मार्च 13, 2026

POST : 2068 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

सच कोई किसी को बताता नहीं 
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।  
 
कहना तो आसां है मगर फिर भी 
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं । 
 
हम से वो हमारा पता जान कर 
नाम तक भी अपना बताता नहीं । 
 
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे 
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । 
 
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल 
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं । 
 
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर 
लौट के वहां से कोई आता नहीं । 
 
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग 
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।  
 

 
 

कोई टिप्पणी नहीं: