Thursday, 30 August 2012

सिसकियां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      सिसकियां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वो सुनता है
हमेशा
सभी की फ़रियाद
नहीं लौटा कभी कोई
दर से उसके खाली हाथ।

शोर बहुत था
उसकी बंदगी करने वालों का वहां
तभी शायद 
सुन पाया नहीं
आज ख़ुदा भी वहां
मेरी सिसकियों की आवाज़।  

जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

जीने की तमन्ना न मरने का इरादा है
हाँ मुहब्बत में हद से गुज़रने का इरादा है।

अब कैसे बचेंगे उन्हें चाहने वाले सब
उनका आज सजने -संवरने का इरादा है।

लड़ना है दिलो जान से ठान लिया है अब
ज़ालिम के ज़ुल्म से न डरने का इरादा है।

लिखनी दास्तां है लहू से अपने कोई
कहने का नहीं अब तो करने का इरादा है।

बढ़ते ये कदम रोकने से न रुकेंगे अब
मंज़िल पे पहुंच के ठहरने का इरादा है।

हम ने थाम ली है ये पतवार तुफानों में
"तनहा" हौंसलों से उतरने का इरादा है। 

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे
रास्ता अंधे सब को दिखा रहे।

सुन रहे बहरे ध्यान से देख लो
गीत सारे गूंगे जब गा रहे।

सबको है उनपे ही एतबार भी
रात को दिन जो लोग बता रहे।

लोग भूखे हैं बेबस हैं मगर
दांव सत्ता वाले हैं चला रहे।

घर बनाने के वादे कर रहे
झोपड़ी उनकी भी हैं हटा रहे।

हक़ दिलाने की बात को भूलकर
लाठियां हम पर आज चला रहे।

बेवफाई की खुद जो मिसाल हैं
हम को हैं वो "तनहा" समझा रहे।  

Wednesday, 29 August 2012

दो दिल दो जिस्म इक जान ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 

       दो दिल दो जिस्म इक जान ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

       ये लेखक के जीवन का अनुभव होता है कि कभी आस पास के लोग उसकी कहानी के किरदार बन जाते हैं कभी कोई काल्पनिक किरदार वास्तविक ज़िंदगी में मिल जाता है। लेखक दो चाहने वालों की कहानी लिखते लिखते अपनी पिछली कहानी के किरदार की अधूरी चाहत को पूरी करने की अपनी इच्छा को भूला नहीं है। जाने क्यों उसको लगा कि काश उस कहानी का नायक नई इस कहानी की नायिका से मिल जाता और दोनों को अपनी अपनी तलाश हासिल हो जाती। इतनी दूर रहते अपनी अपनी बेड़ियों में जकड़े सामाजिक बंधन में अनचाही कैद में रहते कैसे मिलते भला। सोशल मीडिया पर उनकी दोस्ती करवाई यही सोचकर कि शायद जैसा लेखक सोचता है दोनों अच्छे दोस्त बनकर इक दूजे का दुःख दर्द परेशानी समझ थोड़ी ख़ुशी और राहत का अनुभव कर सकेंगे।
 
   बात शुरू हुई थी इक कहानी के दो लोगों से शायद नसीब को उस कहानी के बहाने सच्ची इक कहानी की शुरुआत करनी थी। सागर को वर्षा की मानसिक दशा अपने जैसी लगी थी जाने क्यों मन चाहा उसकी निराशा को भगाकर उसके आंचल को आशा के फूलों से भर दे। वर्षा के जीवन साथी का निधन हो चुका था और उसको कोई भी व्यक्ति साथ और मार्गदर्शन को मिला नहीं था जिस से मन की चिंता की बात कह सके। कुछ ही दिन में वर्षा को सागर में अपने सपनों का हमराही दिखाई देने लगा था। सागर को जीवन में कोई दोस्त नहीं मिला था मगर जाने क्यों वर्षा से बात करने के बाद महसूस हुआ यही मेरी ज़िंदगी की तलाश है। वर्षा को समझ आ गया था कि सागर को किसी अपने की चाहत है। दुनिया की नज़र में और सामाजिक बंधनों में बंधे दोनों किसी रिश्ते में नहीं बंध सकते थे ये बात जान कर भी दोनों अपने अपने दिल पर काबू नहीं रख पा रहे थे। कोई जैसे उनको इक दूसरे की तरफ खींच रहा था मगर मन में दुविधा थी कि दोनों नहीं समझ पा रहे थे दूसरे की भावना क्या है। कहीं वो मुझे गलत ही नहीं समझ ले और दोस्ती का भी रिश्ता टूट नहीं जाए। 

     इक दिन वर्षा ने सागर की निजी ज़िंदगी को लेकर पूछ ही लिया और जान लिया कि वास्तव में हम दोनों एक जैसे अकेले अकेले हैं कहने को बाक़ी सब हैं। सागर कोई बात कहने के बाद संकोच करते सवाल करता वर्षा आपको कोई बात अच्छी नहीं लगे तो कह देना मन में कोई नज़रज़गी मत रखना। वर्षा ने कहा आपको मुझसे कुछ भी कहने का अधिकार है और हम किसी छोटी सी बात से अपने साथ को कभी छोड़ नहीं सकते हैं। आज आपको बताती हूं मुझसे किसी ने पहले कोई दोस्ती वाला रिश्ता बनाना चाहा तो मैंने उसको हमेशा रोक दिया और साफ साफ कह दिया कि अकेली होने से हर किसी से दोस्ती नहीं करती महिला , जब वास्तव में कोई अच्छा लगता है तभी उस से खुलकर बात करती है औरत। आपको पसंद करती और भरोसा है तभी आप से दिल की बात कहना चाहती हूं। 

    समझ कर भी अभी सागर को झिझक थी क्योंकि उसके और वर्षा के सामाजिक स्टेटस में अंतर था। मगर जब वर्षा ने इशारे इशारे में जैसे भी चाहोगी मुझे मंज़ूर है बिना सागर वर्षा का कोई वजूद नहीं है। वर्षा किसी बदली की तरह बरस जाने को व्याकुल थी। चाहती थी सागर अपनी बाहें फैलाकर उसको अपने आप में शामिल कर ले और दो दिल दो जिस्म इक जान हो जाएं। 

                2 पन्ना -              दोस्ती से आगे इक दूजे का सदा सदा का साथ 

  सागर वर्षा नियमित बात करते रहे। कभी वर्षा कहती मिलने को मगर सागर संकोच वश और सामाजिक हालात को समझ उसको कहता कि शायद कभी मुमकिन हो मुझे भी लगता है लेकिन अभी नहीं मिलना हो सकता है। वर्षा चाहती थी रिश्ता आधा अधूरा नहीं हो अगर है तो पूरी तरह से हो। सागर वर्षा की मन की बात और जीवन साथी की ज़रूरत समझने लगा था और इक दिन उसने कहा क्या तुम मुझसे पति पत्नी की तरह संबंध बनाना चाहोगी , कुछ ही पल में वर्षा ने हां बोल कर कहा था मुझे ये पता था इक दिन आप खुद ये मुझे कहोगे मैं इंतज़ार कर रही थी। सागर ने कहा अच्छा होता ये पहले खुलकर खुद बोलती तो वर्षा ने कहा मुझे संकोच था कहीं आपको ये नहीं लगे कि मैं खराब महिला आपको अपने प्यार में फंसाना चाहती हूं मुझे ख़ुशी है खुद आपने मुझे अपनाया है दिल से और अब जन्म जन्म तक वर्षा सिर्फ और सिर्फ आपकी है हो गई है और रहेगी। 

