मिट्टी से खेलते देख सोचता है इस के पास घर नहीं पहनने को कपड़े नहीं खाने को कुछ नहीं है। उस से कहता है मेरे साथ मेरे महल में चलकर रहो आपको सब मिलेगा जो भी मांगोगे। क्या मेरी चार शर्त मानोगे मुझे साथ ले जाना चाहते हो तो बताओ। बादशाह ने कहा कोई मुश्किल नहीं मेरे लिए बोलो क्या क्या शर्त है। उसने कहा मुझे सब खाने को देना मगर खुद आपको कुछ भी नहीं खाना पहली शर्त है , बादशाह ने कहा ये छोड़ और क्या है शर्त बताओ। उसने कहा मुझे शानदार लिबास पहनने को देना खुद नहीं पहनना , तीसरी शर्त मुझे चैन से सोने देना खुद कभी नहीं सोना होगा , और चौथी शर्त है मुझे छोड़कर कभी इक पल भी कहीं नहीं जाना। बादशाह बोले आप ही बताओ कोई भी ऐसा कैसे कर सकता है। मुझे अपने राज का सब कुछ कामकाज करना है कैसे कर सकता हूं।  उसने बताया मेरा ईश्वर ये सब करता है मुझे खिलाता है खुद कुछ नहीं खाता है। मुझे पहनने को कपड़े देता है खुद नहीं पहनता , मैं सोता रहता वो कभी नहीं सोता है , कभी भी मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाता। फिर भी उसका कामकाज उसका दुनिया का सब काम नियमित होता रहता है दिन रात हवा पानी मौसम कुदरत सभी रुकते नहीं हैं। सोचना आपको किसी तस्वीर की ज़रूरत नहीं होगी कोई ईमारत कोई मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरजाघर ज़रूरी नहीं उस से मुहब्बत सबसे सच्ची मुहब्बत है। माला फेरना गिनती करते रहना जैसे कर्म की अहमियत नहीं है। 
 
बसाना ही है तो रूह में बसा मुझको - HindiLoveShayari.CoM

जुलाई 04, 2021

ज़िंदा हैं मर कर भी लोग ( ग़ज़ब की बात ) डॉ लोक सेतिया

  ज़िंदा हैं मर कर भी लोग ( ग़ज़ब की बात ) डॉ लोक सेतिया 

बड़े बड़े दार्शनिक बड़े बड़े संत महात्मा आदर्शवादी समाज सुधारक समझाते रहे मर के भी अमर अजर होने को अच्छे अच्छे कर्म करने चाहिएं अच्छाई सच्चाई की राह चलना चाहिए मगर हम ज़िंदा होकर भी मरे जैसे बेज़मीर लोग बन कर सालों की गिनती बढ़ाते रहे। वास्तव में जीना ऐसा था बल्कि है जीते हैं जैसे कोई चलती फिरती लाश हैं। वास्तविक जीवन कठिन लगता है तभी हमने इक झूठा सपने जैसा जीवन जीना सीख लिया है व्हाट्सएप्प  फेसबुक पर ज़िंदा हैं कुछ लोग दुनिया से अलविदा होने के बाद भी और हमने देखा कुछ दिन बंद किया सोशल मीडिया पर खाता तो लोग समझने लगे जाने ज़िंदा भी हैं कि नहीं। यही ग़ज़ब की बात है आपकी ज़िंदगी की खबर से महत्वपूर्ण लगती है मौत की खबर। दोस्त तो दोस्त दुश्मन भी चाहते हैं तारीफ़ करना फूल चढ़ाना भूलकर दिल की रंजिशें। कभी कभी समझते हैं चार दिन की ज़िंदगी हज़ार झगड़े झमेले किसलिए काश हंसते बोलते मिलते प्यार मुहब्बत की दास्तां बनते। स्वर्ग जैसी लगती है ये काल्पनिक सोशल मीडिया की नकली दुनिया जिस में सभी कुछ है और सबके लिए है शुभकामनाएं भगवान की भक्ति से लेकर आपको मार्गदर्शन देने वाली बातें कथाएं कहानियां। लगता है किसी को किसी से कोई बैर नफरत जलन नहीं है हर कोई सबकी भलाई अच्छाई की चाहत रखता है। 
 
  वास्तविक ज़िंदगी में आपने क्या किया क्यों किया उसका हिसाब कहीं कोई नहीं लिखता है लेकिन अपने सोशल मीडिया पर खूब अपना सिक्का जमाया है सबको वही सच लगता है। समस्या विकट है हम लाख कोशिश कर असली ज़िंदगी में उस तरह बन नहीं सकते हैं। जानते हैं ये सब बेकार किताबी बातें हैं और किताबों को पढ़ना नहीं उनको अलमारी में सजाकर रखते हैं कोई दिन होता है जिस दिन उनको झाड़ पौंछ कर माथा टेकते हैं। जब हमने मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे को भी घंटा बजाने माथा टेकने मोमबत्ती जलाने आरती अरदास पूजा ईबादत करने की जगह समझ लिया है चिंतन मनन करने की जगह कोई नहीं सिर्फ रटी रटाई बात वही औपचारिकता निभाते हैं हर दिन ऐसे में सोशल मीडिया की बातों का असर ख़ाक होगा। शायद हमने स्वर्ग तलाश कर लिया है अनजाने में जन्नत का सुख अनुभव करते हैं परियां हैं बहार है कितनी रौशनी है। लेकिन हम किसी गहरी नींद में सोये हुए दिलकश ख़्वाब देखते रहते हैं नींद खुलने से डरते हैं कहीं हक़ीक़त सामने आकर खड़ी नहीं हो जाए। चिट्ठी नहीं आती मगर संदेश आते हैं स्वर्ग की दुनिया है स्मार्ट फोन की हमारी दुनिया जिस में सांसों की नहीं इंटरनेट डॉटा की ज़रूरत पड़ती है। क्षण भर में जान मुश्किल में पड़ जाती है। सोशल मीडिया की ज़िंदगी में हमसे असली जीने का मज़ा छीन लिया है बात इतनी नहीं हमने अपनी झूठी पहचान बनाने में असली पहचान खो दी है। दुनिया क्या हम खुद से भी अजनबी हैं अपने चेहरे को देखते हैं तो लगता है आईने में कोई और अक्स है हमारी कितनी खूबसूरत डीपी है।
 

 


जुलाई 03, 2021

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ( ज़फ़र से जारी है सफ़र ) डॉ लोक सेतिया

 बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ( ज़फ़र से जारी सफ़र ) 

                                       डॉ लोक सेतिया

जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी। बादशाह होकर भी उनकी मुश्किल वही थी और सदियों बाद हमारी भी हालत उन से बढ़कर कठिन है। दुष्यंत कुमार को भी बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार। ये कोई सरकारी फ़रमान की ही बात नहीं है घोषित आपात्काल की बात भी नहीं हालात समाज के ऐसे बन गए हैं कि शोर मचाने की छूट है हर कोई बंद कमरे में बैठा सोशल मीडिया पर भड़ास निकाल सकता है घर की चौखट लांघते ही सोच विचार कर मुंह खोलना होता है। बात किसी अपने से करनी हो या जान पहचान वाले से अथवा अनजान अजनबी से कहने से पहले समझना ज़रूरी है किसको क्या सुनना है बस जिसको जो अच्छा लगता है आपको उस से वही कहना हैं नहीं तो चुप रहना सब सहना है। इस दौर में ख़ामोशी सबसे बड़ा गहना है ज़ालिम को मसीहा क़ातिल को ख़ुदा कहना है उनकी दुनिया में जीना मौत से दुश्वार है। हर कोई लाचार है बंदा गुनहगार है सरकार खुद बेज़ार है इश्तिहार ही इश्तिहार है। राजाओं की सभाओं से धर्म की चर्चाओं में कभी वाद-विवाद होते थे चर्चा में अपने विचार से बात मनवाई जाती थी सच कहना जुर्म नहीं था कोई आफ़त नहीं ढाई जाती थी तीर तलवार मैदान-ए -जंग में चलाई जाती थी। महफ़िल में इक शमां जलाई जाती थी अपनी कही सबकी सुनी समझी और समझाई जाती थी।  
 
मन की बात का ढिंढोरा नहीं पीटा जाता है मन की बात दुनिया से नहीं होती है शोर करना उलझन की बात होती है। राजा बोला रात है रानी बोली रात है , मंत्री बोला रात है सन्तरी बोला रात है , ये सुबह-सुबह की बात है। इधर काली अंधियारी रात को दिन का उजाला कहना है  बस्ती में रहना है तो झूठ को सच कहना है। दोस्तों से फ़ासिले हो गए हैं ख़त्म सब सिलसिले हो गए हैं , आवाज़ गुम हो गई है लब हिले कुछ सिले हो गए हैं। खुद से मुलाक़ात नहीं होती ज़माने के शिकवे गिले हो गए हैं। किसी से दोस्त से पत्नी से भाई बहन खास रिश्ते से उसकी नापसंद बात करना आपसी संबंध को बिगाड़ना है। मीठा खाना सब चाहते हैं मधुमेय की चिंता छोड़ कर झूठी तारीफ भाती है सच सुनते नातों में कड़वाहट भर जाती है यूं अदब से हंसकर मिलते हैं मन में नफरत का ज़हर छुपाए रखते हैं। मुझे आप जैसे लोग पसंद हैं कहते हैं हम आपके दिल में रहते हैं मौका मिलते ही ऊंचे महल ढहते हैं कहने वाले कहते हैं दुनिया के दस्तूर निराले हैं भीतर अंधेरे बाहर उजाले हैं। आज सवाल करते हैं कड़वा सच किसलिए बोलते हैं क्यों सच के तराज़ू पर सभी को तोलते हैं। इक दिन खोलेंगे लबों को भरी सभा में कहेंगे कहां चले गए वो जो वक़्त पर बोलते हैं।
 

 
 
 
 
 
 

जुलाई 02, 2021

बड़ा नामुराद सोशल मीडिया रोग ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

 बड़ा नामुराद सोशल मीडिया रोग ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

ये ऐसा मीठा मीठा दर्द है जो हर किसी को अच्छा लगता है पहले , उसके बाद धीरे धीरे मज़ा आने लगता है आखिर लगता है ये मुसीबत बन गया है मगर तब तक नशा बन चुका होता है छोड़ना चाहते हैं छोड़ नहीं पाते हैं। कोई इस से बचा नहीं इंसान से बेजान सरकार तक उलझे हैं फेसबुक व्हाटऍप्स के मायाजाल में। सब से दुनिया भगवान रिश्तों से मोहभंग हो सकता है मुआ यही इक है जिस बिन जीना मुहाल लगता है फरिश्तों की दुनिया है बाकी सब जी का जंजाल लगता है। इंटरनेट नहीं हो डाटा खत्म हो मत पूछो जीने मरने का सवाल लगता है। मैंने ज़िंदगी के दस साल खुद को गंवाया है अब जाकर समझ आया है खोया ही हैं समय बर्बाद किया है नहीं कुछ भी पाया है। एक बार नहीं सौ बार आज़माया है। जिधर देखते हैं बढ़ता जाता ये शाम का साया है हर किसी ने सोच समझ का दीपक खुद ही बुझाया है ये घना अंधियारा हर किसी को बहुत भाया है। सबने औरों को सब कुछ समझाया है कभी किसी को समझ नहीं आया है दवा जानकर मीठा ज़हर खाया है। आपको अपनी कहानी बताते हैं इस दुनिया की तस्वीर बनाते हैं भगवान से बाज़ार तक यहीं मिलते हैं ये कुछ नहीं सिर्फ इक फैला हुआ रेगिस्तान है जिस में कभी गुलशन नहीं खिलते हैं। आज मंच पर आते हैं हर पर्दा उठाते हैं सच और झूठ दोनों को आमने सामने बिठाते हैं फिर दर्द की दास्तां सुनते हैं मगर उदास नहीं होते हैं ख़ुशी जताते हैं हंसते गाते मुस्कुराते हैं ये दिखावे की दुनिया है डीपी खूबसूरत चुनकर लगाते हैं। 
 
आपको हर शख़्स ऑनलाइन दिखाई देता है पढ़ता है जाने कैसी उल्टी सीधी पढ़ाई राज़ कोई नहीं जानता दोस्त दुश्मन भाई भाई दिखाई देता है। मिलते नहीं बात करते नहीं गली से जिनकी गुज़रते नहीं उनको सुबह शाम शुभकामना संदेश भेजते हैं। मुझे बड़े अच्छे सच्चे लगते हैं कुछ लोग हिम्मत वाले जो मुझे पसंद नहीं करते ब्लॉक कर देते हैं अपने दिल की हसरत का पता देते हैं मेरे बारे जो अफ़वाह उड़ा देते हैं ये अल्फ़ाज़ बड़े शायर से उधार लिए हैं ज़रूरी है साफ बता देते हैं। सोशल मीडिया पर सरकार चलती है कितनी बेकार हो तब भी शानदार चलती है झौंपड़ी महल दिखाई देती है अंधों की नगरी काना राजा है जम्हूरियत लंगड़ी लूली है बैसाखियों की महिमा हर बार चलती है। कुदरत की नहीं है किसी और की माया है कुछ भी मिला नहीं किसी को सभी ने खुद को गंवाया है जिस दिन से पड़ा ये मनहूस साया है इक पागलपन सभी पर छाया है समझ कोई नहीं असलियत को पाया है। 
 
   पढ़ता सुनता कोई भी नहीं है समझता सच्चाई कोई भी नहीं है गरीब की जोरू सबकी भाभी है बहन कोई नहीं भरजाई किस की कौन है नहीं मालूम किस घर मातम किस घर बजती शहनाई सोचता हरजाई कोई भी नहीं। माता पिता का निधन सोशल मीडिया पर बता रहे हैं जैसे मौत का जश्न मना रहे हैं लाइक देखते हैं कमेंट पढ़ कर जवाब देते हैं कुछ इस तरह दुनियादारी निभाते हैं सारा हिसाब देते हैं। भगवान परेशान हैं क्या हाल किया है भक्तों ने बिना सोचे समझे कोई टकसाल किया है अंधभक्तों ने। इंसान कितने ख़ुदा बन गए है ईमान बेचकर दौलत बनाई है मत पूछो किसी कैसी कमाई है उस तरफ कुंवा इस तरफ गहरी खाई है सबने अपनी रफ़्तार बढ़ाई है। इंसानियत बच नहीं पाई है लाश उसकी हर किसी ने सजाई है। फेसबुक व्हट्सएप्प दोस्ती बढ़ाएंगे दावा झूठा है नफरत बढ़ाई है इक दीवार रिश्तों में खड़ी की है कोई उसका चाहने वाला कोई इसका चाहने वाला दो चोरों ने राजनीति में क्या आग लगाई है। आपसी कोई मतभेद नहीं है दिखाई देता बस छेद नहीं है राजनेता मिल बैठेंगे अवसर मिलते ही हम लड़ते रहेंगे मिलने का कोई अनुछेद नहीं है। लगता हैं हम गुलाम हैं आज़ाद नहीं हैं ख्यालात नहीं कोई जज़्बात नहीं हैं जिनको मसीहा बना लिया सभी ने वास्तव में उनकी कोई औकात नहीं है नेताओं की कोई धर्म जात नहीं है ये बदल हैं जिनकी होती बरसात नहीं है। 
 

                           समीक्षा की बात : - 

काश जितना समय इस सोशल मीडिया पर बर्बाद किया कोई सार्थक कार्य किया होता तो बहुत अच्छा हो सकता था। मैंने इस से पीछा छुड़ाने का संकल्प लिया है आपको क्या लगता है क्या सही क्या ग़लत आपकी मर्ज़ी है।

 
 
 
 
WhatsApp privacy backlash: Facebook angers users by harvesting their data |  Facebook | The Guardian

जून 28, 2021

खोखले आदर्श झूठी संवेदनाएं ( आधुनिक समाज ) डॉ लोक सेतिया

  खोखले आदर्श झूठी संवेदनाएं ( आधुनिक समाज ) डॉ लोक सेतिया

आंसू बहाना रो देना वास्तव में कायरता नहीं होता है मगर तब जब हमारी भावनाएं सच्ची हों जो पल भर को नहीं हमेशा स्वभाव में नज़र आएं। बार बार देखते हैं टीवी शो में किसी की दुःख भरी घटना सबकी पलकें भिगो देती है तथाकथित नाम वाले लोग मंच पर टिशू पेपर से अपने आंसू पौंछते हैं लगता है सारे जहां का दर्द हमारे सीने में है। मगर ऐसा वास्तविक जीवन में होता नहीं है हम वही दर्शक बेहद निष्ठुर बन जाते है अपने करीब कुछ भी घटता देखते हुए। और टीवी पर किसी को झट से लाख रूपये का चैक देने वाले किसी गरीब को मांगने पर भीख भी नहीं देते है। जनाब आर पी महृषि जी कहते हैं " ये हादिसा भी हुआ इक फाकाकश के साथ , लताड़ उसको मिली भीख मांगने के लिए। अजीब बात है असली भिखारी नहीं मिलते नकली भिखारी हर तरफ दिखाई देते हैं कौन किस किस बात का चंदा मांगता है और चंदे से क्या शान से रहता है कोई हिसाब नहीं है। भिखारी हैं जो नौकरी काम करने का वेतन सुविधाएं पाने के बाद रिश्वत और बेईमानी करते हैं देश समाज अपने कर्तव्य के साथ। लेकिन धर्म का चोला पहन मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाकर भगवान तक को अपने पाप का भागीदार बनाते हैं अमर अकबर ऍंथोनी के अमिताभ बच्चन की तरह लूट चोरी का आधा दान पेटी में डालकर खुद को मसीहा समझते हैं। 
 
दावे करते हैं सत्ताधारी राजनेता जनता का कल्याण और गरीबी मिटाने को लेकर जबकि आज़ादी के 74 साल होने को हैं और आधी आबादी भूखी है अधिकांश को बुनियादी सुविधाएं नहीं हासिल हैं। कारण ये नहीं कि देश के पास संसाधन नहीं हैं बल्कि वास्तविक कारण ये है कि कुछ लोगों को अधिक पाने की हसरतें खत्म ही नहीं होती है शासक वर्ग रईस लोग धनवान कारोबारी उद्योगपति फिल्म टीवी वाले टीवी चैनल अख़बार से समाज सेवा और धर्म की दुकान चलाने वाले महल बनाने और देश विदेश जाकर अपना डंका पीटने पर पैसा बर्बाद करते हैं। इक पागलपन है नाम शोहरत और किसी तरह इतिहास में ख़ास होने को दर्ज होने को। सरकार आलीशान भवन सभागार और ऊंची मूर्तियां जाने क्या क्या आडंबर करती है फिर भी सड़क पर सोशल मीडिया पर इश्तिहार छपवाने पर बेतहाशा धन खर्च किया जाता है खुद के गुणगान पर। असल में अच्छे कार्य करते तो इनकी ज़रूरत नहीं पड़ती वास्तव में शोहरत पाने को इन बातों की कोशिश करना खुद किसी अपराध से कम नहीं है। 
 
लोग समझते हैं अमुक नेताओं ने अधिकारी कलाकार खिलाडी धनवान लोगों ने देश समाज को दिया है जबकि सच इस के विपरीत है उन्होंने जनता से पाया है और केवल दिखाने को नाम भर को वापस जनता को देकर उपकार एहसान करने की बात कहकर अपराध किया है। आपको बड़ी बड़ी कथाओं कहानियों से सबक सिखलाने वालों ने खुद कोई सबक सच्चाई ईमानदारी का सीखा नहीं है अन्यथा अपने लिए नहीं देश के नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने को काम करते। जिन को लाखों करोड़ के शाही विमान और शानदार घर दफ्तर की चाहत है उनको गरीब जनता की भूख रोटी शिक्षा स्वास्थ्य की चिंता करनी चाहिए थी। ये सब राजा बने बैठे हैं कोई राजा नहीं हैं सेवक हैं खुद कहते थे चौकीदार हैं फिर मालिक बन बैठे किस तरह। चलो आपको फिर इक बार असली और नकली धर्म दान की पहचान करवाते हैं। रहीम का नाम सुना तो होगा , कवि के साथ साथ खानदानी नवाब थे जिनको ज़रूरत होती उनकी सहायता किया करते थे। उनकी सभा में इक कवि गंगभाट देखा करते कि रहीम सहायता देते समय अपनी आंखों को झुकाए रहते थे। उनको समझ नहीं आता था नवाब जी ऐसा क्या सोचकर करते हैं। इक दिन उन्होंने दोहा पढ़कर ये बात रहीम से पूछ ली। 

सिखियो कहां नवाब-जू , ऐसी देनी दैन 

ज्यों ज्यों कर ऊंचों करें , त्यों त्यों नीचे नैन। 

रहीम ने उनके सवाल का जवाब अपना दोहा पढ़कर दिया। 

देनहार कोऊ और है , देत रहत दिन रैन 

लोग भरम मो पै करें , या ते नीचे नैन।

 

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जून 24, 2021

ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड चर्चा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड चर्चा ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आपने मंच पर नाटक में जैसा देखा होगा बस ठीक उसी तरह कहीं आसमान या जाने कोई और लोक है वहां सभी धर्म वाले भगवान मिलकर चर्चा कर रहे हैं। एक ही अभिनेता अपना किरदार बदल कभी कुछ कभी कुछ बन जाता है दर्शक समझते हैं कब नायक किस किरदार को निभा रहा है। दुनिया के मंच पर हम सभी भी ज़िंदगी और जीने का अभिनय ही करते हैं शायद खुद अपने किरदार को कभी नहीं समझते कोशिश करते रहते हैं हर किसी को समझने की। समझदारी कहते हैं अपने पागलपन को। समझ नहीं आया तो चलो दर्शक की तरह मंच पर जारी चर्चा विचार विमर्श को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इक धर्म का रूप धारण कर भगवान कह रहा है मैं एक हूं मेरे रंग मेरे चेहरे मेरे तौर तरीके अनेक हैं आज मुझे अपने हर अवतार को धारण कर चर्चा में सभी तरह के ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड बन कर सभी को लेकर बातचीत करनी है। पलक झपकते ही रूप बदल जाता है दूसरे धर्म वाला भगवान बन कहता है माफ़ करना बीच में टोकना पड़ा है पहले इस युग कलयुग की बात करनी है क्या कलयुग में कोई भगवान होता है कौन अवतार लेता है किस रूप में समझना कठिन है कितने भगवान बन बैठे हैं लेकिन किसी भी भगवान के मानने वालों को मिलता कुछ भी नहीं कोई भी तथाकथित भगवान भक्तों की झोली भरता नहीं है सबकी झोली खाली है भरी हुई झोली वाले अपने भगवान के दर पर आते हैं मगर जाते हैं लौट कर खाली झोली हाथ जोड़े निराश हमेशा। 
 
अचानक तीसरे धर्म वाले भगवान दिखाई देते हैं कहते हैं कलयुग में मसीहा पय्यम्बर नहीं जन्म लेता कभी भी। शैतान को भगवान ने ये वरदान दिया हुआ है कि लोग दुनिया कलयुग में उसको ही अपना विधाता भाग्यविधाता समझ उसका गुणगान करेंगे। भगवान बेबस होकर ये तमाशा देखते रहते हैं लोग सब जानकर देख कर समझ कर भी शैतान की अनुचित अनैतिक बातों को भी सही मानकर उसकी जयजयकार करते हैं। जिस जिस को मसीहा भगवान पय्यम्बर समझते हैं वही उनको ठगता है लूटता है धोखा देता है तब भी उसी की वंदना करते हैं। रोज़ टीवी चैनल वाले इस समय की माहमारी का कारण वायरस के नये नये अवतार की बात करते हैं भला कीटाणु विषाणु के भी कभी अवतार होते हैं मगर देखो हर कोई भगवान से बढ़कर कोरोना के नाम की माला जपता है। जिसकी माला जपते हैं उस से ही बचना भी चाहते हैं। फ़िल्मी लगता है ख़लनायक को खुश करने को उसकी महिमा का गुणगान करते हैं। 
 
