अप्रैल 01, 2026

POST : 2074 मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है हमारे अपने देश का ही शख़्स है जिसने कभी मांगा नहीं लेकिन सभी जानते है उस के रहते भला कोई और इस कीर्त्तिमान का दावेदार होने की सोच भी सकता है ।  कोई और दुनिया भर को उल्लू बना सकता है भगवान होने का भरोसा किसी और में कभी दिखाई नहीं देता है खुद भगवान पछताते हैं ऐसे व्यक्ति को धरती पर भेजा भी तो भारतवर्ष में जन्म दिया लेकिन उसको लगता है उसका जन्म नहीं हुआ अवतार लिया है ।  बस इक वही अजर अमर है बाकी सब  संसार नश्वर है उसको रहना है और कण कण में दिखाई देना है सिर्फ इसी मकसद से उसने अपने महिमामंडन प्रसार प्रचार पर धन पानी की तरह बहाया है ।  उसने जो भी चाहा है पाया है इस ख़ातिर उसने क्या क्या नहीं गंवाया है खुद नैया पार लगाने को खेवनहार को भी डुबोया है ।  कौन है जो हंसता दिखाई देता है संविधान लोकतंत्र क्या सभी का रोना है किसने रोया है बस उसकी अश्रुधारा ने दुनिया को डुबोया है । उसकी कटु मुस्कान पर कौन फ़िदा नहीं होता वो नहीं चाहता तो देश दुनिया में कोई हादसा नहीं होता , काश कोई आपसा कभी नहीं होता ।  इक वही शाम का जैसे बढ़ता हुआ साया है काली घटा बनकर आसमान पर छाया है आपको समझ कभी नहीं आती उसकी क्या माया है । कोई जाल उसने बिछाया है हर मछली ने खुद कांटा निगला है उसको अपना रक्षक घोषित किया तब ज़िंदा रहने का अवसर पाया है ।  ज़हर सभी को अमृत बताकर पिलाया है जाने कैसा मज़ा है जो हर कोई मौत को खुद बुला लाया है । आज पहली अप्रैल पर हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है ख़ुशी मनाओ दुनिया को मूर्ख बनाने का कीर्तिमान हासिल कर उसने सभी को बदलाली में भी हंसना सिखलाया है आपदा को अवसर घोषित कर उसने इक और महान कारनामा कर दिखलाया है । कवियों ने जो पढ़ा नीचे लिखा है खूब लुत्फ़ उसने उठाया है । 
 
   

हैरान हैं  भगवान ( क्षणिकाएं : हास्य - व्यंग्य  ) 

क्या ऐसे होते हैं इंसान 
क्या यही है शराफ़त की पहचान , 
चोर से कहते चोरी कर कोतवाल से भी पकड़वाते , 
कोयला करने लगा है हीरे की पहचान । 
 
भाई से भाई , बेटे से बाप की करवाते लड़ाई ,
आफ़त खुद जिसने बुलाई 
शामत उसकी आई , 
खाते सभी से खूब मलाई , 
कहना मत उनको हरजाई आदत है बनाई ।  
 
बेच ईमान दौलत कितनी कमाई , 
जिसकी खाई उसकी बजाई 
दो तरफ़ा है किरपान ,   
मान न मान सभी लोग नादान 
बस इक अपनी आन बान शान । 
 
कौन किसका है कद्रदान , 
मिलता है सभी को जीने का वरदान 
मीठा ज़हर पहचान , 
किस किस की ऊंची है दुकान 
फ़ीके फ़ीके सभी पकवान ।

अपने बनकर समझते 
सभी को पायदान ,
जाके पैर न फटी बिवाई , 
वो क्या जाने पीर पराई ,
बिछा हुआ क़ालीन नीचे छुपा 
सभी कूड़ा कर्कट बाहरी शान ।  
 
ऊपर बैठा हुआ हैरान 
कोई भगवान ,
सच और झूठ की मिलावट 
करते हैं नासमझ नादान ,
पर उपदेश कुशल बहुतेरे , 
करते दुनिया पर कितने एहसान । 
 
 

           क्षणिकाएं ( हास्य - व्यंग्य कविताएं ) 

सरकार है कायदा है कानून संविधान है 
भूखों का पेट भरने को रोटी नहीं है , पर 
भूखे मर जाने पर मिलता सभी को बराबर 
लाखों की मुआवज़ा राशि का प्रावधान है ।  
 

2  

बड़ा ही निराला अदालती खेल है
अनगिनत बेगुनाह हैं कैदी जेलों में  
हमेशा से गुनहगारों के लिए मिलती 
बचने को अग्रिम ऐंटिसिपेटरी बेल है ।    
 

लोकतंत्र भी इक खेल तमाशा है 
कभी तोला है तो कभी वो माशा है 
मुंह में पानी है नेताओं प्रशासन के  
जनता क्या है बस मीठा बताशा है । 
 

मंच पर भाषण देते समय जनाब 
चिंता भ्रष्टाचार पर जतला रहे थे 
दलालों को इशारों इशारों में ही 
घर शाम को अपने बुला रहे थे । 
 
 

राजनेता (  व्यंग्य -  कविता  ) 

दफ़्न रूह की आवाज़ कर गया 
जी रहा मगर इक शख़्स मर गया ।  
 
ऐतबार उसका ,  क्या करें भला 
और कुछ कहा , कुछ और कर गया ।  
 
मांगता सदा , ख़ैरात वोट की 
जीत कर न जाने फिर किधर गया ।  
 
रहनुमा बनाकर भूल हमने की 
देश लूटकर घर बार भर गया । 
 
क्या नशा चढ़ा सत्ता जो मिल गई 
ज़ुल्म की हदों से , है गुज़र गया । 
 
बेचने लगा अपना इमान तक 
देख कर उसे शैतान डर गया । 
 
मैं ग़ुलाम हूं  , सरकार आप हैं 
कह के बात ' तनहा ' ख़ुद मुकर गया ।  
 
 
 

   सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) 

 
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में  
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
 
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
 
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में 
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
 
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना 
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में 
 
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां 
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में 
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है 
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में 
 
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना 
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में  
 
 


 

मार्च 22, 2026

POST : 2073 आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

        आदेश शैतान का ( नई व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया  

शैतान की पहचान करना सबसे बड़ी चुनौती है शैतान आदमी के भीतर रहता है कभी भी अपनी ताकत दिखला सकता है । भगवान तक का शैतान पर कोई बस इसीलिए नहीं चलता है क्योंकि भगवान ने जब दुनिया बनाई तब कुछ नियम निर्धारित किए थे जिस में एक नियम ये भी था जो हमेशा रहेगा स्वयं भगवान भी जिसको बदल नहीं सकता है , वो है आदमी को अपने विवेक से कुछ भी करने की अनुमति दी गई थी । तभी लोग भला बुरा जैसा भी आचरण करते हैं भगवान किसी को रोकता टोकता नहीं है , जैसा कुछ लोग बतलाते हैं उसकी मर्ज़ी से सभी कुछ होता है सच नहीं भ्रामक है शायद उन्होंने ऐसी बात किसी ख़ास मकसद से ही फैलाई है जबकि वास्तव में खुद उन्हीं पर भगवान का कोई अंकुश नहीं दिखाई देता है । शैतान की उलझन है कि उसको लगता है वही सबसे समझदार और ताकतवर भी है इसलिए दुनिया को बदलना अथवा सुधारना चाहता है जो उसको यकीन है गलत ढंग से चलती है । लेकिन आपको मालूम ही नहीं होता कब कोई किस रूप में आपको मिलता है , कोई पिता कोई दोस्त कोई परिजन कोई अन्य आपके संपर्क में रहने वाले को अनुभव होता है कि जैसा उसको चाहिए आप उस तरह से नहीं चलते हैं । ऐसे में आपको डांटकर या फिर फटकार लगाकर सुधर जाने को कहता है अन्यथा आपको विवश कर सकता है राह रंग ढंग बदलने को । जब कोई नहीं मानता उसकी बात तब शैतान अपने असली रूप में प्रकट होता है , आपके घर से गांव से शहर से राजधानी तक वही रहता है । आजकल दुनिया में तमाम ऐसे शासक बन गए हैं जिनको सभी देशों को उस राह पर लाना है जो वो बताते हैं समझाते हैं डराते हैं प्रलोभन भी देते हैं । शैतान शुरुआत में शराफ़त का इक पर्दा लगाए रखते हैं वार्तालाप समझौता अपनी शर्तों पर बंधने को आपकी भलाई और सुरक्षा से जोड़ते हैं । अभी कोई जल्दबाज़ी मत करना उसको लेकर कोई छवि बनाने में पहले अपना चेहरा देखना कोई शैतान उस के पीछे भी छुपा हुआ है जो तमाम लोगों को नासमझ मानता है और खुद को सबसे काबिल और जानकार । 
 
