ईमान अपना बेच कर कुछ करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ईमान अपना बेच कर , कुछ करोड़ में
शामिल हुए सब लोग इस भाग - दौड़ में ।
अच्छा - बुरा कोई नहीं सोचता यहां
सारा ज़माना लग गया है जोड़ - तोड़ में ।
देखो तुम्हें ये वक़्त क्या क्या दिखा रहा
फंसते ही जाते लोग इसकी मरोड़ में ।
हैरान सारा देश उनको ख़बर नहीं
नुक़सान को कहने लगे लाभ जोड़ में ।
क्यों कर सभी को साथ लेकर चले नहीं
अटके खड़े हैं लोग कितने ही मोड़ में ।
नेता यूं करने लग गए प्यार देश को
उठने लगी हो ख़ाज जैसे कि कोड़ में ।
' तनहा ' ज़माना दौड़ता हांफता यहां
होते नहीं शामिल कभी आप दौड़ में ।
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