Thursday, 30 August 2012

ग़ज़ल 7 1 ( आई हमको न जीने की कोई अदा )

आई हमको न जीने की कोई अदा ,
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा !
लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया ,
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा !
हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां ,
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा !
हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर ,               ( चारागर = चिकित्सक )
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा !
हाथ में हाथ लेकर जिएं उम्र भर ,
और होता है क्या ज़िंदगी का मज़ा !
आज "तनहा" हमें मिल गई ज़िंदगी ,
छोड़ मझधार में जब गया नाखुदा  !           ( नाखुदा  = माझी )

ग़ज़ल 7 0 ( जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है )

जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है ,
हाँ मुहब्बत में हद से गुज़रने का इरादा है !
अब कैसे बचेंगे उन्हें चाहने वाले सब ,
उनका आज सजने -संवरने का इरादा है !
लड़ना है दिलो जान से ,ठान लिया है अब ,
ज़ालिम के ज़ुल्म से न डरने का इरादा है !
लिखनी दास्तां है लहू से अपने कोई ,
कहने का नहीं अब तो करने का इरादा है !
बढ़ते ये कदम रोकने से न रुकेंगे अब ,
मंज़िल पे पहुंच के ठहरने का इरादा है !
हम ने थाम ली है ये पतवार तुफानों में ,
"तनहा" हौंसलों से उतरने का इरादा है !

ग़ज़ल 6 8 ( हैं उधर सारे लोग भी जा रहे )

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे ,
रास्ता अंधे सब को दिखा रहे !
सुन रहे बहरे ध्यान से देख लो ,
गीत सारे गूंगे जब गा रहे !
सबको है उनपे ही एतबार भी ,
रात को दिन जो लोग बता रहे !
लोग भूखे हैं बेबस हैं मगर ,
दांव सत्ता वाले हैं चला रहे !
घर बनाने के वादे कर रहे ,
झोपड़ी उनकी भी हैं हटा रहे !
हक़ दिलाने की बात को भूलकर ,
लाठियां हम पर आज चला रहे !
बेवफाई की खुद जो मिसाल हैं ,
हम को हैं वो "तनहा" समझा रहे ! 

Wednesday, 29 August 2012

ग़ज़ल 5 9 ( मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का )

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ,
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का !
बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी ,
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का !
नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी ,
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का !
करेगा तिजारत की बात जब ज़माना ,
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का !
हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के ,
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का !
वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई ,
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का  !

ग़ज़ल 5 8 ( बिजलियों का भी धड़का है बरसात में )

बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ,
क्या गज़ब ढाये काली घटा रात में !
कुछ कहा सादगी से भी उसने अगर ,
राज़ था इक छुपा उसकी हर बात में !
कम नहीं है ज़माने के लोगों से वो ,
बस लिया देख पहली मुलाक़ात में !
राह तकती किसी की वो छत पर खड़ी ,
देखा जब भी उसे चांदनी रात में !
हारते सब रहे इस अजब खेल में ,
लोग उलझे रहे यूँ ही शह-मात में  !

ग़ज़ल 5 7 ( मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी )

मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी ,
दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी !
याद रहता है हमें जो उम्र भर ,
मौत का पैगाम है ये ज़िंदगी !
मुस्कुराती सुबह आती है मगर ,
फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी !
है कभी फूलों सी कांटों सी कभी ,
नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी !
जानते ये राज़ "तनहा" काश हम ,
इक बड़ा ईनाम है ये ज़िंदगी ! 

ग़ज़ल 1 5 1 ( आपने जब पिलाना छोड़ दिया )

आपने जब पिलाना छोड़ दिया ,
मयकदे हमने जाना छोड़ दिया  !
रोज़ महफ़िल जमाना छोड़ दिया ,
घर किसी को बुलाना छोड़ दिया  !
अब कहीं आना जाना छोड़ दिया ,
आपका आशियाना छोड़ दिया  !
दोस्तों का ठिकाना छोड़ दिया ,
दुश्मनों से निभाना छोड़ दिया  !
ज़िंदगी को डराना छोड़ दिया ,
अब ज़हर रोज़ खाना छोड़ दिया  !
चारागर को बुलाना छोड़ दिया ,
दर्द को खुद बढ़ाना छोड़ दिया  !
गैर सारा ज़माना छोड़ दिया ,
आज "तनहा" ने माना छोड़ दिया  !
                                                       (  चारागर = डॉक्टर = चिकित्सक )

Monday, 27 August 2012

ग़ज़ल 5 4 ( महफ़िल में जिसे देखा तनहा सा नज़र आया )

महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया !
हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से ,
अनजाना बना अपना ,बैठा -सा नज़र आया !
मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में ,
मुझको न कोई लेकिन ,तेरा-सा नज़र आया !
हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा ,
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया !
हसरत सी लिये दिल में ,हम उठके चले आये ,
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ! 

ग़ज़ल 5 3 ( इस दरजा एतबार क्यों )

इस दरजा एतबार क्यों ,
कहते हो बार बार क्यों !
कोई बताये किस तरह ,
ग़म का है इव्वास्तगार क्यों !
मुरझाये गुल कभी नहीं ,
उस को न इख्तियार क्यों !
जाने किसी के आने का ,
हम को है इंतज़ार क्यों !
पूछो न हमसे आज तुम ,
दिल का गया करार क्यों !
उनको सुना नई ग़ज़ल ,
"तनहा" है बेकरार क्यों ! 

ग़ज़ल 5 2 ( हादिसों की अब तो आदत हो गई है )

हादिसों की अब तो आदत हो गई है ,
ग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है !
बस खबर ही आपकी पहचान है अब ,
आपकी कैसी ये शोहरत हो गई है !
किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें ,
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है !
थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन ,
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है !
भूल जाते हैं सभी कसमें वफ़ा की ,
बेवफाई अब तो आदत हो गई है !
लोग अपने आप से अनजान "तनहा" ,
आजकल कुछ ऐसी हालत हो गई है !

Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 4 9 ( शिकवा किस्मत का न करना )

शिकवा किस्मत का न करना ,
ग़म से घबरा कर न मरना !
माना ये दुनिया है ज़ालिम ,
तुम न इस दुनिया से डरना !
नफरतों की है ये दल दल ,
तुम इधर से मत गुज़रना !
अश्क पी लेना मगर तुम ,
प्रेम को रुसवा न करना !
तुम न पहचानो जो खुद को ,
इस कदर भी मत संवरना !
हो सका न निबाह तुम से ,
तुम न इस सच से मुकरना ! 

ग़ज़ल 4 3 ( वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये )

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ,
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिए !
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क का ,
सोचकर उसका अंजाम हम रो लिए !
महफिलें आपकी और तनहा हैं हम ,
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिए  !
हम तो डर ही गए , मर गए सब के सब ,
आप ज़िंदा तो हैं ,अपने लब खोलिए !
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह ,
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिए !

ग़ज़ल 3 4 ( बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे )

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे ,
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे !
बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं ,
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे !
पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर ,
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे !
खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता ,
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे !
वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल ,
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे !
भाईचारे का मिला इनाम उनको ,
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे !

ग़ज़ल 2 5 ( दर्द दे कर हमें जो सताये कोई )

दर्द दे कर हमें जो सताये कोई ,
हम किधर जाएं फिर ये बताये कोई !
रूठ कर हम तो बैठे हैं इस आस में ,
हम को अपना समझ कर मनाये कोई !
दर खुला हमने रक्खा है इस वास्ते ,
कोई वादा नहीं फिर भी आये कोई !
बेख्याली में कब जाने किस मोड़ पर ,
राह में हाथ हमसे मिलाये कोई !
याद आये किसी की तो भर आये दिल ,
इस तरह भी न हम को रुलाये कोई !
अश्क पलकों पे आ कर छलकने लगें ,
इस कदर आज हमको हंसाये कोई !
शाम ढलते ही इस धुन में रहते हैं हम ,
काश पुरदर्द नग्मा सुनाये कोई  !

ग़ज़ल 2 3 ( न आयें अगर वो , करें क्या बताओ )

न आयें अगर वो , करें क्या बताओ ,
वो आयें ,बहाना कुछ ऐसा बनाओ !
कशिश उनके दिल में भी पैदा करो तुम ,
उन्हें , वरना तुम ,कर के कोशिश भुलाओ !
मुहब्बत कभी इस तरह भी हुई है ,
बुलायें तुम्हें पास तुम दूर जाओ !
उसे सिज्दा कर के हुए हम तो काफ़िर ,
अगर हो सके उस खुदा को मनाओ !
जो उम्मीद टूटी तो फिर होगी मुश्किल ,
न यूँ दिल को झूठे दिलासे दिलाओ !
जगह दो न दो अपने दिल में हमें तुम ,
बस इक बार हमसे नज़र तो मिलाओ !
वो अनजान बनते हैं सब जान कर भी ,
उन्हें हाल-ए-दिल तुम न "तनहा" सुनाओ ! 

ग़ज़ल 2 2 ( तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है )

तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ,
ये मेरी वफाओं का मिला खूब सिला है !
इक बूँद को तरसा किये हम प्यास के मारे ,
ऐसे तो बरसता न ये सावन से गिला है !
आती रही यूं तो बहारें ही बहारें ,
बिन तेरे मगर दिल का कोई फूल खिला है !
मिल जाते हैं हमदर्द यहां कहने को लेकिन ,
बांटे भी वो हम किससे जो ग़म तुम से मिला है !
हंसता है खुदा जाने ये क्यूं हम पे ज़माना ,
आंसू कोई शायद तेरी पलकों पे ढला है !
दो पल ही गुज़ारे थे तेरे साथ ब-मुश्किल ,
इक उम्र बड़ी पा के मगर "लोक" चला है  !

ग़ज़ल 2 1 ( रंक भी राजा भी तेरे शहर में )

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ,
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में !
नाव तूफां से जो टकराती रही ,
वो किनारे जा के डूबी लहर में !
ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है ,
रोक रोने पर भी है अब कहर में !
मर के भी देते हैं सब उसको दुआ ,
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में !
क्या भरोसा आप पर "तनहा" करें ,
आप जाते हो बदल इक  पहर में !

ग़ज़ल 1 9 ( उस को यूँ हैरत से मत देखा करो )

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ,
ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है !
जिसको ठुकराने चले तुम बिन पढ़े ,
दोस्ती ही का तो वो पैगाम है !
उठ गया अब तो जहां से एतबार ,
शहर वालों में ये चर्चा आम है  !
काफिले में चल रहे हैं साथ साथ ,
अपनी अपनी फिर भी तनहा शाम है !
देख कर लाशें कभी रोते नहीं ,
खोदना ही कब्र उनका काम है !
सत्यवादी कह के हंसता है जहां ,
बस यही सच कहने का ईनाम  है !

ग़ज़ल 1 8 ( बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही )

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ,
इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही !
इक हमीं पर न थी उनकी चश्मे करम ,
सब पे महफ़िल में उनकी इनायत रही !
हम तो पीते हैं ये ज़हर ,पीना न तुम ,
उनकी औरों को ऐसी हिदायत रही !
उड़ गई बस धुंआ बनके सिगरेट का ,
राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही  !
भर के हुक्का जो हाकिम का लाते रहे ,
उनको दो चार कश की रियायत रही  !

ग़ज़ल 1 2 ( बहती इंसाफ की हर ओर यहाँ गंगा है )

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है !
वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है !
महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है !
ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है !
आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है !
उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है  !
उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है ! 

ग़ज़ल 0 7 ( जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए )

जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ,
ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए  !
और कुछ भी तो हमको तम्मना नहीं ,
सांस लेने को थोड़ी हवा चाहिए !
हाल -ए -दिल आ के पूछे हमारा जो खुद ,
ऐसा भी एक कोई खुदा चाहिए !
अपनों बेगानों से अब तो दिल भर गया ,
एक इंसान इंसान सा चाहिए  !
देख कर जिसको मिट जाएं दुनिया के ग़म ,
कोई मासूम सी वो अदा चाहिए !
जब कभी पास जाने लगे प्यार से ,
बस तभी कह दिया फ़ासिला चाहिए !
ज़िंदगी से नहीं और कुछ मांगना ,
दोस्त "तनहा" हमें आपसा चाहिए !

ग़ज़ल 0 5 ( पास आया नज़र जो किनारा हमें )

पास आया नज़र जो किनारा हमें ,
मौज ने दूर फेंका दोबारा हमें !
ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी ,
यूँ लगा है किसी ने पुकारा हमें !
लड़खड़ाये तो खुद ही संभल भी गए ,
मिल न पाया किसी का सहारा हमें !
हो गई अब तो धुंधली हमारी नज़र ,
दूर से तुम न करना इशारा हमें !
दुश्मनों से न इतना करम हो सका ,
हमने चाहा जो मरना न मारा हमें !
हमको मालूम है मौत देगी सुकूं ,
ज़िंदगी से मिला बोझ सारा हमें !
बिन बुलाये यहां आप क्यों आ गये ,
सबने "तनहा" था ऐसे निहारा हमें !  

Saturday, 25 August 2012

ग़ज़ल 1 4 2 ( कहाँ कुछ और मांगा है , यही इम्दाद कर दो )

कहां कुछ और मांगा है ,यही इम्दाद कर दो,
मिटा दो हर निशां मेरा ,मुझे बर्बाद कर दो !
सुना है आपकी मांगी दुआ सुनता खुदा है,
किसी दिन आप मेरे वास्ते फ़रियाद कर दो !
हुआ मुश्किल बड़ा जीना हमारा अब जहां में ,
हमें अब जिंदगी की कैद से आज़ाद कर दो !
ज़माना बन नहीं जाए कहीं दुश्मन तुम्हारा ,
मिलेगी हर ख़ुशी तुमको हमें नाशाद कर दो !
ये दुनिया लाख दुश्मन हो हमें कुछ ग़म नहीं है ,
हमारा साथ तुम देना उसे नक्काद कर दो !
नहीं देते कसम लेकिन हमें तुमसे है कहना,
मिलेंगे रोज़ हम दोनों यहां मीआद कर दो !
सभी अपने यहां पर हैं ,नहीं हैं गैर तनहा,
कहो अपनी सुनो उनकी अभी इतिहाद कर दो ! 

ग़ज़ल 2 7 ( भुला दें चलो सब पुरानी खताएं ) नव वर्ष पर संकल्प

भुला दें चलो सब पुरानी खताएं ,
नई अपनी पहचान फिर से बनाएं  !
जो शिकवे गिले हैं निकालें दिलों से ,
करीब आ के हम हाथ अपने मिलाएं !
न मुरझाएं चाहे बदल जाए मौसम ,
हम आँगन में कुछ फूल ऐसे खिलाएं  !
न हम जी सकेंगे न तुम दूर रह कर ,
तो फिर दूरियां ये न क्यूँ हम मिटाएं  !
हो टूटा हुआ सिलसिला फिर से कायम ,
हमें तुम बुलाओ तुम्हें हम बुलाएं  !
खताएं हमारी जफ़ाएं तुम्हारी ,
बहुत हो चुकीं अब चलो मान जाएं  !
ज़मीं आस्मां चाँद तारों के नग्में ,
फिर इक साथ मिलकर तरन्नुम से गाएं  !

Friday, 24 August 2012

ग़ज़ल 1 3 4 ( बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा )

बहुत खूब समझे इशारा तुम्हारा ,
नहीं अब मिलेगा सहारा तुम्हारा !
नया और साथी तुम्हें मिल गया है ,
गया टूट नाता हमारा तुम्हारा  !
हुई भूल हमसे भी कोई तो होगी ,
नहीं दोष होगा ये सारा तुम्हारा  !
भुला कर हमें मत कभी याद करना ,
तभी हो सकेगा गुज़ारा तुम्हारा  !
हमारे सितारे रहें गर्दिशों में ,
चमकता रहे पर सितारा तुम्हारा !
हमारी नज़र में अभी तक बसा है ,
था कितना हसीं वो नज़ारा तुम्हारा !
तुम्हें रात सपने में देखा था "तनहा" ,
वही नाम फिर था पुकारा तुम्हारा  !

