मेरा दर्द न समझा कोई ( व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया
सभी मेरे ही अपने लोग कहलाते हैं
मिलकर मेरी वंदना को गीत गाते हैं ,
मेरी अस्मत को लूटती है दुनिया जब
आप मस्ती में झूमते हैं , मुस्कुराते हैं
खराब कितना अच्छा जिसको बताते हैं ।
मेरा बदन ही नहीं रूह तलक भी मेरी
छलनी छलनी किया हर किसी ने मुझे
मैं किस को जा कर बताऊं आप सब
कितने ज़ालिम हैं और बेरहम हैं कितने
मुझ पर क्या क्या सितम रोज़ ढाते हैं ।
दुनिया हैरान देख कर दुर्दशा को मेरी
कौन समझता है यहां पर व्यथा को मेरी
मुझ में रहने ही वाले ख़ुद किस तरह से
मेरी हस्ती मिटाने की कोशिश में लगे हैं
जाने क्या क्या तैर तरीके आज़माते हैं ।
चील कौवे कभी गिद्ध लगते हैं जैसे जो
मुझे नौंचते रहते और खाते ही जाते हैं
कितनी बदनसीब इक अबला नारी जैसी
जिनसे रिश्ता मेरा वजूद का है वही लोग
लाकर बाज़ार में मुझसे यूं नाच नचाते हैं ।
आप इसको मुझसे मुहब्बत बताने लगे हैं
बांट के टुकड़ों में मेरा वजूद निशदिन ही
नुमाईश करने को मुझे ऐसे सजाते हैं और
खुद बिचौलिया बन बोली लगवा कर मेरी
बेशर्म बनकर बेच कर फिर जश्न मनाते हैं ।
कुछ भी बोली नहीं मैं चुप चाप सदा रोई
दर्द को मेरे कभी समझा नहीं यहां पर कोई
जैसे किसी मुर्दा लाश की अर्थी है डोली भी
कभी मेरी समाधि बना कुछ नाम रख कोई
सर को झुकाते हैं दिया जलते पुष्प चढ़ाते हैं ।

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