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अक्टूबर 24, 2012

POST : 200 नहीं आता हमें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

नहीं आता हमें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

लगाना दिल नहीं आता हमें
दुखाना दिल नहीं आता हमें ।

मिलाना हाथ आता है मगर
मिलाना दिल नहीं आता हमें ।

उन्हें आता नहीं हम पर यकीं
दिखाना दिल नहीं आता हमें ।

हमें सब को मनाना आ गया
मनाना दिल नहीं आता हमें ।

तुम्हारा दिल तुम्हारे पास है
चुराना दिल नहीं आता हमें ।

बहुत चाहा नहीं माना कभी
रिझाना दिल नहीं आता हमें ।

जिसे देना था "तनहा" दे दिया
बचाना दिल नहीं आता हमें । 
 

 

POST : 199 सपनों में जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सपनों में जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

देखता रहा
जीवन के सपने
जीने के लिये 
शीतल हवाओं के
सपने देखे
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के
सपने देखे
कांटों से छलनी था
जब बदन
मुस्कुराता रहा
सपनों में
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए
सपने देखे
जी भर खाने के
प्यार सम्मान के
सपने देखे
जब मिला
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में
जब नहीं रहा बाकी
झोपड़ी का भी निशां 
राम राज्य का देखा सपना
जब आये नज़र
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के
देखे प्यार इंसानियत
भाई चारे के ख़्वाब
लगा कर पंख उड़ा गगन में
जब नहीं चल पा रहा था
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में
देखे सदभाव समानता के सपने
आशा के सपने
संजोए निराशा में
अमृत समझ पीता रहा विष
मुझे है इंतज़ार बसंत का
समाप्त नहीं हो रहा
पतझड़ का मौसम।

मुझे समझाने लगे हैं सभी
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता
सब की तरह कर लूं स्वीकार
जो भी जैसा भी है ये समाज
कहते हैं सब लोग
नहीं बदलेगा कुछ भी
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास । 
 

 

अक्टूबर 23, 2012

POST : 198 अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वसूला गया होगा
गरीब जनता से कर
भरने को खजाना  उस बादशाह का
जिसने बेरहमी से किया होगा
खर्च जनता की अमानत को
बनवाने के लिये
अपनी प्रेमिका की याद में
ताजमहल उसके मरने के बाद ।

कितने ही मजदूरों
कारीगरों का बहा होगा पसीना
घायल हुए होंगे उनके हाथ
तराशते हुए पत्थर
नहीं लिखा हुआ
उनका नाम कहीं पर ।

क्यों करे कोई याद
उन गरीबों को
बदनसीबों को
देखते हुए ताज
यही सोच रहा हूं मैं आज ।

कुछ और सोचते होगे तुम
मेरे करीब खड़े होकर
जानता हूं वो भी मैं
साथी मेरे
रश्क हो रहा है मुमताज से तुम्हें
नाज़ है
इक शहंशाह के ऐसे प्यार पर तुमको ।

खुबसूरत लग रहा है नज़ारा तुम्हें
भर लेना चाहते हो उसे आंखों में
यादों में बसाने के लिये 
अपने प्यार के लिये
मांगने को दुआएं
उठा रखे हैं दोनों हाथ तुमने
कर रहे हो वादा
फिर एक बार
किसी को लेकर साथ आने का ।

अब तलक चला आ रहा है चलन वही
शासकों का उनके बाद
उनके नाम स्मारक बनवाने का ,
जनता के धन से सरकारी ज़मीन पर
बनाई जाती हैं
सत्ताधारी नेताओं के पूर्वजों की समाधियां ।

नियम कायदा कानून
सब है इनके लिये 
आम जनता के लिये 
नहीं बनता कभी ऐसा आशियाना
जिन्दा लोग
नहीं प्राथमिकता सरकार के लिये
मोहरे हैं हम सब
उनकी जीत हार के लिये ।

लोकतंत्र में पीछे रह गये सब लोग
देश पर बोझ बन गये 
ये सब के सब राजनेता लोग
जब इस बार चढ़ाना
किसी समाधि पर फूल
सोचना रुक कर वहां एक बार
क्या थी उनकी विचारधारा
क्या है हमको वो स्वीकार ।

जो कहलाते जनता के हितचिन्तक
उनके नाम बनाई जाएं समाधियां
और जनता रहे बेघर-बार
करना ही होगा कभी तो विचार । 
 

 

अक्टूबर 22, 2012

POST : 197 बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

बस यही कारोबार करते हैं
हमसे इतना वो प्यार करते हैं ।

कर न पाया जो कोई दुश्मन भी
वो सितम हम पे यार करते हैं ।

नज़र आते हैं और भी नादां
वो कुछ इस तरह वार करते हैं ।

खुद ही कातिल को हम बुला आये 
यही हम बार बार करते हैं ।

इस ज़माने में कौन है अपना
बस यूं ही इंतज़ार करते हैं ।

 


 
 

POST : 196 ज़ुल्म भी हंस के वो तो सहते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

ज़ुल्म भी हंस के वो तो सहते हैं ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

ज़ुल्म भी हंस के वो तो सहते हैं 
लोग  कैसे जहां में रहते हैं ।

कत्ल करते हैं वो जिसे चाहा
इसको जम्हूरियत वो कहते हैं ।

ख़्वाब यूं टूटते हैं जनता के 
रेत के ज्यों घरोंदे ढहते हैं ।

वो मगरमच्छ हैं , कि हैं नेता 
अश्क़ जिनके जो बस यूं बहते हैं । 

' लोक ' अब तो यही सियासत है
 दुश्मनों को जो दोस्त कहते हैं ।  
 

 

 

POST : 195 गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले
ले ,छोड़ गए तुझको भी ज़माने वाले ।

मुझको भी आया अब तो आंसू पीना
तेरा अहसां है मुझको रुलाने वाले ।

होने वाले वो कब हैं किसी के यारो
बाज़ार मुहब्बत का ये सजाने वाले ।

हो कर बेज़ार ये आखिर क्यों रोते हैं
खुद कर के सितम यूं हमको सताने वाले ।

यूं तो रह जाते न हम सब "तनहा"
जो न रूठे होते वो हमको मनाने वाले । 
 

 

POST : 194 उम्र कैद ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

उम्र कैद ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं ही नहीं होती
उम्रकैद की किसी को सज़ा।

साबित करना होता है
उसका बड़ा कोई गुनाह।

साबित नहीं हो पाते
सभी के किए अपराध
मिलते हैं बचाव के
अवसर बार बार
रख सकते हैं
अपराधी अपना वकील
जो देता है बचाव में
नई नई फिर दलील।

अदालत का रहता
वही उसूल हर बार
बेगुनाह को न हो सज़ा
बच जाये भले गुनहगार
आम अपराध की
सज़ा मिलती कुछ साल
चलता कानून भी
धीमी धीमी है चाल।

हर सुविधा मिलती जेल में
चुका कर मोल
देखता जा चुपचाप
कुछ न बोल
ध्यान रखती कैदियों का खुद सरकार
करती रहती है कई जेल सुधार।

उम्र कैद मिलती सबको
विवाह रचाने पर
रोक नहीं कैदी के बाहर जाने पर
जेल के कर के दिन भर सभी प्रबंध 
खुद लौट आता मुजरिम अपने ठिकाने पर।

उसे उम्र भर काटनी होती है सज़ा
जेलर को लाया था जो घर बुला
सज़ा उसकी न हो सकती कभी माफ़
कोई सुनता नहीं फिर उसकी कोई फ़रियाद ।

गंभीर है जुर्म शादी रचाने का
विवाह संगठित श्रेणी का
माना जाता इक अपराध।

साथ छोड़ जाते हैं
सब पुराने साथी
गये थे कभी जो बन कर बाराती
भोगता सज़ा बस अकेला दूल्हा
जलता है ऐसे सुबह शाम चूल्हा
है राज़ मगर जानते सभी हैं
लेकिन किसी को बचाते न कभी हैं 
पति पत्नी का उम्र भर
का यही है नाता
इक देता हर पल सज़ा
दूजा खुश हो है पाता। 

अक्टूबर 21, 2012

POST : 193 भाग्य लिखने वाले ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      भाग्य लिखने वाले ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

विधाता हो तुम
लिखते हो
सभी का भाग्य 
जानता नहीं कोई
क्या लिख दिया तुमने
किसलिए
किस के भाग्य में।

सब को होगी तमन्ना
अपना भाग्य जानने की
मुझे नहीं जानना
क्या क्यों लिखा तुमने 
मेरे नसीब में
लेकिन
कहना है तुमसे यही।

भूल गये लिखना
वही शब्द क्यों 
करना था प्रारम्भ जिस से
लिखना नसीबा मेरा।

तुम चाहे जो भी
लिखो किसी के भाग्य में 
याद रखना
हमेशा ही एक शब्द लिखना 
प्यार मुहब्बत स्नेह  प्रेम।

मर्ज़ी है तुम्हारी दे दो चाहे 
जीवन की सारी खुशियां
या उम्र  भर केवल तड़पना
मगर लिख देना सभी के भाग्य में 
अवश्य यही एक शब्द
प्यार प्यार सिर्फ प्यार। 

अक्टूबर 20, 2012

POST : 192 हाँ किया प्यार मैंने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      हां किया प्यार मैंने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

किया तो होगा
तुमने भी कभी न कभी
किसी न किसी से प्यार ।

धड़कता होगा
तुम्हारा दिल भी
देख कर किसी को ।

मुमकिन है
कर दिया हो तुमने
इज़हार मोहब्बत का
अथवा हो सकता है
रख ली हो
दिल की बात दिल में
समाज के डर से
या इनकार के  डर से ।

मगर मैं जानती हूं 
ऐसा हुआ होगा
ज़रूर जीवन में एक बार
स्वाभाविक है ये 
सभी को हो ही जाता है
एहसास प्यार का ।

आज जब मैंने कर लिया
प्यार का एहसास
और कर दिया परिणय निवेदन
करना चाहा स्वयं को समर्पित ।

उसे जिसे चाहा मेरे मन ने
तो क्यों मान लिया गया
एक अपराध उसे ।

क्यों दे दिया गया
मेरे प्यार  की
पावन  भावना को
चरित्र हीनता का नाम ।

क्या इसलिये
कि देना नहीं चाहता
पुरुष समाज नारी को कभी भी
अधिकार चुनने का ।

पहल करने का अधिकार नहीं है
औरत को
हर पुरुष चाहता है
नारी से मूक स्वीकृति
अथवा अधिक से अधिक
इनकार वह भी शायद
क्षमा याचना के साथ ।

अक्टूबर 19, 2012

POST : 191 बंधन मुक्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      बंधन मुक्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

खोने के लिए जब 
कुछ नहीं बचा
सता रहा है फिर डर
किस बात का।

रही नहीं जब तमन्ना 
कुछ भी पाने की
होना है जब मुक्त
सभी बंधनों से
घबराता है फिर क्यों मन।

अपने ही बुने
सारे बंधनों को छोड़ 
जीवन के अंतिम छोर पर
करना है जतन बचे हुए पल 
इस तरह से जीने का
मिल पाए जिसमें मुझे भी आनंद
खुली हवा में सांस लेने का।   

अक्टूबर 18, 2012

POST : 190 आस्था ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     आस्था ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

सुलझे न जब मुझसे
कोई उलझन
निराशा से भर जाये
जब कभी जीवन
नहीं रहता
खुद पर है जब विश्वास
मन में जगा लेता
इक तेरी ही आस।

