सच का आईना दिखाऊंगा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
सच बोलने की सज़ा ये पाऊंगा
बेख़ता ही मार दिया मैं जाऊंगा ।
होगी न कभी खामोश मेरी ज़ुबान
होगा जब ज़ुल्म आवाज़ उठाऊंगा ।
कर रहे क़त्ल जम्हूरियत का सभी
ये हक़ीक़त लोगों को मैं बतलाऊंगा ।
नाम पर सच बिकता है झूठ यहां
तस्वीर इक रोज़ उसकी बनाऊंगा ।
चिराग़ कोई आप भी जलाते रहना
इक दिन मैं चला आखिर जाऊंगा ।
क़र्ज़ चुकाना सब शहीदों का बाकी है
शीश फूलों की जगह पर चढ़ाऊंगा ।
वतन की मिट्टी में मिलना है मुझे
बन के राख धरती पे बिखर जाऊंगा ।
जनता को मिल जाएंगे अधिकार जब
गीत वही तब मैं भी संग गुनगुनाउंगा ।
लोग गूंगे बहरे हैं नहीं सुनते यहां पर
मैं उन्हें सच का ये आईना दिखाऊंगा ।

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