जनवरी 03, 2026

POST : 2047 कहां से कहां आ गये हैं ( व्यंग्य - रंग बदलती दुनिया ) डॉ लोक सेतिया

कहां से कहां आ गये हैं ( व्यंग्य - रंग बदलती दुनिया ) डॉ लोक सेतिया   

कहां आ गये हम , मेरी पुरानी ग़ज़ल है जिस का वीडियो बनाया जा रहा है मेरे यूट्यूब चैनल गीतकार पर प्रसारित होने की प्रतीक्षा है , इस रचना का शीर्षक उपयुक्त प्रतीत हुआ मुझको । मैंने दो दिन पहले बताया था कि अगली पोस्ट का विषय होगा जब हम खुद को दर्पण में देख कर आनंदित होने लगते हैं तब अपने भीतर झांकना छोड़ देते हैं । अपनी बाहरी सुंदरता सजावट पर ध्यान देते हैं अंतर्मन को देखना तक नहीं चाहते हैं क्योंकि आवरण शानदार है भीतर सब मैला कुचौला है । इक ऐसी शुरुआत हुई है कि हर मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक को देश की हर दीवार पर अपनी ही तस्वीर लगवानी है शोहरत की कामना है । मैंने कितनी बार जॉर्ज सिल्वे की कही बात को दोहराया है कि लोकप्रियता की आकांक्षा करना इक अपराध जैसा है , ये आपके नैतिक आचरण एवं व्यवहार पर निर्भर करता है कि आपको शोहरत मिलेगी अथवा नहीं । देश के खज़ाने से विज्ञापन प्रचार प्रसार से अपने नाम का डंका पीटना मानसिक रोग ही कहला सकता है । अब तो सरकार के सभी विभाग एवं प्रशासक राजनेता इस मानसिकता का शिकार हैं । सभी आत्ममुग्ध हैं किसी को सामाजिक पतन बदहाली की कोई चिंता ही नहीं है , दिखावा सभी करते हैं जबकि जानते हैं उन्होंने कुछ भी सार्थक करने का प्रयास ही नहीं किया । सभी को अधिक से अधिक खुद की खातिर चाहिए और अंजाम ये है कि जनता की खातिर कुछ बचता ही नहीं , सब मिल बांटकर मौज करते हैं । ख़ुशहाली चंद घरानों के लिए आरक्षित है जैसे जो रईस हैं उन्हीं को सब की भूख है , धर्म भी बताता है कि जिस के पास सभी कुछ हो फिर भी और अधिक पाने की हवस हो वो सब से दरिद्र होते हैं । 
 
बात इंसान की नहीं है सरकार समाज की व्यवस्था से लेकर तमाम जगह की यही है , सभी शोर मचाते हैं आगे बढ़ने का मगर किस दिशा को अग्रसर हैं कोई नहीं बताता कोई नहीं समझता कोई नहीं दिखलाता कि  असलियत क्या है कौन आगे बढ़ रहे हैं और कौन और भी पिछड़ रहे हैं सामाजिक खाई इतनी बढ़ गई है । 2026 देश की आज़ादी के 78 साल बाद देश समाज का आचार विचार व्यवहार इतना बदल चुका है कि सोचने समझने लगे तो घबराहट होती है । कभी महात्मा गांधी जी गरीब लोगों को नंगे बदन देख कर सिर्फ एक धोती पहनने का संकल्प लेते हैं , लाल बहादुर शास्त्री पुराने कपड़े पहन कर शपथ ग्रहण करते हैं जबकि आजकल हर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह भव्य आयोजित कर देश की गरीबी का नहीं करोड़ों गरीबों का उपहास किया जाता है । शासक प्रशासक कर्तव्य निभाने की चिंता ही नहीं करते उनकी प्राथमिकता खुद अपने लिए शानदार भवन हर शहर में सचिवालय राज्यों की राजधानी में शानदार बड़ी बड़ी इमारतें जिनमें सभी सुख सुविधाएं उपलब्ध हों , आधुनिक संचार माध्यम और तमाम राजसी शान ओ शौकत आवश्यक लगते हैं । उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश की अधिकांश जनता को पीने का साफ पानी बुनियादी सुविधाएं नहीं हासिल हुई हैं । अगर इसको जनकल्याण देशसेवा समझते हैं तो लोकतंत्र में कितना बड़ा अपराध है मालिक भूखा और उसका नौकर सेवक बन कर छप्पन भोग खाकर भी मानता है जनता पर उपकार करते हैं । 
 
सभी दलों के राजनेताओं ने खुद अपने लिए बंगले गाड़ियां और धन दौलत के अंबार एकत्र कर लिए हैं , शायद ही कोई मिल सकता है जिस नेता या सरकारी अधिकारी के पास उनकी वास्तविक आमदनी से हज़ारों लाखों गुणा जायदाद बेनामी नहीं है । जिस पर छापा डालते हैं पुलिस प्रशासनिक बड़े अधिकारी से छोटे कर्मचारी के पास करोड़ों रूपये बरामद होते हैं । सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश तक के पास धन मिलता है कभी आग लगने से सामने आता है । जानकर हैरानी हुई कि सरकार ने ऐसा कानून बनाया हुआ है जिस में जायदाद ज़ब्त हो सकती है अथवा जुर्माना लगाया जा सकता है लेकिन उनको कोई सज़ा नहीं मिल सकती है । ऐसे ही कुछ अन्य संस्थाओं पर नियुक्त अधिकारी को अपराधी साबित होने पर भी कोई मुकदमा उन पर नहीं चलाने का नियम बनाया हुआ है , मैं चाहे जो करूं मेरी मर्ज़ी । ये कैसा मंज़र है कि देश को बताते हैं आगे बढ़ रहा है लेकिन अपराध गंभीर से गंभीर करने वाले शान से रहते हैं शायद ही कुछ को सज़ा मिलती है । हमारे देश के शासक रत्ती भर भी शर्मिंदा नहीं होते हैं ये देख जानकर कि अन्याय अत्याचार और अमीर गरीब में फ़ासला दिन पर दिन बढ़ता ही जाता है । सरकार सामान्य जनता के प्रति उदासीन है और धनवान लोगों और देश को लूटने वाले साहूकारों के प्रति दयावान है अर्थात अराजकता को बढ़ावा दे रही है । 
 
आजकल ईमानदारी नैतिकता और ऊंचे आदर्शों पर चलना तमाम बड़े लोगों ने छोड़ दिया है सच्चाई से रिश्ता तोड़ कर झूठ और आडंबर से ऐसा गठबंधन कर लिया है कि सही और गलत की परिभाषा बदलनी पड़ी है । इधर सरकारी योजनाओं का अंबार लगा हुआ है और निशदिन नई नई योजनाएं घोषित की जाती हैं जबकि तमाम घोषणाएं कागज़ी हैं कुछ भी हासिल नहीं हुआ इन सभी से सामन्य जनता को । सिर्फ कुछ खास वर्ग को लूटने और झूठे आंकड़े बनाकर जनता को दिखाने पर ही बेतहाशा धन टीवी अख़बार पर प्रचार प्रसार पर बर्बाद कर खुद अपनी पीठ थपथपाई जाती है सत्ताधारी शासकों द्वारा । हमने भौतिकता की खातिर सभी मूल्यों आदर्शों को त्याग दिया है जिस तरफ देखते हैं सभी खुदगर्ज़ी में समाज को विनाश की तरफ धकेल रहे हैं , सभी अर्थात तमाम लोग अपनी सही दिशा से भटक गए हैं और उस जगह खड़े हैं जहां कोई मंज़िल नहीं कोई रौशनी नहीं सिर्फ अंधकार दिखाई देता है दूर दूर तक ।    
 
 
 

 
 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

बढ़िया आलेख ...बनावट ज्यादा हो गई है लोगो मे अपने अंदर नही झांकते। शपथ ग्रहण समारोहों की भव्यता देखते ही बनती है आजकल। अब कहाँ लाल बहादुर शास्त्री जैसे ऊंचे आदर्शो के लोग