फ़रवरी 03, 2026

POST : 2051 भगवान बना कर पछताये ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया

     भगवान बना कर पछताये ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 
भगवन बनकर तू अभिमान ना कर 
तुझे भगवान बनाया हम भक्तों ने ।

पत्थर से तराशी खुद मूरत फिर उसे 
मंदिर में है सजाया हम भक्तों ने ।

तूने चाहे भूखा भी रखा हमको तब भी 
तुझे पकवान चढ़ाया हम भक्तों ने ।

फूलों से सजाया आसन भी हमने ही 
तुझको भी है सजाया हम भक्तों ने ।

सुबह और शाम आरती उतारी है बस 
इक तुझी को मनाया हम भक्तों ने ।

सुख हो दुःख हो हर इक क्षण क्षण में 
घर तुझको है बुलाया हम भक्तों ने ।

जिस हाल में भी रखा है भगवन तूने 
सर को है झुकाया हम भक्तों ने ।

दुनिया को बनाया है जिसने कभी भी 
खुद उसी के है बनाया हम भक्तों ने । 
 
   ऊपर लिखा भजन मेरी मां माया देवी जी प्रतिदिन गाया करती थी , हम सभी को याद रहती है उनकी ये बात । लेकिन आज इसका ज़िक्र अलग  कारण से करना पड़ा है , आस्था से अलग विषय है आधुनिक युग में कोई भगवान कोई मसीहा होता नहीं है , और राजनीति में तो शराफ़त का कोई स्थान ही नहीं है । नासमझ लोग या ख़ुदगर्ज़ चाटुकार लोग जिस किसी को ऊंचाई के ऐसे शिखर पर बिठाते हैं कि बाद में उनकी वास्तविक बात सामने आने पर बगलें झांकते हैं , लेकिन तब भी अपनी भूल को स्वीकार करना कठिन होता है । सोशल मीडिया पर पुरानी कथनी अब की करनी से मेल खाती ही नहीं है और बनाये न बने बात छुपाए न बने की हालत बन जाती है ।  लेकिन शायद उस भजन में छुपी इक वास्तविकता भी उजागर हुई है , जनता जिनको ऊंचे सिंहासन पर बिठाती है शासक बनकर उसी पर मनमाने आदेश जारी कर उसको अपने आधीन रखने और स्वयं राजा महाराजा जैसा जीवन बिताते हैं । तर्कसंगत ढंग से समझें तो कोई भी किसी को भी खुद को समर्पित करता है  या आत्मसमर्पण करता है तो गुलामी करनी ज़रूरी होती है । खुद जिसको बनाया उसी की मूर्ति बनाकर वंदना करना विवशता हो जाती है , खुद भूखे नंगे रहते हैं और मूर्तियों को शानदार परिधान और तरह तरह से पकवान का भोग लगाते हैं । मंदिर में चढ़ाये फल मधुर मिष्ठान इत्यादि को पुजारी थोड़ा हिस्सा चढ़ाने वाले को प्रसाद बताकर देते हैं अधिकांश अपने लिए रखते हैं । शासक भी जनता से कर वसूली करते हैं और अधिकांश भाग खुद और प्रशासन मिलकर मौज से उपयोग करते हैं ।  भगवान को लेकर लिखी गई कथाओं ने यही परंपरा हमेशा से चलाई है । 
 
आपने भगवान को लेकर जितनी कथाएं पढ़ी सुनी हैं सभी में लिखने वाले ने अपने आराध्य की हर बात को उचित ठहराने को आवश्यकता अनुसार परिभाषाएं मापदंड बदले हैं । कृष्ण भगवान शासक बनकर राजा कहलाते हैं मगर जिनसे संबंध रखते हैं उनकी खातिर सभी तरह से सहायता करते हैं । पांडवों को सहयोग देने खुद चले आते हैं द्रोपती की लाज बचाते हैं अर्जुन को कदम कदम सुरक्षा देते हैं । सुदामा गरीब मित्र है कभी खुद उसकी खबर नहीं लेते सर्वज्ञानी होकर भी अनजान रहते हैं । जब सुदामा चलकर आता है तब शायद महसूस होता है कि उसको भी बिना मांगे कुछ दे देते हैं ऐसा लोक लाज की खातिर करना पड़ा होगा । आज भी शासक अपने खास जानकर मित्रों को सभी कुछ बांटते हैं उनकी अपनी शान ओ शौकत कायम रखने को ज़रूरत पड़ती है तो नियम कानून बनते बदलते हैं । गरीब जनता की फ़िक्र कौन करता है उसको झूठे दिलासे देकर बहलाते हैं , अभी बीस तीस साल इंतिज़ार करो तकदीर बदलेगी । हज़ारों हज़ार साल लोग भगवान की आराधना पूजा पाठ भजन कीर्तन करते हैं लेकिन उस भगवान को कभी गरीबों की सुध लेना याद नहीं आया है । भगवान भरोसे बैठने से तकदीर नहीं बदली करोड़ों की , कुछ खास अमीरों पर भगवान अनुकंपा करते हैं उनको आवश्यकता से अधिक मिलता है , सब उसकी मर्ज़ी है । 
 
भगवान पर कोई शंका नहीं की जा सकती है , कथाओं लिखने वालों ने उसकी अनुचित बातों को भी सही बतलाया है । माखनचोर ही नहीं जाने क्या क्या गुणगान बनाया है , हर देवी देवता ने अपने भक्तों को वरदान देकर उनको अपराधी होने पर बचाया है । विधि का विधान ग़ज़ब है कहते हैं सब प्रभु की माया है । भगवान काल्पनिक है कि वास्तविक मालूम नहीं इक दुविधा रहती है , विधाता को सबकी खबर कहते हैं पल पल की रहती है । दुनिया में फिर क्यों उलटी गंगा बहती है समंदर की प्यास बुझती नहीं हर नदी उसी की तरफ बहती है । सरकार भी इसी अंदाज़ से कारोबार चलाती है जिनको प्यास नहीं उनकी प्यास बढ़ाती है जनता की हालत बदहाल होती जाती है । भगवान खुद बड़े बड़े आलीशान महलों में रहता है इंसान भिखारी बनकर सब दुःख परेशानी सहता है , सब पर कृपा करता है कोई बतलाता है । शायद किसी साहूकार जैसा उपरवाले का बहीखाता है  , असल से बढ़कर ब्याज चढ़ता जाता है । देश की सरकार की व्यवस्था भगवान भरोसे है जनता बेचारी भगवान को मनाते मनाते उम्र बिताती है आखिर किसी दिन हताशा निराशा की सीमा पार हो ही जाती है । दुनिया के धरती पर बनकर रहने वाले भगवानों और किसी आसमान पर रहने वाले असली भगवान सभी सुनते ही नहीं आदमी की व्यथा सुनाते हैं उपदेश और अपने महिमामंडन की कोई कथा । आख़िरी विनती है मत लेना इस बात को अन्यथा । 
 
 मैं ईश्वर को क्यों नहीं देख पा रहा/रही हूँ? - बाल सुसमाचार प्रचार फेलोशिप
  

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