जुलाई 24, 2012

POST : 16 रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफ़त है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

    रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफ़त है ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

रहें खामोश जब तक लब कहा जाता शराफत है 
ज़ुबां जब खोलता कोई उन्हें लगती बगावत है ।
 
नहीं देता ख़ुदा क्योंकर सभी को सब बराबर है
कभी खुद देखता आकर किसे कितनी ज़रूरत है ।
 
ख़ता उनकी नहीं कोई , हुई जिनको मुहब्बत है 
ज़माने से ज़रा पूछो  तुम्हें कैसी अदावत है ।
 
जमा जितना किया तुमने सभी कुछ छोड़ जाना है  
विरासत सौंप कर जाते लिखी तुमने वसीयत है ।

ज़माने ने मिटा डाला कभी का नाम तक उसका 
कभी दौलत के बदले में नहीं मिलती मुहब्बत है ।
 
बचेगा देश अब कैसे , किसे फुर्सत कभी समझे 
जिधर देखो यही लगता सियासत बस तिजारत है ।
 
अदाओं को हसीनों की समझ पाया नहीं कोई 
दिखा कर फिर छुपा लेना यही उनकी नज़ाकत है ।

हमारे मुल्क के सब देशवासी एक जैसे हैं 
तुम्हारी धर्म को लेकर बड़ी गंदी सियासत है ।
 
बनाते महल ' तनहा ' लोग खुद फुटपाथ पर रहते  
गरीबों की अमीरों पर हमेशा ही इनायत  है ।
 
 

 
 


 

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