अगस्त 31, 2012

सिसकियां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      सिसकियां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वो सुनता है
हमेशा
सभी की फ़रियाद
नहीं लौटा कभी कोई
दर से उसके खाली हाथ।

शोर बहुत था
उसकी बंदगी करने वालों का वहां
तभी शायद 
सुन पाया नहीं
आज ख़ुदा भी वहां
मेरी सिसकियों की आवाज़।  

अगस्त 30, 2012

आई हमको न जीने की कोई अदा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आई हमको न जीने की कोई अदा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आई हमको न जीने की कोई अदा
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा।

लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा।

जो करें भी शिकायत तो किस बात की 
क़त्ल करना किसी को है उनकी अदा।

हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा।

हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर               ( चारागर = चिकित्सक )
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा।

हाथ में हाथ लेकर सफ़र पर चलें
पूछना किसलिए मंज़िलों का पता।
 
सब वफ़ादार खुद को बताते रहे 
और "तनहा" को कहते रहे बेवफ़ा।

जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है
हाँ मुहब्बत में हद से गुज़रने का इरादा है।

अब कैसे बचेंगे उन्हें चाहने वाले सब
उनका आज सजने -संवरने का इरादा है।

लड़ना है दिलो जान से ठान लिया है अब
ज़ालिम के ज़ुल्म से न डरने का इरादा है।

लिखनी दास्तां है लहू से अपने कोई
कहने का नहीं अब तो करने का इरादा है।

बढ़ते ये कदम रोकने से न रुकेंगे अब
मंज़िल पे पहुंच के ठहरने का इरादा है।

हम ने थाम ली है ये पतवार तुफानों में
"तनहा" हौंसलों से उतरने का इरादा है। 

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे
रास्ता अंधे सब को दिखा रहे।

सुन रहे बहरे ध्यान से देख लो
गीत सारे गूंगे जब गा रहे।

सबको है उनपे ही एतबार भी
रात को दिन जो लोग बता रहे।

लोग भूखे हैं बेबस हैं मगर
दांव सत्ता वाले हैं चला रहे।

घर बनाने के वादे कर रहे
झोपड़ी उनकी भी हैं हटा रहे।

हक़ दिलाने की बात को भूलकर
लाठियां हम पर आज चला रहे।

बेवफाई की खुद जो मिसाल हैं
हम को हैं वो "तनहा" समझा रहे।  

दो दिल दो जिस्म इक जान ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 

       दो दिल दो जिस्म इक जान ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

       ये लेखक के जीवन का अनुभव होता है कि कभी आस पास के लोग उसकी कहानी के किरदार बन जाते हैं कभी कोई काल्पनिक किरदार वास्तविक ज़िंदगी में मिल जाता है। लेखक दो चाहने वालों की कहानी लिखते लिखते अपनी पिछली कहानी के किरदार की अधूरी चाहत को पूरी करने की अपनी इच्छा को भूला नहीं है। जाने क्यों उसको लगा कि काश उस कहानी का नायक नई इस कहानी की नायिका से मिल जाता और दोनों को अपनी अपनी तलाश हासिल हो जाती। इतनी दूर रहते अपनी अपनी बेड़ियों में जकड़े सामाजिक बंधन में अनचाही कैद में रहते कैसे मिलते भला। सोशल मीडिया पर उनकी दोस्ती करवाई यही सोचकर कि शायद जैसा लेखक सोचता है दोनों अच्छे दोस्त बनकर इक दूजे का दुःख दर्द परेशानी समझ थोड़ी ख़ुशी और राहत का अनुभव कर सकेंगे।
 
   बात शुरू हुई थी इक कहानी के दो लोगों से शायद नसीब को उस कहानी के बहाने सच्ची इक कहानी की शुरुआत करनी थी। सागर को वर्षा की मानसिक दशा अपने जैसी लगी थी जाने क्यों मन चाहा उसकी निराशा को भगाकर उसके आंचल को आशा के फूलों से भर दे। वर्षा के जीवन साथी का निधन हो चुका था और उसको कोई भी व्यक्ति साथ और मार्गदर्शन को मिला नहीं था जिस से मन की चिंता की बात कह सके। कुछ ही दिन में वर्षा को सागर में अपने सपनों का हमराही दिखाई देने लगा था। सागर को जीवन में कोई दोस्त नहीं मिला था मगर जाने क्यों वर्षा से बात करने के बाद महसूस हुआ यही मेरी ज़िंदगी की तलाश है। वर्षा को समझ आ गया था कि सागर को किसी अपने की चाहत है। दुनिया की नज़र में और सामाजिक बंधनों में बंधे दोनों किसी रिश्ते में नहीं बंध सकते थे ये बात जान कर भी दोनों अपने अपने दिल पर काबू नहीं रख पा रहे थे। कोई जैसे उनको इक दूसरे की तरफ खींच रहा था मगर मन में दुविधा थी कि दोनों नहीं समझ पा रहे थे दूसरे की भावना क्या है। कहीं वो मुझे गलत ही नहीं समझ ले और दोस्ती का भी रिश्ता टूट नहीं जाए। 

     इक दिन वर्षा ने सागर की निजी ज़िंदगी को लेकर पूछ ही लिया और जान लिया कि वास्तव में हम दोनों एक जैसे अकेले अकेले हैं कहने को बाक़ी सब हैं। सागर कोई बात कहने के बाद संकोच करते सवाल करता वर्षा आपको कोई बात अच्छी नहीं लगे तो कह देना मन में कोई नज़रज़गी मत रखना। वर्षा ने कहा आपको मुझसे कुछ भी कहने का अधिकार है और हम किसी छोटी सी बात से अपने साथ को कभी छोड़ नहीं सकते हैं। आज आपको बताती हूं मुझसे किसी ने पहले कोई दोस्ती वाला रिश्ता बनाना चाहा तो मैंने उसको हमेशा रोक दिया और साफ साफ कह दिया कि अकेली होने से हर किसी से दोस्ती नहीं करती महिला , जब वास्तव में कोई अच्छा लगता है तभी उस से खुलकर बात करती है औरत। आपको पसंद करती और भरोसा है तभी आप से दिल की बात कहना चाहती हूं। 

    समझ कर भी अभी सागर को झिझक थी क्योंकि उसके और वर्षा के सामाजिक स्टेटस में अंतर था। मगर जब वर्षा ने इशारे इशारे में जैसे भी चाहोगी मुझे मंज़ूर है बिना सागर वर्षा का कोई वजूद नहीं है। वर्षा किसी बदली की तरह बरस जाने को व्याकुल थी। चाहती थी सागर अपनी बाहें फैलाकर उसको अपने आप में शामिल कर ले और दो दिल दो जिस्म इक जान हो जाएं। 

                2 पन्ना -              दोस्ती से आगे इक दूजे का सदा सदा का साथ 

  सागर वर्षा नियमित बात करते रहे। कभी वर्षा कहती मिलने को मगर सागर संकोच वश और सामाजिक हालात को समझ उसको कहता कि शायद कभी मुमकिन हो मुझे भी लगता है लेकिन अभी नहीं मिलना हो सकता है। वर्षा चाहती थी रिश्ता आधा अधूरा नहीं हो अगर है तो पूरी तरह से हो। सागर वर्षा की मन की बात और जीवन साथी की ज़रूरत समझने लगा था और इक दिन उसने कहा क्या तुम मुझसे पति पत्नी की तरह संबंध बनाना चाहोगी , कुछ ही पल में वर्षा ने हां बोल कर कहा था मुझे ये पता था इक दिन आप खुद ये मुझे कहोगे मैं इंतज़ार कर रही थी। सागर ने कहा अच्छा होता ये पहले खुलकर खुद बोलती तो वर्षा ने कहा मुझे संकोच था कहीं आपको ये नहीं लगे कि मैं खराब महिला आपको अपने प्यार में फंसाना चाहती हूं मुझे ख़ुशी है खुद आपने मुझे अपनाया है दिल से और अब जन्म जन्म तक वर्षा सिर्फ और सिर्फ आपकी है हो गई है और रहेगी। 

       अगली सुबह वर्षा ने सागर से कहा था मुझे थोड़ा महसूस होता रहा रात भर कि क्या हमने कल जो सोचा चाहा और स्वीकार किया उस को उचित मानते हैं तब सागर ने कहा मन में कोई शंका नहीं रखो अब तुम अकेली हो अपने जीवन को जीने को हक है हमने कोई जिस्म का नहीं मन से आत्मा से अपने आप को इक दूजे को सौंपने की बात की है जो सच्चा प्यार है पहले भी लोग धर्म कथाओं में समाज में ऐसे रिश्ते बनाते रहे हैं। कोई संशय है तो तुम नहीं चाहती तो कोई बात नहीं। तब वर्षा ने कहा था ऐसा नहीं अब आपको अपना सब कुछ मान लिया है बस इक चाहत है भले किसी के सामने नहीं अकेले ही कभी आप मुझे अपनी बनाने की औपचारिक रीति को अवश्य पूरा करो। आपसे अपनी मांग भरवाने  की सिंदूर लगवाने की इच्छा है और आपको पसंद है बिंदी माथे पर लगाना तो जिस दिन कहोगे आपकी हर बात स्वीकार करना मेरा धर्म है। वर्षा ने अपने जन्म दिन पर अपने माथे पर बिंदी लगा ली थी और सागर ने भी उसकी इच्छा मांग भरने की जब भी संभव हुआ करने की बात कही थी। 

                                3  पन्ना -    इक दूजे के होने के बाद 

  दिल से आत्मा से चाहने के बाद भी फासले बहुत थे दूरी मन की नहीं मगर हालात की मज़बूरी थी। कभी मिलते मिलते रह गए कभी हौसला नहीं किया दुनिया से डर कर। आपस में रूठना मनाना कभी किसी बात पर खफ़ा होकर संपर्क नहीं रखना बीच बीच में हुआ मगर दोनों की चाहत बढ़ती गई कम हुई नहीं कभी। वर्षा को कभी निराशा होती तो कहती मुझे लगता है हम कभी मिल नहीं सकेंगे भरोसा डगमगाने लगता तब सागर उसको संभालता और भरोसा कायम रखने को मान जाती वर्षा ऐसे में कहती मुझे आप पर खुद से बढ़कर यकीन है। मुझे तो सब आपकी मर्ज़ी से करना है मेरे लिए आप मेरी नैया के खेवनहार हो मेरे स्वामी भगवान सभी बस आप को मानती हूं। सागर ये सुनकर और अधिक चाहता वर्षा को हर तरह से ख़ुशी देना। जब भी वर्षा का मन जो भी चाहता सागर वही खुद कहता और उसकी कामना को पूर्ण करता रहता। 
  
    आखिर उनकी मुलाकात पहली बार आमने सामने हो गई जब किसी शहर में दोनों ही को आना पड़ा और इक और ने उनकी भावनाओं को समझ मिलवाने का अवसर दिया। शायद जो भी संभव था दोनों ने इक दूजे को ख़ुशी देने को सब करने की कोशिश की और बहुत खूबसूरत पल ज़िंदगी के अनुभव किये मिलकर। फिर भी बार बार मिलने और खुलकर अकेले में साथ रहने की चाहत बाकी है जो कभी न कभी पूरी होगी अब सागर की बात का विश्वास वर्षा को पूर्णतया है। 
 

                        4  पन्ना -  चाहत खुल कर जीने की 

    वर्षा को लगता है लेखक  ने लिखी है कहानी मगर अभी उसकी मन भी भावना रह गई है। सागर ने कितनी बार पूछा मगर वर्षा किसी न किसी कारण खुलकर अपनी भावनाएं उजागर नहीं कर सकी। उसका मन अभी अपने सागर से मिलन और जीवन भर इक साथ खुल कर जीने को करता है। कभी सागर खुद को कैद में बंद पंछी समझता था मगर जब उसने खुद को आज़ाद कर लिया है तो वर्षा को अपनी जंज़ीरें तोड़ने की कोई तरकीब नहीं मिल रही है। सागर से मिलन को वर्षा को बरसना नदी बनकर बहना और मीलों की दूरी तय कर सागर की बाहों में समाना है। चाहकर भी वर्षा अपने सागर को अपने पास आने को नहीं कह सकती है। सागर विश्वास करता है कभी किसी दिन किसी तरह दोनों का ये फ़ासला ख़त्म होना ही है। चाहत दोनों को बराबर है बढ़ती जाती है पल पल हर दिन मुहब्बत में इंतज़ार के पल बड़े लंबे हुआ करते हैं। कहानी का अंजाम अभी कोई नहीं जानता है सागर वर्षा और कहानी का लेखक। मगर सागर को भरोसा है किसी दिन वर्षा और वह इक साथ अवश्य होंगे उनका मिलन जन्म जन्म के लिए होना ही है। वर्षा की भी यही कामना है मगर उसका मन विचलित हो जाता है उस से और इंतज़ार सहा जाता नहीं और वर्षा को नदिया बनकर बहुत दूरी तय करनी है अपने सागर की बाहों में जाकर समाने को बेताब है।

अगस्त 29, 2012

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) 

                      डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का।

बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का।

नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का।

करेगा तिजारत की बात जब ज़माना
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का।

हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का।

वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का।

बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बिजलियों का भी धड़का है बरसात में
क्या गज़ब ढाये काली घटा रात में।

कुछ कहा सादगी से भी उसने अगर
राज़ था इक छुपा उसकी हर बात में।

कम नहीं है ज़माने के लोगों से वो
बस लिया देख पहली मुलाक़ात में।

राह तकती किसी की वो छत पर खड़ी
देखा जब भी उसे चांदनी रात में।

हारते सब रहे इस अजब खेल में
लोग उलझे रहे यूँ ही शह-मात में। 

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी
दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी।

याद रहता है हमें जो उम्र भर
मौत का पैगाम है ये ज़िंदगी।

मुस्कुराती सुबह आती है मगर
फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी।

है कभी फूलों सी कांटों सी कभी
नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी।

जानते ये राज़ "तनहा" काश हम
इक बड़ा ईनाम है ये ज़िंदगी।
 

आपने जब पिलाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आपने जब पिलाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आपने जब पिलाना छोड़ दिया
मयकदे हमने जाना छोड़ दिया।