किसी अभिनेता को सदी का महानायक नाम दिया है किसी को धन दौलत का अंबार लगाने पर उसकी बढ़ाई करते हैं टीवी अख़बार वाले खुद को सबसे महान सच्चा बताकर उल्लू बनाते हैं। ये सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं मिलकर बांटकर खाते मौज मनाते हैं झूठ का दरबार लगाकर सच के पैरोकार कहलाते हैं। मापदंड इनके सुविधा से बदल जाते हैं जिसको गुंडा बदमाश कहते हैं उसी की हाज़िरी लगाते हैं उसके पांव दबाते हैं। भोगी लोभी योग सिखाते हैं खूब धन कमाते हैं जनता को रोगमुक्त होने के उपाय समझते मगर खुद दवा की दुकान चलाते हैं। समझ नहीं आता क्या किसको समझाते हैं खुद को सच्चा और बाकी सभी को झूठा बताते हैं इस तरह खोटा सिक्का अपना दुनिया भर में चलाते हैं। ऐसे लोग भिखारी से जाने कैसे शासक बन जाते हैं देश को विकास और भले वक़्त की बातों से बहलाते हैं मगर वास्तव में सत्यानाश विनाश और बर्बादी लेकर आते हैं। कलयुग में हंस दाना दुनका चुगता है कौवे मोती खाते हैं। जनता की झौपड़ी भी नहीं रहती और सरकार जनाब आलिशान घर महल दफ्तर बनवाते हैं। मंच पर कोई नहीं है नेपथ्य से आवाज़ आने लगी है भगवान को गहरी नींद आ गई है उसको नहीं जगाते लोरी गाकर सुलाते हैं। आखिर में इक फ़िल्मी भजन से कथा का अंत कर विराम देते हैं और घर पर रहो सुरक्षित रहो दो गज़ की दूरी मास्क है ज़रूरी का संदेश सुनते हैं खामोश होकर नाटक के दर्शक अपने स्मार्ट फोन पर समय बिताते हैं। 
 

 

जून 14, 2021

ज़माने को बदलना चाहते ( अनसुलझी उलझन ) डॉ लोक सेतिया

 ज़माने को बदलना चाहते ( अनसुलझी उलझन ) डॉ लोक सेतिया 

मुमकिन है कोई अपना गांव शहर देश बदल किसी और जगह रहने लगे। मगर नामुमकिन है इस दुनिया ज़माने को बदलना सुबह शाम रात दिन बदलने से धरती आकाश नहीं बदलते हैं आपके चाहने से हालात नहीं बदलते हैं रिश्ते बनते बिगड़ते हैं दिल के जज़्बात नहीं बदलते हैं। इतिहास बदल जाते हैं नाम बदल जाते हैं नानक कबीर और सुकरात नहीं बदलते हैं। आदमी को अच्छा कुछ भी नहीं लगता सब कुछ बदलना चाहता है अपने आप को छोड़कर समस्या बाकी लोग सब दुनिया नहीं है आपका सोचने समझने का तरीका है जो आपको सबको उस तरह बनाना है जैसा आपको पसंद है। क्या क्या बदलोगे माता पिता भाई बहन दोस्त रिश्तेदार पति पत्नी पड़ोसी जान पहचान वाले गली मुहल्ले वाले कोई भी आपको मंज़ूर नहीं जो भी जैसा है और जब नहीं बदलते लोग आपकी ज़रूरत और चाहत से तब आप दुःखी परेशान चिंतित हो जाते हैं क्योंकि सभी अपनी नज़र से सबको देखते परखते हैं औरों के नज़रिये को कभी नहीं समझते हैं। हमारी उलझन हमारी खुद की मानसिकता है सिमित सोच है और हम समझते हैं जो हम जानते हैं सोचते हैं बस इक वही सही है संपूर्ण है। मगर हम सभी आधे अधूरे हैं बाकी सभी मिलते हैं तभी हमारी दुनिया पूर्ण होती है। अपने अपने खोखलेपन से घबराते हैं और भीतर से कमज़ोर बाहर से शक्तिशाली बनकर इतराते हैं। जीवन भर हम खुद से ही लड़ते लड़ते जीतने की उम्मीद में हारते जाते हैं हासिल कुछ नहीं होता है खुद को खो कर बाद में पछताते हैं। हम जागते हुए भी गहरी नींद में हैं खुद सोते हुए दुनिया भर को जगाते हैं। सबको जैसा है कोई स्वीकार करो बिना बदले अपनों को दिल से प्यार करो खत्म हर बहस हर तकरार करो। जीवन भर मत यही मेरे यार करो। 
 


 

जून 12, 2021

पशुओं से प्यार इंसान से तकरार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  पशुओं से प्यार इंसान से तकरार ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  न उनकी दोस्ती अच्छी न उनसे दुश्मनी अच्छी। जाने क्या सोचकर मनोविज्ञानिक उन पर शोध कर बैठे अब पछताते हैं क्या जुर्म बेलज्ज़त कर बैठे। चर्चा कर उनके आचार व्यवहार को समझ कर नतीजा निकला उनको खुद अपना इंसान होना अजीब लगता है। बाहर से इंसान लगते हैं अंदर जानवर नहीं शैतान और हैवान रहता है उनको खबर नहीं होती कब उनके भीतर कौन सा जानवर सामने निकलने को बेताब रहता है। कुत्ता बिल्ली चूहा सभी के गुण शामिल हैं लोमड़ी और गिरगिट उनके लिए उस्ताद हैं जबकि शेर होने की उनकी हसरत है गधों से उनका लगाव सबसे बढ़कर है तभी गधे को अपना पूर्वज समझने में उनको संकोच नहीं है। मांसाहारी हैं जानवर को उनकी पसंद का खाना खिलाते हैं खुद उनको ज़िंदा इंसान का लहू पीकर उसकी बोटी बोटी से हड्डियां तक चबाना बड़ा ही मज़ेदार लगता है। इंसान इंसानियत जैसे शब्द उनको ज़रा भी पसंद नहीं हैं खुद अपने आप को जब कभी आईने के सामने खड़ा कर देखते हैं उनको दर्पण में किसी आदमखोर जानवर की छवि नज़र आती है। पशुओं को पालना और अपने इशारों पर नचाना उनको खेल लगता है जिस खेल को खेलकर उनको अपार सुःख की अनुभूति होती है। उनको लगता है शहर गांव में बड़े बड़े मकानों में पशुओं को रहना चाहिए नर्म बिस्तर और गर्मी में ढंडी हवा और सर्दी में हीटर लगे कमरे उनके लिए होने ज़रूरी हैं इंसान को फुटपाथ भी नहीं मिलना चाहिए जंगल जाकर बसना चाहिए। 
 
उनको नहीं मालूम उनके अंदर का इंसान कब मरा पशुओं से प्यार होने से पहले या पशुओं से प्यार करते करते इंसान और इंसानियत को खुद क़त्ल किया उन्होंने। पर अब उनको इंसान देखना अच्छा नहीं लगता है जानवर उनको अपने लगते हैं इंसान किसी और दुनिया के वासी लगते हैं। हर जानवर पशु पक्षी को जैसा चाहे शिक्षित कर उनसे मनचाहा काम करवाना आता है इंसान को लाख कोशिश कर भी उस तरह का नहीं बना पाए जैसा उनको पसंद है। इंसान सवाल करते हैं तकरार करते हैं और उनको तकरार करने वाले बड़े खराब लगते हैं। ये उन्होंने पत्नियों से हुनर सीखा है अपने पतियों को अपना गुलाम बनाकर रखना और उन पर हुक्म चलाकर उनसे हर बात मनवाना मगर कभी न कभी ये पति नाम वाले भी इनकार कर देते हैं लेकिन पशु कभी ऐसा कर ज़िंदा नहीं रहते हैं उनको बीमार पागल घोषित कर मार कर उनका उपयोग कितनी तरह किया जाता है। इंसान की कीमत जीते जी भी कुछ भी नहीं होती और मौत के बाद उसको कोई नहीं चाहता है जबकि जानवर मौत के बाद भी हज़ार काम आते हैं। 
 
आधुनिक होना रईस धनवान और बहुत ख़ास होना सभी चाहते हैं और सब हासिल होने के बाद बस यही महत्वपूर्ण होता है इंसान और इंसानियत से रिश्ते छोड़ पशुओं जानवरों से संबंध बनाना। पुराने समय में कुत्ते घर के बाहर चौखट दरवाज़े पर बैठे होते थे और महमान पड़ोसी जानकर अजनबी लोग घर की बैठक में शोभा बढ़ाते अच्छे लगते थे। इधर मामला उल्टा हो गया है कुत्तों से गले लगते हैं गोदी में बिठाकर चूमते दुलारते हैं इंसान को दूर भगाते हैं धुधकारते हैं झूठी शान बघारते हैं। सुख सुविधा लोभ लालच ने आदमी को इंसान से खूंखार जानवर बना दिया है आजकल बड़े बड़े शहर महानगर में अमीरों की बस्ती में ऐसे लोग अपने जैसे भाई बंधु जानवर पशु पंछी को पालते हैं उनका भरोसा आदमी पर नहीं खुद से बढ़कर पालतू जानवर पर बचा है। यही उनको अपने लगते हैं। जिनको उनसे संबंध रखना हो उन्हें इंसान नहीं जानवर बनना पड़ता है आपको अपने जैसा बनाना उनका मकसद है।
 
 
 Can we live without love? - Quora
 

जून 11, 2021

मिट्टी जैसी ज़िंदगी ( ज़ुबां से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया

    मिट्टी जैसी ज़िंदगी ( ज़ुबां से दिल तक ) डॉ लोक सेतिया 

ये आम होने का एहसास मेरा अकेले का नहीं बल्कि अधिकांश दुनिया भर के लोगों का है जिनकी कोई अलग पहचान नहीं होती है। शायद हम भी ख़ास हैं या ख़ास बन सकते थे मगर हमने कोशिश ही नहीं की आम से ख़ास बनने या होने की। हम मिट्टी के लोग मिट्टी से बनते हैं मिट्टी में मिल जाना है जान कर समझ कर खुद को हर किसी के पांव की धूल होने को स्वीकार कर लेते हैं कि यही नसीब है नियति है। सभी को आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं जब जिसको जितनी ज़रूरत होती है। हम जैसे आम लोगों से सभी मिट्टी के खिलौने की तरह मन बहलाने को खेलते हैं और खेल खेल में तोड़ देते हैं मिट्टी का खिलौना टूटने का किसी को ज़रा भी अफ़सोस होता नहीं है। जिनको मिट्टी को आग में तपाकर पकाना आता है वो कुम्हार घड़े सुराही बनानकर मिट्टी को मनचाही कीमत में बेचते हैं भट्ठे वाले ईंट बनाकर खूब कमाते हैं मिट्टी का उपयोग सभी करते हैं मिट्टी से दामन सभी बचाते हैं। ज़िंदगी की चादर सभी मैली नज़र नहीं आने देना चाहते हैं कितने उपाय करते हैं अपने लिबास को साफ़ चमकदार और बेदाग़ बनाये रखने को। जिनके नाम की शोहरत के ढोल नगाड़े बजते हैं उनकी सारी ज़िंदगी अपनी चमक बरकरार रखने और छींटों से कीचड़ से सुरक्षित रहने में कट जाती है। कच्ची मिट्टी के घड़े से नदिया पार पिया से मिलने जाना हर किसी को मुहब्बत इबादत करना नहीं आता है। 
 
मिट्टी को छोड़ लोहा पीतल चांदी सोना सभी की कीमत होती है , सबसे महंगे दाम पत्थर बिकते हैं कभी रास्ते पर पांव की ठोकर खाने वाला पत्थर भी मूर्ति बनकर भगवान कहलाता है लोग सर झुकाते हैं आदमी भी मिट्टी का स्वभाव छोड़ जब कठोर पत्थर बन जाता है तभी हर कोई उसको पहचानता है उसका अस्तित्व समझता है। अन्यथा मिट्टी रेत बनकर उड़ती कभी कीचड़ बनकर पड़ी रहती है अनचाही चीज़ की तरह। घर में बहुत सामान ऐसा होता है जो हमेशा से रहता है उसकी ज़रूरत पड़ती है इस्तेमाल करते हैं और उसके बाद कहां रख छोड़ा कोई नहीं ध्यान रखता। फिर ज़रूरत पड़ती है तो इधर उधर यहीं कहीं मिल जाती है वस्तु कोई उसको संभालता नहीं कोई चुरा कर क्या करेगा कोई ध्यान नहीं देता भले उसके बगैर कोई कितना महत्वपूर्ण कार्य होना संभव नहीं हो। जाने कितने लोग दुनिया में इसी तरह के हैं जिनको रोज़ सभी उपयोग करते हैं उनकी जब भी ज़रूरत पड़ती है मगर उनका महत्व कोई नहीं समझता क्योंकि वो सस्ते हैं बहुतायत में मिलते हैं। 
 
घर महल ऊंची अटालिकाएं बनाने वाले मिट्टी के बिछौने पर रहते सोते जागते मिट्टी होकर मिट जाते हैं। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना परिंदों की तरह अपना घौंसला अपनी नगरी बनाई बसाई छोड़ जाते है किसी और आने वाले की खातिर तिनकों को बिना अपने निशां छोड़े ही। मगर ख़ास बड़े लोग वास्तव में कोई नवनिर्माण करते नहीं है किसी पर मकान ज़मीन या इमारत पर अपना नाम लिखवा समझते हैं हम अमर हो जाएंगे जबकि उन्होंने खुद दिया कुछ भी नहीं छीना हासिल किया या अधिकार जमाया होता है। यही विडंबना है यहां हर कतरा खुद को दरिया समझता है और समंदर होना चाहता है जबकि समंदर या दरिया का अस्तित्व खुद कतरों से बना है। इक पागलपन की अंधी दौड़ है जिस में तमाम लोग अपनी वास्तविक पहचान सामान्य होने को छिपाकर ख़ास होने की बनावटी पहचान ढूंढते मिट्टी से पत्थर बन जाते हैं। पेड़ पौधे पशु पंछी जानवर सबकी पहचान बचाये रखने की बात करने वाले इंसान आदमी की वास्तविक पहचान को समाप्त होने से बचाना नहीं चाहता बल्कि उसको मिटाता जा रहा है। विकास कह रहे हैं विनाश को खुद बुलाते हैं। मुझे सभी ने बहुत समझाया मगर मुझे आम से ख़ास होना नहीं आया मुझे मिट्टी बनकर रहना पसंद है पत्थरों की नगरी में पत्थर दिल होना नहीं चाहा कभी। अब उड़ने की बेला है चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। 
 
शायद बड़ी देर बाद समझ आया है कि हम जैसे आम लोगों ने खुद ही अपने चारों तरफ इक जाल बुना हुआ है। समाज के सारे नियम कायदे हमारे लिए हैं ख़ास बड़े लोग अपनी मर्ज़ी ज़रूरत और साहूलियत को देख कर नियम अच्छे बुरे की परिभाषा बदल लेते हैं उनका किया सितम भी एहसान कहलाता है। अपने मतलब की खातिर खराब से खराब आचरण भी करते उनको रत्ती भर अफ़सोस नहीं होता है। झूठ चालाकी जालसाज़ी या छल कपट सब इस्तेमाल कर उनको सफलता पानी होती है। शासक अधिकारी धनवान या धर्मगुरु जैसे ओहदे को पाकर उनको मनमानी की छूट ही नहीं मिलती बल्कि उनका यशोगान किया जाता है करवाया जाता है करना पड़ता है निचली पायदान पर खड़े शोषित वर्ग को किसी तरह ज़िंदा रहने उनके अन्याय अत्याचार से बचने के लिए।
 

 
 

जून 05, 2021

साहित्य का बाज़ार बनाये लोग ( सिर्फ सच ) डॉ लोक सेतिया

   साहित्य का बाज़ार बनाये लोग ( सिर्फ सच ) डॉ लोक सेतिया 

कोई बीस साल पहले की बात है मैंने " लेखक का दर्द " शीर्षक से रचना लिखी थी और तमाम जगह भेजी थी। बस इक जगह छपी थी बाकी सभी ने रद्दी की टोकरी में फैंक दी थी छपना मेरा मकसद था भी नहीं आईना दिखलाने वालों को सच का आईना दिखाना था। ताकि सच ज़िंदा रहे जैसे स्लोगन की बड़ी बड़ी बातें करने वाले झूठ पर सच का लेबल लगाकर ऊंचे दाम बेच मालामाल होते हैं। इक अख़बार ने मेरी रचना को पुर्ज़े-पुर्ज़े कर फाड़कर वापस भेजा था तब मैंने उनको लिखा था जब किसी के यहां कोई मर जाता है तब उधर से फाड़कर चिट्ठी भेजी जाती है अपने सूचना भेजी आपके दफ्तर में लगता है ज़मीर नाम का कोई असमय मर गया है। संवेदना जताना ज़रूरी है उसके बाद मैंने ऐसे लोगों को लेकर बहुत लिखा है जो औरों को तस्वीर दिखलाते हैं अपने खुद को नहीं देखते हैं। इक ग़ज़ल इस पर बड़ी पुरानी बहुत बार छपी है पेश है। 
    
इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 
तमाम लोग साहित्य को मुनाफे का कारोबार समझ इसका बाज़ार लगाकर कारोबार करते हैं मगर समझते हैं हम साहित्य की सेवा उसको बढ़ावा दे रहे हैं जबकि अख़बार पत्रिका में छपने वाली रचनाओं के लेखक को कुछ भी नहीं देते हैं। बहुत लोग भेजने का वादा करते हैं भेजते नहीं हैं इन सभी ने समझा है लेखक बंधक की तरह है ख़ामोशी से अपना धर्म निभाना उसकी मज़बूरी है। इस पर कुछ लिखेगा तो छापेगा कौन मतलब पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा कोई नहीं लेता। इक बात को उन्होंने हथियार बना लिया है। कोई भी धंधा घाटे में कब तक चल सकता है शुरुआत में लिखने वालों से सहयोग की विनती करना अनुचित नहीं मगर पचास साल तक नियमित अख़बार पत्रिका निकालना उस से तमाम तरह से नाम शोहरत पद ईनाम पुरुस्कार पाने के बाद खुद को अगली कतार में बैठ महानता का चोला पहन कर भी लिखने वालों का शोषण करते रहना किसी गुनाह से कम नहीं है। 
 
   कोई नेता अपने अनुचित कार्य को गलत नहीं समझता मज़बूरी नाम देता है अधिकारी और काला बाज़ारी भी धंधे में करना पड़ता है दुहाई देते हैं मिलवट से लेकर अपना सामान बेचने को इश्तिहार में झूठ बताने वाले सभी पैसे की खातिर ईमान बेचते हैं। ठीक इसी तरह साहित्य से कमाई कर घर दफ्तर शानो शौकत और सुख सुविधा हासिल करने वाले लोगों के पास लेखक को महनत का उचित मोल देना फज़ूल लगता है। उनका स्टाफ़ वेतन पाता है कागज़ की कीमत चुकानी पड़ती है छपाई करने वाले को भी पैसा देना होता है बिजली अदि सभी खर्चे भरते हैं क्योंकि उनको भुगतान नहीं किया तो दुकान बंद हो जाएगी। मगर लिखने वाले विवश हैं हाथ जोड़ उपकार समझते हैं छापने पर उनको रोटी की ज़रूरत नहीं होती है , शायद पब्लिशर समझते हैं लिखने वालों को खाली पेट रख कर दर्द की अनुभूति करवा वे साहित्य पर एहसान करते हैं क्योंकि बदहाली में लिखने वाला अच्छा लिख सकता है। 
 
बिल्कुल सरकार की तरह जनता की हालत खराब से और खराब होती जाती है और खाना- ख़राब ने गुलिस्तां किया बर्बाद सामने है। उनकी हर चाहत देशसेवा है ज़रूरी है आम नागरिक का ज़िंदा रहना जुर्म नहीं मज़बूरी है खासो-आम की बढ़ती जाती दूरी है। सच कहना मुसीबत को घर बुलाना है मगर मेरे लिए सच को सच कहना ज़रूरी है लिखना मेरा कारोबार नहीं है ज़रूरत है चुप रहना नहीं सीखा मज़बूरी है। साहित्य की बात करने वालों को सच में मिलावट कर बाज़ार में बेच अपने स्वार्थ पूरे नहीं करने चाहिएं सच की खातिर ईमानदार अधिकारी अपनी जान जोखिम में डाल शासक को जानकारी देते हैं और देश का पीएमओ उसकी शिकायत की जानकारी बेईमान भ्र्ष्ट लोगों को भेजते हैं सत्येंदर दुबे क़त्ल कर दिए जाते हैं। आप सच बोलने की कीमत नहीं चुकाते घबराते हैं। टीवी चैनल अख़बार पत्रिका वालों से बस इक बात कहनी है। 
 

                 बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,

                 सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते।

जून 04, 2021

इम्युनिटी बढ़ाने से निराशा भगाने तक ( मानसिक दिवालियापन ) डॉ लोक सेतिया

    इम्युनिटी बढ़ाने से निराशा भगाने तक ( मानसिक दिवालियापन ) 

                                        डॉ लोक सेतिया  

इंतज़ार करें आपको ये सब पाने का तरीका भी बताना हैं वो भी बिना कोई सामान बेचे कोई पैसा कोई कीमत कोई लागत खर्च किये। पहले सोचना ज़रूरी है ये क्या हो रहा है हर कोई खुद को खुदा से बढ़कर सब करने समझने वाला बताता है। जाने कितनी दवाएं कितनी चीज़ें हमेशा कितने अन्य कार्यों में उपयोगी बताई जाती थीं बिकती खरीदी जाती थीं किसी ज़रूरत मकसद की खातिर। अचानक कोरोना के आने के बाद समझाया जाने लगा कि उनसे इम्युनिटी बढ़ती है और कोरोना से बचने को अपनी इम्युनिटी बढ़ाना सबसे ज़रूरी है। लगता है पैसे ने सभी को पागलपन की सीमा तक खुदगर्ज़ बना दिया है तभी इस तरह अपना सामान बेचने को निराधार दावे किये जाने लगे हैं। सभी आपको इक डर दिखलाकर बचाने को उपाय बता रहे हैं जबकि कोई नहीं जानता वास्तव में उस से कोई लाभ होगा या नहीं और सिर्फ किसी की तिजोरी भरनी है। जहां तमाम लोगों ने ईश्वर तक को बाज़ार में बेचा है भोले भाले लोगों को डर और लालच के जाल में उलझाकर वहां ये होना अचरज की बात नहीं है। क्या हम ठगों की नगरी नहीं ऐसे देश में रहते हैं जहां हर कोई दूसरे को ठगने के ढंग तलाश कर रहा है और ऐसे में खुद भी ठगी करते करते किसी ठग का शिकार बन जाता है। हमने घटिया फ़िल्मी पटकथा में देखा था नकली डॉक्टर मरते हुए रोगी को नाच गाना दिखलाकर तालियां बटोरते हैं। क्या गंभीर जानलेवा रोग का उपचार करते समय ऐसा करना और उसका वीडियो बनाकर वॉयरल करना सही मानसिकता है या फिर इक दिखावे का पागलपन है। 
 
