ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है
मौत लेकिन सफ़र सुहाना है ।
ज़िंदगी ख़्वाब इक अधूरा सा
नींद खुलते ही टूट जाना है ।
वक़्त को कौन रोक पाया है
जो नया आज कल पुराना है ।
थे जो अपने , हुए पराये हैं
याद करना नहीं , भुलाना है ।
हो गई इन्तिहा सितमगर अब
क्या सितम और तुमने ढाना है ।
आ सको आज तो चले आओ
कल किसी ने नहीं बुलाना है ।
चल दिए शहर छोड़ कर ' तनहा '
क्या , कहीं और भी ठिकाना है ।

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