रोज़ महफ़िल जमाना छोड़ दिया
घर किसी को बुलाना छोड़ दिया।

अब कहीं आना जाना छोड़ दिया
आपका आशियाना छोड़ दिया।

दोस्तों का ठिकाना छोड़ दिया
दुश्मनों से निभाना छोड़ दिया।

ज़िंदगी को डराना छोड़ दिया
अब ज़हर रोज़ खाना छोड़ दिया।

चारागर को बुलाना छोड़ दिया
दर्द को खुद बढ़ाना छोड़ दिया।

गैर सारा ज़माना छोड़ दिया
आज "तनहा" ने माना छोड़ दिया।
                                                    
(  चारागर = डॉक्टर = चिकित्सक )

अगस्त 27, 2012

महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया।

हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से
अनजाना बना अपना , बैठा-सा नज़र आया।

मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में
मुझको न कोई लेकिन , तेरा-सा नज़र आया।

हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया।

हसरत सी लिये दिल में , हम उठके चले आये
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया।  

इस दरजा एतबार क्यों ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इस दरजा एतबार क्यों ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

इस दरजा एतबार क्यों
कहते हो बार बार क्यों।

कोई बताये किस तरह
ग़म का है इव्वास्तगार क्यों।

मुरझाये गुल कभी नहीं
उस को न इख्तियार क्यों।

जाने किसी के आने का
हम को है इंतज़ार क्यों।

पूछो न हमसे आज तुम
दिल का गया करार क्यों।

उनको सुना नई ग़ज़ल
"तनहा" है बेकरार क्यों।  

हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हादिसों की अब तो आदत हो गई है
ग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है।

बस खबर ही आपकी पहचान है अब
आपकी कैसी ये शोहरत हो गई है।

किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है।

थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है।

भूल जाते हैं सभी कसमें वफ़ा की
बेवफाई अब तो आदत हो गई है।

लोग अपने आप से अनजान "तनहा"
आजकल कुछ ऐसी हालत हो गई है।

शिकवा किस्मत का न करना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा किस्मत का न करना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा किस्मत का न करना
ग़म से घबरा कर न मरना।

माना ये दुनिया है ज़ालिम
तुम न इस दुनिया से डरना।

नफरतों की है ये दल दल
तुम इधर से मत गुज़रना।

अश्क पी लेना मगर तुम
प्यार को रुसवा न करना।

तुम न पहचानो जो खुद को
इस कदर भी मत संवरना।

हो सका न निबाह तुम से
तुम न इस सच से मुकरना।  


वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"


वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये। 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये। 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये। 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये। 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये। 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा 
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये।
 
महफ़िलें आप की , और "तनहा" हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये।

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहस भ्र्ष्टाचार पर वो कर रहे थे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे।

बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे।

पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे।

खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे।

वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे।

भाईचारे का मिला इनाम उनको
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे। 

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई
हम किधर जाएं फिर ये बताये कोई।

रूठ कर हम तो बैठे हैं इस आस में
हम को अपना समझ कर मनाये कोई।

दर खुला हमने रक्खा है इस वास्ते
कोई वादा नहीं फिर भी आये कोई।

बेख्याली में कब जाने किस मोड़ पर
राह में हाथ हमसे मिलाये कोई।

याद आये किसी की तो भर आये दिल
इस तरह भी न हम को रुलाये कोई।

अश्क पलकों पे आ कर छलकने लगें
इस कदर आज हमको हंसाये कोई।

शाम ढलते ही इस धुन में रहते हैं हम
काश पुरदर्द नग्मा सुनाये कोई।

अगस्त 26, 2012

न आयें अगर वो करें क्या बताओ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

न आयें अगर वो करें क्या बताओ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

न आयें अगर वो , करें क्या बताओ
वो आयें , बहाना कुछ ऐसा बनाओ।

कशिश उनके दिल में भी पैदा करो तुम
उन्हें , वरना तुम , कर के कोशिश भुलाओ।

मुहब्बत कभी इस तरह भी हुई है
बुलायें तुम्हें पास तुम दूर जाओ।

उसे सिज्दा कर के हुए हम तो काफ़िर
अगर हो सके उस खुदा को मनाओ।

जो उम्मीद टूटी तो फिर होगी मुश्किल
न यूँ दिल को झूठे दिलासे दिलाओ।

जगह दो न दो अपने दिल में हमें तुम
बस इक बार हमसे नज़र तो मिलाओ।

वो अनजान बनते हैं सब जान कर भी
उन्हें हाल-ए-दिल तुम न "तनहा" सुनाओ।  

तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है
ये मेरी वफाओं का मिला खूब सिला है।

इक बूँद को तरसा किये हम प्यास के मारे
ऐसे तो बरसता न ये सावन से गिला है।

आती रही यूं तो बहारें ही बहारें
बिन तेरे मगर दिल का कोई फूल खिला है।

मिल जाते हैं हमदर्द यहां कहने को लेकिन
बांटे भी वो हम किससे जो ग़म तुम से मिला है।

हंसता है खुदा जाने ये क्यूं हम पे ज़माना
आंसू कोई शायद तेरी पलकों पे ढला है।

दो पल ही गुज़ारे थे तेरे साथ ब-मुश्किल
इक उम्र बड़ी पा के मगर "लोक" चला है।

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

रंक भी राजा भी तेरे शहर में
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में।

नाव तूफां से जो टकराती रही
वो किनारे जा के डूबी लहर में।

ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है
रोक रोने पर भी है अब कहर में।

मर के भी देते हैं सब उसको दुआ
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में।
 
मत कभी सिक्कों में तोलो प्यार को 
जान हाज़िर मांगने को महर में। 
 
अब समझ आया हुई जब शाम है 
जान लेते काश सब कुछ सहर में। 
 
एक सच्चा दोस्त "तनहा" चाहता 
मिल सका कोई नहीं इस दहर में। 
 
 
      { अब किसी पर हम भरोसा क्या करें 
       लोग सब जाते बदल इक  पहर में। }

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

उस को यूं हैरत से मत देखा करो
ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है।

जिसको ठुकराने चले तुम बिन पढ़े
दोस्ती ही का तो वो पैगाम है।

उठ गया अब तो जहां से एतबार
शहर वालों में ये चर्चा आम है।

काफिले में चल रहे हैं साथ साथ
अपनी अपनी फिर भी तनहा शाम है।

देख कर लाशें कभी रोते नहीं
खोदना ही कब्र उनका काम है।

सत्यवादी कह के हंसता है जहां
बस यही सच कहने का ईनाम  है।

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही
इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही।

इक हमीं पर न थी उनकी चश्मे करम
सब पे महफ़िल में उनकी इनायत रही।

हम तो पीते हैं ये ज़हर ,पीना न तुम
उनकी औरों को ऐसी हिदायत रही।

उड़ गई बस धुंआ बनके सिगरेट का
राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही।

भर के हुक्का जो हाकिम का लाते रहे
उनको दो चार कश की रियायत रही। 
 
अनसुनी बेकसों की रही दास्तां 
ज़ुल्म वालों को मिलती हिमायत रही। 
 
जिनकी झोली थी "तनहा" लबालब भरी 
सब मिले उनकी हसरत निहायत रही। 



बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है।  
 

 

जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए
ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए।

