पौराणिक काल में लौटता भारत ( तिरछी चाल ) डॉ लोक सेतिया
आपको आधुनिक व्यंग्य कथा पढ़ने को लिखी जा रही है , किसी भी कथा को पढ़ते सुनते हुए कोई सवाल किसी तर्क वितर्क की बात को पहले ही छोड़ना आवश्यक है । कथा का यथार्थ से संबंध साबित करने की जगह भावार्थ समझ कर ज्ञान रुपी अमृत पान करना चाहत होनी चाहिए । अधिकांश कथा को समझने में बहुत समय लगता है तब जाकर ऐसा मालूम होता है कि हां अमुक कथा लिखने वाले ने यही कितना पहले लिख रखा था । नहीं मैं कोई भविष्य बताने वाला कदापि नहीं हूं अगर होता तो शायद कब का जान गया होता कि मेरा नसीब कभी भी बदल नहीं सकता है चाहे लाख कोशिशें प्रार्थनाएं करता रहूं । आजकल भविष्यवाणी करने वाले अपनी कही बात से कब मुकर जाते हैं पता ही नहीं चलता है , मैं आधुनिक युग की वास्तविकता को देख कर जैसा समझा हूं इस कथा में वही लिखने की कोशिश है । आपको काफी पीछे अपने देश के इतिहास को जानना समझना होगा , आज़ादी से पहले ही नहीं गुलामी से भी पूर्व जब राजशाही नवाब और राजा महाराजा रजवाड़े जागीरदार कुनबे शाहंशाह शासक सम्राट सुल्तान भूपति हुआ करते थे । दुनिया पिछले युग से आगे बढ़ती है और लोकतांत्रिक या समाजवादी से लेकर तमाम विचारधाराओं को अपनाती है , यहां तक कि जहां अभी भी कोई राजा होता है वहां उसने ख़ुद ही अपनी सीमा को निर्धारित कर देश की जनता को वास्तविक मालिक समझ कर बहुत अधिकार जनता को देने का प्रयास किया है । लेकिन हमको अपने अतीत पर गर्व करने की आदत इतनी अधिक है कि पुरातन काल की अनुचित घटनाओं को भी किसी न किसी तरह से आवश्यक साबित करने की बात करते रहते हैं ।
पिछले कुछ सालों से फिल्मकारों ने टीवी चैनल से ओ टी टी तक ने देश समाज को सही दिशा दिखलाने वाली पुरानी फिल्मों जैसे नया ज़माना वो सुबह कभी तो आएगी पूरब पश्चिम उपकार जैसी लोक जागृति की कहानियों को छोड़ कर पैसे बनाने को तथाकथित धार्मिक और काल्पनिक किरदार तमाम तरह के दिखला कर दर्शकों को असली समाज को भुलाकर किसी कल्पनालोक में आनंद लेने का झूठा सपना दिखलाना शुरू कर दिया है । यकीन मानिये जिस को सदी का महानायक घोषित किया जाता है मीडिया द्वारा समझने लगोगे तो उसने युवा वर्ग को अपने किरादरों से प्रभावित कर भटकाया है और रौशनी की तरफ नहीं घने अंधियारे की तरफ धकेला है । करोड़पति बनाने का खेल का शो किसी मृगतृष्णा से बढ़कर ऐसी दौड़ में कितने लोगों को दौड़ने को प्रेरित करना है जिस की परिणीति वही है जो इक अंग्रेजी कहानी कितनी ज़मीन चाहिए इक आदमी को में होती है । लेकिन शायद आजकल जो कुछ सामने दिखाई दे रहा है देश की राजनीति की हालत भी वर्तमान को छोड़ पुरातन पौराणिक युग की तरफ समाज को धकेलने का प्रयास किया जाने लगा है । बिना संकोच लोग कहने लगे हैं कि उनको कोई भी लोकतांत्रिक ढंग से हटा नहीं सकता बल्कि अगले कितने वर्षों तक उनका ही शासन रहेगा और जनता को उसी को लोकतंत्र मानना होगा ।
अघोषित शाहंशाह की सत्ता की बात होने लगी है जिस में कुछ मनसद होंगे जो साहिब ए आलम का इक़बाल बुलंद रहे की जयजयकार कर बदले में मनचाहा सभी कुछ हासिल किया करेंगे । इस राजनीति ने कितना कुछ संविधान न्याय और मौलिक अधिकार से मानवाधिकार ही नहीं बल्कि विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक पर अंकुश ही नहीं लगाया बल्कि अपने विरोधी को दुश्मन मानकर जैसे चाहा उस पर ज़ुल्म करने तक की कोशिश की है । लेकिन आज जो लोग उनकी विचारधारा को अपने लिए हितकारी समझ रहे हैं उनको इस से आगे की कल्पना शायद नहीं है । क्या आपको ध्यान है ऐसे पुरातन पौराणिक काल में जनता गुलाम बनकर ज़ालिम की शिकायत तक नहीं कर सकती थी और शासक उनकी ज़मीन जायदाद ही नहीं बहू बेटियों बहनों को उठवा कर ले जाना अधिकार समझते थे । गरीबी भूख और तमाम अन्य समस्याओं से अधिक पीड़ादायक ये होता है और ऐसा नहीं कि जो शासक के दरबारी होते हैं उनकी कभी बारी नहीं आती , कभी उनके साथ भी यही होता है । कथाओं में पढ़ने से आपको समझ नहीं आएगा कि तब कैसा जीवन सामान्य वर्ग ही नहीं बल्कि साधनसम्पन्न वर्ग को जीना पड़ता था जिस में कोई अदालत कोई कानून किसी को इंसाफ़ नहीं देता था और शासक का अन्याय और अनुचित निर्णय ही अंतिम समझना अनिवार्य हुआ करता था । आज लगता हैं हमारा समाज और राजनीति और शासकीय प्रणाली की व्यवस्था उसी अंधकारमय भविष्य की तरफ अग्रसर है । सावधान ।




















