सितंबर 28, 2026

POST : 2123 सत्तासुंदरी का चीरहरण ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

          सत्तासुंदरी का चीरहरण ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया 

सभा आयोग की है , चर्चा महाभियोग की है , राजनीति को लग चुके गंभीर लाईलाज रोग की है ।  मुखिया को इक ऐसा वरदान उपहार में दिया गया जिस से उस के सौ नहीं करोड़ नहीं असंख्य अपराध करने पर भी कोई सज़ा की तो बात ही क्या कोई मुकदमा तक दर्ज नहीं किया जा सकेगा ।  ऐसा अभयदान मिलना कोई छोटी बात नहीं थी लेकिन जब ये साबित हो गया कि आयोग में कोई आधुनिक दुर्योधन सत्तासुंदरी का चीरहरण निरंतर कर रहा था और सभी मंच पर आसीन सदस्य ख़ामोशी से तमाशाई बन जो होता है होने दो को चतिरार्थ करते रहे , लेकिन अपनी असहमति दर्ज भी ऐसे करते रहे जैसे कोई महसूस करता है कि उनका इस से कुछ लेना देना नहीं है , अकेला इक व्यक्ति लाभार्थी है ।  खुल कर कहते तो रासलीला में उनको शामिल ही नहीं किया गया वो दोनों तरसते ही रहे ।  रोकने की चेष्टा उन्होंने की ही नहीं का मतलब वही जानते है क्योंकि सब गैरकानूनी ढंग से हो रहा समझ कर भी उनको अपने कर्तव्य निभाने की आवश्यकता नहीं महसूस हुई कभी ।  जब बात खुली तब उनको अपना बचाव याद आया देश की व्यवस्था को बर्बाद होते देख कर बचाना उनको महत्वपूर्ण नहीं लगा था ।  कुछ लोग जिनको हमेशा किसी धर्म को बचाने की चिंता रहती थी उनको धर्म अधर्म से कोई मतलब नहीं रहा है उनको यकीन हो गया कि सिर्फ आयोग के मुखिया ही इकलौते ऐसे शख़्स हैं जिनके कारण उनका कायम शासन कायम है , ऐसे में उनको देश का सबसे बड़ा पुरस्कार भारत रत्न देना कोई विशेष बड़ी बात नहीं है ।  
 
कब से सत्तासुंदरी का नृत्य देखने का आनंद उनको मिलता रहा था केवल उसी आयोग की अनुकंपा से ही बाक़ी जितना भी प्रयास किया गया धन दौलत प्रचार इत्यादि सब किसी काम नहीं आता बिना उनकी मर्ज़ी से  चुनावी राजनीति का गणित साधना असंभव  ही होता  ।  धार्मिक कथाओं कहानियों पर इधर कितनी फ़िल्में टीवी सीरियल बनाये जा रहे हैं लेकिन कोई नहीं जानता था कि आज भी कोई आधुनिक युग की महाभारत कथा की पटकथा लिख ही नहीं रहा बल्कि दुर्योधन का अवतार बन कर जीवंत किरदार निभा रहा है वो भी ऐसे कि कोई कृष्ण नहीं प्रकट हो सके बचाने को । आधुनिक शासन में शकुनी से लेकर सभी सभासद धृतराष्ट्र के पुत्रमोह का समर्थन खुल कर कर रहे थे किसी को भी कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता था क्योंकि सभी अपने अपने स्वार्थों और घर परिवार के मोहजाल में उलझे हुए अपनी मौज में निरपेक्ष भाव से सहभागी थे ।  आधुनिक युग की रामायण वास्तव में महाभारतकालीन कथा का नवीन संस्करण है , जनता रुपी सीता का अपहरण खुद जिस ने किया है उसने राजा राम का रूप वेशभूषा धारण कर अयोध्या ही नहीं सब दुनिया को भ्र्मजाल  में फंसा लिया है ।  
 
कोई संतान नहीं है लव कुश जैसी जो सभी को राजा राम की वास्तविक कथा सुनाते , नकली संताने कितनी हैं जिनको अपने आका का झूठा गुणगान करना पसंद है ताकि उनको सत्ता की रेवड़ियां मिलती रहें ।  आधुनिक अधर्म कथा का कोई अंत कभी नहीं होने वाला है बल्कि जाने कितने नये अध्याय आगे शामिल होने को तैयार हैं  ।  लोग कुछ भी कहते नहीं हैं भले भगवान के मंदिर से ही लुटेरे चोरी कर शान से भगवान भक्त कहलाते रहें ।  आयोग ने सर्वसम्मति से इक गीत को स्वीकृति प्रदान की है जिसे सभी कर्मचारियों को वितरित किया गया है समझने और पालन करने को तभी उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा ।  देश में करोड़ों लोगों को भले घना अंधकार नसीब होता रहे उनके लिए चकाचौंध रौशनी मिलने का इंतज़ाम किया जाता रहेगा ।    
 

   चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य - कविता ) 

सी लो लबों को और चुप  रहा करो 
ज़ुल्म भी हंसते हंसते सब सहा करो । 
 
चोर को साहूकार कहना सीखो भी   
अब ख़िज़ाओं को बहार कहा करो । 
 
ये ज़माना झूठे लोगों का है  ज़माना 
हमको तुम सब पर ऐतबार कहा करो । 
 
देश के रहनुमाओं का यकीन करो 
इश्तिहार पढ़कर सरकार कहा करो ।
 
उनकी हसरत मसीहा लोग समझें 
क़ातिल पर आता है प्यार कहा करो ।
 
जिनके तख्त ओ ताज़ हुक़ूमत हो  
बड़े अच्छे उनके सब यार कहा करो । 
 
आप अपने ही घर में रहकर खुद को   
हम यहां पर हैं किराएदार कहा करो । 
 
ज़िंदगी और मौत दोनों का यकीन नहीं 
जनाबेआली हम ख़ाकसार कहा करो । 
 
सितमगर है सितम की फ़ितरत भी है  
ज़ख़्म देता है दिया उपहार कहा करो । 
 

 
 


 

सितंबर 25, 2026

POST : 2122 सत्ता का हम्माम ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

   सत्ता का हम्माम ( हास्य - व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सुबह - शाम करते रहते हर हर गंगे थे 
धुल जाते थे पाप सभी बन जाते चंगे थे 
 
जिस्म साफ़ सफ़ेद अंदर से बदरंगे थे 
सत्ता की राजनीति में हुए खुद नंगे थे 
 
मैली चादर थी चुनाव आयोग नाम की 
छुपाए हुए काले कारनामे काले धंधे थे 
 
दरबार था झूठों का झूठे सारे दरबारी थे 
शानदार लिबासों में चोर थे भिखमंगे थे 
 
एक अख़बार की पत्रकार लड़की ने मगर 
फैंक पत्थर कांच की दिवार तोड़ डाली थी 
 
जाने कहां आंधी में उड़ गए सब के सब 
झूठ के पर्दे सत्ता के गलियारों में टंगे थे 
 
अब कैसा शर्माना सभी ही इक जैसे हैं जब 
गऊ माता देख रही बाड़े में बंधे भैंसे हैं सब 
 
गठड़ी पापों की इनकी कौन उठाएगा भला 
कितनी मैली कर दी गंगा बोलते हर हर गंगे थे 
 
 
सुबह -  शाम करते रहते हर हर गंगे थे 
धुल जाते थे पाप सभी बन जाते चंगे थे 
 

 
 

 
   

सितंबर 20, 2026

POST : 2121 खोखली बातें विकसित भारत की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     खोखली  बातें विकसित भारत की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

तेरे वादे पे जिये हम तो ये जान ए झूठ जाना , कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता ।  मुझे आज भी याद है डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने 2020 में विकसित भारत बनाने का सपना 1998 में दिखलाया था ।  और तब ये बात कोई ऐसे ही हवा हवाई ढंग से नहीं कही गई थी उनके नेतृत्व में करीब 500 विशेषज्ञों की टीम ने विज्ञान और भौतिकी विभाग के तहत भारत के विकास का इक विस्तृत तैयार किया था विज़न 2020 नाम से दस्तावेज़ लिखित जारी किया गया था ।  2020 आया भी और कोई आहट तक नहीं सुनाई दी उस घोषित सपने का अंजाम क्यों कैसा हुआ चिंतन करते तो मुमकिन है शासकों को थोड़ा शर्मिंदगी का एहसास हुआ होता ।  उस से पहले भी कभी बीस सूत्री कार्यक्रम कभी कितने और अलग अलग योजनाओं की घोषणा होती रही मगर सभी का नतीजा शून्य निकला ।  दर्द बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की , लेकिन आधुनिक कार्यकाल में पिछले 12 सालों में अनगिनत योजनाओं की घोषणा का इतिहास रचा गया और शायद एक भी साधरण जनता की खातिर घोषित योजना सफल हुई नहीं बल्कि सभी झूठी कपोलकल्पनाएं साबित हुई हैं ।  लेकिन आज फिर से बात 2047 की करने लगे हैं कभी खुद अटल बिहारी बाजपेयी जी ने संसद में कहा था हम ने माना कि  तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन , ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक ।  आज 2020 से 2047 की बात के संदर्भ में उनकी बात सच साबित हुई है जैसा शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने 200 साल पहले कहा था । 
 
