उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ
हमने सोचा था उन पे मगर न हुआ ।
जोड़ कर अपने हाथ सभी थे खड़े
तब भी सिजदे में अपना सर न हुआ ।
उम्र भर घर की लोग तलाश किए
पर मय्यसर हर एक को घर न हुआ ।
फ़ासला अपने बीच बहुत तो न था
ख़त्म हम दोनों से ही सफ़र न हुआ ।
लोग चलने को साथ चले तो सही
हमसफ़र कोई एक भी पर न हुआ ।
दी सदाएं हमने , सबको हरदम
जो ख़ुला मिलता एक भी दर न हुआ ।
धूप में जलते उम्र कटी ' तनहा '
छांव देने को एक शजर न हुआ ।

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