       अगली सुबह वर्षा ने सागर से कहा था मुझे थोड़ा महसूस होता रहा रात भर कि क्या हमने कल जो सोचा चाहा और स्वीकार किया उस को उचित मानते हैं तब सागर ने कहा मन में कोई शंका नहीं रखो अब तुम अकेली हो अपने जीवन को जीने को हक है हमने कोई जिस्म का नहीं मन से आत्मा से अपने आप को इक दूजे को सौंपने की बात की है जो सच्चा प्यार है पहले भी लोग धर्म कथाओं में समाज में ऐसे रिश्ते बनाते रहे हैं। कोई संशय है तो तुम नहीं चाहती तो कोई बात नहीं। तब वर्षा ने कहा था ऐसा नहीं अब आपको अपना सब कुछ मान लिया है बस इक चाहत है भले किसी के सामने नहीं अकेले ही कभी आप मुझे अपनी बनाने की औपचारिक रीति को अवश्य पूरा करो। आपसे अपनी मांग भरवाने  की सिंदूर लगवाने की इच्छा है और आपको पसंद है बिंदी माथे पर लगाना तो जिस दिन कहोगे आपकी हर बात स्वीकार करना मेरा धर्म है। वर्षा ने अपने जन्म दिन पर अपने माथे पर बिंदी लगा ली थी और सागर ने भी उसकी इच्छा मांग भरने की जब भी संभव हुआ करने की बात कही थी। 

                                3  पन्ना -    इक दूजे के होने के बाद 

  दिल से आत्मा से चाहने के बाद भी फासले बहुत थे दूरी मन की नहीं मगर हालात की मज़बूरी थी। कभी मिलते मिलते रह गए कभी हौसला नहीं किया दुनिया से डर कर। आपस में रूठना मनाना कभी किसी बात पर खफ़ा होकर संपर्क नहीं रखना बीच बीच में हुआ मगर दोनों की चाहत बढ़ती गई कम हुई नहीं कभी। वर्षा को कभी निराशा होती तो कहती मुझे लगता है हम कभी मिल नहीं सकेंगे भरोसा डगमगाने लगता तब सागर उसको संभालता और भरोसा कायम रखने को मान जाती वर्षा ऐसे में कहती मुझे आप पर खुद से बढ़कर यकीन है। मुझे तो सब आपकी मर्ज़ी से करना है मेरे लिए आप मेरी नैया के खेवनहार हो मेरे स्वामी भगवान सभी बस आप को मानती हूं। सागर ये सुनकर और अधिक चाहता वर्षा को हर तरह से ख़ुशी देना। जब भी वर्षा का मन जो भी चाहता सागर वही खुद कहता और उसकी कामना को पूर्ण करता रहता। 
  
    आखिर उनकी मुलाकात पहली बार आमने सामने हो गई जब किसी शहर में दोनों ही को आना पड़ा और इक और ने उनकी भावनाओं को समझ मिलवाने का अवसर दिया। शायद जो भी संभव था दोनों ने इक दूजे को ख़ुशी देने को सब करने की कोशिश की और बहुत खूबसूरत पल ज़िंदगी के अनुभव किये मिलकर। फिर भी बार बार मिलने और खुलकर अकेले में साथ रहने की चाहत बाकी है जो कभी न कभी पूरी होगी अब सागर की बात का विश्वास वर्षा को पूर्णतया है। 
 

                        4  पन्ना -  चाहत खुल कर जीने की 

    वर्षा को लगता है लेखक  ने लिखी है कहानी मगर अभी उसकी मन भी भावना रह गई है। सागर ने कितनी बार पूछा मगर वर्षा किसी न किसी कारण खुलकर अपनी भावनाएं उजागर नहीं कर सकी। उसका मन अभी अपने सागर से मिलन और जीवन भर इक साथ खुल कर जीने को करता है। कभी सागर खुद को कैद में बंद पंछी समझता था मगर जब उसने खुद को आज़ाद कर लिया है तो वर्षा को अपनी जंज़ीरें तोड़ने की कोई तरकीब नहीं मिल रही है। सागर से मिलन को वर्षा को बरसना नदी बनकर बहना और मीलों की दूरी तय कर सागर की बाहों में समाना है। चाहकर भी वर्षा अपने सागर को अपने पास आने को नहीं कह सकती है। सागर विश्वास करता है कभी किसी दिन किसी तरह दोनों का ये फ़ासला ख़त्म होना ही है। चाहत दोनों को बराबर है बढ़ती जाती है पल पल हर दिन मुहब्बत में इंतज़ार के पल बड़े लंबे हुआ करते हैं। कहानी का अंजाम अभी कोई नहीं जानता है सागर वर्षा और कहानी का लेखक। मगर सागर को भरोसा है किसी दिन वर्षा और वह इक साथ अवश्य होंगे उनका मिलन जन्म जन्म के लिए होना ही है। वर्षा की भी यही कामना है मगर उसका मन विचलित हो जाता है उस से और इंतज़ार सहा जाता नहीं और वर्षा को नदिया बनकर बहुत दूरी तय करनी है अपने सागर की बाहों में जाकर समाने को बेताब है।

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ( ग़ज़ल ) 

                      डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का।

बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का।

नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का।

करेगा तिजारत की बात जब ज़माना
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का।

हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का।

वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का।

Monday, 27 August 2012

इस दरजा एतबार क्यों ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इस दरजा एतबार क्यों ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

इस दरजा एतबार क्यों
कहते हो बार बार क्यों।

कोई बताये किस तरह
ग़म का है इव्वास्तगार क्यों।

मुरझाये गुल कभी नहीं
उस को न इख्तियार क्यों।

जाने किसी के आने का
हम को है इंतज़ार क्यों।

पूछो न हमसे आज तुम
दिल का गया करार क्यों।

उनको सुना नई ग़ज़ल
"तनहा" है बेकरार क्यों।  

हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       हादिसों की अब तो आदत हो गई है ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हादिसों की अब तो आदत हो गई है
ग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है।

बस खबर ही आपकी पहचान है अब
आपकी कैसी ये शोहरत हो गई है।

किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है।

थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है।

भूल जाते हैं सभी कसमें वफ़ा की
बेवफाई अब तो आदत हो गई है।

लोग अपने आप से अनजान "तनहा"
आजकल कुछ ऐसी हालत हो गई है।

Sunday, 26 August 2012

शिकवा किस्मत का न करना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा किस्मत का न करना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा किस्मत का न करना
ग़म से घबरा कर न मरना।

माना ये दुनिया है ज़ालिम
तुम न इस दुनिया से डरना।

नफरतों की है ये दल दल
तुम इधर से मत गुज़रना।

अश्क पी लेना मगर तुम
प्यार को रुसवा न करना।

तुम न पहचानो जो खुद को
इस कदर भी मत संवरना।

हो सका न निबाह तुम से
तुम न इस सच से मुकरना।  


वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"


वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये। 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये। 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये। 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये। 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये। 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा 
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये।
 
महफ़िलें आप की , और "तनहा" हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये।

Saturday, 25 August 2012

कहां कुछ और मांगा है , यही इम्दाद कर दो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     कहां कुछ और मांगा है , यही इम्दाद कर दो ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कहां कुछ और मांगा है ,यही इम्दाद कर दो
मिटा दो हर निशां मेरा ,मुझे बर्बाद कर दो।

सुना है आपकी मांगी दुआ सुनता खुदा है
किसी दिन आप मेरे वास्ते फ़रियाद कर दो।

हुआ मुश्किल बड़ा जीना हमारा अब जहां में
हमें अब जिंदगी की कैद से आज़ाद कर दो।

ज़माना बन नहीं जाए कहीं दुश्मन तुम्हारा
मिलेगी हर ख़ुशी तुमको हमें नाशाद कर दो।

ये दुनिया लाख दुश्मन हो हमें कुछ ग़म नहीं है 
हमारा साथ तुम देना उसे नक्काद कर दो।

नहीं देते कसम लेकिन हमें तुमसे है कहना
मिलेंगे रोज़ हम दोनों यहां मीआद कर दो।

सभी अपने यहां पर हैं ,नहीं हैं गैर "तनहा"
कहो अपनी सुनो उनकी अभी इतिहाद कर दो।  

Monday, 20 August 2012

दो आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

  दो आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हर बार मुझे
मिलते हैं दो आंसू
छलकने देता नहीं
उन्हें पलकों से।

क्योंकि
वही हैं मेरी
उम्र भर की
वफाओं का सिला।

मेरे चाहने वालों ने
दिया है
यही ईनाम
बार बार मुझको।

मैं जानता हूं
मेरे जीवन का
मूल्य नहीं है
बढ़कर दो आंसुओं से।

और किसी दिन
मुझे मिल जायेगी
अपनी ज़िंदगी की कीमत।

जब इसी तरह कोई
पलकों पर संभाल कर 
रोक  लेगा अपने आंसुओं को
बहने नहीं देगा पलकों  से
दो आंसू। 

Sunday, 19 August 2012

वो दर्द कहानी बन गया ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

वो दर्द कहानी बन गया ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

वो दर्द कहानी बन गया
इक याद पुरानी बन गया।

पत्र जो वापस मिला मुझे
वो उसकी निशानी बन गया।

उसकी महफ़िल में जाना ही
मेरी नादानी बन गया।

लबों तक बात आ न सकी
पलकों का पानी बन गया।

उनका पूछना हाल मेरा
इक मेहरबानी बन गया।

Saturday, 18 August 2012

वो जहाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       वो जहां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम।

मैं रहूंगा हमेशा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       मैं रहूंगा हमेशा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जिवित रहूंगा मैं
अपने लेखन में
हमेशा।

मौत भी
नहीं मिटा सकेगी
दुनिया से
मेरा अस्तित्व।

जब भी चाहो
मिलना तुम मुझसे
और चाहो
मेरे करीब होने का
करना  एहसास तुम
पढ़ लेना
फिर से एक बार मुझे।

होगा हर बार
तुम्हें आभास
मेरे पास होने का
मरते नहीं हैं विचार कभी भी। 

Friday, 17 August 2012

कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जानता हूं मैं
चाहते हो पढ़ना
मेरे मन की
पुस्तक को
जब भी आते हो
मेरे पास तुम।

बैठ कर सामने मेरे
तकते रहते हो
चेहरा मेरा
कनखियों से
चुपचाप।

जान कर भी
बन जाता हूं अनजान मैं
क्योंकि समझता हूँ  मैं
जो चाहते हो पढ़ना तुम 
नहीं लिखा है
वो मेरे चेहरे पर।

तुम्हें क्या मालूम
क्यों खाली है अभी तक
किताब मेरे मन की।

मिटा दिया है किसी ने
जो भी लिखा था उस पर। 

Tuesday, 14 August 2012

देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे - डॉ लोक सेतिया

देश की राजनीति पर वक़्त के दोहे - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्न ए आज़ादी हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्ने आज़ादी हर साल मनाते रहे
शहीदों की हर कसम हम भुलाते रहे।

याद नहीं रहे भगत सिंह और गांधी 
फूल उनकी समाधी पे बस चढ़ाते रहे।

दम घुटने लगा पर न समझे यही 
काट कर पेड़ क्यों शहर बसाते रहे।

लिखा फाइलों में न दिखाई दिया
लोग भूखे हैं सब नेता झुठलाते रहे।

दाग़दार हैं इधर भी और उधर भी
आइनों पर सभी दोष लगाते रहे।

आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे हुआ
बाड़ बनकर रहे खेत भी खाते रहे।

यह न सोचा कभी आज़ादी किसलिए
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ भुलाते रहे।

मांगते सब रहे रोटी , रहने को घर
पांचतारा वो लोग होटल बनाते रहे।

खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन
वो सुनाते रहे लोग भी गाते रहे।

Monday, 6 August 2012

मुझे लिखना है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मुझे लिखना है  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहाँ।

बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में।

Sunday, 5 August 2012

माँ के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मां के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।

खुशियों के मोती ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 खुशियों के मोती  ( कविता )   डॉ लोक सेतिया

हम करते रहते हैं
तलाश जीवन भर
खुशियों को।

कभी कभी
पल भर को आती हैं
जीवन में।

कुछ खुशियाँ
फिर खो जाती हैं
जाने कहाँ वो।

रह नहीं पाती
सदा के लिए
किसी के पास भी
खुशियाँ।

करें किसी दिन
हम ऐसा   
दें सहारा
किसी अजनबी को
बिना किसी स्वार्थ के करें
दूर किसी और की
कोई परेशानी।

मिलेगी तब हमें
जीवन की
वास्तविक ख़ुशी
जो ख़त्म नहीं होगी
पल भर में। 

बहाए अपने दुःख दर्द में
उम्र भर आंसू
व्यर्थ गए
सूख गए पानी की तरह।

कभी देखें बहा कर
आंसू औरों के दुःख में
बन जाएंगे  सच्चे मोती
आंसू हमारे उस दिन।