शैतान को समझाना किसी काम नहीं आता है जो उसको समझाने की कोशिश भी करता है शैतान उसको अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है । लेकिन आपको शैतान से टकराना नहीं है बचना है उस से दुरी बना कर चुपचाप अपने रास्ते चलना है । चिंता मत करना ऐसी राहों पर शैतान की शैतानियत बेअसर साबित होती है उसको उसकी डगर जाने देना उचित है आपको उसकी तरफ देखना नहीं है । शैतान से कोई समझौता कभी नहीं किया जा सकता है उसका कोई ऐतबार नहीं है उसकी चाल में फंसकर लोग अचानक  औंधे मुंह गिर जाते हैं । ज़िंदगी भर आपको ऐसे लोग मिलते रहते हैं जिनका कहना होता है वो कभी किसी का भी बुरा नहीं करते हैं लेकिन उनको सभी लोग बुरे दिखाई देते हैं उनको किसी और में कुछ अच्छाई नज़र ही नहीं आती है । आपको समझ आया होगा आसपास कितने लोग ऐसे समाज सुधारक बने फिरते हैं उनको किसी का  उस ढंग से जीना पसंद नहीं जैसा उनको लगता है सही है दुनिया से लेकर अपने करीब तक सभी को अपने ही रंग में रंगना चाहते हैं । उनका अपना कोई रंग नहीं होता है गिरगिट भी उन जैसा रंग नहीं बना सकती है ये रंग बदलती दुनिया है जिस में सभी अपने बालों पर नहीं चेहरे पर ख़िज़ाब लगाए हुए हैं । अब इक ग़ज़ल और इक कविता से बात को विराम देते हैं ।  
 
 

यहां तो आफ़ताब रहते हैं ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

यहां तो आफताब रहते हैं
कहां , कहिये ,जनाब रहते हैं ।

शहर का तो है बस नसीब यही
सभी खानाखराब रहते हैं ।

क्या किसी से करे सवाल कोई
सब यहां लाजवाब रहते हैं ।

सूरतें कोई कैसे पहचाने
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं ।

पत्थरों के मकान हैं लेकिन
गमलों ही में गुलाब रहते हैं ।

रूह का तो कोई वजूद नहीं
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं ।  
 
 

      ख़ुदा से बात ( कविता )

      डॉ लोक सेतिया

कहते हैं लोग
दुनिया में अच्छा-बुरा
जो भी होता है
सब होता है तेरी ही मर्ज़ी से ।

अन्याय अत्याचार
धर्म तक का होता है
इस दुनिया में कारोबार ।

तेरी मर्ज़ी है इनमें
मैं कर नहीं सकता
कभी भी स्वीकार ।

सिर्फ इसलिए कि याद रखें
भूल न जाएं तुझको
देते हो सबको परेशानियां
दुःख दर्द समझते हैं
दुनिया के  कुछ लोग ।

ऐसा तो करते हैं
कुछ  इंसान
कर नहीं सकता
खुद भगवान ।

खुदा नहीं हो सकता
अपने बनाए इंसानों से
इतना बेदर्द
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़ ।

लगता है
कर दिया है बेबस तुझको
अपने ही बनाए इंसानों ने
जैसे माता पिता
हैं यहां बेबस संतानों से ।

अपने लिए सभी
करते तुझ से प्रार्थना
मैं विनती कर रहा हूँ
पर तेरे लिए ।

बचा लो इश्वर
अपनी ही शान
फिर से बनाओ अपना ये जहान
होगा हम सब पर एहसान ।

अब फिर बनाओ दुनिया इक ऐसी
चाहते हो तुम खुद जैसी
अच्छा प्यारा खूबसूरत
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ।

जिसमें न हो दुःख दर्द कोई
मिलती हों सबको खुशियां ।

अन्याय  अत्याचार का
जिसमें न हो निशां
ऐ खुदा अब बनाना
इक ऐसी नई दुनिया । 
 
 
 

मार्च 18, 2026

POST : 2072 भारत से हथियार मांगे अमेरिका ने ( मानो या न मानो ) डॉ लोक सेतिया

भारत से हथियार मांगे अमेरिका ने ( मानो या न मानो ) डॉ लोक सेतिया   

ये कोई राज़ की बात तो नहीं है दुनिया जानती है हमारी धार्मिक कथाओं में वर्णित हथियार कितने कारगर साबित हुआ करते थे । अमेरिका के शासक को ईरान से जंग में मात दिखाई देने लगी तब उसको भारत के मित्र शासक की कही बात याद आई , उन्होंने बताया था हमारे देश में अभी भी जब किसी देश की टीम से खेल में आमना सामना करना हो हम धार्मिक आयोजन करते हैं विश्वास करते हैं ईश्वर हमारी टीम को विजयी बनाएगा । पौराणिक कथाओं में वर्णित तरह तरह के अस्त्र शस्त्र को लेकर भी विस्तार से जानकारी दी थी तब उन्होंने अमेरिका को जिसे तब अमेरिकी शासक ने अवैज्ञानिक तथ्यरहित समझ महत्व नहीं दिया था । लेकिन जब अभी युद्ध को लेकर आपस में विचार विमर्श हुआ तब अमेरिकी शासक  को ध्यान आई पुरानी बात और उन्होंने पूछा क्या अभी भी ऐसा कुछ आपके पास है । भारत के शासक ने प्रमाण प्रस्तुत करने को भगवत गीता रामायण से महाभारत पर बनाई फिल्मों के अंश भेजने के साथ साथ आधुनिक काल की बाहुबली जैसी कितनी फिल्मों के दृश्य भी भिजवा दिए । इतना ही नहीं हमारे टीवी सीरियल में नागिन से लेकर तंत्र मंत्र पर आधारित तमाम कहानियों को भी सांझा किया । अमेरिकी शासक ने पूछा क्या वास्तव में ऐसा सच हो सकता है तो भारत के शासक ने जवाब दिया अगर पूर्ण विश्वास करते हैं तब कुछ भी असंभव नहीं है । पुछले कितने साल से मेरी विजय का सबसे प्रमुख कारण यही आस्था और विश्वास है । जनता का बहुमत भरोसा करता है कि मैं चाहे कुछ भी करता हूं वही उचित है , इतना ही नहीं मुझ पर कोई शंका करना देशभक्ति पर प्रश्न चिन्ह प्रतीत होता है । लोकतांत्रिक राजनीतिक नैतिक परंपराओं से पहले मुझ पर आस्था और विश्वास समझा जाता है । अमेरिकी शासक ने तब उनको सभी पौराणिक हथियार उपलब्ध करवाने की मांग रख दी जिसे इनकार नहीं करना आपसी संबंधों की ज़रूरत है । मैं जानकारी लेता हूं कि ऐसा कैसे मुमकिन है कुछ समय की मोहलत अमेरिकी शासक ने घोषित कर दी जैसी उनकी आदत है । 
 
बात कहने से पहले सोचना चाहिए उस के बाद बात को तोलना चाहिए तब बाद में बोलना चाहिए , उनको सलाहकार ने बताया कि ऐसा बड़े बूढ़े कहते थे । लेकिन अब तीर कमान से निकल चुका है अब कोई ढंग ऐसा निकालना होगा कि चतुराई से अपनी लाज बच सके । ऐसे में एक विचारक ने जवाब लिख कर देने का दायित्व संभाला है । उन्होंने लिखा है जैसा आपको विदित है पौराणिक हथियार उपयोग करना केवल उन्हीं को आता है जिन्होंने धर्मशास्त्रों का अध्यन और पाठन कर सिद्धियां हासिल की हों । क्योंकि कुछ सालों से ऐसा केवल फ़िल्मी लोग कलाजगत उद्योग उपयोग करते रहें हैं उनके पास ही फारमूला नुस्ख़ा या सिद्धांत है जो इक गोपनीय है कोई किसी को बताता नहीं है । क्योंकि जिनके पास है उन्होंने यही सब दिखला कर इतना अधिक धन और शोहरत कमाई है जो उनकी अगली हज़ारों साल तक की आमदनी का सुरक्षित तरीका है उनसे कोई किसी कीमत पर हासिल नहीं कर सकता है । आपको ईरान के पास जितना तेल ईंधन सोना और कीमती सामान दिखाई देता है उन सभी से मूलयवान हमारी ये पूंजी है । अमेरिका की अर्थव्यस्था कभी हमारी बराबरी नहीं कर सकती अर्थात आपको वो सब बेचना संभव नहीं है आपका सब कुछ गिरवी रखना भी थोड़ा होगा । लेकिन क्योंकि आपने मित्रता की बात कही है इसलिए कभी बाद में युद्ध ख़त्म होने के बाद उसको लेकर कोई डील ठीक उसी तरह की जा सकती है जैसे अभी अभी आपने हम पर डील थोपी है भविष्य में कितने साल तक अमेरिका से खरीदारी को लेकर । अब आया ऊंठ पहाड़ के नीचे , जवाब ने लाजवाब कर दिया है ।  
 
