अक्टूबर 22, 2012

POST : 194 उम्र कैद ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

उम्र कैद ( हास्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं ही नहीं होती
उम्रकैद की किसी को सज़ा ।

साबित करना होता है
उसका बड़ा कोई गुनाह ।

साबित नहीं हो पाते सभी के किए अपराध
मिलते हैं बचाव के अवसर बार बार
रख सकते हैं अपराधी अपना वकील
जो देता है बचाव में नई नई फिर दलील ।

अदालत का रहता  वही उसूल हर बार
बेगुनाह को न हो सज़ा बच जाये भले गुनहगार
आम अपराध की सज़ा मिलती कुछ साल
चलता कानून भी  धीमी धीमी है चाल ।

हर सुविधा मिलती जेल में चुका कर मोल
देख चुपचाप कुछ न अदालत कभी भी बोल
ध्यान रखती कैदियों का खुद हर सरकार
करती है अपराधियों के लिए कई जेल सुधार ।

उम्र कैद मिलती सबको बिना अपराध मगर 
विवाह रचाने धर्मपत्नी खुद घर ले आने पर 
हथकड़ी नहीं इजाज़त कैदी को आने जाने पर 
जेलर की अनुमति से नियम कायदे समझ कर  
खुद लौट आता मुजरिम उसी सही ठिकाने पर ।

उसे उम्र भर काटनी होती है हर दिन ही सज़ा
जेलर को लाया था जो घर बुला आया मज़ा 
सज़ा उसकी न हो सकती कभी भी है माफ़
कोई सुनता नहीं फिर उसकी कोई फ़रियाद ।

गंभीर है जुर्म शादी रचाने का
विवाह संगठित श्रेणी का
माना जाता इक अपराध ।

साथ छोड़ जाते हैं उसके  पुराने साथी
गये थे कभी जो बन कर उसके बाराती
भोगता सज़ा बस अकेला बना जो दूल्हा
जलता है ऐसे सुबह शाम घर का चूल्हा ।
 
है राज़ मगर जानते सभी हैं पुरुष फिर भी 
कोई भी किसी को समझाता न कभी पहेली   
दोनों का है उम्र भर का कैदी जेलर सा नाता
इक देता है सज़ा दूजा खुश से रिश्ता निभाता ।  
 
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1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

Sath chhod jate hn purane sathi👌👍😊