नहीं बस में कुछ भी मेरे
सोचता  हूं है सब हाथ में तेरे
ये मानता हूं और इस भरोसे
बेफिक्र हो जाता हूं
मुश्किलों से अपनी
न घबराता हूं।

लेकिन कभी मन में
करता हूं विचार
कितना सही है
आस्तिक होने  का आधार
शायद है कुछ अधूरी
तुझ पे मेरी आस्था
फिर भी दिखा देती है
अंधेरे में कोई रास्ता।

अक्टूबर 17, 2012

POST : 189 दुर्घटना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       दुर्घटना  (  कविता  ) डॉ लोक सेतिया

जब घटी थी
दुर्घटना मेरे साथ
दोनों ही खड़ी थी
तब मेरे ही पास।

उन्हें इतना करीब से
देखा था मैंने पहली बार
डरा नहीं था नियति को
कर लिया था स्वीकार।

मगर तभी ख़ामोशी से
प्यार और अपनेपन से
अपनी आगोश में
भर लिया था
मुझे ज़िंदगी ने।

मुझे कहना चाहती हो जैसे
तुम्हें बहुत चाहती हूं  मैं।

और लौट गई थी मौत
चुप चाप हार कर ज़िंदगी से
तब मुझे हुआ था एहसास
कितना कम है फासला
मौत और ज़िंदगी के बीच। 

POST : 188 दुनिया बदल रहा हूं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

दुनिया बदल रहा हूं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

दुनिया बदल रहा हूं
खुद को ही छल रहा हूं ।

डरने लगा हूं इतना
छुप कर के चल रहा हूं ।

चलती हवा भी ठण्डी
फिर भी मैं जल रहा हूं ।

क्यों आज ढूंढते हो
गुज़रा मैं कल रहा हूं ।

अब थाम लो मुझे तुम
कब से फिसल रहा हूं ।

लावा दबा हुआ है
ऐसे उबल रहा हूं ।

"तनहा" वहां किसी दिन
मैं भी चार पल रहा हूं ।  
 

 

अक्टूबर 16, 2012

POST : 187 मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

आज लिख रहा है
रंगबिरंगे फूलों से
रौशनी की किरणों से
हमारी कहानी कोई।
 
उसे क्या मालूम
पाए हैं हमने तो कांटे
जीवन भर।

छाया रहा
हमारी ज़िंदगी पर
सदा इक घना अंधेरा है
पल पल जीवन का
गुज़रा है इस तरह
सर्द रातें खुले गगन में
काटे कोई जिस तरह।

कभी किया नहीं
हमने ज़िक्र तक किसी से
अपने दुःख दर्द
अपनी परेशानियों का।

हर सफलता हर ख़ुशी
रही बहुत दूर हम से
मगर दुनिया वालेन कहते रहे
हमें मुक्कदर का सिकंदर।

बना रहा हमारा चित्र
है चित्रकार जो मिला ही नहीं
कभी हमें जीते जी।

ये मेरी जीवन कथा ये चित्र 
दोनों हैं किसी की
सुंदर कल्पनाएं 
नहीं है इनमें कोई सच्चाई।

हां देखा हो शायद
ऐसा सपना कभी मैंने
किसी दिन अपना दिल
बहलाने को। 

POST : 186 मेरा संकल्प है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 मेरा संकल्प है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

लेता हूं शपथ
बनाना है ऐसा समाज
जिसमें कोई अंतर कोई भेदभाव
न हो इंसानों में ।

मिटाना है अंतर
छोटे और बड़े का
अमीर और गरीब का ।

नहीं रहेगा
एक शासक न दूसरा शासित
कोई न हो भूखा
कहीं पर किसी भी दिन
न ही होगा कोई बेबस और लाचार
सभी को मिलेंगे
एक समान
जीने के सभी अधिकार ।

