आदमी को आदमी नहीं रहने दिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
शिक्षित होना क्या ऐसा होता है हमारी देश की शिक्षा आदमी को अच्छा इंसान नहीं बनाती है ।आपको जितने भी पढ़े लिखे लोग दिखाई देंगे सभी हद से बढ़कर स्वार्थी अहंकारी और विवेकहीन लकीर के फ़क़ीर मिलेंगे । उनको पद प्रतिष्ठा पाकर भी संतोष नहीं मिलता है बल्कि उनको इक नया पागलपन शुरू होता है जितना मुमकिन हो अधिक से अधिक खुद की खातिर समेटने का । उनकी मानवीय संवेदना कुछ बनते ही ख़त्म हो जाती है और वो सभी औरों को बांटना नहीं चाहते अपना कर्तव्य पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से निभाना उनको कभी पढ़ाया सिखाया ही नहीं गया । शिक्षित होकर सरकारी नौकरी या अपने कारोबार में जगह मिलते ही उनको फ़र्ज़ निभाना देश समाज की सेवा कर समाज का कल्याण करना महत्वपूर्ण नहीं लगता है सही मार्ग पर चलकर नैतिकता और न्यायपूर्वक दायित्व निभाने की राह छोड़ , अन्य लोग जो वंचित हैं उनको उनके अधिकार और न्याय देने की बजाय वो सभी उनकी विवशता का फ़ायदा उठाकर ख़ुद को विशेष मानने लगते हैं । धन दौलत की बढ़ती हवस उनको इंसान से शैतान बना देती है और अपनी मर्ज़ी से नियम कानून को परिभाषित कर साधारण व्यक्ति को कुछ राहत देने की जगह नित नई परेशानियां देने लगते हैं । शासकीय अधिकार मिलते ही उनको देशवासी समान नज़र नहीं आते हैं । कुछ की खातिर नियम कानून लचीले बना देते हैं और उनके लिए सब आसान बनता जाता है जिनसे उनको बदले में कुछ पाना होता है जबकि तमाम बाकी सामान्य वर्ग उनको अपना रुतबा दिखलाने को सख़्त ही नहीं निरंकुश बन जाते हैं । उनकी छोटी छोटी समस्या का समाधान उनको करना अनावश्यक लगता है और उनको अकारण इधर उधर भटकाने को कितने बहाने तलाश करते हैं । धीरे धीरे देश के प्रशासन का अधिकांश वर्ग निर्दयी और अमानवीय आचरण करने लगा है और बिना रिश्वत या कोई सिफ़ारिश उचित कार्य करना ही नहीं चाहते हैं । अपनी अंतरात्मा अपने विवेक को ताक पर रख कर सरकारी बड़े से बड़े अधिकारी से लेकर निचले स्तर के कर्मचारी तक भ्र्ष्ट और कामचोर हो गए हैं ।
कहते हैं कि जिस से आपको रोटी रोज़ी मिलती है आपको उस मालिक के प्रति ईमानदार होना चाहिए अन्यथा आप इंसान नहीं हैं लेकिन ये शिक्षित लोग जिनसे वेतन सुविधाएं पाते हैं उसी जनता के लिए ईमानदार नहीं होते न ही ईश्वर के प्रति कृतज्ञ होते हैं । भगवान ने आपको अवसर दिया है आप जनता समाज देश की विषमताओं को विसंगतियों को मिटाकर शानदार बना सकते हैं लेकिन उन्होंने राजनेताओं और धनवान लोगों से अवैध संबंध बनाकर उल्टा कार्य किया है और लोगों को सरकारी कायदे कानून के जाल में फंसाकर अपना हित साधने का कार्य किया है । सामन्य आदमी को नियम कानून बताने वाले खुद कभी किसी नियम की परवाह नहीं करते हैं । हर बड़े अधिकारी के पास उचित वेतन सुविधाओं से हासिल धन दौलत से कई गुना अधिक पैसा जनता और सरकारी संसाधनों की लूट से एकत्र मिलता है । शायद ही पांच दस प्रतिशत लोग सही ढंग से अपनी आमदनी से जीवन व्यतीत करते हैं । जैसे कैसे उन सभी में इक अहंकार पैदा हो जाता है जो अपने और सरकारी विभाग से लेकर धनवान लोगों राजनेताओं के काले कारनामों और अनुचित आचरण को सही साबित करने को तर्क घड़ता है और जिनको न्याय इंसाफ चाहिए उनको प्रताड़ित करता है ।
हमने कैसी शिक्षा कैसी पढ़ाई की है जिस ने हम सभी को आदमी से शैतान बना दिया है क्या कभी चिंतन नहीं करते हैं कि हमारा मकसद क्या था और हम भटक कर क्या बन गए हैं । शायद पैसे ने हमको भगवान से भी डरने की आवश्यकता नहीं का सबक सिखाया हैं तभी सभी शासक वर्ग से लेकर धर्म उपदेशक से डॉक्टर शिक्षक तक धन दौलत के पुजारी बन गए हैं । विडंबना देखिए कि हम इस सब के बावजूद भी भारतीय पुरातन मूल्यों संस्कृति की बातें करते हैं अर्थात हम खुद अपने आप को धोखा देते हैं और समझते हैं किसी को कुछ खबर नहीं हम बड़े लोग कितने छोटे होते हैं , वास्तव में हमने अपने को इतना नीचे गहराई में डुबो दिया है कि भ्र्ष्टाचार और खुदगर्ज़ी के दलदल से उबरना असंभव लगता है या शायद हम खुश हैं अपने नैतिक पतन पर चंद सिक्कों में अपना ज़मीर बेच देते हैं । आखिर में इक कविता पेश है ।
बड़े लोग ( नज़्म )
बड़े लोग बड़े छोटे होते हैंकहते हैं कुछ
समझ आता है और
आ मत जाना
इनकी बातों में
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ।
इन्हें पहचान लो
ठीक से आज
कल तुम्हें ये
नहीं पहचानेंगे
किधर जाएं ये
खबर क्या है
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ।
दुश्मनी से
बुरी दोस्ती इनकी
आ गए हैं
तो खुदा खैर करे
ये वो हैं जो
क़त्ल करने के बाद
कब्र पे आ के रोते होते हैं ।
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