ग़ज़ल 1 3 3 ( हदिसे इसलिये हैं होने लगे )

हदिसे इसलिये हैं होने लगे ,
कश्तियां नाखुदा डुबोने लगे !
ज़ख्म खा कर भी हम रहे चुप मगर ,
ज़ख्म दे कर हैं आप रोने लगे !
कल अभी  आपने  जगाया जिन्हें ,
देख लो आज फिर से सोने लगे !
आप मरने की मांगते हो दुआ ,
खुद पे क्यों  एतबार खोने लगे !
काम अच्छे नहीं कभी भी किये   ,
बस  नहा कर हैं पाप धोने लगे !
लोग खुशियां तलाश करते रहे  ,
दर्द का बोझ और ढोने लगे !
फूल देने की बात करते रहे  ,
खार "तनहा" सभी चुभोने लगे !

ग़ज़ल 1 3 2 ( सुनो इक कहानी हमारी जुबानी )

सुनो इक कहानी हमारी जुबानी ,
नई भी नहीं है न है ये पुरानी  !
किसी ने किसी से किया प्यार इक दिन ,
रखी है छुपा कर अभी तक निशानी  !
वहीँ पर सुबह से हुई शाम अक्सर ,
सुहाने थे दिन और रातें सुहानी  !
नहीं भूल सकता कभी वो नज़ारा ,
किसी में थी देखी नदी की रवानी  !
वो क्या दौर था दोस्तो ज़िंदगी का ,
लुटा दी किसी ने किसी पर जवानी !
अजब हाल देखा वहां पर सभी का ,
वहीं प्यास भी थी जहां पर था पानी  !
इसे तुम जुबां पर कभी भी न लाना ,
सुना दी है "तनहा" तुम्हें जो कहानी  !

ग़ज़ल 1 3 0 ( हम सभी इस तरह बंदगी करते )

हम सभी इस तरह बंदगी करते ,
दुश्मनी छोड़ कर दोस्ती करते !
तुम अगर रूठते हम मना लेते ,
जो किया था कभी फिर वही करते !
जी सकेंगे नहीं बिन तुम्हारे हम ,
इस तरह से नहीं दिल्लगी करते !
क्यों नहीं छू लिया आसमां तुमने ,
काम मुश्किल नहीं गर कभी करते !
छोड़ आये जिसे घर तुम्हारा है ,
बस यही सोचकर वापसी करते !
ज़ुल्म सहते रहे हम ज़माने के ,
पर शिकायत किसी से नहीं करते  !
एक हसरत लिये चल दिये "तनहा" ,
मत लगाते गले बात ही करते  ! 

ग़ज़ल 1 2 9 ( नहीं साथ रहता अंधेरो में साया )

नहीं साथ रहता अंधेरों में साया ,
हुआ क्या नहीं साथ तुमने निभाया !
किसी ने निकाला हमें आज दिल से ,
बड़े शौक से कल था दिल में बिठाया !
कभी पोंछते जा के आंसू उसी के ,
था बेबात जिसको तुम्हीं ने रुलाया  !
निभाना वफा तुम नहीं सीख पाये  ,
तुम्हें जिसने चाहा उसी को मिटाया !
चले जा रहे थे खुदी को भुलाये ,
किसी ने हमें आज खुद से मिलाया !
खड़े हैं अकेले अकेले वहीँ पर ,
जहाँ आशियाँ इक कभी था बसाया !
उसे याद रखना हमेशा ही "तनहा" ,
ज़माने ने तुमको सबक जो सिखाया !

Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 8 4 ( अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में )

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अन्दाज़ में ,
आज कैसे कह दिया सब कुछ यहां आगाज़ में !
आप कहना चाहते कुछ और थे महफ़िल में ,पर ,
बात शायद और कुछ आई नज़र आवाज़ में !
कह रहे थे आसमां के पार सारे जाएंगे ,
रह गई फिर क्यों कमी दुनिया तेरी परवाज़ में !
दे रहे अपनी कसम रखना छुपा कर बात को ,
क्यों नहीं रखते यकीं कुछ लोग अब हमराज़ में !
लोग कोई धुन नई सुनने को आये थे यहां ,
आपने लेकिन निकाली धुन वही फिर साज़ में !
देखते हम भी रहे हैं सब अदाएं आपकी ,
पर लुटा पाये नहीं अपना सभी कुछ नाज़ में !
तुम बता दो बात "तनहा" आज दिल की खोलकर ,
मत छिपाओ बात ऐसे ज़िंदगी की राज़ में  !

ग़ज़ल 5 1 ( राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं )

राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं ,
जिस पर निशान गालिबो दागो जिगर के हैं !
जाने कहां कहां के हमें जानते हैं लोग ,
हमको तो ये गुमां था कि तेरे नगर के हैं !
वो काफिले तो जानिबे मंज़िल चले गये  ,
बाकी रही है गर्द वहां हम जिधर के हैं !
मिलते हैं अजनबी की तरह लोग किसलिये  ,
हम सब तो रहने वाले उसी एक घर के हैं !
ये दर्दो ग़म भी खुद को करें किस तरह जुदा ,
रिश्ते हमारे इनसे तो शामो सहर के हैं !
साहिल की रेत को भी भला इसकी क्या खबर ,
बिखरे पड़े हैं जो ये महल किस बशर के हैं  !

ग़ज़ल 4 7 ( नफरत के बदले प्यार दिया है हमने )

नफरत के बदले प्यार दिया है हमने ,
शायद ये कोई जुर्म किया है हमने !
मरना भी चाहा ,मर सके न हम लेकिन ,
लम्हा लम्हा घुट घुट के जिया है हमने  !
दिल में उठती है टीस सी इक रह रह कर ,
नाम उसका जो भूले से लिया है हमने  !
तू हमसे ज़िंदगी ,क्यों है बता रूठी सी ,
ऐसा भी क्या अपराध किया है हमने  !
हमको कातिल कहने वाले ,ऐ नादां,
तुझ पर आया हर ज़ख्म सिया है हमने !
उसने अमृत या ज़हर दिया है हमको ,
जाने क्या यारो आज पिया है हमने !

ग़ज़ल 4 6 ( कहीं न कह दें दिल की बात )

कहीं न कह दें दिल की बात ,
बन जाये महफ़िल की बात !
डूब गई अश्कों के ,
सागर में साहिल की बात !
मिलती नहीं ये मांगे से ,
मौत बड़ी मुश्किल की बात !
एक ज़माना कातिल है ,
किससे कहें कातिल की बात !
ज़हन में भूले भटकों के,
उतर गई मंजिल की बात !
कहीं न लब पर आ जाये  ,
मदहोशी में दिल की बात !
पायल की छमछम में भी ,
होती है दर्दे दिल की बात !

ग़ज़ल 4 5 ( वो पहन कर कफन निकलते हैं )

वो पहन कर कफ़न निकलते हैं ,
शख्स जो सच की राह चलते हैं !
राहे मंज़िल में उनको होश कहाँ ,
खार चुभते हैं , पांव जलते हैं  !
गुज़रे बाज़ार से वो बेचारे ,
जेबें खाली हैं , दिल मचलते हैं  !
जानते हैं वो खुद से बढ़ के उन्हें ,
कह के नादाँ उन्हें जो चलते हैं !
जान रखते हैं वो हथेली पर ,
मौत क़दमों तले कुचलते हैं  !
कीमत उनकी लगाओगे कैसे ,
लाख लालच दो कब फिसलते हैं !
टालते हैं हसीं में  वो उनको ,
ज़ख्म जो उनके दिल में पलते हैं !

