अक्टूबर 31, 2012

POST : 208 तुम्हारी नज़रें ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   तुम्हारी नज़रें ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जानते नहीं
पहचानते नहीं
जुबां से कह न सके
तुमने माना भी नहीं ।

अजनबी बन गये हो तुम
मुझे भी मालूम न था
लेकिन
मेरे बचपन के दोस्त  
छिप सकी न ये बात
तुम्हारी उन नज़रों से
जो पहचानती थी मुझे ।
 
तुम अब तक
नहीं सिखा सके
उन्हें बदल जाना
तभी तो पड़ गया आज
तुम्हें
मुझसे नज़रें चुराना । 
 

  

POST : 207 क्या सच क्या झूठ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         क्या सच क्या झूठ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     प्रचार ज़रूरी है।  हर कोई प्रचार का भूखा है। क्या क्या नहीं करते लोग प्रचार पाने के लिए।  यहां तक कि कभी लोग ऐसा भी कह देते हैं कि बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ।  नेताओं को प्रचार की भूख पागलपन तक होती है।  सत्ता मिलते ही राज्य  भर में इनकी तस्वीरें सब जगह नज़र आने लगती हैं।  लगता है लोगों का मानना है कि बिना प्रचार कोई उन्हें याद नहीं रखेगा।  तभी सब नेता जनता का पैसा अपने  बाप दादा की समाधियां बनाने पर बर्बाद करते हैं जबकि जनता को उसकी ज़रूरत अपने जीने की ज़रूरतों के लिए होती है। नेताओं के लिए देश की जनता कभी महत्वपूर्ण रही नहीं है।  कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर भगवान के मंदिर सब कहीं न बने होते तो शायद लोग उसपर विश्वास ही न करते।

   एक लेखक का मानना है कि अगर रामायण राम के भक्त ने न लिखी होती और लिखने वाला रावण को नायक बना कर लिखता तो हम आज रावण को बुराई का प्रतीक न समझते।  रावण ने अपनी बहिन की नाक काटने वाले से बदला लिया था।  इस बारे क्या किसी ने विचार किया है कि अग्निपरीक्षा लेने के बाद भी राम ने अपनी पत्नी सीता को बिना कारण महलों से निष्कासित कर वन में भेज दिया , क्यों ?
कहीं ये राजा का न्याय न हो कर एक पुरुषवादी सोच तो नहीं थी।

    रामायण लिखने वाले ने इस पर क्यों कुछ नहीं लिखा कि जो धर्म पत्नी आपके साथ चौदह वर्ष बनवास में रहे ,आपको भी अवसर आने पर उसके साथ वन में जाना चाहिए था।  मगर कोई धर्म हमें सोचने सवाल करने की इजाज़त नहीं देता।  विशेष बात ये है कि जब भी जो किसी का प्रचार करता है , उसको महान बनाने को तब उसके विचारों और आदर्शों की नहीं नाम -छवि का ही प्रचार किया जाता है।  इसका ही अंजाम है कि हम प्रतिमाओं के सामने नतमस्तक होते हैं , आचरण को अपनाना कभी ज़रूरी नहीं समझते।  बड़े बड़े लोगों का प्रचार कितना सच्चा है और कितना झूठा कौन जाने । 
 

    

POST : 206 मतभेद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

    मतभेद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज स्पष्ट
हो गई तस्वीर
जब मेरे विचारों की
ताज़ी हवा से
छट गई सारी धुंध
मिट गई हर दुविधा
हो गया अंतर्द्वंद का अंत ।

जान लिया
कि जाते हैं बदल
सही और गलत के
सारे मापदंड अब दुनिया में ।

मगर मुझे चलना है
उसी राह पर
जिसे सही मानता हूं मैं
लोग चलते रहें
उन राहों पर
सही मानते हों वो जिन्हें ।

काश जान लें सभी
विचारों के मतभेद के
इस अर्थ को और हो जाए अंत
टकराव का दुनिया वालों का
हर किसी से ।

मतभेद
हो सकता है सभी का
औरों से ही नहीं
कभी कभी
खुद अपने आप से भी ।
 

 

अक्टूबर 30, 2012

POST : 205 आत्म मंथन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   आत्म मंथन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जाने कैसा था वो जहां
जाने कैसे थे वो लोग
बेगाने लगते थे अपने
अपनों में था बेगानापन ।

हर पल चाहत पाने की
कदम कदम खोने का डर
आकांक्षाओं आपेक्षाओं का
लगा रहता था हरदम मेला
लेकिन भीड़ में रह कर भी
हर कोई होता था अकेला ।

झूठ छल फरेब मुझको 
हर तरफ आता था नज़र
औरों से लगता था कभी
कभी खुद से लगता था डर ।

किसी मृगतृष्णा के पीछे
शायद सभी थे भाग रहे
भटकते रहते दिन भर को
रातों को सब थे जाग रहे ।
 
अब जब खुद को पाया है
चैन तब रूह को आया है
नहीं कोई भी मदहोशी है
छाई बस इक ख़ामोशी है ।

छोड़ उस झूठे जहां को
अब हूं अपने ही संग मैं
अब नहीं कर पाएगा कभी
मुझे मुझ से अलग कोई
सब कुछ मिल गया मुझे
पा लिया है खुद को आज ।
 

 

POST : 204 यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे
कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे ।

खुली इस तरह से वो जुल्फें किसी की
लगा छा गये आज बादल घनेरे ।

करें याद फिर से वो बातें पुरानी
बने जब हमारे सभी ख़्वाब तेरे ।

किया जुर्म हमने मुहब्बत का ऐसा
ज़माना खड़ा है हमें आज घेरे ।

बचाता हमें कौन लूटा सभी ने
बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे ।

कहीं भी नहीं है हमारा ठिकाना
सुबह शाम ढूंढे नये रोज़ डेरे ।

दिया साथ सबने ज़रा देर "तनहा"
कदम दो कदम सब चले साथ मेरे ।  
 

 

अक्टूबर 25, 2012

POST : 203 तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो
इक तुम्हीं मुझ को हासिल नहीं हो ।
 
जान कुर्बान की जिस ने तुम पर
कैसे तुम उसके कातिल नहीं हो ।
 
जो कहे आईना ,  मान लेंगे
तुम मुहब्बत के काबिल नहीं हो ।

जान पाओगे तुम खुद को क्योंकर
खुद ही अपने मुक़ाबिल नहीं हो ।

दिल पे गुज़रती है जो बेरुखी से
उस से तुम भी तो गाफ़िल नहीं हो ।
 
बेमुरव्वत हो ऊपर से लेकिन
सच कहो साहिबे-दिल नहीं हो ।

तुम ज़रा अपने दिल से ये पूछो
मेरी कश्ती के साहिल नहीं हो ।

देख कर तुमको ये सोचता हूं
क्या तुम्हीं मेरी मंज़िल नहीं हो । 
 

 

POST : 202 इश्क़ का हो इज़हार , बहुत मुश्किल है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 इश्क़ का हो इज़हार , बहुत मुश्किल है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

इश्क का हो इज़हार ,बहुत मुश्किल है
दुहरी इस की धार ,बहुत मुश्किल है ।

जीत न पाया दिल के खेल में कोई
जीत के भी है हार , बहुत मुश्किल है ।

हो न अगर दीदार तो घबराये दिल
होने पर दीदार बहुत मुश्किल है ।

इस को खेल न तुम बच्चों का जानो
दुनिया वालो प्यार बहुत मुश्किल है ।

इश्क का दुश्मन है ये ज़माना लेकिन
कोई नहीं है यार , बहुत मुश्किल है ।

तूने किसी का दिल तोड़ा है बेदर्दी
टुकड़े हुए हैं हज़ार , बहुत मुश्किल है ।

प्यार तो अफसाना है एक नज़र का
होता है एक ही बार , बहुत मुश्किल है ।

देर से आने की है उनकी आदत
हम हैं इधर बेज़ार , बहुत मुश्किल है ।

कहते हैं वो तुम बिन मर जाएंगे
जां देना , सरकार , बहुत मुश्किल है । 
 

 

अक्टूबर 24, 2012

POST : 201 क्यों परेशान हूँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 क्यों परेशान हूं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मन है उदास क्यों
जा रहा हूं  मैं किधर
ढूंढ रहा हूं किसको  
चाहिए क्या मुझे
कहां है मेरी मंज़िल 
कैसी हैं राहें मेरी
प्रश्न ही प्रश्न हर तरफ
आ रहे हैं मुझको नज़र
नहीं कहीं कोई भी जवाब ।

जीवन की सारी खुशियां
कहां मिलेंगी सबको
खिलते हैं फूल ऐसे कहां
जो मुरझाते नहीं फिर कभी
कहां हैं वो सब लोग
जो बांटते हों सिर्फ प्यार
कहीं तो होगा वो आंगन
जिसमें न हो कोई दीवार ।

कहां है दुनिया वो
जिसकी है मुझको तलाश
कोई तो मिलेगा मुझे कभी
और देगा उसका पता मुझे
एक प्रश्न चिन्ह बन गया
जीवन है मेरा
बता दो कोई तो मुझे
क्या है मेरा जवाब । 
 

 

POST : 200 नहीं आता हमें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

नहीं आता हमें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

लगाना दिल नहीं आता हमें
दुखाना दिल नहीं आता हमें ।

मिलाना हाथ आता है मगर
मिलाना दिल नहीं आता हमें ।

उन्हें आता नहीं हम पर यकीं
दिखाना दिल नहीं आता हमें ।

हमें सब को मनाना आ गया
मनाना दिल नहीं आता हमें ।

तुम्हारा दिल तुम्हारे पास है
चुराना दिल नहीं आता हमें ।

बहुत चाहा नहीं माना कभी
रिझाना दिल नहीं आता हमें ।

जिसे देना था "तनहा" दे दिया
बचाना दिल नहीं आता हमें । 
 

 

POST : 199 सपनों में जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सपनों में जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

देखता रहा
जीवन के सपने
जीने के लिये 
शीतल हवाओं के
सपने देखे
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के
सपने देखे
कांटों से छलनी था
जब बदन
मुस्कुराता रहा
सपनों में
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए
सपने देखे
जी भर खाने के
प्यार सम्मान के
सपने देखे
जब मिला
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में
जब नहीं रहा बाकी
झोपड़ी का भी निशां 
राम राज्य का देखा सपना
जब आये नज़र
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के
देखे प्यार इंसानियत
भाई चारे के ख़्वाब
लगा कर पंख उड़ा गगन में
जब नहीं चल पा रहा था
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में
देखे सदभाव समानता के सपने
आशा के सपने
संजोए निराशा में
अमृत समझ पीता रहा विष
मुझे है इंतज़ार बसंत का
समाप्त नहीं हो रहा
पतझड़ का मौसम।

मुझे समझाने लगे हैं सभी
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता
सब की तरह कर लूं स्वीकार
जो भी जैसा भी है ये समाज
कहते हैं सब लोग
नहीं बदलेगा कुछ भी
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास । 
 

 

अक्टूबर 23, 2012

POST : 198 अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वसूला गया होगा
गरीब जनता से कर
भरने को खजाना  उस बादशाह का
जिसने बेरहमी से किया होगा
खर्च जनता की अमानत को
बनवाने के लिये
अपनी प्रेमिका की याद में
ताजमहल उसके मरने के बाद ।

कितने ही मजदूरों
कारीगरों का बहा होगा पसीना
घायल हुए होंगे उनके हाथ
तराशते हुए पत्थर
नहीं लिखा हुआ
उनका नाम कहीं पर ।

क्यों करे कोई याद
उन गरीबों को
बदनसीबों को
देखते हुए ताज
यही सोच रहा हूं मैं आज ।

कुछ और सोचते होगे तुम
मेरे करीब खड़े होकर
जानता हूं वो भी मैं
साथी मेरे
रश्क हो रहा है मुमताज से तुम्हें
नाज़ है
इक शहंशाह के ऐसे प्यार पर तुमको ।

खुबसूरत लग रहा है नज़ारा तुम्हें
भर लेना चाहते हो उसे आंखों में
यादों में बसाने के लिये 
अपने प्यार के लिये
मांगने को दुआएं
उठा रखे हैं दोनों हाथ तुमने
कर रहे हो वादा
फिर एक बार
किसी को लेकर साथ आने का ।

अब तलक चला आ रहा है चलन वही
शासकों का उनके बाद
उनके नाम स्मारक बनवाने का ,
जनता के धन से सरकारी ज़मीन पर
बनाई जाती हैं
सत्ताधारी नेताओं के पूर्वजों की समाधियां ।

नियम कायदा कानून
सब है इनके लिये 
आम जनता के लिये 
नहीं बनता कभी ऐसा आशियाना
जिन्दा लोग
नहीं प्राथमिकता सरकार के लिये
मोहरे हैं हम सब
उनकी जीत हार के लिये ।

लोकतंत्र में पीछे रह गये सब लोग
देश पर बोझ बन गये 
ये सब के सब राजनेता लोग
जब इस बार चढ़ाना
किसी समाधि पर फूल
सोचना रुक कर वहां एक बार
क्या थी उनकी विचारधारा
क्या है हमको वो स्वीकार ।

जो कहलाते जनता के हितचिन्तक
उनके नाम बनाई जाएं समाधियां
और जनता रहे बेघर-बार
करना ही होगा कभी तो विचार । 
 

 

अक्टूबर 22, 2012

POST : 197 बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

बस यही कारोबार करते हैं
हमसे इतना वो प्यार करते हैं ।

कर न पाया जो कोई दुश्मन भी
वो सितम हम पे यार करते हैं ।

नज़र आते हैं और भी नादां
वो कुछ इस तरह वार करते हैं ।

खुद ही कातिल को हम बुला आये 
यही हम बार बार करते हैं ।

इस ज़माने में कौन है अपना
बस यूं ही इंतज़ार करते हैं ।

 


 
 

POST : 196 ज़ुल्म भी हंस के वो तो सहते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

ज़ुल्म भी हंस के वो तो सहते हैं ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

ज़ुल्म भी हंस के वो तो सहते हैं 
लोग  कैसे जहां में रहते हैं ।

कत्ल करते हैं वो जिसे चाहा
इसको जम्हूरियत वो कहते हैं ।

ख़्वाब यूं टूटते हैं जनता के 
रेत के ज्यों घरोंदे ढहते हैं ।

वो मगरमच्छ हैं , कि हैं नेता 
अश्क़ जिनके जो बस यूं बहते हैं । 

' लोक ' अब तो यही सियासत है
 दुश्मनों को जो दोस्त कहते हैं ।  
 


 

 

POST : 195 गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले
ले ,छोड़ गए तुझको भी ज़माने वाले ।

मुझको भी आया अब तो आंसू पीना
तेरा अहसां है मुझको रुलाने वाले ।

होने वाले वो कब हैं किसी के यारो
बाज़ार मुहब्बत का ये सजाने वाले ।

हो कर बेज़ार ये आखिर क्यों रोते हैं
खुद कर के सितम यूं हमको सताने वाले ।

यूं तो रह जाते न हम सब "तनहा"
जो न रूठे होते वो हमको मनाने वाले । 
 

 

POST : 194 उम्र कैद ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

उम्र कैद ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं ही नहीं होती
उम्रकैद की किसी को सज़ा ।

साबित करना होता है
उसका बड़ा कोई गुनाह ।

साबित नहीं हो पाते सभी के किए अपराध
मिलते हैं बचाव के अवसर बार बार
रख सकते हैं अपराधी अपना वकील
जो देता है बचाव में नई नई फिर दलील ।

अदालत का रहता  वही उसूल हर बार
बेगुनाह को न हो सज़ा बच जाये भले गुनहगार
आम अपराध की सज़ा मिलती कुछ साल
चलता कानून भी  धीमी धीमी है चाल ।

हर सुविधा मिलती जेल में चुका कर मोल
देख चुपचाप कुछ न अदालत कभी भी बोल
ध्यान रखती कैदियों का खुद हर सरकार
करती है अपराधियों के लिए कई जेल सुधार ।

उम्र कैद मिलती सबको बिना अपराध मगर 
विवाह रचाने धर्मपत्नी खुद घर ले आने पर 
हथकड़ी नहीं इजाज़त कैदी को आने जाने पर 
जेलर की अनुमति से नियम कायदे समझ कर  
खुद लौट आता मुजरिम उसी सही ठिकाने पर ।

उसे उम्र भर काटनी होती है हर दिन ही सज़ा
जेलर को लाया था जो घर बुला आया मज़ा 
सज़ा उसकी न हो सकती कभी भी है माफ़
कोई सुनता नहीं फिर उसकी कोई फ़रियाद ।

गंभीर है जुर्म शादी रचाने का
विवाह संगठित श्रेणी का
माना जाता इक अपराध ।

साथ छोड़ जाते हैं उसके  पुराने साथी
गये थे कभी जो बन कर उसके बाराती
भोगता सज़ा बस अकेला बना जो दूल्हा
जलता है ऐसे सुबह शाम घर का चूल्हा ।
 
है राज़ मगर जानते सभी हैं पुरुष फिर भी 
कोई भी किसी को समझाता न कभी पहेली   
दोनों का है उम्र भर का कैदी जेलर सा नाता
इक देता है सज़ा दूजा खुश से रिश्ता निभाता ।  
 
 जन्म Quotes in Hindi, Gujarati, Marathi and English | Matrubharti

अक्टूबर 21, 2012

POST : 193 भाग्य लिखने वाले ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      भाग्य लिखने वाले ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

विधाता हो तुम
लिखते हो
सभी का भाग्य 
जानता नहीं कोई
क्या लिख दिया तुमने
किसलिए
किस के भाग्य में।

सब को होगी तमन्ना
अपना भाग्य जानने की
मुझे नहीं जानना
क्या क्यों लिखा तुमने 
मेरे नसीब में
लेकिन
कहना है तुमसे यही।

भूल गये लिखना
वही शब्द क्यों 
करना था प्रारम्भ जिस से
लिखना नसीबा मेरा।

तुम चाहे जो भी
लिखो किसी के भाग्य में 
याद रखना
हमेशा ही एक शब्द लिखना 
प्यार मुहब्बत स्नेह  प्रेम।

मर्ज़ी है तुम्हारी दे दो चाहे 
जीवन की सारी खुशियां
या उम्र  भर केवल तड़पना
मगर लिख देना सभी के भाग्य में 
अवश्य यही एक शब्द
प्यार प्यार सिर्फ प्यार। 

अक्टूबर 20, 2012

POST : 192 हाँ किया प्यार मैंने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      हां किया प्यार मैंने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

किया तो होगा
तुमने भी कभी न कभी
किसी न किसी से प्यार ।

धड़कता होगा
तुम्हारा दिल भी
देख कर किसी को ।

मुमकिन है
कर दिया हो तुमने
इज़हार मोहब्बत का
अथवा हो सकता है
रख ली हो
दिल की बात दिल में
समाज के डर से
या इनकार के  डर से ।

मगर मैं जानती हूं 
ऐसा हुआ होगा
ज़रूर जीवन में एक बार
स्वाभाविक है ये 
सभी को हो ही जाता है
एहसास प्यार का ।

आज जब मैंने कर लिया
प्यार का एहसास
और कर दिया परिणय निवेदन
करना चाहा स्वयं को समर्पित ।

उसे जिसे चाहा मेरे मन ने
तो क्यों मान लिया गया
एक अपराध उसे ।

क्यों दे दिया गया
मेरे प्यार  की
पावन  भावना को
चरित्र हीनता का नाम ।

क्या इसलिये
कि देना नहीं चाहता
पुरुष समाज नारी को कभी भी
अधिकार चुनने का ।

पहल करने का अधिकार नहीं है
औरत को
हर पुरुष चाहता है
नारी से मूक स्वीकृति
अथवा अधिक से अधिक
इनकार वह भी शायद
क्षमा याचना के साथ ।

अक्टूबर 19, 2012

POST : 191 बंधन मुक्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      बंधन मुक्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

खोने के लिए जब 
कुछ नहीं बचा
सता रहा है फिर डर
किस बात का।

रही नहीं जब तमन्ना 
कुछ भी पाने की
होना है जब मुक्त
सभी बंधनों से
घबराता है फिर क्यों मन।

अपने ही बुने
सारे बंधनों को छोड़ 
जीवन के अंतिम छोर पर
करना है जतन बचे हुए पल 
इस तरह से जीने का
मिल पाए जिसमें मुझे भी आनंद
खुली हवा में सांस लेने का।   

अक्टूबर 18, 2012

POST : 190 आस्था ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     आस्था ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

सुलझे न जब मुझसे
कोई उलझन
निराशा से भर जाये
जब कभी जीवन
नहीं रहता
खुद पर है जब विश्वास
मन में जगा लेता
इक तेरी ही आस।

नहीं बस में कुछ भी मेरे
सोचता  हूं है सब हाथ में तेरे
ये मानता हूं और इस भरोसे
बेफिक्र हो जाता हूं
मुश्किलों से अपनी
न घबराता हूं।

लेकिन कभी मन में
करता हूं विचार
कितना सही है
आस्तिक होने  का आधार
शायद है कुछ अधूरी
तुझ पे मेरी आस्था
फिर भी दिखा देती है
अंधेरे में कोई रास्ता।

अक्टूबर 17, 2012

POST : 189 दुर्घटना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       दुर्घटना  (  कविता  ) डॉ लोक सेतिया

जब घटी थी
दुर्घटना मेरे साथ
दोनों ही खड़ी थी
तब मेरे ही पास।

उन्हें इतना करीब से
देखा था मैंने पहली बार
डरा नहीं था नियति को
कर लिया था स्वीकार।

मगर तभी ख़ामोशी से
प्यार और अपनेपन से
अपनी आगोश में
भर लिया था
मुझे ज़िंदगी ने।

मुझे कहना चाहती हो जैसे
तुम्हें बहुत चाहती हूं  मैं।

और लौट गई थी मौत
चुप चाप हार कर ज़िंदगी से
तब मुझे हुआ था एहसास
कितना कम है फासला
मौत और ज़िंदगी के बीच। 

POST : 188 दुनिया बदल रहा हूं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

दुनिया बदल रहा हूं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

दुनिया बदल रहा हूं
खुद को ही छल रहा हूं ।

डरने लगा हूं इतना
छुप कर के चल रहा हूं ।

चलती हवा भी ठण्डी
फिर भी मैं जल रहा हूं ।

क्यों आज ढूंढते हो
गुज़रा मैं कल रहा हूं ।

अब थाम लो मुझे तुम
कब से फिसल रहा हूं ।

लावा दबा हुआ है
ऐसे उबल रहा हूं ।

"तनहा" वहां किसी दिन
मैं भी चार पल रहा हूं ।  
 

 

अक्टूबर 16, 2012

POST : 187 मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

आज लिख रहा है
रंगबिरंगे फूलों से
रौशनी की किरणों से
हमारी कहानी कोई।
 
उसे क्या मालूम
पाए हैं हमने तो कांटे
जीवन भर।

छाया रहा
हमारी ज़िंदगी पर
सदा इक घना अंधेरा है
पल पल जीवन का
गुज़रा है इस तरह
सर्द रातें खुले गगन में
काटे कोई जिस तरह।

कभी किया नहीं
हमने ज़िक्र तक किसी से
अपने दुःख दर्द
अपनी परेशानियों का।

हर सफलता हर ख़ुशी
रही बहुत दूर हम से
मगर दुनिया वालेन कहते रहे
हमें मुक्कदर का सिकंदर।

बना रहा हमारा चित्र
है चित्रकार जो मिला ही नहीं
कभी हमें जीते जी।

ये मेरी जीवन कथा ये चित्र 
दोनों हैं किसी की
सुंदर कल्पनाएं 
नहीं है इनमें कोई सच्चाई।

हां देखा हो शायद
ऐसा सपना कभी मैंने
किसी दिन अपना दिल
बहलाने को। 

POST : 186 मेरा संकल्प है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 मेरा संकल्प है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

लेता हूं शपथ
बनाना है ऐसा समाज
जिसमें कोई अंतर कोई भेदभाव
न हो इंसानों में ।

मिटाना है अंतर
छोटे और बड़े का
अमीर और गरीब का ।

नहीं रहेगा
एक शासक न दूसरा शासित
कोई न हो भूखा
कहीं पर किसी भी दिन
न ही होगा कोई बेबस और लाचार
सभी को मिलेंगे
एक समान
जीने के सभी अधिकार ।

रुकना नहीं है मुझे
चलते जाना है
उस दिशा में
जहां सब रहें सुख चैन से
करने को समाज के
उज्जवल भविष्य का निर्माण ।

प्रतिदिन करता हूं
खुद से ये वादा
चाहे कुछ भी हो उसका अंजाम
टकराना है झूठ से
अन्याय से
अत्याचार करने वालों से
जनहित के लिए ।

डरना नहीं कभी
सत्ता का दुरूपयोग करने वालों से
उठानी है अपनी आवाज़
भ्रष्टाचार के खिलाफ
जीवन के हर मोड़ पर
निभाना है संकल्प
मातृभूमि के प्रति
अपना दायित्व निभाने का । 
 

 

अक्टूबर 15, 2012

POST : 185 मुझ बिन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     मुझ बिन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कब होता है किसी के
होने का एहसास
समझ आता है
न होने का एहसास ।

जब नहीं होता है कोई पास
लगता है तब
कि था कितना करीब
जब मिला करते थे रोज़
होती न थी कभी बातचीत भी
कहते हैं अब मिले हो तुम
कितनी मुद्दत के बाद ।

कल पूछा था उसने
क्या छोड़ दिया लिखना
बीत गये बहुत दिन
पढ़े हुए कहानी कोई ।
 
ढूंढते रहे थे उस दिन
मुशायरे में तुम्हें
सुन लेते कोई ग़ज़ल
फिर तुमसे नई पुरानी ।
 
लिखता रहा जब तक
नहीं कहा था कभी उसने
उसे लगता है अच्छा
मुझे  पढ़ना
सुनाया करता था जब मैं
सुनना चाहता था कहां कोई ।

न होना मेरा लग रहा है
बेहतर मेरे होने से
आज कोई देखता ही नहीं मुझे
मेरे बाद होंगी शायद बातें मेरी
कोई किसी दिन कहेगा किसी से
कभी होता था यहां
मुझ सा भी कोई इंसान । 

POST : 184 अच्छा ही है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अच्छा ही है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अच्छा है
सफल नहीं हो सका मैं
अच्छा है
मुझे नहीं मिला
बहुत सारा पैसा कभी
अच्छा है
मिले हर दिन मुझे
नये नये दुःख दर्द
अच्छा है
बेगाने बन गये
अपने सब धीरे धीरे ।

अच्छा है
मिलता रहा
बार बार धोखा मुझको
अच्छा है
नहीं हुआ कभी
मेरे साथ न्याय
अच्छा है
पूरी नहीं  हुई
एक दोस्त की मेरी तलाश ।

अच्छा है
मैं रह गया भरी दुनिया में
हर बार ही अकेला
अच्छा है
पाया नहीं कभी
सुख भरा जीवन
अच्छा है नहीं जी सका
चैन से कभी भी मैं ।

अगर ये सब
मिल गया होता मुझे तो
समझ नहीं पाता
क्या होते हैं दर्द पराये
शायद कभी न हो सकता मुझको
वास्तविक जीवन का
सच्चा एहसास
संवारा है 
ज़िंदगी की कश-म-कश ने
मुझको 
निखारा है 
हालात की तपिश ने
मुझको
आग में तपने के बाद
ही तो बनता है
खरा सोना कुंदन ।

चला नहीं
बाज़ार में दुनिया के
तो क्या हुआ
विश्वास है पूरा मुझको
अपने खरेपन पर
नहीं पहचान सके
लोग मुझे तो क्या
खुद को पहचानता हूं
मैं ठीक से
अपनी पहचान
नहीं पूछनी किसी दूसरे से
जानता हूं अपने  आप को मैं
अच्छा है । 
 

 

POST : 183 हम दोनों की सोच ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

हम दोनों की सोच ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरे दिल में
नहीं रहती तुम
तुम्हारा एहसास
रहता है
मेरे मन में 
मस्तिष्क में ।

मैं चाहता नहीं तुम्हें
तुम्हारे
रंग रूप के कारण
मुझे तो भाती है
तुम्हारी वो सोच
मिलती है
जो सोच से मेरी ।

मुझे रहना है
बन कर वही सोच
तुम्हारे दिमाग में
दिल में तुम्हारे
नहीं रहना है  मुझको ।

होता नहीं उसमें
प्यार का कोई  एहसास
मुहब्बत का हो
या  फिर नफरत का
दर्द का या कि ख़ुशी का
सब होता है एहसास
दिमाग में हमारे
धड़कता है दिल भी
जब आता है  कोई 
एहसास मन मस्तिष्क में ।

आधुनिक युग का प्रेमी मैं
जीता हूं यथार्थ में
रहता है दिल में
केवल लाल रंग का खून
जो नहीं प्यार जैसा रंग
दिल में रहने की
बात है वो कल्पना
जिसे मानते रहे
सच अब तक सभी प्रेमी ।

प्यार हमारा
रिश्तों का कोई 
अटूट बंधन नहीं 
लगने लगे जो
बाद में 
एक कैद दोनों को ।

पास रहें चाहे दूर
हम करते रहेंगे 
प्यार इक दूजे को
सोच कर समझ कर
जान कर
समझती हो मुझे तुम
तुम्हें जानता हूं मैं 
मिलते हैं दोनों के विचार
करते हैं एक दूसरे का
हम सम्मान
हमारे बीच नहीं है
कोई दीवार
न ही हम बंधे हैं
किसी अनचाहे बंधन में
करते रहे  करते हैं
करेंगे हमेशा ही 
हम आपस में सच्चा प्यार ।
 

 

अक्टूबर 14, 2012

POST : 182 बस बहुत हो चुका ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     बस बहुत हो चुका ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

कोई
तथाकथित ईश्वर
धर्म गुरु
कोई पूजास्थल
अब नहीं करेंगे
निर्णय
सही और गलत का ।
 
स्वर्ग या मोक्ष
की चाह
नर्क की सज़ा
का डर
कर नहीं सकेंगे
विवश मुझे ।

अब चलना होगा
सही मार्ग पर मुझे
छोड़ सब बातें
धर्मों की ।

समाज के दोहरे मापदंड
हित अहित
मान अपमान की चिंता
रोक नहीं पाएंगे
मुझे अब कभी ।

बस बहुत हो चुका
जी सकूंगा कब तक
आडंबर के सहारे।
 
मुझे चलना होगा
उस राह पर
जिस पर चलना चाहे
मेरा मन मेरी आत्मा
फिर चाहे जो भी हो ।

कोई अन्तर्द्वंद कोई ग्लानि
कोई पश्चाताप
सत्य और झूठ का
पुण्य और पाप का
अच्छाई और बुराई का
नहीं अब रहा बाकी ।
 
तय करेगा
केवल मेरा विवेक
और चलना है अब मुझे
उसी मार्ग पर
जिसे सही मानता हूं मैं 
मन से आत्मा से ।
 

 

POST : 181 इंसान बेचते हैं , भगवान बेचते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते हैं , भगवान बेचते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते है    भगवान बेचते हैं
कुछ लोग चुपके चुपके ईमान बेचते हैं ।

लो हम खरीद लाये इंसानियत वहीं से
हर दिन जहां शराफत शैतान बेचते हैं ।

अपने जिस्म को बेचा  उसने जिस्म की खातिर
कीमत मिली नहीं   पर नादान बेचते है ।

सब जोड़ तोड़ करके सरकार बन गई है
जम्हूरियत में ऐसे फरमान बेचते हैं ।

फूलों की बात करने वाले यहां सभी हैं
लेकिन सजा सजा कर गुलदान बेचते हैं ।

अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं
अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं ।

सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना
लाशें खरीद कर जो , शमशान बेचते हैं ।  
 

 

POST : 180 फ़लसफ़ा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        फ़लसफ़ा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फलसफा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं
अब छुपा आंसुओं को वो मुस्कराने लगे हैं ।

जान पाये नहीं जो कभी हमारी वफ़ा को
बात दिल की कहां वो जुबां पे लाने लगे हैं ।

मिल गया खेत को बेच कर ये गर्दोगुबार
हर कहीं इस तरह कितने कारखाने लगे हैं ।

आपकी इस बज़्म में हमीं नहीं बिनबुलाये
और कुछ लोग अक्सर यहां पे आने लगे हैं ।

अब नहीं काम करती दवा न कोई दुआ ही
लोग "तनहा" यहां ज़हर खुद ही खाने लगे हैं । 
 

 

POST : 179 जाग जाओ बहुत सो लिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जाग जाओ बहुत सो लिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जाग जाओ बहुत सो लिये 
दिन चढ़ा ,आंख तो खोलिये ।

रौशनी कब से है मुन्ताज़िर
खिड़कियां ज़ेहन की खोलिये ।

बेगुनाही में खामोश क्यों
बोलिये और सच बोलिये ।

राह में था अकेला कोई
बढ़ के साथ उसके हम हो लिये ।

हम को कोई न ग़म था मगर
ग़म पे औरों के हम रो लिये ।

खुद को धोखा न देना कभी
आप अपने से सच बोलिये ।

ज़िंदगी का करो सामना
राज़ "तनहा" सभी खोलिये ।
 

 

POST : 178 यहां तो आफ़ताब रहते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

यहां तो आफ़ताब रहते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

यहां तो आफताब रहते हैं
कहां, कहिये ,जनाब रहते हैं ।

शहर का तो है बस नसीब यही
सभी खानाखराब रहते हैं ।

क्या किसी से करे सवाल कोई
सब यहां लाजवाब रहते हैं ।

सूरतें कोई कैसे पहचाने
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं ।

पत्थरों के मकान हैं लेकिन
गमलों ही में गुलाब रहते हैं ।

रूह का तो कोई वजूद नहीं
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं ।  
 

 

अक्टूबर 13, 2012

POST : 177 लिखे खत तुम्हारे नाम दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   लिखे खत तुम्हारे नाम दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

लिखता रहा नाम तुम्हारे
हर दिन मैं खत 
अकेला था जब भी
और उदास था मेरा मन  
जब नहीं था कोई
जो सुनता मेरी बात
मैं लिखता रहा
बेनाम खत तुम्हारे नाम।

जानता नहीं 
नाम पता तुम्हारा
मालूम नहीं
रहते हो किस नगर की
किस गली में तुम दोस्त।

मगर सभी सुख दुःख अपने
खुशियां और परेशानियां

लिखता रहा नाम तुम्हारे  
बेनाम खत तुम्हारे नाम।

सोचता हूं  शायद तुम भी
करते हो ऐसा ही मेरी तरह 
लिखते हो मेरे लिए खत
तुम भी यही सोच कर।

लिखता रहा सदा तुम्हीं को
तलाश भी करता रहा तुम्हें।

फिर आज दिल ने चाहा
तुमसे बात करना
और मैं लिख रहा हूं 
फिर ये खत नाम तुम्हारे।

मिलेंगे हम अवश्य
कभी न कभी तो जीवन में
और पहचान लेंगे
इक दूजे को।

तुम तब पढ़ लेना मेरे ये
सभी खत नाम तुम्हारे 
और मुझे दे देना इनके
वो जवाब जो लिखते हो
तुम भी हर दिन सिर्फ मेरे लिये 
मेरे दोस्त। 
 
 ( इक दोस्त की तलाश मुझे हमेशा से रही है। मेरा लेखन उसी की खोज को लेकर है। )

POST : 176 मरने से डर रहे हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

मरने से डर रहे हो ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

मरने से डर रहे हो
क्यों रोज़ मर रहे हो ।

अपने ही हाथों क्यों तुम
काट अपना सर रहे हो ।

क्यों कैद में किसी की
खुद को ही धर रहे हो ।

किस बहरे शहर से तुम
फ़रियाद कर रहे हो ।

कातिल से ले के खुद ही
विषपान कर रहे हो ।

पत्थर के आगे दिल क्यों
लेकर गुज़र रहे  हो । 
 

 

POST : 175 आज हैं अपराधी बनेगें कल नेता ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज हैं अपराधी बनेंगे कल नेता ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया 

हर बात को देखने का होता है
सबका अपना अपना नज़रिया
किसी को कुछ भी लगे
हमको तो
भाता है अपना सांवरिया ।

किसलिए हो रहे हैं
इन अपराधियों को देख कर आप हैरान
आने वाले दिनों में यही
बढ़ाएंगे देश की देखना शान ।

अगर नए नए अपराध नहीं होंगे
अपराधी न होंगे
तो मिलेंगे कैसे आपको भविष्य के
संसद और विधायक ।

शासन करने
राज करने के लिए
नहीं चाहिएं सोचने समझने वाले
राजा बनते हैं हमेशा ही
मनमानी करने वाले ।

सब को हक है
राजनीती करने का लोकतंत्र में
भ्रष्टाचार का विरोध कर 
नहीं जीत सकता कोई कभी चुनाव
अपराध जगत है
आम लोगों के लिए सत्ता की एक नाव ।

जिनके बाप दादा नहीं हों नेता अभिनेता 
उनको बिना अपराध कौन टिकट देता
देखो आज आपको
लग रहा जिनसे बहुत डर
कल दिया करोगे उनको
रोज़ खुद जीने के लिए कर
सरकार कैसे मिटा दे
भला सारे अपराध देश से
लोकतंत्र में नेताओं की बढ़ गई है ज़रूरत
नेता बन या तूं भी या फिर जा मर ।

भ्रष्टाचार और अपराध का
राजनीती से है पुराना नाता 
एक है पाने वाला दूसरा है उसका दाता
समझ लो इनके रिश्तों को आप भी आज
बताओ इनमें  कौन है
किसका बाप
और कौन किसकी औलाद ।  
 
People with criminal tendencies in politics and increasing number of  candidates with criminal background stain democracy - राजनीति में अपराधी |  Jansatta

अक्टूबर 12, 2012

POST : 174 हादिसे दिल पे आते रहे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

हादिसे दिल पे आते रहे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

हादिसे दिल पे आते रहे
दास्तां हम सुनाते रहे ।

बेगुनाही भी थी इक खता
हम सज़ा जिसकी पाते रहे ।

मौत हमसे रही दूर ही
लाख हम ज़हर खाते रहे ।

हमने सपने संजोए थे जो
ज़िंदगी भर रुलाते रहे ।

तंग आकर करूं ख़ुदकुशी
लोग इतना सताते रहे ।

दिल बहल जाये कुछ इसलिये 
शायरी में लगाते रहे । 
 

 

POST : 173 मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है
सुकूं सा मुझे अब तो आने लगा है ।

कोई फूल तन्हा ज़रा देर खिलकर
बहारों में मुरझाया जाने लगा है ।

उसे भूल जाऊं ये कसमें दिलाकर
गया ,जो वो फिर याद आने लगा है ।

ख्यालों में ,ख़्वाबों में रह-रह के हमको
तुम्हारा तस्व्वुर सताने लगा है ।

कभी हमने-तुमने जो गाया था मिलकर
वही गीत दिल गुनगुनाने लगा है ।  
 

 

POST : 172 मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे ।

उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे ।

जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे ।

आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे ।

दामन अपना तू कांटों से बचा के चल
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे ।

किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे ।

ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे ।  
 

 

POST : 171 झूठी सुन्दरता ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   झूठी सुंदरता ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

खूबसूरत बदन
झील सी गहरी आँखें
मरमरी से होंट
उन्नत उरोज
नागिन से काले बाल
मदमस्त अदाएं
उस पर सोलह श्रृंगार ।

सभी को
कर रहे थे दीवाना
लग रहा था धरा पर जैसे
उतर आई है अप्सरा कोई ।

तभी सुनाई दिया
उसका कर्कश स्वर
नफरत भरे उसके बोल
और लगने लगी
बेहद बदसूरत वो ।

था सब कुछ उसके पास
मगर नहीं था
कुछ भी उसके पास ।

POST : 170 अधूरी प्यास ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       अधूरी प्यास ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

युगों युगों से नारी को
छलता रहा है पुरुष
सिक्कों की झंकार से
कभी कीमती उपहार से
सोने चांदी के गहनों से
कभी मधुर वाणी के वार से ।

सौंपती रही नारी हर बार ,
तन मन अपना कर विश्वास
नारी को प्रसन्न करना
नहीं था सदा पुरुष की चाहत ।

अक्सर किया गया ऐसा
अपना वर्चस्व स्थापित करने को
अपना आधिपत्य
कायम रखने के लिये ।

मुझे पाने के लिये 
तुमने भी किया वही सब
हासिल करने के लिये 
देने के लिये  नहीं
मैंने सर्वस्व समर्पित कर दिया तुम्हें ।

तुम नहीं कर सके ,
खुद को अर्पित कभी भी मुझे
जब भी दिया कुछ तुमने
करवाया उपकार करने का भी
एहसास मुझको और मुझसे 
पाते रहे सब कुछ मान कर अपना अधिकार ।

समझा जिसको प्यार का बंधन 
और जन्म जन्म का रिश्ता
वो बन गया है एक बोझ आज
मिट गई मेरी पहचान
खो गया है मेरा अस्तित्व ।

अब छटपटा रही हूँ मैं
पिंजरे में बंद परिंदे सी
एक मृगतृष्णा था शायद
तुम्हारा प्यार मेरे लिये 
है अधूरी प्यास
नारी का जीवन शायद ।     
 
 Nari teri yahi kahani aanchal mein doodh aur aankhon mein paani - An online  Hindi story written by Renu Shukla | Pratilipi.com

POST : 169 नेपथ्य ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        नेपथ्य ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

किसी लेखक ने
भूख से तड़पते हुए
दरिद्रता भरे
जीवन पर लिखी थी
जो कहानी ।

तुम कर रहे हो
अभिनय
उस कहानी के
नायक की भूमिका का ।

जो दर्द भरे बोल
निकले थे
एक खाली पेट से
बोल रहे हो तुम
उन बोलों को
भरपेट मनपसंद भोजन खा कर ।

और चाहते हो
करना कल्पना उस नायक के ,
दर्द के एहसास की ।

चाहे कर लो
कितना भी जतन 
ला नहीं पाओगे वो आंसू
जो स्वता ही निकल आते हैं ,
हर गरीब के बेबसी में ।

नहीं मिल सकते कहीं से
बिकते नहीं हैं
दुनिया के बाज़ार में ।

तुम बेच सकते हो बार बार
झूठे आंसू दिखावे के
है कमाल का अभिनय तुम्हारा
महान कलाकार हो तुम ।

आवाज़ तुम्हारी रुलाती है
भाती है दर्शकों को
मिल जायेंगी तुम्हें
तालियाँ दर्शकों की
और ढेर सारी दौलत भी ।

मगर
कहानी का लेखक
कहानी के नायक की तरह
जीता रहेगा गरीबी का
दुःख भरा जीवन हमेशा ।

उसकी कहानी से हो नहीं पायेगा 
न्याय कभी भी । 

POST : 168 यही सपना है मेरा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

यही सपना है मेरा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

रात एक बेहद खुबसूरत सपना देखा
मैं एक नई दुनिया में रह रहा हूं
हरा भरा मैदान है
पेड़ पौधे
फूल हैं
परिंदों की चहचहाह्टें ।

मैं सवतंत्र हूं वहां पर
कोई चिंता नहीं
घर की कोई दीवार नहीं
रिश्तों नातों की कोई जंजीरें नहीं ।

कोई रोकने वाला नहीं
कोई टोकने वाला नहीं
कोई दुःख नहीं
कोई कमी नहीं
किसी तरह की कोई ज़रूरत नहीं ।

कोई डर नहीं
घबराहट नहीं
हर तरफ बस जीवन ही जीवन है
प्यार ही प्यार है ।

इस जहां में
पुरानी दुनिया की कोई भी बुराई  नहीं है
न कोई स्वार्थ न लोभ लालच
कुछ भी नहीं दिखाई देता वहां
न धन दौलत न सुख सुविधा
न कोई आधुनिक साधन
मगर कुछ भी कमी नहीं लग रही थी ।

इन सब की कोई ज़रूरत ही नहीं थी वहां पर
लग रहा था बस मेरा एक
दोस्त वहीं कहीं आस पास है
कोई नाम नहीं जिसका
रंग रूप का पता भी नहीं
कोई चेहरा नहीं पहचान नहीं ।

केवल एक एहसास है
वहां किसी के होने का
प्यार - अपनेपन का
हम दोनों रहते हैं प्यार से
जैसे सोचते थे
चाहते थे मगर रह पाए नहीं जीवन भर ।

कई बार नींद टूटी
मगर जागना नहीं चाहा
फिर से सो जाता
और देखने लगता वही सपना ।

काश जागता न कभी मैं
आज सुबह के उस सपने से
लोग कहते हैं
सुबह के सपने सच हो जाते हैं ।

सच हो जाए काश
मेरा आज का वही सपना । 
 

 

अक्टूबर 11, 2012

POST : 167 ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है
ज़िंदगी हमें जिस मोड़ पर भी लाई है ।

झूमकर हमारी मौत पर सभी नाचें
आरज़ू सभी को आखिरी बताई है ।

किस तरह जिया है, किस तरह मरा कोई
ग़म नहीं किसी को रस्म बस निभाई है ।

कब तलक सहें हम ज़ुल्म इन खुदाओं के
इंतिहा हुई अब , ए खुदा दुहाई है ।

है बहुत अंधेरी शाम आज की लेकिन
हो रही सुबह पैगाम ये भी लाई है ।

है गुनाह क्यों दुनिया में प्यार करना भी
तूं बता ज़माने क्यों नज़र चुराई है ।

चार दिन को आये सब यहां मुसाफिर हैं
पर नहीं किसी ने राह तक दिखाई है ।

अब नहीं मिलेंगे इंतज़ार मत करना
कह गया है कोई , ज़िंदगी पराई है ।

छोड़ उस जहां को आ गये यहां "तनहा"
क्या हसीं नज़ारा ,जब हुई रसाई है । 
 

 

अक्टूबर 10, 2012

POST : 166 जाँच आयोग ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जांच आयोग ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

काम नहीं था
दाम नहीं था
वक़्त बुरा था आया
ऐसे में देर रात
मंत्री जी का संदेशा आया
घर पर था बुलाया ।

नेता जी ने अपने हाथ से उनको
मधुर मिष्ठान खिलाया
बधाई हो अध्यक्ष
जांच आयोग का तुम्हें बनाया ।

खाने पीने कोठी कार
की छोड़ो चिंता
समझो विदेश भ्रमण का
अब है अवसर आया ।

घोटालों का शोर मचा
विपक्ष ने बड़ा सताया
नैया पार लगानी तुमने
सब ने हमें डुबाया ।

जैसे कहें आंख मूंद
सब तुम करते जाना
रपट बना रखी हमने
बिलकुल न घबराना ।

बस दो बार
जांच का कार्यकाल बढ़ाया
दो साल में रपट देने का
जब वक़्त था आया ।

आयोग ने मंत्री जी को
पाक साफ़ बताया
उसने व्यवस्था को
घोटाले का दोषी पाया ।

लाल कलम से
फाइलें कर कर काली
खोदा पर्वत सारा
और चुहिया मरी निकाली ।         
 
 Madhya Pradesh News: जांच आयोग इसी माह सौंपेगा लटेरी गोली कांड की रिपोर्ट -  Madhya Pradesh News The Commission of Inquiry will submit the report of the  Latteri firing incident this month

POST : 165 सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है
अब तो ऐसा हाल है
मर गए लोग भूख से
सड़ा गोदामों में माल है ।

बारिश के बस आंकड़े
सूखा हर इक ताल है
लोकतंत्र की बन रही
नित नई मिसाल है ।

भाषणों से पेट भरते
उम्मीद की बुझी मशाल है
मंत्री के जो मन भाए
वो बकरा हलाल है ।

कालिख उनके चेहरे की
कहलाती गुलाल है
जनता की धोती छोटी है
बड़ा सरकारी रुमाल है ।

झूठ सिंहासन पर बैठा
सच खड़ा फटेहाल है
जो न हल होगा कभी
गरीबी ऐसा सवाल है ।

घोटालों का देश है
मत कहो कंगाल है
सब जहां बेदर्द हैं
बस वही अस्पताल है ।

कल जहां था पर्वत
आज इक पाताल है
देश में हर कबाड़ी
हो चुका मालामाल है ।

बबूल बो कर खाते आम
हो  रहा कमाल है
शीशे के घर वाला
रहा पत्थर उछाल है ।

चोर काम कर रहे
पुलिस की हड़ताल है
हास्य व्यंग्य हो गया
दर्द से बेहाल है ।

जीने का तो कभी
मरने का सवाल है । 

ढूंढता जवाब अपने
खो गया सवाल है ।

POST : 164 सीता का पश्चाताप ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      सीता का पश्चाताप ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे स्वयं बनना था
एक आदर्श
नारी जाति के लिये ।

प्राप्त कर सकती थी
मैं स्वयं अपनी स्वाधीनता
अधिकार अपने ।

कर नहीं पाता
कभी भी रावण
मेरा हरण ।

मैं स्वयं कर देती
सर्वनाश उस पापी का
मानती हूँ आज मैं
हो गई थी मुझसे भयानक भूल ।

पहचाननी थी
मुझे अपनी शक्ति
मुझे नहीं करनी थी चाहत
सोने का हिरण पाने की ।

मेरे अन्याय सहने से
नारी जगत को मिला
एक गलत सन्देश ।

काश तुलसीदास
लिखे फिर एक नई रामायण
और एक आदर्श बना परस्तुत करे
मेरे चरित्र को
उस युग की भूल का
प्राश्चित हो इस कलयुग में । 

POST : 163 तीन छोटी कवितायेँ ( पूँजी // शोर // फुर्सत ) डॉ लोक सेतिया

1     पूंजी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सफलता की बता कर बातें
बांटनी चाही खुशियां
दोस्तों के संग ।

प्रतिद्वंदी बन गये 
दोस्त सब
लगे करने ईर्ष्या मुझ से ।

मिले जितने भी दुःख दर्द
दोस्तों से,सभी अपनों से
दुनिया वालों से छुपा कर
रखे अपने सीने में ।

दर्द की वो सारी दौलत
है बाकी मेरे पास
नहीं समाप्त होगी
जो जीवन प्रयन्त ।

2      शोर ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वो सुनता है
हमेशा सभी की फ़रियाद
नहीं लौटा कभी कोई
दर से उसके खाली हाथ ।

शोर बड़ा था
उसकी बंदगी करने वालों का
शायद तभी
नहीं सुन पाया
मेरी सिसकियों की
आवाज़ को आज खुदा ।

3   फुर्सत ( कविता  ) डॉ लोक सेतिया

मुझे पता चला
दुखों का पर्वत टूटा
तुम्हारे तन मन पर ।

निभानी तो है औपचारिकता
सांत्वना व्यक्त करने की
मगर करूं क्या व्यस्त हूं
अपनी दुनिया में मस्त हूं ।

फुर्सत नहीं है
ज़रा भी अभी
आऊंगा तुम्हारे पास
मैं दिखावे के आंसू बहाने
मिलेगी जब कभी फुर्सत मुझे । 
 

 
           

अक्टूबर 09, 2012

POST : 162 दृष्टि भ्रम ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

दृष्टि भ्र्म ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

शहर में आता है
नया अफसर
जब भी कोई
करता है दावा
नहीं मैं पहले जैसे
अफसरों जैसा ।

पत्रकार वार्ता में
देता है बयान
मैं कर दूंगा दूर
जनता की सब समस्याएं
लगा करेगा
मेरा खुला दरबार
आ सकता है कोई भी
करने फरियाद 
मुझे होगी बेहद ख़ुशी
कर इस शहर वालों की सेवा
उन से पहले भी
हर इक अफसर ने
दिया था बयान यही
दिया करेंगे यही फिर
उनके बाद आने वाले भी ।
 
बदलते रहेंगे अफसरान
रहेगा मगर हमेशा
उनका वही बयान
न बदला कभी
न बदलेगा कभी
प्रशासन और सरकार का बना बयान ।

पढ़ सुन कर उनका बयान
कर उस पर एतबार
कोई चला जाए उनके दरबार
और करे जाकर उनसे
कर्तव्य निभाने की कभी बात 
लगता तब उनको
दे रहा चुनौती कोई सरकार को
सत्ता के उनके अधिकार को
जो न माने उसका उपकार
हो जाती नाराज़ है उससे सरकार ।

कहलाता है जनसेवक
लेकिन शासक होता है शासक
आम है जनता अफसर हैं ख़ास
लाल बत्ती वाली उसकी कार
सुरक्षा कर्मी भी है साथ
है निराली उसकी शान
धरती के लोग जनता
अफसरों के लिए
ऊंचा आसमान ।

लेकिन इक दिन
वो भी आता है
अफसर न अफसर कहलाता है
पद न उसका रह  जाता है
आम नागरिक बन तब
उसको है समझ आता
रहने को केवल धरती है
उड़ते थे जिस आकाश में
नहीं उसका कोई भी अस्तित्व
उसका वो नीला रंग
है मात्र एक दृष्टि भ्रम । 
 

        

अक्टूबर 08, 2012

POST : 161 नये चलन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

नये चलन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

छोड़ गये डूबने वाले का हाथ

लोग सब कितने समझदार हैं

हैं यही बाज़ार के दस्तूर अब

जो बिक गये वही खरीदार हैं ।


जीते भी, मरते भी उसूलों पर थे

न जाने होते वो कैसे इंसान थे

उधर मोड़ लेते हैं कश्ती का रुख

जिधर को हवा के अब आसार हैं ।


किया है वादा, निभाना भी होगा

कभी रही होंगी ऐसी रस्में पुरानी

साथ जीने और मरने की कसमें

आजकल लगती सबको बेकार हैं ।


लोग अजब ,अजब सा शहर है

देखते हैं सुनते हैं बोलते नहीं हैं

सही हुआ, गलत हुआ, सोचकर

न होते कभी भी खुद शर्मसार हैं ।
 

    

POST : 160 समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

समझता हूं मेरे पास सब कुछ है  ,     
समझना है नहीं कुछ भी पास मेरे ।

समझता हूं बहुत कुछ जनता हूं  ,      
समझना है नहीं मैं जानता कुछ भी ।

समझता हूं खुद को बलशाली बहुत  , 
समझना है बड़ा ही  कमज़ोर हूं मैं ।

समझता हूं मेरे साथी है कितने  ,       
समझना है नहीं अपना है कोई ।

समझता हूं अपने आप को दाता ,     
समझना है हूं मैं बस इक भिखारी ।

समझता हूं कर सकता सभी कुछ ,    
समझना है नहीं कुछ हाथ में मेरे ।

समझता हूं मेरा दुश्मन ज़माना है ,   
समझना है खुद ही अपना हूं दुश्मन ।

समझता हूं मेरे हैं राज़दार कितने ,     
समझना है नहीं हमराज़ ही कोई ।

समझता हूं  मैं ज़िंदा आदमी हूं ,       
समझना है  होती ज़िंदगी क्या है ।

समझता हूं ,समझ पाता नहीं हूं ,     
समझना है अभी मुझको क्या क्या ।