भगवान पर संशय ख़त्म ( व्यंग्य - कथा ) डॉ लोक सेतिया
कथा की शुरुआत करने का वही पुराना ढंग है लेकिन भगवान से भक्तों तक कुछ भी पुराना नहीं है इस मंदिर में सभी नवीनतम है । किसी पत्थर से नहीं पीतल तांबे लोहे से नहीं शुद्ध सोने से बनाई गई है मूर्ति भगवान की । अब किसी को कोई संशय नहीं रहना चाहिए कि भगवान है या नहीं है और अगर है तो वो कैसा है । छुप छुप कर नहीं जैसा उसको पसंद है करना खुले आम सभी के सामने कर दिखलाता है , कोई माई का लाल उसको नहीं रोक पाता है उसका कहना है वही सभी का दाता है । लाखों करोड़ को वो हर महीने खैरात बंटवाता है , उसका अपना इक बही खाता है जो उसके सामने नतमस्तक होकर शीश झुकाता है मनचाहा वरदान पाकर जाता है । उसका कद सबसे बड़ा है इक अकेला वही शान से खड़ा है देवी देवताओं तक को चुनाव में पराजित कर उसने अपना परचम हर जगह लहराया है । जिस जिस ने उसको पूजा है माना है रिझाया है मनाया है उसका कल्याण हुआ है जिसने नहीं भरोसा किया बहुत पछताया है इस देश में उसकी माया है सूरज चांद हवा पानी जंगल सभी पर उसका इख़्तियार है कहीं अंधेरा कहीं उजाला धूप कहीं कहीं शीतल छाया है । बस अब अधिकांश उसकी महिमा की बात करते हैं वही सब करता है सभी उस से हमेशा डरते हैं जिस पर तिरछी निगाह उसने डाली है उसकी तिजोरी हुई ख़ाली है । खुद अपने गुलशन को जो उजाड़ता है सिर्फ़ वही गुलशन का माली है ग़ज़ब की उसकी रखवाली है कुछ बचा ही नहीं होगा तो कौन फिर कुछ बिगाड़ सकता है । जब से धरती पर उसका शासन आया है उसने जितना इतिहास लिखा था पहले उसको मिटाया है इक अलग नया इतिहास उसने बनाया है यारों संग सभी खाया और रोज़ नाचने नचाने का दरबार सजाया है कौन कौन उसकी खातिर नाचा है किस किस को अपने अंगने में नचाया है आठवां सुर उसी ने बनाया है । सोने चांदी के भगवान हर घड़ी हंसते हैं मिट्टी के हम इंसान पल पल रोते हैं जो समझदार हैं जाग जाते हैं मिलता है उनको हम सभी खोते हैं ।
आधुनिक भगवान ने सभी को समझाया है दुनिया की झूठी मोह माया ने सबको उलझाया है ख़ाली हाथ आदमी जाएगा ख़ाली हाथ आदमी आया है किसने लूटा किसने चुराया की बातों को छोड़ो ख़ामोश रहकर वक़्त गुज़ारो सबक पढ़ाया है सौ साल बाद आज़ादी के वाला सुहाना ख्वाब कोई दिखाया है । उस भगवान को खुद अपने लिए सभी कुछ चाहिए था जैसे भी मुमकिन हुआ सब कुछ हथियाया है आपको ठेंगा दिखलाने का समय तब आया है । उसकी कहानी काल्पनिक नहीं है सब सच है सामने है वन टू का फोर फोर टू का वन गीत उसको पसंद है यही भजन बजवाया है । यही होता है जिसने बनाया उसी का नाम मिटाते हैं तब इंसान से भगवान बनकर शोभा बढ़ाते हैं । अब कोई चेहरे पर रही नकाब नहीं है , वो कर्म उंगलियों पे गिनते हैं ज़ुल्म का जिस के कोई हिसाब नहीं है । आपके सामने हक़ीक़त है कोई भी सुनहरा ख़्वाब नहीं है , सही गलत का रखता वो हिसाब नहीं है सत्ता से बढ़कर कोई नशा नहीं कोई शासक पीता शराब नहीं खून इंसान का बहता है जिस नाम पर लिखी उस पर कोई किताब नहीं है । क्या भगवान से कम हैं आप नहीं आली जनाब नहीं ।
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