जनवरी 29, 2023

दर्द भरी दास्तां ( अफ़साना ग़ज़ल का ) डॉ लोक सेतिया

       दर्द भरी दास्तां ( अफ़साना ग़ज़ल का ) डॉ लोक सेतिया 

ग़ज़ल की हालत देख कर आंसू निकल आए , इतने शानदार सभागार में मुशायरा आयोजित किया गया था , ग़ज़ल की उदासी देखी नहीं गई । देखा खड़ी थी अकेली इक कोने में अपने दर्द को अकेले सहती छुपती हुई , दुःख को छुपाती हुई । हाथ जोड़ निवेदन किया चलो आपकी जगह सामने सजे मंच पर है यहां नहीं आप को सुनने आये हैं हज़ारों चाहने वाले । ग़ज़ल कहने लगी ठीक से पढ़ो कहीं लिखा है मेरा नाम सब को किसी नाम वाले शायर को सुनना है देखो कितने शायरों के नाम उनकी तस्वीर लगी हैं बैनर पर ग़ज़ल की कोई तस्वीर कोई नाम होता नहीं है एहसास हुआ करते हैं । ग़ज़ल की बात कोई नहीं करता इन दिनों कुछ लोग जिनकी शोहरत है उनकी बात होती है मेरे अपने हैं लेकिन मुझसे अनजान हो गये हैं नाम शोहरत पहचान दौलत मिली तब से बेगाने बन गए हैं । ग़ज़ल ने अपनी दर्द भरी दास्तां मुझे सुनाई शायद किसी और को ग़ज़ल को क्या हुआ क्या क्यों हो रहा उसको घायल किया जा रहा कि क़त्ल किया जाने लगा है समझने की फुर्सत नहीं थी । तालियां बजती रहीं वाह वाह लोग कहते रहे और शायर लोग ग़ज़ल से बढ़कर जाने क्या क्या करते रहे । अब उसकी हिक़ायत खुद ग़ज़ल की ख़ामोश लबों की ज़ुबानी लिखी नहीं कही है उसने समझना चाहो तो समझना पढ़कर भूल मत जाना । 
 
महफ़िल में मुझे टुकड़े टुकड़े कर हिस्सों में बांटकर सुनाने वाले क्या मेरे आशिक़ हैं कोई शेर किसी ग़ज़ल का कोई मतला कोई बीच का भाग जैसे किसी महबूबा माशूका के मुखड़े जिस्म के अंगों की नुमाईश बाजार में कोई करे ।  ग़ज़ल आधी-अधूरी क्या मुकम्मल अच्छी नहीं लगती जैसे होंट आंखें कमर छाती हाथ पांव सब मिलाकर उसकी शख़्सियत की बात नहीं करते जिस्म को देखते हैं रूह से वाकिफ़ नहीं जो लोग । कोई किसी आयोजक को मुख़ातिब होकर पढ़ता है कोई अपनी किसी बात से जोड़ता है । ग़ज़लियत की ग़ज़ल की नफ़ासत की नाज़ुकी की ईशारों की मुहावरेदार भाषा की स्वभाव की बात को दरकिनार कर पथरीली आवाज़ में किसी जंग किसी नफरत की राजनीति से धर्म की चर्चा होती है जबकि ग़ज़ल का इस सब से कोई भी सरोकार कोई रिश्ता नहीं होता है । शासक राजनेता अधिकारी वर्ग संवेदना शून्य लोग मानवीय दुःख दर्द से जिनका कोई नाता नहीं मंच से शायरी करते हुए शायर और उसके अल्फ़ाज़ को बेरहमी से क़त्ल करते हैं । भला मेरा उनसे कोई संबंध मुमकिन है ग़ज़ल सच का आईना है सोने चांदी के गहनों से झूठ को सजाकर कुछ हासिल नहीं हो सकता हैं । अब न तो ग़ज़ल कहने का शऊर है शायरों में और न सुनने वालों में सुनने का सलीका और कोई पैग़ाम भी नहीं देती आधुनिक युग की रास्ता भटकी ग़ज़ल नाम की रचनाएं । 
 
ग़ज़ल किसी को बड़ा छोटा नहीं समझती और न किसी की महिमा का गुणगान करती है न ही किसी से टकराव करना जानती है ।  ग़ज़ल प्यार मुहब्बत इंसानियत का संदेश देती है उसको किसी सरहद की दिवारों में कैद करना मुमकिन ही नहीं है । ग़ज़ल ने इक सवाल पूछा है दुनिया भर में ग़ज़ल की महफ़िल सजाने वालों से कि वहां ग़ज़ल सुनने कहने पढ़ने कौन आते हैं और कौन किसी नाम वाले शायर को सुनने आते हैं । अगर ग़ज़ल की बात है ग़ज़ल से इश्क़ है तो बस ग़ज़ल का ज़िक्र हो बाक़ी सब को छोड़कर । ग़ज़ल कहने वालो मुझे अल्फ़ाज़ से बहर में छंद का ख़्याल रखते हुए बयां करना सीख लिया और मधुर स्वर में गाकर सुनने वालों को मुग्ध कर लिया लेकिन तौर तरीका अंदाज़ मेरे साथ मेल खाता नहीं तो बनाव श्रृंगार किस काम का । कवि सम्मेलन मुशायरे शोर लगते हैं ग़ज़ल से जो सुकून मिलता है वो नहीं दिखाई देता है । जो सुनकर लोग भीतर अंतर्मन तक महसूस कर स्तब्ध नहीं हो जाएं और ताली बजाना वाह वाह करना भूल खामोश रह जाएं वो लाजवाब ग़ज़ल सुनाई नहीं देती जो सभा से उठकर घर जाने पर भी ज़हन में गूंजती रहती हो ।  
 

 आखिर में मेरी डॉ लोक सेतिया 'तनहा' की इक ग़ज़ल पेश है  :-

दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल ।

वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल ।

वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल ।

आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल ।

बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल ।

जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम  नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल । 
 

 

जनवरी 23, 2023

दुनिया बनाने वाला हैरान परेशान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     दुनिया बनाने वाला हैरान परेशान ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ बात ऐसी हुई कि ऊपरवाला खुद अपने निवास स्थान को छोड़ नीचे धरती पर चला आया । सोचा था शायद वहीं चैन सुकून मिला तो वापस आसमानों की तरफ भूले से भी देखना नहीं । धरती पर आकर देखा तो दुनिया बदल चुकी थी जैसी उसने बनाई और जिस भविष्य की कल्पना कर धारणा बनाकर छोड़ दिया था दुनिया को खूबसूरत से भी बढ़कर शानदार सभी के जीने ख़ुशी से रहने को तमाम चीज़ें उपलब्ध करवा कर उसका कोई वजूद ही नहीं था । उसने कभी ऐसी दुनिया बनाने की चाहत नहीं की थी ये कोई और किसी शैतान की बनाई दुनिया लगती है । घूमते फिरते अजनबी लोगों से पूछता रहा ये कौन सी दुनिया है किस ने बनाया है ये सब तबाही का मंज़र दिखाई देता है कोई भी यहां जितना भी हासिल है उस को पाकर संतुष्ट नहीं है । चलते चलते कितने बड़े बड़े महल जैसे मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे गिरजाघर कितने धर्मों के धार्मिक स्थल नज़र आये काफी तहकिक़ात के बाद पता चला ईश्वर अल्लाह जीसस वाहेगुरु रहते हैं उन जगहों पर । देवी देवता पीर पय्यमबर फ़रिश्ते मसीहा संत साधु उपदेशक असंख्य नाम वाले गली गली शहर शहर बस्ती बस्ती गांव गांव विराजमान हैं जिनकी आराधना पूजा ईबादत आरती महिमा का गुणगान होता है । धन दौलत चढ़ावा तरह तरह के व्यंजन उनको भोग लगाए जाते हैं हीरे जवाहरात सोना चांदी के ज़ेवरात पहनाए जाते हैं । खुदा को अल्लाह को बंदे मनाए जाते हैं किस बात से खफ़ा हुआ दुनिया का मालिक कोई नहीं जानता भजन आरती अरदास क्या क्या नहीं जिस को रोज़ सुबह शाम दोहराए जाते हैं । इक पहेली है विधाता ईश्वर ख़ुदा कितने नाम हैं सभी सुलझाने की बात नहीं करते उलझन को बढ़ाए जाते हैं । इक दुनिया बनाने वाले के अनगिनत तस्वीरें बुत क्या क्या नहीं बनाकर बाज़ार में सिक्का जमाए मुनाफ़ा कमाए कारोबार चलाए जाते हैं ।  किसी कंपनी की तरह शाखाएं खोलते जाते हैं ख़रीददार को जो मांगोगे मिलेगा की तरह झांसा देकर उल्लू बनाए जाते हैं । 
 
आखिर उपरवाले को एहसास हुआ कि दुनिया को बनाकर उसे अपने हाल पर छोड़ आज़ादी से सबको मनमानी करने की छूट देना बड़ी गलती थी और उसको खुद हर दिन पल पल संभालना भी उसका दायित्व था । कुछ सहायकों को देखभाल करने को नियुक्त करने से सब सुचारु ढंग से नहीं चल सकता था । बहुत सोचने चिंतन करने के बाद विधाता ने निर्णय लिया जब तक तमाम समस्याओं को समझ नहीं लेते और समाधान नहीं खोज लेते उस आकाशलोक में नहीं लौटना है । बहुत दिन से दुनिया का मालिक फुटपाथ पर रह रहा है । उधर ऊपर जब मालिक बहुत समय तक दिखाई नहीं दिए तो उस लोक में सबको चिंता होने लगी ढूंढते ढूंढते थक गये सभी तब राज़ खुला किसी ने कटाक्ष किया था मालूम भी है जिस दुनिया को बनाया था किस हाल में है । भारत देश के लोकतंत्र की तरह सिंघासन पर विराजमान शासक अधिकारी सोचते हैं सब बढ़िया है शानदार है क्योंकि सरकारी आंकड़े योजनाएं सभी दिखलाते हैं चारों तरफ हरियाली है फूल ही फूल खिले हैं । भूख गरीबी बदहाली अन्याय अपराध भेदभाव जनता की समस्याएं कब की मिटाई जा चुकी हैं उन फाईलों को दीमक चाट गई है और अधिकारी कर्मचारी सरकारी अनाज के गोदामों को पेट भरकर खाते खाते मस्ती में झूमते रहते हैं । देश का सारा धन दौलत साधन पांच फ़ीसदी अमीरों का  है बाकी को कुछ नहीं मिला और उनको समझाया गया है कि ये उनकी फूटी किस्मत है बदनसीबी है । सरकार समाज का कोई दोष नहीं है दुनिया बनाने वाले ने सबको एक समान देने का प्रावधान नहीं किया है तभी जिसकी लाठी उसकी भैंस का शासन कायम है । मुश्किल अजीब है ऊपरवाला अपनी बनाई दुनिया को  देख कर दंग है और जिनको बनाया था वो बंदे उसको पहचानते नहीं मानते ही नहीं खुद ईश्वर धरती पर आया है अपने आप बगैर किसी कर्मकांड आयोजन किये ।  

उपरवाले को खोजते खोजते उस लोक वासी धरती पर पहुंचे और बदली दुनिया के हालात उसके आधुनिक अंदाज़ को देख समझ कर विधाता को मनाने लगे ज़िद छोड़ अपनी आसमानी दुनिया को लौट चलें । बस अब बहुत देर कर दी तुमने दुनिया को बनाकर सुध बुध नहीं ली अब सब ने अपने अपने भगवान खुदा देवी देवता बना लिए हैं । दुनिया  को उनके खुद के बनाये नकली भगवानों के रहमो करम पर छोड़ कोई और नई असली दुनिया बनाओ  ये सब मानते भी हैं कि असली दुनिया कहीं कोई और है । लेकिन ऊपरवाला नहीं माना उस से अब कोई नई दुनिया बन ही नहीं सकती अपनी गलती की सज़ा झेलनी पड़ेगी उसको फुटपाथ पर रहना होगा प्रायश्चित करने को ।  टीवी पर देखा कोई फ़िल्मी अदाकारा को आरती कर रहे थे कोई किसी शातिर अपराधी को मन की बात समझने वाला समझ उसके पांव पकड़े थे कोई किसी राजनेता की तस्वीर के सामने सर झुकाए खड़े थे , कितने लोग अपना भगवान खुदा कितनी बार बदल रहे थे । दुनिया असली कैसे रहती जब दुनिया वालों ने अपनी पसंद से साहूलियत को देख ईश्वर नकली बनाकर उनकी भक्ति शुरू कर दी है ।



