मई 26, 2022

जनसेवा का अजब कारोबार ( गंदा है पर धंधा है ) डॉ लोक सेतिया

 जनसेवा का अजब कारोबार ( गंदा है पर धंधा है ) डॉ लोक सेतिया 

सभी चाहते हैं इस गंगा में स्नान करना , स्थानीय निकाय के चुनाव घोषित होते ही गली गली सड़क पर इश्तिहार बैनर लगने लगे हैं। खुद को ईमानदार और मिलनसार ही नहीं सबकी सहायता को रात दिन तैयार रहने वाला बताकर अपनी सेवा का अवसर मांगते हैं। साल भर पहले से अपना गुणगान खुद पैसे खर्च कर करने लगते हैं। लाखों की बात नहीं करोड़ों तक चुनाव पर खर्च करना चाहते हैं जो उनको समाज की देश की छोड़ो अपने शहर गली बस्ती की परवाह होती तो इतना पैसा लगाकर कई आस पास की समस्याओं का समाधान कर सकते थे मगर कभी नहीं करते। किसी संस्था को थोड़ा पैसा देते हैं अगर तो पहले हिसाब लगाते हैं फ़ायदा क्या होगा नाम शोहरत के साथ चुनावी गणित साधते हैं। कुछ साल पहले इक दोस्त के बड़े भाई टिकट हासिल करने को बड़े नेता को बुलाकर सभा आयोजित कर रहे थे। मुझसे मिलने आये निमंत्रण देने तो उनके छोटे भाई की आर्थिक दशा और स्वास्थ्य की हालत को लेकर चर्चा हुई। मैंने कहा आप इस पर लाखों खर्च करते हैं क्या भाई की सहायता नहीं कर सकते बल्कि उन्होंने बताया था भाई बहन और अन्य रिश्तेदार खराब हालत को देख मिलते तक नहीं शायद डरते हैं कुछ उधार नहीं मांग ले। जबकि उन्होंने नहीं मांगी आर्थिक सहायता किसी से कभी। जवाब मिला छोटे भाई की सहायता कर सकता हूं क्या आप मेरा पैसा सूद समेत लौटाने की ज़िम्मेदारी लेते हैं। मैंने कहा आपके भाई ने नहीं कहा मुझसे कोई क़र्ज़ दिलाने को ये तो मैंने आपसी परिवारिक संबंध को देख कर सलाह दी थी , लेकिन जिस चुनाव की टिकट की दावेदारी कर रहे हैं किसी ने उस टिकट की गारंटी दी है और टिकट मिल गई तो भी जीतने की कोई गारंटी देता है। क्या आप इक जुआ नहीं खेल रहे हैं इस राजनीति के कारोबार में किसी का कोई भरोसा नहीं है। आपसे जितना चंदा मांग रहे हैं दल वाले कोई उस से अधिक दे दे तो टिकट उसको मिल जाएगी। 
 
आज की बात पर आते हैं जितने भी लोग चुनाव लड़ना चाहते हैं किसी राजनीतिक दल में शामिल होकर खुद को बिना विचारधारा की बात सोचे बंधक रखने को तैयार हैं। जब जिस को भी जीत कर कुर्सी मिली तब उसकी निष्ठा उसकी वफ़ादारी जनता के लिए नहीं उस दल के और नेताओं के लिए होगी। समाज सेवा जनता की भलाई की बात पीछे छूट जाएगी और बंदरबांट का खेल शुरू हो जाएगा। कुर्सी पर बैठ कर हर काम में मुनाफ़े में हिस्सा लेंगे कर्मचारी अधिकारी ठेकेदार मिलकर। कितनी संस्थाएं सामाजिक बदलाव से लेकर सफाई पर्यावरण नशा का कारोबार बंद करवाने की आड़ में खूब पैसा बना रहे हैं। संस्थाओं एनजीओ के नाम पर शान से गुलछर्रे उड़ाते हैं। यहां धर्मराज कहलाने वाले सत्ता पाने से पहले खुद अपना ईमान बेचते हैं और बहुत ऐसे लोग अपनी जाति बिरादरी को बंधक या गिरवी रखने की कोशिश करते हैं। अभी सबको फेसबुक व्हाट्सएप्प पर संदेश भेजते हैं मगर किसी से पहचान नहीं है फोन पर बात नहीं करते संदेश का जवाब नहीं देते कोई पूछे कौन हैं क्या जानते हैं मुझे। पता चला आप सभी से संपर्क करने को ठेके पर आई टी सैल बना लिया है कभी आप को ज़रूरत हो तब आई टी सैल किस काम आएगा उसको जिस काम का अनुबंध मिला चुनाव तक रहेगा। 
 
दौलत शोहरत ताकत पाने की ललक ने कितने लोगों को स्वार्थ में अंधा कर पागल बना दिया है । कितने ऐसे लोग जीवन भर भटकते रहे मगर कभी इधर कभी उधर के बनकर भी खाली हाथ चले गए दुनिया से। जाना सबको ख़ाली हाथ है बस कुछ सार्थक वास्तविक समाजसेवा करने वालों का जीना सार्थक हो जाता हैं और मर कर भी उनकी सच्चाई ईमानदारी बाक़ी रहती है। लेकिन कई ऐसे होते हैं जिनको सत्ता पद मिल भी जाते हैं तब भी उनकी लूट की भ्र्ष्टाचार की दौलत और शानो-शौकत उनके किरदार को ऊंचा नहीं छोटा बना देती है उनकी असलियत सामने आती अवश्य है हर कोई जानता है उनके महल गरीबों की लाशों पर बने हैं उनकी अवैध संपत्ति काली कमाई कारनामे सभी समझते हैं। ऊपरवाला भी हिसाब लिखता है। 
 
 
ये सच जिनको उजागर करना चाहिए जब देखते हैं उनका भाईचारा नेताओं अधिकारियों और प्रशासनिक कर्मचारियों से है और उनके वीडियो किसी का विज्ञापन किसी अधिकारी की चाटुकारिता उसकी महिमा का बखान करने पर केंद्रित हैं तब निराशा होती है। अपना कर्तव्य ईमानदारी से निष्पक्षता से निभाना है तो देश जनता समाज की सच्चाई सामने लानी ही होगी।
भटक गए हैं तो अभी भी सही राह पर चल सकते हैं अन्यथा झूठ को सच साबित करना कोई महान कार्य नहीं है।

मई 24, 2022

ग़लत सवाल का जवाब है बस ख़ामोशी - डॉ लोक सेतिया

      क्या हो पूछते हैं , मैं कौन हूं , नहीं जानते लोग ( उलझन ) 

                           डॉ लोक सेतिया 

    दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें , तुम को न हो ख़्याल तो हम क्या जवाब दें । मीना कुमारी की फिल्म " बहू - बेगम " का ये गीत मैंने कॉलेज में रैगिंग के दिन सुनाया था शायद हमेशा से मेरे मन में ये बात रही है वर्ना कितने और गीत मुझे पसंद थे जिनको सुना सकता था । ज़माना बदलता रहा लेकिन दुनिया का तौर नहीं बदला कभी भी कितनी अजीब बात है हर कोई पूछता है क्या हैं आप कभी कोई समझना नहीं चाहता जानने की ज़रूरत नहीं समझता कि कौन क्या है । ग़ालिब को कहना पड़ा हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ़्तगू क्या है। दुनिया तेरे बाज़ार से अजनान हूं मैं नहीं कोई ख़रीदार न ही बिकने वाला बाज़ारी सामान हूं मैं। सवालों से परेशान नहीं हैरान हूं मैं , सब होशियार हैं इस ज़माने में , नासमझ और नादान हूं मैं। सियासत और अदावत की दुनिया में मुहब्बत की अहमियत कुछ भी नहीं है खोटे सिक्के चलते हैं खरे की पहचान नहीं है , चलन में नहीं शराफत ईमानदारी और सच्चाई आजकल। काश सवालात करने वालों को खुद अपने बारे में मालूम होता कि उनकी वास्तविकता क्या है। जो दिखाई देते हैं जो कहलाना चाहते हैं जो सोचते हैं हम हैं दरअसल हो नहीं सकते उनकी विडंबना है झूठी ज़िंदगी जीते हैं दो किरदार निभाते हैं समाज में कुछ और एवं वास्तविक जीवन में उस के विपरीत। ये महलों ये तख्तों ये ताज़ों की दुनिया ये इन्सां के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है। लोग खुद को नहीं समझते दुनिया को समझने की बात करते हैं मैंने खुद को समझने जानने की कोशिश की है किसी और को समझने समझाने की फ़ुर्सत नहीं है।  
 
गलत सवालात के उतर कैसे सही हो सकते हैं उन सवालों को छोड़ देना उचित है अन्यथा जवाब की जगह इक सवाल पर हज़ार सवाल खड़े हो जाएंगे। ख़ामोशी का अर्थ ये नहीं कि हमको मालूम नहीं उनके पूछने का मकसद क्या है खामोश रहते हैं कि किस किस को कितनी बार समझाएं असली मुद्दा क्या है। जब लोग बचना चाहते हैं सच से तब सच पर सवाल खड़े करते हैं। बज़ुर्ग कहते थे जहां सलीके से बात नहीं हो रही हो और लोग असभ्य भाषा और कुतर्क का उपयोग करने लगें उस महफ़िल में चुप रहना ही बेहतर है। जब लोग सिर्फ यही सोचते हैं कि क्या हैं आप जानना नहीं चाहते कौन हैं आप तब उनसे वार्तालाप से कुछ हासिल नहीं हो सकता है। 
 

 
 

      

 
 

मई 16, 2022

मज़ाक मज़ाक में देश बर्बाद किया ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सब बर्बाद हुआ किसलिए ( शहंशाह की मौज ) डॉ लोक सेतिया 

शहंशाह को मज़ाक पसंद है ख़ास कर जिनको पसंद नहीं करते उनका उपहास करना किसी को ज़ख़्मी कर उस के घाव पर मरहम लगाने के नाम पर नमक छिड़कना उनको लगता है शासन करने का मज़ा इसी में है। उनके सभी झूठ देश की जनता के साथ गंदे मज़ाक ही होते हैं और कुछ भी नहीं सत्ता का नशा चढ़ता है तो मदहोशी की नहीं सुरूर की बात होती है। तोडना फोड़ना मनचाहे ढंग से मिटाना अहंकार गरूर की बात होती है। शासकों को सचिव से भरोसेमंद और कोई नहीं लगते हैं सचिव की हैसियत सचिवालय से बढ़कर होती है और हर सत्ताधारी का सचिव उसको भगवान से बढ़कर लगता है। शासन करते चुनाव जीतते बहुमत हासिल करते समय का पता ही नहीं चला तो इक दिन शहंशाह को सचिव ने अनुरोध किया उनकी जीवन कथा लिखनी ज़रूरी है। शहंशाह खुद नहीं लिख सकते सचिव जानते हैं सरकारी बाबू भी ये काम नहीं कर सकते जिन कलम वालों को शहंशाह ने खरीदा हुआ है उनकी लिखी जीवनी पर दुनिया यकीन ही नहीं करेगी। काफी सोच विचार कर इक निर्भीक साहित्यकार का चयन किया गया खोजबीन कर मिल ही गया कोई। शर्त थी लिखने वाले की यही कि जनाब को अपनी जीवन कथा लिखवानी है तो लिखने वाले को सच सच बताना होगा और उसकी किसी बात से खफ़ा बिल्कुल नहीं होना बल्कि सही आलोचना करने पार ठीक उसी तरह तालियां बजानी होंगीं जैसे लोग प्रशंसक उनके झूठ सुनकर बजाते रहे हैं । साहित्यकार ने बताया लोग आपको जैसा समझते हैं अगर आप साबित कर सकते हैं कि वैसे नहीं हैं और आपकी जीवनी का हर अध्याय दुनिया को अचरज में डाल कर चौंकाता हो तब कौतूहलवश सभी पढ़ना चाहेंगे अन्यथा किसी सरकारी लायब्रेरी की अलमारी में आत्मकथा दम तोड़ती रहती है। शहंशाह हमेशा सन्यासी होने की बात कहते रहे हैं सोचा अपने तमाम झूठों पर पर्दा डालने को इस एक बात को सच साबित करना उचित होगा। जीवन कथा उसी अवसर पर छपवाना तय किया गया क्योंकि जब सब त्याग कर जा रहे हों तब खोना क्या पाना क्या। शहंशाह की बात उन्हीं के शब्दों में ध्यान पूर्वक पढ़िए।
 
मैंने रिश्ते नाते सब छोड़ दिए थे परिवार पत्नी भाई मां सबको त्याग कर दर दर भटकता रहा भीख मांग कर गुज़र बसर करता रहा। किस्मत से मुझे सिकंदर बना दिया नासमझ लोगों ने ख़राबहाल बंदे के ख़्वाब बर्बादी को ख़त्म कर खानाबादी लाने की बात पर भरोसा कर अपनी बदनसीबी को खुद बुला लिया। भटकते भटकते मुझे आभास हुआ था कि लोग भौतिकता के जाल में धन दौलत मोह माया में राम नाम जपना भूल गए हैं। आधुनिक शिक्षा ने उनको सही मार्ग से भटका दिया है तभी जिस को खुद अपनी मंज़िल की खबर नहीं उस से राह पूछने की मूर्खता करने लगे थे। राजनेताओं से जनता की भलाई की उम्मीद करना बिल्ली से दूध की रखवाली जैसा काम था। चौकीदार बनकर चोरी करना नेताओं की फ़ितरत होती है। मैंने बहुत कमाल के तौर तरीके से जो कुछ भी पहले शासक बनाते रहे उन सब संगठनों संस्थाओं को मर्यादाओं को एक एक कर छिन्न भिन्न कर दिया और इस ढंग से टुकड़े टुकड़े कर दिया जिस को कोई फिर जोड़ नहीं सकेगा। देश समाज बर्बाद हुआ तो लोग कब तक आबाद रहेंगे उनको भी तबाह होना ही होगा धीरे धीरे। लेकिन ऐसे में उनको अपनी बर्बादी पर जश्न मनाने की आदत बनानी पड़ेगी और समझना होगा जब शहंशाह और सिकंदर ख़ाली हाथ दुनिया से रुख़सत होते हैं तो उनको पैसा और साज़ो-सामान की चिंता छोड़ राम नाम जपने और खाली पेट भजन कीर्तन करने का महत्व समझना होगा। 
 
लिखने वाला समझ गया उपरवाले की माया है उस ने किसी को दुनिया बसाने को भेजा होगा शुरआत में     कभी अब जब लगा कि ये दुनिया किसी काम की नहीं तो बर्बाद करने को इक शहंशाह को भेज दिया।
वास्तव में जब तक लोग ऊपरवाले ईश्वर को अपना विधाता समझते रहे उसको भी दुनिया की फ़िक्र होती थी लेकिन जब लोग खुद भगवान बनने लगे अपना भगवान यहीं धरती पर किसी को बनाने लगे तब दुनिया का अच्छा रहना संभव नहीं था। असली भगवान से नकली भगवान की तुलना नहीं की जा सकती है। हुआ ऐसा कि लोगों ने नकली मुखौटे लगाकर भेस बदलने वाले बहरूपिए को असली समझ लिया और उस की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य किया। गांव गांव शहर शहर गली गली चेहरा बदल भगवान बनकर लोगों की भावनाओं से खेल बहरूपिए अपना पेट भरते थे उनको महनत करना नहीं आता था मुफ्त भीख मांगने की आदत होती थी। शहंशाह ने शुरुआत नकली शासक बनकर नकली लालकिला बना भाषण देने से ही की थी। 
 
काठ की हांडी बार बार चढ़ाने का जादू पहली बार देखा है दुनिया ने। अब भला इस से बढ़कर खराब हाल क्या होंगे कि लोग अपने क़ातिल को मसीहा समझते हैं उसकी चाटुकरिता करते करते वास्तिक भगवान को भुलाकर उसकी भक्ति करते हैं। लोग मनोरंजन और खेल तमाशों से इस हद तक बहलने लगे हैं कि उनको मालूम नहीं पड़ता कि कब कोई बहरूपिया रूप बदल कर उनको तमाशा दिखलाते दिखलाते तमाशाई से तमाशा बना गया है। उसकी तरह झोला उठाकर सन्यासी बनना सबके बस की बात नहीं है। लेकिन शहंशाह बने बहरूपिए की ज़िद है सबको लोभ मोह माया छोड़ सन्यासी बनाने की। जीवनी लेखक ने जैसा कहा शहंशाह की कथा ने सबको सकते में डाल दिया है जब जनाब जाने किधर चले गए हैं। पर लिखने वाला स्तब्ध है कि असलियत जानकर भी लोग नाराज़ नहीं है उस नकली भगवान बने बहरूपिए को उसके बनवाये मंदिरों में मूर्तियां लगाकर आरती पूजा करने लगे हैं। उसकी लीला वही जाने कहते हैं फिल्म वाले इक और नई फ़िल्म बनाने पर विचार कर रहे हैं। बदलता कुछ नहीं नाम चेहरे बदलते रहते हैं इसी को राजनीति और लोकतंत्र कहते हैं।  


मई 13, 2022

सब कुछ पास , फिर भी ख़ाली हाथ ( खरी - खरी ) डॉ लोक सेतिया

  सब कुछ पास , फिर भी ख़ाली हाथ ( खरी - खरी ) डॉ लोक सेतिया 

बहुत दिन से आजकल के दौर के हालात को देख परेशान था। 

शीर्षक लिखते ही डॉ बशीर बद्र जी की ग़ज़ल का इक शेर ज़हन में आ गया। 

" कई अमीरों की महरूमियां न पूछ कि बस , गरीब होने का एहसास अब नहीं होता। " 

                        चलो आपको पूरी ग़ज़ल ही सुनाते हैं। 

अदब की हद में हूं  , मैं बेअदब नहीं होता , 
तुम्हारा तज़्किरा अब रोज़ो-शब नहीं होता। 
 
कभी-कभी तो छलक पड़ती हैं यूं ही आंखें ,
उदास होने का कोई सबब नहीं होता। 
 
कई अमीरों की महरूमियां न पूछ कि बस ,      
गरीब होने का एहसास अब नहीं होता। 
 
मैं वाल्देन को ये बात कैसे समझाऊं ,               
मुहब्बतों में हसबो-नसब नहीं होता। 
 
वहां के लोग बड़े दिलफ़रेब होते हैं ,             
मेरा बहकना भी कोई अजब नहीं होता। 
 
मैं उस ज़मीन का दीदार करना चाहता हूं ,    
जहां कभी भी खुदा का ग़ज़ब नहीं होता। 
 
जिस बात को लिखने को कितनी किताबें कम पड़तीं शायर ने इक ग़ज़ल में सब कह दिया। शायरी समझना सबको नहीं आता है जहां आह भरनी होती है लोग वाह वाह कहते हैं और जब अश्क़ बहने चाहिएं सुनने वाले जोश से भर कर तालियां बजाते हैं। कभी कभी ग़ज़ल की मुहावरेदार शैली से बात नहीं बनती तब खरी - खरी बात कहने को व्यंग्य की भाषा उपयोग करनी पड़ती है। लोग आलीशान घरों में रहते हैं धन दौलत नाम शोहरत ऐशो-आराम सब हासिल है मगर दिल भिखारी का भिखारी है। हाथ फैलाते रहते हैं मांगने को किसी को देते नहीं कभी कुछ भी यही बदनसीबी है बड़े बड़े उद्योगपतियों कारोबारी घरानों शहंशाहों शासकों धनवान लोगों की। हसरतें अधूरी हैं दुनिया भर की ज़मीन चाहते हैं अफ़सोस आखिर दो गज़ ज़मीन भी मिलना आसान नहीं होता है। 
 
पढ़ लिख कर भी इंसानियत शराफ़त ईमानदारी विनम्रता नहीं सीखी और अहंकार करते हैं अपने बड़े ज्ञानी होने पर। अज्ञानता और छोटापन है किरदार ऊंचाई को नहीं छूता रसातल की तरफ जा रहे हैं अपनी आत्मा को बेचते हैं अमीर होने को। खुद को सबसे जानकार समझने वाले मीडिया अखबार टीवी सिनेमा के लोग पैसे को भगवान समझ झूठ की जय-जयकार करते हैं। दर्शक पाठक को सही मार्ग नहीं दिखलाते बल्कि भाषा से लेकर अभिनय तक में अशलीलता गंदगी और हिंसक बनाने का कार्य करते हैं। समाज को गलत दिशा दिखला रहे हैं अमानवीय आचरण को उचित ठहरा सबको भटका रहे हैं। साहित्य के पुजारी तक राग दरबारी सुना रेवड़ियां पाकर इतरा रहे हैं। 
 
कल डॉ हैम जीनॉट जो बचपन की मनोविज्ञान से संबंधित रहे हैं जिन्होंने विनाश के दृश्य देखे थे बचने के बाद उनकी बात पढ़कर रौंगटे खड़े हो गए। मैं यातना शिविर से बच गया लेकिन जो मैंने वहां देखा कोई भी कभी नहीं देखे। मैंने देखा शिक्षित इंजीनियर गैस चैंबर बना रहे थे मानवता को ख़त्म करने को , फिज़ीशियन ज़हर देकर जाने ले रहे थे , नर्सें छोटे छोटे बच्चों को क़त्ल कर रही थी। उच्च शिक्षित लोग महिलाओं और बेबस इंसानों को बंदूक की गोलियों से मार रहे थे। उन्होंने सलाह दी है कि बच्चों को अच्छे इंसान बनाना केवल शिक्षित मनोरोगी और राक्षस नहीं बनाना किताबी शिक्षा नहीं सामाजिक आदर्शों मूल्यों की वास्तविक समझ देना ज़रूरी है। 
 
आस पास देखते हैं लोग शानदार पहनावा लिबास वाले लेकिन उनका व्यवहार उनका आचरण असभ्य और जंगली जानवर जैसा लगता है। किसी और की कोई परवाह नहीं उनको जो करना है करते हैं और कितना भी आपत्तिजनक कार्य करते उनको कोई शर्मिंदगी नहीं होती है। सत्ता पद पैसे ताकत का दुरूपयोग कर उनको गर्व का अनुभव होता है कहने को धर्म ईश्वर की बातें करते हैं मगर अधर्म करते संकोच नहीं करते हैं। हमारे आस पास कितने रईस लोग वास्तव में बेबस लोगों गरीबों से उनकी मज़बूरी का फायदा उठाकर अमीर बन गए हैं। शासक सरकारी अधिकारी नेता लोग बोलते कुछ हैं होते कुछ और हैं शिकायत करने विरोध करने वालों पर अन्याय अत्याचार करते उनको लज्जा नहीं आती जबकि वास्तव में उनका कर्तव्य जनता की सेवा करना है शासन का रौब दिखाना नहीं। पैसा किसी भी तरीके से कमाया हुआ है कोई नहीं देखता अपराध को बढ़ावा देकर अपराधियों का साथ देकर खुद को बलवान समझते हैं जो सही मायने में भीतर से खोखले होते हैं। 
 
संक्षेप में सार की बात इतनी है कि हमने सच्चाई अच्छाई की राह को छोड़ कर जुगाड़ और छोटा रास्ता चुन लिया है जिस में अमीर बनने शोहरत ताकत हासिल करने सुख सुविधा झूठी शान दिखाने को अपना लिया है। हमारे शब्द शानदार लगते हैं जिनका अर्थ कुछ भी नहीं है बस व्यर्थ की बातों में ज़िंदगी गुज़ार ही नहीं रहे बल्कि जीने का मकसद तक बचा नहीं है। जिधर देखते हैं छल कपट वाले इश्तिहार दिखाई देते हैं मगर दावा यही किया जाता है समाज शिक्षा जनहित कल्याणकारी कार्य है कारोबार नहीं मतलब झूठ की सीमा नहीं है। किसी शायर ने कहा है " वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से , मैं ऐतबार न करता तो क्या करता।

मई 08, 2022

वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

          वक़्त के हालात ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

दिल के जज़्बात यही थे , मेरे तेरे एहसास यही थे 
पास थे और दूरियां थीं , तब भी दिन रात यही थे। 
 
नहीं मिलने की थी मज़बूरी , कुछ कदम की थी दूरी
नज़रें समझतीं थी बस , होंठों पर अल्फ़ाज़ नहीं थे। 
 
डर ज़माने का यही था , मिलते थे मिल पाते नहीं थे 
धड़कनों की आवाज़ यही , जानते थे समझते नहीं थे। 
 
ज़िंदगी कैसे बिताई हमने , दास्तां सुनी सुनाई हमने 
अलग-अलग रहकर भी पर , दिल से बिछुड़े नहीं थे। 
 
प्यार की मज़बूरियां कुछ , कुछ हौंसलों की भी कमी 
थे जुदा  क्योंकि दोनों , इक मंज़िल के राही नहीं थे। 
 
सोचता हूं मैं आज तुम भी , सोचती हो बात यही कि 
ज़िंदगी पर हक़ होता काश , नसीब तो अपने नहीं थे। 
 
वो प्यार था पहला हमारा , याद है हमको वो नज़ारा 
दिल की बातें दिल में रखीं , कहना जो कहते नहीं थे। 
 
सोचता रहता हूं मैं जो , क्या तुम्हें भी महसूस होता है 
आज कुछ और बात है , मगर हालात कभी ऐसे नहीं थे।

मई 05, 2022

सपनों की दुनिया की तलाश ( दोस्ती - प्यार ) डॉ लोक सेतिया

  सपनों की दुनिया की तलाश ( दोस्ती - प्यार ) डॉ लोक सेतिया 

शायद कोई कहानी कोई उपन्यास कोई नाटक कोई फिल्म बचपन में असर कर गई और मैंने ज़िंदगी उसी दोस्ती - प्यार की तलाश के नाम कर दी। सोचा नहीं समझा नहीं कहीं से पता ठिकाना नहीं पूछा कोई डगर नहीं मिली जिस पर कोई नाम लिखा हुआ होता कि यही वो रास्ता है जो मुहब्बत की बस्ती नगर गांव को जाता है। भरोसा था कोई तो होगा जिसको मेरी चाह होगी मुझे ढूंढता होगा। ज़माना ठोकरें लगाकर सबक सिखाता रहा कोई पागलपन बताकर हंसता रहा मगर दिल को भरोसा था कोई कुछ भी कहे मुझे रुकना नहीं है जीवन भर अपनी तलाश जारी रखनी है। इधर उधर भीड़ में सुनसान राहों में खिले हुए गुलशन में उजड़े हुए चमन में धूप में छांव में रेगिस्तान में समंदर में सब जगह तलाश किया यहां तलक कि फेसबुक इंटरनेट पर वास्तविक दोस्ती की उम्मीद कर मृगतृष्णा का शिकार हो प्यास से निढाल हुआ। दोस्त बनाए मिले बिछुड़े और हक़ीक़त और ख़्वाब की बात समझ आती गई। सोशल मीडिया से आधुनिक साधन से इंटरनेट से गूगल से सर्च की खबर पता चली तो अचानक विचार आया ये ख्याल पहले क्यों नहीं आया। बस और समय बर्बाद नहीं करना जहां खुली आंख वही सवेरा समझते हैं सोचकर इस को आज़माया है। 
 