लेकिन कमाल की बात है यहां देश के नेताओं अधिकारियों सभी विभाग वालों की कब से आदत सी बन गई है अपने वास्तविक कर्तव्य अपने कार्य को छोड़ तमाम अन्य कार्यों में संलगन होकर मौज मस्ती को अपना मनोरंजन का माध्यम बनाकर लोगों का ध्यान अपनी विफलताओं से हटाना। कोई अधिकारी जनसमस्याओं को छोड़कर सांस्कृतिक आयोजन या मुख्य अतिथि बन कर भाषण देता है कोई नेता किसी जाति समुदाय की सभाओं में शामिल होकर समाज की एकता से खिलवाड़ करता है। पुलिस विभाग अपराध पर अंकुश लगाने की बात छोड़कर नृत्य संगीत का कार्यक्रम आयोजित करता है। ऐसा तब उचित होता अगर उन्होंने जनता की समस्याओं का निदान कर दिया होता। खेद की बात है तमाम बड़े राजनेता शोहरत पाने की होड़ में कुछ सार्थक बदलाव करने की जगह यही करते नज़र आते हैं। उस से भी बड़ा अनुचित कार्य इन सभी कार्यों पर जनता का धन खर्च करना किसी गुनाह से कम नहीं है। 
 
अधिक विवरण की ज़रूरत नहीं है समझने को इतना बहुत है। मगर आपको इम्युनिटी बढ़ाने और निराशा को छोड़ आशावादी दृष्टिकोण अपनाने को बेहद साधारण आम तरीका बताना है। सबसे पहले आपको नफ़रत करना किसी से ईर्ष्या जलन रखना और तथाकथित आगे बढ़ने ऊपर पहुंचने की अंधी दौड़ को छोड़ सादगी से जीवन जीना सीखना होगा। खुद को बड़ा किसी को छोटा बनाने की कोशिश आपको सही मायने में नीचे ले जाती है। पहाड़ पर खड़े होकर खुद को ऊंचा समझना सही नहीं है ऐसे में आपका कद बौना होता है। पैसा दौलत पद नाम शोहरत अगर अच्छे कार्यों से मिलती है अपनी काबलियत से तभी वास्तविक है अन्यथा अनुचित ढंग छल कपट से अर्जित नाम काले धंधे रिश्वत की कमाई लूट की आमदनी आपसे आपका व्यक्तत्व छीन लेती है और आप इंसान नहीं मशीन की तरह बेजान बन जाते हैं जो खराब होते ही कबाड़ की तरह शहर घर से बाहर फैंकी जाती है। केवल अपने लिए सब कुछ की चाहत इंसान को हैवानियत की तरफ लेकर जाती है। आदमी वही है जो सभी की भलाई की सोच रखकर समाज की खातिर देश की खातिर योगदान देना जानता हो। झूठ से कभी आपका कल्याण नहीं हो सकता है झूठ आपको भीतर से खोखला कर देता है गेंहूं को घुन की तरह मिटा देता है। सच की ईमानदारी की कठिन डगर ही आपको साहस देती है और आपके अंदर की शक्ति आपको हर अन्याय अत्याचार से टकराने लड़ने की इच्छाशक्ति की तरह समस्याओं से निपटने का हौंसला देती है। ऐसा व्यक्ति घबराता नहीं हालात से लड़ता है जीत जाता है। मुमकिन है ऐसा भरोसा करने वाला हर रोग हर दशा में आशा का दामन पकड़ शान से जीता ही नहीं मरता भी उसी शान से है। मौत से डरकर जीना ज़िंदगी नहीं है।  हम किसी पर भी भरोसा नहीं करते खुद भी भरोसे के काबिल नहीं बन सकते हैं जिस ढंग से हमने जीना शुरू किया है डर और अविश्वास को बढ़ावा देकर। सरकार वयवस्था संस्थाओं पर क्या अब भगवान पर भी भरोसा नहीं करते हैं। अपने आत्मविश्वास से बढ़कर कोई इम्युनिटी कोई सुरक्षा होती नहीं है और आत्मविश्वास सच्चाई भलाई ईमानदारी की राह चलकर मिलता है। आडंबर झूठ छल कपट या दिखावे की महानता से कदापि नहीं।

जून 01, 2021

ज़िंदगी का अफ़साना ( जीने का फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

   ज़िंदगी का अफ़साना ( जीने का फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया 

ज़िंदगी इसी को कहते हैं कभी ख़ुशी कभी दर्द कभी जीत कभी हार कभी बहार कभी पतझड़ कभी भीड़ अपनों की दुनिया भर का साथ कभी एकाकीपन सूनापन वीरानगी का मज़र। धूप भी छांव भी आंधी तूफ़ान बारिश और इक डर बिजली गिरने का सब ख़ाक हो जाने का। ज़िंदगी सालों की बड़ी छोटी संख्या नहीं होती है ज़िंदगी नाम है अंधेरी तूफानी रात में मझधार में डगमगाती नैया को किसी खिवैया के बगैर हौंसलों से उस किनारे लगाने अपनी मंज़िल को तलाश करने का। मंज़िल कभी किसी को नहीं मिलती है आखिरी मंज़िल वही है बस जीने का मतलब है चलना चलते जाना रुकना नहीं थक कर ठहरना नहीं। ज़िंदगी खेल है जंग भी इम्तिहान भी कभी मुश्किल है कभी आसान भी। जब कभी आप घिर गये घने अंधेरों में और जिन पर आपको भरोसा था साथ देंगे हाथ पकड़ सहारा देंगें वही आपको निराश कर छोड़ गये मज़बूरी के बहाने बनाकर तब अकेले अपने दम पर कैसे आपने खुद को टूटने बिखरने नहीं दिया उसी को जीना कहते हैं। यही इम्तिहान है सभी मेले छूट जाने हर कारवां उजड़ जाने के बावजूद निराशा में आशाओं को मन में जगाये रखने और चलते रहने का। दोस्त अपने पराये रिश्ते सभी आपको मीठे कड़वे अनुभव देते हैं आपको सुःख दुःख दोनों को गले लगाना सीखना पड़ता है ज़िंदगी के सफर में धूप ज़्यादा छांव कम मिलती है पल पल बदलती है , एक समान रहना जीवन नहीं कहलाता है बहते पानी का दरिया है और बहाव के साथ नहीं लहरों से टकराकर धारा के विपरीत तैर कर अपनी मर्ज़ी की दिशा में बढ़ते जाना वास्तविक ढंग है अपनी शर्तों पर जीकर दिखाने का। 
 
मुश्किलों से घबराना हार मानकर बैठना ज़िंदगी नहीं होती है मुश्किलों उलझनों से लड़ते हुए आगे बढ़ते जाना जीना कहलाता है। कब आपका साथ किसी ने नहीं निभाया ये चिंता की बात नहीं है ऐसे में आपने कठिनाइयों का सामना किस साहस से किया ये महत्वपूर्ण है। ज़िंदगी लंगड़ी किसी और के सहारे बैसाखी से चलना नहीं है गिरकर भी खुद संभलना ज़िंदगी को सही अंजाम तक पहुंचाना है। दुनिया आपको क्या मानती है किस रूप में देखती है उसकी परवाह छोड़ खुद आपको कैसे रहना है अपना अस्तित्व बचाकर ये ज़रूरी है खुद अपनी पहचान हैं हम किसी और की बताई पहचान बनकर रह जाना खो जाना है। कभी कभी कोई आपका साथ निभाता है खराब हालात में बस वही अपना है बाकी सब दुनिया बेगानी है और अजनबी लोगों में खुद को बचाये रख कोई हमराही कोई हमदर्द कोई हमख़्याल मिलना नसीब की बात है। सबका नसीब शानदार नहीं होता है अपनी बदनसीबी बदहाली में भी संयम से काम लेकर कोशिश करते रहना पतझड़ में फूल खिलाना इसी को वास्तविक जीना कहते हैं। 
 
जब तक आप इसी बात को लेकर परेशान निराश होते रहेंगे कि सबने आपको क्या दिया क्या आपको उम्मीद थी तब तक आप जी रहे हैं लेकिन ज़िंदगी से भागकर उसका साक्षात्कार नहीं किया है। दुनिया से क्या मिला सोचना व्यर्थ की बात है आपने दुनिया को क्या दिया है ये सोचने की बात है खाली हाथ आना खाली हाथ जाना कोई मतलब नहीं हम रहे आकर चले गए। सार्थकता जीवन की इसी में हैं हम देश दुनिया को क्या योगदान देकर जाएंगे। हमने अपनी दुनिया को पहले से सुंदर खूबसूरत और बेहतर बनाया है या उसको और भी बर्बाद किया है ये तय करता है हमारा दुनिया में आना क्या था। हंसना रोना मौज मस्ती और अपने लिए सुख सुविधा आनंद और ऐशो-आराम से बसर करना ज़िंदगी नहीं सिर्फ जीने का अभिनय करना है ज़िंदगी है आस पास अंधेरे मिटाकर उजाले करने का काम। प्यार बांटना जीवन है मुहब्बत भाईचारा वास्तविक कल्याण की राह मानवता का धर्म है। झूठ अहंकार और हर किसी से टकराव की आदत ज़िंदगी को नर्क बनाना है  खुद जीते जी घुट घुट कर जीना खुदगर्ज़ी की सोच किसी को कुछ नहीं मिलता इन से। ज़िंदगी से नेमतें मिलीं हमने उनको समझा नहीं खुद शिकायत और जो नहीं हासिल उसकी चाहत करने में जितना भी पास उसको संवारा संजोया नहीं खो दिया सब कुछ। किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , हमको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। 
 

 

मई 31, 2021

कुछ ठग इक बाज़ार सब ख़रीदार ( हाल-ए- बीमार ) डॉ लोक सेतिया

कुछ ठग इक बाज़ार सब ख़रीदार ( हाल-ए- बीमार ) डॉ लोक सेतिया 

 जल्दबाज़ी मत करना पढ़ना सोचना समझ आये तो समझना नहीं समझ सको तो उनसे कभी मत उलझना। ठग लोगों की बिरादरी है कोई चोर-चोर मौसेरे भाई नहीं हैं उनका अपना धंधा है गंदा है मगर मुनाफा चंगा है। किसी को धरती पर सिक्का जमाना था किसी को समंदर पर कब्ज़ा जमाना था। हाय अपना भी कोई ज़माना था दुनिया हमारी उनका नहीं कहीं भी आशियाना था। मांगने से चाहे छीनकर मिला बना लिया सभी ठगों ने कोई ठिकाना था धेला पैसा बनते बनते बन गया इक आना दो आना चार आना था अठन्नी की हसरत बाक़ी थी रूपये की हैसियत को पाना था। हमने उनको नहीं ठीक पहचाना था देशभक्ति समाजसेवा सब झूठा बहाना था उन्हें तो दुनिया को उल्टा सबक पढ़ाना था लिखना नहीं सीखा था जो लिखा उसको मिटाना था उल्लू बनाकर सबको दिखाना था। हमने भी क़व्वाली को सच कर दिखलाना था जो दवा के नाम पे ज़हर से उस चारागर को ढूंढ लाना था। अपने क़ातिल को मसीहा कहकर दिल को बहलाना था मगर उनकी नज़र थी उनका निशाना था। 
 