मुमकिन तो बहुत कुछ होता है लेकिन वादे करना अलग बात होती है इरादे करना दूसरी बात होती है ।  उदाहरण ढूंढने कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है अभी कुछ दिन पहले जेपी नड्डा जी ने ये रहस्य खोला था कि 2014 में केंद्र की सत्ता मिलते ही मोदी जी ने देश के सभी 768 जिलों में पार्टी के शानदार कार्यालय जिन में पांच तारा होटल से बढ़कर सुविधाएं हों बनाने का संकल्प लिया था , जिस में से लगभग 563 से अधिक बन चुके हैं और बाकी पर निर्माण कार्य जारी है ।  उनके लिए ज़मीन का अधिग्रहण किया जा चुका है और सभी जगह कार्यालयों में आधुनिक कॉन्फ्रेंस हाल मीटिंग रूम डिजिटल सुविधाएं दी जा रही हैं ।  कहते हैं हाथी के खाने के दांत अलग दिखाने के अलग होते हैं बिल्कुल उसी तरफ सत्ता अपने अपने दल से चंदा देने वालों की खातिर सब समय पर करती है जबकि जनता देश समाज को झांसे में रखने को दिखावे वाले दांत के अंदाज़ में आडंबर तमाशे आयोजित किए जाते रहते है जिनका हक़ीक़त से कोई लेना देना कभी नहीं होता है ।  जो उनकी विचारधारा की या महत्वाकांक्षा की बात थी राम मंदिर से नया संसद भवन ही नहीं कितने अन्य ऐसे कार्य भले घटिया निर्माण साबित हुए लेकिन जल्दी जल्दी पूरे किये जाते रहे हैं ।  
 
काला धन वापस लाना था मगर देश विदेश में काला धन और भी तेज़ी से बढ़ता गया है यहां तक कि कोई न्यायधीश भी कहते हैं कि नोटबंदी काला धन को सफ़ेद बनाने का माध्यम था , खुद मोदी जी भी कहते हैं उनको काले सफेद से कोई फ़र्क नहीं पड़ता निवेश होना चाहिए ।  शायद ही किसी विकसित देश में कथनी और करनी में इतना विरोधाभास होने पर भी सरकार और राजनीतिक दल खुद अपनी पीठ थपथपाते दिखाई दे सकते हैं , जिस बात को लेकर शर्मिंदगी होनी चाहिए उसी पर गौरान्वित होना भारत में संभव हुआ है ।  1998 में भी शायद उनको मालूम था 22 साल बाद 2020 की बात सभी भूल जाएंगे कितने ज़िंदा रहते हैं कितने मर जाते हैं इंतज़ार में सोचना ही ज़रूरी नहीं लगा होगा , अब वही इतिहास की भूल फिर से दोहराई जा रही है 21 साल बाद 2047 में कौन ज़िंदा रहेगा देखने को सोचने की आवश्यकता ही नहीं है ।  लेकिन पिछली सरकारों को पानी पी पी कर कोसने वाली सरकार के राजनेता अपनी उन्हीं नाकामियों पर कुछ भी नहीं कहते बल्कि कोशिश करते हैं कि गरीबी भूख बदहाली से अपने तमाम अनैतिक कार्यों पर पर्दा डालने का और लूट से संवैधानिक संस्थाओं का सत्यानास करने तक  समाज को ठगने छलने धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं ।  अभी भी कोई उनकी बातों पर भरोसा करेगा कभी नहीं देश की जनता को कुछ समय तक झांसे में रखना संभव है हमेशा को नहीं कभी भी नहीं । 
 

 

सितंबर 18, 2026

POST : 2120 कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   कोई मरे कोई जीवे, सुथरा घोल बताशा पीवे ( हास परिहास ) 

                                 डॉ लोक सेतिया 

 ये पंजाबी लोक कहावत , या मुहावरा संत सुथरा शाह से जुड़ी हुई बात है ।  आग लगे बस्ती में मौज राम मस्ती में की तरह से दूसरों के सुःख दुःख से बेपरवाह अपने फक्क़ड़पन में बेफिक्र होकर ख़ुशी मनाता है ।  शायद संत सुथरे शाह का आधुनिक स्वरूप इस काल में सत्ता पर बैठा है कुछ भी नहीं करता सिर्फ़ मन की बात करना भाता है ।  चंचल मन का क्या है पल भर में दुनिया भर में विचरण करता है टिकता नहीं कभी किसी ठिकाने पर ।  संत सुथरे शाह ने अपने भीतर से आत्मा को कई साल पहले निकाल का छोड़ दिया था , जिसका साथ निभाना था उस आत्मा को अकेली छोड़ दिया था ।  आत्मा सीता की तरह बन बन भटकती रहती है उसको फुर्सत नहीं ये मोह माया की बात लगती है ।  लेकिन मोह माया शोहरत ताकत खुद उसे अपने लिए सबसे अधिक पसंद है जितना मिले थोड़ा लगता है सब हासिल है फिर भी ख़ालीपन है मन में लालसाओं का अंबार है ।  देश से राज्यों तक उनका विस्तार है अपनी सरकार की जय जयकार है मिटता नहीं अहंकार है कदम कदम दिखाई देता इक मझधार है नैया के डूबने का बन गया आसार है तब भी उनको नहीं मिलता चैन करार है नित नया तमाशा उनको दरकार है ।  कितने दीप जलाये तब भी बाहर  रौशनी भीतर घना अंधकार है  , लगता है जीत भी हुई बेकार है ऐसी जीत सबसे बड़ी हार है व्यर्थ हुआ हर इश्तिहार है सच अभी खामोश है तब भी झूठ बड़ा बेकरार है ।  जो उस पार था वही इस पार है अपनी ही कही हर बात खुद का उपहास बन गई है इंसान कितना लाचार है । 
 
आधी रात को जागते सोते की मदहोशी छाई है तन्हाई में कोई आवाज़ दी सुनाई है जैसे मर चुकी आत्मा फिर जाग गई है दुहाई दुहाई है ।  कितना कुछ जोड़ लिया है कोई हिसाब नहीं कुछ भी संग नहीं रहता अंधकार मिटाता माहताब नहीं ।  कर्मफ़ल की बात नहीं है कोई भगवान आखिर किस किस का कितना हिसाब लिखता होगा , उस से छुपा सकते हैं दुनिया से छुपा सकते हैं मगर अपनी जो इक अंतरात्मा है कभी मरने के बाद भी मरती नहीं है बस उसका सामना कैसे करोगे खुद अपने ही साये से डरोगे ।  जनाब के माथे पर पसीना है अरे ये जीना भी कोई जीना है दिन गुज़रते साल गुज़रते जाते बदलता रहता महीना है ये समय बड़ा ही कमीना है ।  पर्वत के शिखर से फ़िसलने का भय सताता है तब आगाज़ भूल अंजाम नज़र आता है , कोई कहीं दूर गाता है जो खोता है बस वही पाता है ।  मगर खोने पाने के हिसाब नहीं आता है असली बही खाता बतलाता है क़र्ज़ बढ़ता जाता है लेकिन उनको चार्वाक ऋषि का संदेश दिल बहलाता है , क़र्ज़ ले कर घी पियो कौन अगले जन्म में क़र्ज़ मांगता है कौन चुकाता है ।  ज़रा सी आहट से जी घबराता है नींद से कौन बार बार जगाता है उनको अब सही गलत का अंतर नहीं समझ आता है कोई साधु वही बोल दोहराता है उठ जाग मुसाफ़िर भौर भई अब रैन कहां जो सोवत है ।  क्या क्या कहते थे कितना कुछ कर दिखाना है जनता को धरती पर इक स्वर्ग दिखाना है , मगर कुछ भी किया नहीं करना चाहा ही नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ खुद अपना दिल बहलाते रहे खुद हंसते सबको रुलाते रहे , जाना उधर था और जनाब किधर जाते रहे । 
 
सबसे शानदार महानायक बनने की हसरत थी लेकिन अभिनय करते करते कहानी को इस तरह बयां किया कि विदूषक बनकर रह गए हैं ।  दुनिया हंस ही नहीं रही आपका उपहास कर रही है महसूस होता है सही नायक नहीं चुना किरादर निभाने को ,  जनता को कितना रुलाया है सोचा था कुछ कर दिखाओगे दिल की बेचैनियां मिटाने को । आपको आता नहीं कुछ भी सिवा झूठे आंसू दिखाने और लोगों को रुलाने को ।  खुशियों का अंबार लगा है गली गली शहर शहर उनका दरबार सजा है फिर भी दिल की उदासी जाती नहीं है , चैन की नींद आती नहीं है ।  दिया बुझने लगा है तेल ख़त्म हो गया है कोई बाती क्या कोई थाती नहीं है जिसे सौंप कर जाते किसी को देश या समाज को ।  ख़ाली ख़ाली पिंजरा है बिना चिड़िया का बसेरा है न तेरा है न मेरा है ।  कोई सागर दिल को बहलाता नहीं बेखुदी में भी करार आता नहीं हालत ऐसी हुई है ।  
 