जनवरी 20, 2023

पानी का सफ़र ज़िंदगी भर ( चलते-चलते ) डॉ लोक सेतिया 

     पानी का सफ़र ज़िंदगी भर ( चलते-चलते ) डॉ लोक सेतिया  

   न जाने किसकी कही बात पढ़कर अपनी ज़िंदगी के सफर को बयां करने को शब्द मिले शीर्षक की तलाश थी पूरी हुई । अब क्या लिखना सोचने की ज़रूरत नहीं है लेकिन आसान भी नहीं जीवन की कड़ियों-लड़ियों को तरीके से जोड़ना सिलसिलेवार शुरआत से अभी तलक जारी सफर तक । इक बहता हुआ पानी जिसे खुद अपने उद्गमस्थल  का पता नहीं किधर जाना कब तक कहां तक चलते रहना कोई खबर नहीं । कहीं किसी ने शब्द लिखे हुए थे , पत्थरों पर पानी के निशां रहते हैं मगर पानी पर कोई निशां पत्थरों का नहीं रहता है । पत्थर ही पत्थर मिलते रहे नसीब से कोई रास्ते में रुकावट बनकर कभी कोई किसी ने हाथ से उछाल कर फैंका मुझे आहत करने को । राह के रोड़े पत्थर से टकराता बचता राह बनाता बढ़ता गया और जितने भी जिस जिस ने मेरे भीतर हलचल पैदा करने को फैंके पत्थरों को अपने भीतर संजोता गया उछालने वालों पर कुछ फुहार की तरह छींटे देकर भिगोता हुआ । कोई किनारा किसी नदी की तरह मुझे नहीं मिला बांध कर रखने को मेरी फितरत आज़ाद सफर जिधर मर्ज़ी चलते रहने की बनी रही । अभिलाषा है किसी रेगिस्तान में मरु उद्यान बनकर कुछ फूल कुछ पेड़ पौधे कुछ पंछियों पशुओं राह चलते गुज़रते आते जाते मुसाफिरों की प्यास बुझाने को उपयोगी बन कर रहने की । 
 
     मैंने पहले बताया था मैं इक पौधा हूं जो उग आया किसी तपते रेगिस्तान में जैसा लगता है जिस को कितनी बार कुचला गया पैरों तले कभी आंधियों तूफानों ने बर्बाद किया कभी जानवर खाते उजाड़ते रहे । मैं जाने क्यों और कैसे दोबारा उग जाता रहा भले बौना रहा कद मेरा और फ़लदार नहीं बन पाया हालात की सौग़ात के कारण । मैं प्यासा हूं खुद पानी होकर भी अपनी नियति पर हैरान भी हूं , मेरा कोई ठिकाना नहीं मेरा घर है जिस में दुनिया बसती है कितने अपने पराये रहते हैं बस अनचाहा महमान भी मैं ही हूं । बहता पानी बनकर अपने निशां सभी पर छोड़े हैं ऊबड़ खाबड़ पत्थरों को सलीके से तराशा है उनकी शक़्ल को कितना नर्म मुलायम बना दिया है । कभी कभी तो कोई पत्थर कीमती बन कर ऊंचे आलीशान भवनों की शान बन गया या किसी महल की गुंबद होकर खुद पर इतराने लगा है । पत्थर को देवता भगवान बनाया मैंने अपने हाथ से तराशकर और वही मुझ से मेरी निशानी मांगते हैं जब मैं उनको नहलाने को लाया जाता हूं पावनता की कसौटी पर जांचा परखा जाता हूं । कितने नामों से जाना जाता हूं लेकिन इन्हीं सब बातों में वास्तविक अस्तित्व को खो जाता हूं । 
 
   इक हरियाणवी लोक कथा की बात याद आई पानी और प्यास को लेकर । अपने खेत पर कुंवे पर पानी की गागर भरती पणिहारिन से राह चलते चार राही पानी पिलाने की बात कहते हैं तो पणिहारिन पहले अपना परिचय बताओ तभी पिला सकती हूं अजनबी अनजान लोगों बात नहीं करती । पहला व्यक्ति जवाब देता है कि हम मुसाफ़िर हैं , पणिहारिन बोलती है कि मुसाफिर तो दो ही हैं सूरज और चांद तुम कैसे मुसाफिर कहला सकते हो । तब दूसरा व्यक्ति जवाब देता है कि हम प्यासे हैं , पणिहारिन बोलती है कि दुनिया में प्यासे तो दो ही हैं एक चातक पंछी और दूसरी धरती माता तुम प्यासे कैसे कहला सकते हो । तब तीसरा व्यक्ति जवाब देता है कि हम तो बेबस हैं ,  पणिहारिन बोलती है कि तुम बेबस कैसे कहला सकते हो बेबस तो दो हैं दुनिया में इक गाय और दूसरी कन्या । ऐसे में चौथा व्यक्ति कहता है कि हम तो मूर्ख हैं , तब पणिहारिन बोलती है कि मूर्ख तो दो होते हैं जगत में इस का जवाब कहानी के आखिर में देती है पणिहारिन न्यायधीश को । पानी को लेकर बहुत कुछ समझाया गया है फिर भी समझना बहुत बाक़ी है ।  तू पी - तू पी राजस्थानी लोक कथा है तो इक नीति कथा धरती का रस भी है मगर हम पानी पानी रटते हैं प्यास कैसे बुझेगी बिना पिये पानी । धरती समंदर पर पानी ही पानी है फिर भी पीने को पानी काफ़ी नहीं खारा और खराब प्रदूषित पानी बेकार है । कभी आंख का शर्म का पानी हुआ करता था इंसानों में सबसे मूलयवान आजकल ढूंढने से दिखाई नहीं देता । ज़िंदगी भर जारी रहता है जो सफर उस में पानी की अहमियत बहुत है । पानी और प्यास का रिश्ता क्या है कोई समझ नहीं सका अभी भी , ये किस की बात है कौन जाने । 



 
 

जनवरी 15, 2023

नकली की कीमत असली की चाहत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  नकली की कीमत असली की चाहत नहीं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   ये युग ये आधुनिक काल सब इक धोखा है छल है कुछ भी सच में असली नहीं है हम खुद असली इंसान नहीं हैं इंसान कहलाते हैं बन नहीं सकते इंसानियत झूठी है आडंबर करते हैं ज़रूरत पड़ने पर हैवानियत जाग जाती है और इंसानियत को क़त्ल कर क़ातिल हो कर भी मसीहा होने का दम भरते हैं । रिश्ते नाते खुशियां क्या दुःख-दर्द तक वास्तविक नहीं दिखावे को होते हैं । सोशल मीडिया पर सभी संदेश खोखले होते हैं जिन में भावनाएं नहीं औपचारिकताएं निभाते हैं हमदर्दी नहीं किसी के साथ न किसी से कोई वास्तविक एहसास ख़ुशी का आनंद का । मिलते नहीं मिलना ज़रूरी नहीं लगता बात तक करने की फुर्सत नहीं है हर कोई अकेला अपने आप में ग़ुम है अपने से अजनबी मगर अनजान अजनबी लोगों में अपनापन ढूंढता है । अपनी फेसबुक व्हाट्सएप्प पर लिखते हैं जो खुद भी शायद समझ नहीं पाते दुनिया को समझाते हैं और लाइक्स कमैंट्स को दौलत मनाते हैं कमाई हुई आसानी से । सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक उपदेश तक सभी बेअसर साबित होते हैं अनुचित आचरण अनैतिक कार्य बढ़ते जाते हैं समाज नीचे गिरता जाता है । दोस्ती नकली है संख्या भर है हमेशा साथ निभाने वाला कोई नहीं मिलता है । प्यार इश्क़ मुहब्बत सब कुछ बाज़ार जैसा है कब क्या हो कोई नहीं जानता सभी ख़ुद को सच्चे आशिक़ समझते हैं और निभाने की बात पर हज़ार बहाने होते हैं । संग संग जीना मरना कोई नहीं समझता जब तक निभ सके ठीक है फिर अलग राह चुनते हैं दोनों आशिक़ मशूका । 
 
    देश सेवा का कारोबार नकली है गरीब , साहूकार नकली है जनता की चुनी उसकी सरकार हर बार नकली है , टीवी चैनल का हर इश्तिहार नकली है । भगवान असली आजकल नहीं दिखाई देता है ईश्वर के नाम पर मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे में कोई और रहता है जो बड़े छोटे अमीर गरीब ऊंचे नीचे धनवान सबको दर्शन देता है चढ़ावा और शान ओ शौकत का सामान बनकर । मन मंदिर आत्मा और सच्चे ढंग से प्रार्थना करने की कोई शर्त नहीं है मनमर्ज़ी से अधर्म करते जाओ और तीर्थ स्थल पर करोड़ों दान दे कर धर्मात्मा कहलाओ । मौसम का मिजाज़ नकली है नकली हवाएं नकली दवाएं क्या दुआएं भी असली नहीं हैं संतों महात्माओं का आशिर्वाद नकली है आश्रमों का धर्म वाला हिसाब नकली है । कीमत ऊंची है नकली चीज़ों की असली का कोई चाहने वाला नहीं मिलता है । घर भी नकली हैं गलियां चौराहे सब नकली हैं रौनकें नकली हैं उत्स्व नकली हैं मनोरंजन असली नहीं फूहड़ता और असभ्य भाषा नग्नता को परोसना फिल्म टीवी सीरियल का गंदा कारोबार बन गया है । समाज को दिशा दिखाना नहीं भटकाना फ़ायदे का कारोबार हो गया है । उपचार करने वाला सबसे बड़ा बीमार हो गया है ।  दोस्त से नफरत , दुश्मन से प्यार हो गया है , झूठों का सरदार सच का झंडाबरदार हो गया है , सच  असाध्य रोग का रोगी बन गया है उसका नहीं संभव उपचार हो गया है ।  
 
   भाग दौड़ नकली है चाहतें ख़्वाहिशें नकली हैं नकली शोहरत नकली ऊंचाई नकली मसीहाई है असली की बात मत पूछो रामदुहाई है । दिन - रात नकली दूल्हा बरात नकली है गठबंधन नकली है रस्में-क़स्में नकली हैं  शहनाई की आवाज़ नकली है सर का हर ताज़ नकली है । नकली हंसी आंसू भी नकली संबंधों के वादे नकली हैं कौन निभाना याद रखता है । खुद हम सभी अपनी असलियत छुपाते हैं जो हैं नहीं वही होने का यकीन दुनिया को दिलाते हैं । सच से डरते हैं झूठ बोलकर इतराते हैं सच का दर्पण देखते नहीं कोई दिखा दे तो घबराते हैं । ज़िंदगी भर झूठ को सच साबित करते करते आखिर सच में मर जाते हैं मौत के बाद ज़िंदा रहने की आरज़ू में ज़िंदगी भर इक बोझ उठाते हैं खुद से नज़रें चुराते हैं । असली की बात से हम सब भागते हैं डरने लगे हैं असली चेहरे से नकाब को पहचान बना बैठे हम झूठे नकली दुनिया के बनावटी लोग ।  



 
 

दिसंबर 29, 2022

क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

   क़िताब की दर्दनाक दास्तां ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

ये लिखने वाला भी नहीं जानता था छापने वाले को भी शायद इसकी उम्मीद नहीं थी किताब की बदनसीबी थी जो नहीं होना चाहिए था वही हो गया । क़िताब की ये व्यथा कोई समझेगा भी कैसे जब किसी को कागज़ की लिखावट छपाई काले रंग की स्याही की पढ़ने को लुभाती नहीं है । कहीं किसी कोने में पड़ी हुई है कितनी किताबों के बीच दबी हुई ख़ामोश हैं सब की सब अपना अपना अकेलापन अकेले सहती हुई । कोई किताब नहीं जानती उसके साथ पड़ी किताब के पन्नों पर क्या लिखा है । किताबों में क्या क्या नहीं है खुशियां हैं संवेदनाएं हैं शिक्षा है ज्ञान है जीवन की वास्तविकता से काल्पनिक परीकथाओं मनोरंजन तक सब है दुःख दर्द मानवीय सरोकार से प्यार मुहब्बत रिश्ते समाजिक संबंध की समझ शामिल है अथाह समंदर है । लेकिन जब कोई भीतर झांकता ही नहीं तो कंकर पत्थर हीरे मोती की परख कैसे होगी । कभी किताब को सर पर माथे पर लगाते थे आजकल किताब रद्दी वाले कबाड़ी के झोले में सिसकती दिखाई देती है । आपको हैरानी हो रही है तो बताना ज़रूरी है सुबह गली से गुज़रते कबाड़ी पर नज़र पड़ी तो बिल्कुल नई नवेली दुल्हन जैसी किताब दिखाई दी मुझे छत पर खड़े हुए । आवाज़ देकर रोका तो उसको लगा मुझे भी कोई पुराना सामान बेचना है , मैंने घर से बाहर गली में जाकर बात की और किताब की बात की तो उसने कहा आपको चाहिए तो दस रूपये कीमत है । अचरज से सवाल किया जिसने बेची दस रूपये में बेची है , नहीं साहब पांच रूपये में ख़रीदी है दस में बेचूंगा । खैर मैंने उसको मनचाहे दाम देकर किताब खरीद कर सर माथे लगाया और मां सरस्वती से क्षमा याचना की कहा जिस किसी ने भी ऐसा अपराध किया उसको माफ़ करना । 
 
कितने बड़े लेखक की पुस्तक है और कितनी बहुमूल्य कालजयी रचना बताकर इक और जुर्म नहीं करना चाहता फिर भी अनचाहे ही सालों पुरानी घटना याद आ गई है । लिखता था अखबार पत्रिकाओं में भी रचनाएं छपती थी और कई साथी सलाह देते रहते थे किताब छपवानी चाहिए । महानगर जाना हुआ तो इक प्रकाशक जो खुद बड़े नाम वाले लेखक भी थे उन से मुलाक़ात करने चला गया । उनको अपनी पांडुलिपि देकर निवेदन किया कि पढ़कर बताएं रचनाएं छपने के काबिल हैं भी या नहीं । जैसे कोई हंसता है उपहास करने जैसा जवाब मिला उन्होंने कहा हिंदी में किताब पढ़ता कौन है , ये तो आपको खुद पैसे खर्च कर दोस्तों को निःशुल्क बांटनी पड़ती है । उस के बाद कितने पन्नों की कैसी किताब कितनी प्रतियां कितने हज़ार में छपेंगी हिसाब समझाने लगे थे । ये सपने में भी नहीं सोचा था बस किसी तरह निकला बाहर भागा तेज़ी से सड़क तक आते आते सांस चढ़ी हुई थी ।
 
तीस साल बीत गए फिर किसी प्रकाशक से मिलने का हौंसला नहीं कर सका । जीवन में बहुत उल्टा सीधा कर लिया तब विचार आया चलो ये भी कर देखते हैं कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा ही सही । ये आदत रही है आगे बढ़े कदम रुकते नहीं और मंज़िल की चाह रखे बगैर सफर करता रहा हूं । जिस जहां की जिस मंज़िल की तलाश मुझे है शायद इक ख़्वाब ही है जिस को हक़ीक़त बनाना मेरी आरज़ू है । सब सोच समझ कर पूरी तैयारी से किताब छपवाने का हौसला किया और किताब छपवा कर समझा सब शानदार अनुभव है । लेकिन कहां मालूम था कि अभी दुश्वारियां ही दुश्वारियां सामने हैं । किताब छपना काफी नहीं पाठक तक किताब पहुंचाना उसको पढ़ने को उत्साहित करना टेढ़ी खीर है । लिखने वाला फिर उसी मोड़ पर खड़ा होता है कभी अखबार पत्रिका वाले खूब आमदनी करते हैं लेकिन लिखने वाले को कोई कीमत नहीं मिलती किसी बंधुआ मज़दूर की तरह या नाम को मानदेय राशि जिस से कोई जीवन यापन नहीं कर सकता है । नवोदित लेखक को आसानी से सोशल मीडिया पर किताबों के सौदागर मिलते हैं जो बिना परखे रचनाओं की किताब छापने का कारोबार कर खूब कमाई करते हैं । उस के बाद किताब की हालत पर कोई ध्यान नहीं देता , कोई खुद को लेखक समझने कहलाने पर संतोष कर लेता है कुछ हज़ार खर्च कर और कोई किताबें छापने का मुनाफ़े का व्यौपार कर मौज से रहता है । कितनी तरह की किताबें कहां अपनी बदहाली पर आंसू बहाती हैं किसी को अपनी दर्द भरी व्यथा कथा सुना नहीं सकती हैं । उस के आगे की दर्द भरी दास्तां कैसे लिखें किस को पढ़नी है क्योंकि लिखने वाला भी इक दौड़ में शामिल होने को अभिशप्त है इनामात सम्मान नाम शोहरत की भागम भाग में वास्तविक उद्देश्य समाज को आईना दिखाने का बदलाव का न्याय समानता का भेदभाव समाप्त करने वाले देश समाज दुनिया के निर्माण का पीछे छूट जाता है ।

तो इस वजह के चलते मर्दों से ज्यादा रोती हैं औरतें - Women Cry More Due To  Hormonal Changes - Amar Ujala Hindi News Live

दिसंबर 16, 2022

किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है ) डॉ लोक सेतिया 

 किताबें मेरी ख़त हैं दोस्ती वाले ( अंदाज़ अलग है )  डॉ लोक सेतिया 

                        जनाब साक़िब लखनवी अज़ीम शायर हैं कहते हैं

               ' ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था  ,  हमीं सो गये दास्तां कहते कहते '।

                       कोई पचास साल पहले कही थी मैंने पहली ग़ज़ल 

               ' किसे हम दास्तां अपनी सुनाएं  , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं ।

  उसी इक दोस्त इक मेहरबां की तलाश में क्या क्या नहीं लिखता रहा । बेनाम शख़्स अनजान नगर गांव  , बिना पता - जाने , ठिकाना बताए , भेजे ख़त लिख लिख कर कोई जवाब नहीं मिला , अधिकांश ग़ुम हो गए , कुछ वापस लौट आए मेरे पास खुद ही भेजे खुद ही पढ़े बार बार । ज़माना खुद को समझदार कहता है दावा करते हैं लिफ़ाफ़ा देख कर ख़त का  मज़मून भांप लेते हैं काश किसी ने खोला होता और समझने की कोशिश की होती कि मेरे लिखे ख़त नहीं भीतर इक कोरा कागज़ भेजा है । मेरी मन की किताब को किसी ने झांका तक नहीं बस बाहर से आवरण को देख कुछ और ही समझते रहे लोग । पुस्तक का बाहरी कवर देख लोग भटक भी जाते हैं तो कभी अंदर लिखा पढ़ कर हैरान हो जाते हैं कुछ ऐसा संभव था कोई मुझे भीतर तक गहराई से जानता समझता तो जैसा सोचा उस के विपरीत पाकर दंग रह जाता । हर कोई चेहरा देखता रहा लिबास की सिलवटें गिनता रहा , साफ मन की कद्र किसी ने नहीं जानी । कभी जब लिखनी होगी किसी किताब के पन्नों पर अपनी कहानी , प्यास को हम लिखेंगे तब पानी । यही आदत रही है हमने कभी साक़ी को अपनी प्यास दिखलाई ही नहीं ज़िंदगी भर खाली जाम लिए बैठे रहे दुनिया की महफ़िल के मयख़ाने में । दोस्ती की भाषा समझते ही नहीं लोग , सभी को निस्वार्थ दोस्ती क्या होती है नहीं पता मतलब की बात सभी जानते हैं । इस दौर की दुनिया की महफ़िल में सिर्फ मैं ही तनहा नहीं रहा सच तो ये है कि भीड़ में हर कोई अकेला नज़र आया मुझे । ये कहने को लिखी अपनी पुरानी इक ग़ज़ल पढ़ता हूं , शायद समझ सके कोई ।
 

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया ।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा-सा नज़र आया ।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा-सा नज़र आया ।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया ।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ।   
 
   साक़िब लखनवी जी इक शेर में कहते हैं ,  कोई नक़्श और कोई दीवार समझा , ज़माना हुआ मुझ को  चुप रहते रहते । शायद यही होता है ख़ामोश रहने से मगर बोलने से कब कौन क्या समझता है कहना और भी मुश्किल है । तभी बहादुर शाह ज़फ़र जी कहते हैं बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी , जैसे अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी । मैंने कुछ और लिखा मगर ज़माने ने कुछ और पढ़ा समझा जो जिस का नज़रिया था उस ने अपने ढंग से अर्थ निकाल लिया । जब कई साल बाद मुझे अपने लेखन को  पुस्तक के आकार में छपवाना शुरू किया तब जान पहचान वाले लोगों दोस्तों को शायद लगा जैसा सभी किताब छपवाते हैं नाम शोहरत ईनाम पुरुस्कार आदि की कतार में खड़े होने को वही चाहत रही होगी । कुछ दिन बाद कुछ लोग पूछने लगे कि कैसा रहा पाठक वर्ग की प्रतिक्रिया , मुझे यकीन है ये सवाल करने वालों ने खुद मेरी किसी किताब को ठीक से पढ़ा नहीं होगा अन्यथा वो मुझ से रचनाओं भावनाओं की बात करते न कि इस तरह औपचारिक दुनियादारी की बातें । उनको रूचि थी कितनी किताबें बिकी कितनी आमदनी घाटा हुआ क्या खोया क्या पाया , मुझे इनकी चिंता कभी नहीं थी । कभी कभी होता है लेखक की बात पाठक को अपने अनुसार कुछ अलग लगती है जो स्वाभाविक है मगर कभी कोई शब्दों भावनाओं को ही नहीं समझता तब उलझन होती है । मुझे जिस की चाहत थी आखिर वो दिन वो पल-क्षण आ ही गए हैं । हर दिन कहीं से कोई फोन पर कॉल कर बात करता है क्या डॉ लोक सेतिया जी बात कर रहे हैं , हां कहने पर बताते हैं आपकी किताब मिली किसी तरह से पढ़ कर मन किया बातचीत करने को जानने समझने को । यही वास्तविक मूल्य है किताब का चाहे किसी भी लेखक की हो ।
 
   कई बार ये बात कही है पहले भी , मैंने हर वर्ष डायरी शुरू करते एक ही हिसाब याद किया है वो ये कि पिछले साल कितने दोस्त बने कितने खो गए कितने अजनबी साथ चले कितने हमराही बिछुड़ गए । जैसे अधिकांश दुनिया वाले धन दौलत सोना चांदी हीरे जवाहरात के बढ़ते घटते खज़ाने का बही खाता लगाते हैं । मेरे पास इक पलड़े में दोस्ती रिश्ते नाते रहे हैं और तराज़ू की दूजी तरफ पलड़े में सच लिखने का मेरा जूनून और दोनों को बराबर रखने का असंभव सा काम जैसे दोधारी तलवार पर चलना मेरी विवशता रही है । सदा यही भरोसा किया है कोई भी मुझे पढ़ेगा समझेगा तो दोस्त बन कर हमेशा साथ रहेगा । किताबों ने मुझे कितने ऐसे लोगों से परिचित करवाया है यही दोस्ती मेरी सच्ची पूंजी हैं । कभी पढ़ा था किसी लेखक को समझना है तो उस के लेखन को पढ़ना ज़रूरी है अन्यथा नहीं जान सकते । मुझे आप या अन्य लोग जो समझते हैं बिना पढ़े ही सही नहीं हो सकता है , जानता हूं किसी को फुर्सत कहां मुझे जाने समझे फिर भी कभी जिन को दोस्ती प्यार मुहब्बत की ज़रूरत है पढ़ कर मेरी तरह दोस्त तलाश कर सकते हैं । मुझसे करोगे दोस्ती या कोई और मुझ से बेहतर ढूंढना चाहोगे ये आपकी मर्ज़ी है । 
 

 




 

दिसंबर 12, 2022

भूल गए कलम की बात लिखना ( जुर्म-बेलज़्ज़त ) डॉ लोक सेतिया 

 भूल गए कलम की बात लिखना  ( जुर्म-बेलज़्ज़त ) डॉ लोक सेतिया  

  ये कैसे हुआ कलम उदास है किसी लिखने वाले को लेखनी की याद तक नहीं आई । मुझे उसकी हालत पर रोना आ गया । हाथ में लेकर चाहा आजकल के दौर को लेकर कुछ लिखना तो लगा जैसे स्याही सूख गई है मेरी कलम की । कलम को मेरी विवशता समझ आई तो कहने लगी तुमने हमेशा अपने अश्कों से अपने लहू से समाज की दुःख दर्द की बात कही है । लिखते लिखते जीवन बिताया है और तब कहीं जाकर खुद अपने और किताबों को लेकर लिखा है अन्यथा अपना सुख दुःख ख़ुशी ग़म छोड़ समाज की खातिर आंसू बहाए हैं तुमने । आज जब मुझे थामा है उठाया है कलम को समाज की वास्तविक दशा लिखने को तब मेरी बेबसी पर परेशान हो रहे हो । मैं इस दौर की सच्ची बात लिख नहीं सकती क्योंकि समाजिक मर्यादाओं आदर्शों नैतिक मूल्यों का पतन इस सीमा तक हो चुका है कि लिखने को स्याही आंसू नहीं खून भरना पड़ेगा और लिखने वाले तुझ में खून बचा ही कितना है और किसी का लहू तुम नहीं भर सकते मुझ में , भले आदमी का लहू पानी से सस्ता बाज़ार में मिलता है । साहित्य शिक्षा से लेकर देश समाज की वास्तविकता की बात करने खुद को सच का झंडाबरदार समझने वाले तक कलम से नाता तोड़ चुके हैं कागज़ कलम स्याही की दवात बीते ज़माने की बात हो गये हैं । कलम क्या होती है तलवार को पराजित कर सकती है इस को समझना उनके बस की बात नहीं जो बिक कर लिखते हैं अपना ज़मीर मार कर चाटुकारिता करते हैं और जिसकी अनुकंपा से धन दौलत सुख सुविधा साधन पाते हैं उन्हीं की भाषा में राग दरबारी गाकर शासकों का गुणगान करते हैं उनको मसीहा बतलाते हैं । 
 
  कलम की व्यथा-कथा कोई लिखे भी तो कैसे जब कलम खुद प्यासी है और कोई भी स्याही किसी भी लिखने वाले क़लमकार के पास बची नहीं है । जिस कलम से मुहब्बत की दास्तानें लिखी प्यार वाले गीत लिखे ग़ज़ल कविता में एहसास भरे उस कलम से आधुनिक युग की खोखली झूठी मनघडंत कहनियां कोई किस तरह लिख सकता है हाथ कांपते हैं रूह बेचैन होती है ये हालात देख कर जब हर तरफ हिंसा नफरत और समाज को बांटने की कोशिश करने को बढ़ावा दिया जा रहा है । अनैतिकता आदर्श बन गई है और देशसेवा लूट का कारोबार और घना अंधकार खुद को सूरज घोषित कर रहा है । तस्वीरों ने अपनी झूठी चमक दमक से शब्दों को धुंधला कर दिया है कलम ने जो लिखा पढ़ा नहीं जा सकता है समय की धूल ने कागज़ किताब को ढक दिया है और आईना वास्तविक शक़्ल को नहीं दिखलाता है जो बहुत भयानक बदसूरत है आधुनिक समाज की और नकली रौशनी सबको परेशान कर रही है । आंखें हैं फिर भी अंधे बने हैं लोग मुंह में ज़ुबान है फिर भी गूंगे बन गए हैं सभी , सब सामने है मगर दिखाई कुछ भी नहीं देता । सभी लिखने वालों ने अपनी कलम को या तो कहीं रख छोड़ा है बेकार बेजान समझ कर या उस से रिश्ता तोड़ लिया है और लैपटॉप कंप्यूटर कीपैड पर उंगलियां चलती हैं लिखती हैं शब्द जिन में संवेदना का अभाव होता है । 
 
