अगस्त 19, 2012

POST : 52 याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

याद तुम्हें करता है कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

याद तुम्हें करता है कोई
जीते जी मरता है कोई ।

लफ्ज़े-मुहब्बत अपनी जुबां पर
लाने से डरता है कोई ।

दुनिया में इक वो ही हसीं है
इस का दम भरता है कोई ।

सूखे फूल चढ़ा कर कैसी
ये पूजा करता है कोई ।

खुद से तन्हाई में बातें
दीवाना करता है कोई ।

वादा करके भी वो न आया
यूँ भी ज़फा करता है कोई । 
 

 

POST : 51 लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

लब पे आई तो मुहब्बत आई
भूल कर भी न शिकायत आई ।

बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में
फिर हमें याद वो मूरत आई ।

हम से बिछड़ी जो अभी शाम ढले
रात भर याद वो सूरत आई ।

कश्ती लहरों के हवाले कर दी
बेबसी में जो ये नौबत आई ।

आसमां रंग बदल कर बोला
लो ज़मीं वालो कयामत आई ।
 
 
चाल कोई न कभी हम चलते 
काम लेकिन न शराफ़त आई । 
 
बन गए चोर सिपाही ' तनहा ' 
क्या ग़ज़ब की है सियासत आई ।
 
 

 

POST : 50 शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

शीशे सा नाज़ुक घर भी है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

शीशे सा नाज़ुक घर भी है
कुछ तूफानों का डर भी है ।

जीने की चाहत है लेकिन
पीना ग़म का सागर भी है ।

इंसानों की खबर न कोई
शहर का ऐसा मंज़र भी है ।

यूँ तो है खामोश किनारा
लहर गई टकरा कर भी है ।

ढूंढ के उसको लाओ कहीं से
खोया सहर में दिनकर भी है ।
 

 

POST : 49 तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

तमाम उम्र क्यों खड़े थे हम
यही सोच के चल पड़े थे हम ।

न पतवार थी न कोई माझी
हौसलों से हुए बड़े थे हम ।

वक़्त आया जो फैसले का
खुद अपने से भी लड़े थे हम ।

ज़माने की आग से पक गए
वरना कच्चे घड़े थे हम ।

झुक गए तेरी मुहब्बत में
तबीयत से सरचड़े थे हम ।

मोम की तरह पिघल गए
कभी फौलाद से कड़े थे हम ।

फरियाद कातिल से न करेंगे
इसी बात पे अड़े थे हम । 
 

 

POST : 48 जीवन राह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

जीवन राह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

खुद पे ही एतबार कर लो
ज़िंदगी का तुम दीदार कर लो ।

जो मंज़िल की चाह है तुम्हें
मुश्किलों से भी प्यार कर लो ।

बेहतर है ये किनारे बैठने से
डूब जाओ या कि पार कर लो ।

बदल सकते हो हवा का रुख
हौसला तुम एक बार कर लो ।

कौन अपना है कौन बेगाना
प्यार से मिले जो प्यार कर लो ।
  
 

 

POST : 47 पुष्प ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 पुष्प ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया    

पल दो पल में मुर्झाऊंगा
शाख से टूट के क्या पाऊंगा ।

आज सजा हूँ गुलदस्ते में
कल गलियों में बिखर जाऊंगा ।

उतरूंगा जो तेरे जूड़े से
बासी फूल ही कहलाऊंगा ।

गूंथा जाऊंगा जब माला में
ज़ख्म हज़ारों ही खाऊंगा ।

मेरे खिलने का मौसम है
लेकिन तोड़ लिया जाऊंगा ।

चुन के मुझे ले जायेगा माली
डाली को याद बहुत आऊंगा । 
 

 


POST : 46 वो जहाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       वो जहां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

देखी है हमने तो
बस एक ही दुनिया
हर कोई है स्वार्थी जहां 
नहीं है कोई भी
अपना किसी का ।

माँ-बाप भाई-बहन
दोस्त-रिश्तेदार
करते हैं प्रतिदिन
रिश्तों का बस व्यौपार ।

कुछ दे कर कुछ पाना भी है
है यही अब रिश्तों का आधार ।

तुम जाने किस जहां की
करते हो बातें
लगता है मुझे जैसे 
देखा है शायद 
तुमने कोई स्वप्न 
और खो गये हो तुम । 
 

 

अगस्त 18, 2012

POST : 45 मैं रहूंगा हमेशा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       मैं रहूंगा हमेशा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जिवित रहूंगा मैं
अपने लेखन में
हमेशा ।

मौत भी
नहीं मिटा सकेगी
दुनिया से
मेरा अस्तित्व ।

जब भी चाहो
मिलना तुम मुझसे
और चाहो
मेरे करीब होने का
करना  एहसास तुम
पढ़ लेना
फिर से एक बार मुझे ।

होगा हर बार
तुम्हें आभास
मेरे पास होने का
मरते नहीं हैं विचार कभी भी ।  
 

 

अगस्त 17, 2012

POST : 44 कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      कोरा कागज़ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जानता हूं मैं
चाहते हो पढ़ना
मेरे मन की
पुस्तक को
जब भी आते हो
मेरे पास तुम ।

बैठ कर सामने मेरे
तकते रहते हो
चेहरा मेरा
कनखियों से
चुपचाप ।

जान कर भी
बन जाता हूं अनजान मैं
क्योंकि समझता हूँ  मैं
जो चाहते हो पढ़ना तुम 
नहीं लिखा है
वो मेरे चेहरे पर ।

तुम्हें क्या मालूम
क्यों खाली है अभी तक
किताब मेरे मन की ।

मिटा दिया है किसी ने
जो भी लिखा था उस पर । 
 

 

अगस्त 15, 2012

POST : 43 बेचैनी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

  बेचैनी ( नज़्म )  डॉ  लोक सेतिया 

पढ़ कर रोज़ खबर कोई
मन फिर हो जाता है उदास ।

कब अन्याय का होगा अंत
न्याय की होगी पूरी आस ।

कब ये थमेंगी गर्म हवाएं
आएगा जाने कब मधुमास ।

कब होंगे सब लोग समान
आम हैं कुछ तो कुछ हैं खास ।

चुनकर ऊपर भेजा जिन्हें
फिर वो न आए हमारे पास ।

सरकारों को बदल देखा
हमको न कोई आई रास ।

जिसपर भी विश्वास किया
उसने ही तोड़ा है विश्वास ।

बन गए चोरों और ठगों के
सत्ता के गलियारे दास ।

कैसी आई ये आज़ादी
जनता काट रही बनवास ।  
 

 

POST : 42 देश के वर्तमान हालात पर वक़्त के दोहे - डॉ लोक सेतिया

देश के वर्तमान हालात पर वक़्त के दोहे - डॉ  लोक सेतिया 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख ।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर ।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग ।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल ।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार ।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग ।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार ।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान।  
 
अंधे - बहरे शहर में ये बातें बेमोल 
कौन सुनेगा अब यहां तनहा तेरे बोल ।  





अगस्त 14, 2012

POST : 41 जश्न आज़ादी का हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्न आज़ादी का हर साल मनाते रहे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जश्न आज़ादी का हर साल मनाते रहे
शहीदों की हर कसम हम भुलाते रहे ।
 
याद नहीं रहे भगत सिंह सुभाष गांधी 
फूल उनकी समाधी पे बस चढ़ाते रहे ।

दम घुटने लगा पर न समझे बात ये कि  
काट कर पेड़ क्यों सब शहर बसाते रहे ।

लिखा फाइलों में न दिखाई दिया कभी 
लोग भूखे हैं सब नेता सच झुठलाते रहे ।

दाग़दार हैं इधर भी और उधर भी मगर  
आईना देख कर चेहरे अपने छुपाते रहे ।

आज सोचें ज़रा क्योंकर ऐसे होने लगा 
बाड़ बनकर राजनेता देश को  खाते रहे ।

यह न सोचा कभी भी आज़ादी किसलिए
ले के अधिकार सब फ़र्ज़ अपने भुलाते रहे ।

मांगते सब रहे दो वक़्त रोटी छोटा सा घर
पांचतारा वो लोग कितने ही महल बनाते रहे ।

खूबसूरत जहाँ से है हमारा वतन , गीत को 
वो सुनाते रहे सभी लोग भी हैं दोहराते रहे ।
 
 

 
 

अगस्त 13, 2012

POST : 40 दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें (ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त भूले दोस्ती हम क्या करें
बन गए सब मतलबी हम क्या करें ।

प्यार से देखा हमें जब आपने
ले गई दिल सादगी हम क्या करें ।

अब बताएं सब हुस्न वाले हमें
जब सताए आशिकी हम क्या करें ।

एक दिन हम ढूंढ ही लेते खुदा
खो गई है ज़िंदगी हम क्या करें ।

दिल हमारा लूट कर कल ले गईं
सब अदाएं आपकी हम क्या करें ।

प्यार उनको जब रकीबों से हुआ
फिर हमारी बेबसी हम क्या करें ।

आज कितना दूर देखो हो गया
आदमी से आदमी हम क्या करें ।

सब परेशां लग रहे इस शहर में
हम यहाँ पर अजनबी हम क्या करें ।

आज "तनहा" मार डालेगी तुम्हें
अब किसी की बेरुखी हम क्या करें ।  
 

 

अगस्त 12, 2012

POST : 39 हमको जीने की दुआ देने लगे (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हमको जीने की दुआ देने लगे (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

हमको जीने की दुआ देने लगे
आप ये कैसी सज़ा देने लगे ।

दर्द दुनिया को दिखाये थे कभी
दर्द बढ़ने की दवा देने लगे ।

लोग आये थे बुझाने को मगर
आग को फिर हैं हवा देने लगे ।

अब नहीं उनसे रहा कोई गिला
अब सितम उनके मज़ा देने लगे ।

साथ रहते थे मगर देखा नहीं
दूर से अब हैं सदा देने लगे ।

प्यार का कोई सबक आता नहीं
बेवफा को हैं वफ़ा देने लगे ।

कल तलक मुझ से सभी अनजान थे
अब मुझे मेरा पता देने लगे ।

मांगता था मौत ' तनहा ' रात दिन
जब लगा जीने , कज़ा देने लगे । 
 

 