ग़ज़ल 3 8 ( सब से पहले आपकी बारी )

सब से पहले आप की बारी ,
हम न लिखेंगे राग दरबारी !
और ही कुछ है आपका रुतबा ,
अपनी तो है बेकसों से यारी !
लोगों के इल्ज़ाम हैं झूठे ,
आंकड़े कहते हैं सरकारी !
फूल सजे हैं गुलदस्तों में ,
किन्तु उदास चमन की क्यारी !
होते सच , काश आपके दावे ,
देखतीं सच खुद नज़रें हमारी !
उनको मुबारिक ख्वाबे जन्नत ,
भाड़ में जाये जनता सारी  !
सब को है लाज़िम हक़ जीने का ,
सुख सुविधा के सब अधिकारी  !
माना आज न सुनता कोई ,
गूंजेगी कल आवाज़ हमारी  !

ग़ज़ल 3 7 ( हम तो जियेंगे शान से )

हम तो जियेंगे शान से,
गर्दन झुकाये से नहीं !
कैसे कहें सच झूठ को ,
हम ये गज़ब करते नहीं !
दावे तेरे थोथे हैं सब ,
लोग अब यकीं करते नहीं !
राहों में तेरी बेवफा,
अब हम कदम धरते नहीं !
हम तो चलाते हैं कलम ,
शमशीर से डरते नहीं  !
कहते हैं जो इक बार हम ,
उस बात से फिरते नहीं !
माना मुनासिब है मगर ,
फरियाद हम करते नहीं !

ग़ज़ल 2 4 ( तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम )

तड़पा ही गया हिज्र में बरसात का आलम ,
और उसपे उमड़ते हुए जज़्बात का आलम !
याद आता है वो वक्ते मुलाकात हमारा ,
बरसात में भीगे हुए हालात का आलम !
बस भीगते ही रहने में थी खैर हमारी ,
बौछार से कम न था शिकायात का आलम !
दीवाना बनाने हमें रिमझिम में चला है ,
दुजदीदा निगाहों के इशारात का आलम !
लफ़्ज़ों में बयाँ कर न सकूँगा मैं सुहाना ,
भीगी हुई जुल्फों की सियह रात का आलम !

Tuesday, 21 August 2012

ग़ज़ल 3 0 ( दिल में आता है सतायें उनको )

दिल में आता है सतायें उनको ,
बात ये कैसे बतायें उनको !
एक मुद्दत हुई दीदार किये ,
किस बहाने से बुलायें उनको !
वो तो हर बात पे हंस देते हैं ,
कभी रूठें तो मनायें उनको !
ये सितम हमसे न होगा हर्गिज़ ,
कि शबे हिज्र रुलायें उनको !
हमने पूछा था सवाल उनसे कभी ,
याद वो कैसे दिलायें उनको !
खुद ग़ज़ल हैं वो हमारे दिल की ,
क्या भला और सुनायें उनको !

ग़ज़ल 2 8 ( राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं )

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ,
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं !
बात करता है किस लोक की ये जहां ,
लोक -परलोक से हम तो डरते नहीं !
हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी ,
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं !
आईने में तो होता है सच सामने ,
सामना इसका सब लोग करते नहीं !
खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर ,
नाम के नाखुदा पार उतरते नहीं !

ग़ज़ल 1 6 ( ये सबने कहा अपना नहीं कोई )

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ,
फिर भी कुछ दोस्त बनाये हमने !
फूल उनको समझ कर चले काँटों पर ,
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाये हमने !
यूँ तो नग्में थे मुहब्बत के भी ,
ग़म के नग्मात ही गाये हमने !
रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर ,
जिनसे दुःख दर्द छिपाये हमने !
ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार ,
खुद ही भेजे ख़त पाये हमने  !
हम फिर भी रहे जहां में "तनहा" ,
मेले कई बार लगाये हमने ! 

ग़ज़ल 14 ( फिर कोई कारवां बनायें हम )

फिर कोई कारवां बनायें हम ,
या कोई बज़्म ही सजायें हम  !
छेड़ने को नई सी धुन कोई ,
साज़ पर उंगलियां चलायें हम  !
आमदो रफ्त होगी लोगों की ,
आओ इक रास्ता बनायें हम  !
ये जो पत्थर बरस गये  इतने ,
क्यों न मिल कर इन्हें हटायें हम  !
है अगर मोतिओं की हमको तलाश ,
गहरे सागर में डूब जायें  हम  !
दर बदर करके दिल से शैतां को ,
इस मकां में खुदा बसायें  हम  !
हुस्न में कम नहीं हैं कांटे भी ,
कैक्टस सहन में सजायें  हम  !
हम जहाँ से चले वहीँ पहुंचे ,
अपनी मंजिल यहीं बनायें हम  !

ग़ज़ल 0 4 ( भीगा सा मौसम हो और हम हों )

भीगा सा मौसम हो और हम हों ,
भूला हुआ हर ग़म हो और हम हों  !
फूलों से भर जाये रात रानी  ,
महकी हुई पूनम हो और हम हों  !
झूल के झूले में आकाश छू लें   ,
रिमझिम की सरगम हो और हम हों  !
भूली बिसरी बातें याद करके  ,
चश्मे वफा पुरनम हो और हम हों  !
आकर जाने की सुध बुध भुलायें  ,
थम सा गया आलम हो और हम हों  !
आओ चलें हम उन तनहाइयों में ,
जिन में सुकूं हरदम हो और हम हों  !
मिल न सकें तो मौत ही हमको आये ,
रूहों का संगम हो और हम हों !

Sunday, 19 August 2012

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया = 2 0 भाग एक

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ,
आईने से यूँ परेशान हैं लोग  !
बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह ,
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग !
जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें ,
उन को ही देख के हैरान हैं लोग !
अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन ,
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग !
आदमीयत  को भुलाये बैठे ,
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग !
शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी ,
बन गए शहर की जो जान हैं लोग
मुझको मरने भी नहीं देते हैं ,
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग !

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 19 भाग एक

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ,
जो पिछड़ जाते हैं वो लोग बिखर जाते हैं !
जिनको मिलता ही नहीं कोई जीने का सबब ,
मौत से पहले ही अफ़सोस वो मर जाते हैं !
मुश्किलों को कभी आसान नहीं कर सकते ,
उलझनों से ,वो सभी लोग , जो डर जाते हैं !
जो नहीं मिलता कभी जा के किनारों पे हमें ,
वो उन्हें मिलता है जो बीच भंवर जाते हैं  !
हम समझते हैं जिन्हें अपना वो गैरों की तरह ,
पेश आते हैं तो हम जीते जी मर जाते हैं !
गैर अच्छे जो मुसीबत में हमारी आकर ,
दोस्तों जैसा कोई काम तो कर जाते हैं !
आएगा कोई हमारा भी मसीहा बन कर ,
आस में, उम्र तो क्या ,युग भी गुज़र जाते हैं !

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 18 भाग एक

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ,
फायदा ज़हर भी कर जाते हैं !
सीख जाते हैं भुलाना उनको ,
बन के जो गैर गुज़र जाते हैं !
ख्वाब तो ख्वाब हैं उनका क्या है ,
नींद जो टूटी बिखर जाते हैं !
एक तिनके का सहारा पा कर ,
डूबने वाले भी तर जाते हैं !
इस से पहले कि उन्हें पहचाने ,
वो जो करना था ,वो कर जाते हैं !
फूल यादों पे चढ़ाओ उनकी ,
जीते जी लोग जो मर जाते हैं ! 

अब हमें दिल की बात कहने दो ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 1 7 भाग एक

अब हमें दिल की बात कहने दो ,
हो जो मुमकिन तो अश्क बहने दो !
सब चले जाएंगे कभी न कभी ,
कोई मेहमान अभी तो रहने दो  !
वक़्त इसका इलाज कर देगा ,
दिल को अब तो ये दर्द सहने दो  !
ख़त्म कर दो खामोशियों को आज ,
कहना है जो लबों को कहने दो  !
रोक पाई न इश्क को दुनिया ,
ये तो दरिया है इसको बहने दो  !
देखो खुद बन के तुम तमाशाई ,
हिलती दीवार घर की ढहने दो  !

बात दिल में थी जो बता न सके ( नज़्म / ग़ज़ल ) 1 6 डॉ लोक सेतिया = भाग एक

बात दिल में थी जो बता न सके ,
आपबीती उन्हें सुना न सके  !
हमने कोशिश हज़ार की लेकिन ,
बेकरारी ए दिल छिपा न सके !
बातें करते रहे ज़माने की ,
बात अपनी जुबां पे  ला न सके !
चाह कर भी घटा सी जुल्फों को ,
उनके चेहरे से हम हटा न सके  !
हमने पूछा जो बेरुखी का सबब ,
वो बहाना कोई बना न सके  !
जाने वाले ने देखा मुड़. मुड़. कर ,
हम मगर उसको रोक पा न सके ! 

है शहर में बस धुआं धुआं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया = 1 5 भाग एक

है शहर में बस धुआं धुआं ,
न रौशनी का कोई निशां !
ये पूछती है नज़र नज़र ,
है आदमी का कोई निशां !
समझ सके जो यहाँ है कौन ,
ज़रा सी इक बच्ची की जबां !
कहीं भी दिल लगता ही नहीं ,
जो कोई जाये भी तो कहाँ  !
सुनाएँ कैसे किसी को हम ,
इक उजड़े दिल की ये दास्ताँ !

वो दर्द कहानी बन गया ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया = 1 4 भाग एक

वो दर्द कहानी बन गया ,
इक याद पुरानी बन गया  !
पत्र जो वापस मिला मुझे ,
वो उसकी निशानी बन गया !
उसकी महफ़िल में जाना ही ,
मेरी नादानी बन गया  !
लबों तक बात आ न सकी ,
पलकों का पानी बन गया  !
उनका पूछना हाल मेरा ,
इक मेहरबानी बन गया  !

याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 1 3 भाग एक

याद तुम्हें करता है कोई ,
जीते जी मरता है कोई !
लफ्ज़े-मुहब्बत अपनी जुबां पर ,
लाने से डरता है कोई  !
दुनिया में इक वो ही हसीं है ,
इस का दम भरता है कोई  !
सूखे फूल चढा कर कैसी ,
ये पूजा करता है कोई  !
खुद से तन्हाई में बातें ,
दीवाना करता है कोई  !
वादा करके भी वो न आया ,
यूँ भी ज़फा करता है कोई ! 

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 1 2 भाग एक

लब पे आई तो मुहब्बत आई ,
भूल कर भी न शिकायत आई !
बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में ,
फिर हमें याद वो मूरत आई !
हम से बिछड़ी जो अभी शाम ढले ,
रात भर याद वो सूरत आई !
कश्ती लहरों के हवाले कर दी ,
बेबसी में जो ये नौबत आई !
आसमां रंग बदल कर बोला ,
लो ज़मीं वालो कयामत आई  !

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 11 भाग एक

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ,
कुछ तूफानों का डर भी है !
जीने की चाहत है लेकिन ,
पीना ग़म का सागर भी है !
इंसानों की खबर न कोई ,
शहर का ऐसा मंज़र भी है !
यूँ तो है खामोश किनारा ,
लहर गई टकरा कर भी है !
ढूंढ के उसको लाओ कहीं से,
खोया सहर में दिनकर भी है  !

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 0 4 भाग एक

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ,
यही सोच के चल पड़े थे हम !
न पतवार थी न कोई माझी ,
हौसलों से हुए बड़े थे हम  !
वक़्त आया जो फैसले का ,
खुद अपने से भी लड़े थे हम  !
ज़माने की आग से पक गए ,
वरना कच्चे घड़े थे हम  !
झुक गए तेरी मुहब्बत में ,
तबीयत से सरचड़े थे हम  !
मोम की तरह पिघल गए ,
कभी फौलाद से कड़े थे हम  !
फरियाद कातिल से न करेंगे ,
इसी बात पे अड़े थे हम !

खुद पे ही एतबार कर लो ( नज़्म / जीवन राह ) डॉ लोक सेतिया = 0 3 भाग एक

खुद पे ही एतबार कर लो ,
ज़िंदगी का तुम दीदार कर लो !
जो मंज़िल की चाह है तुम्हें ,
मुश्किलों से भी प्यार कर लो !
बेहतर है ये किनारे बैठने से ,
डूब जाओ या कि पार कर लो !
बदल सकते हो हवा का रुख ,
हौसला तुम एक बार कर लो !
कौन अपना है कौन बेगाना ,
प्यार से मिले जो प्यार कर लो ! 

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ( नज़्म / पुष्प ) डॉ लोक सेतिया = 0 2 भाग एक

पल दो पल में मुर्झाऊंगा ,
शाख से टूट के क्या पाउँगा !
आज सजा हूँ गुलदस्ते में ,
कल गलियों में बिखर जाऊंगा !
उतरूंगा जो तेरे जूड़े से ,
बासी फूल ही कहलाऊंगा !
गूंथा जाऊंगा जब माला में ,
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा !
मेरे खिलने का मौसम है ,
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा !
चुन के मुझे ले जायेगा माली ,
डाली को याद बहुत आऊंगा !

झूठी सुन्दरता ( कविता ) 2 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

खूबसूरत बदन ,
झील सी गहरी आँखें ,
मरमरी से होंट ,
उन्नत उरोज ,
नागिन से काले बाल ,
मदमस्त अदाएं ,
उस पर सोलह श्रृंगार ,
सभी को ,
कर रहे थे दीवाना ,
लग रहा था ,
धरा पर जैसे ,
उतर आई है ,
अप्सरा कोई !
तभी सुनाई दिया ,
उसका कर्कश स्वर ,
नफरत भरे उसके बोल ,
और लगने लगी ,
बेहद बदसूरत वो !
था सब कुछ उसके पास ,
मगर नहीं था ,
कुछ भी उसके पास !

Saturday, 18 August 2012

अधूरी प्यास ( कविता ) 2 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

युगों युगों से ,
नारी को ,
छलता रहा है पुरुष ,
सिक्कों की झंकार से ,
कभी कीमती उपहार से ,
सोने चांदी के गहनों से ,
कभी मधुर वाणी के वार से !
सौंपती रही ,
नारी हर बार ,
तन मन अपना ,
कर विश्वास ,
नारी को प्रसन्न करना ,
नहीं था सदा ,
पुरुष की चाहत ,
अक्सर किया गया ऐसा ,
अपना वर्चस्व ,
स्थापित करने को ,
अपना आधिपत्य ,
कायम रखने के लिये  !
मुझे पाने के लिये  ,
तुमने भी किया वही सब ,
हासिल करने के लिये  ,
देने के लिये  नहीं ,
मैंने सर्वस्व ,
समर्पित कर दिया तुम्हें ,
तुम नहीं कर सके ,
खुद को अर्पित कभी भी मुझे !
जब भी दिया कुछ तुमने ,
करवाया उपकार करने  ,
का भी  एहसास मुझको  ,
और मुझसे  ,
पाते रहे सब कुछ ,
मान कर अपना अधिकार ,
समझा जिसको ,
प्यार का बंधन  ,
और जन्म जन्म का रिश्ता ,
वो बन गया है ,
एक बोझ आज ,
मिट गई मेरी पहचान ,
मेरा अस्तित्व !
अब छटपटा रही हूँ मैं ,
पिंजरे में बंद परिंदे सी ,
एक मृगतृष्णा था शायद ,
तुम्हारा प्यार मेरे लिये  ,
है अधूरी प्यास ,
नारी का जीवन शायद !   

वो जहाँ ( कविता ) 2 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

देखी है ,
हमने तो ,
बस एक ही दुनिया ,
हर कोई है ,
स्वार्थी जहाँ ,
नहीं है कोई भी ,
अपना किसी का !
माँ-बाप ,
भाई-बहन ,
दोस्त-रिश्तेदार ,
करते हैं प्रतिदिन ,
रिश्तों का बस व्योपार !
कुछ दे कर ,
कुछ पाना भी है ,
है यही अब ,
रिश्तों का आधार ,
तुम जाने ,
किस जहाँ की ,
करते हो बातें ,
हमें तो लगता है ,
देखा है शायद  ,
तुमने कोई स्वप्न  ,
और खो गये हो तुम !