  ऐसे में पुरानी बंद पेटी से कितने ख़त कितने रंगों की स्याही से अलग अलग लिखावट के अनगिनत स्वरूपों वाले निकाल देख रहा हूं । इक इक शब्द एहसास से भरा हुआ महसूस होता है किसी डायरी में कोई सूखा फूल अभी भी याद ताज़ा कर रहा है और कोई किताब के पन्नों के बीच रेशमी राखी जैसा धागा आधी पढ़ी किताब की याद दिलाता है । कैसे कैसे कागज़ कितनी तरह की छवियां कितने रंग की खुशबूदार स्याही देख कर लगता है उन फूलों भरे गुलशन को छोड़ हम लोग इक तपते झुलसते रेगिस्तान में चले आये हैं , भागते फिरते हैं किसी हिरण की तरह चमकती रेत को पानी समझ मृगतृष्णा का शिकार हुए हम सभी । कितना कुछ याद रहता है जो भुलाये नहीं भूलता पुराना बेहद खूबसूरत हुआ करता था । काश कोई फिर से लौटा सकता वो गुज़रा ज़माना । कलम का कागज़ से स्याही वाला रिश्ता बहुत अच्छा था बड़ा सुहाना ।  







दिसंबर 11, 2022

बनाकर खुद इस को परेशान ( इंसान भगवान ) डॉ लोक सेतिया 

   बनाकर खुद इस को परेशान ( इंसान भगवान ) डॉ लोक सेतिया 

     आदमी को भी चैन नहीं आया भगवान की दुनिया से अलग अपनी इक अजीब करिश्माई जहां की तामीर कर ली । नाम कितने हैं सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प टीवी स्मार्ट फोन काल्पनिक कितने ही किरदार कठपुतली जैसे बनाए अपनी उंगलियों पर नचाने को खेल से लेकर जंग तक मुहब्बत से लेकर नफरत तक दोस्ती दुश्मनी दोनों आधुनिक दुनिया में कभी कुछ कभी कुछ रंग बदलने वाले । फेसबुक की झूठी दुनिया असली लगने लगी और वास्तविक धरती आसमान हवा पानी पेड़ पशु पंछियों की दुनिया किसी काम की नहीं लगने लगी है । कौन जाने जैसे खुद बनाए इस मायाजाल से आदमी परेशान हुआ लगता है चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा पा रहा , अनावश्यक ही समय व्यर्थ बर्बाद कर रहा है आदत बन गई है नशा बन गया है कुछ भी हासिल नहीं होता फिर भी आशिक़ी की तरह दिल लगता नहीं सोशल मीडिया के बगैर जीना बेकार लगता है , ऊपरवाला भी पशेमान रहता हो जब दुनिया उसके मनचाहे ढंग से नहीं चलती और इधर उधर जिधर किधर भटकती रहती है । इक लोक कथा में दैत्य बना कर कोई सृजनकार खुद उसी का शिकार हो जाता है और जिसको खुद तराशा हाथों से अपने , वही पूछता है बनाने वाले से निशानी होने की उसकी । भगवान से इंसान उसी तरह सवालात करता है और भगवान से जवाब देते नहीं बनता है । 
 
  फेसबुक बनाते समय लगता था यही जगह है ख़ुशी सुकून खूबसूरत रिश्ते दोस्ती प्यार सब मनचाही मुरादें मिल जाती हैं , धीरे धीरे सब कागज़ी फूल हाथ लगाते बिखरते गए । दिन भर तरसते ही रहे कोई बात तो करे  , मुझको कहां खबर भी इशारों का शहर है ये अल्फ़ाज़ मेरे इक स्वर्गवासी दोस्त की ग़ज़ल से लिये हैं । नकली जलते बुझते सितारों की रौशनी से कुदरती नज़ारे छुप गए हैं । सुनहरे ख़्वाबों की दुनिया इतनी भाई है कि हर कोई जागते हुए भी सपने देख कर मस्ती में झूमता रहता है । बंद कमरे में खुद कैद होकर समझते हैं दुनिया भर को कैद कर लिया है । अपने ख़्यालात दिल के जज़्बात ख़ुशी दर्द नर्म मुलायम से सख़्त शब्द तलवार जैसे अल्फ़ाज़ सभी भरी महफ़िल बयां करते हैं बेशक किसी को किसी से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है । बधाई शोक संदेश बुलाना सब औपचरिकता निभाते हैं सिर्फ कहने भर को संदेश भेज कर जवाब दे कर । मिलना जुलना ज़रूरी नहीं लगता है कई बार महीनों सालों वार्तालाप करते रहने के बाद पूछना पड़ता है आप कौन हैं रहते कहां करते क्या हैं । सैंकड़ों हज़ारों की भीड़ में रिश्ते इक तस्वीर बन कर रह गए हैं जो प्रोफाइल पिक्चर बदलते समय नहीं लगता है । 
 
   भगवान की बनाई दुनिया भी जैसी बनाई थी वैसी रही नहीं और इंसानों की इंसानियत ख़त्म होती गई और शैतान की हैवानियत बढ़ती गई , जिस से सभ्यता शराफ़त ईमानदारी का नामो निशान मिट गया और धोखा छल कपट हिंसा अन्याय का आलम स्थपित हो गया है । सोशल मीडिया भी संबंध बनाने के बजाय आपसी मतभेद और अनावश्यक विवाद बढ़ाने का मंच बन गए हैं गंदी राजनीती और संकीर्ण विचारधारा ने फेसबुक व्हाट्सएप्प को हथियार बना कर दोस्तों रिश्तेदारों को विरोधी बना दिया है । इतना ज़हर भर दिया है लोगों के दिल-दिमाग़ में कि लोग बिना ख़ंजर इक दूजे को ज़ख़्मी करने लगे हैं । विडंबना है हर हाथ फूल लिए है और हर सर पर घाव भी दिखाई देता है । टीवी सीरियल से फिल्म तक अख़बार टीवी की बहस से विज्ञापन तक झूठ धोखा डर और भयानक घंटनाओं कहानियों ने माहौल को इस कदर खराब कर दिया है कि हर किसी को अजनबी क्या अपने करीबी लोग तक भरोसे करने के काबिल नहीं लगते हैं । दलदल में धंसे हुए हैं निकलने की कोशिश में और धंसते जाना नियति है । उपाय शायद यही है कि कभी इंटरनेट किसी कारण ख़त्म हो जाए ये सब बेकार होकर अपनी मौत मर जाएं , विनाश करने वालों का आखिर अंत इसी तरह से होता है जब कोई उनका अंजाम आखिर अंत होना है ये बात सच कर दिखला दे । अचानक लिखते लिखते वाई फाई इंटरनेट हमेशा को जाना अर्थात इस पोस्ट का खुद ही डिलीट किए बिना अनपब्लिश रहना । 
 
 चेहरा बदलना - Google Play पर ऐप्लिकेशन

दिसंबर 03, 2022

लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

  लेखक-पुस्तक संवाद ( किताब की आत्मकथा ) डॉ लोक सेतिया

लेखक बहुत दिन से चिंतित था कुछ भी नया विषय लिखने को ध्यान में नहीं आ रहा था । बिस्तर पर करवट बदलते बदलते सामने रखी अलमारी पर निगाह जाकर ठहर गई कुछ हलचल सी भीतर महसूस हुई । लगा कोई किताब कह रही है मुझे इस बंद अलमारी से बाहर निकलना है । चाबियों का गुच्छा लिया मगर कोई भी चाबी ताला खोलने में सफल नहीं हुई तो सोचा कल सुबह उठ कर चाबीवाले को घर बुलाना होगा । आंख लग गई और सपने में किताब अपनी चुप्पी तोड़कर खुद बोलने लगी । लेखक पुस्तक संवाद होता रहा और लिखने वाले की नया विषय की तलाश पूर्ण हो गई और लिखी गई आत्मकथा किताब की । 
 
किताबें असंख्य विषयों पर लिखी जाती हैं साहित्य सांस्कृतिक ऐतहासिक धार्मिक देश काल विश्व भर की नित नई जानकारी खोज शोध से लेकर शिक्षा जगत स्कूल कॉलेज से विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई को लेकर । लेकिन साधारण ढंग से किताबों को दो मुख्य भागों में बांट कर रख सकते हैं । पहली वो जो पाठक को किसी और काल्पनिक दुनिया में लेकर जाती हैं जहां चमक दमक जगमगाहट और असंभव को संभव होते दिखाई देते हैं चमत्कार से सब होता है लेकिन उन कथा कहानियों को लेकर शंका सवाल सोचने समझने की किसी को अनुमति नहीं है । लिखा है आपको बगैर सोचे विश्वास करना होगा अन्यथा आपको नादान नासमझ आदि कहकर नकारा जा सकता है । ऐसी तमाम किताबें आपको मानसिक तौर पर आज़ाद होकर चिंतन की अनुमति नहीं देती हैं । दूसरी वो जो पाठक को वास्तविक जीवन से परिचित करवाती हैं और जिन से सबक लेकर सीख कर पाठक ज़िंदगी में उनका उपयोग कर समस्याओं को समझने और समाधान खोजने का कार्य कर सकते हैं । 
 
इधर किताबें लिखने की दौड़ लगी हुई है लेकिन मकसद समाज को बदलना नहीं बल्कि नाम शोहरत और अन्य भौतिक वस्तुओं की चाहत हो गया है । लिखने वाला खुद लिख कर भूल जाता है और पाठक को देश समाज को कोई मार्गदर्शन अथवा सकारात्मक योगदान को लेकर उदासीन है । प्रकाशक किताब की गुणवत्ता परखे बिना छापते हैं सामान्य कारोबार की तरह धन दौलत कमाने की खातिर । बड़े बड़े शहरों में किताबों का बाज़ार लगाया जाता है जहां किताबों को तोलकर खरीदा बेचा जाता है किसी भाजी तरकारी या धातु या सामान की तरह से । किताब में लिखा कितना मूलयवान है महत्वपूर्ण है अथवा व्यर्थ की गतिविधि ही है कुछ फर्क नहीं पड़ता है सब एक भाव है टके सेर भाजी टके सेर खाजा जैसी बात है । किताबों की ऐसी दुर्दशा हमारे समाज की कड़वी वास्तविकता को दिखलाता है जहां इंसान से लेकर सामाजिक आदर्श और मूल्य तक कहीं फेंक दिए गए हैं । खोखली बातें करते हैं अनुसरण करना अनावश्यक लगता है । आधुनिक शिक्षा ने आदमी को बेजान मशीन जैसा बना दिया है जैसे कोई रॉबट या कम्प्यूटर जैसा प्रोग्राम किया गया है करता है । चिंतनशील विचारवान विवेकशील नहीं बनने देती आधुनिक शिक्षा । 
 
शिक्षा विज्ञान विकास और विनाश को नहीं परखते हैं , साधन बनाने की खातिर समाज को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जहां बर्बादी और मानवीयता के अंत को सामने देख हैरान हैं । अब कोई सोचता तक नहीं कि हम कब कहां भटक गए और देश समाज दुनिया को बेहतर बनाने की जगह खतरनाक गहरी खाई में ले आये हैं जबकि समझते रहे कि शिखर पर चढ़ रहे हैं । जवीन उपयोगी किताबों को बंद अलमारियों में सजाकर रखना पढ़ना छोड़ कर यही करते रहने का परिणाम है । इक ताला जो हमारे दिमाग़ को लगा है खुलता नहीं है और बंद अलमारी में रखी किताबों की तरह दीमक की तरह खोखला कर रहा है । जिनके ज़हनों में अंधेरा है बहुत , दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत । मेरी इक पुरानी ग़ज़ल का मतला याद आता है ।    
 

 

नवंबर 28, 2022

बेजान बेज़ुबान की बेबसी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     बेजान बेज़ुबान की बेबसी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कितने दिनों से तैयारी चल रही थी जिस खूबसूरत महबूबा की मिलन की अपने चाहने वालों से मगर हम ढूंढते ही रहे उसके निशां तलक नहीं दिखाई दिए । शायद मुझे छोड़ किसी को ज़रूरत ही नहीं थी तभी किसी ने उस के अस्तित्व को लेकर कोई शब्द तक नहीं बोला घंटों इधर उधर की चर्चा करते रहे सभी । जैसे हर कोई अपने आप में गुम हुआ हुआ था , मंच पर बैठे डायस पर खड़े संबोधित करने वाले सभी संवेदनारहित बुत जैसे लगे किसी कठपुतली की तरह धागे कोई और थामे अपने इशारों पर नचा रहा उनको । जिन को लेकर शोर था साक्षात दर्शन करवाते हैं खुद अपने आप को नहीं पहचान सकते थे ऐसा लगा । विवाह समारोह जैसी रौनक लगी थी लेकिन शोक सभा सा मातम छाया हुआ था ख़ुशी की जगह झूठी मुस्कुराहट सिर्फ दिखावे को होंटों पर टांग रखी थी । अभी तक उसके निधन की खबर नहीं सुनी पढ़ी थी फिर ये उदासी हर चेहरे पर क्यों नज़र आ रही थी । अधिकांश उपस्थित लोग अपने अपने स्मार्ट फोन पर सोशल मीडिया कोई गेम खेलने या तस्वीर लेने में व्यस्त थे सभा में बैठे चल रही गतिविधि से अनभिज्ञ अनजान । शायद लोग अपने अपने उद्देश्य से आये थे और इंतज़ार कर रहे थे मकसद पूरा होते जाने की वापस , यहां औपचरिकता निभानी थी बस यही होता रहा । 
 