POST : 38 ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से इतनी मुहब्बत नहीं करते
खुद से ऐसे अदावत नहीं करते ।

ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन
लोग फिर भी बगावत नहीं करते ।

इस कदर भा गया है कफस हमको
अब रिहाई की हसरत नहीं करते ।

हम भरोसा करें किस तरह उन पर
जो किसी से भी उल्फत नहीं करते ।

आप हंस हंस के गैरों से मिलते हैं
हम कभी ये शिकायत नहीं करते ।

पांव जिनके  ज़मीं  पर हैं मत समझो
चाँद छूने की चाहत नहीं करते ।

तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है
हम तुम्हारी इबादत नहीं करते ।

पास कुछ भी नहीं अब बचा "तनहा"
लोग ऐसी वसीयत नहीं करते । 
 

 

POST : 37 हल तलाशें सभी सवालों का ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हल तलाशें सभी सवालों का ( ग़ज़ल ) डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

हल तलाशें सभी सवालों का
है यही रास्ता उजालों का ।

तख़्त वाले ज़रा संभल जायें
काफिला चल पड़ा मशालों का ।

फूल भेजे हैं खुद रकीबों को
दे दिया है जवाब चालों का ।

प्यास बुझती नहीं कभी उनकी
दर्द समझो कभी तो प्यालों का ।

ख्वाब हम देखते रहे शब भर
मखमली से किसी के बालों का ।

बेच डालें न देश को इक दिन
कुछ भरोसा नहीं दलालों का ।

राज़ दिल के सभी खुले "तनहा"
कुछ नहीं काम दिल पे तालों का । 
 

 

POST : 36 हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हर मोड़ पर लिखा था आगे नहीं है जाना
कोई कभी हिदायत ये आज तक न माना ।

मझधार से बचाकर अब ले चलो किनारे
पतवार छूटती है तुम नाखुदा बचाना ।

कब मांगते हैं चांदी कब मांगते हैं सोना
रहने को झोंपड़ी हो दो वक़्त का हो खाना ।

अब वो ग़ज़ल सुनाओ जो दर्द सब भुला दे
खुशियाँ कहाँ मिलेंगी ये राज़ अब बताना ।

ये ज़िन्दगी से पूछा हम जा कहाँ रहे हैं
किस दिन कहीं बनेगा अपना भी आशियाना ।

मुश्किल कभी लगें जब ये ज़िन्दगी की राहें
मंज़िल को याद रखना मत राह भूल जाना ।

हर कारवां से कोई ये कह रहा है "तनहा"
पीछे जो रह गए हैं उनको था साथ लाना । 
 

 

POST : 35 हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम पुरानी लकीरें मिटाते रहे
कुछ नये  रास्ते खुद बनाते रहे ।

आशियाँ इक बनाया था हमने कहीं
उम्र भर फिर उसे हम सजाते रहे ।

हर ख़ुशी दूर हमसे रही भागती
हादसे साथ अपना निभाते रहे ।

तुम भी मदहोश थे हम भी मदहोश थे
दास्ताँ फिर किसे हम सुनाते रहे ।

ख्वाब देखे कई प्यार के रात भर
जब खुली आँख सब टूट जाते रहे ।

इक ग़ज़ल आपकी क्या असर कर गई
हम उसे रात दिन गुनगुनाते रहे ।

जा रहे हैं मगर फिर मिलेंगे कभी
दीप आशा के "तनहा" जलाते रहे । 
 

     

POST : 34 दिल पे अपने लिखी दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     दिल पे अपने लिखी दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल ( ग़ज़ल ) 

                       डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दिल पे अपने लिख दी हमने तेरे नाम ग़ज़ल
जब नहीं आते हो आ जाती हर शाम ग़ज़ल ।

वो सुनाने का सलीका वो सुनने का शऊर
कुछ नहीं बाकी रहा बस तेरा नाम ग़ज़ल ।

वो ज़माना लोग वैसे आते नज़र नहीं
जब दिया करती थी हर दिन इक पैगाम ग़ज़ल ।

आंसुओं का एक दरिया आता नज़र मुझे
अब कहूँ कैसे इसे मैं बस इक आम ग़ज़ल ।

बात किसके दिल की , किसने किसके नाम कही
रह गयी बन कर जो अब बस इक गुमनाम ग़ज़ल ।

जामो - मीना से मुझे लेना कुछ काम  नहीं
आज मुझको तुम पिला दो बस इक जाम ग़ज़ल । 
 
इक यही हसरत है ' तनहा ' इस से इश्क़ किया 
है यही आग़ाज़ , अपना हो , अंजाम ग़ज़ल । 
 
 
 Gazal

अगस्त 11, 2012

POST ; 33 सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे ( ग़ज़ल ) 

                                 डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे
अब ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे ।

