मिट्टी का घड़ा ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
हर तरफ छाया अंधेरा
और मैं तन्हा खड़ा हूं ।
कैद में तन्हाइयों की
क्या कहूं मैं क्यों पड़ा हूं ।
साथ देता कौन , मैंने
कब किसी को है पुकारा
यूं अकेले उम्र सारी
इस ज़माने से लड़ा हूं ।
है यही तकदीर पाई
रास्ते मेरे अलग हैं
दूरियां बढ़ती ही जाती
मैं अगर आगे बढ़ा हूं ।
मुझको मिट्टी ने बनाया
अधपका ही रह गया था
क्यों करूं अफ़सोस आख़िर
सिर्फ़ इक टूटा घड़ा हूं ।

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