मार्च 06, 2026

POST : 2064 आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

     आधुनिक युग की कथा क्या है ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया  

साहित्य भले अधिकांश लोग नहीं पढ़ते हैं लेकिन धार्मिक ग्रंथों की कथाओं कहानियों से सभी परिचित हैं ।जानकारी और समझना अलग बात है मगर सबसे विचित्रता यही है कि शायद ही कभी अधिकांश लोग अपने विवेक से अथवा अंतरात्मा से पूछते हैं कि आदर्शों नैतिकता के मूल्यों की कसौटी पर खुद कितने खरे कितने खोटे हैं । शायद जितना बड़ा समझते हैं अपने आप को उतने ही छोटे हैं कभी सोचा है हम क्या करते हैं गंभीर विषय पर हंसते हैं जिन बातों का कोई मतलब नहीं उनका रोना रोते हैं । जानता हूं आज कोई भी रामायण गीता महाभारत जैसे ग्रंथ की रचना करने की बात सोचता ही नहीं शायद किसी को ऐसी किताब का कोई महत्व ही नहीं महसूस होता है फिर भी सोचना अगर उन ग्रंथों की बातों पर गौर किया जाए तो हम सभी हमारा समाज कैसा है । पुरातन कथाओं को छोड़ अपने पुराने इतिहास को ही जानते समझते तो समझ पाते कि हम कितने बौने नकली किरदार वाले बनते जा रहे हैं । क्या हम किसी धर्मयुद्ध में शामिल हैं या नहीं हैं सिर्फ दर्शक हैं तमाशाई हैं , हम में साहस ही नहीं सही और गलत की पहचान परख करने का अर्थात हम कायर और विवेकहीन लोग हैं जो अपनी असलियत छिपाने को ढकने को कोई आवरण ओढ़े रहते हैं । दुनिया हमेशा उनको महत्व देती है जो अपने समय में इस तरफ या उस तरफ खड़े होते हैं जो कौरव और पांडव राम और रावण कृष्ण और कंस में किसका चयन करना है नहीं निर्णय कर पाए उनको कालखंड की बात लिखने वालों ने किसी कूड़ेदान में भी जगह नहीं दी उनका कोई वजूद कहीं नहीं दिखाई देता है ।
 
हमको सोचना चाहिए हम खुद भी और हमारी शासन वर्ग की व्यवस्था कैसी है , कोई अपना तौर तरीका है कोई रास्ता जो भले कितना कठिन हो उस पर चलना ही है अपनी विचारधारा से पीछे हटना स्वीकार नहीं है । अगर वही हमने खो दिया है तो हमारे पास बचा कुछ भी नहीं हैं , कभी उधर कभी इधर अवसरवादी बन कर अथवा कायरता को किसी तरह से कुछ और नाम देकर इतिहास से नज़रें चुराते हैं । कभी हमारे देश और समाज के कुछ नायक हुआ करते थे जिन्होंने हमेशा अपने स्वार्थों धन दौलत शोहरत ऐश आराम को छोड़ अपनी विवेकशीलता से सही और गलत को समझ कर खुद भी सही को चुना और सभी को सही दिशा दिखलाई थी । लेकिन आज कैसे लोग नायक कहलाने लगे हैं हम कैसे उनको महानायक बतलाने लगे हैं जो सत्ता ताकत नाम शोहरत धन दौलत की खातिर खुद अपनी कीमत लगवाने लगे हैं । बिकने वाले कभी ख़रीदरार नहीं हो सकते हैं कोई बचा है जो किसी कीमत पर किसी हालात में बिकता नहीं है ।  ये सभी विडंबनाएं हमारे सामने हैं हम देख कर देखना ही नहीं चाहते अपनी आंखें नहीं सोचने समझने की शक्ति को ही छोड़ दिया है आंखों वाले अंधे बन गए हैं ।   
 
बात सिर्फ हथियारों की जंग की नहीं है हमने आसानी से सभी हासिल करने की चाहत में जीवन की लड़ाई लड़ने से पहले समझौता कर हार मान ली है । सोचते ही नहीं हम कैसा समाज बन गए हैं जो भेड़चाल की तरह चलता जाता है बुद्धि का उपयोग करना भूल गए हैं । हमने जितने भी धार्मिक ग्रंथ पढ़े हैं उन सभी में दो पक्ष अच्छाई बुराई या कुछ भी अन्य कारण से आमने सामने खड़े थे लेकिन दोनों तरफ कुछ लोग साथ देने विरोध करने की खातिर खुद समझ से निर्णय लिया करते थे जीतना हारना महत्व नहीं रखता आपका कोई मकसद होना आवश्यक है । लेकिन आजकल हम सभी खुद को विशेष मानते हैं जबकि ऐसी कोई विशेषता हम में होती ही नहीं है । आधुनिक शिक्षा ने हमारे समाज को ज़िंदा समाज से किसी निर्जीव समाज में बदल दिया है जो मशीनी ढंग से रहता है आचरण करता है वास्तविक ज्ञान से हम ख़ाली हो गए हैं । कैसे विडंबना है कि हम अपनी पुरानी विरासत परंपराओं पर गर्व की बात करते हैं जबकि हमारी खुद की कोई भी गौरवशाली परंपरा या विरासत भविष्य को सौंपने को नहीं पास हमारे । शायद तभी कोई  चाह कर भी कुछ लिख नहीं सकता है जो वास्तविकता है उसको अनकहा छोड़ना बेहतर है ताकि आने वाली पीढ़ियां शर्मिंदा नहीं हों । 
 
अंत में मुझे इक लोककथा याद आती है , किसी नगर को शानदार बनाने को इक जादूगर अपने जादू से सभी इंसानों से जीव जंतुओं पेड़ पौधों को चमकीले लिबास से ढक देता है । ठीक जैसे हमने खुद को कितनी तरह के उजले कपड़ों कीमती ज़ेवर इत्यादि से सजाया हुआ है । भैतिक ही नहीं आध्यात्मिक तौर भी झूठी नकली चीज़ों से खुद को ढक लिया है जिस से दिखाई देता है शानदार है मगर भीतर धीरे धीरे खोखलापन बढ़ता गया है और उस जादूगर की दिखावे की दुनिया अचानक किसी जर्जर इमारत की तरह ध्वस्त हो जाने को अभिशप्त है । हमारी हर चीज़ काल्पनिक है वास्तविकता से हमारा देश समाज कोई मेल नहीं खाता है । संक्षेप में हमने पत्थरों को हासिल करने में अनमोल रत्नों को गंवा दिया है और हम धरती से आकाश छूने चांद पर जाने के नाम पर नीचे रसातल में पहुंच चुके हैं , अब पछताने से भी क्या हासिल होगा ।  
 

  

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