जब तक पिलायेंगे सभी पीते ही रहेंगे
लिखने लगे जब हम मुहब्बत, जाम लिखेंगे ।

पाई सज़ाएँ बेखता उनसे तो हमेशा
अब हम मगर उनके लिए ईनाम लिखेंगे ।

उसको लिखेंगे ख़त कभी दिल खोल के हम भी
हम हो गये तेरे लिये बदनाम लिखेंगे ।

साकी से पूछो हम हुए मदहोश नहीं थे
भर - भर पिलाये हैं उसी ने जाम  लिखेंगे ।

होगा सुनाने का नया अंदाज़ हमारा
कोई ग़ज़ल हम जब किसी के नाम लिखेंगे ।

लिखने लगे जब सच तो लिखना छोड़ मत देना
"तनहा" लिखेंगे , और सुबहो-शाम लिखेंगे । 
 

 

POST : 32 यही सोचकर आज घबरा गये हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यही सोचकर आज घबरा गये हम
चले थे कहाँ से कहाँ आ गये हम ।

तुम्हें क्या बतायें फ़साना हमारा
किसे छोड़ आये किसे पा गये हम ।

जिया ज़िंदगी को बड़ी सादगी से
दिया जब किसी ने ज़हर खा गये हम ।

खुदा जब मिलेगा कहेंगे उसे क्या
यही सोचकर आज शरमा गये हम ।

रहे भागते ज़िंदगी के ग़मों  से
मगर लौट कर रोज़ घर आ गये हम।

मुहब्बत रही दूर हमसे हमेशा
न पूछो ये हमसे किसे भा गये हम ।

उसी आस्मां ने हमें आज छोड़ा
घटा बन जहाँ थे कभी छा गये हम ।

रहेगी रुलाती यही बात "तनहा"
ख़ुशी का तराना कहाँ गा गये हम । 
 

  

अगस्त 10, 2012

POST : 31 चंद धाराओं के इशारों पर ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

चंद धाराओं के इशारों पर
डूबी हैं कश्तियाँ किनारों पर ।

अपनी मंज़िल पे हम पहुँच जाते
जो न करते यकीं सहारों पर ।

खा के ठोकर वो गिर गये हैं लोग
जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर ।

डोलियाँ राह में लूटीं अक्सर
अब भरोसा नहीं कहारों पर ।

वो अंधेरों ही में रहे हर दम
जिन को उम्मीद थी सितारों पर ।

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के
फूल रख आये हम मज़ारों पर ।

उनकी महफ़िल से जो उठाये गये
हंस लो तुम उन वफ़ा के मारों पर ।
 

 

POST : 30 कोई हमराज़ अपना बना लीजिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कोई हमराज़ अपना बना लीजिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

 
कोई हमराज़ अपना बना लीजिये
एक अपनी ही दुनिया बसा लीजिये ।

खुल के हंसिये तो ऐ हज़रते दिल ज़रा
दर्दो-ग़म अपने सारे  मिटा लीजिये ।

ज़िंदगी की अगर लय पे चलना है तो
साज़े दिल पर कोई धुन बजा लीजिये ।

अपना दुश्मन समझते थे कल तक जिन्हें
आज उनको गले से लगा लीजिये ।

जो कहें आप बेख़ौफ़ हो कर कहें
कुछ तो अल्फाज़े-हिम्मत जुटा लीजिये ।

ताज की बात तो बाद की बात है
खुद को शाहे जहां तो बना लीजिये ।

जो भी होना है अंजाम हो जाएगा
आप उल्फत का बीड़ा उठा लीजिये ।
 
 
 

 
 


 
 
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POST : 29 कैसे कैसे नसीब देखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं  ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कैसे कैसे नसीब देखे हैं
पैसे वाले गरीब देखे हैं ।

हैं फ़िदा खुद ही अपनी सूरत पर
हम ने चेहरे अजीब देखे हैं ।

दोस्तों की न बात कुछ पूछो
दोस्त अक्सर रकीब देखे हैं ।
 
ज़िंदगी  को तलाशने वाले
मौत ही के करीब देखे हैं ।

तोलते लोग जिनको दौलत से
ऐसे भी कम-नसीब देखे हैं ।

राह दुनिया को जो दिखाते हैं
हम ने विरले अदीब देखे हैं ।

खुद जलाते रहे जो घर "तनहा"
ऐसे कुछ बदनसीब देखे हैं ।   
 

 

POST : 28 शिकवा तकदीर का करें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

शिकवा तकदीर का करें कैसे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

शिकवा तकदीर का करें कैसे
हो खफा मौत तो मरें कैसे ।

बागबां ही अगर उन्हें मसले
फूल फिर आरज़ू करें कैसे ।

ज़ख्म दे कर हमें वो भूल गये
ज़ख्म दिल के ये अब भरें कैसे ।

हमको खुद पर ही जब यकीन नहीं
फिर यकीं गैर का करें कैसे ।

हो के मज़बूर  ज़ुल्म सहते हैं
बेजुबां ज़िक्र भी करें कैसे ।
 
भूल जायें तुम्हें कहो क्यों कर
खुद से खुद को जुदा करें कैसे ।

रहनुमा ही जो हमको भटकाए
सूए - मंजिल कदम धरें कैसे । 
 

 
 


 

अगस्त 09, 2012

POST : 27 फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

फैसले तब सही नहीं होते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

फैसले तब सही नहीं होते
बेखता जब बरी नहीं होते ।

जो नज़र आते हैं सबूत हमें
दर हकीकत वही नहीं होते ।

गुज़रे जिन मंज़रों से हम अक्सर
सबके उन जैसे ही नहीं होते ।

क्या किया और क्यों किया हमने
क्या गलत हम कभी नहीं होते ।

हमको कोई नहीं है ग़म  इसका
कह के सच हम दुखी नहीं होते ।

सोच लें , लिखने से ये पहले हम 

फैसले आखिरी नहीं होते ।

जो न इंसाफ दे सकें ' तनहा '
पंच वो , पंच ही नहीं होते ।
 
 
 
Prosecutors in a criminal justice system - iPleaders


 


 

अगस्त 08, 2012

POST : 26 इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा '

इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  'तनहा '

इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं ।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं ।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं ।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं ।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नज़ीर बनाते हैं ।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं । 
 

 

अगस्त 07, 2012

POST : 25 ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ग़म से दामन बचाना छोड़ दिया
हमने आंसू बहाना छोड़ दिया ।

अब बहारो खिज़ा से क्या डरना
हमने अब हर बहाना छोड़ दिया ।

जब निभाना हुआ नामुमकिन तब
रूठ जाना ,  मनाना छोड़ दिया ।

हो गये हैं जो कब से बेगाने
उनको अपना बनाना छोड़ दिया ।

कब कहाँ किसने कैसे ज़ख्म दिये
हर किसी को बताना छोड़ दिया ।

उनको कोई ये जा के बतलाये
हमने रोना रुलाना छोड़ दिया ।

मिल गया अब हमारे दिल को सुकून
जब से दिल को लगाना छोड़ दिया ।

ख्याल आया हमारे दिल में यही
हमने क्यों मुस्कुराना छोड़ दिया ।

हमने फुरकत में "तनहा" शामो-सहर
ग़म के नगमें सुनाना छोड़ दिया ।  
 

 

POST : 24 मुझे लिखना है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मुझे लिखना है  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कोई नहीं पास तो क्या
बाकी नहीं आस तो क्या ।

टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या ।

धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या ।

छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या ।

बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या ।

ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी का प्यार तो क्या ।

हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या ।

सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या ।

जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या ।

मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की  और विश्वास की ।

लिखनी है  कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की ।

अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहाँ ।

बस खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
खिलखिलाती मुस्कानें हों ।

फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।

वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में । 
 

 

अगस्त 05, 2012

POST : 23 माँ के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मां के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी ।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी ।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी । 
 

 

POST : 22 खुशियों के मोती ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 खुशियों के मोती  ( कविता )   डॉ लोक सेतिया

हम करते रहते हैं
तलाश जीवन भर
खुशियों को ।

कभी कभी
पल भर को आती हैं
जीवन में ।

कुछ खुशियाँ
फिर खो जाती हैं
जाने कहाँ वो ।

रह नहीं पाती
सदा के लिए
किसी के पास भी
खुशियाँ ।

करें किसी दिन
हम ऐसा   
दें सहारा
किसी अजनबी को
बिना किसी स्वार्थ के करें
दूर किसी और की
कोई परेशानी ।

मिलेगी तब हमें
जीवन की
वास्तविक ख़ुशी
जो ख़त्म नहीं होगी
पल भर में । 

बहाए अपने दुःख दर्द में
उम्र भर आंसू
व्यर्थ गए
सूख गए पानी की तरह ।

कभी देखें बहा कर
आंसू औरों के दुःख में
बन जाएंगे  सच्चे मोती
आंसू हमारे उस दिन । 
 

 

अगस्त 01, 2012

POST : 21 जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ( वसीयत-नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

     जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ( वसीयत - नज़्म ) 

                            डॉ लोक सेतिया

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये ।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये ।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये ।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे
मैं भी था कोई , न ये याद दिलाया जाये ।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये ।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये ।    
 
 

जुलाई 31, 2012

POST : 20 एक पत्नी ने बनवाया नया इक ताज ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 एक पत्नी ने बनवाया नया इक ताज  ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

बनवाया होगा
किसी बादशाह ने
अपनी मुमताज के नाम
कोई ताजमहल
मुझे नहीं है
उसे देखने की
कोई चाहत।

मगर चाहता हूँ
किसी दिन मैं
जा कर देख आऊं
उस
ह्युम्निटी हस्पताल को। 

जिसे बनवाया है
एक मज़दूर की पत्नी ने
पति की याद में
पति के बिना इलाज
मरने के बाद।

अपने बेटे को
अनाथालय में भेजकर
की तपस्या
अपने सपने को
पूरा करने की
डॉक्टर बनाया उसको
ऐसा अस्पताल
बनाने के लिए।
 
ताकि अब और
किसी गरीब को
पैसा पास न होने के कारण
कोई कर न सके
इलाज से इनकार। 
 

 

जुलाई 26, 2012

POST : 19 हमको ले डूबे ज़माने वाले ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 हमको ले डूबे ज़माने वाले ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको ले डूबे ज़माने वाले
नाखुदा खुद को बताने वाले ।
 
