देश की संसद में सांसदों से खतरा ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
शायर बशीर बद्र जी कहते हैं , बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना । मुझे हमेशा बड़े लोगों से बचकर रहना ज़रूरी लगता है , नेताओं की सभाओं में जाना सामान्य नागरिक के लिए परेशानी का सबब बन जाता है । कितनी बार वीवीआईपी लोगों का सड़क पर ख़तरनाक़ रफ़तार से निकलता वाहनों का काफ़िला हमको भयभीत करता है क्योंकि उनकी गाड़ियां अपनी साइड को छोड़ गलत साइड भी दौड़ती हैं जब सड़क पर कोई डिवाईडर नहीं होता है । अधिकारी राजनेता ही नहीं अन्य कुछ लोग भी सार्वजनिक सड़क पार्क पर कोई भी आयोजन कर किसी एम्बुलेंस की रह में बाधा पैदा कर रोगी की ज़िंदगी पर संकट पैदा करते हैं । आजकल शासक रोज़ाना सभाएं आयोजित कर अपना रुतबा ऊंचा करने को व्याकुल रहते हैं , उनको जनता की बात सुननी पसंद नहीं होती केवल जय जयकार सुनना चाहते हैं । सुरक्षा कर्मी उनकी सुरक्षा से बढ़कर इस बात को लेकर सजग होते हैं कि गलती से कोई विरोध की आवाज़ नहीं सुनाई दे । अधिकांश सभाओं में काले रंग की पोशाक से लेकर कोई कपड़ा तक लोग लेकर नहीं आएं ये देखना होता है । जनता को ये सभी कोई सुरक्षा का एहसास नहीं करवाते बल्कि भय का वातावरण पैदा करते हैं । शासकों को जनता से कोई खतरा नहीं है मगर अब उनको अपने ही साथ रहने वाले सहकर्मियों से डर लगता है ऐसा कुछ घटनाओं से मालूम हुआ है बात ख़ुदकुशी करने तक पहुंच गई है लेकिन विषय को अधिक तूल नहीं दिया गया क्योंकि ऐसा करने से जाने क्या क्या सामने आने का अंदेशा था । अब मामला संसद में सांसदों से सरकार तक की सुरक्षा पर पहुंच गया है जो अप्रत्याशित है ।
ये साधारण बात कदापि नहीं है ये बेहद गंभीर चिंता की बात है किसी टीवी चैनल या सोशल मीडिया पर किसी की कही बात नहीं बल्कि लोकसभा के अध्यक्ष की कही बात है । लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जी ने बताया है कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को सदन में नहीं आने का अनुरोध किया था क्योंकि उनको किसी अप्रिय घटना के घटने का अंदेशा था । संसद भवन पर आतंकवादी हमले से सांसदों को बचाने को सुरक्षा कर्मी अपनी जान पर खेलकर सफल रहे थे 13 दिसंबर 2001 को , लेकिन आज समझाया जा रहा है कि देश के प्रधानमंत्री और सदन के नेता को संसद में सांसदों से ही खतरा महसूस होने लगा है लोकसभा अध्यक्ष को ही । सबसे पहला प्रश्न तो यही है कि क्यों कैसे ऐसे सांसद निर्वाचित होकर लोकतंत्र का मंदिर कहलाने वाले संसद भवन में पहुंच गए हैं जिन से असभ्य अशिष्ट और अशोभनीय व्यवहार की आशंका हो सकती है । लेकिन उस से भी बढ़कर संसदीय मर्यादा को लेकर चिंतन की आवश्यकता है , संसद में सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष क्या शालीनता पूर्वक विचार विमर्श नहीं कर सकते हैं । दोष किसी एक पक्ष का नहीं है लगता है सभी ने मर्यादा की सीमाओं को लांघने में कोई संकोच नहीं किया है । खुद देश के प्रधानमंत्री ही राज्य सभा में उनसे पहले के सभी प्रधानमंत्रियों को लेकर आपत्तिजनक बातें कहते हैं और सत्तापक्ष के सभी सांसद समर्थन करते हैं । ऐसा अहंकार कभी पहले नहीं दिखाई दिया है बल्कि जिनको लेकर प्रधानमंत्री जी हमेशा आलोचना करते हुए मर्यादा की सीमा भूल जाते हैं उन्होंने अपने समय में विपक्ष को महत्व देने और आदरपूर्वक उनकी बात को सुनने का प्रयास किया था संसद में ।
आज प्रधानमंत्री कहते हैं कि पहले के सभी प्रधानमंत्री देश को लेकर संजीदा नहीं थे उनकी कोई सोच नहीं थी समाज को लेकर कोई दृष्टि नहीं थी । जबकि उनको मालूम होना चाहिए कि लोकतंत्र की आधारशिला मज़बूत बनाने में उनकी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही है । उनकी समझ उनकी मनोकामनाओं को कम आंकना किसी अपराध जैसा है तमाम नेताओं ने देश को शानदार भविष्य देने की कोशिशें की हैं । केवल सत्ता पाने की भूख तब नहीं दिखाई देती थी और न किसी को छोटा बनाकर अपना कद बढ़ाना किसी ने ऐसा किया था । नई शिक्षा आधुनिक समय के साथ कदम मिलाकर चलना जानते थे तभी गरीबी के समय भी परमाणु विज्ञान और शिक्षा स्वास्थ्य से लेकर देश में आपसी भाईचारा कायम रखने में उन सभी ने पूरी निष्ठा और देश समाज के प्रति ईमानदारी से कर्तव्य निभाया है । यहां तक की देश की आज़ादी की लड़ाई में अपना जीवन और सर्वस्व अर्पित किया है । संविधान बनाने से संवैधानिक संस्थाओं का निर्माण करने तक उनकी भूमिका और योगदान भुलाया नहीं जा सकता है । इतना ही नहीं जो लोग स्वतंत्रता संग्राम में शामिल नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत की सहायता करते थे उनको भी आज़ाद देश में बराबर अवसर प्रदान कर किसी भी तरह से कोई भेदभाव नहीं करना लोकतांत्रिक परंपरा स्थापित करना मकसद रहा है । आज लगता है कि जैसे कोई व्यक्ति देश समाज संविधान कानून से ऊपर दिखाई देने लगा है जिस पर कोई सवाल कोई विरोध करना सत्ता को स्वीकार नहीं है । ये तो लोकतांत्रिक संवैधानिक और मौलिक अधिकारों का हनन कहला सकता है , कोई भी राजनेता आलोचना से परे नहीं हो सकता है । शायद सभी दलों में अपराधी प्रवृति के लोग सांसद या विधायक बनकर माननीय कहलाते हैं तभी संसद में आचरण का स्तर गिरता ही जा रहा है । देश की राजनीति में अब आपसी विश्वास सदभावना का नितांत आभाव दिखाई दे रहा है , मगर वास्तव में डर किसी और से कम शायद खुद अपने आप से भीतर से अधिक महसूस होता है । शायद ही कभी किसी को सामन्य जनता के ख़ास वर्ग द्वारा कुचले जाने की घटनाओं पर कभी चिंता हुई हो उन पर अंकुश लगाने की चर्चा हुई हो , ख़ास लोगों की जान की कीमत होती है साधारण जनता तो कीड़े मकोड़े कभी अनचाहे अवरोध की तरह मसले कुचले जाते हैं ।





