अगस्त 12, 2026

POST : 2107 मिट्टी का घड़ा ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

               मिट्टी का घड़ा ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया  

हर तरफ छाया अंधेरा  
और मैं तन्हा खड़ा हूं । 
 
कैद में तन्हाइयों की 
क्या कहूं मैं क्यों पड़ा हूं । 
 
साथ देता कौन , मैंने 
कब किसी को है पुकारा 
 
यूं अकेले उम्र सारी 
इस ज़माने से लड़ा हूं । 
 
है यही तकदीर पाई 
रास्ते मेरे अलग हैं 
 
दूरियां बढ़ती ही जाती 
मैं अगर आगे बढ़ा हूं । 
 
मुझको मिट्टी ने बनाया 
अधपका ही रह गया था 
 
क्यों करूं अफ़सोस आख़िर 
सिर्फ़ इक टूटा घड़ा हूं ।  
 

 


 

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