रुकना नहीं है मुझे
चलते जाना है
उस दिशा में
जहां सब रहें सुख चैन से
करने को समाज के
उज्जवल भविष्य का निर्माण ।

प्रतिदिन करता हूं
खुद से ये वादा
चाहे कुछ भी हो उसका अंजाम
टकराना है झूठ से
अन्याय से
अत्याचार करने वालों से
जनहित के लिए ।

डरना नहीं कभी
सत्ता का दुरूपयोग करने वालों से
उठानी है अपनी आवाज़
भ्रष्टाचार के खिलाफ
जीवन के हर मोड़ पर
निभाना है संकल्प
मातृभूमि के प्रति
अपना दायित्व निभाने का । 
 

 

अक्टूबर 15, 2012

POST : 185 मुझ बिन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     मुझ बिन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कब होता है किसी के
होने का एहसास
समझ आता है
न होने का एहसास ।

जब नहीं होता है कोई पास
लगता है तब
कि था कितना करीब
जब मिला करते थे रोज़
होती न थी कभी बातचीत भी
कहते हैं अब मिले हो तुम
कितनी मुद्दत के बाद ।

कल पूछा था उसने
क्या छोड़ दिया लिखना
बीत गये बहुत दिन
पढ़े हुए कहानी कोई ।
 
ढूंढते रहे थे उस दिन
मुशायरे में तुम्हें
सुन लेते कोई ग़ज़ल
फिर तुमसे नई पुरानी ।
 
लिखता रहा जब तक
नहीं कहा था कभी उसने
उसे लगता है अच्छा
मुझे  पढ़ना
सुनाया करता था जब मैं
सुनना चाहता था कहां कोई ।

न होना मेरा लग रहा है
बेहतर मेरे होने से
आज कोई देखता ही नहीं मुझे
मेरे बाद होंगी शायद बातें मेरी
कोई किसी दिन कहेगा किसी से
कभी होता था यहां
मुझ सा भी कोई इंसान । 

POST : 184 अच्छा ही है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अच्छा ही है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अच्छा है
सफल नहीं हो सका मैं
अच्छा है
मुझे नहीं मिला
बहुत सारा पैसा कभी
अच्छा है
मिले हर दिन मुझे
नये नये दुःख दर्द
अच्छा है
बेगाने बन गये
अपने सब धीरे धीरे ।

अच्छा है
मिलता रहा
बार बार धोखा मुझको
अच्छा है
नहीं हुआ कभी
मेरे साथ न्याय
अच्छा है
पूरी नहीं  हुई
एक दोस्त की मेरी तलाश ।

अच्छा है
मैं रह गया भरी दुनिया में
हर बार ही अकेला
अच्छा है
पाया नहीं कभी
सुख भरा जीवन
अच्छा है नहीं जी सका
चैन से कभी भी मैं ।

अगर ये सब
मिल गया होता मुझे तो
समझ नहीं पाता
क्या होते हैं दर्द पराये
शायद कभी न हो सकता मुझको
वास्तविक जीवन का
सच्चा एहसास
संवारा है 
ज़िंदगी की कश-म-कश ने
मुझको 
निखारा है 
हालात की तपिश ने
मुझको
आग में तपने के बाद
ही तो बनता है
खरा सोना कुंदन ।

चला नहीं
बाज़ार में दुनिया के
तो क्या हुआ
विश्वास है पूरा मुझको
अपने खरेपन पर
नहीं पहचान सके
लोग मुझे तो क्या
खुद को पहचानता हूं
मैं ठीक से
अपनी पहचान
नहीं पूछनी किसी दूसरे से
जानता हूं अपने  आप को मैं
अच्छा है । 
 

 

POST : 183 हम दोनों की सोच ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

हम दोनों की सोच ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरे दिल में
नहीं रहती तुम
तुम्हारा एहसास
रहता है
मेरे मन में 
मस्तिष्क में ।