नेपथ्य ( कविता ) 2 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

किसी लेखक ने ,
भूख से तड़पते हुए ,
दरिद्रता भरे ,
जीवन पर लिखी थी ,
जो कहानी ,
तुम कर रहे हो ,
अभिनय ,
उस कहानी के ,
नायक की भूमिका का !
जो दर्द भरे बोल ,
निकले थे ,
एक खाली पेट से ,
बोल रहे हो तुम ,
उन बोलों को ,
भरपेट मनपसंद ,
भोजन खा कर ,
और चाहते हो ,
करना कल्पना ,
उस नायक के ,
दर्द के एहसास की ,
चाहे कर लो ,
कितना भी प्रयत्न ,
ला नहीं पाओगे ,
वो आंसू ,
जो स्वता ही ,
निकल आते हैं ,
हर गरीब के बेबसी में ,
नहीं मिल सकते कहीं से ,
बिकते नहीं हैं ,
दुनिया के बाज़ार में  !
तुम बेच सकते ,
हो बार बार ,
झूठे आंसू दिखावे के ,
है कमाल का ,
अभिनय तुम्हारा ,
महान कलाकार हो तुम ,
आवाज़ तुम्हारी रुलाती है ,
भाती है दर्शकों को ,
मिल जायेंगी तुम्हें ,
तालियाँ दर्शकों की ,
और ढेर सारी दौलत भी ,
मगर ,
कहानी का लेखक ,
कहानी के नायक की तरह ,
जीता रहेगा ,
गरीबी का ,
दुःख भरा जीवन ,
उम्र भर ,
उसकी कहानी से ,
हो नहीं पायेगा  ,
न्याय कभी भी !

Friday, 17 August 2012

कोरा कागज़ ( कविता ) 2 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जानता हूँ मैं ,
चाहते हो पढ़ना ,
मेरे मन की ,
तुम पुस्तक ,
जब भी आते हो ,
मेरे पास तुम ,
बैठ कर सामने मेरे ,
तकते रहते हो ,
चेहरा मेरा ,
तिरछी नज़रों से ,
चुपचाप !
जान कर भी ,
बन जाता हूँ ,
अनजान मैं ,
क्योंकि ,
समझता हूँ  मैं ,
जो चाहते हो ,
पढ़ना तुम ,
नहीं लिखा है ,
वो मेरे चेहरे पर !
तुम्हें क्या मालूम ,
क्यों खाली है अभी तक ,
किताब मेरे मन की !
किसी ने मिटा दिया है ,
जो भी लिखा था उस पर !

मैं रहूँगा हमेशा ( कविता ) 2 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जिवित रहूँगा मैं ,
अपने लेखन में ,
हमेशा ,
मौत भी ,
नहीं मिटा सकेगी ,
दुनिया से ,
मेरा अस्तित्व !
जब भी चाहो ,
मिलना तुम मुझसे ,
और चाहो ,
मेरे करीब होने का
करना  एहसास तुम ,
पढ़ लेना ,
फिर से एक बार मुझे !
होगा हर बार ,
तुम्हें आभास ,
मेरे होने का !
मरते नहीं हैं ,
विचार कभी भी !

Thursday, 16 August 2012

कहानी ज़ख्मों की ( कविता ) 1 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बार बार ,
लिखता रहा ,
हर बार ,
मिटाता रहा ,
कहानी ,
अपने जीवन की। 
अच्छा है यही ,
रह जाये अनकही ,
सदा कहानी ,
मेरे जीवन की।
हो न जाये ,
उदास कोई ,
सुनकर मेरी कहानी ,
जीवन में ,
सभी को होती है ,
किसी न किसी से ,
कोई उम्मीद ,
सुनकर मेरी दास्ताँ  ,
टूट न जाये ,
कहीं किसी की कोई आस।
कैसे खड़ा करूँ कटघरे में ,
सभी अपनों को ,
बेगानों को ,
कैसे कह दूं  ,
मिल सका नहीं ,
इक इन्सान ,
इस पूरी दुनिया में मुझे। 
कैसे कर लूँ मैं स्वीकार  ,
कैसे जीते जी ,
मान लूँ  ,
अपनी तलाश की ,
मैं अभी भी हार। 
सुनाऊँ अपनी कहानी ,
मिल जाये  अगर ,
कहीं अपना कोई ,
आंसुओं से  ,
भिगो दूँ उसका दामन ,
रोये  वो भी ,
साथ मेरे देर तक ,
हो जाये मेरे ,
हर दुःख दर्द  ,
और अकेलेपन का अंत। 
मगर लिखी जाती नहीं  ,
उस फूल की कहानी ,
जिसको मसल डाला ,
खुद माली ने।
कहानी उस पत्थर की ,
लगाते रहे जिसको ,
ठोकर सभी लोग।
नहीं लिखी जाती ,
उन सपनों की कहानी ,
बिखरते रहे हर सुबह जो ,
उन रातों की कहानी ,
जिनमें हुई न कभी चांदनी ,
उन सुबहों की ,
क्या लिखूं कहानी ,
मिटा पाया न ,
जिनका सूरज ,
मेरे जीवन से अँधेरा।
काँटों के दर्द भरे शब्दों से ,
मुझे नहीं लिखनी है ,
किसी किताब के ,
खाली पन्नों पर ,
अपने ज़ख्मों की कहानी। 

Tuesday, 14 August 2012

पढ़ कर रोज़ खबर कोई ( नज़्म / बेचैनी ) डॉ लोक सेतिया - 1 भाग एक

पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,
मन फिर हो जाता है उदास !
कब अन्याय का होगा अंत ,
न्याय की होगी पूरी आस !
कब ये थमेंगी गर्म हवाएं ,
आएगा जाने कब मधुमास !
कब होंगे सब लोग समान ,
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास !
चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें ,
फिर वो न आए हमारे पास !
सरकारों को बदल देखा ,
हमको न कोई आई रास !
जिसपर भी विश्वास किया ,
उसने ही तोड़ा है विश्वास  !
बन गए चोरों और ठगों के ,
सत्ता के गलियारे दास  !
कैसी आई ये आज़ादी ,
जनता काट रही बनवास !

दोहे आज के वक़्त के ( राजनीति पर ) 10 भाग तीन - डॉ लोक सेतिया

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख !
मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर !
तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग !
दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल !
झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार !
नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग !
चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार !
आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान !

जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया - 2 2 भाग एक

जश्ने आज़ादी हर साल मनाते रहे ,
पर शहीदों की हर कसम भुलाते रहे !
भगत सिंह और गाँधी सब भूले हमें ,
फूल उनकी समाधी पे चढ़ाते रहे  !
दम भी घुटने लगा हम न ये समझे मगर ,
काट कर पेड़ क्यों शहर बसाते रहे !
जो लिखा फाइलों में न दिखाई दिया ,
लोग भूखे हैं नेता झुठलाते रहे  !
दाग़  ही दाग़ कुछ इधर भी कुछ उधर भी ,
आइनों पर सभी दोष लगाते रहे  !
आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे हुआ ,
बाड़ बनकर रहे खेत भी खाते रहे !
यह न सोचा कभी आज़ादी किसलिए ,
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ भुलाते रहे !
मांगते सब रहे रोटी ,रहने को घर ,
पांचतारा वो होटल बनाते रहे !
खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन ,
वो सुनाते रहे लोग भी गाते रहे !

सीता का पश्चाताप ( कविता ) 1 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुझे स्वयं ,
बनना था ,
एक आदर्श ,
नारी जाति के लिये।
प्राप्त कर सकती थी ,
मैं स्वयं ,
अपनी स्वाधीनता ,
अधिकार अपने ,
कर नहीं पाता ,
कभी भी रावण ,
मेरा हरण !
मैं स्वयं कर देती ,
सर्वनाश उस पापी का ,
मानती हूँ आज मैं ,
हो गई थी ,
मुझसे भयानक भूल ,
पहचाननी थी ,
मुझे अपनी शक्ति ,
मुझे नहीं करनी थी चाहत ,
सोने का हिरण पाने की ,
मेरे अन्याय सहने से ,
नारी जगत को मिला ,
एक गलत सन्देश !
काश तुलसीदास ,
लिखे फिर ,
एक नई रामायण ,
और एक आदर्श ,
बना परस्तुत करे ,
मेरे चरित्र को ,
उस युग की भूल का ,
प्राश्चित हो इस कलयुग में !