आज के आधुनिक हथियार महाभारत के इन 5 शक्तिशाली अस्त्रों के आगे कुछ नहीं थे ।  5 most powerful weapons

मार्च 17, 2026

POST : 2071 फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
 
फिर वही सिलसिला हो गया 
बोला सच , वो खफ़ा हो गया । 
 
ज़िंदगी का मैं बोझा लिए 
आदमी से गधा हो गया । 
 
आई कश्ती जो मझधार में 
नाख़ुदा ही ख़ुदा हो गया । 
 
हाल दिल का न पूछे कोई 
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।  
 
हमने इल्ज़ाम सर पर लिया 
क़र्ज़ जितना , अदा हो गया । 
 
हम खड़े थे , खड़े रह गए 
इस तरह वो जुदा हो गया । 
 
ख़ुश है ' तनहा ' उसे देख कर 
दोस्त कितना बड़ा हो गया ।  
 
 

 
 

मार्च 16, 2026

POST : 2070 241 ( Repeat ) ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।  
 

 

मार्च 14, 2026

POST : 2069 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती  
ऐसी कोई  ,  मुलाक़ात और होती ।  
 
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
 
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें 
होता दिन और , वो रात और होती । 
 
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे 
झोली में वरना ख़ैरात और होती । 
 
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता 
ऐसे दूल्हे की , बारात और होती ।  
 
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही 
खेले हम होते , शह - मात और होती ।  
 
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई 
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।  
 

 
   

मार्च 13, 2026

POST : 2068 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

सच कोई किसी को बताता नहीं 
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।  
 
कहना तो आसां है मगर फिर भी 
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं । 
 
हम से वो हमारा पता जान कर 
नाम तक भी अपना बताता नहीं । 
 
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे 
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । 
 
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल 
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं । 
 
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर 
लौट के वहां से कोई आता नहीं । 
 
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग 
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।  
 

 
 

मार्च 11, 2026

POST : 2067 ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है  
आम इसके शामो - सहर नहीं है ।  
 
जिस जगह जाकर सब करें इबादत 
क्या कहीं ऐसा , एक घर नहीं है ।  
 
हम समझते हैं आज की हक़ीक़त 
टूटने का ख़्वाबों के , डर नहीं है । 
 
दोस्त सारे , दुश्मन बने हुए हैं 
प्यार सी कोई शै इधर नहीं है । 
 
कर नहीं सकते वो कभी मुहब्बत 
गर उन्हें होना दर - बदर नहीं है ।  
 
मोड़ पर ठहरें हैं कई मुसाफ़िर 
मंज़िलों की , कोई डगर नहीं है । 
 
लोग उन पर , रखते नज़र हमेशा  
सिर्फ़ ' तनहा ' को ही खबर नहीं है ।  
 

 
 

मार्च 08, 2026

POST : 2066 सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सबका नसीब बताते जानते नहीं खुद का हाल  ( हास्य - कविता )

                      डॉ लोक सेतिया 

 
पंडित जी से इक दिन पूछा बतलाओ कैसी है ग्रहचाल 
ख़ाली जेब रहना है कब तक होंगें सब लोग मालामाल  
 
नाम जानकर बोले मुझसे जैसे गुज़रे हैं पिछले सब साल 
जैसे भारत देश की हालत बिगड़ रही है साल दर साल 
 
लोक की लोकतंत्र की राशि इक है ग्रहों की उलटी चाल 
जनता का कसूर नहीं है डेमोक्रैसी का भाग्य ही बदहाल
 
भारत और भ्र्ष्टाचार दोनों का ही ग़ज़ब है अपना कमाल
कोई रहता है पात पात पर कोई रहता है हर डाल डाल 
 
बेचती हमेशा झूठे सपने राजनीति की सभी की टकसाल 
पंछी समझता है मिला है दाना नहीं समझता कैसा जाल 
  
मायाजाल में फंस कर लोग भूल गए सब अपनी सुर ताल
सय्याद दिलाता भरोसा रखता है वो सब का बड़ा ख़्याल  
 
पिंजरे के तोते की तरह बतलाते उनकी किस्मत का हाल
चुनाव नतीजे में मुमकिन ही नहीं पाती अपनी सकें निकाल 
 
राजनेताओं की प्रशासन की हमेशा होती तिरछी है हर चाल 
चाबुक है उनके हाथ में जब तक , बचाओ सब अपनी खाल 
 
सांसद विधायक सभी बिकते हैं राजधानी बन गई घुड़साल 
सर पर सबके लटक रही तलवार बचने को नहीं कोई ढाल  
 
कुछ हलवा पूरी छीन खाते सबको नहीं मिलती रोटी - दाल 
न्यायालय की बात मत पूछो निकलते हैं रोज़ बाल की खाल  
 
नचाती नाचती सत्ता की सुंदरी घने काले लम्बे जिसके बाल 
राजनीति की कालिख़ लगाई जाती तो बन जाती रंग गुलाल  
 
सितारे बदले खेल बदलेगा है काली पूरी उन की हुई है दाल  
कुंडली खुलने लगी है लोगों की किसका खून सफेद या लाल  
 
सांवली सलौनी सूरत पिया की सबको लुभाती थी बीते साल 
कोई रोग लगा है चेहरे की हवाईयां उड़ीं बिखरे बिखरे हैं बाल 
 
ख़ामोशी सी उन पर छाई है घर दफ़्तर सब की लगती हड़ताल
जन्मपत्रिका ग़ुम कौन चुरा गया तिजौरी से , होगी जांच पड़ताल   
 
 

 
 


 


     
 
 

मार्च 06, 2026

POST : 2065 ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ऐसी भी खताएं कर गए  
हम जीने से पहले मर गए ।  
 
दुश्मनों के सितम सहते रहे 
देखा दोस्तों को तो डर गए ।
 
ढूंढते फिरे , यहां - वहां 
बुलाया उसने तो न उधर गए । 
  
पूछा जो हमसे हमारा पता 
जानते नहीं कह मुकर गए ।
 
लिखे थे ख़त हाले दिल के 
रह जेब में मगर गए ।   
 
बाद जाने के सोचा किए 
करना था क्या क्या कर गए । 
 
हम बढ़ा सके न कदम 
कुछ दूर से वो गुज़र गए ।  


 
( 16 मार्च 1996 डायरी से )  
 

 
 
 
 

POST : 2064 आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

साहित्य भले अधिकांश लोग नहीं पढ़ते हैं लेकिन धार्मिक ग्रंथों की कथाओं कहानियों से सभी परिचित हैं ।जानकारी और समझना अलग बात है मगर सबसे विचित्रता यही है कि शायद ही कभी अधिकांश लोग अपने विवेक से अथवा अंतरात्मा से पूछते हैं कि आदर्शों नैतिकता के मूल्यों की कसौटी पर खुद कितने खरे कितने खोटे हैं । शायद जितना बड़ा समझते हैं अपने आप को उतने ही छोटे हैं कभी सोचा है हम क्या करते हैं गंभीर विषय पर हंसते हैं जिन बातों का कोई मतलब नहीं उनका रोना रोते हैं । जानता हूं आज कोई भी रामायण गीता महाभारत जैसे ग्रंथ की रचना करने की बात सोचता ही नहीं शायद किसी को ऐसी किताब का कोई महत्व ही नहीं महसूस होता है फिर भी सोचना अगर उन ग्रंथों की बातों पर गौर किया जाए तो हम सभी हमारा समाज कैसा है । पुरातन कथाओं को छोड़ अपने पुराने इतिहास को ही जानते समझते तो समझ पाते कि हम कितने बौने नकली किरदार वाले बनते जा रहे हैं । क्या हम किसी धर्मयुद्ध में शामिल हैं या नहीं हैं सिर्फ दर्शक हैं तमाशाई हैं , हम में साहस ही नहीं सही और गलत की पहचान परख करने का अर्थात हम कायर और विवेकहीन लोग हैं जो अपनी असलियत छिपाने को ढकने को कोई आवरण ओढ़े रहते हैं । दुनिया हमेशा उनको महत्व देती है जो अपने समय में इस तरफ या उस तरफ खड़े होते हैं जो कौरव और पांडव राम और रावण कृष्ण और कंस में किसका चयन करना है नहीं निर्णय कर पाए उनको कालखंड की बात लिखने वालों ने किसी कूड़ेदान में भी जगह नहीं दी उनका कोई वजूद कहीं नहीं दिखाई देता है ।
 
