सितंबर 18, 2026

POST : 2120 कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

 ये पंजाबी लोक कहावत , या मुहावरा संत सुथरा शाह से जुडी हुई बात है ।  आग लगे बस्ती में मौज राम मस्ती में की तरह से दूसरों के सुःख दुःख से बेपरवाह अपने फक्क़ड़पन में बेफिक्र होकर ख़ुशी मनाता है ।  शायद संत सुथरे शाह का आधुनिक स्वरूप इस काल में सत्ता पर बैठा है कुछ भी नहीं करता सिर्फ़ मन की बात करना भाता है ।  चंचल मन का क्या है पल भर में दुनिया भर में विचरण करता है टिकता नहीं कभी किसी ठिकाने पर ।  संत सुथरे शाह ने अपने भीतर से आत्मा को कई साल पहले निकाल का छोड़ दिया था , जिसका साथ निभाना था उस आत्मा को अकेली छोड़ दिया था । आत्मा सीता की तरह बन बन भटकती रहती है उसको फुर्सत नहीं ये मोह माया की बात लगती है । लेकिन मोह माया शोहरत ताकत खुद उसे अपने लिए सबसे अधिक पसंद है जितना मिले थोड़ा लगता है सब हासिल है फिर भी ख़ालीपन है मन में लालसाओं का अंबार है ।  देश से राज्यों तक उनका विस्तार है अपनी सरकार की जयजयकार है मिटता नहीं अहंकार है कदम कदम दिखाई देता इक मझधार है नैया के डूबने का बन गया आसार है तब भी उनको नहीं मिलता चैन करार है नित नया तमाशा उनको दरकार है ।  कितने दीप जलाये तब भी भाहर रौशनी भीतर घना अंधकार है लगता है जीत भी हुई बेकार है ऐसी जीत सबसे बड़ी हार है व्यर्थ हुआ हर इश्तिहार है सच अभी खामोश है तब भी झूठ बड़ा बेकरार है ।  जो उस पार था वही इस पार है अपनी ही कही हर बात खुद का उपहास बन गई है इंसान कितना लाचार है । 
 
आधी रात को जागते सोते की मदहोशी छाई है तन्हाई में कोई आवाज़ दी सुनाई है जैसे मर चुकी आत्मा फिर जाग गई है दुहाई दुहाई है ।  कितना कुछ जोड़ लिया है कोई हिसाब नहीं कुछ भी संग नहीं रहता अंधकार मिटाता माहताब नहीं ।  कर्मफ़ल की बात नहीं है कोई भगवान आखिर किस किस का कितना हिसाब लिखता होगा , उस से छुपा सकते हैं दुनिया से छुपा सकते हैं मगर अपनी जो इक अंतरात्मा है कभी मरने के बाद भी मरती नहीं है बस उसका सामना कैसे करोगे खुद अपने ही साये से डरोगे ।  जनाब के माथे पर पसीना है अरे ये जीना भी कोई जीना है दिन गुज़रते साल गुज़रते जाते बदलता रहता महीना है ये समय बड़ा ही कमीना है ।  पर्वत के शिखर से फ़िसलने का भय सताता है तब आगाज़ भूल अंजाम नज़र आता है , कोई कहीं दूर गाता है जो खोता है बस वही पाता है ।  मगर खोने पाने के हिसाब नहीं आता है असली बही खाता बतलाता है क़र्ज़ बढ़ता जाता है लेकिन उनको चार्वाक ऋषि का संदेश दिल बहलाता है क़र्ज़ ले कर घी पियो कौन अगले जन्म में क़र्ज़ मांगता है कौन चुकाता है ।  ज़रा सी आहट से जी घबराता है नींद से कौन बार बार जगाता है उनको अब सही गलत का अंतर नहीं समझ आता है कोई साधु वही बोल दोहराता है उठ जाग मुसाफ़िर भौर भई अब रैन कहां जो सोवत है ।    
 
 

 

सितंबर 17, 2026

POST : 2119 जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

  जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जान है तो जहान है देश में आया हुआ तूफ़ान है 
सभी को खाना लाज़मी आज  ख्याली पकवान है 
नाचती है ज़मीन भी झूमता हुआ इक आसमान है 
सत्ता के मन भाता बहुत खुशियों का समूहगान है 
 
राजा विक्रम सिंह ने भी जारी किया फ़रमान था 
भेस बदल कर निकला देखने मुआयना करने गया 
ढोल नगाड़े बज रहे थे हर तरफ़ दिखावे की ख़ुशी 
इक मोची अपनी चप्पल सी रहा भीगी आंखे लिए 
 
राजा क्रोध में उसके पास गया क्यों रो रहे बताओ 
शाही फ़रमान के उलंघन की मिलेगी सज़ा को पाओ
मोची बोला मेरी बेटी है बहुत बीमार पैसे नहीं पास
सज़ा दो है मंज़ूर झूठी ख़ुशी नहीं मना सकता हज़ूर 
 
सामने था सच जिसको दुनिया से छुपाया था आपने 
झौंपड़ी जलाई कितनी थी जब महल बनाया  आपने 
आपके जलाये दीप जितने कुछ देर में बुझ ही जाएंगे
आपकी कैसी ख़ुशी जनता को हर दिन सताया आपने  
 
कहानी में राजा को हुआ भूल का अपनी एहसास था 
आपने लेकिन दिया भगवान राम को दूसरा बनवास था 
आपने हर तरफ़ चलाई है गर्म हवाएं कहकर के मधुमास 
पछताते हैं नकली चमक दमक देख किया था विश्वास  
 
आपका जवाब नहीं मगर जनता पूछती  इक सवाल है
कुछ लोगों की रईसी अधिकांश जनता हुई बदहाल है 
आपकी राजनीति सबको लगती करती बड़ा कमाल है 
सत्ता की मनमानी हमेशा चलती रहती बेढंगी चाल है   
 

 जूतों में बंटती दाल है ( कविता ) 

 
अब तो ऐसा हाल है जूतों में बंटती दाल है
मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है ।

बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है ।

भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है ।

कालिख उनके चेहरे की कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है ।

झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
गरीबी ऐसा सवाल है । 

घोटालों का देश है मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं बस वही अस्पताल है ।

कल जहां था पर्वत आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी हो चुका मालामाल है ।

बबूल बो कर खाते आम हो  रहा कमाल है
शीशे के घर वाला रहा पत्थर उछाल है ।

चोर काम कर रहे पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया दर्द से बेहाल है ।

जीने का तो कभी मरने का सवाल है 
ढूंढता जवाब अपने खो गया सवाल है । 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
   
 
    

सितंबर 16, 2026

POST : 2118 प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

प्यास को हर जगह पानी लिखेंगे
हम अगर अपनी कहानी लिखेंगे । 
 
उम्र भर जो दर्द देते रहे हैं 
शुक्रिया लिख मेहरबानी लिखेंगे ।  
 
कोशिशें की भूल पाए न लेकिन 
फिर सभी बातें पुरानी लिखेंगे । 
 
कश्तियों को जो डुबोती हैं हर दिन 
रोज़ लहरों की रवानी लिखेंगे । 
 
क्या कहें कैसा नया दौर लगता 
राह से भटकी जवानी लिखेंगे । 
 
अश्क़ अपने सूख कब से गए हैं 
ख़ुश्क आंखों की ज़ुबानी लिखेंगे । 
 
लिख रहे ' तनहा ' नहीं लोग समझे 
एक दिन वो ख़ुद ही म'आनी लिखेंगे ।   
 

 
 
  

अगस्त 29, 2026

POST : 2117 हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
हम सभी से  , उम्र भर डरते रहे हैं 
कब जिए हम रोज़ बस मरते रहे हैं ।
 
दुश्मनी को दोस्ती का नाम दे कर 
दोस्ती की , इल्तिजा करते रहे हैं । 
 
खा के ठोकर भी नहीं संभले कभी हम 
फिर फ़िसल कर के , वहीं गिरते रहे हैं । 
 
था सुना  , कुछ लोग होते थे जहां में  
जो पराये  दर्द  को ,  हरते रहे हैं ।  
 
क्या किया सरकार ने कैसे बताएं 
खेत माली  सब यहां  चरते रहे हैं । 
 
कौन सच की बात करता है यहां पर  
झूठ से गागर सभी भरते रहे हैं ।  
 
नाख़ुदा बन कश्तियां ' तनहा ' डुबोते 
आसरा तिनके का , ले तरते रहे हैं ।    
 
 

 

अगस्त 24, 2026

POST : 2116 कैसे कैसे लोग मशहूर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       कैसे कैसे लोग मशहूर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

     ज़िंदगानी का कोई मकसद नहीं है  ,  एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है ।  

       पेड़ पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे , रास्तों  में एक भी बरगद नहीं है ।  

 
दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल है , जिस का भावार्थ है कि आज का समाज बेहद छोटी सोच वाला है  , कोई विशाल क़िरदार नहीं दिखाई देता कहीं भी जो समाज को छांव देता हो अन्याय की धूप से बचाने का काम करता हो ।  आगे की बात करने से पहले दुष्यंत कुमार की पहली ग़ज़ल की बात दोहराना ज़रूरी है , यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है  , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए ।  भावार्थ है कि जो जो संस्थान संविधान ने बनाये थे ताकि पीड़ित नागरिक को राहत देने को सहायक हों , उन्हीं से जब सामन्य नागरिक को पीड़ा दर्द और अन्याय मिलने लगे तब वहां से हमेशा को चले जाना चाहिए ।  पुलिस प्रशासन न्यायपालिका सभी जब सत्ताधारी राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर सरकार और धनवान  वर्ग की मनमानी में साथ देने लग जाएं तब कोई जाये तो कहां जाये ।  अफ़सोस है आजकल यही हो रहा है शासक प्रशासन जनता को न्याय नहीं देते बल्कि ज़ुल्म करते हैं लूटते हैं और अपने विवेक से कर्तव्य नहीं निभाते अहंकारी बन कर अनुचित कार्य बिना संकोच करते हैं ।  
 
लेकिन समाज में विडंबना दिखाई देती है जब हर तरफ ऐसे लोगों की चर्चा ही नहीं होती बल्कि मीडिया पर टीवी सोशल मीडिया पर उन लोगों से साक्षात्कार लेने उनकी राय पर सुर्खियां बनाने का कार्य होता है जिनकी शोहरत ही किसी बेकार घटिया काम घटना के कारण मिली होती है ।  हैरानी की नहीं चिंता की बात है कैसे कैसे लोगों को हमने अपना आदर्श बना लिया है जिनको मर्यादा तो क्या नैतिक मूल्यों भाषा तक की रत्ती भर परवाह नहीं होती है ।  माना अधिकांश लोग इधर कुछ भी तरीका अपनाकर सफ़लता हासिल कर धनवान बन जाते हैं लेकिन भारतीय सभ्यता कभी भी पैसे का  पुजारी बनने को उचित नहीं मानती है ।  सत्यमेव जयते , हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखता और हम झूठ की जय जयकार करने लगे हैं ।  संसद में तीन सौ सांसद आपराधिक मामलों में शामिल हैं और राज्यों में आधे राज्यों में खुद मुख्यमंत्री इसी कतार में आते हैं , विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में अपराधी बैठे हुए हैं ।  ऐसे में संविधान की शपथ सभी से एक समान न्याय करने और पक्षपात नहीं करने किसी से अनुराग या द्वेष नहीं रखने पर अमल क्या उसे याद भी कोई नहीं रखता है ।  आज शहीद राजगुरु का जन्म दिन है तो विचार आया कि क्या आज कोई है जो वास्तव में देश समाज की आज़ादी की खतिर या गुलामी की बेड़ियां काटने को अपनी जान कुर्बान कर सकता हो ।  कुछ लोगों ने खुदगर्ज़ी की आखिरी सीमा पार कर दी है अपने अधिकारों और कायदे कानूनों का अनुचित उपयोग कर लोगों का शोषण करने और शासकों की तिजोरियां भरने का काम करते हैं । शहीदों की आत्माओं से परमात्मा तक से धोखा करते हैं साधरण आदमी की समस्याओं को और भी अधिक बढ़ाकर । शासक वर्ग की लूट की आज़ादी से कौन देश को मुक्त करवाएगा कोई भी नज़र नहीं आता ऐसा नायक , खलनायक बहुत हैं जो खुद को नायक कहलाना चाहते हैं । 
 
 जिनका कर्तव्य है जनता की सेवा ईमानदारी से करने का उनको अपने अधिकार याद हैं लोगों के अधिकार समझना फ़र्ज़ निभाना भूल गए हैं , बल्कि वास्तविकता विपरीत है हर कोई ऐसे शासकों से घबराता डरता है और अवसर मिले तो उसका चाटुकार बनकर अपने लिए अधिकार सुख सुविधाएं पाना चाहता है ।  देश में अब वास्तविक नायक नहीं मिलते हमने नकली खोखले व्यक्तत्व वाले लोगों को अपना नायक घोषित कर समाज को बर्बादी की तरफ भेजने का कार्य करने लगे हैं ।  रसातल की तरफ जाने को कहने लगे हैं नई ऊंचाइयां छू रहे हैं ।  सच कहना हो तो लगता है जैसे कुछ नहीं अधिकांश लोगों को विशेषकर ख़ास तबके को खुद गुलामी पसंद है ,  जैसे कोई खाने को हड्डी डालता है तो कुत्ते दुम हिलाते हैं तलवे चाटते हैं , उसी तरह खास वर्ग की हालत हो गई  है ,  सब कुछ पास है पद पैसा लेकिन ज़मीर ज़िंदा नहीं  है ।     
 

 

अगस्त 23, 2026

POST : 2115 दोस्त कोई मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       दोस्त कोई  मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 
दोस्त कोई  मिला नहीं
इस जहां से गिला नहीं । 
 
कौन शिकवा करे भला 
जब रहा सिलसिला नहीं । 
 
चल रहे सब अलग अलग  
एक भी  काफ़िला नहीं । 
 
अपना अपना नसीब है 
फूल दिल का ख़िला नहीं । 
 
हार सब आंधियां गईं 
एक पत्ता हिला नहीं । 
 
कल इमारत बुलंद थी   
आज साबुत शिला नहीं । 
 
देख ' तनहा ' उधर ज़रा  
बच सकेगा किला नहीं ।  
 

 
 
 
 
 
 
  

अगस्त 22, 2026

POST : 2114 भगवान पर संशय ख़त्म ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

    भगवान पर संशय ख़त्म ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

कथा की शुरुआत करने का वही पुराना ढंग है लेकिन भगवान से भक्तों तक कुछ भी पुराना नहीं है इस मंदिर में सभी नवीनतम है ।  किसी पत्थर से नहीं पीतल तांबे लोहे से नहीं शुद्ध सोने से बनाई गई है मूर्ति भगवान की ।  अब किसी को कोई संशय नहीं रहना चाहिए कि भगवान है या नहीं है और अगर है तो वो कैसा है ।  छुप छुप कर नहीं जैसा उसको पसंद है करना खुले आम सभी के सामने कर दिखलाता है , कोई माई का लाल उसको नहीं रोक पाता है उसका कहना है वही सभी का दाता है । लाखों करोड़ को वो हर महीने खैरात बंटवाता है , उसका अपना इक बही खाता है जो उसके सामने नतमस्तक होकर शीश झुकाता है मनचाहा वरदान पाकर जाता है ।  उसका कद सबसे बड़ा है इक अकेला वही शान से खड़ा है देवी देवताओं तक को चुनाव में पराजित कर उसने अपना परचम हर जगह लहराया है ।  जिस जिस ने उसको पूजा है माना है रिझाया है मनाया है उसका कल्याण हुआ है जिसने नहीं भरोसा किया बहुत पछताया है इस देश में उसकी माया है सूरज चांद हवा पानी जंगल सभी पर उसका इख़्तियार है कहीं अंधेरा कहीं उजाला धूप कहीं कहीं शीतल छाया है ।  बस अब अधिकांश उसकी महिमा की बात करते हैं वही सब करता है सभी उस से हमेशा डरते हैं जिस पर तिरछी निगाह उसने डाली है उसकी तिजोरी हुई ख़ाली है ।  खुद अपने गुलशन को जो उजाड़ता है सिर्फ़ वही गुलशन का माली है ग़ज़ब की उसकी रखवाली है कुछ बचा ही नहीं होगा तो कौन फिर कुछ बिगाड़ सकता है ।  जब से धरती पर उसका शासन आया है उसने जितना इतिहास लिखा था पहले उसको मिटाया है इक अलग नया इतिहास उसने बनाया है यारों संग सभी खाया और रोज़ नाचने नचाने का दरबार सजाया है कौन कौन उसकी खातिर नाचा है किस किस को अपने अंगने में नचाया है आठवां सुर उसी ने बनाया है ।  सोने चांदी के भगवान हर घड़ी हंसते हैं मिट्टी के हम इंसान पल पल रोते हैं जो समझदार हैं जाग जाते हैं मिलता है उनको हम सभी खोते हैं ।  
 
आधुनिक भगवान ने सभी को समझाया है दुनिया की झूठी मोह माया ने सबको उलझाया है ख़ाली हाथ आदमी जाएगा ख़ाली हाथ आदमी आया है किसने लूटा किसने चुराया की बातों को छोड़ो ख़ामोश रहकर वक़्त गुज़ारो सबक पढ़ाया है सौ साल बाद आज़ादी के वाला सुहाना ख्वाब कोई दिखाया है ।  उस भगवान को खुद अपने लिए सभी कुछ चाहिए था जैसे भी मुमकिन हुआ सब कुछ हथियाया है आपको ठेंगा दिखलाने का समय तब आया है ।  उसकी कहानी काल्पनिक नहीं है सब सच है सामने है वन टू का फोर फोर टू का वन गीत उसको पसंद है यही भजन बजवाया है ।  यही होता है जिसने बनाया उसी का नाम मिटाते हैं तब इंसान से भगवान बनकर शोभा बढ़ाते हैं ।  अब कोई चेहरे पर रही नकाब नहीं है , वो कर्म उंगलियों पे गिनते हैं ज़ुल्म का जिस के कोई हिसाब नहीं है ।  आपके सामने हक़ीक़त है कोई भी सुनहरा ख़्वाब नहीं है , सही गलत का रखता वो हिसाब नहीं है सत्ता से बढ़कर कोई नशा नहीं कोई शासक पीता शराब नहीं खून इंसान का बहता है जिस नाम पर लिखी उस पर कोई किताब नहीं है ।  क्या भगवान से कम हैं आप नहीं आली जनाब नहीं ।    
 

 

POST : 2113 जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

जो हक़ीक़त को छुपा देते हैं 
झूठ को सच भी बना देते हैं । 
 
बात क्या उनको बताई जाए 
राज़ ग़ैरों को बता देते हैं ।  
 
बात करते हैं अदावत की वो  
दोस्ती का यूं सिला देते हैं ।  
 
जो न पहुंचाए कभी मंज़िल तक 
रास्ता ऐसा दिखा देते हैं । 
 
लोग करते हैं सियासत हर दम 
जलते शोलों को हवा देते हैं । 
 
ज़हर हाथों से पिला कर हमको  
लोग  जीने की दुआ देते हैं ।  
 
ख़ुद गए जो छोड़ कर ' तनहा ' को 
बेवफ़ाई का गिला देते हैं ।  
 
 