Monday, 13 August 2012

ग़ज़ल 1 4 4 ( दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें )

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें ,
बन गए सब मतलबी हम क्या करें !
प्यार से देखा हमें जब आपने ,
ले गई दिल सादगी हम क्या करें  !
अब बताएं सब हुस्न वाले हमें ,
जब सताए आशिकी हम क्या करें !
एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा ,
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें !
दिल हमारा लूट कर कल ले गईं ,
सब अदाएं आपकी हम क्या करें !
प्यार उनको जब रकीबों से हुआ ,
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें !
आज कितना दूर देखो हो गया ,
आदमी से आदमी हम क्या करें  !
सब परेशां लग रहे इस शहर में ,
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें !
आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें ,
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें !

ग़ज़ल 1 4 3 ( बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते )

बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,
सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते !
किसी ने घर जलाया था ,उसी से जा के ये पूछा ,
जला के घर हमारा आप आब क्यों नहीं देते  !
सभी यहाँ बराबर हैं ,सभी से प्यार करना तुम,
सबक लिखा हुआ जिसमें ,किताब क्यों नहीं देते  !
छुपा नहीं छुपाने से हुस्न कभी भी दुनिया से,
हसीं सभी हटा अपना हिजाब क्यों नहीं देते  !
नहीं भुला सके हम ख्वाब जो कभी सजाये थे ,
हमें वही सुहाने फिर से ख्वाब क्यों नहीं देते  !
इश्क यहाँ सभी करते ,नहीं बचा कभी कोई,
न बच सका किसी का दिल ,जनाब क्यों नहीं देते !
यही तो मांगते सब हैं ,हमें भी कुछ उजाला दो ,
नहीं कहा किसी ने आफ़ताब क्यों नहीं देते !
अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है ,
कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते !
उन्हें अभी बता देना ,यही गिला है "तनहा" को ,
हमें कभी सभी अपने अज़ाब क्यों नहीं देते !

Sunday, 12 August 2012

ग़ज़ल 1 3 5 ( हमको जीने की दुआ देने लगे )

हमको जीने की दुआ देने लगे ,
आप ये कैसी सज़ा देने लगे !
दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी ,
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे !
लोग आये थे बुझाने को मगर ,
आग को फिर हैं हवा देने लगे !
अब नहीं उनसे रहा कोई गिला ,
अब सितम उनके मज़ा देने लगे !
साथ रहते थे मगर देखा नहीं ,
दूर से अब हैं सदा देने लगे !
प्यार का कोई सबक आता नहीं ,
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे !
कल तलक मुझ से सभी अनजान थे ,
अब मुझे मेरा पता देने लगे !
मांगता था मौत "तनहा" रात दिन ,
जब लगा जीने , कज़ा देने लगे !

ग़ज़ल 1 3 1 ( ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते )

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ,
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते  !
ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन ,
लोग फिर भी बगावत नहीं करते !
इस कदर भा गया है कफस हमको ,
अब रिहाई की हसरत नहीं करते  !
हम भरोसा करें किस तरह उन पर ,
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते !
आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं ,
हम कभी ये शिकायत नहीं करते !
पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो ,
चाँद छूने की चाहत नहीं करते  !
तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है ,
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते !
पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा" ,
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते  !

ग़ज़ल 1 2 0 ( हल तलाशें सभी सवालों का )

हल तलाशें सभी सवालों का ,
है यही रास्ता उजालों का  !
तख़्त वाले ज़रा संभल जायें ,
काफिला चल पड़ा मशालों का !
फूल भेजे हैं खुद रकीबों को ,
दे दिया है जवाब चालों का !
प्यास बुझती नहीं कभी उनकी ,
दर्द समझो कभी तो प्यालों का !
ख्वाब हम देखते रहे शब भर ,
मखमली से किसी के बालों का !
बेच डालें न देश को इक दिन ,
कुछ भरोसा नहीं दलालों का !
राज़ दिल के सभी खुले "तनहा" ,
कुछ नहीं काम दिल पे तालों का !

ग़ज़ल 1 1 6 ( हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना )

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ,
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना !
मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे ,
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना  !
कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना ,
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना !
अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे ,
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना !
ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं ,
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना !
मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें ,
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना  !
हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा" ,
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना  !

ग़ज़ल 1 1 5 ( हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे )

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ,
कुछ नये  रास्ते खुद बनाते रहे !
आशियाँ इक बनाया था हमने कहीं ,
उम्र भर फिर उसे हम सजाते रहे !
हर ख़ुशी दूर हमसे रही भागती ,
हादसे साथ अपना निभाते रहे  !
तुम भी मदहोश थे हम भी मदहोश थे ,
दास्ताँ फिर किसे हम सुनाते रहे  !
ख्वाब देखे कई प्यार के रात भर ,
जब खुली आँख सब टूट जाते रहे  !
इक ग़ज़ल आपकी क्या असर कर गई ,
हम उसे रात दिन गुनगुनाते रहे !
जा रहे हैं मगर फिर मिलेंगे कभी ,
दीप आशा के "तनहा" जलाते रहे !     

ग़ज़ल 1 0 9 ( दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल )

दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल !
वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल   !
वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल !
आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल !
बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल !
जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम  नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल !

Friday, 10 August 2012

ग़ज़ल 9 8 ( सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे )

सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे ,
अब ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे !
जब तक पिलायेंगे सभी पीते ही रहेंगे ,
लिखने लगे जब हम मुहब्बत, जाम लिखेंगे !
पाई सज़ाएँ बेखता उनसे तो हमेशा ,
अब हम मगर उनके लिए इनाम लिखेंगे !
उसको लिखेंगे ख़त कभी दिल खोल के हम भी ,
हम हो गये तेरे लिये बदनाम लिखेंगे !
साकी से पूछो हम हुए मदहोश नहीं थे ,
भर- भर पिलाये हैं उसी ने जाम  लिखेंगे !
होगा सुनाने का नया अंदाज़ हमारा ,
कोई ग़ज़ल हम जब किसी के नाम लिखेंगे !
लिखने लगे जब सच तो लिखना छोड़ मत देना ,
"तनहा" लिखेंगे और सुबह शाम लिखेंगे !

ग़ज़ल 9 0 ( यही सोचकर आज घबरा गये हम )

यही सोचकर आज घबरा गये हम ,
चले थे कहाँ से कहाँ आ गये हम  !
तुम्हें क्या बतायें फ़साना हमारा ,
किसे छोड़ आये किसे पा गये हम !
जिया ज़िंदगी को बड़ी सादगी से ,
दिया जब किसी ने ज़हर खा गये हम !
खुदा जब मिलेगा कहेंगे उसे क्या ,
यही सोचकर आज शरमा गये हम  !
रहे भागते ज़िंदगी के ग़मों  से ,
मगर लौट कर रोज़ घर आ गये हम !
मुहब्बत रही दूर हमसे हमेशा ,
न पूछो ये हमसे किसे भा गये हम !
उसी आस्मां ने हमें आज छोड़ा ,
घटा बन जहाँ थे कभी छा गये हम !
रहेगी रुलाती यही बात "तनहा" ,
ख़ुशी का तराना कहाँ गा गये हम !  

ग़ज़ल 5 0 ( चंद धाराओं के इशारों पर , डूबी हैं कश्तियां किनारों पर )

चंद धाराओं के इशारों पर ,
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर !
अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते ,
जो न करते यकीं सहारों पर  !
खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग ,
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर !
डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर ,
अब भरोसा नहीं कहारों पर  !
वो अंधेरों ही में रहे हर दम,
जिन को उम्मीद थी सितारों पर  !
ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,
फूल रख आये हम मज़ारों पर !
उनकी महफ़िल से जो उठाये गये ,
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर !

ग़ज़ल 4 8 ( कोई हमराज़ अपना बना लीजिये )

कोई हमराज़ अपना बना लीजिये ,
एक अपनी ही दुनिया बसा लीजिये !
खुल के हंसिये तो ऐ हज़रते दिल ज़रा ,
दर्दो-ग़म अपने सारे  मिटा लीजिये  !
ज़िंदगी की अगर लय पे चलना है तो ,
साज़े दिल पर कोई धुन बजा लीजिये !
अपना दुश्मन समझते थे कल तक जिन्हें ,
आज उनको गले से लगा लीजिये  !
जो कहें आप बेख़ौफ़ हो कर कहें ,
कुछ तो अल्फाज़े-हिम्मत जुटा लीजिये !
ताज की बात तो बाद की बात है ,
खुद को शाहे जहां तो बना लीजिये  !
जो भी होना है अंजाम हो जाएगा ,
आप उल्फत का बीड़ा उठा लीजिये  ! 

ग़ज़ल 4 2 ( कैसे कैसे नसीब देखे हैं )

कैसे कैसे नसीब देखे हैं ,
पैसे वाले गरीब देखे हैं  !
हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर ,
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं  !
दोस्तों की न बात कुछ पूछो ,
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं  !
जिंदगी को तलाशने वाले ,
मौत ही के करीब देखे हैं  !
तोलते लोग जिनको दौलत से ,
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं  !
राह दुनिया को जो दिखाते हैं ,
हम ने विरले अदीब देखे हैं  !
खुद जलाते रहे जो घर तनहा ,
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं  !  

Thursday, 9 August 2012

ग़ज़ल 2 6 ( शिकवा तकदीर का करें कैसे )

शिकवा तकदीर का करें कैसे ,
हो खफा मौत तो मरें कैसे !
बागबां ही अगर उन्हें मसले ,
फूल फिर आरज़ू करें कैसे  !
ज़ख्म दे कर हमें वो भूल गये ,
ज़ख्म दिल के ये अब भरें कैसे  !
हमको खुद पर ही जब यकीन नहीं ,
फिर यकीं गैर का करें कैसे  !
हो के मजबूर ज़ुल्म सहते हैं ,
बेजुबां ज़िक्र भी करें कैसे ! 
भूल जायें तुम्हें कहो क्यों कर ,
खुद से खुद को जुदा करें कैसे  !
रहनुमा ही जो हमको भटकाए ,
सूए- मंजिल कदम धरें कैसे  ! 

ग़ज़ल 3 5 ( फैसले तब सही नहीं होते )

फैसले तब सही नहीं होते ,
बेखता जब बरी नहीं होते !
जो नज़र आते हैं सबूत हमें ,
दर हकीकत वही नहीं होते !
गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर ,
सबके उन जैसे ही नहीं होते  !
क्या किया और क्यों किया हमने ,
क्या गलत हम कभी नहीं होते !
हमको कोई नहीं है ग़म  इसका ,
कह के सच हम दुखी नहीं होते  !
जो न इंसाफ दे सकें हमको ,
पंच वो पंच ही नहीं होते  !
सोचना जब कभी लिखो तनहा ,
फैसले आखिरी नहीं होते  !

Wednesday, 8 August 2012

ग़ज़ल 1 1 ( इक आईना उनको भी हम दे आये )

इक आईना उनको भी हम दे आये,
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं !  
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग,
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं  !
सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही,
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं  !
देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह,
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं  !
कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर,
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं  !
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी,
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं  !

Monday, 6 August 2012

ग़ज़ल 7 9 ( ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया )

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ,
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया !
अब बहारो खिज़ा से क्या डरना ,
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया !
जब निभाना हुआ नामुमकिन तब ,
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया  !
हो गये हैं जो कब से बेगाने ,
उनको अपना बनाना छोड़ दिया !
कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये ,
हर किसी को बताना छोड़ दिया  !
उनको कोई ये जा के बतलाये ,
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया  !
मिल गया अब हमारे दिल को सुकून ,
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया !
ख्याल आया हमारे दिल में यही ,
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया !
हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर ,
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया  !

Sunday, 5 August 2012

माँ के आंसू ( कविता ) 1 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कौन समझेगा ,
तेरी उदासी
तेरा यहाँ ,
कोई नहीं ,
उलझनें हैं ,
साथ तेरे ,
कैसे उन्हें ,
सुलझा सकोगी !
ज़िंदगी दी ,
जिन्हें तूने ,
वो भी न ,
हो सके  तेरे ,
बेरहम दुनिया को ,
तुम कैसे  ,
अपना बना सकोगी ,
सीने में अपने ,
दर्द सभी ,
कब तलक ,
छिपा सकोगी ,
तुम्हें किस बात ने ,
रुलाया आज ,
मां ,
तुम कैसे ,
बता सकोगी !

खुशियों के मोती ( कविता ) 1 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हम करते रहते हैं ,
तलाश जीवन भर ,
खुशियों को ,
कभी कभी ,
पल भर को आती हैं ,
जीवन में ,
कुछ खुशियाँ ,
फिर खो जाती हैं ,
जाने कहाँ वो ,
रह नहीं पाती ,
सदा के लिए , 
किसी के पास भी ,
खुशियाँ।
करें किसी दिन ,
हम ऐसा ,  
 दें सहारा ,
किसी अजनबी को ,
बिना किसी स्वार्थ के करें ,
दूर किसी और की ,
कोई परेशानी ,
मिलेगी तब हमें ,
जीवन की ,
वास्तविक ख़ुशी ,
जो ख़त्म नहीं होगी ,
पल भर में। 
बहाए अपने दुःख दर्द में ,
उम्र भर आंसू ,
व्यर्थ गए ,
सूख गए पानी की तरह ,
कभी देखें बहा कर ,
आंसू औरों के दुःख में ,
 बन जाएंगे  सच्चे मोती ,
आंसू हमारे उस दिन।  

Friday, 3 August 2012

उस पार जाना ( कविता ) 1 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ले चल मुझे ,
उस पार ,
मेरे माझी !
पूछा नहीं ,
कभी भी मैंने ,
कहाँ है ,
मेरे सपनों का ,
जहाँ !
तलाश करने ,
अपनी दुनिया ,
जाना है ,
उस पार मुझे ,
मैं  नहीं डरता ,
भंवर से,
तूफ़ान से ,
दिया नहीं कभी ,
किसी ने मेरा साथ , 
मगर तुम माझी हो मेरे ,
लगा दो पार ,
नैया मेरी ,
या डुबो दो भंवर में ,
तोड़ो मत मेरा दिल ,
ये कह कर ,
कि उस पार कुछ नहीं है !
कह दो ,
मेरे माझी ,
झूठा है ये  बहाना ,
 मुझे अब भी ,
है उस पार जाना !!    

Wednesday, 1 August 2012

जाने कब मिलोगी तुम ( कविता ) 1 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

दूर बहुत दूर ,
आती है मुझे नज़र
हंसती मुस्कुराती हुई ,
छू लूँ उसे प्यार से ,
सोचता हूँ मैं ,
किसी दिन ले ले मुझे ,
अपनी बाहों में वो ,
कब से मैं उसकी तरफ ,
बढ़ाता रहा हूँ कदम ,
मगर लगता है जैसे ,
बढ़ता ही जा रहा है ,
फासला ,
हम दोनों के बीच !
एक तरफा ,
चाहत है शायद ,
उसने चाहा नहीं ,
मुझे कभी भी ,
मैंने उसे देखा है ,
प्यार से मिलते सभी से ,
रूठी हुई है क्यों मुझ से ही ,
लगाया नहीं ,
मुझे कभी गले ,
तड़प रहा हूँ ,
उसके लिए मैं ,
क्यों भाग रही है मुझसे ,
दूर और दूर ज़िंदगी !!

ग़ज़ल 8 8 ( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये  !
इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये !
वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये !
मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये !
दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये !
जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये !