अगस्त 19, 2026

POST : 2111 ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

       ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ज़िंदगी दर्द का ख़ज़ाना है 
मौत लेकिन सफ़र सुहाना है । 
 
ज़िंदगी ख़्वाब इक अधूरा सा 
नींद खुलते ही टूट जाना है ।   
 
वक़्त को कौन रोक पाया है 
जो नया आज कल पुराना है । 
 
थे जो अपने ,  हुए पराये हैं 
याद करना नहीं , भुलाना है ।
 
हो गई इन्तिहा सितमगर अब  
क्या सितम और तुमने ढाना है । 
 
आ सको आज तो चले आओ 
कल किसी ने नहीं बुलाना है । 
 
चल दिए शहर छोड़ कर ' तनहा '  
क्या , कहीं और भी ठिकाना है ।   
 

 

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