बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
बिजलियों का भी धड़का है बरसात मेंक्या गज़ब ढाये काली घटा रात में ।
कुछ कहा सादगी से भी उसने अगर
राज़ था इक छुपा उसकी हर बात में ।
कम नहीं है ज़माने के लोगों से वो
बस लिया देख पहली मुलाक़ात में ।
राह तकती किसी की वो छत पर खड़ी
देखा जब भी उसे चांदनी रात में ।
क्या सही क्या ग़लत कौन समझा यहां
लोग उलझे रहे , रोज़ शह - मात में ।
भीख में ज़िंदगी हम नहीं मांगते
मौत दे दो हमें आप सौगात में ।
इश्क़ 'तनहा ' किया ऐसे अंदाज़ से
हम मिले रोज़ उनसे ख़्यालात में ।

2 टिप्पणियां:
बहुत खूब
Bahut bdhiya sher
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