कैसे कैसे लोग मशहूर हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
ज़िंदगानी का कोई मकसद नहीं है , एक भी क़द आज आदमक़द नहीं है ।
पेड़ पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे , रास्तों में एक भी बरगद नहीं है ।
दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल है , जिस का भावार्थ है कि आज का समाज बेहद छोटी सोच वाला है , कोई विशाल क़िरदार नहीं दिखाई देता कहीं भी जो समाज को छांव देता हो अन्याय की धूप से बचाने का काम करता हो । आगे की बात करने से पहले दुष्यंत कुमार की पहली ग़ज़ल की बात दोहराना ज़रूरी है , यहां दरख़्तों के साये में धूप लगती है , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए । भावार्थ है कि जो जो संस्थान संविधान ने बनाये थे ताकि पीड़ित नागरिक को राहत देने को सहायक हों , उन्हीं से जब सामन्य नागरिक को पीड़ा दर्द और अन्याय मिलने लगे तब वहां से हमेशा को चले जाना चाहिए । पुलिस प्रशासन न्यायपालिका सभी जब सत्ताधारी राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर सरकार और धनवान वर्ग की मनमानी में साथ देने लग जाएं तब कोई जाये तो कहां जाये । अफ़सोस है आजकल यही हो रहा है शासक प्रशासन जनता को न्याय नहीं देते बल्कि ज़ुल्म करते हैं लूटते हैं और अपने विवेक से कर्तव्य नहीं निभाते अहंकारी बन कर अनुचित कार्य बिना संकोच करते हैं ।
लेकिन समाज में विडंबना दिखाई देती है जब हर तरफ ऐसे लोगों की चर्चा ही नहीं होती बल्कि मीडिया पर टीवी सोशल मीडिया पर उन लोगों से साक्षात्कार लेने उनकी राय पर सुर्खियां बनाने का कार्य होता है जिनकी शोहरत ही किसी बेकार घटिया काम घटना के कारण मिली होती है । हैरानी की नहीं चिंता की बात है कैसे कैसे लोगों को हमने अपना आदर्श बना लिया है जिनको मर्यादा तो क्या नैतिक मूल्यों भाषा तक की रत्ती भर परवाह नहीं होती है । माना अधिकांश लोग इधर कुछ भी तरीका अपनाकर सफ़लता हासिल कर धनवान बन जाते हैं लेकिन भारतीय सभ्यता कभी भी पैसे का पुजारी बनने को उचित नहीं मानती है । सत्यमेव जयते , हमारे लिए कोई महत्व नहीं रखता और हम झूठ की जय जयकार करने लगे हैं । संसद में तीन सौ सांसद आपराधिक मामलों में शामिल हैं और राज्यों में आधे राज्यों में खुद मुख्यमंत्री इसी कतार में आते हैं , विधानसभाओं में भी इसी अनुपात में अपराधी बैठे हुए हैं । ऐसे में संविधान की शपथ सभी से एक समान न्याय करने और पक्षपात नहीं करने किसी से अनुराग या द्वेष नहीं रखने पर अमल क्या उसे याद भी कोई नहीं रखता है । आज शहीद राजगुरु का जन्म दिन है तो विचार आया कि क्या आज कोई है जो वास्तव में देश समाज की आज़ादी की खतिर या गुलामी की बेड़ियां काटने को अपनी जान कुर्बान कर सकता हो । कुछ लोगों ने खुदगर्ज़ी की आखिरी सीमा पार कर दी है अपने अधिकारों और कायदे कानूनों का अनुचित उपयोग कर लोगों का शोषण करने और शासकों की तिजोरियां भरने का काम करते हैं । शहीदों की आत्माओं से परमात्मा तक से धोखा करते हैं साधरण आदमी की समस्याओं को और भी अधिक बढ़ाकर ।
बल्कि वास्तविकता विपरीत है हर कोई ऐसे शासकों से घबराता डरता है और अवसर मिले तो उसका चाटुकार बनकर अपने लिए अधिकार सुख सुविधाएं पाना चाहता है । देश में अब वास्तविक नायक नहीं मिलते हमने नकली खोखले व्यक्तत्व वाले लोगों को अपना नायक घोषित कर समाज को बर्बादी की तरफ भेजने का कार्य करने लगे हैं । रसातल की तरफ जाने को कहने लगे हैं नई ऊंचाइयां छू रहे हैं । सच कहना हो तो लगता है जैसे कुछ नहीं अधिकांश लोगों को विशेषकर ख़ास तबके को खुद गुलामी पसंद है , जैसे कोई खाने को हड्डी डालता है तो कुत्ते दुम हिलाते हैं तलवे चाटते हैं , उसी तरह खास वर्ग की हालत हो गई है , सब कुछ पास है पद पैसा लेकिन ज़मीर ज़िंदा नहीं है ।

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