और कुछ भी तो हमको तम्मना नहीं
सांस लेने को थोड़ी हवा चाहिए।

हाल -ए -दिल आ के पूछे हमारा जो खुद
ऐसा भी एक कोई खुदा चाहिए।

अपनों बेगानों से अब तो दिल भर गया
एक इंसान इंसान सा चाहिए।

देख कर जिसको मिट जाएं दुनिया के ग़म
कोई मासूम सी वो अदा चाहिए।

जब कभी पास जाने लगे प्यार से
बस तभी कह दिया फ़ासिला चाहिए।

ज़िंदगी से नहीं और कुछ मांगना
दोस्त "तनहा" हमें आपसा चाहिए।

पास आया नज़र जो किनारा हमें ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

पास आया नज़र जो किनारा हमें ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

पास आया नज़र जो किनारा हमें
मौज ने दूर फेंका दोबारा हमें।

ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी
यूँ लगा है किसी ने पुकारा हमें।

लड़खड़ाये तो खुद ही संभल भी गए
मिल न पाया किसी का सहारा हमें।

हो गई अब तो धुंधली हमारी नज़र
दूर से तुम न करना इशारा हमें।

दुश्मनों से न इतना करम हो सका
हमने चाहा जो मरना न मारा हमें।

हमको मालूम है मौत देगी सुकूं
ज़िंदगी से मिला बोझ सारा हमें।

बिन बुलाये यहां आप क्यों आ गये
सबने "तनहा" था ऐसे निहारा हमें।   

अगस्त 25, 2012

कहां कुछ और मांगा है , यही इम्दाद कर दो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     कहां कुछ और मांगा है , यही इम्दाद कर दो ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहां कुछ और मांगा है ,यही इम्दाद कर दो
मिटा दो हर निशां मेरा ,मुझे बर्बाद कर दो।

सुना है आपकी मांगी दुआ सुनता खुदा है
किसी दिन आप मेरे वास्ते फ़रियाद कर दो।

हुआ मुश्किल बड़ा जीना हमारा अब जहां में
हमें अब जिंदगी की कैद से आज़ाद कर दो।

ज़माना बन नहीं जाए कहीं दुश्मन तुम्हारा
मिलेगी हर ख़ुशी तुमको हमें नाशाद कर दो।

ये दुनिया लाख दुश्मन हो हमें कुछ ग़म नहीं है 
हमारा साथ तुम देना उसे नक्काद कर दो।

नहीं देते कसम लेकिन हमें तुमसे है कहना
मिलेंगे रोज़ हम दोनों यहां मीआद कर दो।

सभी अपने यहां पर हैं ,नहीं हैं गैर "तनहा"
कहो अपनी सुनो उनकी अभी इतिहाद कर दो।  

भुला दें चलो सब पुरानी खताएं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भुला दें चलो सब पुरानी खताएं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भुला दें चलो सब पुरानी खताएं
नई अपनी पहचान फिर से बनाएं।

जो शिकवे गिले हैं निकालें दिलों से
करीब आ के हम हाथ अपने मिलाएं।

न मुरझाएं चाहे बदल जाए मौसम
हम आँगन में कुछ फूल ऐसे खिलाएं।

न हम जी सकेंगे न तुम दूर रह कर
तो फिर दूरियां ये न क्यूँ हम मिटाएं।

हो टूटा हुआ सिलसिला फिर से कायम
हमें तुम बुलाओ तुम्हें हम बुलाएं।

खताएं हमारी जफ़ाएं तुम्हारी
बहुत हो चुकीं अब चलो मान जाएं।

ज़मीं आस्मां चाँद तारों के नग्में
फिर इक साथ मिलकर तरन्नुम से गाएं। 
 

 

अगस्त 24, 2012

बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा
नहीं अब मिलेगा सहारा तुम्हारा।

नया और साथी तुम्हें मिल गया है
गया टूट नाता हमारा तुम्हारा।

हुई भूल हमसे भी कोई तो होगी
नहीं दोष होगा ये सारा तुम्हारा।

भुला कर हमें मत कभी याद करना
तभी हो सकेगा गुज़ारा तुम्हारा।

हमारे सितारे रहें गर्दिशों में
चमकता रहे पर सितारा तुम्हारा।

हमारी नज़र में अभी तक बसा है
था कितना हसीं वो नज़ारा तुम्हारा।

तुम्हें रात सपने में देखा था "तनहा"
वही नाम फिर था पुकारा तुम्हारा।

हादिसे इसलिए हैं होने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हादिसे इसलिए हैं होने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हादिसे इसलिये हैं होने लगे
कश्तियां नाखुदा डुबोने लगे।

ज़ख्म खा कर भी हम रहे चुप मगर
ज़ख्म दे कर हैं आप रोने लगे।

कल अभी  आपने  जगाया जिन्हें
देख लो आज फिर से सोने लगे।

आप मरने की मांगते हो दुआ
खुद पे क्यों  एतबार खोने लगे।

काम अच्छे नहीं कभी भी किये  
बस  नहा कर हैं पाप धोने लगे।

लोग खुशियां तलाश करते रहे 
दर्द का बोझ और ढोने लगे।

फूल देने की बात करते रहे 
खार "तनहा" सभी चुभोने लगे।

सुनो इक कहानी हमारी ज़ुबानी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सुनो इक कहानी हमारी ज़ुबानी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सुनो इक कहानी हमारी जुबानी
नई भी नहीं है न है ये पुरानी।

किसी ने किसी से किया प्यार इक दिन
रखी है छुपा कर अभी तक निशानी।

वहीँ पर सुबह से हुई शाम अक्सर
सुहाने थे दिन और रातें सुहानी।

नहीं भूल सकता कभी वो नज़ारा
किसी में थी देखी नदी की रवानी।

वो क्या दौर था दोस्तो ज़िंदगी का
लुटा दी किसी ने किसी पर जवानी।

अजब हाल देखा वहां पर सभी का
वहीं प्यास भी थी जहां पर था पानी।

इसे तुम जुबां पर कभी भी न लाना
सुना दी है "तनहा" तुम्हें जो कहानी।

हम सभी इस तरह बंदगी करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम सभी इस तरह बंदगी करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम सभी इस तरह बंदगी करते
दुश्मनी छोड़ कर दोस्ती करते।

तुम अगर रूठते हम मना लेते
जो किया था कभी फिर वही करते।

जी सकेंगे नहीं बिन तुम्हारे हम
इस तरह से नहीं दिल्लगी करते।

क्यों नहीं छू लिया आसमां तुमने
काम मुश्किल नहीं गर कभी करते।

छोड़ आये जिसे घर तुम्हारा है
बस यही सोचकर वापसी करते।

ज़ुल्म सहते रहे हम ज़माने के
पर शिकायत किसी से नहीं करते।

एक हसरत लिये चल दिये "तनहा"
मत लगाते गले बात ही करते।  

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया
हुआ क्या नहीं साथ तुमने निभाया।

किसी ने निकाला हमें आज दिल से
बड़े शौक से कल था दिल में बिठाया।

कभी पोंछते जा के आंसू उसी के
था बेबात जिसको तुम्हीं ने रुलाया।

निभाना वफा तुम नहीं सीख पाये 
तुम्हें जिसने चाहा उसी को मिटाया।

चले जा रहे थे खुदी को भुलाये
किसी ने हमें आज खुद से मिलाया।

खड़े हैं अकेले अकेले वहीँ पर
जहाँ आशियाँ इक कभी था बसाया।

उसे याद रखना हमेशा ही "तनहा"
ज़माने ने तुमको सबक जो सिखाया।

अगस्त 22, 2012

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में
आज कैसे कह दिया सब कुछ यहां आगाज़ में।

आप कहना चाहते कुछ और थे महफ़िल में ,पर
बात शायद और कुछ आई नज़र आवाज़ में।

कह रहे थे आसमां के पार सारे जाएंगे
रह गई फिर क्यों कमी दुनिया तेरी परवाज़ में।

दे रहे अपनी कसम रखना छुपा कर बात को
क्यों नहीं रखते यकीं कुछ लोग अब हमराज़ में।

लोग कोई धुन नई सुनने को आये थे यहां
आपने लेकिन निकाली धुन वही फिर साज़ में।

देखते हम भी रहे हैं सब अदाएं आपकी
पर लुटा पाये नहीं अपना सभी कुछ नाज़ में।

तुम बता दो बात "तनहा" आज दिल की खोलकर
मत छिपाओ बात ऐसे ज़िंदगी की राज़ में।

राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया "तनहा"

राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं
जिस पर निशान गालिबो दागो जिगर के हैं।

जाने कहां कहां के हमें जानते हैं लोग
हमको तो ये गुमां था कि तेरे नगर के हैं।

वो काफिले तो जानिबे मंज़िल चले गये 
बाकी रही है गर्द वहां हम जिधर के हैं।

मिलते हैं अजनबी की तरह लोग किसलिये 
हम सब तो रहने वाले उसी एक घर के हैं।

ये दर्दो ग़म भी खुद को करें किस तरह जुदा
रिश्ते हमारे इनसे तो शामो - सहर के हैं। 
 
साहिल की रेत को भी भला इसकी क्या खबर 
बिखरे पड़े हैं जो ये महल किस बशर के हैं। 
 
सुनसान शहर सारा अंधेरा गली गली
थोड़ा जिधर उजाला है "तनहा" उधर के हैं। 

यूट्यूब पर मेरा चैनल " अंदाज़-ए -ग़ज़ल " से वीडियो पेश करता हूं। 

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नफरत के बदले प्यार दिया है हमने ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       नफरत के बदले प्यार दिया है हमने ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

नफरत के बदले प्यार दिया है हमने
शायद ये कोई जुर्म किया है हमने।

मरना भी चाहा , मर सके न हम लेकिन
लम्हा लम्हा घुट घुट के जिया है हमने।

दिल में उठती है टीस सी इक रह रह कर
नाम उसका जो भूले से लिया है हमने।

तू हमसे ज़िंदगी ,क्यों है बता रूठी सी
ऐसा भी क्या अपराध किया है हमने।

हमको कातिल कहने वाले , ऐ नादां
तुझ पर आया हर ज़ख्म सिया है हमने।

उसने अमृत या ज़हर दिया है हमको
जाने क्या यारो , आज पिया है हमने। 
 
साकी बन कर "तनहा" भर दो पैमाना
किस्मत से ख़ाली जाम लिया है हमने।   

आप मेरे यूट्यूब चैनल पर भी वीडियो देख सुन सकते हैं। 



कहीं न कह दें दिल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहीं न कह दें दिल की बात ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहीं न कह दें दिल की बात
बन जाये महफ़िल की बात।

डूब गई अश्कों के
सागर में साहिल की बात।

मिलती नहीं ये मांगे से
मौत बड़ी मुश्किल की बात।

एक ज़माना कातिल है
किससे कहें कातिल की बात।

ज़हन में भूले भटकों के
उतर गई मंजिल की बात।

कहीं न लब पर आ जाये 
मदहोशी में दिल की बात।

पायल की छमछम में भी
होती है दर्दे दिल की बात।

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं
शख्स जो सच की राह चलते हैं।

राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं।

गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं।

जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं।

जान रखते हैं वो हथेली पर
मौत क़दमों तले कुचलते हैं।

कीमत उनकी लगाओगे कैसे
लाख लालच दो कब फिसलते हैं।

टालते हैं हसीं में  वो उनको
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं। 

सब से पहले आपकी बारी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सब से पहले आपकी बारी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सब से पहले आप की बारी
हम न लिखेंगे राग दरबारी।

और ही कुछ है आपका रुतबा
अपनी तो है बेकसों से यारी।

लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे
आंकड़े कहते हैं सरकारी।

फूल सजे हैं गुलदस्तों में
किन्तु उदास चमन की क्यारी।

होते सच , काश आपके दावे
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी।

उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत
भाड़ में जाये जनता सारी।

सब को है लाज़िम हक़ जीने का
सुख सुविधा के सब अधिकारी।

माना आज न सुनता कोई
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी।

हम तो जियेंगे शान से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम तो जियेंगे शान से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम तो जियेंगे शान से
गर्दन झुकाये से नहीं।

कैसे कहें सच झूठ को
हम ये गज़ब करते नहीं।

दावे तेरे थोथे हैं सब
लोग अब यकीं करते नहीं।

राहों में तेरी बेवफा
अब हम कदम धरते नहीं।

हम तो चलाते हैं कलम
शमशीर से डरते नहीं।

कहते हैं जो इक बार हम
उस बात से फिरते नहीं।

माना मुनासिब है मगर
फरियाद हम करते नहीं। 

तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम
और उसपे उमड़ते हुए जज़्बात का आलम।

याद आता है वो वक्ते मुलाकात हमारा
बरसात में भीगे हुए हालात का आलम।

बस भीगते ही रहने में थी खैर हमारी
बौछार से कम न था शिकायात का आलम।

दीवाना बनाने हमें रिमझिम में चला है
दुजदीदा निगाहों के इशारात का आलम।

लफ़्ज़ों में बयाँ कर न सकूँगा मैं सुहाना
भीगी हुई जुल्फों की सियह रात का आलम।

दिल में आता है सतायें उनको ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दिल में आता है सतायें उनको ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दिल में आता है सताएं उनको
बात ये कैसे बताएं उनको।

एक मुद्दत हुई दीदार किये
किस बहाने से बुलाएं उनको।

वो तो हर बात पे हंस देते हैं
कभी रूठें तो मनाएं उनको।

ये सितम हमसे न होगा हर्गिज़
कि शबे हिज्र रुलाएं उनको।

हमने पूछा था सवाल उनसे कभी
याद वो कैसे दिलाएं उनको।

खुद ग़ज़ल हैं वो हमारे दिल की
क्या भला और सुनाएं उनको। 
 
चाह दिल में है अभी तक "तनहा"
कस के सीने से लगाएं उनको।
 

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं।

बात करता है किस लोक की ये जहां
लोक -परलोक से हम तो डरते नहीं।

हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं।

आईने में तो होता है सच सामने
सामना इसका सब लोग करते नहीं।

खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर
नाम के नाखुदा पार उतरते नहीं।

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई
फिर भी कुछ दोस्त बनाए हमने।

फूल उनको समझ कर चले कांटों पर
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाए हमने।

यूं तो नग्में थे मुहब्बत के भी
ग़म के नग्मात ही गाए हमने।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर
जिनसे दुःख दर्द छिपाए  हमने।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार
खुद ही भेजे ख़त पाए  हमने।

उसने ही रोज़ लगाई ठोकर 
जिस जिस के नाज़ उठाए हमने। 

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा"
मेले कई बार लगाए  हमने।  

फिर कोई कारवां बनाएं हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फिर कोई कारवां बनाएं हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फिर कोई कारवां बनाएं हम
या कोई बज़्म ही सजाएं हम।

छेड़ने को नई सी धुन कोई
साज़ पर उंगलियां चलाएं हम।

आमदो - रफ्त होगी लोगों की
आओ इक रास्ता बनाएं हम।

ये जो पत्थर बरस गये  इतने
क्यों न मिल कर इन्हें हटाएं हम।

है अगर मोतियों की हमको तलाश
गहरे सागर में डूब जाएं हम।

दर- ब- दर करके दिल से शैतां को
इस मकां में खुदा बसाएं हम।

हुस्न में कम नहीं हैं कांटे भी
कैक्टस सहन में सजाएं हम।

हम जहां से चले वहीं पहुंचे
अपनी मंजिल यहीं बनाएं हम।

लोग सब चुप उदास महफ़िल है 
फिर से "तनहा" को ढूंढ लाएं हम। 
 

अब आप मेरी ग़ज़ल और नज़्म मेरे यूट्यूब चैनल : अंदाज़-ए-ग़ज़ल , पर भी सुन सकते हैं। 


 

भीगा सा मौसम हो और हम हों ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भीगा सा मौसम हो और हम हों ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भीगा सा मौसम हो और हम हों
भूला हुआ हर ग़म हो और हम हों।

फूलों से भर जाये रात रानी 
महकी हुई पूनम हो और हम हों।

झूल के झूले में आकाश छू लें  
रिमझिम की सरगम हो और हम हों।

भूली बिसरी बातें याद करके 
चश्मे वफा पुरनम हो और हम हों।

आकर जाने की सुध बुध भुलायें 
थम सा गया आलम हो और हम हों।

आओ चलें हम उन तनहाइयों में
जिन में सुकूं हरदम हो और हम हों।

मिल न सकें तो मौत ही हमको आये
रूहों का संगम हो और हम हों।

अब आप ये ग़ज़ल मेरे यूट्यूब चैनल पर भी सुन सकते है। 



अगस्त 20, 2012

दो आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

  दो आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू। 

अगस्त 19, 2012

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया 

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग
आईने से यूँ परेशान हैं लोग।

बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग।

जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें
उन को ही देख के हैरान हैं लोग।

अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग।

आदमीयत  को भुलाये बैठे
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग।

शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी
बन गए शहर की जो जान हैं लोग।

मुझको मरने भी नहीं देते हैं
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग। 

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं
जो पिछड़ जाते हैं वो लोग बिखर जाते हैं।

जिनको मिलता ही नहीं कोई जीने का सबब
मौत से पहले ही अफ़सोस वो मर जाते हैं।

मुश्किलों को कभी आसान नहीं कर सकते
उलझनों से , वो सभी लोग , जो डर जाते हैं।

जो नहीं मिलता कभी जा के किनारों पे हमें
वो उन्हें मिलता है जो बीच भंवर जाते हैं।

हम समझते हैं जिन्हें अपना वो गैरों की तरह
पेश आते हैं तो हम जीते जी मर जाते हैं।

गैर अच्छे जो मुसीबत में हमारी आकर
दोस्तों जैसा कोई काम तो कर जाते हैं।

आएगा कोई हमारा भी मसीहा बन कर
आस में, उम्र तो क्या , युग भी गुज़र जाते हैं।  
 

दोस्तो अब आप मेरी नज़्म / ग़ज़ल मेरे यूट्यूब चैनल पर भी देख सुन सकते हैं। 

लिंक नीचे दिया गया है। अंदाज़-ए -ग़ज़ल। 


 

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं
फायदा ज़हर भी कर जाते हैं।

सीख जाते हैं भुलाना उनको
बन के जो गैर गुज़र जाते हैं।

ख्वाब तो ख्वाब हैं उनका क्या है
नींद जो टूटी बिखर जाते हैं।

एक तिनके का सहारा पा कर
डूबने वाले भी तर जाते हैं।

इस से पहले कि उन्हें पहचाने
वो जो करना था , वो कर जाते हैं।

फूल यादों पे चढ़ाओ उनकी
जीते जी लोग जो मर जाते हैं।  
 
बैठ चुप-चाप कहीं पर "तनहा" 
जब हुई शाम तो घर जाते हैं।
 

अब हमें दिल की बात कहने दो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

अब हमें दिल की बात कहने दो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

अब हमें दिल की बात कहने दो
हो जो मुमकिन तो अश्क बहने दो।

सब चले जाएंगे कभी न कभी
कोई मेहमान अभी तो रहने दो।

वक़्त इसका इलाज कर देगा
दिल को अब तो ये दर्द सहने दो।

ख़त्म कर दो खामोशियों को आज
कहना है जो लबों को कहने दो।

रोक पाई न इश्क को दुनिया
ये तो दरिया है इसको बहने दो।

देखो खुद बन के तुम तमाशाई
हिलती दीवार घर की ढहने दो।

बात दिल में थी जो बता न सके ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

बात दिल में थी जो बता न सके ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

बात दिल में थी जो बता न सके
आपबीती उन्हें सुना न सके।

हमने कोशिश हज़ार की लेकिन
बेकरारी ए दिल छिपा न सके।

बातें करते रहे ज़माने की
बात अपनी जुबां पे  ला न सके।

चाह कर भी घटा सी जुल्फों को
उनके चेहरे से हम हटा न सके।

हमने पूछा जो बेरुखी का सबब
वो बहाना कोई बना न सके।

जाने वाले ने देखा मुड़ मुड़ कर
हम मगर उसको रोक पा न सके।   
 
छोड़ कर दोस्त चल दिए "तनहा" 
हम भी गैरों के पास जा न सके।
 
 

है शहर में बस धुआं धुंआ ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

है शहर में बस धुआं धुंआ ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

है शहर में बस धुआं धुआं
न रौशनी का कोई निशां।

ये पूछती है नज़र नज़र
है आदमी का कोई निशां।

समझ सके जो यहाँ है कौन
ज़रा सी इक बच्ची की जबां।

कहीं भी दिल लगता ही नहीं
जो कोई जाये भी तो कहाँ।

सुनाएँ कैसे किसी को हम
इक उजड़े दिल की ये दास्ताँ। 

वो दर्द कहानी बन गया ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

वो दर्द कहानी बन गया ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

वो दर्द कहानी बन गया
इक याद पुरानी बन गया।

पत्र जो वापस मिला मुझे
वो उसकी निशानी बन गया।

उसकी महफ़िल में जाना ही
मेरी नादानी बन गया।

लबों तक बात आ न सकी
पलकों का पानी बन गया।

उनका पूछना हाल मेरा
इक मेहरबानी बन गया।

याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

याद तुम्हें करता है कोई
जीते जी मरता है कोई।

लफ्ज़े-मुहब्बत अपनी जुबां पर
लाने से डरता है कोई।

दुनिया में इक वो ही हसीं है
इस का दम भरता है कोई।

सूखे फूल चढा कर कैसी
ये पूजा करता है कोई।

खुद से तन्हाई में बातें
दीवाना करता है कोई।

वादा करके भी वो न आया
यूँ भी ज़फा करता है कोई।  

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

लब पे आई तो मुहब्बत आई
भूल कर भी न शिकायत आई।

बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में
फिर हमें याद वो मूरत आई।