  बड़े लोग छोटे दिल वाले होते हैं तभी नहीं समझते सोचते क्या बोला जो कदापि नहीं बोलना चाहिए था । कुर्सी पद धन अधिकार का नशा छाया हुआ था । कोई सभा की संख्या कितनी थोड़ी है बता कर खुद मिले करोड़ रूपये की पुरुस्कारों की धनराशि और लाखों की भीड़ की बात करने के साथ किसी और जगह होने वाले आयोजन की आलोचना करते हुए आरोप लगा रहे थे वहां गलत लोग होते हैं शामिल । कोई हद से बढ़कर कहने लगे उनको लोग स्वार्थ मतलब से मिलते हैं जबकि उनको सरकारी पद मिला ही इसी उद्देश्य की ख़ातिर है । छाज तो छाज छलनी भी बोली थी व्यर्थ इतना सब लिखने की ज़रूरत क्या है नासमझ इतना नहीं सोचा कहां किस कारण क्यों पधारे हैं । अजीब विवाह समारोह था दुल्हन का अता पता नहीं था और सभी शुभकामनाएं भी इस तरह दे रहे थे जैसे संवेदना जताने आए हैं । 
 
   ये इक दिन इक शहर की घटना भर नहीं है देश समाज में संविधान धर्म संस्कृति को लेकर जश्न का आयोजन किया जाता है मगर चर्चा होती है मातम की तरह । खुद ही क़ातिल हैं क़त्ल खुद किया जानकार या भले अनजाने में और उसी को ज़िंदा रखने की कसमें खाते हैं । 
   मुझे अपनी ग़ज़ल का शेर याद आया है :-
 
                 ' तू कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले। '
 
ज़िंदा लाश की तस्वीर पर फूलमाला पहनाना ये कैसी अजीब रिवायत इस दौर की बन गई है ।  
आखिर में इक नज़्म पेश करता हूं । 

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं।
 
 
 जिंदा लाश | Hindi Tragedy Poem | Nitu Arora

नवंबर 17, 2022

भारत सरकार को ज़रूरत है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

     भारत सरकार को ज़रूरत है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

कितने साल हो गए हैं  देखते सुनते , सोचा ही नहीं समझा ही नहीं भारत देश को आर्थिक दशा भूख गरीबी तमाम जनता की बुनियादी ज़रूरतें ख़्वाहिशें मनोकामनाएं आरज़ूएं सपने पूर्ण करने को आवश्यकता है तो बस इक विभाग की       ' करोड़पति बनने बनाने के खेल की '  अमिताभ बच्चन जी हैं इस सब की परिभाषाएं समझने वाले विभाग उन्हीं के हवाले किया जाना उचित होगा । उनको अगर  सरकार कहेगी तो वो अवश्य मान ही जाएंगे , सदी के महानायक कहलाने वाले । चलो शायद इसी बहाने देश समाज को कुछ वास्तव में सार्थक उन्होंने दिया भी है उसका भी प्रमाण भी उपलब्ध होगा , अन्यथा अभी कोई नहीं जानता उनका देश समाज को सकारात्मक योगदान क्या है । जब भी उनका खेल टीवी पर देखते हैं लगता है हम अपनी दुनिया से अलग किसी दुनिया में हैं जहां सब वास्तविकता से विपरीत सुनहरा रंगीन और लाजवाब है । दर्शक तक जिनको शो में साक्षात दर्शन का सौभाग्य मिल गया होता है अपना जीवन सफल हुआ समझते हैं जिस प्रतिभागी को साहब के सामने बैठने का मौका मिलता है खुद जनाब इशारों में समझाते हैं दुर्लभ है बार बार क्या जीवन में दोबारा नहीं मिलता है । यकीन करें डेढ़-दो घंटे तक सभी सम्मोहित रहते हैं इक जादूगर का जादू अपना असर दिखलाता है तो बाहरी सारी दुनिया व्यर्थ की लगने लगती है । कुछ क्षण कुछ पल सब परेशानियां सारे दुःख दर्द उड़नछू हो जाते हैं । अक्सर लोग कहते हैं अमिताभ बच्चन जी से मिले बात की उनके करीब बैठे स्वर्ग-सुख़ की अनुभूति हो गई उसके बाद कुछ हासिल करने को बचा ही नहीं मगर पैसा फिर भी पैसा है लक्ष्मी का आदर करना चाहिए बस इसी ख़ातिर सवाल जवाब होते हैं अन्यथा तथाकथित हॉटचैयर पर बैठना सिंहासन पर विराजमान होने से कम नहीं है । खिलाड़ी और खेल खिलाना वाला दोनों जतलाते बतलाते रहते हैं कि ऐसा होने से किसी की काबलियत का लोहा मान लेते हैं सभी मान सम्मान प्रतिष्ठा बढ़ जाती है और व्यक्ति सातंवे आसमान पर होने का गर्व गौरव अनुभव करता है । 

  सबकी कहानी अलग अलग मिसाल होती है हर शाम कमाल से बढ़कर कमाल होती है । सबकी मुहब्बत जवान होती है खिला हुआ लाल गुलाब या कोई रेशमी रुमाल होती है । कुछ सवाल पर पर्दादारी है क्या ये खेल सच है फरेब है कोई हक़ीक़त है या छल है कहीं ये कोई लाईजाज रोग है मानसिक बिमारी है । कितने आबाद हुए कितने हुए बर्बाद आज किस की कल किस की आनी बारी है । मुझे ही नहीं मुमकिन है और भी तमाम लोगों को लगता होगा कि हमारी समझ और काबलियत पर सवालिया निशान है आज तलक केबीसी में चयन नहीं होना किसी अवगुण से कम नहीं है । टीवी चैनल और शो प्रस्तुतकर्ता का यकीन है कि हर समस्या का समाधान उनका खेल है देश की जनता की सभी चिंताओं आर्थिक परेशानियों से व्यक्तिगत तक का हल संभव है उनके मायाजाल में शामिल होकर । नौकरी कारोबार नहीं खेल खेल में धनवान बनने की बात होती थी लेकिन आजकल खेल को अलविदा कह चुके खिलाड़ी विज्ञापन से पैसा कमाते हैं और अपने प्रशसंसकों को पैसा बाज़ार की राह दिखलाते हैं और क्या क्या खरीदने को कहते हैं भले उनके घर खाने को दाने नहीं हों अम्मा चली भुनाने कहावत चतिरार्थ करते हैं । देश की महानता सरकारी योजनाओं का गुणगान करने वाले नहीं बताते आज़ादी के इतने साल बाद गरीबी बदहाली क्यों है अधिकांश जनता के लिए जबकि कुछ ख़ास लोगों के लिए धन दौलत नाम शोहरत ऐशो-आराम सब मुंहमांगी मुरादें मिलती हैं । जबकि इन सभी ने कभी शायद केबीसी खेल खेला क्या देखा भी नहीं होगा , तो क्या ये इक छल है झूठा दिलासा झूठे सुनहरे ख़्वाब दिखला कर उलझाए रखने को । 
 
  लेकिन अगर ये रामबाण तरीका है तो चलो यही सही इक विभाग इक मंत्रालय देश की राजधानी से है शहर नगर गांव की गली गली इसका प्रंबध करवा कर नया कीर्तिमान स्थपित किया जाना चाहिए । आधुनिक युग में कुछ भी मुमकिन है संभव हो सकता है इक ऑनलाइन ऐप्प की मदद से । 
 
 यहां हो मछली का निशान तो सम्मान और पैसा दोनों मिलेंगे

नवंबर 08, 2022

काले धन की आत्मकथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       काले धन की आत्मकथा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

मेरा नाम काला है जबकि वास्तव में मैं सबसे खूबसूरत और रंगीन हूं । मैं अजर अमर और हर युग काल देश में रहा हूं और हमेशा रहूंगा कोई मुझे मिटा नहीं सकता है । जिनको मुझसे जितना अधिक प्यार है वही मेरा नाम हर दिन जपते रहते हैं मुझे खत्म कोई नहीं करना चाहता बल्कि सभी मुझसे दिल जान से बढ़कर मुहब्बत करते हैं । जैसे कोई आशिक़ अपनी महबूबा को लेकर आहें भरता है उसको ज़ालिम क़ातिल कहता है मुझे प्यार करने वाले काला धन बर्बाद करता है की रट लगाते हैं लेकिन रात को नींद नहीं आती मेरी चिंता चाहत में जागते रहते हैं । कुछ साल पहले इक शासक को मेरे मोहजाल में इस कदर जकड़ लिया कि उसने इरादा कर लिया सारा का सारा काला धन अपने पास जमा करने का । फरमान जारी हुआ और जिस के पास जितना काला धन अपराध रिश्वत लूट घोटालों से जमा किया हुआ था बदल कर सफेद कर बदलवा दिया । शोर मच गया काला धन ख़त्म हो गया है जबकि मैं ऐसा राक्षस की तरह हूं जिस की हर खून की बूंद से इक नया दैत्य पैदा होता जाता है । 70 साल में जितना काला धन मेरे चाहने वालों की तिजोरियों में जमा हुआ था उस से दस गुणा पिछले सात सालों में इकट्ठा हो गया है और सबसे अधिक उसी के खुद के पास और उसके ख़ास दोस्तों के पास है जिस ने मुझे ख़त्म करने की कसम उठाई थी । झूठी कसमें मुहब्बत में खाना इक पुरानी रिवायत है । काला धन कोयले की खान जैसा है जो सोना बन जाता है बाज़ार में आकर शकल बदल जाती है । काले धन की तस्वीरें सुंदर लगती हैं जब रईस लोग शान से बड़े बड़े मंदिरों में चढ़ाते हैं गरीबों का लहू चूसकर धनवान बनने पर । हर सत्ताधारी शासक की सेज पर दुल्हन बनकर आलिंगन करती हुई भविष्य के दिलकश सपने संजोती हूं अगले चुनाव की रणनीति के रूप में । राजनेताओं धर्म उपदेशकों बड़े बड़े उद्योगपतियों ने मेरा दामन कभी छोड़ा नहीं है । पैसा बाज़ार से मुंबई के मनोरंजन कारोबार तक सिर्फ मेरा ही जलवा दिखाई देता है काला टीका बुरी नज़र से बचाता है इस बात से मेरा महत्व समझ सकते हैं । 

मैंने सिर्फ लिबास बदला है जैसे अभिनेता राजनेता बाहरी आवरण बदलते हैं अंदर से वही रहते हैं झूठे बेईमान और बदचलन बदनीयत इंसान । शराफ़त से मेरा कोई रिश्ता न कभी था न कभी हो ही सकता है शरीफ़ लोग गरीबी और बदहाली का ज़ेवर पहनते हैं चांदी सोना उनकी किस्मत में नहीं होता है । बचपन में इक सहपाठी जिसका रंग सबसे गोरा चिट्टा था सब उसको काला कहकर बुलाते थे क्योंकि उसकी मां ने उसको यही नाम दिया था बुरी नज़र नहीं लगे इस की खातिर । काला धन बदनाम है खराब नहीं है खराब लगता है जब किसी और की जेब में होता है खुद अपनी तिजोरी का काला धन लक्ष्मी बनकर पूजा जाता है । अब की दीवाली भी काले धन वालों की शानदार रही है खूब रौशनी पटाखे और उपहार लेना देना जुआ खेलना शुभ समझते हैं ।
 
 
 black-money

नवंबर 07, 2022

सोच विचार कर , भीड़ बनकर नहीं ( सही-गलत निर्णय ) डॉ लोक सेतिया

सोच विचार  कर , भीड़ बनकर नहीं  ( सही-गलत निर्णय ) डॉ लोक सेतिया 

 इधर तमाम लोग समझते हैं कि मौजूदा शासक पुराने सत्ता के उच्च पदों  पर रहे राजनेताओं नायकों के नाम सड़कों भवनों पर लिखे हुए बदल कर हटवा कर कोई विशेष महत्वपूर्ण सराहनीय कृत्य कर रहे हैं । जबकि अधिकांश ऐसे नाम उनके देश समाज के नवनिर्माण को समर्पण और योगदान को समझते हुए रखे गए थे । किसी राजनितिक लाभ या गुणगान के लिए हर्गिज़ नहीं । अपनी विचारधारा के विरोधी लोगों के नाम अपनी संकीर्ण राजनीती की खातिर बदलने से उन लोगों की छवि को कोई फर्क नहीं पड़ता है बल्कि भविष्य में खुद अपनी मानसिकता को उजागर कर  प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं , कि हमने सत्ता हासिल कर निराशाजनक और नकारात्मक ढंग से कार्यशैली अपनाई थी । क्या खुद आपके पास सार्थक कर दिखाने को कुछ भी नहीं सूझता है ।  

   ऐसे कार्यों का समर्थन करने वाले लोगों ने  पुराने देश को समर्पित राजनेताओं एवं उनके समाज के प्रति सरोकारों को समझे बगैर उनको लेकर संकीर्ण विचार बना लिए हैं  , गहराई तक जाने उस समय की सामाजिक दशा को जाने बिना मनचाहे ढंग से । काश उनको मालूम होता कि देश समाज के हित में क्या ये उचित है कि पुराने बुद्धिजीवी समाजिक  चिंतक विद्वान लोगों की कोशिशों की सराहना करना छोड़ आधुनिक समय की नकारात्मक बातों को उचित ठहराया जाना चाहिए । शायद  बाद में इस सरकार के शासकों को भी पछतावा हो कि पिछले लोगों की आलोचना करने को छोड़ खुद कुछ सार्थक कल्याणकारी कार्य उन्होंने किया ही नहीं है । आजकल के युवाओं को हवा के साथ चलने वालों को धारा के विरुद्ध खड़े होकर बदलाव लाने का मतलब पता नहीं है । जो शासक सत्ता पर काबिज़ होकर लोकतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा को नहीं समझता और चाहता है कि कोई विपक्ष रहना ही नहीं चाहिए क्या उसका समर्थन किया जाना देश और संविधान के अनुसार सही होगा अथवा जिस शासक ने अपने कार्यकाल में विपक्ष को आदर देना और महत्वपूर्ण समझा देश को एकता और शांति भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़ना जैसे मूल्यों को अपनाया उसका समर्थक होना चाहिए । सबसे पहला सवाल जिस धार्मिक विचारधारा की बात करते हैं क्या उसी के अनुसार किसी व्यक्ति के ज़िंदा नहीं रहने के बाद उसको लेकर असभ्य और अपमानजनक बातें करना क्या कहलाता है । अपनी सुविधा और साहूलियत से किसी एक को अच्छा और किसी एक को खराब साबित करने का प्रयास जबकि वास्तव में वो दोनों उस समय में साथ साथ मिलकर आपसी राय सहमति से निर्णय करते रहे हों क्या निम्न स्तर की कार्यशैली नहीं है । 

 बात निकली तो सामाजिक राजनैतिक से आगे साहित्य पर भी हुई । साहित्य के भव्य आयोजन का अर्थ उत्कृष्ट साहित्य को बढ़ावा देना नहीं होता है । साहित्य सृजन करने वाले लेखकों को अपने समय की देश समाज की सही तस्वीर दिखलानी चाहिए जबकि कुछ जाने माने ख़ास लोगों ने इस में दोहरे मापदंड अपनाए हैं और धन दौलत नाम शोहरत सत्ता से नज़दीकी हासिल करने को वास्तविकता को उजागर करने का कर्तव्य नहीं निभाया है । उनकी फिल्मों गीतों कथाओं कहानियों ने आम दर्शक को भटकाने का कार्य किया है , आधा सच आधा झूठ मिलाकर वास्तविकता को अफ़साना बना दिया है और जो हक़ीक़त नहीं उसको वास्तविकता बनाकर अपनी लेखनी के साथ अन्याय किया है । सच नहीं लिख सकती जो कलम उसको कागज़ काले करना छोड़ना बेहतर होगा । शिक्षित वर्ग को केवल अपने हित की ही नहीं समाजिक सरोकार की भी चिंता होनी चाहिए और संवेदनशीलता पूर्वक न कि औपचरिक हल्की फुलकी बातें करने तक । काश उनको ध्यान आये कि देश गुलामी की जंज़ीरों से ही नहीं सामाजिक आडंबरों और दिखावे की कुरीतियों से अभी मुक्त नहीं हुआ है और किसी भी राजनेता दल या व्यक्ति की चाटुकारिता स्वयं में इक समस्या है गंभीर सवालात खड़े करती हुई । ग़ालिब के अप्फाज़ में नींद क्यों रात भर नहीं आती । बदलाव होना चाहिए मगर कैसा ये सवाल अवश्य समझना सोचना होगा  , सड़कों इमारतों संस्थाओं के नाम बदलने से देश की तस्वीर नहीं बदलेगी न तकदीर ही बदल सकती है । 



 

नवंबर 01, 2022

बिना शर्त कुछ नहीं कुछ भी ( ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

      बिना शर्त कुछ नहीं कुछ भी ( ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

खुदा ईश्वर या विधाता जो भी है इंसान को जन्म देता है मगर बतलाता नहीं उसकी भी शर्त है दुनिया में जितना भी जैसे भी हासिल करते रहना आखिर मौत के बाद कुछ भी किसी का नहीं रहता है । लेकिन पैदा होते ही रिश्तों संबंधों की अनगिनत शर्तें लागू होती रहती हैं और लाज़मी होता है उनको मंज़ूर करना । जन्म देने वाले संतान को पालते हैं बड़ा करते हैं बहुत प्यार से तमाम तरह से शिक्षा विचार से बुद्धिमान शक्तिशाली बनाते हैं मगर साथ साथ इक अंकुश लगा रहता है उनकी बातों को बगैर कोई सवाल किये मानते रहना । बस जहां चुपचाप हां में हां नहीं मिलाई वहीं टकराव की शुरुआत हो जाती है । कोई समझ नहीं पाता है भविष्य में ऐसे कितने नियम कायदे स्वीकार करने होते हैं ज़िंदा रहने को कदम कदम । और ये सब इस तरह चलता रहता है कि इंसान जानता तक नहीं कैसे इक अजब अनचाहे मोहजाल में फंसता चला जाता है और उन सब में खुद का अस्तित्व दिखाई नहीं देता है । अधिकांश सोचते समझते नहीं उनका जीवन क्या है किसलिए जी रहे हैं बस साल दर साल उम्र की सालों की संख्या बढ़ती जाती है जबकि सौ बरस की ज़िंदगी में जिए कभी नहीं होते सही मायने में ।  

आज़ादी शब्द को लेकर इक जाल बुना गया है चालाक लोगों ने शासन करने को सबको गुलामी की जंज़ीरों में जकड़ा हुआ है । कुछ मुट्ठी भर लोग मनमानी करने ऐशो आराम से शान ओ शौकत से रहने की कीमत भोले लोगों से वसूलते हैं छीनते हैं झूठे वायदे और उनकी देश समाज की भलाई की बातों वाले भाषण देकर । सब नियम सारे कानून संविधान दावा करते हैं अधिकार देने का जबकि दरअसल इसकी आड़ में आपको बेबस और कमज़ोर करते हैं कोई सरकार कोई अदालत कोई सुरक्षा व्यवस्था आपको अधिकार न्याय समानता देने को विवश नहीं है । आपको कायदे नियम पालन नहीं करने पर दंडित करने वाले खुद कर्तव्य नहीं निभाने पर किसी तरह से दंडित नहीं हो सकते हैं । समय बदलता रहता है मगर आम ख़ास बड़े छोटे का भेदभाव नहीं मिटता है । अमीर और अमीर ताकतवर अधिक ताकतवर बनता जाता है और शासक सत्ता बेरहमी से लूट का कारोबार करती रहती है । सामाजिक व्यवस्था समाज की भलाई नहीं करती और परंपराओं की बेड़ियां आदमी को अनचाहे अनुचित बंधनों रीति रिवाज़ों की कैद से मुक्त नहीं होने देती हैं ।
 
किसी आसमान पर कोई भगवान या खुदा ईश्वर है या नहीं लेकिन धरती पर जिसे देखते हैं खुदाई की बात करता है । खुद को साबित करने को कितने हथकंडे अपनाते हैं सभी तथाकथित महान बड़े लोग । माजरा यही समझ नहीं आया किसी को अच्छाई करने वाले को अच्छा कहलाने की चाहत नहीं होती है ।  खराब लोग बुराई करते हैं लेकिन कहलाना भले इंसान चाहते हैं तभी धनवान लोग शासक देशभक्ति का दम भरने वाले धर्म उपदेशक समाजसेवक होते कुछ हैं करते जो भी हैं दिखलाते उसका विपरीत हैं आडंबर करते हैं । लगता है बल्कि यकीनन ऐसा ही हो सकता है कि भगवान ने अपना गुणगान अपनी उपासना इबादत अर्चना की ज़रूरत ही नहीं समझी हो एवं कोई और हैवान जैसा भगवान बनकर अपने खराब कार्यों पर पर्दा डालने का कार्य कर रहा है । अपनी इस दुनिया की हालत देख कर यही लगता है कि यहां शैतान का शासन चलता है हैवान की हैवानियत फलती फूलती है और भलेमानुष लोग बर्बाद होते रहते हैं । शैतान भगवान को असहाय कर मौज मस्ती कर रहा है ।    
 
 

 
  

 

 

 

अक्तूबर 28, 2022

 मुफ़लिसी पर गर्व था खैरात ने रुसवा किया ( जज़्बात ) डॉ लोक सेतिया 

किसी और जहां की तलाश है हमको , इस जहान की चाहत नहीं रखते । गांव की गलियां बड़ी भाती हैं हम शहर में रहने की ख़्वाहिश नहीं करते । अपनी मुफ़लिसी की कभी शिकायत नहीं रही हम ज़माने की तरह रास्ते में हमसफ़र नहीं बदलते । हमको तमाशा पसंद नहीं है मंज़ूर उनको भी मखमल में टाट का पैबंद नहीं है । हमने हक़ भी मांगे नहीं फरियाद कर के खुश थे दुनिया सबकी आबाद कर के । बड़े बड़े शहरों की ऊंची ऊंची इमारतें किसी मुसाफिर को ठहरने को जगह नहीं देती हैं सर्द हवाओं में तपती लू और बारिश में पल भर को भी सायबान का साया नहीं देती हैं । कुछ भी किसी का अपना नहीं है सब कड़वा सच है कोई खूबसूरत सपना नहीं है । बच कर निकलने की कोई सूरत नहीं दिखाई देती है नर्क कितने हैं बस इक जन्नत नहीं दिखाई देती है ऊंचे मीनार हैं गहराई नहीं दिखाई देती है , रुसवा हैं लोग मगर उनको खुद की रुसवाई नहीं दिखाई देती है पहाड़ तनकर खड़े हैं नीचे उनके कितनी गहरी है खाई नहीं दिखाई देती है । अजब सी भूलभुलैया में खो गया हूं मैं कहीं से कोई आवाज़ नहीं देता मुझको , जाना किधर है किधर से था आया इसी उलझन में खड़ा हूं खामोश ग़ुज़रा वक़्त नया आज नहीं देता मुझको । हक़ीक़त को ढक दिया गया है छुपा दिया है घना कोहरा है जिसको शानदार आकाश बताया जाने लगा है । मेरा दिल इस अजनबी भीड़ में घबराने लगा है , मुझको गांव अपना याद आने लगा है । हर शख़्स यही सोच कर पछताने लगा है । बहुत कुछ और कहना है ग़ज़ल से काम लिया है । 

हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल )  
 
हक़ नहीं खैरात देने लगे
इक नई सौगात देने लगे।

इश्क़ करना आपको आ गया
अब वही जज़्बात देने लगे।

रौशनी का नाम देकर हमें
फिर अंधेरी रात देने लगे।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए
आप सबको मात देने लगे।

बादलों को तरसती रेत को
धूप की बरसात देने लगे।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की
एक झूठी बात देने लगे।

जानते सब लोग "तनहा" यहां
किलिये ये दात देने लगे।
 
  तुम मेरी फ़क़ीरी को कहाँ लेके चले आये|| मे टाट का | Nojoto...

अक्तूबर 24, 2022

ओ रौशनी वालो ( अंधकार की आवाज़ ) डॉ लोक सेतिया

    ओ रौशनी वालो ( अंधकार की आवाज़ ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

उजाला उस जगह करना चाहिए जिस जगह अंधेरा हो , रौशन सड़कों महलों बाज़ारों को चकाचौंध रौशनी से सजाना बाहरी दिखावा करने से भीतर का अंधकार मिटता नहीं बल्कि और अधिक बढ़ाता ही है । जब काली अंधेरी अमावस की रात को दिये जलाकर अंधेरा मिटाया गया होगा तब उसकी अहमियत रही होगी । आज जब चारों तरफ जगमगाहट है सजावट को दिये जलाना अंतर्मन के अंधकार को कम नहीं करता है । कोई बतला रहा था भगवान राम की इक ऐसी मूर्ति बना रहे हैं जो हर दिशा से एक जैसी नज़र आएगी । कण कण में भगवान दिखाई देने की बात कोई नहीं करता आजकल । राजा राम पत्नी सीता संग बनवास से वापस लौटे थे और अयोध्या वासियों ने स्वागत करने को दीप उत्सव मनाया था , अब शासक तो राजाओं से बढ़कर शाही शान-ओ-शौकत से  चकाचौंध चुंधयाती रौशनी में रहते हैं जनता को बनवास मिला हुआ है जिसका कोई अंत दिखाई नहीं देता उन के जीवन में उजाला कब होगा उस दिन वास्तव रामराज और दीपोत्स्व का त्यौहार मनाया जाना चाहिए । जिस देश की अधिकांश जनता भूख गरीबी शोषण अन्याय अत्याचार और असमानता के वातावरण में रहने को अभिशप्त हो वहां त्यौहार का उल्लास केवल धनवान और सुवधा साधन सम्पन्न वर्ग को हो सकता है वो भी तभी अगर उनको आम इंसानों के दुःख दर्द परेशानियों से कोई सरोकार नहीं हो । ऐसे में शासक वर्ग का देश का खज़ाना आडंबर पर बेतहाशा बेदर्दी से खर्च करना लोकतंत्र और संविधान के ख़िलाफ़ गुनाह ही समझा जाना चाहिए । अधिक विस्तार से कहना व्यर्थ है अपनी पहली कविता दोहराता हूं । मन की बेचैनी अभी भी कायम है ।  