मैं चाहता नहीं तुम्हें
तुम्हारे
रंग रूप के कारण
मुझे तो भाती है
तुम्हारी वो सोच
मिलती है
जो सोच से मेरी ।

मुझे रहना है
बन कर वही सोच
तुम्हारे दिमाग में
दिल में तुम्हारे
नहीं रहना है  मुझको ।

होता नहीं उसमें
प्यार का कोई  एहसास
मुहब्बत का हो
या  फिर नफरत का
दर्द का या कि ख़ुशी का
सब होता है एहसास
दिमाग में हमारे
धड़कता है दिल भी
जब आता है  कोई 
एहसास मन मस्तिष्क में ।

आधुनिक युग का प्रेमी मैं
जीता हूं यथार्थ में
रहता है दिल में
केवल लाल रंग का खून
जो नहीं प्यार जैसा रंग
दिल में रहने की
बात है वो कल्पना
जिसे मानते रहे
सच अब तक सभी प्रेमी ।

प्यार हमारा
रिश्तों का कोई 
अटूट बंधन नहीं 
लगने लगे जो
बाद में 
एक कैद दोनों को ।

पास रहें चाहे दूर
हम करते रहेंगे 
प्यार इक दूजे को
सोच कर समझ कर
जान कर
समझती हो मुझे तुम
तुम्हें जानता हूं मैं 
मिलते हैं दोनों के विचार
करते हैं एक दूसरे का
हम सम्मान
हमारे बीच नहीं है
कोई दीवार
न ही हम बंधे हैं
किसी अनचाहे बंधन में
करते रहे  करते हैं
करेंगे हमेशा ही 
हम आपस में सच्चा प्यार ।
 

 

अक्टूबर 14, 2012

POST : 182 बस बहुत हो चुका ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     बस बहुत हो चुका ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

कोई
तथाकथित ईश्वर
धर्म गुरु
कोई पूजास्थल
अब नहीं करेंगे
निर्णय
सही और गलत का ।
 
स्वर्ग या मोक्ष
की चाह
नर्क की सज़ा
का डर
कर नहीं सकेंगे
विवश मुझे ।

अब चलना होगा
सही मार्ग पर मुझे
छोड़ सब बातें
धर्मों की ।

समाज के दोहरे मापदंड
हित अहित
मान अपमान की चिंता
रोक नहीं पाएंगे
मुझे अब कभी ।

बस बहुत हो चुका
जी सकूंगा कब तक
आडंबर के सहारे।
 
मुझे चलना होगा
उस राह पर
जिस पर चलना चाहे
मेरा मन मेरी आत्मा
फिर चाहे जो भी हो ।

कोई अन्तर्द्वंद कोई ग्लानि
कोई पश्चाताप
सत्य और झूठ का
पुण्य और पाप का
अच्छाई और बुराई का
नहीं अब रहा बाकी ।
 
तय करेगा
केवल मेरा विवेक
और चलना है अब मुझे
उसी मार्ग पर
जिसे सही मानता हूं मैं 
मन से आत्मा से ।
 

 

POST : 181 इंसान बेचते हैं , भगवान बेचते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते हैं , भगवान बेचते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते है    भगवान बेचते हैं
कुछ लोग चुपके चुपके ईमान बेचते हैं ।

लो हम खरीद लाये इंसानियत वहीं से
हर दिन जहां शराफत शैतान बेचते हैं ।

अपने जिस्म को बेचा  उसने जिस्म की खातिर
कीमत मिली नहीं   पर नादान बेचते है ।

सब जोड़ तोड़ करके सरकार बन गई है
जम्हूरियत में ऐसे फरमान बेचते हैं ।

फूलों की बात करने वाले यहां सभी हैं
लेकिन सजा सजा कर गुलदान बेचते हैं ।

अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं
अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं ।

सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना
लाशें खरीद कर जो , शमशान बेचते हैं ।