  हर साल की तरह उनको जश्न मनाना था मगर अफ़सोस मौसम क़ातिलाना नहीं हर तरफ छाया वीराना था नशा था चढ़ा बिना पिये हर कोई दीवाना था साकी नहीं था न कोई पैमाना था बसंती को गब्बर सिंह को मनाना था । नाचना नहीं चाहिए झूमना भी अच्छा नहीं लेकिन उनको दिल अपना लगाना था झूठी तक़रीर की आरज़ू थी सच को दफ़नाना था। सारी दुनिया पर उनको परचम लहराना था हम लोग अच्छे बुरे हैं सभी उनका कौमी तराना था गुलाम सबको मानसिक तौर से बनाकर आप से अच्छा कोई नहीं शोर मच गया शोर देखो आया कैसा ठग वाला दौर खुद हंसना सभी को रुलाना था महरमछ के आंसू बहाकर अंदर से मुस्कुराना था। 
 
चूहों की दौड़ है बिल्ली मौसी का नहीं चलता ज़ोर है भौंकने वालों की नगरी में गधा बना सिरमौर है। डरने की क्या बात है जब गब्बर सिंह कहता मन की बात है तेरा मेरा साथ रहे जनता सदा उदास रहे चोरों की बरात चली सच की अर्थी साथ चली। टीवी पर ठग छाए हैं बड़े दूर की कौड़ी लाये हैं शीशे के महल बनाए हैं पत्थर जमकर चलवाएं हैं ये आधुनिक काल की बातें हैं बिन पानी की बरसातें हैं शीशे ये इतने पक्के हैं कोई इनको तोड़ नहीं सकता हवा का रुख उनके इशारे पर कोई आंधी को मोड़ नहीं सकता। टीवी पर बस दो चेहरे हैं शतरंज में ये दो मोहरे हैं बाकी सब बेजान खड़े खड़े मरते हैं बस ज़हर पीकर आह नहीं भरते हैं सुभानअल्लाह माशाल्लाह कहकर बादशाह सलामत रहे कहते रहते हैं। मसीहा है वही अत्याचारी है जाने कैसी बिमारी है जो दुनिया में सबसे झूठा है लाख सच पर वही भारी है। हम राजा-जानी हैं अभिनेता राजकुमार का अपना अंदाज़ था उसने अपनी शर्तों पर अभिनय कर खुद को सबसे अलग और बड़ा माना था क्या ज़माना था। उधर मीनाकुमारी का मंदिर और आखिरी सांस गिनती मां थी इधर शराब शराबी मयखाना था और क्या अजब तराना था। 
 

 

मई 28, 2021

ओटन लगे कपास ( शराफ़त की पढ़ाई नया नियम ) डॉ लोक सेतिया

 ओटन लगे कपास ( शराफ़त की पढ़ाई नया नियम ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे मंज़ूर है संयम और शराफ़त से आचरण का नियम लागू होना लेकिन सबसे पहले उन पर यही सख़्ती से लागू किया जाये , जिनको खुद पर कोई नियम कानून कोई रुकावट कोई सीमा रेखा कोई मर्यादा का पालन करना अपने शासकीय अधिकार का हनन लगता है। सिर्फ सोशल मीडिया पर झूठ नफरत असभ्य भाषा बिना आधार किसी को बुरा भला कहना बंद करवाना लाज़मी नहीं सभ्य समाज में बड़े छोटे सभी को नैतिकता और सच्चाई का पास रखना ज़रूरी है। संक्षेप में मगर बिल्कुल साफ और तथ्यात्मक ढंग से विषय की बात करते हैं। सरकार कोई नेता जब कोई बात कोई वादा कोई आरोप किसी पर भाषण में खुली सभा में या फिर संसद विधानसभा में किसी अदालत में अपना पक्ष रखते हुए बोलकर लिख कर या किसी तरह से सामने लाता है तब उसकी कही गई समझाई गई हर बात को ऐसे नियम कानून की कसौटी पर खरा साबित होना ही चाहिए और ऐसा नहीं होने पर उस पर कठोर करवाई की जानी चाहिए। देश जनता समाज को झूठ से बहलाना झांसे में रख कर सही को गलत और गलत को सच समझाने का काम देशभक्ति नहीं अपराध है संविधान की भावना का अनादर है जो सत्ता पर बैठकर कभी नहीं किया जा सकता है। चुनाव में वादा किया जो वास्तव में सच नहीं साबित हुआ तब ये गुनाह माफ़ी लायक कदापि नहीं हो सकता है। ऐसे अपराध की सज़ा पांच साल बाद चुनाव में हार ही काफी नहीं बल्कि उनको इक पल भी शासन का अधिकार नहीं होना चाहिए। अपनी बात से पलटते ही उनका तख़्ता पलट किया जाना चाहिए। 
 
सरकारी आंकड़े झूठे हों तो सरकार को रहने का अधिकार किसलिए और क्यों। कोई टीवी पर जनता को अपने किसी ढंग से निरोग होने का इश्तिहार देकर नाम पैसा शोहरत कमाता है लेकिन वास्तव में लोग उनकी कही बात मानने के बावजूद निरोग होते नहीं रोग बढ़ते जाते हैं तब सिर्फ वही इक शख्स नहीं उसके झूठ को जारी करने वाले सभी सहयोगी सहभागी टीवी अख़बार या उनके गोरखधंधे से फायदा उठाने वाले मुजरिम हैं लुटेरे हैं उन पर सज़ा और जुर्माना लगा कर जिनकी जेब से पैसा गया उनकी भरपाई की जानी चाहिए। सोशल मीडिया पर या टीवी अख़बार पर ज़हर को अमृत बनाना अपने कारोबार के बढ़ाने की खातिर उचित कैसे हो सकता है। सरकारी दफ़्तर में या पुलिस थाने या अदालत में डराने धमकाने रुतबा बढ़ाने को बिना कारण लोगों को अशिष्ट भाषा अनुचित अचार व्यवहार से अपनी मनमानी करना रिश्वत लेकर घर भरना क्या इसको किसी व्यक्ति अधिकारी शासक का विशेषाधिकार माना जाना चाहिए। किसी भी बहाने कोई भी मकसद बतलाकर आपराधिक आचरण को सही नहीं साबित कर सकते हैं। 
 
व्हाट्सएप्प फेसबुक ट्विटर सोशल मीडिया पर गंदगी नहीं होना काफी नहीं है गंदगी कहीं भी नहीं रहनी चाहिए और शराफत सोशल मीडिया की नकली दुनिया से पहले हमारी वास्तविक दुनिया में होना अधिक ज़रूरी और महत्वपूर्ण है। वो कहानी याद है ना पापी को सज़ा देनी है मगर पहला पत्थर वो मारे जिसने खुद कोई पाप नहीं किया हो। कमाल का विधान है जिनके अपकर्मों की कोई गिनती नहीं कर सकता वो हमसे हिसाब मांगेगे अच्छे बुरे कर्म हर बोली बात हर लिखी बात को परखेंगे कसौटी पर। इंसाफ़ का तराज़ू पकड़ने वाले से कोई सवाल नहीं पूछेगा कि आपका ये तराज़ू सभी को बराबर समझता भी है या नहीं। लेकिन उनके बाट बदल जाते हैं लेने के अलग देने के अलग अलग हैं। मगर जिनका आगाज़ ही झूठा हो उसका अंजाम सच कैसे होगा आपको सोचने की नहीं समझने की ज़रूरत है। यहां नियम कायदे कानून बनते हैं कागज़ पर ज़मीन पर दिखाई नहीं देता कोई भी कायदा कानून , बाल मज़दूरी महिला सुरक्षा , शिक्षा और रोटी से लेकर जीने का बुनियादी अधिकार पहले से है लेकिन बंद कानूनी किताब में वास्तव में कहां है। इंसान तो क्या पशु पक्षी जानवर तक के लिए नियम कायदे कनून हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि गधों तक के लिए कानून बनाया हुआ है हर गधे से दिन में आठ घंटे काम लेना उसको दिन में चार बार भोजन पानी के लिए अवकाश मिलना उसके पांव पर रस्सी बांधने से पहले मुलायम कपड़ा बांधना कानूनी नियम है इतना ही नहीं उसको उमस भरे मौसम में काम नहीं करवाने की भी शर्त राखी हुई है। 
 
कितने कानून बनाकर रख छोड़े हैं उनका पालन कोई नहीं करवाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात सभी ईमानदारी से कर्तव्य निभाने निष्पक्षता की न्याय की व्यवस्था की शपथ उठाकर कुर्सी पर बैठते हैं लेकिन अपनी शपथ कोई भी निभाता नहीं याद तक नहीं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। जिस देश की संसद में बड़े बड़े गंभीर अपराध के आरोपी बैठकर कानून बनाते हैं कानून को समझते नहीं उसकी खिल्ली उड़ाते हैं उस देश में बदलने को कोई कानून कारगर नहीं साबित हो सकता कभी भी। आधुनिक व्यवस्था पर कुछ दोहे लिखे हैं आखिर में आपके लिए हाज़िर हैं। 
 
 

           देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे          - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

मई 26, 2021

बदनाम बहुत हैं गुमनाम नहीं हैं ( लज्ज़त ए शोहरत ) डॉ लोक सेतिया

बदनाम बहुत हैं गुमनाम नहीं हैं ( लज्ज़त ए शोहरत ) डॉ लोक सेतिया 

    कोठों की बदनामी धंधा चमकाती है गब्बर सिंह का नाम मीलों तक दहशत महसूस करवाता था इस पर डाकू को नाज़ था अफ़सोस हुआ जब तीन साथियों ने नाम मिट्टी में मिला दिया। काली दाढ़ी वाले बाबा जी की खिल्ली जम कर उड़ाई जा रही है उनके चेहरे पर शिकन नहीं है उनका निशाना धंधे पर है धंधे में मुनाफा बढ़ता है तो खुद मज़ाक बन जाना खराब बात नहीं है। सफ़ेद दाढ़ी वाले से उन्होंने सीखा है खबरों में रहना ज़रूरी है भले विषय का क ख ग नहीं आता हो चर्चा में भाग लेना बड़े काम आता है। झूठ पकड़ा जाता है तब भी झूठ पर घंटा भर वाद विवाद चलता रहता है जिस में असली विषय किसी को याद ही नहीं रहता। अपमानित महसूस करना कारोबारी लोगों के लिए या राजनेताओं के लिए महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। जिस देश में सबसे बड़ी अदालत अपने को अपमानित करने वाले पर एक रुपया जुर्माना ठोकती है उस देश समाज में अपमानित सम्मानित होने पर चिंता करना फज़ूल है। 
 
   चलो झूठे काल्पनिक किस्से कहानियां पढ़ना छोड़ विचार करते हैं वास्तविकता क्या है। जिस इतिहास पर आपको गर्व है उसमें कितनी मिलावट कितनी बनावट है सोचने लगोगे तो पागल हो जाओगे। जिसको मसीहा लिखा हुआ है समझने लगे तो क़ातिल पाओगे अभी भी नहीं सच को सच कहोगे तो झूठ बोल कर झूठ सुनकर झूठे लोग कहलाओगे वक़्त के बाद जागोगे क्या होगा बस पछताओगे। कथा कहानी कभी सच नहीं होती है लिखने वाली कलम तक रोती है। आखिर में सब अच्छा होता है दर्शक अकल का कच्चा होता है लेकिन सबक यही सीखा है हमने बाद में जो होगा देखा जाएगा जीवन भर सबको लूटा खसूटा हैं हमने। स्वर्ग और नर्क जन्नत दोजख़ कितने जाकर कब देखा है जिनके हाथ कटे होते हैं उनकी भी भाग्य रेखा है। महल खड़े किये महनतकश लोगों ने खून पसीना उनका बहा था पैसा था भूखे नंगे गरीब लोगों का शिलालेख पर बादशाह का उल्लेख लिखा था। ज़ुल्मों की थी जो कहानी किसने लिखी कैसी थी मुहब्बत की दास्तां पुरानी और हमने समझा नहीं न जाना वहशत को चाहत जब माना। मेरी इल्तिजा सुनते हो प्यार करना सच्चा मगर ताजमहल न बनवाना हाथ पकड़ना साथ निभाना रिश्तों को मत जंजीर बनाना। शहंशाहों के ताज से अच्छा होता प्यार का छोटा सा आशियाना बसाना। 
 
