बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का ( खोदा पहाड़ ) डॉ लोक सेतिया
काफ़ी दिनों से बताया जा रहा था इस बार कौन बनेगा करोड़पति में कुछ अलग होगा , इस बार सोचना पड़ेगा । कल रात इसी बात को जानने समझने को पहला एपीसोड देखा तो सोचने जैसा कुछ भी नहीं मिला , सच कहूं तो देखने सुनने जैसा कुछ लगा ही नहीं वही पुरानी शराब का नया लेबल । लेकिन आज समझना चाहा तो महसूस हुआ कि केबीसी को इस बार यही सोचना पड़ेगा की कब तक उन्हीं बातों में उलट फेर कर अदल बदल कर किस को बहलाना है शायद खुद आयोजक को ही नहीं बल्कि प्रयोजक तक को विचार करना पड़ेगा की कब तक उसको ज़िंदा रख सकते हैं किसी वेंटिलेटर जैसे उपकरण के सहारे । अब उसको जाने देना उचित होगा । शेर याद आया , शायर ख्वाजा हैदर अली आतिश जी का , बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का , जो चीरा तो इक कतरा - ए - खूं न निकला । कभी न कभी हर शय का अंतिम समय आता ही है लगता है अब उनको कुछ और नया सोचना चाहिए लेकिन ऐसा संभव तभी हो सकता है जब पिछले से बाहर निलक सकें , पुरानी चीज़ों से लगाव मोह आसानी से छूटता नहीं है । इस से पहले कि देखने वाले ऊब कर उठ कर जाने लगें तमाशा दिखलाने वाले को तमाशा बंद कर देना चाहिए ।
हालात बदल गए हैं लोग अब घिसी पिटी नकली बातों से बहलते नहीं हैं , समाज इन दिनों काफ़ी रंग बदल रहा है बल्कि बड़ी जल्दी जल्दी घटनाएं घट रही हैं । आपकी टीवी सिनेमा की उन्हीं झूठी बनावटी बातों का असर बाक़ी नहीं रहा है लोग मदहोशी से बाहर निलकने लगे हैं सब समझने लगे हैं । कल वही फ़िल्मी डायलॉग और आपस में एक दूसरे को खुश करने की कोशिश नहीं प्रभावी लगी नहीं देखने वालों को । ऐसे में आपको सोचना पड़ेगा कि कैसे अपनी झूठी नकली बनावटी दुनिया से निकल कर असली समाज की वास्तविकता को जानने समझने की कोशिश की जा सकती है । आज लगने लगा है कि जो दावा किया जाता रहा है किसी को सदी का महानायक किसी को मिस्टर परफैक्शनिस्ट किसी को ढाई किलो का हाथ इत्यादि सब की कलई खुलने लगी है । अभी तक आपने बहुत डींगें हांक ली लोगों को करोड़पति बनाने के सपने पूरे करने वाले अब आपको खुद अपनी छवि के बिखरने टूटने की आशंका दिखाई दे रही है । अठाहरवां संस्करण का शुरुआती एपीसोड देख कर लगता है जैसे उनको पोटली में कोई खेल खिलौना बचा नहीं है , अब वो बेचना है जिसका कोई आकार कोई वजूद कहीं नहीं है लेकिन फ़िल्मनगरी की आदत है ऐसा करने में उनको रत्ती भर संकोच नहीं होता है । भाग लेने वालों से दर्शकों तक को निराशा मिले तब भी उनको जितना पैसा चाहिए मिलना निर्धारित है कभी कभी सफल नहीं होना और भी फ़ायदेमंद साबित होता है ।
अजीब विडंबना है टीवी शो अभिनय मनोरंजन की दुनिया को वास्तविक देश समाज की घटनाओं से कोई मतलब नहीं है उनके घर आंगन में ढोल नगाड़े बजते हैं भले बाहर असली समाज की दुनिया में कितनी चीख पुकार हाहाकार मची हो । ये अपनी झूठी काल्पनिक दुनिया में नकली ख़ुशी मौज मस्ती में खोये हुए मदहोश हैं कोई दौलत शोहरत का नशा उन पर छाया हुआ है । इनका कोई भी सार्थक सृजन कभी होता ही नहीं जो देश समाज को कोई दिशा देने का कर्तव्य निभाये , ऐसा कोई फ़र्ज़ इनको याद ही नहीं है कला साहित्य संगीत का प्रयोजन जागरूकता फ़ैलाने का हुआ करता था कभी । ये खुद भटके हुए लोगों का इक ऐसा समूह है जिस का जनता देश समाज के कल्याण से कोई नाता नहीं है उनको सब आसानी से हासिल होता है साधारण आदमी की कठिनाई उनको विचलित नहीं करती बल्कि इक विषय प्रतीत होती है फ़िल्म टीवी शो सीरियल बनाकर पैसा बनाने का । आखिर में इक कविता इन सभी फ़िल्मी किरदार निभाने वाले नायक का अभिनय निभाने वाले अभिनेताओं को लेकर पढ़ते हैं ।
नेपथ्य ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
किसी लेखक नेभूख से तड़पते हुए
दरिद्रता भरे
जीवन पर लिखी थी
जो कहानी ।
तुम कर रहे हो
अभिनय
उस कहानी के
नायक की भूमिका का ।
जो दर्द भरे बोल
निकले थे
एक खाली पेट से
बोल रहे हो तुम
उन बोलों को
भरपेट मनपसंद भोजन खा कर ।
और चाहते हो
करना कल्पना उस नायक के ,
दर्द के एहसास की ।
चाहे कर लो
कितना भी जतन
ला नहीं पाओगे वो आंसू
जो स्वता ही निकल आते हैं ,
हर गरीब के बेबसी में ।
नहीं मिल सकते कहीं से
बिकते नहीं हैं
दुनिया के बाज़ार में ।
तुम बेच सकते हो बार बार
झूठे आंसू दिखावे के
है कमाल का अभिनय तुम्हारा
महान कलाकार हो तुम ।
आवाज़ तुम्हारी रुलाती है
भाती है दर्शकों को
मिल जायेंगी तुम्हें
तालियाँ दर्शकों की
और ढेर सारी दौलत भी ।
मगर
कहानी का लेखक
कहानी के नायक की तरह
जीता रहेगा गरीबी का
दुःख भरा जीवन हमेशा ।
उसकी कहानी से हो नहीं पायेगा
न्याय कभी भी ।
2 टिप्पणियां:
एक पूर्व सांसद को तो राष्ट्रपतियों के प्रश्न का भी उत्तर नही पता था...आमिर थोड़ा बहुत बता रहा था बाद में सब लाइफलाइन लाइफलाइन लेने लगे जैसे इस शो को 3 कलाकारों में आकर लाइफ लाइन दी हो...सब एक दूसरे की तारीफों में लगे हुए थे
बढ़िया आलेख सर....
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