फ़रवरी 17, 2026

POST : 2056 उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

   उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

उन पे अश्क़ों का कुछ भी असर न हुआ  
हमने सोचा था उन पे मगर न हुआ । 
 
जोड़ कर अपने हाथ सभी थे खड़े 
तब भी सिजदे में अपना सर न हुआ ।
 
उम्र भर घर की लोग तलाश किए 
पर मय्यसर हर एक को घर न हुआ ।
 
फ़ासला अपने बीच बहुत तो न था 
ख़त्म हम दोनों से ही सफ़र न हुआ । 
 
लोग चलने को साथ चले तो सही 
हमसफ़र कोई एक भी पर न हुआ । 
 
दी सदाएं हमने , सबको हरदम 
जो ख़ुला मिलता एक भी दर न हुआ ।
 
धूप में जलते उम्र कटी ' तनहा '
छांव देने को एक शजर न हुआ ।  
 

 
 
 
 
  
  

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