Monday, 13 August 2012

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें (ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें
बन गए सब मतलबी हम क्या करें।

प्यार से देखा हमें जब आपने
ले गई दिल सादगी हम क्या करें।

अब बताएं सब हुस्न वाले हमें
जब सताए आशिकी हम क्या करें।

एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें।

दिल हमारा लूट कर कल ले गईं
सब अदाएं आपकी हम क्या करें।

प्यार उनको जब रकीबों से हुआ
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें।

आज कितना दूर देखो हो गया
आदमी से आदमी हम क्या करें।

सब परेशां लग रहे इस शहर में
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें।

आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें। 

No comments: