सच कोई किसी को बताता नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
सच कोई किसी को बताता नहीं
ये लोगों को वैसे भी भाता नहीं ।
कहना तो आसां है मगर फिर भी
मुश्किल है कि ज़ुबां पे आता नहीं ।
हम से वो हमारा पता जान कर
नाम तक भी अपना बताता नहीं ।
मुस्कराया करो अपने हर ग़म पे
रोने वालों को कोई हंसाता नहीं ।
फूल ने अर्थी से किया ये सवाल
कोई दुल्हन को ऐसे सजाता नहीं ।
जा तो रहे हो , पत्थरों के शहर
लौट के वहां से कोई आता नहीं ।
दवा जान के पी जाते हैं कुछ लोग
ज़हर मरने को , कोई खाता नहीं ।

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