छुट्टियों का अभिप्राय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
छुट्टियां अपना भावार्थ बदल चुकी हैं
हमने भी छुट्टियां मनाना छोड़ दिया है
बचपन की छुट्टियां अभी तक याद हैं
लौट आते थे पढ़ने वाले सब बच्चे गांव
शहर नौकरी काम करने गए सब लोग
घर गांव गलियां लगती ख़ुशरंग कितनी
घर परिवार का कोई बड़ा मुखिया तब
पत्र भेजता या किसी को भेजता रहता
बुलाने लिवाने सभी बेटियों को घर पर
ससुराल से बाबुल के प्यारे आंगन में
बड़ी प्यारी हुआ करती थी वो छुट्टियां ।
दिन कैसे बीत गए पता नहीं चलता था
वापस लौटते थे सभी बारी बारी तब
ख़ूबसूरत यादों को साथ लिए हुए जिन्हें
जीवन भर सालों बाद भी भुला नहीं पाये
बड़े शहरों में रहते हुए खो गई हैं छुट्टियां
सोसाइटी की सड़कें सुनसान वीरान हैं
पड़ोसी अपने लगते अजनबी अनजान हैं
भीड़ में अकेलापन तन्हाई का आलम है
इधर उधर कहीं भागते फिरते हैं सब लोग
जाने किस चीज़ की तलाश में मालूम नहीं ।
पहाड़ों से हरी भरी वादियों जंगलों तक में
कोई सुकून कभी नहीं मिलता ढूंढते फिरते
रेगिस्तानों से लेकर नदियों झीलों किनारे
कितना कुछ करते हैं चाहा अनचाहा कहीं
उकताहट होती है समय लगता है थम गया
कितना पैसा खर्च कर समय व्यतीत कर के
लौटते हैं और भी ख़ामोश उदासी लिए हुए ।
शहरी समाज की सभी छुट्टियां लगती जैसे
बोझिल हवाएं लिए जिन में सांसें घुटती हैं
लगती थी बचपन वाली खुशियों की छुट्टियां
छोटी छोटी बातों जिनकी कीमत कुछ नहीं थी
कितनी अनमोल स्मृतियां संजोये प्रतीत होती
दिल चाहता तो है लौटना गांव छुट्टियों में कभी
मगर हम भूल गए गांव जाने वाले सब रास्ते
गूगल भी नहीं बता सकता लोकेशन हमको ।
