   खुद को जो कहते हैं सेवक शासक बनकर सितम हैं करते उनके लाल कालीन के नीचे जाने कितने लोग कुचले पड़े हैं मगर ये बेरहम शान से चलते। गरीबों का हक छीन कर सब अरमान शासकों के पलते। धर्म की उपदेश की बातें दुनिया को समझाते हैं सबने देखा उनको खुद पाप की राह बढ़ते जाते हैं। छल कपट से बना इमारत उसको मंदिर मस्जिद कहते हैं क्या ऐसे घरों में ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु रहते हैं। हमने सच को नहीं है जाना झूठा पढ़ते हैं अफसाना तोते की तरह शब्द रटते हैं भावार्थ समझा न माना। देने वाला कोई नहीं है दाता बना सबसे बड़ा भिखारी नैतिकता क्या होती है और क्या होती है ईमानदारी ये सब भाषण की बातें हैं करते उल्टी बातें सारी जिसको बताते है दुनियादारी। शोहरत की चाहत जो हैं करते मुजरिम हैं गुनहगार हैं सारे कैसा युग आजकल है आया सबको डूबकर लोग ढूंढते हैं किनारे। बदनाम होकर भी खुश हैं झूठे लोग नाम मिला पहचान मिली है। मुझे कहा था मेरे बेटे ने सच है क्या आपने ये बात पढ़ी है। 
 
   इधर कब से कुछ लोग परिवारवाद की राजनीति से खानदानी कारोबार से मालामाल होने वालों को देश समाज का लुटेरा बता रहे थे अच्छे अच्छों की हस्ती मिटाकर धूल में मिलाने की कसम खा रहे थे। उनका कोई घरबार नहीं सबको समझा रहे थे अपना खाली झोला भरते भरते खुद सब देश समाज के लिए है मीठी मीठी बातों से उल्लू बना रहे थे। रात को दिन दिन को रात बनाकर जादूगिरी दिखला रहे थे। सोशल मीडिया टीवी अखबार सभी को कठपुतली बनाकर नचवा रहे थे सब उनके गुण गाकर अपना धंधा उनके गोरखधंधे से हाथ मिलाकर बढ़ा रहे थे। ऑफ दि रिकॉर्ड यार लोग समझा रहे थे हम खुद अपना नया इतिहास बना रहे थे। कोई आगे न पीछे बाद में सब भूल जाएंगे बस इसलिए उल्टी गंगा बहा कर कीर्तिमान बना रहे थे। कोई वारिस नहीं मगर विरासत बढ़कर शोहरत की बुलंदी पाकर इतरा रहे थे। बनाना नहीं कुछ भी जो भी पुराना बनाया हुआ है उसको ढा रहे हैं। हम जहां पांव रखते हैं उस धरती को बंजर बना कर कांटों की हस्ती दिखला रहे हैं। हम इंसान नहीं मशीन हैं बुलडोज़र की तरह बड़ी ऊंची इमारतों को ख़ाक में मिला रहे हैं। लोग टीवी पर देखते हैं हम मुस्कुरा रहे हैं जबकि हम खलनायक की तरह मन ही मन ठहाका लगा रहे हैं। जनता को क्या क्या सिखला रहे हैं बेचते हैं ज़मीर तक और आत्मा तक बिकवा रहे हैं। शोहरत जुर्म भी होती है जब अच्छे कार्य से नहीं खराब आचरण से भी पाने की ललक होती है हम सच करके दिखला रहे हैं। मतलबपरस्ती को देशभक्ति समाजसेवा घोषित करा रहे हैं।

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मई 25, 2021

दीवानापन है या कुछ और ( ब-कलम-ख़ुद ) डॉ लोक सेतिया

   दीवानापन है या कुछ और ( ब-कलम-ख़ुद ) डॉ लोक सेतिया

किसी ने नहीं पूछा और कौन किसलिए पूछेगा मैं क्या हूं कौन हूं। सच्ची बात तो यही है अब दुनिया को किसी को समझने की चाहत क्या ज़रूरत नहीं फुर्सत भी नहीं। बस हर कोई खुद को लेकर परेशान है हैरान है अपने से अनजान है। सोचा कोई नहीं समझने वाला तो दिल से दिल की बात करते हैं फिर इक बार खुद से मुलाकात करते हैं। लिखना ज़रूरी है कभी दुनिया की भीड़ में गुम हो गए तो जैसे बच्चों की जेब में नाम पता लिख कर रखा होता है जिस किसी को मिले घर स्कूल पहुंचा सकता है। अक्सर लोग पूछते हैं आपका नाम क्या पहचान क्या है किसी दिन मुझे बताएंगे आपका वजूद क्या है। मंज़िल-ए - मकसूद क्या है। मुझे चाह थी ज़रूरत थी घड़ी दो घड़ी कोई प्यार की बात करता मुझसे भी। मगर दुनिया तिजारत करती है मुहब्बत बिकती है नीलाम होकर बदले में खोटे झूठ वाले सिक्कों के दाम पर सच का मोल यहां दो कौड़ी भी नहीं और सच्चाई का तलबगार मिलता ही नहीं। सच की बात करने वाले हैं दुनिया में सच से बचते हैं घबराते हैं झूठ से मिलते हैं हाथ मिलाते हैं गले लगाकर साथ निभाते हैं। रिश्तों दोस्ती दुनियादारी के नातों में तमाम लोग तराज़ू लिए खड़े मिले। मुझसे मेरी आज़ादी लेकर अपने पिंजरे में बंद कर मुझे अपना बनाकर रखना चाहते थे और मुझे सोने वाले पिंजरे भी कभी नहीं भाये। कीमत सस्ती महंगी की बात नहीं मुझे तो अपनी अनमोल चाहत को बिना किसी मोल बिकना पसंद था कोई चाहत का तलबग़ार मिलता जो कभी। 
 
बड़ी देर बाद समझे हैं किसी से मुहब्बत की चाहत करते करते खुद से कभी मुहब्बत ही नहीं की। मेरे भीतर अथाह सागर है प्यार का जिसको दुनिया ने कभी देखा समझा नहीं खुद अपने आप को प्यार करना ज़रूरी है बाहर किसी से कभी मांगने से नहीं मिलता है प्यार ज़माने में। सुनते थे कोई कस्तूरी मृग होता है जो दौड़ता रहता है कस्तूरी की सुगंध के पीछे जबकि वास्तव में कस्तूरी खुद उसके भीतर छुपी रहती है। मुझे अपने भीतर झांकना होगा खुद को तलाशना समझना होगा और खुद से दिल लगाना होगा। बेशक मुझे हंसना मुस्कुराना गुनगुनाना होगा ज़िंदगी को ज़िंदगी की तरह जीना होगा मौत आएगी जब ख़ुशी से गले लगाना होगा मौत से भी नाता निभाना होगा। ज़िंदगी को अलविदा कहना ज़रूरी है मगर ज़िंदा हैं तो खुलकर जीना भी ज़रूरी है। ज़िंदगी इक फ़लसफ़ा है घुट घुट कर जीना ज़िंदगी नहीं जीने की मज़बूरी है। 
 







मई 24, 2021

किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया

  किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान ( आठवां सुर ) डॉ लोक सेतिया 

 मुकद्दर ने किसी को तख़्तो-ताज़ बख़्श दिया कितने बंदर कलंदर बन बैठे सिकंदर सभी हैरान हैं गधे बड़े पहलवान हैं। जो नहीं जानते कुछ भी अनजान हैं मगर अब ऊंची जिनकी दुकान है फीके बेशक उनके पकवान हैं वही लोग लगते देश की शान हैं। यही नसीब की बात है उनकी सुबह है आपकी रात है सूखा मचाती ये बरसात है फालतू की उनकी नई बकवास है सभी कह रहे वाह वाह क्या बात है। समझ आएगी साफ साफ बताते हैं ये सब जो उल्लू बनाते हैं खूब खाते कमाते हैं झूठ फरेब छल कपट की सीढ़ी चढ़ते जाते हैं आपको हर बात समझाते हैं उनके शीशे के घर हैं मगर फिर भी सभी पर पत्थर चलाते हैं। आपको फ़िल्मी डायलॉग की तरह बोलकर ऊंची आवाज़ में सबसे बड़ा झूठ यही सच समझना आपको कहते हैं और आप मान भी जाते हैं। आओ आपको दो ऐसे लोगों से मिलवाते हैं जिनको समझ कर भी लोग समझ नहीं पाते हैं। 
 
कोई राजनेता है कोई अभिनेता है उसने किसी का कोई भला नहीं किया है सब खुद लिया है कुछ भी नहीं दिया है सब मानते हैं ये सबसे ख़राब है मगर जादू उसका चल रहा है भिखारी सभी हैं इक वही नवाब है। जिसने किया सबका ख़ानाख़राब है वही मांगता सबसे हिसाब किताब है ये खोटा सिक्का चल रहा है देश में ठग ऑफ हिन्दुस्तान हैं दाता के भेस में। नहीं कुछ भी उसने कभी भी पढ़ा है अनपढ़ है नासमझ है और नकचढ़ा है बिठाया था आंखों पर लो सर पर खड़ा है कहता है दुनिया में सबसे बड़ा है। खोटा सिक्का चलता है बस समझो खरा है। इक और से मिलवाना हैं ये सच है झूठा अफ़साना है उसने सबको योग से भोग तक महारोग से राजयोग तक जो नहीं सीखा समझाना है खुद पढ़ा नहीं आपको पढ़वाना है उसका खाना खज़ाना है कहता है सब कुछ लुटवाना है मगर हाथ किसी के कुछ नहीं आना है उसका हर जगह ठिकाना है। सभी जानते हैं इन दोनों को ये झूठे हैं धोखेबाज़ हैं सब जानते हैं मगर फिर भी सब जाल में उन्हीं के फंसे हैं खुश हैं ये जैसे भी हैं हमारे लिए बढ़िया हैं सोचते हैं। संक्षेप में इक नज़्म पुरानी दोहरा रहे हैं ये देश को सपनों से बहला रहे हैं जो इनकी पोटली में रखा नहीं है दिखला रहे बेचते हैं करोड़ों कमाकर दिखला रहे हैं। राजा नंगा कहानी को बदलकर उल्टी गंगा बहा रहे हैं। अंधे रास्ता दिखा रहे हैं गूंगे मधुर गीत सुना रहे हैं सभी बहरे ताली बजा रहे हैं। 
 
किसी ने जन्नत का ख़्वाब बेचा किसी ने सब का बनाकर नकाब बेचा उसने अपना चेहरा दुनिया भर को आईना कहकर जनाब बेचा। समंदर है दावा किया था जनता को सूखा तलाब बेचा क्या क्या खरीदा क्या क्या बनाया सवाब मिलता है बतलाकर अज़ाब बेचा। जाने किस शायर की लिखी ये नज़्म है क्या सोचकर लिखी मगर इक बाबा इक राजनेता ने उसको सच कर दिखाया है। काठ की तलवार बनाकर जंग लड़ता है जीत का परचम फहराया है। नज़्म पेश है वीडियो से पहले लिख देता हूं आभार सहित जिसकी रचना है गुमनाम अनाम का धन्यवाद। रावी से तीन नहरें निकलीं दो सूखी और इक कभी बही ही नहीं। जो बहती नहीं उस में तीन लोग नहाने को आये दो डूब गए इक मिलता ही नहीं। जो मिलता नहीं उसको तीन गांय मिलीं दो बच्चे देने के काबिल नहीं एक गर्भवती होना नहीं जानती जो गर्भवती नहीं उसने तीन बछड़ों को जन्म दिया। दो अपाहिज एक उठ भी नहीं सकता। जो उठता तक नहीं उसका मूल्य तीन रूपये दो खोटे और एक जो चलता ही नहीं जैसे पुराने हज़ार पांच सौ वाले नोट रद्दी की तरह आजकल। उस चलन से बाहर नहीं चलते रूपये की कीमत आंकने तीन सुनियार पारखी आये जिन में दो अंधे हैं और एक को कुछ भी दिखाई नहीं देता है। उस को तीन मुक्के मारे गए जिन में दो चूक गए और एक लगा ही नहीं। अध्याय का अंत वीडियो अभी पेश है। 
 

 

मई 23, 2021

जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        जहांपनाह भावुक हुए ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 नहीं टीवी चैनल वाले नहीं देख सकते अपने पालनहार के मुखमंडल पर उदासी का भाव। जनता का क्या है रोना उसका नसीब है आपकी पलकों पर नमी नहीं अच्छी लगती है। दिन भर यही सबसे ज़रूरी खबर चलती रही। मान गए प्यार हो तो ऐसा ही हो अपने महबूब का खिलता चेहरा कभी मुरझाया नज़र नहीं आये सच टीवी एंकर को लग रहा था खबर पढ़ना छोड़ वो भी रो दे काश कि सामने बैठे होते हज़ूर तो अपने टिशू पेपर से उनकी पलकों को पौंछती। आंचल दुपट्टा रहा नहीं क्या करें साड़ी का पल्लू ही होता लेकिन फैशन जीन टॉप का ठहरा। जो हमने दास्तां जनता की सुनाई आप क्यों रोये तबाही तो वाराणसी की जनता पे आई आप क्यों रोये। ये गीत बजाना चाहिए था मगर हो नहीं पाया मगर जहांपनाह की उदासी की वजह कुछ लोगों की जान जाना नहीं हो सकता है। मामला गंभीर है मन की बात शायद अभी कुछ समझनी समझानी रह गई है। इस में कोई शक नहीं कि वास्तविक कीमती अश्क़ वही होते हैं जिनको कोई पलकों से ढलने नहीं देता चुपचाप पी जाते हैं बेबसी के आंसू लोग आह भी नहीं भरते। लेकिन कीमत समझी जाती है उन अश्क़ों की जो बहते ही नहीं किसी दामन को भिगोते भी हैं। टुकड़े हैं मेरे दिल के ए यार तेरे आंसू , देखे नहीं जाते हैं दिलदार तेरे आंसू। उनका हाल देख कर लोग ज़ार ज़ार रोने लगे , हमारा दर्दो ग़म है ये इसे क्यों आप सहते हैं फ़ना हो जाएगी सारी खुदाई आप क्यों रोये। सैलाब की तरह बहाकर ले गए सभी को इतने लोग तो समंदर में आये ताउते तूफ़ान में तबाह नहीं हुए जितना उनकी भीगी पलकों में डूब कर फ़नाह हो गए हैं। 
 
 आंसुओं की दास्तां लिखते लिखते कथाकार की कलम उदास हो जाती है। आशिक़ के अश्क़ों पर कितने बेमिसाल शेर हैं शायरी में अश्क़ का रुतबा बड़ा ऊंचा है मुस्कुराहट की तो कोई कीमत नहीं आंसुओं से हुई है हमारी क़द्र , उम्र भर काश हम यूं ही रोते रहें आज क्योंकि हुई है हमें ये खबर। बादलों की तरह हम तो बरसे बिना लौट जाने लगे थे मगर रो पड़े। आज दिल पे कोई ज़ोर चलता नहीं मुस्कुराने लगे थे मगर रो पड़े। कभी लिखा था हमने भी बस ज़रा सा मुस्कुराए तो ये आंसू आ गए वर्ना तुमसे तो कहना ये अफ़साना न था। ये राजनीति है जनाब यहां एक एक आंसू का हिसाब रखते हैं गिन गिन कर बदला लेते हैं। कोई कलाकार पेंटिग बना सकता है बादशाह के इंसाफ के तराज़ू के पलड़े पर कितनी लाशें एक पलड़े पर मगर झुका हुआ पलड़ा होता है जिस पलड़े पर किसी का इक आंसू गिर गया है। महिलाओं को अच्छी तरह मालूम है ये हथियार कभी नाकाम नहीं होता है उनका रोना किसी को जीवन भर रुला सकता है जब कोई तरकीब नहीं काम आती है आज़मा सकता है। आंसुओं पर दो कविताएं इक नज़्म पेशा हैं।

दो आंसू ( कविता ) 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू।  
 

मां के आंसू ( कविता ) 

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं। 
 
 
 
 

मई 21, 2021

व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया

   व्यथा-कथा चिट्ठी की ( दास्तान- ए- ज़माना ) डॉ लोक सेतिया 

 सदियों पुराना लंबा सफर है संदेश भिजवाने का मिलने का खुला पोस्टकार्ड मिलता था कभी बंद लिफ़ाफ़े को देख कर हाल समझ जाते थे। कितने फ़िल्मी गाने प्यारे प्यारे सुनाई देते थे चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए। जो दुनिया से रुख़सत हो जाते उनकी याद आती थी तब यही कहते थे उधर से कोई डाकिया चिट्ठी लेकर आता किसी तरह। अब मत पूछो संदेश भेजते हैं अपने दिल के जज़्बात बयां करते हैं हालात बतलाते हैं तो सोशल मीडिया पर कोई समझता ही नहीं। भीड़ है मगर सभी अकेले हैं जानते हैं मगर सभी अजनबी लगते हैं कभी कभी कोई पढ़ता है तो सच पढ़कर नाराज़ हो जाता है क्योंकि अजीब मौसम है व्हाट्सएप्प मेसेंजर का हर कोई अपनी कहता है और जवाब भी चाहता है जो उसको भला लगता हो वही लिख कर भेजे कोई।  ख़त दोस्ती और मुहब्बत को कायम रखते थे मगर ये नामुराद सोशल मीडिया वाले संदेश आपसी दूरी को और भी बढ़ा देते हैं चार कदम दूर बैठा भी दिल से इतना दूर हो जाता है कि सात समंदर पार की दूरी से भी अधिक फ़ासला लगता है। मुझे याद आया कॉलेज में रहते थे तब परिसर में छोटा सा डॉकघर हुआ करता था क्लॉस से हॉस्टल जाते बीच में रुकते दोपहर का भोजन करने से पहले कोई ख़त मिले यही हसरत होती थी प्यार की दोस्ती की अपनेपन की भूख पेट की भूख को भुला देती थी। कमरा नंबर बताते थे और डाकिया चिट्ठी पकड़ा देता था हज़ार युवक पढ़ते थे किसी का नाम ज़रूरी नहीं हुआ करता था। शायद ही किसी दिन मुझे निराशा होती थी जब कोई डॉक मेरे नाम की नहीं मिलती थी सभी दोस्त हैरान होते थे मुझे रोज़ कैसे चिट्ठियां मिलती हैं ये किसी ने नहीं समझा कि मैं हर दिन कितने अपनों को खत लिख कर भेजता था। उस ज़माने में कितने लोगों से कितने साल पास नहीं होकर भी रिश्तों में नज़दीकी बनाये रखी थी। वास्तव में मेरी ख़त लिखने की आदत ने ही मुझे लेखन की राह पर ला दिया है।
 
चिट्ठियां बड़ी संभाल कर रखते थे बंद बक्से में अलमारी में और कुछ बिस्तर पर सिरहाने तकिये के नीचे आधी रात को जागते फिर से पढ़ते थे। ख़त लिख दे सांवरिया के नाम बाबू कोरे कागज़ पे लिख दे सलाम बाबू। क्या ज़माना था स्याही की खुशबू की महक समाई होती थी लिखावट में जो पढ़ने वाले के भीतर समा जाती थी। बाज़ार से किताबों की दुकान से लेटर पैड और पैन चुनकर लाया करते थे। रंग बिरंगे पैड पर कलाकारी की हुई होती थी भेजने वाले की पहचान नज़र आती थी। कलम-दवात की स्याही से जेल पैन तक पहुंचते पहुंचते शब्द लिखावट साफ और गहराई बढ़ती गई मगर दिल को छूने वाले एहसास जज़्बात जाने कहां खो गए हैं। बात रूह तक नहीं पहुंच पाती आंखों से दिल में उतरती नहीं दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेते हैं हम आजकल। शायद अब कभी कोई इतिहास की धरोहर बनकर किताब में दर्ज किसी जाने माने नायक की लिखी चिट्ठियों को लोग याद ही नहीं करते। अमृता प्रीतम की जीवनी रसीदी टिकट जैसा अनुभव मिलता नहीं इधर शोहरत वाले अपनी आत्मकथा लिखते लिखवाते हैं मगर ज़िंदगी की वास्तविकता से कोसों दूर बनावट की बातें। अब  राजनेता की रेडियो पर कही तथाकथित मन की बात में मन की कोई बात होती ही नहीं अनबन की बात लगती है। 
 
फोन क्या आया सब बदलता गया और बदलते बदलते इतना बदला जो लोग खुद ही बदल गए। कभी फोन पर सभी से आपसी हाल चाल की बातें हुआ करती थीं। धीरे धीरे फोन का महत्व कम होता गया और औपचारिकता की बातें होने लगी। अब बस कुछ करीबी लोगों को छोड़ किसी का फोन आता है तो इक चिंता होती है क्यों आया है फिर भी सब ठीक हो तो सोचने लगते हैं कोई मतलब कोई ज़रूरत कुछ काम होगा और पूछने से बचते हैं बल्कि सोचने लगते हैं कोई बहाना बनाकर पीछा छुड़ाने को लेकर। रिश्तों की मधुरता जाने कब ख़त्म हो गई जब लोग स्वार्थी और खुदगर्ज़ बनते बनते आदमी से बेजान पत्थर बन गए हैं। अभी बीस साल पहले अख़बार पत्रिका में पाठकों की बात बड़ी महत्वपूर्ण समझी जाती थी संपादक पाठक को भगवान की तरह आदर देते थे आलोचना करने पर भी आभार जताया जाता था। विज्ञापन और पैसा टीआरपी जब से पाठक से बड़े लगने लगे टीवी अख़बार पत्रिका को प्रशंसा के पत्र ईमेल ही अच्छे लगने लगे हैं। डॉक से मिले खत रचनाएं धूल चाटती पड़ी होती हैं कहीं। वास्तव में ईमेल कभी चिट्ठियों की जगह नहीं ले सकते हैं। कारोबारी  बात सामान बेचने खरीदने या सरकारी सामाजिक संगठनों संस्थाओं की सूचनाओं का आदान प्रदान जानकारी टीवी अख़बार के खबर आदि से लेकर अपने आर्थिक उद्देश्य की ज़रूरत भर बन गए हैं पल भर बाद कूड़ेदान में मिलते हैं। 
 
यूं तो खतो -किताबत पर बहुत लिखा लिखने वालों ने। नसीम अंसारी कहते हैं " मैं रौशनी पे ज़िंदगी का नाम लिख के आ गया , उसे मिटा मिटा के ये सियाह रात थक गई।" लेकिन मैंने जब से चिट्ठी की जगह सभी को संदेश भेजने शुरू किये व्हाट्सएप्प के मायाजाल में उलझकर बड़े हैरतअंगेज़ अनुभव हुए हैं लोग सच से घबराकर बिना पढ़े समझे मुझे समझाने लगते थे व्यर्थ समय बर्बाद करते हैं किसी को सच्चाई से कोई मतलब नहीं रहा। लेकिन हद की भी हद नहीं होती जब लोग पढ़कर जवाब देने की जगह सवाल उठाते हैं लिखने का हासिल क्या है पूछते हैं। ऐसे में दुष्यन्त कुमार का शेर याद आना ज़रूरी है। कहते हैं दुष्यन्त कुमार " हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है।"