अगस्त 19, 2012

POST : 50 शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

शीशे सा नाज़ुक घर भी है
कुछ तूफानों का डर भी है ।

जीने की चाहत है लेकिन
पीना ग़म का सागर भी है ।

इंसानों की खबर न कोई
शहर का ऐसा मंज़र भी है ।

यूँ तो है खामोश किनारा
लहर गई टकरा कर भी है ।

ढूंढ के उसको लाओ कहीं से
खोया सहर में दिनकर भी है ।
 
( फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी ग़ज़ल संग्रह में शामिल नज़्म ) 
 

 
 
 
 


 

2 टिप्‍पणियां:

Sanjaytanha ने कहा…

बहुत खूब

Sanjaytanha ने कहा…

Wahhh ....दिनकर भी है