  बेचैनी ( नज़्म )  

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास।
 

Awaaz - Hindi poetry | Quotes, Poetry

अक्तूबर 11, 2022

इक ख़्वाब जो हक़ीक़त नहीं बन सका ( ज़िंदगी की मज़बूरी ) डॉ लोक सेतिया

    इक ख़्वाब जो हक़ीक़त नहीं बन सका ( ज़िंदगी की मज़बूरी ) 

                                  डॉ लोक सेतिया 

कितनी बार यही सपना दिखाई देता है सुबह होते भूल जाता है या नहीं मालूम भुलाना पड़ता है । कभी कभी सोचता हूं शायद हौसला किया होता तो भले कुछ भी हुआ होता दिल में ये मलाल नहीं रहता कि काश । सपना यही आज रात आया कि बचपन में ही मैं सभी रिश्तों नातों की परवाह छोड़ अनचाही कैद से कितने ज़ुल्मों की ऊंची दिवारों से आज़ाद होकर भाग रहा हूं अजनबी राहों पर अनजानी मंज़िल की तरफ । अक्सर लोग बनी बनाई राहों पर चाहे-अनचाहे चलते जाते हैं घबराते हैं अपनी अलग राह बनाकर चलने के जोखिम से और ज़िंदगी भर पछताते हैं काश साहस किया होता ।  मैंने ज़िंदगी को हक़ीक़त में नहीं जिया है ज़िंदा रहा हूं सपनों के सहारे आपको पागलपन लगता है मेरे लिए किसी जन्नत के ख़्वाब जैसा हसीन हमेशा सच होने की उम्मीद ।  दो कविताओं में यही बात कहनी चाही है मैंने ।
 

 सपनों में जीना ( कविता ) 

देखता रहा
जीवन के सपने
जीने के लिये 
शीतल हवाओं के
सपने देखे
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के
सपने देखे
कांटों से छलनी था
जब बदन
मुस्कुराता रहा
सपनों में
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए
सपने देखे
जी भर खाने के
प्यार सम्मान के
सपने देखे
जब मिला
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में
जब नहीं रहा बाकी
झोपड़ी का भी निशां 
राम राज्य का देखा सपना
जब आये नज़र
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के
देखे प्यार इंसानियत
भाई चारे के ख़्वाब
लगा कर पंख उड़ा गगन में
जब नहीं चल पा रहा था
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में
देखे सदभाव समानता के सपने
आशा के सपने
संजोए निराशा में
अमृत समझ पीता रहा विष
मुझे है इंतज़ार बसंत का
समाप्त नहीं हो रहा
पतझड़ का मौसम ।

मुझे समझाने लगे हैं सभी
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता
सब की तरह कर लूं स्वीकार
जो भी जैसा भी है ये समाज
कहते हैं सब लोग
नहीं बदलेगा कुछ भी
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास ।

सच हुए सपने ( कविता ) 

सपने तो सपने होते हैं
देखते हैं सभी सपने
मैंने भी देखे थे कुछ
प्यार वाले सपने।

कोई अपना हो
हमराज़ भी हो
हमसफ़र भी हो
हमज़ुबां भी हो
चाहे पास हो
चाहे कहीं दूर हो
हो मगर दिल के
बहत ही करीब
जिसको पाकर
संवर जाये मेरा
बिगड़ा हुआ नसीब ।

सब दुनिया वाले
यही कहते थे
किस दुनिया में
रहता हूं मैं अब तक
और किस दुनिया को
ढूंढता फिरता हूं
ऐसी दुनिया जहां
कोई स्वार्थ न हो
कोई बंधन न हो
और हो सच्चा प्यार
अपनापन  भरोसा
अटूट विश्वास इक दूजे पर ।

मगर मेरा विश्वास
मेरा सपना सच किया है
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम
जी उठा हूं जैसे फिर से
निकल कर जीवन की निराशाओं से
तैर रहा आशाओं के समंदर में ।

तुम्हारा हाथ थाम कर
मिलेगी अब ज़रूर
उस पार मेरी मंज़िल
इक सपनों का होगा
महल वहीं कहीं
जहां होगा अपना हर कोई
मुहब्बत वाला इक घर
जिसकी खिड़की दरवाज़े
दीवारें और छत भी
बने होंगे प्यार से
स्वर्ग सा सुंदर होगा
अपना छोटा सा आशियाना ।
 
 
 रात के इन सपनों का हकीकत में क्या होता है मतलब! – News18 हिंदी
 

सितंबर 27, 2022

अंधकार की निशानियां हैं , ये चकाचौंध रौशनियां ( इंसानियत के खण्डर ) डॉ लोक सेतिया

अंधकार की निशानियां हैं , ये चकाचौंध रौशनियां  ( इंसानियत के खण्डर )

                                   डॉ लोक सेतिया 

किसी की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहता केवल अपनी सोच को व्यक्त करना चाहता हूं । तमाम लोग किसी शहर की रंग बिरंगी रौशनियां देख का आनंद और रोमांच का अनुभव करते हैं । कभी किसी जगह किसी दिन ख़ास अवसर पर सजावट और रौशनी का भव्य आयोजन किया जाता है । मुझे न जाने क्यों ये सब देख कर अलग तरह का एहसास होता है । सोचता हूं इन सब चमक दमक से देश समाज की बदहाली अंधकार क्या छुप गया है या शायद और भी अधिक दिखाई देता है । कुछ लोग बहुत सारा धन साधन कुछ पलों की इक दिखावे की ख़ुशी पर खर्च करते हैं पानी की तरह पैसा बहाते हैं वास्तव में बर्बाद करते हैं जबकि उनके हमारे आस पास गरीबी भूख बेबसी का जीवन जीते हैं करोड़ों लोग । इतना अंतर अमीर और गरीब का कोई विधाता की देन नहीं है बल्कि ये हमारी सामाजिक और सरकारी अमानवीय व्यवस्था के कारण होता रहा है हो रहा है और हम होने देना चाहते हैं । मेरी बात निराशाजनक लग सकती है जबकि निराशाजनक पहलू ये है कि हम अधिकांश से अधिक अथवा आवश्यकता से ज़्यादा पाकर खुद को भाग्यशाली और उन लोगों से बड़ा या बेहतर समझते हैं जिनको दो वक़्त रोटी भी नसीब नहीं है । लेकिन इस के बावजूद हम मानवता की देश दुनिया के कल्याण की बातें करते हैं और खुद को सभ्य मानते हैं । ये अजीब मंज़र है कोई नंगे बदन है भूख से बिलखता है जीने की बुनियादी सुविधाओं से वंचित है तो कुछ हैं जिनकी चाहतें हसरतें ख़्वाहिशें बढ़ती जाती हैं ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती । धर्म की बात करें तो हर धर्म बताता है वास्तविक धर्म दीन दुःखियों की सहायता करना है संचय करना और व्यर्थ के आडंबर पर बर्बाद करना धर्म नहीं होता है , सबसे महत्वपूर्ण बात जिन के पास सब कुछ है लेकिन तब भी उनको और अधिक हासिल करने की चाहत है वो सबसे दरिद्र लोग होते हैं । 
 
पुरानी ऐतहासिक इमारतों को देखने लोग आते हैं और आचम्भित होते हैं शासकों के शानदार ठाठ बाठ और शाही तौर तरीके की निशानियां देख कर । मुझे वहां जाना अच्छा नहीं लगता है जाना होता है कभी किसी कारण तो देख कर सोचता हूं उन राजाओं ने शासकों ने इतना पैसा केवल अपनी विलासिता पर खर्च किया तो कितने आम नागरिक से कर वसूल कर और क्या उसी से देश राज्य समाज को ख़ुशहाल नहीं बनाया जा सकता था । ऐतहासिक स्थलों पर ये रईसी देख कर , और हाथी घोड़े पालकी की सवारी का लुत्फ़ उठाकर क्या समझते हैं कि हम शहंशाहों की तरह है जबकि वास्तव में हमको आधुनिक लोकतंत्र में सोचना कुछ और चाहिए वो ये कि ऐसा करना देश समाज राज्य के साथ अनुचित आचरण करना था और है । अन्यथा किताबों में ग्रंथों में नीति निर्धारक कथाओं में राजा को जनता का पालक और रक्षक नहीं बताया गया होता । जिन कार्यों का हमको विरोध करना चाहिए उन्हीं का गुणगान करते हैं इसी से समझ आता है कि हमको गुलामी दास्ता और आज़ादी का अंतर नहीं मालूम या उनके अर्थ नहीं समझते हैं । कितना अजीब विरोधाभास है हम महानगरीय जीवन जीना चाहते हैं शानदार बड़े बड़े राजमार्ग पर तेज़ गति से वाहन चलाना चाहते हैं लेकिन खण्डर जंगल को देखना चाहते हैं खेल तमाशा समझ कर । हमको जो बताया जाता है वो किसी सत्ताधारी द्वारा लिखवाया इतिहास का एक पक्ष है और उसका वास्तविक पहलू शायद कभी सामने नहीं आता है । उसको समझना ज़रूरी है इन सब बातों पर चिंतन विमर्श कर खुले दिमाग से । लेकिन हम नहीं करते ऐसा कभी भी क्योंकि ये हमें चिंतित और परेशान उदास कर सकते हैं जबकि हम ख़ुशी और आनंद की तलाश करते हैं चिंताओं से भागते हैं चिंतन से घबराते हैं । 
 
मृगतृष्णा की बात होती है , मुझे लगता है हमारा समाज और लोग उसी का शिकार हैं । चमकती हुई रेत को पानी समझ कर दौड़ रहे हैं उम्र भर भागते रहते हैं और आखिर प्यासे ही मर जाते हैं । कहीं ये किसी का अभिशाप तो नहीं जो हम सोचते हैं कोई वरदान मिला है । लिखने को बहुत है समझने को इतना काफी है। 
 

 

सितंबर 13, 2022

हर ख़ुशी हमारे लिए ( राज़ की बात नहीं ) डॉ लोक सेतिया

     हर ख़ुशी हमारे लिए ( राज़ की बात नहीं ) डॉ लोक सेतिया  

राज़ की बात नहीं थी खुद हम ही नादान और नासमझ थे जो इतनी सी बात समझने में सालों लग गए कि जिनको हमारी ख़ुशी हमारी पसंद से कोई मतलब नहीं था सिर्फ अपनी ख़ुशी चाहते थे बदले में मुझे क्या किसी को भी खुश देखना नहीं चाहते थे उनकी चाहत में दुःखी होने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए । चलो देर ही से सही ये नुस्खा समझ आया तो सही । अश्कों से रिश्ता निभाता रहा बिना बात मुस्कराया तो सही । ख़ुशी कब से खड़ी हुई थी उसको बुला कर खुद अपने दिल में बिठाया तो सही । दुनिया से जो प्यार कभी मिलता नहीं वही अपने आप से पाया तो सही । हम अकेले नहीं खुद साथ हैं अपने ज़माने को कर के दिखाया तो सही । ग़मों से दामन छुड़ाया भी नहीं खुशी को गले से लगाया तो सही । चमन कुछ उदास था मुद्दत से बहारों का मौसम आया तो सही । कोई सूरज कोई चांद नहीं दिखाई देता इक छोटा जुगनू टिमटिमाया तो सही । निराशा के घने बदल छाए हुए थे पर आशा का दीपक जलाया तो सही । तकदीर ने लिखी नफ़रतें ही नफ़रतें साहस से लकीरों को मिटाया तो सही । दर्द के गीत कितने मधुर लगते थे ख़ुशी का नग़्मा महफ़िल को सुनाया तो सही ।
 
भूल हुई जो हमने बेदिल बेरहम दुनिया वालों से जीने की इजाज़त मांगी , मरने की सज़ाएं देने वाले भला किसी को अपनी ज़िंदगी पर इख़्तियार देते हैं । हमको हंसता मुस्कराता देख पूछते हैं माजरा क्या है कैसे ऐसे हालात में खुश रहते हो , रोने की आदत नहीं फिर भी कभी आंखें नम हों तो ज़माना उस पर भी तंज कसता है । हमदर्द ज़माना नहीं है किसी के लिए भी । चतुराई चालाकी चालबाज़ी झूठ का आडंबर नहीं सीखा हमने कभी जिन्होंने इन सभी को आज़माया बहुत कुछ छीना चुराया आखिर उनका अंजाम भी सामने नज़र आया इक दिन उनको खाली हाथ पाया । सच से नज़रें चुराने वाला हमेशा है पछताया दुनिया वालो ने जाने क्यों झूठ का परचम लहराया । हमने कभी नहीं दोस्तों को परखा न कभी आज़माया फिर भी अफ़सोस नहीं है भरोसा किया और धोखा खाया । ऐतबार पर ऐतबार करते हैं ये ख़ता है तो हो हम तो खताएं बार बार करते हैं । आखिर इक बात कहनी है अपनों-बेगानों सभी से , बस और कुछ नहीं चाहता किसी से भी ।
 

         जीने के मुझे पहले अधिकार दे दो , मरने की फिर सज़ाएं सौ बार दे दो।  

 

 
           