आज फ़िल्मी अदाकारा तबस्सुम , किरण सचदेव , हास्य कलाकार की बात याद आई , वो अक्सर इक मुक्तक सुनाती थी : 
 
बादलों की तरह बरसते रहे , 
उम्र भर हंसी को तरसते रहे । 
 
कहकहे सारी दुनिया को हमने दिए 
और तबस्सुम को हम ही तरसते रहे ।  
 
  
 
 

 

सितंबर 17, 2026

POST : 2119 जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

  जश्न मनाओ फ़रमान है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जारी किया गया फिर ग़ज़ब तुग़लकी फरमान है
दिया जलाना आशीर्वाद का क्या निराली शान है
घोर निराशा छाई है जनमानस देश समाज में है 
पर उनको क्या खबर उनका सब तख़्त ताज में है  
  
 
जान है तो जहान है देश में आया हुआ तूफ़ान है 
सभी को खाना लाज़मी आज  ख्याली पकवान है 
नाचती है ज़मीन भी झूमता हुआ इक आसमान है 
सत्ता के मन भाता बहुत खुशियों का समूहगान है
 
 
राजा विक्रम सिंह ने भी जारी किया फ़रमान था 
भेस बदल कर निकला देखने मुआयना करने गया 
ढोल नगाड़े बज रहे थे हर तरफ़ दिखावे की ख़ुशी 
इक मोची अपनी चप्पल सी रहा भीगी आंखे लिए 
 
राजा क्रोध में उसके पास गया क्यों रो रहे बताओ 
शाही फ़रमान के उलंघन की मिलेगी सज़ा को पाओ
मोची बोला मेरी बेटी है बहुत बीमार पैसे नहीं पास
सज़ा दो है मंज़ूर झूठी ख़ुशी नहीं मना सकता हज़ूर 
 
सामने था सच जिसको दुनिया से छुपाया था आपने 
झौंपड़ी जलाई कितनी थी जब महल बनाया  आपने 
आपके जलाये दीप जितने कुछ देर में बुझ ही जाएंगे
आपकी कैसी ख़ुशी जनता को हर दिन सताया आपने  
 
कहानी में राजा को हुआ भूल का अपनी एहसास था 
आपने लेकिन दिया भगवान राम को दूसरा बनवास था 
आपने हर तरफ़ चलाई है गर्म हवाएं कहकर के मधुमास 
पछताते हैं नकली चमक दमक देख किया क्यों विश्वास  
 
आपका जवाब नहीं मगर जनता पूछती  इक सवाल है
कुछ लोगों की रईसी अधिकांश जनता हुई बदहाल है 
आपकी राजनीति सबको लगती करती बड़ा कमाल है 
सत्ता की मनमानी हमेशा चलती रहती बेढंगी चाल है   
 

 जूतों में बंटती दाल है ( कविता ) 

 
अब तो ऐसा हाल है जूतों में बंटती दाल है
मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है ।

बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है ।

भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है ।

कालिख उनके चेहरे की कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है ।

झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
गरीबी ऐसा सवाल है । 

घोटालों का देश है मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं बस वही अस्पताल है ।

कल जहां था पर्वत आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी हो चुका मालामाल है ।

बबूल बो कर खाते आम हो  रहा कमाल है
शीशे के घर वाला रहा पत्थर उछाल है ।

चोर काम कर रहे पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया दर्द से बेहाल है ।

जीने का तो कभी मरने का सवाल है 
ढूंढता जवाब अपने खो गया सवाल है । 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
   
 
    

सितंबर 16, 2026

POST : 2118 प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    प्यास को हर जगह पानी लिखिंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

प्यास को हर जगह पानी लिखेंगे
हम अगर अपनी कहानी लिखेंगे । 
 
उम्र भर जो दर्द देते रहे हैं 
शुक्रिया लिख मेहरबानी लिखेंगे ।  
 
कोशिशें की भूल पाए न लेकिन 
फिर सभी बातें पुरानी लिखेंगे । 
 
कश्तियों को जो डुबोती हैं हर दिन 
रोज़ लहरों की रवानी लिखेंगे । 
 
क्या कहें कैसा नया दौर लगता 
राह से भटकी जवानी लिखेंगे । 
 
अश्क़ अपने सूख कब से गए हैं 
ख़ुश्क आंखों की ज़ुबानी लिखेंगे । 
 
लिख रहे ' तनहा ' नहीं लोग समझे 
एक दिन वो ख़ुद ही म'आनी लिखेंगे ।