सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
सितम सरकार हम पर रोज़ ढा रहे हैं
कहानी ज़ालिमों की , दोहरा रहे हैं ।
है जिन के हाथ में , इंसाफ़ का तराज़ू
वही कानून के , पुर्ज़े उड़ा रहे हैं ।
बुरा था वक़्त जब तब दूर हो गए थे
नये हालात में , खुद पास आ रहे हैं ।
सुना तो रूह तक भी कांपने लगी है
न जाने , लोग कैसे गीत गा रहे हैं ।
उन्हीं के सामने क्यों हाथ जोड़ते हो
तुम्हारी बस्तियों को जो जला रहे हैं ।
न जाने क़त्ल किसका रोज़ हो रहा है
चली है , ख़ून की आंधी दिखा रहे हैं ।
सियासत देख उनकी कह रहे हैं ' तनहा '
इशारे आपके , सबको डरा रहे हैं ।

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