हमको सोचना चाहिए हम खुद भी और हमारी शासन वर्ग की व्यवस्था कैसी है , कोई अपना तौर तरीका है कोई रास्ता जो भले कितना कठिन हो उस पर चलना ही है अपनी विचारधारा से पीछे हटना स्वीकार नहीं है । अगर वही हमने खो दिया है तो हमारे पास बचा कुछ भी नहीं हैं , कभी उधर कभी इधर अवसरवादी बन कर अथवा कायरता को किसी तरह से कुछ और नाम देकर इतिहास से नज़रें चुराते हैं । कभी हमारे देश और समाज के कुछ नायक हुआ करते थे जिन्होंने हमेशा अपने स्वार्थों धन दौलत शोहरत ऐश आराम को छोड़ अपनी विवेकशीलता से सही और गलत को समझ कर खुद भी सही को चुना और सभी को सही दिशा दिखलाई थी । लेकिन आज कैसे लोग नायक कहलाने लगे हैं हम कैसे उनको महानायक बतलाने लगे हैं जो सत्ता ताकत नाम शोहरत धन दौलत की खातिर खुद अपनी कीमत लगवाने लगे हैं । बिकने वाले कभी ख़रीदरार नहीं हो सकते हैं कोई बचा है जो किसी कीमत पर किसी हालात में बिकता नहीं है ।  ये सभी विडंबनाएं हमारे सामने हैं हम देख कर देखना ही नहीं चाहते अपनी आंखें नहीं सोचने समझने की शक्ति को ही छोड़ दिया है आंखों वाले अंधे बन गए हैं ।   
 
बात सिर्फ हथियारों की जंग की नहीं है हमने आसानी से सभी हासिल करने की चाहत में जीवन की लड़ाई लड़ने से पहले समझौता कर हार मान ली है । सोचते ही नहीं हम कैसा समाज बन गए हैं जो भेड़चाल की तरह चलता जाता है बुद्धि का उपयोग करना भूल गए हैं । हमने जितने भी धार्मिक ग्रंथ पढ़े हैं उन सभी में दो पक्ष अच्छाई बुराई या कुछ भी अन्य कारण से आमने सामने खड़े थे लेकिन दोनों तरफ कुछ लोग साथ देने विरोध करने की खातिर खुद समझ से निर्णय लिया करते थे जीतना हारना महत्व नहीं रखता आपका कोई मकसद होना आवश्यक है । लेकिन आजकल हम सभी खुद को विशेष मानते हैं जबकि ऐसी कोई विशेषता हम में होती ही नहीं है । आधुनिक शिक्षा ने हमारे समाज को ज़िंदा समाज से किसी निर्जीव समाज में बदल दिया है जो मशीनी ढंग से रहता है आचरण करता है वास्तविक ज्ञान से हम ख़ाली हो गए हैं । कैसे विडंबना है कि हम अपनी पुरानी विरासत परंपराओं पर गर्व की बात करते हैं जबकि हमारी खुद की कोई भी गौरवशाली परंपरा या विरासत भविष्य को सौंपने को नहीं पास हमारे । शायद तभी कोई  चाह कर भी कुछ लिख नहीं सकता है जो वास्तविकता है उसको अनकहा छोड़ना बेहतर है ताकि आने वाली पीढ़ियां शर्मिंदा नहीं हों । 
 
अंत में मुझे इक लोककथा याद आती है , किसी नगर को शानदार बनाने को इक जादूगर अपने जादू से सभी इंसानों से जीव जंतुओं पेड़ पौधों को चमकीले लिबास से ढक देता है । ठीक जैसे हमने खुद को कितनी तरह के उजले कपड़ों कीमती ज़ेवर इत्यादि से सजाया हुआ है । भैतिक ही नहीं आध्यात्मिक तौर भी झूठी नकली चीज़ों से खुद को ढक लिया है जिस से दिखाई देता है शानदार है मगर भीतर धीरे धीरे खोखलापन बढ़ता गया है और उस जादूगर की दिखावे की दुनिया अचानक किसी जर्जर इमारत की तरह ध्वस्त हो जाने को अभिशप्त है । हमारी हर चीज़ काल्पनिक है वास्तविकता से हमारा देश समाज कोई मेल नहीं खाता है । संक्षेप में हमने पत्थरों को हासिल करने में अनमोल रत्नों को गंवा दिया है और हम धरती से आकाश छूने चांद पर जाने के नाम पर नीचे रसातल में पहुंच चुके हैं , अब पछताने से भी क्या हासिल होगा ।  
 

  

मार्च 05, 2026

POST : 2063 हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  हमको वापस अभी तो जाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हमको वापस अभी तो जाना है  
इक ठिकाना , कहीं बनाना है ।  
 
लोग कितना बदल गए देखो 
रोज़ , कोई , नया बहाना है । 
 
उम्र भर , कौन साथ देता है 
एक दिन सब ने छोड़ जाना है । 
 
था बुरा कौन कौन अच्छा था 
सिर्फ़ बीता हुआ ,  ज़माना है । 
 
हमको आवाज़ कौन अब देगा 
किसलिए अब हमें बुलाना है । 
 
मुझको इतना ज़रा बताओ तो 
याद रखना , किसे भुलाना है ।
 
चंद सांसें अभी बची ' तनहा '
धड़कता दिल ठहर ही जाना है ।  
 

 

मार्च 03, 2026

POST : 2062 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 
हम जिएं कैसे , हम मरें कैसे  
क्या करें और क्या करें कैसे ।
 
जिस्म घायल है रूह भी घायल 
ज़ख़्म ही ज़ख़्म हैं , भरें कैसे । 
 
वो जो झांसों में उनके आ जाएं 
उनसे दुश्मन भी फिर डरें कैसे । 
 
हम न तदबीर ही करें कोई 
दोष तक़्दीर पर धरें कैसे । 
 
दुश्मनी हम से है ज़माने को 
' तनहा ' उल्फ़त भी हम करें कैसे ।  
 
 

   

मार्च 01, 2026

POST : 2061 अशांति का नॉबेल पुरस्कार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       अशांति का नॉबेल पुरस्कार ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 कभी ऐसा होता नहीं कि किसी अमीर को कोई प्रेमिका ठुकरा कर किसी और की बन जाए । उनको पूरा यकीन था नॉबेल पुरस्कार का सबसे सही दावेदार सिर्फ वही हैं । फ़िल्मी कहानियों की तरह जो कभी नहीं होता घट गया उनको मांगने पर कितनी कोशिशों से भी नहीं मिला किसी और को बिना प्रयास ही प्राप्त हो गया । आशिक़ी में आधुनिक प्रेमी आंसू नहीं बहाते बल्कि समझते हैं कि उसकी किस्मत ही खराब थी जो मेरी नहीं हुई किसी और की हो गई । लेकिन बाहर कुछ भी कहते रहें ताकतवर लोग अंदर से खुद को अपनानित समझते हैं और नतीजा इसकी सज़ा दुनिया भर को देते रहते हैं जीवन भर अभद्रता पूर्वक आचरण करते हैं । लेखक उनका दर्द समझते हैं और उनसे संवेदना जताते हैं दिलासा दिलाना चाहते हैं समझाते हैं कभी किसी को सभी कुछ नहीं मिलता है पर ऐसी बातों से तकलीफ़ घटती नहीं बढ़ती ही है ।  
 