गूगल से पूछने पर सब मिलता है इश्तिहार देखा कितनी बार , ढूंढा कोई गली कोई सड़क कोई बस्ती कोई गांव कोई नगर कोई जगह जहां वो दुनिया हो जिस में दोस्ती प्यार हो कोई और दुनियादारी का झगड़ा कोई पराया बेगाना कोई छोटा बड़ा अमीर गरीब का भेदभाव नहीं होता हो। इतने विकल्प बताए गूगल ने बस वही नहीं दिखलाया जिसकी बात की थी। अचानक ध्यान आया कोई मंदिर कोई पीर पैयम्बर की जगह कोई नदी तालाब जहां जाकर मांगने से मुराद पूरी होती हो उसकी खोज करते हैं। धन दौलत नाम शोहरत दुनिया भर की भौतिक वस्तुओं की मनोकामना पूरी होती हैं जहां ऐसे कितने अनगिनत विकल्प सामने थे लेकिन दोस्ती-प्यार जहां मांगने से मिलता हो कोई ऐसा स्थल कहीं नहीं था। जाने कैसे इक अजनबी से वार्तालाप हो गई जिस ने अंतरिक्ष में खोज करने में ज़िंदगी भर काम किया हुआ था। बहुत सोच समझ कर मेरी तलाश की बात पर गंभीर विमर्श कर उन्होंने कहा कि ज़रूर ऐसी कोई दुनिया हो सकती है लेकिन हमारी इस धरती पर संभव नहीं है। दार्शनिक बनकर समझाने लगे इस दुनिया में हर कोई हर नाते रिश्ते संबंध से जुड़ता है संपर्क में रहता है अपनी इच्छा की पूर्ति की खातिर जिस नाते रिश्ते से कोई लाभ कोई ज़रूरत कोई चाहत नहीं पूरी होती हो उसको छोड़ने में क्षण भर भी देरी नहीं करते हैं। सबको औरों से पाने की हसरत होती है और नहीं मिलने पर शिकायत रहती है। निस्वार्थ दोस्ती-प्यार इस दुनिया में समझदार लोग करते नहीं हैं यहां कोई मूर्खता करने की बात नहीं करता है मूर्खताएं करते हैं मगर मूर्ख कहलाना बनना नहीं चाहते लोग। 
 
 यहां कथाओं कहानियों में प्यार मुहब्बत दोस्ती की बातें मिलती हैं लोग राधा श्याम मीरा घनश्याम से लेकर हीर रांझा सलीम अनारकली की पुराने और कुछ आधुनिक काल की सिनेमा टीवी सीरियल की काल्पनिक कहानियों की बात शान से करते हैं लेकिन वास्तविक जीवन में ये सब किसी काम के नहीं लगते हैं। हर कोई भौतिकता बाहरी शारीरिक सुंदरता और शानो-शौकत का तलबगार है यहां आधुनिक समय में प्यार का भी सजा हुआ बाज़ार है। दिल नहीं जैसे कोई इश्तिहार है दिल टूटता है फिर जुड़ जाता है कहीं किसी और पर आते देर नहीं लगती बसंत की ज़रूरत नहीं बहार की कोई कीमत नहीं वेलेनटाइन का दिन बड़ा शानदार त्यौहार है। फूल कहते हैं इंग्लिश में बुद्धू बनने को रंगबिरंगे फूलों का कारोबार है। प्यार कोई राज़ की बात नहीं है युगों से सदियों से इस खेल की बाज़ी खेलते रहे हैं सब कुछ खोने को पाना कहते हैं बंदे का ख़ुदा हो जाना कहते हैं। रूह की आत्मा की एहसास की कहानी होती है जिस्म की बात बेमानी होती है जहां जिस्मानी वासना की ख़्वाहिश होती है मुहब्बत भूली बिसरी कहानी होती है। 
 
चाहत इक ईबादत है उसको ज़रूरत और आदत बनाया तो क़यामत होती है। दिल मिलना नसीब की बात होती है इश्क़ की चांदनी रात अश्कों की बरसात होती है बड़ी हसीन वो मुलाक़ात होती है लफ़्ज़ों से नहीं आंखों आंखों में बात होती है। वो मुलाक़ात बड़ी मुद्दत के बाद होती है। सच्चा प्यार सबके मुकद्दर की बात नहीं है झूठी हसरतों ने हर किसी को भटकाया है जिस ने पाने को प्यार समझा है प्यार को नहीं समझ पाया है खुद को खोया है जिसने उसी ने मुहब्बत का ख़ुदा पाया है। प्यार तो दर्द का रिश्ता है इश्क़ से आदमी बनता कोई फ़रिश्ता है। ज़मी पर फ़रिश्ते जब उतरते हैं लोग सब इक दूजे से प्यार करते हैं। चली जब से नफरतों की आंधी है प्यार की अर्थी उठाए फिरते हैं लोग वो कोई और चीज़ है जिसको आशिक़ी समझते हैं लोग। किसी की पलकों से किसी के दामन पर गिरकर मोती बनता है कोई आंसू कीमत उसकी नहीं कोई लगा सकता ये गली है जिस में और कोई दूसरा नहीं समा सकता। 
 

 

मई 02, 2022

ख़ुद से मुलाकात नहीं होती ( सुकून की तलाश ) डॉ लोक सेतिया

   ख़ुद से मुलाकात नहीं होती ( सुकून की तलाश ) डॉ लोक सेतिया 

  होती है ज़माने से मगर अपने से बात नहीं होती है , इन उजालों में वो बात नहीं होती है शहर में कभी चांदनी रात नहीं होती है। सुबह कब हुई कब हुई शाम खबर नहीं , बादल होते हैं बरसात नहीं होती है दोपहर की धूप से बचना मुश्किल है कोई भी दिलकश सुहानी रात नहीं होती है। भीड़ में हर कोई खुश भी है परेशान भी बैचैन दिल को चैन मिलने की राह नहीं मिलती कश्ती किनारों से बच के निकलती है साहिल से मुसाफ़िर का नाता नहीं कोई फूल की खुशबू से पहचान नहीं है बाग़ों की तितलियों से बात नहीं होती है। 

सोचना याद करना यादों की मधुर बातों को कभी फुर्सत ही नहीं है उन झरोखों से झांककर देखने की। क्या दिन से महफ़िल से उकताहट होती थी तो कभी छत पर कभी खेत खलियान में अकेले पेड़ों की छांव में जा कर चैन मिलता था खुद अपने आप से बात करते थे। गाते गुनगुनाते कभी तन्हाई में अश्क़ बहाते चैन पाते थे अपने दुःख दर्द भरे मौसम छोड़ बहार लाते थे। दोस्तों की महफ़िल में नाचते झूमते गाते थे दिल को इस तरह बहलाते थे अश्कों के मोती बेकार नहीं बहाते थे। शाम ढले सुनसान राहों पर चलते चले जाते थे किसी नहर किनारे लहरों से बतियाते थे। ये कोई पागलपन नहीं था ये खुद को समझने चिंतन मनन करने का ढंग होता था। पढ़ना लिखना याद करना हो तो बाग़ में जाकर बैठते पेड़ से लगकर घंटों गुज़र जाते थे घर हॉस्टल में पढ़ना लिखना मुश्किल लगता था जब कमरे में लोग आते जाते आवाज़ लगाते थे बस करो कितना पढ़ोगे दोस्त मुश्किल बढ़ाते थे। 
 
  अब आजकल हर कोई अकेला है फिर भी दुनिया भर की बेमतलब की बातें बेचैन किए रखती हैं। सोशल मीडिया टीवी फेसबुक व्हाट्सएप्प जाने कितने झंझट जकड़े हुए हैं। आदत लत बनी नशा बन गई है दुनिया भर की खबर है लेकिन कितनी झूठी कितनी सच्ची नहीं समझते और खुद अपने आप से अजनबी हैं। खुद को जानते पहचानते नहीं खुद अपने से मिलते नहीं सोचते नहीं क्या हूं मुझे किधर जाना क्या करना है बस दौड़ रहे हैं भागते भागते थक गए मगर मंज़िल का कोई पता नहीं शायद मंज़िल से दूर होते जाते हैं उलटी दिशा को चलकर। ऋषि मुनि तपस्वी पहाड़ों पर जाते थे जीवन का अर्थ जीने का मकसद ढूंढने को , हम गांव शहर महानगर से पर्वत की सैर करने जाते हैं मौज मस्ती आनंद के कुछ पल व्यतीत करने को। और कुछ दिन बाद वापस उसी कोलाहल में आनंद का एहसास भूलकर बेचैनी को गले लगाते हैं। आदमी की बनाई इस दुनिया ने उसको वास्तविक कुदरती दुनिया से इतना दूर कर दिया है कि अब उस वास्तविक सुकून चैन आनंद की अनुभूति संभव नहीं रही है। मनोवैज्ञानिक शोध कर चौंकाने वाले तथ्य सामने ला रहे हैं असुरक्षा अनावश्यक भय आशंकाओं ने मन मस्तिष्क को घेर लिया है। हर कोई हर किसी को अविश्वास और शंका की निगाह से देखता है। सही बात का कोई और मतलब ढूंढते रहते हैं हमने खुद को इक जेल में कैद कर लिया है और फेसबुक व्हाट्सएप्प की अंधी गली को रौशनी समझने लगे हैं। कहने को कितने शानदार संदेश मिलते हैं भेजते हैं लेकिन आचरण में उनका कोई प्रभाव नहीं होता है। गंधारी की तरह सब लोग अपनी आंखों पर पट्टी बांधी हुए हैं स्वार्थ खुदगर्ज़ी की , लेकिन संजय धृतराष्ट्र को गीता का संदेश सुना रहे हैं जबकि उनका ध्यान मोह माया जीत हार और महाभारत की घटनाओं का आंकलन अपनी सुविधा से करने में लगा है। आधुनिक काल में महाभारत का स्वरूप बदला है गीता का अर्थ बदला है गीता का उपयोग जाने किस किस उद्देश्य से किया जाने लगा है। बगैर समझे ताली बजाना सर हिलाना आदत बन गया है। सोशल मीडिया ने दुनिया को इस ढंग से पेश किया है कि पांव आसमान पर सर धरती पर है मगर उड़ान कहते हैं रसातल की ओर जाने को। जिनको खुद अपनी पहचान नहीं है सबको उनकी तस्वीर दिखलाते हैं । बिकने वाले लोग खरीदार कहलाते हैं। तलवे चाटते हैं दुम हिलाते हैं। अंधे दुनिया को नई राह बताते हैं।
 

 
 

अप्रैल 30, 2022

कितने परेशान सवालात खड़े हैं ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया

   कितने परेशान सवालात खड़े हैं ( देश के हालात )  डॉ लोक सेतिया 

कहां से शुरूआत की जाए , भगवान जाने उसी को सब खबर होती है मानते हैं। मगर ध्यान आया ऋषि मुनि ईश्वर की खोज करते थे कठिन तपस्या के बाद दर्शन होते थे। इस आधुनिक युग में कोई विधाता दुनिया को बनाने वाले की तलाश कर भी ले तो क्या उनसे जवाब मिल जाएंगे। कोई उनसे कहे कि आपके लिए हमने या सरकार ने अथवा कुछ संस्थाओं संगठनों ने बड़े बड़े आलीशान शानदार महलनुमा घर बनवाए हैं जिन में चल कर आपको रहना होगा और जैसे मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनाने वालों ने निर्धारित किए हुए हैं उनका पालन करना होगा अपनी अर्चना ईबादत पूजा भक्ति स्वीकार कर वहां आने वालों को आशीर्वाद देकर उनकी आराधना का फल देना होगा। मुमकिन है ईश्वर को ये सब मंज़ूर नहीं हों और वो इन जगहों पर रहने को राज़ी नहीं हो। कोई भी ताकत भीड़ या सरकारी आदेश भी ईश्वर को विवश नहीं कर सकता उन स्थानों पर निवास करने को जिनका निर्माण सच्चाई ईमानदारी और पवन भावनाओं से नहीं तमाम तरह के स्वार्थ की खातिर मनमाने ढंग से किया गया हो। जिन को धर्म की देश सेवा की बात करनी चाहिए उनका पहला कर्तव्य इंसान की दुःख दर्द की चिंता होनी चाहिए ,  गरीबी भूख असमानता अन्याय को मिटाने पर बात छोड़कर भगवान और धर्म को अपनी मर्ज़ी से परिभाषित कर आदमी को आदमी से टकराव की राह भटकाने वालों पर वास्तविक ईश्वर मेहरबान नहीं हो सकते हैं। ऐसे सभी धार्मिक स्थलों में भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु निवास करते हों धर्मगुरुओं की शिक्षाओं ग्रंथों को पढ़कर लगता नहीं है। हम कैसे लोग हैं जो इतना भी नहीं समझना चाहते कि हम मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बनवा सकते हैं मगर परमात्मा को पकड़ कर उन जगहों रहने को विवश नहीं कर सकते क्योंकि उनको जिस बंधन जिस कैद में रख सकते हैं वो प्यार मुहब्बत और आपसी सद्भाव भाईचारे से निर्मित इंसानियत का घर हो सकता है। नफरत की अलगाव की बुनियाद पर ताकत अहंकार और दौलत से खड़ी ऊंची दीवारों में विधाता को बंद कर रहने को मज़बूर नहीं किया जा सकता है। 
 
भगवान की बात के बाद समाज की देश राज्य न्याय व्यवस्था की आज़ादी और संविधान की बात करते हैं।राजनेता अधिकारी न्यायपालिका सुरक्षाकर्मी और साहित्य समाज की वास्तविकता की बात लिखने कहने दिखलाने वाले क्या होना चाहिए और क्या होता है इसका अंतर समझना ज़रूरी है कर्तव्य पालन करने को। लेकिन अगर खुद स्वार्थी और मतलब की खातिर झूठ को सच एवं सच को झूठ साबित करते हैं तो देश की बर्बादी के असली गुनहगार वही हैं। उनको खुद अपने लिए जितना चाहिए अधिकार मानते हैं पाने को नियम कानून कायदे कोई बाधा नहीं बन सकते लेकिन सामान्य नागरिक की बुनियादी ज़रूरत पूरी नहीं होने पर नागरिक बेबस हो अधिकार नहीं भीख मांगने की तरह खड़ा हुआ है 75 साल होने को हैं। ये कैसा विधान है जिस से मुट्ठी भर लोगों के पास देश का अधिकांश भाग है राजाओं की तरह रहने को जबकि बाकी तमाम लोग नाम भर को पाकर ज़िंदा हैं मौत से खराब हाल में रहकर। सरकार सरकारी विभाग अधिकारी कुछ धनवान लोगों उद्योगपतियों को मनमानी करने लूटने देते हैं और खुद भी तथा राजनेता भी मौज उड़ाते हैं और देश की जनता को कुछ नहीं मिलता झूठे आश्वासन और भाषण और कागज़ी आंकड़ों के सिवा। उनकी चाहत उनकी मर्ज़ी को पूरा करने को ख़ास वर्ग की कामना चुटकी बजाते हल हो जाती है करोड़ों का बजट उनकी महत्वांकाक्षा के लिए उपलब्ध होता है। उनके शाही अंदाज़ उनके राजसी ठाठ उनके शोहरत के इश्तिहार रोज़ करोड़ों सरकारी कोष से बंदरबांट कर अनावश्यक बोझ जनता को ढोना पड़ता है। मगर उसी आम जनता की शिक्षा स्वास्थ्य सेवा रोज़गार रोटी पीने का साफ़ पानी मुहैया करवाना सरकार को संभव नहीं लगता है क्योंकि राजनेताओं अधिकारी वर्ग न्यायपालिका देश की संस्थाओं संगठनों को इस पर सोचना ज़रूरी नहीं लगता है। 
 
    आजकल बिजली संकट छाया हुआ है ये समस्या हल हो सकती है । सूरज के आसन पर घने अंधेरे बैठे हैं। वास्तविक संकट उस घने अंधकार की है जिस पर अटल बिहारी बाजपेयी जी की कविता उपयुक्त लगती है।  पढ़ना समझना ये संकट गंभीर है।
 

 

अप्रैल 19, 2022

समझाने वालों ने बर्बाद किया ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

     समझाने वालों ने बर्बाद किया ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया 

 इधर व्हाट्सएप्प फेसबुक पर जैसे कोई आग जल रही है दोस्तों को जानपहचान वालों को प्यार शुभकामनाओं के संदेश औपचरिकता निभाने को भेजने वाले समाज को धर्म या विचारधारा के नाम पर बांटने वाले वीडियो और संदेश बड़ी शिद्दत से भेजते हैं। मुझे कितनी बार समझाना पड़ा है निवेदन किया कृपया मुझे ये किताब मत पढ़ाओ मुझे सिर्फ मुहब्बत का सबक याद रखना है। दोस्त दोस्ती भुला बैठे करीबी लोग रिश्ते नाते सभ्य शिष्टाचार की मर्यादा लांघ कर ऐसे वार्तालाप करने लगे कि बोलचाल बंद है। जाने ये कैसा धर्म कैसी आस्था कैसी अंधभक्ति है जिस ने तमाम लोगों को पागल कर दिया है । मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना वाली कहानी पुरानी है आजकल धर्म मज़हब लोगों को क़त्ल करना दंगे फसाद करने की सीख देने लगे हैं। कभी चालबाज़ अशिक्षित नासमझ लोगों को झूठ को सच बताते थे अब तो पढ़े लिखे लोग भी ऐसे स्वार्थी लोगों की बातों में आकर इस हद तक मूर्ख बन गए हैं कि झूठ की जय जयकार करने लगे हैं। बड़े बड़े पद नाम शोहरत वाले लोग किरदार में ख़लनायक को पीछे छोड़ चुके हैं। देश के रखवाले होने की नकाब पहन नेता देश की संपदा लूट कर खाने लगे हैं चालीस चोर अलीबाबा के दिल को लुभाने लगे हैं।   
 
  इतनी छोटी सी बात समझते समझते ज़िंदगी गुज़र गई कि समझदार कहलाने वाले लोगों ने मुझे उन राहों पर चलने को विवश कर बर्बाद किया जिन पर मुझे चलना पसंद नहीं था। अभी तुम छोटे हो बच्चे हो नासमझ हो जानते नहीं अच्छा बुरा क्या है हम तेरे शुभचिंतक हैं तुझसे बेहतर समझते हैं तुम्हें क्या करना चाहिए और किस तरह कहां कैसे जीना चाहिए।  जीवन के अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय मुझे इसी तरह लेने पड़े हैं क्योंकि मुझे भयभीत किया गया कि अपनी मर्ज़ी से चुनी राह पर चलना सुरक्षित नहीं नतीजे खतरनाक होंगे।  शायद उनकी आशंका उचित रही हो लेकिन खुद अपनी समझ से अपनी पसंद की डगर चलता तो इस बात का पछतावा नहीं होता कि मुझे अनचाही राहों पर चलकर हासिल कुछ भी नहीं हुआ।  और आज वही कहते हैं कि मुझे औरों की समझाई बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए था खुद अपनी मंज़िल चुननी चाहिए थी।  मगर कितनी अजीब बात है कि आज भी मुझे समझाया जाता है कि आपको तजुर्बा नहीं है हम शिक्षक हैं अनुभवी हैं तजुर्बेकार हैं तुम्हें वही करना चाहिए जैसा हम समझते हैं। कोई नहीं सोचता कि जिसकी ज़िंदगी जुड़ी है उसकी अपनी सोच इच्छा सबसे अधिक महत्व रखती है। मुझे जो चाहिए उसको छोड़ कर जो और समझते हैं उस को अपनाना चाहिए।  जबकि खुद ऐसे लोग हमेशा वही करते हैं जो उनको अच्छा लगता है उनको किसी की सलाह ज़रूरी नहीं लगती लेकिन सबको नसीहत देना पसंद है।  हमारी मुश्किल ये भी है कि हम उनसे शिकायत भी नहीं कर सकते कि उन्हीं के भरोसे उनकी बातों को मानकर हम चलते रहे अनचाही राहों पर खुद की मर्ज़ी को छोड़कर और नतीजा हम नहीं पहुंचे कहीं भी। नहीं ये मेरी ज़िंदगी की कहानी नहीं है  उन लोगों की बात है जो धार्मिक आस्था के नाम पर या किसी गुरु की भक्ति किसी व्यक्ति नेता अभिनेता खिलाड़ी के प्रशंसक बनकर अपने विवेक की समझ की तर्क की बात नहीं समझते और नफरत भेदभाव की इंसानियत को शर्मिंदा करने वाली बातें करते हुए खुद को देशभक्त एवं धर्म के झंडाबरदार समझते हैं। सारे जहां से अच्छा गीत लिखने वाले इक़बाल की दो रचनाओं से समस्या और समाधान की राह ढूंढते हैं।

                        1   नई तहज़ीब ( अल्लामा इक़बाल ) 

            उठाकर फेंक दो बाहर गली में , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गन्दे ।

         इलेक्शन , मिम्बरी , कौंसिल , सदारत , बनाए खूब आज़ादी के फंदे। 

                  2    फ़लसफ़ा - ओ - मज़हब ( इक़बाल )

 यह आफ़ताब क्या यह सिपहरे बरी है क्या 
 ( ये सूरज ये ऊंचा आकाश क्या है )
समझा नहीं तसलसुले शाम ओ सहर को मैं। 

अपने वतन में होके गरीबुद्दयार हूं 
डरता हूं देख देख के इस दश्त-ओ - दर को मैं। 

खुलता नहीं है मेरे सफरे - ज़िंदगी का राज़ 
लाऊं कहां से बंदा ए साहब नज़र को मैं। 

हैरां हूं बू अली कि मैं आया कहां से हूं 
रूमी यह सोचता है कि जाऊं किधर को मैं। 

जाता हूं थोड़ी दूर हर इक राहे - रौ के साथ 
पहचानता नहीं हूं अभी रहबर को मैं। 

जब कोई भी सोच कोई व्यवस्था कोई औषधि कोई आहार सड़ गाल जाता है तब उसका उपयोग ख़तरनाक जानलेवा साबित हो सकता है। हमारी राजनैतिक धार्मिक संस्थाओं संगठनों की हालत यही हो चुकी है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में " अब तो इस तालाब का पानी बदल दो , ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।
 

      

अप्रैल 15, 2022

मुझसे बिना बात खफ़ा ख़ुदा है ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया

  मुझसे बिना बात खफ़ा ख़ुदा है ( तिरछी नज़र ) डॉ लोक सेतिया 

    बुलावा आया जाना ज़रूरी था भले उनसे जान-पहचान कभी ठीक से हुई नहीं जानते पहचानते हैं यूं ही चलते फिरते मुलाक़ात होती रहती है। अजीब ढंग से अपने घर आने का अनुरोध किया था ये कह कर कि आपको ऐसी शख़्सियत से मिलवाना है जिनसे आपको सवालात करने हैं और उनको भी आपसे मुलाक़ात करनी है ठीक तरह से समझने को क्योंकि उनकी परेशानी है नहीं समझ सके क्या हैं आप लोक सेतिया । ऐसा कौन हो सकता है उन्होंने राज़ रखा था इस को कहा था ताज्जुब की बात है हैरान होगे देख कर उस का लुत्फ़ कुछ ख़ास होगा। जाने पर मुझे महलनुमा घर के शानदार भाग में ले गए जहां कोई चमकदार लिबास में मनमोहक छवि धारण किए अनुपम दृश्य प्रस्तुत कर ईश्वरीय रूप बनाए ऊंचे सिंहासन पर हाथ उठाए आसीस देने का आभास देता पृष्ठभूमि में सूरज की किरणों से सुसज्जित बैठा हुआ था। अप्रत्याशित घटना थी उनके घर विधाता ईश्वर ख़ुदा भगवान विधाता साक्षात विराजमान थे। बिना बताये पहचान गया था जान गया था वही हैं मिलकर ख़ुशी हुई दुआ सलाम नमस्कार अभिवादन किया और पूछ ही बैठा आपको फुर्सत मिल गई धरती पर आकर अपनी बनाई दुनिया का हाल देखने की। भगवान बोले भूल गए आपने ही घोषणा की थी मेरे सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर आने की। मुझे अच्छी तरह याद है हुई थी चर्चा लेकिन मुझे लाख बार कोशिश करने पर भी आपका अकॉउंट दिखाई नहीं दिया। भगवान हंसकर बोले मुझे सब पता है लेकिन मैंने डॉ लोक सेतिया आपको ब्लॉक किया हुआ है सब को दिखाई देता हूं बस कुछ लोग आपके जैसे जिनकी बातें मुझे समझ नहीं आतीं उनको ब्लॉक किया हुआ है। दुनिया में तमाम लोग हैं जो मुझे मानते हैं या जो नहीं भी मानते हैं नास्तिक हैं लेकिन आप कुछ लोग मुझे कटघरे में खड़ा कर जाने कैसी कैसी बात कहते हैं। मैंने दुनिया बनाकर सही ढंग से उसका ख़्याल नहीं रखा अपने गुणगान और आरती पूजा अर्चना चढ़ावा मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरिजाघर धार्मिक स्थल की शान-ओ-शौकत के मोहजाल में खोया रहता हूं। मुझे जिनकी बातें समझ नहीं आतीं भले खरी होती हैं कड़वा सच अच्छा नहीं लगता उनको ब्लॉक कर देता हूं बचने पीछा छुड़ाने को , कितने और लोग यही करते हैं आपको ब्लॉक करने का कोई कारण नहीं है आपसे संपर्क नहीं रखना पसंद करते क्योंकि आप उनको पसंद की झूठी बातें नहीं करते हैं। झूठ सिंघासन पर विराजमान है उसकी जय-जयकार नहीं करते तो खामोश रहो यही उचित है , ऊपरवाला बेबस है जब अधिकांश लोग झूठ के देवता के उपासक हैं तब सच को ज़िंदा रखना मुमकिन ही नहीं है। सच जाने कब से लापता है कोई नहीं जानता ज़िंदा भी है या उसकी लाश को दफ़न कर दिया है क़त्ल कर। 
 
  ऊपरवाले ने सच सामने कह दिया है जब मुझे ब्लॉक किया हुआ है तो मेरी उपासना मेरी दुआ मेरी विनती उस तक पहुंचती ही नहीं। लौट आती है मेरी ईबादत मेरी प्रार्थना मेरी विनती ख़ाली उस तक जा ही नहीं पाती मेरी आह मेरी सिसकियां मेरे आंसू। सुबह-शाम जिस जगह मैंने ईबादत पूजा अर्चना की उम्र बीत गई तब पता चला उस जगह कोई ख़ुदा कोई भगवान कोई अल्लाह कभी नहीं था। मेरे मन का संशय और बढ़ गया था समझ नहीं आ रहा था मुझे ब्लॉक किया हुआ है तो फिर मुझसे मुलाक़ात ये सब बातें करने की ज़रूरत क्या है। साहस कर उनसे सवाल कर दिया चलो माना आपकी सभी बातों को लेकिन इस तरह अचंभित कर चुपचाप बुलावा भेज मुलाक़ात करने और वार्तालाप करने का प्रयोजन क्या है। उन्होंने मेरी बात का जवाब इस तरह दिया है। ध्यान से पढ़ना और समझ कर विचार करना समझ आये तो मुझे समझाना अगर संभव हो। अब आपकी इस दुनिया का ख़ुदा भगवान सब मैं ही हूं सोशल मीडिया पर ही नहीं हर घर गांव गांव नगर नगर गली गली बाज़ार सड़क मॉल तक मेरा ही जलवा है। यही इस आधुनिक युग का सत्य है सोशल मीडिया पर हर कोई भगवान समझता है खुद को सब अपनी कहते हैं और अपनी पसंद की बात पढ़ना सुनना चाहते हैं। 
 
  मेरा हाथ पकड़ मेरे सहारे लोग क्या से क्या बन गए हैं। ज़र्रा आफ़ताब बन गया है चौकीदार आली - जनाब बन गया है मुखौटा पहचान हो गया है असली चेहरा नकाब बन गया है। झूठ लाल कालीन जैसा सच जैसे कि इक फंदा है इंसान आदमी नहीं रहा शैतान फ़रिश्ता हर बंदा है। झूठ बिकता है सच बनकर ये सबसे अच्छा धंधा है कहते हैं धंधा धंधा है भले कितना ही गंदा है। राजनीति धर्म खेल टीवी शो से सिनेमा टीवी सीरियल तक सिर्फ धोखा है बेईमानी है नई नहीं वही कहानी है। बिल्ली मौसी शेर की नानी है देश सेवा समाज सेवा है खूब खाने को मिलता मेवा है। नाम है नाम बिकते हैं करोड़ों का ले कर दाम बिकते हैं तुम खरीदो ईनाम बिकते हैं मयकदे बिकते हैं जाम बिकते हैं साकी खुद प्यासे रहते हैं क्या बताएं क्यों अरमान बिकते हैं। मुझ से बोला आधुनिक युग का स्वयं घोषित भगवान मेरी शरण में आ जाओगे जो भी चाहत है सब पाओगे नहीं समझोगे तो हाथ मलते रहोगे वक़्त के बाद पछताओगे। सोशल मीडिया की गंगा बहती है पाप धुलते हैं पुण्य मिलते हैं किनारे से देखते रह जाओगे सोच लो फिर सिर्फ पछताओगे। ऐसा नहीं कि कोई भगवान नहीं है असली नकली की होती पहचान नहीं है। सोशल मीडिया के भगवान से मिलना जाने कैसा लगा समझ नहीं पाया फिर भी उसको काल्पनिक नहीं वास्तविक कहना होगा। वास्तविक भगवान कोई भी हो उसको परेशानी हो सकती है खुद को असली साबित करने में बगैर सोशल मीडिया का उपयोग किये।
 
 
 

अप्रैल 06, 2022

ज़मीं पर फ़रिश्ता थी मां ( श्रद्धासुमन ) डॉ लोक सेतिया


            ज़मीं पर फ़रिश्ता थी मां ( श्रद्धासुमन ) डॉ लोक सेतिया 

दुनिया की नज़र में पत्नी की माता सास होती है मगर मुझे उन्होंने कभी दामाद नहीं समझा हमेशा बेटा ही समझा मेरे लिए बड़ी खुशनसीबी थी मुझे इस तरह कुछ और महिलाओं ने मां भी ममता और स्नेह का आशीर्वाद दिया और मैंने उन सभी में अपनी मां की छवि देखी। मुझे अपनी मां से अधिक प्यारा और सुंदर दुनिया का कोई शख़्स नहीं लगा कभी। 18 साल पहले मुझे जन्म देने वाली मां दुनिया को छोड़ गई लेकिन मेरे मन में उनकी स्मृति हर क्षण बनी रही और जीवन भर रहेगी। मांओं की ममता का क़र्ज़ चुकाया नहीं जा सकता है दुनिया की दौलत देकर भी। मेरी इच्छा है कोई अगला जन्म हो तो अपनी मां और सभी मांओं की मामता की छांव में जीवन बिताने उनकी सेवा करने में व्यतीत हो। 
 
शायद कभी न कभी सभी के जीवन में ऐसा कठिन समय आता है जब हालात इस सीमा तक खराब होते हैं कि आपको अपनी ही ज़मीन जायदाद हक़ ही नहीं करीबी लोगों दोस्तों की ज़रूरत पड़ती है ज़िंदगी की जंग लड़ने के लिए मगर कुछ भी हासिल नहीं होता। दुनिया अजनबी गैर ही नहीं दुश्मन बन जाती है और बिना कारण हर कोई आपसे किनारा ही नहीं करता बल्कि आपको तबाह बर्बाद करने में शामिल हो जाता है। आपकी ज़िंदगी की कश्ती तूफ़ान में मझधार में हिचकोले खाती है और तमाम लोग डूबने का तमाशा देख रहे होते हैं। ऐसे भयानक हालात कुछ महीने या कुछ साल रहते हैं जब आपका बिखर जाना संभव होता है और संभलना बहुत मुश्किल। 
 
रूह कांपती है अभी भी सोचने पर हम कैसे उन हालात से सुरक्षित बाहर निकले। उस समय सिर्फ इक शख़्स था जो हमारे लिए इस ज़मीं पर फ़रिश्ता जैसा था वो थी मां जो 23 मार्च को चली गई दुनिया को छोड़ कर। अब कोई नहीं सर पर आशीर्वाद का हाथ रखने वाला भले हालात बदलते लोग बदल कर दूरियां मिटा साथ चलने लगे। मगर खराब हालात में ढांढस बंधाने और हिम्मत देने वाला फ़रिश्ता फिर कोई नहीं मिलेगा। जिन घनघोर अंधेरों में खुद अपना साया साथ छोड़ जाता है उस में सहारा देने वाले फ़रिश्ते के पास धन दौलत जैसा कुछ भी नहीं था लेकिन उसका साथ और हर तरह से कोशिश कर रास्ता निकालने की चाहत सब कर सकती थी। और उस ने ऐसा सिर्फ हमारे लिए ही नहीं किया बल्कि उनका जीवन हर किसी के लिए हमेशा मुश्किल हालात में साथ देने और निभाने की मिसाल रहा है। न जाने कितने अपनों परायों की मां सभी दिलों में बसती है।

फ़रवरी 18, 2022

डॉ लोक सेतिया की किताबें ( जानकारी ) पाठकों के लिए ' फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ' उपहार सवरूप निशुल्क

      डॉ लोक सेतिया की किताबें ( जानकारी ) पाठकों के लिए 

जैसा कि पिछले 10 साल से नियमित ब्लॉग पर पाठक पढ़ते रहे हैं 1570 पोस्ट पब्लिश हैं 335000 व्यूज सभी पोस्ट को पढ़ने वालों के मिलाकर हो चुके हैं एवं तीस साल से अख़बार हिंदी साहित्य की पत्रिकाओं में भी हज़ारों रचनाएं छपती रही ब्लॉग पर शामिल हैं चुनिंदा रचनाएं आपको जानकारी है। 
 
अब मैंने उन सभी विधाओं की सबसे बेहतर रचनाओं को पुस्तक रूप में छपवाना शुरू किया है। 
 
दिसंबर 2021 में ग़ज़ल संग्रह ' फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ' प्रकाशित हुआ है।
 
मार्च 2022 में कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' आपके लिए उपलब्ध होगा। 
 
जल्दी ही व्यंग्य रचनाओं की किताब 
 
' हमारे वक़्त की अनुगूंज ' 
 
और कहानियों की किताब 
 
' दास्तानें ज़िंदगी ' पब्लिश हो जाएगा। 
 
जिस किसी को भी मेरी रचनाओं की किताब पढ़नी हो मंगवाने को मुझे फोन पर संपर्क कर सकते हैं। 
 
ब्लॉग पर फॉलो करने वाले सभी चाहने वाले कमेंट की जगह किताब मंगवाने को अपना पता ईमेल और फोन नंबर लिख सकते हैं उनको मेरी पहली किताब उपहार सवरूप निशुल्क भेजी जाएगी। 
 
भविष्य में सभी किताबों को ऑनलाइन उपलब्ध करवाने की जानकारी दी जाती रहेगी। 
 
ग़ज़ल और कविता की किताब प्रकाशक श्वेतवर्णा प्रकाशन दिल्ली की साईट पर उपलब्ध हैं। 
 
मेरी फेसबुक पर किताबों को ऑनलाइन मंगवाने को लिंक आपको बहुत जल्दी मिल जाएगा पुस्तक प्रकाशक एवं अमेज़न दोनों से मंगवाने की सुविधा रहेगी। 
 
कहने की ज़रूरत नहीं कि मेरे लेखन का एक ही मकसद है जनहित समाज की वास्तविकता को लिखना और पाठक तक पहुंचाना। नाम शोहरत धन दौलत जैसा कुछ भी पाना न कभी मेरा ध्येय रहा है और न कभी हो सकता है।   
 
फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी  , अमेज़न पर उपलब्ध है लिंक नीचे दिया गया है।  
 
जैसे ही बाकी किताबें प्रकाशित होती हैं उनके लिंक भी शेयर करता रहूंगा।

http://www.amazon.in/dp/9391081746?ref=myi_title_dp


 

फ़रवरी 09, 2022

कौन मुजरिम क़लम के क़त्ल का ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया

  कौन मुजरिम क़लम के क़त्ल का ( व्यथा-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

पुस्तकालय की बंद अलमारी से जाने कब से लाल रंग का लहू जैसा तरल पदार्थ बहता बहता फ़र्श पर दाग़ बनता जा रहा है लाख कोशिश की मगर धब्बे मिटते ही नहीं। सरकार को खबर मिली तो सीबीआई को जांच पर लगा दिया क्योंकि टीवी चैनल को इंसानी खून की गंध महसूस हुई और इंसानी खून की गंध अख़बार टीवी चैनल को हमेशा करीब आने को विवश करती है। विशेषज्ञ बड़ी बारीकी से देखते परखते हादिसे की तह तक पहुंचे तो माजरा सुलझने की जगह और उलझता लगा। लिखने वाले की सैंकड़ों किताबों के नीचे उसकी कलम दबी कुचली पड़ी बरामद हुई। सरकारी विभाग की सोने से बनी कलम जो लिखने वाले को ईनाम पुरुस्कार के साथ भेंट की गई थी उसकी हालत देख कोई नहीं समझ पाया कि जान बाकी है या नहीं लेकिन कचूमर निकलने के बाद भी उस के भीतर से स्याही की जगह लहू की धारा निरंतर बहती जाती थी। राज़ खुला कि शासक ने खुश होकर लिखने वाले को सोने की कलम हीरे मोती से जड़ी उपहार स्वरूप भेंट दी थी जिस में स्याही की जगह गरीबों का लहू भरा हुआ था। इतनी महंगी कीमत की कलम लिखने वाले ने किताबों के ढेर के नीचे दबाकर क्यों रखी थी और कैसे इतनी किताबों का बोझ उसको दबाता कुचलता रहा और कलम में भरा स्याही की जगह लहू बहते बहते पुस्तकालय को क़त्ल की वारदात की जगह घोषित करने को विवश हुआ। लहू की हर बूंद मिट्टी के कण कण में बसी अनगिनत कविताओं ग़ज़लों कहानियों की रचनाओं की वास्तविक दास्तां की तरफ इशारा कर रही थी। रूह कांपने लगी है इतनी लाशें दबी पड़ी अचानक सामने देख कर। सीबीआई के पास तमाम जानकर होते हैं जांच रपट लिखने लिखी को बदलने की ज़रूरत पड़ती रहती है तब कलम स्याही कागज़ की समझ वाले विशेषज्ञ बुलाने पड़ते हैं। कलम की जांच कर जानकार ने बताया कि अभी बचने की उम्मीद बाकी है। 
 
     वेंटीलेटर पर जैसे रोगी को रखते हैं उसी तरह कोशिश करने पर कलम में हलचल होने पर घायल कलम से सवाल किया गया तुम्हारी इस दशा का कारण क्या है। एक एक करके किताबों की रतफ इशारा किया लिखने वाले को गुनहगार बताते हुए। सभी किताबों को खोलना पड़ा सावधानी से पन्ने पलटते हुए ताकि सबूत सुरक्षित रहें और इस तरह सैंकड़ों किताबों में कलम को दबाने कुचलने तोड़ने मरोड़ने के निशान मिल ही गए। कहीं इतिहास को बदलने कहीं घोटाले के अपराधी को बचाने को नज़ीर बनाने की बात करने और झूठ को सच बनाकर ख़लनायक को नायक घोषित करने का कार्य कर लिखने वाले ने खुद अपना ज़मीर बेचने एवं कलम की आत्मा को लहू-लुहान किया था। कविता ग़ज़ल को घायल किया मंच पर तालियां और चंद चांदी के सिक्के पाने की चाहत में। कभी लघुकथा को उपन्यास कभी हक़ीक़त को अफ़साना बना दिया। यहां तक कि आने वाले भविष्य को गुज़रा कोई पुराना ज़माना बना बेचा सस्ते दाम पर। वहीं कहीं लिखने वाले की डायरी मिली लेखक की आत्मकथा जो कभी किताब नहीं बन पाई। प्यार की दास्तां सिनेमा पर फिल्मकार ने नफरत डर और हिंसा रोमांच बना दिया लिखने वाले की विवशता देखते हुए लालच का जाल बिछाकर। किसी संपादक ने किसी टीवी सीरियल निदेशक ने हर अंक हर एपिसोड में दर्शक को भटकाते हुए काली अंधेरी रात को रौशनी का नाम देकर गुमराह किया धन दौलत कमाने की खातिर। 
 
लंबा समय अथक महनत रंग लाई और सीबीआई ने कितने बड़े बड़े नाम वाले जाने माने लोगों के चेहरों से शराफत की नकाब हटाकर उनकी असली सूरत दिखलाई जो हैरान परेशान करने से बढ़कर भयभीत करती दिखाई दी। उसी टीवी चैनल जिसने घटना पर एपिसोड बनाकर सनसनी फैलाई थी जांच रिपोर्ट मालूम करने पर गोपनीय ढंग से जानकारी मिली उसको सबसे बड़ा गुनहगार साबित किया गया है। शासक और सत्ताधारी दल की अनुकंपा हासिल थी इसलिए जोड़ तोड़ कर सीबीआई जांच बदल कर साज़िश को मज़ाक बनाकर जारी किया गया। जांच का नतीजा खोदा पहाड़ निकाली चुहिया वो भी मरी हुई । 
 

                      डॉ लोक सेतिया की ग़ज़ल कहती है   :-

 
इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नज़ीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 

 
 

जनवरी 16, 2022

ये दीवानगी है पागलपन है ( ख़ुदपरस्ती ) डॉ लोक सेतिया

    ये दीवानगी है पागलपन है ( ख़ुदपरस्ती ) डॉ लोक सेतिया 

ज़रा सा चिंतन करोगे तो समझ जाओगे जिसको कीमती हीरे जवाहरात समझते रहे ऐसे पत्थर हैं जिनकी ज़रूरत ही नहीं थी। मूल्यवान वस्तु आपको आसानी से राह चलते नहीं मिलती है इतना सभी जानते हैं बाज़ार से खरीदने से पहले आंकलन करते हैं बढ़िया है कि घटिया और जिस कीमत पर मिल रही है क्या उतना महत्व है भी या नहीं। खाना कपड़े उपयोग का सामान आपको ढूंढना पड़ता है उचित दाम पर अच्छी गुणवत्ता और अपनी ज़रूरत को देख कर। फिर आपने इधर उधर से मिली जानकारी सोशल मीडिया की पढ़ाई से धर्म ईश्वर और जीवन की कठिन समस्याओं का हल कैसे समझ लिया। सिर्फ यही सोचकर कि इस में आपकी जेब से कोई पैसा खर्च नहीं हुआ आपको हर चीज़ लाजवाब बेमिसाल अनमोल लगती है। जबकि आपको खबर ही नहीं आपकी सबसे मूल्यवान चीज़ आपका समय खर्च नहीं व्यर्थ बर्बाद हुआ है। धन दौलत शोहरत घटती बढ़ती रहती है इक समय ही है जिसकी रफ़्तार हमेशा वही रहती है दिन रात के चौबीस घंटे हर किसी को बराबर मिलते हैं कौन सार्थक ढंग से उपयोग करता है कौन समय को गंवाता है अपने पर निर्भर है। 
 
ईश्वर को पाना चाहते हैं तो पहले समझना होगा क्या है ईश्वर , गली गली कोई नाम देकर कोई मूर्ति कोई तस्वीर लगाने से हासिल कुछ नहीं होगा। साधु सन्यासी संत महात्मा जिसको खोजते रहे जीवन भर उनको जाने कितनी तपस्या से मिला अपने भीतर और हम सोचते हैं कहीं भी राह चलते मिलेगा हमको। सिर्फ सोच लेना कि हम उसको जानते हैं समझते हैं और मानते हैं काफी नहीं है। दुनिया को दिखाने को कुछ भी कर सकते हैं आस्था विश्वास के नाम पर लेकिन खुद अपनी अंतरात्मा से छल नहीं कर सकते उसको कैसे भरोसा दिलवाओगे ईश्वर को पा लिया है। जिस ने उसको पा लिया उसको कुछ भी और पाने की ज़रूरत कहां रहती है जबकि हम कितना भी मिला और पाने की चाहत रखते हैं। अमृतकलश मिल जाये तब भी प्यासे के प्यासे रहने वाले बदनसीब लोग होते हैं। उपदेशक धर्मगुरु आसानी से मिलते हैं दुनिया में लेकिन सच्चा मार्गदर्शक सही रास्ता धर्म की राह चलने की शिक्षा देने वाला मिलता नहीं तलाश करना पड़ता है। 
 
अपने कभी अच्छी किताब अच्छा संगीत अच्छी कहानी अच्छा साहित्य तलाश किया है समझने पढ़ने सुनने को ज़िंदगी का अर्थ जानने को। टीवी पर सिनेमा में भव्य सभागार में आपको जो चमक दमक जो शोर आकर्षित करता है क्या आपको उपयोगी लगता है खुद को समझने और सही गलत की परख करने को। मिलेगा ढूंढने से जैसे पुराना फ़िल्मी संगीत आपको निराशा से निकाल रौशनी की तरफ ले जाता है। हर शब्द का अर्थ और महत्व होता है लेकिन आधुनिक काल में शब्द अर्थ को छोड़ शोर करते लगते हैं इन दोनों का अंतर समझना होगा। किसी स्कूल के बच्चों की आवाज़ें सुनते हैं तो मन को ख़ुशी मिलती है लेकिन किसी बाज़ार या मंडी का शोर आपको बेचैन करता है। पंछियों की आवाज़ सुकून देती है झरने की आवाज़ सुरीली लगती है जबकि मशीन और विधवंस होने की ध्वनि आपको विचलित करती है। पैसा कमाना कला का मकसद नहीं होता है जो कलाकार अभिनेता निर्माता निर्देशक बस पैसा कमाने को इनका इस्तेमाल करते हैं वास्तव में अपने धर्म और कर्तव्य से भटक गये हैं। 
 
अच्छा साहित्य कला संगीत कथा कहानी आपको अच्छा इंसान बनाते हैं। जो भी आपको हिंसा नफरत और आपस में भेदभाव छल कपट की तरफ ले कर जाते हैं आपके हितेषी नहीं दुश्मन हैं। सच कितना भी कड़वा लगे आपका भला करता है जबकि झूठ भले शहद से मीठा लगता है होता ज़हर की तरह हानिकारक ही है। स्मार्ट फोन से आपको फ़ायदा होता है या नुकसान आपके विवेक पर निर्धारित करता है , मुझे सब मालूम है ख़ुदपरस्ती बेहद ख़तरनाक होती है। सुकरात कहते हैं जो सोचता है मुझे कुछ नहीं पता वो कुछ जानता है लेकिन जिसको लगता है मुझे सब मालूम है वास्तव में वो कुछ भी नहीं जानता है। खुद अपने आप पर मोहित होना बड़ा रोग है जिसके शिकार अधिकांश होते हैं जिनको अपनी सूरत सबसे सुंदर लगती है। ऐसे लोग जिनको किसी व्यक्ति गुरु धर्म विचारधारा की अंधभक्ति की आदत होती है मानसिक रूप से दिवालिया होते हैं। सावन के अंधे की तरह उनको हरियाली ही हरियाली दिखाई देती है।

जनवरी 15, 2022

तुझे तेरी बेदर्दी की कसम कोरोना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

तुझे तेरी बेदर्दी की कसम कोरोना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

वास्तव में उनको ऐसी उम्मीद नहीं थी कितने चाव से कितने अपनेपन से उसको ज़र्रे से आंधी तूफ़ान बनाया था आसमान पर पहुंचाया था वही अपने पालनहार को आंखें दिखाने लगा है। किसी और दल की राजनीति के काम आने लगा है उनसे नज़रें मिलाता नहीं नज़र बचाकर उधर जाने लगा है । चूहा शेर को सताने लगा है शेर बिल्ली मौसी को बुलाने लगा है , पुराना इक नग़्मा गुनगुनाने लगा है। 
 
हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई , अरे मार डाला दुहाई। 
अभी नासमझ हो उठाओ ना खंजर , कहीं मुड़ ना जाए तुम्हारी कलाई। 
सितम आज मुझ पर जो तुम ढा रही हो , बड़ी खूबसूरत नज़र आ रही हो। 
जी चाहता है के खुद जान दे दूं , मुहब्बत में आए ना तुम पर बुराई। 
हमें हुस्न की हर अदा है गंवारा , हसीनों का गुस्सा भी लगता है प्यारा। 
उधर तुमने तीर - ए - नज़र दिल पे मारा , इधर हमने भी जान कर चोट खाई। 
करो खून तुम ना मेरे जिगर का , बस एक वार काफ़ी है तिरछी नज़र का। 
यही प्यार को आज़माने के दिन हैं , किए जाओ हम से यूं ही बेवफ़ाई। 
 
फिल्म ' लीडर ' 1964 वर्ष की से गीत याद आया है तो 2022 साल में लीडर को मतलब समझना पड़ेगा। कोरोना से उनका रिश्ता गहरा है साथ निभाया है बचाया है भंवर से और किनारे लगाया है। बन कर हमसाया नाता कितनी बार आज़माया है भला कौन उस से बढ़कर काम आया है। ज़ालिम ये सितम तो मंज़ूर नहीं मुहब्बत का ये दस्तूर नहीं रकीबों से गले मिलने लगे हो आशिक़ हैं हम तुझ से मग़रूर नहीं। मुझे तुमने समझा नहीं है दुनिया में कोई भी मुझसा नहीं है। मुझे छोड़ गैर से प्यार करने वाला दुनिया में बचता ज़िंदा नहीं है। कोरोना तुमने मेरी मुहब्बत को देखा है मेरी दुश्मनी से वाकिफ़ नहीं तुम , दोस्त आशिक़ भले नहीं सबसे बेहतर लेकिन दुश्मन होकर मुझसे बुरा कोई नहीं है। मिर्ज़ा ग़ज़लिब कहते हैं। 
 
इश्क़ मुझको नहीं वहशत ही सही , मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही। 
कत्आ कीजे न तअल्लुक हम से , कुछ नहीं है तो अदावत ही सही। 
 
कोरोना तुम मेरी पहली मुहब्बत नहीं हो कुर्सी मेरी पहली सच्ची मुहब्बत है तुम सिर्फ इक सीढ़ी हो और मुझे मालूम है ऊपर पहुंच कर सबसे पहले उस सीढ़ी को गिराना राजनीति का ज़रूरी सबक है। मेरी नहीं तो किसी और की होने को बचोगी नहीं मुझे मालूम है तुझे कब कहां कैसे ख़त्म कर मातम मनाना है जश्न मनाने की तरह। ख़िलौना समझ खेलते हैं जो अपने ख़िलौने किसी को नहीं देते कभी कोई छीनने की कोशिश करे तो तोड़ देते हैं ख़िलौने से नहीं अपनी ज़िद से प्यार करते हैं जो वो बच्चे कभी बड़े नहीं होते हैं खुद नहीं रोया करते रुलाते हैं सबको हंसने को मिट्टी से खेलना धूल उड़ाना शरारती बच्चों की फ़ितरत होती है और आदत कभी जाती नहीं है।

जनवरी 06, 2022

हाल-ए-दिल आ के पूछे हमारा जो खुद , ऐसा भी एक कोई ख़ुदा चाहिए । ( आरज़ू ) डॉ लोक सेतिया

  एक संविधान एक भगवान एक विधान ( हक़ीक़त ) डॉ लोक सेतिया

वो जो भी है किसी भी नाम से पुकारो एक ही है और उसने दुनिया भी एक ही बनाई है। जो उसको मानते हैं या जो उसको नहीं मानते हैं ऊपरवाले ने सभी को समान बनाकर सब एक जैसा दिया है। जो समझते और समझाते हैं उसकी पूजा अर्चना महिमा का गुणगान करने से जो भी पाप किये हैं क्षमा किये जा सकते हैं और मोक्ष मिल सकता है खुद गुमराह हैं। ईश्वर की अदालत में हिसाब अच्छे बुरे कर्मों का होना चाहिए दुनिया की शासकों की व्यवस्था की तरह न्याय अन्याय में पक्षपात भला कैसे हो सकता है। भगवान ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु सभी को याचक कैसे बना सकते हैं उनको अपनी बनाई दुनिया के सभी इंसानों से कुछ भी पाने की ज़रूरत कैसे हो सकती है जब विधाता सभी को सब देता है। अचरज की बात है ईश्वर को अपने होने की बात खुद कहने की चाहत भला क्यों हो सकती है उसका होना कोई छिपी हुई राज़ की बात नहीं है ज्ञान की आंखों से पता चलता है अज्ञानता की पट्टी बंधी हुई जिनकी आंखों पर उन्हीं को नज़र नहीं आता। आस्था विश्वास विवेक बुद्धि से पैदा होता है किसी के आदेश उपदेश से तोते की तरह रटने से कदापि नहीं। अगर हम अपने विवेक से चिंतन मनन कर समझेंगे तो सब समझ आएगा। धार्मिक कथाओं ग्रंथों में सही मार्गदर्शन देने का कार्य किया गया है लेकिन सोचने की बात ये है कि कोई भी आपको सही गलत रास्ता बताता है मगर उस पर चलना और आचरण कर उचित मंज़िल तक पहुंचना आपको अपने कदमों से है। उधर नहीं जाना सभी जगह लिखा हुआ होता है लेकिन किसी ने भी उस हिदायत को कभी माना ही नहीं। वास्तविकता यही है आपकी आत्मा आपका मन जानता है क्या उचित क्या अनुचित है फिर भी सभी स्वार्थ लोभ अहंकार के कारण मनमानी करते हैं और समझते हैं जैसे नियम कानून का उलंघन कर रिश्वत जुर्माना देकर बच जाएंगे पकड़े जाने पर वैसा ऊपरवाले की अदालत में भी स्तुति अर्चना चढ़ावा काम आएगा। इस से बढ़कर अज्ञानता और नासमझी क्या हो सकती है। क्या भगवान को किसी इंसान से कुछ चाहिए मतलब आप ईश्वर को देने वाले बन सकते हैं ये आपकी आस्था नहीं कुछ और है विधाता के दरबार में झूठ का कारोबार नहीं चलता है। ईश्वर की परिकल्पना करने वालों ने उसके अनेक नाम दिये और अपने अपने आराध्य की कथा लिख कर उनका गुणगान किया लेकिन उनकी कथाओं में महत्व उसी को बड़ा और महान शक्तिशाली आदर्श साबित करने की खातिर अन्य किरदारों की उपेक्षा और उनका महत्व कम करना ठीक उसी तरह है जैसे पिता को संतान सबसे बेहतर समझती है मानती है या हर माता को अपने बच्चे सबसे प्यारे लगते हैं। 
 