हम से बिछड़ी जो अभी शाम ढले
रात भर याद वो सूरत आई।

कश्ती लहरों के हवाले कर दी
बेबसी में जो ये नौबत आई।

आसमां रंग बदल कर बोला
लो ज़मीं वालो कयामत आई।

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

शीशे सा नाज़ुक घर भी है
कुछ तूफानों का डर भी है।

जीने की चाहत है लेकिन
पीना ग़म का सागर भी है।

इंसानों की खबर न कोई
शहर का ऐसा मंज़र भी है।

यूँ तो है खामोश किनारा
लहर गई टकरा कर भी है।

ढूंढ के उसको लाओ कहीं से
खोया सहर में दिनकर भी है।

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम
यही सोच के चल पड़े थे हम।

न पतवार थी न कोई माझी
हौसलों से हुए बड़े थे हम।

वक़्त आया जो फैसले का
खुद अपने से भी लड़े थे हम।

ज़माने की आग से पक गए
वरना कच्चे घड़े थे हम।

झुक गए तेरी मुहब्बत में
तबीयत से सरचड़े थे हम।

मोम की तरह पिघल गए
कभी फौलाद से कड़े थे हम।

फरियाद कातिल से न करेंगे
इसी बात पे अड़े थे हम।

जीवन राह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

जीवन राह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

खुद पे ही एतबार कर लो
ज़िंदगी का तुम दीदार कर लो।

जो मंज़िल की चाह है तुम्हें
मुश्किलों से भी प्यार कर लो।

बेहतर है ये किनारे बैठने से
डूब जाओ या कि पार कर लो।

बदल सकते हो हवा का रुख
हौसला तुम एक बार कर लो।

कौन अपना है कौन बेगाना
प्यार से मिले जो प्यार कर लो।
 

पुष्प ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 पुष्प ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया    

पल दो पल में मुर्झाऊंगा
शाख से टूट के क्या पाउँगा।

आज सजा हूँ गुलदस्ते में
कल गलियों में बिखर जाऊंगा।

उतरूंगा जो तेरे जूड़े से
बासी फूल ही कहलाऊंगा।

गूंथा जाऊंगा जब माला में
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा।

मेरे खिलने का मौसम है
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा।

चुन के मुझे ले जायेगा माली
डाली को याद बहुत आऊंगा।

वो जहाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       वो जहां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम।

अगस्त 18, 2012

मैं रहूंगा हमेशा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       मैं रहूंगा हमेशा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जिवित रहूंगा मैं
अपने लेखन में
हमेशा।

मौत भी
नहीं मिटा सकेगी
दुनिया से
मेरा अस्तित्व।

जब भी चाहो
मिलना तुम मुझसे
और चाहो
मेरे करीब होने का
करना  एहसास तुम
पढ़ लेना
फिर से एक बार मुझे।

होगा हर बार
तुम्हें आभास
मेरे पास होने का
मरते नहीं हैं विचार कभी भी। 

अगस्त 17, 2012

कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जानता हूं मैं
चाहते हो पढ़ना
मेरे मन की
पुस्तक को
जब भी आते हो
मेरे पास तुम।

बैठ कर सामने मेरे
तकते रहते हो
चेहरा मेरा
कनखियों से
चुपचाप।

जान कर भी
बन जाता हूं अनजान मैं
क्योंकि समझता हूँ  मैं
जो चाहते हो पढ़ना तुम 
नहीं लिखा है
वो मेरे चेहरे पर।

तुम्हें क्या मालूम
क्यों खाली है अभी तक
किताब मेरे मन की।

मिटा दिया है किसी ने
जो भी लिखा था उस पर। 

अगस्त 15, 2012

बेचैनी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

  बेचैनी ( नज़्म )  डॉ  लोक सेतिया 

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास। 

देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे - डॉ लोक सेतिया

देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

अगस्त 14, 2012

जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्ने आज़ादी हर साल मनाते रहे
शहीदों की हर कसम हम भुलाते रहे।

याद नहीं रहे भगत सिंह और गांधी 
फूल उनकी समाधी पे बस चढ़ाते रहे।

दम घुटने लगा पर न समझे यही 
काट कर पेड़ क्यों शहर बसाते रहे।

लिखा फाइलों में न दिखाई दिया
लोग भूखे हैं सब नेता झुठलाते रहे।

दाग़दार हैं इधर भी और उधर भी
आइनों पर सभी दोष लगाते रहे।

आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे हुआ
बाड़ बनकर रहे खेत भी खाते रहे।

यह न सोचा कभी आज़ादी किसलिए
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ भुलाते रहे।

मांगते सब रहे रोटी , रहने को घर
पांचतारा वो लोग होटल बनाते रहे।

खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन
वो सुनाते रहे लोग भी गाते रहे।

अगस्त 13, 2012

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें (ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें
बन गए सब मतलबी हम क्या करें।

प्यार से देखा हमें जब आपने
ले गई दिल सादगी हम क्या करें।

अब बताएं सब हुस्न वाले हमें
जब सताए आशिकी हम क्या करें।

एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें।

दिल हमारा लूट कर कल ले गईं
सब अदाएं आपकी हम क्या करें।

प्यार उनको जब रकीबों से हुआ
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें।

आज कितना दूर देखो हो गया
आदमी से आदमी हम क्या करें।

सब परेशां लग रहे इस शहर में
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें।

आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें। 

अगस्त 12, 2012

हमको जीने की दुआ देने लगे (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको जीने की दुआ देने लगे (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको जीने की दुआ देने लगे
आप ये कैसी सज़ा देने लगे।

दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे।

लोग आये थे बुझाने को मगर
आग को फिर हैं हवा देने लगे।

अब नहीं उनसे रहा कोई गिला
अब सितम उनके मज़ा देने लगे।

साथ रहते थे मगर देखा नहीं
दूर से अब हैं सदा देने लगे।

प्यार का कोई सबक आता नहीं
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे।

कल तलक मुझ से सभी अनजान थे
अब मुझे मेरा पता देने लगे।

मांगता था मौत "तनहा" रात दिन
जब लगा जीने , कज़ा देने लगे। 

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते।

ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन
लोग फिर भी बगावत नहीं करते।

इस कदर भा गया है कफस हमको
अब रिहाई की हसरत नहीं करते।

हम भरोसा करें किस तरह उन पर
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते।

आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं
हम कभी ये शिकायत नहीं करते।

पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो
चाँद छूने की चाहत नहीं करते।

तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते।

पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा"
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते।

हल तलाशें सभी सवालों का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हल तलाशें सभी सवालों का ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

हल तलाशें सभी सवालों का
है यही रास्ता उजालों का।

तख़्त वाले ज़रा संभल जायें
काफिला चल पड़ा मशालों का।

फूल भेजे हैं खुद रकीबों को
दे दिया है जवाब चालों का।

प्यास बुझती नहीं कभी उनकी
दर्द समझो कभी तो प्यालों का।

ख्वाब हम देखते रहे शब भर
मखमली से किसी के बालों का।

बेच डालें न देश को इक दिन
कुछ भरोसा नहीं दलालों का।

राज़ दिल के सभी खुले "तनहा"
कुछ नहीं काम दिल पे तालों का।

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना।

मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना।

कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना।

अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना।

ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना।

मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना।

हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा"
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना।

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे
कुछ नये  रास्ते खुद बनाते रहे।