आप इस की कल्पना नहीं कर सकते कि जब किसी ताकतवर धनवान बाहुबली को उसकी मनवांछित चीज़ नहीं देते हैं तो उसकी अनबुझी प्यास उसको क्या से क्या बना देती है । उनको शांति का नॉबल पुरस्कार न देना कितना बड़ा अपराध है आपको नहीं मालूम था तो अब समझ गए होंगे । अपना आपा खोकर उन्होंने किस किस को कितनी बार अपमानित नहीं किया , तब भी उनको चैन नहीं आया तो देख लो उन्होंने उस दिखावे वाले किरदार को छोड़ अपना असली किरदार दुनिया को दिखलाया है । जो उनकी नहीं मानता उस पर मनचाहा टैरिफ़ लगाया है , भले खुद उनकी अदालत ने इसको अनुचित बताया है लेकिन कौन बच सकता है उन्होंने इक ऐसा जाल बिछाया है । सभी ने कुछ न कुछ खोया है बस इक वही है जिस ने जो चाहा सभी कुछ पाया है । सब उसकी माया है दुनिया उसको ख़लनायक समझती है कुछ भी कहती रहे उसको तो ये कर के दिल को चैन आया है । यकीन मानिये कि अगर उनको नॉबल पुरस्कार दे दिया गया होता तो उनको कुछ भी ऐसा करने में संकोच होता और भले कोई भी कारण होते वो अपने शांति पुरस्कार की लाज रखने को भले और शरीफ़ किरदार को निभाने को विवश होते ही । दुनिया की यही आदत है गुण नहीं दिखाई देते अवगुण नज़र आते हैं तभी लोग तानाशाह अन्यायी अत्याचारी बन कर अपनी शान बढ़ाते हैं । 
 
आपने उनका दिल दुखाया है अपनी भूल समझ कर प्रायश्चित करने को कोई उपाय करना ज़रूरी है , आंधी चलने लगी है चिंगारी सुलग रही है शोला भड़कना ज़रूरी है । पानी की खातिर कोई बरसात करवानी होगी उनकी नॉबेल संग तस्वीर बनवानी होगी । ऐसी इक अनोखी नई परंपरा चलाओ आधुनिक युग में शांति की कोई कद्र नहीं अशांति सभी को भाती है इक अशांति का नॉबल पुरस्कार चलाओ जिसका नियम ऐसा बनाओ हाथ जोड़ नहीं मांगो , छीन कर ले जाओ । दुनिया बैठी है परमाणु बम पर आप छोड़ दो शांतिगीत गाना चलो मिसाईल फैंको मौत का खेल रचाओ सभी कहेंगे आप से हमको बचाओ , आप लाशों पर खड़े होकर खुद को महान बतलाओ , जिस को भी चाहो मौत के घाट पहुंचाकर उसको ज़ालिम घोषित कर उचित ठहराओ । लोग आजकल सभी जगह खलनायकों पर फ़िदा हैं कोई आधुनिक गीत लिखो उनकी महिमा का बखान कर पत्थर से हीरा बन कर अपनी कीमत ऊंची लगवाओ । पत्रकारिता से आगे बढ़ो चाटुकारिता की पढ़ाई पढ़कर जिसकी खाते हो उसकी हाज़िरी लगाओ , हरियाणा में कहावत है जिसकी खाई बाजरी उसकी लगाई हाज़िरी । बहती हुई गंगा में हाथ धोने से काम नहीं चलता खुद नंगे होकर उन संग नहाओ नाचो झूमों मौज मनाओ कौन देखता है सोच कर कभी मत शर्माओ ।    
 

 हां हां मैं खलनायक हूं ( हास्य - कविता ) 

 
शराफ़त की कदर नहीं सुन मेरे यार
छोड़ भलाई डराने लगे भर के हुंकार   
आपने किया था उन पर अत्याचार 
उनको मांगने पर भी दिया नहीं था 
बस इक शांति का नॉबल पुरस्कार । 
 
छोड़ो उसकी बात करना है बेकार  
अब तो समझो अगर हैं समझदार 
क्या होता है उसका कोई आधार 
शुरू करो ऐसा ही अशांति पुरस्कार 
साबित होंगे वही सबसे बड़े हक़दार ।
 
 Ashantee Medal 1873 - 74 clasp Coomassie
 
  

फ़रवरी 27, 2026

POST : 2060 भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

        भगवान की मर्ज़ी ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया  

ख़लबली मची है धरती लोक में नहीं उस परलोक में जिस में रहते हैं भगवान और सभी देवता देवियां जिनको विधाता ने बनाया हुआ है दुनिया का कामकाज उसकी देखभाल और विधि का विधान चलाने की खातिर । विकट समस्या उतपन्न हो गई है जब भगवान ने घोषणा कर दी है कि वह अपने पदभार से निवृत हो रहे हैं । आपको अगर लगेगा कि तब उनकी जगह किसी और को ये अवसर मिलने वाला है तो आप कुछ भी नहीं जानते हैं जब देवी देवताओं को बनाने वाला भगवान खुद भगवान नहीं रहेगा तब अन्य सभी कुछ और बनना तो दूर जो बनाए गए हैं उस से भी वंचित होकर अपना अपना अस्तित्व खो बैठेंगे । नारद मुनि अकेले ऐसे हैं जो भगवान से बिना संकोच वार्तालाप कर सकते हैं , नारद जी बोले लगता है अपनी पत्नी संतान से कोई कहासुनी हुई है जिसकी सज़ा हम सभी देवी देवताओं से लेकर अपने प्रिय भक्तजनों को देने की बात कर रहे हैं । भगवान हमेशा हंसते थे नारद जी की बात से उनकी चिंता मिट जाया करती थी लेकिन आज भगवान के मुखमंडल पर हंसी नहीं गहरी उदासी दिखाई दे रही है । नारद जी समझ गए माजरा कुछ और है जो हमेशा की तरह किसी न किसी ढंग से उपाय करने से बात बन जाती रहती थी से गंभीर है । नारद जी बोले प्रभु अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें अन्यथा अनर्थ हो जाएगा आपके बगैर कोई भी कैसे रह पाएगा । भगवान कहने लगे मेरा निर्णय अंतिम है और बदल नहीं सकता है , आपको भी मेरे भरोसे नहीं रहना चाहिए खुद अपने आप पर भरोसा रखना चाहिए । नारद जी ने कहा भगवन आप भी समझते हैं जानते हैं कि आप हम सभी को देवी देवता इंसान को आदमी औरत से लेकर कण कण को क्या से क्या बना सकते हैं । पेड़ पौधे पशु पक्षी जानवर कीड़े मकोड़े से पत्थर तक को कुछ भी बनाते हैं जल थल हवा सभी आपके आदेश से बनते हैं बिगड़ते हैं । कोई भी आपको कैसे बना सकता है ये कल्पना करना भी संभव नहीं है , अचानक प्रभु ने आखिरी इक करामात दिखलाई ताकि सभी को वास्तविक कारण समझाया जा सके । 
 
भारतभूमि पर कुछ लोग टीवी चैनल सोशल मीडिया से सभाओं में शहर शहर गांव गांव बस्ती बस्ती जगह जगह लगाए इश्तिहारों प्रचार प्रसार में साबित कर रहे नज़र आने लगे कि कोई आदमी भगवान से भी बढ़कर लोकप्रिय है । उसको बनाने वाली जनता उसको हटाने की बात सोच भी नहीं सकती है बोलना तो जैसे अक्षम्य अपराध है , जिस दल की सरकार है उस में सभी जानते हैं मानते हैं समझते हैं कि वही असली सरकार हैं उनके बगैर सभी सांसद सभी विधायक सभी मंत्री दल के सभी पदाधिकारी सदस्य कुछ भी नहीं हैं उनके खेल खिलौने हैं । कब किस का अस्तित्व ख़त्म हो जाये सिर्फ उनकी मर्ज़ी है , न्यायालय के न्यायधीश से चुनाव आयोग के आयुक्त तक हर ख़ास बड़े बड़े पद पर उनकी पसंद से लोग नियुक्त होते हैं कभी कोई पसंद का नहीं बन भी जाता है तो कुछ भी कर नहीं सकता अथवा त्यागपत्र देने की नौबत आ सकती है । जिनको शोर मचाना आता है उन्होंने अपना ईमान उनको बेच दिया है और अपना मालिक उनको समझ कर उनकी वंदना गुणगान कर बदले में मनवांछित वरदान पाते हैं । आजकल भारत देश में करोड़ों लोग उन्हीं के भक्त कहलाते हैं उनको हर बात पर सर झुकाते हैं उन जैसा कोई नहीं हुआ कोई दुनिया भर में नहीं है यही समझते हैं समझाते हैं । ऐसे भगवान ने अपने खास लोगों को क्या से क्या नहीं बना दिया है , लोग कभी नहीं देखते समझते उसने अपनी हसरत पूरी करने की चाहत में सब बना बनाया मिटा दिया है । अपना नाम हर जगह अंकित करवा खुद को अजर अमर बनवाने को हरा भरा गुलशन उजड़वा दिया है । उनके बनाये हुए भगवान रोज़ अपने रंग ढंग दिखलाते हैं सावन के अंधे भक्त हैं रात को दिन अंधेरे को उजाला बताते हैं । भगवान क्या कहना चाहते हैं सभी देवी देवताओं को समझ आ गया है असली भगवान से बढ़कर नकली भगवान दुनिया में छा गया है , भगवान भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं संख्याबल में किस के अनुआई साथ नहीं छोड़ते किस को छोड़ देते हैं आर्टिफीसियल इंटेलिजेन्स से इसका नतीजा सामने आ गया है । जब लोगों ने असली भगवान से बढ़कर इंसान को नकली भगवान बनाकर उसी पर भरोसा करना शुरू कर दिया है तब पहले के वास्तविक भगवान से रिश्ता बचा ही कहां है ।     
 
 ग्राम प्रधान ने दिया त्यागपत्र, व्यक्तिगत कारणों का हवाला - Youth India News

फ़रवरी 20, 2026

POST : 2059 आता नहीं झूठ बोलना जानते चोरी करना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       आता नहीं झूठ बोलना जानते चोरी करना  ( हास-परिहास ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

सत्यवादी हरीशचंद्र जी के वशंज कहलाते हैं , सत्य ही ईश्वर है की रट हम लगाते हैं , लेकिन अभी तक भी झूठ बोलने का सलीका नहीं आया है , जब भी बोलते हैं पकड़े जाते हैं । झूठ बोलने से कोई पाप नहीं लगता है कहते हैं जिस झूठ से किसी की चाहे खुद की ही भलाई हो उस से पाप नहीं लगता पुण्य समझते हैं । हम धर्मात्मा बनकर झूठ की कथा बांचते हैं सुनने वालों को मोह माया से बचने की बात करते हैं खुद मायाजाल में फंसते जाते हैं । झूठ का सागर बहुत गहरा है जो लोग डूबते हैं गहराई में पार उतर जाते हैं हीरे मोती उनकी झोली में भरते जाते हैं । हम चोर नहीं साहूकार कहलाते हैं चोरी करना अपना हुनर है दुनिया को दिखाते हैं असली चोर कभी नहीं पकड़े जाते हैं थानेदार बनकर कायदा कानून सबको समझाते हैं । कौन अपनी खामियां बताता है हर शख्स खुद को काबिल समझदार ईमानदार बतलाता है बस किसी की बात पर ऐतबार कभी किसी को नहीं आता है कोई ये बोलता नहीं समझता है झूठ बोलना सभी को खूब आता है । झूठ ही अपना सच कहलाता है सच से हमारा कभी नहीं रहता रिश्ता नाता है सच से हर शख़्स बचता है झूठ से ही दिल को चैन आता है सच कहने सुनने से दिल घबराता है । झूठ आपको मुसीबत से बचाता है सच का कोई भी ऐतबार ही नहीं करता कभी पति पत्नी से कहता है तो जाओ झूठे कहीं के सब मुझको समझ आता है । कहने का तातपर्य ये है कि झूठ हमको स्वीकार है झूठों की महफ़िल में होती जयजयकार है । झूठ दौड़ता है भागता है सभी मानते हैं कि दुनियादारी में झूठ ही चलता है सच हमेशा दिखाई देता हाथ मलता है । अदालत से लेकर संसद विधानसभाओं में सभी जगह झूठ का ही बोलबाला है सच कोई हरजाई है मतवाला है उसके लिए सभी के हाथ में कांटों की कोई माला है । झूठ का रिश्ता मधुर है बीवी का भाई साला है अपनी बहन का वही रखवाला है । सच सामने खड़ा भी दिखाई नहीं देता मुंह पर लगाया झूठ का इक ताला है आपको समझना है क्या गड़बड़झाला है । 
 
चोरी करते हैं हम सभी शान से कोई भी जगह हो घर दफ़्तर या किसी दुकान से ,  सीसीटीवी तक नहीं पकड़ पाते हैं चोरी चोरी लोग आंख मिलाते है दिल लूटते हैं आप पछताते हैं । दुनिया में हम जैसा कोई और नहीं है चोरों की नगरी में शराफ़त का चलता ज़ोर नहीं । शरीफ़ लोग शराफ़त में मारे जाते हैं असली चोर मौज करते हैं बड़े भलेमानस कहलाते हैं । भगवान जिसको हमने बनाकर कहीं बिठाया है उस ईमारत को भी चोरी के धन से बनवाया है चोरी करने बच भी जाएं तब भी हेरा फेरी से नहीं बचते हैं । हम अपने पांव ख़ामोशी से छुप कर रखते हैं खुद को छोड़ सभी पर नज़र रखते हैं । दुनिया जानती नहीं कितना बड़ा कमाल है चोरी का जितना भी माल है भरी उसी से अपनी टकसाल है । चालीस चोर इक अलीबाबा की कहानी पुरानी है आजकी दास्तान आधुनिक है सुहानी है देश का सभी कुछ कब कौन कैसे चुराता है जनता को खबर नहीं उसका अपना हमदर्द बनकर कौन उसका हक का सब खाकर दानवीर कहलाता है । चोरी की शिक्षा कलाकारी भी कहलाती है कोई विश्वविद्यालय ये हुनर सिखाता है चोरी के माल को अपना बताकर  फंस जाता है ख़बर से हैरान सभी लोग होते हैं चोरी करने में ऐसी गलती हमसे कैसे हुई है हमने दुनिया को हमेशा ठेंगा दिखाया है चोरी भी सीनाज़ोरी भी सबक सीखा है पढ़ाया है । सभी का सर चकराया है जब ऊंठ पहाड़ के नीचे आया है । 
 लोहे के मशीने कुत्ते पर आँसू बहाने से क्या होगा। यह सिर्फ़ एक यूनिवर्सिटी  की बात नहीं है, सारे शिक्षा जगत में गलघोंटिया प्रयोग चल रहा है ...

फ़रवरी 19, 2026

POST : 2058 असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

     असली की हार नकली की जीत ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया  

 
कौन समझा बनावट क्या, हक़ीक़त है क्या  
वास्तविक नहीं कुछ भी , कैसी शर्म ओ हया
नकली होशियारी सबको , लुभाने लगी अब 
वास्तविकता को , कहना ही होगा अलविदा । 
 
प्यार नकली है कारोबार भी नकली है यहां 
कितना खूबसरत लगता है नकली आस्मां  
चलो दिलदार चलो छोड़ कर असली जमीं 
बनाने लगी है दुनिया काल्पनिक इक जहां । 
 
कागज़ी फूल हैं , गुलशन है संग-ए-मरमर के   
जिस्म और जान दोनों ही अलग हो गए जब 
चांदनी चांद की , न रौशनी ही आफ़ताब की  
अब नहीं चाहिए कोई खुशबू किसी गुलाब की । 
 
सिर्फ़ छूने से सब कुछ बिखर ही गया लेकिन 
शोर कितना था नकली पर सम्मेलन का सुना 
सामना असलियत से करना पड़ेगा कभी जब 
साबित होगा बेकार बहुत बजता था झुनझुना । 
 
नकली ईमानदारी देशभक्ति भी नकली मिली 
अर्थव्यवस्था की खिलती नहीं इक भी कली 
आपकी सड़कें बंद  जनता के लिए आजकल
सरकार जी सुरक्षित रहने दो बस हमारी गली ।
 
असली कुछ भी नहीं आपने रहने दिया देश में 
मिलते रावण अब कितने ही राम जी के भेस में
सच को ज़िंदा ही दफ़्न कर दिया सभी ने जैसे 
कोई जगह देश में रही रहने को न ही परदेस में । 
 
जिधर देखते नकली का लो परचम लहरा रहा 
असली कौन है दुनिया में सभी को समझा रहा 
झूठी दुनिया की प्रीत है सुन अरे बांवरे आदमी   
कोई कबीरा आधुनिक भजन गाकर  सुना रहा ।  
 
 NDTV ai impact summit 2026 live updates day 3 itc maurya new ...
     
 

POST : 2057 मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

        मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया  

 
सभी मेरे ही अपने लोग कहलाते हैं 
मिलकर मेरी वंदना को गीत गाते हैं , 
मेरी अस्मत को लूटती है दुनिया जब  
तब वो मस्ती में झूमते हैं  मुस्कुराते हैं  
खराब कितना अच्छा जिसको बताते हैं ।
 
मेरा बदन ही नहीं रूह तलक भी मेरी 
छलनी छलनी किया हर किसी ने मुझे   
मैं किस को जा कर बताऊं आप सब  
कितने ज़ालिम हैं और बेरहम हैं कितने  
मुझ पर कितने सितम बार बार ढाते हैं ।
 
दुनिया हैरान देख कर दुर्दशा को मेरी 
कौन समझता है यहां पर व्यथा को मेरी  
मुझ में रहने ही वाले ख़ुद किस तरह से  
मेरी हस्ती मिटाने की कोशिश में लगे हैं     
जाने क्या क्या तौर तरीके आज़माते हैं । 
 
चील कौवे कभी गिद्ध लगते हैं जैसे जो 
मुझे नौंचते रहते और खाते ही जाते हैं 
कितनी बदनसीब इक अबला नारी जैसी 
जिनसे रिश्ता मेरा वजूद का है वही लोग  
लाकर बाज़ार में मुझसे यूं नाच नचाते हैं ।
  
 
आप इसको मुझसे मुहब्बत बताने लगे हैं 
बांट के टुकड़ों में मेरा वजूद निशदिन ही 
नुमाईश करने को मुझे ऐसे सजाते हैं और 
खुद बिचौलिया बन बोली लगवा कर मेरी 
बेशर्म बनकर बेच कर फिर जश्न मनाते हैं । 
 
कुछ भी बोली नहीं मैं चुप चाप सदा ही रोई 
दर्द को मेरे कभी समझा नहीं यहां पर कोई 
जैसे किसी मुर्दा लाश की अर्थी है डोली भी 
कभी मेरी समाधि बना कुछ नाम रख कोई  
सर को झुकाते हैं दिया जलाते पुष्प चढ़ाते हैं ।    
 
 भारत माता – एक महाकाव्य फिल्म

 

फ़रवरी 17, 2026

POST : 2056 उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ  
हमने सोचा था उन पे मगर न हुआ । 
 
जोड़ कर अपने हाथ सभी थे खड़े 
तब भी सिजदे में अपना सर न हुआ ।
 
उम्र भर घर की लोग तलाश किए 
पर मय्यसर हर एक को घर न हुआ ।
 
फ़ासला अपने बीच बहुत तो न था 
ख़त्म हम दोनों से ही सफ़र न हुआ । 
 
लोग चलने को साथ चले तो सही 
हमसफ़र कोई एक भी पर न हुआ । 
 
दी सदाएं हमने , सब को हरदम 
जो ख़ुला मिलता एक भी दर न हुआ ।
 
धूप में जलते उम्र कटी ' तनहा '
छांव देने को एक शजर न हुआ ।  
 

 
 
 
 
  
  

फ़रवरी 16, 2026

POST : 2055 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कहने को सब कुछ बदला है कुछ लोगों की तकदीर बदली है , लेकिन सही मायने में समाज देश साधारण जनता के लिए हालात बदले हैं लेकिन पहले से ख़राब हुए हैं । सच तो ये है कि तमाम सामान्य वर्ग को धकेल कर हाशिये से बाहर कर दिया गया है । राजनेताओं प्रशासन अधिकारियों कर्मचारियों धनवान उद्योगपतियों अन्य बड़े सफलता हासिल कर ख़ास बड़े वर्ग में शामिल लोगों की नज़र में जनता या उसकी परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है । ऐसे तमाम लोग खेलते हैं अपनी अपनी पसंद ज़रूरत सुविधा से कोई भी खेल जिस में उनके निशाने पर गेंद की जगह साधरण लोग होते हैं । खेल कितने हैं फुटबॉल क्रिकेट वालीबॉल टेनिस बास्केटबॉल बिलियर्ड्स इत्यादि , गेंग को ठोकर लगाना पीटना तरह तरह से खिलाड़ी करते हैं कभी गेंद की हालत बिगड़ जाती है तो बदल जाती है । राजनेताओं की राजनीति सत्ता को लेकर होती हैं देश समाज को लेकर कभी हुआ करती थी आजकल नहीं की जाती है । जब से दुनिया इक व्यौपार का बाज़ार बन गई है तब से आदर्श नैतिक मूल्य सांस्कृतिक पहचान किसी तयखाने में दबाकर रखी नहीं बल्कि दफ़ना दी गई है । हर भौतिकतावादी देश की तरह से भारतीय सभ्यता झूठी बनावटी चमक दमक से प्रभावित होकर अपनी वास्तविक पहचान अपनी विरासत को खोटे सिक्कों में तोलने को तैयार है । भारत देश का संविधान और लोकतंत्र सिर्फ किसी किताब का बाहरी आवरण बन गई है जिस के भीतर जाने कब से क्या क्या अजीब दर्ज किया जाता रहा है । मगर 140 करोड़ लोग कभी नहीं जान सकते कि हमारी वास्तविकता क्या थी और कैसे क्या से क्या बना दी गई है । सत्ता को कोई भी ऐसी किताब जनता के सामने खुलना कदापि स्वीकार नहीं है ।शासक शब्दों से डरते भी हैं जबकि उनकी तमाम जंग भी शब्दजाल ही हैं जिसे वो सभी कभी सभाओं में कभी व्यक्तव्यों में कभी सोशल मीडिया में उपयोग करते हैं ।  विदेश नीति से आर्थिक रणनीति तक जैसे कोई खेल तमाशा लगती है जिस में कौन देश कैसे किस किस देश को अपनी शतरंजी चालों में जकड़ कर मात दे सकता है और सभी बेबस परेशान हो कर भी कुछ कर नहीं सकते बेहद विवश लगते हैं । 
 
विदेश नीति पुराने संबंधों को दरकिनार कर ऐसे नये ढंग तौर तरीके पर चल पड़ी है जिस में अंदेशा है कि शायद दोबारा से अंग्रेजी शासन जैसी क्या उस से भी भयानक गुलामी का शिकंजा कसा जा सकता है । आज की विवशता और बनावटी उज्ज्वल भविष्य की धुंधली तस्वीर कोई छल साबित हो सकती है मगर शासक वर्ग की चिंता सिर्फ और सिर्फ खुद की खातिर है । देश समाज जनता की खातिर उनके पास कोई सार्थक संवाद नहीं है केवल अविश्वसनीय वादे झूठे विज्ञापन और काल्पनिक शानदार व्यवस्था 2047 तक देने की बात है ।कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक । आज़ादी के दिन पैदा हुए लोग 78 साल के हो चुके हैं सौ साल की गारंटी सरकार नहीं दे सकती है उसकी हर गारंटी झूठी है जनता को बहलाने को दी जाती है । खिलाड़ी सभी खेल में सफ़ल हो रहे हैं लेकिन चुनवी गणतंत्र के जिस खेल में जनता का जीवन दांव पर लगाया जाता है उसकी हर बार हार होती है , गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य से रोज़गार की बात छोड़ न्याय तक उसको जीते जी नहीं मिलता है । सामन्य आदमी की सुरक्षा की कोई चिंता किसी शासक प्रशासक को रत्ती भर भी नहीं है उनको अपनी ज़िंदगी से बढ़कर किसी की जान नहीं लगती है । राजनेताओं को सबसे अधिक चिंता उनकी कुर्सी की रहती है अपनी जान से भी अधिक प्यारी लगती है ।  कुर्सी का खेल ख़तरनाक साबित हुआ है हमारे लिए , क्योंकि इस खेल में खिलाड़ी किसी नियम कानून किसी आदर्श को कभी नहीं मानते बल्कि सब कुछ तोड़ने को उचित समझते हैं ।  
 
 Raag Darbari (Hard) - Hindi book by - Srilal Shukla - राग दरबारी (सजिल्द) -  श्रीलाल शुक्ल

फ़रवरी 13, 2026

POST : 2054 ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में 
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।  
 
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां  
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।  
 
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा 
फंसते ही जाते लोग इसकी , मरोड़ में । 
 
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं 
नुक़सान को कहने लगे लाभ , जोड़ में ।  
 
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं 
अटके खड़े हैं लोग कितने ही , मोड़ में । 
 
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को 
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में । 
 
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां 
होते नहीं शामिल , कभी आप दौड़ में ।   
 

 

फ़रवरी 12, 2026

POST : 2053 सभी को स्वर्ग चाहिए ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

    सभी को स्वर्ग चाहिए  ( आधुनिक व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

अपनी यही धरती पहले स्वर्ग से सुंदर हुआ करती थी अधिकांश लोग अच्छाई सच्चाई ईमानदारी ऊंचे आदर्शों पर चलते थे । सादगी भरा जीवन वास्तविक आचरण में नैतिकता का पालन करते थे देश समाज स्वर्ग लगता था दुनिया को शानदार बनाने की कोशिश करते थे हमारे पूर्वज । तब सभी मरने के बाद कामना करते थे मोक्ष की प्राप्ति की स्वर्ग यही है जानते थे नर्क की चिंता नहीं थी क्योंकि भले कर्म सही मार्ग पर चलना जानते थे । लेकिन हमारी बदनसीबी है कि हमने खुद अपने समाज को स्वर्ग से नर्क बनने दिया और बनाने में खुद भी योगदान देते रहते हैं । आज भौतिकता स्वार्थी स्वभाव अहंकार लोभ लालच और किसी भी तरह से सभी कुछ हासिल करने की चाहत का पागलपन जिस में अवसर मिले तो छीन लेना लूटना सामन्य बात हो गई है । यही नर्क है और हमारा देश समाज किसी भी नर्क से कम नहीं है बल्कि ऐसे नर्क की कल्पना भी हमारे पुरखों ने नहीं की होगी । हम सभी समझते हैं कि आधुनिक समय में हम समझदार बन गए हैं शायद सभी कुछ जानते हैं समझते हैं जो हमारी अज्ञानता का प्रमाण है । हम सोचते तक नहीं हैं कि हमने कैसे अपने देश को इस हद तक बर्बाद किया है कि शानदार स्वर्ग को नर्क बना दिया है , लेकिन हम इस अपनी दुनिया को फिर से अच्छा नहीं बनाना जानते न ही बनाने की कोशिश करते हैं हमने इसको स्वीकार कर लिया है कि ये खराब है और इतनी अधिक खराब है कि सुधारना संभव ही नहीं है । विडंबना ये है कि हम इस वास्तविकता को अपने झूठ और दिखावे के आडंबरों से ढकना छिपाना चाहते हैं , सोशल मीडिया से तमाम अन्य प्रकार से प्रचार प्रसार आयोजन से इक पर्दा डालने का कार्य निरंतर करते रहते हैं । हम समझते हैं विधाता से कुछ भी छिपाया जा नहीं सकता फिर भी उस ईश्वर से भी छल चतुराई करने की नासमझी करते हैं । 
 
मरना सभी को इक दिन है भले मरने की तैयारी कोई नहीं करता सभी जीना चाहते हैं मगर मौत आनी है आएगी भी सभी कामना करते हैं मर कर स्वर्ग में जगह मिलने की । स्वर्ग कोई अगर जगह होगी तब उस में प्रवेश से रहने की अनुमति तक क्या इतनी आसानी से हासिल हो जाएगी लगता तो नहीं है । जैसी भी पूंजी चाहिए होगी हमने वो कभी अर्जित की भी है जीवन में , नफरत भेदभाव सभी से हेरा फेरी ज़िंदगी भर हमने कुछ और कभी अर्जित किया ही नहीं । पाप छल कपट की झूठी नाम की शोहरत उस दुनिया में प्रवेश पाने से वर्जित ही कर सकती है । बबूल बोकर आम खाने की आकांक्षा है अपनी दुनिया को नर्कीय बनाकर किसी स्वर्ग की कामना रखना । मान लो किसी कारण हमको स्वर्ग में प्रवेश मिल भी जाए तब क्या हमको स्वर्ग की आबोहवा वहां का वातावरण पसंद आएगा , कभी नहीं हमको स्वर्ग में पल भर ठहरना कठिन लगेगा । नर्क को हमने बनाया ही नहीं उसको अपनी आदत दिनचर्या में शामिल कर लिया है । यकीन मानिए हमको उस स्वर्ग में भी अपने इस धरती के नर्क की याद आती रहेगी और इतना ही नहीं हमने विश्वास कर लिया है यही हमको सबसे शानदार लगता है इस नर्क से बिछुड़ना कोई नहीं चाहेगा । स्वर्ग मांगते हैं स्वर्ग को पसंद कदापि नहीं करते और मुमकिन है फिर किसी स्वर्ग को नर्क बनाकर पुरानी भूल दोहराना चाहते हों । स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।  स्वर्ग और नर्क की हक़ीक़त मालूम हो जाए तो मुमकिन है लोग अपना इरादा बदल कर मरने के बाद भी नर्क ही जाना चाहते हों , कविता पढ़ कर पुनर्विचार कर सकते हैं । 
 
 

श्रद्धांजलि सभा ( हास्य-व्यंग्य कविता )

 डॉ लोक सेतिया

टेड़ा है बहुत 
स्वर्ग और नर्क का सवाल 
सुलझाएं जितना इसे 
उजझता जाता है जाल ।

आपको दिखलाता हूं 
मैं आंखों देखा हाल 
देखोगे इक दिन आप भी 
मैंने जो देखा कमाल ।

बहुत भीड़ थी स्वर्ग में 
बड़ा बुरा वहां का हाल 
छीना झपटी मारा मारी
और बेढंगी थी चाल ।

नर्क को जाकर देखा 
कुछ और ही थी उसकी बात 
दिन सुहाना था वहां 
और शांत लग रही रात ।

पूछा था भगवान से 
स्वर्ग और नर्क हैं क्या 
और उसने मुझे 
ये सब कुछ दिया था दिखा ।

घबराने लगा जब मैं 
थाम कर तब मेरा हाथ 
बतलाई थी भगवान ने 
तब मुझे सारी बात ।

श्रधांजली सभा होती है 
सब के मरने के बाद 
सब मिल कर जहां 
करते हैं मुझसे फ़रियाद
स्वर्ग लोक में दे दूं 
सबको मैं कुछ स्थान 
बेबस हो गया हूं मैं 
अपने भगतों की बात मान ।

शोक सभाओं में 
ऐसा भी कहते हैं लोग 
स्वर्ग लोक को जाएगा 
आये  हैं जो इतने लोग ।

देखकर शोकसभाओं की भीड़ 
घबरा जाता हूँ मैं 
मुझको भी होने लगा है 
लोकतंत्र सा कोई रोग ।

कहां जाना चाहते हो 
सब से पूछते हैं हम 
नर्क नहीं मांगता कोई 
जगह स्वर्ग में है कम ।

नर्क वालों के पास 
है बहुत ही स्थान 
वहां रहने वालों की 
है अलग ही शान 
रहते हैं वहां 
सब अफसर डॉक्टर वकील 
बात बात पर देते हैं 
वे कोई नई दलील ।

करवा ली हैं बंद मुझसे 
नर्क की सब सजाएं 
देकर रोज़ मानवाधिकारों की दुआएं ।

बना ली है नर्क वालों ने 
अपनी दुनिया रंगीन 
मांगने पर स्वर्ग वालों को 
मिलती नहीं ज़मीन ।

नर्क ने बनवा ली हैं
ऊंची ऊंची दीवारें 
स्वर्ग में लगी हुई हैं 
बस कांटेदार तारें
नर्क में ही रहते हैं 
सब के सब बिल्डर 
स्वर्ग में बन नहीं सकता कोई भी घर ।

स्वर्ग नर्क से दूर भी 
बैठे थे कुछ नादान  
स्वर्ग नर्क मोक्ष पर इक कविता पेश है श्रद्धांजलि सभा ।
फुटपाथ पे पड़ा हुआ था 
जिनका सामान
उन्हें नहीं मिल सका था 
दोनों जगह प्रवेश 
जो रहते थे पृथ्वी पर 
बन कर खुद भगवान ।

किया था भगवान ने 
मुझसे वही सवाल 
स्वर्ग नर्क या है बस
मुक्ति का ही ख्याल ।

कहा मैंने तब सुन लो 
ए दुनिया के तात 
दोहराता हूँ मैं आज 
एक कवि की बात ।

मुक्ति दे देना तुम 
गरीब को भूख से 
दिला सको तो दिला दो 
मानव को घृणा से मुक्ति
और नारी को 
दे देना मुक्ति अत्याचार से 
मुझे जन्म देते रहना 
बार बार इनके निमित ।

मित्रो
मेरे लिये  स्वर्ग की 
प्रार्थना मत करना 
न ही कभी मेरी 
मुक्ति की तुम दुआ करना
मेरी इस बात को 
तब भूल मत जाना 
मेरी श्रधांजली सभा में 
जब भी आना ।  
 
 आज की कहानी: स्वर्ग और नरक - National Thoughts