विधाता ने जीव जंतु पेड़ पौधे हवा पानी धरती जाने क्या क्या बनाया और इंसान को भी बनाया लेकिन उसने सभी को बंधन मुक्त रखा अगर चाहता तो सभी सिर्फ वही कर्म करते जो उसकी मर्ज़ी या अनुमति होती लेकिन तब आदमी पेड़ पक्षी जीव सभी इक मशीन होते निर्जीव निर्धारित कार्य करने को। सभी ज्ञानीजन कहते हैं इंसान कर्म अपनी मर्ज़ी से कर सकता है नतीजा ऊपरवाले की मर्ज़ी से और अच्छे बुरे कर्मों का फल भी मिलना अवश्य है देर है अंधेर नहीं है। मूर्खता है हम इंसान सीसीटीवी कैमरे से निगरानी करते हैं और समझते हैं ऊपरवाला नहीं देखता हम क्या करते हैं क्या क्या नहीं करते हैं। अपने भगवान को भी धोखा देना चाहते हैं इस से बढ़कर नादानी नासमझी क्या होगी। आदमी मतलबपरस्त होकर अपने मालिक से हेराफेरी करने की कोशिश करता है तो वो हंसता होगा कहीं से देख कर। मेरी पुस्तक ' फ़लसफ़ा ए ज़िंदगी ' की दूसरी ग़ज़ल इस विषय पर है। पढ़ते हैं फिर समझते हैं। 
 
ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।

लोग मुझे वहां तलाश करते हैं जहां मैं नहीं हूं , जबकि सब को पता है ऐसी कोई जगह नहीं जहां मैं नहीं हूं। जिस जगह सर झुकाते हैं वहां जाने कौन है। आपके दिल में रहता था निकाल दिया अब नहीं रहता उस जगह। मैं कोई चेहरा नहीं मन की आवाज़ हूं। मुझे आज़माना मत मैं आपका इम्तिहान नहीं हूं। सिर्फ नज़र चाहिए मैं दिखाई दे जाऊंगा छुपा हुआ नहीं हूं। जिनको मुझ पर यकीन नहीं मानते नहीं , मैं भी कहता हूं कि मैं नहीं हूं। बस सभी खुद अपने आप को पहचान लें काफी है आस्तिक नास्तिक के भंवर में हिचकोले खाती नैया नहीं तूफान सी ज़िंदगी को पार कर किनारे लगने की कोशिश की ज़रूरत है।
 
 
हमारे देश का एक संविधान है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आधारित है और धर्मनिरपेक्ष है सभी को इक समान अधिकार आज़ादी से जीने न्याय पाने विचारों को अभिव्यक्त करने के देने को वचनबद्ध है। कोई भी शासक कोई सरकार संविधान से ऊपर नहीं हो सकती है। इसलिए जिस किसी की मानसिकता संविधान के विपरीत होती है उनको न्याय और संवैधानिक संस्थाओं का आदर कर उनके अनुरूप कार्य करना पड़ता है केवल बहुमत हासिल करने से संविधान से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं मिल सकती है। खेद का विषय है कि बहुत लोग देश और संविधान से अधिक किसी व्यक्ति दल अथवा विचारधारा को महत्व देने लगे हैं। ऐसे में शासक और अधिकारी सत्ता का दुरूपयोग कर देश की व्यवस्था से खिलवाड़ कर अपने समर्थक के अपराधों को अनदेखा और विरोधी को निरपराध सज़ा देने जैसा कार्य करते हैं। हर नागरिक अपने विचार और धार्मिक आस्था पर चल सकता है लेकिन किसी को भी किसी अन्य के विचारों से असहमत होने पर नफरत या हिंसा की अनुमति नहीं मिल सकती है। देश का कानून न्यायपालिका सबको समान मानकर सुरक्षित समाज बनाने को प्रतिबद्ध हैं। मेरा हमेशा से यही कहना रहा है इक शेर मेरी ग़ज़ल का है। 
 

                 हाल-ए-दिल आ के पूछे हमारा जो खुद  , 

                     ऐसा भी एक कोई ख़ुदा चाहिए ।



दिसंबर 27, 2021

समाज को किताबों से जोड़ना ( मेरा मकसद ) डॉ लोक सेतिया

  समाज को किताबों से जोड़ना ( मेरा मकसद ) डॉ लोक सेतिया 

   हर किसी का कोई मकसद अवश्य होना चाहिए। लिखते लिखते उम्र बिताई है अब आगे बढ़कर कुछ नया सार्थक करना चाहता हूं। लेखक का साहित्य सृजन नाम शोहरत हासिल करने को नहीं होता है अपने समय की वास्तविक तस्वीर दिखाई देनी चाहिए। किताबों से पढ़ने से लगाव ही नहीं मुहब्बत होनी ज़रूरी है अन्यथा हमारी जानकारी और विवेकशीलता कुंवे के मेंढक की तरह हो सकती है। सोशल मीडिया की पढ़ाई कुछ ऐसी ही है। कोई आपको विवश नहीं कर सकता अगर आपको प्यास नहीं है पढ़ने की आंखों पर कोई पट्टी बांध रखी है या किसी चश्मे से देखते हैं तो सावन के अंधे को हरियाली नज़र आती है जैसी हालत बन जाती है। जाने क्यों हम सदियों से चली आई मान्यता को भुला बैठे हैं कि किताबें आपका सच्चा दोस्त हितैषी और मार्गदर्शक होती हैं। अपनी संतान आने वाली पीढ़ियों को सही मार्ग पर चलकर उच्च आदर्शों और नैतिक मूल्यों का पालन करने का सबक सिखाना है तो किताबों से जोड़कर ही संभव है। 
 
   लिखना कभी भी खालाजी का घर नहीं रहा है सच को सच झूठ को झूठ कहना कांच के टुकड़ों पर चलना है और अन्याय अत्याचार असमानता के लिए निडरता पूर्वक विरोध करते लिखना तलवार की धार अपने सर पर लटकती अनुभव होती है। सर पर रोज़ कफ़न बांध कर निकलते हैं , वो लोग जो सच की राह चलते हैं। किताबों का स्वभाव है लिखा हुआ जो कभी बदलता नहीं है जो कहती हैं उस बात से मुकरती नहीं कभी किताबें , दुनिया में दोस्त मतलब की खातिर मुकर जाते हैं सिर्फ किताबें हैं जिनको कुछ फर्क नहीं पड़ता। आपसे नाराज़ नहीं होती न कोई उम्मीद होती है ज्ञान देकर कुछ हासिल करने को । मुंशी प्रेम चंद खुद को इक मज़दूर समझते थे कलम का और जिस दिन कुछ लिखा नहीं उनका कहना था कि मुझे रोटी खाने का अधिकार नहीं। ये संकल्प ही लेखक को अच्छा साहित्य रचने के काबिल बनाता है। मैं क्या लिखता हूं से अधिक महत्वपूर्ण है क्यों लिखता हूं। ये मेरा आजीविका का साधन नहीं बल्कि घर फूंक तमाशा देखना है। 
 
  लिखने की शुरआत हुई इक पत्रिका का हर अंक में इक कॉलम छपता था उसको पढ़कर। संपादक लिखते थे अगर आप शिक्षित हैं तो सिर्फ अपना कारोबार नौकरी कर घर बनाना शादी कर संतान को जन्म देना सुखी जीवन बिताना काफी नहीं है।  ये सब अनपढ़ ही नहीं पशु पक्षी जीव जंतु तक कर लेते हैं पढ़ लिखकर आपको अपने समाज और देश को बेहतर बनाने को बिना किसी स्वार्थ कुछ योगदान देना ही चाहिए। उनकी कही बातों में इक विकल्प ये भी था समाज की समस्याओं पर ध्यान देकर उनके समाधान की कोशिश करना। मेरा लेखन जनहित की बात उठाना जहां जो अनुचित दिखाई दे उसका विरोध करना इक जूनून बन गया। सामाजिक विडंबनाओं को देख ख़ामोश रहना नहीं सीखा जब तक लिखता नहीं सांस लेना कठिन महसूस होता। कठिनाईयां हर क्षण सामने खड़ी थीं अधिकांश लोग मुझे क्या कुछ भी होता रहे सोच कर अनदेखा करते हैं। जब तक खुद अपनी समस्या नहीं हो सब कहते हैं ये सामान्य बात है ऐसा हर जगह घटित होता है बस अपना घर सुरक्षित होना ज़रूरी है। अनुचित का विरोध करना लोग नासमझी मानते हैं। 
 
साहित्य की हर विधा में मेरा लेखन बड़े कथाकारों रचनाकारों के सामने भले सामन्य लगे लेकिन इसको पढ़कर पाठक को हमारे युग वर्तमान काल की सही तस्वीर अवश्य नज़र आएगी ये यकीन है। और यही मेरे लिए सार्थक लेखन की कसौटी है। अगर मेरी ग़ज़ल , कविता , व्यंग्य रचनाएं , कहानियां , सामाजिक विषयों पर तार्किक ढंग से लिखे आलेख इस पर खरे उतरते हैं तो ज़िंदगी की मेरी सबसे बड़ी पूंजी है ये।
 
  

दिसंबर 21, 2021

बुरा हूं मगर इतना बुरा नहीं ( ब्यान अर्ज़ है ) डॉ लोक सेतिया

   बुरा हूं मगर इतना बुरा नहीं ( ब्यान अर्ज़ है ) डॉ लोक सेतिया 

मैंने कब कहा कि मैं अच्छा हूं , बुरा जो देखन मैं चला , बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना , मुझसे बुरा न कोय। लेकिन इतना भी बुरा नहीं जितना साबित किया गया मुझको। जुर्म करता तो सज़ाएं मंज़ूर भी कर लेता पर बेगुनाही को भी जुर्म समझ सूली पर चढ़ाना भला कैसे चुपचाप इंसाफ़ समझता ज़ुल्म को। क़ातिल को दुआ देने की रस्म आखिर कोई कब तक निभाए। बात मेरी भी पहले सुनलो फिर सज़ा दो मेरे गुनाहों की। दोस्ती को ईबादत समझा जुर्म तो है इंसानियत को धर्म माना बगावत ही तो की है झूठ के सामने सर नहीं झुकाया सच की ख़ातिर जान तक दे सकता हूं सियासत से अदावत ही तो है। ज़माना हर रोज़ बदलता है चाल अपनी हम नहीं रुकते न दौड़ते न कभी थकते चलते हैं अपनी रफ़्तार से आदत ही तो है। हम तो चलाते हैं कलम शमशीर से डरते नहीं , कहते हैं जो बात कहकर अपनी बात से मुकरते नहीं। जाने कैसे समाज की बनी बनाई आसान राहों से अलग नई रह बनाकर चलने की चाह दिल दिमाग़ पर सवार हुई और कांटो पर तपती ज़मीन पर पत्थरीली राहों बढ़ता रहा। सच का दर्पण समाज का आईना और अभिव्यक्ति की आज़ादी के झंडाबरदारों से निडरता पूर्वक आवाज़ उठाने का सबक सीख लिया तो वापस मुड़कर नहीं देखा जबकि इन सभी बातों का दम भरने वाले खुद बाज़ार में बिकने लगे ज़मीर को मारकर। मैंने उन्हीं से सवाल पूछने का जुर्म भी किया है। बिका ज़मीर कितने में जवाब क्यों नहीं देते , सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते। जुर्म-बेलज्ज़त साहित्य समाज की सच्ची तस्वीर दिखलाना कर बैठे और हर किसी की निगाह में खटकने लगे हैं। 
 
चाटुकारिता करना नहीं पसंद और सत्ता से टकराना उनकी वास्तविकता और इश्तिहार का विरोधाभास सामने लाना तलवार की धार पर कांच के टुकड़ों पर चलना जैसा होना ही था। सीता की तरह अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ता है कौन किस से फ़रियाद करे गुनहगार बच जाते हैं बेगुनाह फांसी चढ़ते हैं। फैसले तब सही नहीं होते , बेगुनाह जब बरी नहीं होते। जो न इंसाफ़ दे सकें हमको , पंच वो पंच ही नहीं होते। सोचना ये लिखने से पहले , फैसले आख़िरी नहीं होते। उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ , 'लोक ' राजा को वो कहता है निपट नंगा है। अपराध है राजा नंगा है बोलना कहानी पुरानी अभी तक हक़ीक़त है। ये सभी अल्फ़ाज़ ग़ज़ल के हैं मेरी लिखी हुई , पहली कविता की शुरुआत जिन शब्दों से हुई उनकी बात करते हैं। पढ़कर रोज़ खबर कोई मन फिर हो जाता है उदास। कब अन्याय का होगा अंत , न्याय की होगी पूरी आस।  कब ये थमेंगी गर्म हवाएं , आएगा जाने कब मधुमास। कैसी आई ये आज़ादी , जनता काट रही बनवास। ये तहरीर है इक़बाल ए जुर्म है। मैंने उनको आईना दिखाने की जुर्रत की है जो आईनों का बाज़ार लगाकर दुनिया को दिखाते हैं बदशक़्ल है मगर खुद अपने आप को नहीं देख सकते । अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग , आईने से यूं परेशान हैं लोग। शानो-शौकत है वो उनकी झूठी , बन गए शहर की जो जान हैं लोग। मैंने अपना जुर्म कबूल कर लिया है मुश्क़िल उनकी है जिन्होंने कटघरे में खड़ा किया है उन नाख़ुदाओं ने कश्ती को डुबोया है। चंद धाराओं के इशारों पर , डूबी हैं कश्तियां किनारों पर। हमे सूली चढ़ा दो हमारी आरज़ू है ये , यही कहना है लेकिन मुझे कहना नहीं आता।
 

 

दिसंबर 17, 2021

किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक ( कागज़ कलम स्याही पुस्तक का सफर ) डॉ लोक सेतिया

          किस को सुनाएं से सुन ज़माने तक 

             ( कागज़ कलम स्याही पुस्तक का सफर )

                                डॉ लोक सेतिया 

शीर्षक संक्षेप में नहीं संभव इस पोस्ट का क्योंकि 1973 में पहली ग़ज़ल कही थी ' हम अपनी दास्तां किस को सुनाएं , कि अपना मेहरबां किस को बनाएं '। करीब आधी सदी का लंबा सफर साहित्य से चाहत का मुहब्बत से जूनून होने तक का जिया है हर दिन परस्तिश की है। किताबें छपवाने की शुरुआत देर से सही मगर सोच विचार कर करने चला हूं ताकि सिर्फ मेरी ही नहीं सभी लिखने वालों की मुश्किलों दुश्वारियों और हौंसलों की बुलंदी से थकान तक का एहसास पाठक वर्ग को हो सके। जाने कितने सोच विचार अंतर्द्वंद से गुज़रते हुए कलम हाथ में उठाते हैं विचार भावना को शब्दों में पिरोना रचना का आंखों से मस्तिष्क और रूह तलक पहुंचना सिर्फ रचनाकार जानता है तपस्या क्या होती है। आपको ग़ज़ल की 151 रचनाएं पढ़ने में कुछ घंटे लगेंगे लिखने में सालों हर हर्फ़ के मायने समझने में बीते हैं। लिखना ऐसे समय में जब हर कोई सोशल मीडिया टीवी चैनल अनगिनत ऐप्प्स और गूगल पर दुनिया देखना समझना चाहता है साहस का कार्य है। इसलिए पुस्तक से साहित्य से समाज को जोड़ना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि ज़िंदगी की वास्तविकता और सामाजिक समस्याओं की वास्तविक भावनाओं को महसूस करने को यही एक विकल्प बचा लगता है। किताब से अच्छा दोस्त कोई नहीं दुनिया में और अच्छे साहित्य से बढ़कर मार्गदर्शन कोई अन्य नहीं कर सकता है। पुस्तक के पन्ने निर्जीव वस्तु नहीं होते हैं पाठक से संवाद करते हैं कभी हमदर्द लगते हैं कभी निराशा के अंधकार से बाहर निकाल रौशनी से मिलवाते हैं। किताबें बंद अलमारी की शान बढ़ाने को नहीं हो सकती हैं बेशक इधर बहुत मशहूर जाने माने लोग सिर्फ खुद के गुणगान जीवनी और अधिकांश अनावश्यक घटनाओं की व्यर्थ चर्चा कर ख्याति हासिल करने को इसका अनुचित उपयोग करते हैं। और सरकारी संस्थान संघठन ऊंचे दाम खरीद लायब्रेरी की शोभा बढ़ाते हैं। सच्चा कलम का सिपाही अपनी नहीं समाज की बात कहता है।  

ग़ज़ल संग्रह के बाद कविताओं की उसके बाद व्यंग्य रचनाओं पर आधारित पुस्तक और चौथी किताब ज़िंदगी की कहनियों की हाज़िर करनी है। मकसद दौलत शोहरत पाना कदापि नहीं है बल्कि आपको खुद अपने आप से मिलवाने का उद्देश्य है। ये आपको निर्णय करना है खुद से नज़रें मिलाना चाहते हैं अथवा नज़र बचाना चाहेंगे। बुद्धिजीवी लोगों से समीक्षा लिखवाना अनावश्यक होगा पाठक को रचनाएं खुद से जुड़ती हुईं लगती हैं और सामाजिक सरोकार की चिंता जागृत करने को सफल होती हैं तभी सार्थकता होगी रचनाओं की। इंतज़ार नहीं स्वागत नहीं करें लेकिन निवेदन है पुस्तक जिस भी किसी लेखक की हो आपको मिलती है तो उसको रद्दी की टोकरी में फैंक कर सरस्वती का निरादर कदापि नहीं करें। पढ़ना नहीं पसंद तो जैसे अख़बार पत्रिका के संपादक खेद सहित लौटाते हैं ताकि अन्य किसी के लिए उपयोगी हो सके जैसा कदम उठाना बुरा नहीं है। लिखने वालों को इसकी आदत होती है दस जगह भेजी रचना एक जगह छप जाती है तब भी ख़ुशी मिलती है बेशक रॉयल्टी तो क्या उचित मानदेय भी हमेशा नहीं मिलता। 
 

 

दिसंबर 15, 2021

ग़ुलामी को बरकत समझने लगे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ग़ुलामी को बरकत समझने लगे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

शहंशाह के चाहने वाले ग़मज़दा हैं उदास हैं बड़े बेचैन हैं। कहते हैं सरकार इतनी कठोर तपस्या किसलिए। पहले जितने शासक हुए हैं सभी ने मौज मस्ती सैर सपाटे शाही अंदाज़ से सजना संवरना रोज़ मनचाहा खाना जश्न मनाना जैसे ऐशो आराम पर खज़ाना लुटाया है। सरकार आपने बस इक धोती कुर्ते एक समय पेट भरना एक समय उपवास रखना गांधी लालबहादुर की राह चल सादगी से रहकर देशसेवा की मिसाल कायम की है। अपने अपनी शान दिखाने को कोई महल नहीं बनाया है गरीबी से नाता छोड़ा नहीं हमेशा इक झौंपड़ी में घर बसाकर गुज़ारा किया है। अफ़सोस चाहने वालों को इस बात का है कि जिन की खातिर जनाब कांटों का ताज पहन शूलों भरे सिंघासन पर विराजमान हैं वही देशवासी आपको बुरा भला कहते हैं। उनको नहीं पता आपको सत्ता की रत्ती भर चाहत नहीं है आप तो भिखारी बनकर जीवन बिताते रहे हैं बस बीस साल से कुर्सी से रिश्ता इस तरह निभाया है जैसे कोई आशिक़ अपनी महबूबा से दिल से प्यार करता है तो किसी और की कभी नहीं होने देता। ग़ुलाम लोग चाटुकारिता से बहुत आगे बढ़कर शहंशाह को अपना आराध्य और खुद को उपासक मानते हैं। उनके दिलो-दिमाग़ में चिंता और डर महसूस होने लगा है कहीं देश की नासमझ जनता उनको चुनाव में पराजित करने का गुनाह नहीं कर बैठे। ठीक है इस से पहले बड़े बड़े अहंकारी तानाशाहों को देशवासियों ने उनकी सही जगह पहुंचाया है धूल चटाई है। लेकिन गुलामों को डर है उनका भगवान सत्ता से बाहर हुआ तो क्या होगा वो घड़ी क़यामत की घड़ी होगी। 
 
गुलामों की हालत ऐसी है कि उनको लगता है देश को आज़ादी पहले नहीं मिली थी अब जब से इस शासक को सत्ता हासिल हुई तब मिली है आज़ादी। देश की आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले सभी जान की कुर्बानियां जाने क्यों देते रहे। उस इतिहास को मिटाना चाहते हैं जिस में ऐसे कई नाम आते हैं जिन्होंने आज़ादी की जंग में विदेशी शासकों का साथ दिया आज़ादी की ख़ातिर लड़ने वाले शहीदों की मुखबरी और जासूसी करते रहे लेकिन इस शासन के लोगों को आदर्श लगते हैं। माजरा कुछ और है शहंशाह के दरबार में सजाएं इस कदर खूबसूरत मिलने लगी हैं कि हर कोई गुनहगार होने को बेताब है। सब अपने गुनाहों का इकरार करने लगे हैं ग़ुलामी को बरकत समझने लगे हैं। 
 

 

दिसंबर 14, 2021

हमारी मज़बूरी है लिखना ( कलम का सिपाही ) डॉ लोक सेतिया

  मुश्किल चुप रहना आसां नहीं कहना ( उलझन ) डॉ लोक सेतिया 

लिखने का मकसद क्या है सवाल पूछते हैं सभी दोस्त अपने जान पहचान वाले अजनबी लोग यहां तक बेगाने भी। हर किसी का अपना अलग नज़रिया है कोई समझता है पैसा मिलना चाहिए वर्ना किसलिए जोखिम उठाना सच लिखना और दुश्मन बना लेना ज़माने भर को। किसी को लगता है छपने पर नाम शोहरत मिलती है समाज में बुद्धिजीवी कहलाने से रुतबा बढ़ता है। किताबें छपने पर साहित्यकार की उपाधि हासिल कर ख़ास होने का एहसास मिलता है सरकारी संस्थाओं में जगह ईनाम पुरूस्कार पाने की कतार में खड़े होने का सौभाग्य मिलता है। ये सभी कारण लिखने की वजह नहीं बन सकते और इन सब की खातिर लिखने वाला कलमकार नहीं होता है। लेखक इक सिपाही होता है कलम का सिपाही जो सामाजिक सरोकार और सच्चाई की खातिर निडरता पूर्वक जीवन भर अपनी अंतिम सांस तक लड़ता है तलवार के साथ अन्याय अत्याचार के विरुद्ध देश समाज की वास्तविकता को उजागर कर आडंबर विडंबनाओं विसंगतियों पर चोट करने को। जब कोई लेखक कलम उठाता है उसका दायित्व बन जाता है सार्थक लेखन करना अपना धर्म निभाना अन्यथा संकीर्णता पूर्ण रचनाकार आखिर रोता है जैसा नौवें सिख गुरु तेगबहादुर जी अपनी बाणी में कहते हैं , करणो हुतो सु ना कियो परियो लोभ के फंद , नानक समियो रमी गईयो अब क्यों रोवत अंध। थोड़ा इस विषय को विस्तार से समझते हैं अन्य सभी लोगों को सामने रखते हुए। 
 
शुरुआत आदमी से करते हैं इंसान को इंसानियत और सभ्य समाज की संरचना के लिए जैसा आचरण करना चाहिए वैसा नहीं उसके विपरीत करने पर स्वार्थी खुदगर्ज़ और असमाजिक पापी अधर्मी समझा जाता है। सरकार राजनेता अधिकारी कर्मचारी अपना कर्तव्य देश कानून संविधान की मर्यादा का पालन कर नहीं करते हैं तो उनको पद पर रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। हालत कितनी खेदजनक और भयभीत करने वाली दिखाई देती है जब ये खुद को देश जनता का सेवक नहीं मालिक समझने लगते हैं। आज़ादी के बाद सामन्य नागरिक की हालत बिगड़ती गई है और मुट्ठी भर धनवान एवं राजनीति करने वालों धर्म के झण्डाबरदार बने लोगों तथा विशेषाधिकार प्राप्त टीवी चैनल अख़बार के सच के पैरोकार होने का दावा करने वाले शक्तिशाली बनकर अन्य लोगों की आज़ादी और जीने के अधिकारों का हनन करते हुए संकोच नहीं करते बल्कि अधिकांश गर्वानित महसूस करते हैं सबको जूते की नोक पर रखते हुए। कोई डॉक्टर किसी रोगी को दवा ही नहीं दे तो क्या रोगी की मौत का मुजरिम नहीं हो सकता , बस यही किया है देश की सरकारों ने अधिकारियों ने धर्म उपदेश समाज सेवा के नाम पर आडंबर करने वाले लोगों ने। किसी शायर ने कहा है ' वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता , तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं। '
 
वपस लेखन धर्म की बात पर आते हैं। कोई पढ़ता है चाहे नहीं कोई अखबार पत्रिका छापता है या नहीं हमारा कार्य है अपने समय की वास्तविकता को सामने लाने आईना बनकर जो अच्छा बुरा है उसे दिखलाना। कायर बनकर कलम नहीं चलाई जा सकती है। घर फूंक तमाशा देखना पड़ता है कबीर नानक जैसे संत शिक्षा देते हैं। चाटुकारिता नहीं करना काफी नहीं है आधुनिक काल में दुष्यन्त कुमार होना ज़रूरी है , पहली ग़ज़ल का पहला शेर कहता है ' कहां तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए , कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए '। आखिरी ग़ज़ल का शेर भी ज़रूरी है , ' मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं , मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं '। शासक आपको दिलकश खूबसूरत चकाचौंध रौशनियों की दास्तां सुनाते हैं जिनसे करोड़ों गरीबों के घरों में उजाला नहीं हो सकता है। सपनों की दुनिया से बाहर निकलना होगा सपनों का स्वर्ग किसी काम नहीं आता हमको जिस देश दुनिया धरती पर रहना है जीने को उसका अच्छा सुरक्षित और सबके लिए एक समान होना ज़रूरी है। बड़े संतों महात्माओं बड़े आदर्शवादी नायकों ने सदा यही कल्पना की थी भारत देश ही नहीं दुनिया को शानदार मिल जुलकर प्यार से रहने वाली जगह बनाने को जिस में छोटा बड़ा अमीर गरीब का अंतर नहीं हो भेदभाव की दीवार नफरत की भावना नहीं हो। 
 
साहित्य हमेशा सामाजिक पतन को रोकने और उत्थान की राह बनाने का कार्य करता रहा है। मुंशी प्रेम चंद की विरासत को आगे बढ़ाना है अपनी महत्वांक्षाओं को त्याग कर। हम किसी और पर दोष देकर बच नहीं सकते हैं खामोश रहकर ज़ालिम के डर से अथवा अपने लोभ लालच स्वार्थ से झूठ को सच बताना अपनी अंतरात्मा अपने ज़मीर से धोखा करना ज़िंदा रहते लाश बनना होगा। चलती फिरती लाश होना किसी कलम के सिपाही को स्वीकार नहीं हो सकता है। साहित्य कलम की उपासना करते चालीस साल हो चुके हैं अब जाकर पुस्तक छपवाने की शुरुआत करते हुए इस विषय पर चिंतन करना उचित लगा है। पुस्तकें पाठक को पसंद आएंगी खरीदेंगे या मुमकिन है पाठक को मनोरंजन रोचकता की चाह होने से साहित्य की गंभीर रचनाओं समाजिक वास्तविकता से अधिक काल्पनिक विषयों का आनंद भाएगा ये मेरी चिंता का विषय नहीं है। मुझे लिखना है और सिर्फ वास्तविकता को उजागर करने की कोशिश करनी है। और आधुनिक समय की सामाजिक वास्तविकता बेहद कड़वी है उसको मधुर बनाकर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।