Tuesday, 21 August 2012

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये सबने कहा अपना नहीं कोई
फिर भी कुछ दोस्त बनाये हमने।

फूल उनको समझ कर चले काँटों पर
ज़ख्म ऐसे भी कभी खाये हमने।

यूँ तो नग्में थे मुहब्बत के भी
ग़म के नग्मात ही गाये हमने।

रोये हैं वो हाल हमारा सुनकर
जिनसे दुःख दर्द छिपाये हमने।

ऐसा इक बार नहीं , हुआ सौ बार
खुद ही भेजे ख़त पाये हमने।

हम फिर भी रहे जहां में "तनहा"
मेले कई बार लगाये हमने।  

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