आज फिर ले के वो बारात चले 
अपनी दुल्हन को जलाने वाले ।

देश सेवा का लगाये तमगा
फिरते हैं देश को खाने वाले ।

ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम
हम न सर अपना झुकाने वाले ।

हो गये खुद ही फ़ना आख़िरकार 
मेरी हस्ती को मिटाने वाले । 
 
एक ही घूंट में मदहोश हुए 
होश काबू में बताने वाले । 
 
उनको फुटपाथ पे तो सोने दो
ये हैं महलों को बनाने वाले ।

काश हालात से होते आगाह 
जश्न-ए-आज़ादी मनाने वाले । 
 
तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं
मेरी अर्थी को उठाने वाले ।

तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं
मुझको हर बार हराने वाले ।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना
अपनी सूरत को छुपाने वाले ।

  आप मेरी ग़ज़ल को यूट्यूब पर भी देख और सुनकर लाइक और सब्सक्राइब कर सकते है मेरे चैनल अंदाज़-ए -ग़ज़ल पर। 


 

POST : 18 ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी आज कर गया कोई
ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई ।

तेज़ झोंकों में रेत के घर सा
ग़म का मारा बिखर गया कोई ।

न मिला कोई दर तो मज़बूरन
मौत के द्वार पर गया कोई ।

खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर
फिर से खुद ही संवर गया कोई ।

ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई ।

और गहराई शाम ए तन्हाई
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई ।

है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक"
जीते जी कब से मर गया कोई ।   
 

 

जुलाई 25, 2012

POST : 17 है अधूरी कहानी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      है अधूरी कहानी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

ज़िंदगी  नहीं है
कागज़ पे लिखी 
पर्दे पर दिखाई गई  
कोई पटकथा ।

जिसे ले जाता है
मनचाहे अंत तक
लिखने वाला लेखक  
भटकने नहीं देता
कहानी के पात्रों को ।

बचाये रखता है
अपने पात्रों के
वास्तविक चरित्र को
संबल बन कर ।

छोड़ दिया है शायद
अकेला और बेसहारा 
विधाता ने
जीवन में हर पात्र को ।

भटक जाती है ज़िंदगी 
धूप - छावं में
अनजान पथ पर चलते हुए
बार बार ।

जाने कब कहाँ कैसे
भटक जाते हैं सभी पात्र
सही मार्ग से जीवन में ।

सभी करते रह जाते हैं प्रयास 
कहानी को उचित परिणिति तक
ले जाने का
मगर आज तक
पहुंचा नहीं पाया कोई भी
पूर्णता तक उसको ।

रह गयी है अधूरी
सब के जीवन की
वास्तविक कहानी
त्रिशंकु बन कर रह गये  हैं
जीवन में तमाम लोग । 
 

 

जुलाई 24, 2012

POST : 16 रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफ़त है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफ़त है ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफत है 
ज़ुबां जब खोलता कोई उन्हें लगती बगावत है ।
 
नहीं देता ख़ुदा क्योंकर सभी को सब बराबर है
कभी खुद देखता आकर किसे कितनी ज़रूरत है ।
 
ख़ता उनकी नहीं कोई , हुई जिनको मुहब्बत है 
ज़माने से ज़रा पूछो  तुम्हें कैसी अदावत है ।
 
जमा जितना किया तुमने सभी कुछ छोड़ जाना है  
विरासत सौंप कर जाते लिखी तुमने वसीयत है ।

ज़माने ने मिटा डाला कभी का नाम तक उसका 
कभी दौलत के बदले में नहीं मिलती मुहब्बत है ।
 
बचेगा देश अब कैसे , किसे फुर्सत कभी समझे 
जिधर देखो यही लगता सियासत बस तिजारत है ।
 
अदाओं को हसीनों की समझ पाया नहीं कोई 
दिखा कर फिर छुपा लेना यही उनकी नज़ाकत है ।

हमारे मुल्क के सब देशवासी एक जैसे हैं 
तुम्हारी धर्म को लेकर बड़ी गंदी सियासत है ।
 
बनाते महल ' तनहा ' लोग खुद फुटपाथ पर रहते  
गरीबों की अमीरों पर हमेशा ही इनायत  है ।
 
 

 
 


 

जुलाई 23, 2012

POST : 15 नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई ( ग़ज़ल ) लोक सेतिया "तनहा"

    नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई ( ग़ज़ल ) 

                            लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई 
है अपनी जेब तक खाली कहीं पर घर नहीं कोई ।

चले थे सोच कर कोई हमें उसका पता देगा 
यहाँ पूछा वहां ढूँढा मिला दिलबर नहीं कोई ।

बताना हुस्न वालों को जिन्हें चाहत है सजने की
मुहब्बत से हसीं अब तक बना ज़ेवर नहीं कोई ।

ग़ज़ल की बात करते हैं ज़माने में कई लेकिन
हमें कहना सिखा देता मिला शायर नहीं कोई ।

हमें सब लोग कहते थे कभी हमको बुलाना तुम
ज़रूरत में पुकारा जब मिला आ कर नहीं कोई ।

कहीं मंदिर बना देखा कहीं मस्जिद बनी देखी
कहाँ इन्सान सब जाएँ कहीं पर दर नहीं कोई ।

वहां करवट बदलते रात भर महलों में कुछ "तनहा"
यहाँ कुछ लोग सोये हैं जहाँ बिस्तर नहीं कोई । 
 

 

जुलाई 22, 2012

POST : 14 नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

         नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मैंने देखे हैं
कितने ही
नाटक जीवन में
महान लेखकों की
कहानियों पर
महान कलाकारों के
अभिनय के ।

मगर नहीं देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक
जो खेला जाएगा
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने घर के आँगन में ।

देखना आप सब
उसे ध्यान से
मुझे जीने नहीं दिया जिन्होंने कभी
जो मारते  रहे हैं बार बार मुझे
और मांगते रहे मेरे लिये
मौत की हैं  दुआएं ।

कर रहे होंगे बहुत विलाप
नज़र आ रहे होंगे बेहद दुखी
वास्तव में मन ही मन
होंगे प्रसन्न ।

कमाल का अभिनय
आएगा  तुम्हें नज़र
बन जाएगा  मेरा घर
एक नाट्यशाला । 
 

 

जुलाई 21, 2012

POST : 13 मन की बात ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       मन की बात ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

देख कर किसी को
बढ़ गई दिल की धड़कन
समा गया कोई
मन की गहराईओं में
किसी की मधुर कल्पनाओं में
खोए  रहे रात दिन
जागते रहे किसी की यादों में
रात - रात भर करते रहे
सपनों में उनसे मुलाकातें ।

चाहा कि बना लें उन्हें
साथी उम्र भर के लिए
हर बार रह गया मगर
फासला कुछ क़दमों का
हमारे बीच ।

उनकी नज़रें
करती रहीं इंतज़ार 
खामोश सवाल के जवाब का
पर हम साहस न कर सके
प्यार का इज़हार करने का कभी ।

समझ नहीं सके वो भी
हमारी नज़रों की भाषा को
और लबों पे ला न पाए
दिल की बात कभी हम । 


                                                       

जुलाई 20, 2012

POST : 12 अलविदा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    अलविदा ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

तुम जा रहे हो आज
छुड़ा कर मुझसे हाथ
भुला कर उम्र भर
साथ देने का वादा
जब मिल गया है
तुम्हें किनारा ।

चलो अच्छा हुआ
मिल गया तुम्हें 
कोई तो ऐसा
जो कर सके
पूरे तुम्हारे सपने ।

चाहा तो मैंने भी
यही था सदा
मगर कर न पाया कभी
मुझे और क्या चाहिये
तुम्हारी ख़ुशी से  बढ़कर ।

मैं जूझता रहा
तेज़ हवओं से
लड़ता रहा तूफानों से
नहीं डरा कभी
किसी भी भंवर से ।

समझा था मैंने सदा तुम्हें
अपनी  मंज़िल भी
किनारा भी
मैं खड़ा हूं वहीं उसी  कश्ती पर
थामे पतवार बन के माझी ।

और देख रहा हूं  तुम्हें
आंसू लिये पलकों पर अपनी
कदम - कदम दूर जाते हुए
हाथ हिलाते हुए । 
 

 

जुलाई 18, 2012

POST : 11 उमंग यौवन की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   उमंग यौवन  की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

ये मस्ती
ये अल्हड़पन
ये झूम के चलना
ये हर पल गुनगुनाना
ये सतरंगी सपने बुनना
ये हवाओं संग उड़ना
ये भीनी भीनी खुशबु
ये बहारों का मौसम
ये सब है तुम्हारा आज
ओर है सारा जहाँ तुम्हारा ।
जी भर के जी लो
आज तुम इनको
कुछ ऐसे कि
याद रह जाए उम्र भर 
इनका मधुर एहसास ।

यौवन में
कदम रखता हुआ 
अठाहरवां साल है ये । 
 

 

जुलाई 15, 2012

POST : 10 कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये ।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये ।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको ।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने 
खुद अपनी ही कैद से । 
 

 

जुलाई 11, 2012

POST : 09 साया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   साया ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

पी लेता हूं 
यूं तो अक्सर
ज़िंदगी का
मैं ज़हर ।

जाने क्यों
फिर भी कभी
भर आती हैं आंखें 
और घुटने
लगता है दम ।

रोकने से
तब रुकते नहीं
आंखों से आंसू
तनहाई में अक्सर ।

मन करता है
जा कर पास तुम्हारे
चुप चाप बैठ कर
जी भर के रो लेने को ।

सोचता हूं 
मैं कभी कभी
अकेले में ये भी
जिसकी तलाश है मुझे 
तुम वही हो कि नहीं ।

भीगी पलकों के
हम दोनों के शायद
इस नाते को कभी
मैं नहीं कोई भी
नाम दे पाया ।

तुम्हें भी
याद आता है कभी
छत के कोने में देर रात तक
राह तकता हुआ
गुमसुम सा
खड़ा कोई साया । 
 

 

जुलाई 10, 2012

POST : 08 चुभन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

           चुभन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

धरती ने
अंकुरित किया
बड़े प्यार से उसे
किया प्रस्फुटित
अपना सीना चीर कर
बन गया धीरे धीरे
हरा भरा पौधा
उस नन्हें बीज से ।

फसल पकने पर
ले गया काट कर
बन कर स्वामी
डाला था जिसने बीज
धरती में
और धरती को मिलीं
मात्र कुछ जडें
चुभती हुई सी ।

अपनी कोख में
हर संतान को
पाला माँ ने 
मगर मिला उन्हें सदा
पिता का ही नाम
जो समझता रहा खुद को
परिवार का मुखिया
घर का मालिक ।

और हर माँ
सहती रही
कटी हुई जड़ों की
चुभन के  दर्द को
जीवन पर्यन्त । 



जुलाई 09, 2012

POST : 07 हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा (ग़ज़ल ) 

                       डॉ लोक सेतिया  "तनहा"

हमको तो कभी आपने काबिल नहीं समझा
दुःख दर्द भरी लहरों में साहिल नहीं समझा ।

दुनिया ने दिये  ज़ख्म हज़ार आपने लेकिन
घायल नहीं समझा हमें बिसमिल नहीं समझा ।

हम उसके मुकाबिल थे मगर जान के उसने
महफ़िल में हमें अपने मुकाबिल नहीं समझा ।

खेला तो खिलोनों की तरह उसको सभी ने
अफ़सोस किसी ने भी उसे दिल नहीं समझा ।

हमको है शिकायत कि हमें आँख में तुमने
काजल सा बसाने के भी काबिल नहीं समझा ।

घायल किया पायल ने तो झूमर ने किया क़त्ल
वो कौन है जिसने तुझे कातिल नहीं समझा ।

उठवा के रहे "लोक" को तुम दर से जो अपने
पागल उसे समझा किये साईल नहीं समझा ।    
 

 

POST : 06 नया दोस्त कोई बनाने चले हो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नया दोस्त कोई बनाने चले हो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नया दोस्त कोई बनाने चले हो
फिर इक ज़ख्म सीने पे खाने चले हो ।

न टकरा के टूटे कहीं शीशा ए दिल
ये पत्थर को क्यों तुम मनाने चले हो ।

उसी शाख पर जिसपे बिजली गिरी थी
नया आशियाँ क्यों बसाने चले हो ।

यकीं कर के मौजों पे अपना सफीना
कहाँ बीच मझधार लाने चले हो ।

छिपे हैं गुलों में हज़ारों ही कांटे
कि जिनसे घर अपना सजाने चले हो ।

सितमगर हैं नश्तर से वो काम लेंगे
जिन्हें दाग़े-दिल तुम दिखाने चले हो ।

ये हंसने हंसाने की तुम चाह लेकर
कहाँ आज आँसू बहाने चले हो । 
 

 

जुलाई 08, 2012

POST : 05 बिका ज़मीर कितने में , हिसाब क्यों नहीं देते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     बिका ज़मीर कितने में , हिसाब क्यों नहीं देते ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

बिका ज़मीर कितने में ,हिसाब क्यों नहीं देते
सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते ।


किसी ने घर जलाया था , उसी से जा के ये पूछा
जला के घर हमारा आप आब क्यों नहीं देते ।

 
सभी यहाँ बराबर हैं सभी से प्यार करना तुम
सबक लिखा हुआ जिसमें किताब क्यों नहीं देते ।

छुपा नहीं छुपाने से हुस्न कभी भी दुनिया से
हसीं सभी हटा अपना हिजाब क्यों नहीं देते ।

नहीं भुला सके हम खाव्ब जो कभी सजाये थे
हमें वही सुहाने फिर से ख्वाब क्यों नहीं देते ।

इश्क यहाँ सभी करते , नहीं बचा कभी कोई
न बच सका किसी का दिल जनाब क्यों नहीं देते ।

यही तो मांगते सब हैं हमें भी कुछ उजाला दो
नहीं कहा किसी ने आफताब क्यों नहीं देते ।

अभी तो प्यार का मौसम है और रुत सुहानी है
कभी किसी हसीना को गुलाब क्यों नहीं देते ।

उन्हें अभी बता देना यही गिला है "तनहा" को
हमें कभी सभी अपने अज़ाब क्यों नहीं देते । 
 

 

जुलाई 06, 2012

POST : 04 औरत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

           औरत    ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

तुमने देखा है
मेरी आँखों को
मेरे होटों को
मेरी जुल्फों को ,
नज़र आती है तुम्हें 
ख़ूबसूरती नज़ाकत और कशिश
मेरे जिस्म के अंग अंग में ।
 
तुमने देखा है 
केवल बदन मेरा 
प्यास बुझाने को 
अपनी हवस की ,
बाँट दिया है तुमने
टुकड़ों में मुझे
और उसे दे रहे हो 
अपनी चाहत का नाम ।

तुमने देखा ही नहीं 
कभी उस शख्स को 
एक इन्सान है जो
तुम्हारी ही तरह  ,
जीवन का हर इक 
एहसास लिये । 
 
 
जो नहीं है केवल एक जिस्म 
औरत है तो क्या ।