 

अगस्त 20, 2026

POST : 2112 सच का आईना दिखाऊंगा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     सच का आईना दिखाऊंगा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया  

सच बोलने की सज़ा ये पाऊंगा 
बेख़ता ही मार दिया मैं जाऊंगा । 
 
होगी न कभी खामोश मेरी ज़ुबान 
होगा जब ज़ुल्म आवाज़ उठाऊंगा । 
 
कर रहे  क़त्ल जम्हूरियत का सभी 
ये हक़ीक़त लोगों को मैं बतलाऊंगा । 
 
नाम पर सच बिकता है झूठ यहां  
तस्वीर इक रोज़  उसकी बनाऊंगा । 
 
चिराग़ कोई आप भी जलाते रहना
इक दिन मैं चला आखिर जाऊंगा । 
 
क़र्ज़ चुकाना सब शहीदों का बाकी है 
शीश फूलों की जगह पर चढ़ाऊंगा ।
 
वतन की मिट्टी में मिलना है मुझे 
बन के राख धरती पे बिखर जाऊंगा ।  
 
जनता को मिल जाएंगे अधिकार जब  
गीत वही तब मैं भी संग गुनगुनाउंगा । 
 
लोग गूंगे बहरे हैं नहीं सुनते यहां पर 
मैं उन्हें  सच का ये आईना दिखाऊंगा ।    
 

   

अगस्त 19, 2026

POST : 2111 ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है 
मौत लेकिन सफ़र सुहाना है । 
 
ज़िंदगी ख़्वाब इक अधूरा सा 
नींद खुलते ही टूट जाना है ।   
 
वक़्त को कौन रोक पाया है 
जो नया आज कल पुराना है । 
 
थे जो अपने ,  हुए पराये हैं 
याद करना नहीं , भुलाना है ।
 
हो गई इन्तिहा सितमगर अब  
क्या सितम और तुमने ढाना है । 
 
आ सको आज तो चले आओ 
कल किसी ने नहीं बुलाना है । 
 
चल दिए शहर छोड़ कर ' तनहा '  
क्या , कहीं और भी ठिकाना है ।   
 

 

अगस्त 15, 2026

POST : 2110 इंतज़ार क़यामत तक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          इंतज़ार क़यामत तक  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

पहले जाने कितनी बार किस किस ने भरोसा दिलवाया था लेकिन कोई भी अपने वादों पर खरा साबित नहीं हुआ , सच कहते हैं कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।  कहने से पहले थोड़ा खुद अपने भीतर भी झांकते तो क्या बुरा था , आपको जो जो करना था चाहते थे कर दिखाना था आपने सब दस साल में कर ही नहीं लिया बल्कि कोई भी अड़चन किसी तरह की आपको नहीं रोक पाई न कोई कानूनी न कोई नैतिक न ही कोई सामाजिक मान मर्यादा की परवाह ।  क्या क्या कैसे कैसे किया करवाया बताने की ज़रूरत नहीं है सभी सामने है , लेकिन जब जनता की दुर्दशा बदहाली को मिटाने की बात करनी पड़ी तब 2047 तक की बात कहने लगे जनाब ।  कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक ये जले पर नमक छिड़कने जैसा है कि हमको अपने अपनों के लिए अभी और करने दो जनता की बारी अभी जल्दी क्या है कुछ साल और गुज़ार सकते हैं उसके बाद ज़िंदगी रही तो देख लेंगे क्या हुआ तेरा वादा।  सत्ता पाने के बारह साल के समय में आपका दल दुनिया का सबसे धनवान राजनीतिक दल होने का दावा है , देश में शहर शहर आपके दल के शानदार दफ़्तर बनवा लिए हैं , खुद अपने लिए विशेष हवाई जहाज़ से कितना कुछ आपकी ख़ुशी मौज मस्ती और कितने रईसाना महंगे महंगे शौक पर देश के ख़ज़ाने को बेरहमी से खर्च किया गया है जिसे , किसी ऐसे देश में जिस में आधी आबादी की हालत इतनी खराब है कि उनके लिए अच्छी शिक्षा चिकित्सा  सेवाएं तो दूर जीने की बुनियादी ज़रूरतें नहीं पूरी होती , सामाजिक अन्याय और खुदगर्ज़ी कहना उचित होगा । अभी उनको 21 साल और इंतज़ार करने की बात करना दर्शाता है कि शासक सरकार में संवेदना का नितांत अभाव है ।  2014 से पहले की सरकार पर केवल इक काल्पनिक आधार पर घोटाले का आरोप लगाया गया था सी ए जी की रिपोर्ट में ऐसा कहते हुए की अगर बोली करवाई होती तो कितने करोड़ का फ़ायदा होता , आज उसी सी ए जी की कितनी रिपोर्ट सामने हैं जिस में आपकी सरकार के मंत्रालय और राज्यों की सरकारों के विभागों ने कितना पैसा कहां खर्च हुआ बताया तक नहीं है ।  पिछली सरकार की तर्ज़ पर कोई सी ए जी अवश्य आंकलन कर बता सकता है कि जितना पैसा आपने अपने दल और अपने ख़ास दोस्तों को फ़ायदा दिलवाया है उस से समाज में कितना कल्याण हो सकता था ।  ये कैसी देशसेवा है जिस में जनता बदहाल और शासक दल और उसके संगी साथी मालामाल होते जाते हैं तब भी आपको अन्य दल लुटेरे लगते हैं जिनके पास चालीस पचास साल सत्ता रहने के बाद भी इतना क्या इस से दसवां भाग भी नहीं है । ऐसा नहीं कहना चाहता कि पिछली सरकारों ने लूटा नहीं बल्कि सभी सरकारों ने सरकारी अधिकारियों ने मिल कर इतना लूटा नहीं होता तो देश कब का गरीबी भूख जैसे समस्याओं से निजात पा चुका होता ।  
 
आपने कभी अपने पिछले दो बार सत्ता में रहने वाले पांच पांच साल का सही हिसाब नहीं दिया है कि जनता को क्या क्या उपलब्ध हुआ है वास्तव में न कि झूठे आंकड़ों में । देश आज सब से खराब हालत में है आर्थिक तौर से भी सामाजिक तौर से भी और विदेशनीति कूटनीति सभी में असफ़ल साबित हुआ है किस लिए ।  क्योंकि आपको सिर्फ अपने खुद को बड़ा साबित करने की चाहत ने जनता और समाज की तरफ ध्यान देने ही नहीं दिया है विडंबना इस बात की है कि सब कुछ लुटवा कर बर्बाद कर के भी आपको समझ नहीं आया कि सिर्फ खोखली बातों से कुछ ठीक नहीं होने वाला है । आपात्काल की चर्चा करते हैं जबकि आज आपने तब से कहीं अधिक बढ़कर तानाशाही तौर तरीके अपनाये हैं और हर दिन लोग पुलिस और बिना वर्दी कुछ बदमाशों से पिटते हैं जब उनको कोई विरोध शांति पूर्वक करने नहीं दिया जाता ।  आप अपनी गलती को ढकने को उनको बदनाम करना चाहते हैं कुछ अपशब्द जैसा कह कर ।  लेकिन असमानता की सीमा बढ़ने पर जब शासक वर्ग और साधरण जनता में गहरी खाई बन जाती है तब लोग अपने अधिकार हासिल करने को साहस कर अन्याय करने वालों अपनी ताकत दिखाते हैं हमेशा । 
 
तमाशा आपका कभी ख़त्म नहीं होता मगर खेद की बात है कि आपने उन जगहों पर भी झूठ ही बोला हैं जहां पर सिर्फ सच ईमानदारी से बोलना चाहिए था । देश का बंटवारा भी आपको अपनी राजनीति करने का अवसर लगता है जबकि आप जब से सत्तारूढ़ हुए हैं सिर्फ लोगों को बांटने का की प्रयास किया है ।  15 अगस्त को बोलने वाले समझने वाले दोनों जानते थे की सब सिर्फ केवल औपचारिकता निभाना का कार्य कर रहे हैं । हैरान किया उस बाबा ने भंडाफोड़ कर कि सब कुछ गलत हो रहा है और नहीं बदले अगर आप तो उनको भी अपना धंधा छोड़ फिर आंदोलन करना पड़ सकता है ।  लेकिन खुद ही अपनी कहीं बात पर जैसे हंसते हुए दिखाई दिए , बात रोने की है उनको अभी समझ नहीं आया उनका खुद का एतबार कौन करता है । छाज तो बोले छलनी क्या बोले जिस में हज़ारों छेद होते हैं उनको अपने गिरेबान में झांकना चाहिए दोबारा भेस बदल कर भागना कठिन होगा समय बदल गया है ।  थोड़ा इस ग़ज़ल से समझ लेना कि सच की डगर पर वही चलते हैं जो जान हथेली पर रखते हैं जेल जाने से घबराते नहीं हैं ।  
 
 

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ( ग़ज़ल ) 

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं
शख्स जो सच की राह चलते हैं ।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं ।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं ।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं ।

जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं ।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं ।

टालते हैं हसीं में  वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं ।  
 

 
 
 
 
  

अगस्त 14, 2026

POST : 2109 आज़ादी एक अधूरा ख़्वाब ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     आज़ादी एक अधूरा ख़्वाब ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

भारत देश विदेशी शासन से मुक्त हो गया 1947 में ,  और हम 80 वीं वर्षगांठ मनाएंगे कल 15 अगस्त को  लेकिन वास्तव में साधारण लोग वंचित हैं , आज़ादी पाने आज़ादी से जीने से सभी को बराबर अधिकार मिलने का ख़्वाब अभी अधूरा ही है।  आज़ाद होने का मतलब बहुत बड़ा है हमको अभी कितनी तरह की गुलामी से छुटकारा पाना है , मेरी आयु 75 साल की है मगर अभी तक कभी भी आज़ादी से जीने नहीं दिया गया मुझे ।  बचपन में माता पिता से लेकर कितने अन्य लोग मुझे किसी न किसी तरह अपने आधीन रखने का कार्य करते रहे हैं उनका विचार था मुझको मनचाहे ढंग से रहने तो क्या सोचने समझने देखने बोलने की भी आज़ादी मिलना अनुचित होगा ।  बस ऐसी ही इक सोच सभी की रही है ख़ुद को मुझसे बड़ा समझदार जानकर और मेरा शुभचिंतक होने का अधिकारी मान कर मुझे अपने आधीन ख़ुशी से रहने को विवश करना उनका दायित्व था ।  ये सिलसिला कहीं पर भी कभी थमता नहीं है सिर्फ मुझी को नहीं जिसका जिस पर बस चलता है उसी को अपने आधीन  रखने की इक रिवायत चलती आई है ।  सरकार जिस में सांसद विधायक जनता चुनती है और कार्यपालिका से न्यायपालिका तक सभी को नियुक्त किया जाता है सही न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित रखने को वो सभी कभी भी नागरिकों की आज़ादी और अधिकारों की परवाह करते ही नहीं है ।  सामन्य जनता की कोई आज़ादी कोई अधिकार सुरक्षित नहीं है , बल्कि ये तमाम संस्थान संगठन उसका हनन करते रहते हैं बिना किसी संकोच के हमेशा ।  हमारा समाज जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसे नियम पर चलता रहा है धनवान बलशाली गरीब कमज़ोर से सब छीन लेते हैं बेबस कर जब भी जैसे भी । 
 
देश की राजनीति किसी गुलामों की मंडी से कम नहीं है जिस में कुछ लोग बाकी  सभी को अपने इशारों पर नचाते हैं बदले में उनको मिलता है सभी कुछ मगर आज़ादी कभी नहीं । राजनीतिक दलों का तौर तरीका कभी संविधान की भावना के अनुरूप नहीं रहा है । अदालत से निर्वाचन आयोग तक सभी ये सब होते देखते रहते हैं कुछ भी करते नहीं हैं क्योंकि उनको देश समाज संविधान से पहले स्वयं खुद की चिंता रहती है उनकी मनमानी चलती रहती है उनसे कोई सवाल नहीं पूछता कि  आपकी उपयोगिकता क्या है । सांसद विधायक बनना उनका यही इक  लक्ष्य था ताकि उनको शानदार जीवन रहन सहन सुख सुविधाएं मिलती रहें हमेशा , कोई कर्तव्य भी उनको निभाना होगा इस के लिए कभी भी  बाध्य नहीं किया गया उनको योग्यता का कोई पैमाना उन पर लागू नहीं होता है जैसे अन्य कहीं अयोग्यता असफलता से सज़ा मिलती है और हटाया जाता है  ।  उनकी ये भौतिकता की आज़ादी उनको मानसिक तौर पर गुलाम बनाने का ही परिणाम है उनकी सोच विचारधारा कोई मायने नहीं रखती है ।  सत्ता मिलते ही कुछ खास लोगों को आज़ादी मिलती है मनमानी करने से सभी को अपनी गुलामी करने को विवश करने वाले हालात पैदा करने की ।  उनके नियम कानून योजनाएं सभी उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने और जब तक मुमकिन हो अपनी सत्ता अपनी कुर्सी को बनाये रखने को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं ।  इस आज़ाद  देश के शासकों ने यही किया है धीरे धीरे  एक एक कर के सभी मौलिक अधिकारों पर डाका डालना और कहने को आज़ादी की रक्षक कहलाना । 
 
शायद हम भूल चुके हैं कि हम भी आज़ाद हैं तभी किसी न किसी को अपना मसीहा समझ उसकी जय जय कार करते हैं , किसी शासक की तानाशाही और अहंकारी आचार व्यवहार  या सत्ता का गलत उपयोग पर हम विचलित नहीं होते बल्कि सोचते हैं ऐसा ही होता है कौन नहीं करता है ।  सत्ता अधिकार और धन दौलत से शासक विवेकहीन बन कर देश को लूटने बर्बाद करने और केवल अपने ही ऐशो आराम को सबसे ज़रूरी समझने लगते हैं  लेकिन जनता छटपटाती है कुछ करने का हौसला नहीं कर पाती है ।  हम किसी पिंजरे में कैद खुद को असहाय समझते हैं और सोचते हैं कोई आकर हमको पिंजरे से आज़ाद करवाएगा ।  अभी एक कॉलेज के कानून की पढ़ाई करने वाले भावी वकीलों ने किसी ख़ास बड़े पद पर बैठे व्यक्ति से उपाधि या स्नातक की डिग्री लेने से असहमति जताई और संसथान को अवगत करवाया कि उनको नहीं बुलाया जाये जिनके कार्य न्याय को लेकर शंका पैदा करते हैं ।  लेकिन खबर है उनको इस कारण डिग्री मिलने में कठिनाई हो सकती है किसी ने अपने अधिकारों का उलंघन कर ऐसा आदेश निर्देश जारी किया मगर वापस लेने को बाध्य हुए विरोध को देख कर उनको अपने विवेक से ऐसा नहीं करना चाहिए समझ नहीं आया  । क्या छात्रों को  अपने विचार ऐसे सार्वजनिक तौर पर व्यक्त करने का अधिकार  नहीं है ।  बहुत कम लोगों को याद हो शायद कभी अभिनेता अमिताभ बच्चन जी की इक फ़िल्म आई थी , मैं आज़ाद हूं , वास्तव में कोई भी शख़्स उस नाम का नहीं था फ़िल्म में इक अख़बार के संपादक ने सनसनी पैदा करने को कुछ ख़त छापे थे अनाम आज़ाद नाम वाले व्यक्ति का नाम लिखकर ।  उन खतों में सड़ी गली व्यवस्था पर सवाल या टिप्पणियां की जाती थी जो शासन प्रशासन को स्वीकार नहीं होता है ।  अंत में जिसको आज़ाद बनाकर सामने लाकर पेश करना था उसको अपनी जान देकर खुद को असली साबित करना पड़ा था ।  आजकल अख़बार टीवी चैनल वाले जनसमस्याओं की बात नहीं करते हैं सत्ता को अपना ज़मीर बेच कर उसका गुणगान कर मालामाल हैं ।  जिनका सब कुछ पैसा है उनको गरीबी भूख अन्याय अत्याचार दिखाई नहीं देता क्योंकि ये जिनके साथ घटता है उस जनता से मीडिया को कोई मतलब नहीं रहा है ।  आज़ादी मिली है दलालों को चोर लुटेरों को वो कुछ भी करते रहें कोई रोकने टोकने वाला नहीं है ।  हम उनके पिंजरे से बाहर निकलना ही नहीं चाहते हैं कैद में रहकर खैर मनाते हैं क़ातिल को खुद घर बुलाते हैं ।  वास्तव में हम ऐसा साहस कभी नहीं करते बल्कि जिस पिंजरे में कैद हैं उसी से लगाव हो गया लगता है ।  साधु और पिंजरे में कैद पंछी की कहानी याद है , इक बार फिर से पढ़ कर समझते हैं ।   
 
 

             साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )

 पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे आज़ाद करो ।  ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला ।  मगर पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया ।  अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़ सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है ।  उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना ।   अब साधु ने उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई में फेंक दिया ।  इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को ।  लेकिन आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही दिशा नहीं समझाने वाले ।  अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है ।  घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है । 
 

मैंने शुरुआत ख़ुद अपने आप से की थी आखिर में उस को ध्यान में रखते हुए अपनी किताब एहसासों के फूल से इक कविता पेश करता हूं ।  

 

   कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये ।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये ।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको ।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने 
खुद अपनी ही कैद से । 
 

 

 



अगस्त 13, 2026

POST : 2108 ये क्या हुआ कैसे हुआ ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ये क्या हुआ कैसे हुआ ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

कितना भरोसा था भगवान का बहुत चर्चा थी पांच सौ साल बाद भगवान को लाया गया है भगवान राम जी का भव्य मंदिर बनवाया गया है । दान चंदा को लेकर शंका हुई तो मालूम पड़ा दर्शन को आने वाले लोगों में बड़ी कमी आई है , अचरज की बात नहीं है लोग वहां चंदे का हिसाब देखने को तो आते नहीं थे ।  मंदिर वही है उसमें स्थापित मूर्ति भी उसी जगह है आने वालों को दर्शन भी उसी ढंग से हो रहे हैं फिर संशय संकोच किस बात का है ।  सब भगवान की मर्ज़ी से होता है तो चंदे का हिसाब किताब भी भगवान से छुपा तो नहीं है , क्या किसी ने बताया कि ऐसी बात से नाराज़ हो कर भगवान मंदिर को छोड़ किसी और जगह चले गए हैं ।  अगर आपको भगवान के दर्शन करने हैं तो इस मायाजाल से बाहर निकलना होगा ।  पिछले दिनों इक ख़ास पहचान के अपने भाई भारत आये थे आजकल अमेरिका में रहते हैं , उत्साहित थे बता रहे थे अमेरिका का पॉसपोर्ट होने से पूरी मंडली को वी आई पी दर्शन करवाए गए ।  कुछ भी बदला नहीं है आपको समझने में भूल हुई है भगवान हैं या नहीं हैं ये दर्शन को आने वाले की आस्था पर निर्भर है ।  जिनको मिलना है भगवान हर जगह मिल ही जाते हैं जिनको शानदार भवन ईमारत और भव्य नज़ारों को देखना है उनके लिए कितनी और जगह मिल जाती हैं ।  सभी राहें अपनी जगह रहती हैं कभी नहीं चलती आहटें गुज़रती हैं आती जाती हैं ।  भगवान के घर सभी का स्वागत है लेकिन अचरज इस बात का है कि लोग यहां भी कुछ ख़ास शर्तें रखना चाहते हैं । कभी किसी को भगवान ने नहीं कहा होगा कि मुझे कोई आलीशान घर बनवा कर दो रहने को , ऊपरवाले को नीचे धरती पर किसी ठौर ठिकाने की ज़रूरत शायद ही हो सकती है ।  मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी को कोई भी धार्मिक स्थल कोई ईमारत कोई ढांचा किसी नाम का तोड़कर गिराकर अपना आवास बनाना स्वीकार हो ही नहीं सकता है । 
 
