जनवरी 13, 2026

POST : 2049 लूटने वाले आज भी हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

          लूटने वाले आज भी हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया  

राष्ट्रीय सुरक्षा कलाकार अजीत डोभाल ने युवकों को संबोधित करते हुए कहा है कि हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है ।  जाने ऐसे लोग देश की वास्तविक सुरक्षा को लेकर कितने संवेदनशील  हैं क्योंकि आजकल उनके ही कालखंड में देश की लूट में राजनेताओं अधिकारियों धनवान लोगों की मिलीभगत साफ दिखाई दी है , क्या सुरक्षा सलाहकार को वो सब उचित लगता है अथवा हज़ार साल पहले विदेशी लुटेरों से बदला लेने की सोच आधुनिक देश को लूटने वालों को लेकर खामोश रहना उनकी मानसिकता उचित हो सकती है । गंभीर समस्याओं जैसे आतंकवाद से लेकर चीन अमेरिका तक को लेकर लगता नहीं कि ऐसा ही आचरण शासक एवं सरकार का दिखाई दिया है हर बार शौर्य का डंका बजाते हैं लेकिन अंजाम तक कभी पहुंचते ही नहीं है । गीदड़ भभकी देना उचित नहीं है हम ताकतवर हैं दावा करते हैं मगर शीघ्र ही किसी के प्रभाव में आकर कदम पीछे खींच लेते हैं । काश अजीत डोभाल जी संदेश देते कि हमको पुराने इतिहास से सबक सीखना चाहिए और देश समाज को लूटने वाले चाहे जो भी हों उनका साहसपूर्ण विरोध करना चाहिए । विडंबना ही है कि जब अधिकांश राजनेता प्रशासनिक अधिकारी कर्मचारी बड़े बड़े उद्योगपति धर्म उपदेशक से खिलाड़ी भगवा धारण करने वाले व्यवसायी कलाकार तक तमाम जनता को गुमराह कर खुद मालामाल होने में शामिल हैं उनकी लूट खसूट की बात छोड़ पुरातन इतिहास से बदला लेने को युवकों को उकसाने का कार्य कर रहे हैं ये जानते समझते हुए कि इसका हासिल कुछ भी नहीं होगा । बल्कि शायद उनका मकसद इस युग की ऐसी तमाम खामियों से ध्यान हटाने की कोशिश लगती है ।  
 
कुछ अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह से ही देश संविधान से अधिक शासक वर्ग से संबंध बनाने को ऐसा किया जाने लगा है , विशेषकर जब सुप्रीम कोर्ट ऐसी ही कितनी बातों पर हैरानी जता रहा है कि देश में नियम कानून भी कुछ ख़ास लोगों के लिए अलग अलग निर्धारित किए जाने लगे हैं उनको अपराध करने पर भी सज़ा से बचाने को संविधान संशोधन लाने लगे हैं । शासक बनकर अपनी डफली अपना अपना राग बजाने लगे हैं । लोकतंत्र को कब लूटतंत्र बना दिया गया किसी को खबर ही नहीं हुई , सांसदों विधायकों को कल्याण निधि के नाम पर ही नहीं बल्कि कितनी ही सुविधाओं पर बेतहाशा धन खर्च करना देश जनता की सेवा हर्गिज़ नहीं है बल्कि कानूनी डकैती है , जिस देश में करोड़ों को पांच किलो अनाज से जीने पर विवश किया जाता है और कितनी ही ऐसी लुभावनी योजनाओं का मकसद जनमत को प्रभावित कर सत्ता पर काबिज़ रहना है उस में प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री से अन्य सभी शासक वर्ग का विलासिता पूर्वक जीवन समाज की सेवा नहीं ख़ज़ाने की लूट ही है । अधिकांश योजनाओं में पैसे का गलत उपयोग से भ्र्ष्टाचार करने तक सामने आता रहता है । पिछले कुछ सालों में बहुत कार्य झूठे कागज़ी आंकड़ों पर ही हुए हैं मगर कभी जांच नहीं हुई कि कौन कौन कैसे शासक वर्ग से मिलकर ये लूटने का कार्य करता रहा है । जिनको इस सब पर निगरानी करनी थी उन्होंने अपनी आंखें बंद कर सब गलत होने दिया है अपने स्वार्थ की खातिर ।   
 
अजीत डोभाल जी को मालूम होना चाहिए कि देश में धर्म की आड़ में अभी भी लूट चल रही है , क्या मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे का मकसद धन दौलत ज़मीन जायदाद एकत्र करना होना चाहिए या फिर दान से मिली राशि को दीन दुःखियों को सहायता देने पर खर्च करना चाहिए । सबसे महत्वपूर्ण बात किसी भी धर्म को राजनीति को बढ़ावा देने को भेदभाव नहीं करना चाहिए जैसा आजकल होने लगा है । धर्म को अपनी सत्ता की राजनीति का माध्यम बनाना भी देश समाज और संविधान की भावना के विपरीत है । आप पढ़ लिख कर ऊंचे  पद पर नियुक्त होने के बावजूद भी युवा समाज को इस तरह से भटकाने का प्रयास कैसे कर सकते हैं । क्या आप समाज को बताएंगे कि जिस तरह सत्ता मिलते ही राजनेताओं और राजनैतिक दलों के पास धन दौलत और आलीशान दफ़्तर से महलनुमा आवास बनते जाते हैं वो कैसे संभव है बिना सत्ता का दुरूपयोग कर लूट करने के चाहे उसको चंदा इलेक्टोरल बांड कुछ भी नानकरण कर दिया जाए । अफ़सोस है इस अनुचित राजनीति पर कोई कुछ नहीं बोलता क्योंकि सभी शामिल हैं अपना अपना हिस्सा पाने में लूट के भागीदार बन सोशल मीडिया अख़बार टेलीविज़न से तथकथित समाजसेवी तक ।  अंत में इक खरी बात कभी बाद में कोई इतिहास में दर्ज करेगा कि ऐसा भी हुआ था जब पुरानी लूट पर भाषण दिए गए थे मगर उस समय हो रही लूट खसूट पर एक आवाज़ नहीं सुनाई दी थी ।  अंत में इक ग़ज़ल , सियासत बोझ बनती जा रही है , विरासत आपको समझा रही है । 
 
 

विरासत अब समझ में आ रही है ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

 

सियासत बोझ बनती जा रही है 
विरासत आपको समझा रही है । 
 
नज़र तिरछी हुई सत्ता की देखो 
लो सबको याद नानी आ रही है ।  
 
भरोसा अब नहीं कोई भी बाकी 
हक़ीक़त देख कर पछता रही है । 
 
जो शोले राख में दहके हुए हैं 
उसे वो रौशनी बतला रही है । 
 
हुआ क्या हाल ' तनहा ' देश का है
फसल को बाड़ चरती जा रही है । 
 

 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

गलत सोच....प्रतिशोध किस्से लेना अब...बढ़िया आलेख