आशियाँ इक बनाया था हमने कहीं
उम्र भर फिर उसे हम सजाते रहे।

हर ख़ुशी दूर हमसे रही भागती
हादसे साथ अपना निभाते रहे।

तुम भी मदहोश थे हम भी मदहोश थे
दास्ताँ फिर किसे हम सुनाते रहे।

ख्वाब देखे कई प्यार के रात भर
जब खुली आँख सब टूट जाते रहे।

इक ग़ज़ल आपकी क्या असर कर गई
हम उसे रात दिन गुनगुनाते रहे।

जा रहे हैं मगर फिर मिलेंगे कभी
दीप आशा के "तनहा" जलाते रहे।      

दिल पे अपने लिखी दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     दिल पे अपने लिखी दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल।

वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल।

वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल।

आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल।

बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल।

जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम  नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल।

अगस्त 11, 2012

सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे ( ग़ज़ल ) 

                                 डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे
अब ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे।

जब तक पिलायेंगे सभी पीते ही रहेंगे
लिखने लगे जब हम मुहब्बत, जाम लिखेंगे।

पाई सज़ाएँ बेखता उनसे तो हमेशा
अब हम मगर उनके लिए इनाम लिखेंगे।

उसको लिखेंगे ख़त कभी दिल खोल के हम भी
हम हो गये तेरे लिये बदनाम लिखेंगे।

साकी से पूछो हम हुए मदहोश नहीं थे
भर- भर पिलाये हैं उसी ने जाम  लिखेंगे।

होगा सुनाने का नया अंदाज़ हमारा
कोई ग़ज़ल हम जब किसी के नाम लिखेंगे।

लिखने लगे जब सच तो लिखना छोड़ मत देना
"तनहा" लिखेंगे , और सुबहो-शाम लिखेंगे।

यही सोचकर आज घबरा गये हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम
चले थे कहाँ से कहाँ आ गये हम।

तुम्हें क्या बतायें फ़साना हमारा
किसे छोड़ आये किसे पा गये हम।

जिया ज़िंदगी को बड़ी सादगी से
दिया जब किसी ने ज़हर खा गये हम।

खुदा जब मिलेगा कहेंगे उसे क्या
यही सोचकर आज शरमा गये हम।

रहे भागते ज़िंदगी के ग़मों  से
मगर लौट कर रोज़ घर आ गये हम।

मुहब्बत रही दूर हमसे हमेशा
न पूछो ये हमसे किसे भा गये हम।

उसी आस्मां ने हमें आज छोड़ा
घटा बन जहाँ थे कभी छा गये हम।

रहेगी रुलाती यही बात "तनहा"
ख़ुशी का तराना कहाँ गा गये हम।   

अगस्त 10, 2012

चंद धाराओं के इशारों पर ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते
जो न करते यकीं सहारों पर।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर
अब भरोसा नहीं कहारों पर।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम
जिन को उम्मीद थी सितारों पर।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के
फूल रख आये हम मज़ारों पर।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर। 

कोई हमराज़ अपना बना लीजिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कोई हमराज़ अपना बना लीजिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

कोई हमराज़ अपना बना लीजिये
एक अपनी ही दुनिया बसा लीजिये।

खुल के हंसिये तो ऐ हज़रते दिल ज़रा
दर्दो-ग़म अपने सारे  मिटा लीजिये।

ज़िंदगी की अगर लय पे चलना है तो
साज़े दिल पर कोई धुन बजा लीजिये।

अपना दुश्मन समझते थे कल तक जिन्हें
आज उनको गले से लगा लीजिये।

जो कहें आप बेख़ौफ़ हो कर कहें
कुछ तो अल्फाज़े-हिम्मत जुटा लीजिये।

ताज की बात तो बाद की बात है
खुद को शाहे जहां तो बना लीजिये।

जो भी होना है अंजाम हो जाएगा
आप उल्फत का बीड़ा उठा लीजिये।  

कैसे कैसे नसीब देखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं
पैसे वाले गरीब देखे हैं।

हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं।

दोस्तों की न बात कुछ पूछो
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं।

जिंदगी को तलाशने वाले
मौत ही के करीब देखे हैं।

तोलते लोग जिनको दौलत से
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं।

राह दुनिया को जो दिखाते हैं
हम ने विरले अदीब देखे हैं।

खुद जलाते रहे जो घर तनहा
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं।   

शिकवा तकदीर का करें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा तकदीर का करें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा तकदीर का करें कैसे
हो खफा मौत तो मरें कैसे।

बागबां ही अगर उन्हें मसले
फूल फिर आरज़ू करें कैसे।

ज़ख्म दे कर हमें वो भूल गये
ज़ख्म दिल के ये अब भरें कैसे।

हमको खुद पर ही जब यकीन नहीं
फिर यकीं गैर का करें कैसे।

हो के मजबूर ज़ुल्म सहते हैं
बेजुबां ज़िक्र भी करें कैसे।
 
भूल जायें तुम्हें कहो क्यों कर
खुद से खुद को जुदा करें कैसे।

रहनुमा ही जो हमको भटकाए
सूए- मंजिल कदम धरें कैसे। 

अगस्त 09, 2012

फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फैसले तब सही नहीं होते
बेखता जब बरी नहीं होते।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते।

क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते।

जो न इंसाफ दे सकें हमको
पंच वो पंच ही नहीं होते।

सोचना जब कभी लिखो " तनहा "
फैसले आखिरी नहीं होते।

अगस्त 08, 2012

इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं।

अगस्त 07, 2012

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया।

अब बहारो खिज़ा से क्या डरना
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया।

जब निभाना हुआ नामुमकिन तब
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया।

हो गये हैं जो कब से बेगाने
उनको अपना बनाना छोड़ दिया।

कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये
हर किसी को बताना छोड़ दिया।

उनको कोई ये जा के बतलाये
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया।

मिल गया अब हमारे दिल को सुकून
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया।

ख्याल आया हमारे दिल में यही
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया।

हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया।  
 

 

मुझे लिखना है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मुझे लिखना है  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहाँ।

बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में।

अगस्त 05, 2012

माँ के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मां के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।

खुशियों के मोती ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 खुशियों के मोती  ( कविता )   डॉ लोक सेतिया

हम करते रहते हैं
तलाश जीवन भर
खुशियों को।

कभी कभी
पल भर को आती हैं
जीवन में।

कुछ खुशियाँ
फिर खो जाती हैं
जाने कहाँ वो।

रह नहीं पाती
सदा के लिए
किसी के पास भी
खुशियाँ।

करें किसी दिन
हम ऐसा   
दें सहारा
किसी अजनबी को
बिना किसी स्वार्थ के करें
दूर किसी और की
कोई परेशानी।

मिलेगी तब हमें
जीवन की
वास्तविक ख़ुशी
जो ख़त्म नहीं होगी
पल भर में। 

बहाए अपने दुःख दर्द में
उम्र भर आंसू
व्यर्थ गए
सूख गए पानी की तरह।

कभी देखें बहा कर
आंसू औरों के दुःख में
बन जाएंगे  सच्चे मोती
आंसू हमारे उस दिन।  

अगस्त 01, 2012

जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ( वसीयत-नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

     जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ( वसीयत-नज़्म ) 

                            डॉ लोक सेतिया

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।