जिन्होंने राम को लेकर अपनी राजनीति की मंज़िल की ऊंचाई हासिल करनी थी उन्होंने जिस मंदिर को बनवाया वो उनकी मालकियत समझी जानी चाहिए और मालूम करते तो समझ आता की किस किस दस्तावेज़ पर कोई कौन असली मालिक भी है ख़रीदार भी और विक्रय का अधिकारी भी वही है ।  भगवान राम ने कभी कोई दावा नहीं किया न ही समझते हैं उनकी बनाई दुनिया में कोई ज़मीन तो क्या हवा पानी धूप छाया पर किसी का अधिकार नहीं लिखा कानूनी भाषा में सभी बेनामी कहला सकते हैं , बेनामी आमदनी जायदाद पर विवाद कुछ लोगों का आपसी झगड़ा होता है । हर किसी को बीच में हस्ताक्षेप की आवश्यकता नहीं होती है ।  चिंता इस बात की होनी चाहिए कि भगवान का नाम भी किसी ऐसी बात में लाना अनुचित है , भगवान का नाम बदनाम न करो ।  सोचा कि जब वास्तविक भगवान को इन सभी बातों की खबर मिली होगी तब उन पर क्या बीती होगी ।  किसी अन्य ईश्वर देवी देवता ने ताना भी मारा होगा कि इतनी जल्दी आपकी अहमियत घटने लगी है हमारी कितने सालों से बढ़ती बढ़ती ऐसी हो चुकी है कि सरकार को अंकुश लगाना पड़ा है जबकि आपके मंदिर आने को कितनी सुविधाएं क्या क्या नहीं किया गया । आपका कुछ नहीं होना लेकिन जिन्होंने आपको लाकर खड़ा किया बनाने को क्या क्या नहीं किया कोई तरीका नहीं छोड़ा सही या गलत जैसे भी हो करिश्मा कर दिखाया भगवान को लाने का अन्यथा सभी को भगवान लाते हैं दुनिया में उनकी गंगा कैसे बहेगी चिंता उनकी है ।  आपके सहारे जो थे उनका कोई और सहारा दोबारा मिलेगा कहीं किसी तरह अन्यथा उनकी नैया कैसे पार लगेगी भविष्य में उनको कितना कुछ खुद अपने लिए करना है आपके नाम पर । आपका नाम लिखने से पत्थर भी तैरने लगे थे उनके डूबने पर सवाल आपकी अनुकंपा पर भी खड़ा हो सकता है । 
 

 

अगस्त 12, 2026

POST : 2107 मिट्टी का घड़ा ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

               मिट्टी का घड़ा ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

हर तरफ छाया अंधेरा  
और मैं तन्हा खड़ा हूं । 
 
कैद में तन्हाइयों की 
क्या कहूं मैं क्यों पड़ा हूं । 
 
साथ देता कौन , मैंने 
कब किसी को है पुकारा 
 
यूं अकेले उम्र सारी 
इस ज़माने से लड़ा हूं । 
 
है यही तकदीर पाई 
रास्ते मेरे अलग हैं 
 
दूरियां बढ़ती ही जाती 
मैं अगर आगे बढ़ा हूं । 
 
मुझको मिट्टी ने बनाया 
अधपका ही रह गया था 
 
क्यों करूं अफ़सोस आख़िर 
सिर्फ़ इक टूटा घड़ा हूं ।  
 

 


 

POST : 2106 सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

  सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं  
कहानी ज़ालिमों की , दोहरा रहे हैं ।  
 
है जिन के हाथ में , इंसाफ़ का तराज़ू 
वही कानून के , पुर्ज़े उड़ा रहे हैं ।  
 
बुरा था वक़्त जब तब दूर हो गए थे 
नये हालात में , खुद पास आ रहे हैं ।
 
सुना तो रूह तक भी कांपने लगी है 
न जाने , लोग कैसे गीत गा रहे हैं ।   
 
उन्हीं के सामने क्यों हाथ जोड़ते हो 
तुम्हारी बस्तियों को जो जला रहे हैं । 
 
नहीं कीमत यहां पर जान की रही अब 
जो हैं ज़िंदा उन्हें मुर्दा बता रहे हैं ।
 
सियासत देख उनकी कह रहे हैं ' तनहा '
इशारे आपके  ,  सबको डरा रहे हैं । 
 

  

अगस्त 11, 2026

POST : 2105 बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का ( खोदा पहाड़ ) डॉ लोक सेतिया

  बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का ( खोदा पहाड़ ) डॉ लोक सेतिया 

काफ़ी दिनों से बताया जा रहा था इस बार कौन बनेगा करोड़पति में कुछ अलग होगा , इस बार सोचना पड़ेगा । कल रात इसी बात को जानने समझने को पहला एपीसोड देखा तो सोचने जैसा कुछ भी नहीं मिला , सच कहूं तो देखने सुनने जैसा कुछ लगा ही नहीं वही पुरानी शराब का नया लेबल । लेकिन आज समझना चाहा तो महसूस हुआ कि केबीसी को इस बार यही सोचना पड़ेगा की कब तक उन्हीं बातों में उलट फेर कर अदल बदल कर किस को बहलाना है शायद खुद आयोजक को ही नहीं बल्कि प्रयोजक तक को विचार करना पड़ेगा की कब तक उसको ज़िंदा रख सकते हैं किसी वेंटिलेटर जैसे उपकरण के सहारे ।  अब उसको जाने देना उचित होगा ।  शेर याद आया , शायर ख्वाजा हैदर अली आतिश जी का , बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का , जो चीरा तो इक कतरा - ए - खूं न निकला ।  कभी न कभी हर शय का अंतिम समय आता ही है लगता है अब उनको कुछ और नया सोचना चाहिए लेकिन ऐसा संभव तभी हो सकता है जब पिछले से बाहर निलक सकें , पुरानी चीज़ों से लगाव मोह आसानी से छूटता नहीं है ।  इस से पहले कि देखने वाले ऊब कर उठ कर जाने लगें तमाशा दिखलाने वाले को तमाशा बंद कर देना चाहिए ।  
 
हालात बदल गए हैं लोग अब घिसी पिटी नकली बातों से बहलते नहीं हैं , समाज इन दिनों काफ़ी रंग बदल रहा है बल्कि बड़ी जल्दी जल्दी घटनाएं घट रही हैं ।  आपकी टीवी सिनेमा की उन्हीं झूठी बनावटी बातों का असर बाक़ी नहीं रहा है लोग मदहोशी से बाहर निलकने लगे हैं सब समझने लगे हैं ।  कल वही फ़िल्मी डायलॉग और आपस में एक दूसरे को खुश करने की कोशिश नहीं प्रभावी लगी नहीं देखने वालों को ।  ऐसे में आपको सोचना पड़ेगा कि कैसे अपनी झूठी नकली बनावटी दुनिया से निकल कर असली समाज की वास्तविकता को जानने समझने की कोशिश की जा सकती है ।  आज लगने लगा है कि जो दावा किया जाता रहा है किसी को सदी का महानायक किसी को मिस्टर परफैक्शनिस्ट किसी को ढाई किलो का हाथ इत्यादि सब की कलई खुलने लगी है ।  अभी तक आपने बहुत डींगें हांक ली लोगों को करोड़पति बनाने के सपने पूरे करने वाले अब आपको खुद अपनी छवि के बिखरने टूटने की आशंका दिखाई दे रही है ।  अठाहरवां संस्करण का शुरुआती एपीसोड देख कर लगता है जैसे उनको पोटली में कोई खेल खिलौना बचा नहीं है , अब वो बेचना है जिसका कोई आकार कोई वजूद कहीं नहीं है लेकिन फ़िल्मनगरी की आदत है ऐसा करने में उनको रत्ती भर संकोच नहीं होता है ।  भाग लेने वालों से दर्शकों तक को निराशा मिले तब भी उनको जितना पैसा चाहिए मिलना निर्धारित है कभी कभी सफल नहीं होना और भी फ़ायदेमंद साबित होता है । 
 
अजीब विडंबना है टीवी शो अभिनय मनोरंजन की दुनिया को वास्तविक देश समाज की घटनाओं से कोई मतलब नहीं है उनके घर आंगन में ढोल नगाड़े बजते हैं भले बाहर असली समाज की दुनिया में कितनी चीख पुकार हाहाकार मची हो ।  ये अपनी झूठी काल्पनिक दुनिया में नकली ख़ुशी मौज मस्ती में खोये हुए मदहोश हैं कोई दौलत शोहरत का नशा उन पर छाया हुआ है । इनका कोई भी सार्थक सृजन कभी होता ही नहीं जो देश समाज को कोई दिशा देने का कर्तव्य निभाये , ऐसा कोई फ़र्ज़ इनको याद ही नहीं है कला साहित्य संगीत का प्रयोजन जागरूकता फ़ैलाने का हुआ करता था कभी ।  ये खुद भटके हुए लोगों का इक ऐसा समूह है जिस का जनता देश समाज के कल्याण से कोई नाता नहीं है उनको सब आसानी से हासिल होता है साधारण आदमी की कठिनाई उनको विचलित नहीं करती बल्कि इक विषय प्रतीत होती है फ़िल्म टीवी शो सीरियल बनाकर पैसा बनाने का । आखिर में इक कविता इन सभी फ़िल्मी किरदार निभाने वाले नायक का अभिनय निभाने वाले अभिनेताओं को लेकर पढ़ते हैं । 
 
 

        नेपथ्य ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

किसी लेखक ने
भूख से तड़पते हुए
दरिद्रता भरे
जीवन पर लिखी थी
जो कहानी ।

तुम कर रहे हो
अभिनय
उस कहानी के
नायक की भूमिका का ।

जो दर्द भरे बोल
निकले थे
एक खाली पेट से
बोल रहे हो तुम
उन बोलों को
भरपेट मनपसंद भोजन खा कर ।

और चाहते हो
करना कल्पना उस नायक के ,
दर्द के एहसास की ।

चाहे कर लो
कितना भी जतन 
ला नहीं पाओगे वो आंसू
जो स्वता ही निकल आते हैं ,
हर गरीब के बेबसी में ।

नहीं मिल सकते कहीं से
बिकते नहीं हैं
दुनिया के बाज़ार में ।

तुम बेच सकते हो बार बार
झूठे आंसू दिखावे के
है कमाल का अभिनय तुम्हारा
महान कलाकार हो तुम ।

आवाज़ तुम्हारी रुलाती है
भाती है दर्शकों को
मिल जायेंगी तुम्हें
तालियाँ दर्शकों की
और ढेर सारी दौलत भी ।

मगर
कहानी का लेखक
कहानी के नायक की तरह
जीता रहेगा गरीबी का
दुःख भरा जीवन हमेशा ।

उसकी कहानी से हो नहीं पायेगा 
न्याय कभी भी । 
 
 

 

अगस्त 08, 2026

POST : 2104 इस बार सोचना पड़ेगा ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

  इस बार सोचना पड़ेगा  ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया 

अर्थात अब तक केबीसी और जनाब अमिताभ बच्चन जी ने सोचा ही नहीं था , जिस शो को धन ज्ञान से लेकर जाने कितने तरह का भंडार समझ रहे थे , वास्तव में वो क्या था सोचने की घड़ी आ गई है ।  सोचने को बहुत कुछ है मगर अधिकांश लोग सोचने समझने की ज़हमत उठाते ही नहीं जो मन चाहा , जो फ़ायदे का सौदा दिखाई दिया , बिना संकोच करते जाते हैं ।  इस बार सोचना होगा कि वास्तव में केवल केबीसी ही नहीं अन्य तमाम टेलीविज़न शो फ़िल्में सीरियल से समाज को हासिल क्या होता है ।  कला साहित्य और टीवी सिनेमा का कर्तव्य समाज को सही मार्ग दिखलाना वास्तविकता से परिचित करवाना और समस्याओं का समाधान तलाश करना था ।  लेकिन ये सभी दर्शकों को घटिया मनोरंजन और झूठी चमक दमक से प्रवाभित कर ऐसी किसी मृगतृष्णा का शिकार कर रहे हैं जिस का परिणाम भागते दौड़ते प्यासे मर जाना है । उनका कहना है गंदा है पर धंधा है और धंधे का कोई धर्म नहीं होता , अर्थात पैसा मिलता है तो कुछ भी कर सकते हैं । राजनीति और वैश्यावृति दो पेशे हमेशा समझे जाते थे जिन में समानताएं हैं सब बिकाऊ है शरीर से आत्मा ज़मीर से तकदीर तक बस कीमत दाम घटते बढ़ते रहते हैं समय समय की बात है अधिक विस्तार की ज़रूरत नहीं समझदार हैं लोग इतने से समझ जाएंगे ।  केबीसी वाले क्या सोचेंगे क्या फ़रमायेंगे या हमेशा की तरह दर्शकों को उलझाएंगे तालियां बजवा अपनी तिजोरी भरवाएंगे ।  सोचना होगा मिल बैठे हैं दो और अभिनेता भी चले थे किस मकसद को लेकर पहुंच गए हैं जिस में मकसद की कोई बात नहीं होती , नायक का किरादर निभाते निभाते ख़लनायक को और ऊंचाई पर लेकर खड़ा करते हैं । 
 
हर बार स्लोगन बदलते हैं जैसे पुरानी चीज़ पर नया चमकदार लेबल लगाया जाता है मगर भीतर कुछ भी नहीं होता वही खोखलापन जो शोर मचाता है । कॉकरोच शब्द से भी समझ आया होगा आपको भी समाज सरकार दुनिया की तरह किसी की ज़ुबान से निकला एक शब्द कितना बड़ा तूफ़ान कोई बवंडर खड़ा कर सकता है ।  आपकी मशहूरी भी जाने कब पर्वत की ऊंचाई से नीचे धरती पर ला खड़ा करे आपको भी सोचना पड़ेगा , जब विश्व भर में कितना प्रयास प्रचार प्रसार कितना पैसा खर्च कर अर्जित शोहरत इक झटके में किसी को ज़मीन पर ला पटकती है तब आपकी क्या हैसियत है आखिर तो पर्दे पर काल्पनिक किरादर ही हैं कोई असली जीवन में आदर्श और मूल्यों पर चलने वाले असली नायक नहीं हैं जैसे नेहरू गांधी सुभाष या फिर जिनका जन्म दिन वही है जो आपका है लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी ।  कोई पद नहीं चाहा स्वीकार किया कुछ धन दौलत नहीं जमा की आपकी तरह से फिर भी इतिहास में उनके सामने आप क्या बड़े से बड़े राजनेता बेहद बौने लगते हैं । केबीसी खेल है मनोरंजन है या फिर जुआ है बदले ढके छुपे ढंग से जिस का नशा हर रोज़ कितने लोगों को बर्बाद करता है ये सबक सिखला कर कि महनत काबलियत से बढ़कर तकदीर का दांव खेलना आसान रास्ता है ।  इस बार इस बात को भी सोचना क्या देश समाज को आपने दिया है अपने फ़िल्मी किरादरों से लेकर विज्ञापनों तक से सिर्फ पैसा कमाना कोई महान कार्य नहीं होता है । इक खबर से लोग हैरान नहीं हुए जब पता चला कि किसी की तांबे की बनाई गई मूर्ति बरसात में धुलने से भीतर सीमेंट की निकली बल्कि उसके भी अंदर मुमकिन है कुछ खोखलापन ही मिले या कुछ मलबा जैसा सामान भरा हो । बड़े बड़े किरदार बाहर से सोने जैसे चमकते होते हैं अंदर कितना कुछ सड़ांध सा छुपा रहता है । 
 
शायद अभी भी हम सभी को भी सोचना चाहिए हमको कैसा देश कैसा समाज बनाना है । क्या सिर्फ आधुनिक सुख सुविधाएं साधन संसाधन महत्वपूर्ण हैं या उनसे बड़ी बात होती है सच्चाई ईमानदारी और समाजिक एकता समानता न कि येन केन प्रकरण कुछ भी हासिल करना ।  हमारा चरित्र क्या है कथनी अलग होती है करनी विपरीत होती है अपने चेहरे पर कितने मुखौटे लगाए हुए हैं सोचना ही पड़ेगा ।  मगर इस बार सोचने की आवश्यकता का असली कारण और है ए आई अर्थात नकली होशियारी  (   artificial intelligence ) को केबीसी में शामिल करना । भाग लेने वालों को सलाह दी जा रही है Google gemini से सीखें , आपको उलझन नहीं हो इसलिए बताना है कि नकली होशियारी इक ऐसा पागलपन है जिसने दुनिया को अपनी उंगलियों पर नचाना सिखा दिया है । सरकार से लेकर सॉफ्टवेयर उद्योग तक इसके मोहजाल में उलझे हुए हैं । आपने राजा नंगा है कहानी पढ़ी सुनी होगी , उस में राजा को सबसे खूबसूरत लिबास पहनने की चाहत होती है । शायद सभी को देख कर शहंशाह को भी ऐसा पहनावा आज़माने की धुन सवार हुई हो , उस कहानी की तरह ए आई का भी कोई वास्तविक अस्तित्व है नहीं केवल इक भ्रमजाल है ।  इसलिए शो आयोजक को सावधानी बरतनी होगी कि दर्शकों में कोई मासूम बच्चा कहीं राज़ नहीं खोल दे कि किसी ने कुछ भी नहीं पहना है पोशाक दिखाई नहीं दे रही है ।  आपने सोचने में बहुत देरी की है शायद अभी भी सब आपको समझ नहीं आएगा , और कितनी उम्र समझने में लगेगी उनको जो दुनिया को क्या क्या समझाने का कार्य करते रहे , दीपक तले अंधेरा जैसा हाल है । बाद में पछताने से क्या होगा जब चिड़िया चुग गई खेत की कहावत है । आपको पहले ही सोचना चाहिए था जनाब ।    
 
 KBC 18: Aamir Khan, Preity Zinta and Sunny Deol join Amitabh Bachchan for a star-studded premiere | - The Times of India
 


 

अगस्त 07, 2026

POST : 2103 आदमी को आदमी नहीं रहने दिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  आदमी को आदमी नहीं रहने दिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

शिक्षित होना क्या ऐसा होता है हमारी देश की शिक्षा आदमी को अच्छा इंसान नहीं बनाती है ।आपको जितने भी पढ़े लिखे लोग दिखाई देंगे सभी हद से बढ़कर स्वार्थी अहंकारी और विवेकहीन लकीर के फ़क़ीर मिलेंगे । उनको पद प्रतिष्ठा पाकर भी संतोष नहीं मिलता है बल्कि उनको इक नया पागलपन शुरू होता है जितना मुमकिन हो अधिक से अधिक खुद की खातिर समेटने का । उनकी मानवीय संवेदना कुछ बनते ही ख़त्म हो जाती है और वो सभी औरों को बांटना नहीं चाहते अपना कर्तव्य पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से निभाना उनको कभी पढ़ाया सिखाया ही नहीं गया । शिक्षित होकर सरकारी नौकरी या अपने कारोबार में जगह मिलते ही उनको फ़र्ज़ निभाना देश समाज की सेवा कर समाज का कल्याण करना महत्वपूर्ण नहीं लगता है सही मार्ग पर चलकर नैतिकता और न्यायपूर्वक दायित्व निभाने की राह छोड़ , अन्य लोग जो वंचित हैं उनको उनके अधिकार और न्याय देने की बजाय वो सभी उनकी विवशता का फ़ायदा उठाकर ख़ुद को विशेष मानने लगते हैं । धन दौलत की बढ़ती हवस उनको इंसान से शैतान बना देती है और अपनी मर्ज़ी से नियम कानून को परिभाषित कर साधारण व्यक्ति को कुछ राहत देने की जगह नित नई परेशानियां देने लगते हैं । शासकीय अधिकार मिलते ही उनको देशवासी समान नज़र नहीं आते हैं । कुछ की खातिर नियम कानून लचीले बना देते हैं और उनके लिए सब आसान बनता जाता है जिनसे उनको बदले में कुछ पाना होता है जबकि तमाम बाकी सामान्य वर्ग उनको अपना रुतबा दिखलाने को सख़्त ही नहीं निरंकुश बन जाते हैं । उनकी छोटी छोटी समस्या का समाधान उनको करना अनावश्यक लगता है और उनको अकारण इधर उधर भटकाने को कितने बहाने तलाश करते हैं । धीरे धीरे देश के प्रशासन का अधिकांश वर्ग निर्दयी और अमानवीय आचरण करने लगा है और बिना रिश्वत या कोई सिफ़ारिश उचित कार्य करना ही नहीं चाहते हैं । अपनी अंतरात्मा अपने विवेक को ताक पर रख कर सरकारी बड़े से बड़े अधिकारी से लेकर निचले स्तर के कर्मचारी तक भ्र्ष्ट और कामचोर हो गए हैं ।  
 
कहते हैं कि जिस से आपको रोटी रोज़ी मिलती है आपको उस मालिक के प्रति ईमानदार होना चाहिए अन्यथा आप इंसान नहीं हैं लेकिन ये शिक्षित लोग जिनसे वेतन सुविधाएं पाते हैं उसी जनता के लिए ईमानदार नहीं होते न ही ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होते हैं । भगवान ने आपको अवसर दिया है आप जनता समाज देश की विषमताओं को विसंगतियों को मिटाकर शानदार बना सकते हैं लेकिन उन्होंने राजनेताओं और धनवान लोगों से अवैध संबंध बनाकर उल्टा कार्य किया है और लोगों को सरकारी कायदे कानून के जाल में फंसाकर अपना हित साधने का कार्य किया है । सामन्य आदमी को नियम कानून बताने वाले खुद कभी किसी नियम की परवाह नहीं करते हैं । हर बड़े अधिकारी के पास उचित वेतन सुविधाओं से हासिल धन दौलत से कई गुना अधिक पैसा जनता और सरकारी संसाधनों की लूट से एकत्र मिलता है । शायद ही पांच दस प्रतिशत लोग सही ढंग से अपनी आमदनी से जीवन व्यतीत करते हैं । जैसे कैसे उन सभी में इक अहंकार पैदा हो जाता है जो अपने और सरकारी विभाग से लेकर धनवान लोगों राजनेताओं के काले कारनामों और अनुचित आचरण को सही साबित करने को तर्क घड़ता है और जिनको न्याय इंसाफ चाहिए उनको प्रताड़ित करता है । 
 
हमने कैसी शिक्षा कैसी पढ़ाई की है जिस ने हम सभी को आदमी से शैतान बना दिया है क्या कभी चिंतन नहीं करते हैं कि हमारा मकसद क्या था और हम भटक कर क्या बन गए हैं । शायद पैसे ने हमको भगवान से भी डरने की आवश्यकता नहीं का सबक सिखाया हैं तभी सभी शासक वर्ग से लेकर धर्म उपदेशक से डॉक्टर शिक्षक तक धन दौलत के पुजारी बन गए हैं । विडंबना देखिए कि हम इस सब के बावजूद भी भारतीय पुरातन मूल्यों संस्कृति की बातें करते हैं अर्थात हम खुद अपने आप को धोखा देते हैं और समझते हैं किसी को कुछ खबर नहीं हम बड़े लोग कितने छोटे होते हैं , वास्तव में हमने अपने को इतना नीचे गहराई में डुबो दिया है कि भ्र्ष्टाचार और खुदगर्ज़ी के दलदल से उबरना असंभव लगता है या शायद हम खुश हैं अपने नैतिक पतन पर चंद सिक्कों में अपना ज़मीर बेच देते हैं । आखिर में इक कविता पेश है ।   
 
 

बड़े लोग ( नज़्म ) 

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं
कहते हैं कुछ
समझ आता है और

आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।

इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे

किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।

दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे

ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं । 
 
 अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने  इश्तिहार आप बच कर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े

अगस्त 06, 2026

POST : 2102 इतिहास मिटाना कथाएं बनाना ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       इतिहास मिटाना कथाएं बनाना  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया  

इतिहास का विषय सभी को समझ नहीं आता है कुछ लोग मानते हैं वर्तमान में पुरातन इतिहास को याद रखना खुद ही मुसीबत को बुलाना है । उन्होंने पुरातन इतिहास को कभी हक़ीक़त माना ही नहीं उनके लिए कपोल काल्पनिक कथाएं कहानियां भले झूठी साबित हों लगती शानदार हैं । आधुनिक कालीन वास्तविक समाज की कड़वी सच्चाई उनको देखना पसंद नहीं है उस से नज़रें चुराते हैं ऐसे में उनकी समस्या और गंभीर बन जाती है दुनिया को क्या दिखाया जाए । सबसे पहले इक ऊंची दीवार खड़ी की जाती है जिस के पीछे पुरातन इतिहास दिखाई ही नहीं दे मगर कोशिश कर के भी उस पुराने इतिहास की निशानियों को मिटाने में सफल नहीं होने पर उस पर कालिख़ पोतने की बात करते हैं । सिर्फ इक इसी मकसद पर ध्यान रखने से कुछ  नया आधुनिक युग का इतिहास रचने को कुछ भी किया ही नहीं जाता है । सृजन करना नहीं जानते , जानते हैं केवल निर्मित को ढहाना या फिर उनको अपना बनाया घोषित करने का कार्य करना । किताबों से मिटाने से कभी इतिहास की निशानियां मिट सकती हैं न ही उनके पिछले कर्मों पर पर्दा डाला जा सकता है । इतिहास से घबराते हैं मगर खुद उन्हीं का इतिहास उनके सामने खड़ा हो जाता है अपने अतीत से शर्मसार नहीं जो उनका भविष्य सुधरता नहीं है । लेकिन उनको अपनी ज़िद छोड़नी नहीं है उन बातों पर गर्व करते हैं जो गौरवशाली कहला नहीं सकती हैं । 
 
देश की समस्याओं को जानना समझना उनको ऐसे व्यर्थ कार्यों पर चिंता करना फ़ज़ूल लगता है । भूख बेरोज़गारी शिक्षा स्वास्थ्य उनकी प्राथमिकता नहीं है उनकी चिंता अपनी विचारधारा को जैसे भी मुमकिन हो थोपना है कोई आदर्श कोई नैतिकता कोई संविधान उनके रास्ते में अड़चन नहीं बन सकता है । जनता की खुशहाली उनकी चाहत नहीं हैं उनको केवल खुद अपने लिए नाम शोहरत से लेकर शानदार रहन सहन मौज मस्ती चाहिए जनता की आहें उसकी वेदना से उनको कोई मतलब नहीं है । जनता होना उसका भाग्य है कमनसीबी है शासक होना खुशनसीबी है शासक बनकर भी जो गरीबी को लेकर विचलित हो उस से नासमझ कौन होगा । चुनाव जीतना लाज़मी है मगर उस के लिए देश जनता की भलाई की बात पर चिंतन करना ज़रूरी नहीं है । चुनाव जीतने को साम दाम दंड भेद सभी आज़मा कर भी बात नहीं बने तो हर सीमा को लांघना जानते हैं खुद को नियम कानून क्या देश भगवान से भी बड़ा मानते हैं । जनता को हर तरफ उजियारा दिखाई दे इतनी चमक दमक उनको दिखलाना आता है । चलाचौंध रौशनी में जो देखने लायक नहीं है अन्याय अत्याचार ज़ुल्म दहशत सभी छुपाया जाता है बस इक यही करिश्मा उनको खूब आता है , सच आलोचना उनको कब भाता है अपना गुणगान चाटुकारिता उनको सातवें आसमान पर बिठाता है । ऊंची ऊंची उड़ान भरना उनके मन को लुभाता है कौन किस लिए अपने घर बुलाता है उनको घर लुटवा कर भी बड़ा मज़ा आता है उनका अपना अलग इक बही खाता है जिस में उनका पलड़ा हमेशा झुकता जाता है । मीडिया उनका खरीदा हुआ गुलाम है उनके सुर में सुर मिलाता है हर समय गंदर्भ राग सुनाकर सत्ता का मन बहलाता है । 
 
सरकार ने लिखने वाले को घर नहीं दफ़्तर नहीं किसी और एकांत जगह बुलवाया है जिस जगह इक दरबार गया सजाया है सभी को नचवाया है समूहगान गाया है सब सिर्फ सत्ता की माया है । हर पंछी को दाना खिलाया है सोने का पिंजरा हर किसी को बहुत भाया है । लिखने वाले को गया समझाया है हमने झूठ को सच से बड़ा बनवाया है खाली हाथ लोग आते हैं झोलियां भर भर लौट जाते हैं रात दिन उनकी महिमा सुनते सुनाते हैं भवसागर से पार उतर जाते हैं । लिखने वाले ने सवाल किया है क्या आपका इतिहास स्वर्णिम है जिस को लिखवाना है आपके दरबार में सभी लोग अंधे हैं और अंधों में काना है जो वही राजा है । हंसी हर तरफ गूंजने लगी है आपको कोई इतिहास नहीं लिखना है कोई चिल्लाया है आपको कथा लिखनी है भजन लिखना है सभी को सुनाना है आधी हक़ीक़त है आधा अफ़साना है । कथा में जिसको पूज्य बनाते हैं उसकी नाकामियों गलतियों को भी सुंदर तरीके से लिखते हैं समझाते हैं । उसके अवगुण भी सही साबित किये जाते हैं कितने कारण बताकर उसकी ख़राबी को कमाल किया कहते हैं आसमान पर भगवान इंसान धरती पर रहते हैं । सत्ता का उनका आसमान ऊंचा है हर किरदार जिस से छोटा बौना है बहुत नीचा है ईश्वर बनाना होता है जिसे उसकी कथनी करनी पर आचरण पर शंका सवाल नहीं किया जाता है बिना ऐसा समझे किसी को मालामाल नहीं किया जाता है ।  पुरानी कथाओं से किरदार चुनकर नई आधुनिक युग की कलयुगी रामायण लिखवाई जाएगी , सीता जनता है आखिर किसी धरती में समाएगी , चैन से कभी नहीं जी पाएगी ।
 
( जैसा कि पुरातन काल से रीति परंपरा चलती आई है कथा के अंत में कथासार एवं कथा का फल अवश्य बताया जाता है ताकि सुनने वाला सबक ग्रहण कर भविष्य में अमल कर सके । इस तथाकथित एतिहासिक कथा का नतीजा वही निकलेगा जो निकलना चाहिए । बुराई जीत कर भी पराजित ही होनी लाज़मी है और जितने लोग स्वर्थी कायर बनकर समाज और देश से छल कपट करते रहे उनको देश समाज विरोधी ही जाना जाएगा , हर कोई आखिर ख़ाली हाथ जाएगा हां साथ अपने बुरे कर्मों का हिसाब ले जाएगा । पापी भ्र्ष्टाचारी शासन प्रशासन अनंत काल तक विनाश का कारण समझा और घोषित किया जाएगा ।  उनका सारा झूठा प्रचार व्यर्थ जाएगा हर मुजरिम गुनहगार कहलाएगा । )  
 
 

 


    

अगस्त 05, 2026

POST : 2101 इस देश को तुमने बहुत बर्बाद किया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 इस देश को तुमने बहुत बर्बाद किया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

इस देश को तुमने बहुत बर्बाद किया है 
हैं कौन जिनको आपने आबाद किया है । 
 
समझा तुम्हें था दोस्त तुम दुश्मन हो सभी के 
इंसाफ कैसा आपने ईजाद किया है । 
 
जो बात सबको याद  है तुम भूल गए हो 
तुमको पता है क्या कहां इरशाद किया है । 
 
बन कर सभी का चारागर  बस ज़हर पिलाया 
हर रोज़ ऐसा आपने उन्माद किया है । 
 
अर्थी शहीदों की पे कितने फूल चढ़ाए 
होता यही हर बार कुछ अपवाद किया है । 
 
ताउम्र सबको आपने जो अश्क़ दिए हैं 
उसका असर है जो तुम्हें नाशाद किया है । 
 
की क्या ख़ता कोई कभी ' तनहा ' ने बताओ 
कुछ तो कहो उसने कभी प्रमाद किया है ।  
 

 
 


 
 


 

अगस्त 03, 2026

POST : 2100 कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

      कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

कहीं कुछ भी नज़र आता नहीं
ये आलम अब सहा जाता नहीं । 
 
हुई सब कोशिशें , नाकाम हैं 
मगर मुश्किल से घबराता नहीं । 
 
जो आये मौत मर हम जाएंगे 
उठा कर ज़हर ख़ुद खाता नहीं । 
 
गिला हमसे सदा सब को रहा 
उन्हें जो चाहिए लाता नहीं । 
 
था जितना पास सबको बांट कर
कहा ख़ुद को , कभी दाता नहीं । 
 
अभी भी , क़र्ज़ , कितना और है
कभी बदले में , कुछ पाता नहीं । 
 
जहां ' तनहा ' बहुत दिलकश मगर 
करें क्या , हमको जो भाता नहीं । 
 

 


   
 
 
 

अगस्त 02, 2026

POST : 2099 अभी तलक दोस्त ढूंढता हूं ( मेरी चाहत ) डॉ लोक सेतिया

   अभी तलक दोस्त ढूंढता हूं ( मेरी चाहत ) डॉ लोक सेतिया  

जैसा कि मैंने हमेशा ही बताया है मैंने लिखना शुरू ही दोस्त की तलाश में किया था , मेरी ज़िंदगी दोस्ती के नाम है और जितना भी लिखा पिछले पचास वर्ष में उस इक गुमनाम अनजान दोस्त को समर्पित है जो मेरा यकीन है मौत से पहले किसी दिन मिलेगा अवश्य मुझे ।  उस दोस्ती उस अपनेपन की मेरी प्यास का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता है दुनिया के अथाह सागर से बस इक बूंद काफ़ी है जो सिर्फ मुझे हासिल हो मेरी प्यास बुझा सकती हो । आपको काल्पनिक असंभव बात लगती होगी क्योंकि आपने दोस्ती का अर्थ गहराई से समझा ही नहीं होगा । इक छोटी सी कहानी पढ़ी थी कि कोई निकला एक दोस्त और उस भगवान की तलाश में तो रास्ते में उसको दोस्त मिल गया , उसके बाद उसको भगवान की आवश्यकता ही नहीं रही । मिला है कभी आपको कोई ऐसा दोस्त जो भगवान से बढ़कर हो , भगवान की भी कितनी शर्तें होती हैं मनाने अपना बनाने की मगर दोस्ती में कोई शर्त नहीं कोई अनुबंध नहीं कोई हिसाब किताब नहीं । दोस्त से कभी कुछ मांगना ही नहीं पड़ता है दोस्ती में आनंद मिलता है देकर अपना सभी कुछ बगैर किसी चाहत के पाने की कुछ भी बदले में । आपने जितनी बातें पढ़ी सुनी होंगी सुदामा कृष्ण जैसी उन में कुछ देना कुछ पाना हुआ होगा जो समानता का अनुभव नहीं करवाता है जबकि सच्ची दोस्ती में बराबर होते हैं जिसका जितना भी है दोस्त का खुद का अपना ही है मांगने की आवश्यकता कभी नहीं पड़ती है । कभी किसी दोस्त के घर पर दीवार पर टंगी हुई थी इक शीशे में जड़ी हुई उद्धरण की बात , दोस्त के घर को जाती सड़क कभी लंबी नहीं होती है , चले आओ । 
 
ऐसा बिल्कुल नहीं कि मैंने दोस्त बनाये नहीं या मैंने कभी दोस्ती नहीं की , बचपन के स्कूल से कॉलेज और उसके बाद तमाम शहरों गांवों में मुझे कितने ही लोग मिलते रहे दोस्त बनाये मैंने । मैंने तो अनगिनत ऐसे भी लोग दोस्त बनाये हमेशा जिन से कभी मिलना हुआ ही नहीं कोई मिलने का बिछुड़ने का अवसर तक नहीं था । ऐसे कितने दोस्त हैं अभी भी और रहेंगे जीवन भर की बात नहीं है मैंने अपने दोस्तों के दुनिया से अलविदा कहने के बाद भी उनकी जगह रखी है दिल दिमाग़ दोनों जगह ही । सभी कुछ न कुछ अलग अपना ख़ास संकल्प बनाते रहते हैं , मेरी चाहत है कहीं किसी जगह ऐसा एक घर बनाया जाये जिस में रहने वाले सिर्फ दोस्ती की हसरत रखते हों । कोई जाति धर्म अमीर गरीब कोई भेदभाव नहीं केवल पावन प्रेम दोस्ती का रत्ती भर भी छल कपट दिखावा नहीं । अपनी ऐसी दुनिया बसाना जिस में कोई भी पराया नहीं हो ।  
 
हर किसी ने समझाया कि ऐसी कोई दुनिया कहीं भी नहीं है कोई भी बिना मतलब रिश्ते नाते नहीं निभाता है आप इक मृगतृष्णा की बात करते हैं ।  लेकिन मैंने कभी ऐसी बातों से निराश होकर अपना संकल्प छोड़ा नहीं है , भरोसा है कोई मुझ जैसा मेरी ही तलाश में रहता है हमेशा । आखिर में इक कविता इक नज़्म से विषय को विराम देते हैं , अंत कभी नहीं होता इस चर्चा का जीवन में। 
 
 

       वो जहां ( कविता ) 

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का ।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार ।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार ।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम । 
 

 

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( नज़्म ) 

ये सबने कहा अपना नहीं कोई
फिर भी कुछ दोस्त बनाए हमने ।

फूल उनको समझ कर चले कांटों पर
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाए हमने ।

यूं तो नग्में थे मुहब्बत के भी
ग़म के नग्मात ही गाए हमने ।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर
जिनसे दुःख दर्द छिपाए  हमने ।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार
खुद ही भेजे ख़त पाए  हमने ।

उसने ही रोज़ लगाई ठोकर 
जिस जिस के नाज़ उठाए हमने । 

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा"
मेले कई बार लगाए  हमने । 
 
 
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