दोस्त अब तक मिला नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
दोस्त कोई मिला नहीं
इस जहां से गिला नहीं ।
कौन शिकवा करे भला
जब रहा सिलसिला नहीं ।
चल रहे सब अलग अलग
एक भी काफ़िला नहीं ।
इस बरस की बहार में
फूल कोई ख़िला नहीं ।
हार सब आंधियां गईं
एक पत्ता हिला नहीं ।
उस शिखर का वजूद क्या
बच सकी जब शिला नहीं ।
देख लो अब करीब से
दिल है ' तनहा ' किला नहीं ।

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