सितंबर 12, 2022

एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान

   एहसासों के फूल  ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान 

                           रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया  

गत वर्ष मुझे डॉ सेतिया ने फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी शीर्षक से अपनी पहली किताब भेजी थी , जिसकी भूमिका से मुझे एक पंक्ति अभी तक नहीं भूली है । वह कहते हैं :- लिखना मेरा जूनून है , मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको इबादत की तरह समझा है । इसी वर्ष उनकी तीन किताबों का सुंदर ढंग से छपकर आना वाकई उनके जूनून को दर्शाता है , उन्हें बधाई । और उनकी जुनूनी इबादत को सलाम । 
 
उनके ताज़ा कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' में लगभग 75 छंदबद्ध कविताएं एवं मुक्तछंद रचनाएं संग्रहीत  हैं जो सहज सीधी ज़बान में बदलती अनुभूतियों और एहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं । उनमें कोई शब्दाडंबर नहीं , कोई गूढ़ दर्शन की बोझिल बातें नहीं लेकिन सब में ठोस ज़िंदगी की तरल बातें हैं , जो उनके 71 वर्ष के जीवन अनुभव से निचुड़ी हुई आई हैं । 
 
 
प्रेम अनुभूतियाँ ज़िंदगी की सबसे तरलतम और सघनतम , उदास किंतु सुखद , और सृजन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण अनमोल अनुभूतियाँ होती हैं । ऐसी कविताएं सिरहाने के नीचे रखी जाती हैं , युवावस्था में  , और प्रौढ़ावस्था में हृदय की तहों के नीचे या स्मृतियों में । ऐसी कुछ कविताएं और ग़ज़लें हैं : वो दर्द कहानी बन गया , जाने कब मिलोगी तुम , मन की बात , उमंग यौवन की , मेरे ख़त , मेरी खबर आदि ।    
 
 
कवि केवल प्रेमिका की याद से उपजी उदासी को ही नहीं उकेरता बल्कि वृद्धावस्था में हर उस मां की उदासी को भी शिद्दत से महसूस करता है जो युवा संतान की उपेक्षा सहती है । यह ऐसा है जैसे कोई किसान युवा हुई फसलें काट लेता है और पीछे कटी हुई जड़ों का दर्द ही टीसता रह जाता है  , माँ के आंसू ऐसी ही कविता है । 
 
 
कवि का जीवन संघर्षों में और संघर्षशील मनुष्य के जीवट और आत्मविश्वास में पूरा विश्वास है । वह एक कविता में लिखता है : जीवन इक संग्राम तो क्या \ नहीं पल भर आराम तो क्या । ' थकान ' में कहता है : जीवन भर चलता रहा \ कठिन पत्थरीली राहों पर \ पर मुझे रोक नहीं सके \ बदलते मौसम भी । 
 
 
कवि नये ज़माने की नयी नारी का उद्यघोष सीता के पश्चाताप की आवाज़ में करता है , मुझे नहीं करनी थी चाहत \ सोने का हिरण पाने की ,  और एक अन्य कविता 'औरत ' में जो संग्रह की पहली कविता है वह उसकी आवाज़ यूं बनता है : " तुमने देखा है \ केवल बदन मेरा \ प्यास बुझाने को अपनी हवस की \ बांट दिया है तुमने टुकड़ों में मुझे \ और उसे दे रहे हो चाहत का नाम । एक और खूबसूरत कविता है ' हमारा अपना ताज ' पति-पत्नी का अपना प्यार का छोटा सा बसेरा । 
 
 
सामाजिक सरोकारों की कविताओं में ' काश ' शीर्षक से कविता मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमें कवि सच्ची धर्मनिरपेक्षता सर्व धर्म समभाव का पक्षधर तो बनता है लेकिन उससे बढ़कर वह समूची मानवता के दर्द के एहसास को प्रमुखता देता है न कि मंदिर मस्जिद जाने को । कवि प्राकृतिक परिवेश का प्रेमी है और पर्यावरण संरक्षण में विश्वास रखता है । ' ठंडी ठंडी छाँव ' वृक्ष कहता है : काटना मत मुझे कभी भी \ जड़ों से मेरी \ जी नहीं सकूंगा \ अपनी ज़मीन को छोड़कर  , मैं कोई मनी प्लांट नहीं हूं । मानि वह प्राकृतिक उत्पाद के बाज़ारवाद का भी आलोचक है । 
 
 
साहित्य में कागज़ के फूल सजाने वाले कई लोग पत्थर के फूल भी बन कर नफरती बोल बोलकर बाल श्रमिकों का कैसे दिल दुखाते हैं , ये पीड़ा एहसासों के फूल खिलाने वाले डॉ सेतिया जी बखूबी समझते हैं । उनकी दृष्टि में वो साहित्य कहीं गुम हो गया है जो सद्भावना और संवेदना से खुशियों की महफ़िलें सजाता था ।  अब तो घुटन में उन्हें इस तालाब का जल प्रदूषित लगता है और सब फूल कुम्हलाए हुए । 
 
 
समाज में फैली इन दुष्प्रवृतियों से दुःखी हो कर वह कृष्ण को उनका वायदा याद दिलाते हैं जो उन्होंने अधर्म  जाने पर नया अवतार ले कर आने को कहा था । यहां उनका संस्कृति प्रेम झलकता है ।  इस प्रकार कविता दर कविता सेतिया जी जीवन यात्रा की अच्छी बुरी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति करते चलते हैं । हां कहीं कहीं उनकी घिसी-पिटी उपमाएं अखरती भी हैं , यथा , फूल ही फूल खिले हों \ हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।  फिर भी बहुत ताज़गी है उनकी कविताओं में शिल्प तथा सादी ज़बान में।  उनके लिए साधुवाद की कामना करता हूं ।  
 
  अमृत लाल मदान 
अध्यक्ष , साहित्य सभा 
कैथल ( हरियाणा ) 136027 
मोबाइल नंबर - 94662-39164 

उपरोक्त पुस्तक समीक्षा आदरणीय मदान जी ने 11सितंबर 2022 आर के एस डी ( पी जी ) कॉलेज में विमोचन करते समय पढ़ कर सुनाई । मुझे याद नहीं उनसे कभी पहले आमने सामने मुलाक़ात हुई या कोई वार्तालाप हुई हो । शायद कोई बेहद संवेदशील साहित्य सृजक ही ऐसा कर सकता है केवल पुस्तक को पढ़ कर रचनाकार की मन की भावनाओं को समझ कर इतनी सही सार्थक समीक्षा करना । मुझे अपनी रचनाओं की इस से बढ़कर कोई कीमत नहीं मिल सकती है । अमृत लाल मदान जी का धन्यवाद शब्दों में नहीं किया जा सकता है । 

(   पाठक वर्ग की सुविधा के लिए ' एहसासों के फूल ' कविता संग्रह की पुस्तक व्हाट्सएप्प नंबर 
8447540078 पर संदेश भेज मंगवा सकते हैं । जल्दी ही अमेज़न पर भी उपलब्ध करवा दी जाएगी। )
 

 

सितंबर 06, 2022

कौन समझेगा कहानी मेरी ( कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया

   कौन समझेगा कहानी मेरी ( कही-अनकही ) डॉ लोक सेतिया 

शब्द नहीं एहसास हैं , मैंने अपनी दास्तां सुनाने को कुछ फ़िल्मी गीत कुछ और बातें उधार ली हैं । मेरे अल्फ़ाज़ जाने कैसे कहां गुम हो गए हैं । मैं कौन हूं कहां हूं देखता कोई नहीं , रहता हूं जिस बस्ती में मुझे जानता कोई नहीं । बंद हूं इक कैद में ज़िंदगी की चाह में , कफ़स के परिंदों को उड़ने को छोड़ता कोई नहीं । कभी बेवजह हंसता अश्क बहाता कभी जाने क्यों , इस दुनिया की भीड़ में मेरी तरफ देखता कोई नहीं । दोस्त खुद का नहीं , दोस्ती का घर बना लिया , दुश्मन बहुत मेरे यहां , मुझे मांगने पर मगर मारता कोई नहीं । ये इक नज़्म है जिसकी कोई बहर नहीं मिली कोई मीटर काफ़िया नहीं मिल सका लाख कोशिश करने पर भी । जिस डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखी हुई थी खो गई आज ढूंढी तो नहीं दिखाई दी । उसी तरह जैसे इधर उधर घर बाहर ज़माने भर के अपने बेगाने लोगों में प्यार की चाहत की इक ओस जैसी बूंद भी मेरे लिए कभी नहीं थी । इक दोस्त अजीब लगता था उसकी बातें अच्छी लगती थीं मगर समझ नहीं आती थीं शायद अब थोड़ा थोड़ा समझने लगा हूं । याद आया उस की तबीयत खऱाब थी मिलने गया तो उसकी पत्नी ने जैसे इक शिकायत की थी बोली थी भाई साहब देखना आपका दोस्त इस तस्वीर बनाकर क्या समझाना चाहता है । बड़ी सी पेंटिंग दीवार पर टांगी हुई थी निजी कक्ष में जिस में कोई बदन पर कांटेदार तारों से बंधा हुआ था । शायद सबकी नज़र नहीं जाती थी वहां जहां इक छोटा सा दिल का निशान बना हुआ था । कॉलेज के समय से ही उसको ऐसे पेड़ों की पेंटिंग बनानी पसंद थी जिस की शाखाओं पर कोई पत्ता तक नहीं होता था सूखे ठूंठ जैसे दरख़्त की तस्वीर बनाता रहता था । उस ने अपने घर में गमलों में पौधे लगा रखे थे जिन में फूलदार कम और कंटीले कैक्टस अधिक थे । मुझे घर बनाने पर कुछ कैक्टस गमले में उपहार दे गया था कोई कुछ भी समझे मैं जानता हूं उसके दामन में मेरे लिए एक भी शूल नहीं था फूल खिलाना चाहता था शायद मगर साथ साथ कांटे भी होंगे गुलाब में छुपे हुए इस वास्तविकता को समझाना भी चाहता था । 
 
 उम्र बीत गई तब जाकर समझा खुद अपने आपको सबकी बात को । ये दुनिया किसी प्यासे जलते तपते रेगिस्तान की तरह है और हम लोग प्यासे हैं प्यार अपनापन और चैन सुकून की तलाश में दौड़ते रहते हैं ।  यही मृगतृष्णा जीवन का अभिप्राय है चमकती हुई रेत को पानी समझ भागते भागते आखिर प्यासे ही मर जाना है । मुझे फ़िल्में देखना बेहद पसंद रहा है , लोग अपने आनंद मनोरंजन के लिए सिनेमा देखते हैं मुझे जैसे किरदार भाते हैं आस-पास नहीं मिलते फ़िल्म देखता तब दिखाई देते हैं । पागलपन ही सही मुझे प्यार रहा है ऐसे किरदारों से अथाह मुहब्बत की है , आनंद फिल्म में एक दोस्त मिल जाता है जिसको बिना जाने पहचाने किसी नाम से पुकारने पर जवाब में उसी तरह का किरदार सामने खड़ा दिखाई देता है । आनंद किसी मुरारीलाल को नहीं जानता फिर भी कभी किसी से मिलने बात करने की चाहत हो तो इस नाम से आवाज़ देकर पुकारता है राजेश खन्ना को जॉनी वाकर गुरु बन जयचंद नाम से जवाब देता है । मुझ जैसे लोग कितने होंगे जिनको उनका मुरारीलाल जयचंद आनंद को मिले कितने दोस्तों की तरह वास्तव में मिलते नहीं हैं । 
 
लेकिन आजकल की फ़िल्में टीवी सीरियल की कहानियों में दोस्ती मुहब्बत हमदर्दी वाले किरदार नहीं होते हैं , दिखाई देते हैं चालाक चालबाज़ हिंसा को बढ़ावा देने वाले ख़लनायक वाले किरदार । खलनायक आजकल नायक से अधिक पसंद किए जाने लगे हैं , हमको सिनेमा टीवी अखबार से टीवी समाचार चैनल तक डराने लगे हैं । सपने सुहाने अब नहीं दिखाई देते भयानक ख़्वाब आधी रात को जगाने लगे हैं । फूलों की बात क्या बताएं इधर बाज़ार में ऊंचे दाम बिकते हैं । मैंने फूलों की बात जब भी किसी से की लगा सब को प्लास्टिक या पत्थर के फूल पसंद हैं गुलदान में सजाकर रखने को । मेरे खिलाए फूल भरी बहार में क्यों मुरझा जाते हैं मैं नहीं जानता कोई राज़ होगा छुपा इस में मुमकिन है । चलते चलते इक पुरानी ग़ज़ल सुनाता हूं ।
 

फूलों के जिसे पैगाम दिये ( ग़ज़ल ) 

फूलों के जिसे पैग़ाम दिये
उसने हमें ज़हर के जाम दिये ।

मेरे अपनों ने ज़ख़्म मुझे 
हर सुबह दिए हर  शाम दिये ।

सूली पे चढ़ा कर खुद हमको
हम पर ही सभी इल्ज़ाम दिये ।

कल तक था हमारा दोस्त वही
ग़म सब जिसने ईनाम दिये ।

पागल समझा , दीवाना कहा
दुनिया ने यही कुछ नाम दिये ।

हर दर्द दिया , यारों ने हमें
कुछ ख़ास दिये , कुछ आम दिये ।

हीरे थे कई , मोती थे कई
" तनहा " ने  सभी बेदाम दिये ।