फ़रवरी 16, 2026

POST : 2055 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 खिलाड़ी ख़ास वर्ग , गेंद साधरण लोग  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कहने को सब कुछ बदला है कुछ लोगों की तकदीर बदली है , लेकिन सही मायने में समाज देश साधारण जनता के लिए हालात बदले हैं लेकिन पहले से ख़राब हुए हैं । सच तो ये है कि तमाम सामान्य वर्ग को धकेल कर हाशिये से बाहर कर दिया गया है । राजनेताओं प्रशासन अधिकारियों कर्मचारियों धनवान उद्योगपतियों अन्य बड़े सफलता हासिल कर ख़ास बड़े वर्ग में शामिल लोगों की नज़र में जनता या उसकी परेशानियों से कोई सरोकार नहीं है । ऐसे तमाम लोग खेलते हैं अपनी अपनी पसंद ज़रूरत सुविधा से कोई भी खेल जिस में उनके निशाने पर गेंद की जगह साधरण लोग होते हैं । खेल कितने हैं फुटबॉल क्रिकेट वालीबॉल टेनिस बास्केटबॉल बिलियर्ड्स इत्यादि , गेंग को ठोकर लगाना पीटना तरह तरह से खिलाड़ी करते हैं कभी गेंद की हालत बिगड़ जाती है तो बदल जाती है । राजनेताओं की राजनीति सत्ता को लेकर होती हैं देश समाज को लेकर कभी हुआ करती थी आजकल नहीं की जाती है । जब से दुनिया इक व्यौपार का बाज़ार बन गई है तब से आदर्श नैतिक मूल्य सांस्कृतिक पहचान किसी तयखाने में दबाकर रखी नहीं बल्कि दफ़ना दी गई है । हर भौतिकतावादी देश की तरह से भारतीय सभ्यता झूठी बनावटी चमक दमक से प्रभावित होकर अपनी वास्तविक पहचान अपनी विरासत को खोटे सिक्कों में तोलने को तैयार है । भारत देश का संविधान और लोकतंत्र सिर्फ किसी किताब का बाहरी आवरण बन गई है जिस के भीतर जाने कब से क्या क्या अजीब दर्ज किया जाता रहा है । मगर 140 करोड़ लोग कभी नहीं जान सकते कि हमारी वास्तविकता क्या थी और कैसे क्या से क्या बना दी गई है । सत्ता को कोई भी ऐसी किताब जनता के सामने खुलना कदापि स्वीकार नहीं है ।शासक शब्दों से डरते भी हैं जबकि उनकी तमाम जंग भी शब्दजाल ही हैं जिसे वो सभी कभी सभाओं में कभी व्यक्तव्यों में कभी सोशल मीडिया में उपयोग करते हैं ।  विदेश नीति से आर्थिक रणनीति तक जैसे कोई खेल तमाशा लगती है जिस में कौन देश कैसे किस किस देश को अपनी शतरंजी चालों में जकड़ कर मात दे सकता है और सभी बेबस परेशान हो कर भी कुछ कर नहीं सकते बेहद विवश लगते हैं । 
 
विदेश नीति पुराने संबंधों को दरकिनार कर ऐसे नये ढंग तौर तरीके पर चल पड़ी है जिस में अंदेशा है कि शायद दोबारा से अंग्रेजी शासन जैसी क्या उस से भी भयानक गुलामी का शिकंजा कसा जा सकता है । आज की विवशता और बनावटी उज्ज्वल भविष्य की धुंधली तस्वीर कोई छल साबित हो सकती है मगर शासक वर्ग की चिंता सिर्फ और सिर्फ खुद की खातिर है । देश समाज जनता की खातिर उनके पास कोई सार्थक संवाद नहीं है केवल अविश्वसनीय वादे झूठे विज्ञापन और काल्पनिक शानदार व्यवस्था 2047 तक देने की बात है ।कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक । आज़ादी के दिन पैदा हुए लोग 78 साल के हो चुके हैं सौ साल की गारंटी सरकार नहीं दे सकती है उसकी हर गारंटी झूठी है जनता को बहलाने को दी जाती है । खिलाड़ी सभी खेल में सफ़ल हो रहे हैं लेकिन चुनवी गणतंत्र के जिस खेल में जनता का जीवन दांव पर लगाया जाता है उसकी हर बार हार होती है , गरीबी भूख शिक्षा स्वास्थ्य से रोज़गार की बात छोड़ न्याय तक उसको जीते जी नहीं मिलता है । सामन्य आदमी की सुरक्षा की कोई चिंता किसी शासक प्रशासक को रत्ती भर भी नहीं है उनको अपनी ज़िंदगी से बढ़कर किसी की जान नहीं लगती है । राजनेताओं को सबसे अधिक चिंता उनकी कुर्सी की रहती है अपनी जान से भी अधिक प्यारी लगती है ।  कुर्सी का खेल ख़तरनाक साबित हुआ है हमारे लिए , क्योंकि इस खेल में खिलाड़ी किसी नियम कानून किसी आदर्श को कभी नहीं मानते बल्कि सब कुछ तोड़ने को उचित समझते हैं ।  
 
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